Wednesday, December 22, 2021

चर्चा प्लस | लड़कियों के विवाह की न्यूनतम आयु और लैंगिक समानता | डाॅ शरद सिंह

चर्चा प्लस
लड़कियों के विवाह की न्यूनतम आयु और लैंगिक समानता
- डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह

देर आयद- दुरुस्त आयद! बेटियों की भलाई के बारे में सोचने में वर्षों का अंतराल लगा दिया गया। शारदा एक्ट सन् 1929 में आया जिसमें लड़कियों के विवाह की न्यूनतम आयु 14 वर्ष की गई। लगभग 49 साल बाद सन् 1978 में शारदा एक्ट में संशोधन करके लड़कियों के विवाह की न्यूनतम आयु 18 वर्ष की गई और अब 43 साल बाद 21 वर्ष की जाने वाली है। यह संशोधन लैंगिक समानता की सोच को भी सुदृढ़ बनाएगा जिसकी सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक हर स्तर पर आज आवश्यकता भी है।  
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केन्द्र सरकार ने लड़कियों के विवाह की न्यूनतम कानूनी आयु को 18 साल से बढ़ाकर लड़कों के बराबर 21 साल करने का फैसला किया है। केंद्रीय कैबिनेट ने लड़कों और लड़कियों के लिए शादी की न्यूनतम उम्र एक समान, यानी 21 साल करने के विधेयक को मंजूरी दे दी है। अब इस विधेयक को कानून का रूप देने के लिए वर्तमान कानून में संशोधन किया जाएगा। यह नया कानून लागू हुआ तो सभी धर्मों और वर्गों में लड़कियों के विवाह की न्यूनतम उम्र बदल जाएगी। वर्तमान कानूनी प्रावधान के तहत लड़कों के विवाह लिए न्यूनतम आयु 21 साल और लड़कियों के लिए 18 साल निर्धारित है। विवाह से जुड़ी न्यूनतम आयु एक समान करने का यह निर्णय उस समय किया गया है जब इससे एक साल पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि सरकार इस बारे में विचार कर रही है कि महिलाओं के लिए न्यूनतम आयु क्या होनी चाहिए। यह निर्णय समता पार्टी की पूर्व अध्यक्ष जया जेटली की अध्यक्षता वाले कार्यबल की अनुशंसा के आधार पर लिया गया है। पूरी संभावना है कि सरकार बाल विवाह (रोकथाम) अधिनियम, 2006  को संशोधित करने संबंधी विधेयक संसद के मौजूदा शीतकालीन सत्र में ला सकती है। यह प्रस्तावित विधेयक विभिन्न समुदायों के विवाह से संबंधित पर्सनल लॉ में महत्वपूर्ण बदलाव का प्रयास कर सकता है ताकि शादी के लिए आयु एक समान सुनिश्चित की जा सके। इंडियन क्रिश्चियन मैरिज एक्ट 1872, पारसी मैरिज एंड डिवोर्स एक्ट 1936, स्पेशल मैरिज एक्ट 1954, मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) आवेदन अधिनियम, 1937, हिंदू मैरिज एक्ट 1955 और द हिंदू माइनॉरिटी एंड गार्जियनशिप एक्ट, 1956, सभी के अनुसार शादी करने के लिए लड़के की उम्र 21 साल और लड़कियों की 18 वर्ष होनी चाहिए। इसमें धर्म के हिसाब से कोई बदलाव या छूट नहीं दी गई है। फिलहाल बाल विवाह निषेध अधिनियम 2006 लागू है, जिसके मुताबिक 21 और 18 से पहले की शादी को बाल विवाह माना जाएगा। ऐसा करने और करवाने पर 2 साल की जेल और एक लाख तक का जुर्माना हो सकता है।
विवाह की आयु में एकरूपता लाने का विचार कोई आज ही पैदा नहीं हुआ है। वर्ष 2021 के फरवरी माह में सर्वोच्च न्यायालय ने दिल्ली और राजस्थान उच्च न्यायालयों में विवाह के लिये ‘‘समान न्यूनतम उम्र’’ घोषित करने के लंबित मामलों को अपने यहां स्थानांतरित करने की एक याचिका की जांच का फैसला किया था। भारत के मुख्य न्यायाधीश  की अगुवाई वाली एक बेंच ने ‘‘सुरक्षित लैंगिक न्याय, लैंगिक समानता और महिलाओं की गरिमा’’ के लिये दायर याचिका पर सरकार को नोटिस जारी किया। इस याचिका में विवाह की न्यूनतम आयु में विसंगतियों को दूर करने और इसको लिंग और धर्म से परे सभी नागरिकों के लिये एक समान बनाने के लिये केंद्र सरकार को निर्देश देने की मांग की गई थी। विवाह की न्यूनतम उम्र अभी तक लड़की के लिये 18 और लड़कों के लिये 21 वर्ष निर्धारित है। यह तर्क दिया गया था कि विवाह के लिये अलग-अलग उम्र मौलिक अधिकारों (अनुच्छेद 14, अनुच्छेद 15 और अनुच्छेद 21) तथा महिलाओं के प्रति सभी प्रकार के भेदभावों को समाप्त करने हेतु अभिसमय पर भारत की प्रतिबद्धता के विरुद्ध है।
विवाह की न्यूनतम आयु में एकरूपता लाने के पीछे यह ठोस तर्क दिया गया था कि इससे मातृ मृत्यु दर में कमी आएगी। पोषण स्तर में सुधार हो सकेगा। इससे लडत्रकियों को को उच्च शिक्षा और आर्थिक प्रगति के अधिक अवसर प्राप्त होंगे। इस प्रकार एक अधिक समतावादी समाज का निर्माण हो सकेगा। विवाह की न्यूनतम आयु बढ़ने से उन लड़कियों को भी स्नातक तक पढ़ाई करने का अवसर मिल जाएगा जिनसे विवाह के आधार पर पढ़ाई छुड़ा दी जाती है। इसका सकारात्मक पहलू यह भी होगा कि स्नातक करने वाली युवतियों की संख्या में वृद्धि होगी जिससे महिला श्रम शक्ति भागीदारी के अनुपात में सुधार होगा। लड़का और लड़की दोनों आर्थिक तथा सामाजिक रूप से लाभान्वित होंगे। महिलाएं आर्थिक रूप से सशक्त होकर अपने हित में निर्णय ले सकेंगी।
