Thursday, August 3, 2017

Dr (Miss) Sharad Singh at Pavas Vyakhyan Mala 2017 Bhopal - Train Journey

Sagar to Bhopal on Rajyarani Express ...
Dr (Miss) Sharad Singh at Pavas Vyakhyan Mala 2017 Bhopal - Train Journey....


Dr (Miss) Sharad Singh at Pavas Vyakhyan Mala 2017 Bhopal - Train Journey

Dr (Miss) Sharad Singh at Pavas Vyakhyan Mala 2017 Bhopal - Train Journey

Dr (Miss) Sharad Singh at Pavas Vyakhyan Mala 2017 Bhopal - Train Journey

Dr (Miss) Sharad Singh at Pavas Vyakhyan Mala 2017 Bhopal - Train Journey

Dr (Miss) Sharad Singh at Pavas Vyakhyan Mala 2017 Bhopal - Train Journey

Dr (Miss) Sharad Singh at Pavas Vyakhyan Mala 2017 Bhopal - Train Journey

Dr (Miss) Sharad Singh at Pavas Vyakhyan Mala 2017 Bhopal - Train Journey


चर्चा प्लस ... जरूरी है जड़ों तक पहुंचना ... डॉ. शरद सिंह


Dr Sharad Singh
"सार्थक संवाद और शोधपूर्ण लेखन विचारों को जिस तेजी से उद्वेलित करता है, उतना ही दूरगामी प्रभाव भी छोड़ता है। यही मूल अवधारणा होनी चाहिए प्रत्येक साहित्यिक आयोजनों की जैसी कि #पावस_व्याख्यान_माला’ की अवधारणा है।"
.... पढ़िए मेरे कॉलम " #चर्चा_प्लस " सागर दिनकर (02.08.2017) में मेरा लेख "जरूरी है जड़ों तक पहुंचना" ।
 
चर्चा प्लस
जरूरी है जड़ों तक पहुंचना  
- डॉ. शरद सिंह
 
अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों की बाढ़ और अंग्रेजी की ओर अभिभावकों की अंधी दौड़ ने मातृभाषाओं को उपेक्षित कर दिया है। दिलचस्प बात तो यह है कि हिन्दी के प्राध्यापक, साहित्यकार एवं पक्षधर भी इस अंधी दौड़ में सम्मिलित हैं। हिन्दी के लिए उपजे ऐसे कठिन दौर में कुछ आयोजन ऐसे भी हैं जो हिन्दी के मान को बचाए रखने के प्रति आश्वस्त कराते हैं। ऐसा ही एक आयोजन है -‘पावस व्याख्यान माला’ जो प्रदेश की राजधानी भोपाल में प्रति वर्ष आयोजित किया जाता है। मेरी लगातार तीन वर्ष की सहभागिता का अनुभव मुझे भरोसा दिलाता है कि हिन्दी के प्रति सत्यनिष्ठा से काम करने वाले अभी भी बहुसंख्यक हैं।

कभी-कभी ऐसा लगता है कि हमारी सारी विद्वता, सारी सोच अंग्रेजों के बनाए माप-दण्ड के अनुरूप चलती है। हम शेक्सपियर, शैली और कीट्स के इतर साहित्य को जानने से कतराते हैं। सोवियत संघ के युग में आम आदमी ने टॉल्सटॉय, गोर्की और पुश्किन के साहित्य को जाना। उससे कुछ आगे फ्रैंज काफ्का, सार्त्र और कामू को पढ़ा। आज ‘ अलकेमिस्ट’ के लेखक पाओलो कोएलो को भी हिन्दी लेखक और पाठक कम ही जानते हैं। जो जानते हैं उनमें भी पाओलो कोएलो की साहित्यिक प्रवृत्तियों को समझने वाले कम ही हैं। अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों की बाढ़ और अंग्रेजी की ओर अभिभावकों की अंधी दौड़ ने मातृभाषाओं को उपेक्षित कर दिया है। ऐसी दशा में आज हमें मेहनत करनी पड़ेगी त्रिलोचन के सॉनेट की मूलप्रवृत्तियों को समझने के लिए। खैर त्रिलोचन और उनके सॉनेट की बात मैं बाद में करूंगी पहले उस आयोजन के बारे में जहां त्रिलोचन और उनके सॉनेट को पूरी आत्मीयता से याद किया गया। विगत 24 वर्ष से मध्यप्रदेष राष्ट्रभाषा प्रचार समिति भोपाल द्वारा ‘पावस व्याख्यान माला’ का आयोजन किया जा रहा है। इस वर्ष भी 28 से 30 जुलाई 2017 तक हिन्दी भवन, भोपाल में 24वीं पावस व्याख्यानमाला का तीन दिवसीय आयोजन किया गया। व्याख्यान के लिए चार विषय चुने गए थे - रामायण में प्रतिष्ठापित मूल्यों की सार्वभौमिकता, अमृतलाल नागर के उपन्यासों का वैशिष्ट्य, त्रिलोचन : गांव के कवि का सॉनेट शिल्प तथा चौथा विषय था लोक साहित्य में संस्कृति की मधुरिम छटा। जितना सच यह है कि लोक साहित्य ने हिन्दी साहित्य को समृद्ध बनाया है उतना ही सच यह भी है कि पाश्चात्य साहित्यिक प्रवृत्तियों ने भी हिन्दी साहित्य को विस्तार दिया है। इस क्रम में सॉनेट का स्थान सबसे पहले आता है। पश्चिमी जगत की साहित्यिक विधा सॉनेट को भारतीय परिवेश में ढालने का श्रेय यदि किसी को है तो वह है कवि त्रिलोचन शास्त्री को। 
Charcha Plus Column of Dr Sharad Singh in "Sagar Dinkar" Daily News Paper
 
