Wednesday, June 30, 2021

चर्चा प्लस | बड़े और छोटे पर्दे के बेताज बादशाह सईद मिर्जा | डाॅ शरद सिंह

चर्चा प्लस
बड़े और छोटे पर्दे के बेताज बादशाह सईद मिर्जा
               - डाॅ शरद सिंह             
30 जून को जन्मे थे सईद अख़्तर मिर्जा। एक ऐसा निर्देशक और पटकथा लेखक जिसने भारतीय दर्शकों समानांतर सिनेमा के साथ ही समानांतर धारावाहिक भी दिखाया और अपार सफलता प्राप्त की। फिल्म निर्देशन में उन्होंने अपने अलग मायने गढ़े। धारावाहिक ‘‘नुक्कड़’’ का निर्देशन चुनौती भरा था लेकिन ‘‘अल्बर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है’’ जैसी फिल्म दे चुके सईद मिर्जा के लिए कोई भी चुनौती बड़ी नहीं थी।
 
धारावाहिक ‘‘नुक्कड़’’ ने भारतीय टेलीविजन को समानांतर धारावाहिक की सौगात दी थी। वर्ष िि और 1987 में टेलीविजन पर इस धरावाहिक ने अपनी खास पहचान बनाई। कुंदन शाह और सईद मिर्जा द्वारा निर्देशित इस धारावाहिक की कहानी प्रबोध जोशी द्वारा लिखी गई थी। कहा जाता है कि नुक्कड़ के निर्देशन के समय कुंदन शाह थोड़े घबराए हुए थे। वे इस धारावाहिक की सफलता को ले कर भी सशंकित थे। लेकिन सईद मिर्जा को पूरा भरोसा था अपने काम पर और वे आश्वस्त थे कि ‘‘नुक्कड़’’ दर्शकों को पसंद आएगा। ऐसा हुआ भी। दिलीप धवन, रमा विज, पवन मल्होत्रा, संगीता नाईक और अवतार गिल की इसके अहम भूमिकाएं थी। अपने प्रदर्शन के दिनों में इसकी लोकप्रियता चरम पर थी। इसके कुछ पात्र जैसे खोपड़ी, कादिर भाई और घंशु भिखारी घर-घर में पहचाने जाने लगे। नुक्कड़ ने 80 के दशक में प्रसारित किए जाने वाले तीन सबसे अधिक लोकप्रिय धारावाहिकों में अपनी जगह बना ली थी। धारावाहिक का पहला सीजन 40 एपीसोड का था। इसके हर अंक में कम कमाने वाले लोगों की दैनिक समस्याओं को मुख्य पात्रों की जिंदगी के द्वारा दिखाया गया था। शहरों में बढ़ती हुई कठिन सामाजिक और आर्थिक समस्याओं के कारण कम आय वाले लोगों के टूटते सपनों को इसके प्रत्येक एपीसोड्स में प्रस्तुत किया गया। जीवन की कटु सच्चाई पर आधारित इस धारावाहिक को दर्शकों ने बड़े चाव से देखा। उन्हें इसकी हर घटना अपने जीवन की घटना लगती।
गुरु उर्फ रघुनाथ (दिलीप धवन) बिजली सुधारता है और नुक्कड़ समूह का सर्वसम्मति से चयनित मुखिया है। मदद करने के लिए हमेशा तैयार रहने वाले गुरु में किसी का पक्ष न लेने का गुण हैं और यह अक्सर नुक्कड़ में रहने वाले लोगों के बीच के छोटे झगड़े सुलझाता है। कादर भाई उर्फ कुट्टी (अवतार गिल) - कादर भाई एक छोटा सा रेस्टेरोंट चलाते हैं जहां नुक्कड़ के सदस्य अक्सर मिलते हैं। कादर  भाई दयालु स्वभाव के हैं और नुक्कड़ के गरीब सदस्यों को मुफ्त में चाय और नाश्ता देते हैं। हरी (पवन मल्होत्रा) - हरी की साइकिल सुधारने की दुकान है और एक अमीर लड़की मधु से उसे प्यार है। गुप्ता सेठ, मधु के पिता, इससे चिढ़ते हैं और हमेशा दोनों पर नजर रखते हैं। खोपड़ी (समीर खख्खर) - खोपड़ी उर्फ गोपाल एक शराबी है जिसे नुक्कड़ के सभी सदस्य बेहद पसंद करते हैं। गणपत हवलदार (अजय वाडकर) - गणपत हवलदार नुक्कड़ में कोई भी समस्या आने पर तुरंत आ जाता है। ये सभी धारावाहिक के ऐसे पात्र थे जो बेहद लोकप्रिय हुए और दर्शकों में अपनी अनूठी छाप छोड़ने में सफल हुए।
अवतार गिल और पवन मल्होत्रा जैसे कलाकारों को इस धारावाहिक से पहचान मिली और आगे चल कर उन्हें बड़े पर्दे पर भी काम मिलता रहा। ‘‘नुक्कड़’’ और इसके सभी कलाकारों की सफलता का श्रेय अगर किसी को दिया जाना चाहिए तो वह नाम है सईद अख़्तर मिर्जा उर्फ़ सईद मिर्जा।
30 जून 1943 को मुंबई, महाराष्ट्र में अख्तर मिर्जा के घर जन्मे पटकथा लेखक और हिंदी फिल्मों और टेलीविजन के निर्देशक सईद मिर्जा के पिता स्वयं एक प्रसिद्ध पटकथा लेखक थे। ‘‘नया दौर’’ और ‘‘वक्त’’ जैसी फिल्मों में उन्होंने निर्देशन का काम किया था। सईद मिर्जा के भाई अजीज मिर्जा ने सन् 1989 के टेलीविजन धारावाहिक ‘‘सर्कस’’ के निर्देशन के के साथ ही शाहरुख खान को लांच किया। सईद मिर्जा ने भी अपने पिता के पदचिन्हों पर चलते हुए बड़े और छोटे दोनों पर्दें पर अपनी धाक जमाई और सिद्ध कर दिया कि टेलीविजन पर सच्चाई पर आधारित धारावाहिक दिखाया जा सकता है और दर्शक उसे पसंद भी करते हैं। कुछ समय के लिए विज्ञापन में काम करने के बाद सईद मिर्जा ने फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया पूना में दाखिला लिया। जहां से उन्होंने 1976 में स्नातक की उपाधि प्राप्त की। सईद अख्तर मिर्जा ने 1976 में एक वृत्तचित्र फिल्म निर्माता के रूप में अपना करियर शुरू किया, एक सामंती धन संस्कृति के जाल में फंसे एक आदर्शवादी युवा की कुंठाओं के बारे में प्रशंसित अरविंद देसाई की अजीब दास्तान (1978) के साथ फिल्मों में स्नातक किया। इसने वर्ष के लिए सर्वश्रेष्ठ फिल्म का फिल्मफेयर क्रिटिक्स अवार्ड जीता। इसके बाद अल्बर्ट पिंटो को गुसा क्यूं आता है (1980), एक गुस्से में युवा के बारे में, अपने वर्ग और जातीय पहचान की तलाश में था। इसने सर्वश्रेष्ठ फिल्म का फिल्मफेयर क्रिटिक्स अवार्ड भी जीता। इसके बाद सन् 1984 में सईद मिर्जा ने न्यायव्यवस्था की बिगड़ी दशा पर कटाक्ष करती फिल्म निर्देशित की जिसका नाम था- ‘‘मोहन जोशी हाजिर हो!’’ इस फिल्म में एक अधेड़ आयु दम्पति जो रियल-एस्टेट डेवलपर के साथ न्यायालय में संघर्ष करता रहता है ताकि वह अपने कानूनी अधिकार पा सके। इस फिल्म में न्यायव्यवस्था और भ्रष्टाचार के गठजोड़ को बखूबी दिखाया गया। इसके अलावा सईद मिर्जा ने सन् 1980 में ‘‘अल्बर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है’’, 1989 में ‘‘सलीम लंगदे पे मत रो’’ और 1995 में ‘‘नसीम’’ बनाई। फिल्म ‘‘सलीम लंगड़े पे मत रो’’ में एक कट्टर मुस्लिम युवक की कहानी थी जो परिस्थितिवश अपराध के शिकंजे में फंस जाता है और उससे निकलने के लिए हरसंभव प्रयास करता है। इस फिल्म में पवन मलहोत्रा ने कट्टर मुस्लिम युवक की भूमिका अदा की थी। यह एक अत्यंत संवेदनशील फिल्म थी जिसने दर्शकों को झकझोर दिया। उन्होंने 1996 में दो राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीते। सईद मिर्जा को 2020 में इंटरनेशनल कल्चरल आर्टिफैक्ट फिल्म फेस्टिवल में ‘‘लाईफटाइम अचीवमेंट अवार्ड’’ से सम्मानित किया गया।
बड़े पर्दे पर उनकी आखिरी फिल्म थी ‘‘नसीम’’ (1995) जो बाबरी मस्जिद ढहने के बाद के माहौल पर आधारित थी। इस फिल्म को अविजीत घोष की किताब ‘‘40 रीटेक, बॉलीवुड क्लासिक्स यू मे हैव मिस्ड’’ में भी शामिल किया गया। इसके बाद उन्होंने बड़े पर्दे को छोड़ कर अपना समय यात्रा, लेखन और वृत्तचित्र बनाने में लगा दिया। साथ ही उन्होंने आत्मकथात्मक काम आरम्भ किया।  सईद मिर्जा ने उपन्यास भी लिखे। सन् 2008 में उनका पहला उपन्यास आया जिसका नाम था -‘‘अम्मी: लेटर टू ए डेमोक्रेटिक मदर’’। इस उपन्यास में उन्होंने सूफी कथाओं के साथ ही अपनी मां की यादों को भी संजोया। उनकी मां की मृत्यु सन् 1990 में हो गई थी। वे अपनी मां को बहुत चाहते थे और उनकी मृत्यु पर सईद को बहुत सदमा पहुंचा था। इसके बाद उन्होंने एक और उपन्यास लिखा ‘‘द मोंक, द मूर एंड मोसेस बेन जालौन’’ यह सन् 2012 में प्रकाशित हुआ। यह उपन्यास जानबूझ कर भुला दिए गए इतिहास के बारे में है।

