Wednesday, May 26, 2021

चर्चा प्लस | सीएम की घोषणा और लाभ से वंचित अविवाहित बेटियां | डाॅ शरद सिंह

चर्चा प्लस
 सीएम की घोषणा और लाभ से वंचित अविवाहित बेटियां - डाॅ शरद सिंह
           शिवराज सरकार बेटियों के हित में हमेशा महत्वपूर्ण घोषणाएं करती रही है जिनसे हर आयुवर्ग की बेटियों का जीवन संवर सके। लेकिन प्रशासनिक स्तर पर इन घोषणाओं का कितना परिपालन किया जाता है इसे एक उदाहरण से समझा जा सकता है जिसमें अविवाहित बेटियों के लिए 25 वर्ष की उम्र पूरी होने के बाद भी परिवार पेंशन दिए जाने की घोषणा लगभग साल भर पहले की गई थी। लेकिन अविवाहित बेटियां आज भी इस लाभ से वंचित हैं क्यों प्रशासनिक आदेश का कहीं अता-पता नहीं है। इसे घोषणाओं का खोखलापन कहें या प्रशासनिक लापरवाही? या फिर सीएम हाउस द्वारा घोषणाओं के क्रियान्वयन के फालोअप में कमी। जो भी कहें आर्थिक परेशानी भुगत तो रही हैं प्रदेश की अविवाहित बेटियां।
प्रदेश में बेटियों को सम्मान, सुरक्षा और बेहतर जीवन देने की दिशा में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान  हमेशा प्रयासरत रहते हैं जो कि समय-समय पर उनके द्वारा की जाने वाली घोषणाओं से प्रकट होता रहता है। लेकिन विसंगति यह है कि मुख्यमंत्री की घोषणाओं और उसको अमलीजामा पहनाने के बीच बहुत बड़ा अंतर रह जाता है। जिस गति से घोषणा पर अमल किया जाना चाहिए, उस तेज गति से अमल होता नहीं है। जैसे, मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने 15 अगस्त 2020 को अपने संबोधन के दौरान लाल परेड मैदान में घोषणा की थी कि मध्य प्रदेश में सभी शासकीय कार्यक्रम ‘‘बेटियों की पूजा’’ के साथ शुरू किए जाएंगे जिससे बेटियों और महिलाओं का सम्मान का भाव सबके मन में जागे। दिलचस्प यह कि घोषणा के पूरे चार माह बाद आदेश जारी किए गए। अर्थात् मुख्यमंत्री की घोषणा को अमल में लाने में पूरे चार माह लगे और फिर आदेश जारी किया गया। जिसकी कॉपी मध्यप्रदेश सरकार के सभी विभागों, सभी विभागाध्यक्ष, सभी संभागायुक्तों, सभी कलेक्टरों और सभी जिला पंचायतों के मुख्य कार्यपालन अधिकारियों को भेजी गई। बेटियों के पांव पूजन की घोषणा को अमलीजामा पहनाने में प्रशासन को चार माह का समय लग गया।
25 वर्ष से ऊपर आयु की अविवाहित बेटियों के हित में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने एक महत्वपूर्ण घोषणा की थी। यह घोषणा प्रशासनिक स्तर पर आज भी लागू होने की बाट जोह रही है।

शिवराज सरकार ने मध्यप्रदेश  में महिला सशक्तिकरण की दिशा में बड़ी योजना के संशोधन पर विचार करते हुए केंद्र सरकार के नियम की ही तर्ज पर मुख्यमंत्री सचिवालय द्वारा अविवाहित बेटियों के लिए 25 वर्ष की उम्र पूरी होने के बाद पारिवारिक पेंशन दिए जाने की घोषणा की थी। इसके लिए प्रस्ताव परीक्षण के लिए सामान प्रशासन विभाग को भेजा गया था। दरअसल, केंद्र सरकार ने कर्मचारियों के मामले में 28 अप्रैल 2011 को पेंशन नियम में संशोधन किया था। जहां अविवाहित बेटी, विधवा, परित्यक्ता बेटी को पेंशन देने की पात्रता उम्र बढ़ा दी गई थी। जिसके बाद अविवाहित पुत्री के मामले में यदि आयु 25 वर्ष से अधिक हो गई हो और उसका विवाह नहीं हुआ हो तो उसे पारिवारिक पेंशन का लाभ दिया जाएगा। इसी नियम को शिवराज सरकार ने मध्यप्रदेश में लागू करने का विचार किया। सन् 1976 के अधिनियम के अनुसार प्रदेश में कर्मचारियों के मामले माता-पिता की मृत्यु के बाद प्रदेश में अभी बेटे को 18 साल और बेटी को 25 साल तक ही परिवार पेंशन पाने की पात्रता है। प्रदेश में इस प्रस्ताव को परिवार पेंशन अधिनियम 1976 से ही लागू किया गया है। वहीं इसमें संशोधन  हो जाने पर अविवाहित बेटी के लिए 25 वर्ष की उम्र पूरी होने के बाद जब तक उसका विवाह नहीं हो जाता तब तक पारिवारिक पेंशन दिया जाएगा। इस संबंध में प्रावधान बना कर मुख्यमंत्री सचिवालय द्वारा सामान्य प्रशासन विभाग को परीक्षण के लिए भेजा गया। इस पर वित्त विभाग 13 मार्च 2020 को परिवार पेंशन कल्याण मंडल ने भी सैद्धांतिक सहमति दे दी। किन्तु इसके बाद भी राज्य प्रशासन को 25 वर्ष से अधिक आयु अविवाहित बेटियों को पारिवारिक पेंशन का लाभ दिलाने के लिए कोई आदेश जारी नहीं कर सका है। वित्त विभाग मार्च 2020 में ही इस प्रस्ताव को सहमति दे चुका है। उसके तत्काल बाद सामान्य प्रशासन विभाग के पास यह प्रस्ताव परीक्षण भेजा गया था। कोई बाधा न होते हुए भी अंतिम निर्णय साल भर से लंबित है। यानी शिवराज सरकार द्वारा अविवाहित बेटियों के हित में की गई घोषणा आज भी क्रियान्वयन की ंप्रतीक्षा कर रही है और सैकड़ों बेटियां आर्थिक संकट से जूझ रही हैं।  
24 जनवरी 2021 को राष्ट्रीय बालिका दिवस पर मिंटो हाल में ‘‘पंख’’ अभियान के शुभारंभ कार्यक्रम को संबोधित करते हुए शिवराज सिंह चैहान ने कहा था कि शिशु के कोख में आने से लेकर मृत्यु के बाद तक परिवार की सहायता के लिए मध्यप्रदेश में अनेक योजनाएं चल रही हैं। सभी योजनाओं का उद्देश्य महिलाओं के चेहरे पर मुस्कान लाना है। यह हम सभी का दायित्व भी है। मुख्यमंत्री श्री चौहान ने कहा कि प्रदेश में महिलाओं के कल्याण के लिए अनेक योजनाएं संचालित हैं। इनमें एक अनूठा ‘‘पंख’’ अभियान भी है जो बालिकाओं के संरक्षण, जागरण, पोषण, ज्ञान, स्वास्थ्य, स्वच्छता का प्रतीक है। पी से प्रोटेक्शन, ए से अवेयरनेस, एन से न्यूट्रीशन, के से नॉलेज एवं एच से हेल्थ व हाइजीन के माध्यम से बेटियों की सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं सर्वांगीण विकास सुनिश्चित किया जाना तय किया गया है। मुख्यमंत्री श्री चौहान ने कहा कि पंख अभियान के लिए हिन्दी में अभिप्रायरू पावक (अग्नि), अंतरिक्ष, नीर (पानी), क्षितिज और हवा से है। यह अभियान बालिकाओं और महिलाओं की निराशा को दूर करेगा। भारत सरकार की बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ् सयोजना किशोरियों को चहुंमुखी विकास में मदद करती है। मध्यप्रदेश में इसे नया स्वरूप दिया गया है। पंख अभियान भी इस योजना का ही हिस्सा है, जिसके अंतर्गत अगले दो महीनों की गतिविधियों का कैलेण्डर तैयार किया गया है। अभियान के अंतर्गत जिला स्तर पर विभिन्न विभागों के सहयोग से किशोरियों के स्वास्थ्य, शिक्षा और सुरक्षा को सुनिश्चित किया जाएगा। किशोरियों का डाटाबेस तैयार किया जाएगा। इससे उनके विकास में सहयोग मिलेगा। जनप्रतिनिधि और अशासकीय संस्थाओं को भी अभियान से जोड़ा जाएगा। बालिका जन्म को प्रोत्साहन, बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम, पॉक्सो एक्ट, दहेज प्रतिषेध अधिनियम के प्रचार-प्रसार, किशोरियों और उनके अभिभावकों को कुप्रथाओं की समाप्ति के लिए जागरूक करना, किशोरियों को अपने अधिकारों के प्रति जागरूक बनाना, उनके पोषण के स्तर को सुधारना, पंचायत स्तर पर वोकेशनल ट्रेनिंग देना और उनकी नेतृत्व क्षमता विकसित करना अभियान के अंग हैं। मुख्यमंत्री ने कहा कि मध्यप्रदेश में गांव की बेटी योजना, प्रतिभा किरण योजना, मातृ वंदना योजना, उदिता योजना, वन स्टॉप सेंटर का संचालन, लाडो अभियान का संचालन सभी का उद्देश्य किशोरियों और महिलाओं की ताकत बढ़ाना है।
महिला सशक्तीकरण के लिए गांव की बेटी योजना, प्रतिभा किरण, कन्या विवाह योजना, शौर्या दल गठन, महिला स्व-सहायता समूह महत्वपूर्ण माध्यम हैं। लाड़ली लक्ष्मी योजना की वर्ष 2007 में शुरूआत हुई थी। बहुत से ऐसे परिवार है जो आर्थिक रूप से कमजोर होने के करना अपनी बेटियों को उच्च शिक्षा नहीं दे पाते और न ही उनके विवाह के लिए पैसे इकट्ठा नहीं कर पाते हैं। बहुत से लोग लड़का और लड़कियों में भेद भाव भी करते है । इन सभी परेशानियों को देखते हुए राज्य सरकार ने लाडली लक्ष्मी योजना 2021 को शुरू किया इस योजना के तहत उद्देश्य है बेटी की पढाई और शादी के लिए आर्थिक सहायता प्रदान करना। इस योजना के तहत मध्य प्रदेश के नागरिको की नकारात्मक सोच को बदलना और बालिकाओ के भविष्य को उज्जवल बनाना है और इस  पैसे का इस्तेमाल लड़की द्वारा उसकी उच्च शिक्षा अथवा विवाह के लिए किया जा सकता है। इस तरह मध्य प्रदेश राज्य में महिलाओं और पुरुषों के लिंग अनुपात को कम करना और राज्य में महिलाओं के सशक्तिकरण को बढ़ावा देने का प्रयास है। लेकिन घोषणाओं के लागू किए जाने में साल भर से भी अधिक समय लगना इस बात को सोचने पर मजबूर करता है कि सरकार की सोच और प्रशासन की तत्परता के बीच तालमेल का अभाव है जिससे बेटियों का हित चाहने वाले मुख्यमंत्री की छवि पर भी विपरीत असर पड़ता है। घोषणा यदि विज्ञापन की वस्तु बन कर रह जाए तो उसका जनमानस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। आमजन शासन-प्रशासन से सहयोग की आशा रखता है किन्तु जब जीवनयापन के प्रश्न का हल ही ठंडे बस्ते में लम्बित पड़ा हो तो घोषणाओं पर से विश्वास डगमगाना स्वाभाविक है।
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Tuesday, May 25, 2021

