Sunday, December 6, 2020

आंचलिक पत्रकारिता, महिलाएं और हैशटैग मी टू | लेख | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह

    लेख  

आंचलिक पत्रकारिता, महिलाएं और हैशटैग मी टू

   - डाॅ (सुश्री) शरद सिंह

साहित्यकार एवं काॅलमिस्ट

drsharadsingh@gmail.com

Dr (Miss) Sharad Singh, Author, Novelist & Social Activist

       यदि यह कहा जाए कि हमारे देश की मानसिक भूमि आज भी आंचलिक महिला पत्रकारिता के लिए उतनी उर्वर नहीं है जितनी होनी चाहिए, तो इसमें अतिशयोक्ति नहीं होगी। आंचलिक पत्रकारिता में  पुरुष पत्रकार तो अनेक हैं किन्तु महिला पत्रकारों को उंगलियों पर गिना जा सकता है। यह अवश्य है कि निजी चैनल्स के रूप में इलेक्ट्राॅनिक मीडिया ने एंकर के रूप में अंचल की युवतियों को रुपहले पर्दो पर अवश्य जगह दे दी है किंतु जहां तक बात ज़मीनी पत्रकारिता में महिलाओं के दखल की है तो आज भी कस्बाई और ग्रामीण अंचल पिछड़ा हुआ है। इस तारतम्य में मुझे वह समय याद आता है जब स्नातक उपाधि प्राप्त करने के बाद ही मैंने मध्यप्रदेश के छोटे से जिले पन्ना में पत्रकारिता में कदम रखा था। उस समय पन्ना में ही एक और महिला पत्रकार हुआ करती थीं प्रभावती शर्मा। जिनके पतिदेव एक टेबलाईड अखबार प्रकाशित किया करते थे। पति के टेबलाईड अखबार में पत्नी की पत्रकारिता कुछ-कुछ आज के ‘‘सरपंचपति’’ जैसी ही थी। वे ग्रामीण क्षत्रों में कम ही जाया करती थीं।  मेरा उनसे परिचय पत्रकारिता में कदम रखने के बाद हुआ। मैं पन्ना ज़िले में इकलौती महिला रिपोर्टर थी। लोग तनिक आश्चर्य से किन्तु सम्मान से देखा करते थे। ग्रामीण अंचलों के दौरे पर निकले पर वहां कौतूहल भरा स्वागत एवं सहयोग मिलता। उन दिनों प्रिंट मीडिया में एक उत्साहजनक वातावरण था। उस दौर में जबलपुर से प्रकाशित होने वाले समाचारपत्र दैनिक ‘नवीनदुनिया’ में ‘जोगलिखी’ काॅलम में पन्ना की समस्याओं पर मेरी रिपोर्ट्स प्रकाशित हुआ करती थीं। वहीं से प्रकाशित होने वाले दैनिक ‘ज्ञानयुग प्रभात’ में मैंने विशेष संवाददाता का कार्य किया। ‘जनसत्ता’ एवं ‘पांचजन्य’ के लिए रिपोर्टिंग की। उन दिनों पन्ना में बहुचर्चित ‘भदैंया कांड’ हुआ था जिसमें भदैंया नामक ग्रामीण की कुछ दबंगों ने आंखें छीन ली थीं। इस लोमहर्षक कांड पर मेरी कव्हरेज को ‘जनसत्ता’ ने प्रमुखता से प्रकाशित किया था। 

Press Conference of animal rights activist, environmentalist and now Union Minister Smt Maneka Gandhi and beside her left Journalist Miss Sharad Singh

पन्ना की खुली जेल में रह रहे दस्यु पूजा बब्बा से मैंने साक्षात्कार लिया था। डकैत चाली राजा के आत्मसमर्पण तथा कुछ डकैतों के इन्काउंटर पर भी मैंने रिपोर्टिंग की थी। इसी तारतम्य में एक लोमहर्षक घटना घटी थी मेरे साथ। मुझे जनसम्पर्क अधिकारी ने सूचना दी कि उस वनपरिक्षेत्र में पुलिस ने सभी पत्रकारों को आमंत्रित किया है जहां अलस्सुबह तीन डकैतों का इन्काउंटर किया गया था। हम सभी पत्रकार जनसम्पर्क विभाग की जीप में सवार हो कर आनन-फानन में निकल पड़े। उस समय तक मैंने इन्काउंटर के बारे में सुना भर था किन्तु किसी मृत दस्यु को देखा नहीं था। तो, जब हम घटना स्थल पर पहुंचे तो वहां दुबले-पतले तीन ग्रामीण युवकों की लाशें पड़ी हुई थीं। वे देखने में किसी भी ऐंगल से डकैत नहीं लग रहे थे। एक झोला, कुछ कपड़े और दो बोरियां वहां जमीन पर पड़ी हुई थीं जो उन डकैतों का समान बताया गया। वैसे, किसी के माथे पर नहीं लिखा होता है कि वह डकैत है। उन दिनों ग्रामीण अंचलों में यदि देसी तमंचा भी हाथ लग गया तो युवकों को डकैत बनते देर नहीं लगा करती थी। वैसे इससे भी इनकार नहीं किया जा सकता है कि उन दिनों कहीं-कहीं फर्जी इन्काउंटर भी हुआ करते थे। बहरहाल, मैंने उन डकैतों की लाशें देखीं। उनमें से एक के सिर में गोली लगी थी और उसका भेजा खोपड़ी से बाहर आ गया था। यह दृश्य मुझे भीतर तक हिला गया। मुझे उबकाई आने लगी। एक पुलिसवाले ने हंसते हुए मुझ पर तंज किया,‘‘आप जीप में जा कर बैठ जाइए। आपके बस का नहीं है यह सब देखना।’’

उसकी बात सच थी, मगर मुझे चुभी। उस पुलिसवाले पर गुस्सा भी आया लेकिन उबकाई के कारण उसे पलट कर जवाब नहीं दे सकी। सच्चाई यही थी कि मैं उस दृश्य को देख कर झेल नहीं सकी। इससे पहने मैंने कभी कोई क्षत-विक्षत लाश नहीं देखी थी। मैंने उसी घड़ी तय किया कि मैं अब कभी इन्काउंटर के बाद लाशें देखने नहीं जाऊंगी। लेकिन आज जब दुनिया के अशांत क्षेत्रों से महिला पत्रकारों को रिपोर्टिंग करते हुए देखती हूं तो मुझे लगता है कि वह मेरे लिए एक जीवट अनुभव था जो मुझे बहुत कुछ सिखा गया। ग्रामीण अंचलों की जमीनी पत्रकारिता बहुत धैर्य और संवेदना के साथ एक ऐसी असंवेदना की भी मांग करती है जो सच्चाई को समाने लाने के लिए जरूरी होती है।     

Press Conference of Union Minister H.K.L. Bhagat (who blemed for 1984's roits) and Journalist Miss Sharad Singh

उन दिनों अनुबंध के आधार पर रिपोर्टिंग के अंतर्गत कलकत्ता (कोलकाता) से प्रकाशित होने वाले साप्ताहिक ‘रविवार’ के लिए खजुराहो महोत्सव पर मेरे फीचर सहित विभिन्न विषयों पर मेरी स्टोरीज़ प्रकाशित हुई थीं, जिनमें डायमण्ड माइन्स, पन्ना नेशनल पार्क तथा पन्ना में बस गए पत्थर से चक्की, सिलबट्टा बनाने वाले बंजारा समुदाय के जीवन पर स्टोरीज़ शामिल थीं। परिस्थितिवश मैं जमीनी पत्रकारिता से दूर होती गई। आज मैं पीछे मुड़ कर देखती हूं तो तब से अब तक समूचे बुंदेलखंड में ही नहीं अपितु सम्पूर्ण आंचलिक क्षेत्रों में जमीनी पत्रकारिता से जुड़ी सक्रिय महिला पत्रकार गिनती की ही दिखाई देती हैं, उनमें भी अधिकांश स्थानीय समाचारपत्रों से ही संबद्ध हैं। राष्ट्रीय स्तर के समाचारपत्रों में अपनी रिपोर्ट देने का जज़्बा उनमें कम ही देखने को मिलता है। 


आज देश के आंचलिक क्षेत्रों के विश्वविद्यालयों में पत्रकारिता के उपाधि पाठ्यक्रम चल रहे हैं, कई निजी पत्रकारिता महाविद्यालय भी संचालित हैं लेकिन इनसे पढ़ कर निकलने वाली महिला पत्रकार ग्रामीण अंचल की जमीनी पत्रकारिता पर कम ही टिक रही हैं। बात की जाए यदि उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड अंचल की तो वहां कुछ समय पूर्व एक धमाका हुआ था जब ‘खबर लहरिया’ नाम का अखबार प्रकाशित होना शुरू हुआ। आकलनकत्र्ताओं ने इसे ‘वैकल्पिक मीडिया’ कहा। ‘खबर लहरिया’ ग्रामीण मीडिया नेटवर्क में अपनी पहचान बनाने में सफल रहा क्योंकि कई जिलों में इसके लिए सिर्फ़ महिला रिपोटर्स रखी गईं। चालीस से अधिक महिलाओं द्वारा चलाया जानेवाला ये अख़बार उत्तर प्रदेश और बिहार से स्थानीय भाषाओं में छपता है। ‘ख़बर लहरिया’ को संयुक्त राष्ट्र के ’लिट्रेसी प्राइज़’ समेत कई पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है। ‘खबर लहरिया’ की पत्रकार सुश्री कविता चित्रकूट के कुंजनपुर्वा गांव के एक मध्यमवर्गीय दलित परिवार से आती हैं। बचपन में उनकी पढ़ाई नहीं हुई। उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि वो जिंदगी में कभी पत्रकार बनेंगी। वर्ष 2002 में उन्होंने ’खबर लहरिया’ में पत्रकार के रूप में काम शुरू किया। वे कहती हैं कि ‘मेरे पिताजी ने बचपन से मुझे पढ़ाया नहीं और कहा कि तुम पढ़कर क्या करोगी, तुम्हे कलेक्टर नहीं बनना है। मैने छुप-छुप कर पढ़ाई की। पहले था कि मैं किसी की बेटी हूं या फिर किसी की पत्नी हूं। आज मेरी खुद की पहचान है।’

इस अख़बार से पत्रकार के रूप में महिलाओं का जुड़ाव होने पर भी जो पुरुष-मानसिकता सामने आई वह चौंकाने वाली थी क्योंकि इन महिला पत्रकारों को अनजान नंबरों से लगातार अश्लील संदेश और धमकियां मिलने लगीं। इस तथ्य का पता चलने पर मुझे लगा कि जिन दिनों मैं जमीनी पत्रकारिता से जुड़ी हुई थी, उन दिनों आंचलिक पत्रकारिता के लिए महिला पत्रकार अपवाद का विषय थीं फिर भी उन्हें सकारात्मक माहौल मिलता था। प्रशासन से ले कर समस्याग्रस्त क्षेत्र तक सम्मान और सहयोग मिलता था। या फिर मध्यप्रदेशीय बुंदेलखंड में आज भी वह माहौल है जहां महिला पत्रकारों को इस प्रकार की ओछी बाधाओं का सामना नहीं करना पड़ता है। वैसे यहां प्रश्न क्षेत्र का नहीं मानसिकता का है क्योंकि उत्तरप्रदेशीय बुंदेलखंड में ही एक ऐसी महिला पत्रकार हुईं जिन्होंने अपने पति की बात को झुठलाते हुए दबंग पत्रकारिता की और जेल भी गईं। बांदा की पहली महिला पत्रकार के रूप में विख्यात मधुबाला श्रीवास्तव एक दबंग व्यक्तित्व की महिला रहीं। वे अपने संस्मरण सुनाते हुए अपने पत्रकार बनने के विषय में बताया करती थीं कि एक बार जब वे मंदिर गईं तो वहां यह चर्चा आई कि शहर में कोई महिला पत्रकार नहीं है। यह बात उनके पति ने इस भाव से कही थी कि गोया महिलाएं पत्रकारिता कर ही नहीं सकती हैं। तब वे आगे आ कर बोलीं कि ‘‘हम हैं महिला पत्रकार।’’ इस तरह उन्होंने पत्रकारिता जगत में कदम रखा। एक बार उन्होंने अपने पत्रकार पति के विरुद्ध भी भाषण दिया था। मधुबाला श्रीवास्तव ने ‘अमर नवीन’, ‘क्रांति कृष्णा’ तथा ‘पायोनियर’ के लिए भी पत्रकारिता की। मीसा एक्ट के तहत उन्हें जेल भी जाना पड़ा था। किंतु उन्हें भी अश्लील संदेशों अथवा ऊटपटांग धमकियों का सामना नहीं करना पड़ा था। इसका अर्थ यही है कि ग्ररमण अंचलों में जहां आज समय के साथ चलते हुए जमीनी पत्रकारिता में महिलाओं की बहुसंख्या दिखनी चाहिए थी वहां अल्पसंख्यक स्थिति है। 