नीति आयोग में जया जेटली की अध्यक्षता में साल 2020 में बने टास्क फोर्स की सिफारिश के अनुसार पहले बच्चे का जन्म देते समय उम्र 21 वर्ष होनी चाहिए। विवाह में देरी का परिवारों, महिलाओं, बच्चों और समाज के आर्थिक, सामाजिक और स्वास्थ्य पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। उल्लेखनीय है कि इस टास्कफोर्स को मातृत्व की आयु से संबंधित मामलों, मातृ मृत्यु दर को कम करने, पोषण स्तर में सुधार और संबंधित मुद्दों की जांच करने के लिए गठित किया गया था। केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 2020-21 के अपने बजट भाषण के दौरान टास्क फोर्स के गठन का जिक्र करते हुए कहा था, ‘‘1929 के तत्कालीन शारदा अधिनियम में संशोधन करके 1978 में महिलाओं की शादी की उम्र 15 साल से बढ़ाकर 18 साल कर दी गई थी। जैसे-जैसे भारत आगे बढ़ रहा है, महिलाओं के लिए उच्च शिक्षा और कैरियर बनाने के अवसर खुल रहे हैं। मातृ मृत्यु दर को कम करने के साथ-साथ पोषण स्तर में सुधार की अनिवार्यता है। एक लड़की के मातृत्व में प्रवेश करने की उम्र के पूरे मुद्दे को इसी रोशनी में देखने की जरूरत है।’’
देखा जाए तो लड़कियों की विवाह की न्यूनतम आयु की स्थिति सदियों से असंगत रही है। सन् 1927 में न्यायाधीश और समाज सुधारक राय साहब हरबिलास शारदा ने बाल विवाह रोकने के लिए संसद में विधेयक पेश किया था जिसमें लड़कों के लिए शादी की उम्र 18 और लड़कियों के लिए 14 तय की गई। न्यूनतम आयु की कोई सीमा न होने से एक सीमा होने की दिशा में ‘शारदा एक्ट’ एक महत्वपूर्ण कदम था लेकिन यह मातृत्व की शारीरिक क्षमता की दृष्टि से अनुपयुक्त था। इसके साथ ही इसमें दण्ड का प्रावधान भी बहुत कम था। कानून तोड़ने वाले को केवल 15 दिन जेल या हजार रुपये जुर्माना या दोनों हो सकते थे। यद्यपि उस जमाने में हज़ार रुपए की कीमत आज की मौद्रिक तुलना में बहुत अधिक थी, फिर भी दोषियों के लिए यह दण्ड हल्का ही था।
देश की स्वतंत्रता के लगभग 30 वर्ष बाद लड़कियों की मातृत्व वहन करने की शारीरिक क्षमता और स्वस्थ प्रसव के आधार पर शारदा एक्ट में संशोधन किए जाने पर विचार किया जाने लगा। सन् 1978 में शारदा एक्ट में संशोधन किया गया जिसके अंतर्गत लड़कों के लिए विवाह की न्यूनतम उम्र 21 और लड़कियों के लिए 18 तय की गई। जो आज तक लागू है। अब लड़कियों के विवाह की न्यूनतम आयु 18 से बढ़ा कर 21 किए जाने के प्रस्ताव पर सोशल मीडिया की ‘टाईमपास’ किस्म के लोगों द्वारा मताधिकार की आयु का तर्क दिया जा रहा है कि जब मतदान की आयु 18 वर्ष हो सकती है तो विवाह की आयु 21 वर्ष क्यों? इसका सीधा उत्तर यही है कि सरकार चुनने में यदि गलती हो जाए तो पांच साल बाद या मध्यावधि चुनाव के द्वारा सरकार बदली जा सकती है। किन्तु अपरिपक्व मातृत्व के जोखिम में पत्नी की मृत्यु होने पर, बेरोजगारी की स्थिति में परिवार न पाल सकने पर अथवा अपरिपक्व अवस्था में जन्मे कमजोर अथवा शारीरिक दोषपूर्ण बच्चे को आप कैसे बदलेंगे? लड़कियों की विवाह की न्यूनतम आयु वैज्ञानिक एवं आर्थिक दोनों दशाओं को ध्यान में रखते हुए तय किया जाना ही सबसे अच्छा कदम होगा।
जब लड़कियों के विवाह की न्यूनतम आयु की चर्चा की जाए तो इस बात को ध्यान में रखना जरूरी है कि यह विषय मात्र पढ़े-लिखे शहरी तबके से जुड़ा हुआ नहीं है। यह विषय उन लोगों के लिए भी है जो आदिवासी एवं ग्रामीण अंचलों में अत्यंत सीमित स्वास्थ्य सुविधाओं साथ रहते हैं। यह विषय उन लोगों से भी जुड़ा हुआ है जो आर्थिक रूप से कमजोर हैं और जिनमें साक्षरता का प्रतिशत कम है। यह विषय उन लोगों से भी जुड़ा हुआ है जो बेटी को बोझ समझते हैं और उसकी शिक्षा पर ध्यान देने के बजाए उसका जल्द से जल्दी विवाह कर के ‘‘भारमुक्त’’ हो जाना चाहते हैं। समूचे समाज को ध्यान में रख कर ही ऐसे मुद्दों पर कानूनी संशोधन किए जाते हैं और तभी ऐसे संशोधन हितकारी सिद्ध होते हैं। यूं भी हमारे देश में दण्ड के भय के बिना स्वविवेक से पूर्ण सुधार संभव ही नहीं है। ऐसे लोगों का प्रतिशत कम ही है जो बेटी की वैवाहिक आयु को ले कर व्याकुल नहीं होते हैं वरन् समाज का एक बड़ा प्रतिशत बेटी के शीघ्र विवाह की हड़बड़ी में रहता है। ऐसे लोगों पर कानूनी बंदिश ही कारगर सिद्ध हो सकती है और बेटियों को बेटों के समान अपना व्यक्ति निर्मित करने का भरपूर अवसर मिल सकेगा। शारीरिक दृष्टि (बायोलाॅजिकली) भी वह मातृत्व धारण के करने और मातृत्व की जिम्मेदारी निभाने में अधिक सक्षम हो सकेगी। वर्तमान एकल परिवार पद्धति में यह और भी अधिक जरूरी है कि लड़की अपने विवाह और मातृत्व के बारे में निर्णय लेने के लिए मानसिक रूप से भी परिपक्व अर्थात् बालिग हो चुकी रहे। भावी स्वस्थ समाज की संरचना की दिशा में लड़कियों के विवाह की न्यूनतम आयु बढ़ाया जाना लाभप्रद ही रहेगा, साथ ही लैंगिक समानता की भावना का भी विकास करने में भी सहायक होगा।
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Tuesday, December 21, 2021