पुस्तक समीक्षा | गुलमोहर : स्त्रीमन की काव्यात्मक अभिव्यक्ति | समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह | आचरण में प्रकाशित

मित्रो, प्रस्तुत है आज 25.05.2021 को #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई काव्य संग्रह "गुलमोहर" की  पुस्तक समीक्षा... 
आभार दैनिक "आचरण" 🙏
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पुस्तक समीक्षा
गुलमोहर : स्त्रीमन की काव्यात्मक अभिव्यक्ति
 समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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पुस्तक   - गुलमोहर (काव्य संग्रह) 
कवयित्री - चंचला दवे             
प्रकाशक - अनुज्ञा बुक्स, 1/10206, लेन नं.1,वेस्ट गोरख पार्क, शाहदरा, दिल्ली-2 
मूल्य    - रुपए 350 मात्र                                           
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कविता एक अभिव्यक्ति का एक ऐसा माध्यम है जिसमें कठोर यथार्थ को भी कोमल शब्दों में और मधुरता से व्यक्त किया जा सकता है। समकालीन हिन्दी कविता ने काव्य का ऐसा अलग ही धरातल गढ़ा है। एक ऐसा धरातल जो वातावारण और परिस्थितियों से सीधा संवाद करता है, कई बार आंखों में आंखें डाल कर। यह इसलिए संभव हुआ कि हिन्दी कविता में कवयित्रियों ने अपने अंतर्मन को खुल कर सामने रखा। चाहे निजता हो या सांसारिकता, कभी-कभी दोनों को एक साथ साधते हुए कविताएं लिखीं। समष्टि से व्यष्टि और व्यष्टि से समष्टि का पारस्परिक क्रम समकालीन कवयित्रियों की कविताओं में देखा जा सकता है। ‘‘गुलमोहर’’ कवयित्री चंचला दवे की काव्यकृति है जिसमें गर्मी की तपन और गुलमोहर की छांह है, भूमि का धूसर रंग तो गुलमोहर के फूलों का अग्निदग्धा चटख रंग भी है। चंचला दवे की कविताओं पर दृष्टिपात करने से पूर्व यह ध्यान रखना भी महत्वपूर्ण है कि उन्होंने अहिन्दी भाषी होते हुए भी हिन्दी को अपनी मातृभाषा की तरह अपनाया है और हिन्दी में अपनी कविताओं की प्रवाहमान अभिव्यक्ति की है।  
समकालीन हिंदी कविता के संदर्भ में देखा जाए तो बाज़ारवाद के प्रभाव से सांस्कृतिक विघटन और पारिवारिक संरचना का रक्षा संघर्ष महज स्त्री का संघर्ष न होकर विश्व में मानव मुक्ति के संघर्ष का आह्वान करता है। ये कविताएं सभी वर्ण, जाति, लिंग के स्त्री-समाज की सामूहिक संवेदना को अपने देश-काल , परिवेश , संस्कृति और समय -संदर्भों की भाषा में अभिव्यक्त कर के स्त्री अस्मिता के सभी प्रश्नों और संभावनाओं को समाहित करती हैं। चंचला दवे की कविताओं में मां के अस्तित्व को ले कर गंभीर रचनाकर्म है। वे मां संबंधी अपनी कविताओं में मां से संवाद करती हैं, उनके अधिकारों की पुनर्स्थापना करना चाहती हैं और वर्तमान परिवार में मां का स्थान सुनिश्चित करना चाहती हैं। चंचला दवे की कविताओं में विस्तृत परिवृत्ति है जो व्यापक मानवीय सहानुभूति को बनाएं रखना चाहती है। उनकी एक बहुत छोटी-सी कविता है - ‘‘मां घर की देहरी पर’’। यह कविता चंद पंक्तियों में मां के अस्तित्व का विशद आख्यान प्रस्तुत कर देती है। कविता देखिए-
घर की देहरी पर
बिना बाप की
बेटी के लिए
चौकसी करती
राह तकती
दरवाज़े पर
बाप बनी खड़ी
रहती है मां।

यह मां की एक ऐसी परिभाषा है जिसे पढ़ कर संस्कृत का यह श्लोक याद आ जाता है-
    नास्ति मातृसमा छाया नास्ति मातृसमा गतिः।
    नास्ति मातृसमं त्राणं नास्ति मातृसमा प्रपा।।
अर्थात् माता के समान कोई छाया नहीं, कोई आश्रय नहीं, कोई सुरक्षा नहीं। माता के समान इस विश्व में कोई जीवनदाता नहीं।

मां को स्मरण करती हुई चंचला दवे की एक और कविता है ‘‘मां अब तुम नहीं हो’’। इस कविता में मां की आत्मिक उपस्थिति के समक्ष दैहिक अनुपस्थिति नगण्य दिखाई देती है। कवयित्री लिखती हैं-
मां बहुत याद आती हो, तुम
नहीं हो, पर घुली हो रक्त में नमक बन कर
प्यार बन कर, दौड़ती हो मेरी रग-रग में
मां तुम कहां हो?
सदा हो मेरे साथ
साथ रहना।

अर्जेन्टीना के विश्वविख्यात कवि पाब्लो नरूदा ने अपनी सौतेली मां के साथ अपना बचपन गुज़ारा। जिनके बारे में उन्होंने लिखा है कि- ‘‘हां, मैं एक अच्छी सौतेली मां को जानता हूं। वह सौतेली थी, लेकिन फरिश्तों जैसी थी।’’ अपनी उस मां के लिए पाब्लो नरूदा ने एक लम्बी कविता लिखी थी जिसकी कुछ पंक्तियां इस प्रकार हैं- 
तुम्हारे लिए मैं पसंद करूंगा ख़ामोशी
तब जबकि तुम अनुपस्थित हो
और सुन सकती हो मुझे कहीं दूर से
जबकि मेरी आवाज स्पर्श नहीं कर सकती तुम्हें

पाब्लो नरूदा की सौतेली मां में और चंचला दवे की कविता की सगी मां में कोई भावनात्मक अंतर नहीं है और मां के प्रति संतान की संवेदना में भी अलगाव नहीं है। संवेदनाओं को तार्किकता के पैमाने से नहीं नापा जा सकता है। संवेदना अंतकरण की लहलहाती उपज होती है जो भावनाओं साथ-साथ वैचारिकता का भी पोषण करती है। 

चंचला दवे मां को अपनी कविता में समेटते समय पिता के अस्तित्व को भी ध्यान में रखती हैं। पिता पर केन्द्रित उनकी कविताओं में एक बहुत ही कोमल कविता है ‘‘यादों में पिता’’। यह कविता पिता को ब्रह्माण्ड के अस्तित्व से एकाकार करती हुई पिता को अभिव्यक्ति देती है। -
उगते सूरज की लाली
के उस पार
खड़े होते पिता/सूरज बन कर 
उतर आते/धरती पर 
आकाश में गोल घूम कर
फिर डांटते-डपटते 
स्मृति में/बार-बार पिता
बरसों पुरानी रोशनी/फैलती है
बन कर उजाला।

समाज की आधुनिक संरचना और मूल्यों में सकारात्मक परिवर्तन भी चंचला दवे की विताओं में मुखर हुआ है। परंपरागत पारिवारिक ढांचें में स्त्री का स्थान सबसे आखिरी पायदान पर रहा है। स्त्री का दायित्व निर्धारित किया गया कि वह घर सम्हाले, कपड़े धोऐ, पानी भरे, अनाज पीसे, बच्चे पैदा करे, बच्चों का पालन करे आदि-आदि। लेकिन ग्लोबल होते समाज में युवा पीढ़ी एक अलग पारिवारिक संरचना को स्वीकृति देती जा रही है जिसमें स्त्री को घर की चहार दीवारी से बाहर भी मनचाहे अधिकार हैं। युवा पीढ़ी के रचे समाज में स्त्री परंपरागत बेड़ियों से मुक्त दिखाई देती है। इसी बात को लक्षित करते हुए चंचला दवे ने कविता लिखी है- ‘‘बातें’’-
बच्चों ने कई बातें
अभी से सीख ली हैं
जैसे/अपनी पत्नी से 
नहीं करवाएंगे काम
बच्चों से नहीं धुलवाएंगे कपड़े
खूब आज़ादी देंगे
खूब उड़ाएंगे पतंग/गाएंगे गाने
उड़ जाएंगे आकाश तक
तोड़ लाएंगे तारे
होने वाले बीवी बच्चों के लिए।

