Wednesday, October 10, 2018

चर्चा प्लस ... स्त्री शक्ति का स्मरण कराती है नवरात्रि - डॉ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
चर्चा प्लस ...
स्त्री शक्ति का स्मरण कराती है नवरात्रि
- डॉ. शरद सिंह
‘देवी’ का अर्थ है निर्भयता और शक्ति। नवरात्रि वह काल खण्ड है जिसमें देवी के प्रतीक को स्थापित कर के शक्ति की उपासना का अनुष्ठान किया जाता है और देवी के रूप में शक्तिसम्पन्न निर्भय स्त्री की कल्पना को साकार किया जाता है। नवरात्रि में देवी भगवती के नौ रूपों में नौ शक्तियों की पूजा की जाती हैं। यह नौ शक
्तियां स्त्रीशक्तियां ही तो हैं। निर्भय स्त्री ही देवी है, जो असुरों का संहार करने, जो देवताओं और सम्पूर्ण जगत् का कल्याण करने की क्षमता रखती है। जो जगत् की जननी है, मां है, वही शक्ति है। इसीलिए इस पर्व के धार्मिक महत्व के साथ ही हमें इसके व्यावहारिक महत्व को भी समझना होगा। वस्तुतः नवरात्रि पर्व स्त्रियों का सम्मान का पर्व है।
शक्ति का स्मरण कराती है नवरात्रि - डॉ. शरद सिंह ... चर्चा प्लस ... Column of Dr (Miss) Sharad Singh in Sagar Dinkar News Paper
या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता,
या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता,
या देवी सर्वभूतेषु बुद्धि रूपेण संस्थिता
या देवी सर्वभूतेषु लक्ष्मीरूपेण संस्थिता
नावरात्रि में स्त्री शक्ति को स्थापित किया जाता है और स्मरण किया जाता है कि स्त्री अशक्त नहीं सशक्त है। विडम्बना यह कि सदियों से सबसे अधिक अपराध स्त्री के विरुद्ध ही होते आ रहे हैं। आज भी आंकड़े भयावह हैं। समाचारों में आए दिन किसी भी आयुवर्ग की स्त्री की अवमानना अथवा बलात्कार के समाचार स्त्रीशक्ति की स्थापना संबंधी विचार को झुठलाने की कोशिश करते रहते हैं। फिर भी स्त्रियां अपनी शक्ति को धीरे-धीरे पहचान रही हैं और अपने आत्मसम्मान की स्थापना कर रही हैं। संघर्ष कड़ा है पर विजय असंभव नहीं। सच तो यह है कि स्त्री स्वयंसिद्धा है। उसे किसी के सामने झुकने अथवा न्याय की भीख मांगने की जरूरत नहीं। देवी दुर्गा के नौ रूप स्त्री की उस शक्ति को दर्शाते हैं जिनसे वह मानव में मौजूद राक्षसी प्रवृत्तियों का नाश कर सकती है। नवरात्रि की कथाएं यही तो बताती हैं कि जहां देवता स्वयं को अक्षम पाते हैं वहां देवी अपनी क्षमता का प्रयोग कर के सब कुछ सही कर देती है। आज की स्त्री भी तो यही कर रही है। स्त्री घर सम्हाल रही है, नौकरी कर रही है, राजनीति में आगे आ चुकी है और पुरुरूोचित माने जाने वाले सुरक्षा एवं यांत्रिकक्षेत्र में भी स्वयं को साबित कर रही है। आज दुनिया का कोई भी क्षेत्र स्त्री की पहुंच से दूर नहीं है। आज की स्त्री पुरुष-प्रधान समाज के मानको को बदल रही है। जिस स्त्री-अस्मत अथवा स्त्री की दैहिक शुचिता की दुहाई दे कर स्त्री को आत्महत्या करने तक मजबूर किया जाता था, उसी दुहाई को वह आज कठोरता से ठुकरा कर उन परिस्थितियों को बेनकाब कर रही है जिनके द्वारा उन्हें डराया, दबाया गया। ‘मी टू’ और ‘यू टू’ जैसे कैम्पेन आज स्त्री को सिर उठा कर जीने की ताकत दे रहे हैं। जिस यौनिक अपराध का शिकार होने के कारण उसे जीवन भर मुंह छिपा कर जीना पड़ता था, आज उस अपराध के विरुद्ध मुंह खोलने का साहस स्त्रियों में आता जा रहा है। भारत में भी इसकी शुरुवात सेलीब्रिटी महिलाओं ने कर दी है, जिससे आमस्त्री में भी साहस का संचार होगा। यह जरूरी भी है। आज जब नन्हीं अबोध बालिकाओं को भी बलात्कारी नहीं बख़्श रहे हैं तो ऐसे दूषित माहौल में स्त्रियों का यौनहिंसा के विरुद्ध उठ खड़ा होना जरूरी है। जब स्त्रियां साहस दिखाती हैं तो पुरुषवर्ग भी उनका साथ देता है। पुरुषों की सत्ता पुरुषों के वैचारिक भिन्नता ने बनाई। दुर्भाग्यवश स्त्री को दोयम दर्जे का मानने वाले पुरुष समाज में प्रभावी स्तर पर रहे। किन्तु प्रत्येक पुरुष अपराधी नहीं होता है। वह भी पिता, भाई, पति और पुत्र होता है। उसे भी स्त्री के साथ अपने गरिमापूर्ण संबंधों का भान होता है। यदि ऐसा नहीं होता तो आज जिस समर्थन के साथ स्त्रियां जीवन में बहुमुखी विकास कर रही हैं, वह नहीं कर पातीं और दीवारों के भीतर, हाथ भर लम्बे घूंघट में घुट रही होतीं। लेकिन यह समर्थन तभी मिला जब स्त्रियों ने साबित कर दिया कि वे हर तरह का काम करने में सक्षम हैं।
