Wednesday, November 9, 2016

वायु प्रदूषण की दिल्ली अब दूर नहीं है

Dr Sharad Singh
" वायु प्रदूषण की दिल्ली अब दूर नहीं है " - मेरा कॉलम #चर्चा_प्लस "दैनिक सागर दिनकर" में (09. 11. 2016) .....

My Column #Charcha_Plus in "Sagar Dinkar" news paper

 

वायु प्रदूषण की दिल्ली अब दूर नहीं है
- डॉ. शरद सिंह 


दिल्ली में पिछले 17 वर्षों की सबसे खतरनाक धुंध को देखते हुए पूरे देश में चिन्ता के बादल छा गए। राष्ट्रीय राजधानी में वायु प्रदूषण से निपटने के लिए समय रहते रक्षात्मक कदम न उठाने के लिए राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने दिल्ली सरकार को फटकार लगाई। एनजीटी ने पानी के छिड़काव के लिए हेलीकॉप्टरों के इस्तेमाल तक के लिए कहा। जो दशा आज हम दिल्ली और उसके आस-पास के क्षेत्रों में देख रहे हैं, वह देश के किसी भी हिस्से में कल दिखाई देने लगे तो आश्चर्य नहीं होगा। यह भयावह स्थिति किसी एक दिन में नहीं बनी। दिवाली के पटाखों या खेत के धुंए ने तो बस आखिरी बूंद का काम किया है।

यूं तो प्राकृतिक एवं मानवीय कारणों से वायु के दूषित होने की प्रक्रिया वायु प्रदूषण कहलाती है। लेकिन वर्तमान दशा बताती है कि मानवीय कारणों ने वायु को प्रदूषित करने में प्रकृति को बहुत पीछे छोड़ दिया है। भारत जैसे विकासशील देश में प्राकृतिक संसाधनों को अनुचित दोहन और कृत्रिम तत्वों के अधिकतम प्रयोग ने पर्यावरण को अनुमान से कहीं अधिक नुकसान पहुंचाया है। यदि दिल्ली का ही उदाहरण लें तो जिस समय दिल्ली के मुख्यमंत्री ने गाड़ियों के लिए ऑड-इवेन फार्मूला पहली बार लागू किया था, उस समय उसे भी यह अनुमान नहीं था कि चंद माह बाद दिल्ली में वायु प्रदूषण का स्तर मापने की क्षमता से भी कहीं अधिक पाया जाएगा। शाम होते-होते धुंधलका छा जाना कई वर्षोंं दिल्ली के लिए आम बात रही है। सभी ने इसे लगभग अनदेखा किया। भले ही वायु प्रदूषण के कारण दिल्ली में श्वास रोगियों की संख्या में तेजी से बढ़ोत्तरी हुई। वाशिंगटन विश्वविद्यालय द्वारा 1999 से 2000 के बीच किए एक अध्ययन के अनुसार सूक्ष्म वातावरण, वायु प्रदूषण में रहने वाले मरीजों को फेफडों के संक्रमण का जोखिम अधिक रहता है। वायु में घुल जाने वाले विशिष्ट प्रदूषक एरुगिनोसा या बी-सिपेसिया घातक रोगों के कारण बनते हैं। एक अध्ययन के दौरान पाया गया कि एक हजार में से लगभग 117 मौतें सिर्फ़ वायु प्रदूषण के कारण हुईं। अध्ययन बताते हैं कि शहरी क्षेत्रों में मरीज बलगम की अधिकता, फेफड़ों की क्षमता कम होना और गंभीर खांसी से अधिक पीड़ित रहते हैं।
वर्तमान में विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लू.एच.ओ.) के अनुसार ‘वायु प्रदूषण एक एैसी स्थिति है जिसके अन्तर्गत बाह्य वातावरण में मनुष्य तथा उसके पर्यावरण को हानि पहुचाने वाले तत्व सघन रूप से एकत्रित हो जाते हैं।‘ दूसरे शब्दों में वायु के सामान्य संगठन में मात्रात्मक या गुणातात्मक परिवर्तन, जो जीवन या जीवनोपयोगी अजैविक संघटकों पर दुष्प्रभाव डालता है, वायु प्रदूषण कहलाता है।
हम यह सोच कर तसल्ली नहीं रख सकते हैं कि जो संकट महानगरों में दिखाई दे रहा है वह छोटे शहरां अथवा औद्योगिक दृष्टि से पिछड़े इलाकों में नहीं गहरा सकता है। संकट के कारण अलग हो सकते हैं लेकिन संकट की भयावहता दिल्ली जैसी ही रहेगी।

Charcha Plus Column of Dr Sharad Singh in "Sagar Dinkar" Daily News Paper
सबक नहीं लिया

विश्व में औद्योगिक विकास के बाद कई ऐसी घटनाएं घटीं जिनसे सबक लेते हुए वायु प्रदूषण के नियंत्रण पर गंभीरता सेध्यान दिया जाना चाहिए था। किन्तु अफसोस कि ऐसा नहीं हुआ। अमेरिका में वायु प्रदूषण की सबसे भीषण घटना डोनोरा, पेनसिल्वेनिया में 1948 के अक्टूबर के अन्तिम दिनों में हुई जिसमे 20 लोग मरे गए और 7,000 लोग घायल हो गए थे। इंग्लैंड को अपना सबसे बुरा नुकसान जब हुआ तब 4 दिसम्बर 1952 को लन्दन में भारी धूम कोहरा की घटना हुई। छह दिन में 4000 से अधिक लोग मारे गए और बाद के महीनों के भीतर 8000 और लोगों की मृत्यु हो गई। सन् 1979 में पूर्व सोवियत संघ में स्वर्डर्लोव्स्क के पास एक जैविक युद्ध कारखाने से अन्थ्रेक्स के रिसाव से सैकड़ों लोगों की मृत्यु हो गयी थी। भारत में सबसे भयंकर नागरिक प्रदूषण आपदा 1984 में भोपाल आपदा थी। संयुक्त राज्य अमरीका की यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री कारखाने से रिसने वाली गैस से 2000 से अधिक लोग मारे गए और 150,000 से 600,000 दूसरे लोग घायल हो गए जिनमे से 6,000 लोग बाद में मारे गए। जबकि ये तथ्य किसी से भी छिपे नहीं रहे कि वायु प्रदूषण से होने वाले स्वस्थ्य प्रभाव जैविक रसायन और शारीरिक परिवर्तन से लेकर श्वास में परेशानी, घरघराहट, खांसी और विद्यमान श्वास तथा हृदय की परेशानी हो सकती है। इन प्रभावों का परिणाम दवाओं के उपयोग में वृद्धि होती है, चिकित्सक के पास या आपातकालीन कक्ष में ज्यादा जाना, ज्यादा अस्पताल में भरती होना और असामयिक मृत्यु के रूप में आता है। वायु की ख़राब गुणवत्ता के प्रभाव दूरगामी है परन्तु यह सैद्धांतिक रूप से शरीर की श्वास प्रणाली और हृदय के संचालन को प्रभावित करता है। वायु प्रदुषण की व्यक्तिगत प्रतिक्रिया उस प्रदूषक पर, उसकी मात्रा पर, व्यक्ति के स्वास्थ्य की स्थिति और अनुवांशिकी पर निर्भर करती है जिससे वह व्यक्ति संपर्क में रहता है।

बुंदेलखंड पर भी संकट

हम विश्व के किसी भी हिस्से में ‘शुद्ध वायु’ नहीं प्राप्त कर सकते। भारत में भी 1970 के दशक से ही प्रदूषण के व्यापक प्रभावों के बारे में विशेष अध्ययन किये गये हैं। वर्तमान में सभी महानगरों एवं औद्योगिक केन्द्रों में प्रदूषण मापन के यन्त्र लगाना प्रशासन ने अनिवार्य कर दिया है। देश की कई संस्थायें इस काम में लगी हुई है। इनमें से नागपुर की (राष्ट्रीय पारिस्थितिकी एवं परिवेश शोध संस्थान), प्रमुख विश्वविद्यालयों के पर्यावरण विभाग, भारतीय टेक्नालाजी संस्थान, भाभा आणविक शोध केन्द्र, बम्बई, पर्यावरण नियोजन एवं समन्वयय की राष्ट्रीय समिति, भारत सरकार का केन्द्रीय स्वास्थ्य एवं श्रम मंत्रालय आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। इन सभी कार्यों का परिवेश एवं नियोजन एवं समन्वय की राष्ट्रीय समिति से समन्वित कर उनके आधार पर विभिन्न प्रकार के नियम व कानून बनाने की एवं विशेष प्रदूषण नियंत्रण व तकनीक व उपकरण काम में लाने या आयात करने की सलाह दी जाती है। लेकिन योजनाओं एवं सरकारी प्रयासों के साथ ही जरूरत है जन जागरूकता की। सरल शब्दों में कहा जाए तो अपनी और अपनी आने वाली पीढ़ी की सांसों को शुद्ध वायु देने के लिए प्रत्येक व्यक्ति को स्वयं जागरूक रहना होगा। जागरूक रहने से आशय है स्वच्छता बनाए रखना और अधि से अधिक पेड़ लगाना। बुंदेलखंड में इन दोनों में गिरावट आई है। नागरिकों में जागरूकता की कमी है और जंगल की अवैध कटाई स्थिति को घातक दशा की ओर धकेल रही है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण पिछले साल पड़ा सूखा है। किसानों को आशानुरूप फसल न मिलने पर आत्महत्या के लिए विवश होना पड़ा। इसके पीछे कर्ज न चुका पाने का कारण तो था ही लेकिन इससे बड़ा कारण था सूखे की मार। जो र्प्यावरण के परिवर्तन के परिणामस्वरूप सामने आया।
बुंदेलखण्ड औद्योगिक दृष्टि से पिछड़ा हुआ है। यहां बड़े कारखानों की कमी है। लेकिन इससे यह सोचना गलत होगा कि यहां वायु प्रदूषण के बढ़ते स्तर का खतरा नहीं है। बुंदेलखंड जैसे क्षेत्रों में जंगलों और नदियों का होना खतरे के आगमन को धीमा तो कर सकता है लेकिन उससे मुक्त नहीं रख सकता है। यहां के शहरों और गांवों में वायु प्रदूषण के सबसे बड़े कारक हैं खुली बजबजाती नालियां, हर दस कदम पर रखा कूचे-कचरे का ढेर और गंदगी का अंबार। इन सबसे निकलती ज़हरीली गैसें स्लोप्वाइजन का काम करती हुई सांसों को प्रभावित कर रही हैं। केन जैसी सहायक नदियों का जल स्तर तेजी से होता जा रहा है। भू-जल के सतर में भी विगत वर्षों में चिन्ताजनक गिरावट आई है। दरअसल चाहे वायु हो या जल, प्रत्येक प्राकृतिक तत्व संतुलन पर निर्भर रहते हैं। यदि र्प्यावरण सृतुलन बिगड़ेगा तो उपयोगी एवं जीवनदायी प्राकृतिक तत्वों की भी कमी होने लगेगी। बुंदेलखंड जैसे क्षेत्र इसलिए भी महत्व रखते हैं कि यदि समय रहते इन क्षेत्रों में पर्यावरण के संतुलन को पुनर्स्थापित कर लिया गया तो शहरी क्षेत्रों को भी ये शुद्ध वायु मुहैया करा सकेंगे। 


