Wednesday, September 29, 2021

चर्चा प्लस | 29 सितम्बर, विश्व हृदय दिवस कहता है - दिल धड़कने दो ! | डाॅ शरद सिंह

चर्चा प्लस 

29 सितम्बर, विश्व हृदय दिवस कहता है - दिल धड़कने दो !
    - डाॅ. शरद सिंह                                                                          ‘‘दिन लेना-दिल देना’’ जैसे रूमानीयत भरी बातें तो अकसर सुनने को मिलती रहती हैं लेकिन अगर दिल ही ख़तरे में पड़ जाए तो क्या होगा? जी हां, हर साल 17 मिलियन से अधिक लोग हृदय रोग से मर जाते हैं। इससे लड़ने के लिए ग्लोबल कम्युनिटी वल्र्ड हार्ट फेडरेशन ने ‘‘वल्र्ड हार्ट डे’’ यानी विश्व हदय दिवस मनाना तय किया। यह हर साल 29 सितंबर को आयोजित होने वाला एक ऐसा दिवस है जो दिल की बीमारियों से बचने की ओर ध्यान दिलाता है। 


‘‘दिल दा मामला है’’, ‘‘दिल देना, दिल लेना ये सौदा खरा-खरा’’, ‘‘हाय मेरा दिन चुरा के ले गया चुराने वाला’’ आदि-आदि न जाने कितने फिल्मी गाने दिल को ले कर गाए जाते रहे हैं। लेकिन ये दिल असली ख़तरे में पड़ जाता है अगर इसे कोई बीमारी हो जाए। इश्क़ की बीमारी नहीं सीवीडी यानी कार्डियोवस्कुलर डिसीज़़ अर्थात् दिल की बीमारी। आमतौर पर दिल की बीमारी को लोग हार्ट अटैक के नाम से ही जानते हैं जबकि हार्ट अटैक हृदय से जुड़ी अन्य बीमारी की एक प्रत्यक्ष प्रतिक्रिया मात्र होती है। दिल की बीमारियां कई तरह की होती हैं। कोरोनरी धमनी रोग यानी जिसे कोरोनरी हृदय रोग कहा जाता है, हृदय रोगों में बेहद आम रोग है, हाइपरटेंसिव हृदय रोग जो उच्च रक्तचाप से ग्रस्त हृदय रोग होता है, रूमेटिक हृदय रोग जो यह बीमारी रुमैटिक फीवर से संबंधित होता है। आजकल हृदय की रक्त-धमनियों में वसा जमने से भी गंभी संकट उत्पन्न हो जाता है। हृदय रोग के प्रमुख कारण बताए जाते हैं- कोलेस्ट्रॉल बढ़ना, धूम्रपान, शराब पीना, तनाव, मोटापा, उच्च रक्तचाप और आनुवांशिकता (हेरेडिटेरी) आदि।
देखा जाए तो आज के आधुनिक लाइफस्टाइल और अनियमित आहार के कारण 30 से 40 साल की उम्र में ही लोगों को दिल के रोग होने लगे हैं। यह समस्या इतनी आम हो चुकी है की हर परिवार में कोई न कोई सदस्य ह्रदय रोग से ग्रस्त है। यही नहीं बल्कि अब तो छोटी उम्र के बच्चे भी इस बीमारी का शिकार होते जा रहे हैं। वर्तमान समय में अव्यवस्थति दिनचर्या, तनाव, गलत खान-पान, पर्यावरण प्रदूषण एवं अन्य कारणों के चलते हृदय की समस्याएं तेजी से बढ़ी हैं। छोटी उम्र से लेकर बुजर्गों तक में हृदय से जुड़ी समस्याएं होना अब आम बात हो गई है। पूरे विश्व में हृदय के प्रति जागरूकता पैदा करने और हृदय संबंधी समस्याओं से बचने के लिए विभिन्न उपायों पर प्रकाश डालने के उद्देश्य से सम्पूर्ण विश्व में हर वर्ष 29 सितंबर को ‘‘विश्व हृदय दिवस’’ मनाया जाता है। विश्व हृदय दिवस मनाने की शुरूआत सन 2000 में की गई थी। इसकी शुरूआत के समय यह तय किया गया था, कि हर साल सितंबर माह के अंतिम रविवार को विश्व हृदय दिवस मनाया जाएगा। लेकिन 2014 में इसके लिए एक तारीख निर्धारित कर दी गई, जो 29 सितंबर थी। तभी से प्रतिवर्ष 29 सितंबर के दिन विश्व हृदय दिवस मनाया जाता है।
सन् 2016 में विश्व हृदय दिवस की थीम थी ‘‘पावर योर लाईफ’’(आपके जीवन की शक्ति), 2017 में ‘‘शेयर द पावर’’ (शक्ति साझा करें), 2018 में ‘‘मई हार्ट, योर हार्ट’’ (मेरा दिल, तुम्हारा दिल), 2019 में ‘‘फाॅर माई हार्ट, फाॅर योर हार्ट, फाॅर आॅल अवर हार्ट’’ (मेरे, तुम्हारे और सबके दिलों के लिए), 2020 में ‘‘यूज़ हार्ट टू बीट कार्डियोमस्क्यूलर डिसीज़’’ (हृदय रोगों को मात देने के लिए हृदय का प्रयोग) और इस वर्ष 2021 के लिए थीम है-‘‘यूज़ हार्ट टू कनेक्ट’’ (जुड़ने के लिए दिल का प्रयोग करें)। वर्ष 2021 के मुख्य उद्देश्य तय किया गया है-‘‘ विश्व स्तर पर सीवीडी के बारे में जागरूकता, रोकथाम और प्रबंधन में सुधार के लिए डिजिटल स्वास्थ्य की शक्ति का उपयोग करना।’’
भारत सहित दुनिया के सभी देशों के आंकड़े देखें तो पता चलता है कि दिल के दौरे से हर वर्ष 1 करोड़ से भी अधिक लोगों की मौत हो जाती है, और इनमें से 50 प्रतिशत लोग अस्पताल पहुंचने से पहले ही दम तोड़ देते हैं। अतः हृदय रोग मौत की एक प्रमुख कारण बन चुका है, जिसके लिए जागरूकता होना बेहद आवश्यक है।  हृदयरोग के मरीजों की संख्या दुनियाभर में लगातार बढ़ती जा रही है। डॉक्टरों का मानना है कि कोरोना महामारी समय में दिल की बीमारी लोगों को ज्यादा नुकसान पंहुचाया है, जिसकी वजह से कोविड-19 के डर से दिल के मरीज घर में ही रहने के लिए मजबूर रहे हैं। वहीं मरीज अपने रेगुलर चेकअप के लिए भी नहीं जा पा रहे थे।
गलत खानपान, हर वक्त तनाव में रहना और समय पर एक्सरसाइज न करने की वजह से ये बीमारी अक्सर होती है। दुनियाभर में अलग-अलग संस्थाएं इस दिन लोगों को जागरूक करती हैं। अगर समय रहते हृदय से जुड़ी समस्याओं पर काबू नहीं पाया गया, तो 2030 तक हर तीसरे इंसान की मौत का प्रमुख कारण हृदय रोग ही होगा। इसके लिए जरूरी है के हृदय के प्रति कुछ सावधानियां अपनाई जाए, और उनका सख्ती से पालन किया जाए। अधिकांश मामलों में हृदय रोग का प्रमुख कारण तनाव ही होता है और मधुमेह, उच्च रक्तचाप जैसी समस्याएं भी हृदय रोगों को जन्म देती है। इन सभी बीमारियों से बचने के लिए स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान देना व सावधानी रखना अनिवार्य है। हार्ट फैलियर के कारण लीवर और गेस्ट्रोइंटेस्टनाइल सिस्टम सिकुड़ जाता है। इससे व्यक्ति को भूख नहीं लगती और हर वक्त उल्टी जैसा महसूस होता है। दिल की धड़कन तेज होना कमजोर दिल का लक्षण है। इस लक्षण को जल्द नहीं पहचाना जाए, तो कार्डियक डेथ तक हो सकती है। 35 से ज्यादा उम्र के युवाओं में भी इनएक्टिव लाइफस्टाइल और खाने की खराब आदतों के कारण दिल की बीमारी होने का खतरा बढ़ रहा है. पिछले 5 साल में दिल की समस्याओं से पीड़ित लोगों की संख्या में तेजी से इजाफा हुआ है. इनमें से अधिकांश 30-50 साल आयु वर्ग के पुरुष और महिलाएं हैं. लोगों के पास अपने शरीर और मन को स्वस्थ और शांत रखने के लिए समय ही नहीं है, जिस वजह से लोगों में कई तरह की बीमारियां देखने को मिल रही हैं. हालांकि अब अनलॉक की प्रक्रिया शुरू हो गई है, डॉक्टरों का कहना है कि अब लोगों को कम से कम आधे घंटे की एक्सरसाइज करनी चाहिए, थोड़ा बाहर घूमना चाहिए लेकिन कोविड से बचने के उपाय के साथ, वहीं नमक, चीनी और ट्रांस फैट वाली चीजें खाने से बचें. इससे दिल की बीमारी होने का खतरा कम होता है. हृदयरोग की गंभीरता को समझते हुए आपको उन आहारों को चुनना चाहिए, जो आपके दिल के साथ-साथ पूरे शरीर के लिए सही हो. फास्ट फूड, जंक फूड, सिगरेट और शराब से दूरी बनाकर रखना चाहिए.
कार्डियोलोजिस्ट बताते हें कि हार्ट की बीमारी के लिए कोई विशेष उम्र नहीं होती है, लेकिन हमारी गतिहीन यानी इनएक्टिव लाइफस्टाइल के कारण 22 साल के व्यक्ति को भी हार्ट अटैक होने लगा है। लेकिन जो लोग कम उम्र में हार्ट अटैक का सामना करते हैं, उनमें बहुत ज्यादा रिस्क फैक्टर होते हैं। इसलिए हार्ट अटैक को रोकने का सबसे अच्छा तरीका है 45 मिनट रोज एरोबिक फिजकल एक्टिविटी, ताजा फल और सब्जियों से भरपूर डाइट और धूम्रपान से बचने सहित हेल्दी लाइफस्टाइल को अपनाया जाए। जो हृदयरोग से पीड़ित हो, उसके लिए जरूरी है कि उसके पास हृदय से जुड़ी दवाइयों का स्टॉक हो। जरूरत हो तो अतिरिक्त दवाई मंगाकर रखे। लेकिन हर दवा हमेशा डॉक्टर की सलाह से और उसके निर्देशानुसार ही लें। दिल की बीमारियों से बचे रहने के लिए खानपान का ध्यान रखते हुए मौसमी फल और ताजा सब्जियां (उबली या पकी हुई), मौसमी फल और ताजा सब्जियों (उबले हुए या पकाया), होलमील रोटी या ब्रेड , सलाद, स्प्रोउट, सब्जियों का सूप, छाछ, पनीर, कम मात्रा में ताजा दूध और सीमित मात्रा में घी आदि का उपयोग किया जाना चाहिए। चीनी की जगह शहद और गुड़ का प्रयोग अच्छा होता हैं। आयुर्वेद के अनुसार आंवला दिल के लिए बहुत लाभदायक होता है। यह ताजा लिया जा सकता है या फिर संरक्षित या पाउडर के रूप में भी ले सकते हैं। यह भी माना जाता है कि एक सप्ताह में कई बार तेल की या तेल के सिर की मालिश बहुत फायदेमंद है। सप्ताह में एक बार तेल के साथ पूरे शरीर की मालिश करना भी अच्छा होता है। इससे रक्तसंचार सुचारु रूप से होता रहता है और दिल की धमनियां ठीक काम करती रहती हैं। ध्यान रहे कि एक स्वस्थ दिल ही अच्छी लम्बे समय तक बेधड़क धड़क सकता है और जब दिल धड़कता रहेगा, तभी तो लिया और दिया जा सकेगा। 
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(सागर दिनकर, 29.09.2021)
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Tuesday, September 28, 2021

