Friday, November 16, 2018

अपनी मां डॉ. विद्यावती ‘मालविका’ जी के साथ केन्द्रीय विश्वविद्यालय घूमने का सुखद अवसर - डॉ. शरद सिंह

From left : Dr Laxmi Pandey, Dr Anand Prakash Tripathi, Dr Vidyawati Malavika, Dr Varsha Singh, Dr Sharad Singh, Dr Rajendra Yadav and bihind Dr Ashutosh Mishra at front of Hindi Department of Dr Hari Singh Gour Central University Sagar
कल (15.11.2018) मेरी माताश्री डॉ. विद्यावती "मालविका" जी ने, डॉ हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर के हिंदी विभाग में जाने की इच्छा प्रकट की । उन्होंने कहा कि मैं आज विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में जाना चाहती हूं जहां आचार्य नंददुलारे बाजपेई, आचार्य रामरतन भटनागर, डॉ. भागीरथ प्रसाद मिश्र, प्रेम शंकर, डॉ. कांति कुमार जैन सरीखे प्रकांड विद्वानों से अनेक अवसरों, आयोजनों में मिलना हुआ करता था। अतः मैं और दीदी डॉ. वर्षा सिंह उन्हें विश्वविद्यालय लेकर गए जहां हिन्दी विभाग के वर्तमान विभागाध्यक्ष डॉ आनंद प्रकाश त्रिपाठी तथा विद्वत स्टाफ डॉ. आशुतोष मिश्रा, डॉ राजेंद्र यादव, डॉ. लक्ष्मी पांडे इत्यादि से उनकी आत्मीय मुलाकात हुई। सभी ने माताश्री का बड़ी आत्मीयता से स्वागत किया। चर्चा के दौरान माता जी ने अपनी पी.एचडी. उपाधि और डॉ. गौर से संबंधित संस्मरण साझा किये। जिसमें उन्होंने याद करते हुए यह भी कहा कि पंडित हजारी प्रसाद द्विवेदी ने उनका वाईवा लिया था।
तत्पश्चात माताश्री को बुंदेली पीठ, हिन्दी विभाग की पत्रिका " ईसुरी" के सम्पादक एवं बुंदेली पीठ के सचिव डॉ. राजेन्द्र यादव ने बुंदेली लोकगीतों पर एकाग्र पत्रिका का ताज़ा अंक भेंट किया।
विश्वविद्यालय से लौटते हुए सिविल लाइन स्थित अमूल रेस्टोरेंट में हमने काफी पी।
कल का दिन उनके लिए थका देने वाला, किन्तु अत्यंत सुखद रहा।
From left : Dr Rajendra Yadav, Dr Ashutosh Mishra, Dr Anand Prakash Tripathi, Dr Vidyawati Malavika, Dr Varsha Singh, Dr Sharad Singh, and Dr Laxmi Pandey in the Hindi Department of Dr Hari Singh Gour Central University Sagar

Dr Vidyawati Malavika and Dr Varsha Singh in the Hindi Department of Dr Hari Singh Gour Central University Sagar

Dr Vidyawati Malavika and Dr Varsha Singh in the Hindi Department of Dr Hari Singh Gour Central University Sagar


Isuri Magazine

Isuri Magazine

Dr ( Miss) Sharad Singh and Dr Varsha Singh in the Hindi Department of Dr Hari Singh Gour Central University Sagar

Dr ( Miss) Sharad Singh and Dr Varsha Singh in the Hindi Department of Dr Hari Singh Gour Central University Sagar

Dr Varsha Singh in the Hindi Department of Dr Hari Singh Gour Central University Sagar

Dr ( Miss) Sharad Singh and Dr Varsha Singh in the Hindi Department of Dr Hari Singh Gour Central University Sagar

Dr ( Miss) Sharad Singh and Dr Varsha Singh in the Hindi Department of Dr Hari Singh Gour Central University Sagar

Dr Varsha Singh at Amul Restaurant, Civil Lines, Sagar

Dr (Miss) Sharad Singh, Dr Varsha Singh and Dr Vidyawati Malavika at Amul Restaurant, Civil Lines, Sagar

Dr (Miss) Sharad Singh, Dr Varsha Singh and Dr Vidyawati Malavika at Amul Restaurant, Civil Lines, Sagar


Dr (Miss) Sharad Singh, Dr Varsha Singh and Dr Vidyawati Malavika at Amul Restaurant, Civil Lines, Sagar

Dr Varsha Singh at Amul Restaurant, Civil Lines, Sagar

Dr (Miss) Sharad Singh at Amul Restaurant, Civil Lines, Sagar

Dr Varsha Singh and Dr Vidyawati Malavika at Amul Restaurant, Civil Lines, Sagar

Dr Varsha Singh and Dr Vidyawati Malavika at Amul Restaurant, Civil Lines, Sagar

Dr Varsha Singh and Dr Vidyawati Malavika at Amul Restaurant, Civil Lines, Sagar

Dr (Miss) Sharad Singh, Dr Varsha Singh and Dr Vidyawati Malavika at Amul Restaurant, Civil Lines, Sagar

