Wednesday, June 5, 2019
Monday, June 3, 2019
बुंदेलखंड के पारंपरिक व्यंजन घर से बेघर पर ‘फूडजोन’ में आबाद - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
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| Dr (Miss) Sharad Singh, Author |
नवभारत में प्रकाशित मेरा लेख "बुंदेलखंड के पारंपरिक व्यंजन घर से बेघर पर ‘फूडजोन’ में आबाद" प्रकाशित हुआ है, इसे आप भी पढ़ें.... हार्दिक धन्यवाद नवभारत !!!
बुंदेलखंड के पारंपरिक व्यंजन घर से बेघर पर ‘फूडजोन’ में आबाद
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
पिछले दिनों पहले भोपाल उसके बाद झांसी के एक मॉल के ‘फूडजोन’ में यह देख कर सुखद आश्चर्य हुआ कि वहां पारंपरिक बुंदेली व्यंजनों का भी एक ‘कॉर्नर’ है। संयोगवश उन्हीं दिनों ‘लिविंग फूड चैनल’ के प्रसिद्ध टीवी शो ‘नॉदर्न फ्लेवर’ में बुंदेली शादियों में बनाए जाने वाले पारंपरिक व्यजनों पर एक कार्यक्रम देखा जिसमें ‘सिंदोरा-सिंदोरी’ जैसे व्यंजन बनाने की विधि बताई गई थी। इन सबको देख कर मुझे वो दिन याद आ गए जब बचपन में मैं बिरचुन यानी सूखे बेर का चूरा खाती हुई इंद्रजाल कॉमिक्स पढ़ा करती थी और मेरी मां खाना बनाने वाली ‘बऊ’ के साथ मिलकर छुट्टी के दिन खुरमा-पपड़ियां बनाया करती थीं। महीनों तक रखे जा सकने वाले खुरमा-पपड़िया को हम बच्चों से बचा कर रखने के लिए ढेर सारे जतन करने पड़ते थे मां को। उन दिनों लपटा और लप्सी भी हमारी जबान पर चढ़ा हुआ था। चीले की फरमाईश तो आए दिन होती थी। पारंपरिक व्यंजनों का यह शौक मुझे अपनी मां से विरासत में मिला। लेकिन अब इस व्यस्त ज़िन्दगी में ऐसे बहुत कम अवसर आते हैं जब घर में कोई विशेष पारंपरिक व्यंजन बन पाता हो। रिश्तेदारों एवं परिचितों के बच्चे तो पिज्जा, बर्गर, नूडल्स और चाउमिन पर फ़िदा रहते हैं। रहा शादी-विवाह के समारोहों का सवाल तो वहां भी बुंदेली छोड़ कर विभिन्न प्रांतों के व्यंजनों के स्टॉल लगे होते हैं, गोया बुंदेली व्यंजन रोज घरों पर बन रहे हों। यही कारण है कि बुंदेलखण्ड के पारंपरिक व्यंजन घर से बेघर होते जा रहे हैं।
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| बुंदेलखंड के पारंपरिक व्यंजन घर से बेघर पर ‘फूडजोन’ में आबाद - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह Navbharat - Bundelkhand Ke Paramparik Vyanjan Ghar Se Beghar Pr FooZone Me Aabad - Dr Sharad Singh, |
ऐसा नहीं है कि
बुंदेलखंड के पारंपरिक व्यंजनों का कोई मौसमी नियम ही न हो। किस मौसम में
क्या खाया जाना चाहिए, इसका निर्देश में मिलता है। जैसे -
चैते गुड, वैसाखे तेल, जेठे पंथ, अषाढ़े बेल
साउन साग, भादौं दही, क्वांर करेला, कातिक मही;
अगहन जीरा, पूसै धना, माघै मिसरी, फागुन चना
जो यह बारह देई बचाय, ता घर वैद कभऊं नइं जाए।।
अर्थात चैत्र मास में गुड़ का सेवन करना अहितकर है, क्योंकि नया गुड़ कफकारी होता है। वैशाख में गर्मी की प्रखरता रहती है, तेल की प्रकृति गर्म होती है इसलिए हानिकारक है। ज्येष्ठ मास में गर्मी की भीषणता रहती है अतः हल्का, सुपाच्य भोजन लेना चाहिए। आषाढ मास में बेल का सेवन नहीं करना चाहिए। और भाद्रपद में दही पित्त को कुपित करता है। आश्विन में करेला पककर पित्तकारक हो जाता है, अतएव हानिकर सिद्ध होता है। कार्तिक मास, जो कि वर्षा और शीत ऋतु का संधिस्थल है, उसमें पित्त का कोप और कफ का संचय होता है और मही यानी मट्ठे से शरीर में कफ बढता है, इसलिए त्याज्य है. अगहन में सर्दी अधिक होती है, जीरा की तासीर भी शीतकारक है, इसलिए इससे बचना चाहिए। पौष मास में धनिया, माघ में मिसरी और फाल्गुन में चना खाना उचित नहीं होता है। इनको ध्यान में रखकर जो मनुष्य खान-पान में सावधानी रखते हैं, वे सदैव निरोग रहते हैं, उनको कभी डाक्टर-वैद्य की आवश्यकता नहीं पडती।
चैते गुड, वैसाखे तेल, जेठे पंथ, अषाढ़े बेल
साउन साग, भादौं दही, क्वांर करेला, कातिक मही;
अगहन जीरा, पूसै धना, माघै मिसरी, फागुन चना
जो यह बारह देई बचाय, ता घर वैद कभऊं नइं जाए।।
अर्थात चैत्र मास में गुड़ का सेवन करना अहितकर है, क्योंकि नया गुड़ कफकारी होता है। वैशाख में गर्मी की प्रखरता रहती है, तेल की प्रकृति गर्म होती है इसलिए हानिकारक है। ज्येष्ठ मास में गर्मी की भीषणता रहती है अतः हल्का, सुपाच्य भोजन लेना चाहिए। आषाढ मास में बेल का सेवन नहीं करना चाहिए। और भाद्रपद में दही पित्त को कुपित करता है। आश्विन में करेला पककर पित्तकारक हो जाता है, अतएव हानिकर सिद्ध होता है। कार्तिक मास, जो कि वर्षा और शीत ऋतु का संधिस्थल है, उसमें पित्त का कोप और कफ का संचय होता है और मही यानी मट्ठे से शरीर में कफ बढता है, इसलिए त्याज्य है. अगहन में सर्दी अधिक होती है, जीरा की तासीर भी शीतकारक है, इसलिए इससे बचना चाहिए। पौष मास में धनिया, माघ में मिसरी और फाल्गुन में चना खाना उचित नहीं होता है। इनको ध्यान में रखकर जो मनुष्य खान-पान में सावधानी रखते हैं, वे सदैव निरोग रहते हैं, उनको कभी डाक्टर-वैद्य की आवश्यकता नहीं पडती।
रहा
पारंपरिक व्यंजनों का प्रश्न तो, पूड़ी के लड्डुओं का स्वाद वह कभी नहीं भूल
सकता है जिसने उन्हें अपने जीवन में एक भी बार खाया हो। ये त्यौहारों बनाए
जाते हैं। (चूंकि ‘थे’ लिखने में अंतस कचोटता है अतः मैं ‘है’ ही लिखूंगी)
बेसन की बड़ी एवं मोटी पूड़ियां तेल में सेंककर हाथों से बारीक मीड़ी जाती
है। फिर उन्हें चलनी से छानकर थोड़े से घी में भूना जाता है। उसके बाद शक्कर
या गुड़ डाल कर हाथों से बांधा जाता है। स्वाद बढ़ाने के लिए कालीमिर्च अथवा
इलायची भी डाल दी जाती है। इसी तरह है हिंगोरा। बिना मठे की बेसन की कढ़ी
जिसमें हींग का तड़का लगाया जाता है। आंवरिया भी इसी श्रेणी का एक व्यंजन
है। आंवरिया अर्थात् आंवले की कढ़ी। इसमें सूखे आंवलों की कलियों को तेल में
भूनकर सिल पर पीस लिया जाता है। फिर बेसन को पानी में घोलकर किसी बर्तन
में चूल्हे पर चढ़ा देते हैं और कढ़ी पक जाने पर, चूल्हे से उतारने के पहले
इसमें आंवलों का चूर्ण और नमक डाल देते हैं। इच्छानुसार इसमें लाल मिर्च,
