Thursday, June 9, 2016

चर्चा प्लस ….. हरियाली ही बचा सकती है हमें ….. डॉ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
मेरा कॉलम 'चर्चा प्लस’ "दैनिक सागर दिनकर" में (08. 06. 2016) .....
 
My Column “ Charcha Plus” in "Dainik Sagar Dinkar" .....
 
चर्चा प्लस …..
हरियाली ही बचा सकती है हमें
- डॉ. शरद सिंह

हमने शहर बसाए और उनका निरंतर विस्तार किया किन्तु पेड़ों और जंगलों से इतने दूर होते चले गए कि आज महानगर की श्रेणी में जा पहुंचे शहर ऑक्सीजन की कमी को झेलने लगे हैं। गमलों की छोटी-सी हरियाली इतनी सक्षम नहीं है कि वह हवा का जहरीलापन कम कर सके, उसके वेग को नियंत्रित कर सके, पानी को रोककर रख सके, तापमान को प्राणियों के अनुकूल बनाए रख सके और ध्वनि को संतुलित कर सके। इन सबके लिए हमें अपने गमले को इतना बड़ा करना होगा कि वह एक पूरे शहर में बदल जाए। हमें ‘शहर वानिकी को अपनाना होगा। यह हमारे के भविष्य के लिए जरूरी है।

हमारे छोटे से घर में सजे हुए छोटे से गमले में जब कोई फूल खिलता है तो हमारा मन उसकी सुंदरता देखकर खिल उठता है। हमारी सांसें उनकी सुगंध से सुगंधित हो उठती हैं। एक गमले में खिला एक फूल हमारे जीवन के उस दिन को एक नई ऊर्जा से भर देता है। उदास दिखने वाली दुनिया के चेहरे पर हमें मुस्कुराहट दिखाई पड़ने लगती है। लेकिन यह सब कुछ एक गमले और एक दिन के लिए ही सीमित रहता है। दूसरे दिन जब फूल मुरझा चुका होता है और गमला सूना-सूना हो जाता है, तब हमें दुनिया फिर एक बार उदास दिखने लगती है, रूखी-रूखी-सी। हम कभी यह क्यों नहीं सोच पाते हैं कि इस खुशी को हमेशा समेटे रखा जा सकता है, घर छोटा-सा भले ही रहे लेकिन असंख्य पेड़-पौधे और अनगिनत फूलों के बीच हम रह सकते हैं। यदि हम अपने विचारों और इच्छाओं का आंगन थोड़ा-सा लंबा-चौड़ा कर लें तो उसमें भांति-भांति की वनस्पतियों के रंग भरकर अपने गमले की सीमाओं को भी बढ़ा सकते हैं। 
Charcha Plus Column of Dr Sharad Singh in "Sagar Dinkar" Daily News Paper

हमने शहर बसाए और उनका निरंतर विस्तार किया किन्तु पेड़ों और जंगलों से इतने दूर होते चले गए कि आज महानगर की श्रेणी में जा पहुंचे शहर ऑक्सीजन की कमी को झेलने लगे हैं। गमलों की छोटी-सी हरियाली इतनी सक्षम नहीं है कि वह हवा का जहरीलापन कम कर सके, उसके वेग को नियंत्रित कर सके, पानी को रोककर रख सके, तापमान को प्राणियों के अनुकूल बनाए रख सके और ध्वनि को संतुलित कर सके। इन सबके लिए हमें अपने गमले को इतना बड़ा करना होगा कि वह एक पूरे शहर में बदल जाए। हमें ‘शहरी वानिकी को अपनाना ही होगा। यह हमारे भविष्य के लिए जरूरी है। 
आज विश्व की जनसंख्या बढ़ती जा रही है। भारत की जनसंख्या में बढ़ोतरी ही नहीं बल्कि शहरों की संख्या में बढ़त होती जा रही है। सन् 1901 में मात्र 11 प्रतिशत जनसंख्या शहरों में रहती थी। सन् 1981 तक यह संख्या 23 प्रतिशत तक जा पहुंची। सन् 1981 के बाद शहरीकरण में और तेजी से वृद्धि हुई है। पुराने शहर फैलकर आस-पास के गांवों से जा जुड़े हैं। उनके बीच का वनक्षेत्र लुप्त हो गया है। शहर कांक्रीट के जंगलों में बदलते जा रहे हैं और उनमें लगभग असंवेदी, पथरीले प्राणियों की भाँति मानव का निवास सघन से सघनतम होता जा रहा है।
शहरों का विस्तार आज जितना लम्बाई में हो रहा है उतना ही ऊंचाई में भी में हो रहा है। बहुमंजिला इमारतें एक आवश्यकता के रूप में खड़ी हो गई हैं। गोया हमने न तो अपनी बांहें फैलाने की जगह के बारे में सोचा है और न सिर उठाने की जगह के बारे में। शहरों की बहुमंजिला इमारतों में रहने वाले न जाने कितने लोग ऐसे हैं जिनके पास अपने घर तो हैं लेकिन न तो जमीन अपनी है और न आसमान अपना।
मध्यतल के ये निवासी अपनी बीच की दुनिया में सिमट-सिकुड़ गए हैं। उनकी ऊर्जा का यदि कोई स्रोत है तो चंद छोटे-छोटे गमले। शहर के पार्कों में उपस्थित रहने वाली भीड़ साक्षी है। इस बात की कि लोग अपने गमलों को पर्याप्त नहीं समझते हैं। वे जानते हैं कि उनके गमले उन्हें भरपूर ऑक्सीजन नहीं दे सकते हैं। फिर भी न जाने क्यों वे अपने गमलों को शहर में बदल डालने की नहीं सोच पाते हैं लेकिन अब तो सोचना ही होगा। अन्यथा एक दिन ऐसा भी आ जाएगा जब हवा, पानी और ऊर्जा हमारा साथ छोड़ देगी।
हर शहर की लगभग एक-सी समस्या है- निवासियों का घनत्व और प्रदूषण। झुग्गी-झोपड़ियों की सघन बसाहट हर शहर, हर रेलवे लाइन के किनारे मौजूद है। इनमें रहने वालों के पास दैनिक-निस्तार के लिए साधन नहीं हैं। उन्हें इसकी परवाह भी नहीं है। वे रेलवे लाइनों और आस-पास के खाली स्थानों को अपने दैनिक-निस्तार के लिए काम में लाते हैं, फिर चाहे प्लेग फैले या डेंगू बुखार। सुलभ-शौचालयों की आदत सभी को नहीं है। वे वातावरण के बारे में सोच ही नहीं पाते हैं। वैसे सोच तो वे भी नहीं पाते हैं जो अपनी गाड़ियों को सड़कों पर अनावश्यक दौड़ाते रहते हैं। वे लोग भी कुछ नहीं सोचते हैं, जो मात्र इसलिए हर पल अपनी गाड़ी का हॉर्न बजाते रहते हैं कि उन्होंने कोई ‘स्पेशल हॉर्न लगवाया हुआ है। उनकी गाड़ी का हॉर्न कितने डेसीबल की ध्वनि लोगों की कोमल श्रवणेन्द्रिय पर मार रहा है, इसकी भी उन्हें न तो जानकारी होती है और न परवाह। देश की स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से अब तक वाहनों की संख्या चालीस गुना हो चुकी है। उनमें ऐसे वाहनों की संख्या साठ से सत्तर गुनी हो चुकी है, जो काले धुएं का गुबार उड़ेलते रहते हैं। ‘पूल बनाकर चलना हमने अभी तक नहीं सीखा है। एक व्यक्ति दो से छः सीटों वाला वाहन लेकर अकेले दौड़ता रहता है और हवा को कॉर्बन मोनोऑक्साइड से भरता रहता है। हवा का दम घुट रहा है।
देश में नदी हैं, झीलें हैं, जल के अनेक स्रोत हैं, मगर शुद्ध जल मात्र 20 प्रतिशत लोगों के पास ही उपलब्ध है। शहरों की तमाम नालियां जल स्रोतों में ही तो जाकर खुलती हैं। ये जल स्रोत अपनी वहन क्षमता से कहीं अधिक गंदगी ढो रहे हैं। गंगा, यमुना, नर्मदा से लेकर घरों के आँगन में बने नलकूप भी मल-जल से प्रभावित हैं। कारखानों का मैला पानी नदियों को काला कर रहा है। बड़े जल स्रोतों में हमने छोटे छेद करके उन्हें कमजोर बना दिया है। कल्पना कीजिए कि एक बड़ी पाइप है, जो एक बड़े बरतन में पानी पहुंचाने का काम करती है। उसमें यदि हर दो इंच पर एक छेद कर दिया जाए तो उस बरतन में पानी कैसे और कितना पहुंच पाएगा, हमने भूमिगत स्रोतों में अपने नलकूपों के रूप में हर फुट-दो फुट पर छेद ही तो किए हैं। अब हमारे तालाब और कुएं अपना जल-स्तर नहीं खोएंगे तो और क्या होगा, दरअसल, हमें पानी सहेजना चाहिए। लेकिन कैसे, बारिश के पानी को सहेजने के सारे तरीके भी तभी कारगर हो सकते हैं जब पेड़ लगाए जाएं। शहरों में पेड़ लगाए जाने की संकल्पना को ‘शहरी वानिकी नाम दिया गया है। पेड़, पौधे, वृक्ष अर्थात सभी छोटी-बड़ी वनस्पतियां हमारी मित्र हैं। वे हमें हर प्रकार का संरक्षण प्रदान करती हैं।
पेड़-पौधों वाले गांवों की अपेक्षा शहरों का तापमान अधिक रहता है। इस बढ़े हुए तापमान को नियंत्रित करने की क्षमता यदि किसी में है तो वह पेड़-पौधों में। एक अकेला वृक्ष अनुकूल परिस्थितियों में 400 लीटर पानी प्रतिदिन वाष्पित करता है जो लगभग पांच वातानुकूलित मशीनों के बराबर है। वृक्षों के कारण दिन और रात के तापमान में भी धीरे-धीरे परिवर्तन होता है। वृक्षों की अधिकता वाले स्थानों में न तो रात तेजी से अधिक ठंडी होती है और न दिन तेजी से अधिक गर्म। ऐसा प्राकृतिक वातानुकूलन वृक्षों के सिवा भला और कौन कर सकता है।
शहरों में कांक्रीट की बहुमंजिला इमारतें तो खड़ी हो ही रही हैं साथ ही उनमें बड़े-बड़े शीशे लगाए जाने का भी प्रचलन बढ़ा है। शीशे सुंदर दिखते हैं। ये भीतर बैठे व्यक्ति को बाहर के परिदृश्य से जोड़े रखते हैं। लेकिन यदि बाहर इन शीशों से निश्चित दूरी पर हरे-भरे वृक्ष नहीं हैं तो ये शीशे सूरज की गर्मी और रोशनी को परावर्तित करके आँखों तथा त्वचा के लिए कष्टप्रद साबित हो सकते हैं। ये शीशे अंदर बैठे लोगों को भले ही सूरज की तपती किरणों से बचाते हैं लेकिन बाहर मौजूद लोगों पर किरणें परावर्तित करके उष्मा और तीखी रोशनी फेंकते रहते हैं। यदि आस-पास वृक्ष हों तो वे परावर्तित उष्मा और किरणों को एक बड़े प्रतिशत में अवशोषित कर सकते हैं। इसीलिए शीशों की सुंदर दुनिया के साथ हरियाली को जोड़े रखना उतना ही आवश्यक है जितना कि खुली हवा में सांस लेना।
वायु में घुलने वाली विषाक्त गैसों से वृक्ष हमें बचाते ही हैं लेकिन इसके साथ ही ध्वनि की घातक तीव्रता से भी हमारी रक्षा करते हैं। मोटे छाल वाले वृक्ष ध्वनि-तरंगों में से कुछ अवशोषित कर लेते हैं तथा कुछ परावर्तित कर देते हैं। जरा सोचिए कि क्या एक छोटे-से गमले में लगा एक नन्हा-सा पौधा ध्वनि की तीव्रता से हमारे कानों को बचा सकता है, फिर क्यों न हम अपने गमले के शौक को एक पूरे शहर में बदल डालें। शहर में सड़कों के किनारे फूलों से लदे पेड़ हों, घरों के आस-पास छायादार वृक्ष हों और हर कॉलोनी में विविध वनस्पतियों से भरा हुआ एक सुंदर पार्क हो तो हमारा शहर किसी गमले के पौधे से कम खूबसूरत नहीं लगेगा। फिर अपने वनस्पति प्रेम को अपने गमले में समेटकर रखने के बदले उसे अपने शहर तक विस्तृत कर देना चाहिए ताकि हम आने वाली पीढ़ी को एक स्वस्थ पर्यावरण उपहार में दे जाएं।
         -----------------------------------
 

