Wednesday, April 1, 2020

शून्यकाल ...भावनाओं से खेलते सोशल मीडिया के अपराधी - डाॅ. शरद सिंह

शून्यकाल ...
भावनाओं से खेलते सोशल मीडिया के अपराधी
 
- डाॅ. शरद सिंह


आज सोशल मीडिया पर जिस तरह भावनाओं के साथ खिलवाड़ किया जाता है उसे देख कर सुदर्शन की कहानी ‘हार की जीत’ याद आती है। उस कहानी में डाकू खड्गसिंह एक अपाहिज बन कर सहायता मांगता हुआ बाबा भारती के पास पहुंचा और उनकी सद्भावनाओं से खिलवाड़ करता हुआ उनका घोड़ा ले उड़ा था। तब उसे रोक कर बाबा भारती ने कहा था कि “लोगों को यदि इस घटना का पता चला तो वे दीन-दुखियों पर विश्वास न करेंगे।“ बाबा भारती कम से कम डाकू खड्गसिंह को यह कह तो सके लेकिन इंटरनेट की आभासीय दुनिया में फ़र्ज़ी आईडी वाले डाकुओं की कोई कमी नहीं है और ये डाकू जनता की भावनाओं पर बेख़ौफ़ डकैती डालते रहते हैं। 

शून्यकाल ...भावनाओं से खेलते सोशल मीडिया के अपराधी - डाॅ. शरद सिंह
      मुझे व्हाट्एप्प की मैसेजेस की भीड़ से घबराहट होती है। उस पर आमतौर पर ऊलजलूल संदेशों से भरे हुए व्हाट्एप्प ग्रुप से तो भगवान बचाए। संदेशों की ये बाढ़ मोबाईल की मेमोरी को तो डुबा ही देती है, साथ ही दिमाग की बत्ती भी गुल कर देती है। फिर भी कई ग्रुप एडमिन जागरूक होते हैं और वे सजगता के साथ अपने ग्रुप का संचालन करते हैं। ऐसे ही एक ग्रुप से मैं भी जुड़ी हूं। उस ग्रुप में विभिन्न क्षेत्रों के बुद्धिजीवी हैं। लेकिन जब बात भावनाओं की हो तो तर्क पीछे छूट जाते हैं। पिछले दिनों इसी तरह का उदाहरण मेरे सामने आया। उस व्हाट्एप्प ग्रुप के एक सदस्य ने एक तस्वीर पोस्ट की। तस्वीर में अपने माता-पिता के साथ दो बच्चे दिखाई दे रहे थे। एक लड़का और एक लड़की। अबोध आयु के।
तस्वीर के साथ संदेश लिखा था कि-‘‘यह परिवार एक नैनो में सफर कर रहा था देवास के पास कार का सीरियस एक्सीडेंट हो गया और दोनों मां-बाप एक्सपायर हो चुके हैं। दोनों बच्चे अपना पता एड्रेस बताने में असमर्थ हैं। कृप्या इस तस्वीर को फार्वर्ड करने की कुपा करें।’’
निश्चितरूप से बड़ा मार्मिक संदेश था जिसे पढ़कर कोई भी व्यक्ति बिना सोचे-विचारे उस पोस्ट को आगे बढ़ा देगा। मैंने भी उस पोस्ट को पढ़ा लेकिन देर से। तब तक उस व्हाट्एप्प ग्रुप के एडमिन चैतन्य सोनी जो एक जागरूक पत्रकार हैं, उस पर टिप्पणी कर चुके थे। मैंने उनकी टिप्पणी पढ़ी।
उनकी टिप्पणी थी कि -‘‘ये फोटो क्या नैनो कार में से मिली है?’’
फिर उनकी दूसरी टिप्पणी थी -‘‘शायद फेक है यह।’’
जाहिर है कि एक पत्रकार की नज़र ने उस जालसाजी को ताड़ लिया जो आम व्यक्ति नहीं ताड़ सकता है। मैंने भी ध्यान से देखा, वह फोटो बहुत ही अच्छी हालत में और एकदम साफ़सुथरी थी। लिहाजा उसका उस दुर्घटनाग्रस्त कार से मिलना तो संभव नहीं था। और जब बच्चे अपने घर का पता नहीं बता पा रहे थे तो वह फोटो व्हाट्एप्प मैसेज करने वाले को कहां से मिल गई? न जाने किस परिवार की फोटो का इस तरह दुरुपयोग किया गया था। उस व्हाट्एप्प ग्रुप में जिन्होंने उस पोस्ट को शेयर किया था, वे एक प्रबुद्ध व्यक्ति हैं लेकिन स्वाभाविक है कि भावुकता में वे इस पक्ष पर नहीं सोच सके होंगे और जब यह संदेश उनके पास आया होगा तो उन्होंने उसे ग्रुप में शेयर कर दिया। जब दुर्घटना और बच्चों के साथ किसी त्रासदी की बात हो तो कोई भी व्यक्ति व्याकुल हो उठेगा और जल्दी से जल्दी उनकी सहायता के लिए तत्पर हो जाएगा। इसमें उन प्रबुद्ध सदस्य का कोई दोष नहीं था। लेकिन यहीं प्रश्न उठता है कि यदि इसी तरह फर्जी संदेश सोशल मीडिया में पोस्ट और फार्वर्ड होते रहेंगे तो सच्ची घटना घटने पर अथवा सही संदेश पर कोई क्यों ध्यान देगा? दरअसल, चंद खुराफातियों ने संवेदनशील लोगों की भावनाओं से खिलवाड़ करने का हथियार बना रखा है सोशल मीडिया को। वहीं इसे कानून की दृष्टि को देखा जाए तो यह साईबर क्राईम है।

2 अप्रैल 2018 को देश के विभन्न हिस्सों में प्रदर्शन के दौरान जो दंगे, आगजनी और मौतें हुईं उसमें भी सोशल मीडिया पर पोस्ट किए गए भड़काऊ संदेशों का बड़ा हाथ रहा। उसके बाद सभी संवेदनशील क्षेत्रों में प्रशासन के द्वारा इंटरनेट पर कुछ समय के लिए रोक लगा दी। इससे उन भड़काऊ संदेश भेजने वालों का तो कुछ नहीं बिगड़ा लेकिन शेष जनता को भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। आजकल ई-बैंकिग का चलन है। आपात या तुरंत पैसे भेजने के लिए ई-बैंकिंग या इंटरनेट पर आधारित अन्य माध्यम ही अपनाए जाते हैं। इंटरनेट को बंद किए जाने पर न जाने कितने लोगों को समय पर पैसे नहीं मिल पाए होंगे। न जाने कितने लोग बस, रेल या हवाई रिजर्वेशन न करा पाने पर अपने अवसरों से वंचित हो गए होंगे। इन सबसे बड़ा नुकसान व्यापार जगत को हुआ। ई-मार्केटिंग तो ठप्प हुई ही, साथ ही सामान्य बाज़ार भी लड़खड़ा गया। प्रशासन जानता था कि इंटरनेट सेवा रोकने से यह सब होगा लेकिन वह मजबूर था। क्योंकि यदि इंटरनेट सेवा जारी रहती तो भड़काऊ संदेश आग उगलते रहते और उसमें आमजनता की जान और माल जलते रहते। जो सुविधा इंसान को इंसान के करीब लाने और परस्पर मित्र बनाने के लिए ईजाद की गई, उसका इस तरह घृणित उपयोग किया जाना इंसानियत को लज्जित करता है।
विभिन्न धर्मों के देवी-देवता को ले कर अभद्र संदेशों का अदान-प्रदान अकसर होता रहता है। जिसके कारण कई बार माहौल गरमाने लगता है और पुलिस व्यवस्था को यथार्थ के बदले आभासीय दुनिया से उपजे खतरों के पीछे दौड़ना पड़ता है। महिलाओं और उसमें भी विशेषरूप से स्कूल-काॅलेज जाने वाली लड़कियों को इससे विशेष खतरा रहता है। बदनीयत लड़के पहले मित्र बनते हैं फिर अवसर पाते ही विशेष ऐंगल से ली गई सेल्फी या फिर मित्रता प्रेम में बदल चुकी हो तो भावुक पलों का मोबाईल-वीडियो बना लेते हैं और फिर उसे इंटरनेट पर अपलोड करने की धमकी दे कर लड़की को ब्लैकमेल करते रहते हैं। ऐसा नहीं है कि ऐसे अपराध पहले नहीं होते थे। लेकिन एक पीढ़ी पहले तक ऐसे अपराधों को उंगलियों पर गिना जा सकता था। तब लड़की द्वारा लिखे गए प्रेमपत्र बदनीयत लड़कों के हथियार होते थे लेकिन वह उन्हें लड़की के माता-पिता या रिश्तेदारों तक ही भेजने की क्षमता रखता था। लेकिन आज एक अपलोड लड़की की गोपनीयता को पल भर में पूरी दुनिया के सामने सार्वजनिक कर सकता है। यह अपराध भावनाओं के साथ किया गया ऐसा अपराध है जो हत्या से भी अधिक जघन्य है। सिर्फ़ लड़की नहीं वरन किसी सभ्रांत पुरुष या लड़के की आपत्तिजनक तस्वीरें या वीडियो इंटरनेट पर अपलोड करने की धमकी दे कर उसका जीना हराम करने की घटनाएं भी सामने आती रहती हैं। यहां तक कि कभी कोई प्रोफेसर इस अपराध की चपेट में आता है तो कभी कोई राष्ट्रीय स्तर का नेता।
भारत में भी साइबर क्राइम मामलों में तेजी से बढ़त हो रही है। सरकार ऐसे मामलों को लेकर बहुत गंभीर है। भारत में साइबर क्राइम के मामलों में सूचना तकनीक कानून 2000 और सूचना तकनीक (संशोधन) कानून 2008 लागू होते हैं। मगर इसी श्रेणी के कई मामलों में भारतीय दंड संहिता (आईपीसी), कॉपीराइट कानून 1957, कंपनी कानून, सरकारी गोपनीयता कानून और यहां तक कि आतंकवाद निरोधक कानून के तहत भी कार्रवाई की जा सकती है। साइबर क्राइम के कुछ मामलों में आईटी डिपार्टमेंट की तरफ से जारी किए गए आईटी नियम 2011 के तहत भी कार्रवाई की जाती है। इस कानून में निर्दोष लोगों को साजिशों से बचाने के इतंजाम भी हैं। सोशल नेटवर्किंग वेबसाइटों, ई-मेल, चैट वगैरह के जरिए बच्चों या महिलाओं को तंग करने के मामले अक्सर सामने आते हैं। इन आधुनिक तरीकों से किसी को अश्लील या धमकाने वाले संदेश भेजना या किसी भी रूप में परेशान करना साइबर अपराध के दायरे में ही आता है। किसी के खिलाफ दुर्भावना से अफवाहें फैलाना, नफरत फैलाना या बदनाम करना भी इसी श्रेणी का अपराध है। इस तरह के केस में आईटी (संशोधन) कानून 2009 की धारा 66 (ए) के तहत सजा का प्रावधान है। दोष साबित होने पर तीन साल तक की जेल या जुर्माना हो सकता है। ई-मेल स्पूफिंग और फ्रॉड के मामलों में आईटी कानून 2000 की धारा 77 बी, आईटी (संशोधन) कानून 2008 की धारा 66 डी, आईपीसी की धारा 417, 419, 420 और 465 लगाए जाने का प्रावधान है।

