Thursday, September 3, 2020

अनलॉक 4.0 : सतर्क रहें जब ढाबा और होटल में खाने जाएं | डॉ. (सुश्री) शरद सिंह | दैनिक जागरण में प्रकाशित

दैनिक जागरण में प्रकाशित मेरा विशेष लेख "अनलॉक 4.0 : सतर्क रहें जब ढाबा और होटल में खाने जाएं" 🚩
❗हार्दिक आभार "दैनिक #जागरण"🙏
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अनलॉक 4.0 : सतर्क रहें जब ढाबा और होटल में खाने जाएं
    - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

    1 सितम्बर से अनलॉक 4.0 शुरू हो गया है जो 30 सितंबर तक जारी रहेगा। इसकी गाईड लाईन पहले ही जारी कर दी गई थी। मध्यप्रदेश में इसमें संशोधन भी किया जा चुका है। मसलन, पहले रविवार को लॉेडाउन से मुक्त कर दिया गया था किन्तु दूसरे आदेश में रविवार का लॉकडाउन जारी रखे जाने की सूचना दी गई। कोरोना वायरस महामारी के प्रसार को कम करने के लिए बीते मार्च महीने में लॉकडाउन की घोषणा की गई थी, जो लॉकडाउन 2.0, 3.0, 4.0 तक चला। इसके बाद चरणबद्ध तरीके से अनलॉक के माध्यम से देश को एक बार फिर पुरानी ज़िन्दगी लौटाने की कोशिश की जा रही है। अनलॉक-4 की नई गाइडलाइंस के मुताबिक 1 सितम्बर से सामाजिक, शैक्षणिक, खेल, मनोरंजन, सांस्कृतिक, धार्मिक, राजनीतिक कार्यक्रम और अन्य सभाओं में 100 लोगों के शामिल होने की छूट दी गई है। इस दौरान, मास्क, सोशल डिस्टेंसिंग, थर्मल स्क्रीनिंग और सैनेटाइजर का उपयोग करना जरूरी होगा।

       गृह मंत्रालय की तरफ से अनलॉक को लेकर जारी दिशा निर्देशों में कहा गया है कि राज्य और केंद्र शासित प्रदेश केंद्र सरकार के परामर्श के बिना कंटेनमेंट जोन को छोड़कर किसी भी स्थानीय स्तर पर लॉकडाउन नहीं लगा पाएंगे। पहले इसके लिए केंद्र ने राज्यों को छूट दे रखी थी। अनलॉक 4.0 में लोगों की अंतर-राज्यीय और सामानों की अंतर-राज्यीय गतिविधि पर कोई पाबंदी नहीं होगी। इस तरह की गतिविधियों के लिए किसी तरह की अलग से अनुमति, मंजूरी या ई-परमिट की जरूरत नहीं होगी। मेट्रो रेल को 7 सितंबर से चरणबद्ध तरीके से शुरू करने की अनुमति दी गई है। आगामी 21 सितंबर से 100 व्यक्तियों की अधिकतम सीमा के साथ सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक कार्यक्रमों की अनुमति दी गई है। जबकि स्कूल, कॉलेज और अन्य शैक्षणिक संस्थानों को 30 सितंबर तक बंद  रखे जाने के निर्देश दिए गए हैं। गाईड लाईन के अनुसार कन्टेन्मेंट जोन्स के बाहर स्थित स्कूलों में नौवीं कक्षा से 12वीं कक्षा तक के छात्रों को अपने शिक्षकों से मार्गदर्शन लेने के लिए स्वैच्छिक आधार पर स्कूल जाने की अनुमति दी जा सकती है। राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों में 50 प्रतिशत तक शिक्षण, गैर-शिक्षण कर्मचारियों को ऑनलाइन शिक्षण, टेली-काउंसलिंग से संबंधित कार्य के लिए स्कूलों में बुलाया जा सकता है। ऑनलाइन, डिस्टेंस लर्निंग की इजाजत जारी रहेगी और उसे प्रोत्साहित किया जाएगा।

मनोरंजन के क्षेत्र में 21 सितंबर से ही ओपन एयर थिएटर्स को खोले जाने की अनुमति रहेगी। सिनेमा हॉल, स्वीमिंग पूल, एंटरटेनमेंट पार्क, थियेटर (ओपन एयर थियेटर को छोड़कर) और इस तरह की जगहों पर गतिविधियां प्रतिबंधित रहेंगी। सिनेमा हॉल, स्विमिंग पुल, अंतरराष्ट्रीय उड़ानें (कुछ विशेष मामलों को छोड़कर) अभी भी बंद रहेंगे। अंतरराष्ट्रीय हवाई यात्रा, गृह मंत्रालय द्वारा मंजूर यात्रा को छोड़कर, स्थगित रहेगी।

होटल, ढाबे आदि को खोले जाने की अनुमति सशर्त पहले ही दी जा चुकी है। अर्थात् कोरोना गाईडलाईन का पालन करते हुए होटल, ढाबे आदि खुले रखे जा सकते हैं। जिसके चलते अनलॉक 3.0 में ही लोगों ने होटलों और ढाबों पर जाना आरम्भ कर दिया था। जहां कोरोना गाईड लाईन का सख़्ती से पालन किया जा रहा है, उन होटलों या ढाबों में उपभोक्ताओं को कोई ख़तरा नहीं है लेकिन अनेक ऐसे ढाबे या छोटे होटल हैं जहां गाईड लाईन का पालन पूरी तरह से नहीं किया जा रहा है। यूं भी दूषित और सड़ी गली सामग्री बेचने वाले दुकानदारों के खिलाफ जुर्माना अधिरोपित करने के साथ दंड का प्रावधान है। दूषित पदार्थ का सैंपल लेकर उसकी जांच में दूषित अथवा मिलावट सिद्ध होने पर यह कार्रवाई खाद्य एवं औषधि विभाग द्वारा संबंधित दुकानदार के खिलाफ की जाती है। खाद्य सुरक्षा विभाग के नियमानुसार आदर्श खाद्य सामग्री के जो कानून किसी दुकान या रेस्टोरेंट पर लागू होते हैं, वही नियम किसी साधारण ठेलों पर सामान बेचने वाले विक्रेता पर भी लागू होते हैं। अगर किसी खाद्य सामग्री में कोई कमी या मिलावट पाई जाती है तो पांच हजार रुपये से लेकर पांच लाख तक का जुर्माना ठोंका जा सकता है। बरती गई लापरवाही व अन्य तथ्यों के आधार पर जुर्माने की राशि कोर्ट तय करता है। इसके अलावा दुकानों के साथ ही ठेले वाले को भी खाद्य सामग्री बेचने के लिए भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआइ) से लाइसेंस लेने का प्रावधान है। इस समय जरूरी है कि खाद्य पदार्थ की गुणवत्ता के साथ ही कोरोना गाईड लाईन के पालन पर भी कड़ाई से ध्यान दिया जाए। अनलॉक 4.0 में घर से बाहर खाने का चलन और बढ़ेगा। इसके साथ ही संक्रमण के ख़तरे भी और बढ़ेंगे। ताजा आंकड़ें देखें तो देश में कोरोना संक्रमितों का आंकड़ा तेजी से बढ़कर 36 लाख के पार पहुंच गया है। स्वास्थ्य मंत्रालय की तरफ से सोमवार को जारी आंकड़ों के मुताबिक बीते 24 घंटे में देश में कोरोना के 78 हजार 512 नए मामले सामने आए और इस दौरान 971 लोगों की जान चली गई। इसके साथ ही देश में अब कोरोना संक्रमितों की संख्या 36,21,246 हो गई है वहीं, अब तक 64,469 लोग इस जानलेवा वायरस के शिकार बन चुके हैं। देश में अभी 7,81,975 एक्टिव मामले हैं। कोरोना संक्रमण का ख़तरा टला नहीं है बल्कि बढ़ा ही है। ऐसी स्थिति में यह ध्यान रखा जाना जरूरी है कि होटलों या ढाबों पर उन थाली, प्लेटों और चम्मचों को कैसे सेनेटाईज़ किया जा रहा है जिनका वे बार-बार प्रयोग कर रहे हैं। नियमानुसार तो खाद्य परोसे जाने वाले बरतन यानी थाली, प्लेट, कटोरियां, चम्मच, कप, गिलास आदि डिस्पोज़ल होने चाहिए। इनमें से गिलास, कप, चम्मच तो सीधे मुंह के संपर्क में आते हैं अतः इनका डिस्पोज़ल होना बेहद जरूरी है। एक व्यक्ति के द्वारा इस्तेमाल किए जाने के बाद उसे में दूसरे व्यक्ति को इस्तेमान नहीं करना चाहिए। सरकारी तबके को यह ध्यान रखना होगा कि होटलों और ढाबों द्वारा गाईड लाईन का पालन किया जाए। इसके साथ ही ग्राहकों को भी होटल या ढाबे पर जा कर ऑर्डर देने से पहले यह सुनिश्चित करना होगा कि वहां गाईड लाईन का पालन किया जा रहा है या नहीं। दरवाज़े पर थर्मल टेस्टिंग को ही समुचित सुरक्षा मान लेने की भूल भारी पड़ सकती है।
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(दैनिक जागरण में 03.09.2020 को प्रकाशित)
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Wednesday, September 2, 2020

