Thursday, December 19, 2019

इन्दौर लिटरेचर फेस्टिवल 2019 में डॉ शरद सिंह आमंत्रित

Raj Express, 19.12.2019 - Dr (Miss) Sharad Singh Speaker of Indore Literature Festival 2019 .
Dainik Bhaskar, 18.12.2019 - Dr (Miss) Sharad Singh Speaker of Indore Literature Festival 2019 .
"इन्दौर मध्यप्रदेश में 21- 23 दिसंबर 2019 को आयोजित होने जा रहे ‘इन्दौर लिटरेचर फेस्टिवल-2019’ में हिन्दी साहित्य पर चर्चा के लिए सागर नगर की वरिष्ठ लेखिका एवं ‘पिछले पन्ने की औरतें’, ‘कस्बाई सिमोन’ आदि अपने उपन्यासों के लिए देश-विदेश में चर्चित कथाकार डॉ (सुश्री) शरद सिंह को स्पीकर के रूप में आमंत्रित किया गया है। जहां वे विभिन्न सत्रों में ‘हिन्दी उपन्यास: ज़मीनी वास्तविकता के कितने क़रीब’ तथा साहित्यकार पाठक संबंधों में सूखा क्यों?’ तथा ‘हिन्दी में बेस्टसेलर मारीचिका’ जैसे विषयों पर अपने विचार साझा करेंगी। 
      उल्लेखनीय है कि डॉ शरद अब तक चंडीगढ़, अजमेर, लखनऊ आदि लिटरेचर फेस्टिवल्स सहित दिल्ली में आयोजित ‘‘साहित्य आजतक’’ लिटरेचर फेस्टिवल में बतौर स्पीकर साहित्य पर महत्वपूर्ण चर्चाएं कर चुकी हैं।
       हैलो हिन्दुस्तान द्वारा इन्दौर में आयोजित इस प्रतिष्ठित तीन दिवसीय आयोजन में हिंदी साहित्य जगत की चर्चित हस्तियों सहित रस्किन बाण्ड, नादिरा बब्बर, प्रयाग शुक्ल, लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी जैसी देश-विदेश की साहित्य और संस्कृति से जुड़ी अंतर्राष्ट्रीय ख्याति की अनेक शख्सियतें शामिल होंगी।" - साभार मीडिया, 18-19.12.2019
Aacharan, 18.12.2019 - Dr (Miss) Sharad Singh Speaker of Indore Literature Festival 2019 .

Dainik Jagaran, 18.12.2019 - Dr (Miss) Sharad Singh Speaker of Indore Literature Festival 2019 .

Deshbandhu, 18.12.2019 - Dr (Miss) Sharad Singh Speaker of Indore Literature Festival 2019 .

Navdunia, 18.12.2019 - Dr (Miss) Sharad Singh Speaker of Indore Literature Festival 2019 .

Patrika, 18.12.2019 - Dr (Miss) Sharad Singh Speaker of Indore Literature Festival 2019 .
Rashtriya Hindi Mail, 18.12.2019 - Dr (Miss) Sharad Singh Speaker of Indore Literature Festival 2019 .

Sagar Dinkar, 18.12.2019 - Dr (Miss) Sharad Singh Speaker of Indore Literature Festival 2019 .
Teen Batti News.com - 18.12.2019 - Dr (Miss) Sharad Singh Speaker of Indore Literature Festival 2019 .

Yuva Pravartak, 18.12.2019 - Dr (Miss) Sharad Singh Speaker of Indore Literature Festival 2019 .
Swadesh Jyoti, 18.12.2019 - Dr (Miss) Sharad Singh Speaker of Indore Literature Festival 2019 .
       