संकट की गंभीरता

दुनिया भर के अत्यधिक वायु प्रदूषण वाले शहरों में ऐसी संभावना है कि उनमें रहने वाले बच्चों में कम जन्म दर के अतिरिक्त अस्थमा, निमोनिया और दूसरी श्वास सम्बन्धी परेशानियां विकसित हो सकती हैं। युवाओं के स्वास्थ्य के प्रति सुरक्षा उपायों को सुनिश्चित करने के लिए नई दिल्ली जैसे शहरों में बसें अब संपीडित प्राकृतिक गैस का उपयोग प्रारंभ किया गया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा किए गए अनुसंधान बताते हैं कि कम आर्थिक संसाधन वाले देशों में जहां सूक्ष्म तत्वों की मात्रा बहुत ज्यादा है, बहुत ज्यादा गरीबी है और जनसंख्या की उच्च दर है। इन देशों के उदाहरण में शामिल हैं मिस्र, सूडान, मंगोलिया और इंडोनेशिया.स्वच्छ वायु अधिनियम 1970 में पारित किया गया था, लेकिन 2002 में कम से कम 146 मिलियन अमेरिकी ऐसे क्षेत्रों में रहते थे जो 1997 के राष्ट्रीय परिवेश वायु गुणवत्ता मानकों में से एक “प्रदूषक मानदंड“ को भी पूरा नहीं करते थे। उन प्रदूषकों में शामिल हैं, ओज़ोन, सूक्ष्म तत्व, सल्फर डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन डाइऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड और सीसा क्योंकि बच्चे ज्यादातर समय घर से बाहर व्यतीत करते हैं इसलिए वे वायु प्रदूषण के खतरों के प्रति अधिक संवेदनशील है। यह याद रखना जरूरी है कि विश्व में हर सातवां बच्चा वायु प्रदूषण से प्रभावित है।
इस बात को समझना ही होगा कि यदि अब भी स्थितियों की गंभीरता को सिर्फ़ राजनीति के चौसर या बयानबाजी पर उछालना नहीं छोड़ा तो चाहे बुंदेलखंड हो या टिहरी-गढ़वाल हो, वायु प्रदूषण के मामले में अब दिल्ली दूर नहीं है। वह दिन जल्दी ही आ जाएगा जब हर शहर, हर गांव धुंधलके से ढंक जाएगा और लगभग प्रत्येक नागरिक श्वास के गंभीर रोगों से जूझता नज़र आएगा।
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Wednesday, November 2, 2016

चर्चा प्लस ... आगे बढ़ रहा है मध्यप्रदेश .... डाॅ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
मेरा कॉलम 'चर्चा प्लस' "दैनिक सागर दिनकर" में (02. 11. 2016) .....
My Column 'Charcha Plus' in "Sagar Dinkar" news paper

आगे बढ़ रहा है मध्यप्रदेश
- डॉ. शरद सिंह 

यह सच है कि कठिनाइयों का पहाड़ सामने है। यह भी सच है कि विकास की गति अपेक्षाकृत धीमी है लेकिन यह उल्लेखनीय है कि विकास के पहिए निरंतर गतिमान हैं। इसमें कोई संदेह नहीं है कि ‘बीमारू प्रदेश’ कहा जाने वाला मध्यप्रदेश तेजी से विकास कर रहा है। दरअसल, विकास वह लम्बी प्रक्रिया है जिसका परिणाम तत्काल दिखाई नहीं देता है और जिसमें त्वरित जैसा कुछ नहीं होता है। यह एक या दो दिन में होने वाली घटना नहीं वरन् कुछ वर्षों में दिखाई पड़ने वाला परिवर्तन है और मध्यप्रदेश इसी परिवर्तन के दौर से गुज़र रहा है, आगे बढ़ रहा है।

मध्यप्रदेश ऐतिहासिक दृष्टि से एक समृद्ध राज्य है। प्रथम बार मध्यप्रदेश ने 1 नवम्बर 1956 में आकार लिया था। दूसरी बार 1 नवम्बर 2000 को छत्तीसगढ़ राज्य के निर्माण के साथ ही इसका आकार बदल गया। किन्तु इसकी प्राचीनता और पुरातात्विक वैभव इसकी गरिमा का एक अलग ही इतिहास लिख चुके हैं। मध्यप्रदेश समूचे देश में पुराचित्रकला, प्राचीन गुफाओं और प्राचीन अवशेषों के के संदर्भ में सबसे समृद्व राज्य है। और यह सम्पदा राज्य के सीहोर, भोपाल, रायसेन, होशंगाबाद और सागर जिलों में मौजूद है। मध्यप्रदेश में सांची को विश्वप्रसिध्द स्तूप हैं। इन स्तूपों का निर्माण ईसा से 300 वर्ष पूर्व से लेकर ईसा के बाद 12वीं शताब्दी के बीच किया गया था। 16वीं एवं 17वीं शताब्दी में बुन्देला राजाओं ने ओरछा में मध्यकालीन वास्तुकला के अभूतपूर्व निर्माण करवाये। चंदेल कला के अनुपम उदाहरण खजुराहो के मंदिर प्रदेश की स्थापत्य एवं मूर्तिकला की सम्पन्नता की निशानी हैं।
 
Charcha Plus Column of Dr Sharad Singh in "Sagar Dinkar" Daily News Paper
इतिहास के आइने में 

प्रागैतिहासिक काल पत्थर युग से शुरू होता है, जिसके गवाह भीमबेटका, आदमगढ, जावरा, रायसेन, पचमढ़ी जैसे स्थान है। हालांकि राजवंशीय इतिहास, महान बौद्ध सम्राट अशोक के समय के साथ शुरू होता है, जिसका मौर्य साम्राज्य मालवा और अवंती में शक्तिशाली था। कहा जाता है कि राजा अशोक की पत्नी विदिशा से थी, जो आज के भोपाल की उत्तर में स्थित एक शहर था। सम्राट अशोक की मृत्यु के बाद मौर्य साम्राज्य का पतन हुआ और ई. पू. तीन से पहली सदी के दौरान मध्य भारत की सत्ता के लिए शुंग, कुशान, सातवाहन और स्थानीय राजवंशों के बीच संघर्ष हुआ। ई. पू. पहली शताब्दी में उज्जैन प्रमुख वाणिज्यिक केंद्र था। गुप्ता साम्राज्य के दौरान चौथी से छठी शताब्दी में यह क्षेत्र उत्तरी भारत का हिस्सा बन गया, जो श्रेष्ठ युग के रूप में जाना जाता है। हूणों के हमले के बाद गुप्त साम्राज्य का पतन हुआ और उसका छोटे राज्यों में विघटन हो गया। हालांकि, मालवा के राजा यशोधर्मन ने ई. सन 528 में हूणों को पराजित करते हुए उनका विस्तार समाप्त कर दिया। मध्ययुगीन राजपूत काल में 950 से 1060 ई.सन के दौरान बुंदेलखंड में चंदेलों का प्रभुत्व रहा। चंदेलों ने न केवल सुव्यवस्थित शासन दिया बल्कि कलाजगत को अत्यंत कलात्मक मंदिर प्रदान किए। भोपाल शहर को नाम देनेवाले परमार राजा भोज ने इंदौर और धार पर राज किया। गोंडवना और महाकौशल में गोंड राजसत्ता का उदय हुआ। 13 वीं सदी में, दिल्ली सल्तनत ने उत्तरी मध्यप्रदेश को हासील किया था, जो 14 वीं सदी में ग्वालियर की तोमर और मालवा की मुस्लिम सल्तनत जैसे क्षेत्रीय राज्यों के उभरने के बाद ढह गई।
1156-1605 अवधि के दौरान, वर्तमान मध्यप्रदेश का संपूर्ण क्षेत्र मुगल साम्राज्य के अंतर्गत आया, जबकि गोंडवाना और महाकौशल, मुगल वर्चस्व वाले गोंड नियंत्रण के अंतर्गत बने रहे। सन् 1707 में औरंगजेब की मृत्यु के बाद मुगल नियंत्रण कमजोर हो गया, जिसके परिणाम स्वरूप मराठों ने विस्तार करना शुरू किया और 1720-1760 के बीच उन्होने मध्यप्रदेश के सबसे अधिक हिस्से पर नियंत्रण स्थापित कर लिया। इंदौर में बसे अधिकतर मालवा पर होलकर ने शासन किया, ग्वालियर पर सिंधिया ने तथा नागपुर द्वारा नियंत्रित महाकौशल, गोंडवाना और महाराष्ट्र में विदर्भ पर भोसले ने शासन किया। इसी समय मुस्लिम राजवंश के अफगान जनरल दोस्त मोहम्मद खान के वंशज भोपाल के शासक थे। कुछ ही समय में ब्रिटिश कंपनी ने बंगाल, बंबई और मद्रास जैसे अपने गढ़ों से अधिराज्य का विस्तार किया। मध्यप्रदेश के इंदौर, भोपाल, नागपुर, रीवा जैसे बड़े राज्यों सहित अधिकांश छोटे राज्य ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन आ गए। 1853 में ब्रिटिशो ने नागपुर के राज्य पर कब्जा कर लिया, जिसमे दक्षिण-पूर्वी मध्यप्रदेश, पूर्वी महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ शामिल था। उत्तरी मध्यप्रदेश के राजसी राज्य सेंट्रल इंडिया एजेंसी द्वारा संचालित किए जाते थे।
1947 में भारत की आजादी के बाद, 26 जनवरी, 1950 के दिन भारतीय गणराज्य के गठन के साथ सैकड़ों रियासतों का संघ में विलय किया गया था। 1950 में पूर्व ब्रिटिश केंद्रीय प्रांत और बरार, मकाराई के राजसी राज्य और छत्तीसगढ़ मिलाकर मध्यप्रदेश का निर्माण हुआ तथा नागपुर को राजधानी बनाया गया। सेंट्रल इंडिया एजेंसी द्वारा मध्य भारत, विंध्य प्रदेश और भोपाल जैसे नए राज्यों का गठन किया गया। राज्यों के पुनर्गठन के परिणाम स्वरूप 1956 में, मध्य भारत, विंध्य प्रदेश और भोपाल राज्यों को मध्यप्रदेश में विलीन कर दिया गया, तत्कालीन सी.पी. और बरार के कुछ जिलों को महाराष्ट्र में स्थानांतरित कर दिया गया तथा राजस्थान, गुजरात और उत्तर प्रदेश में मामूली समायोजन किए गए। फिर भोपाल राज्य की नई राजधानी बन गया। शुरू में राज्य के 43 जिले थे। इसके बाद, वर्ष 1972 में दो बड़े जिलों का बंटवारा किया गया, सीहोर से भोपाल और दुर्ग से राजनांदगांव अलग किया गया। तब जिलों की कुल संख्या 45 हो गई। वर्ष 1998 में, बड़े जिलों से 16 अधिक जिले बनाए गए और जिलों की संख्या 61 बन गई। इसके बाद 1 नवम्बर 1956 को मध्यप्रांत की रियासतों - राज्यों को मिलाकर मध्यप्रदेश का निर्माण किया गया।
मध्यप्रदेश के भू-भाग ने प्रगैतिहासिक एवं ऐतिहासिक दोनों दृष्टि से अपने महत्व को संजोया है। भीमबैठका, आबचंद तथा उदय गिरि की गुफाएं प्रगैतिहासिक महत्व के साक्ष्य रखती हैं जबकि खजुराहो, कुंडलपुर, ताजुल मसाज़िद, मांडू का किला, सागर विश्वविद्यालय जैसे स्थल पुरातन से नूतन की समृद्धि को दर्शाते हैं।

