Wednesday, February 15, 2017

रेलवे का बायो-टॉयलेट अभियान

Dr Sharad Singh


मेरे कॉलम चर्चा प्लस में "दैनिक सागर दिनकर" में ( 15.02. 2017) .....My Column #Charcha_Plus in "Sagar Dinkar" news paper

 

चर्चा प्लस : 
रेलवे का बायो-टॉयलेट अभियान
- डॉ. शरद सिंह


भारतीय रेल स्वच्छता अभियान को ले कर जागरूक है लेकिन जहां तक रेल के टॉयलेट्स का सवाल है, अनेक विसंगतियां हैं। जिस तरह के टॉयलेट्स हमारे देश की आधिकांश रेलों में है वैसे टॉयलेट्स दुनिया के किसी भी विकसित देश की रेलों में नहीं है। यात्री भले ही वातानुकूलित डिब्बे में सफ़र कर रहे हों लेकिन टॉयलेट में पहुंचने पर गर्मियों लू-लपट और सर्दियों में बर्फीली हवाओं की चपेट में आने से नहीं बच पाते हैं। रेलवे इस ओर ध्यान तो दिया है लेकिन गति धीमी है जबकि वातानुकूलित डिब्बों का यात्रा-किराया हर साल बिना नागा बढ़ा दिया जाता है।