पुस्तक समीक्षा | स्त्री स्वर को मुखर करता एक उम्दा काव्य संग्रह | समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह

प्रस्तुत है आज 21.12. 2021 को #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई संपादक अनुभूति गुप्ता द्वारा संपादित काव्य संग्रह "स्त्री स्वर" की समीक्षा...
आभार दैनिक "आचरण" 🙏
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पुस्तक समीक्षा
स्त्री स्वर को मुखर करता एक उम्दा काव्य संग्रह
समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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काव्य संग्रह   - स्त्री स्वर
संपादक      - अनुभूति गुप्ता
प्रकाशक     - उदीप्त प्रकाशन, लखीमपुर खीरी, (उ.प्र.)
मूल्य        - 100/-
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‘‘स्त्री स्वर’’ यह एक साझा काव्य संकलन है। इसका संपादन अनुभूति गुप्ता ने किया है। इस संकलन में पंद्रह कवि एवं कवयित्रियों की वे काव्य रचनाएं सम्मिलित की गई हैं जिनमें स्त्री स्वर मुखर हुआ है। इस सम्वेत संकलन में डॉ भारती वर्मा बौड़ाई, अजय कुमार मिश्र ‘‘अजयश्री’’ वीणा मावर, डॉ सुरेंद्र निशब्द, आनंद वर्धन शर्मा, डॉ शम्मी श्रीवास्तव, रामेश्वर प्रसाद गुप्त, शिवमंगल सिंह, त्रिवेणी मिश्रा, वीरेंद्र प्रधान, प्रभु दयाल खट्टर, गिरीश चावला, संजय सनातन, जितेंद्र कुमार वैष्णव और विनोद कुमार की कविताएं संग्रहित की गई है। इन सभी कविताओं में स्त्री जीवन के संघर्ष दशाओं और क्षमताओं की चर्चा की गई है।
वर्तमान समाज में भी स्त्री पूर्णतया सुरक्षित नहीं है, न तो घर में और न ही बाहर। वह अपने अस्तित्व को साबित करने के लिए निरंतर संघर्ष करती रहती है। इसके बावजूद उसे प्रताड़ना भी सहना पड़ता है लेकिन उसके भीतर की शक्ति उसे सशक्त बनाए रखती है और वह बिना डरे बिना थके जूती रहती है। कवयित्री डॉ भारती वर्मा बौड़ाई ने अपनी कविता ‘‘मैं नव विहान हूं’’ में स्त्री के सशक्त पक्ष को सामने रखा है। पंक्तियां देखिए-
मेरी ओर /बढ़ते हुए ये
असंख्य राक्षसी हाथ
पर नहीं कोई /हाथ ऐसा
जो रक्षा के लिए /उठता दिखे
पर नहीं /किंचित भी
भयभीत मैं /मेरे दोनों हाथ
समर्थ है पूर्णतया /मेरे लिए,
अब कितने भी /उठें वहशी हाथ मेरी ओर
तोड़ डालूंगी उन्हें स्वयं
करूंगी अब न्याय स्वयं
क्योंकि मैं समर्थ और शक्तिवान हूं
मैं नव विहान हूं।

कवि अजय श्री ने अपनी कविता में साहित्य के उस पक्ष को सामने रखा है जिसमें एक विज्ञापन के समान स्त्री का वर्णन करके वाहवाही लूटने का प्रयास किया जाता है। कतिपय साहित्यकारों का प्रिय विषय गांव का वर्णन और स्त्री की देह मात्र इसलिए होता हैकि उसके द्वारा उन्हें पाठकवर्ग अथवा श्रोताओं की प्रशंसा मिल जाती है। ऐसे कवियों पर कटाक्ष करते हुए अजयश्री ने अपनी कविता ‘‘लेखन का प्रिय विषय’’ के अंतर्गत लिखा है-
गांव की माटी/और औरत की देह !
खूब दोहन करते हैं
जिनका नहीं है सरोकार ।
शहर के किचन में
पकती है गांव की रसोई
गर्भाधान से लेकर श्मशान तक
अनुसंधान करते हैं/परत दर परत।
शहर की रौनक/जब उतरती है
खेतों में बुवाई के लिए
जोड़ती है कछोटामार/खेतीहरनों से,
एक एक शब्द उगता है/किसी आलीशान बंगले में
करीने से सजाएं स्टडी टेबल पर
रखे लैपटॉप पर।

भारतीय संस्कृति यूं तो दुनिया में सदा गौरव का विषय रही है किंतु कुछ ऐसे हादसे हुए हैं जिन्होंने संस्कृति और समाज दोनों को लज्जित किया है। ऐसी ही एक घटना रही है निर्भया कांड। जब भी उस नृशंस घटना की स्मृति जागती है तो समाज में बेटियां असुरक्षित दिखाई देने लगती हैं और समाज को उसकी भीरुता के लिए ललकारने का मन करने लगता है। इसी भावभूमि पर है कवयित्री वीणा मावर की कविता ‘‘निर्भया’’। अंश देखिए-
कहां गए वो समाज सुधारक
गए कहां राममोहन और विद्यासागर जुल्मों के खिलाफ
भुजा जिनकी थी फड़की
करी खिलाफत फिर पूरे समाज की
हुई सुरक्षित जिससे फिर हर अबला
तुमसे तो अच्छा बैटिंग ही निकला
था फिरंगी पर अपना निकला
सती प्रथा को खत्म जो कर गया
था हुमायूं भी एक विदेशी
लगी देर पर पहुंचा वह भी
रखी लाज उसने भी राखी की
राह तक रहे तुम किस पल की?

नारी शक्ति की ही बात करती कविता है डॉ शम्मी श्रीवास्तव की, जिसका शीर्षक ही है ‘‘नारी शक्ति’’। अपनी इस कविता में कवयित्री ने स्त्री की उस क्षमता का स्मरण कराया है जब वह अन्याय के विरुद्ध हथियार उठा लेती है और प्रताड़ना का प्रतिरोध करती है। कवयित्री ने देश के स्वतंत्रता संग्राम में झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के योगदान का भी स्मरण कराया है -
जब-जब अधर्म पड़ा है अन्याय ने मचाई तबाही है
नारी शक्ति ने आगे बढ सदैव धूम मचाई है
उठो ! आज फिर जगाओ अपनी शक्ति का एहसास
भूल गई? तुमने ही बदला भारत का इतिहास
अगर न तुमने चिंगारी भड़काई होतीं
देश ने कैसे इस साल 73 वीं वर्षगांठ मनाई होती
मत भूलो नारी ने किया है बार-बार चमत्कार
शक्ति शौर्य की है यह देवी जाने कुल संसार।

कवि शिवमंगल सिंह ने अपनी कविता ‘‘पेड़ जैसी होती है स्त्रियां’’ में स्त्री जीवन के विविध पक्षों को अपनी कविता में निबद्ध किया है। जिस प्रकार एक पेड़ सभी तरह के झंझावात  सहन करके भी अपने फल, फूल, पत्तों की रक्षा करता है, उसी प्रकार एक स्त्री सारे दुख कष्ट सहती हुई अपने परिवार के प्रति समर्पित रहती है। स्त्री जीवन की पेड़ से तुलना करती हुए यह कविता उल्लेखनीय है-
पेड़ जो /तेज आंधियों में भी
झुक झुक कर /चुपचाप
उसके थपेड़ों को सह लेता है
ग्रीष्म के तपन में भी
धरती पर शीतल छांव देता है
बरसात में भीग कर/मुस्कुराहट बिखेर देता है
शरद ऋतु में रात रात भर ठिठुर कर
शांत रहता है /मौसम के तमाम
झंझावात को चुपचाप सहन कर लेता
स्त्रियों भी /पेड़ की तरह
अपने जीवन की तमाम वेदना को /सह लेती हैं
विपरीत परिस्थितियों में भी /मुस्कुराती हैं
खिलखिलाती हैं /धरती पर स्वर्ग बिखेर देती हैं ।