चंचला दवे की कविताओं में ‘स्पर्श’ का लालित्य और ‘मुर्दाघर’ का खुरदरा अहसास भी है। ‘उदास गोधूलि’ से गुज़रता हुइ ‘प्रेम’ है, ‘शब्द’ है, स्मृतियां हैं, गांव है अर्थात् एक अनूठी समग्रता है। यह काव्य संग्रह स्त्रीमन की एक ऐसी काव्यात्मक अभिव्यक्ति है जो पढ़े जाने का स्वतः आग्रह करता है। कवयित्री को भाषाई अधिकार और अभिव्यक्ति की कला बखूबी आती है जिसे उनकी इस कृति ‘‘गुलमोहर" में अनुभव किया जा सकता है।
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Thursday, May 20, 2021

चर्चा प्लस | आंकड़े, अविश्वास और अव्यवस्था से जूझता कोरोना काल | डाॅ शरद सिंह

चर्चा प्लस
आंकड़े, अविश्वास और अव्यवस्था से जूझता कोरोना काल    
      - डाॅ शरद सिंह
कोरोना का दूसरी लहर इतनी भयावह होगी, यह किसी ने सोचा भी नहीं था। हर पांचवें परिवार ने अपने परिजनों को खोया है। दुर्भाग्यवश यह सिलसिला जारी है। मृत्यु के आंकड़े विश्वरिकाॅर्ड तोड़ रहे हैं और जीवनरक्षक दवाओं, इंजेक्शनों की कालाबाज़ारी, नकली दवाएं, दूषित आॅक्सिजन व्यवस्था इंसानीयत को निरंतर शर्मसार कर रही है। क्या ऐसा वातावरण हमें इस आपदा से जल्दी मुक्ति की उम्मींद दिला सकता है? जबकि ब्लैक फंगल जैसी ख़तरनाक बीमारी भी अपना जाल फैलाने लगी है। सच तो ये है कि दवा के साथ ही ज़रूरत है व्यवस्था सुधारने, इंसानीयत बचाने और आपसी विश्वास पैदा करने की।             
पहले कोरोना काल में समय पर सख़्ती से लाॅक डाउन लगाया गया था जिसके अच्छे परिणाम भी सामने आए कि कोरोना संकट सिमटने लगा था। मार्च 2021 तक संक्रमितों के आकड़ों में ज़बर्दस्त गिरावट आ गई थी। लग रहा था कि अब सब कुछ ठीक होने वाल है। लेकिन कुछ लापरवाहियों ने सब कुछ घ्वस्त कर दिया। अप्रैल 2021 में कोरोना ने अपना विकराल रूप दिखाया जो अभी तक ज़ारी है। समाचार ऐजेंसीज के आंकड़ों के अनुसार देश में अब तक कुल 2,79,181 मौतें कोरोना से हुई हैं। इस दौरान मैं भी अपनी दीदी डाॅ वर्षा सिंह को कोरोना संक्रमण के चलते खो दिया। हृदयविदारक अनुभव रहा मेरे लिए। जिससे कुछ प्रश्न मेरे मन में उपजे कि कोरोना में ईलाज के साथ ही विश्वास बढ़ाए जानंे और व्यवस्थाओं को सुधारे जाने की सख़्त ज़रूरत है।

स्थिति एक - कोरोना संक्रमित होने वाले मरीज़ को जब अस्पताल में भर्ती किया जाता है तो संक्रमण रोकने के लिए कोविड वार्ड में मरीज के परिजन को जाने नहीं दिया जाता है। बेशक यह संक्रमण का फैलाव रोकने के लिए ज़रूरी है। लेकिन यही से शुरू होती है मानसिक समस्याएं। मरीज के परिजन अपने मरीज को भर्ती करने के बाद उसे देख तक नहीं पाते हैं। यद्यपि मोबाईल फोन पर बातचीत की अनुमति रहती है लेकिन यह तभी तक संभव हो पाता है जब तक मरीज बात करने की स्थिति में रहता है। फेफड़ों के संक्रमण से ग्रस्त मरीज अधिक देर तक बात नहीं कर पाता है तथा स्थिति बिगड़ने पर तो बातचीत बंद ही हो जाती है। यह स्थिति परिजन और मरीज दोनों के लिए मनोबल गिराने वाली होती है। एकाकी रह गए मरीज का मनोबल टूटने लगता है और उसकी वायरस से लड़ने की क्षमता कम होती जाती है। दुर्भाग्यवश मैंने इस स्थिति को स्वयं महसूस किया है मरीज के परिजन की हैसीयत से। जब संवाद की एकमात्र कड़ी भी टूटने लगती है तो जो असहाय स्थिति महसूस होती है, उसे बयान कर पाना संभव नहीं है।

स्थिति दो - आए दिन नकली इंजेक्शन बेचे जाने की घटनाएं सामने आ रही हैं। हैवानीयत की हद तो यह है कि इंजेक्शन के नाम पर नमक-शक्कर का घोल बेच कर कोरोना संक्रमितों के जीवन से खिलवाड़ किया जा रहा है। वैसे इसे खिलवाड़ के बजाए इरादतन हत्या कहा जाना चाहिए। नकली दवा बेचने वालों पर सीधे इरादन हत्या का केस ही दर्ज़ किया जाना चाहिए और मुकद्दमा भी फास्टट्रैक कोर्ट में चलाया जाना चाहिए। इस आपदा के समय में जो लोग दवाओं की कालाबाज़ारी कर रहे हैं और ऊंचे से ऊंचे दाम में दवाएं बेंच रहे हैं वे भी देशद्रोह और इरादतन हत्या के दोषी ठहराए जाने चाहिए। विचारणीय है कि पिछले एक साल से अधिक समय से देश आर्थिक मंदी के दौर से गुज़र रहा है। बड़े पैमाने पर नौकरिया छूट चुकी हैं। छेाटी दूकानें बंद पड़ी हैं। हम्माल और मज़दूर जैसे रोज कमाने वाले एक-एक रोटी के लिए जूझ रहे हैं। ऐसी विकट स्थिति में इंसानीयत को धोखा देने वालों के विरुद्ध कठोर कदम उठाए जाने की ज़रूरत है।
नकली दवाओं और नहीं इंजेक्शन के मामलों के कारण भय और अविश्वास का वातवारण पैदा हो गया है। अस्पताल में भर्ती मरीज को असली इंजेक्शन मिल पाया या नहीं यह संदेह उस स्थिति में और अधिक विकराल रूप ले लेता है जब मरीज की मृत्य हो गई हो। परिजन यह सोच-सोच कर हलाकान होता रहता है कि उसके मरीज़ को असली इंजेक्शन मिला था या नहीं? इसके लिए अस्पतालों में परदर्शिता की सख़्त ज़रूरत है।  

स्थिति तीन - प्रायवेट अस्पतालों में भारी-भरकम फीस का बोझ होता है जिसे ग़रीब तबका नहीं उठा सकता है। वहीं, सरकारी अस्पतालों, मेडिकल काॅलेजों में बनाए गए कोविड सेंटर्स में प्रबंधन की कमी है। आईसीयू या वेंटिलेटर में रखा गया कोविड मरीज स्वयं गिलास उठा कर पानी नहीं पी सकता है। उसे हर समय एक अटैंडेंट की आवश्यकता होती है। जिसकी व्यवस्था सरकारी अस्पतालों में नहीं है। होता यह है कि प्यास लगने पर मरीज जैसे तैसे अपने परिजन को फोन लगाता है। घर में बैठा परिजन अपने मरीज तक पानी पहुंचवाने के लिए ऐड़ी-चोटी का ज़ोर लगाता है और मरीज को पानी पिलाए जाने में पर्याप्त देर हो चुकी होती है। यह तो एक छोटा-सा उदाहरण है जिसे मैंने स्वयं झेला है। इसी तरह खाने से ले कर वाॅशरूम तक की सारी समस्याएं मुंह बाए खड़ी रहती हैं। काम ज़्यादा और स्टाफ कम। यानी हम अभी भी आपदा का सामना करने के लिए तैयार नहीं हो सके हैं।

प्रश्न यह है कि इस अव्यवस्था और अविश्वास को कैसे दूर किया जाए? इसका सबसे पहला उपाय तो यह है कि सीसीटीवी के ज़रिए बड़े स्क्रीन पर मरीज और उसके परिजन को परस्पर देखने का अवसर उपलब्ध कराया जाए। जब चुनावी आयोजनों में और मनोरंजन के आयोजनों में आसानी से बड़े स्क्रीन और लाईव प्रदर्शन की व्यवस्था हो सकती है तो जीवन-मरण के प्रश्न वाली जगह में यानी अस्पतालों में यह व्यवस्था क्यों नहीं कराई जा सकती है। इससे मरीज और उसके परिजनों के मनोबल में वृद्धि होगी और वह इलाज और आंतरिक व्यवस्थाओं को ले कर आश्वस्त रह सकेगा।

दूसरा उपाय है कि चाहे आपात भर्ती की जाए अथवा वालेंटियर सेवाएं बढ़ाई जाएं लेकिन सिर्फ एक घंटी की दूरी पर मरीज के लिए अटैंडेंट की व्यवस्था उपलब्ध रहे। जिससे खाना, पानी, वाॅशरूम या आॅक्सिजन सप्लाई में कोई भी असुविधा होने पर वह बेड में लगी घंटी दबा कर तुरंत सहायता पा सके। यह भी जीवनरक्षा की दिशा में एक महत्वपूर्ण जरूरत है। मरीज को यह महसूस न होने पाए कि वह अलग-थलग असहाय अवस्था में है और उसकी देखभाल करने वाला कोई नहीं है। इससे मरीज मानसिक तौर पर टूटने लगता है और उसकी प्रतिरोध क्षमता शिथिल पड़ने लगती है। इस स्थिति में स्वयंसेवक बड़ी मदद कर सकते हैं। वे अपनी इच्छाशक्ति से मरीज की उचित देख-भाल कर सकते हैं।    