जीरा, प्याज एवं लहसुन आदि भी पीस कर डाला जाता है।
फरा भी एक
पारंपरिक बुंदेली व्यंजन है। इसमें गेहूं के आटे को मांड़ कर छोटी-छोटी
पूड़िया बेल ली जाती हैं फिर इन्हें खौलते हुए पानी में सेंका जाता है।
बफौरी, मीड़ा, निघौना, रस खीर, बेसन के आलू, फरा, अद्रेनी, थोपा, पूड़ी के
लडडू, महेरी या महेई, करार, मांडे, एरसे या आंसे, लपटा, हिंगोरा, आंवरिया,
ठोमर, ठड़ूला, डुबरी, कचूमर, कुम्हड़े की खीर, गुना, खाकड़ा, लप्सी, रसाजें,
खींच, बिरचून, लुचई, गकरिआ, पपड़िया, टिक्कड़, बरी, बिजौरा, कचरिया,
खुरमा-खुरमी, बतियां आदि अनेक ऐसे व्यंजन हैं जो बुंदेली रसोई के अभिन्न
अंग हुआ करते थे किंतु अब ये इतालवी या चाइनीज़ फूड तले दबते जा रहे हैं।
जबकि इनमें से अनेक ऐसे व्यंजन हैं जो ‘फास्ट फूड’ की श्रेणी में रखे जा
सकते हैं।
यूं तो हमारे देश में व्यंजनों की संख्या का निर्धारण
आमतौर पर छप्पन प्रकार के व्यंजनों के रूप में किया जाता है, किंतु
बुंदेलखंड में सौ से भी अधिक प्रकार के व्यंजन बनाए जाते रहे हैं। दुख तो
तब होता है जब इन व्यंजनों में से कुछ को ‘स्ट्रीट फूड’ की श्रेणी में गिना
जाता है। जो बुंदेली रसोईघर के राजा-रानी हुआ करते थे वे आज ‘स्ट्रीट फूड’
के रूप में बिकते हैं। यही है बाज़ारवाद का चमत्कार जिसने पारंपरिक
व्यंजनों को घरों से बेघर कर के मॉल के आलीशान फूडजोन में पहुंचा दिया है
जहां इनमें से कुछ व्यंजनों का अस्तित्व तो बचा हुआ है लेकिन दस रुपए के
सामान को सौ रूपए में खरीद कर यह झूठा गुमान भी पालने का शगल आ गया है कि
हम अपने पारंपरिक व्यंजनों को लुप्त होने से बचा रहे हैं। यद्यपि बुंदेलखंड
में आयोजित किए जाने वाले बुंदेली उत्सव इव पारंपरिक व्यंजनों को पुनः चलन
में लाने में अपनी महती भूमिका निभा रहे हैं तथा साहित्यकार पारंपरिक
बुंदेली व्यंजनों को पुस्तकाकार सहेज भी रहे हैं किंतु ये तभी चलन में लौट
सकते हैं जब ये एक बार फिर हर घर की रसोई का हिस्सा बन जाएं।
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( नवभारत, 03.06.2019 )
#नवभारत #शरदसिंह #बुंदेलखंड #बुंदेलीव्यंजन #व्यंजन #Bundeli_Cuisine #Cuisine #Navbharat #SharadSingh #Bundelkhand #Traditional_cuisine
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( नवभारत, 03.06.2019 )
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चर्चा प्लस ... सूखती नदियां, बदरंग तालाब और हमारा जलसंरक्षण - डॉ. शरद सिंह
| Dr (Miss) Sharad Singh |
- डॉ. शरद सिंह
‘मन की बात’ के 19वें कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सूखे के संकट पर अपने विचार रखे थे और कहा था कि जल संकट से निपटने के लिए सामूहिक प्रयत्नों की जरूरत है। बेशक सामूहिक प्रयत्न से सब कुछ संभव है लेकिन जब नदियां सूखती हुईं और तालाब जलकुंभी या काई से बदरंग होते हुए दिखाई देते हैं तो यह सिद्ध होने लगता है कि हमने न तो अपने प्रधानमंत्री के मन की बात को स्मरण रखा और न अपनी इच्छाशक्ति को कायम रखा। इतना तो समझना ही चाहिए कि जलसंरक्षण के मात्र दिखावे से जल संरक्षित नहीं रहेगा।
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| चर्चा प्लस ... सूखती नदियां, बदरंग तालाब और हमारा जलसंरक्षण - डॉ. शरद सिंह Charcha Plus - Sukhati Nadiyan, Badarang Talab Aur Hamara Jal Sanrakshan - Charcha Plus Column by Dr Sharad Singh |
आज भारत ही नहीं, तीसरी दुनिया के अनेक देश सूखा और जल संकट की पीड़ा से त्रस्त हैं। भारत सहित अनेक विकासशील देशों के अनेक गांवों में आज भी पीने योग्य शुद्ध जल उपलब्ध नहीं है। आर्थिक विकास, औद्योगीकरण और जनसंख्या विस्फोट से जल का प्रदूषण और जल की खपत बढ़ने के कारण सब कुछ गड़बड़ा गया है। पर्यावरण की क्षति तथा जल प्रबंधन के प्रति लापरवाही के कारण देश के महाराष्ट्र, तेलंगाना और मध्यप्रदेश जैसे कई राज्य जल संकट की त्रासदी से गुज़र रहे हैं। उचित जल प्रबंधन न होने के कारण बारिश के जल को हम इस तरह नहीं सहेज पाए हैं कि वह आज हमारे काम आ पाता। हैण्डपंप, कुओं और बावड़ियों का रख-रखाव सही ढंग से न होने के कारण या तो वे सूख गई हैं या फिर उनका पानी इतना दूषित हो गया है कि हम उसे काम में ही नहीं ला पा रहे हैं।
वर्ष 2018 के लिए जल दिवस की थीम रखी गई है -‘नेचर फॉर वाटर’’ यानी ‘‘जल के लिए प्रकृति’’। यदि प्रकृति सुरक्षित रहेगी और प्राकृतिक तत्वों में संतुलन बना रहेगा तो जल भी बचा रहेगा। हमें याद रखना होगा कि दक्षिण अफ्रीका के केपटाउन शहर में आगामी अप्रैल माह से 4 लाख लोगों को नल बंद करने की योजना बना रहा है। और वह दिन होगा -‘जीरो डे’। मेरी पीढ़ी तक के वे लोग जिन्होंने हिन्दी माध्यम सरकारी स्कूलों में प्राथमिक शिक्षा पाई होगी उन्होंने ककहरा के अभ्यास में यह पाठ अवश्य पढ़ा होगा-‘घर चल, जल भर‘। हमें जल का महत्व हर कदम पर सिखाया और समझाया गया लेकिन मानो हमने अपने तमाम पाठ बहुत जल्दी भुला दिए। हमारी लापरवाहियों के कारण जल का संकट आज एक वैश्विक संकट का रूप लेता जा रहा है। इस संकट को महसूस करते ही संयुक्त राष्ट्र संघ ने जल संरक्षण की ओर सारी दुनिया का ध्यान आकृष्ट करने का निश्चय किया और वर्ष 1993 में संयुक्त राष्ट्र की सामान्य सभा के द्वारा प्रत्येक वर्ष 22 मार्च को विश्व जल संरक्षण दिवस मनाने का निर्णय लिया गया। जल का महत्व, आवश्यकता और संरक्षण के बारे में जागरुकता बढ़ाने के लिये इसे पहली बार वर्ष 1992 में ब्राजील के रियो डी जेनेरियो में “पर्यावरण और विकास पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन” की अनुसूची 21 में आधिकारिक रुप से जोड़ा गया था और वर्ष 1993 से इस उत्सव को मनाना शुरु किया। वर्ष 2017 के लिए थीम थी “अपशिष्ट जल प्रबंधन“। जिसे हम आत्मसात नहीं कर सके। सच तो यह है कि हमारी योजनाओं और उन योजनाओं के अमल होने में दो ध्रुवों जितनी दूरी होती है। केन्द्र, राज्य, निकाय आदि हर स्तर पर बड़ी-बड़ी बातें करते हुए हमने अपशिष्ट जल के प्रबंधन की योजनाओं पर हवाई मंथन किया। क्रियान्वयन के मामले में हमेशा की तरह फिसड्डी रहे। जबकि देश के लगभग हर शहर और हर गांव में पेयजल का संकट गहराता जा रहा है। किसान नहरों और बांधों से, यहां तक कि पेयजल की सप्लाई लाईनों को तोड़ कर, पंक्चर कर के पानी चुराने को विवश हैं। जो पानी पीने के लिए काम में लाया जाना चाहिए उससे खेत सिंचते हैं या फिर उसका अपव्यय कर के उसे नालियों में बहा दिया जाता है। यह सारी अव्यवस्थाएं और अपव्यय इसलिए है कि हम जल प्रबंधन की बातें करना भर जानते हैं, जल प्रबंधन करना नहीं।