Sunday, June 5, 2016

एक स्त्री के नज़रिए से लिव-इन-रिलेशनशिप ...समीक्षा

Sharad Singh's Novel ' Kasbai Simon '
‘प्रभात ख़बर’ के रविवार परिशिष्ट (05. 06. 2016) में कलावंती जी ने मेरे उपन्यास ‘कस्बाई सिमोन’ की बेहतरीन समीक्षा की। इतनी सुंदर समीक्षा करने के लिए मैं कलावंती जी की आभारी हूं। यह समीक्षा ‘प्रभात ख़बर’ के सभी संस्करणों में प्रकाशित हुई।
 
' Prabhat Khabar ' Sunday Supplement 05.06.2016 - Review of Novel ' Kasbai Simon ' 

Wednesday, June 1, 2016

चर्चा प्लस ….. बुंदेलखण्ड में स्त्रियों की दर और दशा ….. डॉ. शरद सिंह



मेरा कॉलम 'चर्चा प्लस’ "दैनिक सागर दिनकर" में (01. 06. 2016) .....
 

My Column “ Charcha Plus” in "Dainik Sagar Dinkar" .....
 


चर्चा प्लस …..
बुंदेलखण्ड में स्त्रियों की दर और दशा
- डॉ. शरद सिंह

बुंदेलखण्ड के विकास के लिए उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश दोनों राज्यों में वर्षों से पैकेज आवंटित किए जा रहे हैं जिनके द्वारा विकास कार्य होते रहते हैं किन्तु विकास के सरकारी आंकड़ों से परे भी कई ऐसे कड़वे सच हैं जिनकी ओर देख कर भी अनदेखा रह जाता है। जहां तक कृषि का प्रश्न है तो औसत से कम बरसात के कारण प्रत्येक दो-तीन वर्ष बाद बुंदेलखंड सूखे की चपेट में आ जाता है। कभी खरीफ तो कभी रबी अथवा कभी दोनों फसलें बरबाद हो जाती हैं। जिससे घबरा कर कर्ज में डूबे किसान आत्महत्या जैसा पलायनवादी कदम उठाने लगते हैं। इन सबके बीच स्त्रियों की दर और दशा पर ध्यान कम ही दिया जाता है।
उत्तर प्रदेश और मध्यप्रदेश के लगभग बारह जिलों में फैला बुंदेलखंड आज भी जल, जमीन और सम्मानजनक जीवन के लिए संघर्षरत है। महिलाओं की दुखगाथाएं एक अलग ही तस्वीर दिखाती हैं। क्या इन सबके लिए सिर्फ सरकारें ही जिम्मेदार हैं अथवा बुंदेलखण्ड के नागरिक भी अपने दायित्वों के प्रति कहीं न कहीं लापरवाह हैं? यह एक अहम् प्रष्न है।
बुंदेलखण्ड में भी पिछले दशकों में पुरुषां की अपेक्षा स्त्रियों का अनुपात तेजी से घटा और इसके लिए कम से कम सरकारें तो कदापि जिम्मेदार नहीं हैं। यदि कोई जिम्मेदार है तो वह परम्परागत सोच कि बेटे से वंश चलता है या फिर बेटी पैदा होगी तो उसके लिए दहेज जुटाना पड़ेगा। बुंदेलखण्ड में औरतों को आज भी पूरी तरह से काम करने की स्वतंत्रता नहीं है। गांव और शहरी क्षेत्र, दोनों स्थानों में आर्थिक रूप से निम्न तथा निम्न मध्यम वर्ग के अनेक परिवार ऐसे हैं जिनके घर की स्त्रियां आज भी तीज-त्यौहारों पर ही घर से बाहर निकलती हैं और वह भी घूंघट अथवा सिर पर साड़ी का पल्ला ओढ़ कर। जिन तबकों में शिक्षा का प्रसार न्यूनतम है, ऐसे लगभग प्रत्येक परिवार की एक ही कथा है कि आमदनी कम और खाने वाले अधिक। आर्थिक तंगी के कारण अपने बच्चों को शिक्षा के बदले काम में लगा देना इस प्रकार के अधिकांश व्यक्ति अकुशल श्रमिक के रूप में अपना पूरा जीवन व्यतीत कर देते हैं। ठीक यही स्थिति इस प्रकार के समुदाय की औरतों की रहती है। ऐसे परिवारों की बालिकाएं अपने छोटे भाई-बहनों को सम्हालने और अर्थोपार्जन के छोटे-मोटे तरीकों में गुज़ार देती हैं। इन्हें शिक्षित किए जाने के संबंध में इनके माता-पिता में रुझान रहता ही नहीं है। ‘लड़की को पढ़ा कर क्या करना है?’ जैसा विचार इस निम्न आर्थिक वर्ग पर भी प्रभावी रहता है। इस वर्ग में बालिकाओं का जल्दी से जल्दी विवाह कर देना उचित माना जाता है। ‘आयु अधिक हो जाने पर अच्छे लड़के नहीं मिलेंगे’, जैसे विचार अवयस्क विवाह के कारण बनते हैं। छोटी आयु में घर-गृहस्थी में जुट जाने के बाद शिक्षित होने का अवसर ही नहीं रहता है। 