हिन्दी साहित्य के काव्य इतिहास में सॉनेट को पूरी भारतीयता के साथ समावेशित करने का श्रेय त्रिलोचन शास्त्री को ही है किन्तु उनके देहान्त के बाद मानो साहित्य जगत ने त्रिलोचन के सॉनेट को महाविद्यालयीन पाठ्यक्रम के एक लघु अध्याय के रूप में लेख कर के छोड़ दिया। यह महत्वपूर्ण रहा कि मध्यप्रदेश राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, भोपाल ने अपनी 24 वीं पावस व्याख्यानमाला में त्रिलोचन के सॉनेट पर पूरा एक सत्र समर्पित किया। विषय था -‘‘त्रिलोचन : गांव के कवि का सॉनेट शिल्प’’। इस सत्र में मैंने कवि त्रिलोचन जी को याद करते हुए अपनी उन स्मृतियों को सबके साथ साझा किया जब त्रिलोचन जी सागर विश्वविद्यालय में मुक्तिबोध सृजन पीठ में अपने प्रथम कार्यकाल में पदस्थ थे। जितने ख्यातिनाम, उतने ही सहज व्यक्ति। उन दिनों मैं नवगीत लिखा करती थी (आज भी यदाकदा नवगीत लिखती हूं।) मैं चाहती थी कि त्रिलोचन जी मेरे नवगीतों पर अपनी राय दें। विश्वविद्यालय कैंपस में उनके निवास पर ही मुक्तिबोध पीठ का कार्यालय था। इसलिए प्रथम परिचय में ही उनकी धर्मपत्नी से भी मेरा परिचय हो गया। अत्यंत ममतामयी स्त्री थीं वे। दिलचस्प बात यह है कि दो मुलाक़ातों के बाद अचानक घर-परिवार की चर्चा निकली और तब त्रिलोचन जी ने मुझसे मेरे परिवार के बारे में पूछा कि मैं किस परिवार से हूं, घर में कौन-कौन हैं आदि-आदि? मैंने उन्हें जब अपनी माता जी डॉ. विद्यावती ‘मालविका’ के बारे में बताया तो उन्हें सुखद आश्चर्य हुआ और वे मुझे लगभग डपटते हुए बोले,‘‘पहले क्यों नहीं बताया कि तुम विद्यावती ‘मालविका’ जी की बेटी हो और संत श्यामचरण जी की नातिन हो!’’
त्रिलोचन जी से पारिवारिक परिचय निकल आया। मैं उन्हें ‘अंकल’ और उनकी धर्मपत्नी को ‘आंटी’ कह कर पुकारती थी। त्रिलोचन जी ने जब मेरे नवगीत देखे तो मुझे सलाह दी कि उन नवगीतों को संग्रह के रूप में प्रकाशित करा लूं। मैंने उनसे पूछा कि कौन प्रकाशक छापेगा इन्हें? इस पर उन्होंने भी दो-टूक उत्तर दिया कि कोई नहीं, पहला संग्रह तुम्हें स्वयं अपने खर्चे पर छपवाना होगा। अंततः सागर के स्थानीय मुकेश प्रिंटिंग प्रेस से मेरा नवगीत संग्रह ‘‘आंसू बूंद चुए’’ सन् 1988 में प्रकाशित हुआ। अपने वादे के अनुरूप जिसका बर्ल्ब स्वयं त्रिलोचन जी ने लिखा था।
यहां मुझे स्वीकार करने में कोई संकोच नहीं है कि उन दिनों त्रिलोचन जी से उनके सॉनेट्स सुन कर मैंने भी हाथ आजमाने का प्रयास किया था। गिनती के दस सॉनेट्स लिखने के बाद ही मुझे समझ में आ गया कि यह विधा देखने में भले ही सरल लगे किन्तु लिखने में बहुत कठिन है।
मुक्तिबोध पीठ में त्रिलोचन जी का दूसरा कार्यकाल विषादयुक्त रहा। उस दौर में उन्होंने अपनी जीवनसंगिनी को खो दिया था और धीरे-धीरे वे स्मृतिभ्रम के शिकार होते जा रहे थे। तमाम विपरीत परिस्थितियां होते हुए भी साहित्य के प्रति उनका उत्साह यथावत रहा। वे अकसर अपने सॉनेट्स की चर्चा किया करते। सॉनेट विधा से उन्हें विशेष लगाव-सा हो गया था। वे कहा करते थे कि ‘‘सॉनेट में मैं अपनी बात अधिक स्पष्ट रूप से कह पाता हूं।’’ मुझे लगता है कि सॉनेट के प्रति उनका यह विश्वास उनके भीतर मौजूद उस व्यक्ति का विश्वास था जो जमीन से जुड़ा हुआ था और आमजन की बातें करना बखूबी जानता था।
त्रिलोचन जी के सॉनेट्स के संदर्भ में एक और घटना मुझे याद आ रही है जिसका यहां मैं उल्लेख करना चाहूंगी। इसी वर्ष, विश्व पुस्तक मेला 2017 में सामयिक प्रकाशन के स्टॉल पर मैं, अशोक वशिष्ठ और नंदभारद्वाज जी बैठे थे, साहित्यिक चर्चा कर रहे थे कि बातों ही बातों में भारतीय साहित्य में पाश्चात्य शैली के प्रभाव की चर्चा चल पड़ी। वहीं पुस्तक पलटते खड़े हुए एक युवक ने अचानक हस्तक्षेप करते हुए पूछा,‘‘त्रिलोचन शास्त्री जी ने भी तो पाश्चात्य शैली को अपनाया। उन्होंने सॉनेट लिखे। क्या उन्हें भारतीय पारम्पिरिक काव्य की शैलियां कम महसूस हुईं?’’
हम तीनों चौंके। पहली बात तो यह कि वह युवक पुस्तक जरूर पलट रहा था लेकिन उसका ध्यान हम लोगों के विचार-विमर्श पर केन्द्रित था। दूसरी बात कि उसने जिस ढंग से हम लोगों के सामने प्रश्न उछाला उससे साफ़ पता चल रहा था कि वह भी बहस में शामिल होना चाहता है। बल्कि शामिल ही नहीं, बहस को आगे भी बढ़ाना चाहता है। उसकी यह जिज्ञासु प्रवृत्ति अच्छी लगी। चर्चा के अंत में उसने स्वयं ही अपना परिचय दिया कि वह जेएनयू का छात्र है और हिन्दी साहित्य की पाश्चात्य प्रवृत्तियों पर ही शोध कर रहा है। अतः स्वाभाविक था उसका इस तरह बहस में शामिल होना। मैंने उस युवक से कहा कि किसी भी साहित्यकार को सीमाओं में नहीं बांधा जा सकता है। किसी कवि से इस बात की अपेक्षा रखना तर्कसंगत नहीं है कि उसे परंपरागत शैलियों में ही लिखना चाहिए अथवा पाश्चात्य शैली के स्थान पर देशज शैली को अपनाना चाहिए। साहित्यसृजन बलात् नहीं किया जाता। यह भावों, संवेगों और अभिव्यक्ति के संयुक्त उद्घाटन होता है और यह उद्घाटन कवि किस ढंग से करना चाहता है यह उसके मनोभावों पर, या कहा जाए तो उसकी इच्छा पर निर्भर होता है। न तो किसी से बलपूर्वक ग़ज़ल लिखवाई जा सकती है और न किसी से बलपूर्वक गीत लिखवाया जा सकता है। जहां तक मेरा मानना है कि साहित्यिक अभिव्यक्ति अपनी काया स्वयं चुनती है।
त्रिलोचन शास्त्री ने सन् 1950 के आस-पास सॉनेट लिखना आरम्भ किया। यह माना जाता है कि उन्होंने अपनी प्रयोगधर्मिता का समावेश करते हुए अपने अधिकांश सॉनेट्स पेटार्कन एवं शेक्सपीयरन शैली में ही लिखे हैं। शिल्प का आधार भले ही आयातित हो किन्तु त्रिलोचन ने भाव, विचार और शिल्प को ‘त्रिलोचनीय’ अर्थात् मौलिक रूप दिया। जहां तक मेरा मानना है कि समालोचना के दौरान लेखन हमेशा शोधपूर्ण होना चाहिए। यानी पहले जड़ों तक पहुंचो, फिर लिखो। हमें त्रिलोचन के सॉनेट की तुलना शेक्सपियर के सॉनेट से करते हुए ही नहीं ठहर जाना चाहिए बल्कि सॉनेट के मूल स्थान ग्रीस, इटली और सिसली के सॉनेट की प्रवृत्तियों से तुलना करना चाहिए। क्योंकि शेक्सपीयर का सॉनेट एलीटवर्ग का सॉनेट था जबकि सिसली का सॉनेट कृषक और मजदूरवर्ग का था और इस प्रकार के सॉनेट ही त्रिलोचन ने लिखे हैं। यह भी याद रखा जाना चाहिए कि त्रिलोचन के सॉनेट में आयरिश और कैल्टिक प्रवृत्तियां भी हैं।
बात फिर वहीं जा पहुंचती है कि यदि ‘पावस व्याख्यान माला’ जैसा आयोजन नहीं होता तो मुझे त्रिलोचन के सॉनेट की जड़ों की प्रत्यक्ष चर्चा करने का उन्मुक्त अवसर नहीं मिलता। सार्थक संवाद और शोधपूर्ण लेखन विचारों को जिस तेजी से उद्वेलित करता है, उतना ही दूरगामी प्रभाव भी छोड़ता है। यही मूल अवधारणा होनी चाहिए प्रत्येक साहित्यिक आयोजनों की जैसी कि ‘पावस व्याख्यान माला’ की अवधारणा है। मैं तो यूं भी लेखन में शोधपूर्ण तथ्यात्मक लेखन की पक्षधर रही हूं। क्योंकि शोध और सत्य की मज़बूत जड़ें ही लेखन रूपी वृक्ष को फलदायी बनाती हैं।
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#त्रिलोचन #अवधारणा #कैल्टिक #इटली #सिसली #आयरिश #पावस_व्याख्यान_माला #भोपाल #सागर #सॉनेट #साहित्यिक_आयोजन

Wednesday, July 26, 2017

चर्चा प्लस ... लिपस्टिक के बहाने स्त्रीपक्ष में बहस ... डॉ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
हाल ही में रिलीज़ "लिपस्टिक अंडर माई बुर्का" पर आज (26.07.2017) मेरा कॉलम #चर्चा_प्लस दैनिक "सागर दिनकर" में पढ़िए ...."अलंकृता श्रीवास्तव की फिल्म ‘‘लिपस्टिक अंडर माय बुर्का’’ ने इस बात को साबित कर दिया है कि आज की महिला फिल्म निर्देशक घाटे के जोखिम से निपटना बखूबी जानती है। स्त्री यौनिकता का संवेदनशील विषय को सामने रख कर वह स्त्री की स्वतंत्रता के पक्ष में आवाज़ बुलंद करती है और साथ ही अपने आर्थिक घाटे की संभावना को भी चतुराई से बचा ले जाती है।"

चर्चा प्लस
लिपस्टिक के बहाने स्त्रीपक्ष में बहस
- डॉ. शरद सिंह 

किसी स्त्री की स्वतंत्रता का अर्थ क्या हो चाहिए? आर्थिक स्वतंत्रता या यौनिक स्वतंत्रता अथवा दोनों या दोनों नहीं। प्रश्न पेंचीदा हैं। तय स्वयं स्त्री को करना है कि वह किस सीमा तक और कैसी स्वतंत्रता चाहती है। निर्देशक अलंकृता श्रीवास्तव द्वारा निर्देशित स्त्री के पक्ष में महत्वाकांक्षी फिल्म ’लिपस्टिक अंडर माय बुर्का’ इस प्रश्न को बड़ी शिद्दत से उठाती है और एक बहस छोड़ जाती है दर्शकों के मन-मस्तिष्क में। लिपस्टिक स्त्री के श्रृंगार का एक हिस्सा ही नहीं वरन् उसके अधिकार का प्रतीक है जिसे वह समाज के सामने लाना चाहती है पूरी खूबसूरती के साथ। फिर भी अनेक ऐसे प्रश्न हैं जो एक बार फिर बहस का आग्रह करते दिखाई देते हैं।
Charcha Plus Column of Dr Sharad Singh in "Sagar Dinkar" Daily News Paper