हमारे पूर्वजों ने हमारे लिए जल के अनेक स्रोत कुओं, बावड़ियों और तालाबों के रूप में हमारे लिए छोड़े लेकिन हम इतने लापरवाह निकले कि उन्हें ढंग से सहेज भी नहीं पा रहे हैं। देश भर में हज़ारों कुए, तालाब और बावड़ियां सूख गईं सिर्फ़ हमारी लापरवाही के कारण। आज भी अनेक कुए ऐसे हैं जो तिल-तिल कर मर रहे हैं। उनका पानी प्रदूषित हो चुका है। हम उस पानी का प्रदूषण दूर कर उसे उपयोगी बना सकें इसके बदले मानो प्रतीक्षा करते हैं कि कब वह कुआ मर जाए और उस ज़मीन पर कोई रिहाइशी बिल्डिंग या शॅापिंग काम्प्लेक्स बना सकें। दुख की बात है कि हम अपनी भावी पीढी के लिए कितने और कैसे जलस्रोत छोड़ जाएंगे, यह भी नहीं सोच रहे हैं। मुझे आज के इस हालात पर राजा मिडास की कहानी याद आती है। यूनानी राजा मिडास को धन-संपत्ति की इतनी अधिक भूख थी कि उसने देवताओं से यह वरदान मांग लिया कि वह जो भी छुए वह सोने में बदल जाए। मिडास वरदान पा कर बेहद खुश हुआ। उसका महल, उसका बिस्तर, उसकी सारी वस्तुएं उसके छूते ही सोने की बन गईं। लेकिन जल्दी ही उसे परेशानियों का सामना करना पड़ा। क्यों कि उसका भोजन-पानी भी उसके छूते ही सोने में बदल गया। यहां तक कि जब उसने अपनी बेटी को दुआ तो वह भी सोने की गुड़िया में बदल गई। तब उसे अपनी गलती का अहसास हुआ और वह रो-रो कर देवताओं से माफी मांगने लगा। काल्पनिक कथाओं में देवता प्रसन्न हो कर माफ कर देते हैं लेकिन यदि हम जलस्रोतों को सुखा कर पर्यावरण से खिलवाड़ करते रहेंगे तो हम स्वयं को माफ करने के योग्य भी नहीं रहेंगे। आखिर प्रत्येक प्राणी के लिए जल का होना जरूरी है। पानी के बिना कोई भी प्राणी अधिक समय तक जीवित नहीं रह सकता है। अब तो इस बात की भी संभावना व्यक्त की जाने लगी है कि यदि तृतीय विश्वयुद्ध हुआ तो वह पानी के लिए ही होगा। दरअसल, पानी किसी भी प्राणधारी की बुनियादी आवयकता होती है।
अतिदोहन के कारण भूजल स्तर जो वर्ष 1984 में 9 मीटर था, अब 17 मीटर हो चुका है। वहीं वर्ष 1984 में भूजल के मात्र 17 प्रतिशत दोहन की तुलना में आज हम 138 प्रतिशत दोहन कर रहे हैं। यदि यही स्थिति रही तो वर्ष 2020 तक भूजल भंडार रीत जाएंगे। इस स्थिति को उचित भूजल प्रबंधन के द्वारा नियंत्रित किया जा सकता है। ये प्रबंधन घरेलू, कृषि, औद्योगिक और सामुदायिक स्तर पर किया जा सकता है। घरेलू क्षेत्र में वर्षा जल संचयन संरचना बनाकर, पेयजल के उचित प्रयोग एवं निष्कासित जल का अन्य कार्यों में प्रयोग कर, कृषि में बूंद बूंद सिंचाई, कम जल में होने वाली फसलें एवं उचित मात्रा में खाद और कीटनाशकों का प्रयोग कर, उद्योगों में जल को रिसाइकिल कर तथा भूजल पुनर्भरण संरचनाएं बनाकर एवं सामुदायिक स्तर पर जल संरक्षण के प्राचीन स्रोतों का जीर्णोद्धार कर इस गंभीर खतरे को टाला जा सकता है। इसके साथ ही कुछ आवश्यक कदम भी उठाने होंगे। जैसे- जल की शिक्षा अनिवार्य विषय के रूप में स्कूली पाठ्यक्रम में जोड़ी जाए, जल संवर्धन एवं संरक्षण कार्य को सामाजिक तथा धार्मिक संस्कारों से जोड़ा जाए, भूजल दोहन अनियंत्रित एवं असंतुलित ढंग से न हो, इसे सुनिश्चित किया जाए, तालाबों और अन्य जल संसाधनों पर समाज का सामूहिक अधिकार हो, जलस्रोतों को प्रदूषण से बचाने का हरसंभव प्रयास किया जाए तथा नदियों और नालों पर चौक डैम बना वर्षा जल को संग्रहीत किया जाए। इन सबके साथ जन संरक्षण एवं संवर्द्धन के लिए जन जागरूकता अभियान को नागरिक मुहिम के रूप में चलाया जाए, जिसमें प्रत्येक नागरिक की किसी न किसी स्तर पर सहभागिता हो। इससे नागरिकों में जन संरक्षण के प्रति अपने दायित्वों का बोध होगा तथा वे भविष्य के भयावह जल संकट के यथार्थ को भली-भांति समझ सकेंगे।
आज शहरी क्षेत्र और ग्रामीण क्षेत्र दोनों ही जलस्रोतों की कमी से जूझना रहे है। जो आर्थिक रूप से समर्थ होते हैं, वे टैंकरों से पानी प्राप्त कर लेते हैं। और अधिक समर्थ मिनरल वाटर की बोतलों से प्यास बुझाते हैं। यह कोई स्थायी विकल्प नहीं है। जब तक जलस्रोतों में पानी है तभ्ी तक टैंकर और मिनरल वाटर की बोतले हैं। इसके साथ ही उन लोगों की पीड़ा को भी समझना जरूरी है जिन्हें एक घड़ा या एक बाल्टी पानी के लिए लम्बी कतारों में खड़े रह कर घंटों प्रतीक्षा करनी पड़ती है या फिर जिन्हें पानी के लिए मीलों की दूरी तय करनी पड़ती है। समाचारपत्रों में आए दिन यह समाचार पढ़ने को मिल जाता है कि फलां जगह पानी भरने के लिए मार-पीट हुई। यह संघर्ष केवल पानी का संषर्घ नहीं बल्कि ज़िन्दा रहने का संषर्घ है। भला पानी के बिना कोई जीवित रह सकता है? आज जब इस संघर्ष की चिंगारियां भड़कने लगी हैं तो अब हमारा चेतना जरूरी है। यह स्वीकार करना ही होगा कि तसला या तगाड़ी हाथों में ले कर तस्वीर खिंचवाने अथवा साल में एक बार जलसंरक्षण का एक नाटक की भांति मंचन करने से जलसंकट हमारे भावी जीवन को पूरी तरह बदरंग कर देगा।
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(दैनिक ‘सागर दिनकर’, 30.05.2019) #शरदसिंह #सागरदिनकर #दैनिक #मेराकॉलम #Charcha_Plus #Sagar_Dinkar #Daily
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Friday, May 24, 2019
बुंदेलखंड की जैव विविधता पर गहराता संकट - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह - नवभारत में प्रकाशित
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| Dr (Miss) Sharad Singh |
समाचारपत्र नवभारत में प्रकाशित मेरा लेख "बुंदेलखंड की जैव विविधता पर गहराता संकट" प्रकाशित हुआ है, इसे आप भी पढ़ें....