कुछ दशक पहले पत्रकारिता में महिलाओं की स्थिति की तसवीर कुछ और ही थी। ‘दी स्टेट्समैन’ के तत्कालीन संपादक कुलदीप नैय्यर ने एक समारोह में कहा था कि ‘‘हम महिलाओं को प्रेफर नहीं करना चाहते क्योंकि प्रशिक्षित करने के बाद वे शादी करके चली जाती हैं। उनके लिए नौकरी वेटिंग रूम की तरह होता है।’’ लेकिन 70 के दशक में महानगरों में यह तस्वीर बदली। तब कुलदीप नैय्यर के विपरीत ‘‘दी स्टेट्समैन’’ के तत्कालीन संपादक सी.आर. ईरानी कहा कि ‘‘हम महिलाओ को पत्रकारिता में प्रेफर करते हैं क्योंकि वो सीरियस, समर्पित और भरोसेमंद होती हैं।’’ 

पुरुष प्रधान समाज और उस पर पुरुष प्रधान कार्यक्षेत्र में स्वयं को साबित करना और पुरुषों का भरोसा जीतना, ये दो लक्ष्य थे जिसे महिलाओं ने पाना शुरू कर दिया। अब तक एक लम्बी सूची बन चुकी है शहरी क्षेत्र में पत्रकारिता करने वाली महिलाओं की जिनमें शुभा सिंह, अन्नू आनंद, पारुल, सेवंती नैनन, मनिका चोपड़ा, मृणाल पाण्डेय, नग़मा सहर आदि का नाम लिया जा सकता है। ये सब उनके लगातार किए गए संघर्ष और श्रम का परिणाम है। लेकिन ग्रामीण अंचल की तस्वीर अधिक नहीं बदली। यह देश का वह क्षेत्र है जहां महिला पत्रकारों की सबसे अधिक जरूरत रही है। आज भी सबसे अधिक शोषित ओर दमित महिला समुदाय ग्रामीण अंचल में ही जीवनयापन कर रहा है, जहां अशिक्षा का बोलबाला है। ऐसे स्थानों में महिलाओं से जुड़ी समस्याओं को खुल कर सामने लाने के लिए जमीनीतौर पर महिला पत्रकारों की जरूरत हमेशा रही है। मैं यहां ‘जमीनीतौर’ शब्द का प्रयोग इसलिए कर रही हूं कि आजकल जो ट्रेंड है कि जब ग्रामीण अंचल में कोई बड़ी घटना घटित होती है तो उसके बाद इलेक्ट्राॅनिक मीडिया की दुनिया से महिला रिपोर्टर्स की फौज घटनास्थल पर जा धमकती है। उनके द्वारा तूफानी अंदाज़ में रिपोर्टिंग कर ली जाती है और फिर वह क्षेत्र रह जाता है यथावत उपेक्षित। अधिक हुआ तो एक-दो दिन फालोअप में जगह दे दी जाती है लेकिन उसके बाद उस ग्रामीण अंचल की तरफ तभी देखा जाता है जब वहां कोई और बड़ी वारदात हो। मसला यह है कि महानगरों में अथवा बड़े शहरों में केन्द्रित इलेक्ट्राॅनिक मीडिया सुदूर अंचल की समस्याओं पर सतत निहाग नहीं रख सकते हैं। इसके लिए क्षेत्रीय पत्रकारिता जरूरी होती है। उस पर महिलाओं से जुड़े मसले तभी सामने आ पाते हैं जब क्षेत्रीय महिलाएं पत्रकारिता कर रही हों। महलिाओं ही नहीं वरन अनेक अन्य संवेदनशील मुद्दों पर भी महिलाएं कहीं अधिक बेहतर तरीके से सच्चाई सामने लाने में सक्षम होती हैं।

जहां चकाचौंध और तड़क-भड़क होती है वहां, अपने-आप भावनाओं का सौदा होने लगता है। यदि समाचार जगत सिनेनगरी में बदलने लगे तो ‘कास्टिंग काउच’ की घटनाएं होने लगती हैं। घर से बाहर निकल कर पुरुष वर्चस्व वाले क्षेत्रों में काम करने वाली महिलाओं को ‘‘फ्लर्ट’’ मान लिया जाता है। वहीं, कुछ महिलाएं पुरुषों की इस मानसिकता का अपनी सीढ़ी के तौर पर इस्तेमाल करने लगती हैं।

Pachakaudi - Novel of Dr (Miss) Sharad Singh

सन् 2007-8 में जब मैं अपना उपन्यास ‘‘पचकौड़ी’’ लिख रही थी (जो कि सन् 2009 में सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली से प्रकाशित हुआ) तो इलेक्ट्राॅनिक मीडिया का एक ऐसा पात्र मेरे जे़हन में आया जो सच्चाई का पक्षधर है, दुस्साहसी है, महत्वाकांक्षी है और साथ ही पुरुषों की दूषित मानसिकता को अपने लाभ की दिशा में मोड़ने में निपुण है। वह पात्र टीवी न्यूज रिपोर्टर ‘‘शेफाली’’ के रूप में मेरे उपन्यास में प्रवेश कर गया और उसने उपन्यास के मुख्यपात्र ‘‘पचकौड़ी’’ की राजनीतिक दिशा ही मोड़ दी। लेकिन पचकौड़ी से मिलने के पूर्व उसने एक चर्चित टीवी चैनल में जिस रास्ते से काम पाया उसे सामने से मैं स्वयं को रोक नहीं सकी- ‘‘ अश्विन ने अपने वादे के अनुरूप शेफाली को हर वो काम दिया जो उसे लगा कि वह उनके न्यूज़ चैनल की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। शेफाली ने उन्हें सफलतापूर्वक पूरा भी किया। अश्विन नाईक और शेफाली के इस गुणा-भाग से उनके न्यूज़ चैनल का टी.आर.पी. सबसे ऊपर जा पहुंचा। सुजीत पालीवाल को इससे अधिक और क्या चाहिए था? वह अश्विन और शेफाली के संबंधों को देख कर भी अनदेखा करता था। यूं भी ऐसे क्षेत्र महानगरों के उन फ्लैट्स की तरह होते हैं जहंा एक को इस बात पर आपत्ति नहीं होती है कि दूसरा किसे अपने घर ला रहा है। ..... शेफाली और अश्विन नाईक का सोना-सुलाना धीरे-धीरे स्वयं ही कम होता चला गया। यह भावनात्मक संबंध तो था नहीं कि दोनों में से किसी भी ओर से इस क्रम को बनाए रखने का का दबाव होता अथवा विशेष आग्रह होता। शेफाली को जो चाहिए था वह मिल रहा था और अश्विन नाईक को भी उसके न्यूज़ चैनल में काम करने के लिए आने वाली नई-नई तितलियों को आकर्षित करने का सुख मिल रहा था। बात बराबर थी। यह सही अर्थों में उन्मुक्त जीवन था। .... न्यूज़ चैनल में काम करते हुए शेफाली की अपनी रेटिंग भी उच्च शिखर पर जा पहुंची। न्यूज चैनल के दर्शक उसे पसंद करते थे। विश्वविद्यालयों और महाविद्याालयों में पत्राकारिता पढ़ने वाली लड़कियां शेफाली जैसी सफल होने का सपना देखती थीं। यह बात और है कि इस आडिएलिज्म से परे पत्रकार जगत् में उसके प्रति लोगों का दृष्टिकोण कुछ और ही था।’’ इस प्रकार ‘‘शेफाली’’ इलेक्ट्राॅनिक मीडिया के एक यथार्थ पक्ष को खुलकर सामने लाई।

ग्रामीण पत्रकारिता इस उन्मुक्तता से कोसों दूर ही रही है। लेकिन पिछले दो दशक में तेजी से परिवर्तन आया है जब से स्थानीय टीवी चैनल्स काम करने लगे हैं। लगभग हर दूसरे शहर में निजी पत्रकारिता महाविद्यालय खुल गए हैं और स्थानीय टीवी चैनल्स की एंकर्स की फौज तैयार होने लगी है। लेकिन सुदूर ग्रामीण अंचल अभी भी इस परिदृश्य से गायब है। 

बहरहाल, ग्रामीण अंचल में महिला पत्रकारिता के पांव अभी जम भी नहीं पाए कि महानगरों में पत्रकारिता जगत की वे अंतर्कथाएं बाहर आने लगीं जो नारी के यौन-शोषण का बयान दे रही थीं। ‘‘हैशटैग मी टू’’ कैम्पेन ने जो प्लेटफाॅर्म दिया उस पर ‘‘शेफाली’’ के अनेक संस्करण सामने आने लगे। जिन्हें अपने जीवन में कुछ करना था तो अनचाहे समझौतों से गुज़रना पड़ा। ’द वायर’ समाचार वेबसाइट में रिपोर्टर अनु भुयन उन औरतों में से हैं जिन्होंने सोशल मीडिया पर अपने यौन उत्पीड़न के अनुभव लिखने शुरू कर दिए-‘‘07 अक्तूबर 2018 अपने साथ हुए यौन उत्पीड़न के बारे में खुलकर बोलने में कोई शर्म नहीं है, बल्कि मुझे लगा कि बोलने से जो शर्म और गिल्ट... कि क्या ये मेरी ग़लती से तो नहीं हुआ था... जिसे मैं अपने अंदर महसूस करती रही थी उससे निकल पाऊंगी और जिसे शर्मिंदा होना चाहिए उसे समाज की नज़र में ला पाऊंगी।“ 

अनु ने बिसनेस स्टैंडर्ड अख़बार के पत्रकार मयंक जैन का नाम लेकर अपने ट्वीट में लिखा कि उन्होंने उनसे यौनसंबंध की मांग की थी क्योंकि उन्हें लगा कि अनु ’वैसे टाइप की लड़की हैं’। यानी एक पुरुष ने एक महिला ककी ‘टाईप’ तय किया और उसके सामने अनैतिक मांग रख दी। अनु भुयन के द्वारा खुलासा किए जाने के बाद ’फ़ेमिनिज़्म इन इंडिया’ नाम की वेबसाइट चलानेवाली जपलीन पसरीचा समेत कई कई महिलाओं ने मयंक पर बुरे बर्ताव के कई आरोप लगाए। इस बीच ऑनलाइन समाचार वेबसाइट ‘‘स्क्रोल’’ ने अपने एक लेख में बताया है कि जिस व़क्त मयंक उनके साथ काम कर रहे थे, उनके खिलाफ़़ यौन उत्पीड़न की शिकायत की गई थी। शिकायतकर्ता ने औपचारिक शिकायत ना करने का तय किया था जिसके कारण मयंक को लिखित चेतावनी देकर छोड़ दिया गया था।