कवि वीरेंद्र प्रधान मैं समाज में नारी के महत्व को स्थापित करते हुए उसकी उपस्थिति की महत्ता को रेखांकित किया है। उनकी कविता ‘‘नारी’’ स्त्री शक्ति का आह्वान करने में सक्षम है। कविता देखिए-
पुत्री भगिनी जननी तो पत्नी किसी की
तू नारी तू ही तो है संचालक परिवार की
तेरे बिना घर सूना, जग सूना, सब सूना
फिर भी तुझे समस्या है अपने अधिकार की
इनके भी दिल है, दिमाग है, दो हाथ हैं
नहीं किसी मायने में नर से कम नारियां
नारी की कीमत को कमतर आंकता है नर
उस पे थोपता अपने ऐब और मक्कारियां
अपना अधिकार तुझे लेकर ही रहना है
‘‘मेरी आवाज सुनो’’ नर से यह कहना है
पथ से विचलित न हो जाये कभी तेरा नर
उसको मर्यादित कर सीता स्वयं बनना है

यूं तो इस संग्रह की प्रत्येक कविता में स्त्री स्वर मुखरित हुआ है किंतु एक और कविता है इस संग्रह में जिसका उल्लेख किया जाना जरूरी है। कविता का शीर्षक है ‘‘बस स्टॉप पर खड़ी अकेली लड़की’’। यह कविता कवि संजय सनातन की है जिसमें उन्होंने दैनिक जीवन में एक लड़की के आत्मसम्मान को चोट पहुंचाने वाली कुचेष्टाओं की ओर ध्यान आकर्षित किया है। कविता देखिए -
वह तन्हा लड़की और सिमटती जाती है
उसे पीठ पीछे भी /निगाहों की कटारें चुभने लगती हैं
तभी अचानक उसकी बस आ जाती है
और वह अपने गंतव्य की ओर चली जाती है
लेकिन हवा में टंगी रह जाती है
अश्लील हंसी की ध्वनियां /और वो असभ्य इशारे
बस स्टॉप पर /आने वाली किसी दूसरी लड़की के लिए।

अनुभूति गुप्ता ने स्त्री के पक्ष में लिखी गई कविताओं को एक संग्रह के रूप में प्रकाशित कर प्रशंसनीय कार्य किया है। यह पुस्तक पठनीय है तथा एक सार्थक स्त्री विमर्श रचती है।
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Wednesday, December 15, 2021