भारत में रेलों की शुरुआत 1853 में अंग्रेजों द्वारा अपनी प्राशासनिक सुविधा के लिये की गयी थी परंतु आज भारत के ज्यादातर हिस्सों में रेलवे का जाल बिछा हुआ है और रेल, परिवहन का सस्ता और मुख्य साधन बन चुकी है। सन् 1853 में बहुत ही मामूली शुरूआत से जब पहली अप ट्रेन ने मुंबई से थाणे तक (34 किमी की दूरी) की दूरी तय की थी, अब भारतीय रेल विशाल नेटवर्क में विकसित हो चुका है।
भारत में रेलों की शुरुआत भले ही सन् 1853 में हुई लेकिन तब की रेलवे आज की रेलवे की तरह सर्वसुविधायुक्त नहीं हुआ करती थी। तब रेलवे में आज की तरह टॉयलेट की सुविधा नहीं थी। भारतीय रेल में टॉयलेट जोड़े जाने की भी एक दिलचस्प कहानी है। दरअसल एक भारतीय व्यक्ति औखिल बाबू ने अंग्रेजो को पत्र लिखा था। दरअसल इनका पूरा नाम ओखिल चंद्र सेन था। उन्होंने 1909 में भारतीय रेलवे में टॉयलेट लगाने की सुविधा देने की मांग की थी। ओखिल बाबू ने अपने पत्र में लिखा था कि वे पैसेंजर ट्रेन में सफर कर रहे थे। ऐसे में अहमदपुर स्टेशन के पास जब उन्हें शौच जाना पड़ा तो वे एकांत में चले गए। ऐसे में जब वे इससे निवृत्त हो ही रहे थे कि ट्रेन चालू हो गई। उनके एक हाथ में धोती थी तो एक में लोटा था। व दौड़े लेकिन रेल पटरी पर ही गिर गए ऐसे में उनकी धोती भी खुल गई। इसे देखकर वहां खड़े लोगों के सामने उन्हें शर्मिंदा होना पड़ा। इसके बाद उन्होंने सवाल किया कि क्या ट्रेन को रोका नहीं जा सकता। इस प्रश्न के साथ उन्होंने साहिबगंज मंडल रेल कार्यालय के नाम एक पत्र लिखा। पत्र का मजमून इस प्रकार था-‘‘मैं पैंसेंजर ट्रेन में यात्रा कर रहा था, जब ट्रेन अहमदपुर रेलवे स्टशेन में रुकी तो मुझे दस्त लगने के चलते टॉयलेट जाना पड़ा। मुझे गए हुए थोड़ी देर ही हुई थी कि गार्ड ने सीटी बजाना शुरू कर दिया कि ट्रेन जा रही है, मैं तुरंत ट्रेन पकड़ने की कोशिश करने लगा। जल्दबाजी में मेरे एक हाथ में लोटा और दूसरे हाथ में धोती थी, इस बीच मैं जल्दी-जल्दी भागने के कारण रेलवे पटरियों पर ही गिर पड़ा। जिसके चलते मेरी धोती खुल गई और मैं नग्न हो गया। उस समय मुझे प्लेटफॉर्म पर मौजूद पुरुषों और महिलाओं ने देखा। ट्रेन चली गई और मैं अहमदपुर स्टेशन पर ही रह गया। यह बहुत बुरा है कि जब कोई व्यक्ति टॉयलेट के लिए जाता है तो क्या गार्ड ट्रेन को 5 मिनट भी नहीं रोक सकता। मैं आपके अधिकारियों से गुजारिश करता हूं कि जनता की भलाई के लिए उस गार्ड पर एक भारी जुर्माना लगाया जाए। अगर ऐसा नहीं होगा तो मैं इसे अखबार में छपवाऊंगा।’’
यह पत्र 1909 में ओखिल चंद्र सेन के द्वारा लिखा गया था। इस पत्र के बाद ही भारतीय रेलवे में टॉयलेट की व्यवस्था की गई। अब हर बड़ी गाड़ियों में टॉयलेट की व्यवस्था है। ओखिल चंद्र का यह पत्र आज भी नई दिल्ली के रेलवे म्यूजियम में सुरक्षित है।
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आरम्भ में रेलों में स्वच्छता की कमी को देख कर महात्मा गांधी भी बड़े दुखी हुए थे। दरअसल, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन के बाद महात्मा गांधी ने भारत के विभिन्न नगरों को देखने का विचार किया। उनकी एक यात्रा कलकत्ता से राजकोट तक की थी। इसमें काशी, आगरा, जयपुर, पालनपुर होते हुए राजकोट पहुंचना था। तीसरे दर्जें के डिब्बों में गन्दगी और शौचालयों की बुरी हालत देखकर वे चकित रह गए। तीसरे दर्जे की शोचनीय दशा देखकर महात्मा गांधी को दुःख भी हुआ। उन्होंने अपनी आत्मकथा में अपने दुख का उल्लेख किया है कि ‘‘उन्हें महसूस हुआ कि पहले और तीसरे दर्जे के किराए में जो अंतर है, उससे कहीं अधिक अंतर उन दोनों में मिलने वाली सुविधाओं में है। तीसरे दर्जे के यात्री भेड़-बकरी की भांति डिब्बों में भरे रहते और सुविधाओं के नाम पर उनको न्यूनतम सुविधाएं मिलतीं। उन्होंने यूरोप में आमतौर पर तीसरे ही दर्जे में यात्रा की थी, अनुभव की दृष्टि से मात्रा एक बार पहले दर्जे में भी यात्रा की थी। वहां उन्होंने पहले और तीसरे दर्जे के बीच भारत जैसा अंतर नहीं पाया।’’
स्वच्छ भारत अभियान भारत सरकार द्वारा आरम्भ किया गया राष्ट्रीय स्तर का अभियान है जिसका उद्देश्य गलियों, सड़कों, रेलों आदि को साफ-सुथरा करना है। यह अभियान महात्मा गांधी के जन्मदिवस 02 अक्टूबर 2014 को आरम्भ किया गया। महात्मा गांधी ने अपने आसपास के लोगों को स्वच्छता बनाए रखने संबंधी शिक्षा प्रदान कर राष्ट्र को एक उत्कृष्ट संदेश दिया था।
रेलवे ने भी शुरू किया था नौ दिन का स्वच्छता अभियान। कार्यक्रम को उत्तर रेलवे के सभी स्टेशनों पर व्यापक स्वच्छता अभियान के तौर पर शुरू किया गया। रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने शनिवार को रेलवे के नौ दिवसीय स्वच्छता सप्ताह कार्यक्रम की शुरुआत की और लोगों से स्वच्छता को अपनी दिनचर्या में शामिल करने की बात भी कही। इस मौके पर रेल मंत्री ने सभी रेल अधिकारियों व कर्मचारियों से रेलवे स्टेशन परिसरों की सफाई के लिए समर्पित होने का आह्वान किया। ‘स्वच्छ रेल स्वच्छ भारत मिशन’ के तहत शुरू हुआ यह कार्यक्रम 25 सितंबर को संपन्न हुआ, जिसमें रेलवे स्वच्छता संबंधित विभिन्न कार्यक्रम आयोजन किया गया। कार्यक्रम के दौरान रेल मंत्री ने कहा कि संयोग से स्वच्छता सप्ताह का शुभारंभ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिवस (17 सितंबर) पर हो रहा है। प्रधानमंत्री के स्वच्छता के प्रति उच्च आदर्शों के चलते उन्हें यह स्वच्छता अभियान समर्पित किया जाता है। उन्होंने रेलवे की स्वच्छता के प्रति प्रतिबद्धता को भी दोहराया और कार्यक्रम को सफल बनाने पर जोर दिया। इस कार्यक्रम को उत्तर रेलवे के सभी स्टेशनों पर व्यापक स्वच्छता अभियान के तौर पर शुरू किया गया। स्टेशनों पर स्वच्छता से संबंधित जानकारी के लिए पोस्टर और बैनर लगाए गए। रेल अधिकारियों ने स्टेशन परिसर में उपयोग होने वाली मशीनों व व्यवस्थाओं का भी निरीक्षण किया। रेलवे स्टेशन, डिपो में पहले से पड़े कचरे को साफ करने के साथ रेलवे ने स्टेशन परिसर में अतिरिक्त कूड़ेदान की व्यवस्था की।
भारतीय रेल स्वच्छता अभियान को ले कर जागरूक है लेकिन जहां तक रेल के टॉयलेट्स का सवाल है, अनेक विसंगतियां हैं। जिस तरह के टॉयलेट्स हमारे देश की आधिकांश रेलों में है वैसे टॉयलेट्स दुनिया के किसी भी विकसित देश की रेलों में नहीं है। यात्री भले ही वातानुकूलित डिब्बे में सफ़र कर रहे हों लेकिन टॉयलेट में पहुंचने पर गर्मियों लू-लपट और सर्दियों में बर्फीली हवाओं की चपेट में आने से नहीं बच पाते हैं। रेलवे इस ओर ध्यान तो दिया है लेकिन गति धीमी है जबकि वातानुकूलित डिब्बों का यात्रा-किराया हर साल बिना नागा बढ़ा दिया जाता है।
वैसे भारतीय रेल टॉयलेट्स के मामले में हाइटेक होने की तैयारी कर रहा है। पहले सन् 2021 तक रेलों में ’बायो-टॉयलेट’ लगा देने का लक्ष्य रखा गया था। इससे पटरियों पर फैलने वाली गंदगी भी समाप्त हो सकेगी। रेलवे अब अपने वायदे को समय से पहले पूरा करने को उत्सुक दिख रही है। रेलवे ने अपनी पटरियों को ’शौचमुक्त’ बनाने और सभी ट्रेनों में ’बायो-टॉयलेट’ लगाने का लक्ष्य 2021 से घटाकर 2019 पर लाने का फैसला किया है और तीन से पांच साल के भीतर जल पुनर्चक्रण की क्षमता 1.2 करोड़ लीटर से बढ़ाकर 20 करोड़ लीटर करने का लक्ष्य तय किया है। रेलवे बोर्ड के सदस्य हेमंत कुमार के अनुसार, ‘‘ सन् 2019 तक भारतीय रेलवे के सभी 55,000 कोचों को 1,40,000 बायो टॉयलेट के साथ फिट किया जाएगा। 31 मार्च 2016 तक हमने रेलवे के 10,000 डिब्बों में लगभग 35,000 बायो-टॉयलेट को स्थापित कर लिया है और इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए हम काफी आश्वस्त हैं।’’ उललेखनीय है कि भारतीय रेलवे ने खुले तल वाली पुरानी टॉयलेट सीट की जगह बायो-टॉयलेट की शुरुआत 2014 में ही कर दी थी। पहले वाली पुरानी टॉयलेट सीट से मल-मूत्र को रेलवे पटरियों पर खुले में ही फेंक दिया जाता है। स्वयं रेलवे प्रशासन का मानना है कि खुले तल वाले टॉयलेट्स न केवल यात्रियों के लिए खराब और नुकसानदेह होते हैं, बल्कि पटरियों पर शौच के निस्तारण से पटरियां भी जल्दी बेकार हो जाती हैं और पटरियां संक्षारित होने लगती हैं। भारतीय रेलवे में बायो-टॉयलेट की शुरुआत ’स्वच्छ रेल, स्वच्छ भारत’ कार्यक्रम के अंतर्गत की गई थी। जिसमें पुराने टॉयलेट की जगह इसे लगाने की समय सीमा सन् 2020-21 थी।
एक सर्वेक्षण के अनुसार भारतीय रेलवे औसतन हर दिन लगभग 6000 टन ठोस अपशिष्ट पदार्थों को उत्पन्न करता है, जिनमें से 4,000 टन मानव अपशिष्ट को सीधे तौर पर रेलवे पटरियों पर फेंक दिया जाता है। अब अगर भारतीय रेलवे समय रहते अपने लक्ष्य को पूरा कर ले तो स्वच्छता अभियान की दिशा में यह एक सकारात्मक कदम होगा।
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Wednesday, February 8, 2017

पं. दीनदयाल उपाध्याय की मृत्यु के अनुत्तरित प्रश्न ...- डॉ. शरद सिंह .. चर्चा प्लस

Dr Sharad Singh
मेरे कॉलम चर्चा प्लस में "दैनिक सागर दिनकर" में (08.02.2017) .....My Column Charcha Plus in "Sagar Dinkar" news paper
 
 
 
चर्चा प्लस   

पं. दीनदयाल उपाध्याय की मृत्यु के अनुत्तरित प्रश्न
    - डॉ. शरद सिंह
 
12 फरवरी, 1968, संध्या सात बज कर छः मिनट पर दीनदयाल जी के ममेरे भाई प्रभुदयाल ने मुखाग्नि दी और दीनदयाल जी की पार्थिव देह को अग्नि को समर्पित कर दिया गया। पंडित दीनदयाल जी की हत्या ने सभी के मन में ये दो प्रश्न जगा दिए थे कि ‘हत्या किसने की?’ और ‘हत्या का उद्देश्य क्या था?’ नानाजी देशमुख ने कहा था, ‘‘इस प्रकार पं. दीनदयाल उपाध्याय की हत्या आज भी भयंकर रहस्य बनी हुई है।’’
यहां मैं अपनी पुस्तक ‘‘राष्ट्रवादी व्यक्तित्व : दीनदयाल उपाध्याय’’ के कुछ अंश साझा कर रही हूं।
 