दरअसल, कामकाजी क्षेत्र में महिलाओं का यौन शोषण एक खामोशी की चादर के नीचे होता रहा। स्वयं महिलाएं इसके विरुद्ध आवाज़ उठाने में झिझकती रहीं। कारण यही था कि जो महिला आवाज़ उठाएगी, उंगलियां उसी पर उठेंगी। मगर ‘‘हैशटैग मी टू’’ कैम्पेन ने भारतीय महिलाओं की इस झिझक को तोड़ा और उन्हें अपनी अतीत की पीड़ा को भी बाहर लाने का साहस दिया। यद्यपि अन्य कामकाजी क्षेत्र में महिलाओं के पक्ष में समय-समय पर महत्वपूर्ण कानून बनाए जाते रहे हैं। सन् 2012 में ज्योति सिंह के साथ हुए सामूहिक बलात्कार के बाद यौन हिंसा के विरुद्ध़ बनाए क़ानून को और व्यापक किया गया और उसमें यौन उत्पीड़न के लिए तीन साल की जेल की सज़ा और जुर्माने का दंड शामिल किया गया। काम की जगह पर यौन उत्पीड़न के लिए सन् 1997 में बनाए गए दिशा निर्देश को 2013 में क़ानून का रूप दिया गया, जिसके तहत संस्थानों को अपने यहां शिकायत समितियां बनाने के लिए बाध्य किया गया। क़ानून के तहत यौन उत्पीड़न की शिकायत किए जाने पर संस्था की ज़िम्मेदारी है कि वो एक शिकायत कमेटी का गठन करे जिसकी अध्यक्षता एक महिला करे, उसकी आधी से ज़्यादा सदस्य महिलाएं हों और उसमें यौन शोषण के मुद्दे पर काम कर रही किसी बाहरी ग़ैर-सरकारी संस्था की एक प्रतिनिधि भी शामिल हो। स्त्री अधिकारों की पैरवी करने वाली लक्ष्मी मूर्ति के अनुसार वे ऐसी कई समितियों में बाहरी प्रतिनिधि के तौर पर रहीं और उन्होंने महसूस किया कि ये क़ानून बहुत अहम हैं।  ये औरतों को अपने काम की जगह पर बने रहते हुए अपराधी को कुछ सज़ा दिलाने का हौसला देते हैं।

Rasbihari Gaur (Famous Poet of Stage & Screen), Dr Sharad Singh, Rahul Dev (Farmer CEO & Editor-in-chief, CNBC News TV Channel) and Sudhir Mishra (Resident Editor, Navbharat Times, Lucknow) at Ajmer, Rajasthan

महिला पत्रकार, आंचलिक पत्रकारिता और ‘‘हैशटैग मी टू’’ कैम्पेन की त्रिकोणात्मकता किसी ‘बारमूडा ट्रैंगल’ से कम नहीं है। इस बारमूडा ट्रैंगल में आंचलिक क्षेत्र की जुझारू जमीनी महिला पत्रकारिता डूबती जा रही है। उस पर सोशल मीडिया ने एक अलग ही हंगामा खड़ा कर रखा है। श्ूं भी आजकल स्मार्टफोन का जमाना है। ऐसे में लोगों का एक-दूसरे से संवाद करने का तरीका भी बदल गया है। लोग अब ‘फेस टू फेस’ बातचीत करने के बजाय वॉट्सऐप और ईमेल पर ज्यादा संवाद करते हैं। ज्यादा से ज्यादा वे फोन कॉल कर लेते हैं। व्यवहार में इस तरह का व्यवहार कार्यस्थल के साथ ही निजी जिंदगी में भी असर डाल रहा है। विश्वसनीयता घट गई है और दिखावा बढ़ गया है। ‘‘यू ट्यूब न्यूज चैनल्स’’ की भरमार हो गई है जिसमें चमकते चेहरे तो हैं लेकिन विश्वसनीयता की कमी रहती है। उनमें प्रस्तुत किए जाने वाले कई समाचारों को ‘‘क्रॅास एक्जामिन’’ नहीं किया जा सकता है। लेकिन इसी सोशल मीडिया ने महिला पत्रकारों को अपने उत्पीड़न पर मुखर होने का भी अवसर दिया। महिला पत्रकार आपस में ही ऐसे अनुभव बांटती रही हैं और सोशल मीडिया पर शुरू हुई इस चर्चा के बाद भी कई हैं जो अपनी बात सार्वजनिक तौर पर कहने की हिम्मत नहीं महसूस कर पाती थीं।

वरिष्ठ पत्रकार रश्मि सक्सेना ने अपने एक लेख में अपने अनुभव साझा करते हुए लिखा कि-‘‘ इस बात ने मुझे यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि कैसे न्यूज़रूम के भीतर चर्चाओं के साथ सिगरेट के कश शामिल हो गए। इसी न्यूज़रूम को हम किसी मंदिर की तरह मानते थे जहां लैंगिक समानता, खुली बहसें और आपसी मेल-मिलाप का माहौल था और जहां हर कोई अपने-अपने स्तर पर कहानियां तलाशने की कोशिश किया करते थे।.....आखिर इतना ख़ूबसूरत न्यूज़रूम किसी शिकार के मैदान में कैसे तब्दील हो गया? इस सवाल का जवाब तलाशते हुए मैं दो अक्टूबर 1971 की यादों में खो गई। जब मैंने पहली बार एक न्यूज़रूम में क़दम रखा था। या यूं कहूं कि आदमियों की दुनिया में गई थी। ये हिंदुस्तान टाइम्स का दफ़्तर था और मैं एक ट्रेनी थी। मुझे लग रहा था कि जैसे मैने पूरा संसार जीत लिया है। इसके बाद मेरे न्यूज़ एडिटर की वो कड़क आवाज़ मेरे लिए पहला सबक था। मुझे याद है उन्होंने कहा था, “तुम, कल से साड़ी पहन कर आओगी। मैं नहीं चाहता कि मेरे लड़कों का ध्यान तुम्हें देखकर भटके। ....मेरी लड़ाई यहां से शुरू हो चुकी थी. हालांकि मुझे लगा कि यह इतना बुरा भी नहीं है, क्योंकि दुश्मन तो बहुत ही कमज़ोर है। इनके लड़के तो मेरे चूड़ीदार कुर्ते से ही घायल हो रहे हैं। मैने बस सहमति में सिर हिलाया और अपनी सीट पर बैठ गई। उसके बाद एक दोस्ताना हाथ ने मेरी ओर चाय का कप बढ़ा दिया। कई दिन गुज़रने के साथ ही वो सख़्त दिखने वाले न्यूज़ एडिटर मेरे सबसे अच्छे गुरु बन गए। उनके वो लड़के हमेशा मेरी मदद के लिए तैयार रहते। ... जिस दिन मेरी पहली बड़ी बाइलाइन ख़बर लगी उस दिन उन्ही न्यूज़ एडिटर ने ख़ुद लेमन-टी का ऑर्डर दिया। उन दिनों में लेमन-टी दूध वाली चाय के मुक़ाबले ज़्यादा महंगी होती थी। ... कुछ-कुछ यही हाल तब भी रहा जब मैं रिपोर्टिंग के लिए गई। वहां भी जो लड़ाई थी वह किसी के व्यवहार से नहीं थी। बल्कि कई बार तो मुझे इस बात के लिए लड़ना पड़ जाता था कि मेरे साथी मेरी इतनी ज़्यादा चिंता क्यों करते हैं। .... मुझे ख़ुद को साबित करने के लिए लड़ना पड़ता था, मुझे बताना पड़ता था कि मैं बिना किसी की मदद लिए बाहर से होने वाले कामों को भी बेहतरीन तरीक़े से कर सकती हूं।’’

Dr (Ms) Sharad Singh Honored by Rameshwar Guru Best Editor Award 2017 at Madhav Rao Sapre News Paper Museum and Research Foundation Bhopal

लड़ कर जीतने और घुटने टेक कर जीतने में बुनियादी अंतर होता है। लड़ कर जीतने वाला सिर उठा कर जीता है जबकि घुटने टेक कर जीतने वाले के न केवल घुटने मुड़े रह जाते हैं, वरन् सिर भी झुका रह जाता है। लड़कर जीतने वाली तस्वीर ही आंचलिक पत्रकारिता में महिलाओं को जमीनी रिपोर्टिंग से जोड़ सकती है। जिसकी महती आवश्यकता है। महिला पत्रकारिता को ले कर बना हुआ संशय और भ्रमजाल टूटना जरूरी है। आंचलिक क्षेत्र में महिला पत्रकारों को सम्मान पाने योग्य बनने के लिए अपनी जीवटता को उभारना होगा। आज पत्रकारिता का अर्थ इलेक्ट्राॅनिक मीडिया की चकाचैंध पर केन्द्रित होता जा रहा है जिससे आंचलिक जमीनी पत्रकारिता से महिलाओं को दूर कर ‘‘स्क्रीन की वस्तु’’ बनाता जा रहा है। यह बिगड़ा हुआ माहौल तभी सुधर पाएगा जब इलेक्ट्राॅनिक मीडिया की चकाचैंध में पड़ कर एंकरिंग से परे भी ज़मीनी पत्रकारिता की ओर सुशिक्षित, प्रशिक्षित और दबंग महिला पत्रकारों की नई खेप कदम रखेगी। 

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Thursday, December 3, 2020

श्रद्धांजलि | चिरविदा ललित सुरजन जी | डॉ (सुश्री) शरद सिंह


स्व. ललित सुरजन जी के प्रति मेरी भावभीनी श्रद्धांजलि को 'युवाप्रवर्तक' में प्रकशित करने के लिए हार्दिक आभार 🙏
श्रद्धांजलि :
चिरविदा ललित सुरजन जी !!!

         - डॉ (सुश्री) शरद सिंह

प्रधान संपादक देशबंधु समाचार समूह आदरणीय ललित सुरजन जी के निधन के समाचार ने स्तब्ध कर दिया  !!! 

देशबंधु समाचार समूह के प्रधान संपादक व वरिष्ठ पत्रकार ,कवि ललित सुरजन को ब्रेन हैमरेज होने के कारण  निधन हो गया। 74 वर्षीय श्री सुरजन को 01 दिसम्बर 2020, मंगलवार को  नोयडा स्थित एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया था।

वे 1961 से एक पत्रकार के रूप में कार्यरत थे। साथ ही वे एक जाने माने कवि व लेखक रहे। ललित सुरजन जी स्वयं को एक सामाजिक कार्यकर्ता मानते थे। पत्रकारिता उनके लिए एक मिशन थी। उनकी साहित्य, शिक्षा, पर्यावरण, सांप्रदायिक सदभाव व विश्व शांति से सम्बंधित विविध कार्यों में उनकी गहरी संलग्नता रही।

हिन्दी पत्रकारिता जगत में श्रद्धेय स्व. मायाराम सुरजन जी की परंपरा को आगे बढ़ाने वाले आदरणीय ललित सुरजन ‘‘देशबंधु के साठ साल’’ के रूप में एक ऐसी लेखमाला लिखी जो देशबंधु समाचारपत्र की यात्रा के साथ हिन्दी पत्रकारिता की यात्रा से बखूबी परिचित कराती है। उनकी अनुमति से इसे धारावाहिक रूप से मैंने भी अपने इसी ब्लॉग में शेयर किया था ...
https://samkalinkathayatra.blogspot.com/2019/11/1.html?m=1

ललित सुरजन जी ट्विटर पर भी सक्रिय रहते थे। उन्होंने मेरे एक ट्वीट पर बड़ी ही आत्मीय टिप्पणी की थी...
https://twitter.com/LalitSurjan/status/1270901547224846338?s=19
 
स्मृतियां अनेक हैं जो मुझे सदा ऊर्जा और मार्गदर्शन देती रहेंगी 🙏
उनकी अग्रजवत आत्मीयता एवं स्नेह सदा स्मरण रहेगा ...