आज का युग कम्प्यूटर, मोबाईल और इंटरनेट का युग है। इंटरनेट की मदद के बिना किसी बड़े काम की कल्पना करना भी मुश्किल है। ऐसे में अपराधी भी तकनीक के सहारे हाईटेक हो रहे हैं। वे अपराध करने के लिए कम्प्यूटर, इंटरनेट, डिजिटल डिवाइसेज और वल्र्ड वाइड वेब आदि का इस्तेमाल कर रहे हैं। ऑनलाइन ठगी या चोरी भी इसी श्रेणी का अहम अपराध होता है। किसी की वेबसाइट को हैक करना या सिस्टम डेटा को चुराना ये सभी तरीके साइबर क्राइम की श्रेणी में आते हैं। साइबर क्राइम दुनिया भर में सुरक्षा और जांच एजेंसियां के लिए परेशानी का कारण साबित हो रहा है। लेकिन कंप्यूटर, इंटरनेट और मोबाईल का प्रयोग करने वालों को हमेशा सतर्क रहना चाहिए कि कहीं उनसे भी जाने-अनजाने में कोई साइबर क्राइम तो नहीं हो रहा है। जहां तक संभव हो आपत्तिजनक संदेशों को फार्वर्ड करने से बचने में ही भलाई है। साथ ही, संदिग्ध-संवेदनशील संदेशों को कुछ पल ठहर कर परखना जरूरी है। कहीं ऐसा न हो कि जाने-अनजाने हम अपनी भावुकता के हाथों ही ठगे जाएं। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो सोशल मीडिया के अपराधी दूसरों के दिमाग पर कब्ज़ा कर के अपने अपराधों को अंजाम देते हैं। इसी लिए सतर्क रहते हुए सोशल मीडिया में मौजूद अपराधियों से अपनी संवेदनाओं और भावनाओं को बचाए रखना जरूरी है।
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(छतरपुर, म.प्र. से प्रकाशित "दैनिक बुंदेली मंच", 10.02.2020)
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चित्रकला वर्कशॉप ...



Dr (Miss) Sharad Singh
रंग के साथी ग्रुप सागर द्वारा इंडियन साइंस कांग्रेस के सहयोग से ग्रामीण विकास में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के योगदान पर केन्द्रित चित्रकला वर्कशॉप का सागर शहर में पहली बार तीन दिवसीय आयोजन किया गया। इसके लिए रंग के साथी ग्रुप सागर के ख्यातिलब्ध चित्रकार असरार अहमद बधाई के पात्र हैं। 💐 चित्रकला कार्यशाला पर मेरी दीदी डॉ वर्षा सिंह की रिपोर्ट आज "दैनिक भास्कर" में बहुत खूबसूरत ढंग से प्रकाशित हुई।📰 मैंने भी वर्कशॉप में चित्रकारी का अवलोकन किया....09.02.2020
Dr Sharad Singh & Dr Varsha Singh in Painting Workshop, 09.02.2020

Dr Sharad Singh & Dr Varsha Singh in Painting Workshop, 09.02.2020

Dr Sharad Singh & Dr Varsha Singh in Painting Workshop, 09.02.2020


Dr Sharad Singh & Dr Varsha Singh in Painting Workshop, 09.02.2020

Dr Sharad Singh & Dr Varsha Singh in Painting Workshop, 09.02.2020

Dr Sharad Singh & Dr Varsha Singh in Painting Workshop, 09.02.2020

Dr Sharad Singh & Dr Varsha Singh in Painting Workshop, 09.02.2020

 Dr Varsha Singh in Painting Workshop, 09.02.2020

 Dr Varsha Singh in Painting Workshop, 09.02.2020

Dr Sharad Singh & Dr Varsha Singh in Painting Workshop, 09.02.2020

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Dr Sharad Singh & Dr Varsha Singh in Painting Workshop, 09.02.2020, Dainik Bhaskar


Sunday, February 9, 2020

शून्यकाल ... कबीर के स्त्री-विरोधी दोहों का सच- डॉ. शरद सिंह


Dr (Miss) Sharad Singh
शून्यकाल 
कबीर के स्त्री-विरोधी दोहों का सच
- डॉ. शरद सिंह
      कबीर ने समाज को आईना दिखाने वाले और मानव-प्रेम के दोहे रचे। वह भी उस काल में जब बोधन जैसे कवि को मात्र इसलिए मृत्युदण्ड दे दिया गया था कि उसका कहना था कि हिन्दू और मुस्लिम धर्म में कोई अंतर नहीं है। ऐसे दुरूह समय में पाखण्डियों को स्पष्ट शब्दों में ललकारने वाले कबीर क्या स्त्री-विरोधी दोहे लिख सकते हैं? यह एक चौंकाने वाला तथ्य है। यह एक शोध का विषय भी हो सकता है लेकिन इसके लिए पूर्वाग्रह से उठ कर बारीकी से तथ्यों को परखना होगा। इस संभावना पर भी गौर करना होगा कि कबीर को लांछित करने के लिए उनके नाम से स्त्री-विरोधी दोहे रच दिए गए हों।
कुछ समय पहले लखनऊ की एक शोध छात्रा ने मुझसे प्रश्न किया था कि ‘‘क्या कबीर स्त्री विरोधी थे?’’ यह प्रश्न चेतना को आंदोलित करने वाला था। मैंने उससे पूछा कि आप किस आधार पर कबीर के बारे में यह प्रश्न कर रही हैं? इस पर उस छात्रा ने मुझे कबीर के दो दोहे सुनाए। निश्चितरूप से वे दोनों दोहे स्त्री-विरोधी थे। मैंने उस छात्रा से यही कहा कि मैं तत्काल इस प्रश्न का उत्तर नहीं दूंगी दो दिन बाद उत्तर दूंगी। दो दिन में मैंने कबीर का लगभग तमाम साहित्य खंगाल डाला और साथ ही उस परिदृश्य पर भी ध्यान दिया जो कबीर के समय मौजूद था। दो दिन बाद उस शोध छात्रा ने फिर अपना प्रश्न दोहराया कि ‘‘क्या कबीर स़्त्री-विरोधी थे?’’ मैंने पूर्ण आश्वस्ति के साथ उसे उत्तर दिया कि मेरे विचार से कबीर स़्त्री-विरोधी नहीं थे। उसने प्रतिप्रश्न किया कि लेकिन वे दोहे जिनमें कबीर ने स्त्री को सर्प से अधिक विषधारी बताया है? उसने जो दो दोहे मुझे उदाहरण स्वरूप सुनाए वे इस प्रकार थे -
(1) नारी की झांई पड़त, अंधा होत भुजंग।
‘कबिरा’ तिन की कौन गति, जो नित नारी को संग।।
तथा,
(2) नारी तो हमहूं करी, तब न किया विचार।
जब जानी तब परिहरि, नारी महा विकार।।
इस पर मैंने उससे पूछा कि इसका क्या प्रमाण है कि वे स्त्री-विरोधी दोहे कबीर ने ही रचे हैं। कबीर वाचिक परम्परा के कवि थे। उन्होंने स्वयं कहा है कि -“मसि कागद छूवो नहीं, कलम गही नहिं हाथ।“ अतः जब विरोधीजन प्रकाशित, प्रमाणित रचनाओं में भी हेरफेर कर देते हैं तो क्या यह संभव नहीं है कि कबीर की स्पष्टवादिता से खीझे हुए विरोधियों ने उन्हें अपने खेमे का दिखाने के लिए कुछ स्त्री-विरोधी दोहे उनके नाम से प्रचारित कर दिए हों। इस पर गंभीरता से शोध होना चाहिए। मेरे विचार से तो शोध के उपरांत ऐसे भ्रामक दोहे कबीर-साहित्य से खारिज़ किए जाने चाहिए।