चर्चा प्लस | सरदार वल्लभ भाई पटेल का पुराना नाता था बुंदेलखंड से | डाॅ शरद सिंह

चर्चा प्लस 
पुण्यतिथि 15 दिसम्बर विशेष
सरदार वल्लभ भाई पटेल का पुराना नाता था बुंदेलखंड से
 - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
  सरदार वल्लभ भाई पटेल भारतीय राजनीति के एक ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने कठोर निर्णयों पर अमल करते हुए देश का राजनीतिक नक्शा ही बदल दिया। रियासतों में बंटा देश एक झंडे अर्थात् तिरंगे के तले आ गया। बारडोली कस्बे में सत्याग्रह करने के लिए ही उन्हंे पहले ‘बारडोली का सरदार’ और बाद में केवल ‘सरदार’ कहा जाने लगा। इसके बाद वे समूचे जनमानस के ‘सरदार’ बन कर देश की सेवा करते रहे। बुंदेलखंडवासी इस पर गर्व कर सकते हैं कि ऐसे लौह व्यक्तित्व का  बुंदेलखंड से पुराना नाता रहा है।  
   बुंदेलखंड से लौह पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल का नाता उनके पिता झावेर भाई के समय से रहा। सरदार वल्लभ भाई पटेल का जन्म 31 अक्टूबर, 1875 को गुजरात के नाडियाड स्थित एक साधारण कृषक परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम झावेरभाई और माता का नाम लाडभाई था। उनके पिता पूर्व में करमसाड में रहते थे। वल्लभ भाई के पिता मूलतः कृषक होते हुए भी एक कुशल योद्धा एवं शतरंज के श्रेष्ठ खिलाड़ी थे। सन् 1857 के पूर्व ही अंग्रेजों के विरुद्ध विभिन्न राज्यों में सुगबुगाहट आरम्भ हो चुकी थी। मराठा नाना साहब एवं झांसी की रानी लक्ष्मीबाई ने अंग्रेजों की असम्मानजनक शर्तें मानने से स्पष्ट मना कर दिया था। धीरे-धीरे युद्ध की स्थितियां निर्मित होती जा रही थीं। उत्तर भारत तथा महाराष्ट्र से नाडियाड आने वाले व्यापारियों के माध्यम से इस सम्बन्ध में छिटपुट समाचार झावेर भाई को मिलते रहते थे। वे भी अंग्रेजों द्वारा भारतीय कृषकों के साथ किए जाने वाले भेद-भाव से अप्रसन्न थे। एक दिन उन्हें पता चला कि उनके कुछ मित्र नाना साहब की सेना में भर्ती होने जा रहे हैं। झावेर भाई ने भी तय किया कि वे भी सेना में भर्ती होकर अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध लड़ेंगे। वे जानते थे कि उनके परिवारजन इसके लिए उन्हें अनुमति नहीं देंगे। अतः एक दिन वे बिना किसी को बताए घर से निकल पड़े।
नाना साहब की सेना में भर्ती होने के उपरांत उन्होंने सैन्य कौशल प्राप्त किया। उस समय तक झांसी की रानी ने ‘अपनी झांसी नहीं दूंगी’ का उद्घोष कर दिया था। सन् 1857 में अंग्रेजों ने झांसी पर आक्रमण कर दिया। रानी लक्ष्मीबाई की सहायता करने के लिए नाना साहब अपनी सेना लेकर झांसी की ओर चल दिए। उनकी सेना में झावेर भाई भी थे।
नाना साहब ने अपनी सेना की एक टुकड़ी रानी लक्ष्मीबाई की सेना में शामिल कर दी। इस टुकड़ी में झावेर भाई थे जो रानी लक्ष्मी बाई की सेना के साथ अंग्रेजों से लोहा लेते हुए झांसी से ग्वालियर की ओर बढ़ रहे थे। उस दौरान झावेर भाई ने बुंदेलखंड में एक योद्धा के रूप में अनेक दिन बिताए। दुर्भाग्यवश, रानी लक्ष्मी बाई अंग्रेजों से घिर गयीं और वीरगति को प्राप्त हुईं तथा झावेर भाई को इन्दौर के महाराजा की सेना ने बंदी बना लिया। अपनी चतुराई और शतरंज के कौशल के सहारे झावेर भाई महाराजा इन्दौर की क़ैद से आजाद हुए।
स्वतंत्रता आन्दोलन में वल्लभ भाई का सबसे पहला और बड़ा योगदान खेड़ा आन्दोलन में था। गुजरात का खेड़ा जिला उन दिनों भयंकर सूखे की चपेट में था। किसानों ने अंग्रेज सरकार से लगान में छूट की मांग की। जब यह स्वीकार नहीं किया गया तो वल्लभ भाई ने महात्मा गांधी के साथ पहुंच कर किसानों का नेतृत्व किया और उन्हें कर न देने के लिए प्रेरित किया। अंततः सरकार को उनकी मांग माननी पड़ी और लगान में छूट दी गयी। यह सरदार पटेल की पहली सफलता थी। इसके बाद उन्होंने बोरसद और बारडोली में सत्याग्रह का आह्वान किया। बारडोली कस्बे में सत्याग्रह करने के लिए ही उन्हंे पहले ‘बारडोली का सरदार’ और बाद में केवल ‘सरदार’ कहा जाने लगा। यह एक कुशलतापूर्वक संगठित आन्दोलन था जिसमें समाचारपत्रों, इश्तिहारों एवं पर्चों से जनसमर्थन प्राप्त किया गया था तथा सरकार  का विरोध किया गया था। इस संगठित आन्दोलन की संरचना एवं संचालन वल्लभ भाई ने किया था। उनके इस आन्दोलन के समक्ष सरकार को झुकना पड़ा था।
महात्मा गांधी द्वारा चलाए गए असहयोग आन्दोलन के दौरान सरकारी न्यायालयों का बहिष्कार करने आह्वान करते हुए स्वयं का उदाहरण प्रस्तुत करने के लिए वल्लभ भाई ने सदा के लिए वकालत का त्याग कर दिया। इस प्रकार का कर्मठताभरा त्याग वल्लभ भाई ही कर सकते थे। महात्मा गांधी और मोतीलाल नेहरू दोनों ही बल्लभ भाई पटेल पर अगाध विश्वास करते थे। महात्मा गांधी ने दांडी यात्रा के बाद अपने एक भाषण में स्वीकार किया था कि -‘‘वल्लभ भाई दांडी में मेरे साथ उपस्थित नहीं हो सके क्यों कि सरकार ने उन्हें बंदी बना कर जेल में डाल दिया था, लेकिन उनका उत्साह और उनकी आशाएं दांडी में जनसमूह के रूप में मेरे साथ थीं। यदि मैं नमक कानून तोड़ने में सफल रहा तो इस सफलता की जमीन वल्लभ भाई द्वारा तैयार की गई थी।’’