ममत्व में डूबी कोमल लोरियां और बाल कविताएं | समीक्षा | समीक्षक - डॉ शरद सिंह

प्रस्तुत है आज 28.09. 2021 को #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई कवयित्री पुष्पा चिले के काव्य संग्रह "परियों की पाती" की  समीक्षा... 
आभार दैनिक "आचरण" 🙏
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पुस्तक समीक्षा
ममत्व में डूबी कोमल लोरियां और बाल कविताएं
समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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कविता संग्रह  - परियों की पाती
कवयित्री      - पुष्पा चिले
प्रकाशक      - संदर्भ प्रकाशन, जे-154, हर्षवर्द्धन नगर, भोपाल (म.प्र.)
मूल्य         - 200/-
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जसोदा हरि पालनैं झुलावै।
हलरावै, दुलरावै, जोइ-जोइ कछु गावै।।
मेरे लाल कौं आउ निंदरिया, काहैं न आनि सुवावै।
तू काहैं नहिं बेगहिं आवै, तोकौं कान्ह बुलावै।। 

कवि सूरदास की ये पंक्तियां लोरी काव्य का एक अद्वितीय उदाहरण हैं जिनमें कवि कहते हैं कि यशोदा मैया पालने में हरि को झुला रही हैं और साथ में कुछ-कुछ गाती भी जा रही हैं। वे गीत गाते हुए नींद को उलाहना दे रही हैं कि उनके लाल को नींद क्यों नहीं आ रही है? यह एक बहुत ही सुंदर ओर बहुत ही मधुर लोरी है। वस्तुतः लोरी और बाल काव्य दोनों ही बच्चों के लिए सृजित किए जाते हैं। निःसंदेह लोरी का उद्देश्य गीत गा कर बच्चे को सुलाने का होता है। जबकि समग्र बालगीत का उद्देश्य बच्चों को रोचक शब्दों में शिक्षा देना होता है। इस तरह देखा जाए तो दोनों ही तरह के काव्य के केन्द्र में बालमन होता है तथा ये कविताएं ममत्व से सराबोर होती हैं। कवयित्री पुष्पा चिले के काव्य संग्रह ‘‘परियों की पाती’’ में दोनों ही तरह का बाल काव्य मौज़ूद है। इसमें लोरियां भी हैं और बालगीत भी। पुष्पा चिले एक प्रतिभाशाली साहित्यकार हैं। उन्होंने कहानियां और उपन्यास लिखे हैं और बालगीत भी लिखे हैं। बालगीत और लोरियां लिखने की प्रेरणा उन्हें कहां से मिली इस संबंध में उन्होंने ‘‘आत्मकथ्य’’ में लिखा है कि भोपाल में उनकी भेंट ‘‘अपना बचपन’’ के संपादक महेश श्रीवास्तव से हुई और उनसे बालगीत लिखने की प्रेरणा उन्हें मिली। 
बाल साहित्य में कविताओं की बहुलता है। सूरदास जैसा महान कवि कृष्ण की बाल लीलाओं का जैसा जीवंत वर्णन करता है वह अन्यत्र दुर्लभ है। सूरदास की कविताओं में दसवें स्वतंत्र रस के रूप में वात्सल्य रस प्रकट होता है। सूर, तुलसी आदि मध्यकालीन कवि कृष्ण एवं राम के बाल स्वरूप और बाल क्रिया-कलापों का सौंदर्यात्मक रूप प्रस्तुत करते हैं। बाल-कविता के क्षेत्र में श्रीधर पाठक, विद्याभूषण विभु, द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी, सोहनलाल द्विवेदी आदि अनेक रचनाकारों की रचनाएं लोकप्रिय रही हैं। हरिवंश राय बच्चन, भवानीप्रसाद मिश्र, प्रभाकर माचवे जैसे कवियों ने भी बाल कविताएं लिखीं। 1947 से 1970 तक के समय को हिंदी बाल-कविता की ऊंचाइयों का समय या ‘‘गौरव युग’’ माना गया है।
‘बाल कविता’ यानी बच्चों के लिए लिखी गयी कविता, जिसमें बच्चों की शिक्षा, जिज्ञासा, संस्कार एवं मनोविज्ञान को ध्यान में रखकर रचना की गई हो। वह चाहे मां की लोरियों के रूप में हो या बच्चों के आपस के खेल-खेल में हो। पुष्पा चिले ने भी लोरी लिखते समय बालमनोविज्ञान के साथ ही ममत्व का भी पूरा ध्यान रखा है। इसका एक उदाहरण देखिए ‘‘सपनों की बिंदिया’’ शीर्षक लोरी गीत से-
मेरी लाड़ो की अंखियों में आ जाना
निंदिया, सपनों की बिंदिया लगा जाना।
अभी सोई है राजदुलारी
भागती रहती है सुकुमारी
तुम उसकी थकान मिटा जाना
मेरी लाड़ो की अंखियों में आ जाना।

रोते हुए बच्चों को मनाना और चुप कराना आसान काम नहीं होता है। एक रोता हुआ बच्चा पूरी तरह से हट की अवस्था में होता है। वह अपनी बात मनवा कर ही चुप होता है। वहीं बच्चा अथवा बचची यदि शैशवास्था में हो और पालने में रो रही हो तो उसे चुप कराना और भी कठिन कार्य होता है। एक मां अथवा ममत्व से परिपूर्ण कोई व्यक्ति ही उसे अपने ममतामय शब्दों से उसे चुप करा सकता है। बेशक़ वे शब्द शिशु को समझ में नहीं आते हैं लेकिन उन शब्दों से ध्वनित ममतामय भाव उसमें शांति का संचार करते हैं। एक शिशु बालिका को रोने से चुप कराने के लिए जिन मधुर शब्दों का प्रयोग किया जाना चाहिए, वे शब्द पुष्पा चिले की इन पंक्तियों में देखे जा सकते हैं-
काहे रोती लली, मेरी लाड़ली
नन्हीं कली, मेरी वारुणी।
देखो पलना में झूमर लगे हैं
तेरे रोने से वे भी डरे हैं
कैसे बज रहे लली
कैसे सज रहे लली
कैसे प्यार से तुझको निहारें कली
पर तू सुनती नहीं उनकी बात री
नन्हीं सी कली मेरी वारुणी।  

 आज बाज़ारवाद ने अपना प्रभाव इतना बढ़ा दिया है कि सपनों से भरा कोमल बचपन कहीं खोता जा रहा है। आज ‘‘प्ले स्टेशन’’ पर ‘‘वर्चुअल फाईट’’ जैसे वर्चुअल गेम्स बाल साहित्य से बच्चों को दूर करने तथा उनके मन में उग्रता भरने की ख़तरनाक भूमिका निभा रहे हैं। फिर भी साहित्यकारों ने निराशा को नहीं ओढ़ा है और बच्चों के लिए कोमल साहित्य रच रहे हैं। इसी क्रम में पुष्पा चिले की ‘‘परियों की पाती’’ को भी गिना जा सकता है। वे बालमन को कल्पनालोक में ले जाने को तत्पर हैं-
बंदर मामा ब्याह रचाएं
आए बाराती सज के
दूल्हा की टोपी लहराए
अचकन दम-दम दमके
दुल्हन का जोड़ा ले आई
दर्जिन चिड़िया सिल के
बाज रहे हैं ढोल,नगारे
और बजे मिरदंग
सारे बाराती नाचे-गाएं
और करें हुड़दंग। 

बालिकाओं का गुड़ियों से प्रेम सर्वविदित है। जिस तरह उनकी मां उन्हें संवारती हैं, सजाती हैं, ठीक उसी तरह बालिकाएं भी अपनी गुड़िया को संवारती, सजाती हैं। गुड़ियां भी नाना प्रकार की होती हैं। घरेलू कपड़ों से बनाई गई गुड़िया से ले कर आज के समय की ‘सेमीरोबो’ ‘टाॅकिंग डाॅल’’ तक। फिर भी आधुनिक बाज़ारवादी युग में बालिकाओं को सबसे अधिक आकर्षित किया ‘‘बाॅर्बी डाॅल’’ ने। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि ‘‘बाॅर्बी डाॅल’’ के डिज़ाइनरों ने इन गुड़ियाओं के साथ कल्पना की अनेक संभावनाएं भी बनाए रखीं। कहने का आशय की इन गुड़ियाओं को सजाया जा सकता है, अपने मन के कपड़े पहनाए जा सकते हैं, उनके बाल संवारे जा सकते हैं और ये सुंदर तो हैं ही। इसलिए बालिकाओं के बीच ये अत्यंत लोकप्रिय हैं। पुष्पा चिले ने भी ‘‘बाॅर्बी डाॅल’’ के प्रति एक बालिका के अनुराग को अपनी ‘‘बाॅर्बी डाॅल’’ शीर्षक कविता में बड़ी सुंदरता से पिरोया है-
जब से आई बाॅर्बी डाॅल 
अन्वी बिटिया करे कमाल
बड़े सबेरे उसे जगाती
ब्रश कराती और नहलाती
तौलिए से पोंछ उसे 
ड्रेसिंग टेबल के पास बिठाती
 