सईद मिर्जा ने जिन कला फिल्मों, धरावाहिकों एवं वृत्तचित्रों का निर्माण तथा निर्देशन किया उनमें प्रमुख हैं-स्लम एविक्शन (1976), हत्या (1976), घासीराम कोतवाल (1976), एक अभिनेता तैयार करता है (1976), शहरी आवास (1977), अरविंद देसाई की अजीब दास्तान (1978), अल्बर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है (1980), पिपरसोद (1982), मोहन जोशी हाजीर हो! (1984), जबलपुर के रिक्शा खींचने वाले (1984), नुक्कड़ (1986), कोई सुन रहा है? (1987), वी शेल ओवरकम (1988), इंतज़ार (1988), सलीम लंगड़े पे मत रो (1989), अजंता और एलोरा (1992), नसीम (1995), कर्मा कैफे (2018), छू लेंगे आकाश (2001)।
सईद मिर्जा को अनेक पुरस्कारों से नवाज़ा गया। फिल्म ‘‘अरविंद देसाई की अजीब दास्तान’’ (1978) के लिए उन्हें सन् 1979 की सर्वश्रेष्ठ फिल्म के लिए फिल्मफेयर क्रिटिक्स अवार्ड दिया गया। सन् 1981 सर्वश्रेष्ठ फिल्म के लिए फिल्मफेयर क्रिटिक्स अवार्ड ‘‘अल्बर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है’’ (1980), सन् 1984 परिवार कल्याण पर सर्वश्रेष्ठ फिल्म के लिए राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार ‘‘मोहन जोशी हाजिर हो!’’ (1984), सन् 1996 सर्वश्रेष्ठ निर्देशन के लिए राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार ‘‘नसीम’’ को दिया गया।
सईद अख्तर मिर्जा एशियन एकेडमी ऑफ फिल्म एंड टेलीविजन के इंटरनेशनल फिल्म एंड टेलीविजन क्लब के आजीवन सदस्य हैं। वह अपनी पत्नी जेनिफर के साथ मुंबई में रहते हैं। गोवा में भी उनका एक घर है। उनके बेटे सफदर और जहीर क्रमशः न्यूयॉर्क और दुबई में रहते हैं। आज भी जब समानांतर फिल्मों और धारावाहिकों की चर्चा आती है तो सईद मिर्जा का नाम पहली पंक्ति में आता है।
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(सागर दिनकर, 30.06.2021)
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Tuesday, June 29, 2021

पुस्तक समीक्षा | खेल पत्रकारिता को समझने के लिए जरूरी है यह पुस्तक पढ़ना | समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह

पुस्तक समीक्षा
खेल पत्रकारिता को समझने के लिए जरूरी है यह पुस्तक पढ़ना  

समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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पुस्तक  - खेल पत्रकारिता के आयाम
लेखक  - डाॅ. आशीष द्विवेदी
प्रकाशक - हिन्दी बुक सेंटर, 4/5-बी, आसफअली रोड, नई दिल्ली
मूल्य    - 230/-
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आज पत्रकारिता शब्द से ही समाचारों से सनसनी फैलाने वाली पत्रकारिता का विचार आता है। जबकि खेल पत्रकारिता से हमारा पुराना नाता है। लगभग हर समाचारपत्र का एक पन्ना खेलजगत की ख़बरों के लिए तय रहता है। एक समय वह भी था जब खेल कमेंट्री सुनने के लिए कानों से ट्रांजिस्टर चिपकाए लोग नज़र आते थे। मैच के ठीक दूसरे दिन अखबार में खेल का विश्लेषण पढ़ने की आतुरता रहती थी। यह आतुरता अभी भी पाई जाती है। यद्यपि आज अधिकांश लोग टेलीविजन या मोबाईल पर खेल देख लेते हैं और विशेषज्ञों की राय भी सुन लेते हैं लेकिन इससे खेल पत्रकारिता सिमटी नहीं है अपितु इसका विस्तार हुआ है क्योंकि मीडिया में खेल और खेल समाचारों की प्रस्तुति खेल  पत्रकारिता पर ही निर्भर रहती है। विगत दिनों खेल पत्रकारिता पर एक महत्वपूर्ण पुस्तक प्रकाशित हुई है जिसका नाम है-‘‘खेल पत्रकारिता के विविध आयाम’’। जैसा कि पुस्तक के नाम से ही अनुमान हो जाता है कि इस पुस्तक में खेल पत्रकारिता पर समग्रता से प्रकाश डाला गया है। इस पुस्तक के लेखक हैं डाॅ. आशीष द्विवेदी।
लेखक डाॅ. आशीष द्विवेदी लगभग बीस वर्ष से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। उन्होंने डाॅ. हरीसिंह गौर केन्द्रीय विश्वविद्यालय सागर से सन् 1999 में संचार एवं पत्रकारिता में प्रावीण्य सूची में मास्टर डिग्री हासिल की और सन् 2008 में ‘‘राष्ट्रीय दायित्व एवं हिन्दी पत्रकारिता’’ विषय में पीएच. डी. की उपाधि प्राप्त की। विगत 12 वर्ष से वे सागर में इंक मीडिया इंस्टीट्यूट आॅफ माॅस कम्यूनिकेशन एंड आई टी के निदेशक हैं। पत्रकारिता का इस दीर्घ अनुभव ने डाॅ. आशीष द्विवेदी की इस पुस्तक को प्रमाणिकतौर पर उद्देश्यपूर्ण बना दिया है। हिन्दी में खेल पत्रकारिता पर कम ही पुस्तकें लिखी गई हैं। जो हैं भी उनमें समग्रता कम ही देखने को मिलती है। अपनी पुस्तक ‘‘खेल पत्रकारिता के विविध आयाम’’ में डाॅ. आशीष द्विवेदी ने खेल पत्रकारिता के विविध पक्षों को बारीकी से प्रस्तुत किया है।
 
पुस्तक की कुल सामग्री पांच खण्डों में विभक्त है। प्रत्येक खण्ड में विभिन्न अध्यायों में जानकारी सहेजी गई है। प्रथम खंड में प्रथम खंड में ‘‘भारत में खेलों की स्थिति का अवलोकन’’ विषय के अंतर्गत भारत में खेल, हॉकी में भारत, फुटबॉल में भारत, खेल अनुवांशिकी और भारत, भारतीय शिक्षा व्यवस्था में खेल, खेलो इंडिया कार्यक्रम और इसके उद्देश्य, खेलों में राजनीति, खेलों में लैंगिक भेदभाव, खेल में सामाजिक बदलाव, खेल में नस्लवाद, खेल मनोविज्ञान, खेल भावना का लोप, खेल से सन्यास और भारतीय खिलाड़ी, राष्ट्रीय खेल नीति और उसका यथार्थ, राष्ट्रीय खेल संहिता, अखिल भारतीय खेल परिषद, खेल संबंधी अवार्ड और उनसे जुड़े विवाद, खेलों के स्याह पहलू, भारत के खेल परिवार, भारत के ब्रांड खिलाड़ी, भारत की प्रमुख खेल अकादमी, खिलाड़ियों की आत्मकथा और जीवनियां, खेलों से व्यक्तित्व विकास, खेल अर्थव्यवस्था व कैरियर, भारत में खेल उत्पाद उद्योग, खेल केंद्रित सिनेमा, खेलों में लीग संस्कृति, कैसे सुधरेंगे खेलों के हालात, ऑनलाइन गेम्स का खेलों पर दुष्प्रभाव जैसे 29 अध्याय इस प्रथम खंड में विवेचन सहित सामने रखे गए हैं।