विनम्र श्रद्धांजलि 🙏
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सागर, मध्यप्रदेश

चर्चा प्लस | मनोरंजन की दुनिया में ओटीटी प्लेटफाॅर्म की धमक | डाॅ शरद सिंह

चर्चा प्लस
मनोरंजन की दुनिया में ओटीटी प्लेटफाॅर्म की धमक
      - डाॅ शरद सिंह
  जब टेलीविजन का प्रसारण भारत में आरंभ हुआ तो एक बड़ी क्रांति का अनुभव हुआ था। घर बैठे ‘कृषिदर्शन’ देखना भी हर दर्शक को भला लगता था। फिर केबल टीवी के आगमन ने टेलीविजन को एक नया विजन दिया। मनोरंजन और सूचनाओं के नए-नए द्वार खोल दिए। अब आज के दौर में ओटीटी प्लेटफाॅर्म ने धूम मचा रखी है। मनोरंजन की दुनिया के उपभोक्ताओं के लिए यह एक चकाचौंध भरी नई दुनिया है। ‘‘कर लोदुनिया मुट्ठी में के बतर्ज़ ओटीटी प्लेटफाॅर्म के लिए नारा दिया जा सकता है-‘‘कर लो मनोरंजन मुट्ठी में’’। 

भारत में टेलीविजन प्रसारण की शुरुआत दिल्ली से 15 सितंबर, 1959 को हुई थी। 1972 तक टेलीविजन की सेवाएं अमृतसर और मुंबई के लिए बढ़ाई गईं। 1975 तक भारत के केवल सात शहरों में ही टेलीविजन की सेवा शुरू हो पाई थी। भारत में कलर टीवी और राष्ट्रीय प्रसारण की शुरुआत 1982 में हुई। लगभग एक सदी पहले टेलीविजन के आविष्कार ने इंसान को एक नयी दुनिया से परिचित कराया। 1924 में ब्रिटेन के जॉन लेगी बेयर्ड द्वारा टीवी के आविष्कार के बाद से इसमें कई बदलाव आते गए। 20वीं सदी में शुरू हुआ यह ब्लैक एंड व्हाइटए 21वीं सदी में एलसीडी, एलइडी तक रंग-बिरंगी हाइ डेफिनिशन में पहुंच गया। शुरु में विशेष वर्ग तक सीमित रहनेवाले टेलीविजन की पहुंच आज जन-जन तक है। संचार क्रांति और विकास के साथ इसका दायरा बढ़ता गया। आज दुनियाभर में एक अरब से ज्यादा लोगों के जीवन का यह अभिन्न हिस्सा बना चुका है। नयी तकनीकों ने टेलीविजन के प्रसारण को बेहतर बनाने में अमूल्य योगदान दिया है। एनालॉग तकनीक के माध्यम से ब्लैक एंड व्हाइट तस्वीर दिखानेवाला यह टीवी आज डीवीबी-टी2 तकनीक के जरिये हाइ डेफिनिशन डिजिटल वीडियो से लोगों का मनोरंजन कर रहा है।

आज ओटीटी प्लेटफाॅर्म ने मनोरंजन की दुनिया को एक नए मुकाम पर पहुंचा दिया है। ओटीटी प्लेटफॉर्म यानी ‘‘ओवर-द-टॉप’’ प्लेटफॉर्म के आने के बाद से दुनिया के तमाम देशों में टेलीविजन देखने वालों की संख्या घटी है। आजकल कई फिल्मे सिनेमाहाल मे नहीं बल्कि ओटीटी प्लेटफाॅर्म जैसे की नेटफ्लिक्स, आॅमेजाॅन प्राईम इत्यादि पर रिलीज़ हो रही है। इंटरनेट का प्रयोग अब सभी क्षेत्रो मे होने लगा है। इस आधुनिक तकनीक ने हमारे जीने का ढंग ही बदल दिया है। आज लगभग हर व्यक्ति किसी न किसी रूप से इंटरनेट से जुड़ता जा रहा है। सरकारी कामकाज ने भी इंटरनेट को स्वीकार कर लिया है। इस कोरोनाकाल में इंटरनेट ने और भी पैंठ जमा ली है। इस दौरान इंटरनेट में भी अनेक सकारात्मक सुधार हुए हैं। इंटरनेट पर काम करना सबके लिए आसान होता जा रहा है और यह सभी पुराने तरीकों को छोड़ कर तेजी से आगे बढ़ता जा रहा है। आजकल कई फिल्मे सिनेमाहाल मे नहीं बल्कि ओटीटी प्लेटफाॅर्म जैसे की नेटफ्लिक्स, आॅमेजाॅन प्राईम इत्यादि पर रिलीज़ हो रही है। अभी भी कई लोगों को ठीक से ज्ञात नहीं है कि ओटीटी क्या है? दरअसल, ऐसे प्लेटफार्म जो इंटरनेट के जरिए वीडियो कंटेंट या कोई भी मीडिया कंटेंट हम तक पहुंचाते हैं , उसे ओटीटी प्लेटफार्म कहा जाता है। यह इंटरनेट डाटा पर चलता है और स्मार्टफोन यूज़र उसे अपने मोबाईल पर इंटरनेट डाटा द्वारा देख सकता है। लेकिन डाटा के साथ ही सब्सक्रिप्शन चार्ज भी लगता है। हर प्लेटफाॅर्म का अपना अलग सब्सक्रिप्शन चार्ज रहता है। एक सर्वेक्षण के अनुसार टीवी के मंथली पैक का दाम जहां लगभग 150 रुपये महीना है, वहीं एमेजॉन प्राइम, हॉटस्टार, जी5 और सोनी लिव जैसे ओटीटी प्लेटफॉर्मों के सालाना सब्सक्रिप्शन की लागत 999 रुपये या इससे भी कम है। हॉटस्टार वीआईपी सिर्फ 35 रुपये महीना (सालाना 365 रुपये) में उपलब्ध है। इसमें तमाम सीरियल्स के साथ हिंदी, तमिल और तेलुगू फिल्म जगत की ताजातरीन फिल्में भी देखने को मिल जाती हैं। सीरियल के वक्त टीवी पर विज्ञापन काफी ज्यादा आते हैं, वहीं ओटीटी प्लेटफॉर्म्स के प्राइम ग्राहकों के सामने यह समस्या नहीं होती है। लेकिन ध्यान देने की बात यह है कि ओटीटी का सब्सक्रिप्शन गिनाते समय डाटा चार्ज को जोड़ कर नहीं बताया जाता है जो इंटरनेट चार्ज के रूप में उपभेक्ता को ही देना पड़ता है।

हमारे देश में ओटीटी प्लेटफॉम का चलन तेजी से बढ़ रही है क्योंकि अब लोगों को मनपसंद शो, सीरियल या मूवीज के लिए ड्राइंग रूम में टीवी के सामने बैठने की जरूरत नहीं है। वे अब ओटीटी प्लेटफॉम की मदद से कहीं भी, कभी भी, कोई भी शो, सीरियल, मूवी, न्यूज देख सकते हैं। इंडस्ट्री के आंकड़ों के अनुसार, दर्शक पांच वर्ष पहले एक हफ्ते में तकरीबन 100 अरब मिनट तक ऑनलाइन कंटेंट देखते थे, जो अब बढ़कर 600 अरब मिनट प्रति सप्ताह हो गया है। यानी अब वे ओटीटी प्लेटफॉर्मों पर छह गुना ज्यादा वक्त बिताने लगे हैं। इस दौरान स्मार्टफोन और डेटा, दोनों ही सस्ते हुए हैं। पहले 40 करोड़ मोबाइल ही ओटीटी को सपोर्ट करते थे। अब यह संख्या 100 करोड़ हो गई है। वर्तमान ट्रेंड में कई लोग अपनी केबल या संटेलाईट सब्सक्रिप्शन रद्द कर रहे हैं और बदले में स्ट्रीमिंग सर्विसेज़ को अपने टीवी देखने के समाधान के रूप में बदल रहे हैं। लेकिन इसका एक पहलू और भी है। हमारे देश में ग्रामीण क्षेत्र में इंटरनेट की उपलब्धता तथा आर्थिक स्तर अभी भी कम है इसलिए ओटीटी की पकड़ ग्रामीण क्षेत्रों में अभी कमज़ोर है। टीवी के सभी कंटेंट ऑनलाइन प्लेटफॉर्मों पर तो मिल जाते हैं, लेकिन ओटीटी इंडस्ट्री के कंटेंट टीवी के लिए सुलभ नहीं होते हैं। स्मार्ट टीवी की मदद से जरूर ओटीटी कंटेंट को टीवी पर देखा जा सकता है, लेकिन ज्यादातर घरों में अभी भी परंपरागत टीवी ही है। खासकर, ग्रामीण इलाकों में जहां सस्ते स्मार्टफोन और डेटा तो पहुंच गए हैं, लेकिन अभी स्मार्ट या ऐंड्रॉयड टीवी नहीं पहुंचा है।

यूं तो वेब सीरीज पर उम्र की हिदायत रहती है, लेकिन जिस प्रकार सिनेमाघर की तरह अवयस्क दर्शकों के प्रवेश पर रोक लगाई जा सकती है वैसी रोक घरों में बैठे अवयस्क दर्शक पर नहीं लगाई जा सकती है। केंद्र सरकार द्वारा ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर उपब्लध कंटेंट को लेकर 11 नवंबर 2020 को जारी एक गजट नोटिफिकेशन के बाद ओटीटी प्लेटफॉर्म पर सेंसरशिप पर गंभीरता से चर्चा चल पड़ी है। नोटिफिकेशन में ओटीटी प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध कंटेंट की निगरानी की बात कही गई थी। इसके पहले केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दलील देते हुए कहा था कि ऑनलाइन माध्यम की निगरानी टीवी से ज्यादा जरूरी है। दरअसल देश में डिजिटल कंटेंट की निगरानी के लिए अभी तक कोई कानून या संस्था नहीं है। यही वजह है कि ओटीटी पर किसी भी प्रकार का कोई नियंत्रण नहीं है। ओटीटी के कंटेंट पर नियंत्रण इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि लाॅकडाउन के बाद से ओटीटी प्लेटफॉर्म पर दर्शकों की संख्या बढ़ी है। लगभग 15 ओटीटी प्लेटफॉर्म्स जिसमें नेटफ्लिक्स, डिज्नी प्लस हॉट स्टार, वूट, अल्ट बालाजी, वूट जैसे बड़े प्लेयर शामिल हैं, जिन्होंनेे मिलकर कंटेट रेगुलेशन के लिए कोड वर्ष 2020 में ही बनाया है, जिसमें पांच तरह के कंटेट ओटीटी प्लेटफार्म पर न दिखाने की सहमति दी है। हालांकि, सरकार ने इसे पर्याप्त नहीं माना। इस रेगुलेशन कोड में ओटीटी प्लेयर्स ने तय किया था कि राष्ट्रीय भावनाओं का अपमान करने वाला कोई कंटेंट नहीं दिखाया जाएगा। साथ ही चाइल्ड पोर्नोग्राफी को बढ़ावा देने वाला, धार्मिक भावनाओं को आहत करने वाला और आतंकवाद को किसी भी रूप में बढ़ावा देने वाला कंटेंट नहीं दिखाया जाएगा। साथ ही ऐसा कोई कंटेंट नहीं दिखाया जाएगा, जिस पर अदालत ने किसी भी तरह की रोक लगाई है।  लेकिन वेब सीरीज के नियमित समीक्षक मानते हैं कि ‘‘वेब सीरीज की दुनिया में क्रांति हो रही है, लेकिन यह क्रांति कंटेंट की कम कामुकता की अधिक हो रही है। दर्शकों को सॉफ्ट पोर्न दिखा कर उसका मानसिक स्खलन किया जा रहा है। एक समीक्षक के अनुसार ‘मिर्जापुर’, ‘इनसाइड ऐज’, ‘गंदी बात’, ‘कौशिकी’ और ‘बारकोड’ जैसे वेब सीरीज ओटीटी प्लेटफार्म पर सेंसरशिप का नया कानून बनवा कर ही मानेंगे।’’ इस संकट से निपटने के लिए सरकार ओटीटी के लिए अलग से सेंसरशिप कानून लाने पर विचार कर रही है। जो आवश्यक भी है। बहरहाल, ओटीटी प्लेटफाॅर्म टेलीविज़न पर भारी पड़ता नज़र आ रहा है और उसकी धमक को साफ़-साफ़ महसूस किया जा सकता है।