बाल साहित्य का सृजन एक चुनौती भरा काम है। वस्तुतः बाल साहित्य बच्चों की मानसिक एवं बौद्धिक क्षमताओं के अनुसार लिखा जाना चाहिए, जिससे बच्चों के मानसिक प्रशिक्षण के साथ उनके ज्ञान में भी वृद्धि हो। बच्चों की दुनिया हमारी दुनिया से सर्वथा भिन्न होती है। उनके देखने, समझने तथा परखने का ढंग हमारे ढंग से अलग होता है। इसलिए बच्चों का साहित्य लिखने के लिए बच्चा बनना पड़ता है ताकि उनके स्तर पर उतरकर उनकी भावनाओं, रुचियों तथा उनके मनोविज्ञान के साथ तारतम्य बिठा सके। जहां तक बाल साहित्य और शिक्षा के अंतर्संबंध का प्रश्न है तो बच्चों में पशु-पक्षियों एवं जलचरों के प्रति संवेदना जगाना उनकी बाल्यावस्था से ही आवश्यक है और यह संवेदना जगाने का काम घर के उदाहरणों से ही शुरु किया जा सकता है। जैसे छोटे से ‘फिशबाऊल’ में क़ैद मछली के प्रति संवेदना हो अथवा पिंजरे में क़ैद पक्षियों के प्रति संवेदना हो। इस तारम्य में संग्रह में एक बड़ी सुंदर कविता है ‘‘मछली गुहार’’ -
मछली रानी करे गुहार
सुनो बात और करो विचार
कहती, बहुत हैं कष्ट हमारे
मछली-घर हैं जेल हमारे
शोभा तुम्हारे घर की बढ़ती
हम हर पल हैं मौत से लड़तीं
जैसे पंछी उड़ें गगन में
हम तैरें नदी-समन्दर में
हम अपने संसार में खुश हैं
करते क़ैद हमें क्यों घर में।

आज टीवी और इंटरनेट के युग में जब बाल साहित्य संकट के दौर से गुज़र रहा है और मंा के स्वर में लोरी सुनने के बजाए बच्चों को ‘‘अलेक्सा’’ के स्वर में लोरी सुननी पड़ती है, हिन्दी बालगीतों का स्थान ‘‘इंग्लिश राईम्स’’ ने ले लिया है तो ऐसे कठिन समय में हिन्दी बाल साहित्य के सृजन की आवश्यकता और अधिक बढ़ गई है। यदि हिन्दी में लोरियों और बालगीतों की उपलब्धता प्रचुर मात्रा में रहेगी तो उसे पढ़ा और गाया भी जाएगा। इस दिशा में कवयित्री पुष्पा चिले ने लोरियां और बालगीत रच कर हिन्दी साहित्य को अनुपम उपहार दिया है। आशा है कि उनका यह काव्य संग्रह ‘‘परियों की पाती’’ बाल काव्य-साहित्य सृजन के लिए अन्य साहित्यकारों के लिए भी प्रेरणा स्रोत बन सकेगा।  
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Wednesday, September 22, 2021

चर्चा प्लस | बढ़ती कीमतें यानी जबरा मारे और रोेने न दे! | डाॅ शरद सिंह

चर्चा प्लस  
बढ़ती कीमतें यानी जबरा मारे और रोेने न दे!
   - डाॅ. शरद सिंह                                                                                
    डीजल-पेट्रोल के निरंतर बढ़ते दाम और
इसके कारण बढ़ती महंगाई को देख कर तो अब लगता है ‘डायन’ भी शरमा कर कहीं जा छुपी है। डीजल-पेट्रोल के दाम 100 रुपए का आंकड़ा पार कर चुके हैं और रसोई गैस 1000 रुपए को छूने की तैयारी में है। अब तो महंगाई को ‘जबरा’ कहा जाना चाहिए। क्योंकि महंगाई की जबरा मार से जनता का घरेलू बजट तेजी से बिगड़ता चला जा रहा है मगर जनता बेचारी ठीक से रो भी नहीं पा रही है।  
अब वह जमाना आ गया है कि मांएं अपने बच्चों को डरा कर चुप कराने के लिए कहेंगी-‘‘रो मत नहीं तो रातो-रात महंगाई बढ़ जाएगी।’’ या फिर यह कहा जाए कि अब जनता रोना ही भूल गई है। उसके आंसू सूख गए हैं। उसे पता है कि महंगाई सर्वशक्तिमान है, कठोर हृदय है, उसके आगे रोने से कुछ नहीं होने वाला है। जब कोई जबस्र्दस्त ताकतवर व्यक्ति किसी कमजोर को मारता-पीटता है तो यही कह कर धमकाता है-‘‘चुप-चुप! रोना नहीं। रोया तो और धुनाई कर दूंगा।’’ यही हाल अब महंगाई और आमजनता के रिश्ते का हो गया है। महंगाई की बढ़त कोई आज का ताज़ा मुद्दा नहीं है। अब तो यह बारहमासी मुद्दा बन चुका है। ज़रा याद करिए 20 फरवरी 2021 को महंगाई के मुद्दे पर बिहार के पर्यटन मंत्री नारायण प्रसाद ने विधानसभा परिसर में पत्रकारों से बात करते हुए क्या कहा था? उन्होंने महंगाई पर एक बहुत ही दिलचस्प और हैरतअंगेज़ टिप्पणी की थी कि- ‘‘महंगाई की आदत लोगों को हो जाती है, इससे आम जनता परेशान नहीं है। वैसे भी आम जनता गाड़ी से नहीं बस से चलती है, इसलिए आम लोगों को बढ़े हुए दामों से कोई परेशानी नहीं हो रही है। मंत्री नारायण प्रसाद ने कहा कि बजट आता है तो थोड़ी महंगाई होती ही है, इससे खास असर नहीं होता है और लोगों को धीरे-धीरे आदत हो जाती है। आम जनता पर इसका आंशिक असर होता है।’’
महंगाई ने हमारी स्मरण शक्ति अतनी कमजोर कर दी है कि हम बहुत जल्दी भूल जाते हैं कि महंगाई के पिछले हंगामें के दौरान क्या टीका-टिप्पणी की गई थी और दामों में कितना ईजाफ़ा हुआ था। अब महंगाई के रोज़ बढ़ते आंकड़ों को हम भला कैसे याद रख सकते हैं? यह सब याद रखने और आकलन करने के लिए शेयर मार्केट वाले, आर्थिक नीति निर्धारक और आर्थिक सलाहकार हैं न। यदि आमजनता महंगाई पर चिंतन करने लगेगी तो इन सब की ड्यूटी का क्या होगा? महंगाई से जुड़े दांव-पेंच वाले भरी-भरकम शब्दावली का क्या होगा? गर्व-सा महसूस होता है जब जीडीपी की बात होती है। जीडीपी यानी ग्रास डोमेस्टिक प्रोडक्ट अर्थात् सकल घरेलू उत्पाद अर्थव्यवस्था के आर्थिक प्रदर्शन का एक बुनियादी माप है, यह एक वर्ष में एक राष्ट्र की सीमा के भीतर सभी अंतिम माल और सेवाओं का बाजार मूल्य है। यही संक्षिप्त परिभाषा है जीडीपी। वस्तुतः इसे समझ पाना सबके बस की बात नहीं है कि इसका महंगाई से क्या ताल्लुक है? इसी तरह एक शब्द समूह है सीपीआई। सीपीआई यानी कंज्यूमर प्राईज़ इंडेक्स यानी उपभोक्ता मूल्य सूचकांक मुद्रास्फीति को निर्धारित करने के लिए एक मीट्रिक है। यह समय की अवधि में घरों द्वारा खपत आवश्यक उत्पादों और सेवाओं की कीमतों में परिवर्तन पर नजर रखने के द्वारा गणना की जाती है। उपभोक्ता मूल्य सूचकांक खुदरा स्तर पर परिवहन, भोजन, चिकित्सा देखभाल, शिक्षा, आदि जैसी वस्तुओं के एक निश्चित सेट में मुद्रास्फीति को दर्शाता है। अब सीपीआई की गणना कैसे की जाती है? तो थोक मूल्य सूचकांक की तरह, सीपीआई की भी आधार वर्ष के संदर्भ में गणना की जाती है। सीपीआई को आधार वर्ष में मूल्य के साथ चालू वर्ष में वस्तुओं की टोकरी की लागत को विभाजित करके और परिणाम को 100 के साथ गुणा करके आसानी से गणना की जा सकती है। सीपीआई में वार्षिक प्रतिशत परिवर्तन का उपयोग मुद्रास्फीति का आकलन करने के लिए किया जाता है। वैसे यह अर्थशास्त्रियों के लिए अथवा आर्थिक अंकक्षकों के लिए आसान हो सकता है, आमजन के लिए नहीं। मैंने भी बीए तक अर्थशास्त्र की पढ़ाई की थी लेकिन मेरे लिए भी इसे समझ पाना कठिन होता है। समाचारपत्रों के बाज़ार वाले पन्ने पर अथवा टीवी समाचारों में जीडीपी और सीपीआई में बढ़त और गिरावट की ख़बरें पढ़ने-सुनने को प्रायः मिलती रहती हैं। आमजन यह समझने की कोशिश करते-करते थक चुका है कि आखिर महंगाई बढ़ती ही क्यों जा रही है? उसने घटने का रास्ता गोया एकदम सील-पैक कर दिया है।
यह सच है कि कोरोनाकाल में देश को भारी आर्थिक क्षति उठानी पड़ी। लेकिन इसके बाद आर्थिक नीति निर्धारकों ने स्थिति सुधरने का दावा किया। वही जीडीपी और सीपीआई जैसे शब्दों का प्रयोग करते हुए लेकिन महंगाई में लगातार उछाल जारी है। खाने-पीने की चीजें, आवास, कपड़े, परिवहन, इलाज, शिक्षा आदि पर आधारित सीपीआई पर नज़र डालें तो महंगाई जून 2019 में 3.8 प्रतिशत से लगभग दोगुनी बढ़कर जून 2021 में 6.26 फीसद हो चुकी थी। यह लगातार दूसरा महीना था जब महंगाई भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की 6 प्रतिशत की सीमा से ऊपर थी। फिर यह जुलाई में कुछ कम होकर तीन माह के निचले स्तर 5.59 फीसद पर आ गई। खाने-पीने की चीजों विशेष रूप से दलहन और तेल से लेकर ईंधन और बिजली तक सभी चीजों के दाम बढ़े। केंद्रीय उद्योग और वाणिज्य मंत्रालय के बयान में कहा गया कि जुलाई 2021 में महंगाई की ऊंची दर मुख्यतः निचले आधार प्रभाव और कच्चे तेल तथा प्राकृतिक गैस के साथ खनिज तेल, बुनियादी धातुओं, खाद्य उत्पादों, कपड़ों, रसायनों और रासायनिक उत्पादों सहित दूसरी चीजों के दाम में बढ़ोतरी के कारण थी।
इतना तो आमजन भी जानता है कि महंगाई डीजल-पेट्रोल की कीमतों की पटरी पर दौड़ती है। डीजल-पेट्रोल मंहगा होता है तो सामानों का परिवहन मंहगा हो जाता है। जिससे सामानों की कीमतों में उछाल आना तय रहता है। तो जब इतना जरूरी है डीजल-पेट्रोल के दामों का नियंत्रित रहना फिर डीजल-पेट्रोल के दाम नियंत्रित क्यों नहीं हो पा रहे हैं? तो इस प्रश्न का उत्तर पाने के लिए ज़रा पीछे मुड़ कर देखना होगा। जून 2010 तक सरकार पेट्रोल की कीमत निर्धारित करती थी और हर 15 दिन में इसे बदला जाता था, लेकिन 26 जून 2010 के बाद सरकार ने पेट्रोल को कीमतों का निर्धारण ऑइल कंपनियों के ऊपर छोड़ दिया। इसी तरह अक्टूबर 2014 तक डीजल की कीमत भी सरकार निर्धारित करती थी, लेकिन 19 अक्टूबर 2014 से सरकार ने ये काम भी ऑइल कंपनियों को सौंप दिया। अर्थात् पेट्रोलियम प्रोडक्ट की कीमत निर्धारित करने में सरकार का कोई नियंत्रण नहीं है। ये काम ऑइल मार्केटिंग कंपनियां करती हैं। ऑइल कंपनियां अंतरराष्ट्रीय मार्केट में कच्चे तेल की कीमत, एक्सचेंज रेट, टैक्स, पेट्रोल-डीजल के ट्रांसपोर्टेशन का खर्च और बाकी कई चीजों को ध्यान में रखते हुए रोजाना पेट्रोल-डीजल की कीमत निर्धारित करती हैं। पेट्रोल-डीजल की कीमत को जीएसटी में लाने पर नियंत्रित किया जा सकता है लेकिन इन्हें जीएसटी में नहीं लाने का सबसे बड़ा कारण है राजस्व में कमी होने का भय। पेट्रोल-डीजल को जीएसटी में लाने से सरकारों को राजस्व का नुकसान होगा और सरकार अपनी कमाई के किसी भी सोर्स में कोई बदलाव नहीं करना चाहती। जबकि ऐसा करने से डीजल-पेट्रोल की कीमतों में 20 से 26 रुपए तक की कमी आ सकती है और यह आमजन की जेबों के लिए भारी राहत होगी।
रहा सवाल रसोई गैस की कीमत का तो उसे भी नियंत्रण में लाना जरूरी है। क्योंकि आज बड़े से ले कर छोटे शहरों तक भोजन पकाने का एकमात्र साधन रसोई गैस (एलपीजी) है। आज देश के अधिकांश घरों में रसोई गैस के माध्यम से ही खाना पकाया जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में भी लोगों ने पारंपरिक चूल्हों पर लकड़ी से खाना पकाना छोड़ दिया है। घरेलू गैस सिलेंडर पर उपभोक्ताओं को मिलने वाली सब्सिडी भी लंबे समय से बंद है।  उस पर पिछले 15 महीनों में ही सरकार ने घरेलू गैस सिलेंडर पर 300 रुपयों से अधिक की बढ़ोतरी कर हो चुकी है। घरेलू बजट को राहत देने के लिए सरकार को घरेलू गैस सिलेंडर की बढ़ती कीमतों पर हर हाल में नियंत्रण करना चाहिए। चाहे यह काम सब्सीडी बहाल कर के ही क्यों न हो।
प्रश्न उठता है कि सरकारें राजस्व किसके लिए कमाती हैं? विकास कार्यों के लिए जो आमजन के हित में हों। तो पेट्रोल-डीजल की कीमत को जीएसटी में ला कर नियंत्रित करना भी तो जनहित का कार्य होगा। महंगाई कम होगी तो विकास की दर अपने-आप बढ़ेगी। लेकिन सरकारें अभी चिंतन-मनन में हैं कि ऐसा किया जाए या नहीं? जबकि महंगाई जबरा बन कर मार रही है और त्रस्त आमजन रो भी नहीं पा रहा है। जबकि यही समय है कि राज्य सरकारें महंगाई से ऊपर जनहित को दर्ज़ा दें।
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(सागर दिनकर, 22.09.2021)
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Tuesday, September 21, 2021