हमारी संस्कृति नारी के आदर की संस्कृति है। प्राचीन भारत में स्त्री का सम्मान किया जाता है। उसे समाज में बराबरी का दर्जा दिया जाता था। पौराणि ग्रंथों में ऋषितुल्य विदुषी स्त्रियों का उल्लेख मिलता है। किन्तु हमारे अतीत में वह काला समय आया जो भारतीय इतिहास में मध्यकाल के नाम से जाना जाता है। विदेशी हमलावरों ने भारतीय पुरुषों को भ्रमित कर के स्त्री सम्मान के मायने ही बदलवा दिए। उन्होंने यह मस्तिष्क में बिठा दिया कि यदि स्त्री को परपुरुष स्पर्श भी कर ले तो उसे आत्मदाह कर लेना चाहिए। इससे भी आगे बढ़ कर एक पाठ और पढ़ाया कि परपुरुष की कुदृष्टि मात्र से बचने के लिए स्त्रियों को तलवार नहीं उठानी चाहिए बल्कि जौहर कर लेना चाहिए। दुर्भाग्य यह कि मातृशक्ति को देवी के रूप् में पूजने वाला पुरुष समाज इस तरह के पाठों को आत्मसात करता चला गया और स्वयं स्त्री समाज आत्महत्या में अपने सम्मान का प्रतिबिम्ब देखने लगी। लेकिन कहा जाता है न कि बुराई के पैर भले ही मजबूत दिखाई दें लेकिन होते कमजोर ही हैं और जल्दी थक जाते हैं। इन बुराइयों के पैर कई दशक बाद थके लेकिन अंततः थक कर चूर-चूर हो गए। जौहर और सती प्रथा बंद हुई। लेकिन इन काले दशकों ने स्त्रियों को शिक्षा, निर्णय लेने के अधिकार, कोख पर अधिकार और यहां तक कि खुली हवा से भी वंचित कर दिया। विचित्रता यह कि जब स्त्रियां दलित बनाई जा रही थीं, उस दौरान भी देवियां पूज्य रहीं। काल्पनिक शक्ति के सामने समाज ने सिर झुकाया किन्तु प्रत्यक्ष शक्ति को लम्बे समय तक अनदेखा किया। इतना अधिक अनदेखा किया कि आज भी समाज स्त्रीशक्ति को पूरी तरह से नहीं देख पा रहा है। शायद इसीलिए नवरात्रि के रूप में देवी के नौ रूपों वाली नौ शक्तियां प्रति वर्ष दो बार समाज के सामने आती हैं ताकि समाज स्त्रीशक्ति को पहचाने और उसे अपना सहभागी बनाए। नवरात्रि तो यह नारी शक्ति के आदर और सम्मान का उत्सव है। यह उत्सव नारी को अपने स्वाभिमान व अपनी शक्ति का स्मरण दिलाता है, साथ ही सकल समाज को नारी शक्ति का सम्मान करने के लिए प्रेरित करता है।
मां दुर्गा की उपासना करते समय जिस स्त्रीशक्ति का बोध होता है वह उपासना के बाद स्मरण क्यों नहीं रहता? न स्त्रियों को और न पुरुषों को। समाचारपत्रों में आए दिन स्त्री के विरुद्ध किए गए जघन्य अपराधों के समाचारों भरे रहते हैं। समाज में आती जा रही चारित्रिक गिरावट को देख कर अत्यंत दुख भी होता है लेकिन सिर्फ़ शोक प्रकट करने या रोने से समस्या का समाधान नहीं निकलता है। देवी दुर्गा का दैवीय चरित्र हमें यही सिखाता है कि अपराधियों को दण्डित करने के लिए स्वयं के साहस को हथियार बनाना पड़ता है। जिस महिषासुर को देवता भी नहीं मार पा रहे थे उसे देवी दुर्गा ने मार कर देवताओं को भी प्रताड़ना से बचाया। नवरात्रि के दौरान लगभग हर हिन्दू स्त्री अपनी क्षमता के अनुसार दुर्गा के स्मरण में व्रत, उपवास पूजा-पाठ करती है। अनेक महिला निर्जलाव्रत भी रखती हैं। पुरुष भी पीछे नहीं रहते हैं। वे भी पूरे समर्पणभाव से मां दुर्गा की स्तुति करते हैं। नौ दिन तक चप्पल-जूते न पहनना, दाढ़ी नहीं बनाना आदि जैसे सकल्पों का निर्वाह करते हैं। लेकिन वहीं जब किसी स्त्री को प्रताड़ित किए जाने का मामला समाने आता है तो अधिकांश स्त्री-पुरुष तटस्थ भाव अपना लेते हैं। उस समय गोया यह भूल जाते हैं कि आदि शक्ति दुर्गा के चरित्र से शिक्षा ले कर अपनी शक्ति को भी तो पहचानना जरूरी है। मां दुर्गा का चरित्र उन्हें दृढ़ और सबल होने का संदेश देता है।
यह भी सच है कि आज स्त्रियों को बहुत अधिक संघर्ष करना पड़ रहा है। दरअसल, स्त्रियों के प्रति संवेदनाओं में विस्तार होना चाहिए। जिस तरह हम नवरात्रि में मातृशक्ति के अनेक स्वरूपों का पूजन करते हैं, उनका स्मरण करते हैं, उसी प्रकार नारी के गुणों का सम्मान किया जाना जरूरी है। घर में मौजूद स्त्रियां अर्थात् माता, पत्नी, बेटी, बहन में नौ दुर्गा के गुण होते हैं जिन्हें स्वीकार कर के सामाजिक बुराइयों को दूर किया जा सकता है। इस पर्व के धार्मिक महत्व के साथ ही हमें इसके व्यावहारिक महत्व को भी समझना होगा। वस्तुतः नवरात्रि पर्व स्त्रियों का सम्मान का पर्व है।
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( सागर दिनकर, 10.10.2018)