शून्यकाल ... कबीर के स्त्री-विरोधी दोहों का सच- डॉ. शरद सिंह, Dainik Bundeli Manch, .09.02.2020

07 दिसम्बर 2016 को बीना कॉलेज की प्राचार्या डॉ संध्या टिकेकर द्वारा ग्राम हिरनछिपा में जनजागरूकता अभियान के तहत एक अत्यंत सार्थक संगोष्ठी कराई गई। जिसमें विशिष्ट अतिथि के रूप में अपने विचार रखते हुए मैंने इसी विषय की चर्चा करते हुए शोधार्थियों और विद्वानों से आग्रह किया कि संत कबीर के स्त्री-विषयक दोहों की पड़ताल करना आवश्यक है क्योंकि मुझे संदेह है कि स्त्री-विरोधी दोहे संत कबीर ने लिखे हैं। वे वाचिक परम्परा के कवि थे अतः यह संभव है कि उनके विरोधियों ने दुष्प्रचार के रूप में ऐसे दोहे उनके नाम के साथ प्रचारित कर दिए हों। इस पर उपस्थित विद्वानों मेरे मेरे विचार का समर्थन किया किन्तु एकाध विद्वान ने उस संदर्भ का घालमेल कर दिया जो तुलसीदास के स्त्री-विरोधी दोहे के रूप में जाना जाता है-‘ढोर, गंवार शूद्र पशु नारी। ये सब ताड़न के अधिकारी।।’’ मैंने उनसे आग्रह किया कि कबीर और तुलसी के दोहों के संदर्भ परस्पर एकदम भिन्न हैं। तुलसी ने जो दोहा लिखा है वह रामकथा के अंतर्गत् विशिष्ट चरित्रों के संदर्भ मे लिखा है और इस पर अलग से स्वतंत्र विचार किया जाना चाहिए। जबकि कबीर के नाम वाले ये दोहे लिखित नहीं मौखिक परम्परा से आए हैं जिनमें नाम के दुरुपयोग की पूरी संभावना है। ये दोहे किसी कथा-संदर्भ के अंतर्गत भी नहीं हैं। अतः इन पर विचार करते हुए तुलसी के दोहे को परे रखना होगा।
कबीर ने जिस काल में दोहों की रचना की उस समय सिकन्दर लोदी का शासन था। सिकन्दर लोदी एक असहिष्णु शासक था। उसकी धार्मिक भेद-भाव की नीतियों के कारण समाज हिन्दू और मुस्लिम दो भागों में बंटा हुआ था। दोनों धार्मिक समाजों में एकता की बात करना अपराध की श्रेणी में गिना जाता था। इसका उदाहरण कवि बोधन के हश्र के रूप् में देखा जा सकता है। कवि बोधन ने यही कहा कि हिन्दू और मुस्लिम धर्म एक समान है और परिणामस्वरूप उसे मुत्युदण्ड दे दिया गया। ऐसे दुरूह समय में कबीर दोनों धर्मों के पाखण्डियों को खुले शब्दों में ललकार रहे थे। पथभ्रष्ट समाज को उचित मार्ग पर लाना ही उनका प्रधान लक्ष्य है। कथनी के स्थान पर करनी को,प्रदर्शन के स्थान पर आचरण को तथा बाह्यभेदों के स्थान पर सब में अन्तर्निहित एक मूल सत्य की पहचान को महत्व प्रदान करना कबीर का उद्देश्य है। हिन्दू समाज की वर्णवादी व्यवस्था को तोडकर उन्होंने एक जाति, एक समाज का स्वरूप दिया। मूर्तिपूजा पर कबीर ने गहरा व्यंग्य किया। वे कहते है -
पहान पूजै हरि मिले, तो मैं पूजूं पहार।
या तो यह चाकी भली, पीस खाये संसार।।
        इसी प्रकार खुदा को पुकारने के लिए जोर से आवाज लगाने पर वे कटाक्ष करते हैं कि -
कांकर पाथर जोरि कै, मस्जिद लई बनाय।
ता चढ़ि मुल्ला बांग दै, बहरा हुआ खुदाय”
कबीर का नाम हिंदी भक्त कवियों में निर्गुण भक्ति धारा की ज्ञानमार्गी शाखा में प्रमुखता से गिना जाता है। कबीर की रचनाओं को मुख्यतः निम्नलिखित तीन श्रेणियों में विभक्त किया जाता हैः रमैनी, सबद, साखी। ’रमैनी’ और ’सबद’ गाए जाने वाले ’गीत या भजन’ के रूप में प्रचलित हैं। ’साखी’ शब्द साक्षी शब्द का अपभ्रंश है। इसका अर्थ है - “आंखों देखी अथवा भली प्रकार समझी हुई बात।“ कबीर की साखियां दोहों में लिखी गई हैं जिनमें भक्ति व ज्ञान उपदेशों को संग्रहित किया गया है। कबीर ने उलटबांसियां भी कही हैं। कबीर न तो मात्र सामाजिक सुधारवादी थे और न ही धर्म के नाम पर विभेदवादी। वह आध्यात्मिकता की सार्वभौम आधारभूमि पर सामाजिक क्रांति के नायक थे। कबीर मानववादी विचारधारा के प्रति गहन आस्थावान थे। वह युग अमानवीयता का था, इसलिए कबीर ने मानवता से परिपूर्ण भावनाओं, सम्वेदनाओं तथा चेतना को जागृत करने का प्रयास किया। कबीर वर्गसंघर्ष के विरोधी थे। वे समाज में व्याप्त शोषक-शोषित का भेद मिटाना चाहते थे। जातिप्रथा का विरोध करके वे मानवजाति को एक दूसरे के समीप लाना चाहते थे। समाज में छुआछूत का प्रचार जोरों पर देखकर कबीर ने उसका खंडन किया। उन्होंने पाखंडियों को संबोधित करके कहा कि -
जो तुम बाभन बाभनि जाया, आन घाट काहे नहि आया।
जो तुम तुरक तुरकानी जाया, तो भीतर खतना क्यूं न कराया।।
कबीर का समाज-दर्शन अथवा आदर्श समाज विषयक उनकी मान्यताएँ ठोस यथार्थ का आधार लेकर खडी हैं। अपने समय के सामन्ती समाज में जिस प्रकार का शोषण दमन और उत्पीडन उन्होंने देखा-सुना था, उनके मूल में उन्हें सामन्ती स्वार्थ एवम धार्मिक पाखण्डवाद दिखाई दिया जिसकी पुष्टि दार्शनिक सिद्धान्तों की भ्रामक व्यवस्था से की जाती थी और जिसका व्यक्त रूप बाह्याचार एवम कर्मकाण्ड थे। कबीर ने समाज व्यवस्था सत्यता, सहजता, समता और सदाचार पर आश्रित करना चाहा जिसके परिणाम स्वरूप कथनी और करनी के अन्तर को उन्होंने सामाजिक विकृतियों का मूलाधार माना और सत्याग्रह पर अवस्थित आदर्श मानव समाज की नीवं रखी। यहां विचारणीय है कि जो कवि, जो विचारक मानवप्रेम और मानव एकता की बात करता हो वह स्त्री-विरोधी दोहे कैसे रच सकता है? उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि -
जांत-पांत पूछे नहिं कोय। 
हरि को भजे सो हरि का होय।।
इसके बाद कबीर के उस पक्ष को भी ध्यान में रखना होगा जिसमें वे सूफी भावना को स्वीार करते हुए स्वयं को अर्थात् आतमा को स्त्री और परब्रह्म को पुरूष मानते हैं-
सुर तैंतीस कौतिक आए, मुनियर सहस अठासी।
कहैं ‘कबीर’ हम ब्याह चले हैं, पुरुष एक अविनासी।।
अतः कबीर ने तो स्वयं को भी स्त्री माना और अपने गुरु रामानंद का स्मरण करते हुए यही कहा कि - 
कहैं ‘कबीर’ मैं कछु न कीन्हा। 
सखि सुहाग राम मोहि दीन्हा।।
एक बिन्दु यह भी है कि कबीर का जीवन के प्रति सकारात्मक एवं तटस्थ दृष्टिकोण था। उन्होंने कहा कि - 
पानी केरा बुदबुदा, अस मानुस की जात। देखत ही छिप जाएगा,ज्यों तारा परभात।।
इस भंगुर जीवन का अंत जब मृत्यु ही है तो उससे भयभीत क्यां होना? इसी सत्य के महत्व को समझते हुए वे स्पष्टवादी बने रहे। उन्हें शासक, शासन अथवा पाखण्डियों से कभी भय नहीं लगा। उन्होंने कहा कि -
आए हैं तो जाएंगे, राजा, रंक, फकीर। 
एक सिंहासन चढ़ि चले, एक बंधे जंजीर।।
        कबीर ऐसे कवि थे जिन्होंने प्रेम की महत्ता को ज्ञान से भी ऊंचा बताया। उन्होंने कहा कि ज्ञान व्यक्ति को ज्ञानी बनाता है किन्तु प्रेम मनुष्य को मनुष्य बनाता है और जो सच्चे अर्थों में मनुष्य बन गया शेष ज्ञान तो उसे स्वयं हो जाएगा-
पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय। ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।।
अतः प्रेम को सर्वोपरि मानने वाले, पाखण्ड को ललकारते हुए स्पष्ट बोलने वाले, आत्मा को स्त्री और ब्रह्म को पुरुष मानने वाले कबीर स्त्री-विरोधी दोहे भला कैसे रच सकते थे? मुझे तो संदेह है इन दोहों पर। मेरा हमेशा यही आग्रह रहेगा कि कबीर के विचारों के प्रति भ्रम उत्पन्न करने वाले दोहों को जांचने और संदेहास्पद निकलने पर खारिज करने की जरूरत है।
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(छतरपुर, म.प्र. से प्रकाशित "दैनिक बुंदेली मंच", 09.02.2020)
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Saturday, February 8, 2020