पाठकों से गहन संवाद करती कहानियां | समीक्षा | समीक्षक - डॉ शरद सिंह

प्रस्तुत है आज 21.09. 2021 को #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई वरिष्ठ कथालेखिका दीपक शर्मा के कहानी संग्रह "पिछली घास" की  समीक्षा...
आभार दैनिक "आचरण" 🙏
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पुस्तक समीक्षा
पाठकों से गहन संवाद करती कहानियां 
समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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कहानी संग्रह - पिछली घास
लेखिका      - दीपक शर्मा
प्रकाशक     - रश्मि प्रकाशन, महाराज पुरम, कृष्णा नगर, लखनऊ-226023 (उप्र)
मूल्य        - 200/-
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‘‘पिछली घास’’ लेखिका दीपक शर्मा की सोलह कहानियों का संग्रह है। हिन्दी कथाजगत में दीपक शर्मा एक जाना-पहचाना नाम है। 30 नवम्बर 1946 में अविभाजित भारत के लाहौर में जन्मीं दीपक भुल्लर जो विवाह के बाद दीपक शर्मा के नाम से चर्चित हुईं लखनऊ क्रिश्चियन काॅलेज के स्नातकोत्तर अंग्रेजी विभाग में लम्बे समय तक अध्यक्ष एवं रीडर के पद पर रहीं। अब तक उनके बीस कहानी संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। स्वभाव से सरल, मृदुभाषी, मिलनसार इस वरिष्ठ लेखिका से मेरी पहली मुलाक़ात सन् 2010 में लखनऊ में इनके निवास पर हुई थी। दीपक शर्मा से मिलते समय यह विश्वास कर पाना कठिन होता है कि एक सौम्य, शांत स्त्री के भीतर विचारों और संवेदनाओं के अनेक ज्वालामुखी दबे हुए हैं बिलकुल ‘‘रिंग आॅफ फायर’’ की तरह। ये सुप्त ज्वालामुखी जब-तब उनकी कहानियों के कथानक बन कर अव्यवस्था के प्रति विद्रोह का लावा उगलने लगते हैं। किन्तु यह लावा इस सावधानी से बहता है कि सब बुरा-बुरा नष्ट हो जाए और अच्छा-अच्छा बच जाए। दीपक शर्मा ने अपने कहानी लेखन की शुरुआत पंजाबी में की। सन् 1979 में इनकी पहली हिन्दी कहानी ‘‘कोलम्बस अलविदा’’ पत्रिका ‘‘धर्मयुग’’ में प्रकाशित हुई। इसके बाद दीपक शर्मा ने हिन्दी कहानी का जो दामन पकड़ा आज भी उसे मज़बूती से थामे हुए हैं। 
इस कहानी संग्रह में गगन गिल की संक्षिप्त तथा मधु बी. जोशी की विस्तृत भूमिका पढ़ने के बाद इसमें संग्रहीत कहानियों के प्रति जिज्ञासा का विस्फोट होना स्वाभाविक है। एक आतुरता जाग उठती है इन सोलह कहानियों की सोलह दुनियाओं से गुज़रने की। संग्रह में मौजूद सोलह कहानियों में पहली कहानी है-‘‘चमड़े का अहाता’’। यह एक मानवीय विमर्श की कहानी है। इसमें एक ऐसा अहाता है जो हमारे आस-पास उपस्थित है एक ‘अंडरवर्ल्ड’ की तरह। लेकिन यह किसी माफिया अंडरवर्ल्ड नहीं है बल्कि हमारे कथित सम्य समाज के राजमार्ग के ठीक बीचो-बीच बने सीवेज़ के मेनहोल के ठीक नीचे है। एक सुगबुगाती, बजबजाती हुई दुनिया। चमड़े के शोधन कार्य की दुर्गन्धयुक्त दुनिया। जहां जानवरों की खालें खरीदी जाती हैं और उन्हें ‘चमड़ा’ बना कर बेचा जाता है। इस दुनिया में चर्मशोधन से भी अधिक दुर्गन्ध उस अपराध की है जो कि घृणित सामाजिक अपराध है, कन्या-वध का। चर्मशोधन की रासायनिक द्रव से भरी टंकियां चमड़ा शोधने के चुनौती भरे काम की गवाही होने के साथ ही उस अपराध की भी गवाह हैं जो कभी नहीं होना चाहिए था। एक चुभता हुआ पारस्परिक संवाद ही इस अपराध को एक झटके में बेनक़ाब कर देता है -
‘‘मैं सब जानता हूं’’ भाई फिर हंसा, ‘‘मैं किसी से नहीं डरता। मैंने एक बाघिनी का दूध पिया है, किसी चमगीदड़ी का नहीं।’’
‘‘तुमने चमगीदड़ी किसे कहा?’’ सौतेली मां फिर भड़कीं।
‘‘चमगीदड़ी को चमगीदड़ी कहा है।’’ भाई ने सौतेली मां की दिशा में थूका,‘‘तुम्हारी एक नहीं दो बेटियां टंकी में फेंकी गईं, पर तुम्हारी रंगत एक बार नहीं बदली। मेरी बाघिनी मां ने जान दे दी, मगर जीते जी किसी को अपनी बेटी का गला घोंटने नहीं दिया।’’
दीपक शर्मा की कहानियों को पढ़ते समय हिन्दी कहानी के उस इतिहास पर भी संक्षिप्त दृष्टिपात कर लेना चाहिए जहां से हिन्दी कहानी ने नई कहानी का स्वरूप ग्रहण किया। वह नई कहानी विधा जिसकी छाप दीपक शर्मा की कहानियों में स्पष्ट दिखाई देती है। उन्नीसवीं शताब्दी के अंत और बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ की कड़ी में हिन्दी भाषा के उन्नयन और गद्य-विधाओं के सूत्रपात ने जिस भाषाई जनतांत्रिक का निर्वाह करते हुए साहित्य रचना की नींव रखी, उसका स्वर आज की रचनाओं में भी सुनाई देता है। उत्तर भारतेन्दु युग जिस रचनात्मकता के संक्रमण का दौर था, उसमें कथा साहित्य के प्रति आग्रह की अपेक्षा की जा रही थी। रोचकता की प्रधानता थी। देवकीनंदन खत्री और गोपालराम गहमरी इत्यादि ने तिलिस्मी ताने-बाने का गल्प तैयार कर कथा-सृजन की अच्छी वृत्तांतमूलक जमीन तैयार कर दी थी। साथ ही इनकी रचनाओं ने हिन्दी का एक बहुत बड़ा पाठकवर्ग भी तैयार कर दिया था। तत्कालीन कथा-लेखन की भाषा खत्री-गहमरी के भाषाई तिलिस्म के इर्द-गिर्द बनती चली गई। परन्तु बीसवीं सदी का हिन्दी कहानी का कथ्य दूसरे ही धरातल पर विकसित हुआ।  कहानी में आमजीवन के यथार्थ से जुड़ने का प्रयास स्पष्ट दिखाई देने लगा। यद्यपि भारतेन्दु युग ने साहित्य को सथार्थ से जोड़ने की प्रक्रिया आरम्भ कर दी थी। इसका परिवर्द्धित संस्करण द्विवेदी युग में दिखाई देता है। जब हिन्दी भाषा के तीन प्रमुख उन्नायकों- माधवराव सप्रे, महावीर प्रसाद द्विवेदी और आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने अपने दौर की आरंभिक कहानियां लिखीं तो उन्होंने भी कहानी के नए प्रतिमान गढ़े जो पूर्व से इतर थे। यह हिन्दी कथा साहित्य के इतिहास में वह एक क्रांतिकारी शुरूआत थी। कहानी के नए सरोकारों और प्रयोगधर्मिता को लेकर डॉ. धर्मवीर भारती ने ‘धर्मयुग’ में कहानी के बदले हुए स्वरूप को रेखांकित करते हुए कहानीकारों-मोहन राकेश, कमलेश्वर और राजेन्द्र यादव का त्रिकोण स्थापित कर दिया। इसे कथालोचना में कुछ विचलन भी पैदा हुआ परन्तु सन् 1954 के ‘कहानी विशेषांक’ ने नई कहानी की वैचारिक भूमि पहले ही स्थापित कर दी थी। अमरकांत की कहानी ‘डिप्टी कलक्टरी’ और कमलेश्वर की कहानी ‘राजा निरबंसिया’ लिखी जा चुकी थीं। इसी क्रम में मोहन राकेश का कहानी संग्रह ‘नए बादल’ सन् 1956 में आया। इसी दौर में निर्मल वर्मा की कहानी ‘परिंदे’ और भुवनेश्वर की कहानी ‘भेड़िये’ और उषा प्रियंवदा की कहानी ‘वापसी’ पर चर्चाएं शुरू हो चुकी थीं। इन्हीं कहानियों को नई कहानी की प्रारंभिक कहानियों में गिना जाता है। इनके अलावा ‘कहानी’ और ‘नई कहानियां’ पत्रिकाओं ने इस आंदोलन की अधिकारिक रूप से घोषित पत्रिका थी।