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Tuesday, October 9, 2018

डॉ शरद सिंह रोटरी क्लब आफ सेंट्रल सागर द्वारा सम्मानित

Dr (Miss) Sharad Singh Honored By Rotary Club Sagar Central 07.10. 2018

रोटरी क्लब आफ सेंट्रल सागर द्वारा क्षमावाणी पर्व पर यूनिवर्सिटी के इंडियन काफी हाउस में कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया।जिसमें मैंने (डॉ शरद सिंह), मेरी दीदी डॉ वर्षा सिंह एवं श्रीमती दीप्ती चंदेरिया आदि ने काव्यपाठ किया। इस अवसर पर रोटरी क्लब आफ सेंट्रल सागर की ओर से स्मृतिचिन्ह प्रदान कर सम्मानित भी किया गया। 07.10.2018 🌏रोटरी क्लब आफ सेंट्रल सागर अध्यक्ष डॉ आजाद जैन एवं श्री अनिल चंदेरिया का हार्दिक आभार
Dr (Miss) Sharad Singh Honored By Rotary Club Sagar Central 07.10. 2018

Dr (Miss) Sharad Singh Honored By Rotary Club Sagar Central 07.10. 2018
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Dr Varsha Singh

Dr (Miss) Sharad Singh Honored By Rotary Club Sagar Central 07.10. 2018

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Dr (Miss) Sharad Singh Honored By Rotary Club Sagar Central 07.10. 2018