Dr (Miss) Sharad Singh at Amul Restaurant, Civil Lines, Sagar

Dr Varsha Singh at Amul Restaurant, Civil Lines, Sagar

Wednesday, November 14, 2018

चर्चा प्लस ... बाल दिवस विशेष : क्या उपहार दे रहे हैं हम अपने बच्चों को ? - डॉ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
चर्चा प्लस ... 
बाल दिवस विशेष :
क्या उपहार दे रहे हैं हम अपने बच्चों को ?
- डॉ. शरद सिंह 
 
हर साल बालदिवस का उत्सव मनाना आसान है लेकिन अपने गिरेबान में झांकना कठिन हैं जहां हम स्वयं को कटघरे में खड़ा पाते हैं। यदि हम अपने बच्चों को अच्छा स्वास्थ्य नहीं दे सकते, अच्छी शिक्षा नहीं दे सकते, अच्छे संस्कार नहीं दे सकते, समुचित सुरक्षा नहीं दे सकते हैं, तो क्या हम दावा कर सकते हैं कि हम अपने बच्चों को अच्छा भविष्य दे रहे हैं? गरीबी, बेरोजगारी, मंहगाई, भ्रष्टाचार, प्रदूषण और अपराध के दलदल का उपहार देते हुए बच्चों को कैसे कहें ‘हैप्पी बालदिवस’? हमारे ये उपहार बच्चों को न तो अच्छा वर्तमान दे सकते हैं और न अच्छा भविष्य।
Charcha Plus a column of Dr (Miss) Sharad Singh in Sagar Dinkar, Daily, Sagar M.P.
पीठ पर लदा भारी-भरकम स्कूल बैग, कोचिंग क्लासेस के लिए भागमभाग कुल मिला कर बेइंतहा तनाव में जीते बच्चे। यदि बच्चा खेलना चाहता है तो उससे उस खेल को खेलने के लिए बाध्य किया जाता है जिसमें आगे चल कर वह कैरियर बना सके और लाखों कमा सके। यदि बच्चे को नाचने या गाने में रुचि है तो उसकी इस रुचि में भी टेलेण्ट-हण्ट वाले टी.वी. शोज़ में सहभागिता की चमक-दमक दिखाई देने लगती है। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो बच्चे की रुचि में कमाई का जरिया देखने की हमारी आदत बनती जा रही है। जब यह तस्वीर है वर्तमान की तो भविष्य कैसा होगा? जब कि हम अपने बच्चों के भविष्य के लिए न तो स्वच्छ वातावरण छोड़े रहे हैं और न र्प्याप्त प्राकृतिक संसाधन। जैसे एक जुआरी पिता जुआ खेलने के लिए कर्ज लेता चला जाता है और इस बात का कतई ध्यान नहीं रखता है कि उसके बच्चे उस कर्ज को कैसे चुकाएंगे, कुछ ऐसी ही दशा की ओर बढ़ रहे हैं हम और हमारे बच्चे।
दिल्ली जैसे महानगरों में प्रदूषण का स्तर इतना अधिक है कि अस्थमा जैसी सांस की बीमारियों से ग्रस्त बच्चों की संख्या दिन प्रति दिन बढ़ती जा रही है। नाक पर नक़ाब लगा कर सांस लेने को मज़बूर बच्चे और बाज़ारवाद के शिकार होते उनके माता-पिता सब कुछ देख कर भी मानो कुछ नहीं देख पा रहे हैं। जो नक़ाब ऑपरेशन थियेटर में पहने जाते थे, वे नक़ाब अब घर से निकलते ही लगाने की नौबत है। गोया समूचा शहर ही ऑपरेशन थियेटर में बदल गया हो। बस, अंतर यही है कि ऑपरेशन थियेटर के अन्दर का वातावरण स्वच्छ रहता है और उस स्वच्छता को बनाए रखने के लिए दस्ताने और नक़ाब पहने जाते हैं लेकिन शहर में गंदगी से बचने के लिए नक़ाब पहनने की जरूरत पड़ने लगी है।
जो गंदगी भरा वातावरण हम अपने बच्चों को दे रहे हैं उसी का परिणाम है कि आज पालने में झूलने वाले नन्हें बच्चे जीका वायरस से जूझ रहे हैं। यह वायरस देश के लगभग हर राज्य में फैलता जा रहा है। मध्यप्रदेश में यहां तक कि सागर जैसे कम विकसित शहर में भी इसके मरीज़ मिलने लगे हैं। ज़ीका वायरस दिन में एडीज मच्छरों के काटने से फैलता है। इस बीमारी में बुखार के साथ जोड़ों में दर्द और सिरदर्द जैसे लक्षण दिखाई देते हैं। इसका कोई टीका नहीं है, न ही कोई ख़ास उपचार है। ये मच्छरों से ही फैलता है। ये वायरस दिन में ज्यादा सक्रिय रहता है। पाया गया है कि विशेष रूप से गर्भावस्था में महिलाएं इससे ज्यादा संक्रमित होती हैं। इससे प्रभावित बच्चे का जन्म आकार में छोटे और अविकसित दिमाग के साथ होता है। ये गर्भावस्था के दौरान वायरस के संक्रमण से होता है। इसमें शिशु दोष के साथ पैदा हो सकता है। नवजात का सिर छोटा हो सकता है। उसके ब्रेन डैमेज की ज्यादा आशंका होती है। साथ ही जन्मजात तौर पर अंधापन, बहरापन, दौरे और अन्य तरह के दोष दे सकता है। इसका सिंड्रोम शरीर के तंत्रिका तंत्र पर हमला करता है और इसके चलते लोग लकवा का शिकार हो जाते हैं। ये न्यूरोलॉजिकल जटिलताएं भी दे सकता है। जीका वायरस कोई नया नहीं है। इसकी पहचान पहली बार सन् 1947 में हुई थी। जिसके बाद ये कई बार अफ्रीका व साउथ ईस्ट एशिया के देशों के कुछ हिस्सों में फैला था। अभी तक कैरेबियाई ,उत्तर व दक्षिणी अमेरिका के 21 देशों में ये वायरस फैल चुका है। भारत में इसके फैलने का सबसे बड़ा कारण है ऐसी गंदगी जहां मच्छर पलते रहते हैं। किसी भी स्वच्छता मिशन का सरकारी स्वरूप आने वाली पीढ़ी को स्वच्छ वातावरण नहीं दे सकता है। इसके लिए प्रत्येक नागरिक को स्वच्छता को जीवनचर्या बनाना होगा। भले ही वह नागरिक करोड़ों के भवनों में रह रहा हो या झोपड़पट्टी में रहता हो। खुद के लिए नही ंतो अपने बच्चों के लिए यह जरूरी है। आज जीका वायरस है तो कल कुछ और इससे भी भयावह वायरस आ जाएगा, यदि आज हम नहीं सम्हले तो।