चर्चा प्लस | बंद होते जाना साहित्यिक पत्रिकाओं का | डॉ शरद सिंह


 चर्चा प्लस

बंद होते जाना साहित्यिक पत्रिकाओं का
- डॉ शरद सिंह

पहले ‘धर्मयुग’, ‘हिन्दुस्तान’, ‘सारिका’ और अब ‘कादम्बिनी’ और ‘नंदन‘ जैसी पत्रिकाएं जिन्होंने हिन्दी साहित्य को हमेशा बढ़ावा दिया, एक-एक कर के बंद हो गईं। यह क्रम आगे भी बढ़ सकता है। इन पत्रिकाओं के मालिकों की आर्थिक हैसियत कम कभी नहीं रही, फिर भी उन्होंने हाथ खींच लिए। ये सभी हिन्दी की पत्रिकाएं थीं। बच्चों से ले कर बड़ों तक के लिए साहित्यिक सामग्री उपलब्ध कराने वाली पत्रिकाएं। क्या इनके मालिक अचानक हिन्दी विरोधी हो गए या फिर कोई और भी कारण है इन पत्रिकाओं के बंद होने का? आइए परखते हैं इस पत्रिका-बंदी के कारणों को।

जो आज तीस वर्ष की आयु से ऊपर के हैं उन्होंने अपने बचपन में ‘नंदन’ ज़रूर पढ़ा होगा। मैंने भी अपने बचपन में ‘नंदन’,‘पराग’,’चंदामामा’ आदि पत्रिकाएं पढ़ीं। वेताल, फ्लैश गॉर्डन, मैंड्रेक की कॉमिक्स के साथ-साथ ये तीनों पत्रिकाएं भी मेरे और मेरी दीदी के लिए मंगाई जाती थीं। मेरी सहेलियां मुझसे मांग कर ये पत्रिकाएं पढ़ा करती थीं। उन दिनों मुझे इन पत्रिकाओं के कारण अपनी सहेलियों पर अपना दबदबा महसूस होता था। उन दिनों ‘नंदन’ में विश्व की महान कृतियां धारावाहिक प्रकाशित की जाती थीं। जिनमें ऑर्थर कानन डायल की ‘शॉरलॉक होम्स’ से ले कर मेगुएल डी सर्वेंटीज़ की ‘डॉन क्विकज़ोट’ जैसे विश्व विख्यात उपन्यास शामिल थे। अनेक पाठक ऐसे होंगे जिनके मन में ऐसे साहित्य के प्रति ‘नंदन’ ने ही रुझान जाग्रत किया होगा। मेरे लिए तो यह सौभाग्य की बात रही कि जिस पत्रिका को मैंने बचपन में पढ़ा, बड़े होने पर उसमें मेरी लिखी कहानियां प्रकाशित हुईं। इसलिए ‘नंदन’ से जो लगाव रहा वह आज उसके बंद होने पर पीड़ा तो दे ही रहा है। यही हाल ‘कादम्बिनी’ का है। इस पत्रिका को मैंने अपने महाविद्यालयीन जीवन में पढ़ना शुरू किया था। बाद में इसमें मेरी परिचर्चा, कहानी, लेख, समीक्षा आदि प्रकाशित हुई।
हिंदी में बाल साहित्य की पत्रिकाओं का प्रकाशन 138 वर्ष पहले आरम्भ हुआ था। हिंदी में पहली बाल पत्रिका भारतेंदु हरिश्चंद्र ने ‘बाल दर्पण’ के नाम से 1882 में इलाहाबाद से शुरू की थी। फिर उन्होंने ‘बाल बोधिनी’ भी निकाली। बच्चों के मनोरंजन देने के साथ ही उनका ज्ञानवर्द्धन करने के उद्देश्य से सरकारी प्रकाशन विभाग ने ‘बाल भारती’ पत्रिका का प्रकाशन आरम्भ किया। सन् 1947 में ‘चंदामामा’ का प्रकाशन शुरू हो चुका था। 1958 में टाइम्स ग्रुप की ‘पराग’ और 1964 में हिंदुस्तान टाइम्स समूह की ‘नंदन। ‘ नंदन' का पहला अंक ही प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू को समर्पित था। इसके कुछ समय बाद ही ‘लोटपोट’ और ‘चंपक’ जैसी बाल पत्रिकाओं का प्रकाशन प्रारंभ हुआ।
हिन्दुस्तान टाइम्स समूह ने सन् 1960 में ‘कादम्बिनी’ पत्रिका का नई दिल्ली से प्रकाशन आरम्भ किया। इसमें साहित्यिकता होते हुए विषय की विविधा थी। इसलिए जल्दी ही यह लोकप्रिय हो गई। इसने साहित्य प्रेमियों एवं सामान्य पाठकों के बीच वर्षों तक अपनी लोकप्रियता बनाए रखी। ‘धर्मयुग’ और ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’ के प्रकाशन बंद होने के बाद की कमी को ‘कादम्बिनी’ बखूबी भरती रही। लेकिन ‘कादम्बिनी’ और ‘नंदन’ दोनों का हश्र अपनी पूर्ववर्ती पत्रिकाओं की तरह ही हुआ। यह कहना गलत नहीं होगा कि इन दोनों पत्रिकाओं ने फिर भी कुछ अधिक समय तक अपने संघर्ष की गाड़ी को खींचा।
एक मंचीय परिसंवाद सत्र में बोलते हुए पत्रकार एवं साहित्यकार आलोक श्रीवास्तव ने बड़े मुद्दे की बात कही थी जिसे यहां उद्धृत करना जरूरी है -‘‘मैं ‘अहा जिंदगी’ का संपादक था। सन् 1991 से 96 तक ‘धर्मयुग’ में रहा मैं। फिर नवभारत टाइम के मुंबई संस्करण में और फिर ‘अहा जिंदगी’ में। विज्ञापन वाले सवाल पर बहुत शोध की जरूरत नहीं है। सब चीजें ऐसे तय नहीं होती हैं। चीजें बहुत बदल गई हैं। आज हमें बहुत व्यापक फलक में देखना होगा। उनके स्रोतों को देखना होगा। कारणों की तलाश करनी होगी। कारणों की श्रृंखलाओं को टटोलना पड़ेगा। तब जाकर हम वस्तुस्थिति का ठीक-ठीक आकलन करने और उसकी काट ढूंढ़ पाने में सक्षम होंगे। बहुत विस्तार में जाने का समय नहीं है।’’
‘पत्र-पत्रिकाएः साहित्यिक सरोकार एवं प्रसार’ विषय पर आयोजित इस परिसंवाद में आलोक श्रीवास्तव ने यह भी कहा था-‘‘मेरा 25 साल का हिन्दी पत्रकारिता का ऑब्जर्वेशन है कि हमने कविता, कहानी, आलोचना, उपन्यास के खांचे बना लिए हैं। स्टीरियोटाइप बना लिए हैं। इनके भीतर अच्छे किस्म की रचनाएं लिखी जा रही हैं और छप रही हैं। लेकिन ऐसी रचनाएं, जो पाठक के दिमाग में उजाला पैदा कर दें, एक रोशनी का विस्फोट कर दें, एक नए मनुष्य का रूपांतरण कर दें, जीवन के बारे में किसी एक दृष्टिकोण से दिखा दें, जो उसने नहीं देखा था, वे नहीं आ रही हैं। हमारा लेखक वर्ग बहुत सुविधाजीवी है। वह प्रेमचंद के जमाने से बहुत आगे निकल आया है। उस पर कोई आरोप नहीं है। ना ही मैं किसी मसीहाई अंदाज में बोल रहा हूँ, लेकिन हिन्दी के वास्तविक लेखक व कवि अभी नेपथ्य में पड़े हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया की पत्रिकाएं निकलती थी - धर्मयुग, सारिका, दिनमान, पराग। इन पत्रिकाओं की हिन्दी क्षेत्र में बहुत गहरी पहुंच थी। पकड़ और प्रभाव था। जब पत्रिकाएं 1990 के बाद से बंद होनी शुरू हुई। हम भारत के लोग विशेषकर हिन्दी क्षेत्र, भाषा, साहित्य के लोग थोड़ा ज्यादा भावुक होते हैं, हमने इसे हिन्दी विरोध के रूप में देखा। यह हिन्दी का विरोध नहीं था। अंग्रेजी की पत्रिकाएं भी बंद हुई। इलस्ट्रेटिड विकली थी, यूथ थी, सांईंस टुडे थी, सब बंद हुई। दरअसल जो व्यापार का मॉडल बन रहा था, उसमें टाइम्स ऑफ इंडिया का टर्न ओवर सौ करोड़ सालाना से दस हजार-बीस हजार सालाना की ओर बढ़ रहा था। उस स्थिति में यह पत्रिकाएं चाहे दस लाख का प्रसार रखें, चाहे बीस लाख का प्रसार रखें। चाहे दस करोड़ का विज्ञापन लाएं, चाहे बीस करोड़ का। वह बहुत छोटा खेल है। इस कारण उन घरानों को वे पत्रिकाएं बंद करनी पड़ी। नतीजा यह हुआ कि पिछले 25-30 सालों में व्यापक प्रसार वाली पत्रिकाएं बंद हो गई।’’