Charcha Plus Column of Dr Sharad Singh in "Sagar Dinkar" Daily News Paper
अन्य प्रदेशों की भांति बुंदेलखण्ड में भी ओडीसा तथा आदिवासी अंचलों से अनेक लड़कियां को विवाह करके लाया जाता हैं। यह विवाह सामान्य विवाह नहीं है। ये अत्यंत ग़रीब घर की लड़कियां होती हैं जिनके घर में दो-दो, तीन-तीन दिन चूल्हा नहीं जलता है, ये उन घरों की लड़कियां हैं जिनके मां-बाप के पास इतनी सामर्थ नहीं है कि वे अपनी बेटी का विवाह कर सकें, ये उन परिवारों की लड़कियां हैं जहां उनके परिवारजन उनसे न केवल छुटकारा पाना चाहते हैं वरन् छुटकारा पाने के साथ ही आर्थिक लाभ कमाना चाहते हैं। ये ग़रीब लड़कियां कहीं संतान प्राप्ति के उद्देश्य से लाई जा रही हैं तो कहीं मुफ़्त की नौकरानी पाने की लालच में खरीदी जा रही हैं। इनके खरीददारों पर उंगली उठाना कठिन है क्योंकि वे इन लड़कियों को ब्याह कर ला रहे हैं। इस मसले पर चर्चा करने पर अकसर यही सुनने को मिलता है कि क्षेत्र में पुरुष और स्त्रियों का अनुपात बिगड़ गया है। लड़कों के विवाह के लिए लड़कियों की कमी हो गई है। माना कि यह सच है कि सोनोग्राफी पर कानूनी शिकंजा कसे जाने के पूर्व कुछ वर्ष पहले तक कन्या भ्रूणों की हत्या की दर ने लड़कियों का प्रतिशत घटाया है लेकिन मात्र यही कारण नहीं है जिससे विवश हो कर सुदूर ग्रामीण एवं आदिवासी अंचलों की अत्यंत विपन्न लड़कियों के साथ विवाह किया जा रहा हो। यह कोई सामाजिक आदर्श का मामला भी नहीं है।
इसमें कोई संदेह नहीं है कि बुंदेलखण्ड ने अपनी स्वतंत्रता एवं अस्मिता के लिए लम्बा संघर्ष किया है और इस संघर्ष के बदले बहुत कुछ खोया है। अंग्रेजों के समय में हुए बुंदेला संघर्ष एवं स्वतंत्रता आंदोलन के कारण इस भू-भाग को विकास के मार्ग से बहुत दूर रखा गया। यहां उतना ही विकास कार्य किया गया जितना अंग्रेज प्रशासकों अपनी सैन्य सुविधाओं के लिए आवश्यक लगा। जब कोई क्षेत्र विकास की दृष्टि से पिछड़ा रह जाता है तो उसका सबसे बुरा असर पड़ता है वहां की स्त्रियों के जीवन पर। अतातायी आक्रमणकारी आए तो स्त्रियों को पर्दे और सती होने का रास्ता पकड़ा दिया गया। उसे घर की दीवारों के भीतर सुरक्षा के नाम पर कैद रखते हुए शिक्षा से वंचित कर दिया गया। यह बुंदेलखण्ड की स्त्रियों के जीवन का सच है। मानो अशिक्षा का अभिशाप पर्याप्त नहीं था जो उसके साथ दहेज की विपदा भी जोड़ दी गई। नतीजा यह हुआ कि बेटी के जन्म को ही पारिवारिक कष्ट का कारण माना जाने लगा। जब बेटियां ही नहीं होंगी तो बेटों के लिए बहुएं कहां से आएंगी?
एक सर्वे के अनुसार प्रति हजार लड़कों के अनुपात में लड़कियों की संख्या पन्ना में 507, टीकमगढ़ में 901, छतरपुर में 584, दमोह में 913 तथा सागर में 896 पाया गया। यह आंकड़े न केवल चिंताजनक हैं अपितु ओडीसा से लड़कियों को ब्याह कर लाने की विवशता की जमीनी सच्चाई भी उजागर करते हैं।
पृथक बुंदेलखण्ड राज्य की मांग करने वालों का यह मानना है कि यदि बुंदेलखण्ड स्वतंत्र राज्य का दर्जा पा जाए तो विकास की गति तेज हो सकती है। यह आंदोलन राख में दबी चिंनगारी के समान यदाकदा सुलगने लगता है। बुंदेलखंड राज्य की लड़ाई तेज करने के इरादे से 17 सितंबर 1989 को शंकर लाल मेहरोत्रा के नेतृत्व में बुंदेलखंड मुक्ति मोर्चा का गठन किया गया था। आंदोलन सर्व प्रथम चर्चा में तब आया जब मोर्चा के आह्वान पर कार्यकर्ताओं ने पूरे बुंदेलखंड में टीवी प्रसारण बंद करने का आंदोलन किया। यह आंदोलन काफी सफल हुआ था। इस आंदोलन में पूरे बुंदेलखंड में मोर्चा कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारियां हुईं। आंदोलन ने गति पकड़ी और मोर्चा कार्यकर्ताओं ने वर्ष 1994 में मध्यप्रदेश विधानसभा में पृथक राज्य मांग के समर्थन में पर्चे फेंके। कार्यकर्ताओं का उत्साह बढ़ा और वर्ष 1995 में उन्होंने शंकर लाल मेहरोत्रा के नेतृत्व में संसद भवन में पर्चे फेंक कर नारेबाजी की। तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव के निर्देश पर स्व. मेहरोत्रा व हरिमोहन विश्वकर्मा सहित नौ लोगों को रात भर संसद भवन में कैद करके रखा गया। विपक्ष के नेता अटल विहारी वाजपेई ने मोर्चा कार्यकर्ताओं को मुक्त कराया। वर्ष 1995 में संसद का घेराव करने के बाद हजारों लोगों ने जंतर मंतर पर क्रमिक अनशन शुरू किया, जिसे उमा भारती के आश्वासन के बाद समाप्त किया गया। वर्ष 1998 में वह दौर आया जब बुंदेलखंडी पृथक राज्य आंदोलन के लिए सड़कों पर उतर आए। आंदोलन उग्र हो चुका था। बुंदेलखंड के सभी जिलों में धरना-प्रदर्शन, चक्का जाम, रेल रोको आंदोलन आदि चल रहे थे। इसी बीच कुछ उपद्रवी तत्वों ने बरुआसागर के निकट 30 जून 1998 को बस में आग लगा दी थी, जिसमें जन हानि हुई थी। इस घटना ने बुंदेलखंड राज्य आंदोलन को ग्रहण लगा दिया था। मोर्चा प्रमुख शंकर लाल मेहरोत्रा सहित नौ लोगों को रासुका के तहत गिरफ्तार किया गया। जेल में रहने के कारण उनका स्वास्थ्य काफी गिर गया और बीमारी के कारण वर्ष 2001 में उनका निधन हो गया। पृथक्करण की मांग ले कर राजा बुंदेला भी सामने आए।
बुदेलखण्ड में किए गए लगभग सभी आंदोलनों एवं विकास की तमाम मांगों के बीच स्त्रियों के लिए अलग से कभी कोई मुद्दा नहीं उठाया गया जिससे विकास की वास्तविक जमीन तैयार हो सके। यदि परिवार की स्त्री पढ़ी-लिखी होगी, आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होगी तो वह अपने बच्चों के उचित विकास के द्वारा आने वाली पीढ़ी को एक विकसित दृष्टिकोण दे सकेगी। इसी विचार के साथ ‘बेटी बचाओ’ और ‘बालिका शिक्षा’, ‘जननी सुरक्षा’ जैसे सरकारी अभियान चलाए जा रहे हैं। बस, आवश्यकता है इन अभियानों से ईमानदारी से जुड़ने की। बेटे और बेटियों के बीच के इस असंतुलित आंकड़े के होते हुए बुंदेलखण्ड के विकास के बारे में सोचना ही हास्यास्पद है। बुंदेलखण्ड का वास्तविक विकास तभी हो सकता है जब बेटियों के अस्तित्व को बचाया जाए और उन्हें एक गरिमापूर्ण सुरक्षित वातावरण प्रदान किया जाए।
---------------