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(दैनिक सागर दिनकर में 03.12.2020 को प्रकाशित)
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Wednesday, November 25, 2020

चर्चा प्लस | डाॅ. हरी सिंह गौर : उनके जैसा दूजा नहीं और | डाॅ शरद सिंह

चर्चा प्लस
डाॅ. हरी सिंह गौर : उनके जैसा दूजा नहीं और
 - डाॅ शरद सिंह
 डॉ. हरी सिंह गौर एक प्रसिद्ध शिक्षाविद्, वकील, राजनेता, लेखक और समाज सुधारक थे। वे दिल्ली विश्वविद्यालय के पहले वाइस चांसलर, नागपुर नगरपालिका के मेयर और भारत की संविधान सभा के सम्मानित सदस्य थे। यह सारा परिचय उस समय छोटा पड़ जाता है जब उनका यह परिचय सामने आता है कि उन्होंने अपनी व्यक्तिगत संपत्ति दान दे कर एक विश्वविद्यालय की स्थापना की। अपना सब कुछ दे कर बुंदेलखंड के हर दृष्टि से पिछड़े इलाके में उच्चशिक्षा की गौरवशाली नींव रखी और दुनिया को दिखा दिया कि परहित और जनहित किसे कहते हैं   हरीसिंह गौर का जन्म 26 नवंबर 1870 को सागर में एक गरीब परिवार में हुआ था। उनके तीन भाई थे- ओंकार सिंह, गणपत सिंह और आधार सिंह। दो बहनें थीं- लीलावती और मोहनबाई। हरी सिंह ने अपनी प्राथमिक शिक्षा सागर से ही पूरी की और चूंकि वह पढ़ाई में बहुत अच्छे थे। प्राइमरी के बाद उन्होनें दो वर्ष में ही आठवीं की परीक्षा पास कर ली जिसके कारण उन्हें सरकार से 2रुपये की छात्रवृति मिलने लगी, जिसके बल पर ये जबलपुर के शासकीय हाई स्कूल गये। लेकिन मैट्रिक में ये फेल हो गये जिसका कारण था एक अनावश्यक मुकदमा। इस कारण इन्हें वापिस सागर आना पड़ा दो साल तक काम के लिये भटकते रहे फिर जबलपुर अपने भाई के पास गये जिन्होने इन्हें फिर से पढ़ने के लिये प्रेरित किया। डॉ. गौर फिर मैट्रिक की परीक्षा में बैठे। अपने विद्यालय का नाम रोशन करते हुए उन्होंने पूरे प्रान्त में प्रथम स्थान पाया। इस उपलब्धि पर उन्हें 50 रुपये नगद एक चांदी की घड़ी एवं बीस रूपये की छात्रवृति मिली। आगे की पढ़ाई के लिए उन्हें नागपुर जाना पड़ा। वहां हिलसप कॉलेज में दाखिला लिया। पूरे कॉलेज में अंग्रेजी एव इतिहास में ऑनर्स करने वाले वे एकमात्र छात्र थे। नागपुर के हिसलोप कॉलेज में वह इंटर की परीक्षा में अव्वल आए और पढ़ाई जारी रखने के लिए उन्हें वजीफा मिल गया। 

हरी सिंह गौर की अध्ययन की प्यास अभी बुझी नहीं थी। वे लंदन जा कर उच्चशिक्षा ग्रहण करना चाहते थे। उन्होंने अपने इच्छा अपने भाइयों के सामने व्यक्त की। उनके भाइयों ने उन्हें लंदन जाने की अनुमति भी दी और सहयोग भी दिया। इसके बाद हरी सिंह गौर कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय चले गए। वहां उन्होंने सन् 1891 में दर्शनशास्त्र और अर्थशास्त्र में उपाधि प्राप्त की। इसके बाद कानून की शिक्षा ग्रहण की और कानून की उपाधि ले कर ही भारत लौटे। अपने देश लौट कर वे रायपुर में वकालत करने लगे। उन्होंने करीब चालीस साल तक वकालत की। शीघ्र ही वे एक योग्य वकील के रूप में विख्यात हो गए। उन्होंने प्रिवी कौंसिल के लिए कई महत्वपूर्ण मुकद्दमें लड़े। वह हाई कोर्ट बार कौंसिल के सदस्य थे और बाद में उन्हें हाई कोर्ट बार एसोसिएशन का अध्यक्ष भी चुना गया। उन्होंने महिलाओं को वकालत करने के लिए क़ानूनी लड़ाई भी लड़ी थी। सिविल मैरिज बिल 1923 तैयार में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस दौरान उन्होंने एक किताब ‘‘पीनल लॉ ऑफ इंडिय’’ लिखी ।

डाॅ. हरी सिंह गौर 1920 से लेकर 1935 तक वह केंद्रीय विधान सभा के सदस्य रहे। सन् 1922 में जब दिल्ली विश्वविद्यालय की स्थापना हुई तब डाॅ. हरि सिंह को उसका वाइस चांसलर नियुक्त किया गया। वे 1928 से 1936 तक नागपुर विश्वविद्यालय के भी वाइस चांसलर रहे। जब डॉ. आंबेडकर की अगुवाई में नया संविधान बनाने के लिए संविधान सभा का गठन हुआ तब हरि सिंह को इसका सदस्य बनाया गया और उन्होंने भारत के संविधान के निर्माण में अहम भूमिका निभाई।

अपनी सारी उपलब्धियों को वे अपूर्ण मानते थे। उनका कहना था कि ‘‘यदि हम कोई ऐसा क़दम नहीं उठाते हैं जो दूसरों का जीवन बदल सके, संवार सके, तो हमारा हर कदम व्यर्थ है।’’ उनकी यही सोच नींव थी उनके उस प्रयास की जो आगे चल कर सागर विश्वविद्यालय के रूप में सामने आई। सागर ही क्या समूचे बुंदेलखंड में उन दिनों उच्चशिक्षा का कोई केन्द्र नहीं था। डाॅ. हरी सिंह गौर यह भली-भांति जानते थे कि आर्थि दृष्टि से पिछड़ा हुआ बुंदेलखंड योग्य युवाओं से तो परिपूर्ण है लेकिन वे युवा असमर्थ हैं बाहर जा कर उच्चशिक्षा प्राप्त करने में। अतः उन्होंने सोचा कि क्यों न उच्चशिक्षा का केन्द्र ही उन युवाओं के पास ला दिया जाए। डाॅ. हरी सिंह गौर ने ब्रिटिश सरकार से आग्रह किया कि सागर में उच्चशिक्षा का केन्द्र स्थापित किया जाए। लम्बी काग़ज़ी कार्यवाही और धन के संकट का हवाला देते हुए टालमटोल करती ब्रिटिश सरकार के आगे अपनी संपत्ति सामने रखते हुए डाॅ. हरी सिंह गौर ने कहा कि अब कोई अड़चन नहीं आनी चाहिए। उन्होंने विश्विद्यालय के लिए बीस लाख रुपये दे दिए। उन्होंने अपनी वसीयत में अपनी संपत्ति का दो तिहाई हिस्सा (लगभग दो करोड़ रुपये) विश्विद्यालय के नाम कर दिया था। उन्होंने इस नए विश्वविद्यालय को कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय की भांति ‘‘सागर विश्वविद्यालय’’ नाम दिया। वे हर विभाग के लिए दुनिया भर से चुन-चुन कर शिक्षाविद् विद्वान सागर विश्वविद्यालय में लाए। अफ़सोस कि वे अपने द्वारा स्थापित सागर विश्वविद्यालय को फलता-फूलता अधिक दिनों तक नहीं देख सके। सन् 1949 की 25 दिसम्बर को उनका निधन हो गया। महान दानी डाॅ. हरी सिंह गौर को श्रद्धांजलि स्वरूप सन् 1983 में सागर विश्वविद्यालय का नाम बदलकर ‘‘डॉ. हरि सिंह गौर विश्वविद्यालय’’ कर दिया गया ताकि दुनिया भर में उनकी यह देन उनके नाम से जानी जाए। 
डाॅ. हरी सिंह गौर समय के पाबंद और मितव्ययी थे। डाॅ. हरि सिंह गौर धन के अपव्यय के प्रबल विरोधी थे। उनके जीवन की अनेक ऐसी घटनाएं हैं जिनसे उनकी मितव्ययिता का पता चलता है। डाॅ. हरि सिंह गौर जब सागर के कुलपति निवास में रहते थे, उस समय की एक घटना है कि एक दिन जब उनका निज सहायक उनसे मिलने आया तो देखा की डाॅ. हरि सिंह गौर फर्श पर घुटनों के बल झुक कर कुछ ढूंढ रहे हैं। कुछ देर देखते रहने के बाद जब निज सहायक ने न रहा गया तो उसने पूछ ही लिया कि आप क्या ढूंढ रहे हैं? डाॅ. हरि सिंह गौर ने उत्तर दिया कि मैं अठन्नी ढूंढ रहा हूं जो यहीं कहीं गिर गई है। ‘‘एक अठन्नी के पीछे आप इतने परेशान हो रहे हैं, आप तो कुलपति हैं।’’ निज सहायक कह बैठा। इस पर डाॅ. हरि सिंह गौर ने उससे कहा,‘‘बात मेरे कुलपति होने और उसके अठन्नी होने की नहीं है, बात लापरवाही और पैसे की कीमत की है। रकम चाहे छोटी हो या बड़ी, मूल्यवान होती है।’’ यह सुन कर निज सहायक ािक अपनी गलती का अहसास हो गया और वह भी अठन्नी ढूंढने लगा। जल्दी ही वह अठन्नी मिल गई और निज सहायक को मितव्ययिता का सबक भी।

एक और रोचक घटना है कि एक बार डाॅ. हरि सिंह गौर जापान सरकार के आमंत्रण पर लेक्चर देने जापान गए। उनकी बेटी भी उनके साथ गई। डाॅ. हरि सिंह गौर अपनी बेटी को निश्चित अंतराल पर जेब खर्च दिया करते थे। जापान में बेटी को एक छाता पसंद आ गया। बेटी के पास जेबखर्च के पैसा खऋत्म हो गया था और अगला जेबखर्च मिलने में अभी दो दिन शेष थे। वे जानती थीं कि उनके पिता समय से पहले जेबखर्च नहीं देंगे। अतः उन्होंने अपने पिता से वह छाता खरीदने के लिए पैसे मांगे। इस पर डाॅ. हरि सिंह गौर कहा कि यदि तुम्हारे पास पैसे नहीं है तो छाता मत खरीदो। तब बेटी से अनुरोध किया कि उधार के रूप में ही दे दीजिए। अगले जेबखर्च से काट लीजिएगा। तब डाॅ. हरि सिंह गौर ने बेटी को समझाया कि यदि पैसे नहीं हैं तो मत खरीदो, और उधार में धन ले कर यानी कर्ज ले कर तो कभी मत खरीदो। इस तरह उन्होंने पैसे देने से साफ़ मना कर दिया। लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं है कि अपनी बेटी को मितव्ययिता और कर्ज से बचने की शिक्षा देते हुए वे पिता के अपने कर्तव्य को भूल गए हों। दूसरे ही दिन उनकी बेटी को जापान में ही एक पार्सल मिला। जब उन्होंने पार्सल खोलकर देखा तो उसमें से जापानी छाता निकला एवं उस पर लिखा था ‘‘तुम्हारे पिता का स्नेह’’। वर्तमान आर्थिक संकट के दौर में उनकी यह सीख बहुत महत्व रखती है।