आपराधिक स्तर पर भी बच्चे अपराध से घिरे हुए दिखाई देने लगे हैं। जब अवयस्क युवा बलात्कार जैसा घिनौना अपराध करने लगें या फिर तीन-चार साल की नन्हीं बच्चियों को हवस का शिकार बनाया जाने लगे तो इसे अच्छी सामाजिक दशा तो हरगिज नहीं कहा जा सकता है। अपराध और अपराधियों से आज बच्चे सुरक्षित नहीं हैं। विकास के दावों के बीच यह एक कड़वा सच है कि हमने अपराधों में कहीं अधिक विकास कर लिया है। हमारे बच्चे न तो घर-परिवार में सुरक्षित हैं, न मोहल्ले में और न स्कूलों में। कोई दुश्मनी भी नहीं, मात्र व्यक्तिगत आनन्द के लिए बच्चों को शिकार बनाया जा रहा है। भारत सरकार द्वारा बच्चों से बलात्कार के मामलों में फांसी की सज़ा दिए जाने का प्रावधान किए जाने के बाद भी घटनाएं थम नहीं रही हैं।
देश के विकास की दिशा में यूं तो लक्ष्य रखा गया है बच्चों के प्रति दुराचार, उनका शोषण, तस्करी, हिंसा और उत्पीड़न समाप्त करना। किन्तु सच तो यह है कि हमारी व्यवस्थाएं नहीं बचा पा रही हैं अपने बच्चों को। महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के अध्ययन ‘चाइल्ड एब्यूज़ इन इंडिया’ के अनुसार भारत में 53.22 प्रतिशत बच्चों के साथ एक या एक से ज़्यादा तरह का यौन दुर्व्यवहार और उत्पीड़न हुआ होता है। गृह मंत्रालय के मुताबिक, सन् 2016 में अगवा बच्चों के 40.4 प्रतिशत मामलों में ही आरोप पत्र दाखिल हुआ। वहीं, 2016 में देश में बच्चों के विरुद्ध अपराध के 1,06,958 मामले दर्ज हुए, जबकि सन् 2015 में इनकी संख्या 94,172 थी। बच्चों की तस्करी, बंधुआ मज़दूरी, बेगारी, यौनशोषण और विवाह के लिए बच्चों के अपहरण के मामलों में बहुत वृद्धि हुई है। भारत में सन् 2016 में बच्चों के अपहरण के 54,723 मामले दर्ज हुए, जबकि सन् 2001 में ऐसे दर्ज मामलों की संख्या 2,845 थी। अर्थात् सोलह सालों में बच्चों के अपहरण के मामलों में 1,823 प्रतिशत की वृद्धि हुई। सन् 2016 में बच्चों के अपहरण के 54,723 मामलों में से 39,842 लड़कियां थीं। इन आंकड़ों को देख कर चिंता होने लगती है कि जब हम बचचों को उनका सुरक्षित वर्तमान नहीं दे पा रहे हैं तो एक सुरक्षित भविष्य कहां से देंगे?
दिनों-दिन बढ़ते हुए बाल-अपराध हमारे सामाजिक जीवन के लिए एक चुनौती हैं। छोटे-छोटे बच्चों में अपराधी प्रवृत्तियां एक गंभीर समस्या बन गई है। बाल जीवन में बढ़ती जा रही हिंसा, क्रूरता, गुण्डागर्दी, नशेबाजी, आवारापन मानव-समाज के लिए एक गंभीर समस्या है। बाल अपराध इस तरह बढ़ रहे हैं कि उनका अनुमान कर सकना मुश्किल है। यूं तो बाल अपराधों के लिए सर्वेक्षण होता रहता है किन्तु कहीं की भी पूरे आंकड़े सामने नहीं आ पाते हैं। माता-पिता अपने बच्चों के अपराधों पर पर्दा डालते रहते हैं। अपने बच्चों के आपराधिक कारनामों को छिपाने के लिए माता-पिता जितनी ऊर्जा खर्च करते हैं, यदि उससे आधी ऊर्जा भी बच्चों की गतिविधियों पर ध्यान देने में लगाएं तो बच्चों के अच्छे संस्कार खोने नहीं पाएंगे। बच्चों का दिमाग़ तो कोरी स्लेट के समान होता है, उसमें यदि आपराधिक प्रवृत्तियां लिख दी जाएं तो वहीं जीवन भर लिखी रहेंगी। आज बच्चे अगर अपने माता-पिता या मेहमानों को पलट कर जवाब देते हैं या बेअदबी से पेश आते हैं तो इसमें दोष बच्चों का नहीं, उन माता-पिता का है जिन्होंने हंस कर बढ़ावा दिया और अपराधी बनने की पहली सीढ़ी यानी ढिठाई पर चढ़ा दिया। आज 80 प्रतिशत बच्चे स्कूली शिक्षा पूरी करते ही कैरियर वाली पढ़ाई के चक्कर में अपने घर से दूर पराये शहरों में चले जाते हैं। इसके बाद उनकी हमेशा के लिए अपनी घर वापसी बहुत कम हो पाती है। जो लौटते भी हैं वे फ्रस्टेशन से ग्रस्त रहते हैं। यह फ्रस्टेशन भी उन्हें उसी वातावरण से मिलता है जो हमने आर्थिक दबाव के रूप में रच दिया है। कमाऊ युवाओं के उदाहरणों से घिरे बेरोजगार युवा पारिवारिक दबाव में आ कर गलत कदम उठाने लगते हैं। या तो वे आत्मघाती हो उठते हैं या फिर अपराधी बन जाते हैं।
हर साल बालदिवस का उत्सव मनाना आसान है लेकिन अपने गिरेबान में झांकना कठिन है,ं जहां हम स्वयं को कटघरे में खड़ा पाते हैं। यदि हम अपने बच्चों को अच्छा स्वास्थ्य नहीं दे सकते, अच्छी शिक्षा नहीं दे सकते, अच्छे संस्कार नहीं दे सकते, समुचित सुरक्षा नहीं दे सकते हैं, तो क्या हम दावा कर सकते हैं कि हम अपने बच्चों को अच्छा भविष्य दे रहे हैं? गरीबी, बेरोजगारी, मंहगाई, भ्रष्टाचार, प्रदूषण और अपराध के दलदल का उपहार देते हुए बच्चों को कैसे कहें ‘हैप्पी बालदिवस’? हमारे ये उपहार बच्चों को न तो अच्छा वर्तमान दे सकते हैं और न अच्छा भविष्य।
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( सागर दिनकर, 14.11.2018)
#शरदसिंह #सागरदिनकर #दैनिक 