विकास की गति

यह सच है कि कठिनाइयों का पहाड़ सामने है। यह भी सच है कि विकास की गति अपेक्षाकृत धीमी है लेकिन यह उल्लेखनीय है कि विकास के पहिए निरंतर गतिमान हैं। इसमें कोई संदेह नहीं है कि ‘बीमारू प्रदेश’ कहा जाने वाला मध्यप्रदेश आगे बढ़ रहा है, विकास कर रहा है। दरअसल, विकास वह लम्बी प्रक्रिया है जिसका परिणाम तत्काल दिखाई नहीं देता है और जिसमें त्वरित जैसा कुछ नहीं होता है। यह एक या दो दिन में होने वाली घटना नहीं वरन् कुछ वर्षों में दिखाई पड़ने वाला परिवर्तन है और मध्यप्रदेश इसी परिवर्तन के दौर से गुज़र रहा है। ‘बीमारू राज्य’ की छवि से बाहर आने के लिए निरंतर प्रयास किए जा रहे हैं। विकास को हर छोर तक पहुंचाने के लिए पंचायती राज व्यवस्था आरम्भ की गई। राज्य में जल संकट के समाधान के लिये ‘जलाभिषेक’ जैसे जलग्रहण कार्यक्रम शुरू किए गए। वन सम्पदा के सम्बन्ध में संयुक्त वन प्रबंधन, ऊर्जा की जरूरतों को पूरा करने के लिये नर्मदा नदी पर बड़े-बड़े बांध और एशियाई विकास बैंक की शर्तों पर बाजारीकरण, कृषि के क्षेत्र में नकद फसलों का विस्तार भी किया गया। बेशक इस तरह के कदम उठाते समय जोखिम भी उठाया गया लेकिन दृढ़ इच्छाशक्ति ने हमेशा साथ दिया।

कठिनाइयां बनाम हौसले

शून्य से छह वर्ष की आयु के बच्चों में कुपोषण का स्तर आज भी चिंताजनक बना हुआ है। सर्वेक्षणों के अनुसार मध्यप्रदेश में 55 प्रतिशत बच्चे कुपोषण के शिकारं हैं। स्मरण रहे कि सन् 1975 से पोषण के अधिकार की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिये एकीकृत बाल विकास परियोजना शुरू हुई थी जिसका दायित्व था कि प्रदेश में एक भी बच्चा कुपोषित न रहे। किन्तु दुर्भाग्यवश, योजना लागू किए जाने के कई दशक के बाद भी बहुत से बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। प्रदेश में बढ़ता हुआ अपराध दर भी चिन्ताजनक है। विशेष रूप से महिलाओं के विरुद्ध किए जाने वाले अपराध। दहेज, बलात्कार, चैन स्नैचिंग, छेड़खानी आदि की घटनाएं प्रदेश की छवि को भी धूमिल करती हैं। छवि खराब करने वाली बात तो यह भी है कि राज्य में लगभग 49 लाख परिवार गरीबी की रेखा के नीचे रहकर जीवन बिता रहे हैं। प्रदेश में साक्षरता का प्रतिशत सरकारी आंकड़ों से कम है। पेयजल और सड़क जैसी बुनियादी आवश्यकताओं की अभी भी कमी है। प्रशासनिक व्यवस्थाओं में भी सुराख अभी बाकी हैं। फिर भी यह कहना ही होगा कि कई क्षेत्रों में स्थितियां पहले से बेहतर हुई हैं। प्रदेश में खेल-कूद को पर्याप्त बढ़ावा दिया जाता है। बच्चों की शिक्षा तथा गर्भवतियों की स्वास्थ्य-सुरक्षा पर र्प्याप्त ध्यान दिया गया है। स्वच्छता अभियान को भी तत्परता से लागू किया गया है। रहा पुलिस व्यवस्था और सुरक्षा का सवाल तो हाल ही में भोपाल सेंट्रल जेल से फरार हुए आतंकियों को लगभग डेढ़ घंटे में मारगिराने की घटना ने आश्वस्त किया है कि तमाम भूल-चूक के बावजूद पुलिस व्यवस्था में तत्परता शेष है।
उज्जैन में कुंभ के आयोजन की सफलता, खजुराहो में ब्रिक्स की बैठक और विदेशी उद्योगपतियों द्वारा प्रदेश में निवेश की इच्छा जताना मध्यप्रदेश के विकास के लिए शुभसंकेत कहे जा सकते हैं। दरअसल, विकास की गति को तेज करने या बनाए रखने में नागरिकों की भूमिका भी मायने रखती है। उदाहरण के लिए स्वच्छता अभियान तभी सफल हो सकता है जब प्रत्येक नागरिक कचरा सही स्थान पर ही डाले। अतः यदि मध्यप्रदेश आगे बढ़ रहा है तो यह मानना होगा कि शासन, प्रशासन और नागरिकों में धीरे-धीरे तालमेल स्थापित होता जा रहा है।
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चर्चा प्लस ... आंतक और अपराध का अंधकार दूर हो .... डाॅ. शरद सिंह


Dr (Miss) Sharad Singh
मेरा कॉलम #चर्चा_प्लस "दैनिक सागर दिनकर" में (26. 10. 2016) .....
 

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आंतक और अपराध का अंधकार दूर हो
- डॉ. शरद सिंह 


हमारे पास चुनाव का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक हथियार है। बस, जरूरत है इस हथियार को काम में लाते समय अपने विवेक से काम लेने की। वस्तुतः हम सुधार सकते हैं देशज और वैश्विक समस्याएं बशर्ते हम परस्पर एक-दूसरे पर विश्वास करने, परस्पर सहायक बनने और मिल कर कदम उठाने का संकल्प लें। स्वार्थपरक विवाद अंधकार ही ला सकते हैं प्रकाश नहीं। तो इस बार की दीपावली पर हम अपने देश और दुनिया के लिए प्रकाश का आह्वान तो कर ही सकते हैं कि आतंक और अपराध का अंधकार दूर हो, ताकि और मोसुल ने बने, और एलप्पो न ढहें और दुनियां की बेटियां आत्मसम्मान के साथ निडर हो कर जी सकें।

Charcha Plus Column of Dr Sharad Singh in "Sagar Dinkar" Daily News Paper

दीपावली आते ही सफाई-स्वच्छता, उत्सव और संकल्पों की बातें होने लगती हैं। एक उत्साह का वातावरण निर्मित हो जाता है। ऐसा लगता है मानो विगत का सारा अंधकार दूर हो जाएगा और वर्तमान से भविष्य तक प्रकाश का साम्राज्य जगमगाता रहेगा। हम भारतीय वैश्विक बंधुत्व पर विश्वास रखते हैं। इसीलिए दुनिया के किसी भी कोने में किसी भी इंसान पर अत्याचार होने पर विचलित हो उठते हैं। हम अपने देश के घरेलू मामलों को भी सुधारना चाहते हैं। जिससे दुनिया के सामने एक मिसाल बन सकें। लेकिन देश में अपराध के निरंतर फैलाव के आगे हमें अपने प्रयास बौने प्रतीत होने लगते हैं और भय का अंधकार गहराने लगता है। हम भारतियों को प्रयासों के साथ-साथ प्रार्थना की शक्ति पर भी विश्वास रहता है। इसीलिए हमारे वैदिक ग्रंथों में भी विश्व शांति के लिए प्रार्थनाएं मिलती हैं। यदि ध्यान से देखें तो हमारे देश में ही नहीं, बल्कि समूचे विश्व में आतंक और अपराध का अंधकार बढ़ता जा रहा है। वैश्विक आतंकवाद के विरुद्ध हमारे देश की विदेश नीति बखूबी काम कर रही है। दुनिया के हरेक मंच पर हम आतंकवाद का डट कर विरोध कर रहे हैं। वहीं देश के भीतर अस्मिता को झकझोरने वाली घटनाओं से से सबक लेने का प्रयास करते रहते हैं। लेकिन हमारे भीतर कुछ कमियां हैं जिन्हें दूर करने का संकल्प कम से कम इस दीपावली पर तो ले ही सकते हैं।

वैश्विक अंधकार

दुनिया के अनेक देशों में घोर अस्थिरता का वातावरण फैला हुआ है। गोया हम विश्वयुद्ध के कगार पर हों। ईरान, इराक, टर्की, फ्रांस आदि सभी आतंकवाद के झटके खा रहे हैं। फ्रांस के पेरिस शहर में हुए आतंकी हमले को जल्दी भुलाया नहीं जा सकता है। वह प्रेस की आजादी ही नहीं वरन नागरिकों की वैचारिक आजादी पर भी हमला था। मोसुल और एलप्पो शहर की बरबादियां मन को कंपा देती हैं। आईएसआईएस के कब्ज़े वाले इराक़ी शहर मोसुल के बाशिन्दों को बाहर जाने के लिए बड़ी क़ीमत चुकानी पड़ रही है। इस्लामिक स्टेट बाहर जाने वालों से उनका मकान या कार ज़मानत के तौर पर जमा करने का कानून बना दिया है। इसी वर्ष जून माह में सेक्स गुलाम बनने से इनकार करने पर आईएसआईएस आतंकवादियों ने 19 यजीदी लड़कियों को लोहे के पिंजरे में बंद कर के जिंदा जला दिया था। आईएसआईएस आतंकवादियों ने 19 यजीदी लड़कियों को लोहे के पिंजरे में बंद करके जिंदा जला दिया था। इसी वर्ष अभी, अक्टूबर माह में इस्लामिक स्टेट (आईएस) के आतंकियों द्वारा इराक के उत्तरी शहर किरकुक में हमला करने के एक दिन बाद शनिवार को इराकी सेना आईएस के नियंत्रण वाले शहर मोसुल के निकट के एक नगर में दाखिल हो गई थी। बलात्कार के बाद इस्लामिक स्टेट ने की चार महिलाओं की पत्थर मार कर हत्या कर दी थी। आतंकी संगठन इस्‍लामिक स्‍टेट के कब्जे वाले मोसुल के सीमावर्ती गांवों में इराकी और कुर्दिश फौजों की बढ़ती ताकत के बीच इस शहर के लोगों का कहना है कि अपनी जान बचाने के लिए आतंकी नागरिकों को ’मानव ढाल’ के रूप में इस्‍तेमाल कर रहे हैं।
सीरिया के उत्तर-पश्चिम में भूमध्य सागर के तट से थोड़ी दूरी पर बसा एक नगर है जो प्राचीन काल से एशिया और यूरोप के मध्य व्यापार के लिए एक महत्वपूर्ण केन्द्र रहा है। अलेप्पो शहर में हुए एक हवाई हमले में कथित तौर पर 15 लोगों की मौत हो गई है। दुनिया के सारे देश सीरिया संकट को ले कर चिंतित हैं। उनकी यह चिन्ता स्वाभाविक है। हाज़ारों परिवार बिखर गए हैं और बूढ़े, बच्चे, औरतें शरणार्थी के रूप में शिविरों में जीने को विवश हैं। कई बच्चे ऐसे हैं जिन्हों ने बेहद कठिन परिस्थितियों में शरणार्थी शिविरों में ही जन्म लिया है। इन बच्चों के भविष्य क्या होगा, यह कोई नहीं बता सकता है।
भारत और पाकिस्तान के बीच की खाइयां भी चौड़ी होती जा रही हैं। धैर्य की सीमा पर बार-बार चोट करते हुए पाकिस्तान ने जो हरकतें की, उन्होंने विवश कर दिया कि भारत भी सर्जिकल स्ट्राइक जैसा कदम उठाए। लेकिन दुख की बात यह है कि सर्जिकल स्ट्राइक के बाद से बौखलाए पाकिस्तान की तरफ से लगातार सीमा पर सीजफायर का उल्लंघन जारी है। कश्मीर में भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पैलेट गन के विकल्प के रूप में लाने का विचार आया और ’पावा शेल्स’ के बारे में भी केन्द्र सरकार ने नए सिरे से चिनतन किया। भारत की एक ओर सीमा पर आतंकी गतिविधियां सिर उठाने लगी हैं। यह सैन्य आतंक का मामला है जो कि चीन की तरफ से दिखाई दे रहा है। भारत सरकार ने इस संबंध में चीन को चेतावनी भी दी है। स्थिति को निंयंत्रित करने के उद्देश्य से पहली बार भारत और चीन ने जम्मू-कश्मीर के पूर्वी लद्दाख क्षेत्र में संयुक्त सैन्य अभ्यास किया।