    
10 फरवरी, 1968 को सुबह आठ बजे का समय था। दीनदयाल जी उस समय लखनऊ में अपनी मुंहबोली बहन लता खन्ना के निवास पर थे। देश की तत्कालीन राजनीतिक दशा पर चर्चा चल रही थी कि उसी समय दीनदयाल जी के लिए एक फोन आया। यह फोन किया था बिहार जनसंघ के संगठन मंत्री अश्विन कुमार ने। वे पटना में बिहार जनसंघ की कार्यकारिणी की बैठक आयोजित करने जा रहे थे। अश्विन कुमार एवं बिहार इकाई के सभी पदाधिकारियों की यह हार्दिक इच्छा थी कि दीनदयाल जी इस सम्मेलन में उपस्थित रहें एवं सभी को उचित मार्गनिर्देश दें। इसी सम्बन्ध में अश्विन कुमार ने दीनदयाल जी से निवेदन किया। चूंकि 11 फरवरी, 1968 को दिल्ली में भारतीय जनसंघ के संसदीय दल की बैठक होनी थी अतः दीनदयाल जी के समक्ष असमंजस की स्थिति थी। उस समय तक उन्हें स्पष्ट निर्देश नहीं मिला था कि उन्हें दिल्ली की बैठक में उपस्थित होना है अथवा नहीं। यही बात उन्होंने अश्विन कुमार से कही, ‘‘यदि सुंदर सिंह भंडारी जी ने दिल्ली की बैठक में भाग लेने को नहीं कहा तो मैं पटना आ सकता हूं।’’
दीनदयाल जी की ओर से इतना अश्वासन अश्विन कुमार के लिए आशाजनक था। उधर अश्विन कुमार दीनदयाल जी के सम्भावित आगमन के समय स्वागत की तैयारी में जुट गये और इधर दीनदयाल जी सुंदर सिंह भंडारी के निर्देश की प्रतीक्षा करने लगे। अंततः पटना जाना तय हुआ।  पठानकोट-स्यालदह एक्सप्रेस में प्रथम श्रेणी बोगी में दीनदयाल जी के लिए बर्थ आरक्षित कराई गयी। पठानकोट-स्यालदह एक्सप्रेस शाम सात बजे लखनऊ स्टेशन पहुंचती थी।
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प्रथम श्रेणी के तीन कम्पार्टमेंट थे ‘ए’, ‘बी’ और ‘सी’। दीनदयाल जी की बर्थ ‘ए’ श्रेणी में थी। इसी कम्पार्टमेंट में भौगोलिक सर्वेक्षण के सहायक निदेशक ए.पी. सिंह के लिए आरक्षित बर्थ थी। ‘बी’ कम्पार्टमेंट में उत्तर प्रदेश विधान परिषद के कांग्रेसी सदस्य गौरीशंकर राय के लिए बर्थ आरक्षित थी। यह कहा जाता है कि दीनदयाल जी ने अपनी सुविधा के लिए गौरीशंकर राय से अपनी सीट बदल ली और वे कम्पार्टमेंट ‘बी’ में आ गये। वे गौरीशंकर राय से परिचित थे अतः इस प्रकार से सीट की अदला-बदली में कोई विशेष बात नहीं थी। गौरीशंकर राय भी बिना किसी आपत्ति के कम्पार्टमेंट ‘ए’ में दीनदयाल जी की सीट पर चले गये।
उत्तरप्रदेश के तत्कालीन उपमुख्यमंत्री राम प्रकाश गुप्त एवं उत्तरप्रदेश विधान परिषद के तत्कालीन सदस्य पीताम्बर दास सहित अनेक लोग दीनदयाल जी को विदा देने स्टेशन पहुंचे थे। उस समय दीनदयाल जी ने धोती, खादी की बनियान, बिना बांह का स्वेटर, उस पर एक और स्वेटर और पश्मीना का कुर्ता पहना हुआ था। उत्तरप्रदेश की कड़कड़ाती ठंड से बचने के लिए कुर्ते के ऊपर ऊनी जैकेट पहन रखी थी। कन्धे पर ऊनी शॉल भी थी। उनके साथ कुल तीन सामान थेµसूटकेस, बिस्तर तथा एक थैला जिसमें पुस्तकें थीं।
नियत समय पर गाड़ी ने लखनऊ स्टेशन छोड़ दिया। दीनदयाल जी अपनी बर्थ पर बैठ कर पुस्तक पढ़ने में मगन हो गये। यात्रा के दौरान वे पुस्तकें पढ़ना और लेख इत्यादि लिखना पसन्द करते थे। यह उन्हें यात्रा के समय का सदुपयोग प्रतीत होता था। पर्याप्त समय होने पर इसीलिए कई बार वे पैसेन्जर रेल में यात्रा करना पसन्द करते थे और यात्रा के दौरान वे या तो नया लेख लिख डालते थे अथवा पुराने अधूरे लेख को पूरा कर डालते थे। वे अपने जीवन के एक-एक मिनट को उपयोगी बनाए रखना चाहते थे। 