जब से टेलीविज़न घर-घर पहुंच गया तो लोगों का बहुत सारा समय टेलीविजन देखने में चला गया। बहुत सारी चीजें पढ़ने के लिए लोग पत्रिकाओं का इस्तेमाल करते थे। छिटपुट कहानियां पढ़ने के बजाए अब लोग टेलीविजन सीरियल देखने लगे। उनकी जो एक प्यास है वो बुझने लगी। दूसरी बात ये कि पत्रिकाओं में जो विमर्श होता था। उसके जगह टेलीविजन चैनल पर चलने वाले विमर्श ने ले ली है। इसके साथ ही आ गया सोशल मीडिया। हर समय वाट्सअप व फेसबुक पर सूचनाओं की बाढ़ आती रहती है। बेशक़ दृश्य लिखित शब्द का विकल्प नहीं हो सकता लेकिन कम खर्चे में अधिक सूचनाओं का समीकरण पाठकों को प्रिंट मीडिया से दूर कर रहा है। आज इंटरनेट और ऑन लाइन रीडिंग के दौर में जब समाचार पत्रों का ही भविष्य संकट में है तो पत्रिकाओं के लिए तो बहुत ही कम स्पेस बचा है।
यह तो हुआ साहित्यिक पत्रिकाओं का प्रकाशकीय पक्ष जो इलेक्ट्रॉनिक दबाव से जूझ रहा है। कोरोना के चलते मीडिया जगत में जहां इलेक्ट्रॉनिक व डिजिटल मीडिया के दर्शकों एवं पाठकों में बढ़ोतरी हुई है। वहीं प्रिंट मीडिया घोर संकट से जूझ रहा है। बड़े अखबारों की भी हालत खराब है। कई एडिशन को एक साथ समेट कर निकाला जा रहा है। वहीं पाक्षिक और मासिक पत्रिकाओं की हालत और भी खराब है। कई पत्रिकाएं सिर्फ ईकॉपी में ही पीडीएफ फार्मेट में ही छप रहीं है। क्यों कि डाक द्वारा पहुंच संभव नहीं हो पा रही है। यानी पत्रिकाओं को पर्याप्त विज्ञापन नहीं मिल रहा है, उनकी पहुंच पाठकों तक नहीं हो पा रही है, तो पत्रिकाएं चलें तो कैसे चलें?
साहित्यिक पत्रिकाओं के बंद होने के कारण का एक और पहलू है जिस पर गौर करना जरूरी है। जो लोग आज ‘कादम्बिनी’ और ‘नंदन’ के बंद होने पर सोशल मीडिया पर स्यापा कर रहे हैं वे ज़रा अपने दिल पर हाथ रख कर विचार करें कि इन पत्रिकाओं के चलते रहने के लिए उन्होंने क्या योगदान दिया? प्रश्न अजीब है। चलिए, ज़रा खुल कर बात करते हैं कि हमने अपने बच्चों और बच्चों के बच्चों को भी अंग्रेजी भाषा को समर्पित कर दिया है। वे अंग्रेजी की पत्रिकाएं पढ़ते हुए हमें अधिक भाते हैं। जो हिन्दी के पाले में खड़े हैं वे इतने समर्थ नहीं हैं कि बढ़े हुए दामों वाली इन पत्रिकाओं को खरीद सकें। यही हाल बड़ों की साहित्यिक पत्रिकाओं का है। हमारी पढ़े-लिखों और क्रयशक्ति धारकों की एक पीढ़ी अंग्रेजी साहित्य के हवाले हो गई है। अब किसी पत्रिका के चार अंक सागर में, चार अंक कानपुर में, दो अंक शिमला में और सात अंक गोरखपुर में बिकने से तो उस पत्रिका के प्रकाशन का खर्चा निकलने से रहा। हमें इस कटु सत्य को स्वीकार करना होगा कि हिन्दी और हिन्दी की साहित्यिक पत्रिकाएं दोनों हमारे हाथों से फिसलती जा रही हैं।