Dr (Miss) Sharad Singh Honored By Rotary Club Sagar Central 07.10. 2018

Dr (Miss) Sharad Singh Honored By Rotary Club Sagar Central 07.10. 2018

Dr (Miss) Sharad Singh Honored By Rotary Club Sagar Central 07.10. 2018

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Dr (Miss) Sharad Singh Honored By Rotary Club Sagar Central 07.10. 2018

Dr (Miss) Sharad Singh Honored By Rotary Club Sagar Central 07.10. 2018
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Dr Varsha Singh

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Dr Varsha Singh

Dr (Miss) Sharad Singh Honored By Rotary Club Sagar Central 07.10. 2018
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Dr Varsha Singh

Dr (Miss) Sharad Singh Honored By Rotary Club Sagar Central 07.10. 2018
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Dr Varsha Singh

Dr (Miss) Sharad Singh Honored By Rotary Club Sagar Central 07.10. 2018

Dr (Miss) Sharad Singh Honored By Rotary Club Sagar Central 07.10. 2018
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Dr Varsha Singh

Dr (Miss) Sharad Singh Honored By Rotary Club Sagar Central 07.10. 2018
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Dr Varsha Singh

Dr (Miss) Sharad Singh Honored By Rotary Club Sagar Central 07.10. 2018
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Dr Varsha Singh

Dr (Miss) Sharad Singh Honored By Rotary Club Sagar Central 07.10. 2018
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Dr Varsha Singh

Dr (Miss) Sharad Singh Honored By Rotary Club Sagar Central 07.10. 2018

Dr (Miss) Sharad Singh Honored By Rotary Club Sagar Central 07.10. 2018

Dr (Miss) Sharad Singh Honored By Rotary Club Sagar Central 07.10. 2018
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Dr (Miss) Sharad Singh Honored By Rotary Club Sagar Central 07.10. 2018 With
Dr Varsha Singh
 

Dr Varsha Singh Honored By Rotary Club Sagar Central 07.10. 2018

Dr Varsha Singh Honored By Rotary Club Sagar Central 07.10. 2018

Saturday, October 6, 2018

हां,मैंने कभी एक झूठ बोला था ... डॉ. शरद सिंह

झूठ बोल कर उसे स्वीकार करना कठिन काम है और यह काम मुझसे करवा लिया ‘‘जागरण सखी’’ पत्रिका की विदुषी सखियों ने... हां,मैंने कभी एक झूठ बोला था और अब उसे मैंने स्वीकार किया है "जागरण सखी" की स्मिता श्रीवास्तव के सामने स्वीकार किया... प्रिय मित्रो, आप भी पढ़िए "जागरण सखी" का अक्टूबर 2018 का अंक !

🙏हार्दिक धन्यवाद विनीता, स्मिता एवं अवधेश जी🙏 🙏हार्दिक धन्यवाद "जागरण सखी" 🙏

http://sakhi.epapr.in/1835982/Sakhi/Oct-2018#page/59/2

Wednesday, October 3, 2018

चर्चा प्लस ... संकटग्रस्त कौवे और श्राद्धपक्ष में भूखे पूर्वज - डॉ. शरद सिंह


Dr (Miss) Sharad Singh
इस बार श्राद्ध पक्ष के दौरान सभी ने महसूस किया कि कौवे नज़र नहीं आते हैं। सकी जो वज़ह मैंने पाई वह इस बार के 'चर्चा प्लस' में आपके सामने रख रही हूं...
 चर्चा प्लस …
  संकटग्रस्त कौवे और श्राद्धपक्ष में भूखे पूर्वज
    - डॉ. शरद सिंह
  श्राद्ध पक्ष आरम्भ होते ही आंखें कौवों को ढूंढने लग जाती हैं। हिन्दू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार श्राद्ध पक्ष में यदि काग अर्थात् कौवे को खाना नहीं खिलाया गया तो पितरों यानी पूर्वजों को भी भूखा रहना पड़ता है। लेकिन अब श्राद्ध पक्ष में भी कौवों का मिलना मुश्क़िल होता जा रहा है। एक ओर हम कौवों को अपने पूर्वजों का दूत मानते हैं, ओर दूसरी ओर वृक्ष काट कर, रासायिक पदार्थों का उपयोग बढ़ा कर उनका घर उजाड़ रहे हैं, उन्हें मार रहे हैं, तो क्या ऐसा कर के हम अपने पूर्वजों को कष्ट नहीं पहुंचा रहे हैं? कौवे जैसे पक्षी हमारी परंपरागत मान्यताओं और पर्यावरण दोनों के संरक्षण लिए जरूरी हैं।                 
Charcha Plus .. Column Of Dr Sharad Singh in Sagar Dinkar, Daily
             