नई कहानी के मूल बिन्दुओं को अपने अवचेतन में ग्रहण करते हुए दीपक शर्मा ने अपना कथा संसार रचा उसमें सच के उद्घाटन का तीव्र आग्रह दिखाई देता है। उदाहरण के लिए इसी संग्रह की दूसरी कहानी ‘‘प्रेत छाया’’ अतीत में सन् 1928 में ले जाती है जब देश में साईमन कमीशन का लागू किए जाने का जम कर विरोध हो रहा था। लोग खुली सड़कों पर भीड़ की शक़्ल में निकल कर अपनी शक्ति का प्रदर्शन कर रहे थे। मगर भीड़ हमेशा अनेक चेहरे लिए होती है। ‘‘गो साईमन गो’’ की नारे लगाती भीड में एक लड़के ने अपनी जाई और बहन को खो दिया था। अब जब वह लड़का चेचक की बीमारी से ग्रस्त हो कर आईसोलेशन के दिन काट रहा होता है तो उसे महसूस होता है कि उसकी जाई उससे मिलने आई है, एक प्रेतछाया की भांति। अपनों को खोने की पीड़ा और एक उद्देश्यपूर्ण देशव्यापी विरोध के बीच की अंतर्कथा। यह कहानी अपने छोटे से आकार में बड़ी-सी कथा समेटे हुए है, गोया यह कहानी नहीं अपितु एक ‘मेमोरी चिप’ हो।
संग्रह में एक कहानी है ‘‘मां का दमा’’। यह सूत और सूती कपड़ा डाई करने वाले कारखाने में काम करने वाली स्त्रियों में से एक मंा की कहानी है। अस्वस्थकर वातावरण में काम करती महिलाएं चैतरफा मुसीबतें झेलती हैं। बेटे की ओर से कही गई इस कहानी में बेटा बताता है कि उसकी मां को दमा हो गया था जिस पर उसके पिता मां को ‘‘घोंघी’’ कह कर पुकारते थे। मां की पीड़ा का अपमान करता सम्बोधन। जबकि इसमें भला मां का क्या दोष था? लड़के ने स्वयं अपनी आंखों से कारखाने की दशा देखी थी-‘‘मां के कारखाने में काम चालू है। गेट पर मां का पता पूछने पर मुझे बताया जाता है, वे दूसरे हाॅल में मिलेंगी, जहां केवल स्त्रियां काम करती हैं। जिज्ञासावश मैं पहले हाॅल में जा टपकता हूं। यह दो भागों में बंटा है। एक भाग में गट्ठों में कस कर लिपटाई गई ओटी हुई कपास मशीनों में चढ़ कर तेजी से सूत में बदल रही है, तो दूसरे भाग में बंधे सूत के गट्ठर करघों में सवार हो कर सूती कपड़ों का रूप धारण कर रहे हैं। यहां सभी कारीगर पुरुष हैं। ...दूसरे हाॅल का दरवाज़ा पार करते ही क्लोरीन की तीखी बू मुझसे आन टकराती है। भाप की कई-कई ताप तरंगों के संग मेरी नाक और आंखें बहने लगती हैं। थोड़ा प्रकृतिस्थ हो कर देखता हूं, भाप एक चैकोर हौज से मेरी ओर लपक रही है। हौज में बल्लों के सहारे सूती कपड़े की अट्टियां नीचे भेजी जा रही हैं। हाॅल में स्त्रियां ही स्त्रियां हैं। उन्हीं में से कुछ ने अपने चेहरों पर मास्क पहन रखे हैं, ऑपरेशन करते समय डाॅक्टरों और नर्सों जैसे।’’
स्वास्थ्य के लिए ऐसे घातक वातावरण में काम करने वाली स्त्रियों की पीड़ा को उनके निकट जा कर महसूस करने के बाद लिखी गई कहानी स्त्रीविमर्श का एक अलग ककहरा रचती है। दीपक शर्मा की संवेदनशीलता अपनी हर कहानी की भांति इस कहानी में भी बखूबी उभर की सामने आई है। कहानी ‘‘बापवाली’’ स्त्री के प्रति होने वाले घरेलू अत्याचारों का लेखा-जोखा सामने रखती है तो कहानी ‘‘ऊंट की पीठ’’ दहेज-लोलुपता और इस कुप्रथा को सवीकार करने वाले एक आम से पिता की मन को आलोड़ित करने वाली कहानी है।
कहानी ‘‘पुरानी फांक’’ संबंधों के जटिल समीकरण की अनूठी कहानी है। इस कहानी का एक संवाद देखिए जो अपने-आप में बहुत कुछ उद्घाटित करने में सक्षम है-
‘‘तुम्हें अपने वर्तमान को अनुभवों से भर लेना चाहिए।‘‘ सुहास मेरी ओर देख कर मुस्कुराता है,‘‘चूंकि तुम्हारे पास नए अनुभवों की कमी है, इसलिए तुम आने वाले अनुभवों को मनगढ़ंतपूर्वक धरण करती हो या फिर बीत चुके अनुभवों का पुनर्धारण। तुम्हें केवल अपने वर्तमान को भरना चाहिए।’’
‘‘वर्तमान?’’ घबराकर मैं अपनी आंखें मंजू दीदी के चेहरे पर गड़ा लेती हूं। मेरा वर्तमान? खिड़की के उस तरफ का एक भीषण रणक्षेत्र? और इस तरफ एक तलाक़शुदा छब्बीस वर्षीय रईसज़ादे के साथ एक कच्चा रिश्ता? दोनों तरफ एक ठीठ अंधेरा।’’
लेखिका ने मानवीय संबंधों के ज्यामितीय समीकरणों को ‘‘माना कि’’ की कल्पना से परे हट कर यथार्थ के पैमाने से नापते हुए प्रस्तुत किया है। कहानी ‘‘पिछली घास’’ इसका एक बेहतरीन उदाहरण है। पांच संतानों वाला परिवार। जिसमें पिता की देहलोलुपता एक विध्वंस रचती है। पिता एक रिश्तेदार लड़की से बलात संबंध बनाता है जिसके परिणामस्वरूप छठीं संतान का जन्म होता है। उस लड़की और छठी संतान को पिता अपनी पत्नी और बेटी के रूप में अपना लेता है किन्तु बेटे के लिए यह सब सहज नहीं है। वह विद्रोही हो उठता है। पिता की धौंस से त्रस्त हो कर पिता को पुलिस की धमकी देता है, लिहाज़ा पिता अपनी वास्तविक पत्नी और पांचों बच्चों को छोड़ कर अपनी अवैध पत्नी और छठी संतान को ले कर फरार हो जाता है। इसके बाद वह परिवार संकटों के किस मुहाने पर जा खड़ा होता है और कैसे उनके सपनों की पर्तें उधड़ती चली जाती हैं, इसे कहानी को पढ़ कर ही अनुभव किया जा सकता है।
संग्रह की कहानियों में लेखिका का एक काल्पनिक स्थान है-कस्बापुर। यह स्थान गांव है, कस्बा, है शहर है और यहां तक कि देश का प्रतिबिम्ब भी है। कस्बापुर एक ऐसा गह्वर है जिसमें समाज की सारी समस्याएं और विडम्बनाएं समाई हुई हैं। एक जाना-पहचाना संसार रचता है कस्बापुर, जो संग्रह की कई कहानियों में मौजूद है। दीपक शर्मा भाषाई मायाजाल नहीं रचती हैं, वे सरल, बोलचाल के शब्दों में अपनी कहानियां लिखती हैं। हिन्दी, उर्दू, अंग्रेजी, अवधी, पंजाबी के शब्द बिना किसी विशेष आग्रह के स्वाभाविक रूप से अपनी जगह लेते जाते हैं। यही उनकी कहानियों का भाषाई सौंदर्य है जो कहानियों को एक प्रवाह में पठनीय बना देता है। कुल मिला कर ‘‘पिछली घास’’ को एक मूल्यावत्तापूर्ण कहानी संग्रह कहा जा सकता है।           
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Friday, September 17, 2021