Thursday, May 26, 2016

चर्चा प्लस ….. लैंगिक समानता के लिए ज़मीनी प्रयासों को बढ़ाना ज़रूरी ….. डॉ. शरद सिंह

मेरा कॉलम 'चर्चा प्लस’ "दैनिक सागर दिनकर" में (26. 05. 2016) .....
My Column “ Charcha Plus” in "Dainik Sagar Dinkar" .....

चर्चा प्लस
लैंगिक समानता के लिए ज़मीनी प्रयासों को बढ़ाना ज़रूरी
- डॉ. शरद सिंह

( ‘‘अंतर्राष्ट्रीय विचार महाकुम्भ’’, सिंहस्थ 2016 में शामिल किए गए लेखिका के आलेख का अंश)
 
महिला, औरत, वूमेन या कोई और सम्बोधन - किसी भी नाम से पुकारा जाए, महिला हर हाल में महिला ही रहती है....और मेरे विचार से उसे महिला रहना भी चाहिए। प्रकृति ने महिला और पुरुष को अलग-अलग बनाया है। यदि प्रकृति चाहती तो एक ही तरह के प्राणी को रचती और उसे उभयलिंगी बना देती। किन्तु प्रकृति ने ऐसा नहीं किया। संभवतः प्रकृति भी यही चाहती थी कि एक ही प्रजाति के दो प्राणी जन्म लें। दोनों में समानता भी हो और भिन्नता भी। दोनों परस्पर एक दूसरे के पूरक बनें, प्रजनन करें और अपनी प्रजाति को पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाएं।
दुर्भाग्यवश, पुरुष और महिला ने मिल कर जिस समाज को गढ़ा था, पुरुष उसका मालिक बनता चला गया और महिला दासी। इतिहास साक्षी है कि पुरुषों ने युद्ध लड़े और खामियाजा भुगता महिलाओं ने। जब महिलाओं को इस बात का अहसास हुआ तो उन्होंने अपने दमन का विरोध करना आरम्भ कर दिया। पूरी दुनिया की औरतें संघर्षरत हैं किन्तु समानता अभी भी स्थापित नहीं हो सकी है। प्रयास निरन्तर किए जा रहे हैं। सरकारी और गैर सरकारी संगठन प्रयास कर रहे हैं लेकिन महिलाओं की अशिक्षा, अज्ञान और असुरक्षा जागरूकता के पहिए को इस प्रकार थाम कर बैठ जाती है कि सारे प्रयास धरे के धरे रह जाते हैं। दरअसल जागरूकता औरत के भीतर उपजनी आवश्यक है। स्वतः प्रेरणा से बढ़ कर और कोई शक्ति नहीं है जो शतप्रतिशत परिणाम दे सके। जिन महिलाओं ने अपने भीतर की पुकार को सुना और अपने अधिकारों के लिए संघर्ष किया उन्हें अधिकार मिले भी हैं, साथ ही वे दूसरी महिलाओं को भी अधिकार दिलाने में सफल रही हैं।
Charcha Plus Column of Dr Sharad Singh in "Sagar Dinkar" Daily News Paper
 मैं समझती हूं कि प्रगति के हिसाब से समूची दुनिया की महिलाओं की दो तस्वीरें हैं। पहली तस्वीर उन महिलाओं की है जो अपने साहस, अपनी क्षमता और अपनी योग्यता को साबित कर के पुरुषों की बराबरी करती हुई प्रथम पंक्ति में आ गई हैं या प्रथम पंक्ति के समीप हैं। दुनिया के उन देशों में जहां महिलाओं के अधिकारों की बातें परिकथा-सी लगती हैं, औरतें तेजी से आगे आ रही हैं और अपनी क्षमताओं को साबित कर रही हैं। चाहे भारत हो या इस्लामिक देश, औरतें अपने अधिकार के लिए डटी हुई हैं। वे चुनाव लड़ रही हैं, कानून सीख रही हैं, आत्मरक्षा के गुर सीख रही हैं और आम महिलाओं के लिए ‘आइकन’ बन रही हैं।
औरत की दूसरी तस्वीर वह है जिसमें औरतें प्रताड़ना के साए में हैं और अभी भी संघर्षरत हैं। वैश्विक सतर पर कोई भी देश ऐसा नहीं है जहां लैंगिक भेद पूरी तरह समाप्त हो गया हो। स्कैंडिनेवियन देश जैसे आईलैंड, नार्वे, फिनलैण्ड और स्वीडेन ही ऐसे देश हैं जो लैंगिक खाई को तेजी से पाट रहे हैं। इसके विपरीत मध्यपूर्व, अफ्रिका और दक्षिण एशिया में ऐसी महिलाओं की संख्या बहुत अधिक है जिनमें जागरूकता की कमी है। उन्हें अनेक वैधानिक अधिकार प्रदान कर दिए गए हैं लेकिन वे उनका लाभ नहीं ले पाती हैं। क्योंकि वे अपने अधिकारों से बेख़बर हैं।
जहां तक लैंगिक समानता का प्रश्न है तो संयुक्त राष्ट्र ने अपने 2015 के बाद के विकास एजेंडे के पूर्ण कार्यान्वयन को सुनिश्चित करने के लिए दुनिया भर में एक व्यापक अभियान शुरू किया है। विगत सितम्बर में हुई बैठक में घोषणा की गई कि राष्ट्रों के सतत विकास के लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए लैंगिक समानता और महिला सशक्तिकरण जरूरी हैं। महासचिव बान की मून ने संदेश में जोर दे कर कहा है- दुनिया अपने विकास लक्ष्यों को तब तक 100 प्रतिशत हासिल नहीं कर सकती है जब तक कि इसके 50 प्रतिशत लोगों अर्थात् महिलाओं के साथ ‘‘सभी क्षेत्रों में पूर्ण और समान प्रतिभागियों के रूप में व्यवहार नहीं किया जाता है।’’
महासचिव बान की मून के इस संदेश की पुष्टि करते हुए, सहायक महासचिव लक्ष्मी पुरी जो संयुक्त राष्ट्र महिला की उप कार्यकारी निदेशक भी हैं, ने भी कहा कि लैंगिक समानता और महिला सशक्तिकरण अपरिहार्य हैं।
विकास के लिए वित्तीय प्रबंधन पर विगत जुलाई में अपनाए गए अदिस अबाबा एजेंडे और विगत सितम्बर में 2030 के सतत विकास के एजेंडे के निष्कर्ष में यह बात दृढ़ता से दिखाई देती है।अदीस अबाबा एजेंडे का पहले अनुच्छेद में ही घोषणा की गई है-‘‘हम लैंगिक समानता और महिला सशक्तिकरण प्राप्त कर के रहेंगे।’’
2030 के एजेंडे में इस बात को माना गया है कि लैंगिक असमानता सभी असमानताओं की जननी है जिसमें देशों के बीच और देशों के अंदर मौजूद असमानताएं शामिल हैं।
पिछले कुछ दशकों की तुलना में आज दुनिया भर में राजनीति में अधिक महिलाएं सक्रिय हैं। ‘‘यह प्रगति बहुत धीमी और असमान है।’’ किसी भी देश में महिलाओं के लिए पूर्ण समानता नहीं है। उन्होंने कहा कि औसतन पांच सांसदों में केवल एक महिला है। दुनिया भर में लगभग 20 महिलाएं राष्ट्रीय नेता हैं।
2030 के सतत विकास के एजेंडे में लैंगिक समानता और महिला सशक्तिकरण की अनिवार्यता को पहली बार समझा गया है और इसकी पुष्टि की गई है। इस एजेंडे में कहा गया है, -‘‘यदि आधी मानव जाती को उसके पूर्ण मानवाधिकारों और अवसरों से वंचित रखा जाता है तो सतत विकास संभव नहीं है।’’ इसे शिखर सम्मलेन स्तर पर दुनिया के 193 देशों द्वारा अपनाया गया है।
यह लक्ष्य न केवल लैंगिक समानता को प्राप्त करने के बारे में है बल्कि समस्त महिलाओं और लड़कियों को सशक्त करने के बारे में है, इसमें इस बात पर जोर दिया गया है कि ‘‘कोई भी पीछे न छूटे।’’
महिलाओं और लड़कियों के प्रति हर प्रकार के भेदभाव को क़ानून और व्यवहारिक रूप से समाप्त करना और महिलाओं के विरुद्ध हिंसा को समाप्त करना सतत विकास के लक्ष्य हैं। इसी प्रकार महिलाओं द्वारा किये जाने वाले अवैतनिक देख-रेख के कार्यों का मूल्यांकन और नियोजन करना, आर्थिक, राजनीतिक और सार्वजनिक जीवन में महिलाओं की बराबर की भागीदारी और नेतृत्व, उनके लैंगिक और प्रजननीय स्वास्थ्य और प्रजननीय अधिकारों की सार्वभौमिक सुनिश्चितता, संसाधनों तक सामान पहुंच, स्वामित्व और नियंत्रण और आर्थिक सशक्तिकरण भी सतत विकास के लक्ष्य हैं।
महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी के अनुसार भारत सरकार लैंगिक समानता का लक्ष्य हासिल करने एवं महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा देने के साथ उनके खिलाफ सभी तरह के भेदभाव को खत्म करने के लिए प्रतिबद्ध है। ‘कमिशन ऑन स्टेटस ऑफ वीमेन’ (सीएसडब्ल्यू) के 60वें सत्र के गोलमेज सत्र के दौरान मेनका ने कहा कि भारत ‘सहस्त्राब्दि विकास लक्ष्य’ हासिल करने को प्रतिबद्ध है और उसने पारदर्शी एवं जवाबदेह तंत्रों के जरिए महिलाओं एवं पुरूषों को बराबरी का मौका देते हुए उनके लिए समान अवसर सुनिश्चित करने के मकसद से आगे बढ़ने का लक्ष्य निर्धारित किया है।
महिला-नीत विकास के महत्व पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी कहा है कि महिलाओं को प्रौद्योगिकी सम्पन्न और जनप्रतिनिधि के तौर पर और प्रभावी बनना चाहिए क्योंकि केवल व्यवस्था में बदलाव से काम नहीं चलेगा। लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने चैथे वैश्विक संसदीय स्पीकर सम्मेलन की आयोजन समिति की बैठक में कहा, ‘लैंगिक समानता को मुख्यधारा में लाना विकास के आदर्श के केंद्र में है। लैंगिक समानता और महिला सशक्तिकरण को विकास प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभानी है, खासकर ऐसे तरीकों से , जिनका गुणात्मक प्रभाव हो।’
स्त्री सशक्तीकरण ऐसा पहलू है, जिसके बिना कोई देश तरक्की नहीं कर सकता, लेकिन यह केवल कागजों में नहीं हकीकत में होना चाहिए। शुरुआत घर से हो, लेकिन इच्छाशक्ति राजनीतिक स्तर पर हो। तभी स्त्री सशक्तीकरण की दिशा में सार्थक प्रयास किए जा सकते हैं। अतः जरूरी है कि सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों एवं स्लम बस्तियों की महिलाओं में अधिकारों के प्रति जागरूकता लाने के लिए ऐसी इकाइयां गठित की जाएं जो महिला-हित की योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए मानसिक दृढ़ता का वातावरण निर्मित कर सकें। इस कार्य के लिए सरकारी और निजी संगठनों को परस्पर सहयोगी बनना होगा।
वैश्विक स्तर पर यदि महिलाओं की स्थिति दोयम दर्जे की है तो उसके लिए जितने जिम्मेदार पुरुष हैं, उसका आधा प्रतिशत जिम्मेदार स्वयं महिलाएं भी हैं। किसी भी सरकार की कोई भी योजना, किसी भी संगठन के कोई भी प्रयास तब तक कारगर नहीं हो सकते हैं जब तक कि प्रत्येक महिला आत्मशक्ति को नहीं पहचानेगी। वस्तुतः यदि महिलाएं सामाजिक प्रताड़ना की शिकार हैं तो उसका सबसे बड़ा कारण उनकी अपनी हिचक भी है। एक ऐसी हिचक जिसमें वे यह सोच कर रह जाती हैं कि ‘भला मैं क्या कर सकती हूं?’ कहने का आशय यही है कि समूचे विश्व में विशेष रूप से सुदूर ग्रामीण अंचल की महिलाओं को आत्मनिर्भर एवं शक्तिसम्पन्न बनाने के लिए सबसे पहले उनका आत्मविश्वास जगा कर उनमें जागरूकता लानी होगी। जमीनी स्तर पर यह काम सबसे पहले जरूरी है।
                                                       --------------------------

Wednesday, May 18, 2016

चर्चा प्लस ….. कुंभ से विचार महाकुंभ तक ….. डॉ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh at International Vichar MahaKumbh, Ninora, Ujjain, MP - 12.05.2016
मेरा कॉलम 'चर्चा प्लस’ "दैनिक सागर दिनकर" में (18. 05. 2016) ..... My Column “ Charcha Plus” in "Dainik Sagar Dinkar" .....