भारत में हिन्दू धर्म में श्राद्ध पक्ष के समय कौओं का विशेष महत्त्व है और प्रत्येक श्राद्ध के दौरान पितरों को खाना खिलाने के तौर पर सबसे पहले कौओं को खाना खिलाया जाता है। ऐसा माना जाता है कि व्यक्ति मर कर सबसे पहले कौए का जन्म लेता है। मान्यता है कि कौओं को खाना खिलाने से पितरों को खाना मिलता है। जो व्यक्ति श्राद्ध कर्म करता है, वह एक थाली में भोजन परोसकर अपने घर की छत पर जाता है और आवाज़ दे कर कौवों को बुलाता है। कौवों के आने पर उन्हें भोजन और पानी दिया जाता है। जब कौआ घर की छत पर खाना खाने के लिए आता है तो यह माना जाता है कि जिस पूर्वज का श्राद्ध किया गया है, वह प्रसन्न है और खाना खाने आ गया है। कौए की देरी व आकर खाना न खाने पर माना जाता है कि वह पितर नाराज़ है और फिर उसको राजी करने के उपाय किए जाते हैं। इस दौरान हाथ जोड़कर अपनी प्रत्येक गलती के लिए उससे क्षमा मांगी जाती है। इसके बाद कौए को फिर भोजन दिया जाता है। जब कौवा भोजन कर लेता है तब माना जाता है कि पितर यानी पूर्वज ने भोजन ग्रहण कर लिया है। वह अब भूखा नहीं है और अपने वंशजों से प्रसन्न है।
पिछले कुछ वर्षों से यह पाया गया है कि कौवों की संख्या में निरंतर गिरावट आ रही है। पहले घर की मुंडेर पर बैठ कर कांव-कांव करते दिखाई-सुनाई दे जाते थे किन्तु अब महानगरों ओर शहरों में को कौवे कभी-कभार ही दिखते हैं। पक्षियों में एकता ओर सामाजिकता की मिसाल कायम करने वाले कौवे धीरे-धीरे विलुप्ति की ओर धकेले जा रहे हैं। यह एक गहन चिंता का विषय है। कौंवों की संख्या घटने का सबसे प्रमुख कारण है वृक्षों का कटना। आम, नीम, पीपल जैसे ऊंचे वृक्षों की शाखाओं में अपना घोंसला बनाने वाले कौवे अब अपना घोंसला कहां बनाएं जब वृक्षों को ही निमर्मता से काटा जा रहा है। जंगल सिमट रहे हैं और शहरों में वृक्षों के लिए कोई स्थान नहीं रह गया है। बाल्कनी या टेरेस में गमलों में सिकुडी-सिमटी हरियाली कौवों को पनाह नहीं दे सकती है। रासायनिक तत्वों से भरपूर वातावण, ध्वनि प्रदूषण और मोबाईल टावारों तथा अन्य तरंगों का संजाल उन पक्षियों के लिए घातक साबित हो रहा है जो  प्राकृतिक पदार्थों को खा कर जीवित रहते हैं और भूमि की चुम्बकीय तरंगों के सहारे आव्रजन-प्रव्रजन करते हैं। प्रदूषण के साथ-साथ सिमट रही बायो-डायवर्सिटी के कारण भी कौओं की संख्या तेजी से घटी है। वातावरण असंतुलन के कारण ही अनेक सुंदर पक्षियों की भांति कौए भी लुप्त होने की कगार पर आ गए हैं। मानव की खान-पान की आदतें बदली हैं। कौए गंदगी खाते हैं। कूड़ा अब पालीथिन में फेंका जाता है। मरे हुए जानवरों की हड्डियों तक में केमिकल होते हैं। खेतों में कीटनाशकों के रूप में जहर फैला हुआ है। अध्ययन से पता चला है कि ऑक्सीटोसिन के इंजेक्शन जिन पशुओं में लगाए जाते हैं, उनकी मौत के बाद मांस खाकर पक्षियों की किडनी बर्बाद हो गई। वह पक्षी विलुप्ति की कगार पर आ गए। यही कौओं के साथ भी हुआ है।
कौए की छः प्रजातियां भारत में मिलती हैं। भारत के ख्याति प्राप्त पक्षी विज्ञानी सालिम अली ने अपनी हैन्डबुक में कौवों की प्रमुख दो का प्रजातियों की चर्चा की है- एक जंगली कौआ (कोर्वस मैक्रोरिन्कोस) तथा दूसरा घरेलू कौआ (कोर्वस स्प्लेन्डेंस)। जंगली कौआ पूरी तरह से काले रंग का होता है, जबकि घरेलू कौआ गले में एक भूरी पट्टी लिए हुए होता है। घरेलू कौवे का वर्णन ’काग भुशुंडि’ नाम कवि तुलसीदास ने किया है, जिसके गले में कंठी माला-सी पड़ी है। पुराणों के अनुसार कौए अपनी मौत नहीं मरते। उन्हें अमरत्व का वरदान है। यह माना गया है