Tuesday, November 13, 2018

एक दिल तोड़ने वाली यात्रा ... - डॉ शरद सिंह

A Heartbreaking Journey - Dr Sharad Singh

 एक दिल तोड़ने वाली यात्रा ... पन्ना (मध्य प्रदेश) की मेरी संक्षिप्त यात्रा ... किसी तरह से समय निकाल कर उस हिरणबाग कॉलोनी में पहुंची जहां मैं पैदा हुई, जहां मेरा बचपन बीता और जहां मैंने ज़िन्दगी को समझना शुरू किया। हिरणबाग का वह कैम्पस तो है लेकिन उसमें इतना दुखद परिवर्तन हो चुका है कि मैं देख कर अवाक् रह गई। एक पॉश कॉलोनी का कैसे सत्यानाश हो सकता है, यह देख कर मैं रो पड़ी... मेरे वह प्यारे घर (जो पी डब्ल्यू डी का सरकारी आवास था) का नक्शा ही बदल चुका है। अब लगता ही नहीं कि वहां कभी सुंदर और व्यवस्थित क्वार्टर्स रहे होंगे। वह विशाल कुआ जिसके पास हम बच्चों को जाने की मनाही थी, अवहेलना का दंश सहते हुए जर्जर हो चुका है ... आंसू आ गए यह सब देख कर... हां, पन्ना शहर ने कांक्रीट की सड़कों और घरों के रूप में विस्तार अवश्य कर लिया है किन्तु वह अपने अतीत की संपदा को खोता जा रहा है... अफ़सोस ....
 