हार्दिक धन्यवाद नवभारत !!!
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
वन, वन्यपशु और वनोपज का धनी बुंदेलखंड आज जैव
विविधता(बायोडायवर्सिटी) पर गहराते संकट के दौर से गुज़र रहा है। प्रत्येक
वर्ष 22 मई को अंतर्राष्ट्रीय जैव विविधता संरक्षण दिवस मनाए जाने के दौरान
समूचे विश्व में जैव विविधता के आकलन की एक स्वाभाविक प्रक्रिया होती है।
विगत वर्ष यह तथ्य सामने आया था कि भारत में 450 प्रजातियों को संकटग्रस्त
अथवा विलुप्त होने की कगार पर हैं। लगभग 150 स्तनधारी एवं 150 पक्षियों का
अस्तित्व खतरे में है, और कीटों की अनेक प्रजातियां विलुप्ति-सूची में दर्ज़
हो चुकी हैं। सन् 2018 में ही यह भयावह सत्यता भी सामने आई कि विगत 10
वर्ष में बुंदेलखंड का तापमान औसत से डेढ़ डिग्री सेल्सियस बढ़ चुका है जोकि
बुंदेलखंड की जैव विविधता के लिए संकट का सूचक है। वैसे यह तापमान अपने-आप
नहीं बढ़ा है, इसके लिए जिम्मेदार स्वयं बुंदेलखंड के निवासी हैं जो
प्रकृति को हानि पहुंचते देख कर भी मौन रहते आए हैं।
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| बुंदेलखंड की जैव विविधता पर गहराता संकट - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह - नवभारत में प्रकाशित Navbharat - Bundelkhand Ki Jaiv Vividhta Pr Gahrata Sankat - Dr Sharad Singh, |
बुंदेलखंड
में नदियों से रेत का बेतहाशा अवैध खनन जैव विविधता को चोट पहुंचाने का एक
सबसे बड़ा कारण है। कानून को धता बता कर मशीनों द्वारा जिस तरह रेत खनन किया
जाता है उससे बेतवा, केन और यमुना में रहने वाले जीव-जंतुओं की प्रजातियां
विलुप्ति की कगार पर पहुंच रही हैं। जबकि एनजीटी यानी नेशनल ग्रीन
ट्रिब्यूनल (राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण) की साफ गाईड लाइन है कि मशीनों से
खनन नहीं किया जाएगा। फिर भी इस गाईड लाईन की अवहेलना की जाती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि बुंदेलखंड में केन और बेतवा और यमुना बड़ी नदियों
में एक हैं और इनमें कुल 15 किस्म की मछलियों की 35 प्रजातियां पाई जाती
हैं। इनमें से कई प्रजातियां मिलना दूभर है लेकिन अवैध खनन से ये
प्रजातियां संकट में पड़ गई हैं। बड़ी मशीनों से रेत निकालने से सबसे अधिक
हानि जैव विविधता की होती है। इससे जलीय जीव-जंतु मारे जाते हैं। इनमें से
कई अब विलुप्त होते जा रहे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार अवैध खनन के कारण केन
नदी में मछलियों की 35 प्रजातियों में कई विलुप्त हो चुकी हैं। केन और
बेतवा में पाई जाने वाली निमेकाइलस, रीटी गोगरा, सिराइनस, रीबा आदि मछलियां
लुप्त प्राय हैं।
मेरा स्वयं का एक दिलचस्प अनुभव है। मेरी
कॉलोनी में एक भवन निर्माण के लिए डम्पर से रेत लाई गई। दूसरे दिन अचानक
मुझे अपने घर में एक विचित्र जीव दिखाई पड़ा जिसकी चाल और आकृति सर्प की
भांति थी किन्तु उसके चार पैर थे। ऐसा अजीब रेप्टाईल उससे पहले मैंने कभी
नहीं देखा था। मैंने हिम्मत कर के उसे घर से बाहर भगाने का प्रयास किया
किंतु ग़ज़ब का फुर्तीला वह जीव घर से निकलने का नाम नहीं ले रहा था। अंततः
मुझे भवन निर्माण स्थल में काम करने वाले मज़दूरों को बुलाना पड़ा। उन लोगों
ने उस जीव को देख कर मुझे बताया कि वह नदी की रेत में रहने वाला जीव है
जिसे बुंदेलखंड में ‘चौगोड़ा’ (उसके चार पैरों के कारण) कहते हैं। वह डम्पर
की रेत के साथ वहां आ पहुंचा था। चूंकि मेरा घर रेत के निकट था और घर में
लगे पेड़ पौधों की ठंडक से आकर्षित हो कर वह घर में आ छिपा था। उन मजदूरों
ने उसे पलक झपकते मार दिया। इससे मुझे बहुत दुख हुआ। मैं उसे मारना नहीं
चाहती थी। वह तो स्वयं विस्थापित था। हम मनुष्यों के द्वारा उसे अपने
प्राकृतिक आवास से अलग होना पड़ा था। वह इस प्रकार की मृत्यु का हकदार कतई
नहीं था। उसके मारे जाने से मुझे अहसास हुआ कि आए दिन न जाने कितने जलजीव
इसी तरह काल का ग्रास बन रहे हैं।
जितना संकट जलजीवों पर है उतना
ही वनों की अवैध कटाई के कारण वन्य जीवों पर संकट है। जनपद महोबा में 5.45
प्रतिशत वन क्षेत्र है और यहां तेंदुआ, भेड़िया, बाज विलुप्त होने की कगार
पर हैं। कहा जाता है कि वहां पहले काला हिरन भी पाया जाता था जो कि अब
दिखाई नहीं देता है। महोबा के निकट के वनों में पाई जाने वाली सफेद मूसली,
सतावर, ब्राम्ही, गुड़मार, हरसिंगार, पिपली आदि वन्य औषधियां भी विलुप्ति की
कगार में जा पहुंची हैं।
राष्ट्रीय वन नीति के अनुसार किसी भी
भू-भाग में 33 प्रतिशत वन क्षेत्र होना चाहिए किंतु बांदा जनपद में आज कुल
वन क्षेत्र 1.21 प्रतिशत ही बचा है। यहां विलुप्त होने वाले जीवां में चील,
गिद्ध, गौरेया व तेंदुआ है। वर्ष 2009 में दुर्लभ प्रजाति के काले हिरन की
संख्या जनपद बांदा में लगभग 59 थी। जनपद चित्रकूट में 21.8 प्रतिशत वन
क्षेत्र है। यहां का रानीपुर वन्य जीवन विहार 263.2283 वर्ग किमी के बीहड़ व
जंगली परिक्षेत्र में फैला है जिसे कैमूर वन्य जीव प्रभाग मिर्जापुर की
देखरेख में रखा गया है। इसीलिए वर्ष 2009 की गणना के अनुसार यहां काले व