Dr (Miss) Sharad Singh as Speaker of Indore Literature Festival 2019

Wednesday, December 18, 2019

चर्चा प्लस ...अंतर्राष्ट्रीय अल्पसंख्यक अधिकार दिवस (18 दिसम्बर) और नागरिकता संशोधन कानून 2019 - डाॅ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
चर्चा प्लस ...अंतर्राष्ट्रीय अल्पसंख्यक अधिकार दिवस (18 दिसम्बर) और नागरिकता संशोधन कानून 2019
         - डाॅ. शरद सिंह                                                                                        
     आज अंतर्राष्ट्रीय अल्पसंख्यक अधिकार दिवस विश्वभर में प्रत्येक वर्ष 18 दिसंबर को मनाया जा रहा है। यह दिवस प्रति वर्ष 18 दिसंबर 1992 से सयुंक्त राष्ट्र संघ द्वारा अल्पसंख्यक समुदायों के अधिकारों की रक्षा, उनकी भाषा, जाति, धर्म, संस्कृति, परंपरा आदि की सुरक्षा को सुनिश्चित करने हेतु मनाया जाता है। अंतर्राष्ट्रीय अल्पसंख्यक अधिकार दिवस पर यह विचार करना जरूरी है कि आखिर क्या है नागरिकता (संशोधन) कानून 2019? इसकी राह में आने वाले अवरोध का मूल कारण क्या है? कहीं दफ़्तरों की लापरवाही भरी कार्यप्रणाली तो नहीं है भय का मूल कारण? जिसे पूर्वोंत्तर ने झेला है।
चर्चा प्लस ...अंतर्राष्ट्रीय अल्पसंख्यक अधिकार दिवस (18 दिसम्बर) और नागरिकता संशोधन कानून 2019  - डाॅ. शरद सिंह

आज जब देश में दिल्ली से लेकर असम तक, उत्तर प्रदेश से लेकर बेंगलुरु-मुंबई तक हर जगह नए नागरिकता (संशोधन) कानून 2019 के खिलाफ प्रदर्शन हो रहा है। देश का अल्पसंख्यक समुदाय भी चिंतित हो उठा है। आज अंतर्राष्ट्रीय अल्पसंख्यक अधिकार दिवस विश्वभर में प्रत्येक वर्ष 18 दिसंबर को मनाया जा रहा है। यह दिवस प्रति वर्ष 18 दिसंबर 1992 से सयुंक्त राष्ट्र संघ द्वारा अल्पसंख्यक समुदायों के अधिकारों की रक्षा, उनकी भाषा, जाति, धर्म, संस्कृति, परंपरा आदि की सुरक्षा को सुनिश्चित करने हेतु मनाया जाता है। अल्पसंख्यक किसे माना जाना चाहिए? संयुक्त राष्ट्र के एक विशेष प्रतिवेदक फ्रेंसिस्को कॉपोटोर्टी ने एक वैश्विक परिभाषा दी, जिसके अनुसार- “किसी राष्ट्र-राज्य में रहने वाले ऐसे समुदाय जो संख्या में कम हों और सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक रूप से कमजोर हों एवं जिनकी प्रजाति, धर्म, भाषा आदि बहुसंख्यकों से अलग होते हुए भी राष्ट्र के निर्माण, विकास, एकता, संस्कृति, परंपरा और राष्ट्रीय भाषा को बनाये रखने में अपना महत्वपूर्ण योगदान देते हों, तो ऐसे समुदायों को उस राष्ट्र-राज्य में अल्पसंख्यक माना जाना चाहिए।”
अंतरराष्ट्रीय अल्पसंख्यक अधिकार दिवस की शुरुआत 18 दिसंबर 1992 को संयुक्त राष्ट्र द्वारा एक घोषणा से हुई थी। भारत में अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय अल्पसंख्यकों से संबंधित मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करता है। भारत के संविधान में अल्पसंख्यक होने का आधार धर्म और भाषा को माना गया है। भारत के अल्पसंख्यक समुदायों में मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध और पारसी शामिल हैं। बहाई और यहूदी अल्पसंख्यक तो हैं, लेकिन इन्हें संबंधित संवैधानिक अधिकार प्राप्त नहीं हैं। भारत सरकार ने अल्पसंख्यक अधिकारों को सुरक्षा प्रदान करने के लिए 1978 में अल्पसंख्यक आयोग का गठन किया था। इसे बाद में राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम-1992 के तहत कानून के रूप में 1992 में पारित किया गया। राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग को वर्ष 2006 जनवरी में यूपीए सरकार ने अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय के अधीन कर दिए। इसे वे सारे संवैधानिक अधिकार प्राप्त हैं, जो दीवानी अदालतों को हैं। इस आयोग का गठन भारत के लिए इसलिए भी महत्व रखता है, क्योंकि पूरे यूरोप के किसी भी राष्ट्र में ऐसा कोई आयोग नहीं है। आज भारत के कई अन्य राज्यों में भी राज्य अल्पसंख्यक आयोग हैं।