स्त्री अधिकारों के पक्ष में फिल्म जगत ने यू ंतो हमेशा पहल की है लेकिन जब ये स्त्री निर्देशकों और निर्माताओं ने इस क्षेत्र में क़दम रखा तब से एक अलग ही रंग इस तरह की फिल्मों में दिखाई देने लगा। यह अलग रंग बॉक्स ऑफिस का जोखिम माना जाता रहा है। भारतीय सिने जगत में अल्पसंख्यक होते हुए भी महिला निर्देषकों ने साहस के साथ इस जोखिम को बार-बार उठाया लिया। अपने परिवार के लिए एक-एक पैसे जोड़ने पर विष्वास रखने वाली महिलाएं जब सिने जगत में निर्देषक के रूप में प्रविष्ट हुईं तो उनमें से अधिकांष ने फिल्म के माध्यम से पैसे कमाने का उद्देष्य त्याग कर सामाजिक, पारिवारिक एवं वैष्विक मुद्दों पर फिल्में बनाईं, वह भी बिना किसी ‘फिल्मी-मसाले’ के।
जब प्रश्न भारतीय सिनेमा का उठता है तो आमतौर पर महिलाओं की विस्तृत भूमिका अभिनय और संगीत तक सिमटी दिखाई देती है। नायिका, खलनायिका, चरित्र अभिनेत्री अथवा पार्श्व गायिका पर जा कर स्त्री का अस्तित्व सिमटता दिखता है। भारतीय सिने जगत में महिला गीतकारों को भी उंगलियों पर गिना जा सकता है और निर्देशकों को भी। यद्यपि भारतीय सिनेमा में महिला निर्देशकों की शुरूआत बहुत पहले हो गई थी जब अपने समय की प्रसिद्ध अभिनेत्री फातिमा बेगम ने सन् 1926 में मूक फिल्म ‘बुलबुल ए परिस्तान’ का निर्देशन किया था। इसके लगभग 10 साल बाद सन् 1936 में अभिनेत्री नरगिस की मां जद्दन बाई ने फिल्म ‘मैडम फैशन’ का निर्देशन किया था। यह फिल्म हिट रही और इसके बाद उन्होंने ‘मोती का हार’ और ‘जीवन स्वप्न’ नामक फिल्मों का भी निर्देशन किया। इसके बाद शोभना समर्थ ने भी अभिनय के साथ ही फिल्म का निर्देशन का काम किया । फिर भी महिला फिल्म निर्देशक स्थायी रूप से अपनी उपस्थिति नहीं बनाए रख सकीं। कई अभिनेत्रियां ऐसी आई जिन्होंने अभिनय के साथ-साथ निर्देशन में भी हाथ आजमाया। इनमें थीं- शोभना समर्थ, साधना, तबस्सुम, हेमामालिनी, नीलिमा अजीम, सोनी राजदान, नंदिता दास और पूजा भट्ट। इन सभी अभिनेत्रियों ने निर्देशन के लिए या तो अभिनय क्षेत्र को त्याग दिया या फिर दोनों ही काम को बराबर करती रहीं। भारतीय सिनेमा में सिर्फ 9.1 फीसदी महिला निर्देशक हैं। यह अंतर्राष्ट्रीय मानक से थोड़ा ही ज्यादा है। अंतरराष्ट्रीय फिल्म उद्योग में फिल्में लिखने वाली महिलाएं ज्यादा हैं। भारत में यह हिस्सेदारी सिर्फ 12.1 फीसदी है। कैमरे के पीछे प्रति 6.2 पुरुषों की तुलना में एक महिला काम कर रही है।
सन् 2017 के मध्य में आई अलंकृता श्रीवास्तव की फिल्म ‘‘लिपस्टिक अंडर माय बुर्का’’ ने इस बात को साबित कर दिया है कि आज की महिला फिल्म निर्देशक घाटे के जोखिम से निपटना बखूबी जानती है। स्त्री यौनिकता का संवेदनशील विषय को सामने रख कर वह स्त्री की स्वतंत्रता के पक्ष में आवाज़ बुलंद करती है और साथ ही अपने आर्थिक घाटे की संभावना को भी चतुराई से बचा ले जाती है। आज की महिला फिल्म निर्देशक व्यावसायिक क्षेत्र बारीकी से नज़र रखे हुए हैं। यह जरूरी भी है। क्यों कि जब आपकी बात अधिक से अधिक लोगों के पास पहुंचेगी तभी तो उस पर विचार-विमर्श होगा अन्यथा स्टूडियो की चौखट पर ही फिल्म भी दम तोड़ देगी। ‘‘लिपस्टिक अंडर माय बुर्का’’ की पूरी टीम इस बात को भली-भांति जानती और समझती है।
‘‘लिपस्टिक अंडर माई बुर्का’’ में पुरूष पितृसत्ता की वजह से इसके पीछे क्या चीजें होती है वो दिखाने की कोशिश की गई है। जहां एक लड़की लोगों के सामने डांस नहीं कर सकती क्योंकि ’लोग क्या सोचेंगे’. जहां एक अधेड़ उम्र की महिला अपने यौनिक रूचि-अरूचि के बारे में बात नहीं कर सकती। जहां एक पुरूष कभी भी सेक्स के लिए अपनी अपनी पत्नी की अनुमति या उसकी पसंद नापसंद के बारे में नहीं सोचता है। ‘‘लिपस्टिक अंडर माई बुर्का’’ उन महिलाओं की आवाज है जो शायद ही कभी सुनी जाती है। दरअसल फिल्म में लिपस्टिक एक प्रतीक है स्त्री के अधिकारों का। लिपस्टिक चेहरे को सुंदर दिखाने के लिए लगाई जाती है लेकिन यदि चेहरा दिखाने की ही आजादी न हो तो? क्या स्त्री पुरुषों की भांति मनुष्य नहीं है जो उसके चेहरा दिखाने पर पाबंदी लगा दी जाती है। ऐसी पाबंदियां पहले घुटन, फिर क्रोध और फिर विद्रोह को जन्म देती हैं। यही इस फिल्म का मुख्य कथानक है।
‘’लिपस्टिक अंडर माई बुर्का’’ के संदर्भ में एक और बात जिसने एक अलग ही बहस का इतिहास रच दिया। सेंसर बोर्ड द्वारा फिलम पर बैन लगा और फिर हटा लेकिन इन सबके विरोध में फिल्म की टीम ने साशल मीडिया पर एक फोटो-आंदोलन चलाया। फिल्म की चारों लीड स्टार्स ने फिल्म के पोस्टर के ही पोज में मिडिल फिंगर को दिखाते हुए तस्वीरें सोशल मीडिया पर अपलोड की। उन्होंने अपने फैन्स से आग्रह किया कि वो भी इसी पोज में अपनी तस्वीरें खींच कर भेजें। इसकी शुरूआत कोंकणा सेन शर्मा, रत्ना पाठक शाह, अहाना कुमरा और प्लबिता बोरठाकुर ने शुरू की है। इन सभी ने इसी मुद्रा में फोटो खिंचाई है। इसे ’लिपस्टिक रिबेलियन’ का नाम दिया गया है। चारो अभिनेत्रियों ने कहा कि एक महिला होने के नाते हम पर हमेशा ये बातें थोपी जाती हैं कि हमें क्या करना चाहिए और क्या नहीं। इसलिए जिस प्रकार सभी ने मुद्रा बनाई है उसी तरह आप भी बनाये और फोटो साझा कर इस आंदोलन का हिस्सा बने। जोया अख्तर ने भी इसके सर्मथन में अपनी आवाज उठाई और अपनी तस्वीर सोशल मीडिया पर पोस्ट की। परिणाम रहा कि ’लिपस्टिक अंडर माई बुर्का’ ने अपने तीसरे दिन नही कुल 2.41 करोड़ की कमाई की।
‘‘लिपस्टिक अंडर माई बुर्का’’ में भोपाल की पृष्ठभूमि है। फिल्म वॉइस ओवर से शुरू होती है कि कैसे महिलाओं की जिंदगी में उदासी आ जाती है और फिर युवावस्था पीड़ा देने लगती हैं। इसके बाद शुरू होती है चार स्त्रियों की अलग-अलग कहानियां। चारों स्त्रियां सभी बंदिशों को तोड़कर यौनिक दमित समाज से बाहर निकलना चाहती है और वो जिंदगी अपने ढंग से जीना चाहती हैं जिसके बारे में उनका मानना है कि मनुष्य होने के नाते उनका अधिकार भी है।
एक स्त्री रेहाना ( पल्बिता बोरठाकुर ) है जो एक टीनएज है और जिसेघर में भी बुर्का में रहना पड़ता है। माइली सायरस (प्रसिद्ध युवा गायिका) बनना चाहती है। उसे लेड जेप का ‘‘स्टेयर वे टू हेवन’’ गाना पसंद है। वह कॉलेज में जीन्स पर बैन के ख़िलाफ आवाज़ उठाती है और दुकान से सामान भी चुराती है। दूसरी स्त्री शिरीन (कोंकणा सेन शर्मा) की है जो एक बुर्का पहनने वाली हाउसवाइफ है। जिसका रुढ़िवादी पति उसे उपभोग की वस्तु से अधिक कुछ नहीं समझता। वो अपनी खुशी के लिए घर-घर जाकर सेल्सगर्ल का काम करती है। तीसरी स्त्री लीला (आहना कुमारा) है जो एक पार्लर चलाती है। उसकी साच और अधिक खुलेपन की है। वह अपनी सुहागरात के लिए ज्यादा प्रतीक्षा नहीं करना चाहती है और इसे लेकर कई सपने सजाती रहती है। चौथी स्त्री बुआ जी उर्फ उषा परमार (रत्ना पाठक शाह) है। वह 55 साल की महिला है जिसका यौन अस्तित्व समाज में स्वीकार्य नहीं है। वो तैराकी के लिए जाती है और नाम बदल कर फोन पर यौनिक बातें करती है। असल में ये चारों महिलाएं एक मिट्टी के घर में रहती है जो बुआ जी का है और बाकी तीनों इसमें किराएदार हैं।
इस कहानी के कई पक्ष ऐसे भी है जिनसे सभी लोग सहमत नहीं हो सकते हैं। जैसे हर स्त्री इस तरह यौनिक दबाव में नहीं रहती है कि अपनी भावनाओं को शांत करने के लिए नाम बदल कर फोन पर यौनिक बातें करने लगे। या फिर स्त्री की सारी स्वतंत्रता उसकी यौनिकता से हो कर ही गुज़रती है। सन् 1996 में दीपा मेहता ने फिल्म ‘फायर’ बनाई। इस फिल्म के कथानक एवं दृष्यांकन को ले कर जमकर विवाद हुआ। भारतीय सिने परिवेष के लिए ‘फायर’ का विषय अत्यंत नया और चौंकाने वाला था। इस फिल्म में बॉलीवुड की दो दमदार अभिनेत्रियों शबाना आजमी और नंदिता दास के माध्यम से दो महिलाओं के बीच के दैहिक संबंधों की कहानी प्रदर्षित की गई है।
नया विषय और वह भी स्त्री-जीवन से जुड़ा हो तो सभी को चौंकाता है। लोग रूचि भी लेते हैं और नाक-भौंह भी सिकोड़ते हैं। ‘‘लिपस्टिक अंडर माई बुर्का’’ को भी इन सबसे गुज़रना पड़ा है। फिर भी जहां तक अभिनय की बात की जाए तो कोंकणा सेन शर्मा ने शिरीन के के पात्र को जिस तरह अभिनीत किया है, अद्भुत है। रत्ना पाठक शाह का अभिनय भी फिल्म में पर्याप्त प्रभावित करता है। आहना कुमारा का दमदार किरदार और पल्बिता बोरठाकुर का विद्रोही अंदाज भी प्रभाव डालता है। सुशांत सिंह, वैभव तत्ववादी भी अपना असर छोड़ते हैं। कुल मिला कर फिल्म बहुत कुछ सिखा जाती है-यौनिक दमन, यौनिक दमन के दुष्परिणाम और फिल्म का नया अर्थशास्त्र।
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#लिपस्टिक_अंडर_माय_बुर्का #अलंकृता_श्रीवास्तव #कोंकणा_सेन_शर्मा #रत्ना_पाठक_शाह #सुशांत_सिंह

Wednesday, July 12, 2017

चर्चा प्लस ... पीड़ित बेटियां और विषपान करते शिव ... डॉ. शरद सिंह

Dr Sharad Singh
बैलों के स्थान पर जुती हुई दो बेटियों की अखबारों में छपी तस्वीर ने सोचने पर विवश कर दिया है कि प्रत्येक समुदाय में धर्मध्वजा उठाए रखने वाली और संस्कृति को प्रवाहमान बनाए रखने वाली बेटियां कब तक असुरक्षित रहेंगी?
पढ़िए "पीड़ित #बेटियां और #विषपान करते #शिव" मेरा कॉलम #चर्चा_प्लस में "दैनिक सागर दिनकर" में ( 12.07. 2017) ..My Column #Charcha_Plus in "Sagar Dinkar" news paper...