Ruined Birth Place of Dr (Miss) Sharad Singh, Hiranbag, Panna (Madhya Pradesh)
Ruined Birth Place of Dr (Miss) Sharad Singh, Hiranbag, Panna (Madhya Pradesh)
Campus of Hiranbag, Panna (Madhya Pradesh)
Campus of Hiranbag, Panna (Madhya Pradesh)
Old Deep Well, Campus of Hiranbag, Panna (Madhya Pradesh)


Wednesday, November 7, 2018

आइये ! मिल कर मनाएं सार्थक दीपावली ! - डॉ (सुश्री) शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
लेख
आइये ! मिल कर मनाएं सार्थक दीपावली !
   - डॉ (सुश्री) शरद सिंह

भारतीय संस्कृति उत्सव प्रधान है। उत्सवों में भी दीपावली का विशेष महत्व है। इस पर्व को अनादिकाल से परम्परागत उत्साह के साथ हम सभी मनाते आये हैं। मगर बदलते सामाजिक परिवेश में इस पर्व को सार्थकता प्रदान करना आज जरुरी हो गया है। आज अनेक परिवार ऐसे हैं जिनके पास दीपावली का उत्सव मनाने के लिए पर्याप्त धन नहीं होता है। ऐसे परिवार में बच्चों के लिए पटाखे-फुलझड़ी तो क्या, मिठाई के चार टुकड़े खरीदना भी कठिन होता है। वे लोग जो विभिन्न कारणों से बेघर हो चुके हैं या अनाथलयों में हैं, अथवा वे लोग जो अपने परिवार से दूर वृद्धाश्रमों में अपना जीवन व्यतीत कर रहे हैं, इन सबका भी तो सब के साथ मिल कर खुशियां मनाने का मन करता है। ज़रा सोचिए, कितना अच्छा हो कि हम किसी ऐसे बच्चे के हाथ में फुलझड़ी का एक डिब्बा थमा दें जो दूर कोने में खड़ा हो कर सूनी, निराश आंखों से टुकुर-टुकुर देख रहा हो दूसरे बच्चों को फुलझड़ी जलाते हुए। कितना अच्छा हो कि हम अनाथालय पहुंच कर कम से कम एक दिन के लिए उन मासूम अनाथ बच्चों के परिवार की कमी पूरी कर दें जो परिवार के सुख से वंचित हैं। उनके पास जाएं और उनके साथ मनाएं दीपावली । कितना अच्छा हो कि हम किसी वृद्धाश्रम में जाएं और बन जाएं उनका परिवार। कितना अच्छा हो कि आने वाली कड़कड़ाती ठंड के लिए किसी ज़रूरतमंद को कंबल और गरम कपड़े दे दें। कितना अच्छा हो....जी हां, अच्छाई की सूची बहुत लंबी हो सकती है बस, दिल में तमन्ना हो कुछ अच्छा करने की, कुछ सार्थक करने की। 
      हम अकसर दीप पर्व दीपावली अपने घर-परिवार तक सीमित होकर मनाते हैं। जबकि होना यह चाहिए कि अपने आसपास, अपने मोहल्ले, अपने शहर में यदि एक भी अभावग्रस्त परिवार है तो उसकी खुशियों का भी ध्यान रखा जाये... और यह भी तो हमारा कर्त्तव्य है। अपने लिये दीपक, मिठाई, पटाखे और वस्त्र खरीद कर लाते हैं तो एक अभावग्रस्त परिवार के लिये भी यही नया सामान अपनी सामर्थ्य के अनुरूप लाएं और उन्हें दे कर उनके चेहरों पर मुस्कान लाएं और स्वयं की खुशियों को भी दोगुना कर लें। कहते हैं न कि खुशियां बांटने से बढ़ती हैं। किसी व्यक्ति को मुट्ठीभर खुशी देने से बढ़ कर और कोई खुशी नहीं होती।
दरअसल, किसी ज़रूरतमंद को कुछ देने का आनंद, दीपक और बल्बों की रोशनी से जगमगाते प्रकाश पर्व के आनंद को एक अनूठे आत्मिक आनंद से भी प्रकाशित कर देता है। अपने घर के साथ कम से कम एक ऐसे घर को भी दीपक, मिठाई, नए कपड़ों का उपहार दे कर रोशन करें जिस घर में बच्चों को फुलझड़ी के लिए तरसना पड़ता हो। यही तो है सार्थक दीपावली। संस्कारों के सबसे जीवंत संवाहक होते हैं बच्चे। सार्थक दीपावली का संस्कार यदि बच्चों को दिया जाए तो वे इसे पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे ले जाएंगे और तब किसी भी घर में दीपावली की रात को अंधेरा नहीं रहेगा। इसीलिए जब किसी आश्रम, किसी अनाथालय, किसी  परिवार अथवा किसी व्यक्ति को हम दीपावली का उपहार दें तो उस समय अपने बच्चों को भी एस अवसर पर सहभागी बनाएं। ऐसे संवेदनशील पल में बच्चों से ये उत्साह भरी पंक्तियां कह सकते हैं-   
So let's celebrate joy of giving
Make our life
Happy and cheering !
मानव समाज एक परिवार है, इस पुनीत भावना से दीपावली को सार्थकता प्रदान करें। इससे सामाजिक समरसता को नई चेतना मिलेगी। तो आइए ठान लें कि -
वंचित न खुशियों से  कोई रहेगा।
अभावों को कोई भी अब न सहेगा।
हर इक घर में दीपक जलाएंगे हम,
सार्थक दीपावली यूं मनाएंगे हम।
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Tuesday, November 6, 2018