अंतर्राष्ट्रीय अल्पसंख्यक अधिकार दिवस पर यह विचार करना जरूरी है कि आखिर क्या है नागरिकता (संशोधन) कानून 2019? अविभाजित भारत में रहने वाले लाखों लोग अलग धर्म को मानते हुए आजादी के वक्त से साल 1947 से पाकिस्तान और बांग्लादेश में रह रहे थे। इसके साथ ही अफगानिस्तान भी मुस्लिम राष्ट्र है और इन देशों में हिंदू, सिख, बौद्ध, पारसी, जैन और ईसाई समुदायों के बहुत से लोग धार्मिक आधार पर उत्पीड़न झेलते हैं। नागरिकता कानून 1955 के अनुसार, किसी अवैध अप्रवासी नागरिक को भारत की नागरिकता नहीं मिल सकती। सरकार ने इस कानून में संशोधन के जरिए अब नागरिकता कानून 2019 के हिसाब से अल्पसंख्यकों को भारत की नागरिकता आसानी से देने का फैसला किया है। बिल की विशेषता यह है कि इसमें भारत की नागरिकता पाने के लिए भारत में कम से कम 12 साल रहने की आवश्यक शर्त को कम करके सात साल कर दिया गया है।
इसमें सरकार का पक्ष है कि पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान इन तीनों देशों में अल्पसंख्यकों को अपनी धार्मिक पद्धति, उसके पालन और आस्था रखने में बाधा आती है। इनमें से बहुत से लोग भारत में शरण के लिए आए और वे अब यहीं रहना चाहते हैं। इन लोगों के वीजा या पासपोर्ट की अवधि भी समाप्त हो चुकी है। कुछ लोगों के पास कोई दस्तावेज नहीं है, लेकिन अगर वे भारत को अपना देश मानकर यहां रहना चाहते हैं तो सरकार उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना चाहती है।

वहीं विपक्षी दलों का कहना है कि विधेयक मुसलमानों के साथ भेदभाव करता है, जिन्हें इसमें शामिल नहीं किया गया है। इस हिसाब से यह संविधान के आर्टिकल 14 का उल्लंघन है। केंद्र सरकार ने कहा है कि पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान मुस्लिम राष्ट्र हैं, वहां मुस्लिम बहुसंख्यक हैं, इस वजह से उन्हें धर्म के आधार पर उत्पीड़न का शिकार नहीं माना जा सकता। केंद्र सरकार ने आश्वासन दिया है कि सरकार दूसरे समुदायों की प्रार्थना पत्रों पर अलग-अलग मामले में गौर करेगी।

जहां तक भारत में मुस्लिम अल्पसंख्यकों के लिए सरकार द्वारा अनेक सहायता योजनाएं हैं। विशेष रूप से शिक्षा के क्षेत्र में देखा जाए तो मानव संसाधन विकास केंद्र की शैक्षिक योजनाओं के तहत शैक्षिक रुप से पिछड़े अल्पसंख्यकों के लिए एरिया इंटेनसिव प्रोग्राम है। इस प्रोग्राम का मुख्य उद्देश्य उन भागों में जहां शिक्षा में पिछड़े हुए अल्पसंख्यक भारी संख्या में रहते हैं, वहां शिक्षा के लिए सुविधा मुहैया कराना। मदरसा शिक्षा को माडर्न बनाने के लिए वित्तीय सहायता, फारसी और अरबी भाषा के क्षेत्र में काम करने वाली संस्थाओं को वित्तीय सहायता, अल्पसंख्यकों को प्रतियोगिताओं के लिए तैयार करने के लिए कोचिंग क्लासों के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की वित्तीय सहायता, केंद्रीय वक्फ परिषद तकनीकि संस्थानों तथा वोकेशनल कोर्स करने वालों को वजीफा तथा वित्तीय सहायता देती है। इसके साथ ही मदरसा शिक्षा के आधुनिकीकरण के लिए वित्तीय सहायता योजना है जो पूरी तरह स्वैच्छिक है। इसको वित्तीय सहायता केंद्र सरकार द्वारा प्राप्त है। इस योजना को ग्रहण करना मदरसों की इच्छा पर निर्भर करता है। इसका उद्देश्य प्राचीन संस्थानों जैसे मकतबा, मदरसों में आधुनिक शिक्षा को बढावा देने के लिए वित्तीय सहायता देना है।