आंतरिक अंधकार

देश के भीतर अपराध की बढ़ती दर अंधकार की उस चादर को बढ़ाती जा रही है जिसके नीचे आम नागरिकों का दम घुटने लगा है। समाचारपत्रों में लगभग एक से डेढ़ पृष्ठ के समाचार अपराधों के ही रहते हैं। जो कुछ घटित होता है उसे ही समाचारपत्र प्रस्तुत करते हैं। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि आज कोई भी नागरिक स्वयं को सुरक्षित अनुभव नहीं करता है। घर में ताला लगा कर बाहर निकलते समय उसे इस बात का भय लगा रहता है कि लौट कर आने तक उसका घर चोरों के धावे से बचा रहेगा या नहीं? औरतों और लड़कियों के साथ होने वाले जघन्य अपराध वातावरण को और भी दूषित कर रहे हैं। चिन्ताजनक बात यह भी है कि आज एकल हिंसा या एकल बलात्कार की जगह सामूहिक हिंसा और सामूहिक बलात्कार की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं। परिवार जितने विखंडित होते जा रहे हैं, संकट भी उतने अधिक बढ़ते जा रहे हैं। परस्पर असंवेदना का वातावरण गहराने लगा है। एक के दुख से दूसरे के दुखी होने का संस्कार सिकुड़ता जा रहा है।
एक दुखद उदाहरण बीना शहर जो प्रशासनिक तौर पर एक छोटा-सा तहसीली इलाका है। इसी बीना शहर में एक नग्न युवती पेड़ों के पीछे छिपी हुई थी। इंसानों की उस पर दृष्टि पड़ी तो उसके इर्द-गिर्द भीड़ लगाने लगे। वह घबरा कर भागी और बिजली के हाईटेंशन टॉवर पर चढ़ती चली गई और लगभग 70 फुट की ऊंचाई पर पहुंच कर वह अपना संतुलन खो बैठी और गिर गई। नीचे गिरते ही उसकी मौत हो गई। यह हृदयविदारक घटना घटी उस युवती के साथ जिसने अपना जीवन अभी ठीक से शुरू भी नहीं किया था। मध्यप्रदेश के डिंडौरी जिले के एक छोटे से गांव की आदिवासी लड़की अपने और अपने परिवार के सपने को सच करने के लिए नौकरी का साक्षात्कार देने जबलपुर गई। फिर जबलपुर से इन्दौर गई। इन्दौर में चार युवकों ने उसे सहायता देने का झांसा दे कर उसके साथ बलात्कार किया। इसके बाद एक युवक उसे इन्दौर से बीना पहुंचा कर रेलवे स्टेशन पर छोड़ गया। बीना में भी उसके साथ सामूहिक बलात्कार किया गया। दिन के उजाले में उस निर्वस्त्र युवती को भीड़ ने घेर लिया। वह आतंकित युवती भीड़ से भयाक्रांत हो कर आत्मघाती कदम उठा बैठी। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो असंवेदनशीलता के अंधकार ने उस युवती का जीवन लील लिया। उस पर बहुत जल्दी भुला दी गई यह घटना। इस घटना को जानने वालों को भी नहीं पता कि उस युवती को उस दशा में पहुंचाने वाले सलाखों के पीछे पहुंचाए गए या नहीं। अपराध के विरूद्ध कानून की मांग भी अब किसी बड़े आंदोलन की प्रतीक्षा करती है और फिर कैंडल मार्च के साथ ठंडे बस्ते में चली जाती है।


करना होगा प्रकाश का आह्वान

राजनीति एक ऐसा माध्यम है जो समाज में कुछ भी सुधार सकता है या फिर कुछ भी बिगाड़ सकता है। लेकिन यदि राजनीति ही ड्रामेबाजी बन कर रह जाए तो कुछ भी सुधरने की आशा कैसे की जा सकती है? यह हम नागरिकों का सौभाग्य है कि हम विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में रहते हैं । हमारे पास चुनाव का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक हथियार है। बस, जरूरत है इस हथियार को काम में लाते समय अपने विवेक से काम लेने की। वस्तुतः हम सुधार सकते हैं देशज और वैश्विक समस्याएं बशर्ते हम परस्पर एक-दूसरे पर विश्वास करने, परस्पर सहायक बनने और मिल कर कदम उठाने का संकल्प लें। स्वार्थपरक विवाद अंधकार ही ला सकते हैं प्रकाश नहीं। तो इस बार की दीपावली पर हम अपने देश और दुनिया के लिए प्रकाश का आह्वान तो कर ही सकते हैं कि आतंक और अपराध का अंधकार दूर हो, ताकि और मोसुल न बने, और एलप्पो न ढहें और दुनियां की बेटियां आत्मसम्मान के साथ निडर हो कर जी सकें।
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Thursday, October 13, 2016

चर्चा प्लस ... रावणों पर विजय पाती आज की स्त्री .... डाॅ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
 
मेरा कॉलम  "चर्चा प्लस"‬ "दैनिक सागर दिनकर" में (05.10. 2016) .....
 
My Column Charcha Plus‬ in "Dainik Sagar Dinkar" .....
  
 
 
रावणों पर विजय पाती आज की स्त्री
- डॉ. शरद सिंह
 
रावण कोई एक व्यक्ति नहीं अपितु पुरुष प्रधान समाज में मौजूद वह आसुरी प्रवृत्तियां हैं जो स्त्री को सदा दोयम दर्जे पर देखना चाहती हैं, उन्हें दलित बनाए रखना चाहती हैं। किन्तु सुखद पक्ष यह भी है कि इन आसुरी प्रवृत्तियों से जूझती हुई लड़कियां आईटी क्षेत्र और अनुसंधान क्षेत्र में भी तेजी से आगे आई हैं। वे अब पढ़ने की खातिर अकेली दूसरे शहरों में रहने का साहस रखती हैं। वे उन सभी क्षेत्रों में सफलतापूर्वक काम कर रही हैं जिन्हें पहले लड़कियों के लिए उपयुक्त नहीं माना जाता था। दरअसल, समाज में विभिन्न रूपों में मौजूद बाधाओं रूपी रावणों पर स्त्रियां विजय पाती जा रही हैं। सतयुग में सीता रावण के छल का शिकार बनी। राम स्वर्णमृग को पकड़ने चल दिए। राम की पुकार समझ कर लक्ष्मण द्वार पर रेखा खींच कर राम की ओर चल पड़े। लक्ष्मण जाते-जाते सीता को समझा गए कि उनके द्वारा खींची गई रेखा को वे न लांघें। यह कथा सर्वविदित है कि लक्ष्मण के जाते ही रावण साधुवेश में आया और दान-धर्म का वास्ता दे कर सीता को विवश कर दिया कि वह लक्ष्मण-रेखा को लांघ जाएं। रेखा लांघते ही रावण ने सीता का हरण कर लिया। तब से यह कहावत चल पड़ी कि स्त्रियों को लक्ष्मण-रेखा नहीं लांघनी चाहिए। इसी कथा का दूसरा पहलू देखा जाए तो कहावत यह भी होनी चाहिए कि स्त्रियों को किसी भी अपरिचित पुरुष का विश्वास नहीं करना चाहिए। न जाने किस पुरुष रूप में रावण मौजूद हो? किन्तु स्त्री न तो सतयुग में डरी और न कलियुग में भयभीत है। भले ही जन्म से मृत्यु तक उसे भिन्न-भिन्न रूप में रावण का सामना करना पड़ता है।
भारतीय स्त्री के सामाजिक विकास की कथा यदि लिखी जाए तो उसमें आए उतार-चढ़ावों से स्त्री के संघर्ष की कथा बखूबी उभर कर सामने आ जाएगी। दिलचस्प बात है कि मुस्लिम आक्रमणकर्ताओं का वास्ता दे कर पर्दा प्रथा, सती प्रथा, बालविवाह जैसी कुप्रथाओं को हर बार परिस्थितिजन्य ‘बेचारगी’ कह दिया जाता है। जबकि इन्हीं कारणों एवं परिस्थितियों के बारे में दूसरे पक्ष से विचार करें तो समाज की और विशेष रूप से पुरुषों की वह कमजोरी साफ-साफ दिखाई देती है जिसमें वे हाथ में तलवार धारण कर के भी अपनी स्त्रियों को बचाने में सक्षम साबित नहीं होते हैं और अप्रत्यक्ष रूप से कहते हैं कि -‘हम तुम्हारी रक्षा नहीं कर सकते हैं इसलिए या तो तुम पर्दे के पीछे छिपी रहो या फिर आग में, पानी में कहीं भी कूद कर अपने प्राण दे दो।’ जो स्त्रियां भयभीत हो गईं या जिनमें परिस्थिति के अनुरूप स्वयं को ढालने का साहस नहीं था, उन्होंने अपने पुरुषों की बात मान ली। लेकिन जिनमें संकटों से जूझने का साहस था वे जीवित रहीं और उनके जीवित रहने से ही सामाजिक पीढ़ियों का सतत प्रवाह जारी रह सका।


Charcha Plus Column of Dr Sharad Singh in "Sagar Dinkar" Daily News Paper

दस नहीं अनेक सिर

सतयुग में रावण के दस सिर थे लेकिन आज स्त्री के विरूद्ध़ खड़े संकट रूपी रावण के दस नहीं अनेक सिंर हैं। जन्मपूर्व से मृत्यु तक जिनसे जूझना उसकी नियति बन चुकी है। स्त्री के जन्म से भी पहले अर्थात् कन्या भ्रूण को इस दुनिया में आने के लिए संघर्ष करना पड़ता है। उसका जन्म मां की दृढ़ता और पिता की सकारात्मक सोच पर निर्भर रहता है। जन्म के बाद भाइयों की अपेक्षा उपेक्षा का सामना उसकी नियति बन जाती है यदि परिवार दकियानूसी परिपाटी पर जी रहा हो तो। बेटी के लिए पढ़ाई, पौष्टिक खाना, खेल-कूद नहीं अपितु घर-गृहस्थी की चक्की के पाट तैयार रहते हैं। इसी चक्की को चलाने और उसमें स्वयं पिसने की शिक्षा उसे दी जाती है। यदि लड़की स्कूल-कॉलेज में पढ़ने जाती है तो उस पर हाजार पाबंदियां ठोंक दी जाती हैं। वह क्या पहने, क्या नहीं? वह क्या पढ़े, क्या नहीं? वह मोबाईल फोन रखे या नहीं? आदि-आदि। उस पर छेड़खानी करने वाले मजनुओं का सामना, शारीरिक क्षति पहुंचाने की धमकी का सामना, दोस्त बन कर अश्लील एम.एम.एस. बना कर ब्लैकमेल करने वालों का सामना।
उत्तर प्रदेश के बागपत जिले के अलावलपुर गांव में छह महिलाओं को खरीदने के वास्ते एक दर्जन से ज्यादा लोग जमा थे। महिलाओं को बेचने वाले उनकी ओर इशारा करके बोली लगा रहे थे। बिहार में गरीबी का दंश झेल रहीं इन महिलाओं को यह ख्वाब दिखाकर लाया गया था कि उत्तर प्रदेश में उनकी शादी कराई जाएगी और वहां आराम से अपना घर बसाकर रहेंगी। बागपत की तरह सहारनपुर के घाटमपुर गांव में पंचायत ने बाजार में महिलाओं की खरीदारी पर रोक लगा दी गई थी। महिलाएं खरीदारी के लिए बाजार में नहीं जाएंगी। महिलाएं घर के बाहर नल पर पानी नहीं भर सकेंगी। पंचायत ने पांच-पांच व्यक्तियों की छह टीमें बनाई गईं, जो गांव में घूमकर निगरानी करती थी और दोषी से निर्धारित जुर्माना वसूलती थीं। विरोध करने पर दोगुना जुर्माना लगता था। भला ऐसे गांवों-कस्बों की बेटियां सानिया मिर्जा, कण्णेश्वरी देवी, इंदिरा नूयी, सुनिता विलियम्स, साक्षी अथवा सायना नेहवाल बन सकना क्या संभव है?