चर्चा प्लस 
कुंभ से विचार महाकुंभ तक 
- डॉ. शरद सिंह
इन्दौर और उज्जैन के बीच निनोरा ग्राम में सामयिक तौर पर खेतों की ज़मीन का अधिग्रहण कर के एक ऐसा आयोजन स्थल बनाया गया जहां 42 देशों के विद्वानों को एक साथ बैठ कर उन सभी विषयों पर चिंतन, मनन करना था जिनके अभाव और असंतुलन से मनुष्य के भावी जीवन को खतरा दिखाई देने लगा है। मुझे भी इस अंतर्राष्ट्रीय विचार महाकुंभ में शामिल होने का निमंत्रण मिला। एक उत्सुकता के साथ मैं भी निनोरा पहुंची। एक भव्य नखलिस्तान मेरे सामने था, बिलकुल किसी फिल्मी सेट की तरह जिसका बजट करोड़ों का हो। चिलचिलाती धूप और लपट भरी हवाओं के बीच पूर्ण वातानुकूलित आयोजन स्थल। विदेशी क्या देशी अतिथि विद्वानों को भी कोई कष्ट होने वाला नहीं था। मुख्यसभागृह के अतिरिक्त चार चिन्तन कक्ष बनाए गए थे जिनमें लगातार चर्चा-परिचर्चा होनी थी। विचार कुंभ के उद्घाटन के साथ ही चिन्तन-मनन का दौर आरम्भ हो गया। इसके बाद यह मानना ही पड़ा कि विचार महाकुंभ के आमंत्रण को स्वीकार करना मेरा सही निर्णय था। सदी के दूसरे सिंहस्थ में राज्य सरकार द्वारा युगों पुरानी विचार-मंथन की परम्परा को पुनर्जीवित करते हुए सामयिक विषयों पर विचार-विमर्श के लिये अंतर्राष्ट्रीय विचार महाकुंभ का आयोजन निनोरा, उज्जैन में 12-14 मई को किया गया।
कुंभ की परिकल्पना भले ही धार्मिक विचारों से उपजी हो लेकिन प्रकृति के प्रति लगाव एवं निष्ठा इसका मूलमंत्र है। नदियांे के तट कुंभ आयोजनों के आदिस्थल माने गए हैं। इसलिए कुंभ में जब विचार महाकुंभ की संकल्पना को मूत्र्तरूप दिया गया तो उसके मेनीफेस्टो यानी ’’सार्वभौम अमृत संदेश’’ में मानव जीवन की रक्षा के लिए प्रकृति की सुरक्षा का आह्वान किया जाना लाजमी था। भले ही इस अमृत संदेश पर राजनीतिक कटाक्ष किए जाएं किन्तु यदि इस आयोजन में 42 देशों के विद्वान एक साथ बैठ कर नदी, तालाब, वृक्षों, कृषि, कुटीर उद्योगों और स्त्रियों की चिन्ता की जाए, स्थितियों को सुधारने के रास्ते ढूंढे जाएं तो आयोजन का उद्देश्य अच्छा ही कहा जाएगा। विश्व प्रसिद्ध सिंहस्थ महाकुंभ एक धार्मिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महापर्व है, जहां आकर व्यक्ति को आत्मशुद्धि और आत्मकल्याण की अनुभूति होती है। सिंहस्थ महाकुंभ महापर्व पर देश और विदेश के भी साधु-महात्माओं, सिद्ध-साधकों और संतों का आगमन होता है। इनके सानिध्य में आकर लोग अपने लौकिक जीवन की समस्याओं का समाधान खोजते हैं। इसके साथ ही अपने जीवन को ऊध्र्वगामी बनाकर मुक्ति की कामना भी करता है। मुक्ति को अर्थ ही बंनधमुक्त होना है और मोह का समाप्त होना ही बंधनमुक्त होना अर्थात् मोक्ष प्राप्त करना है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के चार पुरुषार्थों में मोक्ष ही अंतिम मंजिल है। ऐसे महापर्वों में ऋषिमुनि अपनी साधना छोड़कर जनकल्याण के लिए एकत्रित होते हैं।
Charcha Plus Column of Dr Sharad Singh in "Sagar Dinkar" Daily News Paper
सिंहस्थ उज्जैन का महान स्नान पर्व है। बारह वर्षों के अंतराल से यह पर्व तब मनाया जाता है जब बृहस्पति सिंह राशि पर स्थित रहता है। इसीलिए उज्जैन में सिंहस्थ के नाम से कुंभ का आयोजन होता है। पुराणों के अनुसार देवों और दानवों सहयोग से सम्पन्न समुद्र मंथन से अन्य वस्तुओं के अलावा अमृत से भरा हुआ एक कुंभ भी निकला था। देवगण दानवों को अमृत नहीं देना चाहते थे। देवराज इंद्र के संकेत पर उनका पुत्र जयन्त जब अमृत कुंभ लेकर भागने की चेष्टा कर रहा था, तब कुछ दानवों ने उसका पीछा किया। अमृत-कुंभ के लिए स्वर्ग में बारह दिन तक संघर्ष चलता रहा और उस कुंभ से चार स्थानों पर अमृत की कुछ बूंदें गिर गईं। यह स्थान पृथ्वी पर हरिद्वार, प्रयाग, उज्जैन और नासिक थे। इन स्थानों की पवित्र नदियों को अमृत की बूंदे प्राप्त करने का श्रेय मिला। क्षिप्रा के जल में अमृत की बूंद मिलने की घटना के संदर्भ में सिंहस्थ महापर्व उज्जैन में मनाया जाता है।
उज्जैन के सिंहस्थ कुंभ में विचार महाकुंभ का आयोजन करना और एक ‘मेनीफेस्टो’ जारी करना राजनीतिक हलकों में खबली मचाए हुए है। सिंहस्थ-2016 का सार्वभौम अमृत संदेश दरअसल विचार महाकुंभ तथा उसके पूर्व आयोजित संगोष्ठियों में प्राप्त अनुशंसाओं तथा सुझावों के आधार पर तैयार किया गया है जिसके प्रति मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री आश्वस्त हैं कि सार्वभौम संदेश में निहित मार्गदर्शी सिद्धांत मानव के सम्यक एवं परिपूर्ण जीवन का मार्ग प्रशस्त करेंगे। यद्यपि कतिपय राजनीतिक परिसरों में इस बात को ले कर भी चर्चा-परिचर्चा चल रही है कि इस सिंहस्थ के बाद ‘शिवराज सरकार’ को कहीं अपनी सत्ता तो नहीं गंवानी पड़ेगी? क्यों कि यह कहा जाता है कि सिंहस्थ के बाद सत्ता परिवर्तन हो जाता है। इस तथाकथित ‘अपशकुन’ की परीक्षा भी आगामी चुनाव में हो जाएगी। बहरहाल, मुख्यमंत्री शिवराज सिंह संतों का आशीर्वाद पा कर प्रसन्न और आश्वस्त हैं। वैसे, इसमें कोई संदेह नहीं है कि सिंहस्थ में प्रदेश शासन की ओर से व्यवस्थाओं को सुचारू बनाए रखने के लिए कोई कसर नहीं उठा रखी गई। अंाधी, पानी की आपदा आने से उत्पन्न अव्यवस्था पर जितनी तेजी से नियंत्रण पा लिया गया वह प्रशंसनीय है। यही तत्परता प्रशासन के प्रत्येक सोपान पर मिले तो आमजनता की सारी समस्याएं ही सुलझ जाएं।