Thursday, August 27, 2020

साहस नहीं ये तो है दुस्साहस | डॉ. (सुश्री) शरद सिंह | दैनिक जागरण में प्रकाशित

दैनिक जागरण में प्रकाशित मेरा विशेष लेख "साहस नहीं ये तो है दुस्साहस" 🚩
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साहस नहीं ये तो है दुस्साहस 
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
        प्रकृति के सौंदर्य को निहारना भला सभी को अच्छा लगता है। हर कोई भरी हुई नदियों, तालाबों और झर-झर झरते प्रपातों को देखना चाहता है। सागर संभाग में ऐसे अनेक स्थल हैं जो बारिश के दिनों में अपनी छटाएं बिखेरने लगते हैं और पर्यटकों तथा प्रकृतिप्रेमियों को अपने पास बुलाने लगते हैं। सागर के राहतगढ़ वाटर फॉल, राजघाट बांध, पन्ना के बृहस्पति कुण्ड, पांडव फॉल आदि अनेक नाम गिनाए जा सकते हैं जहां प्रति वर्ष बारिश के मौसम में सैंकड़ों लोगों का हुजूम उमड़ पड़ता है। इस वर्ष भी ये प्राकृतिक स्थल सौंदर्य से लबालब भर गए क्योंकि प्रकृति को क्या पता कि इस वर्ष उसे देखने आने वालों के लिए जोखिम ही जोखिम है। लेकिन जिन्हें इस जोखिम का पता है वे कथित साहस का परिचय देते हुए ऐसे पर्यटन स्थलों पर जा धमके। अभी हाल ही की घटना है जब सागर के राजघाट बांध और राहतगढ़ वाटर फॉल पर दर्शनार्थियों का हुजूम उमड़ पड़ा। प्रकृति का आनंद लेने पहुंचे लोगों ने न तो सोशल डिस्टेंसिंग का ध्यान रखा और न ही कोविड-19 गाईड लाईन का। मेरे एक परिचित भी उसी भीड़ में सपरिवार शामिल थे। फोन पर उन्हें मैंने उनके इस कृत्य पर उलाहना दिया तो वे बड़े आत्मविश्वास से बोले-‘‘अरे, कुछ नहीं होता। फिर हम अपनी गाड़ी से गए थे। वहां सभी ठीक-ठाक दिखाई दे रहे थे। आप चिंता मत करिए। हम सब ठीक रहेंगे।’’ मैंने भी दुआ की उनके लिए  कि उनके साथ सब ठीक ही रहे। क्योंकि उनका बेटा जो अभी अट्ठारह साल का भी नहीं हुआ है, इन्दौर में कोचिंग ले रहा था। लेकिन कोरोना संक्रमण के इस दौर में उसे अपनी कोचिंग छोड़ कर बीच में ही घर वापस आना पड़ा। उनकी बेटी अभी कक्षा दस में पढ़ रही थी। बोर्ड परीक्षा के लिए उसने बहुत मेहनत की थी लेकिन कोरोना के चलते पढ़ाई का सिलसिला गड़बड़ा गया। उसने साहस कर के परीक्षा तो दी लेकिन रिजल्ट उसके मन मुताबिक नहीं रहा। फिर भी वे दोनों बच्चे अपने भविष्य को ले कर सचेत हैं और ऑनलाईन पढ़ाई ज़ारी रखे हुए हैं। लेकिन माता-पिता अपने और अपने बच्चों के स्वास्थ्य को ले कर कितने सजग हैं यह तो उनके राजघाट भ्रमण से ही पता चल गया। मैं इसे उनका साहस नहीं बल्कि दुस्साहस कहूंगी जो उन्होंने इतना बड़ा रिस्क लिया। यदि वे सोशल डिस्टेंसिंग और कोविड-19 गाईड लाईन का ध्यान नहीं रख सकते थे तो उन्हें ऐसे स्थान पर जाना ही नहीं था या फिर भीड़ देख कर गाड़ी से उतरे बिना उसी समय वापस लौट आना था। यह संक्रमण ऐसा नहीं है जिसके लक्षण तुरंत दिखने लगें। फिर जानते-बूझते स्वयं को, अपने परिवार को मुसीबत में क्यों डालना? इससे उन लोगों के लिए भी खतरा बढ़ जाता है जो संपर्क में आते हैं। सभी जानते हैं कि जब तक संक्रमण का पता चलता है तब तक यह संक्रमण दो-चार लोगों को अपनी चपेट में ले चुका होता है।
मध्यप्रदेश में अब तक कुल 9 लाख 51 लाख 822 लोगों के टेस्ट हो चुके हैं। जिसमें से करीब 42 हजार मरीज कोरोना पॉजिटिव हुए हैं। अकेले सागर शहर में ही कोरोना मरीजों की निरंतर बढ़ती संख्या एक वार्निंग की तरह है जिसे लोग अनदेखा कर के स्वयं को मुसीबत की ओर धकेल रहे हैं। सागर शहर में जहां 10 अप्रैल को एक मरीज था वहां अब आंकड़ा रिकार्ड तोड़ता जा रहा है। बायरोलॉजी लैबों से प्राप्त रिपोर्ट के अनुसार 25 अगस्त 2020 को सागर में कोरोना का विस्फोट हुआ। एक साथ 34 लोगों की रिपोर्ट कोरोना पॉजिटिव मिली। इस पर स्वास्थ्य विभाग का चिंतित होना स्वाभाविक है। बुंदेलखंड चिकित्सा महाविद्यालय में कोविड-19 महामारी के कारण हो रही मौतों की संख्या को कम करने तथा संक्रमण की रोकथाम के लिए संभाग कमिश्नर जेके जैन ने भी स्वास्थ्य एवं प्रशासनिक अमलों तथा समाजसेवी संस्थाओं के प्रतिनिधियों की एक बैठक ली। कमिशनर जैन ने बताया कि, कोविड-19 संक्रमण के संबंध में पॉजिटिव प्रकरणों का ’’अर्ली आइडेंटिफिकेशन’’ अर्थात प्रारंभिक अवस्था में ही संक्रमण का पता कर इलाज प्रारंभ करना बहुत महत्वपूर्ण है। उन्होंने बताया कि कोविड संक्रमण की रोकथाम एवं बचाव हेतु आइडेंटिफिकेशन, आइसोलेशन, टेस्टिंग तथा ट्रीटमेंट की प्रक्रिया अपनायी जा रही है। ऐसे प्रकरण जो संक्रमण की प्रारंभिक अवस्था में ही सामने आ जाते हैं उनका इलाज सही वक्त पर शुरू हो जाता है। जिससे व्यक्ति जल्द स्वस्थ होकर घर लौट पाता है। परंतु ऐसे प्रकरण जिनमें व्यक्ति गंभीर रूप से संक्रमित होने के बाद अस्पताल पहुंचता है, उसके बचने की संभावना कम होती है। शहर में दर्ज हो रही मृत्यु का सबसे बड़ा कारण ’’लेट प्रेजेंटेशन’’ है। लेट प्रेजेंटेशन से तात्पर्य व्यक्ति के गंभीर रूप से संक्रमित होने के बाद अस्पताल पहुंचना है। ऐसी स्थिति में संक्रमण बहुत अधिक बढ़ जाता है। उन्होंने जन सामान्य से अपील की कि, कोविड-19 के लक्षण दिखने पर तत्काल रूप से चिकित्सकीय परामर्श लिया जाए। कमिश्नर ने कोविड-19 की गाईड लाईन भी याद दिलाई कि कोविड संक्रमण से बचाव हेतु फेस कवरिंग अर्थात नाक एवं मुंह को ढकना अति-आवश्यक है। इसके लिए ना केवल मास्क बल्कि कोई अन्य कपड़ा जैसे गमछा, दुपट्टा आदि के द्वारा भी चेहरे का ढंका जा सकता है। वायरस से बचाव हेतु आवश्यक है कि, कपडे़ को थ्री-फोल्ड करके पहना जाए। संभागायुक्त ने सभी को संबोधित करते हुए इस आपदा के समय देशहित में सभी से सहयोग मांगा। उन्होंने बताया कि कोविड-19 संक्रमण को फैलने से रोकने हेतु जन भागीदारी भी अत्याधिक आवश्यक है। सभी के समन्वित प्रयासों से संक्रमण को फैलने से रोका जा सकेगा साथ ही इससे होने वाली मृत्युदर को भी कम किया जा सकेगा। उन्होंने शहर के बुद्धिजीवी, गणमान्य नागरिकों से अपील की कि, आज शहर को उनकी जरूरत है। वे अपने-अपने क्षेत्र में लोगों को कोरोना के संबंध में सजग एवं जागरूक बनाएं। जिससे ना केवल सही वक्त पर मरीज अस्पताल पहुंच सके बल्कि सावधानियां रखकर इस संक्रमण से बच भी सके। इस मुहिम में भागीदारी तथा जन जागरूकता हेतु शहर की मुहल्ला समितियों को शामिल करना भी तय किया गया।

एक कहावत है कि जगाया उसे जा सकता है जो सो रहा हो। जो जाग रहा हो और जानबूझ कर सोने का ढोंग कर रहा हो, उसे जगाया नहीं जा सकता है। यही हाल उन दुस्साहसियों का है जो अपने कथित प्रकृतिप्रेम और पर्यटन के नाम पर खुद की और अपने परिवारजन की जान से खिलवाड़ कर रहे हैं। ऐसे लोगों को सोचना चाहिए कि कोविड कोरोना संक्रमण की संख्या जितनी तेजी से घटेगी, उतनी तेजी से हमें इस भयावह स्थिति से छुटकारा मिलेगा। जब संक्रमण फैलेगा नहीं तो वायरस बढ़ेगा कैसे? और जब वायरस बढ़ेगा नहीं तो इससे छुटकारा भी मिल ही जाएगा। राजघाट बांध में नियमों को ताक में रख कर उमड़ी भीड़ जल्दी वहां से नहीं टलती यदि किसी ने उनका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल नहीं किया होता। उस वीडियो को देख कर प्रशासन हरकत में आया और वहां पहुंच कर लोगों को समझाईश दी। 

बेशक पर्यटन और घूमने-फिरने में बुराई नहीं है लेकिन यदि कोरोना गाईड लाईन का ध्यान नहीं रखा जाए तो फिर इसमें जानलेवा बुराई है। प्रशासन सिर्फ़ समझा सकता है, दण्डित कर सकता है लेकिन जब बात जानलेवा संक्रमण की हो तो स्वविवेक से काम लेना भी जरूरी है। ऐसे मामले में किसी भी प्रकार का दुस्साहस सभी के लिए भारी पड़ सकता है। वो कहते हैं न कि सतर्क रहें, सुरक्षित रहें।  
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(दैनिक जागरण में 27.08.2020 को प्रकाशित)
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Wednesday, August 26, 2020

चर्चा प्लस | अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनाम ट्रोलिंग ट्रेंड | डॉ शरद सिंह