चर्चा प्लस … लोकतंत्र की रोशनी के लिए एक दीपक वोट का - डॉ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
चर्चा प्लस …
लोकतंत्र की रोशनी के लिए एक दीपक वोट का
 - डॉ. शरद सिंह
        दीपावली और जगमगाते दीपकों का परस्पर सीधा संबंध हैं। दीपकों की रोशनी के बिना दीपावली की कल्पना ही नहीं की जा सकती है। ठीक इसी तरह जनमत की लोकतांत्रिक प्रक्रिया मतदान के बिना लोकतंत्र की कल्पना संभव नहीं है। जिस प्रकार दीपक की रोशनी अंधेरे को दूर कर के ज्ञात-अज्ञात भय से मुक्ति दिलाती है, ठीक उसी प्रकार एक वोट राजनीतिक विषमताओं एवं नीतिगत समस्याओं से छुटकारा दिला सकता है। अपने मताधिकार का प्रयोग करके प्रत्येक नागरिक अपनी इच्छानुसार उम्मीदवार को चुन सकता है और देश की राजनीतिक स्वरूप का निर्णायक बन सकता है। यही तो है लोकतंत्र की शक्ति और मतदाता जागरूकता, दीपक की तरह जगमगाती हुई।   
Charcha Plus a column of Dr (Miss) Sharad Singh in Sagar Dinkar, Daily, Sagar M.P.
 दी
पावली और राजनीति का का संबंध प्रत्यक्षतरूप में भले ही न हो किन्तु प्रचलित कथा के अनुसार श्रीराम जब लंका विजय कर के अयोध्या लौटे तो अयोध्या की जनता ने विजयी श्रीराम के स्वागत के लिए समूची अयोध्या को दीपकों की रोशनी से जगमगा दिया था। उसी समय से दीपावली मनाए जाने की परम्परा आरम्भ हुई। दीपावली के पर्व को असत पर सत् के विजय यानी बुराई पर अच्छी की विजय पर खुशी मनाने का त्योहार माना जाता है। हम भारतवासियों ने राजनीति में लोकतंत्र को अपनाया और अपने मूल्यों और अधिकारों की रक्षा के लिए डटे रहने का संकल्प लिया। लोकतंत्र का मूल आधार है- चुनाव और मतदान। हम अपनी इच्छानुसार अपना राजनीतिक प्रतिनिधि चुन सकते हैं और यदि वह सही ढंग से काम न कर रहा हो तो अपने मताधिकार का प्रयोग कर के उसे बदल भी सकते हैं। इतिहास गवाह है कि अपने मताधिकार का प्रयोग कर के हमने इस तरह के बदलाव किए भी हैं। हमारे देश में राजनीति और लोकतंत्र का गठबंधन बहुत पुराना है। रामराज्य में भी लोकतांत्रिक व्यवस्था को बनाए रखा गया था। उस समय भले ही राजतंत्र था किन्तु राजा जनता के विचारों के अनुरूपनिर्णय लेता था। भले ही वह लोकतंत्र का एक आदर्श स्वरूप नहीं था फिर भी आमजनता के विचारों का मान रखा जाना अपने आप में लोकतंत्र का एक विशिष्ट रूप सामने रखता है। दुनिया में आज भी ऐसे अनेक देश हैं जहां आमजनता को खुल कर अपने विचार रखने का भी अधिकार नहीं है। यह हमारे लिए गर्व का विषय है कि भारत दुनिया में एकमात्र राष्ट्र हैं जिसने हर वयस्क नागरिक को स्वतंत्रता पहले दिन से ही मतदान का अधिकार दिया है। उल्लेखनीय है कि अमेरिका जो दुनिया का दूसरा सबसे बड़े लोकतंत्र है, उसने भी स्वतंत्रता के लगभग 150 से वर्षों बाद इस अधिकार को अपने नागरिकों को दिया था। ‘लोकतंत्र’ बड़ा लुभावना शब्द है। इसकी ललक उन लोगों से पूछा जाना चाहिए जो तानाशाही की चक्की में पिसते रहते हैं। दुनिया के जिस भी देश में तानाशाही है वहां आमजनता का सबसे पहला स्वप्न होता है लोकतंत्र। भला अपने अधिकार कौन नहीं चाहता है? हर व्यक्ति अपने अधिकारों का प्रयोग करते हुए अपना जीवन अपने ढंग से जीना चाहता है। इसीलिए जब आमजनता को लोकतंत्र नामक अधिकार मिल जाए जो कि उसके सभी अधिकारों का मूल है तो आमजनता का दायित्व बढ़ जाता है। यह एक बहुत संवेदनशील मुद्दा है। अधिकार मिलना और उस अधिकार की रक्षा तभी संभव है जबकि अधिकारों का सदुपयोग किया जाए। सन् 2018 का नवंबर माह में होने वाले चुनाव के जरिए लोकतंत्र अपने अधिकारियों अर्थात् मतदाताओं से यही अपेक्षा कर रहा है कि प्रत्येक मताधिकार प्राप्त व्यक्ति, वह चाहे किसी भी आयुवर्ग का हो, किसी भी धर्म, जाति, लिंग का हो, किसी भी शारीरिक अवस्था का हो, उसे मतदान अवश्य करना चाहिए।   