शून्यकाल ... पं. दीनदयाल उपाध्याय की मृत्यु और कुछ अनुत्तरित प्रश्न - डॉ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
शून्यकाल 
पं. दीनदयाल उपाध्याय की मृत्यु और कुछ अनुत्तरित प्रश्न
    - डॉ. शरद सिंह
      12 फरवरी, 1968, संध्या सात बज कर छः मिनट पर दीनदयाल जी के ममेरे भाई प्रभुदयाल ने मुखाग्नि दी और दीनदयाल जी की पार्थिव देह को अग्नि को समर्पित कर दिया गया। पंडित दीनदयाल जी की हत्या ने सभी के मन में ये दो प्रश्न जगा दिए थे कि ‘हत्या किसने की?’ और ‘हत्या का उद्देश्य क्या था?’ नानाजी देशमुख ने कहा था, ‘‘इस प्रकार पं. दीनदयाल उपाध्याय की हत्या आज भी भयंकर रहस्य बनी हुई है।’’
यहां मैं अपनी पुस्तक ‘‘राष्ट्रवादी व्यक्तित्व : दीनदयाल उपाध्याय’’ के कुछ अंश साझा कर रही हूं। 
    
10 फरवरी, 1968 को सुबह आठ बजे का समय था। दीनदयाल जी उस समय लखनऊ में अपनी मुंहबोली बहन लता खन्ना के निवास पर थे। देश की तत्कालीन राजनीतिक दशा पर चर्चा चल रही थी कि उसी समय दीनदयाल जी के लिए एक फोन आया। यह फोन किया था बिहार जनसंघ के संगठन मंत्री अश्विन कुमार ने। वे पटना में बिहार जनसंघ की कार्यकारिणी की बैठक आयोजित करने जा रहे थे। अश्विन कुमार एवं बिहार इकाई के सभी पदाधिकारियों की यह हार्दिक इच्छा थी कि दीनदयाल जी इस सम्मेलन में उपस्थित रहें एवं सभी को उचित मार्गनिर्देश दें। इसी सम्बन्ध में अश्विन कुमार ने दीनदयाल जी से निवेदन किया। चूंकि 11 फरवरी, 1968 को दिल्ली में भारतीय जनसंघ के संसदीय दल की बैठक होनी थी अतः दीनदयाल जी के समक्ष असमंजस की स्थिति थी। उस समय तक उन्हें स्पष्ट निर्देश नहीं मिला था कि उन्हें दिल्ली की बैठक में उपस्थित होना है अथवा नहीं। यही बात उन्होंने अश्विन कुमार से कही, ‘‘यदि सुंदर सिंह भंडारी जी ने दिल्ली की बैठक में भाग लेने को नहीं कहा तो मैं पटना आ सकता हूं।’’

शून्यकाल ... पं. दीनदयाल उपाध्याय की मृत्यु और कुछ अनुत्तरित प्रश्न - डॉ. शरद सिंह, Dainik Bundeli Manch, 08.02.2020
    दीनदयाल जी की ओर से इतना अश्वासन अश्विन कुमार के लिए आशाजनक था। उधर अश्विन कुमार दीनदयाल जी के सम्भावित आगमन के समय स्वागत की तैयारी में जुट गये और इधर दीनदयाल जी सुंदर सिंह भंडारी के निर्देश की प्रतीक्षा करने लगे। अंततः पटना जाना तय हुआ।  पठानकोट-स्यालदह एक्सप्रेस में प्रथम श्रेणी बोगी में दीनदयाल जी के लिए बर्थ आरक्षित कराई गयी। पठानकोट-स्यालदह एक्सप्रेस शाम सात बजे लखनऊ स्टेशन पहुंचती थी।
प्रथम श्रेणी के तीन कम्पार्टमेंट थे ‘ए’, ‘बी’ और ‘सी’। दीनदयाल जी की बर्थ ‘ए’ श्रेणी में थी। इसी कम्पार्टमेंट में भौगोलिक सर्वेक्षण के सहायक निदेशक ए.पी. सिंह के लिए आरक्षित बर्थ थी। ‘बी’ कम्पार्टमेंट में उत्तर प्रदेश विधान परिषद के कांग्रेसी सदस्य गौरीशंकर राय के लिए बर्थ आरक्षित थी। यह कहा जाता है कि दीनदयाल जी ने अपनी सुविधा के लिए गौरीशंकर राय से अपनी सीट बदल ली और वे कम्पार्टमेंट ‘बी’ में आ गये। वे गौरीशंकर राय से परिचित थे अतः इस प्रकार से सीट की अदला-बदली में कोई विशेष बात नहीं थी। गौरीशंकर राय भी बिना किसी आपत्ति के कम्पार्टमेंट ‘ए’ में दीनदयाल जी की सीट पर चले गये।
उत्तरप्रदेश के तत्कालीन उपमुख्यमंत्री राम प्रकाश गुप्त एवं उत्तरप्रदेश विधान परिषद के तत्कालीन सदस्य पीताम्बर दास सहित अनेक लोग दीनदयाल जी को विदा देने स्टेशन पहुंचे थे। उस समय दीनदयाल जी ने धोती, खादी की बनियान, बिना बांह का स्वेटर, उस पर एक और स्वेटर और पश्मीना का कुर्ता पहना हुआ था। उत्तरप्रदेश की कड़कड़ाती ठंड से बचने के लिए कुर्ते के ऊपर ऊनी जैकेट पहन रखी थी। कन्धे पर ऊनी शॉल भी थी। उनके साथ कुल तीन सामान थेµसूटकेस, बिस्तर तथा एक थैला जिसमें पुस्तकें थीं।
नियत समय पर गाड़ी ने लखनऊ स्टेशन छोड़ दिया। दीनदयाल जी अपनी बर्थ पर बैठ कर पुस्तक पढ़ने में मगन हो गये। यात्रा के दौरान वे पुस्तकें पढ़ना और लेख इत्यादि लिखना पसन्द करते थे। यह उन्हें यात्रा के समय का सदुपयोग प्रतीत होता था। पर्याप्त समय होने पर इसीलिए कई बार वे पैसेन्जर रेल में यात्रा करना पसन्द करते थे और यात्रा के दौरान वे या तो नया लेख लिख डालते थे अथवा पुराने अधूरे लेख को पूरा कर डालते थे। वे अपने जीवन के एक-एक मिनट को उपयोगी बनाए रखना चाहते थे। 