अन्य हिरनों की कुल संख्या 1409 थी। संरक्षित क्षेत्र होने के कारण यहां
पाई जाने वाली अतिमहत्वपूर्ण वन औषधियां गुलमार, मरोड़फली, कोरैया, मुसली,
वन प्याज, सालम पंजा, अर्जुन, हर्रा, बहेड़ा, आंवला और निर्गुड़ी भी अभी
सुरक्षित हैं।
जनपद हमीरपुर में कुल 3.6 प्रतिशत ही वन क्षेत्र
शेष हैं यहां भालू, चिंकारा, चीतल, तेंदुआ, बाज, भेड़िया, गिद्ध जैसे वन्य
जीव आज शिकारियों के कारण विलुप्त होने की कगार पर हैं। दुर्लभ प्रजाति का
काला हिरन यहां के मौदहा कस्बे के कुनेहटा के जंगलों में ही पाया जाता है।
इनकी संख्या अत्यंत सीमित है। जनपद जालौन में 5.6 प्रतिशत वन क्षेत्र है और
यहां पर काले हिरन अब नज़र नहीं आते हैं। झांसी जनपद की भी लगभग यही स्थिति
है कि शहर फैल रहे हैं और वनक्षेत्र सिकुड़ रहे हैं।
वन, वनोपज और
वन्यजीवों की दृष्टि से पन्ना नेशनल पार्क के वनक्षेत्र की दशा संतोषजनक
है। यहां संरक्षित वातावरण में जैव विविधता बनी हुई है। इसी प्रकार सागर
जिले के नौरादेही अभ्यारण्य में वनक्षेत्र सुरक्षित है। जहां संरक्षित
क्षेत्र हैं वहीं जैव विवधिता अभी शेष है। किंतु क्या वनों और जैवविविधता
की रक्षा करना सिर्फ कानून और दण्ड का दायित्व है? आम नागरिकों का भी तो यह
दायित्व बनता है कि वे कम से कम उस जैव विविधता को बचाए रखने के लिए सजग
रहें जो पृथ्वी पर मानव जीवन के भविष्य के लिए जरूरी है। मानवीय
लापरवाहियों एवं अवैध कार्यों के कारण गिरते हुए जलस्तर, बढ़ते हुए तापमान,
घटते हुए वन के साथ दुर्लभ प्रजाति के वन जीवों का विलुप्त होना और पहाड़ों
के खनन से उनका विस्थापन जैव विविधता के लिए संकट सूचक है।
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( नवभारत, 24.05.2019 )
Wednesday, May 22, 2019
छोटे क़दम, बड़ी मंज़िल - - डॉ. शरद सिंह, दैनिक जागरण 'सप्तरंग' परिशिष्ट में प्रकाशित
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| Dr (Miss) Sharad Singh, Author |
दैनिक जागरण (सभी संस्करण) 21.05.2019 के 'सप्तरंग' परिशिष्ट में प्रकाशित मेरा लेख ‘छोटे क़दम, बड़ी मंज़िल’ ...
💗 हार्दिक धन्यवाद दैनिक-जागरण 🙏
इस लिंक पर जा कर आप मेरा लेख पढ़ सकते हैं..
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| छोटे क़दम, बड़ी मंज़िल - - डॉ. शरद सिंह, दैनिक जागरण 'सप्तरंग' परिशिष्ट में प्रकाशित |
छोटे क़दम बड़ी मंज़िल
हर व्यक्ति, हर प्रयास का अपना महत्व होता है। कोई भी छोटा या बड़ा नहीं होता है। महत्व परिणाम का होता है। यदि परिणाम कल्याणकारी है तो छोटी से छोटी वस्तु भी बड़ा महत्व रखती है। ठीक यही बात लागू होती है सफलता पर। आज के उपभोक्तावादी समय में हर व्यक्ति जल्दी से जल्दी सफलता की सीढ़ियां चढ़ जाना चाहता है। उसे लगता है कि यदि उसने रात में जिस सफलता को पाने की इच्छा की है वह उसे सुबह आंख खोलते ही मिल जानी चाहिए। इस हड़बड़ी में व्यक्ति से अनेक गड़बड़ियां हो जाती हैं। जैसे उसे उचित-अनुचित का ध्यान नहीं रहता है। वह शार्टकट अपना कर जल्दी सफलता पा लेने को उद्यत हो उठता है। शार्टकट और जल्दबाजी दोनों का एक ही हश्र होता है। इनके द्वारा प्राप्त सफलता स्थाई नहीं होती है। जैसे पंचतंत्र में दो पक्षियों की कथा है।
एक जंगल में दो पक्षी रहते थे। उस जंगल के दूसरे छोर पर एक वृक्ष था जिसमें वर्ष में एक बार स्वादिष्ट फल आया करते थे। जब फलों का मौसम आया तो दोनों पक्षियों ने वहां जाने की योजना बनाई।
‘वह वृक्ष यहां से बहुत दूर है अतः मैं तो आराम से धीरे-धीरे वहां पहुंचूंगा। अभी फलों का मौसम दो माह रहेगा।’ पहले पक्षी ने दूसरे से कहा।
‘नहीं मित्र, मुझसे तो रहा नहीं जा रहा है। उन स्वादिष्ट फलों के बारे में सोच कर ही मेरे मुंह में पानी आ रहा है अतः मैं तो एक ही उड़ान में वहां जा पहुंचूंगा और छांट-छांट कर मीठे फल खा लूंगा।’ दूसरे पक्षी ने अतिउत्साहित होते हुए कहा। उसके मन में यह खोट भी आ गई थी कि वह पहले पहुंच कर सारे अच्छे फल खा सकता है।
दूसरे दिन दोनों पक्षी अपने घोसलों से निकल कर उस वृक्ष की ओर उड़ चले। कुछ दूर जाने पर पहले पक्षी को थकान होने लगी तो वह सुस्ताने के लिए एक वृक्ष की टहनी पर ठहर गया। वहीं, दूसरा पक्षी उसे ठहरा हुआ देख कर मुस्कुराया और तेजी से फलों की ओर उड़ने लगा। जबकि वह भी थकान का अनुभव करने लगा था। मगर उसे तो फलों को खाने की जल्दी जो थी अतः वह बिना रुके उड़ता गया, उड़ता गया, उड़ता गया। उसे फलों वाला वृक्ष दिखाई देने लगा। फलों की सुगंध भी उसे आने लगी। उसे लगा कि बस, अब तो वह पहुंच ही गया है कि तभी उसके पंख लड़खड़ाए। वह बुरी तरह थक चुका था। उसके पंखों ने जवाब दे दिया और वह वहीं आसमान से ज़मीन पर जा गिरा। उसके पंख टूट गए और वह उन फलों तक कभी नहीं पहुंच सका। जबकि पहला पक्षी जो रुक-रुक कर आ रहा था वह फलों तक आराम से पहुंच गया और उसने जी भर कर स्वादिष्ट फल खाए।