तीसरा उपाय है कि स्वच्छता का हर संभव ध्यान रखा जाए। ऐसे समय में यह और भी ज़रूरी है जबकि ब्लैक फंगल जैसी बीमारी पांव पसारने लगी है। ऑक्सीजन यंत्रों की पूर्ण स्वच्छता जरूरी है। हाईजीन या स्वच्छता इस समय सबसे अधिक जरूरी है।

मैंने तो अपनी दीदी को खो दिया है लेकिन मैं नहीं चाहती हूं कि इस पीड़ा से और लोग भी गुज़रें। आम नागरिकों, नेताओं, पत्रकारों और जनसेवकों को इसके लिए सामूहिक कदम उठाना होगा जिससे विश्वास और व्यवस्था कायम हो सके तथा कोरोना से मरने वालों के आंकड़ों में वास्तविक गिरावट आ सके। गलतियां क्या हुईं इस पर बहस करने के बजाए सुधारा क्या जा सकता है इस पर ध्यान दिया जाना जरूरी है यदि हम चाहते हैं कि देश को कोरोना महामारी से छुटकारा मिल जाए और जो बचे हुए हैं वे सुरक्षित बचे रहें।          
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(दैनिक सागर दिनकर 20 .05 .2021 को प्रकाशित)
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Wednesday, May 19, 2021

पुस्तक समीक्षा | कुमुद पंचरवाली : मानवीय संबंधों को गहराई से रेखांकित करती कहानियां | समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह

प्रिय ब्लॉगर साथियों, पीड़ा की असीम गहराइयों से ख़ुद को बाहर निकालने की कोशिश में मेरा एक और क़दम... एक बार फिर लेखकीय व्यस्तता में ख़ुद को उतार देना चाहती हूं... आप सभी की दुआएं चाहिए..🙏 ....आज  #आचरण  में प्रकाशित पुस्तक समीक्षा... आभार दैनिक "आचरण" 🙏 - डॉ शरद सिंह 
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पुस्तक समीक्षा

कुमुद पंचरवाली : मानवीय संबंधों को गहराई से रेखांकित करती कहानियां

              समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह

पुस्तक   - कुमुद पंचरवाली (कहानी संग्रह)    
प्रकाशक - एन.डी. पब्लिकेशन, 10 सिविल लाईन्स, एल आई सी बिल्डिंग, सागर (म.प्र.)
लेखक  - आर. के. तिवारी          
मूल्य    - रुपए 200 मात्र                                          
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समाज में दुख-सुख, राग-द्वेष, जीतने और हारने के अनेक रंग दिखाई देते हैं। इन्हीं रंगों के बीच अनेक ऐसी घटनाएं छिपी होती हैं जो कहानी बन कर उभरने पर मन को गहरे तक छूती चली जाती हैं। एक स्त्री जो जीवन में बहुत कुछ चाहती हो किन्तु समर्पण की प्रतिमूर्ति बन कर जीवन गुज़ार दे, एक स्त्री जो न चाहते हुए भी प्रतिशोध के भंवर में फंस जाए, एक स्त्री जो परिवार के प्रति अपने दायित्वों का आदर्श रूप में निर्वहन करती रहे और एक ऐसा इंसान जो देश के बंटवारे की आंच से गुज़रता हुआ एक अलग ही व्यक्तित्व में समा जाए। जी हां, ‘‘ कुमुद पंचरवाली’’ कहानीकार आर. के. तिवारी का कहानी संग्रह है जिसमें लम्बी चार कहानियां हैं। आर. के. तिवारी अपनी पहली कथाकृति ‘‘करमजली’’ से तप कर परिपक्व हुए हैं और उनकी लेखकीय परिपक्वता उनके इस नवीनतम कहानी संग्रह में स्पष्ट अनुभव की जा सकती है। संग्रह में रखी गई चारो कहानियों के कथानक ही नहीं वरन् कथापात्र भी बहुत जाने-पहचाने और बहुत समीप के लगते हैं क्यों कि ये आम ज़िन्दगी से चुने गए हैं।
‘‘कुमुद पंचरवाली’’ शीर्षक कहानी संग्रह की सबसे प्रभावी कहानी है। यह एक ऐसी स्त्री की कहानी है जो अपने प्रिय को सम्पूर्णता से पाना चाहती है अर्थात् उसके साथ विवाह करके अपना सुखमय जीवन जीना चाहती है। अनाथ, अपढ़, साईकिल का पंचर जोड़ने का काम करने वाली कुमुद जब अपने गांव में आए प्रतिभाशाली युवा शिक्षक को देखती है तो वह उसे भला लगता है। शिक्षक भी कुमुद से प्रभावित होता है और उसे पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करता है। परिस्थितिवश शिक्षक का एक अन्य युवती से विवाह हो जाता है। कुमुद को ठेस पहुंचती है किन्तु वह अपनी पीड़ा को व्यक्त करने के बदले मौन साध लेती है। शिक्षक की पत्नी के मन में कुमुद और शिक्षक को ले कर संदंह के बीज अंकुरित होने लगते हैं और धीरे-धीरे संदेह की विष-बेल बढ़ने लगती है। एक दिन ऐसा आता है जब शिक्षक की पत्नी उसे छोड़ कर चली जाती है। शिक्षक पत्नी के इस व्यवहार से टूट जाता है। उसका स्वास्थ्य गिरने लगता है। तब कुमुद उसे सहारा देती है और उसकी सेवा करती है, बिना किसी सामाजिक बंधन के। कहानी का असली प्रस्थान बिन्दु ठीक यहीं से शुरू होता है। सामाजिक दंश की परवाह किए बिना निःस्वार्थ भाव से शिक्षक की सेवा करना कुमुद के चरित्र को उन ऊंचाइयों पर पहुंचा देता है जहां मानवीयता सभी सामाजिक भावनाओं से कहीं ऊपर ठहरती है। कहानी में कुमद के भावनात्मक चरित्र के तीन पक्ष बखूबी उभर कर आए हैं। पहला पक्ष वह जिसमें एक अल्हड़ युवती प्रेम में पड़ जाती है और अपने प्रिय के साथ रहने के स्वप्न संजोने लगती है। दूसरा पक्ष वह जिसमें अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रखती हुई अपने प्रेमी की पत्नी के साथ न केवल सहज संवाद बनाती है बल्कि उसके आग्रह पर उसके लिए पूजा के फूल भी लाया करती है। तीसरा पक्ष वह है जिसमें बिना वैवाहिक बंधन के अपने प्रिय की इस प्रकार सेवा-सुश्रुषा करती है जैसे उसकी पत्नी हो। किन्तु उसके इस सेवा भाव में दैहिक संबंधों का कोई स्थान नहीं है। मात्र सेवा भाव और अगाध प्रेम है जो उसे समर्पिता बनाए रखता है। कहानी का अंत मार्मिक बन पड़ा है जिसे पढ़ कर ही महसूस किया जा सकता है। कहानीकार आर. के. तिवारी ने कुमुद के चरित्र के तीनों पक्षों को प्रभावी ढंग से कहानी में पिरोया है। कहानी पढ़ लेने के बाद देर तक कुमुद का चरित्र मन को उद्वेलित करता रहता है। यही कहानीकार की सफलता है।
संग्रह की दूसरी कहानी है ‘‘गंगा फुआ‘‘। यह कहानी उस अतीत में ले जाती है जब बालविवाह द्वारा बच्चों के जीवन का निर्णय कर दिया जाता है और विधवाओं को उपेक्षा और अनादर कर कष्टप्रद जीवन जीना पड़ता था। बाल विवाह पर बांग्ला साहित्य में प्रचुरता से लिखा गया है। ईश्वरचंद्र विद्यासागर, बंकिमचंद्र चट्टोपध्याय, रवींद्रनाथ ठाकुर, शरतचंद्र चट्टोपध्याय ने बाल विवाह और विधवा जीवन की त्रासदी पर अद्भुत यथार्थपरक कथा साहित्य रचा। ‘‘गंगा फुआ‘‘ भी उन्हीं मानवीय मूल्यों का अनुकरण करती चलती है। यह कहानी शुरू होती है दस वर्ष की बालिका गंगा के बालविवाह से। गंगा जब विवाह और वैवाहिक जीवन के बारे में कुछ जानती भी नहीं थी तब उसे विवाह बंधन में बांध दिया गया। उस पर विडम्बना यह कि पहली विदाई के समय हैजा के कारण उसके पति की मृत्यु हो गई। दस वर्षीया बालिका जिसने अभी जीवन के रंग ही नहीं देखे थे, उसे तमाम रंगों से वंचित कर दिया गया। वह सफेद साड़ी के अतिरिक्त और कुछ नहीं पहन सकती थी। सजना-संवरना तो दूर, वह केश तक नहीं रख सकती थी। ससुराल में उस पर अपार बंदिशें थोप दी गई। उसे सूखी घास पर सोना पड़ता, सुबह चार बजे मुंह अंधेरे  शौच के लिए जाना पड़ता, वह किसी से बात नहीं कर सकती थी। वह हंस नहीं सकती थी, वह रो नहीं सकती थी। वह इच्छानुसार सुस्वाद भोजन नहीं कर सकती थी। चार दिन में ही उसकी सेहत गिर गई। गंगा के भाई काशीराम से अपनी बहन की यह दुर्दशा देखी नहीं गई। वह समझ गया कि यदि गंगा ससुराल में रहेगी तो अधिक दिन जीवित नहीं रह सकेगी। काशीराम गंगा के ससुराल वालों को समझा-बुझा कर उसे अपन साथ ले जाने में सफल रहा। मायके पहुंच कर गंगा को राहत मिली। लेकिन दस-पंद्रह दिन में ही ससुराल से बुलावा आ गया। तब गंगा की भाभी ने उसका पक्ष लिया और उसे ससुराल भेजे जाने से रोक लिया। जबकि गंगा की भाभी की उम्र भी मात्र पंद्रह वर्ष थी। इसीलिए गंगा और उसकी भाभी के बीच एक बहनापा, एक सहेलीपन था जो उसकी भाभी गंगा की पीड़ा को समझ सकी। कुछ समय बाद भाभी ने एक पुत्र को जन्म दिया जिसका नाम रखा गया मुन्ना। मुन्ना के दुनिया में आते ही गंगा का घर, परिवार, समाज में एक स्थान निर्धारित हो गया। अब वह गंगा के बदले अपने भतीजे की गंगा फुआ बन गई। परिवार के प्रति अपने दायित्वों के निर्वहन की अनवरत कथा शुरू होती है यहां से और एक आदर्श भारतीय स्त्री की छवि उभर कर आती है गंगा फुआ में। कहानी में गंगा फुआ के चरित्र को जिस कोमलता के साथ ऊंचाइयों तक लेखक ने पहुंचाया है, वह उनकी सृजनशीलता और संवेदनात्मकता के प्रति आश्वस्त करता है।
संग्रह की तीसरी कहानी है ‘‘पद्मा का प्रतिशोध’’। कहानी का पहला वाक्य ही जिज्ञासा जगाने में सक्षम है- ‘‘एक सीधी-सादी लड़की इतनी क्रूर, दुष्ट, हत्यारिन कैसे हो सकती है?’’ कहानी की नायिका पद्मा ग्रामीण परिवेश में पली-बढ़ी। शिक्षा सिर्फ़ चौथी कक्षा तक। पद्मा का विवाह शहर में एक व्यापारी की दूकान पर काम करने वाले युवक रामू से कर दिया गया। वैवाहिक जीवन का आरम्भ सुखमय रहा। ससुर की पहले ही मृत्यु हो चुकी थी। कुछ समय बाद सास भी काल के ग्रास में समा गई। रामू को काम से घर लौटने में देर हो जाया करती थी। घर में अकेली रह जाने वाली पद्मा का परिचय एक ऐसी महिला से हुआ जिसने उसके भोलेपन का लाम उठाते हुए उसे एक ऐसे जाल में फंसा दिया जिससे निकल पाना संभव नहीं था। घर पर खाली बैठने के बजाए चार पैसे कमाने का लालच दे कर उस औरत ने पद्मा को देहव्यापार में धकेल दिया। मना करने पर ब्लैकमेल करने लगी। पद्मा जो एक सीधी-सादी स्त्री थी, इस चक्रव्यूह में फंस कर आहत हो उठी। उसके मन में प्रतिशोध की भावना उठनी स्वाभाविक थी। कहानी एक रोचक मोड़ लेती है और कहानी का पाठक स्वयं को पद्मा के साथ खड़ा पाता है। कहानी का सुखद पक्ष यह है कि पद्मा का पति उसका साथ देता है और उसे सब कुछ भूल जाने को कहता है। लेकिन उसके पति को पता नहीं था कि ऐसे अपराधी अपने शिकार को कभी कुछ भी भूलने नहीं देते हैं। वे ब्लैकमेल को एक हथियार की तरह इस्तेमाल करते हैं। यह कहानी ऐसे छद्मवेशियों के चरित्र को उजागर करती है जो शुभचिंतक बन कर अपने जाल में इस तरह फंसाते हैं कि उससे बाहर निकलना कठिन हो जाता है। कहानी की रोचकता आदि से अंत तक बनी रहती है।
‘‘नंदू पाठक’’ यह संग्रह की चौथी कहानी है। यह देश के विभाजन के समय की कहानी है जब दंगे भड़क रहे थे और समूचा देश विभाजन की आग में झुलस रहा था। इस कहानी में बड़ी सहजता से इस तथ्य को सामने रखा गया है कि चंद स्वार्थी तत्व दंगे भड़काते हैं, सामान्य इंसान नहीं। कहने को हिन्दू-मुस्लिम उन दिनों परस्पर विरोधी बन बैठे थे किन्तु बहुत से लोग ऐसे भी थे जिनकी भावनाएं धार्मिक भेदभाव से बहुत ऊपर थीं। उन्हीं में एक थे नंदू पाठक। देश के विभाजन की मार्मिकता पर अनेक कहानिया ओर उपन्यास लिखे जा चुके हैं। खुशवंत सिंह का ‘‘ट्रेन टू पाकिस्तान’’, भीष्म साहनी का ‘‘तमस’’, कमलेश्वर का ‘‘कितने पाकिस्तान’’ और सआदत हसन मंटो की कहानियां जैसी अनेक कृतियां देश के विभाजन की त्रासदी को बखूबी सामन रख चुकी हैं। विभाजन का विषय ही ऐसा है जो सदियों तक सभी के मन को कुरेदता रहेगा और यह प्रश्न पूछने को मजबूर करता रहेगा कि विभाजन के अतिरिक्त और कोई विकल्प नहीं था क्या? रक्त की नदियों से नहा कर निकले दो राष्ट्र एक-दूसरे का विश्वास चाह कर भी नहीं जीत पाते हैं क्यों कि अतीत की मर्मांतक चींखें इतिहास के पन्नों से निकल कर दिल-दिमाग को झकझोरती रहती हैं।
आर. के. तिवारी एक उत्साही कहानीकार हैं। वे अपने कथानकों के साथ न्याय करने का पूर्ण प्रयत्न करते हैं और इसमें सफल भी रहते हैं। ‘‘कुमुद पंचरवाली’’ कहानी संग्रह कहानीकार आर. के. तिवारी के श्रम और साहित्य के प्रति प्रतिबद्धता को प्रतिबिम्बित करता है। निश्चित रूप से यह एक पठनीय और रोचक कहानी संग्रह है जिसमें मानवीय संबंधों को गहराई से रेखांकित करती कहानियां हैं।
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Wednesday, April 14, 2021