चर्चा प्लस ...  अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनाम ट्रोलिंग ट्रेंड              
- डॉ शरद सिंह
        अधिवक्ता प्रशांत भूषण के ट्वीट बनाम अदालत की अवमानना केस ने इन दिनों अभिव्यक्ति की आजादी को ले कर एक बहस छेड़ दी है। वहीं इंटरनेट पर ट्रोलिंग एक ऐसा ट्रेंड बन चुका है जिसका शिकार कई सेलिब्रेटी हो चुके है। हमारे लोकतंत्र ने हमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दी है जो हमारी सबसे बड़ी शक्ति है। हम अपनी बात रखने के लिए स्वतंत्र है। इंटरनेट और सोशल मीडिया ने वह प्लेटफॉर्म दिया जहां लोग अपने विचार रख सकते हैं लेकिन आजकल लोग इसे हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं। इसी स्वतंत्रता के नाम पर महिलाओं के बारे में अभद्र टिप्पणी करना, लोगों को गालियां देना, उन पर फिकरे कसना, उन का माखौल उड़ाना, ये सब आम हो गया है।

इन दिनों अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर सबसे ताज़ा चर्चा अधिवक्ता प्रशांत भूषण के ट्वीट बनाम अदालत की अवमानना की है। प्रशांत भूषण के ट्वीट को अदालत की अवमानना मान कर उन्हें क्षमा मांगने को कहा गया। क्षमा नहीं मांगने पर सज़ा दिए जाने की बात से भी आगाह किया गया। वहीं प्रशांत भूषण ने अपनी स्टेटमेंट में माफी मांगने से इनकार कर दिया। प्रशांत भूषण ने कहा कि वह अदालत का बहुत सम्मान करते हैं लेकिन माफी मांगना उनकी अंतरात्मा की अवमानना होगी। 20 अगस्त को हुई सुनवाई के दौरान प्रशांत भूषण ने सुप्रीम कोर्ट में महात्मा गांधी के बयान का हवाला देते हुए कहा कि न मुझे दया चाहिए, न मैं इसकी मांग कर रहा हूं। मैं कोई उदारता भी नहीं चाह रहा हूं, कोर्ट जो भी सजा देगी मैं उसे सहर्ष लेने को तैयार हूं। प्रशांत भूषण के इस प्रकरण के साथ ही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर बहस छिड़ गई है।

किसी सूचना या विचार को बोलकर, लिखकर या किसी अन्य रूप में बिना किसी रोकटोक के अभिव्यक्त करने की स्वतंत्रता अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कहलाती है। अतः अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की हमेशा कुछ न कुछ सीमा अवश्य होती है। भारत के संविधान के अनुच्छेद 19 (1) के तहत सभी को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दी गयी है। वहीं, भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 संविधान के मौलिक अधिकार का एक हिस्सा है, जिसमे यह कहा गया है कि भारत में कानून द्वारा स्थापित किसी भी प्रक्रिया के आलावा कोई भी व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति को उसके जीवित रहने के अधिकार और निजी स्वतंत्रता से वंचित नहीं कर सकता है। इसके तहत सीधे सुप्रीम कोर्ट में अपील करने का अधिकार होता है।

प्रश्न उठता है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आज के समय में क्या कोई सीमा सुनिश्चित की जा सकती है जब सोशल मीडिया ने अभिव्यक्ति का एक विस्तृत प्लेटफॉर्म दे रखा है। इस प्लेटफॉर्म के अच्छे और बूरे पहलू दोनों हैं। अच्छा पहलू यह है लिए इसने अनेक बार लोगों का जीवन बचाने और न्याय दिलाने में महती भूमिका निभाई है। किसी बच्चे के गुम हो जाने अथवा किसी गुमें हुए बच्चे के परिवार का पता लगाने में व्हाट्सएप्प जैसे माध्यमों ने सकारात्मक परिणाम दिए हैं। इसी तरह यदि किसी घायल या बीमार को रक्त की ज़रूरत हो तो सोशल मीडिया पर संदेश वायरल होते ही जल्दी से जल्दी रक्त उपलब्ध हुआ है। लेकिन सोशल मीडिया का दूसरा पहलू जो कभी-कभी एक पागलपन में ढलता दिखाई देता है, वह चिंताजनक है। यह पहलू है किसी व्यक्ति या मुद्दे को ट्रोल किए जाने का। जब बात किसी व्यक्ति की हो तो स्थिति मानहानि से भी बदतर होने लगती है। छद्मनामी ट्रोलर बेलगाम तरीके से किसी भी नामी व्यक्ति को ट्रोल करने में इस तरह जुट जाते हैं गोया इसके अलावा उन्हें अपने जीवन में और कोई काम ही न हो। इंटरनेट पर ट्रोलिंग एक ट्रेंड बन चुका है। इसका शिकार कई सेलिब्रेटी हो चुके है। हमारे लोकतंत्र ने हमें एक आज़ादी दी है वो है अभिव्यक्ति की। हम अपनी बात रखने के लिए स्वतंत्र है। इंटरनेट और सोशल मीडिया एक जरिया है जहां लोग अपने विचार रख सकते है, पर आजकल लोग इसे हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं। इसी स्वतंत्रता के नाम पर महिलाओं के बारे में अभद्र टिप्पणी करना, लोगो को गालियां देना, उन पर फिकरे कसना, उन का मखौल उड़ाना, ये सब आम हो गया है। जबकि अभिव्यक्ति की आज़ादी किसी का अपमान करने की आज़ादी नहीं देती है।

देखा जाए तो सोशल मीडिया उस आम नागरिक के लिए वरदान है जिसे अपनी अभिव्यक्ति को दूसरों तक पहुंचाने के लिए कोई मंच अथवा प्रकाशन नहीं मिल पाता था। इसने अनेक ऐसे अकेले बुजुर्गों के जीवन को समाज (भले ही आभासीय) से जोड़ दिया जो अपने अकेलेपन के कारण अवसादग्रस्त जीवन जीने को विवश रहते थे। लेकिन वहीं दूसरी ओर अनियंत्रित और अमर्यादित अभिव्यक्ति ने सोशल मीडिया को क्षति पहुंचाना शुरू कर दिया है। दूसरे से असहमति होने पर गाली-गलौज करना, धमकियां देना और अश्लील व्यवहार करना आम होता जा रहा है। कहा तो यह भी जाता है कि आजकल राजनीतिक दल वेतन के आधार पर ट्रोलर नौकरी पर रखते हैं जिनका काम दिन-रात ऐसे लोगों के खिलाफ आग उगलना होता है जो विरोधी दल के हों। ट्रोलर्स की भूमिका उस समय घातक हो जाती है जब वे जजमेंट करने पर उतारू हो जाते हैं। कौन दोषी है और कौन नहीं? इसका फैसला वे व्यक्ति कैसे कर सकते हैं जिन्हें न तो कानून का ज्ञान होता है और न मामले की गहराई से जानकारी होती है। ऐसे मामलों में अकसर पक्ष और विपक्ष की संख्या प्रभावी रहती है। जिसका पलड़ा भारी हो, बाकी कमेंट्स भी उसी हैसटैग पर नत्थी होते जाते हैं।
जैसे-जैसे सोशल मीडिया पर ट्रोलिंग का अमार्यादित चलन बढ़ता जा रहा है वैसे-वैसे सरकार ही नहीं बल्कि सोशल मीडिया से जुड़ा हर संवेदनशील नागरिक सोशल मीडिया के नियमन की आवश्यकता को महसूस करने लगा है। सरकारें तो अभिव्यक्ति पर नियंत्रण रखने के अवसर ढूंढती ही रहती हैं लेकिन अब सोशल मीडिया के नियमन की मांगें नागरिक समाज और न्यायपालिका की ओर से भी आने लगी हैं। सोशल मीडिया का जिस व्यापक पैमाने पर सुनियोजित रूप से दुरुपयोग किया जा रहा है और उस पर जिस प्रकार का अमर्यादित एवं उच्छृंखल व्यवहार देखने में आ रहा है, वह किसी को भी चिंतित करने के लिए पर्याप्त है। जहां एक ओर सोशल मीडिया के कारण ऐसे व्यक्ति को भी अपने विचार प्रकट करने का मंच मिल गया है जिसे पहले कोई मंच उपलब्ध नहीं था, वहीं दूसरी ओर वह निर्बाध, अनियंत्रित और अमर्यादित अभिव्यक्ति का मंच बन गया है। दूसरे से असहमति होने पर गाली-गलौज करना, धमकियां देना और अश्लील व्यवहार करना आम होता जा रहा है। महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू आदि के भी फर्जी चित्र सोशल मीडिया पर प्रसारित किए जा चुके हैं जिनमें फोटोशॉप के इस्तेमाल द्वारा परिवर्तन करके उनका चरित्र हनन किया जाता है। व्यक्ति और समुदायविशेष के खिलाफ नफरत फैलाने और दंगों की भूमिका बनाने में भी सोशल मीडिया की सक्रियता देखी गई है। इसलिए अब सुप्रीम कोर्ट ने भी सोशल मीडिया के नियमन के लिए कानून बनाए जाने की जरूरत बताई है और सरकार से इस बारे में कानून बनाने को कहा है।