कदम कदम चल कर ही हम अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकते हैं। उछल कूद करने वाले लोग मुंह के बल गिरते हैं और चोट खाते हैं। यह तो हम सब जानते हैं कि ना तो हिमालय का निर्माण एक दिन में हुआ था और न ही वानर सेना ने एक विशाल चट्टान से सेतु बनाया था। अनेक छोटे-छोटे पत्थरों से ही सेतु का निर्माण हुआ था। प्रत्येक सेना में अनेक सिपाही होते हैं जिनके बल पर बड़ी से बड़ी विजय प्राप्त की जाती है। एक-एक ईंट को कुशलता पूर्वक रखकर और जोड़कर ही किसी श्रेष्ठ भवन का निर्माण किया जाता है। एक-एक सीढ़ी चढ़कर ही किसी भवन के ऊपर की मंजिल तक पहुंचा जा सकता है। इतना ही नहीं अपितु हमारा विश्व भी तो छोटे-छोटे कणों द्वारा निर्मित है। जिस नैनो पार्टिकल्स ने आज जीवन में क्रांति ला दी है, वह अणु, परमाणु से ले कर ब्रह्मांड तक का निर्माता है। हमारे प्राचीन ग्रंथ ‘श्वेताश्वतरोपनिषद्’ में ब्रह्माण्ड के सबसे छोटे कण के माप का वर्णन मिलता है-
केशाग्रशतभागस्य शतांशः सादृशात्मकः।
जीवः सूक्ष्मस्वरूपोयं संख्यातीतो हि चित्कणः।।
- अर्थात् यदि केश के अग्रभाग को सौ भागों में विभाजित किया जाए और प्रत्येक भाग को और सौ भागों में विभाजित किया जाए, तब शेष बचा हुआ भाग ब्रह्माण्ड का सूक्ष्मातिसूक्ष्म भाग होगा। यही तो है नैनोपार्टिकल्स जो लघुतम होते हुए भी ब्रह्मांड की रचना करने में सक्षम हैं। अतः जो लोग छोटे-छोटे कार्यों की उपेक्षा करके महत्वाकांक्षाओं को सार्थक करने का स्वप्न देखते हैं, वे भूल जाते हैं कि छोटी-छोटी सफलताएं प्राप्त करते हुए चलने से जीवन में सफलताएं प्राप्त होती हैं। जो व्यक्ति छोटी-छोटी सफलताओं में जीवन को महत्व नहीं देते वह बड़ी सफलता से भी वंचित रह जाते हैं। महान व्यक्तियों की जीवनगाथा यह तथ्य उजागर करती हैं कि छोटे छोटे कर्तव्य पालन में उचित और अनुचित का विवेक रखकर ही वे महान बन सके हैं। महात्मा बुद्ध यह कहते थे -’तुम्हारे सामने जो कार्य है उसको पूरे उत्साह एवं पूरी शक्ति के साथ करो। छोटा समझ कर किसी कार्य की उपेक्षा मत करो।’
हम अपने लक्ष्य के प्रति बढ़ते हुए यह याद रखें कि बारह महीनों को मिलाकर ही एक वर्ष बनता है एक भी माह छूट जाने पर वर्ष पूर्ण नहीं होगा। अतः हमारा प्रत्येक कदम लक्ष्य की प्राप्ति का सूचक है इसलिए छोटे-छोटे कदमों की अवहेलना ना करते हुए उन्हीं को आत्मसात करना चाहिए और स्वयं पर विश्वास रखना चाहिए। वास्तव में हमें अपने बड़े लक्ष्य के लिए छोटे-छोटे प्रयास ही निर्धारित करने चाहिए। यदि दस छोटे प्रयासों में पांच प्रयास असफल हो कर हमें हतोत्साहित करते हैं तो वे पांच प्रयास जो सफल हो गए हैं, हमें उत्साहित भी करते हैं। किन्तु किसी भी काम को करने में जल्दबाजी करना भी घातक सिद्ध होता है-
सहसा विदधीत न क्रियामविवेकः परमापदां पदम्।
वृणते हि विमृश्यकारिणं गुणलुब्धाः स्वयमेव संपदः।।
- अर्थात् जल्दबाजी में कोई कार्य नहीं करना चाहिए क्यूंकि बिना सोचे-समझे किया गया कार्य विपत्तियों को आमंत्रण देता हैं। जो व्यक्ति सहजता से सोच समझ कर आराम से विचार करके अपना काम करते हैं सफलता रूपी लक्ष्मी स्वयं ही उन्हें चुन लेती है।
सफलता पाने के लिए सबसे बड़ी आवश्कता होती है इच्छाशक्ति और प्रयास की। यह ‘प्रयास’ बड़ा ही संवेदनशील शब्द है। प्रयास करने की इच्छा जाग्रत होते ही उर्त्तीण अथवा अनुत्तीर्ण होने का चिंतन भी जाग उठता है। यही चिंतन प्रेरक भी बनता है और घातक भी। उत्तीर्ण होने की इच्छा का होना स्वाभाविक है लेकिन अनुत्तीर्ण होने से भी घबराना नहीं चाहिए। अनुत्तीर्ण होना इस बात का सूचक होता है कि अभी और प्रयास किए जाने की आवश्यकता है। बस, मन में दृढ़ इच्छाशक्ति होनी चाहिए। इस बात को बाल्यावस्था के प्रयासों से जोड़ कर देखा जाए तो सब कुछ सहज ही स्पष्ट हो जाएगा। एक बालक जब गतिशील होना आरम्भ करता है तो वह पहले बैठने का प्रयास करता है। फिर आगे झुकने का अभ्यास करता है। इसके बाद वह घुटनों के बल चलने लगता है। जब उसे घुटनों के बल चलना आ जाता है तो वह खड़े होने का प्रयास आरम्भ कर देता है। किसी न किसी वस्तु का सहारा ले कर वह खड़ा होने लगता है और फिर डगमगाते कदमों से आगे बढ़ता है। खड़े हो कर चलने के इस प्रयास में वह कई-कई बार गिरता है। उसे चोट लगती है। वह रोता है। किन्तु हार नहीं मानता है। फिर वह दिन भी आता है जब वह अपने दम पर खड़े होकर न केवल चलने लगता है अपितु दौड़ने भी लगता है। कहने का आशय यही है कि प्रत्येक उस व्यक्ति को जो अपने जीवन में सफलता पाना चाहता है उसे गिरने से डरे बिना, छोटे-छोटे कदम बढ़ाते हुए निरंतर प्रयास करते रहना चाहिए। इसके बाद उसे जो सफलता मिलेगी, स्थाई होगी क्योंकि इसमें उसका आत्मविश्वास, उसका सतत प्रयास और उसके अनुभव शामिल रहेंगे जो उसे जीवन के हर मोड़ पर प्रेरणा देते रहेंगे।
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World Biodiversity Day 2019 : यही हाल रहा तो 2050 तक खो देंगे एक तिहाई से ज्यादा जैव विविधता - डॉ. शरद सिंह
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| Dr (Miss) Sharad Singh, Author, Editor and Columnist |
आज अंतर्राष्ट्रीय जैव विविधता दिवस पर Patrika.com ने मेरे लेख को प्रकाशित कर जो डिज़िटल प्लेटफार्म दिया है उसके लिए मै Patrika.com की हृदय से आभारी हूं।
Thank You Patrika.com !!!