दूसरे खंड में ‘‘खेल पत्रकारिता: प्रायोगिक पहलू’’ इस विषय के अंतर्गत जो अध्याय रखे गए हैं वे हैं- खेल पत्रकारिता का विकासक्रम, खेल पत्रकारिता का अर्थ, खेल के लिए कैसे लिखें, मैगजीन के लिए  खेल लेखन, खेल फीचर लेखन, खेल साक्षात्कार का महत्व, खेल प्रेस वार्ता, खेल संपादकीय, खेल स्तंभ लेखन, रेडियो में खेल संबंधी लेखन, टेलीविजन में खेल संबंधी लेखन, खेल संबंधी अनुवाद, खेल फोटोग्राफी, खेल संबंधी कार्टून, खेल पेज और उसका लेआउट, खेल पत्रकार की योग्यताएं, प्रेरक खेल पत्रकारिता, खेल पत्रकारिता दूसरा पहलू, खेल के रोचक समाचार, देश के प्रमुख खेल पत्रकार, खेल आधारित चैनल, खेल संबंधी मैगजीन और ब्लॉग खेल पत्रकारिता में कैरियर।

तीसरे खंड में ‘‘प्रमुख खेल संस्थाएं व उनका संक्षिप्त परिचय’’ शीर्षक के अंतर्गत जिन बिंदुओं पर चर्चाएं की गई हैं, वह हैं- प्रमुख खेल संबंधी आयोजन व संस्थाएं, भारतीय खेल प्राधिकरण, भारत के खेल आधारित विश्वविद्यालय/महाविद्यालय, भारत के प्रमुख खेल संघों का परिचय, भारत के प्रमुख खेल स्टेडियम।

चौथे खंड में खेल पत्रकारों से संवाद को संजोया गया है जिसके अंतर्गत जी. राजारमन, चंद्रशेखर लूथरा, प्रवीणचंद्र, विक्रांत गुप्ता, राजेश राय, राजेंद्र सजवान, विमल कुमार, माला तातरवे, हेमंत रस्तोगी, अभिषेक त्रिपाठी, उमेश राजपूत, राजकिशोर, रोशन झा, विजय कुमार, इंद्रजीत मौर्य, मुकेश विश्वकर्मा, ललित कटारिया, बी.पी. श्रीवास्तव, डॉ. प्रेम प्रकाश पंत और संजीव पंगोत्रा के संवाद हैं।

पांचवा और अंतिम खंड परिशिष्ट का है जिसमें कुछ और महत्वपूर्ण तथ्य एवं सामग्रियां प्रस्तुत की गई हैं। जैसे प्रधानमंत्री के ‘‘खेलो इंडिया’’ और ‘‘खेल दिवस’’ पर दिए गए उद्बोधन प्रभाष जोशी का लेख शारदा उगरा का लेख, सानिया मिर्जा का इंटरव्यू, रानी रामपाल का साक्षात्कार तथा सचिन तेंदुलकर के विचार आदि शामिल किए गए हैं।

इस पुस्तक का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि इसमें ग्रामीण स्कूलों के हाल और ग्रामीण स्कूलों में खेल की स्थिति पर भी दृष्टि डाली गई है। जहां अफ्रीका महाद्वीप के देशों में गांव से खिलाड़ी ओलंपिक तक पहुंचते हैं, वहीं भारत में ग्रामीण क्षेत्रों से खिलाड़ी राष्ट्रीय स्तर तक बड़ी मुश्किल से पहुंच पाते हैं। इसके लिए कौन-सी दशा और दिशा जिम्मेदार है, इस पर भी इस पुस्तक में विचार किया है।

खेल से जुड़ी खबरें भी कभी-कभी सनसनी फैला देती हैं जब उनमें ड्रेसिंग रूम की खबरें भी शामिल हो। इस प्रसंग पर लेखक डॉ आशीष द्विवेदी ने रोचक ढंग से उदाहरण देते हुए लिखा है- ‘‘ड्रेसिंग रूम की खबरें भी कई बार चर्चा का विषय बनती है। हालांकि इनकी रिपोर्टिंग में सतर्कता की जरूरत होती है, कारण कई बार यह महज अफवाहें ही निकलती है। अब तो कवरेज का दायरा खिलाड़ियों की पत्नी, बच्चों उनकी फैशन और स्टाइल तक जा पहुंचा है। धोनी की बेटी जीवा का जन्मदिन हो या विराट अनुष्का का हनीमून यह सभी कवरेज का हिस्सा बनते हैं। मैच समाप्त होने के बाद खिलाड़ियों और प्रशिक्षकों की प्रतिक्रिया, मैन ऑफ द मैच की घोषणा ट्रॉफी के साथ शैंपेन की बोतल खोलते हुए टीम का फोटो भी उतना ही महत्वपूर्ण है। आप उस पल को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते।’’

जब खेल पत्रकारिता की बात हो तो एक प्रश्न यह भी उठता है कि आखिर खेल पत्रकारिता का उद्देश्य क्या है? क्या यह सिर्फ खेल संबंधी मनोरंजक तथ्य या आंकड़े प्रस्तुत करने का माध्यम है अथवा इसका कोई और भी उद्देश्य है? इस विषय पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए लेखक ने खेल पत्रकारिता के उद्देश्य निरूपित किए हैं। इसमें जो प्रमुख बिंदु होने रखे हैं, वे हैं- खेलों के प्रति समाज की मानसिकता में बदलाव लाना, खेलों के लिए एक स्वस्थ माहौल का निर्माण करना, ग्रामीण वह आदिवासी अंचलों से प्रतिभाओं की तलाश करना, परंपरागत खेलों को प्रोत्साहित करना, खेलों में मौजूद राजनीति क्षेत्रवाद और जातिवाद पर प्रहार करना, लैंगिक भेदभाव के विरुद्ध आवाज उठाना, खेलों में एकाधिकार जमाने वाले खेल और खिलाड़ियों के प्रभाव से खेल को मुक्त करने की दिशा में पहल करना, खेल नीति और खेल बजट पर चर्चा करना, बौद्धिक स्तर पर खेलों में भारत की स्थिति और कारणों का पड़ताल करना जैसे अनेक उद्देश्य लेखक ने प्रस्तुत किए हैं।

खेलों में लैंगिक भेदभाव विषय पर लेखक ने बेबाकी से अपनी बात सामने रखी है वह लिखते हैं - ‘‘खेलों में आधी दुनिया को लगभग हाशिए पर रखा गया है दुनिया के कई देशों में महिलाओं को लेकर दोहरे मापदंड है भारत में भी स्थिति विकट है कई सारे खेल ऐसे हैं जहां महिलाओं का प्रतिनिधित्व ना के बराबर है जिन खेलों में महिलाएं हैं थी उनमें वे पुरुष या वर्चस्व के आगे कहीं नहीं ठहरती खेल के मैदान की पारंपरिक छवि मर्दानगी की रही है और भारतीय समाज पर काबिज सदियों की पितृसत्ता नहीं से दरकने नहीं दिया ।’’
लेखक को खेल पत्रकारिता पर पुस्तक लिखने का विचार क्यों आया इस बात को उनके इस विचार से भलीभांति समझा जा सकता है - ‘‘वस्तुतः खेल पत्रकारिता में हम उस की रिपोर्टिंग संपादन लेखन फोटोग्राफी और साक्षात्कार की बात करते-करते अपनी बात समाप्त कर देते हैं जबकि मैंने यह पाया कि इसके हाय हम इतने विविध पूर्ण हैं कि अगर उन पर संपूर्णता से बात हो तो एक ग्रंथ कम पड़ सकता है इन सब में भी मुझे जो हम बात नजर आती है वह खेलों के प्रति मानस बदलने की जो एक पुरानी कहावत है ‘खेलोगे कूदोगे बनोगे खराब’ ‘पढ़ोगे लिखोगे बनोगे नवाब’ इस कहावत ने खेलों के प्रति लोगों के रुझान को घटाने में महती भूमिका निभाई है। खेल पत्रकार सिर्फ इसी कहावत के विरुद्ध अगर अपना मिशन चलाएं तो मुझे लगता है खेलों के प्रति एक स्वस्थ माहौल पैदा किया जा सकता है। इसके अलावा खेलों में हावी राजनीति क्षेत्रवाद, लैंगिक असमानता, खेल नीति, बजट, प्रोत्साहन ऐसे अनेक मुद्दे हैं जिन पर भी खेल पत्रकार बहुत ज्यादा कलम चलाते नहीं दिखते।’’ वे आगे लिखते हैं- ‘‘मैं इस बात को लेकर भी चिंतित हूं कि खेलों के प्रति एक उदासीन और कमोवेश उपेक्षा पूर्ण माहौल होने के कारणों की पड़ताल करने में खेल पत्रकारों की ज्यादा दिलचस्पी क्यों नहीं है। गुमनाम खेल प्रतिभाओं को प्रोत्साहन देने खेलों में व्याप्त आला दर्जे की पक्षपात पर खेल पत्रकारिता मौन क्यों है? राष्ट्रीय खेल के मायने बदलते जा रहे हैं। एक खेल विशेष की मोनोपोली ने बाकी खेलों को लगभग उपेक्षित जा कर रखा है तो ओलंपिक में हमें एक पदक के लाले पड़ जाते हैं। मीडिया के कवरेज में भी सौतेलापन है और सरकार के नजरिए में भी। हम आज तक फुटबॉल की एक विश्व कप लायव थीम नहीं दे पाए। इन सब वज़हों की खोजबीन करना कितना जरूरी है यह कौन समझाए।’’