सरकार कोई भी हो भारत में सभी अल्पसंख्यकों के हितों एवं अधिकारों का पूरा ध्यान रखा जाता है। बेशक इसके साथ कार्यालयों की लचर व्यवस्था को सुधारे जाने की जरूरत है जिनके चलते अल्पसंख्यकों को अपनी नागरिकता के अधिकारों को सिद्ध करने में परेशानी का सामना करना पड़ सकता है। इसका उदाहरण असम आदि पूर्वोंत्तर क्षेत्रों में देखा जा चुका है, जहां नागरिकता सूची बनाने में भयंकर लापरवाही बरती गई थी। वस्तुतः नागरिकता बिल को ले कर उद्वेलित होने का मूल कारण भी यही है। ऐसी लापरवाहियों को दूर किया किया जाना पहले जरूरी है।
 ---------------------------  
#चर्चाप्लस, #सागर_दिनकर, #अंतर्राष्ट्रीय_अल्पसंख्यक_अधिकार दिवस  #नागरिकता_संशोधन_कानून #डाॅशरदसिंह

Monday, December 16, 2019

"शिखण्डी ... स्त्री देह से परे" - मेरा नया उपन्यास .. मेरे उपन्यास को पढ़कर अपने मन के मिथक को तोड़ें - डॉ शरद सिंह

शिखंडी कौन था ... 
एक तीसरा लिंग या एक महिला?
Shikhandi ... Stri Deh Se Pare - Novel of Dr (Miss) Sharad Singh
 
कृपया, शिखंडी के जीवन संघर्ष पर आधारित मेरे उपन्यास को पढ़कर अपने मन के मिथक को तोड़ें ...
- डॉ शरद सिंह

विश्व पुस्तक मेला 2020 में मेरा नया उपन्यास "शिखण्डी ... स्त्री देह से परे" महाकाव्य चरित्र शिखंडी पर एक नए पहलू के साथ ... 
Shikhandi ... Stri Deh Se Pare - Novel of Dr (Miss) Sharad Singh

Novel - Shikhandi ... Stri Deh Se Pare
Novelist - Sharad Singh


हार्ड बाउंड और पेपरबैक एक साथ...
Publisher - Samayik Prakashan, New Delhi
3320-21 Jatwara,Netaji Subhash marg
Near Sablok Clinic, Daryaganj New Delhi 110002
E-mail: samayikprakashan@gmail.com
Website: www.samayikprakashan.com
Telephone: 011-23282733, 23270715
Telefax: 011-23270715


Shikhandi ... Stri Deh Se Pare - Novel of Dr (Miss) Sharad Singh
 

"शिखण्डी ... स्त्री देह से परे" - विश्व पुस्तक मेला 2020 में मेरा नया उपन्यास - डॉ शरद सिंह


Shikhandi ... Stri Deh Se Pare - Novel of Dr (Miss) Sharad Singh
विश्व पुस्तक मेला 2020 में मेरा नया उपन्यास "शिखण्डी ... स्त्री देह से परे" महाकाव्य चरित्र शिखंडी पर एक नए पहलू के साथ ... - डॉ शरद सिंह 
 
Novel - Shikhandi ... Stri Deh Se Pare
Novelist - Sharad Singh

Publisher - Samayik Prakashan, New Delhi
3320-21 Jatwara,Netaji Subhash marg
Near Sablok Clinic, Daryaganj New Delhi 110002
E-mail: samayikprakashan@gmail.com
Website: www.samayikprakashan.com
Telephone: 011-23282733, 23270715
Telefax: 011-23270715

Friday, December 13, 2019

आइए मिलते हैं इन्दौर लिटरेचर फेस्टिवल 2019 में ...

Dr (Miss) Sharad Singh As Speaker in Indore Literature Festival 2019
Dr (Miss) Sharad Singh As Speaker in Indore Literature Festival 2019

डॉ शरद सिंह इन्दौर लिटरेचर फेस्टिवल 2019 में...