वल्लभ भाई महात्मा गंाधी को जितना आदर देते थे, महात्मा गांधी भी उन्हें उतनी ही स्नेह करते थे। वे प्रत्येक मामले में एक बार वल्लभ भाई से सलाह ले लेना उचित समझते थे। महात्मा गांधी जानते थे कि वल्लभ भाई व्यवहारिक दृष्टि से उचित सलाह देंगे। जब से वल्लभ भाई ने स्वदेशी वस्त्रों को अपने पहनावे के रूप में अपनाया था तब से ही महात्मा गंाधी का लगाव वल्लभ भाई के प्रति बढ़ गया था। वे समझ गए थे कि वल्लभ भाई कोई अवसरवादी नेता नहीं हैं, वरन् उनमें नेतृत्व और त्याग की क्षमता जन्मजात है। दांडी-यात्रा की सफलता ने महात्मा गांधी के मन में वल्लभ भाई की छवि को और अधिक प्रखर बना दिया।
सरकार एक आर्डीनेंस निकालकर कांग्रेस की समस्त संगठन को गैर कानूनी घोषित कर चुकी थी और कांग्रेस के अध्यक्ष होने के नाते पं. जवाहरलाल नेहरू और उनके पिता पं. मोतीलाल नेहरू गिरफ्तार किए जा चुके थे। पं. मोतीलाल जी जेल जाते हुए सरदार पटेल जी को अपना स्थानापन्न नियुक्त कर गए थे। इसलिए 26 जून 1930 को जेल से बाहर आते ही वल्लभ भाई कांग्रेस संगठन को सुदृढ़ करने और सत्याग्रह-संग्राम को तीव्र करने में संलग्न हो गए।
सरदार पटेल ने अपना महत्वपूर्ण योगदान 1917 में खेड़ा किसान सत्याग्रह, 1923 में नागपुर झंडा सत्याग्रह, 1924 में बोरसद सत्याग्रह के उपरांत 1928 में बारदोली सत्याग्रह में देकर अपनी राष्ट्रीय पहचान कायम की। इसी बारदोली सत्याग्रह में उनके सफल नेतृत्व से प्रभावित होकर महात्मा गांधी और वहां के किसानों ने वल्लभ भाई पटेल को ‘‘सरदार’’ की उपाधि दी। वहीं 1922, 1924 तथा 1927 में सरदार पटेल अहमदाबाद नगर निगम के अध्यक्ष चुने गये। 1930 के गांधी के नमक सत्याग्रह और सविनय अवज्ञा आन्दोलन की तैयारी के प्रमुख शिल्पकार सरदार पटेल ही थे। 1931 के कांग्रेस के कराची अधिवेशन में सरदार पटेल को अध्यक्ष चुना गया। सविनय अवज्ञा आन्दोलन में सरदार पटेल को जब 1932 में गिरफ्तार किया गया तो उन्हें गांधी के साथ 16 माह जेल में रहने का सौभाग्य हासिल हुआ। 1939 में हरिपुरा कांग्रेस अधिवेशन में जब देशी रियासतों को भारत का अभिन्न अंग मानने का प्रस्ताव पारित कर दिया गया तभी से सरदार पटेल ने भारत के एकीकरण की दिशा में कार्य करना प्रारंभ कर दिया तथा अनेक देशी रियासतों में प्रजा मण्डल और अखिल भारतीय प्रजा मण्डल की स्थापना करवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। प्रजा मण्डल की संकल्पना को अपनाते हुए बुंदेलखंड में भी इसकी इकाइयां गठित की गई थीं। लगातार कठोर परिश्रम ने वल्लभ भाई पटेल के स्वास्थ्य को प्रभावित किया था। स्वास्थ्य खराब होने के बाद भी परिस्थितिवश उन्हें अनेक यात्राएं करनी पड़ीं। लगातार दौरों और विपरीत परिस्थितियों में परहेज संभव नहीं हो पाता था। इन सबका दुष्प्रभाव उनके शरीर पर पड़ता गया। 15 दिसम्बर 1950 को प्रातः वल्लभ भाई पटेल के सीने में दर्द उठा। तत्काल चिकित्सकों को बुलाया गया। चिकित्सकों ने हरसंभव प्रयास किया किन्तु दुर्भाग्यवश  9 बजकर 37 मिनट पर हृदयगति रुकने से उनका निधन हो गया। सरदार पटेल के निधन का समाचार विद्युतगति से पूरे देश में फैल गया और समूचा राष्ट्र गहरे शोक में डूब गया। उसी दिन सायंकाल उनके एकमात्र पुत्र डाह्याभाई पटेल ने उनके शव को अग्नि को समर्पित किया। शोक संतप्त राष्ट्र ने ‘लौह पुरुष’ को श्रद्धांजलि अर्पित की।
समूचा बुंदेलखंड वल्लभ भाई पटेल का स्मरण करता ही है तथा चैक-चैराहों, तिराहों में उनकी प्रतिमाएं स्थापित हैं। इसी प्रकार सागर संभागीय मुख्यालय की रजाखेड़ी नगरपालिका के बजरिया तिराहे पर भी सरदार वल्लभ भाई पटेल की एक प्रतिमा स्थापित है। यह प्रतिमा सरदार पटेल के व्यक्तित्व और विचारों का बुंदेलखंड पर प्रभाव का प्रतीक है क्योंकि इस प्रतिमा का निर्माण सन् 2015 में लगभग 6 लाख रुपए के निजी खर्च पर कराया गया। इससे पूर्व लगभग साल भर पहले से प्रतिमा के लिए प्लेटफार्म का निर्माण शुरू कर दिया गया था। प्रतिमा जयपुर से बनवाई गई। इस प्रतिमा का निर्माण एवं स्थापना कुर्मी समाज युवा संगठन के जिलाध्यक्ष विजय पटेल ने अपने पिता स्व. शिब्बू दाऊ पटेल की स्मृति में कराया। विजय पटेल इसका कारण बताते हैं कि वे सदा सरदार पटेल के विचारों से प्रभावित रहे जिसकी प्रेरणा उन्हें अपने पिता से मिली। इसीलिए अपने पिता की स्मृति में उन्होंने सरदार पटेल की प्रतिमा स्थापित कराने का निर्णय लिया। वास्तव में वल्लभ भाई पटेल आधुनिक भारत के शिल्पी थे, उनके विचार आज भी बुंदेलखंड की विकासयात्रा का पथप्रदर्शन कर रहे हैं।
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Tuesday, December 14, 2021