रात्रि दो बज कर पचास मिनट पर दिल्ली-हावड़ा ट्रेन पटना की ओर जा चुकी थी। इसके लगभग चालीस मिनट बाद रात्रि तीन बज कर तीस मिनट पर रेलवे के लाइनमैन ईश्वर दयाल को अपनी ड्यूटी करते समय सूचना मिली कि प्लेटफॉर्म से लगभग एक सौ पचास गज दूर बिजली के पोल नं.1267 से लगभग तीन फुट की दूरी पर गिट्टियों के ढेर पर एक शव पड़ा हुआ है। यह स्थान रेल लाइन से दूर था अतः रेल से कट कर मरने वाले का शव नहीं हो सकता था।
ईश्वर दयाल ने तत्परता दिखाते हुए सहायक स्टेशन मास्टर को फोन पर शव के बारे में सूचना दी। ईश्वर दयाल तथा अन्य कर्मचारियों से पूछताछ करने पर पता चला कि शव को सबसे पहले रात्रि लगभग तीन बजे दिगपाल नाम के पोर्टर ने देखा था। उस समय एक इंजन शंटिंग कर रहा था जिसका ड्राइवर था गफूर और उस इंजन में सुरक्षा गार्ड किशोर मिश्र भी सवार था। किशोर मिश्र ने यह सूचना लाईनमैन ईश्वर दयाल को दी। ईश्वर दयाल ने सहायक स्टेशन मास्टर को इसकी जानकारी फोन पर दी थी।
शव का पंचनामा बनाने से पहले रेलवे चिकित्सक को बुलाया गया जिसने चिकित्सकीय आधार पर शव की पुष्टि की। इसके बाद शव की तस्वीरें लेने के लिए फोटोग्राफर को बुलाया गया। फोटोग्राफर के कैमरे में फ्लैश लाइट न होने सुबह का पर्याप्त उजाला होने की प्रतीक्षा की गयी। सुबह लगभग सात बजकर तीस मिनट पर शव की तस्वीरें खीचीं गयी। चित्र में शव की जो स्थिति दर्ज़ हुई, वह इस प्रकार थी, ‘‘शव पीठ के बल पड़ा था। सिर उत्तर दिशा की ओर तथा पैर पश्चिम की ओर थे। दायां हाथ सिर की ओर था तथा बायां हाथ शॉल के ऊपर से होकर सीने पर था। शॉल से कमर से मुंह तक का भाग ढंका था।’’
एक बात ध्यानाकर्षित करने वाली थी कि शव के बाएं हाथ की कलाई में घड़ी बंधी हुई थी तथा मुट्ठी में पांच रुपये का नोट दबा हुआ था। यह इस तथ्य की ओर संकेत था कि मृतक के साथ लूटपाट नहीं की गयी थी। मृतक के कपड़ों की तलाशी लेने पर 04348 नं. का प्रथम श्रेणी का टिकट प्राप्त हुआ, 47506 नं. की आरक्षण रसीद, कुल 26 रुपये बरामद हुए। कलाई में बंधी घड़ी की पड़ताल करने पर घड़ी के पीछे ‘नाना देशमुख’ नाम लिखा मिला।
‘अज्ञात मृतक’ के रूप में शव का पंचनामा तैयार किया गया। शव को पोस्टमार्टम के लिए भेजा जाना था। भीड़ देखकर स्टेशन के एक कर्मचारी बनमाली भट्टाचार्य का ध्यान आकृष्ट हुआ। वह भी उत्सुकतावश वहां आ गया और उसने जैसे ही शव को देखा तो वह स्तब्ध रह गया। उसके मुंह से निकला,‘‘ये तो जनसंघ के प्रधान पंडित दीनदयाल जी हैं।’’
मुगलसराय के जनसंघ के कार्यकर्ताओं के बीच यह सूचना जंगल में आग की तरह फैल गयी। आरक्षण कार्यालय से मिली जानकारी ने इस बात की पुष्टि कर दी कि जिस शव को पुलिस ‘अज्ञात व्यक्ति का’ मान रही थी, वह राष्ट्रीय स्तर के ख्यातिप्राप्त राजनीतिज्ञ पंडित दीनदयाल उपाध्याय का शव था।

माननीय चन्द्रचूड़ की अध्यक्षता में गठित ‘चन्द्रचूड़ आयोग’ ने पं. दीनदयाल उपाध्याय की हत्या के कारणों एवं परिस्थितियों को नये सिरे से जांचना आरम्भ किया। आयोग ने वाराणसी के विशेष जिला एवं सत्र न्यायाधीश मुरलीधर द्वारा दिए गये कई बिन्दुओं पर अपनी असहमति जताई। आयोग ने नवीन दृष्टिकोण से घटना का स्पष्टीकरण सामने रखा। आयोग ने विवेचना करते हुए लिखा, ‘‘यदि श्री उपाध्याय की मृत्यु के साथ उनके सामान की चोरी भी हुई और यदि हत्या और चोरी किसी एक योजना के अंग हैं तो यह निष्कर्ष निकालना युक्तिसंगत है कि इस हत्या का राजनीति से कोई सम्बन्ध नहीं है। हत्या कुछ लाभ के उद्देश्य से की गयी और हत्या का कुछ तत्कालीन कारण या तो चोरी करते समय पकड़े जाने से बचना था या यह कि चोरी सुविधा से की जा सके।’’
पं. दीनदयाल उपाध्याय के एक हाथ में पांच रुपए के नोट का पाया जाना एक अहम बिन्दु था। इस बिन्दु पर आयोग की ओर से टिप्पणी की गई, ‘‘केवल इस बात के अलावा मेरी समझ में बिलकुल नहीं आया कि कौन और क्यों उनके हाथ में नोट रखेगा? हत्यारे, विशेषकर राजनीतिक हत्यारे, अपना काम करने के बाद घटनास्थल पर ठहरते नहीं। यह भी समझ में आ सकता है, यद्यपि मैंने इस सम्भावना को नहीं माना है, लाश खम्भे के पास रखी गयी ताकि वह एक दुर्घटना जान पड़े परन्तु यह मैं नहीं मान सकता कि दुर्घटना सिद्ध करने के प्रयास में षड्यंत्रकारियों ने इत्मीनान से काम किया कि उसमें कोई त्रुटि न रह जाए। अतः नोट उनके हाथ में रखने की बात सर्वथा अमान्य है।’’
इसी तारतम्य में आयोग का मत था, ‘‘पहले वाले निष्कर्ष से यह युक्तियुक्त परिणाम निकलता है कि मृतक अपनी मुत्यु के समय नोट अपने साथ लिए हुए था।’’
उपरोक्त दोनों बिन्दुओं के निष्कर्षतः परिणाम न निकल पाने तथा जांच के दौरान रह जाने वाली कमियों के कारण ‘चन्द्रचूड़ आयोग’ भी पं. दीनदयाल उपाध्याय की हत्या के वास्तविक कारणों की तह तक नहीं पहुंच सका। आयोग के निष्कर्षों पर टिप्पणी करते हुए नानाजी देशमुख ने कहा था, ‘‘इस प्रकार पं. दीनदयाल उपाध्याय की हत्या आज भी भयंकर रहस्य बनी हुई है।’’                
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Friday, February 7, 2020

चर्चा प्लस ... कौन जिम्मेदार था देश के विभाजन के लिए?- डाॅ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
चर्चा प्लस ... कौन जिम्मेदार था देश के विभाजन के लिए?  
        - डाॅ. शरद सिंह 
       देश का विभाजन क्यों हुआ? कैसे हुआ? इसके लिए जिम्मेदार कौन था? क्या इसे रोका जा सकता था? ये चारो प्रश्न बार-बार उठते रहते हैं। आज राजनीतिक मंचों और टेलीविजन चैनल्स के डिस्कशन में जिस तरह कटुता भरे आरोप-प्रत्यारोप लगाए जाते हैं उसे देख-सुन कर ऐसा लगता है गोया हम उसी बंटवारे के दौर में जा पहुंचे हैं। जबकि कुछ भी कहने से पहले बेहतर है कि पहले हम समझ लें  तत्कालीन स्थितियों को। इस संदर्भ में मैं यहां अपनी पुस्तक ‘‘राष्ट्रवादी व्यक्तित्व: महात्मा गांधी’’ (सामयिक प्रकाशन नईदिल्ली, वर्ष 2015) के कुछ अंश दे रही हूं जिनसे तत्कालीन परिस्थितियां समझी जा सकती हैं।

अंग्रेजों की ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति रंग लाने लगी थी। भारतीय मुस्लिमों और हिन्दुओं को दो धार्मिक समुदाय में बांटने में अंग्रेजों ने कोई कसर नहीं छोड़ी थी। उनकी अलगाववादी नीतियों का ही प्रभाव था कि भारत का एक बड़ा मुस्लिम समुदाय भारत से अलग होकर मुस्लिम राष्ट्र के रूप में स्थापित होने के लिए व्याकुल हो उठा। आरम्भिक गतिविधियों के रूप में मार्च, 1940 में लाहौर अधिवेशन में मुस्लिम लीग ने मुस्लिमों के लिए एक अलग राज्य की मांग उठाई। मुस्लिम लीग के इस निर्णय के पीछे कुछ कट्टरपन्थी विचारधारा वाले मुस्लिमों का हाथ था। 8 अगस्त, 1942 को कांग्रेस द्वारा पारित ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ प्रस्ताव के कारण भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया तथा कांग्रेस के कई महत्त्वपूर्ण नेताओं को गिरफ्तार कर लिया। कांग्रेस के नेताओं की अनुपस्थिति में मुस्लिम लीग को अपना राजनीतिक उद्देश्य पूर्ण करने के लिए मुस्लिम जनमत को अपने पक्ष में करने एक अच्छा अवसर मिल गया।