बतौर स्पीकर इन्दौर लिटरेचर फेस्टिवल 2019 में...
Dr (Miss) Sharad Singh as Speaker in Indore Literature Festival 2019
Dr (Miss) Sharad Singh as Speaker in Indore Literature Festival 2019
http://indorelitfest.com/speakers.phphttp://indorelitfest.com/speakers.php

Thursday, December 12, 2019

बुंदेलखंड में कहां से आई बुंदेली? - डाॅ. शरद सिंह - नवभारत, 12.12.2019 में प्रकाशित

Dr (Miss) Sharad Singh
बुंदेलखंड में कहां से आई बुंदेली?
       - डाॅ. शरद सिंह
(#नवभारत, 12.12.2019 में प्रकाशित)
       बुंदेली बोली है या भाषा? बुंदेलखंड में कहां से आई बुंदेली? बुंदेलखंड के पढ़के-लिखे तबके को बुंदेली बोलना चाहिए या नहीं? जैसे गहन-गंभीर प्रश्न कभी-कभी चाय की चुस्कियों के साथ चर्चा एवं विचार-विमर्श के विषय बन जाते हैं। प्रत्येक बुंदेलखंडी को अपनी बुंदेली पर गर्व है और वह इसे भाषा के रूप में मान्यता दिलाने की प्रबल इच्छा रखता है। लेकिन का स्वरूप क्या है? यह सारी चर्चा एक छोटे से विचार-विमर्श के रूप में उभरी जब मैं, मेरी दीदी डाॅ वर्षा सिह और स्थानीय कवि वीरेन्द्र प्रधान हिन्दी साहित्य और क्षेत्रीय साहित्य पर चर्चा करते हिन्दी से बुंदेली की चिंतन-यात्रा पर निकल पड़े। चाय की चुस्कियों के समापन तक वार्ता का विषय बदल गया किन्तु मेरे मानस में बुंदेली का अस्तित्व उथल-पुथल मचाता रहा। मुझे अपने वे दिन याद आ गए जब मैंने खजुराहो की मूर्तिकला पर पीएच. डी. करने के दौरान बुंदेलखंड की प्राचीनता का अध्ययन कर रही थी। अभी दो माह पहले मेरे मानस में बुंदेलखंड की प्राचीनता के वे पन्ने एक बार फिर खुल गए थे जब मैं अपना चैथा उपन्यास लिख रही थी। 

बुंदेलखंड प्राचीन काल में वत्स तथा मध्ययुग में जेजाकभुक्ति के नाम से जाना जाता था। बुन्देलखंड नाम की प्राचीनता भले ही संक्षिप्त है, किन्तु इस भू-भाग की प्राचीनता मानव सभ्यता के विकास के प्राक्युग से जुड़ी हुई है। पूर्व पाषाण युगीन मानव के उपकरण सागर, दमोह तथा बुन्देलखंड के अन्य क्षेत्रों में मिले हैं। ये बिल्लौर पत्थर, बलुआ पत्थर तथा सोपानाश्म (ट्रप) के बने हुए हैं। इनका काल लगभग पांच लाख ईस्वी पूर्व माना गया है। ये सामग्री उस सभ्यता की धरोहर है जब मनुष्य बड़े, भोथरे औजार-उपकरण बनाता था। अर्थात् बुंदेलखंड प्रगैतिहासिक मनुष्यों का निवास स्थान रहा। रहा भाषा का सवाल तो महाकाव्य काल के दो प्रसिद्ध ग्रंथों ‘रामायण’ एवं ‘महाभारत’ के रचयिता बुन्देलखण्ड की धरती से जुड़े थे। इन ग्रंथों में चेदि, दशार्ण एवं कारुष के रूप में बुंदेलखंड का ही उल्लेख है। बुंदेलखंड में अनेक जनजातियां निवास करती थीं। इनमें कोल, निषाद, पुलिन्द, किरार, नाग आदि थे जिनकी अपनी स्वतंत्र भाषाएं थी। जहां संस्कृत विद्वानों की भाषा थी वहीं जनपदीय भाषा ‘विंध्येली’ थी। विंध्य पर्वत श्रृखंला के कारण यह नाम पड़ा। भरतमुनि के ‘नाट्य शास्त्र’ में ‘विंध्येली’ का उल्लेख है। भाषाविदों का मानना है कि भवभूति ‘उत्तर रामचरित’ के ग्रामीणजनों की भाषा ’विंध्येली’ वस्तुतः प्राचीन बुन्देली ही थी। प्राचीन बुन्देली अर्थात् ‘विंध्येली’ के ‘काल्पी सूत्र’ काल्पी में प्राप्त हुए हैं। माना जाता है कि चन्देल नरेश गण्डदेव (सन् 940 से 999 ई.) तथा उसके उत्तराधिकारी विद्याधर (सन् 999 ई. से 1025 ई.) के काल में बुन्देली भाषा के रूप में सामने आई। बुंदेली भाषा रासो काव्य धारा के माध्यम से विकसित हुई। जगनिक ‘आल्हखण्ड’ तथा ‘परमाल रासो’ प्रौढ़ भाषा की रचनाएं हैं।
भाषा काव्य की परम्परा दशवीं शती से प्रारम्भ हो गई थी। बुन्देली के आदि कवि के रुप में प्राप्त सामग्री के आधार पर जगनिक एवं विष्णुदास सर्वमान्य हैं जो बुन्देली की समस्त विशेषताओं से मण्डित हैं। पं. किशोरीलाल वाजपेयी लिखित हिन्दी ‘शब्दानुशासन’ के अनुसार - ‘‘हिन्दी एक स्वतंत्र भाषा है, उसकी प्रकृति संस्कृत तथा अपभ्रंश से भिन्न है। जबकि बुन्देली की जननी प्राकृत (शौरसेनी) तथा संस्कृत भाषा है। दोनों भाषाओं में जन्मने के उपरांत भी बुन्देली भाषा की अपनी चाल, अपनी प्रकृति तथा वाक्य विन्यास को अपनी मौलिक शैली है।’’
बुंदेलखंड में कहां से आई बुंदेली? - डाॅ. शरद सिंह, नवभारत, 12.12.2019 में प्रकाशित