मुगल सराय जंक्शन पर अज्ञात शव
रात्रि दो बज कर पचास मिनट पर दिल्ली-हावड़ा ट्रेन पटना की ओर जा चुकी थी। इसके लगभग चालीस मिनट बाद रात्रि तीन बज कर तीस मिनट पर रेलवे के लाइनमैन ईश्वर दयाल को अपनी ड्यूटी करते समय सूचना मिली कि प्लेटफॉर्म से लगभग एक सौ पचास गज दूर बिजली के पोल नं.1267 से लगभग तीन फुट की दूरी पर गिट्टियों के ढेर पर एक शव पड़ा हुआ है। यह स्थान रेल लाइन से दूर था अतः रेल से कट कर मरने वाले का शव नहीं हो सकता था।
ईश्वर दयाल ने तत्परता दिखाते हुए सहायक स्टेशन मास्टर को फोन पर शव के बारे में सूचना दी। ईश्वर दयाल तथा अन्य कर्मचारियों से पूछताछ करने पर पता चला कि शव को सबसे पहले रात्रि लगभग तीन बजे दिगपाल नाम के पोर्टर ने देखा था। उस समय एक इंजन शंटिंग कर रहा था जिसका ड्राइवर था गफूर और उस इंजन में सुरक्षा गार्ड किशोर मिश्र भी सवार था। किशोर मिश्र ने यह सूचना लाईनमैन ईश्वर दयाल को दी। ईश्वर दयाल ने सहायक स्टेशन मास्टर को इसकी जानकारी फोन पर दी थी।
शव का पंचनामा बनाने से पहले रेलवे चिकित्सक को बुलाया गया जिसने चिकित्सकीय आधार पर शव की पुष्टि की। इसके बाद शव की तस्वीरें लेने के लिए फोटोग्राफर को बुलाया गया। फोटोग्राफर के कैमरे में फ्लैश लाइट न होने सुबह का पर्याप्त उजाला होने की प्रतीक्षा की गयी। सुबह लगभग सात बजकर तीस मिनट पर शव की तस्वीरें खीचीं गयी। चित्र में शव की जो स्थिति दर्ज़ हुई, वह इस प्रकार थी, ‘‘शव पीठ के बल पड़ा था। सिर उत्तर दिशा की ओर तथा पैर पश्चिम की ओर थे। दायां हाथ सिर की ओर था तथा बायां हाथ शॉल के ऊपर से होकर सीने पर था। शॉल से कमर से मुंह तक का भाग ढंका था।’’
एक बात ध्यानाकर्षित करने वाली थी कि शव के बाएं हाथ की कलाई में घड़ी बंधी हुई थी तथा मुट्ठी में पांच रुपये का नोट दबा हुआ था। यह इस तथ्य की ओर संकेत था कि मृतक के साथ लूटपाट नहीं की गयी थी। मृतक के कपड़ों की तलाशी लेने पर 04348 नं. का प्रथम श्रेणी का टिकट प्राप्त हुआ, 47506 नं. की आरक्षण रसीद, कुल 26 रुपये बरामद हुए। कलाई में बंधी घड़ी की पड़ताल करने पर घड़ी के पीछे ‘नाना देशमुख’ नाम लिखा मिला।
‘अज्ञात मृतक’ के रूप में शव का पंचनामा तैयार किया गया। शव को पोस्टमार्टम के लिए भेजा जाना था। भीड़ देखकर स्टेशन के एक कर्मचारी बनमाली भट्टाचार्य का ध्यान आकृष्ट हुआ। वह भी उत्सुकतावश वहां आ गया और उसने जैसे ही शव को देखा तो वह स्तब्ध रह गया। उसके मुंह से निकला,‘‘ये तो जनसंघ के प्रधान पंडित दीनदयाल जी हैं।’’
मुगलसराय के जनसंघ के कार्यकर्ताओं के बीच यह सूचना जंगल में आग की तरह फैल गयी। आरक्षण कार्यालय से मिली जानकारी ने इस बात की पुष्टि कर दी कि जिस शव को पुलिस ‘अज्ञात व्यक्ति का’ मान रही थी, वह राष्ट्रीय स्तर के ख्यातिप्राप्त राजनीतिज्ञ पंडित दीनदयाल उपाध्याय का शव था।

चन्द्रचूड़ आयोग और अनुत्तरित प्रश्न
माननीय चन्द्रचूड़ की अध्यक्षता में गठित ‘चन्द्रचूड़ आयोग’ ने पं. दीनदयाल उपाध्याय की हत्या के कारणों एवं परिस्थितियों को नये सिरे से जांचना आरम्भ किया। आयोग ने वाराणसी के विशेष जिला एवं सत्र न्यायाधीश मुरलीधर द्वारा दिए गये कई बिन्दुओं पर अपनी असहमति जताई। आयोग ने नवीन दृष्टिकोण से घटना का स्पष्टीकरण सामने रखा। आयोग ने विवेचना करते हुए लिखा, ‘‘यदि श्री उपाध्याय की मृत्यु के साथ उनके सामान की चोरी भी हुई और यदि हत्या और चोरी किसी एक योजना के अंग हैं तो यह निष्कर्ष निकालना युक्तिसंगत है कि इस हत्या का राजनीति से कोई सम्बन्ध नहीं है। हत्या कुछ लाभ के उद्देश्य से की गयी और हत्या का कुछ तत्कालीन कारण या तो चोरी करते समय पकड़े जाने से बचना था या यह कि चोरी सुविधा से की जा सके।’’
पं. दीनदयाल उपाध्याय के एक हाथ में पांच रुपए के नोट का पाया जाना एक अहम बिन्दु था। इस बिन्दु पर आयोग की ओर से टिप्पणी की गई, ‘‘केवल इस बात के अलावा मेरी समझ में बिलकुल नहीं आया कि कौन और क्यों उनके हाथ में नोट रखेगा? हत्यारे, विशेषकर राजनीतिक हत्यारे, अपना काम करने के बाद घटनास्थल पर ठहरते नहीं। यह भी समझ में आ सकता है, यद्यपि मैंने इस सम्भावना को नहीं माना है, लाश खम्भे के पास रखी गयी ताकि वह एक दुर्घटना जान पड़े परन्तु यह मैं नहीं मान सकता कि दुर्घटना सिद्ध करने के प्रयास में षड्यंत्रकारियों ने इत्मीनान से काम किया कि उसमें कोई त्रुटि न रह जाए। अतः नोट उनके हाथ में रखने की बात सर्वथा अमान्य है।’’
इसी तारतम्य में आयोग का मत था, ‘‘पहले वाले निष्कर्ष से यह युक्तियुक्त परिणाम निकलता है कि मृतक अपनी मुत्यु के समय नोट अपने साथ लिए हुए था।’’
उपरोक्त दोनों बिन्दुओं के निष्कर्षतः परिणाम न निकल पाने तथा जांच के दौरान रह जाने वाली कमियों के कारण ‘चन्द्रचूड़ आयोग’ भी पं. दीनदयाल उपाध्याय की हत्या के वास्तविक कारणों की तह तक नहीं पहुंच सका। आयोग के निष्कर्षों पर टिप्पणी करते हुए नानाजी देशमुख ने कहा था, ‘‘इस प्रकार पं. दीनदयाल उपाध्याय की हत्या आज भी भयंकर रहस्य बनी हुई है।’’
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Friday, February 3, 2017

" निराला’ का मानवतावाद " वसंत पंचमी-‘निराला जयंती पर विशेष

Dr Sharad Singh
मेरे कॉलम चर्चा प्लस में "दैनिक सागर दिनकर" में ( 01.02. 2017) .....My Column Charcha Plus in "Sagar Dinkar" news paper
चर्चा प्लस 
  

‘निराला’ का मानवतावाद’
वसंत पंचमी-‘निराला जयंती पर विशेष 
    - डॉ. शरद सिंह
                                                                                       
 आज मानवतावाद ज्वलंत विषय है। इस विषय पर बड़े-बड़े सेमिनार होते हैं, चर्चाएं होती हैं एवं गोष्ठियां आयोजित की जाती हैं। इन सबके द्वारा इस बात को परखने का प्रयास किया जाता है कि मानवदावाद आखिर है क्या? इसे समाज में कैसे स्थापित किया जाए? जबकि हिन्दी साहित्य की मूल चेतना ही मानवतावादी है। इसमें मानवजीवन के प्रत्येक मूल्यों को बारीकी से जांचा-परखा गया है। मानवतावाद के प्रति सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला का अपना एक अलग दृष्टिकोण रहा। वे जब मानव की बात करते थे तो सबसे पहले दुखी-पीड़ित मानवता के प्रति उनकी संवेदनाएं मुखर होती थीं। ‘निराला’ का मानवतावाद सदा प्रासंगिक है। 
    