चर्चा प्लस
 पीड़ित बेटियां और विषपान करते शिव
 - डॉ. शरद सिंह

आए दिन समाचारपत्र भरे रहते हैं बेटियों के प्रताड़ित होने के समाचारों से। कभी हत्या तो कभी बलात्कार तो कभी किसी अन्य तरह का शारीरिक उत्पीड़न। उस पर बैलों के स्थान पर जुती हुई दो बेटियों की अखबारों में छपी तस्वीर ने सोचने पर विवश कर दिया है कि प्रत्येक समुदाय में धर्मध्वजा उठाए रखने वाली और संस्कृति को प्रवाहमान बनाए रखने वाली बेटियां कब तक असुरक्षित रहेंगी? आज के सामाजिक एवं सुरक्षा संबंधी समुद्र मंथन में बेटियों का शोषण रूपी विष बढ़ता जा रहा है और मानो शिव का कण्ठ उसे धारण करने के लिए छोटा पड़ता जा रहा है। क्या हम शिव के तांडव की प्रतीक्षा कर रहे हैं?
Charcha Plus ..  Dr (Miss) Sharad Singh

सावन का महीना और सोलह सोमवार के व्रत का घनिष्ठ संबंध है। हिन्दू परिवारों की बेटियां बड़े उत्साह से सोलह सोमवार का व्रत रखती हैं और मनचाहे जीवन साथी तथा सुखद जीवन की कामना करती हैं। ये बेटियां भगवान शिव की पूजा-आराधना करती हैं। वही भगवान शिव जिन्होंने जगत् कल्याण के लिए विषपान किया था और नीलकण्ठ कहलाए थे। ‘शिवपुराण’ के अनुसार समुद्र मंथन के दौरान जब देवतागण एवं असुर पक्ष अमृत-प्राप्ति के लिए मंथन कर रहे थे, तभी समुद्र में से कालकूट नामक भयंकर विष निकला। उस विष की अग्नि से दसों दिशाएं जलने लगीं और देवताओं और दैत्यों सहित ऋषि, मुनि, मनुष्य, गंधर्व और यक्ष आदि उस विष की गर्मी से जलने लगे। देवताओं की प्रार्थना पर भगवान शिव ने भयंकर विष को अपने शंख में भरा और भगवान विष्णु का स्मरण कर उसे पी गए। भगवान विष्णु अपने भक्तों के संकट हर लेते हैं। उन्होंने उस विष को शिवजी के कंठ (गले) में ही रोक कर उसका प्रभाव समाप्त कर दिया। दुख तो इस बात का है कि आज के सामाजिक एवं सुरक्षा संबंधी समुद्र मंथन में बेटियों का शोषण रूपी विष फैलता जा रहा है और मानो शिव का कण्ठ उसे धारण करने के लिए छोटा पड़ता जा रहा है। क्या हम भगवान शिव के तांडव की प्रतीक्षा कर रहे हैं?
मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री के गृह ज़िले सीहोर में आर्थिक तंगी से जूझ रहे किसान द्वारा खेत जोतने के लिए बैल की जगह बेटियों से हल खिंचवाने की तस्वीरें सामने आने के बाद से सोशल मीडिया से ले कर विपक्षी दलों तक में जागरूकता की लहर दौड़ गई। प्रिंट मीडिया ने तो अपना दायित्व निभाया लेकिन ऐसा लगा जैसे विपक्षी दलों को कोई खज़ाना हाथ लग गया हो। यह घटना राज्य के सीहोर ज़िले के बसंतपुर पांगड़ी गांव का है। रविवार को समाचार एजेंसी एएनआई ने कुछ तस्वीरें जारी की जिसमें एक किसान बैल की जगह बेटियों से खेत की जुताई करवाता नज़र आ रहा था। सरदार बारेला नाम के इस किसान का कहना है कि उनके पास इतने पैसे नहीं हैं कि वह बैल खरीद सके और उनका पालन पोषण कर सके। इतना ही नहीं उस ग़रीब किसान का कहना है कि आर्थिक तंगी की वजह से उसकी 14 वर्षीय बेटी राधिका और 11 वर्ष की कुंती को कक्षा आठ के बाद अपनी पढ़ाई भी छोड़नी पड़ी।
प्रश्न यह उठता है कि यदि उन दो बेटियों और उनके लाचार पिता की तस्वीर अखबारों में नहीं छपती तो क्या पंच, सरपंच आदि स्थानीय प्रशासन उस लाचार किसान के आत्महत्या करने की प्रतीक्षा करता रहता? ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ का नारा उछालना तो आसान है, चंद स्कूली बच्चों की रैलियां निकाल कर ऐसी योजनाओं को समर्थन देना तो और भी आसान है, लेकिन कठिन है तो बेटियों की वास्तविक दशा को सुधारना। लाचार पिता को यह नसीहत दे कर कि वह अपनी बेटियों से इस तरह का काम न कराए, दायित्वों की इतिश्री नहीं मानी जा सकती है और यदि बेटियों की जगह बेटे हल में जुते होते तो क्या इस मामले को अनदेखा किया जा सकता था? सवाल यहां दायित्वों के निर्वहन और खोखली व्यवस्थाओं का है। ‘मामा शिवराज के राज में भांजियां पीड़ित’ कह कर मुख्यमंत्री को दोषी ठहराना तो आसान है किन्तु यदि दो पल के लिए राजनीतिक चश्मा उतार कर मानवता की दृष्टि से देखें तो स्थानीय व्यवस्था के जिम्मेदारों ने अपना कर्त्तव्य किस तरह निभाया अथवा समाज ने उन दोनों बेटियों के पक्ष में कितनी आवाज़ उठाई इस पर भी ध्यान दिया जाना जरूरी है। जब राधिका और कुंती को पढ़ाई छोड़नी पड़ी तो क्या किसी स्कूलशिक्षा, विकासखण्ड कार्यालय अथवा पंचायत की ओर से कोई रिपोर्ट बना कर राज्य शासन के सामने रखी गई? क्या किसी ने उसी समय यह जानने का प्रयास किया कि दो बेटियां अपनी शिक्षा अधूरी क्यों छोड़ रही हैं? क्या सर्वेयर ने उन दोनों बेटियों की माली हालत को जानने या उन्हें सहायता पहुंचाने का प्रयास किया? इस तरह के अनेक प्रश्न हैं जिनकी ओर ध्यान देना ही हमने लगभग छोड़ दिया है। प्रत्येक प्रशासन विभिन्न विभागों से मिल कर ही बनता है लेकिन विभागों और घोटालों के गठबंधन के चलते दायित्वों का सही निर्वहन हो कहां सकता है?
बेटियों के प्रति यह अनदेखी का रवैया सिर्फ़ मध्यप्रदेश में नहीं बल्कि लगभग हर प्रदेश में है। एसिड अटैक की शिकार हो चुकी युवती पर बार-बार एसिड फेंकने की घटना हैरान कर देने वाली है। पीड़िता के लखनऊ स्थित हॉस्टल में घुसकर किसी अनजान शख्स ने यह जघन्य अपराध किया। स्मरण रहे कि यह वहीं युवती है, जिस पर मार्च 2017 में ट्रेन में एसिड अटैक हुआ था। पीड़िता पर मार्च माह में ट्रेन में उस वक्त एसिड अटैक किया गया था, जब वह गंगा गोमती एक्सप्रेस से रायबरेली से लखनऊ के चारबाग रेलवे स्टेशन पहुंची थी। तेजाब से झुलसी युवती को जीआरपी ने अस्पताल में भर्ती कराया। पीड़िता ने बताया था कि ट्रेन में दो युवकों ने उसे जबरदस्ती तेजाब पिलाया और ट्रेन से कूदकर भाग गए। घटना की जानकारी मिलते ही यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ पीड़िता से मिलने अस्पताल पहुंचे थे। उन्होंने पीड़िता को उचित कार्रवाई का आश्वासन दिया था। साथ ही पीड़िता के मुफ्त इलाज और 1 लाख रुपये के मुआवजे का एलान भी किया था।
घटना के बाद हॉस्टल की वार्डन नीरा सिंह ने महिला सुरक्षा के मुद्दे पर चिंता जताई और कहा कि ‘‘यदि हॉस्टल के भीतर  लड़कियां सुरक्षित नहीं हैं तो फिर महिलाओं के लिए सुरक्षित जगह कौन सी होगी?’’ वहीं सीएम योगी ने एक टीवी चैनल से खास बातचीत में कहा कि ‘‘रेप पीड़िता को सुरक्षित जगह रखा गया था। ये देखना होगा कि एसिड अटैक हुआ है या नहीं।’’
यदि एक पल के लिए यह मान लिया जाए कि उस युवती ने स्वयं को घायल किया तो इस पर भी यह जानना जरूरी हो जाता है कि ऐसी कौन सी विवशता पैदा हो गई जिसके कारण उसे ऐसा स्वयं को पीड़ा देनेवाला कृत्य करना पड़ा। क्या उसने पहली बार भी छद्म गढ़ा था? क्या कोई युवती स्वयं को तेजाब से जलाने का साहस कर सकती है? देखा जाए तो हर घटना पर अनुत्तरित प्रश्नों का अंबार लग जाता है।
देश की राजधानी दिल्ली में घटित निर्भया-कांड इतना भी पुराना नहीं हुआ है कि उसके घटनाक्रम को हम भूल जाएं। निर्भया अपने ब्वायफ्रेंड के साथ बस में चढ़ी थी, यानी एक जवान लड़का उसके साथ था जो उसकी सुरक्षा कर सकता था किन्तु दरिंदे भेड़ियों के सामने वह भी टिक नहीं सका। इसका अर्थ यह नहीं है कि वह लड़का कमजोर था या उसमें निर्भया को बचा पाने की चाह नहीं थी। वह तो अपनी जान पर खेल गया लेकिन भेड़ियों के समूह से हार गया। विचार करने की बात तो यह है कि ये भेड़ियों का समूह पनपा ही क्यों? क्या लचर कानून व्यवस्था इसकी जिम्मेदार है? क्या औरातों के प्रति सम्मान की भावना का ग्राफ निरन्तर गिरता जा रहा है? या फिर हम अपने भारतीय संस्कार जिसमें मनुष्य को मनुष्य का सम्मान करना सिखाया जाता है, भूलते जा रहे हैं।
अधिक नहीं मात्र दो दषक पहले, कॉलेज की एक घटना। पान की दूकान पर खड़े कुछ आवारा किस्म के लड़के एक छात्रा को देख कर फिकरे कसने लगे। इस पर पहले तो दूकानदार ने उन्हें ऐसा करने से मना किया। वे नहीं माने तो उसी पान की दूकान पर खड़े दो-तीन अन्य आदमियों ने उन लड़कों की धुनाई कर दी और फिर उसे पुलिस के हवाले कर दिया। उस दिन के बाद से उस पान की दूकान के सामने से बेखौफ लड़कियां गुजरती रहीं, मजाल है कि कोई उन्हें परेशान कर सके। ऐसा लगता है गोया नागरिकों की यह जिम्मेदारी कहीं खो-सी गई है। अब तो ट्रेन की बोगी में सहयात्री लड़की को कोई छेड़ता है, उससे झगड़ता है और फिर उसे चलती ट्रेन से बाहर फेंक देता है, तब भी निन्यान्बे प्रतिशत पुरुष यात्री खामोष रहते हैं। उस पल शायद उन्हें अपने परिवार की बेटियों, स्त्रियों की याद नहीं आती है या फिर सब के सब किसी अज्ञात भय से जकड़ जाते हैं और खामोश रहते हैं।
बेटियां चाहे किसी भी जाति, किसी भी धर्म की हों, बेटिया तो आखिर बेटियां ही होती हैं और उनकी सुरक्षा तथा उनके सुखद-सुरक्षित जीवन का दायित्व भी शासन, प्रशासन, परिवार एवं समाज सभी पर संयुक्त रूप से होता है। किसी एक को जिम्मेदार ठहरा कर शेष अपनी अयोग्यता को ढांक नहीं सकते हैं। अपनी अकर्मण्याताओं से उपजे विष को कब तक भगवान भरोसे छोड़ते रहेंगे? दरअसल, बेटियों की ज़िन्दगी को राजनीतिक मोहरा बनाने की नहीं बल्कि उन्हें हर पायदान पर मदद देने की जरूरत है।
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Wednesday, July 5, 2017

चर्चा प्लस ... महिलाएं, मासिकधर्म और जीएसटी ... डॉ. शरद सिंह


Dr (Miss) Sharad Singh
"जीएसटी के तहत सैनिटरी नैपकिन्स पर 12 प्रतिशत कर लगाया गया है। अतः महिलाजगत में विरोध के स्वर उभरने स्वाभाविक था। वस्तुतः जीएसटी लागू होने के बाद सेनेटरी नैपकीन्स पर देशव्यापी विस्तृत चर्चा और भी जरूरी है। आखिर यह महिलाओं के स्वास्थ्य से जुड़ी बुनियादी ज़रूरत है।"   ...   #महिलाएं, #मासिकधर्म और #जीएसटी की #चुनौतियां  ...  मेरा कॉलम #चर्चा_प्लस में "दैनिक सागर दिनकर" में ( 05.07. 2017) ..My Column #Charcha_Plus in "Sagar Dinkar" news paper...