बुंदेलखंड के यशस्वी राजा महाराज छत्रसाल के समय बुंदेली को राजभाषा का दर्ज़ा प्राप्त था। स्वयं महाराज छत्रसाल के राजकीय पत्र बुंदेली में मिलते है। तो प्रश्न उठता है कि जो बुंदेली महाकाव्यकाल से आकार लेने लगी थी और अपनी स्वतंत्र पहचान बनाने लगी थी, जो बुंदेली एक समय राजभाषा का दर्ज़ा रखती थी, जो बुंदेली जगनिक से ईसुरी तक यह साहित्य सृजन का भाषाई आधार बनी रही। वह भाषा के पद से अपदस्थ कब हो गई? तो इसका एक उत्तर बुंदेलखंड के राजनीतिक और आर्थिक इतिहास में मिलता है। स्वाभिमानी बुंदेलों ने आक्रमणकारियों के आगे कभी घुटने नहीं टेके। चाहे वह शेरशाह सूरी का समय हो अथवा अहमद शाह अब्दाली का। अंग्रेजों के आगे घुटने टेकने का तो प्रश्न ही नहीं था। अंग्रेजों को टक्कर देने का कार्य सबसे पहले बुंदेलों ने किया। इतिहास में दर्ज़ सन् 1842 का ‘बुंदेला विद्रोह’ इसका प्रमाण है। इसी का दूसरा पक्ष भी है कि जब राजनीतिक स्थिरता नहीं रहती है तो आर्थिकतंत्र छिन्न-भिन्न हो जाता है। भुखमरी और ग़रीबी छाने लगती है और आमतौर पर भूखा पेट श्रम कराता है, पढ़ाई नहीं। अंग्रेजी, संस्कृत, उर्दू और क्रमशः खड़ीबोली के बीच बुंदेली भाषा से बोली बन कर रह गई। अनपढ़ों या कम पढ़े-लिखों की बोली। लेकिन आज बुंदेली के भाषाई अतीत को पुनस्र्थापित करने के लिए अनेक सार्थक प्रयास किए जा रहे हैं। बुंदेली बुंदेलखंड में ही जन्मी, यहीं बुंदेली ने राज किया और भविष्य में भी यह बुंदेलखंड की जातीय पहचान को बनाए रखती हुई एक बार फिर भाषा का दर्ज़ा पा ही लेगी।
          --------------------------------
#नवभारत #बुंदेलखंड #शरदसिंह #बुंदेली