सन् 2009 में तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार द्वारा बनाए गए सूचना तकनीकी कानून के अनुच्छेद 66ए में पुलिस को कंप्यूटर या किसी भी अन्य प्रकार के साधन द्वारा भेजी गई किसी भी ऐसी चीज के लिये भेजने वाले को गिरफ्तार करने का अधिकार दे दिया गया था जो उसकी निगाह में आपत्तिजनक हो। पुलिस ने इस अनुच्छेद का इस्तेमाल करके अनेक प्रकार के मामलों में गिरफ्तारियां कीं। इसलिए इसे सुप्रीम कोर्ट ने सन् 2015 में असंवैधानिक करार देते हुए रद्द कर दिया। इसके बाद केंद्र सरकार ने इस मामले की तह तक जाने के लिए एक विशेषज्ञ समिति का गठन किया। इस समिति की रिपोर्ट ने भारतीय दंड संहिता, फौजदारी प्रक्रिया संहिता और सूचना तकनीकी कानून में संशोधन करके सख्त सजाओं का प्रावधान किए जाने की सिफारिश की। इनमें एक सिफारिश यह भी है कि किसी भी किस्म की सामग्री द्वारा नफरत फैलाने के अपराध के लिए दो साल की कैद या पांच हजार रुपये जुर्माना या फिर दोनों की सजा निर्धारित की जाए। भय या आशंका फैलाने या हिंसा के लिए उकसाने के लिए भी एक साल की कैद या पांच हजार रुपये या फिर दोनों की सजा की सिफारिश की गई। जांच प्रक्रिया के बारे में भी कई किस्म के संशोधन सुझाए गए।
आज स्थिति यहां तक जा पहुंची है कि फाली नरीमन और हरीश साल्वे जैसे देश के चोटी के विधिवेत्ता भी ट्रोलिंग जजमेंट के कारण सोशल मीडिया को घातक मानने लगे हैं। कहीं ऐसा न हो कि जिस प्रकार व्हाट्सएप्प के मॉबलिंचिंग में दुरुपयोग के कारण मैसेजिंग की सीमा एक साथ पांच मैसेज तक घटा दी गई। कहीं ऐसा न हो कि व्हाट्सएप्प मैसेजिंग की भांति हमें ट्रोलर्स के कारण सोशल मीडिया के कई लाभों से वंचित होना पड़े़ और हम अपनी अभिव्यक्ति की आजादी को अपने ही हाथों कम करवा डालें। 
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(दैनिक सागर दिनकर में 26.08.2020 को प्रकाशित)
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Friday, August 21, 2020

मेरे उपन्यास "शिखंडी : स्त्री देह से परे" की समीक्षा "दैनिक हिन्दुस्तान" में - डॉ शरद सिंह


प्रिय मित्रो,  "दैनिक हिन्दुस्तान" में  मेरे उपन्यास "शिखंडी : स्त्री देह से परे" की समीक्षा प्रकाशित हुई है इसे आप सब से साझा कर रही हूं...🌹

सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली से प्रकाशित मेरा यह उपन्यास आप Online भी मंगा सकते हैं -
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सागर शहर में यह उपलब्ध है-

वैरायटी बुक्स, द्वारिकाजी कांपलेक्स, सिविल लाइंस पर।

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Thursday, August 20, 2020

चर्चा प्लस | नई शिक्षा नीति में भाषाई प्रावधान का प्रश्नचिन्ह | डॉ शरद सिंह | सागर दिनकर में प्रकाशित

चर्चा प्लस ...
नई शिक्षा नीति में भाषाई प्रावधान का प्रश्नचिन्ह         
     - डॉ शरद सिंह
      नई शिक्षा नीति-2020 को कैबिनेट की मंज़ूरी मिलने के बाद केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक और सूचना प्रसारण मंत्री प्रकाश जावडेकर ने इसे प्रेसवार्ता में जारी किया। इससे पहले 1986 में शिक्षा नीति लागू की गई थी। इस नई शिक्षा नीति में स्कूल शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक कई बड़े बदलाव किए गए हैं। इस नीति की सबसे बड़ी बात है कि नई शिक्षा नीति में पांचवी क्लास तक मातृभाषा, स्थानीय या क्षेत्रीय भाषा में पढ़ाई का माध्यम रखने की बात कही गई है। इसे क्लास आठ या उससे आगे भी बढ़ाया जा सकता है। विदेशी भाषाओं की पढ़ाई सेकेंडरी लेवल से होगी। यद्यपि नई शिक्षा नीति में यह भी कहा गया है कि किसी भी भाषा को थोपा नहीं जाएगा। प्रश्न यह है कि क्या इस नीति के भाषाई प्रावधान में सरकारी स्कूलों के बच्चे उन बच्चों का मुकाबला कर सकेंगे जो प्राईवेट स्कूल में पहली कक्षा से अंग्रेजी भाषा सीखते हैं। देश में अंग्रेजी के प्रभाव के चलते कहीं सरकारी स्कूलों के बच्चे और पिछड़ तो नहीं जाएंगे? इस तरह की कई बातें अभी विचार करने योग्य हैं।

.      मुझे याद है भारत भवन में सन् 2004 में हुई एक साहित्यिक संगोष्ठी जिसमें देश-विदेश से हिन्दी के जानकार एकत्र हुए थे। कथासम्राट प्रेमचंद की पोती सारा राय भी उसमें आई थीं। विदेशों में हिन्दी साहित्य विषयक सत्र के बाद जब हम भोजनसत्र में गपशप कर रहे थे तभी किसी बात पर चर्चा चलते-चलते स्कूल शिक्षा पर पहुंची और सारा राय ने हंस कर कहा-‘‘हिन्दी स्कूलों में पढ़े हुए लोग कितनी भी अच्छी अंग्रेजी बोल लें लेकिन पकड़ में आ ही जाते हैं।’’ मैंने चकित हो कर पूछा-कैसे?’’ तो उन्होंने कहा-‘‘शायद आपने ध्यान नहीं दिया होगा कि अभी पिछले सत्र में जो सज्जन भाषण दे रहे थे वे बिना वज़ह अंग्रेजी झाड़ रहे थे। लेकिन जैसे ही उन्होंने ‘‘पोर्टुगल’’ को ‘‘पुर्तगाल’’ कहा, मैं ताड़ गई कि ये हिन्दी मीडियम के अंग्रेजी नवाब हैं।’’ उनका तंज इस बात पर था कि वे सज्जन हिन्दी के आयोजन में बेवज़ह अंग्रेजी झाड़ रहे थे। उस समय तो यह बात हंसी-हंसी में आई-गई हो गई लेकिन सारा राय की यह टिप्पणी फांस बन कर मेरे दिल-दिमाग़ में चुभी रही। यह बात किसी एक सज्जन की नहीं थी, बल्कि उन तमाम लोगों की थी जो हिन्दी माध्यम स्कूलों में पढ़ते हैं और स्वश्रम से अंग्रेजी में पारंगत होने का प्रयास करते हैं। अब तो अंग्रेजी सिखाने वाले कोचिंग सेंटर भी खुल गए है। यद्यपि कोरोनाकाल ने उन पर भी तालाबंदी करा दी। बहरहाल, ऑनलाईन अंग्रेजी शिक्षा की साईट्स हैं लेकिन वे इतनी सक्षम नहीं हैं कि अंग्रेजी न जानने वाले अथवा कम जानने वाले को अंग्रेजी की पर्याप्त शिक्षा दे सकें। ऐसे में नई शिक्षा नीति 2020 में भाषा शिक्षा को ले कर जो प्रावधान रखा गया है वह चिंता में डालने वाला है।

मैं भी हिन्दी माध्यम स्कूल-कॉलेज में पढ़ी हूं और मुझे अब तक अनेक ऐसे राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय आयोजनों में भाग लेने का अवसर मिला है जो हिन्दी भाषा पर केन्द्रित होते हुए भी अंग्रेजी के बोलबाले के साए में हुए। मुझे असुविधा नहीं हुई क्योंकि हिन्दी पर मेरी भाषाई पकड़ अच्छी है और कक्षा एक से ही घर पर मुझे अंग्रेजी पढ़ाई जाती रही। मेरी मां डॉ, विद्यावती ‘मालविका’ ने हिन्दी की व्याख्याता होते हुए भी मेरी अंग्रेजी भाषा की शिक्षा पर ध्यान दिया तथा उच्चारण को लेकर हमेशा सजग रखा। लेकिन जब मैं उन युवाओं के बारे में सोचती हूं जो समाज के ऐसे तबके से आते हैं जहां माता-पिता दोनों ही भाषाई ज्ञान में कच्चे होते हैं, वे युवा हिन्दी माध्यम स्कूलों में पढ़ते हुए अंग्रेजी के आतंक का कैसे मुकाबला करते होंगे? क्या उनमें हीन भावना पनपने लगती है? क्या वे स्वयं को रोजगार की दौड़ में सबसे निचली सीढ़ी पर खड़ा महसूस करते हैं?