चर्चा प्लस | बुंदेलखंड की संकटग्रस्त परंपराएं : व्यंजन-परंपरा | डाॅ. शरद सिंह


चर्चा प्लस        
 बुंदेलखंड की संकटग्रस्त परंपराएं : व्यंजन-परंपरा
         - डाॅ. शरद सिंह                                                                 
      हमारी परंपराएं हमें संस्कार देती हैं। खान-पान की परंपरा हमें खाद्य-अखाद्य और कब क्या खाना चाहिए, इस बात का बोध कराती हैं। बुंदेलखंड की व्यंजन-परंपरा बहुत समृद्ध है किन्तु बर्गर, पिज्जा, चाउमिन ने इस पर भी अपना दुष्प्रभाव डाला है। बुंदेलखंड में परंपराओं पर छाए संकट के क्रम में इस बार ‘‘चर्चा प्लस’’ में चर्चा कर रही हूं बदलती व्यंजन-परंपरा की ।
कोरोना आपदा के पहले भोपाल एक माॅल के ‘फूडजोन’ में यह देख कर सुखद आश्चर्य हुआ था कि वहां पारंपरिक बुंदेली व्यंजनों का भी एक ‘काॅर्नर’ है। उसके बाद झांसी के में भी बुंदेली फूड जोन काॅर्नर देखने को मिला। संयोगवश उन्हीं दिनों ‘इपिक चैनल’ के प्रसिद्ध टीवी शो ‘नाॅदर्न फ्लेवर’ में बुंदेली शादियों में बनाए जाने वाले पारंपरिक व्यजनों पर एक कार्यक्रम देखा जिसमें ‘सिंदोरा-सिंदोरी’ जैसे व्यंजन बनाने की विधि बताई गई थी। इन सबको देख कर मुझे वो दिन याद आ गए जब बचपन में मैं बिरचुन यानी सूखे बेर का चूरा खाती हुई इंद्रजाल काॅमिक्स पढ़ा करती थी। स्वादानुसार नमक या शक्कर डाल कर बेरचुन का गाढ़ा घोल भी बनाया जाता था। मेरी मां खाना बनाने वाली महराजिन ‘बऊ’ के साथ मिलकर छुट्टी के दिन खुरमा-पपड़ियां बनाया करती थीं। महीनों तक रखे जा सकने वाले खुरमा-पपड़िया को हम बच्चों से बचा कर रखने के लिए ढेर सारे जतन करने पड़ते थे मां को। उन दिनों लपटा और लप्सी भी हमारी जबान पर चढ़ा हुआ था। चीले की फरमाईश तो आए दिन होती थी। गुड़ डले हुए गुलगुलों का स्वाद कभी भुलाया नहीं जा सकता है। मेरे बचपन के समय इतनी मंहगाई नहीं थी। चार की चिरौंजी सस्ती मिलती थी। मुझे अच्छी तरह से याद है कि गुलगुलों में चिंरौंजियां भी डाली जाती थीं। पारंपरिक व्यंजनों का यह शौक मुझे अपनी मां से विरासत में मिला। लेकिन अब इस व्यस्त ज़िन्दगी में ऐसे बहुत कम अवसर आते हैं जब घर में कोई विशेष पारंपरिक व्यंजन बन पाता हो। रिश्तेदारों एवं परिचितों के बच्चे तो पिज्जा, बर्गर, नूडल्स और चाउमिन पर फ़िदा रहते हैं। रहा शादी-विवाह के समारोहों का सवाल तो वहां भी बुंदेली छोड़ कर विभिन्न प्रांतों के व्यंजनों के स्टाॅल लगे होते हैं, गोया बुंदेली व्यंजन रोज घरों पर बन रहे हों। यही कारण है कि बुंदेलखण्ड के पारंपरिक व्यंजन घर से बेघर होते जा रहे हैं।