पुस्तक की प्रस्तावना लिखते हुए प्रो. संजीव भानावत ने बहुत सही लिखा है कि ‘‘पत्रकारिता के विद्यार्थियों को यह पुस्तक खेल पत्रकारिता के अनेकानेक पक्षों को समझने की दिशा में सहायक साबित होगी डॉ द्विवेदी ने श्रम और निष्ठा के साथ काम करते हुए इस पुस्तक का लेखन किया है। इस अछूते विषय पर उनका यह ग्रंथ खेल पत्रकारिता को रोचक बनाने की दिशा में भी मील का पत्थर साबित होगा ऐसा विश्वास है।’’
 
डाॅ आशीष द्विवेदी ने यह पुस्तक लिख कर अपने पत्रकारिता के दायित्व को पूरी ईमानदारी से निभाया है। यह विश्वासपूर्वक कहा जा सकता है कि यह पुस्तक खेल-प्रेमियों एवं खेल-पत्रकारों के साथ-साथ इस विषय के विद्यार्थियों का भरपूर ज्ञानवर्द्धन करेगी क्योंकि यदि कोई व्यक्ति खेल पत्रकारिता को सम्पूर्णता से समझना चाहता है तो उसके लिए ‘‘खेल पत्रकारिता के विविध आयाम’’ पुस्तक को पढ़ना ज़रूरी है।
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Wednesday, June 23, 2021

चर्चा प्लस | कबीर की सहज समाधि जीवनपद्धति | डाॅ शरद सिंह


चर्चा प्लस
कबीर की सहज समाधि जीवनपद्धति
      - डाॅ शरद सिंह
               कबीर की प्रासंगिकता कोई नकार नहीं सकता है। कबीर की वाणी कालजयी वाणी है। उन्होंने जिस मानव स्वाभिमान और निडरता का साथ देते हुए, धार्मिक आडंबर ओढ़ने वालों को ललकारा, वैसा साहस आज भी दिखाई नहीं देता है। कबीर ने सहजसमाधि के रूप में जीने का आसान तरीका बताया जो आज भी प्रासंगिक है।


कबीर का जन्म लहरतारा के पास जुलाहा परिवार में सन 1398 में जेष्ठ पूर्णिमा को माना जाता है। वे संत रामानंद के शिष्य बने और ज्ञान का अलख जगाया। कबीर ने साधुक्कड़ी भाषा में किसी भी संप्रदाय और रूढ़ियों की परवाह किए बिना खरी बात कही। वे एक ही ईश्वर को मानते थे और कर्मकांड के घोर विरोधी थे। अवतार, मूर्तिपूजा आदि को वे नहीं मानते थे। कबीर ने हिंदू मुसलमान सभी समाज में व्याप्त रूढ़िवाद तथा कट्टरपंथ का खुलकर विरोध किया। कबीर के विचार और उनके मुखर उपदेश उनकी साखी, रमैनी, बीजक, बावनअक्षरी और उलटबांसी  में मिलते हैं।
  कबीर ने समाज के साथ-साथ आत्म-उत्थान पर भी बल दिया। आत्म-उत्थान के लिए उन्होंने समाधि के उस चरण को उत्तम ठहराया जिसमें मनुष्य अपने अंतर्मन में झांक सके और अपने अंतर्मन को भलीभांति समझा सके। कबीर ने सहजयान की बहुत प्रशंसा की और इसे सबसे उत्तम कहा। कबीर के अनुसार सहज समाधि की अवस्था दुख-सुख से परे परम सुखदायक अवस्था है। जो इस समाधि में रम जाता है वह अपने नेत्रों से अलख को देख लेता है। जो गुरु इस सहज समाधि की शिक्षा देता है वह सर्वोत्तम गुरु होता है-
     संतो, सहज समाधि भली
     सुख-दुख के इक परे परम,
    सुख तेहि में रहा समाई ।।

कबीर ने सहज समाधि की विशेषताओं को विस्तार से समझाते हुए कहा है कि इस समाधि को प्राप्त करने के लिए न तो शरीर को तप की आग में तपाने की आवश्यकता होती है और कामवासना में लिप्त होकर मोक्ष की ओर अग्रसर होने की। यह समाधि अवस्था उस मधुर अनुभव की भांति है जो इसे प्राप्त करता है, तो वहीं इसकी मधुरता को जान पाता है -
      मीठा सो जो सहेजैं पावा।
     अति कलेस थैं करूं कहावा।।

      कबीर इस तथ्य को स्पष्ट किया कि वस्तुतः सहजसमाधि का नाम तो सभी लेते हैं किंतु उसके बारे में जानते कम ही लोग हैं अथवा सहज समाधि को लेकर भ्रमित रहते हैं। यह तो सामाजिक व्यवस्था है जिसमें हरि की सहज प्राप्ति हो जाती है। कबीर सहज समाधि को और स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि यह कोई आडंबर युक्त क्रिया नहीं है अपितु सहज भाव से जीवनयापन करते हुए राम अथवा हरि में लीन हो जाना ही सहज समाधि है।
   सहज-सहज सब ही कहैं,
   सहज न चीन्हैं कोई ।
   जिन सहजै हरिजी मिलैं
   सहज कहीजैं सोई ।।

   सहज समाधि के लिए न तो ग्रंथों की आवश्यकता है और न किसी पूजा पाठ की। इसके लिए बस इतना करना पर्याप्त है कि विषय-वासना का त्याग, संतान, धन, पत्नी और आसक्ति से मन को हटा कर ष्रामष् के प्रति समर्पित कर दिया जाए। जो भी ऐसा कर लेता है वह सहजसमाधि में प्रविष्ट हो जाता है। कबीर कहते हैं कि यह तो बहुत सरल है-
     आंख न मूंदौं, कान न रूंधौं
     तनिक कष्ट नहीं धारों ।
    .खुले नैनी पहिचानौं हंसि हंसि
     सुंदर रूप निहारौं ।।

इस सहज समाधि की अवस्था को पाकर साधक सहज सुख पा लेता है तथा सांसारिक दुखों के सामने अविचल खड़ा रह सकता है। वह न तो स्वयं किसी से डरता है और न किसी को डराता है। यह तो ब्रह्मज्ञान है जो मनुष्य के भीतर विवेक को स्थापित करता है, धैर्य धारण करना सिखाता है और युगों युगों के विश्राम का सुख देता है -
   अब मैं पाईबो रे, पाइबौ ब्रह्मगियान ।
   सहज समाधें सुख मैं रहिबौ
   कोटि कलप विश्राम ।।

कबीर कहते हैं कि जब मन ष्रामष् में लीन हो जाता है, आसक्ति दूर हो जाती है, चित्त एकाग्र हो जाता है - उस समय मन स्वयं ही भोग की ओर से हटकर योग में प्रवृत्त होने लगता है। यह साधक की साधना की चरम स्थिति ही तो है जिसमें उसे दोनों लोकों का सुख प्राप्त होने लगता है -
एक जुगति एक मिलै, किंवा जोग का भोग ।
इन दून्यूं फल पाइए, राम नाम सिद्ध जोग ।।

सहज समाधि के बारे में कबीर के विचार सिद्धों के सहजयान संबंधी विचार के बहुत समीप हैं। सिद्धों के समय सहज भावना उत्तम और सरल मानी जाती थी। सिद्ध भी यही मानते थे कि घर बार को त्याग कर साधु होना व्यर्थ है यदि त्याग करना है तो सभी प्रकार के आडंबरों का त्याग करना चाहिए। सिद्ध संत गोरखनाथ ने भी सहज जीवन के बारे में यही कहा है कि  ष्हंसना, खेलना और मस्त रहना चाहिए किंतु काम और क्रोध का साथ नहीं करना चाहिए। ऐसा ही हंसना, खेलना और गीत गाना चाहिए किंतु अपने चित्त की दृढ़तापूर्वक रक्षा करनी चाहिए। साथ ही सदा ध्यान लगाना और ब्रह्म ज्ञान की चर्चा करनी चाहिए।ष्
    हंसीबा खेलिबा रहिबा रंग,
    काम क्रोध न करिबा संग ।
    हंसिबा खेलिबा गइबा गीत
    दिढ करि राखि अपना चीत ।।
    हंसीबा खेलिबा धरिबा ध्यान
    अहनिस कथिबा ब्रह्म गियान ।
    हंसै खेलै न करै मन भंग
    ते निहचल सदा नाथ के संग।।