कक्षा पांच तक मातृ भाषा में शिक्षा दिया जाना बड़ी सुखद बात लगती है। निश्चित रूप से इससे बच्चे को विषय को समझने और अपनी मातृभाषा से जुड़े रहने का अवसर मिलेगा। लेकिन क्या इस नीति को अंग्रेजी माध्यम के प्राईवेट स्कूल अपनाएंगे? यदि नहीं अपनाएंगे तो सरकारी और प्राईवेट स्कूलों के बीच की भाषाई खाई और गहरी हो जाएगी। हम दशकों से लॉर्ड मैकाले की शिक्षा नीति को ‘बाबू बनाने की शिक्षा नीति’’ कह कर कोसते आए हैं। लेकिन इस शिक्षा नीति के भाषा-माध्यम पक्ष को लेकर बच्चों के क्या बनने की उम्मींद कर सकते हैं। इसमें कोई संदेह नहीं है कि यह शिक्षा नीति एक महत्वाकांक्षी नीति है। इसमें स्किल डेव्हलपमेंट के अनेक प्रावधान हैं लेकिन इस दौर में जब यह महसूस होने लगा है कि बच्चों को पहली कक्षा से ही द्विभााषी शिक्षा दी जाए तब कक्षा पांच तक केवल मातृ भाषा में शिक्षा का प्रावधान कई चुनौतियां खड़ा करता है। नई शिक्षा नीति में पांचवी क्लास तक मातृभाषा, स्थानीय या क्षेत्रीय भाषा में पढ़ाई का माध्यम रखने की बात कही गई है। इसे क्लास आठ या उससे आगे भी बढ़ाया जा सकता है। विदेशी भाषाओं की पढ़ाई सेकेंडरी लेवल से होगी। इसे लागू करने के साथ ही यह जरूरी होता कि देश में भाषाई एकरूपता पर भी नई नीति बनाई जाती और अंग्रेजी के प्रभाव को समाप्त करने की दिशा में कड़े कदम उठाए जाते। चीन, जापान, रूस, जर्मनी आदि देश एक राष्ट्र भाषा के आधार पर प्रगति कर रहे हैं तो हमारे देश में यह संभव क्यों नहीं हो पाता है? जबकि देश की आज़ादी के बाद से इस दिशा में कई बार ज़ोरदार मांग उठाई गई। यह विचारणीय है कि भाषा का मुद्दा इस नई शिक्षा नीति के व्यावहारिक उद्देश्यों को ठेस पहुंचा सकता है। 

यह अच्छी बात है कि समय के साथ शिक्षानीति में भी परिवर्तन होना चाहिए और अब देश की शिक्षा नीति में 34 साल बाद नए बदलाव किए जा रहे हैं। नई प्रणाली में प्री स्कूलिंग के साथ 12 साल की स्कूली शिक्षा और तीन साल की आंगनवाड़ी होगी। प्रायमरी में तीसरी, चौथी और पांचवी क्लास को रखा गया है। इसके बाद मिडिल स्कूल अर्थात् 6-8 कक्षा में विषय का परिचय कराया जाएगा। सभी छात्र केवल तीसरी, पांचवी और आठवीं कक्षा में परीक्षा देंगे। 10वीं और 12वीं की बोर्ड परीक्षा पहले की तरह जारी रहेगी। लेकिन बच्चों के समग्र विकास करने के लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए इन्हें नया स्वरूप दिया जाएगा। पढ़ने-लिखने और जोड़-घटाव (संख्यात्मक ज्ञान) की बुनियादी योग्यता पर ज़ोर दिया जाएगा। बुनियादी साक्षरता और संख्यात्मक ज्ञान अत्यंत ज़रूरी एवं पहली आवश्यकता मानते हुए ’एनईपी 2020’ में ’बुनियादी साक्षरता और संख्यात्मक ज्ञान पर एक राष्ट्रीय मिशन’ की स्थापना की जाएगी। एनसीईआरटी 8 वर्ष की आयु तक के बच्चों के लिए प्रारंभिक बचपन देखभाल और शिक्षा के लिए एक राष्ट्रीय पाठ्यक्रम और शैक्षणिक ढांचा विकसित करेगा। शिक्षकों के लिए राष्ट्रीय प्रोफ़ेशनल मानक राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद द्वारा वर्ष 2022 तक विकसित किया जाएगा, जिसके लिए एनसीईआरटी, एससीईआरटी, शिक्षकों और सभी स्तरों एवं क्षेत्रों के विशेषज्ञ संगठनों के साथ परामर्श किया जाएगा।

पहली बार मल्टीपल एंट्री और एग्ज़िट सिस्टम लागू किया गया है। यानी मल्टीपल एंट्री और एग्ज़िट सिस्टम की इस नई व्यवस्था में एक साल के बाद सर्टिफ़िकेट, दो साल के बाद डिप्लोमा और तीन-चार साल के बाद डिग्री मिल जाएगी। इससे उन छात्रों को लाभ होगा जिनकी पढ़ाई बीच में छूट जाती है। नई शिक्षा नीति में छात्रों को ये आज़ादी होगी कि अगर वो कोई कोर्स बीच में छोड़कर दूसरे कोर्स में दाखिला लेना चाहें तो वो पहले कोर्स से एक खास निश्चित समय तक ब्रेक ले सकते हैं और दूसरा कोर्स ज्वाइन कर सकते हैं। उच्च शिक्षा में कई बदलाव किए गए हैं। जो छात्र रिसर्च करना चाहते हैं उनके लिए चार साल का डिग्री प्रोग्राम होगा। जो लोग नौकरी में जाना चाहते हैं वो तीन साल का ही डिग्री प्रोग्राम करेंगे। लेकिन जो रिसर्च में जाना चाहते हैं वो एक साल के एमए के साथ चार साल के डिग्री प्रोग्राम के बाद सीधे पीएचडी कर सकते हैं। उन्हें एमफ़िल की ज़रूरत नहीं होगी। नई शिक्षा नीति में अनेक ऐसी बातें हैं जिन पर विस्तार से चर्चा अगले किसी ‘‘चर्चा प्लस’’ में करूंगी। फिलहाल भाषा तत्व जो किसी भी शिक्षा नीति की बुनियाद है, उस पर ध्यान दिया जाना आवश्यक है। यानी पहले ‘‘पुर्तगाल और ‘‘पोर्टुगल’’ की दूरी को पाटना भी जरूरी है।
  
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(दैनिक सागर दिनकर में 20.08.2020 को प्रकाशित)
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स्वच्छता सिर्फ़ सरकार की जिम्मेदारी नहीं | डॉ. (सुश्री) शरद सिंह | दैनिक जागरण में प्रकाशित