ऐसा नहीं है कि बुंदेलखंड के पारंपरिक व्यंजनों का कोई मौसमी नियम ही न हो। किस मौसम में क्या खाया जाना चाहिए, इसका निर्देश साहित्य तक में मिलता है। जैसे -
चैते गुड, वैसाखे तेल, जेठे पंथ, अषाढ़े बेल
साउन साग, भादौं दही, क्वांर करेला, कातिक मही;
अगहन जीरा, पूसै धना, माघै मिसरी, फागुन चना
जो यह बारह देई बचाय, ता घर वैद कभऊं नइं जाए।।

अर्थात चैत्र मास में गुड़ का सेवन करना अहितकर है, क्योंकि नया गुड़ कफकारी होता है। वैशाख में गर्मी की प्रखरता रहती है, तेल की प्रकृति गर्म होती है इसलिए हानिकारक है। ज्येष्ठ मास में गर्मी की भीषणता रहती है अतः हल्का, सुपाच्य भोजन लेना चाहिए। आषाढ मास में बेल का सेवन नहीं करना चाहिए। और भाद्रपद में दही पित्त को कुपित करता है। आश्विन में करेला पककर पित्तकारक हो जाता है, अतएव हानिकर सिद्ध होता है। कार्तिक मास, जो कि वर्षा और शीत ऋतु का संधिस्थल है,  उसमें पित्त का कोप और कफ का संचय होता है और मही यानी मट्ठे से शरीर में कफ बढता है, इसलिए त्याज्य है. अगहन में सर्दी अधिक होती है, जीरा की तासीर भी शीतकारक है, इसलिए इससे बचना चाहिए। पौष मास में धनिया, माघ में मिसरी और फाल्गुन में चना खाना उचित नहीं होता है। इनको ध्यान में रखकर जो मनुष्य खान-पान में सावधानी रखते हैं, वे सदैव निरोग रहते हैं, उनको कभी डाक्टर-वैद्य की आवश्यकता नहीं पडती।


सावन हर्रै भादों चीत। क्वार मास गुड़ खायउ मीत।।

कातिक मूली अगहन तेल। पूस में करै दूध से मेल।।

माघ मास घिउ खींचरी खाय। फागुन उठि के प्रात नहाय।।

चैत मास में नीम बेसहनी। बैसाके में खाय जड़हनी।।

          अर्थात् सावन मास में हर्रै, भादों मास में चिरायता, क्वार मास में गुड़ कार्तिक में मूली, अगहन में तेल, पौष मास में दूध, माघ मास में घी और खिचड़ी, फागुन मास में प्रातः स्नान, चैत मास में नीम का सेवन, वैशाख मास में जड़हन का भात खाना चाहिए। अब इस तरह का खान-पान चलन से बाहर होता जा रहा है और इन कहावतों के बारे में भी कम ही लोगों को ज्ञान है।

  

रहा पारंपरिक व्यंजनों का प्रश्न तो, पूड़ी के लड्डुओं का स्वाद वह कभी नहीं भूल सकता है जिसने उन्हें अपने जीवन में एक भी बार खाया हो। ये त्यौहारों बनाए जाते हैं। (चूंकि ‘थे’ लिखने में अंतस कचोटता है अतः मैं ‘है’ ही लिखूंगी) बेसन की बड़ी एवं मोटी पूड़ियां तेल में सेंककर हाथों से बारीक मीड़ी जाती है। फिर उन्हें चलनी से छानकर थोड़े से घी में भूना जाता है। उसके बाद शक्कर या गुड़ डाल कर हाथों से बांधा जाता है। स्वाद बढ़ाने के लिए कालीमिर्च अथवा इलायची भी डाल दी जाती है। इसी तरह है हिंगोरा। बिना मठे की बेसन की कढ़ी जिसमें हींग का तड़का लगाया जाता है। आंवरिया भी इसी श्रेणी का एक व्यंजन है। आंवरिया अर्थात् आंवले की कढ़ी। इसमें सूखे आंवलों की कलियों को तेल में भूनकर सिल पर पीस लिया जाता है। फिर बेसन को पानी में घोलकर किसी बर्तन में चूल्हे पर चढ़ा देते हैं और कढ़ी पक जाने पर, चूल्हे से उतारने के पहले इसमें आंवलों का चूर्ण और नमक डाल देते हैं। इच्छानुसार इसमें लाल मिर्च, जीरा, प्याज एवं लहसुन आदि भी पीस कर डाला जाता है। फरा भी एक पारंपरिक बुंदेली व्यंजन है। इसमें गेहूं के आटे को मांड़ कर छोटी-छोटी पूड़िया बेल ली जाती हैं फिर इन्हें खौलते हुए पानी में सेंका जाता है। बफौरी, मीड़ा, निघौना, रस खीर, बेसन के आलू, फरा, अद्रेनी, थोपा, पूड़ी के लडडू, महेरी या महेई, करार, मांडे, एरसे या आंसे, लपटा, हिंगोरा, आंवरिया, ठोमर, ठड़ूला, डुबरी, कचूमर, कुम्हड़े की खीर, गुना, खाकड़ा, लप्सी, रसाजें, खींच, बिरचून, लुचई, गकरिआ, पपड़िया, टिक्कड़, बरी, बिजौरा, कचरिया, खुरमा-खुरमी, बतियां आदि अनेक ऐसे व्यंजन हैं जो बुंदेली रसोई के अभिन्न अंग हुआ करते थे किंतु अब ये इतालवी या चाइनीज़ फूड तले दबते जा रहे हैं। जबकि इनमें से अनेक ऐसे व्यंजन हैं जो ‘फास्ट फूड’ की श्रेणी में रखे जा सकते हैं।


यूं तो हमारे देश में व्यंजनों की संख्या का निर्धारण आमतौर पर छप्पन प्रकार के व्यंजनों के रूप में किया जाता है, किंतु बुंदेलखंड में सौ से भी अधिक प्रकार के व्यंजन बनाए जाते रहे हैं। दुख तो तब होता है जब इन व्यंजनों में से कुछ को ‘स्ट्रीट फूड’ की श्रेणी में गिना जाता है। जो बुंदेली रसोईघर के राजा-रानी हुआ करते थे वे आज ‘स्ट्रीट फूड’ के रूप में बिकते हैं। यही है बाज़ारवाद का चमत्कार जिसने पारंपरिक व्यंजनों को घरों से बेघर कर के माॅल के आलीशान फूडजोन में पहुंचा दिया है जहां इनमें से कुछ व्यंजनों का अस्तित्व तो बचा हुआ है लेकिन दस रुपए के सामान को सौ रूपए में खरीद कर यह झूठा गुमान भी पालने का शगल आ गया है कि हम अपने पारंपरिक व्यंजनों को लुप्त होने से बचा रहे हैं। यद्यपि बुंदेलखंड में आयोजित किए जाने वाले बुंदेली उत्सव इन पारंपरिक व्यंजनों को पुनः चलन में लाने में अपनी महती भूमिका निभा रहे हैं तथा साहित्यकार पारंपरिक बुंदेली व्यंजनों को पुस्तकाकार सहेज भी रहे हैं किंतु ये तभी चलन में लौट सकते हैं जब ये एक बार फिर हर घर की रसोई का हिस्सा बन जाएं। (क्रमशः)
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(दैनिक सागर दिनकर 14.04 .2021 को प्रकाशित)
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Wednesday, April 7, 2021

चर्चा प्लस - बुंदेलखंड की संकटग्रस्त परंपराएं : त्योहार-परंपरा - डाॅ. शरद सिंह

चर्चा प्लस        
बुंदेलखंड की संकटग्रस्त परंपराएं : त्योहार-परंपरा                   
     - डाॅ. शरद सिंह                              
          जीवन में परिवर्तन स्वाभाविक है। परिवर्तन गतिशीलता का द्योतक होता है लेकिन स्वस्थ परंपराओं में परिवर्तन क्षेत्र की जातीय पहचान को संकट में डाल देता है। युवा पीढ़ी ऐसे कई पारंपरिक त्योहारों से दूर होती जा रही है जिनका जीवन, पर्यावरण और संस्कारों की दृष्टि से महत्वपूर्ण योगदान रहा है। बुंदेलखंड में परंपराओं पर छाए संकट के क्रम में इस बार ‘‘चर्चा प्लस’’ में चर्चा कर रही हूं बदलती त्योहार-परंपरा की।
बुंदेलखंड में अनेक त्योहार मनाए जाते हैं जिन्हें बड़े-बूढ़े, औरत, बच्चे सभी मिलकर मनाते हैं। लेकिन कुछ त्यौहार ऐसे भी हैं जिन्हें सिर्फ बेटियां ही मनाती हैं, विशेष रूप से कुंवारी कन्याएं। ऐसा ही एक त्यौहार है मामुलिया। बड़ा ही रोचक, बड़ा ही लुभावना है यह त्यौहार। यह जहां एक और बुंदेली संस्कृति को रेखांकित करता है, वहीं दूसरी ओर भोली भाली कन्याओं के मन के उत्साह को प्रकट करता है। दरअसल मामुलिया बुंदेली संस्कृति का एक उत्सवी-प्रतीक है। आज के दौड़-धूप के जीवन में जब बेटियां पढ़ाई और अपने भविष्य को संवारने के प्रति पूर्ण रूप से जुटी रहती है उनसे कहीं सांस्कृतिक लोक परंपराएं छूटती जा रही है मामुलिया का भी चलन घटना स्वाभाविक है। आज बुंदेलखंड की अधिकतर बेटियां नहीं जानती मामुलिया। यूं तो मामुलिया मुख्य रूप से क्वांर मास में मनाया जाता है। इस त्यौहार में अलग-अलग दिन किसी एक के घर मामुलिया सजाई जाती है। जिसके घर मामुलिया सजाई जाने होती है, वह बालिका अन्य बालिकाओं को अपने घर निमंत्रण देती है। सभी बालिकाओं के इकट्ठे हो जाने के बाद वे बबूल या बेर के कांटों में रंग-बिरंगे फूल लगा कर उसे सजातीं हैं। यही सजी हुई शाख मामुलिया कहलाती है। मामुलिया को सजाने के बाद भुने चने, ज्वार की लाई, केला, खीरा आदि का प्रसाद चढ़ाया जाता है। इसके बाद बालिकाएं हाथों में हाथ डालकर मामुलिया के चारों ओर घूमती हुई गाती है-‘‘झमक चली मोरी मामुलिया....’’। इस प्रकार गांव भर में घूमती हुई बालिकाएं नदी अथवा तालाब के किनारे पहुंचती हैं। वे मामुलिया को नदी या तालाब में सिरा देती हैं। मामुलिया सिरा कर लौटते समय पीछे मुड़कर नहीं देखा जाता। कहते हैं कि पीछे मुड़कर देखने से भूत लग जाता है। घर लौटने पर वह बालिका जिसके घर मामुलिया सजाई गई थी, शेष बालिकाओं को भीगे चने का न्योता देती है। मामुलिया बेटियों के पारस्परिक बहनापे का भी त्यौहार है। इस त्यौहार में बड़ों का हस्तक्षेप न्यूनतम रहता है अतः इससे बेटियों में सब कुछ खुद करने का आत्मविश्वास और कौशल बढ़ता है। इस प्रकार के त्यौहारों को उत्सवी आयोजन के रूप में मनाते हुए बचाया जा सकता है। जैसे दिसम्बर 2012 में झांसी महोत्सव में भी मामुलिया सजाने की प्रतियोगिता करा कर बेटियों को मामुलिया के बारे में जानकारी दी गई थी। इसी प्रकार 12 अक्टूबर 2016 को हमीरपुर आदिवासी डेरा में ‘बेटी क्लब’ द्वारा लोक परंपरा का खेल मामुलिया और सुअटा खेला गया।  इसका संरक्षण आवश्यक है। क्योंकि यह परंपरा बेटियों के सम्मान के लिए बनाई गई है। ग्राम बसारी, हटा आदि लोकोसत्वों में भी मामुलिया जैसी परम्पराओं पर ध्यान दिया जाता है किन्तु जरूरी है शहरी जीवन को इन रोचक परम्पराओं से जोड़ना।