भारतीय दर्शन, संस्कृति एवं साहित्य में मानवतावादी तत्व सनातनकाल से विद्यमान रहे हैं। साहित्य में मानवीय चेतना लेखनी की प्राणवाहक का काम करती है। जिसे सुख का आनंद और दुख की पीड़ा सतहीतौर पर हो वह अपने अनगढ़ विचार उद्घाटित तो कर सकता है किन्तु साहित्य सृजन नहीं कर सकता है। हिन्दी साहित्य की मूलचेतना ही मानवतावादी है। इसमें मानव जीवन के प्रत्येक मूल्यों को बारीकी से जांचा-परखा गया है। आधुनिकयुग के साहित्यकारों में महाप्राण कहे जाने वाले सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ ने अपने साहित्य में मानवीय मूल्यों और संवेदनाओं को जिस सूक्ष्मता से उकेरा है, वह उन्हें वास्तव में ‘महाप्राण’ सिद्ध करता है। ‘निराला’ में कालिदास की उदात्त कोमल भावनाएं थीं तो कबीर का फक्कड़पन और विवेकानंद की गंभीरता भी थी। ‘निराला’ काव्यजगत् में जितने स्थापित हुए, उतने ही अपने गद्य साहित्य के लिए भी चर्चित हुए। वे बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। उन्होंने स्वयं पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि-‘‘देखते नहीं मेरे पास एक कवि की वाणी, कलाकार का हाथ, पहलवान की छाती और फिलासफर के पैर हैं।’’
‘निराला’ ने सन् 1915 से कविता लिखना आरंभ किया था। सतत् मंथन के बाद उनका पहला काव्य ‘परिमल’ सन् 1929 में प्रकाशित हुआ। ‘निराला’ ने काव्य के छायावादी दृष्टिकोण को अपनाया वहीं प्रयोगवादी मानकों को भी आत्मसात किया। उनके अन्य काव्य हैं- अनामिका, तुलसीदास, कुकुरमुत्ता, अणिमा, बेला, नए पत्ते, अर्चना एवं आराधना। अनामिका में संग्रहीत ‘तोड़ती पत्थर’ कविता मानवीय मूल्यों की उत्कृष्ट धरोहर है। आचार्य नरेन्द्र शर्मा ने ‘निराला’ एवं ‘तोड़ती पत्थर’ के बारे में लिखा है-‘‘वह आधुनिक कवियों में शैलीगत अपनी आधुनिकता के कारण आधुनिकतम, किन्तु वेदान्त, दर्शन और वीरपूजा संबंधी भावना के कारण पुरातन बने रहे। एक ओर वह घोर अहंवादी है तो दूसरी ओर अपनी उदार मनःसंवेदना के कारण वह पददलितों के हिमायती है। ‘तोड़ती पत्थर इलाहाबाद के पथ पर’ ऐसी भी है उनकी कविता। वह कविता एक ओर तो मार्गी है और दूसरी ओर वह पत्थर तोड़-तोड़ कर नए युग का मार्ग बनाती है।’’
Charcha Plus Column of Dr Sharad Singh in "Sagar Dinkar" Daily News Paper