डाॅ. हरि सिंह गौर ने जिस मितव्ययिता और शैक्षिक योग्यता की जो दूसरों से अपेक्षा की उसे पहले स्वयं अमल में लाया। उनके नाम पर कौंसिल ऑफ साइंस एंड टैक्नॉलॉजी, भोपाल ने ‘डॉ. हरि सिंह गौर स्टेट अवार्ड’ शुरु किया। भारत सरकार ने 26 नवंबर 1976 में उनके नाम पर एक डाक टिकट भी जारी किया था। शिक्षा क्षेत्र में एक महानदानी के रूप में वे हमेशा याद रखे जाएंगे। वे अद्वितीय थे, अद्वितीय हैं और अद्वितीय रहेंगे।   
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(दैनिक सागर दिनकर में 25.11.2020 को प्रकाशित)
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Wednesday, November 18, 2020

चर्चा प्लस | चिन्ताजनक है प्रेम का हिंसा की ओर बढ़ना | डाॅ शरद सिंह

चर्चा प्लस
चिन्ताजनक है प्रेम का हिंसा की ओर बढ़ना
 - डाॅ शरद सिंह
  महाराष्ट्र के बीड जिले में दिवाली के दिन दिल दहला देने वाली घटना घटी जिसमें एक 22 वर्षीय युवती को उसके बॉयफ्रेंड ने एसिड और पेट्रोल से जलाने के बाद सड़क किनारे फेंक दिया। इस ख़बर ने सोचने को मज़बूर कर दिया है कि क्या प्रेम इतना हिंसात्मक रूप भी ले सकता है? विगत कुछ दशकों से एकतरफा प्रेम अथवा प्रेमिका से छुटकारे के लिए हिंसात्मक कदम उठाए जाने के समाचार अकसर पढ़ने को मिलने लगे हैं। प्रेम का इस तरह हिंसा की ओर बढ़ना चिंतनीय है।   
जिसने भी चन्द्रधर शर्मा गुलेरी की ‘उसने कहा था’ पढ़ी है, उसे वह यह संवाद कभी नहीं भूल सकता कि कहानी का नायक लहना सिंह एक लड़की से पूछता है-‘तेरी कुड़माई हो गई?’ और वह लड़की ‘धत्’ कह कर शरमा जाती है। लड़की ने एक दिन ‘तेरी कुड़माई हो गई’ का उत्तर दे दिया कि ‘हंा, हो गई....!’ लहना विचलित हो गया। उस लड़की का विवाह जिससे हुआ, वह आगे चल कर सेना में सूबेदार बना और वह लड़की कहलाई सूबेदारनी। एक भरा-पूरा परिवार, वीर, साहसी पति, वैसा ही वीर, साहसी बेटा। आर्थिक सम्पन्नता। सामाजिक दृष्टि से सुखद पारिवारिक जीवन। वहीं एकतरफा प्रेम में डूबा लहना सिंह उस लड़की को कभी भुला नहीं सका। युद्ध में जाते समय जब लहना सूबेदार के घर उन्हें लेने गया तो सूबेदारनी ने ही उसे पहचाना और अनुरोध किया कि युद्ध में उसके पति यानी सूबेदार की रक्षा करना। लहना सिंह ने अपना वचन निभाया। लहना चाहता तो सूबेदार को मर जाने देता ओर सूबेदारनी से अपना बदला ले लेता। या फिर बहुत पहले ‘कुड़मई’ की ख़बर पाते ही आक्रामक हो उठता। लेकिन लहना ने कोई गलत कदम नहीं उठाया क्योंकि वह उस लड़की से सच्चा प्रेम कर बैठा था। प्रेम समर्पण मांगता है हिंसा या प्रतिकार नहीं।   

आज के माहौल में लहना सिंह का समर्पित प्रेम मानो कहीं खो गया है। हाल ही में महाराष्ट्र के बीड जिले में दिवाली के दिन की दिल दहला देने वाली घटना ने यह सोचने को मजबूर कर दिया कि क्या प्रेम मर कर हिंसा का रूप ले लेता है या फिर वह वस्तुतः प्रेम होता ही नहीं है? महाराष्ट्र के बीड जिले में एक 22 वर्षीय युवती को उसके बॉयफ्रेंड ने एसिड और पेट्रोल से जलाने के बाद सड़क किनारे फेंक दिया, जहां वह 12 घंटे से अधिक समय तक मौत से जूझती, तड़पती वह पड़ी रही। किसी ने उसे देखा और पुलिस को ख़बर की जिसके बाद उसे अस्पताल पहुंचाया गया। मौत से 16 घंटे तक जूझने के बाद उस युवती ने दम तोड़ दिया। यह सिर्फ़ एक घटना नहीं है। विगत कुछ दशको से ऐसी घटनाएं अकसर पढ़ने-सुनने को मिलती रहती हैं। देश के हर प्रांत, हर जिले से एक न एक ऐसी घटना प्रकाश में आती रहती है। जून 2016 को रेवाड़ी में एक युवक ने एक तरफा प्यार के चलते युवती को चाकू मार घायल कर दिया था। मार्च 2017 मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में एक युवक ने एकतरफा प्रेम के चलते एक युवती की चाकू मार कर हत्या करने की कोशिश की। युवती को फौरन अस्पताल ले जाया गया। नवंबर 2018 गाजियाबाद के सिहानी गेट थाना क्षेत्र के मालीवाडा में प्रशांत नाम के 28 वर्षीय युवक ने एक 26 वर्षीय युवती पर चाकू से हमला कर दिया। आरोपी प्रेमी ने लड़की के घर पर ही लड़की का गला चाकू से बुरी तरह रेत दिया। ग्रेटर नोएडा के एक मॉल में शुक्रवार को एकतरफा प्रेम प्रसंग के मामले में एक व्यक्ति ने 18 वर्षीय युवती की चाकू घोंपकर हत्या कर दी और इसके बाद अपने आप को भी मारने की कोशिश की। नवंबर 2019 अलीगढ़ के इगलास कोतवाली क्षेत्र के गांव जारौठ में एकतरफा प्रेम में पागल प्रेमी ने युवती की घर में घुसकर बेरहमी से हत्या कर दी। 19 वर्षीय युवती की 15 दिसंबर को शादी होने वाली थी। शादी की खबर से युवक आहत था। उसने सोमवार दोपहर युवती के घर में घुसकर उसकी गर्दन, छाती और पेट में चाकू से प्रहार किए और भाग गया। जून 2020 कोतवाली थाना क्षेत्र में एक सिरफिरे आशिक ने एकतरफा प्रेम में पड़ोस में रहने वाली लड़की पर चाकू से हमला कर दिया। ओरछा गेट निवासी विनोद पड़ोस में रहने वाली एक लड़की से एकतरफा प्यार करता था। साथ ही वह लड़की पर आये दिन शादी करने का दबाव बनाता था। जब ऐसा नहीं हो सका तो विनोद ने बुधवार की दोपहर लड़की पर चाकू से हमला कर दिया। जून 2020 दिल्ली से सटे गाजियाबाद के तुलसी निकेतन में एकतरफा प्यार में पागल एक सनकी प्रेमी ने एक युवती की चाकू से गोदकर निर्ममता से हत्या कर दी। आरोपी युवक उस युवती की कहीं और शादी तय होने से नाराज था। 

ये तो मामले हैं एकतरफा प्रेम के हिंसात्मक परिणाम के। अब लिवइन में अपनी पार्टनर से पीछा छुड़ाने के लिए हिंसात्मक तरीके अपनाएं जाने लगे हैं। जबकि लिवइन का आधार ही है प्रेम, समर्पण और विश्वास। लेकिन इस प्रकार की हिंसात्मक घटनाओं को देखते हुए लगने लगा है मानो प्रेम से ये तीनों आधार तत्व लुप्त होते जा रहे हैं। ‘प्रेम’ एक जादुई शब्द है। कोई कहता है कि प्रेम एक अनभूति है तो कोई इसे भावनाओं का विषय मानता है। कहा तो यह भी जाता है कि प्रेम सोच-समझ कर नहीं किया जाता है। यदि सोच-समझ को प्रेम के साथ जोड़ दिया जाए तो लाभ-हानि का गणित भी साथ-साथ चलने लगता है। बहरहाल सच्चाई तो यही है कि प्रेम बदले में प्रेम ही चाहता है और इस प्रेम में कोई छोटा या बड़ा हो ही नहीं सकता है। जहां छोटे या बड़े की बात आती है, वहीं प्रेम का धागा चटकने लगता है। ‘रहिमन धागा प्रेम का मत तोड़ो चटकाय। टूटे से फिर न जुड़े, जुड़े गांठ पड़ जाए।’ प्रेम सरलता, सहजता और स्निग्धता चाहता है, अहम की गंाठ नहीं। इसीलिए जब प्रेम किसी सामाजिक संबंध में ढल जाता है तो प्रेम करने वाले दो व्यक्तियों का पद स्वतः तय हो जाता है। स्त्री और पुरुष के बीच का वह प्रेम जिसमें देह भी शामिल हो पति-पत्नी का सामाजिक रूप लेता है। हजारी प्रसाद द्विवेद्वी लिखते हैं कि ‘प्रेम से जीवन को अलौकिक सौंदर्य प्राप्त होता है। प्रेम से जीवन पवित्रा और सार्थक हो जाता है। प्रेम जीवन की संपूर्णता है।’ आचार्य रामचंद्र शुक्ल मानते थे कि प्रेेम एक  संजीवनी शक्ति है। संसार के हर दुर्लभ कार्य को करने के लिए यह प्यार संबल प्रदान करता है। आत्मविश्वास बढ़ाता है। यह असीम होता है। इसका केंद्र तो होता है लेकिन परिधि नहीं होती।’ कथा सम्राट प्रेमचंद ने लिखा है कि ‘मोहब्बत रूह की खुराक है। यह वह अमृतबूंद है, जो मरे हुए भावों को ज़िन्दा करती है। यह ज़िन्दगी की सबसे पाक, सबसे ऊंची, सबसे मुबारक़ बरक़त है।’ 

बेशक़ प्रेम की परिभाषा। प्रेम का अर्थ, एक साथ महसूस की जाने वाली उन सभी भावनाओं से जुड़ा है, जो मजबूत लगाव, सम्मान, घ्बहुत कठिन है घनिष्ठता, आकर्षण और मोह से सम्बन्धित हैं। प्रेम होने पर परवाह करने और सुरक्षा प्रदान करने की गहरी भावना व्यक्ति के मन में सदैव बनी रहती है। प्रेम वह अहसास है जो लम्बे समय तक साथ देता है और एक लहर की तरह आकर चला नहीं जाता। तभी तो कबीर ने कहा है कि -
पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुआ, हुआ न पंडित कोय। 
ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय।।