चुनौती स्वीकार है उसे

इन सारी विपरीत परिस्थितियों में भी भारतीय स्त्री प्रतिदिन स्वयं को साबित करती जा रही है। उसे हर चुनौती स्वीकार है। जब कोई औरत कुछ करने की ठान लेती है तो उसके इरादे किसी चट्टान की भांति अडिग और मजबूत सिद्ध होते हैं। मणिपुर की इरोम चानू शर्मीला इसका एक जीता-जागता उदाहरण हैं। कुछ लोगों को लगा था कि यह आम-सी युवती शीघ्र ही वह अपना हठ छोड़ कर सामान्य ज़िन्दगी में लौट जाएगी। वह भूल जाएगी कि मणिपुर में सेना के कुछ लोगों द्वारा स्त्रियों को किस प्रकार अपमानित किया गया। किन्तु 28 वर्षीया इरोम शर्मीला ने ने संघर्ष का रास्ता नहीं छोड़ा। वे न्याय की मांग को लेकर संघर्ष के रास्ते पर जो एक बार चलीं तो उन्होंने कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा। यह स्त्री का वह जुझारूपन है जो उसकी कोमलता के भीतर मौजूद ऊर्जस्विता से परिचित कराता है।
धनगढ़ (गड़रिया) परिवार में जन्मीं सम्पत देवी पाल उत्तरप्रदेश के बांदा जिले में कई वर्ष से कार्यरत हैं। सम्पत देवी पाल के दल का नाम है ‘गुलाबी गैंग’। सम्पत पाल के गुलाबी दल की औरतें निपट ग्रामीण परिवेश की हैं। वे सीधे पल्ले की साड़ी पहनती हैं, सिर और माथा पल्ले से ढंका रहता है किन्तु उनके भीतर अदम्य साहस जाग चुका है। सम्पत पाल के अनुसार ‘‘जब पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी हमारी मदद करने के लिए आगे नहीं आते हैं तब विवश हो कर हमें कानून अपने हाथ में लेना पड़ता है। यह गैरकानूनी गैंग नहीं है, यह गैंग फॉर जस्टिस है।’’
इसी तरह अनेक स्त्रियां शहरों में, गांवों में अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रही हैं। मुंबई की स्लम बस्ती धारावी में पिछले पंद्रह साल से जूझ रही मधु सर्वटे अपने लिए नहीं लड़ती हैं, वे लड़ती हैं उन औरतों को न्याय दिलाने के लिए जो दैहिक शोषण का शिकार हैं और जिनके पास न्याय पाने का न तो हौसला है और न क्षमता। पुरानी दिल्ली की गंदी बस्ती में लड़कियों की शिक्षा के लिए प्रयासरत शिवा मुरलीधरन एक आम औरत की तरह ही हैं लेकिन उनकी आकांक्षा, उनके प्रयास उन्हें औरों से अलग बनाते हैं। ये दोनों औरतों ने जब स्लम बस्तियों की ओर कदम बढ़ाया तो सबसे पहले उन्हें अपने परिवार से ही विरोध झेलना पड़ा लेकिन उनके आत्मविश्वास ने उनका साथ दिया। देखा जाए तो समाज के हर स्तर पर स्त्रियां चुनौतियों का सामना डट कर कर रही हैं। इनमें से कुछ सुर्खियों में जगह पा जाती हैं तो कुछ खामोशी से अपना काम करती रहती हैं।
दहेज के लिए जलाया जाना, इकतरफा प्रेम में मौत के घाट उतार दिया जाना, तेजाब का शिकार बनाया जाना और इन सबके साथ सैकड़ों बंदिशों का बोझ उनकी ज़िन्दगी पर लाद दिया जाना रावणी ताकतों से भी बढ़ कर त्रासद हैं। फिर भी स्त्रियों ने न केवल ‘सर्वाइव’ किया है बल्कि स्वयं की क्षमताओं को साबित किया है।
  विजय सुनिश्चित है

आज की स्त्री सम्हल कर चलना सीख गई है। सत्तर-अस्सी के दशक और इक्कीसवीं सदी के पहले दशक के बाद की स्त्री में बहुत अंतर आ चुका है। उसने ‘देवी’ और ‘दासी’ इन दोनों छवियों के बीच का रासता ढूंढ लिया है, ठीक मध्यममार्ग की तरह। यह न तो शोषित है और न ही विद्रोही। मानो वह घोषणा कर रही हो कि ‘मेरी क्षमता देखो और तय करो कि तुम मुझे दोनों में से किस पाले में रखना चाहते हो? यदि दोनों में नहीं तो मुझे अपने लिए स्वयं रास्ता बनाने दो और आगे बढ़ने दो, बस तुम मेरे साथ-साथ चलो, न आगे-आगे और न पीछे-पीछे।’ उसे अब रावणों को पहचानना और उनसे निपटना आता जा रहा है। रावण कोई एक व्यक्ति नहीं अपितु पुरुष प्रधान समाज में मौजूद वह आसुरी प्रवृत्तियां हैं जो स्त्री को सदा दोयम दर्जे पर देखना चाहती हैं, उन्हें दलित बनाए रखना चाहती हैं। किन्तु सुखद पक्ष यह भी है कि इन आसुरी प्रवृत्तियों से जूझती हुई लड़कियां आईटी क्षेत्र और अनुसंधान क्षेत्र में भी तेजी से आगे आई हैं। वे अब पढ़ने की खातिर अकेली दूसरे शहरों में रहने का साहस रखती हैं। वे उन सभी क्षेत्रों में सफलतापूर्वक काम कर रही हैं जिन्हें पहले लड़कियों के लिए उपयुक्त नहीं माना जाता था। दरअसल, समाज में विभिन्न रूपों में मौजूद बाधाओं रूपी रावणों पर स्त्रियां विजय पाती जा रही हैं। स्त्री के पक्ष में अब यह विजय सुनिश्चित है क्यों कि पुरुष भी स्त्रियों की क्षमता को स्वीकार करने लगे हैं।
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Thursday, October 6, 2016

चर्चा प्लस ... कचरे के ढेर में पड़े नवजात शिशु .... डाॅ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
मेरा कॉलम  "चर्चा प्लस"‬ "दैनिक सागर दिनकर" में (05.10. 2016) .....
 
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कचरे के ढेर में पड़े नवजात शिशु
- डॉ. शरद सिंह
 
जब कोई नवजात शिशु किसी कचरे के ढेर में पड़ा हुआ मिलता है तो उसकी ख़बर के शीर्षक में होती है केवल ‘निर्दयी मां’। क्या सिर्फ़ स्त्री जिम्मेदार होती है किसी शिशु के जन्म के लिए अथवा उसके कचरे के ढेर में फेंके जाने के लिए? क्या यह जरूरी नहीं है कि कटघरे में उन सबको खड़ा किया जाए जो नवजात शिशु को मरने के लिए छोड़ देते हैं। यदि नवजात को बचाना है तो जरूरत है उस उस मानसिकता को बदलने की जो ऐसा घिनौना क़दम उठाने को बाध्य करती है। 

03 अक्टूबर 2016 की घटना। सागर जिले के बंडा में तालाब के किनारे झाड़ियों में उलझा हुआ था एक नवजात शिशु। शरीर पर चीटियां रेंग रही थीं। सिर में पत्थर से टकराने की चोट भी थी। दो किशोर जो नवरात्रि के चलते देवी मां के मंदिर में जल अर्पित करने जा रहे थे, उस शिशु के रोने की आवाज़ सुनी। युवक आकाश यादव ने उस शिशु को सबसे पहले देखा। फिर दोनों युवकों ने देवीजी को अर्पित करने के लिए ले जाने वाले जल से ही शिशु के शरीर को धोया और पुलिस के आते ही उसे सौंप दिया। शिशु समय रहते अस्पताल पहुंचा दिया गया। यह समाचार विभिन्न समाचार पत्रों में प्रकाशित हुआ जिसमें ‘निर्दयी मां’ को जी भर कर धिक्कारा गया था।
लगभग छः माह पहले सागर जिले के ही खजुरिया गांव में चर्च के पास एक स्वस्थ बालिका मिली थी। पुलिस ने 3 महीने बताया था कि ये बच्ची अवैध संबंधों के चलते हुई थी। इसी तरह शहर के मध्यस्थल (परकोटा) पर मिली बच्ची के मां-बाप तक भी पुलिस ही खुद पहुंची। पु़लिस का मानना है कि लावारिस बच्चों के अधिकांश प्रकरण अवैध संबंधों के चलते सामने आते हैं। कुछ प्रकरणों में लिंग भेद के चलते बच्चों को लावारिस छोड़ा जाता है। यही सच भी है। फिर अकेली मां ही निर्दयी क्यों करार दी जाती है?