20 अक्टूबर, 1943 को जब लार्ड लिनलिथगो के स्थान पर फील्ड मार्शल वावेल को भारत का वायसराय बना कर भेजा गया तो उसका उद्देश्य भारत में उत्पन्न राजनीतिक गतिरोध को समाप्त करना और द्वितीय विश्वयुद्ध में भारतीयों का सहयोग लेना था। फील्ड मार्शल वावेल ने 5 मई, 1944 को महात्मा गांधी तथा अन्य नेताओं को रिहा कर दिया और विश्व युद्ध को समाप्त होता हुआ देखकर वावेल ने कांग्रेस और मुस्लिम लीग के साथ 25 जून से 24 जुलाई, 1945 तक शिमला में बातचीत की। इस बातचीत में कांग्रेस और मुस्लिम लीग भारत के भविष्य पर एकमत नहीं हो सके। विश्वयुद्ध की समाप्ति के एक सप्ताह के भीतर ही वावेल ने केन्द्रीय और प्रान्तीय विधान परिषदों के लिए निर्वाचन की घोषण कर दी। मुस्लिम लीग ने केन्द्रीय विधान परिषद में मुस्लिमों के लिए आरक्षित सभी 30 सीटें जीत लीं। प्रान्तीय विधान परिषद् में मुस्लिम लीग को मुस्लिमों के लिए आरक्षित 560 सीटों में से 427 सीटें प्राप्त हुईं। सन् 1946 में कैबिनेट मिशन भारत आया। कैबिनेट मिशन ने प्रमुख राजनीतिक दलों के साथ लम्बी बातचीत के बाद दो प्रस्ताव रखे। पहला प्रस्ताव एक संयुक्त भारत के निर्माण का सुझाव था। दूसरे प्रस्ताव में पंजाब और बंगाल के हिन्दू बहुसंख्यक क्षेत्रों में समीपवर्ती प्रान्तों को भारत में मिलने की स्वतंत्रता के साथ पाकिस्तान के रूप में एक अलग मुस्लिम राज्य को स्वीकार करने का सुझाव दिया गया था। मुस्लिम लीग ने पहले प्रस्ताव पर अपनी सहमति व्यक्त कर दी। यूं तो कांग्रेस ने भी इस प्रस्ताव पर अपनी सहमति जताई किन्तु वह समूह सम्बन्धी व्यवस्था के पक्ष में नहीं थी तथापि अंतरिम साझा सरकार और संविधान सभा का गठन करने के लिए वायसराय फील्ड मार्शल वावेल ने राजनीतिक कार्यवाही शुरू कर दी।
चर्चा प्लस ... कौन जिम्मेदार था देश के विभाजन के लिए?- डाॅ. शरद सिंह

कांग्रेस के अधिकतर नेता पंथ-निरपेक्ष थे और सम्प्रदाय के आधार पर भारत का विभाजन करने के विरुद्ध थे। महात्मा गांधी का विश्वास था कि हिन्दू और मुसलमान साथ रह सकते हैं और उन्हें साथ रहना चाहिए। उन्होंने विभाजन का घोर विरोध किया, ‘‘मेरी पूरी आत्मा इस विचार के विरुद्ध विद्रोह करती है कि हिन्दू और मुसलमान दो विरोधी मत और संस्कृतियां हैं। ऐसे सिद्धांत का अनुमोदन करना मेरे लिए ईश्वर को नकारने के समान है।’’ 

मुस्लिम लीग और कांग्रेस में विचारधारा के मतभेद उभरने शुरू हो गये थे। 27 जुलाई, 1946 को मुस्लिम लीग ने कैबिनेट मिशन योजना को स्वीकार कर लिया और 16 अगस्त, 1946 को ‘प्रत्यक्ष कार्यवाही दिवस’ के रूप में मनाने के लिए एक प्रस्ताव पारित किया। इससे कलकत्ता में दंगा भड़क उठा, जिसमें लगभग 5000 लोग मारे गये तथा 15000 लोग घायल हुए। इस दंगे में लगभग 1 लाख लोग बेघर हो गये थे। बिहार, उत्तर प्रदेश, पंजाब, नोआखाली और उत्तर-पश्चिम सीमाप्रांत में भी भीषण साम्प्रदायिक दंगे भड़क उठे थे। इस दौरान वाइसराय वावेल ने जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में अंतरिम सरकार के गठन की प्रक्रिया पूर्ण कर ली थी। अंतरिम सरकार का मुस्लिम लीग ने पहले तो बहिष्कार किया लेकिन बाद में फिर वह अपना कोटा मंत्रालयों में भरने के लिए तैयार हो गयी। इस प्रकार देश में साझा अंतरिम सरकार का गठन हो गया। बाद में मुस्लिम लीग ने सरकार की कार्यवाहियों में अनेक बाधाएं खड़ी करनी शुरू कर दीं। मुस्लिम लीग द्वारा लगातार बाधा उत्पन्न करने की स्थितियों से व्यथित होकर जवाहरलाल नेहरू और सरदार वल्लभ भाई पटेल यह सोचने के लिए विवश हो गये कि साझा अंतरिम सरकार से तो बेहतर होता कि विभाजन के लिए ही कार्यवाही की जाती। इस तरह विभाजन को वैकल्पिक रूप से सही मानना तत्कालीन परिस्थितियों को देखते हुए विवशता बन गयी थी। लगातार भारत में अपने विरुद्ध बिगड़ती हुई परिस्थितियों को देखते हुए ब्रिटिश सरकार ने भारत छोड़ने का निर्णय ले लिया। 

जून, 1948 सत्ता हस्तान्तरण की अवधि घोषित की गई थी किन्तु भारत के दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच लगातार गहरे होते जा रहे मतभेदों के कारण अंततः समस्त परिस्थितियों पर विचार करते हुए, 3 जून, 1947 को लार्ड माउंटबेटन ने भारत के विभाजन की घोषणा कर दी। सत्ता हस्तांतरण के लिए 15 अगस्त, 1947 की तिथि घोषित की गई। सत्ता हस्तांतरण की तिथि पूर्व घोषित तिथि जून, 1948 से अगस्त, 1947 कर दिए जाने के कारण देश के सामने गम्भीर चुनौतियां उत्पन्न हो गयीं। क्योंकि भारत और पाकिस्तान के रूप में देश का विभाजन होने के कारण उत्पन्न होने वाली प्रशासनिक और कानून व्यवस्था सम्बन्धी समस्याओं को सुलझाने के लिए कोई पूर्व निश्चित योजना तैयार नहीं की गयी थी। स्वयं रेडक्लिफ ने लिखा, ‘‘जब मैं नक्शे पर विभाजन की लकीर खींच रहा था, तब मुझे पता नहीं था कि मेरी खींची लकीर किसी के घर के बीच से गुज़र रही है, आंगन के बीच से गुज़र रही है अथवा शयनकक्ष के बीच से गुज़र रही है। लकीर खींचते हुए मेरे हाथ कांप रहे थे।’’ भारत का विभाजन हो गया। देश का 30 प्रतिशत भाग कटकर पाकिस्तान नाम से एक अलग देश बन गया। ‘पाकिस्तान मेरी लाश पर बनेगा’- की घोषणा करने वाले महात्मा गांधी असहाय से देखते रहे।

वस्तुतः देश के विभाजन के लिए कोई एक व्यक्ति नहीं बल्कि के लिए हम तत्कालीन भारतीय ही जिम्मेदार थे जो अंग्रेजों के बहकावे में आ गए और आपस में बैर मान बैठे। चौंकन्ने रहना होगा कि कहीं वही बैर एक बार फिर न जाग उठे।
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(दैनिक ‘सागर दिनकर’, 05.02.2020)
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Wednesday, February 5, 2020