कुछ आलोचकों ने निराला के काव्य पर क्लीष्टता का आरोप लगाया है। ऐसे आलोचकों ने ‘निराला’ को ‘कठिन काव्य का प्रेत’ कहा है। ‘निराला’ का ऐसा आकलन इसलिए हुआ क्योंकि वे आलोचक ‘निराला’ के काव्य में निहित मानवीय संवेदनाओं एवं रागात्मक लय को पूरी तरह समझ नहीं सके। उनकी इस दुर्बलता से परे ‘निराला’ के काव्य में मानव जीवन का विकासक्रम और उसका संगठन परिलक्षित होता है। मानव की सतत् संघर्षशीलता के चलते मानवमन में होने वाले परिवर्तनों एवं उतार-चढ़ाव का एक अनूठा दर्शन मिलता है ‘निराला’ के काव्य में। वस्तुतः कवि ‘निराला’ युगयुगीन मानवीय मूल्यों की पड़ताल करते हुए युग के साथ चलते रहे।
‘निराला’ सम्पूर्ण गद्य के विविध रूपों और विशेषकर कथा साहित्य में आस्थावान रहे। ‘निराला’ का आध्यात्मिक दृष्टिकोण भी मानवतावादी था। इसीलिए मानव मन-मस्तिष्क में संचार करने वाले सुख-दुख, राग-द्वेष ‘निराला’ के गद्य साहित्य में मुखर रूप में विद्यमान हैं। ‘निराला’  का मानव देवत्व की तलाश में नहीं, उसकी ऊर्जा देवत्व को गंतव्य मान कर गतिमान नहीं होती किन्तु देवत्व का पर्याय बन कर सामने आती है। ‘निराला’ के गद्य में वेदान्त की अनुप्रेरणा और विवेकानंद की वाणी का प्रभाव ही नहीं बल्कि उनके व्यक्तित्व की विराटता भी विद्यमान है। जब हम ‘निराला’ के काव्य और उनके गद्य में मौजूद मानवचेतना से साक्षात्कार करते हैं तो इस सत्य का अहसास होने लगता है कि पद्य जल नहीं है और गद्य पाषाण नहीं है। वस्तुतः काव्य और गद्य के बीच स्पष्ट धारणात्मक रेखा खींचना कठिन है। हर गद्य में कविता संभव है और हर कविता में गद्य। यह भी सच है कि क्रियात्मक रूप में कविता और गद्य के बीच एक पारंपरिक अंतर माना जाता है और इसी आधार पर कविता में अधि सूक्ष्मता, वाक्संक्षिप्तता, संयम एवं लयात्मकता दिखाई पड़ती है तथा गद्य में अधिक विस्तार, खुलापन एवं व्यापकता का बोध होता है। कुछ आलोचक यह मानते हैं कि काव्य की अपेक्षा गद्य में मूल्यनिर्णय की क्षमता अधिक होती है। जबकि ‘निराला’ के काव्य और गद्य को एक-दूसरे के समान्तर रख कर देखा जाए तो दोनों ही विधाएं समान रूप से मूल्य-निर्णायक साबित होती हैं। अतः यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि वे कौन से कारण रहे होंगे जिन्होने ‘निराला’ को काव्य के साथ-साथ गद्य सृजन से भी जोड़ा, वह भी समउत्कृष्टता और समर्पण के साथ। इस प्रश्न का उत्तर इस एक तथ्य में निहित है कि ‘निराला’ के भीतर एक संवेगतत्व निरंतर प्रवाहित रहा। जीवन के विविध पक्षों में विचरण के कारण ही ज़मीन से जुड़े ‘निराला’ के भीतर हमेशा एक अंतर्द्वन्द्व चलता रहा। वे उद्वेलित होते रहे। जीवन की विषमताओं को ले कर उनके मन में सदा पीड़ा रही कि एक मानव दूसरे मानव का शोषण क्यों करता है? यह सहज प्रश्न और जिज्ञासा उन्हें आकुल करती रही और अंतर्मन में अनजाने में ही एक चिंतन प्रक्रिया बराबर चलती रही। यह उनके भीतर क्रांतिचेतना की पीठिका एवं प्रेरक बनी। यही क्रांतिचेतना अथवा मानववाद ‘निराला’ से काव्य के साथ-साथ गद्य सृजन भी कराती रही।
‘निराला’ के गद्य में विद्यमान मानववाद का तीन बिन्दुओं में आकलन किया जा सकता है- ‘निराला’ के उपन्यासों में मानववाद, कथासाहित्य में मानववाद और रेखाचित्रों-संस्मरणों में मानववाद। इन तीन बिन्दुओं के अध्ययन के उपरांत ‘निराला’ के मानवतावादी दृष्टिकोण की विराटता, गहनता और विस्तार को समझना आसान हो जाता है। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो ये तीनों बिन्दु ‘निराला’ के मानस के मानवीय पूर्णत्व से परिचित कराते हैं।
‘निराला’ का प्रथम उपन्यास ‘अप्सरा’ सन् 1931 में प्रकाशित हुआ। सन् 1933 में ‘अलका’, 1936 में प्रभावती एवं ‘निरुपमा’, 1946 में ‘चोटी की पकड़’ तथा 1950 में ‘कालेकारनामे’ उपन्यास प्रकाशित हुआ। ‘निराला’ की विचार प्रक्रिया को आधार बना कर यह कहा जा सकता है कि लगभग 25 वर्ष तक ‘निराला’ गद्य साहित्य के माध्यम से मानवमूल्यों एवं संवेदनाओं के आकलन और उद्घाटन में संलग्न रहे। इस सतत् प्रवाहित प्रक्रिया के चलते उन्होंने ‘अप्सरा’ में समर्पण, त्याग और बलिदान की प्रेरणा का आधार बनाया। जीवन को आस्वाद की आश्वस्ति दी, कर्म की मानववादी मनोभूमि पर निर्भीकता और स्वावलम्बन को स्थापित किया। ‘अलका’ में नारी के स्वाभिमान, मानव का अधूरापन, मानवीय विवशता, विडम्बना, अत्याचार, उत्पीड़णन और शोषण के विविध रूपों को प्रस्तुत किया। ‘प्रभावती’ में नारी गौरव के साथ प्रेम की उन्मुक्त चेतना को रेखांकित किया। ‘निरुपमा’ में उन्होंने सामाजिक वैषम्य, नारी गरिमा के साथ मानसिक वृत्तियों का विश्लेषण एवं कर्मचेतना को प्रकट किया। ‘चोटी की पकड़’ और ‘कालेकारनामे’ उपन्यास स्वदेशी आंदोलन और आंदोलन की सामाजिक भूमिका पर आधारित है, जिन्हें मानवीय गरिमा, मानवीय औदात्य के साथ-साथ मानवीय बोध और मनुष्य की साधना को मुखर किया है।
‘निराला’ की कहानियां हैं -चतुरी चमार, देवी, राजा साहिब ने ठेंगा दिखाया, हिरनी, अर्थ, सफलता, क्या देखा, सुकुल की बीवी, श्रीमती गजानन और कला की रूपरेखा। ‘चतुरी चमार’ और ‘सुकुल की बीवी’ दो समांतर धरातल की कहानियां हैं। एक में मानवीय विडम्बना और जीवन का आक्रोश उद्घाटित हुआ है तो दूसरी में नारीजीवन की विडम्बना के प्रति रूढ़ि से मुक्ति का आह्वान किया गया है। ‘निराला’ ने ‘देवी’ में मानवीय पर्तां की अंदरूनी बखिया को सामने रखा है तो ‘राजा साहिब ने ठेंगा दिखाया’ में अभिजात्यवर्ग के बौद्धिक दिवालियापन पर कटाक्ष किया है। ‘हिरनी’ मानवीयबोध का प्रश्न उठाती है और ‘श्रीमती गजानन’ नारी के स्वाभिमान से ओतप्रोत है। ‘क्या देखा’ स्वच्छंद प्रेम की मानववादी अभिव्यक्ति है तो ‘कला की रूपरेखा’ मानवीय दुष्प्रवृत्तियों पर चोट करती है।
‘निराला’ के रेखाचित्र एवं संस्मरणों में ‘कुल्लीभाट’ और ‘बिल्लेसुर बकरिहा’ का सृजन निराला-साहित्य की अनन्यतम घटना मानी जा सकती है। वस्तुतः ‘कुल्लीभाट’ में कुल्ली का स्वरूप विद्रोही चेतना के उद्वेलन से आंदोलित हुआ है वहीं ‘बिल्लेसुर बकरिहा’ को मनुष्य की महत्वाकांक्षा का प्रस्तुतिकरण कहा जा सकता है। ‘निराला’ ने जीवन को समझा, जिया और इसी जीवन को अपने गद्य साहित्य में सम्पूर्णता के साथ उतारा। ‘परिमल’ के छायावादी ‘निराला’, ‘कुकुरमुत्ता’ के प्रयोगवादी ‘निराला’ और ‘बिल्लेसुर बकरिहा’ के चरित्र-अन्वेषी ‘निराला’ -इन तीनों में एक तत्व समान रूप से मौजूद है, वह है मानवतावादी दृष्टिकोण।    
इसे दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि ‘निराला’ के कथा साहित्य को या तो केवल खानापूरी के लिए मूल्यांकित कर दिया जाता है अथवा बंधे-बंधाए नियमों और कसौटियों पर उसका परीक्षएा कर के अपनी अध्ययन-मूल्यांकन की औपचारिकता की पूर्ति कर दी जाती है। यही कारण है कि ‘निराला’ का कथा साहित्य एक अप्रत्यक्ष उपेक्षा का शिकार रहा और वह प्रेमचंद के कथा साहित्य के प्रभामंडल के पीछे छिपा रह गया। ‘निराला’ का कथा साहित्य चर्चित अवश्य हुआ लेकिन उचित मूल्यांकन की कमी के चलते अपने जनबोध को भली-भांति उजागर नहीं कर पाया। वर्तमान चिंतक आज के समय को राजनैतिक समय मानते हैं और आज की रचनाओं में इसी राजनैतिक समय को लिखते और समीक्षा का आधार बनाते हैं जबकि ‘निराला’ के गद्य के मर्म को समझने के बाद वर्तमान मानवचरित्र को समझना आसान हो जाता है।
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Tuesday, January 31, 2017

गणतंत्र को हमसे आशाएं ... चर्चा प्लस... - डॉ. शरद सिंह

Dr Sharad Singh
"गणतंत्र को हमसे आशाएं " - मेरे कॉलम चर्चा प्लस में "दैनिक सागर दिनकर" में ( 25.01. 2017) .....My Column Charcha Plus in "Sagar Dinkar" news paper
 



चर्चा प्लस :
गणतंत्र को हमसे आशाएं
- डॉ. शरद सिंह ...                                                                                  

                                                             
‘हम भारत के लोग...’ हमने अपनी आकांक्षाओं, आशाओं एवं विश्वास के साथ संविधान की संरचना को स्वीकार किया और सच्चे गणतंत्र की राह में आगे बढ़ने की शपथ ली। हमने तो हमेशा अपने गणतंत्र से अनेकानेक आशाएं रखीं लेकिन क्या कभी सोचा कि हमने उन आशाओं का क्या किया जो हमारे गणतंत्र को हमसे रही होंगी? क्या हम गणतंत्र की आशाओं पर खरे उतरे हैं या फिर हमने अपने गणतंत्र को अपना निजीतंत्र बनाते जा रहे हैं। अपनी वैश्विक छवि के साथ-साथ सबसे नीचे की पंक्ति के नागरिकों के जीवन-स्तर को ध्यान में रखते हुए इस संदर्भ में कभी-कभी हमे आत्मावलोकन भी करना चाहिए।
    