पुस्तक समीक्षा | कृष्णा सोबती के कृतित्व पर केन्द्रित एक अनूठी पुस्तक ‘‘सापेक्ष 60’’ | समीक्षक - डॉ (सुश्री) शरद सिंह

प्रस्तुत है आज 14.12. 2021 को #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई संपादक महावीर अग्रवाल द्वारा संपादित पुस्तक "सापेक्ष 60" की समीक्षा... 
आभार दैनिक "आचरण" 🙏
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पुस्तक समीक्षा
कृष्णा सोबती के कृतित्व पर केन्द्रित एक अनूठी पुस्तक ‘‘सापेक्ष 60’’  
 समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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पुस्तक       - सापेक्ष 60 (कृष्णा सोबती के कृतित्व पर केन्द्रित)
संपादक      - महावीर अग्रवाल
प्रकाशक     - सापेक्ष, ए-14, आदर्श नगर, दुर्ग (छ.ग.)
मूल्य        - 200/-
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‘‘सापेक्ष 60’’ एक पुस्तक के रूप में जब मुझे डाक से मिली तो मैं यह देख कर अवाक् रह गई कि हार्डबाउन्ड पुस्तक, सुंदर छपाई, पृष्ठ संख्या 472 और मूल्य मात्र 200 रुपये। क्या आज के समय में यह संभव है? मेरे हाथों में इसका प्रमाण था ‘‘सापेक्ष 60’’ के रूप में। वस्तुतः यह ‘‘सापेक्ष’’ पत्रिका का 59 और 60 संयुक्तांक है किन्तु एक हार्डबाउन्ड पुस्तक के रूप में प्रकाशित है। इतनी मोटी पुस्तक का मूल्य 600 रुपये से अधिक ही होता। उस पर इस पुस्तक में संग्रहीत सामग्री की मूल्यवत्ता देखें तो इसकी कीमत हज़ारों में जाएगी। किन्तु यह संपादक महावीर अग्रवाल का ही साहस है जो उन्होंने पत्रिका के उस संयुक्तांक को जो हिन्दी की प्रतिष्ठित लेखिका कृष्णा सोबती पर केन्द्रित है, एक हार्डबाउन्ड पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया। इस तरह के उदाहरण धार्मिक पत्रिकाओं के महत्वपूर्ण अंकों को पुस्तक के रूप में प्रकाशित करने के सिलसिले में ही मिलते हैं। कम से कम हिन्दी साहित्य जगत में यह अपने आप में एक अनूठी पुस्तक है। बेशक़ इसे प्रकाशित करने के लिए रज़ा फाउन्डेशन से आर्थिक अनुदान प्राप्त हुआ है किन्तु अनुदान ले कर भी कोई संपादक इस प्रकार का साहस नहीं कर पाता है। यह सचमुच प्रशंसनीय कार्य है।
रज़ा फाउन्डेशन के संबंध में यहां उल्लेखनीय है कि हिंदी के प्रसिद्ध कवि अशोक वाजपेयी कृष्णा सोबती के सबसे निकट एवं विश्वसनीय रहे हैं। इसी मित्रता के आधार पर कृष्णा सोबती ने अपने और अपने पति शिवनाथ के जीवन की सारी जमा पंूजी जो एक करोड़ रुपए थी और दिल्ली के मयूरविहार इलाके में स्थित उनका फ्लैट रजा फाउंडेशन के नाम करते हुए अशोक वाजपेयी को सौंप दिया था। कृष्णा सोबती की अभिलाषा थी कि रज़ा फाउंडेशन इस पैसे और संपत्ति का उपयोग भारतीय लेखकों और सृजनात्मक कार्यों को आगे बढ़ाने के लिए करे। अपने एक साक्षात्कार में अशोक वाजपेयी ने यह स्पष्ट शब्दों में कहा था कि- ‘‘ ऐसा कोई दूसरा भारतीय लेखक नहीं, जिसने इतनी दरियादिली से दूसरे लेखकों और उनके सृजन के लिए पैसे दिए हों।’’
महावीर अग्रवाल ने कृष्णा सोबती के कृतित्व पर केन्द्रित ‘‘सापेक्ष 60’’ को पुस्तक के रूप में प्रकाशित कर कृष्णा सोबती की अभिलाषा को भी पूरा किया है क्योंकि इतने कम मूल्य में उन पर केन्द्रित समग्र सामग्री किसी भी शोधार्थी अथवा कृष्णा सोबती के कृतित्व के प्रति जिज्ञासा रखने वाले व्यक्ति की ज़ेब पर कतई भारी नहीं पड़ेगी।
कृष्णा सोबती हिन्दी की लेखिकाओं में वह क्रांतिकारी नाम है जिसने खुल कर, साहस के साथ कलम चलाई और वे कभी डरी या घबराई नहीं। वे अपने लेखन के साथ समाज के कट्टरपंथियों के सामने डट कर खड़ी रहीं। कृष्णा सोबती का जन्म पंजाब प्रांत के गुजरात नामक उस हिस्से में 18 फरवरी 1925 को हुआ था, जो अब पाकिस्तान में है। उन्होंने आरम्भ में लाहौर के फतेहचंद कॉलेज से अपनी उच्च शिक्षा की शुरुआत की थी, परंतु जब भारत का विभाजन हुआ तो उनका परिवार भारत लौट आया। कृष्णा सोबती की शिक्षा दिल्ली और शिमला में हुई।
कृष्णा सोबती को अपने कथापात्रों के मनोविज्ञान को अपने उपन्यासों और कहानियों में उतारने में महारत हासिल थी। उनके सभी पात्र प्रखर होते थे। विशेषरूप से उनकी कहानियों के स्त्री पात्र अपने अस्तित्व के लिए आवाज़ बुलंद करने वाले होते थे, जिसके कारण वे कई बार विवादों में भी रहीं। उन्होंने जिंदगीनामा, डार से बिछुड़ी, मित्रो मरजानी, यारों के यार, तिन पहाड़, समय सरगम, जैनी मेहरबान सिंह, गुजरात पाकिस्तान से गुजरात हिन्दुस्तान, ऐ लड़की, दिल-ओ-दानिश और चन्ना जैसे उपन्यास लिखें।
लेखन में निर्भीकता, खुलापन और भाषागत प्रयोगशीलता ये तीन विशेषताएं कृष्णा सोबती को अपने समकालीन लेखिकाओं से अलग करती हैं। सामाजिक बंदिशों के समय में अपने स्त्री समाज के प्रति मुखर होना उनके आंतरिक साहस को रेखांकित करता है। सन् 1950 में कहानी ‘‘लामा’’ से अपनी साहित्यिक यात्रा आरंभ करने वाली कृष्ण सोबती स्त्री की स्वतंत्रता और न्याय की पक्षधर थीं। उन्होंने समय और समाज को केंद्र में रखकर अपनी रचनाओं में एक युग को गढ़ा। अपने लेखन के बारे में उनका कहना है कि ‘‘मैं बहुत नहीं लिख पाती हूं। मैं तब तक कलम नहीं चला पाती हूं, जब तक अंदर की कुलबुलाहट और उसे अभिव्यक्त करने का दबाव इतना अधिक न बढ़ जाए कि मैं लिखे बिना न रह सकूं।’’
उन पर यह आक्षेप लगाया जाता रहा है कि एक स्त्री होने के बाबजूद ‘‘यारों के यार’’ और ‘‘मित्रों मरजानी’’ में उन्होंने उन्मुक्त भाषा (बोल्ड) का प्रयोग किया जबकि वे भली-भांति जानती थीं कि उन पर ‘‘अश्लील लेखन’’ के आरोप लगेंगे। अपने एक विदेशी रेडियो साक्षात्कार में उन्होंने ‘‘अश्लील लेखन’’ के आरोप पर खुल कर अपने विचार रखे थे। उन्होंने कहा था कि - ‘‘भाषिक रचनात्मकता को हम मात्र बोल्ड के दृष्टिकोण से देखेंगे तो लेखक और भाषा दोनों के साथ अन्याय करेंगे। भाषा लेखक के बाहर और अंदर को एकसम करती है। उसकी अंतरदृष्टि और समाज के शोर को एक लय में गूंथती है। उसका ताना-बाना मात्र शब्द कोशी भाषा के बल पर ही नहीं होता। जब लेखक अपने कथ्य के अनुरूप उसे रुपांतरित करता है तो कुछ ‘नया’ घटित होता है। मेरी हर कृति के साथ भाषा बदलती है। मैं नहीं, वह पात्र है जो रचना में अपना दबाव बनाए रहते हैं। ‘ज़िन्दगीनामा’ की भाषा खेतिहर समाज से उभरी है। ‘दिलोदानिश’ की भाषा राजधानी के पुराने शहर से है, नई दिल्ली से नहीं। उसमें उर्दू का शहरातीपन है। ‘ऐ लड़की’ में भाषा का मुखड़ा कुछ और ही है। उसकी गहराई की ओर संकेत कर रही हूं।’’