Thursday, September 16, 2021

चर्चा प्लस | हिन्दी कब पाएगी राष्ट्रभाषा का दर्ज़ा | डाॅ शरद सिंह

चर्चा प्लस 

हिन्दी कब पाएगी राष्ट्रभाषा का दर्ज़ा

  - डॉ. शरद सिंह
     अभी तक हिन्दी राष्ट्रभाषा नहीं बन सकी है जबकि पं. मदन मोहन मालवीय, पुरुषोत्तम दास टंडन, महात्मा गांधी से ले कर अटल बिहारी वाजपेयी ने हिन्दी को राष्ट्रभाषा और राज्यों के बीच संपर्क की भाषा बनाने का अथक प्रयास किया। यहां तक कि थियोसोफिकल सोसाइटी की एनी बेसेंट ने कहा था, ‘भारत के सभी स्कूलों में हिंदी की शिक्षा अनिवार्य होनी चाहिए।’ लेकिन आज अंग्रेजी-भक्ति के आगे हिन्दी की उपेक्षा यथावत है। हिन्दी की चिंता दिवस, सप्ताह, पखवाड़े और मास में सिमट कर रह जाती है।

किसी भी देश की संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा उसकी राष्ट्रभाषा होती है, जिसका प्रयोग लिखनें, पढ़नें और वार्तालाप करने में किया जाता है। राष्ट्रभाषा वह भाषा होती है, जिसमे देश के सभी कार्यों का निष्पादन किया किया जाता है। देश के सभी सरकारी कार्य इसी भाषा में किये जाते है। इस संदर्भ में रोचक बात यह है कि हमारे देश के तीन नाम हैं-भारत, हिन्दुस्तान और इंडिया। लेकिन अभाव है तो एक राष्ट्रभाषा का। भारत में किसी भी भाषा को राष्ट्रीय भाषा का दर्जा नहीं दिया गया है। संविधान का अनुच्छेद 343, अंग्रेजी के साथ हिंदी (देवनागरी लिपि में लिखित) को संघ की आधिकारिक भाषा यानी भारत सरकार की अनुमति देता है। अनेक बार प्रयास किए गए कि हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्ज़ा मिल सके लेकिन हर बार हिन्दी एक सीढ़ी नीचे ही रह गई। जबकि हिन्दी में विविध भाषाओं के शब्द समाहित हैं और यह देश के विविध भाषा-भाषियों के बीच एक अच्छी, सरल संपर्क की भाषा की भूमिका निभा सकती है। बस, आवश्यकता है हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्ज़ा मिलने की।

पं. मदन मोहन मालवीय ने हिन्दी को प्रतिष्ठा दिलाने के लिए सतत् प्रयास किया। न्यायालय में हिन्दी को स्थापित कराया। महामना पहले ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने हिंदी भाषा के उत्थान एवं उसे राष्ट्र भाषा का दर्जा दिलाने के लिए इस आन्दोलन को एक राष्ट्र व्यापी आन्दोलन का स्वरुप दे दिया और हिंदी भाषा के विकास के लिए धन और लोगो को जोड़ना आरम्भ किया। आखिरकार 20 अगस्त सन् 1896 में राजस्व परिषद् ने एक प्रस्ताव में सम्मन आदि की भाषा में हिंदी को तो मान लिया पर इसे व्यवस्था के रूप में क्रियान्वित नहीं किया। लेकिन 15 अगस्त सन् 1900 को शासन ने हिंदी भाषा को उर्दू के साथ अतिरिक्त भाषा के रूप में प्रयोग में लाने पर मुहर लगा दी। बीसवीं सदी में थियोसोफिकल सोसाइटी की एनी बेसेंट ने कहा था, ‘भारत के सभी स्कूलों में हिंदी की शिक्षा अनिवार्य होनी चाहिए।’
भारत में जो भी विदेशी आया उसे हिन्दी सीखना सबसे आसान लगा, वह चाहे अंग्रेज हो या मुग़ल, अफ़गान। चौदहवीं सदी में अमीर खुसरो ने अपनी कविताओं में ‘हिन्दवी’ का प्रयोग किया जिसमें एक पंक्ति फारसी की तो दूसरी हिन्दी (हिन्दवी) की होती थी। वर्तमान में देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी गुजराती भाषी होते हुए भी धाराप्रवाह हिन्दी बोल लेते हैं। जिससे यह तथ्य सिद्ध होता है कि यदि हिन्दी के प्रति प्रेम और इच्छाशक्ति है तो हिन्दी को सीखना, बोलना और समझना सबसे आसान है, क्योंकि यह एक लचीली भाषा है। इसने विभिन्न भाषाओं और बोलियों के शब्द समाहित हैं। इसकी प्रकृति सार्वभौमिक (यूनीवर्सल) भाषा की प्रकृति है। हिंदी में एक भी ऐसा शब्द नहीं है जिसका उच्चारण उसके लिखने से थोड़ा भी अलग हो। इसी वजह से अंग्रेजों ने हिंदी को ‘फोनेटिक लेंग्वेज़’ कहा था।
पुरुषोत्तम दास टंडन ने महामना के आदर्शों के उत्तराधिकारी के रूप में हिंदी को निज भाषा बनाने तथा उसे राष्ट्र भाषा का गौरव दिलाने का प्रयास आरम्भ कर दिया था। सन् 1918 ई. में हिंदी साहित्य सम्मेलन के इन्दौर अधिवेशन में सभापति पद से भाषण देते हुए महात्मा गांधी ने हिन्दी को राष्ट्रभाषा के योग्य ठहराते हुए कहा था कि, ‘मेरा यह मत है कि हिंदी ही हिन्दुस्तान की राष्ट्रभाषा हो सकती है और होनी चाहिए।’ इसी अधिवेशन में यह प्रस्ताव पारित किया गया कि प्रतिवर्ष 6 दक्षिण भारतीय युवक हिंदी सीखने के लिए प्रयाग भेजें जाएं और 6 उत्तर भारतीय युवक को दक्षिण भाषाएं सीखने तथा हिंदी का प्रसार करने के लिए दक्षिण भारत में भेजा जाएं। इन्दौर सम्मेलन के बाद उन्होंने हिंदीसेवा को राष्ट्रीय व्रत बना दिया। दक्षिण में प्रथम हिंदी प्रचारक के रूप में महात्मा गांधी ने अपने सबसे छोटे पुत्र देवदास गांधी को दक्षिण में चेन्नई भेजा। महात्मा गांधी की प्रेरणा से सन् 1927 में मद्रास में तथा सन् 1936 में वर्धा में राष्ट्रभाषा प्रचार सभाएं स्थापित की गईं।
अटल बिहारी वाजपेयी ने संयुक्त राष्ट्रसंघ के अधिवेशन में हिन्दी में भाषण दिया था। वे चाहते रहे कि हिन्दी को राष्ट्रभाषा होने का सम्मान मिले। इसीलिए जो हिन्दी के प्रति अनिच्छा प्रकट करते थे उनके लिए अटल बिहारी का कहना था कि ‘‘क्या किसी भाषा को काम में लाए बिना, क्या भाषा का उपयोग किए बिना, भाषा का विकास किया जा सकता है? क्या किसी को पानी में उतारे बिना तैरना सिखाया जा सकता है?’’
22 फरवरी 1965 को राज्यसभा में राजभाषा नीति पर परिचर्चा के दौरान उन्हांने दिया था, इसमें हिन्दी की उपेक्षा के प्रति उनकी पीड़ा को स्पष्ट रूप से अनुभव किया जा सकता है-‘‘सभापति जी! मेरा दुर्भाग्य है, मेरी मातृभाषा हिन्दी है। अच्छा होता यदि मैं किसी अहिन्दी प्रांत में पैदा हुआ होता क्योंकि तब अगर हिन्दी के पक्ष में कुछ कहता तो मेरी बात का ज्यादा वजन होता। हिन्दी को अपनाने का फैसला केवल हिन्दी वालों ने ही नहीं किया। हिन्दी की आवाज पहले अहिन्दी प्रांतों से उठी। स्वामी दयानंद जी, महात्मा गांधी या बंगाल के नेता हिन्दीभाषी नहीं थे। हिन्दी हमारी आजादी के आंदोलन का एक कार्यक्रम बनी और चौदह सूत्रीय कार्यक्रम के अंतर्गत उसका समावेश किया गया। हमारे संविधान का जो पहला मसविदा बना, उसमें अंग्रेजी के लिए पांच साल देना तय किया गया था, लेकिन श्री गोपालास्वामी अयंगार, श्री अल्लादि कृष्णास्वामी और श्री टी.टी. कृष्णमाचारी के आग्रह पर वह पांच साल की अवधि बढ़ाकर पन्द्रह साल की गयी। हिन्दी अंकों को अंतर्राष्ट्रीय अंकों का रूप नहीं दिया गया। राष्ट्रभाषा की जगह हिन्दी को राजभाषा कहा गया। उस समय अहिन्दी प्रान्तों से हिन्दी का विरोध नहीं हुआ था। संविधान में जो बातें थीं, उनका विरोध या तो राजर्षि पुरुषोत्तमदास टंडन ने किया, जो अंग्रेजी नहीं चाहते थे या स्वर्गीय मौलाना आजाद ने किया, जो हिन्दी की जगह हिन्दुस्तानी चाहते थे, मगर दक्षिण में हिन्दी के विरोध में आवाज नहीं उठी थी, लेकिन पंद्रह साल में हमने क्या किया?’’
हिन्दी के संदर्भ में क्या हम आज महामना मदनमोहन मालवीय और अटल बिहारी वाजपेयी के उद्गारों एवं प्रयासों को अनदेखा तो नहीं कर रहे हैं? वस्तुतः ‘राष्ट्रभाषा’ शब्द प्रयोगात्मक, व्यावहारिक व जनमान्यता प्राप्त शब्द है। राष्ट्रभाषा सामाजिक, सांस्कृतिक स्तर पर देश को जोड़ने का काम करती है अर्थात् राष्ट्रभाषा की प्राथमिक दायित्व देश में विभिन्न समुदायों के बीच भावनात्मक एकता स्थापित करना है। राष्ट्रभाषा का प्रयोग क्षेत्र विस्तृत और देशव्यापी होता है। राष्ट्रभाषा सारे देश की सम्पर्कभाषा होती है। इसका व्यापक जनाधार होता है। राष्ट्रभाषा का स्वरूप लचीला होता है और इसे जनता के अनुरूप किसी रूप में ढाला जा सकता है। विश्व में हिन्दी का गौरव तभी तो स्थापित हो सकेगा जब हम अपने देश में हिन्दी को उचित मान, सम्मान और स्थान प्रदान कर दें। हिन्दी के मार्ग में कहीं न कहीं सबसे बड़ा रोड़ा इसकी रोजगार से बढ़ती दूरी की है। इस तथ्य से हम मुंह नहीं मोड़ सकते हैं कि हमारे युवाओं में यहां युवा का अर्थ एक पीढ़ी पहले के युवाओं से भी है, अंग्रेजी पढ़ कर अच्छे रोजगार के अवसर बढ़ जाते हैं जबकि हिन्दी माध्यम से की हुई पढ़ाई कथित ‘स्लम अपॉर्च्युनिटी’ देती है। इस बुनियादी बाधा को दूर करने के लिए हमें तय करना होगा कि हम पढ़ाई के लिए हिन्दी का कौन-सा स्वरूप रखें जिससे हिन्दी रोजगार पाने के लिए की जाने वाली पढ़ाई का शक्तिशाली माध्यम बन सके। दो में से एक मार्ग तो चुनना ही होगा- या तो संस्कृतनिष्ठ हिन्दी को विभिन्न विषयों का माध्यम बना कर युवाओं को उससे भयभीत कर के दूर करते जाएं या फिर हिन्दी के लचीलेपन का सदुपयोग करते हुए उसे रोजगार की भाषा के रूप में चलन में ला कर युवाओं के मानस से जोड़ दें। यूं भी भाषा के साहित्यिक स्वरूप से जोड़ने का काम साहित्य का होता है, उसे बिना किसी संशय के साहित्य के लिए ही छोड़ दिया जाए। आखिर हिन्दी को देश में और विदेश में स्थापित करने के लिए बीच का रास्ता ही तो चाहिए जो हिन्दी को रोजगारोन्मुख बनाने के साथ उसके लचीलेपन को उसकी कालजयिता में बदल दे। हिन्दी के मार्ग में सबसे बड़ा रोड़ा इसकी रोजगार से बढ़ती दूरी है। इस तथ्य से हम मुंह नहीं मोड़ सकते हैं कि हमने वह वातावरण निर्मित होने दिया है जहां अंग्रेजी पढ़ कर अच्छे रोजगार के अवसर बढ़ जाते हैं जबकि हिन्दी माध्यम से की हुई पढ़ाई कथित ‘स्लम अपॉर्च्युनिटी’ देती है। हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्ज़ा दे कर ही इस बुनियादी बाधा को दूर किया जा सकता है। इससे भी पहले हमें छोड़ना होगा अपने उस दोहरेपन जिसके चलते हिन्दी की भलाई दिवस, सप्ताह और मास में सिमट कर रह जाती है और शेष दिनों में हम अंग्रेजी की सेवा करते रह जाते हैं।
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(सागर दिनकर, 16.09.2021)
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Tuesday, September 14, 2021