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16 मई 2016 को अंबाला के सिटी रोडवेज वर्कशॉप के पीछे एक शिशु लावारिस हालत में पड़ा मिला था जिसे कुत्ते नोच रहे थे। 20 मई 2016 पटना शहर में एक नवजात बरामद हुआ जो पॉलीथिन में लपेट कर फेंक दिया गया था। 27 मई 2016 रायपुर के जिला अस्पताल के पास एक शिशु का शव मिलास जो जानवरों द्वारा अधखाया हुआ था। ये कुछ उदाहरण शहरों अथवा इन घटनाओं की संख्या की दृष्टि से नहीं गिना रही हूं। ये उदाहरण उस बीमार मानसिकता के हैं जो भारत के किसी भी राज्य में किसी भी शहर में, किसी भी गांव में आए दिन सामने आते रहते हैं।

घिनौने अपराध के जिम्मेदार

नवजात शिशु को मरने के लिए किसी कचरे के ढेर पर फेंक आने से बढ़ कर घिनौना अपराध और कोई हो ही नहीं सकता है। यह सच है कि एक शिशु के लिए उसकी मां से बढ़ कर संरक्षक और कोई हो ही नहीं सकती है लेकिन उतना ही सच यह भी है कि हमारे समाज ने स्त्री को जिन लांछनों से जकड़ रखा है उनके रहते एक मां के रूप में स्त्री इस हद तक विवश हो जाती है कि उसे अपने शिशु के त्याग में चाहे-अनचाहे भागीदार बनना ही पड़ता है। इसका उदाहरण हमारे ‘महाभारत‘ महाकाव्य में भी मिलता है। वह सामाजिक लांछन का भय ही था जिसके कारण कुंती ने कर्ण को नदी में बहा दिया था। जो मां अपने पांच पुत्रों को ममता दे सकती थी, उनके साथ ठोकरें खा सकती थी, क्या वह एक और पुत्र को पाल नहीं सकती थी? लेकिन यदि वह कर्ण को पालती और विवाह पूर्व की संतान के रूप में उजागर करती तो क्या समाज उसे चैन से जीने देता? महल की दीवारों के भीतर कर्ण को शैशवावस्था में ही मार दिया जाता। उसकी जीवन रक्षा के लिए भाग्य भरोसे उसे नदी में बहाना ही कुंती के पास विकल्प था, क्यों कि समाज से टकराने की हिम्मत उसमें नहीं थी। अब कुंती को ‘निर्दयी’ कहा जाए अथवा ‘कमजोर स्त्री’ लेकिन कर्ण रूपी शिशु ने जो परित्याग झेला उसके लिए सामाजिक दबाव सबसे बड़ा जिम्मदार था। आज भी हज़ारों कुंती अपने-अपने कर्ण को मरने के लिए छोड़ने को विवश हैं क्यों कि महाभारत काल से अब तक समाज के सोच में कोई विशेष अंतर नहीं आया है। आज भी अविवाहित मां प्रताड़ना की शिकार होती है। अविवाहित मां को प्रताड़ित करने वाले गोया भूल जाते हैं कि किसी भी संतान की उत्पत्ति की बायोलॉजिकल जिम्मेदार सिर्फ़ मां नहीं होती, पिता भी उतना ही जिम्मेदार होता है, फिर चाहे वह वैवाहिक पिता हो या न हो।
अविवाहित माता-पिता अपनी संतान को सामाजिक प्रतिष्ठा नहीं दिला पाते हैं और स्वयं भी उनकी प्रतिष्ठा और ज़िन्दगी खतरे में पड़ जाती है। जिसके लिए जिम्मदार होती है वह सोच जो अविवाहित मां को ‘कुलटा’, ‘पापिन’ आदि-आदि तानों से नवाज़ती है। यह बीमार सोच ही है जो ऐसे माता-पिता को अपनी गलती सुधारने का मौका ही नहीं देती है। जिसका परिणाम भुगतता है निर्दोष शिशु।


मीडिया का दायित्व

‘निर्दयी मां’ कह कर सिर्फ़ स्त्री पर उंगली उठाने वाले मीडिया को भी अपने अपने दायित्व को सही ढंग ये निभाना चाहिए। यदि मीडिया दोषियों को बेनकाब करना चाहता है तो उन सभी दोषियों पर उंगली उठाए जो नवजात को त्यागने के लिए जिम्मेदार हैं, न कि सिर्फ़ मां पर उंगली उठा कर रह जाएं। संचार माध्यमों में काम करने वाले भी इसी समाज में पले-बढ़े होते हैं, उन्हें भी सामाजिक दबावों का बखूबी पता होता है। उन्हें तो बल्कि दबावों को दूर करने के रास्ते दिखाने चाहिए न कि सदियों से चली आ रही दूषित टिप्पणियों को दुहराते रहें। मीडिया इतना सशक्त माध्यम होता है कि वह आसानी से समाज की सोच बदल सकता है। मीडिया को सिर्फ़ एक समाचार परोस कर नहीं रूक जाना चाहिए कि ‘निर्दयी मां ने शिशु को छोड़ा’, बल्कि यदि वह इसके आगे बढ़ कर शिशु के त्यागे जाने के असली कारणों और असली जिम्मेदारों के चेहरों को सामने लाए तो लोग नवजात शिशुओं के प्रति ऐसा घृणित अपराध करने से पहले एक बार सोचेंगे जरूर।
दिलचस्प बात यह है कि संचार माध्यमों से कहीं अधिक सोच में बदलाव आया है फिल्मी दुनिया में। पुरानी भारतीय फिल्मों में अविवाहित गर्भवती पात्र के मुंह से यही कहलाया जाता था कि ‘‘मैं कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं रही। मुझे मर जाना चाहिए’’। ऐसे पात्र के द्वारा अकसर आत्महत्या करना दिखाया जाता था। नायिका जरूर किसी ‘दयालु’ के द्वारा बचा ली जाती थी। फिर तीन घंटे की पूरी फिल्म में उस अविवाहित मां के कष्टों का लेखा-जोखा रहता था। न उसे मां-बाप का सहारा मिलता था और न उस व्यक्ति का जो उसके गर्भवती होने के लिए जिम्मेदार होता था। दशकों तक इसी परिपाटी पर चलते हुए भारतीय फिल्म जगत ने करवट ली और फिर आई ‘क्या कहने’ जैसी फिल्म। इस फिल्म में नायिका अविवाहित मातृत्व को समाज से स्वीकृति दिलाने के लिए जूझती है और फिल्म के अंत में अपने शिशु को सामाजिक स्वीकृति दिला कर मानती है। दुर्भाग्य से इस कथानक के तेवर समाचार संचार माध्यमों से अभी भी दूर हैं।


समाज स्वयं को बदले अब

यदि हम चाहते हैं कि अब और शिशु कचरे के ढेर पर न फेंके जाएं तो जरूरी है कि समाज स्वयं को बदले। यह सभी जानते हैं कि युवावस्था में लापरवाहियां हो जाती हैं। ऐसी दशा में किसी भी लड़की या लड़के को इतना तो विश्वास हो कि जब वे अपनी समस्या अपने परिवार को बताएंगे तो वे उन्हें सिर्फ़ धिक्कारने के बजाए उनकी मदद करेंगे। कानून भी अवांछित गर्भ को गिराने की अनुमति देता है। शिशु को जन्म दे कर उसे जानवरों के बीच जीवित डाल देने से बेहतर तो सुरक्षित और वैधानिक गर्भपात का रास्ता है। लेकिन यह तभी संभव है जब परिवार और समाज इसे सहज भाव से ले और उन युवाओं को सम्हलने का एक अवसर दे। निर्ममता से फेंका गया नवजात शिशु यदि कन्या है तो जाहिर है कि लिंग भेद के चलते यह अपराध किया गया है। बेटी और बेटे में भेद करने वाले अकसर बेटी के जन्म लेते ही बौखला जाते हैं और कन्या शिशु से छुटकारा पाने के लिए उसे मरने को कहीं भी छोड़ आते हैं। इसी कारण सरकार ने डॉक्टरी आवश्यकता के बिना भ्रूण का लिंग परीक्षण अपराध घोषित किया हुआ है। कोख में कन्या भ्रूण को मारे जाने तो कमी आई है लेकिन नवजात कन्या को त्यागने का सिलसिला अभी भी थमा नहीं है। जबकि सरकार ‘लाड़ली लक्ष्मी’ जैसी अनेक योजनाएं चला रही है।
सच तो यह है कि नवजात शिशुओं का परित्याग तभी थम सकता है जब समाज स्वंय में बदलाव लाए और अविवाहित मातृत्व तथा कन्या शिशु के प्रति सकारात्मक रवैया अपनाए। समाज को बदलने के लिए मीडिया को भी स्त्री को लंछित करने वाले अपने शीर्षकों से बाहर आना होगा। उसे समझना होगा कि मां ‘निर्दयी’ नहीं विवश होती है। एक मां को शिशु पालने के लिए समाजिक सहारे और समर्थन की आवश्यकता होती है। मां की कोख में नौ महीने सांसें लेने के बाद जब शिशु पहली बार इस दुनिया में अपनी अांखें खोलता है तो सबसे अधिक खुशी मां को ही होती है। एक मां से यह खुशी न छिने और शिशु से ममता की छांव न छीनी जाए ऐसे माहौल की जरूरत है।
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Friday, September 30, 2016

चर्चा प्लस ... यदि हम हिन्दी का भला चाहते हैं .... डाॅ. शरद सिंह

मेरा कॉलम  "चर्चा प्लस"‬ "दैनिक सागर दिनकर" में (21. 09. 2016) .....
 
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यदि हम हिन्दी का भला चाहते हैं ...
- डॉ. शरद सिंह
 
हिन्दी के मार्ग में कहीं न कहीं सबसे बड़ा रोड़ा इसकी रोजगार से बढ़ती दूरी की है। इस तथ्य से हम मुंह नहीं मोड़ सकते हैं कि हमारे युवाओं में यहां युवा का अर्थ एक पीढ़ी पहले के युवाओं से भी है, अंग्रेजी पढ़ कर अच्छे रोजगार के अवसर बढ़ जाते हैं जबकि हिन्दी माध्यम से की हुई पढ़ाई कथित ‘स्लम अपॉर्च्युनिटी’ देती है। इस बुनियादी बाधा को दूर करने के लिए हमें तय करना होगा कि हम पढ़ाई के लिए हिन्दी का कौन-सा स्वरूप रखें जिससे हिन्दी रोजगार पाने के लिए की जाने वाली पढ़ाई का शक्तिशाली माध्यम बन सके।

वर्ष 2016 का हिन्दी मास भी समाप्त हो गया लेकिन हिन्दी का कितना भला हुआ? मुझे याद आ रही है विगत वर्ष अर्थात् सन् 2015, जुलाई की 19 तारीख। मध्यप्रदेश राष्ट्रभाषा प्रचार समिति एवं हिन्दी भवन न्यास के तत्वावधान में भोपाल में पावस व्याख्यानमाला का आयोजन में मनोज श्रीवास्तव ने एक महत्वपूर्ण तथ्य रखा था कि हम बार-बार संयुक्त राष्ट्रसंघ स्वीकृत भाषासूची में हिन्दी को शामिल किए जाने की मांग करते हैं, किन्तु विश्व श्रम संगठन अथवा सार्क संगठन में भी हिन्दी के लिए स्थान क्यों नहीं मांगते हैं? उसी समय विश्वनाथ सचदेव ने इस ओर ध्यान दिलाया कि जहां हम हिन्दी के प्रति अगाध चिन्ता व्यक्त करते नहीं थकते हैं, वहीं अंग्रेजी माध्यम के शासकीय विद्यालय खोल रहे हैं, क्या यह हमारा अपनी भाषा के प्रति दोहरापन नहीं है?
यह अत्यंत व्यावहारिक पक्ष है कि हम अपने दैनिक बोलचाल में खड़ी बोली का प्रयोग करते हैं जो आसानी से सबकी समझ में आ जाती है। यहां तक कि अहिन्दी भाषी भी इसे समझ लेते हैं किन्तु जब हिन्दी के विद्वान तकनीकी अथवा वैज्ञानिक शब्दावली के लिए जिन हिन्दी शब्दों का चयन करते हैं, वे प्रायः संस्कृतनिष्ठ होते हैं। जैसे- ‘चार पैरों वाले’ के स्थान पर ‘चतुष्पादीय’। जब किसी को पांव में ठोकर लगती है तो उससे हम यह नहीं पूछते कि ‘तुम्हारे पद में आघात तो नहीं लगा?’ हम यही पूछते हैं कि ‘तुम्हारे पैर में चोट तो नहीं लगी?’ जिस शब्दावली से विद्यार्थी परिचित होता है, उससे इतर हम उसके सामने इतनी कठिन शब्दावली परोस देते हैं कि वह तुलनात्मक रूप से अंग्रेजी को सरल मान कर उसकी ओर आकर्षित होने लगता है। संदर्भवश एक बात और (व्यक्तिगत राग-द्वेष से परे यह बात कह रही हूं) कि जो संस्कृतनिष्ठ हिन्दी शब्दावली की पैरवी करते हैं वे ही महानुभाव अपने बेटे-बेटियों को ही नहीं वरन् पोते-पोतियों को अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा दिलाने की होड़ में जुटे हुए भारी ‘डोनेशन’ देते दिखाई पड़ते हैं और गर्व से कहते मिलते हैं। कोई विद्यार्थी किस भाषाई माध्यम को शिक्षा के लिए चुनता है (अथवा उसे चुनने के लिए प्रेरित किया जाता है) यह मसला उतना महत्वपूर्ण नहीं है, जितना कि भाषा को ले कर हमारे दोहरे चरित्र का मसला है। हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्ज़ा दिलवाने तथा विश्वस्तर पर हिन्दी को प्रतिष्ठित कराने की लड़ाई आज आरम्भ नहीं हुई है, यह तो पिछली सदी के पूर्वार्द्ध से छिड़ी हुई है।
Charcha Plus Column of Dr Sharad Singh in "Sagar Dinkar" Daily News Paper
हिन्दी के पक्ष में संघर्ष