एक लम्बी परतंत्रता के बाद स्वतंत्रता किसी भी कीमत पर मिले स्वीकार्य थी। कीमत भी हमने चुकाई। भारतीय भू-भाग का बंटवारा हुआ। अमानवीयता का तांडव देखना पड़ा। उसके बाद ग़रीबी, बदहाली, शरणार्थियों का सैलाब, बेरोज़गारी और सांप्रदायिक तनाव ने स्वतंत्रता की खुशी को कई-कई बार हताहत किया। फिर भी स्वतंत्रता विजयी रही और हमने अपना संविधान गढ़ा तथा उसे स्वयं पर लागू किया। इसके  पहले संविधान सभा के सामने चुनौती थी कि नए गणतंत्र का निर्माण ऐसे हो कि देश में फैली भाषाई, धार्मिक, जातीय, सांस्कृतिक विविधता को आत्मसात किया जा सके और लोगों को सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक दृष्टि से न्याय सुनिश्चित किया जा सके। एक ऐसा गणतंत्र जिसमें नागरिकों को बराबरी का दजर्र मिले। जिसमें शासन की शक्ति किसी एक राजा अथवा अधिनायक के पास न हो कर जनता और उसके चुने प्रतिनिधियों के हाथ में हो।
Charcha Plus Column of Dr Sharad Singh in "Sagar Dinkar" Daily News Paper
गणतंत्र के साथ सुनहरी आशाएं जागीं। देश तरक्की करेगा तो हम भी तरक्की करेंगे। या फिर इसके उलट कि हम तरक्की करेंगे तो देश भी तरक्की करेगा। लेकिन इस ‘हम भारत के लोग’ में से ‘हम’ पर ‘मैं’ का प्रभाव बढ़ता गया और ‘मैं’ ने ‘हम’ को निर्बल बना दिया। कभी-कभी उन्मादी भी। हमने अपनी परम्पराओं को सहेजा संवारा और उनसे सबक लिया। समयानुसार सड़ी-गली परम्पराओं को काट कर फेंका भी लेकिन उन्माद की अवस्था में पहुंचते ही हम सत्य, अहिंसा और परमार्थ के समरकरण को भुला कर हिंसक व्यवहार करने लगते हैं। जीव मात्र के प्रति उदार विचार की परम्परा के पोषक हम यदि जलीकट्टू का समर्थन करने लगते हैं तो वहीं हमारा ‘अहिंसा परमोधर्म’ का आह्वान टूटने लगता है। हमने अपने संविधान में अहिंसा को र्प्याप्त जगह दी है। परमोधर्म को भी उच्च स्थान दिया है फिर हिंसा को अपनी गौरवमयी परम्परा कहते हुए संविधान की धाराओं को कैसे सुरक्षित रख सकते हैं?
9 दिसम्बर 1946 को हुई संविधान सभा की पहली बैठक में विभिन्न जातियों, धर्मों, आर्थिक, राजनीतिक विचारों के लोग शामिल थे और सामाजिक आधार को फैलाने की कोशिश की गई थी ताकि भारत अपने आप में जिस तरह से अद्वितीय विविधता को समेटे है उसी के अनुरूप नए गणतंत्र का निर्माण हो सके। भारतीय संविधान में नैतिकता और राजनीतिक परिपक्वता को आधार बनाया गया। लेकिन समूचे देश में महिलाओं साथ बढ़ते दुर्व्यवहार को देखते हुए यह लगने लगता है कि हमारे तंत्र से अब नैतिकता का लोप होने लगा है। गोया भारतीय स्त्री बर्बरयुग के किसी नए संस्करण को जी रही हो। भारत इस समय मानव तस्करी का वैश्विक मार्ग बन चुका है। यह बर्बरता भी हमारे संवैधानिक उसूलों का सिर झुकाने को र्प्याप्त है।
गणतांत्रिक भारत में देश की विविधता और जटिलता को एक राजनीतिक व्यवस्था के रूप में अपनाया गया और ऐसा करते समय विभिन्न क्षेत्रों में बहुलतावाद का सम्मान किया गया। राजनीतिक क्षेत्र में लोकतंत्र, सांस्कृतिक क्षेत्र में संघीय ढांचे और धार्मिक मामलों में धर्मनिरपेक्षता के सहारे एक नए गणतंत्र के मायनों को स्पष्ट किया गया। गणतंत्र के गठन के बाद से ही नीति निर्धारकों की प्राथमिकता देश के संघीय ढांचे को बनाए रखना थी।
यह सच है कि कोई भी तंत्र हो उसकी अपनी व्यक्तिगत समस्याएं होती हैं। लेकिन गणतंत्र की परिकल्पना मैं संवैधानिक समस्याओं के लिए कई रास्ते खुले रखे गए। संशोधनों के द्वारा संवैधानिक ढांचे में लचीलापन भी बनाए रखा गया। फिर भी प्रत्येक नए चुनाव में चाहे वह लोकसभा का हो या विधान सभा का या फिर किसी पंचायत अथवा निगम का, गरिमा के सीमाएं चटकती मिली हैं। गणतंत्रता के क्या है मायने आज हमारे देश में। इतने लम्बे अरसे में कितने नियमों का ईमानदारी से हमने निर्वाह किया है और कितने ऐसे संवैधानिक नियम है जिनको हमने संविधान के पन्नों पर लिख कर भुला दिया है। हमारा देश भारतवर्ष एक जनतांत्रिक देश है। जहां जनता के द्वारा चुने गये प्रतिनिधियों द्वारा ही देश की शासन व्यवस्था चलायी जाती है। गणतंत्र दिवस हमारे देश के इतिहास का वो दिन है, जिस दिन संविधान पूर्णरुपेण लागू किया गया था। देश की समस्त गतिविधियां इन संवैधानिक नियमों के आधार पर ही सुचारु ढंग से संचालित होती है। संविधान हमे जीने के तौर तरीके सीखाता है। एक सभ्य और कर्मठ राष्ट्र के सपने को साकार करता है हमारा संविधान। देश की गणतंत्रत को बनाये रखने हेतु प्रशासन के साथ साथ जनता का भी महत्वपूर्ण योगदान होता है। संविधान के नियम सबों के लिए बराबर होते है। वो किसी भी प्रकार के जातिभेद या वर्चस्व की भावना से ऊपर होता है। फिर भी भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और विभिन्न प्रकार के संकट आज भी मुंहबाए खड़े हैं। अगर हम सिर्फ अपनी उन्नति के बारे में सोचते है तो ये हमारी संकीर्ण मानसिकता का परिचायक है। हमे अपने देश और समाज के विषय में भी सोचने की जरूरत है। हमें ऐसे कार्यों की ओर स्वयं को अग्रसर करना है, जिनमें स्वयं के साथ सम्पूर्ण राष्ट्र की प्रगति भी सम्मिलित हो। जैसे हमारा संविधान हमें अपने अधिकारों और कर्तव्यों की समझ देता है। वैसे ही हमें भी देश के प्रति अपनी भावना परिलक्षित करनी चाहिए। युवावर्ग जो कि किसी भी राष्ट्र की प्रगति और उसके भविष्य का एकमात्र कार्यवाहक होता है।युवाओं की सहनशीलता, कर्तव्यपरायणता और कर्मठता ही राष्ट्र की अखण्डता रुपी महल के लिए ईंट का कार्य करते है। एक एक ईंट मिलकर ही एक विशाल महल का निर्माण करता है। आज जबकि हम इक्कीसवी सदी में कदम रख चुके है। तकनीक के साथ साथ लोगों की मानसिकता भी अब बदल चुकी है। ऐसे समय में गणतंत्र दिवस को सिर्फ एक राष्ट्रीय दिवस अथवा एक दिन का उत्सव मान कर, टीवी के छोटे पर्दे पर झांकियां देख कर, नेताओं के भाषण सुन कर भुला देना और दूसरे दिन से यह भी याद न रखना कि हमारा कोई संविधान भी है, हमारा कोई गणतंत्र भी है जिसके प्रति हम उत्तरदायी हैं, यह हमारी नासमझी ही नहीं अपराध भी है।
हमारे गणतंत्र का दूसरा महत्वपूर्ण अंग तंत्र है। लेकिन आजकल ऐसा लगता है जैसे तंत्र अनियंत्रित होता जा रहा है। उसे अपनी मनमानी करने से रोकने का दायित्व जिनका है कहीं कहीं तो वे खुद ही भ्रष्टाचार की मिसाल निकल आते हैं। तंत्र के इस कथन की भी अनदेखी नहीं की जा सकती कि आज के दौर में सत्ता दल का राजनैतिक हस्तक्षेप प्रशासनिक अमले पर इतना अधिक रहता हैं कि वे चाहकर भी निष्पक्ष और निर्भीक होकर काम नहीं कर सकते हैं। कोई भी जनप्रतिनिधि जब एक बार अपने राजनैतिक हित साधने के लिये तंत्र का उपयोग कर लेता हैं तो फिर गणतंत्र के मूल्यों में गिरावट आने लगती है। आर्थिक मुद्रास्फीति से कहीं अधिक घातक होती है नैतिकता की स्फीति।किसी भी समस्या को हल करने के लिये गण को तंत्र का साथ देने और तंत्र को त्वरित निराकरण के प्रयास करने आवश्यक होते हैं। आज महंगाई सबसे बड़ी समस्या हैं। हालांकि विश्व स्तरीय आर्थिक मंदी, अंर्तराष्ट्रीय बाजार की उथल पुथल, नोटबंदी के बाद की आर्थिक स्थिति ने देश को भी हिला कर रख दिया है। लेकिन इतना कह देने मात्र से सरकार के कर्तव्यो की इतिश्री नहीं हो जाती है। और ना ही केन्द्र और राज्य सरकार एक दूसरे पर दोषारोपण़ करके बच सकतीं है। गण चुस्त और दुरुस्त रहें तथा तंत्र पूरी मुस्तैदी से देश के विकास और आम आदमी की खुशहाली के लिये संकल्पित हो, तभी देश एक बार फिर अपने स्वर्णिम मुकाम पर पहुंच सकेगा।
आज हम चारों ओर देख रहे हैं की बहुत सारे सरकारी कर्मचारी उन लोगों से घूस ले रहे हैं रिश्वत ले रहे हैं। क्या यही हम हमारे देश के प्रति कर्तव्य निभा रहे हैं । इसमें जिम्मेदार सिर्फ वह सरकारी आदमी नहीं है जिम्मेदार आम आदमी भी है रिश्वत लेने वाला और देने वाला भी जिम्मेदार है और रिश्वत देने वाला भी उतना ही जिम्मेदार है क्योंकि लोग अपना कर्तव्य भूल जाते हैं डॉक्टर, इंजीनियर या किसी भी विभाग के सरकारी कर्मचारी इस दूषित व्यवहार को अपनाते हैं और पूरे देश को इसका खामियाजा भुगतना पड़ता है। विकास के पहिए ऐसे आचरण से ही बाधित हो जाते हैं। प्रश्न यह है कि सुरक्षा मामलों में भी भ्रष्टाचार के दाग़ जब उभर कर सामने आने लगे हैं तो यह मान ही लेना चाहिए कि हम अपने संवैधानिक उसूलों से भटक गए हैं। यदि स्वतंत्रता के दशकों बाद भी हम खुले में शौचमुक्त देश बनाने के लिए संघर्ष करते दिखाई दे रहे हैं तो विश्व के सक्षम राष्ट्रों से किस आधार पर अपनी तुलना कर सकते हैं? बहरहाल अब समय आ गया है कि हमें खुद को धोखा देने से रोकना होगा और सही मायने में खुद के लिए तय करना होगा कि हम अपने गणतंत्र के अनुरूप एक सही तथा अच्छे नागरिक कैसे साबित हो सकते हैं।
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Wednesday, January 18, 2017