चर्चा प्लस
  महिलाएं, मासिकधर्म और जीएसटी
   - डॉ. शरद सिंह
                                                                जीएसटी में सेनेटरी नैपकीन्स पर 12 प्रतिशत टैक्स लगाए जाने पर महिलाजगत में विरोध के स्वर उभरे। विशेष बात तो यह है कि इस विरोध को सशक्त स्वर दिया बॉलीवुड की अभिनेत्रियों ने। सोशल मीडिया पर यह विरोध जबर्दस्त ‘ट्रेंड’ करता रहा।  तेंदू पत्ता बीनने वाली एवं बीड़ी बनाने वाली महिलाओं के जीवन पर ‘‘पत्तों में क़ैद औरतें’’ किताब लिखने के दौरान मैंने स्वयं यह पाया था कि अधिकांश ग्रामीण महिलाएं सेनेटरी नैपकीन्स से या तो अनभिज्ञ हैं या फिर वह उनकी आर्थिक पहुंच से बाहर है। वस्तुतः जीएसटी लागू होने के बाद बिना किसी झिझक के सेनेटरी नैपकीन्स पर देशव्यापी विस्तृत चर्चा और भी जरूरी है।
Charcha Plus ..  Dr (Miss) Sharad Singh

हाल ही में आफ्रिकी देश केन्या में एक बड़ा कदम उठाया गया। वहां की सरकार ने अपना बजट  जारी करते हुए घोषित किया कि सभी स्कूली छात्राओं को सरकार की ओर से मुफ्त सेनेटरी नैपकीन्स दिए जाएंगे। जब कि वहीं हमारे देश में सेनेटरी नैपकीन्स पर जीएसटी बवाल मचा रहा। बॉलिवुड अभिनेत्रियों ने देश के वित्त मंत्री अरुण जेटली को टैग कर उनसे सैनिटरी नैपकीन को टैक्स के दायरे से बाहर रखने की अपील की। अभिनेत्री अदिति राव हैदरी ने ट्वीट किया, ‘’अरुण जेटली जी, सैनिटरी नैपकीन हमारी जरूरत है, लग्जरी नहीं। कृपया इन्हें जीएसटी से बाहर कर दीजिए, ताकि और ज्यादा महिलाएं इनका इस्तेमाल कर सकें।’’
अभिनेत्री स्वरा भास्कर ने भी इस तरह के टैक्स का विरोध किया है। इस बारे में स्वरा ने कहा, ’मैं अदिति राव हैदरी से पूरी तरह सहमत हूं। सरकार को सैनिटरी नैपकीन पर किसी तरह का टैक्स नहीं लगाना चाहिए, क्योंकि यह हमारी जरूरत है, किसी तरह की विलासिता नहीं।’
वहीं बैडमिंटन खिलाड़ी ज्वाला गुट्टा ने इस मामले में हैरानी जताते हुए ट्वीट किया, ’’मिस्टर अरुण जेटली यह बेहद आश्चर्यजनक है। मुझे कभी भी नहीं पता था कि सैनिटरी नैपकीन का इस्तेमाल करना लग्जरी है। मैं हैरान हूं। इसलिए मैं आपसे रिक्वेस्ट करती हूं कि सैनिटरी नैपकीन पर टैक्स न लगाया जाए, ताकि यह हमारे देश की महिलाओं के लिए उपलब्ध हो सके। लहू का लगान को ‘नो’ कहिए।’’
बॉलिवुड एक्ट्रेस लीजा रे ने फाइनैंस मिनिस्टर से सैनिटरी नैपकीन पर टैक्स नहीं लगाने की अपील की। उन्होंने लिखा, ’‘अरुण जेटली क्या आप जानते हैं कि हमारे देश में 88 फीसदी महिलाएं अब भी सैनिटरी नैपकीन की बजाय कपड़े के टुकड़े, राख, लकड़ी की छीलन और फूस इस्तेमाल करती हैं। फिर इन पर भी टैक्स लगा दीजिए?’’
कवन दवे ने ट्वीट किया, ’सैनिटरी नैपकीन पर तो हम पहले ही स्वच्छ भारत सेस के तौर पर टैक्स दे रहे हैं? तो आप लहू के लगान पर डबल चार्ज लेंगे।’ वहीं लेखिका अद्वैता काला ने ट्विटर पर लिखा, ’मासिक धर्म शुरू होने पर 23 फीसदी लड़कियां स्कूल छोड़ देती हैं। आपको सैनिटरी नैपकीन को इतना सस्ता करना चाहिए कि सभी उसका इस्तेमाल कर सकें।’
सैनिटरी नैपकीन पर लगने वाले टैक्स के विरोध में 28 जून, बुधवार सुबह से ही ट्विटर पर ‘‘लहू का लगान’’ ट्रेंड करता रहा। बॉलीवुड अभिनेत्रियों के अलावा कई दूसरे क्षेत्र की महिलाओं ने भी वित्त मंत्री अरुण जेटली से इस टैक्स को खत्म करने की मांग की। बॉलिवुड हीरोइनों समेत तमाम महिलाओं ने सरकार से अपील किया कि हमारे देश में आज भी बहुत कम महिलाएं कीमत ज्यादा होने की वजह से सैनिटरी नैपकीन इस्तेमाल नहीं कर पाती। ऐसे में इसे जीएसटी टैक्स के दायरे में लाकर आम लोगों की पहुंच से बाहर न किया जाए।
इसके बाद एक जून 2017 को महाराष्ट्र की महिला एवं बाल विकास मंत्री पंकजा मुंडे ने राज्य की स्कूली छात्राओं को 5 रुपये में सैनिटरी नैपकिन उपलब्ध कराने की घोषणा की। उन्होंने कहा कि राज्य में अस्मिता योजना के तहत यह सैनिटरी नैपकिन छात्राओं को उपलब्ध कराई जाएगी। नैपकिन देने के लिए सरकार जिला परिषद के स्कूलों में पढ़ने वाली छात्राओं को ‘अस्मिता कार्ड’ देगी। इससे पहले मई माह में ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं को और जिला परिषद स्कूलों में पढ़ने वाली छात्राओं को सैनिटरी नैपकिन मुहैया कराने के लिए फडणवीस सरकार विशेष योजना शुरू करने की बात कही थी। राज्य सरकार ने कहा था कि  अस्मिता योजना के तहत महिलाओं को माहवारी के दिनों में रियायती कीमतों पर सैनिटरी नैपकिन उपलब्ध कराएगी। इसके लिए सरकार ने चालू वर्ष के बजट में करीब 25 करोड़ रुपये का प्रावधान की घोषणा की थी। कोयम्बटूर के श्री अरुणाचलम मुरुगनाथन ने कम लागत में सेनेटरी पैड्स बनाने की सस्ती मशीन का निर्माण किया। एक इंटरव्यू में अरुणाचलम ने कहा कि मासिक धर्म स्वच्छ्ता के लिए सैनिटरी पैड बनाने के लिए  बड़ी-बड़ी मशीनें न होकर छोटी-छोटी मशीनें होनी चाहिए ताकि उन्हें गाँव या ब्लॉक स्तर पर कुटीर उद्योग की तरह महिलाओं द्वारा चलाया जाय. इससे न केवल काम दाम में पैड उपलब्ध हो सकेंगे वरन महिलाओं के लिए रोज़गार का साधन भी उपलब्ध हो जाएगा। उत्तर प्रदेश सरकार की 2017 तक 10000 मेन्स्ट्रुअल हाइजीन लाने की योजना को सफल बनाने में सहायक हो सकती थी। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने उन्हें ये मशीनें यू पी  ब्लॉक स्तर पर लगाने के लिए आमंत्रित भी किया जो एक अच्छी पहल थी।
सन् 2009 में तेंदू पत्ता बीनने वानी एवं बीड़ी बनाने वाली महिलाओं के जीवन पर मैंने एक किताब लिखी, जिसका नाम है ‘‘पत्तों में क़ैद औरतें’’। यह किताब सामयिक प्रकाशन, दरियागंज, नई दिल्ली से सन् 2010 में प्रकाशित हुई। इस किताब को लिखते समय मुझे अनेक महिलाओं से मिल कर उनकी निजी समस्याओं को जानने का अवसर मिला। इस दौरान एक बहुत गंभीर समस्या की ओर मेरा ध्यान गया कि अधिकांश ग्रामीण महिलाएं अपने स्वास्थ्य के प्रति परम्परागत तरीकों का प्रयोग करती हैं जो स्वास्थ्य एवं स्वच्छता की दृष्टि से उचित नहीं है। लेकिन इसके साथ ही मुझे अहसास हुआ कि वे आर्थिक रूप् से इतनी सक्षम नहीं हैं कि वे आधुनिक सुविधाओं को अपना सकें। जैसे मासिकधर्म के दौरान वे सेनेटरी नैपकीन्स काम में नहीं ला सकती थीं क्यों कि एक तो वे उससे अनजान थीं और यदि उसके बारे में जान भी लेतीं तो उसे खरीदने की क्षमता उनमें नहीं थी। मैंने अपनी किताब के पहले अध्याय में ही एक केस स्टडी के अंतर्गत इस मुद्दे का उल्लेख किया - ‘‘माला ने एक स्त्री के जीवन की आरम्भिक अवस्था का परिचय जाना, तेंदू पत्ते की तुड़ाई के दौरान। उसने घने जंगल के बीच युवावस्था में पांव रखा। वह एक बात फिर भी नहीं जान सकी कि उसकी बुआ ने जिस सहजता से उसे कपड़े का टुकड़ा फाड़ कर पहना दिया था वह धूल-मिट्टी के लगातार सम्पर्क में रहा था। यदि उसमें किसी प्रकार के कीटाणुओं की उपस्थिति भी रही हो तो कोई आश्चर्य की बात नहीं है। जिस अवस्था में स्वच्छता सबसे अधिक आवश्यक हो जाती है उस अवस्था में माला को एक गंदा-सा कपड़ा धारण करना पड़ा। उस गंदे कपड़े के कारण उसे किसी प्रकार की छूत (इन्फेक्शन) भी लग सकती थी या कोई अन्य परेशानी हो सकती थी। किन्तु इस बात की चेतना जब माला की मां और बुआ को नहीं थी तो भला, माला को कहां से होती?
माला जैसी न जाने कितनी बालिकाएं मई-जून की भीषण गर्मी में घने जंगल में तेंदू पत्ते तोड़ती हुई युवती बन जाती हैं जबकि न तो उन्हें चिकित्सक से परामर्श लेने का ज्ञान होता है और न स्वच्छता का भान होता है। तेंदू पत्ते तोड़ने वाली लड़किएं और औरतें चिलचिलाती धूप में भी वे अपनी स्त्रीगत समस्याओं से जूझती रहती हैं, फिर भी जंगलों में भटकती रहती हैं, मात्र इसलिए कि बीस-पच्चीस दिनों में चार पैसे कमा कर अपने परिवार को आर्थिक सहायता दे सकें या फिर अपने परिवार में अपना महत्व स्थापित कर सकें। वे यह जता सकें कि वे स्त्री हैं तो क्या हुआ, वे पढ़ी-लिखी नहीं हैं तो क्या हुआ, वे घर-गृहस्थी सम्हालती हैं तो क्या हुआ, वे बच्चे पैदा करती और उन्हें पालती हैं तो क्या हुआ - वे भी चार पैसे कमा सकती हैं।’’
हमारे देश में ग्रामीण एवं आर्थिक रूप से कमजोर घरों की स्कूली छात्राओं की समस्या भी ठीक यही है। उनमें से अनेक ऐसी हैं जो मासिकधर्म के दौरान परम्परागत किन्तु अस्वास्थ्यकर तरीकों का इस्तेमाल करती हैं। अंतर्राष्ट्रीय संस्था यूनीसेफ ने तो मासिकधर्म के दौरान स्वच्छता किस प्रकार रखी जाए एवं सेनेटरी नैपकीन्स का उपयोग कैसे किया जाए, इस विषय पर बाकायदा गाईडलाईन बुकलेट प्रकाशित की हुई है। लेकिन किसी बुकलेट में छपी उपयोगी सामग्री का लाभ भी तभी मिल सकता है जब महिलाओं को उनकी समस्याओं के अनुरूप उन्हीं की बोली-भाषा में जानकारी दे कर प्रेरित किया जाए। जहां तक घोषणाओं का प्रश्न है तो हमारे देश के विभिन्न राज्यों में हर जगह और मुख्यरूप से हर स्कूल में सेनेटरी पैड्स के लिए एटीएम की तरह वेन्डर लगाए जाने घोषणा भी की गई थी। अप्रैल 2015 में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा था कि सरकारी स्कूलों में लड़कियों को सैनिटरी नैपकिन्स बांटे जाएंगे। उन्होंने यह भी कहा था कि इस योजना के लिए हर साल 30-40 करोड़ रुपये का खर्च आएगा। यद्यपि कई स्वयंसेवी संस्थाएं भी अच्छी क्वालिटी के पैड्स बनाने के लिए आगे आ रही हैं। निसंदेह कुछ राज्य सरकारों एवं स्वयंसेवी संस्थाओं ने ‘मेस्ट्रुअल हाईजीन’ को ले कर कमरकसा हुआ है लेकिन कई राज्यों में ये घोषणाएं एक दिखावा बन कर रह गई हैं। उस पर जीएसटी के तहत सैनिटरी नैपकिन्स पर 12 प्रतिशत कर लगाया गया है। अतः महिलाजगत में विरोध के स्वर उभरने स्वाभाविक था। वस्तुतः जीएसटी लागू होने के बाद सेनेटरी नैपकीन्स पर देशव्यापी विस्तृत चर्चा और भी जरूरी है। आखिर यह महिलाओं के स्वास्थ्य से जुड़ी बुनियादी ज़रूरत है।  
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Thursday, June 29, 2017