दैनिक जागरण में प्रकाशित मेरा विशेष लेख "स्वच्छता सिर्फ़ सरकार की जिम्मेदारी नहीं" 🚩
❗हार्दिक आभार "दैनिक #जागरण"🙏
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विशेष लेख :
स्वच्छता सिर्फ़ सरकार की जिम्मेदारी नहीं
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह 
        जब मैं सुबह-सुबह अपने शहर की एनएच-26-ए रोड पर घूमने निकलती हूं तो पहले जो इलाका पड़ता है वह बजरिया कहलाता है। बजरिया की सड़क जहां मेन रोड से मिलती है वहां एक सुविधायुक्त सुलभ शौचालय है। शौचालय के बाद रोड साईड पर ही कुछ दूकाने हैं जिनमें शराब की दूकान भी है। इससे ओर आगे बढ़ने पर कुछ दूर चल कर एक ऐसा स्पॉट है जहां सड़क की दूसरी ओर के लोग कचरा डालते हैं। वहीं सुबह-सवेरे ‘‘लोटा-परेड’’ का अप्रिय, शर्मनाक दृश्य देखने को मिल जाता है। वैसे आजकल लोग लोटे के बदले प्लास्टिक की बोतल में पानी ले कर जाते हैं जो अकसर कोल्डड्रिंक की बोतल होती है। ऐसे लोगों को देख कर यही सोचती हूं कि अब इसमें दोष किसका है? प्रशासन का या लोगों का? माना कि नगरपालिका प्रशासन में अनेक गड़बड़ियां हो सकती हैं जिनके लिए हम उन्हें कोसते ही रहते हैं लेकिन जो काम जनहित में किया गया है उसका उपयोग करने में कोताही क्यों बरतते हैं? चार कदम और चल कर सुलभ शौचालय तक पहुंचा जा सकता है लेकिन ऐसा करने के बजाए सड़क पार कर के गंदगी फैलानागरिक कर्त्तव्य का उल्लंघन नहीं है? खैर, नागरिक कर्त्तव्य एक भारी-भरकम शब्द लगता है लेकिन इसे इंसान होने का फ़र्ज़ भी तो माना जा सकता है। एक गाय-भैंस कहीं भी गोबर करती है तो हम यह सोच कर अनदेखा कर देते हैं कि वह तो एक जानवर है। तो फिर उन इंसानों को क्या कहा जाए जो इस तरह की गंदगी फैलाते हैं? यदि यह कहें कि वे अनपढ़ हैं तो यह तर्क हज़म नहीं होता है क्योंकि अपने घर के बाहर गंदगी फैलाने वाले भी अपने रसोईघर और भगवान के आले को साफ़-सुथरा रखते हैं। तो यही सफ़ाई की भावना अपने घर से बाहर या सड़क के प्रति क्यों नहीं होनी चाहिए?
     मुझे लगभग रोज ही वह घटना याद आती है जब मैं सागर शहर के प्रबुद्ध नागरिकों के के संगठन ‘‘प्रजामंडल’’ की सदस्य के नाते शहर की एक बस्ती में स्वच्छता-जागरूकता अभियान पर गई थी। बस्ती की महिलाएं पहले झिझकीं फिर आहिस्ते से खुल कर बोलने लगीं। एक महिला ने जिस सरलता से मुझे अपनी सच्चाई बताई, उस पर मुझे समझ में नहीं आया कि मैं उसकी साफ़गोई के लिए उसे बधाई दूं या उसकी ‘लाईफ स्टाईल’ के लिए उसे फटकार लगाऊं। हुआ यूं कि जब मैंने उस महिला से पूछा कि क्या तुम्हारे घर में शौचालय है? उसने बड़े इतरा कर, मुस्कुरा कर उत्तर दिया -‘‘हऔ, है। हमाये इते शौचालय है।’’ लेकिन ग्रामीण इलाके के मेरे पूर्वअनुभवों ने मेरे भीतर घंटी बजा दी और मैंने दूसरे ही पल उससे पूछ लिया, ‘‘लेकिन तुम शौचालय में जाती हो या लोटा ले कर बाहर?’’ वह जरा झेंप कर, हंस कर बोली,‘‘हमें तो बाहर अच्छो लगत है। हम तो बाहरई जात आएं।’’ मेरी शंका सही निकली। दरअसल, यही बात बार-बार सामने आती है कि सुविधाएं उपलब्ध होने से भी कहीं बड़ी आवश्यकता है व्यवहार परिवर्तन की।

आजकल जगह-जगह सार्वजनिक शौचालय बने होते हैं, कोई भी व्यक्ति हो उसे उनका उपयोग करना चाहिए। घर का जो भी कचरा हो उसे कचरे के डिब्बे में रख कर कचरागाड़ी में ही डालना चाहिए। हमारे घर के छोटे बच्चों को भी सड़क स्वच्छता के बारे में जानकारी प्रदान करना चाहिए ताकि वह भी अपना टूटा-फूटा समान, कोल्डड्रिंक की बोतलें, प्लास्टिक की बोतल ,इधर उधर ना फेकें। साफ़ सफाई के लिए लोगो को सामने आना होगा और योगदान देना होगा।
      
“देश की सफाई एकमात्र सफाई कर्मियों की जिम्मेदारी नहीं है क्या इस में नागरिकों की कोई भूमिका नहीं है? हमें इस मानसिकता को बदलना होगा।“ यही तो कहा था प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘‘स्वच्छ भारत अभियान’’ आरम्भ करते हुए। राजनैतिक स्तर पर राजनीतिक दलों में वैचारिक मतभेद हो सकते हैं लेकिन स्वच्छता एक ऐसा विषय है जिस पर सभी एकमत दिखाई देते है। क्योंकि स्वच्छता है तो स्वास्थ्य है। दुख की बात है कि देश को स्वतंत्र हुए 73 वर्ष हो चुके हैं लेकिन आज भी हमें साफ-सुथरा रहने के सबक परस्पर एक-दूसरे को सिखाने पड़ रहे हैं। स्वच्छता हमारे घर, सड़क तक के लिए ही जरूरी नहीं होती है, यह सभी के स्वास्थ्य की पहली आवश्यकता है। इसी को मद्देनजर रखते हुए भारत सरकार द्वारा चलाया जा रहा ‘स्वच्छ भारत अभियान’ और ‘गंदगी भारत छोड़ो अभियान’।

आधिकारिक रूप से 1 अप्रैल 1999 से शुरू, भारत सरकार ने व्यापक ग्रामीण स्वच्छता कार्यक्रम का पुनर्गठन किया और पूर्ण स्वच्छता अभियान शुरू किया जिसको बाद में 01 अप्रैल 2012 को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा निर्मल भारत अभियान नाम दिया गया। स्वच्छ भारत अभियान के रूप में 24 सितंबर 2014 को केंद्रीय मंत्रिमंडल की मंजूरी से निर्मल भारत अभियान का पुनर्गठन किया गया था। इसके बाद स्वच्छ भारत अभियान की विस्तृत रूपरेखा तैयार की गई। स्वच्छ भारत अभियान 2 अक्टूबर 2014 को शुरू किया गया और 2019 तक खुले में शौच को समाप्त करना इसका उद्देश्य तय किया गया। यह एक राष्ट्रीय अभियान है। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने महात्मा गांधी जी की जयंती 2 अक्टूबर 2014 को स्वच्छ भारत अभियान की शुरुआत की , स्वच्छ भारत अभियान को भारत मिशन और स्वच्छता अभियान भी कहा जाता है। महात्मा गांधी जी की जयंती के अवसर पर माननीय श्री नरेंद्र मोदी जी महात्मा गांधी जी की 145 वी जयंती के अवसर पर इस अभियान की शुरुआत की 2 अक्टूबर 2014 थी। साफ-सफाई को लेकर भारत की छवि को बदलने के लिए प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने देश को एक मुहिम से जोड़ने के लिए जन आंदोलन बनाकर इसकी शुरुआत की। हाल ही में ‘गंदगी भारत छोड़ो’ अभियान भी आरम्भ किया गया है।

स्वच्छ भारत अभियान और गंदगी भारत छोड़ो अभियान के मूल उद्देश्य हैं- खुले में शौच बंद करवाना जिसके तहत हर साल हजारों बच्चों की मौत हो जाती है, सामूहिक शौचालयों का निर्माण करवाना, लोगों की मानसिकता को बदलना, शौचालय उपयोग को बढ़ावा देना और सार्वजनिक जागरूकता लाना। इसी अभियान के तहत सन् 2019 तक सभी घरों में पानी की पूर्ति सुनिश्चित कर के गांवों में पाइपलाइन लगवाना भी तय किया गया था जो अभी अपने लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर सका है। इनके अतिरिक्त ग्राम पंचायत के माध्यम से ठोस और तरल अपशिष्ट की अच्छी प्रबंधन व्यवस्था सुनिश्चित करना, सड़के फुटपाथ ओर बस्तियां साफ रखना, साफ सफाई के जरिए सभी में स्वच्छता के प्रति जागरूकता पैदा करना भी स्वच्छता अभियान का अभिन्न हिस्सा है। यह सब तभी संभव है जब सभी नागरिक स्वच्छता से रहने की आदत डाल लें। महात्मा गांधी ने सही कहा था -“जो परिवर्तन आप दुनिया में देखना चाहते हैं वह सबसे पहले अपने आप में लागू करें।“ 
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(दैनिक जागरण में 20.08.2020 को प्रकाशित)
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