उच्चशिक्षा जगत के स्याह पक्षों को उजागर करता उपन्यास | समीक्षा | डॉ शरद सिंह

प्रस्तुत है आज 14.09. 2021 को #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई वरिष्ठ साहित्यकार डॉ श्याम सुंदर दुबे जी के उपन्यास "पहाड़ का पाताल" की  समीक्षा... 
आभार दैनिक "आचरण" 🙏
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पुस्तक समीक्षा
उच्चशिक्षा जगत के स्याह पक्षों को उजागर करता उपन्यास  
समीक्षक - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
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उपन्यास     - पहाड़ का पाताल
लेखक      - श्यामसुंदर दुबे
प्रकाशक    - ग्रंथलोक, 1/7342, नेहरू मार्ग, ईस्ट गोरख पार्क, शहदरा, दिल्ली-32
मूल्य       - 550/-
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‘‘पहाड़ का पाताल’’ उपन्यास का जिज्ञासा जगाने वाला नाम है। पहाड़ को सभी देखते हैं लेकिन पहाड़ की जड़ों की ओर किसी का ध्यान नहीं जाता है। उपन्यास का यह नाम एक व्यंजनात्मक नाम है जो पहाड़ की भांति ऊंचाई लिए हुए उच्चशिक्षा जगत की खोखली होती जड़ों के अंतरंग पक्षों की बात करता है। आज उच्चशिक्षा जगत से हर शिक्षित वर्ग संबंध रखता है। स्वयं नहीं तो अपने बच्चों की शिक्षा के जरिए। अतः उस उच्चशिक्षा जगत के सच को जानना भी ज़रूरी है। उच्चशिक्षा जगत के स्याह पक्षों की अपने उपन्यास के माध्यम से पड़ताल की है कथाकार, ललित निबंधकार, कवि समीक्षक एवं लोकविद् डॉ. श्याम सुंदर दुबे ने। इससे पूर्व उनके दो और उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं-‘‘दाखि़ल-ख़ारिज़’’ और ‘‘सोनाफूल’’।  
जब उपन्यास की किसी चर्चा होती है तो मन-मस्तिष्क में एक विस्तृत कथानक की रूपरेखा उभरने लगती है। एक ऐसा कथानक जिसमें अनेक घटनाएं होंगी और अनेक पात्र। ये सभी जीवन से जुड़े हुए होंगे और कल्पना एवं यथार्थ के एक रोचक ताने-बाने से बुने हुए होंगे। निःसंदेह उपन्यासकार मानवजीवन से संबंधित सुखद, दुखद मर्मस्पर्शी घटनाओं को क्रमबद्धता के साथ प्रस्तुत करता है। वस्तुतः उपन्यास में एक ऐसी विस्तृत कथा होती है जो अपने भीतर अन्य गौण कथाएं समेटे रहती है। इस कथा के भीतर समाज और व्यक्ति की विविध अनुभूतियां और संवेदनाएं, अनेक प्रकार के दृश्य और घटनाएं और बहुत प्रकार के चरित्र हो सकते हैं, और यह कथा विभिन्न शैलियों में कही जा सकती है। शर्त ये है कि उपन्यासकार के पास जीवन दृष्टि होनी चाहिए। जीवन के यथार्थ का गहरा अनुभव होना चाहिए, सृजनात्मक कल्पना की अपार शक्ति होनी चाहिए, विचारों की गहनता होनी चाहिए और जीवन की विवेचना होनी चाहिए। उपन्यास को जो लोग मनोरंजन का साधन मानते हैं वे मानों उपन्यास की मूल शक्ति और अनिवार्यता से परिचित नहीं है। डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी ने उपन्यास विधा को आधुनिक युग की देन माना है। उनके अनुसार,‘‘नए गद्य के प्रचार के साथ-साथ उपन्यास प्रचार हुआ है। आधुनिक उपन्यास केवल कथा मात्र नहीं है और पुरानी कथाओं और आख्यायिकाओं की भांति कथा-सूत्र का बहाना लेकर उपमाओं, रूपकों, दीपकों और श्लेषों की छटा और सरस पदों में गुम्फित पदावली की छटा दिखाने का कौशल भी नहीं है। यह आधुनिक वैक्तिकतावादी दृष्टिकोण का परिणाम है।” आज हिन्दी में भी उपन्यास विधा पुरानी कथाओं और आख्यायिकाओं के समानांतर वर्तमान संदर्भों पर भी समुचित ध्यान देती है।
‘‘पहाड़ का पाताल’’ अपने आप में अनेक घटनाक्रम और अनेक पात्र समेटे हुए है। मूल कथानक मूलपात्र अपर्णा और आशुतोष के इर्दगिर्द ही घूमता है लेकिन इस परिक्रमा में ऐसे प्रसंग और ऐसे गोपन सामने आते हैं जो उपन्यास के उद्देश्य को बार-बार रेखांकित करते हैं तथा अन्य पात्रों को भी केन्द्र की ओर ले आते हैं। मूल कथा से कई अंतर्कथाएं जुड़ती जाती हैं लेकिन डॉ. श्यामसुंदर दुबे का लेखकीय कौशल कहीं भी क्रम-भंग नहीं होने देता है। उपन्यास लेखन की गंभीरता के संदर्भ में डॉ. रामदरश मिश्र का मानना रहा कि ‘‘उपन्यास एक हल्की-फुल्की विधा नहीं है जो संभव-असंभव घटनाओं और चटकीले-भड़कीले प्रसंगों की अवतारणा करती चलने वाली कथा के माध्यम से पाठकों का मनोरंजन करे, उपन्यास की वास्तविक शक्ति महान है। उसका उद्देश्य बड़ा है।’’
उपन्यास का आरंभ दो पुराने सहपाठी आशुतोष और अपर्णा की परस्पर पुनर्भेंट से होता है। दोनों के बीच अतीत के पन्ने खुलने लगते हैं और उनमें से ऐसे चरित्र झांकने लगते हैं जो उच्चशिक्षा के श्वेत-स्याह पहलुओं को तार-तार कर के सामने रख देते हैं। शोधकार्य करने वाले विद्यार्थियों का कतिपय मार्गनिदेशकों द्वारा शोषण किए जाने की घटनाएं यदाकदा सामने आती रही हैं। विशेषरूप से महिला शोधकर्ताओं को उस समय विकट समस्या का सामना करना पड़ता है जब उनका पाला किसी देहलोलुप मार्गनिदेशक से पड़ जाता है। यदि वे अपना शोधकार्य छोड़ती हैं तो उनका भविष्य दांव पर लग जाता है और यदि वे शोधकार्य जारी रखती हैं तो उनके सामने दो विकल्प रहते हैं कि या तो वे अपना मार्गनिदेशक बदल लें या फिर परिस्थितियों से समझौता कर लें। मार्गनिदेशक बदलना सुगमकार्य नहीं होता है। इसका कारण बताना जरूरी होता है जोकि किसी भी महिला शोधार्थी को दुविधा की स्थिति में डाल देता है। निःसंदेह, यह उच्चशिक्षा जगत का एक घिनौना पक्ष है। इस दुराव्यवस्था के चलते कई बार योग्य शोधार्थी पीछे रह जाते हैं और अयोग्य शोधार्थी आगे बढ़ते चले जाते हैं। जो स्वयं योग्य नहीं है वह विद्यार्थियों को कैसे योग्य बनाएगा, यह एक विचारणीय प्रश्न है। किन्तु यही एक प्रश्न नहीं है जिस पर सोचने की आवश्यकता है। और भी प्रश्न यह उपन्यास सामने रखता है। जैसे प्रोफेसर साहब के ‘‘प्रताप’’ से आसानी से पीएच. डी. की उपाधि उनके हर ‘‘सेवक’’ को मिल जाना। इस संदर्भ में बड़ा रोचक वर्णन किया है उपन्यासकार ने -‘‘पंडित बनवारी लाल का प्रताप चतुर्दिक व्याप्त था। इस प्रताप के ताप से हिन्दी का मुख जसवंत नगर की झील में शुभ्र सरसिज-सा खिल रहा था। यहां एक बार जो आ गया फिर वह डॉक्टर ऑफ फिलासफी हो कर ही जाता था। इस उपलब्धि की व्याधि में फंसे दो-दो पंचवर्षीय योजनाओं वाले बजरबट्टू निखट्टू को सीनियर्स की चप्पलें घिसते, ज़र्दा लसियाते और किसी न किसी लड़की को गसियाते यहां के सहेट स्थलों पर बिलानागा पाया जा सकता था।