लेकिन वर्तमान परिदृश्य चिंता में डालने वाला है। प्रेम हिंसा की ओर बढ़ता दिखाई देने लगा है। इसके कारणों पर गौर करें तो तो मूल करण यही दिखाई देते हैं कि एक तो मानवीय मूल्यों में तेजी से कमी आती जा रही है और दूसरे, युवाओं में प्रेम संबंधों को ले कर असुरक्षा की भावना बढ़ रही है। ये दोनों कारण ‘‘प्रेम करने का भ्रम पालने वालों’’ को हिंसाात्मक बना देता है। असली प्रेम करने वाले कभी, किसी भी दशा में अपने प्रिय का अहित नहीं कर सकते हैं। इस हिंसात्मक आचरण के लिए कहीं न कहीं घरेलूहिंसा भी जिम्मेदार है। जो बच्चे अपने घर में स्त्रियों के प्रति हिंसात्मक रवैया देखते हैं, वही बच्चे बड़े हो कर स्त्रियों के प्रति हिंसात्मक कदम उठाने से नहीं हिचकते हैं। समाज से जुड़ा यह एक ऐसा विषय है जिसकी अनदेखी नहीं किया जाना चाहिए। भारतीय संस्कृति प्रेम की पक्षधर है हिंसा की नहीं।               
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(दैनिक सागर दिनकर में 18.11.2020 को प्रकाशित)
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Wednesday, November 11, 2020

चर्चा प्लस | सतर्कता से दीपावली मनाना है, कोरोना को हराना है | डाॅ शरद सिंह

चर्चा प्लस
सतर्कता से दीपावली मनाना है, कोरोना को हराना है
   - डाॅ शरद सिंह
  दीपावली वह त्यौहार है जिसका नाम लेते ही दीपकों की जगमग करती कतारों की तस्वीर आंखों के आगे घूम जाती है। लाई, बताशे, पटाखे, फुलझड़ी आदि इसे और अधिक रोचक बना देते हैं। लेकिन इस बार की दीपावली वैसी नहीं होगी जैसी हम हमेशा मनाते आए हैं। कारण कि कोरोना आपदा से अभी छुटकारा नहीं मिला है। इस बार की दीपावली सतर्क दीपावली के रूप में मनाने में ही सुरक्षा और खुशियां दोनों निहित है। साथ ही इसे हम परमार्थ रूप दे कर सार्थक दीपावली यानी एक स्पेशल दीपावली में बदल सकते हैं। 

दीपावली का उत्साह कोरोना के भय पर भारी पड़ रहा है। बाज़ार में दूकानें सज गई हैं और भीड़ उमड़ने लगी है। फिर भी हर व्यक्ति दुविधा की स्थिति से गुज़र रहा है। इतने बड़े त्यौहार को वह फीका भी नहीं जाने देना चाहता है और वहीं उसके भीतर कोरोना संक्रमण कर भय भी समाया हुआ है। कोरोना के भय के प्रति देश में हर स्तर पर प्रशासन भी सतर्क है। इसी लिए दीपावली पर एनजीटी यानी नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने सतर्कता नोटिस जारी करते हुए देश के 23 राज्यों में पटाखों की बिक्री और उपयोग पर अस्थायी प्रतिबंध लगाने पर अपना आदेश सुनाया है। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल यानी राष्ट्रीय हरित अधिकरण की स्थापना 18 अक्तूबर 2010 को एनजीटी अधिनियम, 2010 के तहत पर्यावरण संरक्षण, वन संरक्षण, प्राकृतिक संसाधनों सहित पर्यावरण से संबंधित किसी भी कानूनी अधिकार के प्रवर्तन, दुष्प्रभावित व्यक्ति अथवा संपत्ति के लिये क्षतिपूर्ति प्रदान करने एवं इससे जुड़े हुए मामलों के प्रभावशाली और त्वरित निपटारे के लिये की गई थी। दूसरे शब्दों में इसे पर्यावरण अदालत कहा जा सकता है, जिसे हाई कोर्ट के समान शक्तियां प्राप्त हैं। एनजीटी ने 30 नवंबर की रात तक दिल्ली एनसीआर सहित देश के उन शहरों और कस्बों में पटाखों पर पूरी तरह बैन लगा दिया है जहां पिछले साल नवंबर में हवा की गुणवत्ता खराब रही। आतिशबाजी पर भी पाबंदी लगाई गई है। वहीं मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने पटाखों पर पाबंदी तो नहीं लगाई है लेकिन चाईनीज़ पटाखे बेचने और चलाने पर रोक लगाई है।

दीपावली मानने को ले कर एनजीटी ने गाईडलाईन भी जारी की है जिसके अनुसार जिन शहरों में वायु प्रदूषण इंडेक्स 200 से ज्यादा है, वहां पर पटाखों की बिक्री और पटाखे जलाने पर रोक लगाई गई है। जिन शहरों में वायु प्रदूषण खतरे के बिन्दु से नीचे होगा, वहां पर पटाखे बेचे जा सकेंगे और उन्हें जलाने के लिए दो घंटे का समय निर्धारित रहेगा। यह पटाखे त्यौहारों यथा - दीपावली, छठ, न्यू ईयर और क्रिसमस जैसे त्यौहारों पर जलाए जा सकेंगे। पश्चिम बंगाल, ओडिशा, राजस्थान और हरयाणा समेत एनजीटी ने 23 राज्यों में पटाखों की बिक्री और उपयोग पर अस्थायी प्रतिबंध लगाने पर अपना आदेश सुनाया है। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने कहा, ‘वैसे शहर या कस्बे जहां वायु गणवत्ता ‘मध्यम’ या उसके नीचे दर्ज की गई, वहां सिर्फ हरित पटाखों की बिक्री हो सकती है और दीपावली, छठ, नया साल, क्रिसमस की पूर्व संध्या जैसे अन्य मौकों पर पटाखों के इस्तेमाल और उन्हें फोड़ने की समय सीमा को दो घंटे तक ही सीमित रखी जा सकती है, जैसा कि संबंधित राज्य इसको तय कर सकते हैं।’ इसके साथ ही नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने कहा कि ‘वहीं अन्य स्थानों पर प्रतिबंधरोक अधिकारियों के लिए वैकल्पिक है और अगर अधिकारियों के आदेश में इस संबंध में कड़े कदम हैं, तो वे लागू होंगे।’ यह गाईडलाईन इसलिए जारी की गई है क्योंकि वायु प्रदूषण से कोविड-19 के मामले बढ़ सकते हैं।  इसके अलावा जिन शहरों में वायु प्रदूषण प्रतिशत अपेक्षाकृत कम है, वहां सिर्फ ग्रीन पटाखे ही छोड़े जा सकते हैं, वह भी मात्र दो घंटे की निर्धारित अवधि में। यह याद रखना जरूरी है कि इस बार तो कोरोना आपदा का दौर है। कोरोना हवा में ही तेजी से फैलता है। अगर पर्यावरण प्रदूषित होगा तो कोरोना भी उतनी तेजी से ही फैलेगा। इसलिए प्रदेश सरकार के द्वारा दी गई छूट रूपी विश्वास का सम्मान करते हुए मध्यप्रदेश में भी पटाखे कम से कम चलाए जाएं तो इससे हवा को प्रदूषित होने से बचाए रख सकेंगे और कोरोना संक्रमण को फैलाने के अपराध के मानवीय अपराध के भागीदार भी नहीं बनेंगे। इस बार अध्योध्या में अभूतपूर्व दीपोत्सव मानाया जाना है। उस दीपोत्सव की संकल्पना का अनुसरण करते हुए हम भी दीपोत्सव मना सकते हैं। दीपक पटाखों की तरह वायु को नुकसान नहीं पहुंचाते हैं, वहीं जगमग रोशनी की सुंदरता से सराबोर कर देते हैं। प्रकाश का त्यौहार है दीपावली तो सही मायने में प्रकाश पर ही आधारित दीपावली हम मनाएं, व्यर्थ ही पटाखें के बारूद से धन और वायु का अपव्यय क्यों करें? कुछ पल की खुशी के लिए ध्वनि और वायु प्रदूषण बढ़ा कर कोरोना को न्योता देने से बेहतर है कि हम पटाखों में व्यय होने वाले पैसों से उन लोगों की मदद करें जो कोरोना आपदा के चलते बेरोजगार हो गए हैं अथवा महानगरों से अपने घर-गांव लौट कर आर्थिक तंगी से जूझ रहे हैं।

कोरोना के मामलों की गिनती में भले ही आधिकारिक रूप से कमी दिखाई दे रही हो लेकिन इससे चिन्तामुक्त नहीं हुआ जा सकता हैं। चिकित्सकों एवं विशेषज्ञों का भी मानना है कि बढ़ती सर्दी में कोरोना संक्रमण का दूसरा दौर आ सकता है। इस घातक वायरस का अभी भी कोई टीका विकसित नहीं हुआ है। इसलिए इस दीवाली हमें अपने और अपने परिवार को सुरक्षित रखने के लिए पहले की तरह सतर्क रहना होगा। लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं है कि दीपावली के जोश को कम होने दें। थोड़ी-सी समझदारी और सतर्कता के साथ खुशियों भरी सुरक्षित दीपावली मनाई जा सकती है। सतर्कता सिर्फ़ इतनी रखनी है कि बड़े और भीड़-भाड़ वाले दीपावली के समारोहों में जाने से बचें। कोरोनावायरस के फैलने का जोखिम सबसे ज्यादा उन स्थानों पर है जहां छोटे स्थान में अधिक लोग इकट्ठा होते हैं। विस्तार वाली जगह में जहां सोशल डिस्टेंसिंग संभव है वहां भी कई बार डिस्टेंसिंग बनाए रखना कठिन हो जाता है। आप हर व्यक्ति से सतर्कता भरी बुद्धिमानी की उम्मींद नहीं कर सकते हैं। कई लोग जान की परवाह किए बिना ढिठाई की हद तक बेपरवाह हो जाते हैं और बिना मास्क के लपक कर मिलने के लिए निकट चले आते हैं। ऐसे समय आप सभ्यता एवं संकोचवश ‘‘दूर रहिए-दूर रहिए’’ भी नहीं कह पाते हैं और मन ही मन डरते रहते हैं। इसलिए बेहतर है कि ऐसी कठिनाई वाली स्थिति में ही क्यों फंसा जाए। 

जब बात भीड़ से बचने की हो तो त्यौहारी खरीददारी के लिए बाज़ार जाने से भी परहेज करना जरूरी है। त्यौहार के समय बाज़ार में भीड़ जुटना स्वाभाविक है। ऐसे में कोरोना से खुद का बचाव करना बेहद कठिन है। सभी जानते हैं कि भीड़ में संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है। इस कोरोनाकाल में बिना किसी अतिरिक्त खर्च के स्थानीय दूकानदार ‘‘एट डोर सर्विस’’ देने लगे हैं। तो इस घर बैठी सेवा का लाभ उठाते हुए त्यौहारी खरीददारी की जा सकती है। इसलिए कोरोना के डर से मन मारने के बजाए कोरोना काल में ऑनलाइन शॉपिंग सबसे बेहतर विकल्प है।
जहां तक आर्थिक संकट से जूझ रहे लोगों की मदद का प्रश्न है तो कोरोना काल में रोजी रोटी के संकट से जूझ रहे कुम्हारों के लिए स्थानीय प्रशासन ने ‘‘बाज़ार बैठकी’’ से उन्हें मुक्त रख कर उनकी बहुत बड़ी सहायता की है। कोरोना और आर्थिक संकट दोनों से जूझते हुए भी कुम्हारों ने अपनी उम्मींद का दिया जलाए रखा है और वे उत्साहपूर्वक दिए बना रहे हैं। दीपावली के अवसर पर मिट्टी से बने हुए दीपकों के साथ ही लक्ष्मी, गणेश, कुबेर, अन्न का कूडा, ग्वालिन आदि की भी जरूरत पड़ती है। कुम्हार भी कोरोना आपदा की गंभीरता को समझते हैं। उन्हें मजबूरी में बाज़ार की भीड़ के बीच अपनी दूकानें लगानी पड़ रही हैं, फिर भी वे घर-घर घूमते हुए भी दीपक तथा मिट्टी की अन्य वस्तुएं बेचते घूम रहे हैं। यदि घर के दरवाज़े आए कुम्हारों से हम बिना अधिक मोलभाव किए दीपक आदि खरीदेंगे तो इससे हम भीड़ भरे बाज़ार में जाने से भी बचेंगे और उन कुम्हारों से सामग्री खरीद कर उनकी आर्थिक मदद भी कर सकेंगे। आखिर जो वस्तुएं वे हमारे घर के दरवाज़े पर ला रहे हैं वही वस्तुएं तो बाज़ार में मौजूद है।  