पं. मदन मोहन मालवीय ने हिन्दी को प्रतिष्ठा दिलाने के लिए सतत् प्रयास किया। न्यायालय में हिन्दी को स्थापित कराया। महामना पहले ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने हिंदी भाषा के उत्थान एवं उसे राष्ट्र भाषा का दर्जा दिलाने के लिए इस आन्दोलन को एक राष्ट्र व्यापी आन्दोलन का स्वरुप दे दिया और हिंदी भाषा के विकास के लिए धन और लोगो को जोड़ना आरम्भ किया। आखिरकार 20 अगस्त सन् 1896 में राजस्व परिषद् ने एक प्रस्ताव में सम्मन आदि की भाषा में हिंदी को तो मान लिया पर इसे व्यवस्था के रूप में क्रियान्वित नहीं किया। लेकिन 15 अगस्त सन् 1900 को शासन ने हिंदी भाषा को उर्दू के साथ अतिरिक्त भाषा के रूप में प्रयोग में लाने पर मुहर लगा दी।
बीसवीं सदी में थियोसोफिकल सोसाइटी की एनी बेसेंट ने कहा था, ‘भारत के सभी स्कूलों में हिंदी की शिक्षा अनिवार्य होनी चाहिए।’
पुरुषोत्तम दास टंडन ने महामना के आदर्शों के उत्तराधिकारी के रूप में हिंदी को निज भाषा बनाने तथा उसे राष्ट्र भाषा का गौरव दिलाने का प्रयास आरम्भ कर दिया था। सन् 1918 ई. में हिंदी साहित्य सम्मेलन के इन्दौर अधिवेशन में सभापति पद से भाषण देते हुए महात्मा गांधी ने हिन्दी को राष्ट्रभाषा के योग्य ठहराते हुए कहा था कि, ‘मेरा यह मत है कि हिंदी ही हिन्दुस्तान की राष्ट्रभाषा हो सकती है और होनी चाहिए।’ इसी अधिवेशन में यह प्रस्ताव पारित किया गया कि प्रतिवर्ष 6 दक्षिण भारतीय युवक हिंदी सीखने के लिए प्रयाग भेजें जाएं और 6 उत्तर भारतीय युवक को दक्षिण भाषाएं सीखने तथा हिंदी का प्रसार करने के लिए दक्षिण भारत में भेजा जाएं। इन्दौर सम्मेलन के बाद उन्होंने हिंदीसेवा को राष्ट्रीय व्रत बना दिया। दक्षिण में प्रथम हिंदी प्रचारक के रूप में महात्मा गांधी ने अपने सबसे छोटे पुत्र देवदास गांधी को दक्षिण में चेन्नई भेजा। महात्मा गांधी की प्रेरणा से सन् 1927 में मद्रास में तथा सन् 1936 में वर्धा में राष्ट्रभाषा प्रचार सभाएं स्थापित की गईं।
अटल बिहारी वाजपेयी ने संयुक्त राष्ट्रसंघ के अधिवेशन में हिन्दी में भाषण दिया था। वे चाहते रहे कि हिन्दी को राष्ट्रभाषा होने का सम्मान मिले। इसीलिए जो हिन्दी के प्रति अनिच्छा प्रकट करते थे उनके लिए अटल बिहारी का कहना था कि ‘‘क्या किसी भाषा को काम में लाए बिना, क्या भाषा का उपयोग किए बिना, भाषा का विकास किया जा सकता है? क्या किसी को पानी में उतारे बिना तैरना सिखाया जा सकता है?’’
क्या हम आज महामना मदनमोहन मालवीय और अटल बिहारी वाजपेयी के उद्गारों एवं प्रयासों को अनदेखा तो नहीं कर रहे हैं? वस्तुतः ‘राष्ट्रभाषा’ शब्द प्रयोगात्मक, व्यावहारिक व जनमान्यता प्राप्त शब्द है। राष्ट्रभाषा सामाजिक, सांस्कृतिक स्तर पर देश को जोड़ने का काम करती है अर्थात् राष्ट्रभाषा की प्राथमिक दायित्व देश में विभिन्न समुदायों के बीच भावनात्मक एकता स्थापित करना है। राष्ट्रभाषा का प्रयोग क्षेत्र विस्तृत और देशव्यापी होता है। राष्ट्रभाषा सारे देश की सम्पर्कभाषा होती है। इसका व्यापक जनाधार होता है। राष्ट्रभाषा का स्वरूप लचीला होता है और इसे जनता के अनुरूप किसी रूप में ढाला जा सकता है।

सम्मेलनों में सिमटी हिन्दी चिन्ता

पहला विश्व हिन्दी सम्मेलन 10 जनवरी से 14 जनवरी 1975 तक नागपुर में आयोजित किया गया था। सम्मेलन का आयोजन राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा के तत्वावधान में हुआ। सम्मेलन से सम्बन्धित राष्ट्रीय आयोजन समिति के अध्यक्ष महामहिम उपराष्ट्रपति बी. डी. जत्ती थे। सम्मेलन के मुख्य अतिथि थे मॉरीशस के प्रधानमंत्रा शिवसागर रामगुलाम। सम्मेलन में तीन महत्वपूर्ण प्रस्ताव पारित किए गए थे- 1.संयुक्त राष्ट्र संघ में हिन्दी को आधिकारिक भाषा के रूप में स्थान दिया जाए 2. वर्धा में विश्व हिन्दी विद्यापीठ की स्थापना हो तथा 3. विश्व हिन्दी सम्मेलनों को स्थायित्व प्रदान करने के लिये अत्यन्त विचारपूर्वक एक योजना बनायी जाए।
भोपाल में आयोजित विश्व हिन्दी सम्मेलन इस क्रम में दसवां सम्मेलन था। सन् 1975 से 2015 तक प्रत्येक विश्व हिन्दी सम्मेलन में हिन्दी के प्रति वैश्विक चिन्ताएं व्यक्त की जाती रहीं, हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए योजनाएं बनती रहीं किन्तु  यदि हम अंग्रेजी के प्रति अपनी आस्था और समर्पण को इसी तरह बनाए रहेंगे, एक ओर विश्व हिन्दी सम्मेलन जैसे महत्वांकांक्षी आयोजन करेंगे और दूसरी ओर ठीक उसी समय अंग्रेजी माध्यम के सरकारी विद्यालय खोलेंगे तो हमारे हिन्दी के प्रति आग्रह को विश्व किस दृष्टि से ग्रहण करेगा?
हिन्दी के प्रति हमारी कथनी और करनी में एका होना चाहिए। हिन्दी समाचारपत्र अपनी व्यवसायिकता को महत्व देते हुए अंग्रेजी के शीर्षक छापते हैं जबकि एक भी अंग्रेजी समाचारपत्र ऐसा नहीं मिलेगा जिसमें हिन्दी लिपि में अथवा हिन्दी के शब्दों को शीर्षक के रूप में प्रयोग में लाया जा रहा हो। ‘‘सैलेब्स’’ हिन्दी के समाचारपत्र में मिल जाएगा लेकिन अंग्रेजी के समाचारपत्र में ‘‘व्यक्तित्व’’ अथवा ऐसा ही कोई और शब्द शीर्षक में देखने को भी नहीं मिलेगा।

हिन्दी को रोजगार से जोड़ना होगा
विश्व में हिन्दी का गौरव तभी तो स्थापित हो सकेगा जब हम अपने देश में हिन्दी को उचित मान, सम्मान और स्थान प्रदान कर दें। हिन्दी के मार्ग में कहीं न कहीं सबसे बड़ा रोड़ा इसकी रोजगार से बढ़ती दूरी की है। इस तथ्य से हम मुंह नहीं मोड़ सकते हैं कि हमारे युवाओं में यहां युवा का अर्थ एक पीढ़ी पहले के युवाओं से भी है, अंग्रेजी पढ़ कर अच्छे रोजगार के अवसर बढ़ जाते हैं जबकि हिन्दी माध्यम से की हुई पढ़ाई कथित ‘स्लम अपॉर्च्युनिटी’ देती है। इस बुनियादी बाधा को दूर करने के लिए हमें तय करना होगा कि हम पढ़ाई के लिए हिन्दी का कौन-सा स्वरूप रखें जिससे हिन्दी रोजगार पाने के लिए की जाने वाली पढ़ाई का शक्तिशाली माध्यम बन सके। दो में से एक मार्ग तो चुनना ही होगा- या तो संस्कृतनिष्ठ हिन्दी को विभिन्न विषयों का माध्यम बना कर युवाओं को उससे भयभीत कर के दूर करते जाएं या फिर हिन्दी के लचीलेपन का सदुपयोग करते हुए उसे रोजगार की भाषा के रूप में चलन में ला कर युवाओं के मानस से जोड़ दें। यूं भी भाषा के साहित्यिक स्वरूप से जोड़ने का काम साहित्य का होता है, उसे बिना किसी संशय के साहित्य के लिए ही छोड़ दिया जाए। आखिर हिन्दी को देश में और विदेश में स्थापित करने के लिए बीच का रास्ता ही तो चाहिए जो हिन्दी को रोजगारोन्मुख बनाने के साथ उसके लचीलेपन को उसकी कालजयिता में बदल दे।

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Sunday, September 25, 2016

चर्चा प्लस ... राष्ट्रवादी चिंतक पं. दीनदयाल उपाध्याय .... डाॅ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
मेरा कॉलम  "चर्चा प्लस"‬ "दैनिक सागर दिनकर" में (21. 09. 2016) .....
 
My Column Charcha Plus‬ in "Dainik Sagar Dinkar" .....
  