सिद्धों और नाथों की सहज ज्ञान परंपरा की जो प्रवृत्ति कबीर  तक पहुंची उसे कबीर ने आत्मसात किया और उसे सहज समाधि के रूप में और अधिक सरलीकृत किया। जिससे लोग सुगमता पूर्वक उसे अपना सकें। इस संदर्भ में राहुल सांकृत्यायन का यह कथन समीचीन है कि ष्यद्यपि कबीर के समय तक एक भी सहजयानी नहीं रह गया था फिर भी इन्हीं (पूर्ववर्ती) से कबीर तक सहज शब्द पहुंचा था। जिस प्रकार सिद्ध सहज ध्यान और प्रवज्या से रहित गृहस्थ जीवन व्यतीत करते हुए सहज जीवन की प्रशंसा करते हैं वैसे ही कबीर साधु वेश से रहित घर में रहकर जीवन साधना में लीन थे।ष्
संसार में रहकर सांसारिकता के अवगुणों में न डूबना ही सहजसमाधि का मूलमंत्र कहा जा सकता है। सिद्धों के इस विचार को आगे बढ़ाते हुए कबीर ने कहा है -
साधु ! सहज समाधि भली ।
गुरु प्रताप जा दिन से जागी
दिन-दिन अधिक चली
जंह-जंह डोलों सो परिकरमा
जो कछु करौं सो सेवा
जब सोवौं तब करो दंडवत
पूजौं और न देवा
कहौं तो नाम सुनौं सो सुमिरन
खावौं पियौं सो पूजा
गिरह उजाड़ एक सम लेखौं
भाव मिटावौं दूजा

कबीर ने अपने जीवन में संयम, चिंतन, मनन एवं साधना को अपनाया। उन्होंने सदैव भक्ति का सहज मार्ग ही सुझाया। यह वही सहज मार्ग था जो सिद्धों-नाथों के बाद आडम्बरों की भीड़ में लगभग खो गया था किंतु कबीर ने उसे पुनर्स्थापित किया तथा शांति एवं धैर्यवान जीवन जीने का रास्ता दिखाया।
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(सागर दिनकर, 23.06.2021)
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Tuesday, June 22, 2021

पुस्तक समीक्षा | स्त्री-अतीत की गौरव गाथा: ब्रह्मवादिनी | समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह | आचरण में प्रकाशित

मित्रो, प्रस्तुत है आज 22.06.2021 को #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई कवयित्री डॉ. सरोज गुप्ता के काव्य संग्रह "ब्रह्मवादिनी" की  पुस्तक समीक्षा...
आभार दैनिक "आचरण" 🙏
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पुस्तक समीक्षा
स्त्री-अतीत की गौरव गाथा: ब्रह्मवादिनी 
समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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काव्य संग्रह - ब्रह्मवादिनी
कवयित्री - डाॅ. सरोज गुप्ता
प्रकाशक - जे.टी.एस. पब्लिकेशन्स, वी-508, गली नं. 17, विजय पार्क, दिल्ली-110053
मूल्य - रुपए 595/-
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प्राचीन भारतीय संस्कृति में स्त्रियों को समाज में जो उच्चस्थान दिया गया था उसका वर्तमान संदर्भ में अनुमान लगाना कठिन है। विशेष रूप से भारतीय इतिहास में जो आक्रांताओं का युग आया उसने स्त्रियों की गौरवशाली स्थिति को पददलित कर दिया। वेदों में नारी को अत्यंत महत्वपूर्ण, गरिमामय, उच्च स्थान प्रदान किया गया है। वेदों में स्त्रियों की शिक्षा-दीक्षा, शील, गुण, कर्तव्य, अधिकार और सामाजिक भूमिका का! सुन्दर वर्णन पाया जाता है। वेदों में स्त्री यज्ञीय है अर्थात् यज्ञ समान पूजनीय, वेदों में नारी को ज्ञान देने वाली, सुख, समृद्धि लाने वाली, विशेष तेज वाली, देवी, विदुषी, सरस्वती, इन्द्राणी, उषा आदि अनेक आदर सूचक नाम दिए गए हैं। वेदों में स्त्रियों पर किसी प्रकार का प्रतिबन्ध नहीं है। उसे सदा विजयिनी कहा गया है। उनके हर काम में सहयोग और प्रोत्साहन की बात कही गई है। वैदिक काल में नारी पठन-पाठन से लेकर युद्धक्षेत्र में भी जाती थी। जैसे रानी कैकयी महाराज दशरथ के साथ युद्ध में गई थी। कन्या को अपना पति स्वयं चुनने का अधिकार था। अनेक ऋषिकाएं वेद मंत्रों की द्रष्टा थीं- अपाला, घोषा, सरस्वती, सर्पराज्ञी, सूर्या, सावित्री, अदिति-दाक्षायनी, लोपामुद्रा, विश्ववारा, आत्रेयी आदि। अतीत की इसी गौरवशाली परम्परा को काव्य रूप में प्रस्तुत किया है कवयित्री डाॅ. सरोज गुप्ता ने अपने काव्य संग्रह ‘‘ब्रह्मवादिनी’’ के रूप में। यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण संग्रह है। इसमें उन स्त्रियों के बारे में काव्यात्मक जानकारी दी गई है जो अपने ज्ञान एवं कौशल के कारण ब्रह्मवादिनी ऋषिकाएं कहलाईं।


‘‘ब्रह्मवादिनी’’ काव्य संग्रह में इस संग्रह के अवतरण की भी एक समृद्ध परम्परा देखी जा सकती है। संग्रह की ‘‘पुरोचना’’ में आचार्य पं. दुर्गाचरण शुक्ल ने इस काव्य संग्रह की मूल कथाओं के संदर्भ को स्पष्ट करते हुए मानो गुरु-शिष्य परम्परा की एक नई प्रस्तावना लिखी है। वे लिखते हैं कि ‘‘ब्रह्मवादिनी दृष्टमंत्रभाष्य के प्रणयन के समय मन में यह प्रबल आकांक्षा उत्पन्न हुई थी कि इस ग्रंथ को आज की प्रगतिशील नई पीढ़ी की महिलाएं पढ़ें, समझें, तो ही मैं अपने को कृत कार्य मानूंगा। ग्रंथ लेखन की ये चाह आज पूरी हो रही है। मेरी कनिष्ठा शिष्या डाॅ. सरोज ने मेरे इस ग्रंथ को पढ़ा है, गुना है। यही नहीं ब्रह्मवादिनियों के दिव्य विचारों ने चित्त पर जो प्रभाव डाला है, उसे मुक्त रूप से कविता में अभिव्यंजित किया है।’’ अर्थात् इस काव्य संग्रह में गुरु के ज्ञान को आधार बना कर उनकी गुणी शिष्या ने काव्यात्मक संरचना बुनी है। वर्तमान समय में यह अपने आप में एक सुंदर अनूठा उदाहरण है कि गुरु-शिष्य परम्परा इस प्रकार भी निभाई जा सकती है। इसीलिए संस्कृतिविद डाॅ. श्याम सुंदर दुबे ने इसे ‘‘एक महनीय कृति’’ कहा है।

      ‘‘ब्रह्मवादिनी’’ में लोपामुद्रा, रोमशा, विश्ववारा आत्रेयी, अपाला अत्रिसुता, शश्वती, नद्यः ऋषिका, यमी वैवश्वती, वसुक्रपत्नी, काक्षीवती घोषा, अगस्त्यस्वसा, दाक्षयणी अदितिः, सूर्या सावित्री, उर्वशी, दक्षिणा प्राजापत्या, सरमा देवशुनी, जुहूः ब्रह्मजाया, वाग आम्भृणी, रात्रि भारद्वाजी, गोधा, इंद्राणी, श्रद्धा कामायनी, देवजामयःइंद्रमातरः, पौलोमी शची, सार्पराज्ञी, निषद उपनिषद, लाक्षा, मेधा तथा श्री नामक ऋषिकाओं का सुंदर विवरण दिया गया है। वस्तुतः काव्य संग्रह में संग्रहीत प्रत्येक कविता ब्रह्मवादिनियों  से साक्षात्कार कराती है। ऋषिका लोपामुद्रा के व्यक्तित्व वैभव को लक्षित करते हुए कवयित्री भावपूर्ण शब्दों में लिखती है-
यज्ञ पूजन करते-करते मन की आंखों ने
अगस्त्य प्रिया लोपामुद्रा का दर्शन किया।
हम सबकी आराध्या, पूजनीया, प्रातः स्मरणीय
भारतीय वैदिक नारी की अलौकिक छवि लिए
असाधारण व्यक्तित्व की धनी, तेजस्वी मनस्वी
निजत्व का लोप करने वाली अनुपम सृजन शक्ति
आलापन में गुरु महर्षि दुर्वासा से दीक्षित
श्रीविद्या को साधने वाली, पराशक्ति स्वयंसिद्धा
विश्वासमयी ऋषिका लोपामुद्रा का दर्शन किया।

‘‘नद्यः ऋषिका’’ कविता में इस तथ्य का पता चलता है कि जलप्रवाहिनी नदियों को भी ऋषिका स्वरूप माना जाता था तथा ज्ञान का प्रवाह बनाए रखने वाली ऋषिका को नदी की भांति प्रवाहमान माना जाता था। इस कविता की यह पंक्तियां देखिए जिनमें नद्यः ऋषिका उद्घोष करती है -
मैं नदी हूं
द्युलोक अंतरिक्ष से धरती तक
प्राणशिराओं को अपने में समेटे
लहरों, धाराओं से वत्सलता छलकाती
अनन्त करुणा सहेजे, अहर्निश बह रही हूं
मैं नदी हूं।