ये छोटी-छोटी लेकिन महत्वपूर्ण सतर्कता दीपावली की खुशियों पर कोरोना का ग्रहण लगने से बचाए रखेगी। फिर यह भी संभव है कि इस तरह की संकट वाली यह इकलौती दीपावली हो। दुनिया भर में चल रहे अनुसंधानों को देखते हुए हम आशा कर सकते हैं कि अगली दीपावली के पहले तक हर व्यक्ति के पास वैक्सीन पहुंच जाएगा और अगली दीपावली हम कोरोना आपदा से मुक्त हो कर मनाएंगे। तो इस बार की दीपावली में कुछ अलग हट कर, कुछ सुरक्षित, कुछ सतर्क, कुछ दूरियों के साथ दीपावली का आनंद लें और कोरोना के भय पर विजय पाएं। आखिर पटाखों के बिना भी दीपावली हो सकती है दमदार।
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(दैनिक सागर दिनकर में 11.11.2020 को प्रकाशित)
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Wednesday, November 4, 2020

चर्चा प्लस | ‘चार्ली हेब्दो’ जनित अशांति और संयम का अस्त्र | डाॅ शरद सिंह

चर्चा प्लस
‘चार्ली हेब्दो’ जनित अशांति और संयम का अस्त्र
 - डाॅ शरद सिंह
 किसी की भावनाओं को भड़काना सबसे आसान होता है यदि पता चल जाए कि वह किसके प्रति सबसे अधिक संवेदनशील है। ‘‘चार्ली हेब्दो’’ ने सटायर के नाम पर हमेशा भावनाओं को ही चोट पहुंचाया है और भड़काया है। इस बार उसके भड़कावे की आंच हमारे देश की सड़कों तक आ पहुंची। ऐसे समय में सामूहिक गुस्से का फ़ायदा उठाने वाले भी सक्रिय हो उठते हैं और आम जनजीवन की शांति भंग कर देते हैं। तब संयम ही वह अस्त्र होता है जो प्रत्येक आतंकी और कट्टरपंथी गतिविधियों को सौ प्रतिशत पराजित करता है। 
हाल ही में फ्रांस की व्यंग्य पत्रिका ‘‘चार्ली हेब्दो’’ ने एक बार फिर पूरे विश्व की शांति भंग कर दी है। ‘‘चार्ली हेब्दो’’ ने उस कार्टून को फिर से प्रकाशित कर दिया जिस पर एक बार पहले भी नृशंस गोलीकांड हो चुका है। इस बार कार्टून प्रकाशित होने के बाद राजधानी पेरिस में एक युवक ने एक स्कूली शिक्षक की सिर काटकर नृशंस हत्या कर दी थी। युवक ने ऐसा इसलिए किया था क्योंकि शिक्षक ने अपने विद्यार्थियों को पैगंबर मोहम्मद का एक कार्टून दिखाया था। इस युवक को भी तुरंत ही मौत के घाट उतार दिया गया। युवक की पहचान एक चेचेन्या निवासी के तौर पर की गई और इस संबंध में कई गिरफ्तारियां भी की गईं। इस घटना के बाद एक बार फिर बहस छिड़ गई है वैश्विक आतंकवाद पर। 

पेरिस की घटना के बाद दुनिया के हर देश में विचारधारा के दो धड़े दिखाई देने लगे हैं। एक धड़ा वह जो शिक्षक के मारे जाने की निंदा कर रहा है तथा इसे आतंकवादी गतिविधि मान रहा है और दूसरा धड़ा वह जो शिक्षक के मारे जाने का समर्थन करता है। इस बहस की आंच से भारत भी अछूता नहीं है। मानवतावाद का हिमायती भारत और भारतीय कभी भी हिंसा का समर्थन नहीं करते हैं किन्तु कुछ लोगों की भावनाओं को इतनी अधिक ठेस पहुंची कि उन्होंने सड़कों पर निकल कर फ्रांस के राष्ट्रपति का विरोध किया ओर शिक्षक की हत्या किए जाने का समर्थन किया। ऐसे संवेदनशील समय में कुछ बुद्धिजीवियों ने भी संयम का साथ छोड़ कर ऐसे बयान दे दिए जो भारतीय परिप्रेक्ष्य में उचित नहीं कहे जा सकते हैं। असल दोषी ‘‘चार्ली हेब्दो’’ है। किसी की धार्मिक भावनाओं के साथ अनावश्यक छेड़-छाड़ करना कतई उचित नहीं कहा जा सकता है जैसे कि शिक्षक की हत्या भी मानवता का हनन ही कहा जाएगा। बेशक धार्मिक कट्टरता से किसी का भला नहीं होता लेकिन धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने से भी किसी का भला नहीं होता है। ऐसी घटनाओं का सबसे अधिक लाभ उठाते हैं आतंकी संगठन। आम जनता समझ भी नहीं पाती है कि उन्हें किस तरह उकसाया जा रहा है। जब तक उन्हें समझ में आता है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।

आतंकवादी गतिविधियों के दो उदाहरण ऐसे हैं जिन्हें सभी आसानी से समझ सकते हैं। 9/11 की घटना जिसमें न्यूयॉर्क में वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हमला किया गया था जिसमें अनेक निरपराध लोग मारे गए थे। साल 2001 में 11 सितंबर को अमेरिका में हुए आतंकी हमले ने पूरी दुनिया को हिला कर रख दिया था। इस हमले में अमेरिका का वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पूरी तरह से ध्वस्त हो गया था। दो विमानों को वर्ल्ड ट्रेड सेंटर के टॉवर्स में टकरा दिया, जबकि तीसरे विमान से पेंटागन पर हमला किया गया। इन हमलों में 2,996 लोगों की मौत हो गई थी और 6,000 से ज्यादा लोग घायल हुए थे। अमेरिका ने इस हमले का बदला लिया और पाक के एबटाबाद में 2 मई 2011 को अमेरिकी कमांडो ने एक ऑपरेशन में अलकायदा चीफ ओसामा बिन लादेन को मौत के घाट उतार दिया। इस हमले के बाद अमेरिका ने सुरक्षा नीति में व्यापक बदलाव किए गए। दूसरी घटना भारत में मुंबई पर आतंकी हमले की। मुंबई में 26 नवंबर 2008 को हुए आतंकी हमले ने पूरे देश को हिलाकर रख देने वाले इस हमले को आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा के 10 आतंकियों ने अंजाम दिया था। उन्होंने देश की आर्थिक राजधानी में कई स्थानों को निशाना बनाया था। इस हमले में 166 बेगुनाह लोग मारे गए थे। छत्रपति शिवाजी टर्मिनस स्टेशन के अलावा आतंकियों ने ताज होटल, होटल ओबेरॉय, लियोपोल्ड कैफे, कामा अस्पताल और दक्षिण मुंबई के कई स्थानों पर हमले शुरू कर दिया था। एक साथ इतनी जगहों पर हमले ने सबको चौंका दिया था। 

भारत को अब तक अनेक बार आतंकी गतिविधियों का शिकार होना पड़ा है। 1991 पंजाब हत्याकांड, 1993 मुंबई बम धमाके, 1993 चेन्नई में आरएसएस कार्यालय में बमबारी, 2000 चर्च बमबारी, 2000 लाल किला आतंकवादी हमला, 2001 भारतीय संसद हमला, 2002 मुंबई बस बमबारी, 2002 अक्षरधाम मंदिर पर हमला, 2003 मुंबई बम बमबारी, 2004 असम में धमाजी स्कूल बमबारी, 2005 दिल्ली बम विस्फोट, 2005 भारतीय विज्ञान संस्थान शूटिंग, 2006 वाराणसी बमबारी, 2006 मुंबई ट्रेन बमबारी, 2006 मालेगांव बमबारी, 2007 समझौता एक्सप्रेस बमबारी, 2007 हैदराबाद बमबारी, 2007 अजमेर दरगाह बमबारी, 2008 जयपुर बमबारी, 2008 बैंगलोर सीरियल विस्फोट, 2008 अहमदाबाद बमबारी, 2008 दिल्ली बम विस्फोट, 2008 मुंबई हमले, 2010 पुणे बमबारी, 2010 वाराणसी बमबारी, 2011 मुंबई बमबारी, 2011 दिल्ली बमबारी, 2012 पुणे बमबारी, 2013 हैदराबाद विस्फोट, 2013 श्रीनगर हमला, 2013 बोध गया बमबारी, 2013 पटना बम विस्फोट, 2014 छत्तीसगढ़ हमला, 2014 झारखंड विस्फोट, 2014 चेन्नई ट्रेन बमबारी, 2014 असम हिंसा, 2014 चर्च स्ट्रीट बम विस्फोट, बैंगलोर, 2015 जम्मू हमला, 2015 गुरदासपुर हमला, 2015 पठानकोट हमला, 2016 उरी हमला, 2016 बारामुल्ला हमला, 2017 भोपाल उज्जैन पैसेंजर ट्रेन बमबारी, 2017 अमरनाथ यात्रा हमला, 2018 सुक्का हमला आदि अनेक आतंकवादी घटनाएं हैं जिन्होंने भारत की शांति को समय-समय पर चोट पहुंचाई। लेकिन आतंकवाद के विरुद्ध भारत का दृष्टिकोण हमेशा एकदम स्पष्ट रहा है। सन् 2019 की 11 सितम्बर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि ‘‘आज आतंकवाद एक वैश्विक समस्या है जिसने विचारधारा का रूप ले लिया है। उन्होंने साथ ही कहा कि आतंक की जड़ें हमारे पड़ोस में पनप रही हैं लेकिन हम इसका मजबूती से सामना कर रहे हैं और आगे भी करते रहेंगे। आतंकवादियों को पनाह और प्रशिक्षण देने वालों के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए भारत पूर्ण रूप से सक्षम है और हमने इसे करके दिखाया भी है।’’ यही तो है भारतीय दृष्टिकोण और दृढ़ता जिसने हर अशांति से देश को उबारा है।

ऐसे समय में जब विश्व कोरोना आपदा जैसे विकट संकट से जूझ रहा है, ऐसी घटनाओं के प्रति संयम बरतना जरूरी है जो भावनाओं को ठेस पहंचाने और भड़काने के लिए ही की गई हों। विकसित देशों की अपेक्षा हमारा देश अधिक संकटों से घिरा हुआ है। कोरोना आपदा ने लाखों लोगों की नौकरियां छीन ली हैं। उद्योग-धंघे एक बार फिर अपना पांव जमाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। कोरोना आपदा के कारण हमारी जीवनचर्या पूरी तरह से बदल चुकी है। अब सेहत की सुरक्षा हमारा पहला मुद्दा है। इन परिस्थितियों में ‘‘चार्ली हेब्दो’’ जैसी पत्रिका को नकारना ही उचित कदम होगा। सटायर का अर्थ किसी की निजता को चोट पहुंचाना नहीं होता है।  अतः जिस प्रतिक्रिया की वे उम्मीद करते हैं, वह प्रतिक्रिया उन्हें नहीं मिलेगी तो वे स्वयं पराजित हो जाएंगे। प्रत्येक विपरीत परिस्थितियों में संयम का अस्त्र सबसे अधिक कारगर होता है।      
                  
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(दैनिक सागर दिनकर में 04.11.2020 को प्रकाशित)
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