शून्यकाल ... बुंदेलखंड और पलायन का मुद्दा - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
शून्यकाल 
बुंदेलखंड और पलायन का मुद्दा
  - डॉ. शरद सिंह
       राजनीतिक बहसों के दौरान जिस तरह जाति, धर्म और नागरिकता पर जंग छिड़ी हुई है उसके बीच मजदूरों के मुद्दे कहीं खो से गए हैं। गोया मजदूरों के बारे में चिन्ता करने की कतई जरूरत नहीं है। जबकि देश में अब कृषकों से भी बड़ी मजदूरों की संख्या हो चली है। इनमें वे कृषक मजदूर भी शामिल हैं जो माईग्रेट कर के एक राज्य से दूसरे राज्य मजदूरी करने जाते हैं। छत्तीसगढ़, उड़ीसा, बिहार और अब बुंदेलखंड के मजदूरों की मांग सबसे अधिक होती है। वहीं इनका मेहनताना सबसे कम होता है। अपना घर, गांव, जमीन छोड़ कर कोई कहीं और नहीं जाना चाहता है। लेकिन जब पेट भरने का कोई उपाय दिखाई न दे, व्यक्ति दाने-दाने को मोहताज हो जाए तो उसे सबकुछ छोड़-छाड़ कर परदेस में भटकना पड़ता है। भारतीयों का गिरमिटिया मजदूर बन कर दक्षिण आफ्रिका में गन्ने के खेतों में काम करने जाना और पशुवत् जीवन जीने को विवश होना इसी तरह के पलायन की वह आरम्भिक कड़ी है जो इतिहास के पन्नों में दर्ज़ है। उस समय हम गुलाम थे लेकिन अब अपने प्रजातंत्र में रहते हुए भी किसानों को मजदूर बनते देख रहे हैं। 
सन् 2011 को मुझे कटनी से सागर आना था। नियत समय पर स्टेशन पहुंची तो वहां देखा कि छत्तीसगढ़ी मजदूर परिवारों से प्लेटफाॅर्म अटा पड़ा था। बौखलाई सी स्त्रियां, झंुझलाए से पुरुष और कुपोषण के शिकार बच्चे। मैंने अपनी आंखों से उन बच्चों को मिट्टी के बरतन में सहेज कर रखे बासी भात पर झपटते देखा। उस पल मन में यही विचार आया कि क्या यही है मेरा भारत? मजदूरों का वह समूह अकेले नहीं था। उनके साथ उनका एक कथित ठेकेदार था। उसी ने उन्हें रेल में ले जाने की व्यवस्था की थी। वह बीच-बीच में आकर समझा रहा था कि उनमें से कितने लोगों को किस डिब्बे में चढ़ना है। उन मजदूर परिवारों के चेहरों पर साफ देखा जा सकता था कि वे अपने अनिश्चित भविष्य को ले कर भयभीत हैं। 
शून्यकाल ... बुंदेलखंड और पलायन का मुद्दा - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
         लगभग यही दृश्य मुझे सन् 2017 में खजुराहो रेलवे स्टेशन पर देखने को मिला। अंतर मात्र इतना था कि कटनी रेलवे स्टेशन में मैंने छत्तीसगढ़ी मजदूरों को देखा था जो पोटली में मिट्टी के बरतनों में बासी भात बांध कर पलायन कर रहे थे। जबकि खजुराहो रेलवेस्टेशन पर मैंने जिन मजदूरों को देखा वे बुंदेलखंड के थे और उनकी पोटलियों में बाजरे की मोटी रोटियां बंधी थीं। इन मजदूरों के साथ भी उनके बीवी-बच्चे थे। वे दिल्ली जा रहे थे। इस आशा से कि उस महानगर में उन्हें कोई न कोई काम मिल जाएगा। जिससे उनके बीवी-बच्चों का तो पेट भरेगा ही और बचा हुआ पैसा वे अपने बूढ़े मां-बाप के लिए अपने गांव भेज सकेंगें। एक छलावे भरा स्वप्न उन्हें ज़िन्दगी के रेगिस्तान की ओर ले जा रहा था।
सूखे के प्रकोप, लचर जल प्रबंधन और जल की कमी से जूझ रहे बुंदेलखंड के सैकड़ों गांवों से प्रतिवर्ष अनेक ग्रामीण अपने-अपने गांव छोड़ कर दूसरे राज्यों तथा महानगरों की ओर पलायन करने को विवश हो जाते हैं। असंगठित, अप्रशिक्षित मजदूरों के रूप में काम करने वाले इन मजदूरों का जम कर आर्थिक शोषण होता हैं। यह स्थिति तब और अधिक भयावह हो जाती है जब उन्हें कर्जे के बदले अपना घरबार बेच कर अपने बीवी-बच्चों समेत गांवों से पलायन करना पड़ता है। गरमी का मौसम आते ही गांवों में पानी की कमी विकराल रूप धारण कर लेती हैै। कुंआ, तालाब, पोखर और हैंडपंप सब सूख जाते हैं। अंधाधुंध खनन से यहां की नदियां भी सूखती जा रही हैं। बिना पानी के कोई किसान खेती कैसे कर सकता है? बिना पानी के सब्जियों भी नहीं उगाई जा सकती हैं। खेत और बागीचों के काम बंद हो जाने पर पेट भरने के लिए एकमात्र रास्ता बचता है मजदूरी का। हल चलाने वाले हाथ गिट्टियां ढोने के लिए मजबूर हो जाते हैं। अभावग्रस्त बुंदेलखंड से हर साल रोजी रोटी की तलाश में हजारों परिवार परदेश जाते हैं। मगर रोटी की खातिर गरीबों का यह पलायन राजनीतिक दलों के एजेंडे में दिखाई नहीं देता है। बुंदेलखंड का क्षेत्र मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में विस्तृत है। इस क्षेत्र में कुल आठ संसदीय क्षेत्र आते हैं। टीकमगढ़, खजुराहो, दमोह और सागर जैसी लोकसभा सीटें मध्य प्रदेश में आती हैं, तो झांसी, जालौन, हमीरपुर और बांदा उत्तर प्रदेश के हिस्से में हैं। इस क्षेत्र में आय का एक मात्र साधन खेती है। यहां कोई बड़ा उद्योग-धंधा नहीं है। दरअसल, खेती भी कुछ खास वर्गो के पास ही है और बहुसंख्यक वे लोग हैं, जो मजदूरी करके अपना पेट पालते हैं। जब सूखा पड़ता है तो बहुसंख्यक वर्ग दाने-दाने को मोहताज हो जाता है। इन्हीं स्थितियों में इस क्षेत्र से लोग पलायन करते हैं।
बुंदेलखंड के ही चित्रकूट जिले की मंदाकिनी, गुन्ता, बरदहा, बानगंगा सूखकर नाली की तरह कहने लगती है। बांदा की रंज, बागेन, केन जैसी बड़ी नदियों की धार जगह जगह से टूट गई है। महोबा की चंद्रावल, बिरमा, अर्जुन, उर्मिल जैसी नदियों में दूर-दूर तक पानी नहीं नजर आ रहा है। बुंदेलखंड की पहज, धसान, सौर, नारायणी जैसी कई नदियां वैसे ही मृतप्राय हो चुकी हैं। सागर की बेबस नदी अपनी बेबसी पर आंसू बहाती रहती है। अवैध रेत खनन के कारण अब यमुना और बेतवा जैसी नदियों के पाट भी सूखने लगे हैं। नदियों के तटवर्ती गांव पांच-पांच किमी की दूरी तय करके किसी तरह अपनी जान बचा रहे हैं। जिन गांवों के आस-पास कहीं भी पानी का इंतजाम नहीं है उन गांवों के लोग पानी और रोटी के लिए महानगरों की ओर पलायन कर रहे हैं। पिछले एक दशक के दौरान करीब 45 लाख लोग यहां से पलायन कर चुके हैं। कुछ साल पहले तक लोग अपने भूखे बच्चों की भूख मिटाने के लिए रोजी-रोटी की तलाश मे परदेश कमाने जाते थे। अब भूख और प्यास दोनों से बचने के लिए दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, मंबई, कोलकाता जैसे महानगरों की ओर पलायन कर रहे हैं। स्वयंसेवी संगठनों के अनुसार बुंदेलखंड छोड़कर जाने वालों का प्रतिशत इसी जून माह में 50 फीसदी का आंकड़ा पार कर सकता है।
भला कौन चाहता है अपना घर, गांव और अपने लोगों को छोड़ कर कहीं बाहर जाना? यदि दो समय की रोटी का जुगाड़ अपने क्षेत्र में ही हो जाए तो कोई भी दूसरे क्षेत्र या दूसरे प्रदेश में नहीं जाना चाहेगा। पेट की लाचारी जिस तरह बुंदेलखंड के किसानों को बेघर कर रही है और दर-दर भटका रही है, बुंदेली युवा रोजगार के लिए महानगरों में भटकते हुए अपराधों की भेंट चढ़ रहे हैं, बुंदेली युवतियों को अपने परिवार का आर्थिक सहारा बनने का प्रयास जिस तरह छल-कपट और शोषण का सामना करना पड़ रहा है वह चिंताजनक है। पलायन की विविशता को आड़ बना कर मानव-तस्करी जैसे घृणित अपराध भी बुंदेलखंड में अपने पांव जमाने लगे हैं। लेकिन हमारे राजनीतिक दलों के अधिकांश बड़बोले नेताओं को जाति, धर्म और नागरिकता से फुर्सत मिले तो वे इन मजदूरों की दीन दशा पर दृष्टिपात करें। काश वे समझ पाते कि पलायन के लिए विवश कृषक से श्रमिक बनते जा रहेे दीन-हीन इंसानों की चिंता भी करनी जरूरी है।            ---------------------
(छतरपुर, म.प्र. से प्रकाशित "दैनिक बुंदेली मंच", 05.02.2020)
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Monday, February 3, 2020