चर्चा प्लस ... स्मार्ट सिटी की चुनौतियां ... डॉ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
" दरअसल, #स्मार्ट_सिटी_प्रोजेक्ट एक महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट है और इसमें नेता, अधिकारी, समाजसेवी, पत्रकार और आमजनता सभी के लिए अपनी जिम्मेदारी को समझना होगा।" ... #स्मार्टसिटी की चुनौतियां ... मेरा कॉलम #चर्चा_प्लस में "दैनिक सागर दिनकर" में ( 28.06. 2017) ..My Column #Charcha_Plus in "Sagar Dinkar" news paper....
 
चर्चा प्लस
स्मार्ट सिटी की चुनौतियां
- डॉ. शरद सिंह


जितने भी शहर स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट की दौड़ में उत्तीर्ण हो गए उनके लिए खुशियां मनाने का समय नहीं बल्कि उन चुनौतियों पर चिन्तन करने का है जो उनके सामने खड़ी हैं। क्या ये चुनौतियां निर्धारित समय सीमा में पूरी हो सकती है? क्या इन शहरों में माद्दा है कि वास्तविक स्मार्ट सिटी बन कर दिखाएं? कहीं स्मार्टनेस का महल उस सीसी रोड की तरह हो कर न रह जाए जो पहली बरसात में ही बह जाती है। दरअसल, स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट एक महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट है और इसमें नेता, अधिकारी, समाजसेवी, पत्रकार और आमजनता सभी के लिए अपनी जिम्मेदारी को समझना होगा। 

जब स्मार्ट सिटी की चर्चा आती है तो पहला प्रश्न मन में कौंधता है कि यह ’स्मार्ट सिटी’ है क्या? स्मार्ट सिटी की संकल्पना, हर शहर और हर देश के लिए भिन्न होती है जो विकास के स्तर, परिवर्तन और सुधार की इच्छा, शहर के निवासियों के संसाधनों और उनकी आकांक्षाओं पर निर्भर करता है। ऐसे में, स्मार्ट सिटी का भारत में यूरोप से अलग अर्थ होगा। इतना ही नहीं, खुद भारत में प्रत्येक शहर की दशा के अनुसार स्मार्ट सिटी के मायने अलग होंगे। भारत में किसी भी शहर निवासी की कल्पना में, स्मार्ट शहर तस्वीर में ऐसे परिदृश्य और सेवाओं की सूची होती है जो उसकी आकांक्षा के अनुरूप हो। नागरिकों की आकांक्षाओं और जरूरतों को पूरा करने के लिए, शहरी योजनाकार को बुनियादीतौर पर पूरे शहरी पारिस्थितिकी तंत्र का इस प्रकार विकास करना होता है, जो व्यापक विकास के चार स्तंभों-संस्थागत, भौतिक, सामाजिक और आर्थिक अवसंरचना में दिखाई देता है। किसी भी शहर की स्मार्टनेस उसकी बुनियादी जरूरतों की पूर्ति पर निर्भर होती है। यदि शहर में सड़कें उखड़ी हुई हैं, ड्रेनेज की व्यवस्था चौपट है और हर साल बारिश में नागरिकों को सड़क पर बहती नालियों का समाना करना पड़ता है, यदि कचरा उठाने और कचरा प्रबंधन का काम लचर है या फिर शासकीय स्तर पर चिकित्सकीय सुविधाएं गड़बड़ी से भरी पड़ी हैं तो मान कर चलना होगा कि आसान नहीं है डगर स्मार्टसिटी की।
Charcha Plus Column of Dr Sharad Singh in "Sagar Dinkar" Daily News Paper