विश्वविद्यालय परिसर में प्रेमलीलाओं के प्रसंग न हों, यह संभव नहीं है। युवावस्था में प्रेम स्वाभाविक मनोभाव है और महाविद्यालय या विश्वविद्यालय इसके लिए सबसे ‘‘हॉट प्लेस’’ कहे जा सकते हैं। प्रस्तुत उपन्यास में कुछ दशकों पहले के विश्वविद्यालयीन प्रेमप्रसंगों का वर्णन है और यथानुसार उन स्थलों का भी दिलचस्प विवरण दिया गया है जहां छात्र-छात्राएं परस्पर प्रेमालाप कर पाते थे। डॉ दुबे लिखते हैं कि  ‘‘लायब्रेरी का अंतरंग, पहाड़ी की ढलानों के झुरमुट और कैंटीन का डार्क कॉर्नर ऐसे ही रस प्लावी अभिसार केन्द्र थे। सरेराह लड़कियां गठियाने के अवसर वर्जित थे। जमाना ज़रा दूसरे किस्म का जो था।’’
यहां मुंशी प्रेमचंद का यह कथन स्मरण हो आता है कि ‘‘मैं उपन्यास को मानव-जीवन का चित्र समझता हूं। मानव-चरित्र पर प्रकाश डालना और उसके रहस्यों को खोलना ही उपन्यास का मुख्य स्वर है।” इस स्वर को उपन्यासकार श्यामसुंदर दुबे ने बखूबी साधा है। उपन्यास में वर्णित कुछ नाम वास्तविक न हो कर भी बहुत जाने-पहचाने से लगते हैं। एक उद्धरण देखिए -‘‘विषय विशेषज्ञ के रूप में हिन्दी के जाने-माने विद्वान डॉ. हेमेन्द्र और डॉ. सियावर सिंह आए थे। इन दोनों का आतंक उन दिनों हिन्दी क्षेत्र में छाया हुआ था। इनका दबदबा ऐसा था कि किसी अदना से अदना साहित्यकार की पहली कितबिया को ये मुक्तिबोध की डायरी के समक्षक स्थापित कर देते थे। इस तरह की स्थापना सुन कर हिन्दी जगत सकते में आ जाता था। अकसर ऐसे सकते आते-जाते रहते थे और इन दोनों के कारण हिन्दी जगत अपने इतिहास विषयक अनेक अनिर्णयों में लटका रहता था। इन लटकाऊ लोगों की पैंठ कहां नहीं थी? ये पुस्तक चयन समिति, विदेश-यात्रा समिति, राजभाषा समिति, पुरस्कार समिति जैसी सैंकड़ों समितियों के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष पद सुशोभित किए हुए थे।’’
इन व्यंजनात्मक पंक्तियों में वर्णित दोनों व्यक्तियों के यथार्थ को वे पाठक सहज ही भांप सकते हैं जो हिन्दी साहित्य की आलोचनात्मक गतिविधियों से किसी न किसी रूप में जुड़े हुए हैं। जो सीधेतौर पर नहीं जुड़े हैं अथवा वास्तविक जीवन में उनसे अनभिज्ञ हैं, वे भी आसानी से समझ सकते हैं कि ऐसे ख्यातिलब्ध व्यक्ति विश्वविद्यालयों में प्राध्यापक चयन प्रक्रिया को किस तरह प्रभावित करते हैं। कुलमिला कर एक सौदा-सा होता है चयनकर्ताओं के बीच कि तुम मेरे उम्मीदवार का चयन करो और मैं तुम्हारे उम्मींदवार का चयन कर दूंगा। यहां उम्मीदवारों के पक्षधरों की योग्यता उम्मीदवारों की योग्यता पर भारी पड़ जाती है। यह भी एक स्याह पक्ष है विश्वविद्यालयीन जगत का।
उपन्यास में छात्रों की वह दुनिया भी है जो सीनियर्स का वरदहस्त मिल जाने पर हर तरह के कार्यकलाप करने को स्वतंत्र हो जाते हैं, साथ ही अपने सीनियर्स के हर काम करने को मुस्तैद रहते हैं। छात्रसंघ और छात्रसंघ के चुनाव दोनों में ‘‘शागिर्द’’ छात्रों की अहम भूमिका रहती है। इन्हीं ‘‘शागिर्द’’ छात्रों में सबसे योग्य छात्र आगे चल कर छात्रसंघ का नेतृत्व करता है। यह गांव से आने वाले छात्रों के लिए एक मायावी दुनिया होती है जहां उन्हें नए सिरे से जीना सीखना पड़ता है। कथानक में ऐसा ही एक छात्र अनिल है जिसे विश्वविद्यालय परिसिर में प्रवेश करते ही अपने सीनिसर रामसुजान सिंह की ‘‘कृपा’’ प्राप्त हो गई और उसे उन तमाम परेशानियों का सामना नहीं करना पड़ा जो एक नए छात्र को सीनियर्स के कारण होती है। इसी पात्र अनिल जब प्रो. अनिल बन जाता है तो वह विवाहित होते हुए भी छात्रा शुभ्रा के मोह में पड़ जाता है जो कि वस्तुतः प्रेम नहीं दैहिक आकर्षण मात्र था।
व्याख्यानों की परिपाटी की अंतर्कथा सामने रखते हुए उपन्यासकार ने करारा कटाक्ष किया है। प्रो. अक्षर मार्तंड ऐसे ही एक पात्र हैं जो दूसरे शहरों में जा कर व्याख्यान देने को ही अपना प्राध्यापकीय कर्म मनते हैं। उनका विवरण देखिए-‘‘वे हमें साकेत पढ़ाते थे लेकिन कक्षाओं में कम ही दिखते थे। दिख जाते तो अपनी फाईल में रखे ओल्ड स्टूडेंट्स के नोट्स से ही वे हमें पढ़ाते थे। वे अक्सर व्याख्यान देने के लिए बाहर जाते रहते थे। जब कोई प्रोफेसर व्याख्यान देने बाहर जाता था तब उसे कर्त्तव्य अवकाश दिया जाता था। कर्त्तव्य अवकाश की इस सुविधा ने प्रो. अक्षर मार्तंड को व्याख्यान दिग्विजयी बना दिया था। कार्यालय का लिपिक जानता था कि अब की बार प्रो. अक्षर मार्तंड कौन-सी संस्था में व्याख्यान देने का प्रमाणपत्र लाएंगे। उनके अब तक के गौशाला, मूकबधिर पाठशाला उज्जैन में गर्दभ मेले में व्याख्यान देने के प्रमाणपत्र काफी चर्चित हो चुके थे।’’
उपन्यास में दो और महत्वपूर्ण पात्र हैं जो विश्वविद्यालय परिसर से हट का भी परिसर से जुड़े हुए हैं। ये पात्र हैं- काजू सपेरा और बेड़नी फुलमतिया। काजू सपेरा का कंट्रास्ट जीवन और फुलमतिया के जीवन की त्रासद घटनाएं उपन्यास में एक अलग ही रंग भरती हैं तथा मूल कथानक के परिवेश को और सम्पन्नता प्रदान करती हैं। फुलमतिया के साथ डकैतों का भी प्रसंग है जो तत्कालीन अपराधकथा के परिदृश्य को सामने रखता है। प्रो. प्रमोद शंकर, मेडम कस्तवार आदि कई पात्र हैं जो अपनी छोटी-बड़ी उपस्थिति से मूलकथानक को सफलतापूर्वक गतिप्रदान करते हैं।
उपन्यासकार ने शुभ्रा और काजू सपेरा के बहाने आगामी समय का भी आकलन करने से गुरेज़ नहीं किया है-‘‘इतना निश्चित है कि आगामी जो समय है, वह पुरुषार्थहीन महत्वाकांक्षाओं का समय है। यह अकर्मण्यता एक ऐसी अपसंस्कृति को जनम दे सकती है जिसमें और तो और बच्चियों की देह के भूखे भेड़िए अनेक तरह की चालें चल कर अपना मतलब सिद्ध करते रहेंगे। भगवान बचाए ऐसे समय से।’’  
‘‘पहाड़ का पाताल’’ के लेखक डॉ. श्यामसुंदर दुबे स्वयं लगभग चालीस वर्ष तक उच्चशिक्षा विभाग में प्रोफेसर एवं प्राचार्य के पद पर रहे हैं अतः उच्चशिक्षा जगत के कोनों-कतरों से भी वे बखूबी वाक़िफ़ हैं। वे सागर विश्वविद्यालय में मुक्तिबोध सृजनपीठ के डायरेक्टर भी रह चुके हैं। उनसे विश्वविद्यालयीन जगत की कमियां एवं ख़ामियां छुपी नहीं हैं। उन्होंने जिस रोचक ढंग से उच्चशिक्षा जगत की दुरावस्थाओं की बखिया उधेड़ी है वह अपने-आप में अनूठी है। उपन्यास की भाषा कथानक और पात्रों के अनुरुप हिन्दी, उर्दू, अंग्रेजी के साथ-साथ देशज शब्दों से परिपूर्ण है। उपन्यास में सुरुचिपूर्ण विस्तार है, रोचकता है, और विचार-विमर्श के लिए अनेक ज्वलंत बिन्दु हैं। उच्चशिक्षा जगत के अंधेरे कोनों में झांकता यह उपन्यास प्रत्येक दृष्टि से दिलचस्प एवं पठनीय है।      
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