दीपावली के कई दिन पहले से ही घर की दीवारों की रंगाई-पुताई, आंगन की गोबर से लिपाई और लिपे हुए आंगन के किनारों को ‘‘ढिग’’ धर का सजाना यानी चूने या छुई मिट्टी से किनारे रंगना। चौक और सुराती पूरना। गुझिया, पपड़ियां, सेव-नमकीन, गुड़पारे, शकरपारे के साथ ही एरसे, अद्रैनी आदि व्यंजन बनाया जाना। बुंदेलखंड में दीपावली का त्यौहार पांच दिनों तक मनाया जाता है। यह त्यौहार धनतेरस से शुरु होकर भाई दूज पर समाप्त होता है। बुंदेलखंड में दीपावली के त्यौहार की कई लोक मान्यताएं और परंपराएं हैं जो अब सिमट-सिकुड़ कर ग्रामीण अंचलों में ही रह गई हैं। जीवन पर शहरी छाप ने अनेक परंपराओं को विलुप्ति की कगार पर ला खड़ा किया है। इन्हीं में से एक परंपरा है- घर की चौखट पर कील ठुकवाने की। दीपावली के दिन घर की देहरी अथवा चौखट पर लोहे की कील ठुकवाई जाती थी। मुझे भली-भांति याद है कि पन्ना में हमारे घर भोजन बनाने का काम करने वाली जिन्हें हम ‘बऊ’ कह कर पुकारते थे, उनका बेटा लोहे की कील ले कर हमारे घर आया करता था। वह हमारे घर की देहरी पर ज़मीन में कील ठोंकता और बदले में मेरी मां उसे खाने का सामान और कुछ रुपए दिया करतीं। एक बार मैं उसकी नकल में कील ठोंकने बैठ गई तो मां ने डांटते हुए कहा था-‘‘यह साधारण कील नहीं है, इसे हर कोई नहीं ठोंकता है। इसे मंत्र पढ़ कर ठोंका जाता है।’’ मेरी मां दकियानूसी कभी नहीं रहीं और न ही उन्होंने कभी मंत्र-तंत्र पर विश्वास किया लेकिन परंपराओं का सम्मान उन्होंने हमेशा किया। आज भी वे दीपावली पर पूछती हैं कि कील ठोंकने वाला कोई आया क्या? लेकिन शहरीकरण की दौड़ में शामिल काॅलोनियों में ऐसी परंपराएं छूट-सी गई हैं। दीपावली के दिन गोधूलि बेला में घर के दरवाजे पर मुख्य द्वार पर लोहे की कील ठुकवाने के पीछे मान्यता थी कि ऐसा करने से साल भर बलाएं या मुसीबतें घर में प्रवेश नहीं कर पातीं हैं। बलाएं होती हों या न होती हों किन्तु घर की गृहणी द्वारा अपने घर-परिवार की रक्षा-सुरक्षा की आकांक्षा की प्रतीक रही है यह परंपरा।

दीपावली की पूजा के लिए दीवार पर सुराती बनाने की परंपरा रही है। आज पारंपरिक रीत-रिवाजों को मानने वाले घरों अथवा गांवों में ही दीपावली की पूजा के लिए दीवार पर सुराती (सुरैती) बनाई जाती है। सुराती स्वास्तिकों को जोड़कर बनाई जाती है। ज्यामिति आकार में दो आकृति बनाई जाती हैं, जिनमें 16 घर की लक्ष्मी की आकृति होती है, जो महिला के सोलह श्रृंगार दर्शाती है। नौ घर की भगवान विष्णु की आकृति नवग्रह का प्रतीक होती है। सुराती के साथ गणेश, गाय, बछड़ा व धन के प्रतीक सात घड़ों के चित्र भी बनाये जाते हैं। दीपावली पर हाथ से बने लक्ष्मी - गणेश के  चित्र की पूजा का भी विशेष महत्व है। जिन्हें बुंदेली लोक भाषा में ‘पना’ कहा जाता है। कई घरों में आज भी परंपरागत रूप से इन चित्रों के माध्यम से लक्ष्मी पूजा की जाती है।

बुंदेलखंड में दशहरा-दीपावली पर मछली के दर्शन को भी शुभ माना जाता है। इसी मान्यता के चलते चांदी की मछली दीपावली पर खरीदने और घर में सजाने की मान्यता भी बुंदेलखंड के कुछ इलाकों में है। बुंदेलखंड के हमीरपुर जिला से लगभग 40 किमी. दूर उपरौस, ब्लॉक मौदहा की चांदी की विशेष मछलियां बनाई जाती हैं। कहा जाता है कि चांदी की मछली बनाने का काम देश में सबसे पहले यहीं शुरू हुआ था। उपरौस कस्बे में बनने वाली इन मछलियों को मुगलकाल के बादशाह भी पसंद करते थे। अंग्रेजों के समय रानी विक्टोरिया भी इसकी कारीगरी देखकर चकित हो गयी थीं। जागेश्वर प्रसाद सोनी उसे नयी ऊंचाई पर ले गये। मछली बनाने वाले जागेश्वर प्रसाद सोनी की 14वीं पीढ़ी की संतान राजेन्द्र सोनी के अनुसार इस कला का उल्लेख इतिहासकार अबुल फजल ने अपनी किताब ‘‘आइने अकबरी’’ में भी किया है। उन्होंने लिखा है कि यहां के लोगों के पास बढ़िया जीवन व्यतीत करने का बेहतर साधन है, इसके बाद उन्होंने चांदी की मछली का उल्लेख किया और इसकी कारीगरी की प्रशंसा भी की है। इसके बाद सन् 1810 में रानी विक्टोरिया भी इस कला को देखकर आश्चर्यचकित हो गयी थीं। उन्होंने सोनी परिवार के पूर्वज स्वर्णकार तुलसी दास को इसके लिए सम्मानित भी किया था। राजेंद्र सोनी के अनुसार दीपावली के समय चांदी की मछलियों की मांग बहुत ज्यादा बढ़ जाती है। क्योंकि मछली को लोग शुभ मानते हैं और चांदी को भी। उनके अनुसार धीरे-धीरे ये व्यापार सिमटता जा रहा है। कभी लाखों रुपए में होने वाला ये कारोबार अब संकट में है और चांदी की मछलियों की परंपरा समापन की सीमा पर खड़ी है।  (क्रमशः)
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(दैनिक सागर दिनकर 07.04 .2021 को प्रकाशित)
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Thursday, April 1, 2021

चर्चा प्लस | बुंदेलखंड की संकटग्रस्त परंपराएं : सिमटते खेल | डाॅ. शरद सिंह

चर्चा प्लस        
   बुंदेलखंड की संकटग्रस्त परंपराएं : सिमटते खेल                
           - डाॅ. शरद सिंह
    बुंदेलखंड की संस्कृति परंपराओं की धनी है लेकिन जीवन की आधुनिक शैली ने इसकी स्वस्थ परंपराओं को भी ग्रहण लगाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। कई बुंदेली परंपराएं आज अपना अस्तित्व बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रही हैं। खेल, त्योहार, व्यंजन, लोकगीत, लोकनृत्य, लोकनाट्य आदि की परंपराएं प्रत्येक क्षेत्र के लोकाचार को दर्शाती हैं। बुंदेलखंड में परंपराओं पर छाए संकट पर ‘‘चर्चा प्लस’’ में क्रमशः चर्चा करूंगी। तो इस बार के चर्चाप्लस में कर रही हूं संकटग्रस्त खेलों की चर्चा।
बुंदेलखंड में भी ऐसी अनेक परंपराएं हैं जो इस क्षेत्र की विशेषताओं को दर्शाती हैं। लेकिन आधुनिक जीवन शैली में इलेक्ट्राॅनिक मीडिया ने इन परंपराओं का समय छीन लिया है। अब परिवार के सदस्य काना-दुआ, सोलह गोटी खेलने अथवा लोकनाट्य देखने के बजाए सोशल मीडिया पर समय बिताना अधिक पसंद करते हैं। बेशक सोशल मीडिया का अपना अलग महत्व है लेकिन अपनी स्वस्थ परंपराओं को जीवित रखना भी ज़रूरी है, भले ही यह एक अनुष्ठान की तरह ही क्यों न हो।     
 