इस लिंक पर जा कर आप मेरा लेख पढ़ सकते हैं......(22.05.2019)
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| World Biodiversity Day 2019 : यही हाल रहा तो 2050 तक खो देंगे एक तिहाई से ज्यादा जैव विविधता - डॉ. शरद सिंह |
चर्चा प्लस ..22 मई विश्व जैव-विविधता संरक्षण दिवस पर विशेष : हम तेजी से खो रहे हैं अपनी जैव विविधता - डॉ. शरद सिंह
| Dr (Miss) Sharad Singh |
हम तेजी से खो रहे हैं अपनी जैव विविधता
- डॉ. शरद सिंह
जब देश के सबसे बड़े गणतंत्र के चुनावों के पहले परिणाम घोषित होने की घड़ी करीब आ गई हो तो भला किसे याद रहेगा विश्व जैव विविधता संरक्षण दिवस? शायद चंद प्रकृतिविद एवं पर्यावरणचिंतकों को ही यह दिवस याद रहेगा। जबकि जैव विविधता पृथ्वी पर जीवन की मौजूदगी का वह महत्वपूर्ण पक्ष है जो पृथ्वी को जीवन के योग्य बनाए हुए है। भारत में 450 प्रजातियां संकटग्रस्त अथवा विलुप्त होने की कगार पर हैं। लगभग 150 स्तनधारी एवं 150 पक्षियों का अस्तित्व खतरे में है, और कीटों की अनेक प्रजातियां विलुप्ति-सूची में दर्ज़ हो चुकी हैं। ये आंकड़े जैव विविधता पर मंडराते संकट को दिखाते हैं। यह हमें समझना ही होगा कि इस जैव विविधता को बचाना मानव जीवन को बचाने के लिए जरूरी है।
बड़ी विचित्र-सी बात लगती है न कि मुंबई के बाहरी इलाके में नई बसाई गई बस्तियों में रात को तेंदुआ घूमता है। पर यह सच है। इसकी स्वयं नेशनल जियोग्राफिक सोसायटी की टीम ने वीडियोग्राफी की। जंगलों के निकट बसे गांवों और शहरों में वन्यपशुओं के घुस आने की अनेक घटनाएं आए दिन सामने आती हैं। अभी हाल ही में यानी इसी मई माह के पहले सप्ताह में कालेमुंह के वानरों का एक पूरा झुंड सागर जिला मुख्यालय के मकरोनिया उपनगर में उन कॉलोनियों से हो कर गुज़रा जहां कभी वानरों का प्रकोप नहीं रहा। चूंकि आधुनिक कॉलोनियों में फलदारवृक्षों का अभाव रहता है तथा छत या अांगन में भी खाने-पीने की वस्तुएं नहीं मिल पाती हैं अतः वह वानर-झुंड कॉलोनी के इलाके में रुका नहीं। छतों पर से होता हुआ आगे कहीं चला गया। निःसंदेह इस झुंड की यात्रा वहां जा कर थमी होगी जहां इन्हें खाना-पानी मिला होगा। उनका इस तरह शहर के भीड़ भरे इलाके से हो कर गुजरना इस बात का सबूत था कि उन वानरों का निवास या तो जंगल काटे जाने से उजड़ गया है या फिर उनके इलाके में उनके लिए भोजन और पानी समाप्त हो चुका है। मूल समस्या यह है कि शहरों में इनके लिए कोई जगह नहीं है और ये अपने प्राकृतिक आवास को खोते जा रहे हैं। इस प्रकार ये वानर कब तक जीवन संघर्ष में सफल होते रहेंगे? यदि वानर अथवा कोई भी वन्य पशु अथ्वा पक्षी विलुप्ति की कगार पर पहुंचता है तो यह मानना चाहिए कि पृथ्वी पर जीवन की एक कड़ी टूट कर नष्ट हो जाती है। कल्पना करिए कि पृथ्वी पर मौजूद सभी प्रकार के जीव एवं वनस्पतियां मोती की माला के मोती हैं तो मानव उस माला का लॉकेट है। माला के टूटने और मोतियों के बिखरने से लॉकेट का अस्तित्व भी नहीं रहेगा।
धरती पर मौजूद जंतुओ और पौधों के बीच के संतुलन को बनाए रखने के लिए अतंर्राष्ट्रीय जैव विविधता दिवस 22 मई को मनाया जाता है। इसे ’विश्व जैव-विविधता संरक्षण दिवस’ भी कहते है। प्रतिवर्ष सम्पूर्ण विश्व में 22 मई’ को मनाया जाता है। यह एक अंतर्राष्ट्रीय दिवस है जिसे संयुक्त राष्ट्र संघ ने प्रारंभ किया था। इस वर्ष की थीम रखी गई है-‘अवर बायोडायवर्सिटी, अवर फूड, अवर हेल्थ’। जैव विविधता सभी जीवों एवं पारिस्थितिकी तंत्रों की विभिन्नता एवं असमानता को कहा जाता है। 1992 में ब्राज़ील के रियो डि जेनेरियो में हुए जैव विविधता सम्मेलन के अनुसार जैव विविधता की परिभाषा इस प्रकार है- ‘‘धरातलीय, महासागरीय एवं अन्य जलीय पारिस्थितिकीय तंत्रों में उपस्थित अथवा उससे संबंधित तंत्रों में पाए जाने वाले जीवों के बीच विभिन्नता जैवविविधता है।’’
प्राकृतिक एवं पर्यावरण संतुलन बनाए रखने में जैव विविधता का महत्व देखते हुए ही जैव विविधता दिवस को अंतरराष्ट्रीय दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया गया। नैरोबी में 29 दिसंबर, 1992 को हुए जैव विविधता सम्मेलन में यह निर्णय लिया गया था, किंतु कई देशों द्वारा व्यावहारिक कठिनाइयां जाहिर करने के कारण इस दिन को 29 मई की बजाय 22 मई को मनाने का निर्णय लिया गया। इसमें विशेष तौर पर वनों की सुरक्षा, संस्कृति, जीवन के कला शिल्प, संगीत, वस्त्र-भोजन, औषधीय पौधों का महत्व आदि को प्रदर्शित करके जैव विविधता के महत्व एवं उसके न होने पर होने वाले खतरों के बारे में जागरूक करना है।
जैव विविधता का संरक्षण और उसका टिकाऊ उपयोग, पारिस्थितिक रूप से टिकाऊ विकास के लिये महत्वपूर्ण है। विभिन्न प्रकार के जीवों की अपनी अलग-अलग भूमिका है, जो प्रकृति को संतुलित रखने तथा हमारे जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं को पूर्ण करने, तथा सतत् विकास के लिये संसाधन प्रदान करने में अपना योगदान करती है। जैव विविधता का वाणिज्यिक महत्व, भोजन, औषधियां, ईंधन, औद्योगिक कच्चा माल, रेशम, चमडा, ऊन आदि से हम सब परिचित हैं। इसके पारिस्थितिकी महत्व के रूप में खाद्य श्रृंखला, मृदा की उर्वरता को बनाये रखना, जैविक रूप से सड़ी-गली चीजों का निपटान, भू-क्षरण को रोकने, रेगिस्तान का प्रसार रोकने, प्राकृतिक सौंदर्य को बढ़ाने एवं पारिस्थितिकी संतुलन बनाये रखने में के रूप में देखा जा सकता है। इसके अलावा जैव विविधता का सामाजिक, नैतिक तथा अन्य प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष महत्व है, जो हमारे लिये महत्वपूर्ण है।