इसी संग्रह में ऋषिका सरमा देवशुनी का काव्यात्म विवरण प्रस्तुत किया गया है जिसमें ऋषिका सरमा देवशुनी के अस्तित्व की विशेषताएं बड़े सुंदर ढंग से बताई गई हैं। ये पंक्तियां परिचयात्मक होते हुए भी प्रवाहपूर्ण एवं लयात्मक हैं-
सरमा देवशुनी साक्षात् वाक रूपा दिव्यप्रकायामयी
सूर्यरश्मि, ज्ञान शक्ति खोजती अमरत्व की देवी।
पणि मेघों ने असुर रूप में, प्रकाश किया आच्छादित
वाक् सरस्वती वृहस्पति की गौएं, मेघपणियों ने कर ली लुप्त
इन्द्र लोक में अंधकार से मच गई खलबली
अंधकार ही अंधकार से सर्वत्र आसुरी वृत्ति बढ़ी
श्यामल मेघों के पीछे बाधाएं हरती
सरमा देवशुनी दिवयप्रकाशमयी।

कवयित्री डाॅ. सरोज गुप्ता की संस्कृतनिष्ठ भाषाई पकड़ ने इस संग्रह की कविताओं को अर्थवान बना दिया है। भाषाई सौष्ठव का आनंद लेने वाले पाठकों के लिए यह काव्य संग्रह पूर्ण उपादेय है। संग्रह की कविता ‘‘ऋषिका रात्रि भारद्वाजी’’ में शब्दों का चयन विशेष आकर्षित करता है-
देदीप्यमान, प्रकाशवती विश्वाःश्रियाः
सृष्टि के मूल की रात्रिरूप महाबीज
विशिष्ट नक्षत्र, रूपनेत्रों से सब ओर झांकती
तमरूप ओजस्वी ओढ़ती सारी चमक
जीवरात्रि, ईशरात्रि, महाप्रलयकालरात्रि
सृष्टि की अव्यक्तशक्ति
ब्रह्ममयी एकार्णव चितशक्ति
ऋषिका रात्रि भारद्वाजी।

यह काव्य संग्रह स्त्री-अतीत की गौरवमयी गाथा कहता हुआ भारतीय संस्कृति और उसमें स्त्री के स्थान को समझने का प्रबल आग्रह करता है। गहरे सामाजिक सरोकारों के साथ ऋषिकाओं के जीवन को बड़े प्रभावी ढंग से और सुंदर शब्दों में व्यक्त किया गया है। इसीलिए इस संग्रह की कविताओं में भी प्राचीन वैदिक काव्य की ध्वन्यांत्मकता स्पष्ट अनुभव की जा सकती है। कवयित्री डाॅ. सरोज गुप्ता ने अपने मन के भावों को कागज पर उकेरते हुए जो अंतः सलिला प्रवाहित की है वह पठनीय एवं संग्रहणीय है। यह काव्यसंग्रह स्वतः ही पाठकों की बुकशेल्फ में जगह बनाने सक्षम है। भारतीय स्त्री के गौरवमयी अतीत में रुचि रखने वाले पाठकों द्वारा इसे अवश्य पढ़ा जाना चाहिए। 
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Saturday, June 19, 2021

श्री माधवराव सप्रे जन्मदिवस 2021

 आज 19.06.2021 को श्री माधव राव सप्रे जी की जन्मभूमि पथरिया में कोविड प्रोटोकॉल का पालन करते हुए सप्रे जी की जयंती मनाई गई। समारोह में अतिथि के रूप में मैं भी शामिल हुई। इस अवसर पर केंद्रीय संस्कृति पर्यटन राज्य मंत्री श्री प्रहलाद सिंह पटेल, माधव राव सप्रे संग्रहालय भोपाल के संस्थापक- संयोजक श्री विजयदत्त श्रीधर, हिन्दी के विद्वान श्री श्याम सुंदर दुबे, वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल, व्यंग्यकार डॉ सुरेश आचार्य तथा इतिहासविद डॉ श्याम मनोहर पचौरी सहित अनेक विद्वान उपस्थित रहे। 
पल भर को मास्क बिना एक तस्वीर ले ली... कहीं अपना चेहरा ही न भूल जाऊं ...उस दौरान मेरे आस-पास कोई नहीं था, यक़ीन रखें!

Wednesday, June 16, 2021

चर्चा प्लस | एक गंभीर कार्य है स्त्री-अध्ययन | डाॅ शरद सिंह

चर्चा प्लस
एक गंभीर कार्य है स्त्री-अध्ययन
 - डाॅ शरद सिंह
            सामाजिक अध्ययन के अंतर्गत स्त्री-अध्ययन अर्थात् वीमेन स्टडीज़ सबसे रोचक विषय माना जाता है। अनेक विश्वविद्यालयों में स्त्री-अध्ययन केन्द्र संचालित हैं। इन केन्द्रों में स्त्री जीवन से जुड़ी समस्याओं एवं संभावनाओं का विश्लेषण तथा आकलन किया जाता है। इसलिए ज़रूरी हो जाता है कि ऐसा महत्वपूर्ण कार्य पुराने कार्यों की ‘‘काॅपी-पेस्ट’’ बन कर न रह जाए जैसा कि अन्य मानविकी विषयों में देखने को मिलता है। इस विषय की गंभीरता एक ईमानदार और गंभीर शोध की मांग करती है।
 