सिंहस्थ महापर्व के प्रथम शाही स्नान के बाद से प्रतिदिन लगभग 25 -30 लाख श्रद्धालुओं ने धर्मलाभ लिया। रविवार एवं पर्व स्नान पर एक साथ लगभग 50 लाख से अधिक श्रद्धालु पहुंचे। सम्पूर्ण सिंहस्थ में आठ से दस करोड़ श्रद्धालुओं उज्जैन पहुंच कर कुंभ में शामिल होना किसी भी प्रबंधन के लिए एक बड़ी चुनौती कहा जा सकता है। चुनौती तो वे सारी समस्याएं भी हैं जिनके कारण ग्लोबलवार्मिंग जैसे संकट उत्पन्न हो गए हैं। इसीलिए सिंहस्थ अर्थात् कुंभ के अंतर्गत् अंतर्राष्ट्रीय विचार महाकुंभ आयोजित किया गया जिसमें मानव जीवन, मानव-कल्याण के लिए धर्म, ग्लोबल वार्मिंग एवं जलवायु परिवर्तन, विज्ञान एवं अध्यात्म, महिला सशक्तीकरण, कृषि की ऋषि परंपरा, स्वच्छता एवं पवित्रता, कुटीर एवं ग्रामोद्योग विषयों पर भारत एवं विश्व भर के विभिन्न देशों से आए विद्वानों ने विचार विमर्श किया और उन विमर्शों से प्रेरित होकर मानव जीवन के लिए प्रासंगिक मार्गदर्शी सिद्धांतों को सिंहस्थ 2016 के ‘‘सार्वभौम अमृत संदेश’’ जारी किया गया। कुल 51 सूत्रीय ‘‘सार्वभौम अमृत संदेश’’ में मुख्य रूप से कहा गया है कि - संपूर्ण मानव जाति एक परिवार है। अतः सहयोग और अंतर्निर्भरता के विभिन्न रूपों को अधिकतम प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए। विकास का लक्ष्य सभी के सुख, स्वास्थ्य और कल्याण को सुनिश्चित करना है। जीवन में मूल्य के साथ जीवन के मूल्य का उतना ही सम्मान करना जरूरी है। शिक्षा में मूल्यों के शिक्षण, व्यवहार एवं विकास का नियमित पाठ्यक्रम शामिल किया जाए, ताकि कम उम्र से ही बच्चों में उनका प्रस्फुटन हो सके। इस पाठ्यक्रम को अन्य विषयों की तरह समान महत्व दिया जाना चाहिए। यह पाठ्यक्रम ऐसे आरंभिक प्लेटफार्म की तरह हो जिसके आस-पास शिक्षा का संपूर्ण पाठ्यक्रम विकसित किया जा सके। अस्वस्थ प्रतिस्पर्धात्मकता के स्थान पर सामाजिकता, अंतर्निर्भरता करुणा, मैत्री, दया, विनम्रता, आदर, धैर्य, विश्वास, कृतज्ञता, पारदर्शिता, सहानुभूति और सहयोग जैसे मूल्यों को बढ़ाने के लिए शिक्षा की पद्धतियों में यथोचित परिवर्तन किया जाए। मूल्यान्वेषण सिर्फ निजी विकास के लिए नहीं बल्कि समाज को एक व्यवस्था देने, संबंधों को संतुलित करने और जीवन प्रतिमानों का निर्माण करने के लिए जरूरी है। सर्वधर्म समादर की भावना विकसित करने के लिये शिक्षा में उपयुक्त पाठ्यक्रम सम्मिलित किये जायें। धर्म जहां हमें प्रेम, सहयोग, सामन्जस्य के पाठ के माध्यम से एक सूत्र में बांधता है, वहीं विस्तारवादी उद्देश्यों के लिए किये गये उसके दुरुपयोग से विश्वबंधुता का हनन होता है। धर्म यह सीख देता है कि जो स्वयं को अच्छा न लगे, वह दूसरों के लिए भी नहीं करना चाहिए। जियो और जीने दो का विचार हमारे सामाजिक व्यवहार का मार्गदर्शी सिद्धांत होना चाहिए।
इस अमृत संदेश में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि पृथ्वी पर पर्यावरणीय संकट का समाधान सिर्फ प्रकृति के साथ आत्मीयता से प्राप्त होगा। इसके लिए देशज ज्ञान के विविध क्षेत्रों, जैसे कृषि, वानिकी, पारंपरिक चिकित्सा, जैव विविधता संरक्षण, संसाधन प्रबंधन और प्राकृतिक आपदा में महत्वपूर्ण सूचना स्त्रोत के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए। पारिस्थितिकी की रक्षा के लिए अत्यधिक उपभोक्तावाद पर अंकुश लगाने की आवश्यकता है। प्राकृतिक संसाधनों के अविवेकपूर्ण शोषण ने अनेक प्राकृतिक विपदाओं को जन्म दिया है। इसका संज्ञान लेते हुए ऐसी जीवन शैली एवं अर्थ-व्यवस्थाओं को विकसित करें जिनसे प्रकृति का पोषण हो।
विचार महाकुंभ में विश्व में स्त्रियों की घटती जनसंख्या और दुर्दशा पर भी चर्चा हुई। साथ ही विश्व में व्याप्त भीषण जल-संकट की गंभीरता को समझते हुए जल-संवर्धन की तकनीकों और प्रणालियों को प्रोत्साहित करने और पृथ्वी की जल-संभरता को क्षति पहुंचाने वाली प्रक्रियाओं को रोकने के उपायों पर भी निर्णय लिए गए। साधु-संतों ने भी वृक्षारोपण का संकल्प लिया। कुलमिला कर आशान्वित करने वाले निष्कर्षों एवं निर्णयों के साथ विचार महाकुंभ का समापन होना कुछ अच्छे संकेत छोड़ गया है बशर्ते उन संकेतों एवं प्रयासों के संकल्पों पर नौकरशाही की धूल न जमने पाए।
                                        -------------------------------