समझने की जरूरत है बुंदेलखंड की ज़रूरतें - डाॅ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
समझने की जरूरत है बुंदेलखंड की ज़रूरतें
 - डाॅ. शरद सिंह
(नवभारत में 03.02.2020 को प्रकाशित)
    हर वर्ष गणतंत्र दिवस मनता है और हर वर्ष वसंत भी आता है। बुंदेलखंड में भी हर्षोल्लास का वातावरण दिखता है, यहां के खेतों में सरसों फूलती है, देवी सरस्वती की पूजा-अर्चना की जाती है, साहित्यकार समाज महाकवि ‘निराला’ की जयंती मनाते हुए उन्हें कृतित्व का स्मरण करता है। ठीक वैसे ही जैसे पूस के बाद माघ, और माघ के बाद फागुन मास प्रतिवर्ष आता और चला जाता है। प्रत्येक सामयिक खुशी के बाद सामने खड़ा रह जाता है क्षेत्र का सदियों पुराना पिछड़ापन। देश को स्वतंत्र हुए भले ही दशकों व्यतीत हो गए किन्तु बुंदेलखंड में विकास की दर कछुआ चाल से ही चलती रही है। कुछ बदलाव तो ऐसे हैं जो मानों समय के साथ स्वतः होते चले गए। यहां शिक्षा की दर आज भी शत-प्रतिशत नहीं हो सकी है। आवागमन के साधनों की आज भी पर्याप्त उपलब्धता नहीं हैं। रोजगार के अवसरों की तो यह दशा है कि युवाओं को अपना घर-द्वार छोड़ कर दूसरे प्रदेशों में रोजी-रोजगार ढूंढना पड़ता है। जल प्रबंधन की कमियां उस समय उजागर होने लगती है जब किसान अच्छी फसल न होने के कारण कर्जे में डूब कर आत्महत्या की ओर कदम बढ़ाने लगते हैं। हर बार केन्द्रीय बजट बनता है और समूचा बुंदेलखंड अपने आप को ठगा-सा महसूस कर के रह जाता है। ऐसा नहीं है कि बुंदेलखंड के विकास के लिए कभी कोई पैकेज नहीं दिया जाता है लेकिन जो पैकेज दिया जाता है उसकी धनराशि कहां, कैसे और कब खर्च होती है, पता नहीं चलता है क्योंकि विकास का प्रत्यक्ष प्रमाण सामने दिखता ही नहीं है। इसका अर्थ तो यही है कि या तो धनराशि को सही ढंग से उपयोग में नहीं लाया जाता है अथवा उसके खर्च की माॅनीटरिंग में कमी रह जाती है।   

बुंदेलखंड के माता-पिता अपना पेट काट कर अपने बच्चों का भविष्य संवारने में जुटे रहते हैं। वे चाहते हैं कि उनका बच्चे अच्छी से अच्छी शिक्षा पाएं और कोई अच्छी नौकरी पा सकें। बेटियों को पढ़ाने की रूचि भी बढ़ी है। लेकिन शिक्षा और रोजगार के मामले में दो समस्याएं हैं। पहली तो यह कि उच्चशिक्षा के भरोसेमंद और प्रतिष्ठित केन्द्र इस अंचल में कम ही हैं। इसी का लाभ उठाते हुए कुछ ऐसी संस्थाएं भी अपनी दूकानदारी खोल कर बैठी हुई हैं जो कम पैसों में कथित डिग्री दे कर युवाओं के भविष्य और उनके माता-पिता के सपनों के साथ खुल कर खिलवाड़ कर रही हैं। दूसरी समस्या है आवागमन के साधनों की कमी की। बुंदेलखंड के अनेक अंचल ऐसे हैं जो आज भी रेल सुविधा की बाट जोह रहे हैं। जिन्हें रेल मार्ग मिल गया है उन्हें गिनती की रेलें मिली हैं। इससे होता यह है कि लम्बी दूरी की कई गाड़ियां इस पूरे अंचल से लगभग रात्रि को ही गुजरती हैं जिससे उनके द्वारा यात्रा कर पाना छात्राओं एवं महिलाओं के लिए जोखिम भरा होता है यदि वे अकेली यात्रा करने की स्थिति में हों। रोजगार के संदर्भ में युवाओं द्वारा कई बार मांग उठाई जा चुकी है कि बुंदेलखंड में आईटी सेक्टर की स्थापना की जाए ताकि युवाओं को अच्छे रोजगार के लिए दूसरे राज्यों में न भटकना पड़े। किन्तु बात वहीं आवागमन के साधनों की कमी पर आ कर अटकती है। कोई भी मल्टीनेशनल कंपनी आईटी सेक्टर मं तभी निवेश करने का मन बनाएगी जब विदेशों से आने वाले उनके प्रतिनिधियों को आवागमन की बेहतर सुविधाएं सुलभ होंगी। समूचे बुंदेलखंड में एकमात्र खजुराहो ही ऐसा हवाई अड्डा है जहां से यात्री उड़ाने भरी जाती हैं किन्तु वह भी गिनती की हैं और वहां से सभी महत्वपूर्ण शहरों के लिए उड़ानों की कमी है। इस मामले पर विशेषज्ञों का कहना है कि यदि खजुराहो हवाई अड़डे का और अधिक विस्तार करते हुए उड़ानों की संख्या बढ़ाई जाएगी तो इससे वहां के ऐतिहासिक एवं अत्यंत कलात्मक विश्वविख्यात मंदिरों को क्षति पहुंच सकती है। इस स्थिति में जरूरी हो जाता है कि बुंदेलखंड के विस्तृत भौगोलिक क्षेत्र के लिए घरेलू उड़ानों के कम से कम दो और ऐसे हवाई अड्डे स्थापित किए जाएं जहां सस्ती उड़ान सेवाएं सुलभ हो सकें और बुंदेलखंड के निवासी देश के अन्य क्षेत्रों से हवाई मार्ग द्वारा जुड़ सकें। 

Article of Dr (Miss) Sharad Singh in Navbharat, समझने की जरूरत है बुंदेलखंड की ज़रूरतें - डाॅ. शरद सिंह
             बुंदेलखंड में चिकित्सा साधनों की भी कमी यथावत बनी हुई है। ग्रामीण क्षेत्र एवं गरीब तबका आज भी नीम हकीमों के हाथों अपनी जान का खतरा उठाता रहता है। अशिक्षित तबका पढ़े-लिखे और प्रशिक्षित डाॅक्टरों में तथा नीम हकीमों के बीच अंतर वह समझ नहीं पाता है। यदि समझ भी जाए तो वह मंहगी चिकित्सा सेवा का बोझ न उठा पाने की स्थिति में नीम हकीमों से दवाएं ले कर संतोष कर लेता है। भले ही दशा बिगड़ने पर उसे जिला चिकित्सालयों की ओर भागना पड़े किन्तु छोटी-छोटी सी प्रतीत होने वाली बीमारियों के लिए वह मंहगी दवाएं या डाॅक्टर की बड़ी-बड़ी फीस नहीं चुका सकता है क्यों कि उसकी कमजोर आर्थि स्थिति उसे इसकी इजाजत नहीं देती है। रहा सवाल सरकारी अस्पतालों की दशा का तो वह आए दिन समाचारपत्रों की सुखियां बनती रहती है। यहां तक कि सरकारी मेडिकल काॅलेजों की दशा भी कोई अच्छी नहीं है। कभी ‘‘मुन्ना भाइयों’’ का स्कैम सामने आता है तो कभी मरीजों के साथ बदसलूकी की दशा दुखी कर देती है। सेवाकार्य के रूप में पहचानी जाने वाली चिकित्सा सेवा आज बुंदेलखंड में भी अपने व्यावसायिक रूप को स्थापित कर चुकी है। गंव के लोग अच्छी चिकित्सा की आशा में शहर की ओर आते हैं और शहर के लोग उसी अच्छी चिकित्सा की आशा में महानगरों का मुंह ताकते हैं।

बुंदेलखंड में विकास की गति धीमी क्यों है? इस तथ्य की तह में पहुंचना जरूरी है और उससे अधिक जरूरी है बुंदेलखंड की जरूरतों को जानने की। लेकिन सवाल उठता है कि जब आजादी के सात दशकों बाद भी ये जरूरतें क्यों बनी हुई हैं जबकि इनकी पूर्ति तो देश स्वतंत्र होने के बाद पहली, दूसरी या तीसरी पंचवर्षीय योजना में ही हो जानी चाहिए थी। कहीं तो कोई चूक, कोई कमी है जो बुंदेलखंड का समुचित विकास नहीं होने देती है।            
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