 आज देश भर में लगभग 150 से अधिक स्त्री अध्ययन केंद्र संचालित हैं। 12वीं पंचवर्षीय योजना (2012-17) के समय यूजीसी के द्वारा बहुत से महिला अध्ययन केंद्र खोले गए थे। भारत में महिला-विमर्श 19वीं सदी से शुरू हुआ, जब धर्मिक-सामाजिक सुधर आंदोलनों में दलितों, पिछड़ों और महिला उत्थान को केंद्रित किया गया। भारत में  औपनिवेशिक और उत्तर-औपनिवेशिक काल के महिला आंदोलनों से स्त्री-विमर्श बाहर आया। और स्त्री की असमानता, असुरक्षा, यौन उत्पीड़न, पिछड़ापन, अशिक्षा, सामाजिक विभेद इत्यादि पर अध्ययन होने लगे। 1970 के दशक में महिला अध्ययन एक बौद्धिक खोज और संस्थागत कार्य के तौर पर उभरा। इस प्रक्रिया के दौरान इस विषय की पूर्व अवधारणाओं, उपकरण (टूल), तकनीक और पद्धतियों पर सवाल खड़े किए गए, नयी दृष्टि से शोध् किए गए। सन् 1974 में सरकार द्वारा गठित सीएसडब्ल्यूआइ (कमेटी आॅन स्टेटस आॅफ वीमेन इन इंडिया) की रिपोर्ट ‘‘टुवर्ड्स इक्वेलिटी’’ प्रकाशित हुई तो स्त्रियों की बदहाली-अशिक्षा, कुपोषण, भू्रण हत्या, बाल विवाह, बेरोजगारी, यौन शोषण, असमान मजदूरी, गरीबी जैसे सवाल पूरे देश में गूंजने लगे। सरकार ने भी यह महसूस किया कि गरीब ग्रामीण महिलाओं को इस स्थिति से उबारना चाहिए। इसका परिणाम 1974 में महिला अध्ययन शोध् इकाइयों की स्थापना के रूप में आया। पहला महिला अध्ययन केंद्र मुंबई के एसएनडीटी महिला विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग में खुला जिसकी डायरेक्टर नीरा देसाई थीं। इस प्रकार स्त्रियाँ ‘शिक्षा प्राप्त करने की पात्र’ से ‘शोध एवं अध्ययन’ की नयी विषयवस्तु बनीं। महिला अध्ययन केंद्र इस प्रकार रूपांतरण के माध्यम बने जो न केवल राज्यनीति बल्कि महिलाओं के अपने विषय में सोच को भी परिवर्तित करें। सन् 1987 से महिला अध्ययन केंद्रों की स्थापना 9 चुनिंदा विश्वविद्यालयों में शिक्षण, शोध और प्रसार की दृष्टि से की जाने लगी। 1986 की नयी शिक्षा नीति में यूजीसी ने भारतीय विश्वविद्यालयों में स्त्री अध्ययन केंद्रों के विकास की गाइडलाइन्स दी थी।
   जहंा तक स्त्री विमर्श का प्रश्न है तो स्त्री विमर्श, स्त्री मुक्ति, नारीवादी आंदोलन आदि - इन सभी के मूल में एक ही चिन्तन दृष्टिगत होता है, स्त्री के अस्तित्व को उसके मौलिक रूप में स्थापित करना। स्त्री विमर्श को लेकर कभी-कभी यह भ्रम उत्पन्न हो जाता है कि इसमें पुरुष को पीछे छोड़ कर उससे आगे निकल जाने का प्रयास है किन्तु ‘विमर्श’ तो चिन्तन का ही एक रूप है जिसके अंतर्गत किसी भी विषय की गहन पड़ताल कर के उसकी अच्छाई और बुराई दोनों पक्ष उजागर किए जाते हैं जिससे विचारों को सही रूप ग्रहण करने में सुविधा हो सके। स्त्री विमर्श के अंतर्गत  भी यही सब हो रहा है। समाज में स्त्री के स्थान पर चिन्तन, स्त्री के अधिकारों पर चिन्तन, स्त्री की आर्थिक अवस्थाओं पर चिन्तन तथा स्त्री की मानसिक एवं शारीरिक अवस्थाओं पर चिन्तन - इन तमाम चिन्तनों के द्वारा पुरुष के समकक्ष स्त्री को उसकी सम्पूर्ण गरिमा के साथ स्थायित्व प्रदान करने का विचार ही स्त्री विमर्श है।
सदियों से भारत में सती प्रथा, पर्दा प्रथा, दहेज प्रथा, अधिकार विहीनिता, रूढ़िवादिता को समाज का अंग पाया गया। परन्तु 19वीं शताब्दी में पश्चिमी शिक्षा के आगमन से संस्कृतियों में टकराव हुआ। फलस्वरूप महिला अधिकारों की बात की जाने लगी। लोग परम्परागत ढांचे से बाहर निकलकर सोचने लगे, महिलाओं की शिक्षा को बढ़ावा दिया जाने लगा। 1917, 1926 और 1927 में क्रमशः भारतीय महिला संघ, भारतीय महिला परिषद व अखिल भारतीय महिला सम्मेलन की स्थापना हुई तथा स्वतन्त्रता के बाद महिलाओं के विरुद्ध हिंसा के मुद्दों पर विचार किया गया। भारत में राष्ट्रीय स्तर पर मानवाधिकारों को लागू करने के लिए 1950 में संवैधानिक उपाय किये गए। इससे पूर्व सन् 1930 तथा 1944 में स्त्रियों को समाज में समान अधिकार दिए जाने की मांग की गई थी। सन् 1944 में इस संबंध में एक मसौदा भी तैयार किया गया था।
महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा व भारतीय स्त्री अध्यंयन संघ के संयुक्त तत्वावधान में स्त्री अध्ययन के 13 वें राष्ट्रीय सम्मे्लन के अंतर्गत पांच दिवसीय सम्मेलन में ‘‘हाशिएकरण का प्रतिरोध, वर्चस्व को चुनौती: जेंडर राजनीति की पुनर्दृष्टि’’ पर गंभीर विमर्श करने के लिए गांधीजी की कर्मभूमि वर्धा में देशभर के 650 स्त्री अध्ययन अध्येताओं का सम्मेलन हुआ था। इससे पहले 11वां अधिवेशन गोवा में और 12 वां लखनऊ में आयोजित किया गया था। इस पांच दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन में अधिवेशन पूर्व कार्यशाला में देशभर के 60 से अधिक विश्वमविद्यालयों के लगभग 250 विद्यार्थियों ने भाग लिया था। स्त्री अध्ययन के विद्यार्थियों ने पहले सत्र के दौरान ‘‘स्त्री अध्ययन: शिक्षा शास्त्र और पाठ्यक्रम’’ पर विमर्श करते हुए कहा था कि - ‘‘स्त्री अध्ययन महिला मुक्ति आंदोलन के परिणामस्वरूप निकला हुआ एक विषय है, जबकि स्त्री अध्ययन को लेकर केंद्रों, विभागों और स्नातकोत्तर व उच्च  शिक्षा के स्तर पर बहुत सारे संघर्ष हुए हैं और किए जाने हैं।’’ विद्यार्थियों ने स्त्री अध्ययन के मुख्य अनुशासन के अभ्यासों और उससे पड़ने वाले प्रभावों के अनुभवों को साझा किया। शोधार्थियों ने विशेषकर इस विषय को पढ़ते समय परिवार द्वारा मिलनेवाली चुनौतियों को भी बताया कि किस तरह जब वह अपने विषय के तत्वों पर परिवार और समाज में बात करते हैं तो लोग उनका विरोध करते हैं। कुछ विद्यार्थियों ने यह अनुभव किया है कि यह मात्र समानता का सवाल नहीं है परंतु यह मानव की तरह व्यवहार किए जाने का सवाल है। द्वितीय सत्र के दौरान ‘‘स्त्री अध्युयन: अनुभव और सरोकार’’ विषय पर चर्चा की गई थी।
अटल बिहारी वाजपेयी हिंदी विश्वविद्यालय, भोपाल ने भी महिलाओें के उत्थान एवं जागरूकता की दृष्टि से जाबाला महिला अध्ययन केन्द्र की स्थापना हेतु कुछ महत्वपूर्ण उद्देश्य निर्धारित किए। जैसे - परिवार व्यवस्था में महिला की भूमिका का अध्ययन करना, व्यापक सामाजिक जीवन में महिला की स्थिति एवं भूमिका का आकलन करना, भारतीय संस्कृति के संदर्भ में स्त्रीपुरुष सहअस्तित्व की संकल्पना को पुनस्र्थापित करना, समतामूलक समाज की पुनस्र्थापना के मध्य स्त्री की एक मानव के रूप में पहचान करना, स्त्री अपराध-मुक्त समाज की संकल्पना पर शोध करना, स्त्री सशक्तीकरण के मार्ग में आने वाले अवरोधों की पहचान कर उनके समाधानमूलक उपायों पर विचार करना, स्त्री क्रियाशीलता के प्रस्थान बिंदुओं की पहचान के साथ, राष्ट्र निर्माण में स्त्री की भूमिका को सुनिश्चित करना, महिला संबंधी भारतीय दृष्टिकोण या अवधारणा का अध्ययन तथा वैश्विक दृष्टिकोण की समीक्षा करना, वर्तमान समय में युवा महिलाओं के समक्ष आने वाली विभिन्न चुनौतियों (पारिवारिक, व्यावसायिक, सामाजिक) एवं समाधानों का अध्ययन करना तथा लिंगीय (जेण्डर) संवेदनशीलता पर अध्ययन एवं शोध आयोजित करना। इस केन्द्र का लक्ष्य भारत से बाहर गए सभी भाषा-भाषी समूहों का व्यावसायिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और शैक्षणिक अन्तर-अनुशासनिक अध्ययन है।
अकसर यह देखने में आता है कि विश्वविद्यालयीन शोधकर्ता ज़मीनीतौर पर परिश्रम करने के बजाए सरकारी और गैरसरकारी अंाकड़ों को आधार बना लेते हैं। जबकि कई बार ज़मीनी सच्चाई आंकड़ों से परे होती है। स्त्री-अध्ययन एक महत्वपूर्ण विषय है। यह विषय समाज की आधी आबादी की दशा और दिशा को तय करता है। आंकड़ों को खंगालने में कोई बुराई नहीं है किन्तु यह भी देखा जाना चाहिए कि किसी एक मुद्दे पर किसी एनजिओ और सरकारी आंकड़ों में अन्तर तो नहीं है? यदि अंतर है तो क्यों है? और यदि अंतर नहीं है तो क्यों नहीं है? इन दोनों पक्षों का स्वयं सत्यापन करना बेेहद जरूरी होता है। स्त्री-अध्ययन के समय यदि ज़मीनी सच्चाई को ध्यान में रख कर शोध कार्य किया जाए तो एक ऐसी यथार्थपरक तस्वीर सामने आएगी जो भारतीय स्त्रियों के अधिकारों एवं सुखद भविष्य को सुनिश्चित कर सकती है। आखिर एक गंभीर कार्य है स्त्री अध्ययन।    
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(सागर दिनकर,16.06.2021)
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Tuesday, June 15, 2021

पुस्तक समीक्षा | भावनाओं की सुंदर प्रस्तुति है ‘‘शब्दों की निर्झरिणी’’ में | समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह | आचरण में प्रकाशित

साथियों, प्रस्तुत है आज 15.06.2021 को "आचरण" में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई युवा कवयित्री जयंती सिंह लोधी के काव्य संग्रह "शब्दों की निर्झरिणी’’ की पुस्तक समीक्षा ... 
आभार दैनिक "आचरण" 🙏
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पुस्तक समीक्षा
भावनाओं की सुंदर प्रस्तुति है ‘‘शब्दों की निर्झरिणी’’ में
समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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पुस्तक  - शब्दों की निर्झरिणी (काव्य संग्रह)
कवयित्री - जयंती सिंह लोधी
प्रकाशक - रंगमंच प्रकाशन
मूल्य    - 250/-
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कहा जाता है कि जहां शब्द ठहरते हैं वहीं से काव्य गतिमान हो जाता है। वस्तुतः शब्द भावानाओं का आधार बना कर काव्य को अभिव्यक्त करते हैं। जहां शब्द किसी निर्झरणी के समान प्रवाहमान हों वहां भावनाओं की अनेकानेक लहरें उठना स्वाभाविक हैं। सागर शहर की युवा कवयित्री जयंती सिंह लोधी एक संभावनाशील कवयित्री हैं। वे अपने शब्दों से काव्य में वह सब कुछ पिरो देने को कटिबद्ध दिखाई देती हैं जो उनके अनुभव से गुज़रता है, चाहे वह अनुभव प्रकृति के सौंदर्य, सामाजिक व्यवस्था, राजनीतिक अव्यवस्था, अथवा अंतर्मन की भावनाएं हों। उनका काव्य संग्रह ‘‘शब्दों की निर्झरणी’’ भावनाओं की गतिशीलता और गहराई को एक साथ प्रस्तुत करता है। संग्रह की भूमिका में टिप्पणी करते हुए प्रो. आनंद प्रकाश त्रिपाठी ने लिखा है कि ‘‘काव्य की संप्रेषणीयता, भावों की कुशल अभिव्यक्ति, भाषा की सहजता, सरलता और सौंदर्य, छंदों का वैविध्य, विचारों का खुलापन, नए जमाने की सोच, गलत का विरोध आदि सब कुछ है, इस संग्रह की कविताओं में।’’
जयंती लोधी की प्रकृति संबंधी कविताओं में छायावादी प्रकृति वर्णन की आभा दिखाई देती है। वे प्रकृति का मानवीकरण करती हुई मनोभाव व्यक्त करती हैं। जैसे ‘‘निर्झरिणी’’ शीर्षक उनकी कविता की पंक्तियां देखिए-
उन्मुक्त धार नदी की
सुंदर मन भावनी
धवल धार बहती कल कल
निर्झरिणी पथ गामिनी