Tuesday, May 17, 2016

लेख .... हाशिए की औरतों का आर्थिक योगदान - शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh


15.05.2016, ‘जनसत्ता’ में प्रकाशित लेख आप सब से शेयर कर रही हूं आप भी इसे पढि़ए
 http://epaper.jansatta.com/c/10358806
(15.05.2016)
my article published in "Jansatta" news paper. Please read ....

लेख .... 
हाशिए की औरतों का आर्थिक योगदान 
- शरद सिंह
कामकाजी औरतों की चर्चा होते ही प्रायः उन स्त्रियों की छवि आंखों के आगे तैर जाती है जो किसी स्कूल, कार्यालय अथवा अन्य कार्यस्थलों में काम करती हैं और बदले में निश्चित वेतन पाती हैं। इसी तरह आर्थिक जगत का नाम आते ही कुछ नामचीन महिलाओं का स्मरण जाग उठना स्वाभाविक है। लेकिन उन औरतों पर प्रायः ध्यान नहीं जाता है जो कामकाजी की श्रेणी में प्रत्यक्षतः नहीं आती हैं किन्तु परिवार, समाज और देश के लिए उनका आर्थिक योगदान बहुत मायने रखता है। इनका कौशल इनकी व्यक्तिगत पहचान का दायरा भले ही सीमित क्षेत्र में सिमटा रहता है किन्तु इसके कौशल का लोहा सभी मानते हैं। ये औरतें उस हाशिए की औरतें हैं जहां उनकी मुख्य पहचान खंाटी घरेलू औरत की होती है। उद्यमिता के दृष्टिकोण से इस प्रकार की महिलाओं में से कुछ को कुटीर उद्योग तो कुछ को लघुउद्योग से जुड़ा हुआ देखा जा सकता है किन्तु कुछ ऐसी भी हैं जो किसी भी श्रेणी में दिखाई न देती हुई भी अर्थोपार्जन करती रहती हैं।
Jansatta, 15.05.2016 ... Hashiye ki Auraton ka Arthik Yogdan - Dr Sharad Singh