उदाहरण के लिए सागर को ही लीजिए। भौगोलिक दृष्टि से एक अत्यंत सुंदर शहर है। यहां का विश्वविद्यालय डॉ. हरीसिंह गौर केन्द्रीय विश्वविद्यालय के छात्र दुनिया के कोने-कोने में जा कर नाम कमा रहे हैं। शहर की अपनी एक झील है। एक पुराना शहर है जो चारो ओर से नई कॉलोनियों के रूप् में विस्तार पाता जा रहा है। इस शहर की अपनी एक बोली है, अपनी है संस्कृति है और अपनी एक पहचान है। इस तरह की खूबियां लगभग हर उस शहर की है जो स्मार्टसिटी की दौड़ में विजयी मुद्रा में खड़े हैं। इसलिए इन सभी चुनौतियां भी लगभग एक समान हैं। इसीलिए यहां मैं सागर शहर के संदर्भ में बात करूंगी।
निसंदेह सागर शहर के मध्य में एक पुराना शहर है। इस पुराने शहर के बसाने वालों ने शहर के लिए उत्तम कोटि की पेयजल व्यवस्था एवं जल निकासी व्यवस्था की थी। लेकिन धीरे-धीरे वे सारी व्यवस्थाएं सिकुड़ गईं। आज ड्रेनेज़ और सफाई की व्यवस्था चरमरा चुकी है। जब पुराना शहर बसाया गया था तब उसकी सड़कें चौड़ी हुआ करती थीं (जैसेकि साक्ष्य मिले हैं) लेकिन अब सड़कें अतिक्रमण की चपेट में हैं। नगरनिगम की सीमा में आने वाले शहर के अधिकांश हिस्से अतिक्रमण के शिकार हैं। सिकुड़ी हुई सड़कों के गड्ढे अपनी अलग ही कहानी कहते हैं। उस पर डेयरी विस्थापन का मुद्दा तो कई पंचवर्षीय योजनाएं पार कर चुका है और जस का तस है। शहर को एक अदद मेडिकल कॉलेज का गौरव प्राप्त हुआ लेकिन वहां भी अव्यवस्थाओं और मुन्ना भाइयों के कारण मरीज त्राहि-त्राहि करते दिखाई पड़ते हैं। शहर का पर्यावरण इस कदर दूषित हो चुका है कि उसे संवारने के लिए कड़ी मशक्कत करनी पड़ेगी।
ऐसा पहली बार हुआ है, शहरी विकास मंत्रालय कार्यक्रम में निधियन के लिए शहरों के चयन करने के लिए ‘चुनौती’ अथवा प्रतिस्पर्धा विधि का उपयोग किया गया। राज्य और शहरी स्थानीय निकाय स्मार्ट शहरों के विकास में महत्वपूर्ण सहायक भूमिका निभाएंगे। इस स्तर पर स्मार्ट नेतृत्व एवं दूरदृष्टि और निर्णायक कार्रवाई करने की क्षमता महत्वंपूर्ण कारक होंगे जो मिशन की सफलता निर्धारित करेंगे। स्मार्टसिटी के रास्ते में अनेकानेक चुनौतियां हैं जिनमें कुछ बुनियादी चुनौतियां हैं- आईटी, वाई-फाई, बिजली, जलजमाव, ठोस कचरा प्रबंधन, सीवरेज की सफाई, जलापूर्ति और यातायात आदि।
शहर के सरकारी अस्पतालों में चिकित्सकों और संरचना दोनों में लगभग 50 प्रतिशत की कमी है। निजी अस्पताल और नर्सिंगहोम तो हैं, पर गरीब उसकी सुविधाएं प्राप्त नहीं कर सकते हैं। जबकि शहरी नियमानुसार 30 मिनट की इमरजेंसी सेवा के साथ सभी घरों तक पहुंच। लगभग 1500 की आबादी पर कम से कम एक डिस्पेंसरी और 1 लाख की आबादी पर 25 से 30 बेडों का नर्सिंग होम होना चाहिए। प्रति एक लाख की आबादी पर क्रमशः 80, 200 और 500 बेड का कैटेगरी ए, कैटेगरी बी और सामान्य हॉस्पिटल होना चाहिए।
आईटीके मामले में दूसरे शहरों की अपेक्षा हम पीछे हैं। नेट कनेक्टिविटी के चुस्त-दुरूस्त संजाल की जरूरत है। पूरे शहर में 100 एमबीपीएस की स्पीड के साथ वाई-फाई की सुविधा मिलनी चाहिए, ताकि लोग कभी भी नेट इस्तेमाल कर सकें। यूं भी दैनिक जीवन में हर काम के लिए इंटरनेट पर निर्भरता बढ़ती जा रही है। अतः इंटरनेट व्यवस्था सुचारू होना जरूरी है।
आवश्यकता के अनुरूप बिजली की उपलब्धता भी जरूरी है। इस दिशा पर भी ध्यान देना होगा। सभी घरों में बिजली का कनेक्शन और 24 घंटे बिजली आपूर्ति को सुनिश्चित करने और बिजली की बर्बादी से बचने के लिए टैरिफ स्लैब्स का निर्धारण करना होगा।
बरसाती पानी की निकासी के लिए सभी सड़कों तक का बेहतरीन नेटवर्क तैयार करना होगा। शत-प्रतिशत रेन वाटर हार्वेस्टिंग पर जोर देना होगा। जरा-सी बारिश हुई और निचली बस्तियों तथा कॉलोनियों में पानी भरने लगता है। शहर के पुराने नालों का रख-रखाव जरूरी है।
सभी घरों तक डोर-टू-डोर कचरा उठाने की व्यवस्था करनी होगी। ठोस कचरे की शत-प्रतिशत रिसाइक्लिंग करने से ही समस्या का समाधान होगा। सभी घरों में शौचालय, स्कूलों में लड़कियों के लिए अलग से शौचालय की व्यवस्था। सीवरेज और गंदे पानी के प्रबंधन के लिए नेटवर्क का संपूर्ण विस्तार। पुरानी सीवरेज सिस्टम पूरी तहर से ध्वस्थ हो चुका है।
सभी घरों में कनेक्शन देकर 24 घंटे जलापूर्ति करनी होगी। प्रत्येक व्यक्ति पर लगभग 135 लीटर की आपूर्ति करनी होगी। जिससे लोगों को सहूलियत हो। वाटर ट्रीटमेंट पर ध्यान देना होगा।
400 मीटर की पैदल दूरी पर खुदरा दुकानें, पार्क, प्राथमिक विद्यालय जैसी 95 फीसदी दैनिक आवश्यकताओं की पहुंच घरों तक होनी चाहिए। कई इलाके ऐसे हैं, जहां बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं। मैपिंग के बिना स्थानिक नियोजन करना काफी मुश्किल है। शहर के एक से दूसरे छोर तक पहुंचने के लिए अधिकतम 30 से 45 मिनट लगने चाहिए। सड़क के दोनों किनारे फुटपाथ और आवासीय क्षेत्र में 10-15 मिनट की पैदल दूरी पर यातायात का प्रबंध होना चाहिए।
स्मार्टसिटी प्रोजेक्ट के अंतर्गत कुछ व्यवस्थाएं अनिवार्यरूप से तय की गई हैं जैसे - सभी प्रोजेक्ट का ऑनलाइन और टाइमबाउंड निपटारा, जन सेवाओं की ऑनलाइन डिलीवरी, नागरिकों के साथ प्रभावी संचार व्यवस्था, गरीबों को रियायती दर पर सुविधाएं उपलब्ध कराना, ओपन डाटा प्लेटफॉर्म जहां नागरिकों को सूचनाएं मुफ्त मिलें, सभी जनोपयोगी सेवाओं के लिए एक नियंत्रक संस्था का गठन, सभी प्रोजेक्ट्स के लिए सबसे पहले प्राइवेट सेक्टर को आमंत्रण आदि।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की स्मार्ट सिटी बनाने की महत्वाकांक्षी परियोजना में ताज़ा-ताज़ा शामिल हुए सागर शहर सहित तमाम प्रतियोगी शहरों को स्मार्ट बनाने के लिए नागरिकों के भी कुछ दायित्व हैं जैसे, शहर की स्वच्छता बनाए रखना, नागरिकों की सुरक्षा और संरक्षा, विशेष रूप से महिलाओं, बच्चों एवं बुजुर्गों की सुरक्षा, स्वास्थ्य और शिक्षा पेयजल को व्यर्थ बहने से रोकना, रेन वाटर हार्वेस्टिंग को अपनाना, सौदर्याकरण के लिए लगाए जाने वाले पेड़-पौधों की रक्षा करना क्यों कि ये न केवल सुन्दरता बढ़ाते हैं बल्कि पर्यावरण में संतुलन भी बनाए रखते हैं। इसके साथ ही पशुपालकों को डेयरी विस्थापन में सहयोगी बनना होगा। इन सबके अतिरिक्त सबसे बड़ा दायित्व जो नागरिकों को निभाना होगा, वह है ‘व्हिसिल ब्लोअर’’ बनने का। यदि किसी भी नागरिक को किसी भी स्तर पर कोई भी चूक होती दिखाई दे अथवा किसी गड़बड़ी का अंदेशा हो तो उसे तत्काल जागरूकता का परिचय देना होगा। उल्लेखनीय है कि सरकार ने ‘‘व्हिसिल ब्लोअर्स’’ के लिए यह प्रावधान रखा है कि यदि वे चाहें तो उनका नाम उजागर नहीं किया जाएगा ताकि उनकी सुरक्षा बनी रहे।
सच तो यह है कि हर नागरिक चाहता तो बहुत कुछ है लेकिन उसे पाने के लिए शासन अथवा राजनीतिक दलों का मुंह ताकता रहता है। बुनियादी जरूरतों को पूरा कराने में भी उसे हिचक होती है। इसलिए यह तय है कि यदि अपने शहर को सचमुच ‘स्मार्ट सिटी’ बनाना है तो नागरिक सहयोग एवं जागरूकता की अहम भूमिका को स्वीकार करना होगा। स्मार्ट सिटी बनाने के लिए सरकार तो आर्थिक सहायता उपलब्ध कराएगी ही किन्तु नगरनिगमों को भी अपनी आय बढ़ानी होगी जिसके अंतर्गत नागरिकों पर विभिन्न प्रकार के टैक्स बढ़ेंगे। राह कठिन है, इस अर्थ में भी कि किसी स्कैम पर चर्चा करना आसान होता है लेकिन समय रहते उस स्कैम को होने से ही रोकना साहस का काम होता है। लेकिन यदि आमजनता अधिक टैक्स चुकाते हुए अधिक सुविधाएं पाने की चाहत रखती है तो उसे ‘‘व्हिसिल ब्लोअर्स’’ बन कर अपने टैक्स के पैसों की निगरानी भी करनी होगी।
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#स्मार्टसिटी #चुनौतियां, #व्हिसिल_ब्लोअर #टैक्स

Wednesday, June 21, 2017

चर्चा प्लस ... योग संवारता है जीवन को ... डॉ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
International Yoga Day
 
विश्व योग दिवस (21 जून) पर विशेष :
"योग संवारता है जीवन को" ... मेरा कॉलम #चर्चा_प्लस में "दैनिक सागर दिनकर" में ( 21.06. 2017) ..My Column #Charcha_Plus in "Sagar Dinkar" news paper....

 

चर्चा प्लस
विश्व योग दिवस (21 जून) पर विशेष :
योग संवारता है जीवन को

- डॉ. शरद सिंह 

योग जीवन को संवारने की एक व्यवहारिक शैली है जो आज वैश्विक रूप् ले चुकी है। योग किसी धर्म, जाति अथवा संप्रदाय से जुड़ी क्रिया नहीं है, यह तो जीवन को शारीरिक, आध्यात्मिक और संवेदनात्मक रूप से शांत एवं समृद्ध करने की कला है और यह तथ्य इस बात से साबित भी हो चुका है कि दुनिया के अनेक देश और उनके नागरिक योग की महत्ता को स्वीकार चुके है। योग को किसी भी पूर्वाग्रह से मुक्त हो कर अपना कर अपने तनावपूर्ण जीवन को तनाव से मुक्त किया जा सकता है। दरअसल, आज के कठिन युग में योग एक लाभकारी जीवनशैली है।
Charcha Plus Column of Dr Sharad Singh in "Sagar Dinkar" Daily News Paper