 
राष्ट्रवादी चिंतक पं. दीनदयाल उपाध्याय
- डॉ. शरद सिंह
 
दीनदयाल उपाध्याय में देश सेवा की ललक थी उतनी ही अध्ययन के प्रति अभिरुचि थी। वे एक चिन्तक, लेखक, सम्पादक, संगठनकर्ता एवं राजनीतिज्ञ ही नहीं अपितु एक अच्छे पाठक भी थे। उनके कंधे में टंगे रहने वाले थैले में दो या तीन किताबें अवश्य रहती थीं। दीनदयाल उपाध्याय की बहुमुखी प्रतिभा का सभी सम्मान करते थे, चाहे वे संघ के अनुयायी हों या किसी और दल के। यहां मैं अपनी पुस्तक ‘‘राष्ट्रवादी व्यक्तित्व : दीनदयाल उपाध्याय’’ के कुछ अंश साझा कर रही हूं। 

25 सितंबर 1916 को राजस्थान के धनकिया नामक ग्राम में जन्में पं. दीनदयाल उपाध्याय को परिवार का स्नेह अधिक समय तक न मिल सका। जब माता-पिता उनसे बिछड़े तब उनकी आयु मात्र आठ वर्ष ही थी। दुर्भाग्य ऐसा था कि कुछ ही समय बाद दीनदयाल जी के भाई शिवदयाल की भी निमोनिया से पीड़ित होने के कारण मृत्यु हो गई। माता-पिता के अभाव में उनका पालन-पोषण उनके मामा ने किया। जो राजस्थान के गंगापुर रेलवे स्टेशन पर मालगार्ड के रूप में कार्यरत थे। उनके मामा ने उनसे शादी का कई बार आग्रह किया लेकिन वे शादी के प्रस्तावों को नकार देते थे। शायद राष्ट्र की सेवा का व्रत लेकर ही वे जन्मे थे, जिस कारण सभी सांसारिक बंधनों से दूर वे केवल भारत माता के बंधन में ही रहे। उन्होंने भारतीय संस्कृति एवं राष्ट्र के लिए अथक कार्य किया। 
Charcha Plus Column of Dr Sharad Singh in "Sagar Dinkar" Daily News Paper

पं. दीनदयाल उपाध्याय एक सच्चे कर्मयोगी थे। वे अत्यंत सादगी से रहना पसंद करते थे। उनका मानना था कि व्यक्ति को इच्छाओं के वशीभूत नहीं रहना चाहिए, बल्कि इच्छाओं को अपने वश में रखना चाहिए। वे यह भी मानते थे कि विचारों की उच्चता ही व्यक्ति को उत्कृष्ट बनाती है। दीनदयाल उपाध्याय सभी को अपना मानते थे। उनके मन में जाति, धर्म, भाषा, अमीर, गरीब आदि का कोई भेद नहीं था। उनके इस स्वभाव के संबंध में मुम्बई की एक महिला कार्यकर्ता ने अपने उद्गार प्रकट किए थे कि ‘‘हमारे यहां अनेक नेता आते रहते हैं। कोई नेता आ रहा हो तो उनकी अच्छी देख-भाल करने की चिन्ता तो मन में होती ही है। किन्तु दीनदयाल उपाध्याय आने वाले हों तो ऐसी कोई चिन्ता मुझे नहीं होती थी । लगता था मानों अपना ही कोई भाई या सगा-संबंधी आ रहा है।’’


अहम् से परे

पंडित दीनदयाल उपाध्याय सहज व्यक्ति थे। वे अहंकार से कोसों दूर रहते थे। सन् 1960 की एक घटना है, कानपुर में संघ-शिक्षा वर्ग का शिविर था। दीनदयाल उपाध्याय भी शिविर में शामिल थे। दोपहर के भोजन के पश्चात् सभी शिविरार्थी अपना-अपना लोटा ले कर नल पर हाथ धोने के लिए पंक्तिबद्ध खड़े थे। उस पंक्ति में एक चंचल प्रकृति का कार्यकर्ता भी था। उसने जैसे ही देखा कि एक धोती-कुर्ताधारी शांत स्वभाव का कार्यकर्ता पानी भरने के लिए अपना लोटा नल के नीचे रख रहा है, वैसे ही वह चंचल कार्यकर्ता लपक कर आया और उसने लोटा उठा कर परे फेंक दिया। धोती-कुर्ताधारी कार्यकर्ता उसके इस कृत्य पर शान्त रहा। उसने अपना लोटा उठाया और पंक्ति में सबसे पीछे जा कर खड़ा हो गया क्यों कि उसकी पारी व्यर्थ जा चुकी थी। वह चंचल कार्यकर्ता अपनी इस शरारत पर अत्यन्त प्रसन्न था। कुछ देर बाद कक्षाएं पुनः आरम्भ हुईं। बौद्धिक वर्ग की कक्षा में उस धोती-कुर्ताधारी युवक का परिचय कराते हुए कहा गया कि ये पंडित दीनदयाल उपाध्याय हैं और ये आपकी बौद्धिक वर्ग की कक्षा लेंगे।
वहां लोटा फेंकने वाला कार्यकर्ता भी विद्यार्थी के रूप में उपस्थित था। जैसे ही उसे इस बात का पता चला कि उसने जिसका लोटा फेंका था वह और कोई नहीं पंडित दीनदयाल उपाध्याय थे। उसे तो मानां काटो तो खून नहीं। वह भाग कर शिविर संचालक के पास पहुंचा क्योंकि दीनदयाल उपाध्याय का सामना करने का साहस उसमें नहीं था। शिविर संचालक ने उसे समझाया कि यदि दीनदयाल उपाध्याय को अपने वरिष्ठ होने का अहंकार होता तो वे उसी समय डांटते या अन्य किसी तरह से दंडित करते किन्तु उन्होंने ऐसा कुछ भी नहीं किया। अतः वह भयभीत न हो। इस प्रकार शिविर संचालक द्वारा समझाए जाने के बाद वह चंचल कार्यकर्ता साहस करके दीनदयाल उपाध्याय के पास गया और उनके पैर पकड़ लिए। दीनदयाल उपाध्याय ने उसे गले से लगाते हुए कहा - ‘‘मैं तुम्हारे भीतर उपस्थित ऊर्जा को प्रणाम करता हूं। तुम इसका सही मार्ग पर उपयोग करोगे ऐसा मुझे विश्वास है।’’ 


व्यक्तिगत आलोचना के विरोधी

राजनीति के क्षेत्र में एक-दूसरे पर व्यक्तिगत छींटाकशीं करना हमेशा सामान्य बात रही है, विशेषरूप से चुनाव के दौरान तो इसका और भी वीभत्स रूप सामने आने लगता है। जौनपुर लोकसभा क्षेत्र से जब दीनदयाल उपाध्याय को चुनाव के लिए खड़ा किया गया तो उनके साथी यादवराज देशमुख ने अपने पत्रकारिता के अनुभवों के आधार पर उन्हें सलाह दी कि -‘‘पंडित जी, चुनाव सभाओं में आपके भाषण कुछ अधिक आक्रामक होने चाहिए। प्रतिपक्ष पर तीखा प्रहार किए बिना चुनाव अभियान में रंग नहीं चढ़ पाएगा। मतदाताओं पर रचनात्मक एवं शिक्षात्मक भाषणों का प्रभाव नहीं पड़ता है।’’
एक अन्य कार्यकर्त्ता ने भी देशमुख का समर्थन करते हुए कहा कि -‘‘हां, पंडित जी, आपको अपने भाषणों में विरोधी नेता की जम कर टांग खि्ांचाई करना चाहिए।’’
‘‘ टांग खि्ांचाई से आपका आशय?’’ दीनदयाल उपाध्याय ने पूछा।
‘‘आशय यही कि आप उसके व्यक्तिगत जीवन का बखिया उधेड़ दीजिए।’’ उस कार्यकर्त्ता ने स्पष्ट किया।
‘‘देखिए, यदि आप लोगों को ऐसा लगता है कि मेरा प्रभाव नहीं पड़ेगा तो मैं चुनाव से हट जाता हूं। लेकिन केवल मत बटोरने के लिए अपने भाषणों में किसी पर व्यक्तिगत लांछन नहीं लगा सकूंगा। चाहे अपने हों या विरोधी, किसी की भी व्यक्तिगत आलोचना को मैं अनैतिक कार्य मानता हूं और मैं इसका विरोधी हूं।’’ दीनदयाल उपाध्याय दो-टूक ढंग से आगाह कर दिया कि उनसे घटिया राजनीति की आशा कोई न रखे।
पं. दीनदयाल उपाध्याय ने सदैव स्वच्छ राजनीति का पक्ष लिया। वे स्पष्टवादी थे और राजनीति में भी वे सभी से स्पष्टता की अपेक्षा रखते थे। 


सदा प्रासंगिक रहेंगे विचार 

पं. दीनदयाल उपाध्याय राष्ट्र को सर्वोपरि मानते थे। उनका कहना था कि राष्ट्र विभिन्न समाजों, समूहों एवं कुशलताओं से बनी एक ऐसी इकाई है जो मानव सभ्यता को सच्चे अर्थ में परिभाषित करती है। वे नागरिकों के लिए राष्ट्रीयता को सबसे बड़ी पूंजी मानते थे।
पं. दीनदयाल प्रकृति की महत्ता को सम्मान देते थे। वे प्राकृतिक सम्पदा के दुरुपयोग के विरोधी थे। उनके अनुसार प्रकृति का दोहन उसी सीमा तक किया जाना चाहिए जिस सीमा तक प्रकृति को क्षति न पहुंचे। पं. दीनदयाल जी ने मनुष्य एवं राष्ट्र के समुचित विकास के लिए सांस्कृतिक स्वतंत्रता को अति आवश्यक माना। इस संबंध में उन्होंने अपने एक लेख में लिखा था कि ‘‘15 अगस्त 1947 को हमने एक लड़ाई जीती है। अपने विकास के मार्ग के रोड़ों को दूर करने के लिए हमें स्वतंत्रता की आवश्यकता थी। अब हमारी आत्मानुभूति का मार्ग प्रशस्त हो गया है। अब मानव की प्रगति के लिए हमें इसकी सहायता करनी है। पं. दीनदयाल देश के विकास के लिए भूमि के उचित वितरण एवं समुचित देखभाल को मुख्य आधार मानते थे। वे कृषि की सुव्यवस्था के लिए कृषियोग्य भूमि का उचित बन्दोबस्त किया जाना आवश्यक समझते थे। पं. दीनदयाल भविष्य के भारत की अपनी संकल्पना में आर्थिक, सामाजिक, बौद्धिक, सांस्कृतिक एवं धार्मिक दृष्टि से सुदृढ़ भारत को देखा था। उन्होंने कहा था कि ‘‘परतंत्रता के कारण दुनिया के अन्य राष्ट्रों की तुलना में हम बराबरी में खड़े नहीं हो सके। परन्तु अब हम स्वाधीन हो गए हैं। अब हमें इस कमी को पूरा करना चाहिए।’’
पं. दीनदयाल उपाध्याय ने राष्ट्र एवं मनुष्यता को आधार में रख कर जीवन के प्रत्येक पक्षों पर चिन्तन किया तथा अपने मौलिक विचार सब के सामने रखे। चाहे प्रकृति के उचित दोहन का विषय हो या सांस्कृतिक स्वतंत्रता की आवश्यकता पर का, धर्म संबंधी विचार हों या फिर भूमि के उचित वितरण चिन्ता दीनदयाल जी के विचार प्रत्येक देश, काल एवं परिस्थितियों में प्रासंगिक रहेंगे तथा दिशाबोध कराते रहेंगे। इसीलिए उनके विचारों को राजनीतिक मतभेदों से परे रख कर देखा जाता है। तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गांधी ने पं. दीनदयाल उपाध्याय की मृत्यु पर शोक प्रकट करते हुए कहा था कि ‘‘मुझे श्री उपाध्याय जी की मृत्यु की खबर सुन कर गहरा आघात पहुंचा है। श्री उपाध्याय देश के राजनीतिक जीवन में एक प्रमुख भूमिका अदा कर रहे थे। उनकी ऐसी दुखद परिस्थितियों में असामयिक और अप्रत्याशित मुत्यु से उनका कार्य अधूरा रह गया है। जनसंघ व कांग्रेस के बीच मतभेद चाहे जो हों मगर श्री उपाध्याय सर्वाधिक सम्मान प्राप्त नेता थे और उन्होंने अपना जीवन देश की एकता और संस्कृति को समर्पित कर दिया था।’’

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