देश में अनेक ऐसे लघु और कुटीर उद्योग हैं जिनकी बुनियाद घरेलू औरतों के श्रम पर टिकी हुई है। ये औरतें कामकाजी श्रेणी के खंाचे में नहीं आती हैं। ये अपना परिवार सम्हालती हैं, बच्चे पालती हैं, सभी नाते-रिश्ते, धार्मिक परम्पराएं तथा सामाजिक नियमों का सावधानीपूर्वक पालन करती हैं। यहां तक कि घरेलू हिंसा का शिकार भी होती रहती हैं फिर भी अपने परिवार के लिए चंद रुपये जुटाने के लिए अपने आराम के दो पल भी भेंट चढ़ा देती हैं। भले ही इनके श्रम को कोई महत्व नहीं मिलता, परिवार की ओर से भी इनके अर्थोपार्जन को महत्व नहीं दिया जाता, फिर भी ये काम करती हैं और पैसे कमाती हैं और वह भी सम्मानजनक तथा वैधानिक ढंग से।
भारत में घरेलू उद्योगों का दयारा गांवों व शहरों दोनों क्षेत्रों में फैला हुआ है। इसमें विभिन्न तरह के उत्पादन, कृषि, गैर कृषि आदि शामिल हैं। घरेलू उद्योग पुराना उद्योग है लेकिन नई आर्थिक नीतियों ने इसे प्रोत्साहित किया है। कृषि क्षेत्र में बढ़ रही अरुचि और गांवों में रोजगार के सीमित साधनों ने भी इस उद्योग को बढ़ावा दिया है। घरेलू कामगार अधिकतर महिलाएं व लड़कियां ही होती हैं। समाज में एक महिला की भूमिका उसके घरेलू कार्यों से ही आंकी जाती है। उस पर बच्चों की देखभाल और घर परिवार की सेवा का दायित्व होता है। इसलिए भी घरेलू उद्योग उसके अनुकूल रहता है। क्योंकि घर में रहते हुए आर्थिक गतिविधियों से जुड़ने पर उसके घरेलू, सामाजिक दायित्व ज्यादा प्रभावित नहीं होते। जैसे एक बीड़ी लपेटने का काम करने वाली महिला अपना यह काम करते हुए छोटे बच्चे को स्तनपान भी करा सकती है। सामाजिक प्रचलन भी महिला को घर बैठ कर काम करने को बढ़ावा देते हैं।
बीड़ी बनाने का कार्य दो स्तरों पर होता है। पहले स्तर पर बीड़ी बनाने के लिए तेंदूपत्ता जुटाना होता है जिससे बीड़ी को आकार दिया जाता है। दूसरे स्तर पर बीड़ी लपेटने और उन पर ‘झिल्ली’ लगाने का काम होता है। बीड़ी निर्माण की सकल प्रक्रिया दो भागों में बंटी होती है- तेंदूपत्ता संग्रहण तथा बीड़ी लपेटना। इन दोनों कार्यों में पैंसठ से पचहत्तर प्रतिशत स्त्रियां कार्य करती हैं। ये स्त्रियां जिन जीवन-दशाओं में रह कर कार्य करती हैं उन्हें निकट से देखने, जानने और अनुभव करने के बाद एक बात साक्ष्यांकित हो जाती है कि स्त्रियों में असीमित सहनशक्ति एवं परिवार के प्रति समर्पण की भावना होती है। देश में कई ऐसी निजी संस्थाएं हैं जो तेंदूपत्ता संग्रहण में लगे श्रमिकों के पक्ष में संघर्षरत हैं। जैसे आस्था नामक संस्था सन् 1986 से संघर्ष कर रही है। इस संस्था के प्रयासों से सन् 1990 में कोटरा, राजस्थान में तेंदूपत्ता संघर्ष समिति का गठन किया गया जिसने तेंदूपत्ता संग्रहण करने वाले श्रमिकों को दिए जाने वाले पारिश्रमिक में बढ़ोत्तरी कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अहमदाबाद की सेवा संस्था भी एक ऐसी निजी संस्था है जिसकी शाखाएं देश भर में फैली हुई हैं। सेवा तेंदू पत्ता संग्रहकर्ता औरतों के हितों के लिए भी समय-समय पर संघर्ष करती रहती है। विभिन्न राज्यों में स्थानीय स्तर पर विभिन्न श्रम संगठन भी इन औरतों के अधिकार के लिए आवाज उठाते रहते हैं। वर्ष 1991 की जनगणना के अनुसार अकेले मध्यप्रदेश की कुल मुख्य कार्यशील जनसंख्या में महिलाओं का प्रतिशत लगभग 26.3 प्रतिशत था। तेंदू पत्ता संग्रहण तथा बीड़ी बनाने के अतिरिक्त अगरबत्ती उद्योग में भी महिलाओं की बड़ी संख्या कार्यरत है।
अगरबत्ती की मांग लगभग हर घर में होती है। घर को सुगंधित करना हो या फिर पूजा करने के लिए अगरबत्ती की आवश्यकता पड़ती है। घर बैठी महिलाओं के लिए यह स्वरोजगार के रूप में कमाई का महत्वपूर्ण साधन बन चुका है। अगरबत्ती के प्रति पैकेट उत्तमता के अनुसार एक रूपये से लेकर 100-150 रूप्ये तक बिकते हैं। इस काम के लिए किसी विशेष शिक्षा अथवा दक्षता की आवश्यकता नहीं होती है। काम करने की ललक ही सबसे बड़े कौशल के रूप में दक्षता दिलाता है। कम पढ़ीलिखी अथवा अशिक्षित महिलाएं भी अगरबत्ती बनाने के काम में निपुण साबित होती हैं।
अचार, पापड़ और चिप्स आदि बनाने के कार्य में 95 प्रतिशत महिलाएं संलग्न होती हैं। ये महिलाएं अपने घरेलू दायित्वों के साथ बड़ी कुशलता के साथ इन कार्यों को करती हैं। उदाहरण के लिए पापड़ उद्योग को ही ले लिया जाए। महिलाओं को पापड़ के लिए सामग्री दी जाती है। उन्हें घर जाकर सिर्फ बेलने का काम करना पड़ता है। इस काम में प्रत्येक महिला एक हजार से तीन हजार रूपए प्रतिमाह तक कमा लेती है। मसालों को साफ कर, पीसकर तथा पैक करने में जो महिलाएं अपना योगदान करती हैं, वे भी अप्रत्यक्ष रूप से देश के कुटीर एवं लघु उद्योग को सुदृढ़ता प्रदान करती हैं।
केन्द्र एवं राज्य सरकारों की ओर से विभिन्न योजनाओं के अंतर्गत स्वसहायता समितियों के गठन को प्रोत्साहन तथा आर्थिक सहायता भी दी जाती है। इनके अंतर्गत उन औरतों को एक समूह के रूप में संगठित होने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है जो अकेली घर से निकलने, किसी पराए पुरुष से बात करने तथा घरेलू कार्यों से इतर काम करने से झिझकती हैं। ऐसी औरतें आपस में मिल कर परस्पर एक-दूसरे का सहारा बनती हैं तथा एक-दूसरे के लिए प्रेरक का काम करती हैं। ये वही औरतें हैं जो घरेलू स्तर पर मसाला बनाने के व्यवसाय में कामगार की भूमिका निभाती हैं, ये वही औरतें हैं जो अचार और बड़ियां बनाती हैं, ये वही औरतें हैं जो लखनऊ के चिकन का कशीदा, वाराणसी का जरी उद्योग, जयपुर की रजाइयां और बंधनी में अपना योगदान देती हैं। यूं भी सलवार, कमीज, लहंगे-चुन्नी, रेडीमेड कपड़ों इत्यादि सभी पर कढ़ाई का प्रचलन हमेशा ही रहा है। मोमबत्ती और टेराकोटा की सजावटी वस्तुएं बनाने के कार्य में भी घरेलू औरतों का पुरुषों से अधिक प्रतिशत रहता है। बांस, नारियल के रेशे, जूट आदि से उपयोगी सामान बनाने का कार्य महिलाएं घर बैठे करती हैं तथा अपने परिवार को आर्थिक मदद करती हैं।
बढ़ती हुई महंगाई के इस जमाने में जितना भी धन कमाया जाए वह परिवार के गुजारे के लिए अपर्याप्त है । यदि बच्चों को उचित शिक्षा दिलानी है या अपने परिवार का सामाजिक व आर्थिक स्तर ऊंचा उठाना है तो महिलाओं को आगे आना ही पड़ता है। देश में सामाजिक, पारिवारिक ढांचा तथा शैक्षिक स्तर अभी भी प्रत्येक महिला को पूर्णरूप से कामकाजी बनने का वातावरण मुहैया नहीं कराता है। ऐसी स्थिति में अपने पारिवारिक दायित्वों से समय बचा कर, घर में ही काम करते हुए चार पैसे कमाने का रास्ता इन औरतों का सहारा बनता है। इन महिलाओं को भले ही कामकाजी न कहा जाए अथवा इनके आर्थिक योगदान को रेखांकित नहीं किया जाए फिर भी दैनिक जीवन में काम आने वाली अनेक वस्तुएं इन्हीं के श्रम और कौशल से निर्मित होती हैं। दरअसल, चाहे सफाई के काम में आने वाली झाडू हो, ड्राइंगरूम को सजाने वाली वस्तुएं अथवा फैशन की दुनिया में रैम्प पर जगमगाते वस्त्रों का रंग और पैटर्न हो, ये सब आर्थिक जगत के हाशिए पर मौजूद इन औरतों का महत्वपूर्ण किन्तु मौन योगदान होता है।
-------------------------

My views on Vichar Mahakumbh in "Peoples Samachar"

My views on Vichar Mahakumbh in "Peoples Samachar", Indore Edition,14. 05. 2016 ...
Peoples Samachar, Indore Edition 14. 05. 2016