डगर डगर पर है मुश्किल
पर हार नहीं यह मानती
दृढ़ संकल्प और श्रम से
पर्वत को भी लांघती

कवियत्री जहां एक और प्रकृति की कोमलता एवं  सजीवता से  तादात्म्य  में स्थापित करती है, वही मां के प्रति उनकी काव्य दृष्टि बड़े ही समर्पित भाव से ममत्व की सुंदर व्याख्या करती है। वह मां की गोद में जन्नत मानती हैं तथा मां का सुख सागर के समान कहती हैं। मां का आशीष उन्हें प्रकाश के समान देदीप्यमान प्रतीत होता है। उनकी मां शीर्षक यह रचना देखिए-
 मां की गोद में जन्नत है
 मां सुख का सागर है
 मां ममता की शीतल छांव
 मां से रोशन सारा घर है
 जीवन दात्रि और निर्मात्री
 बच्चों पर न्योछावर है
 त्याग पूर्ण है मां का जीवन
 मां ईश्वर से बढ़कर है

मां का वर्णन करते समय पिता के अस्तित्व को भूलती नहीं है। एक उत्तम पारिवारिक जीवन में पिता की उपस्थिति एक अलग ही सुख का बोध कराती है। ‘‘पिता’’ शीर्षक से उनकी यह काव्य पंक्तियां विचारणीय है-
 पिता हमारे जीवन दाता
 पिता से अपनी है पहचान
 पिता के उत्तम कर्तव्यों से
सुख पाती है हर संतान
 उनकी त्याग तपस्या देखो
 सख्त नारियल का व्यवहार
बच्चों को जीत दिलाने हेतु
 स्वयं हार करते स्वीकार

 माता-पिता के साथ ही परिवार एवं समाज में बेटियों का विशेष महत्व होता है। यह बात और है कि वर्तमान स्थितियां बेटियों के अनुकूल नहीं हैं। आज भी देश के अनेक परिवारों में बेटियों को जन्म लेने से पूर्व ही मार दिया जाता है। जबकि बेटियां घर परिवार में खुशी लेकर आती है वह अन्नपूर्णा के समान घर को संपन्नता से पूर्ण करती हैं तथा दो परिवारों, दो कुल का मान बढाती हैं। जयंती सिंह लोधी ने अपनी कविता ‘‘बेटी’’ में बेटी की महत्ता को प्रस्तुत किया है-
        जीवन में खुशियां लेकर आ जाती है बेटियां
        चंपा जूही चमेली जैसी खिल जाती हैं बेटियां
        बेटी बनकर सुख देती बहु बन वंश  बढ़ाती है
        अन्नपूर्णा घर की लक्ष्मी दो  कुल का मान कहाती  है      
        कोख में बेटी मत मारो इसको जीवनदान दो
        इनकी पूजा बहके करो न, पर जीने का अनुदान दो

बेटियों के अस्तित्व को संकट में देखते हुए जयंती सिंह लोधी तटस्थ नहीं रह पाती हैं और वे बेटियों को बचाने और उन्हें सम्मान देने का आह्वान करती हैं -
       कहीं राधा, कहीं गीता, कहीं मुस्कान ख़तरे में
       किसी की कोख ख़तरे में, किसी की जान ख़तरे में
       हमारी बेटियां देखो, वतन की शान होती हैं
       मगर इनका जमाने में रहा सम्मान ख़तरे में

“मैं नारी हूं” शीर्षक कविता स्त्री के अस्तित्व और समाज में स्त्री की स्थिति को बखूबी वर्णित करती है। कवयित्री स्वयं एक स्त्री होने के नाते इस मर्म को गहराई से समझती है, विश्लेषित करती है और तब अपने काव्य में पिरोती है, यह तथ्य कविता की प्रत्येक पंक्ति में मुखर होता है। कविता की पंक्तियां देखिए-
 मैं विधाता की
 सर्वश्रेष्ठ कृति हूं
 सृजना हूं, प्रकृति हूं
 मुझ में समाया है संसार
 मुझ से रोशन है घर द्वार
 हिम्मत कभी न हारी हूं
 हां मैं नारी हूं।
 हजारों बंदिशें  मुझ पर
 हैवान भेड़ियों की पैनी नजर
 मेरा वजूद मिटाने को आतुर
 फिर भी जीने की अधिकारी हूं
 हां मैं नारी हूं

भारतीय संस्कृति में कृष्ण कथा का स्थान सर्वोच्च है अधिकांश कवि राधा और कृष्ण के चरित्र को, उनके  वर्णन को  अपनी कविताओं में रोते हैं और राधा कृष्ण के शाश्वत प्रेम का उदाहरण देते हैं।  राधा कृष्ण का प्रेम वस्तुतः प्रेम भावना का सौंदर्यत्मक रूप प्रस्तुत करता है।  एक ऐसा सौंदर्य जिसमें परस्पर समर्पण की भावना है विश्वास है और भक्ति भी है जयंती लोधी अपनी  रचना में ”राधिका” शीर्षक  रचना में राधा और कृष्ण की परस्पर पूरक था को बड़े ही सुंदर ढंग से प्रस्तुत करती है। यह पंक्तियां देखिए-
 राधिका बिना श्याम आधे अधूरे हैं
 दोनों संग संग हैं प्रीत पुरजोर है

राधा-कृष्ण की भावभूमि पर एक अन्य कविता का अंश देखिए जिसमें कवयित्री ने राधा की मनोदशा का सुंदर चित्रण किया है-
यह मैं हिलोर है पंछियों का शोर है
हाथों में हाथ लिए मेरा चितचोर है
मुरली बाज रही कंगना भी बाज रहे
मेरा मन मोहना नंदकिशोर है

अपनी लेखनी के प्रति कवयित्री जयंती लोधी के भीतर एक सहज भाव है जिसे उनकी कविताओं में स्पष्ट रूप से अनुभव किया जा सकता है। अपने काव्य सृजन के बारे में वे कहती हैं-
अनोखी है, अलबेली है
ये लेखनी मेरी सहेली है
मेरे मन के मधुमन में
जब खुशियों के फूल खिले
तब तब महकी मेरी लेखनी
अरमानों के पंख मिले

जयंती सिंह लोधी के काव्य का एक सुखद पक्ष यह भी है कि वे अपने आशावादी विचारों को प्रभावी ढंग से सामने रखती हैं और सुखद, उज्ज्वल भविष्य के प्रति आशान्वित दिखाई देती हैं-
निराशा के कुहासें में, उजाला हम भी लाएंगे
चलो अब बादलों के पार नया सूरज उगाएंगे
हिमालय की ऊंचाई से  हमारे  हौसले देखों
सुनहरे ख़्वाब की कूची से नई किरणें बनाएंगे
खुशी का रंग ले कर संग, सपनों को उकेरेंगे
इरादों की  उड़ानों से  सफर  आसां बनाएंगे

कवयित्री जयंती सिंह लोधी के इस काव्य संग्रह ‘‘शब्दों की निर्झरणी’’ में संग्रहीत कविताओं, गीतों, ग़ज़लों, दोहों एवं छंदमुक्त रचनाओं का भावपक्ष प्रबल है, यद्यपि उन्हें अपने काव्य के कलापक्ष को निखारने की अभी और आवश्यकता है। भावनाओं के उद्घाटन पर नियंत्रण रखते हुए काव्यशिल्प को साधना सतत सजगता और अभ्यास की मांग करता है जोकि इस संग्रह की कविताओं को देखते हुए कहा जा सकता है कि कवयित्री में काव्यशिल्प को साधने की भी क्षमता है, बस, जरूरत है काव्यविधान को ध्यान में रखने की। सारांशतः कहा जाए तो, ‘‘शब्दों की निर्झरणी’’ भावसिक्त कर देने वाला एक पठनीय संग्रह है और यह कवयित्री की काव्य साधना के प्रति आश्वस्त करता है।
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