हम भारतीय सौभाग्यशाली हैं कि हमारे देश के इतिहास के कुछ काले कालखण्ड छोड़ दिए जाएं तो यहां लोकतंत्र की राजनीतिक परंपरा प्राचीनकाल से चली आ रही है। भारत में लोकतंत्रात्मक शासन प्रणाली का आरंभ पूर्व वैदिक काल से ही हो गया था। प्राचीनकाल में भारत में सुदृढ़ लोकतांत्रिक व्यवस्था विद्यमान थी। इसके साक्ष्य हमें प्राचीन साहित्य, सिक्कों और अभिलेखों से प्राप्त होते हैं। विदेशी यात्रियों एवं विद्वानों के वर्णन में भी इस बात के प्रमाण हैं। वर्तमान संसद की तरह ही प्राचीन समय में परिषदों का निर्माण किया गया था, जो वर्तमान संसदीय प्रणाली से मिलती-जुलती थी। गणराज्य या संघ की नीतियों का संचालन इन्हीं परिषदों द्वारा होता था। इसके सदस्यों की संख्या विशाल थी। उस समय के सबसे प्रसिद्ध गणराज्य लिच्छवि की केंद्रीय परिषद में 7,707 सदस्य थे वहीं यौधेय की केंद्रीय परिषद के 5,000 सदस्य थे। वर्तमान संसदीय सत्र की तरह ही परिषदों के अधिवेशन नियमित रूप से होते थे। प्राचीन गणतांत्रिक व्यवस्था में आजकल की तरह ही शासक एवं शासन के अन्य पदाधिकारियों के लिए निर्वाचन प्रणाली थी। यह एक विशेषता थी कि राजतंत्र और लोकतंत्र एक साथ विद्यमान था। योग्यता एवं गुणों के आधार पर इनके चुनाव की प्रक्रिया आज के दौर से थोड़ी भिन्न जरूर थी। सभी नागरिकों को वोट देने का अधिकार नहीं था। किन्तु आज प्रत्येक भारतीय नागरिक को मताधिकार प्राप्त है। मतदान, वह भी बिना किसी दबाव के। भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है। यह संविधान विश्व का सबसे लंबा लिखित संविधान है।
देखा जाए तो ’लोकतंत्र’ राजनीति की महत्वपूर्ण अवधारणा है, जो अपनी बहुआयामी अर्थों के कारण समाज और मनुष्य के जीवन के बहुत से सिद्धांतों को प्रभावित करता है। ’लोकतंत्र’ शब्द का अंग्रेजी पर्याय ’डेमोक्रेसी’ है जिसकी उत्पत्ति ग्रीक मूल शब्द ’डेमोस’ से हुई है। डेमोस का अर्थ होता है- ’जन साधारण’ और इस शब्द में ’क्रेसी’ शब्द जोड़ा गया है जिसका अर्थ ’शासन’ होता है। बाबा साहब डॉ. अम्बेडकर ने लोकतंत्र की विशेषताओं की व्याख्या करते हुए उसे शासन से भी आगे जीवनपद्धति ठहराते हुए कहा था कि ’लोकतंत्र का अर्थ है, एक ऐसी जीवन पद्धति जिसमें स्वतंत्रता, समता और बंधुता समाज-जीवन के मूल सिद्धांत होते हैं।’
जब कोई राजनीतिक विचार जीवनपद्धति की तरह अपना लिया जाए तो उस जीवनपद्धति को दोषमुक्त रखना भी प्रत्येक नागरिक का कर्त्त्ाव्य हो जाता है। सही उम्मीदवार का चयन, उचित विचारधारा का चयन और एक स्वस्थ और जनहित वाली सरकार बनाना भी नागरिक कर्त्तव्य बन जाता है। आज लोकतंत्र को चोट पहुंचाने वाले अपराध बढ़ रहे हैं। लोकतंत्र में जनता के प्रति चाहे वह अपराधी ही क्यों न हो, नरमी बरती जाती है। मृत्युदंड दिए जाने का प्रावधान लगभग समाप्त कर दिया गया था किन्तु अफ़सोस की बात है कि एक बलात्कारमय हत्या के प्रकरण से मृत्युदंड के प्रावधान को पुनजाग्रत करना पड़ा था। सन् 1978 का ‘रंगा-बिल्ला केस’। भारतीय नौ सेना के कैप्टन मदन मोहन चोपड़ा की 17 वर्षीया बेटी गीता चोपड़ा जो कॉलेज की सेकेंड ईयर की छात्रा थी और बेटा संजय चोपड़ा जो दसवीं का छात्र था, 26 अगस्त 1978 को रंगा और बिल्ला नामक दो अपराधी युवकों की दरिंदगी के शिकार हो गए। चोरी की कार में सवार इन दोनों अपराधियों ने गीता के साथ बलात्कार किया और उसके नन्हें भाई के द्वारा अपनी बहन को बचाने का प्रयास करने पर भाई-बहन दोनों को मोत के घाट उतार दिया था। अपराधियों के पकड़े जाने पर दिल्ली के एडिशनल सेसन जज ने फांसी की सजा सुनाई। दुखद है कि इस सजा के विरुद्ध अपील की गई। किन्तु दिल्ली हाई कोर्ट ने उसे 1979 में नामंजूर कर दिया। केस को एक झटका फिर लगा जब ख्यातिप्राप्त वकील आर.के. गर्ग ने रंगा और बिल्ला की वकालत की। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ये पेशेवर हत्यारे हैं और इनके प्रति दया नहीं दिखाई जा सकती। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश वाई.वी. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाले तीन सदस्यीय खंडपीठ ने फांसी की सजा को बहाल रखा। कुलदीप सिंह उर्फ रंगा और जसवीर सिंह उर्फ बिल्ला को 1982 में फांसी पर लटका दिया गया था। स्मरण रहे कि सन् 1978 में भारतीय बाल कल्याण परिषद ने 16 से कम आयु के बच्चों के लिए दो वीरता पुरस्कार संजय चोपड़ा पुरस्कार और गीता चोपड़ा पुरस्कार की घोषणा की जिन्हें राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार के साथ हर साल दिया जाता है। अपराध और अपराधी लोकतंत्र को कठोर होने को विवश करते हैं अतः लोकतंत्र पर घिरते अपराध के अंधकार को दूर करने के लिए एक वोट रूपी दीपक का प्रयोग करते हुए हमें अपने मज़बूत लोकतांत्रिक इरादों को स्थापित करना ही चाहिए। ताकि अपराधों पर अंकुश लग सके और लोकतंत्र को कठोर बनने के लिए मजबूर न होना पड़े। यूं भी दीपावली और जगमगाते दीपकों का परस्पर सीधा संबंध हैं। दीपकों की रोशनी के बिना दीपावली की कल्पना ही नहीं की जा सकती है। ठीक इसी तरह जनमत की लोकतांत्रिक प्रक्रिया मतदान के बिना लोकतंत्र की कल्पना संभव नहीं है। जिस प्रकार दीपक की रोशनी अंधेरे को दूर कर के ज्ञात-अज्ञात भय से मुक्ति दिलाती है, ठीक उसी प्रकार एक वोट राजनीतिक विषमताओं एवं नीतिगत समस्याओं से छुटकारा दिला सकता है। अपने मताधिकार का प्रयोग करके प्रत्येक नागरिक अपनी इच्छानुसार उम्मीदवार को चुन सकता है और देश की राजनीतिक स्वरूप का निर्णायक बन सकता है। यही तो है लोकतंत्र की शक्ति और मतदाता जागरूकता, दीपक की तरह जगमगाती हुई।
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( सागर दिनकर, 06.11.2018)
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Monday, November 5, 2018