बुंदेलखंड में आज से पच्चीस-तीस वर्ष पहले तक विद्यालयों में ग्रीष्मावकाश होना बच्चों के लिए किसी महा-उत्सव से कम नहीं होता था। वार्षिक परीक्षा के दौरान भी एक उत्साह मन में कुलबुलाता रहता था कि इस बार छुट्टियों में कहां जाना है और कितना खेलना है। एक मई से 30 जून तक होेने वाले ग्रीष्मावकाश में खेलों की बाढ़ आ जाती थी। जिनको घर से बाहर निकल कर खेलने की अनुमति रहती वे गिल्ली-डंडा, पिट्टू जैसे खेल खेलते। जिन्हें घर के भीतर रह कर खेलने को मिल पाता वे चपेटा, काना दुआ, सोलह गोटी, बग्गा, लंगड़ी धप्पा जैसे खेल खेलते। इन खेलों को खेलने के लिए उन्हें कहीं जा कर प्रशिक्षण प्राप्त नहीं करना पड़ता था। वे सहज प्रवृति से इन खेलों को खेलते। इन खेलों के दौरान बच्चों के बीच परस्पर प्रेम भी बढ़ता और कभी-कभी छोटे-मोटे झगड़े भी होते जो दूसरे दिन तक स्वयं ही समाप्त हो जाते। अब स्थितियां बदल चुकी हैं। अब बच्चों के परीक्षा परिणाम मेरिट के ‘कटआॅफ’ पर टिके होते हैं। गरमी की छुट्टियां बाद में होती हैं, अगली कक्षा में दाखिला पहले हो जाता है। जिससे उनकी छुट्टियां पढ़ाई के बोझ से मुक्त नहीं हो पाती हैं। उस पर ‘समर कैम्प’ और ‘स्किल डेव्हलपमेंट क्लासेस’, ‘ग्रूमिंग क्लासेस’ ‘काम्पिटीशन क्रैश कोर्स’ आदि नाना प्रकार के शैक्षणिक कैम्प तथा कोर्स रहते हैं जिनमें शिक्षा ग्रहण करते हुए बच्चा ‘क्लासरूम इफैक्ट’ से मुक्त नहीं हो पाते हैं। वे पाश्चात्य ज्ञान भले ही अर्जित कर लें किन्तु अपनी परम्पराओं का ज्ञान उन्हें नहीं मिल पाता है और न ही स्वतः करने की उनकी स्किल  का विकास हो पाता है। जबकि पारंपरिक खेल बच्चों द्वारा ही ईजाद किए जाते रहे हैं और उनमें संशोधन, परिवर्द्धन भी बच्चों द्वारा ही किया जाता रहा ।

बुन्देली लोकसंस्कृति भी जीवन के अनुरुप मनुष्य को ज्ञान प्रदान करने में सक्षम रही है। इस तथ्य का एक उदाहरण उन खेलों को के रूप में देखा जा सकता है जिन्हें बालिकाएं सहज भाव से बड़ी रूचि के साथ खेलती बुन्देली बालिकाएं जिन खेलों को खेलती हैं उन पर बारीकी से ध्यान दिया जाए तो उन खेलों की उपादेयता का पता चलता है। ये खेल अंतः क्रीड़ा (इनडोर गेम) तथा बर्हिक्रीड़ा (आउटडोर गेम) दोनों तरह के होते थे। जिन खेलों को कमरे, आन्तरिक आंगन, छज्जे, अटारी अथवा छत पर खेला जा सकता है वे इनडोर गेम की श्रेणी में आते थे। इसके विपरीत जिन खेलों को बाहरी आंगन, मैदानों, खलिहान के परिसर में खेला जाता था वे आउटडोर गेम कहलाते। 
बुन्देलखण्ड बालिकाओं में जो खेल अधिक लोकप्रिय हैं तथा परम्परागत रूप से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक प्रवाहित होते आ रहे हैं, वे हैं- चपेटा, काना दुआ, सोलह गोटी, बग्गा, लंगड़ी धप्पा अथवा गपई समुद्र, गुंइयां बट्ट, घोर-घोर रानी, घोड़ा पादाम साईं, रस्सी-कूद, अंगुल-बित्ता, रोटी-पन्ना, पुतरा-पुतरियां, छिल-छिलाव, आंख-मिंचउव्वल, लंगड़ी छुआउल, छुक-छुक दाना आदि। देश की स्वतंत्रता के पूर्व सुरक्षा की दृष्टि से बुंदेलखंड में बालिकाओं को घर से बाहर कम ही जाने दिया जाता था तथा देश की स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी बुन्देलखण्ड में विकास की दर अपेक्षाकृत धीमी रही। ऐसी स्थिति में स्वप्रेरित खेलों ने उनके जीवन को मनोरंजन के साथ-साथ सुदृढ़ता प्रदान की। 

बुंदेली खेलों में चपेटा, काना दुआ, सोलह गोटी, बग्गा जैसे खेल संकटों को दूर कर के उन पर विजय पाने का साहस और कौशल बढ़ाते तो वहीं लंगड़ी धप्पा अथवा गपई समुद्र,  घोड़ा पादाम साईं, रस्सी-कूद, अंगुल-बित्ता, छिल-छिलाव, आंख-मिंचउव्वल, लंगड़ी छुआउल जैसे खेल शारीरिक संतुलन के साथ-साथ व्यायाम और आपसी सामंजस्य की शिक्षा देते। घोर-घोर रानी जैसे खेल अन्याय का विरोध करना सिखाते। वहीं छुक-छुक दाना जैसे खेल छल-कपट के प्रति सचेत रहने की चेतना जगाते। रोटी-पन्ना, पुतरा-पुतरियां जैसे खेल गृहस्थ जीवन, पारिवारिक एवं सामाजिक व्यवस्थाओं के प्रति सम्वेदनशील बनाते। इस प्रकार बुन्देली बालिकाओं के जीवन में पारम्परिक खेल जीवन के पाठ की भूमिका निभाते हैं।

बालकों में गिल्ली-डंडा, कबड्डी, कुश्ती लोकप्रिय रही। लेकिन आज बालक-बालिकाओं दोनों के हाथों में मनोरंजन के इलेक्ट्राॅनिक उपकरण आ जाने से उन पारंपरिक खेलों से वे दूर होते जा रहे हैं जो उनमें शारीरिक क्षमता का विकास करते तथा आपसी सहयोग भावना को बढ़ाते। अब तो हाथों में झेंगाबाॅक्स का रिमोट अथवा मोबाईल का स्क्रीन होता है और होता है अकेले रहने का जुनून। इस जुनून को पबजी जैसे खेल बढ़ावा दे कर मौत के मुंह तक पहुंचा देते हैं। बुंदेलखंड के बच्चे तो अब अपने पारम्परिक खेलों को ठीक से जानते ही नहीं हैं। यह दशा शहरों में ही नहीं गंावों में भी हो चली है। गिल्ली-डंडा की जगह क्रिकेट ने ले रखा है। अब पढ़ने वाले लड़के कंचे नहीं खेलते। लड़कियां भी चपेटा खेलने के बदले चैटिंग करने में रमी रहती हैं। यही कारण है कि जहंा एक ओर पारंपरिक खेल दम तोड़ रहे हैं वहीं बच्चों की स्वाभाविकता, मासूमियत और खिलंदड़ापन गुम होता जा रहा है। फिज़िकल फिटनेस के लिए पैसे दे कर जुंबा और जिम में भर्ती होने में शान समझा जाता है।   
   
फिर भी कुछ लोग हैं जो बुंदेलखंड के पारम्परिक खेलों को बचाने का उल्लेखनीय प्रयास कर रहे हैं। छतरपुर जिले के ग्राम बसारी में डाॅ. बहादुर सिंह परमार के अथक प्रयासों से विगत 22 वर्ष से लगातार बुंदेली उत्सव का आयोजन किया रहा है। खजुराहो के निकट होने के कारण इस उत्सव का आनंद लेने न केवल स्वदेशी अपितु विदेशी पर्यटक भी पहुंचते हैं। बुंदेली खेलों को सहेजने की दिशा में इस उत्सव में बुंदेली खेल प्रतियोगिताएं कराई जाती हैं। ऐसा ही एक बुंदेली उत्सव दमोह जिले की हटा तहसील में भी होता है। इस उत्सव में भी बुंदेली खेलकूद प्रतियोगिताएं कराई जाती हैं। झांसी, हटा आदि स्थानों में भी बुंदेली उत्सव मनाया जाता है। डॉ. हरीसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय में आयोजित गौर गौरव उत्सव में भी बुंदेली खेल आयोजित किए गए थे। ये खेल थे-गिल्ली-डंडा, पिट्टू, काना-दुआ, कुश्ती, कबड्डी, गिप्पी आदि। इस तरह के प्रयास देख कर अवश्य लगता है कि अभी भी कुछ लोग ऐसे हैं जो विलुप्त होते बुंदेली खेलों के आत्र्तनाद को सुन रहे हैं और उसके अस्तित्व को बचाए रखने का प्रयास कर रहे हैं। किन्तु खेलों का सीधा संबंध बच्चों से होता है और जब तक बच्चों को इन खेलों से नहीं जोड़ा जाएगा तब तक इन खेलों की दीर्घजीविता खतरे में रहेगी। (क्रमशः)
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(दैनिक सागर दिनकर 01.04 .2021 को प्रकाशित)
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