कि इस अमरत्व गुण पर काग प्रजाति ने पितृलोक तक पहुंच बनाई है। इन्हें पितृलोक का संदेशवाहक माना गया है। यही कारण है कि श्राद्ध का नैवेद्य (कागुर) कौओं को चढ़ाया जाता है। पितृपक्ष नैवेद्य को कागुर कहा जाता है, जो काग को समर्पित है। रजो-तमोगुण का समावेश रहता है। श्राद्ध के लिए बनाया गया भोजन धार्मिक भावना को बढ़ाता है। साथ ही यह परलोक संबंधी ज्ञान और भक्तिभाव को विकसित करता है। यही कागुर काग को अर्पित किया जाता है। इस पर पांच विकल्पों का प्रावधान भी है। इनमें गोग्रास बलि, श्वान बलि, काग बलि, देवाधि बलि तथा पिपीलिकादि बलि शामिल है। काग बलि को सर्वाधिक महत्व इसलिए मिला है, क्योंकि शिवजी के गणों में काग भुशुंडि को स्थान मिला था। रामचरित मानस की घटनाओं पर काग भुशुंडि से शिवजी चर्चा किया करते थे। पृथ्वी लोक तथा देवलोक इनके लिए समान सुलभ थे। पृथ्वी लोक की सारी खबरें देवलोक, पितृलोक तक काग ही पहुंचाते थे। इसलिए इनका विशेष महत्व है। पितृपक्ष में कागुर के पांच भाग काग को चढ़ाए जाते हैं। एक भाग श्वान यानी कुत्ते को तथा एक भाग गौमाता के हिस्से चढ़ाने का उल्लेख पुराणों में दर्ज है। वहीं विष्णु भगवान को धरती का पालनहार माना जाता है तथा प्रभु राम को विष्णुजी का अवतार। पृथ्वी लोक की इस व्यवस्था में भोले भंडारी को संहार का देवता माना गया है। भगवान शिव के शीश पर चंद्रमा विराजमान हैं जहां पितृलोक स्थापित है। शिवजी ने काग भुषुंडि को अमरत्व का दिया था। सभी युगों में घटी घटनाओं के साक्षी रहे काग को शिवजी के गणों में शामिल किया गया है। इसी कारणवश काग बलि को प्राथमिकता दी जाती है। पुराणों में वर्णित काग भुषुंडि चरित्र से कौओं की विशिष्टताएं पता चलती हैं।
देखा जाए तो हमारे पूर्वज हमसे कहीं अधिक विद्वान और पर्यावरण हितैषी थे। उन्होंने उन पशु-पक्षियों को भी महत्व दिया जिन्हें आज उपेक्षा की दृष्टि से देखा जाता है। कौवे आज हैं या नहीं अथवा उनकी आबादी कितनी बची है, इसकी चिन्ता आमतौर पर किसी को नहीं है। जबकि कौवे पर्यावरण के अभिन्न अंग हैं। ये मानव जीवन के लिए खतरनाक कीट-पतंगों को अपना भोजन बनाकर हमारी रक्षा करते हैं । पर्यावरण संरक्षण की दृष्टि से पक्षियों का मानव जीवन में बहुत बड़ा महत्व है । आकाश में उड़ते ये पंखवाले परोपकारी जीव पर्यावरण की सफाई के बहुत बड़ा योगदान करते है । गिद्ध, कौआ, चील ऐसे पक्षी है जो मृत जानवरों के अवशिष्ट का सफाया करके धरती को साफ-सथुरा रखने में मदद करते हैं।
पर्यावरण संरक्षण के लिए यह जरूरी हो गया है कि हम पक्षियों को बचाने की दिशा में जागरूक हो जाएं। पक्षियों की संख्या यदि इसी तरह कम होती गई तो पर्यावरण में जो असंतुलन पैदा होगा उसका खामियाजा हमारी आने वाली पीढ़ियों को भोगना होगा । कौए, चील तथा ऐसे बड़े पक्षियों की प्रजाति पूरी तरह नष्ट हो जाए इससे पहले, आधुनिकता की अंधी दौड़ के नाम पर इसकी अनदेखी नहीं की जानी चाहिए। वृक्षों को काट कर पक्षियों का घर उजाड़ कर यदि हम उन्हें अपनी प्रजाति बढ़ाने से रोकते हैं, उनकी आबादी को संकट में डालते हैं तो यह मान कर चलना चाहिए कि हम पर्यावरण ही नहीं बल्कि अपने धार्मिक मूल्यों ओर मान्यताओं की भी जड़े काट रहे हैं। यदि हम अपनी परम्परागत, संस्कारगत मानयताओं को बचाए रखना चाहते हैं और अपनी भावी पीढ़ी को विरासत में एक स्वस्थ पर्यावरण देना चाहते हैं तो हमें कौवे तथा संकटग्रस्त सभी पक्षियों का संरक्षण एवं संवर्द्धन करना ही होगा।
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       ( सागर दिनकर, 03.10.2018)