इसमें कोई संदेह नहीं कि आज के उत्तरआधुनिक युग यानी इलेक्टॉनिक युग में विश्वपटल पर योग को स्थापित करने का श्रेय प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी को ही दिया जा सकता है और इस सच्चाई को स्वीकारने के लिए तमाम राजनीतिक चश्मों को परे रख कर भारतीय संस्कृति एवं मूल्यों के वैश्विक प्रसार को ध्यान में रखना होगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 14 सिंतबर 2014 को पहली बार पेश किया गया यह प्रस्ताव तीन महीने से भी कम समय में संयुक्त राष्ट्रसंघ की महासभा में पास हो गया। भारतीय राजदूत अशोक मुखर्जी ने ‘अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस’ का प्रस्ताव संयुक्त राष्ट्रसंघ की सभा में रखा था, जिसे दुनिया के 175 देशों ने भी सह-प्रस्तावित किया था। संयुक्त राष्ट्रसंघ की जनरल असेंबली में किसी भी प्रस्ताव को इतनी बड़ी संख्या में मिला समर्थन भी अपने आप में एक रिकॉर्ड बन गया। इससे पहले किसी भी प्रस्ताव को इतने बड़े पैमाने पर इतने देशों का समर्थन नहीं मिला था। यह भी पहली बार हुआ था कि किसी देश ने संयुक्त राष्ट्रसंघ असेंबली में कोई इस तरह का प्रस्ताव मात्र 90 दिनों में पास हो गया हो।
प्रश्न उठता है कि 21 जून का दिन नही योग दिवस के लिए क्यों चुना गया? तो इसका उत्तर भारतीय खगोलगणना में विद्यमान है। 21 जून को इस दिन ग्रीष्म संक्रांति होती है। इस दिन सूर्य पृथ्वी के परिप्रेक्ष्य में उत्तर से दक्षिण की ओर चलना शुरू करता है। योग के दृष्टि से यह समय संक्रमण काल माना जाता है, यानी रूपांतरण के लिए आदर्श समय। योगिक कथाओं के अनुसार योग का पहला प्रसार शिव द्वारा उनके सात शिष्यों के बीच किया गया। कहते हैं कि इन सप्त ऋषियों को ग्रीष्म संक्राति के बाद आने वाली पहली पूर्णिमा के दिन योग की दीक्षा दी गई थी, जिसे शिव के अवतरण के तौर पर भी मनाते हैं। इस प्रकृतिक घटना को दक्षिणायन के नाम से जाना जाता है।
योग एक प्राचीन कला है जिसकी उत्पत्ति भारत में लगभग 6000 साल पहले हुई थी। ऐसा माना जाता है कि जब से सभ्याता शुरू हुई है तभी से योग किया जा रहा है। योग के विज्ञान की उत्पात्ति हजारों साल पहले हुई थी, पहले धर्मों या आस्थाय के जन्मत लेने से काफी पहले हुई थी। योग विद्या में शिव को पहले योगी या आदि योगी तथा पहले गुरू या आदि गुरू के रूप में माना जाता है। वैदिक कथाओं के अनुसार कई हजार वर्ष पहले, हिमालय में कांति सरोवर झील के तटों पर आदि योगी ने अपने प्रबुद्ध ज्ञान को अपने प्रसिद्ध सप्तऋषि को प्रदान किया था। सप्तऋषियों ने योग के इस विशिष्ट ज्ञान को विश्व में प्रसारित किया। सिंधु घाटी सभ्यता के अनेक जीवाश्म, अवशेष एवं मुहरें भारत में योग की उपस्थिति को साबित करती हैं। देवी मां की मूर्तियों की मुहरें, लैंगिक प्रतीक तंत्र योग का सुझाव देते हैं। लोक परंपराओं, सिंधु घाटी सभ्येता, वैदिक एवं उपनिषद की विरासत, बौद्ध एवं जैन परंपराओं, दर्शनों, ‘महाभारत’ एवं ‘रामायण’ महाकाव्यों, शैवों, वैष्णवों की आस्तिक परंपराओं एवं तांत्रिक परंपराओं में योग का उल्लेख है। वैदिक काल के दौरान सूर्य को सबसे अधिक महत्व दिया गया। सूर्य को प्रणाम करने की विशेष पद्धति से ’सूर्य नमस्कार’ का योगिक आसन विकसित हुआ। यद्यपि पूर्व वैदिक काल में भी योग किया जाता था, महान संत महर्षि पतंजलि ने अपने योग सूत्रों के माध्यम से उस समय विद्यमान योग की प्रथाओं, उसकी क्रियाओं एवं उससे संबंधित ज्ञान को व्यवस्थित किया। पतंजलि के बाद भी अनेक योगाचार्यों ने मनुष्य के जीवन को व्यवस्थित करने के लिए योग की महत्ता को सर्वोत्तम ठहराया। कई दशकों पहले पश्चिमी दुनिया का योग से भली-भांति परिचय कराया था स्वामी विवेकानंद ने, जब उन्होंने 1893 में अमेरिका के शिकागो में विश्व धर्म संसद को संबोधित किया था। उसके बाद से पूर्व के कई गुरुओं व योगियों ने दुनियाभर में योग का प्रसार किया और दुनिया ने योग को बड़े पैमाने पर स्वीकार किया। योग पर कई अध्ययन और शोध हुए, जिन्होंने मानव कल्याण में योग के विस्तृत और दीर्घकालिक फायदों को साबित किया। किन्तु दुर्भाग्यवश अपने ही देश में योग उपेक्षित होता चला गया।
प्राचीनकाल में लोग स्वस्थ और तनावमुक्त बने रहने के लिए अपने दैनिक जीवन में योग और ध्यान के के अपनाते थे। किन्तु आज के भगमभाग और व्यस्त वातावरण में योग करना दिन प्रति दिन कम होता जा रहा है। जो व्यक्ति उत्साह के साथ योग आरम्भ कर भी देते हैं तो वे एक या दो सप्ताह में ही उससे ऊब कर पुराने ढर्रे पर आ जाते हैं। इस ऊब का सबसे बड़ा कारण यह है कि ऐसे लोग अपनी अंतःप्रेरणा से नहीं बल्कि ‘‘तथाकथित व्यवसायिक योगा’’ की चमक-दमक से प्रभावित हो कर योग को अपनाते हैं। भ्रमित हो कर आरम्भ किया गया कोई भी कार्य उसकी वास्तविक महत्ता को कभी सिद्ध नहीं कर पाता है। यदि योग की वास्तविक महत्ता को अच्छी तरह समझ लिया जाए तो पता चल जाएगा कि जीवन को बेहतर बनाने के लिए इससे अच्छा सस्ता, सुंदर और टिकाऊ उपाय औा कोई नहीं है। योग करने के लिए किसी विशेष उपकरण की आवश्यकता नहीं होती है। न ही मंहगी व्यायामशालाओं (जिम) की फीस भरने की जरूरत होती है। देश में अनेक संस्थाएं हैं जो निःशुल्क योग की शिक्षा देती हैं तथा समय-समय पर शिविर लगा कर उन क्षेत्रों में भी योग के आसनों का ज्ञान देती हैं जहां कोई भी योग-केन्द्र नहीं होते हैं।
यदि योग के आसनों को अपने शरीर एवं अपनी शारीरिक आवश्यकताओं के हिसाब से सीख, समझ लिया जाए तो योग एक बहुत ही सुरक्षित क्रिया है और किसी के भी द्वारा किसी भी समय की जा सकती है, यहां तक कि इससे बच्चे भी लाभ ले सकते हैं। योग वह क्रिया है, जिसके अन्तर्गत शरीर के विभिन्न भागों को एक साथ लाकर शरीर, मस्तिष्क और आत्मा को सन्तुलित करने का एक अभ्यास है। बिना किसी समस्या के जीवन भर तंदरुस्त रहने का सबसे अच्छा, सुरक्षित, आसान और स्वस्थ तरीका योग है। इसके लिए केवल शरीर के क्रियाकलापों और श्वास लेने के सही तरीकों का नियमित अभ्यास करने की आवश्यकता है। यह शरीर के तीन मुख्य तत्वों; शरीर, मस्तिष्क और आत्मा के बीच संपर्क को नियमित करना है। यह शरीर के सभी अंगों के कार्यकलाप को नियमित करता है और कुछ बुरी परिस्थितियों और अस्वास्थ्यकर जीवन-शैली के कारण शरीर और मस्तिष्क को परेशानियों से बचाव करता है। यह स्वास्थ्य, ज्ञान और आन्तरिक शान्ति को बनाए रखने में मदद करता है। अच्छे स्वास्थ्य प्रदान करने के द्वारा यह हमारी भौतिक आवश्यकताओं को पूरा करता है, ज्ञान के माध्यम से यह मानसिक आवश्यकताओं को पूरा करता है और आन्तरिक शान्ति के माध्यम से यह आत्मिक आवश्यकता को पूरा करता है, इस प्रकार यह हम सभी के बीच सामंजस्य बनाए रखने में मदद करता है।
योग का नियमित अभ्यास हमें अनगिनत शारीरिक और मानसिक तत्वों से होने वाली परेशानियों को दूर रखने के द्वारा बाहरी और आन्तरिक राहत प्रदान करता है। योग के विभिन्न आसन मानसिक और शारीरिक मजबूती के साथ ही अच्छाई की भावना का निर्माण करते हैं। यह मानव मस्तिष्क को तेज करता है, बौद्धिक स्तर को सुधारता है और भावनाओं को स्थिर रखकर उच्च स्तर की एकाग्रता में मदद करता है। अच्छाई की भावना मनुष्य में सहायता की प्रकृति के निर्माण करती है और इस प्रकार, सामाजिक भलाई को बढ़ावा देती है। एकाग्रता के स्तर में सुधार ध्यान में मदद करता है और मस्तिष्क को आन्तरिक शान्ति प्रदान करता है। योग प्रयोग किया गया दर्शन है, जो नियमित अभ्यास के माध्यम से स्व-अनुशासन और आत्म जागरुकता को विकसित करता है। योग का अभ्यास किसी के भी द्वारा किया जा सकता है, क्योंकि आयु, धर्म या स्वस्थ परिस्थितियों परे है। यह अनुशासन और शक्ति की भावना में सुधार के साथ ही जीवन को बिना किसी शारीरिक और मानसिक समस्याओं के स्वस्थ जीवन का अवसर प्रदान करता है। योग्य शिक्षक से एक बार अच्छी तरह सीख लेने के बाद योग करने से स्वास्स्थ्य संबंधी अनेक कठिनाइयां दूर हो जाती हैं। साथ ही इसके कोई साईड इफैक्ट भी नहीं होते हैं।
देखा जाए तो योग जीवन को संवारने की एक व्यवहारिक शैली है जो आज वैश्विक रूप ले चुकी है। योग किसी धर्म, जाति अथवा संप्रदाय से जुड़ी क्रिया नहीं है, यह तो जीवन को शारीरिक, आध्यात्मिक और संवेदनात्मक रूप से शांत एवं समृद्ध करने की कला है और यह तथ्य इस बात से साबित भी हो चुका है कि दुनिया के अनेक देश और उनके नागरिक योग की महत्ता को स्वीकार चुके है। योग को किसी भी पूर्वाग्रह से मुक्त हो कर अपना कर अपने तनावपूर्ण जीवन को तनाव से मुक्त किया जा सकता है। दरअसल, आज के कठिन युग में योग एक लाभकारी जीवनशैली है।
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