My Train Journey in bitter cold January : From New Delhi to Sagar from World Book Fair 2017 - Dr (Miss) Sharad Singh

Dr Sharad Singh on Delhi to Sagar Train Journey from World Book Fair 2017, 07-15 January
Dr Sharad Singh on Delhi to Sagar Train Journey from World Book Fair 2017, 07-15 January
Dr Sharad Singh on Delhi to Sagar Train Journey from World Book Fair 2017, 07-15 January
Dr Sharad Singh on Delhi to Sagar Train Journey from World Book Fair 2017, 07-15 January
Dr Sharad Singh on Delhi to Sagar Train Journey from World Book Fair 2017, 07-15 January

Goodbye World Book Fair 2017 ... Dr Sharad Singh

Dr Sharad Singh at World Book Fair 2017, Entrance Gate No. 8, Pragati Maidan, New Delhi
Dr Sharad Singh at World Book Fair 2017, Entrance Gate No. 8, Pragati Maidan, New Delhi

Dr Sharad Singh at World Book Fair 2017, Entrance Gate No. 8, Pragati Maidan, New Delhi

Dr Sharad Singh at World Book Fair 2017, Entrance Gate No. 8, Pragati Maidan, New Delhi

Dr Sharad Singh at World Book Fair 2017, Entrance Gate No. 8, Pragati Maidan, New Delhi

Dr Sharad Singh at World Book Fair 2017, Entrance Gate No. 8, Pragati Maidan, New Delhi
 

World Book Fair 2017 ...Meeting with Friends - 3

पुस्तकों के बीच यूं मुलाक़ात होना सुखद लगता है ...
Nice to Meet You ... Anup Vashishtha ji, Dr Vivek Mishra, Reetu Kalsi, Navrahi Navyavesh, Pradeep Saurabh, Pranjal Dhar and Mahendra Bhishma
विश्व पुस्तक मेला 2017

From Left- Anup Vashishtha, Dr Sharad Singh, and Dr Vivek Mishra at World Book Fair 2017, Pragati Maidan, New Delhi

From Left- Dr Sharad Singh, Mahendra Bhishma and Dr Vivek Mishra at World Book Fair 2017, Pragati Maidan, New Delhi

From Left- Reetu Kalsi, Navrahi Navyavesh and Dr Sharad Singh at World Book Fair 2017, Pragati Maidan, New Delhi

Pranjal Dhar, Dr Sharad Singh, Pradeep Saurabh at Rajkamal Stall at World Book Fair 2017, Pragati Maidan, New Delhi

Pranjal Dhar, Dr Sharad Singh, Pradeep Saurabh at Rajkamal Stall at World Book Fair 2017, Pragati Maidan New Delhi --