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Monday, October 1, 2018

'पत्रिका' समाचारपत्र में मेरी माताश्री डॉ. विद्यावती 'मालविका' की क्रियाशीलता के बारे में

About Dr Vidyawati Malavika in Patrika 01.10.2018
आज अंतरराष्ट्रीय वृद्ध दिवस पर स्थानीय 'पत्रिका' समाचारपत्र ने मेरी माताश्री डॉ. विद्यावती 'मालविका' की क्रियाशीलता के बारे में प्रकाशित किया है। जिसे मैं आप सबसे शेयर कर रही हूं।
हार्दिक आभार "पत्रिका" 🙏

Happy International Day of Older Persons !

Friday, September 28, 2018

Dr. Sharad Singh Awarded by Sagar Gourav Samman 2018 By Vichar Sansatha Sagar

Dr. Sharad Singh Awarded by Sagar Gourav Samman 2018 By Vichar Sansatha Sagar
सागर शहर की अग्रणी सामाजिक संस्था " विचार " द्वारा दिनांक 21.09.2018 को विभिन्न क्षेत्रों में सक्रिय सागर नगर की प्रतिभाओं के एक भव्य सम्मान समारोह में मुझे यानी डॉ. (सुश्री) शरद सिंह को इस वर्ष से प्रारम्भ किए गए प्रथम " सागर गौरव सम्मान " से सम्मानित किया गया।
मैजेस्टिक प्लाजा, सागर के सभागार में आयोजित इस समारोह में मंच पर उपस्थित लब्धप्रतिष्ठित जनों में प्रमुख थे... कला गुरु विष्णु पाठक, योग गुरु विष्णु आर्य, पर्यावरणविद आशारानी मलैया, एकता समिति के संस्थापक रशीद भाई और समाजसेवी, " विचार " संस्था के संस्थापक एवं बिजनेसमैन कपिल मलैया।
Sagar Gourav Samman 2018
Dr. Sharad Singh Awarded by Sagar Gourav Samman 2018 By Vichar Sansatha Sagar

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Dr. Sharad Singh Awarded by Sagar Gourav Samman 2018 By Vichar Sansatha Sagar

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Dr. Sharad Singh Awarded by Sagar Gourav Samman 2018 By Vichar Sansatha Sagar

Dr. Sharad Singh Awarded by Sagar Gourav Samman 2018 By Vichar Sansatha Sagar

Dr Varsha Singh ... Dr. Sharad Singh Awarded by Sagar Gourav Samman 2018 By Vichar Sansatha Sagar

Dr. Sharad Singh Awarded by Sagar Gourav Samman 2018 By Vichar Sansatha Sagar

Dr. Sharad Singh Awarded by Sagar Gourav Samman 2018 By Vichar Sansatha Sagar

Dr. Sharad Singh Awarded by Sagar Gourav Samman 2018 By Vichar Sansatha Sagar