धनतेरस की हार्दिक शुभकामनाएं - डॉ शरद सिंह

Happy Dhanteras - Dr (Miss) Sharad Singh
प्रिय मित्रो, 
धनतेरस की हार्दिक शुभकामनाएं 🙏  
ईश्वर आपको एवं आपके परिवार को उत्तम स्वास्थ्य एवं धनसंपदा प्रदान करे 🙏🙏🙏

Saturday, November 3, 2018

केरल की हेण्ड पेंटेड सूती साड़ी हो तो मॉडलिंग जरूरी है ... डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

Dr Sharad Singh in Kerala Cotton Saree with hand painted work with Buddha design, 31.10.2018
प्रिय मित्रो, केरल की हेण्ड पेंटेड सूती साड़ी पहनी हो तो मॉडलिंग करनी तो बनती है...😊 है न !!! 🌷
वैसे, हेण्ड पेंटेड साड़ियां मुझे बहुत पसंद हैं...
Dear Friends,
  I participated in Voter Awareness Programme and that time I wore this Kerala Cotton saree with hand paint work of Buddha design.
Dr Sharad Singh in Kerala Cotton Saree with hand painted work with Buddha design, 31.10.2018
Dr Sharad Singh in Kerala Cotton Saree with hand painted work with Buddha design, 31.10.2018
Dr Sharad Singh in Kerala Cotton Saree with hand painted work with Buddha design, 31.10.2018
Dr Sharad Singh in Kerala Cotton Saree with hand painted work with Buddha design, 31.10.2018
Dr Sharad Singh in Kerala Cotton Saree with hand painted work with Buddha design, 31.10.2018
Dr Sharad Singh in Kerala Cotton Saree with hand painted work with Buddha design, 31.10.2018
Dr Sharad Singh in Kerala Cotton Saree with hand painted work with Buddha design, 31.10.2018
Dr Sharad Singh in Kerala Cotton Saree with hand painted work with Buddha design, 31.10.2018
Dr Sharad Singh in Kerala Cotton Saree with hand painted work with Buddha design, 31.10.2018
Dr Sharad Singh in Kerala Cotton Saree with hand painted work with Buddha design, 31.10.2018
Dr Sharad Singh in Kerala Cotton Saree with hand painted work with Buddha design, 31.10.2018