वैश्विक नेताओं ने भविष्य की पीढ़ियों के लिए पृथ्वी को एक जीवित ग्रह सुनिश्चित करते हुए वर्तमान जरूरतों को पूरा करने के लिए ’सतत विकास’ की एक व्यापक रणनीति पर सहमति व्यक्त की थी। 193 सरकारों ने इस पर हस्ताक्षर किए गए थे। अतंरराष्ट्रीय जैव-विविधता संरक्षण का उद्देश्य ऐसे पर्यावरण का निर्माण करना है, जो जैव विविधता में समृद्ध, टिकाऊ और आर्थिक गतिविधियों के लिए अवसर प्रदान कर सके। जैव विविधता का तात्पर्य विभिन्न प्रकार के जीव−जंतु और पेड़-पौधों का अस्तित्व धरती पर एक साथ बनाए रखने से होता है। इसकी कमी से बाढ़, सूखा और तूफान आदि जैसी प्राकृतिक आपदा का खतरा बढ़ जाता है। पारिस्थितिक संतुलन को बनाये रखने तथा खाद्यान्न उत्पादन बढ़ाने में भी जैव विविधता की अहम भूमिका होती है। इसलिए हमे प्रकृति से उपहार के रूप में मिले पेड़-पौधे, अनेक प्रकार के जीव-जंतु, मिट्टी, हवा, पानी, महासागर, समुद्र, नदिया आदि का संरक्षण करना चाहिए।
पृथ्वी पर लाखों प्रजाति के जीव व वनस्पति उप्लब्ध हैं। इन सबकी विशेषता एवं आवास विविध हैं, फिर भी यह आपस मे प्राकृतिक कड़ियों से जुड़े हैं। संक्षेप में हम इसे वैश्विक जैव विविधता मान सकते हैं। मानव के कारण पर्यावरण में हो रहे बदलाव के कारण इनकी कड़ियां टूट रही हैं, जो कि चिन्ता का विषय है। विश्व के समृद्धतम जैव विविधता वाले 17 देशों में भारत भी सम्मिलित है, जिनमें विश्व की लगभग 70 प्रतिशत जैव विविधता विद्यमान है। अन्य 16 देश हैं- ऑस्ट्रेलिया, कांगो, मेडागास्कर, दक्षिण अफ़्रीका, चीन, इंडोनेशिया, मलेशिया, पापुआ न्यू गिनी, फिलीपींस, ब्राज़ील, कोलम्बिया, इक्वेडोर, मेक्सिको, पेरू, अमेरिका और वेनेजुएला। संपूर्ण विश्व का केवल 2.4 प्रतिशत भाग ही भारत में है, लेकिन यहां विश्व के ज्ञात जीव जंतुओं का लगभग 5 प्रतिशत भाग निवास करता है। ’भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण’ एवं ’भारतीय प्राणी सर्वेक्षण’ द्वारा किये गये सर्वेक्षणों के अनुसार भारत में लगभग 49,000 वनस्पति प्रजातियां एवं 89,000 प्राणी प्रजातियां पाई जाती हैं। भारत विश्व में वनस्पति-विविधता के आधार पर दसवें, क्षेत्र सीमित प्रजातियों के आधार पर ग्यारहवें और फसलों के उद्भव तथा विविधता के आधार पर छठवें स्थान पर है। वैसे भारत जैव विविधता संरक्षण का प्रबल पक्षकार है।
विश्व के कुल 25 जैव विविधता के सक्रिय केन्द्रों में से दो क्षेत्र पूर्वी हिमालय और पश्चिमी घाट, भारत में है। जैव विविधता के सक्रिय क्षेत्र वह हैं, जहां विभिन्न प्रजातियों की समृद्धता है और ये प्रजातियां उस क्षेत्र तक सीमित हैं। भारत में 450 प्रजातियों को संकटग्रस्त अथवा विलुप्त होने की कगार पर दर्ज किया गया है। लगभग 150 स्तनधारी एवं 150 पक्षियों का अस्तित्व खतरे में है, और कीटों की अनेक प्रजातियां विलुप्त होने की कगार पर हैं। ये आंकड़े जैव विविधता पर निरंतर बढ़ते खतरे की ओर संकेत करते हैं। यदि यही दर बनी रही तो वर्ष 2050 तक हम एक तिहाई से ज्यादा जैव विविधता खो सकते हैं। जैव विविधता को कई कारणों से नुकसान हो रहा है। इसमें मुख्य है, आवास की कमी, आवास विखंडन एवं प्रदूषण, प्राकृतिक एवं मानवजन्य आपदायें, जलवायु परिवर्तन, आधुनिक खेती, जनसंख्या वृद्धि, शिकार और उद्योग एवं शहरों का फैलाव। अन्य कारणों में सामाजिक एवं आर्थिक बदलाव, भू-उपयोग परिवर्तन, खाद्य श्रृंखला में हो रहे परिवर्तन, तथा जीवों की प्रजनन क्षमता में कमी इत्यादि है। जैव विविधता का संरक्षण करना मानवजीवन के अस्तित्व के लिये आवश्यक है। भारत को विश्व के उन 12 देशों मे शमिल किया जाता है जो सर्वाधिक जैव विविधता वाले देश हैं। पक्षियों की दृष्टि से भारत का स्थान दुनिया के दस प्रमुख देशों में आता है। भारतीय उप महाद्वीप में पक्षियों की 176 प्रजातियां पाई जाती हैं। दुनिया भर में पाए जाने वाले 1235 प्रजातियों के पक्षी भारत में हैं, जो विश्व के पक्षियों का 14 प्रतिशत है।
गंदगी साफ करने में कौआ और गिद्ध प्रमुख हैं। गिद्ध शहरों ही नहीं, जंगलों से खत्म हो गए। 99 प्रतिशत लोग नहीं जानते कि गिद्धों के न रहने से हमने क्या खोया। 1997 में रेबीज से पूरी दुनिया के 50 हजार लोग मर गए। भारत में सबसे ज्यादा 30 हजार लोग मारे गए। तब स्टेनफोर्ट विश्व विद्यालय के शोधकर्ताओं ने अपने अध्ययन में पाया कि गिद्धों की संख्या में अचानक कमी के कारण ऐसा हुआ। वहीं दूसरी तरफ चूहों और कुत्तों की संख्या में एकाएक वृद्धि हुई। अध्ययन में बताया गया कि पक्षियों के खत्म होने से मृत पशुओं की सफाई, बीजों का प्रकीर्णन और परागण भी काफ़ी हद तक प्रभावित हुआ। अमेरिका जैसा पूंजीवादी और प्रगतिशील देश चमगादड़ों को संरक्षित करने का हर संभव उपाय कर रहा है। यदि हम सोचते हैं कि चमगादड़ तो पूरी तरह बेकार हैं तो हमारी यह सोच गलत है क्योंकि वैज्ञानिकों के अनुसार चमगादड़ मच्छरों के लार्वा खाता खाते हैं और मनुष्य को मच्छरों से होने वाली अनेक बीमारियों से बचाते हैं।
यदि जंगल नहीं होगा तो वन्यपशु-पक्षी नहीं होंगे, पशु-पक्षी नहीं होंगे तो हानिकारक कीटाणु हमें क्षति पहुंचाते रहेंगे। जंगल नहीं रहेगा तो पानी भी समाप्त होता जाएगा और यदि नन्हें पक्षी नहीं रहेंगे तो जंगलों की संतति थमने लगेगी। सभी एक-दूसरे से परस्पर पूरक के समान जुड़े हुए हैं। इसीलिए जल, थल, वायु कभी स्थानों के जीवों का अपने-अपने स्थान पर होना आवश्यक है। इसे सरल शब्दों यही कहा जा सकता है कि पृथ्वी पर मानव जीवन के भविष्य के लिए हर एक जीव जरूरी है और इसके लिए जरूरी है जैव विविधता का बना रहना।
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