कृष्णा सोबती को सन 1980 में जिंदगीनामा के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। सन 1981 में शिरोमणि पुरस्कार के अतिरिक्त मैथिली शरण गुप्त सम्मान से सम्मानित किया गया। सन 1982 में कृष्णा सोबती को हिंदी अकादमी पुरस्कार से पुरस्कृत किया गया। सन 1996 में कृष्णा सोबती को साहित्य अकादमी फेलोशिप से पुरस्कृत किया गया। सन 1999 में, लाइफटाइम लिटरेरी अचीवमेंट अवार्ड के साथ कृष्णा सोबती प्रथम महिला बनीं जिन्हें कथा चूड़ामणि अवार्ड से नवाजा गया। सन 2008 में हिंदी अकादमी दिल्ली का ‘शलाका अवार्ड’ भी उनको मिला तथा सन 2017 में ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
एक दिलचस्प बात जिसके बारे में उन्होंने अपने एक साक्षात्कार में बताया था कि उपन्यास ‘जिंदगीनामा’ सन् 1952 में लिख कर प्रकाशक के पास भेजा किन्तु प्रकाशक ने उसकी भाषा पर आपत्ति करते हुए उसमें परिवर्तन करने को कहा। कृष्णा सोबती को यह स्वीकार्य नहीं हुआ और उन्होंने उसे प्रकाशक से वापस ले लिया। अंततः वह उपन्यास सन् 1979 में प्रकाशित हुआ और उस पर उन्हें 1980 साहित्य अकादमी अवार्ड दिया गया। यद्यपि कुछ दशक बाद उन्होंने असहिष्णुता के मुद्दे पर साहित्य अकादमी अवार्ड सहित हिंदी अकादमी का ‘शलाका सम्मान’ और ‘व्यास सम्मान’ भी लौटा दिया था। इतना ही नहीं उन्होंने ‘पद्मभूषण’ लेने से भी मना कर दिया था। ऐसी दृढ़ और जीवट लेखिका के बारे जानने की जिज्ञासा हर साहित्यकार के मन में होना स्वाभाविक है। इस दृष्टि से ‘‘सापेक्ष 60’’ को महत्वपूर्ण कहा जा सकता है।
‘‘सापेक्ष 60’’ में कृष्णा सोबती के कृतित्व पर आधारित समस्त सामग्री को कुल 17 अध्यायों में रखा गया है। इन अध्यायों के पूर्व कृष्णा सोबती के वे हस्तलिखित पत्र हैं जो उन्होंने महावीर अग्रवाल को लिखे थे। ‘‘सापेक्ष 60’’ के पहले अध्याय में ‘‘दांपत्य की जुगलबंदी’’ शीर्षक से चार साक्षात्कार है - पहला साक्षात्कार है ‘‘कृष्णा सोबती और शिवनाथ ढाई आखर का घरौंदा है दांपत्य’’।  कृष्णा सोबती के जीवन और साहित्य पर चर्चा है साधना जैन और कांति कुमार जैन की ‘‘किस्सागोई के अनूठे पन में लिपटी संवेदना’’। सुमन सेठी और अनूप सेठी ने चर्चा की है ‘‘चन्ना’’ पर- ‘‘पहला और अंतिम उपन्यास चन्ना’’। संतोष अग्रवाल और महावीर अग्रवाल ने चर्चा की है कृष्णा सोबती के व्यक्तित्व पर -‘‘आत्मीय बोध की गर्माहट से भरी कृष्णा जी’’।  दूसरा अध्याय है ‘‘बुद्ध का कमंडल’’।  इस अध्याय में राजन शर्मा, मैनेजर पांडे, निरंजन देव शर्मा के लेखों के साथ ही एक संपादकीय भी है, जिसका शीर्षक है- ‘‘खरगोश के दिल में शेरनी’’।  तीसरा अध्याय है-‘‘संस्कार से संवेदना’’। इस अध्याय में कृष्णा सोबती के कृतित्व एवं व्यक्तित्व का आकलन करते पांच लेख दिए गए हैं। इसके बाद ‘‘धरोहर’’ के अंतर्गत पांच महत्वपूर्ण साहित्य पुरोधाओं के लेख है। जो हैं त्रिलोचन शास्त्री, देवेंद्र सत्यार्थी, कमलेश्वर, सत्येन कुमार और नामवर सिंह।
‘‘मनीषियों की दृष्टि में कृष्णा सोबती’’ इस शीर्षक के अंतर्गत अशोक बाजपेयी, निर्मल वर्मा, प्रयाग शुक्ल, गिरधर राठी, सुधीश पचौरी, नंदकिशोर नवल, रघुवीर सहाय, बच्चन सिंह, विजय मोहन सिंह, विजयेंद्र स्नातक, गोपाल राय, बीबा सोबती, कुंवर नारायण, अनामिका तथा ओम थानवी के विचार है।
‘‘हम हशमत के सिलसिले में’’ इस शीर्षक के अंतर्गत ‘‘हम हशमत’’ पर केंद्रित उमाशंकर जोशी, बसंत त्रिपाठी, सर्वमित्रा सुरजन तथा साधना अग्रवाल के लेख हैं। ‘‘तूलिका और रंगमंच’’ अध्याय में नामवर सिंह का लेख ‘‘पुरुष प्रधान रूढ़ियों को तोड़ती मित्रो’’,  देवेंद्र राज अंकुर का लेख ‘‘यादगार प्रस्तुति में रची बसी पाशो’’ तथा ‘‘कृष्णा सोबती पुनर्सृजन का उत्सव’’ लेख रखे गए हैं।
‘‘कवित्त’’ अध्याय में कृष्णा सोबती पर केंद्रित कविताएं हैं। ‘‘स्मृतियों का अंतरिक्ष’’ इस अध्याय में अनिता सभरवाल, रचना यादव, निर्मला जैन और रवींद्र कालिया के कृष्णा सोबती से संबंधित संस्मरण रखे गए हैं।  ‘‘साहित्य संस्कृति’’ अध्याय में रमेश नैयर तथा ललित सुरजन के लेख हैं। कृष्णा सोबती के उपन्यासों को पढ़ते हुए जो विचार मन में आए उन पर आधारित कमल कुमार और मृदुला गर्ग के लेख हंै। ‘‘कहानी और कहानी’’ अध्याय में विनोद शाही, धनंजय वर्मा, मधुरेश के लेखों के जरिए कृष्णा सोबती की कहानी कला पर समुचित सामग्री उपलब्ध है। इसमें ‘‘आख्यान और गल्प की कहानी’’ तथा ‘‘आल्हादित करता है कहानी का शंखनाद’’ ये दो लेख भी मौजूद हैं। एक अध्याय है ‘‘अधूरी बातचीत’’ जो कृष्णा सोबती से महावीर अग्रवाल का साक्षात्कार है।
‘‘जिंदगीनामा’’ और ‘‘यारों के यार’’ इन दो कृतियों पर दो महत्वपूर्ण लेखकों के लेख हैं। जिनमें से एक लेख है प्रदीप कुमार का ‘‘जिंदगी के किस्सों का दस्तावेज कृष्णा सोबती’’ और दूसरा लेख है डॉ. विमल लोदवाल का ‘‘कृष्णा सोबती कृत यारों के यार उपन्यास में शासकीय कार्मिकों की मानसिकता’’।
 कृष्णा सोबती के उपन्यासों ‘‘समय सरगम’’, ‘‘जैनी मेहरबान सिंह’’ और ‘‘सूरजमुखी अंधेरे के’’ पर तीन महत्वपूर्ण लेख हैं। पहला लेख है रमेश दवे का ‘कृष्णा सोबती सूफियाना रागत्व की कथाकार’’। दूसरा लेख है डॉ शरद सिंह का (यानी मेरा) ‘‘समाज में वृद्धों की दशा को खंगालता समय सरगम’’।  तीसरा लेख है डॉ. संध्या प्रेम का ‘‘सूरजमुखी अंधेरे के एक पुनर्पाठ’’।
अध्याय ‘‘गुजरात पाकिस्तान से गुजरात हिंदुस्तान’’ के अंतर्गत देश के विभाजन के समय विस्थापन पर सियाराम शर्मा के लेख के साथ ही स्वयं कृष्णा सोबती के आत्मकथात्मक दो लेख शामिल किए गए हैं जिनमें पहला लेख है ‘‘मेरा सामाजिक व राजनैतिक वक्तव्य’’ तथा दूसरा  लेख है ‘‘इंद्रधनुषी रंगों-सा मोहक जीवन। पुस्तक के अंतिम अध्याय में ‘‘परिशिष्ट’’ के रूप में कृष्णा सोबती से तीन दशक की बातचीत दी गई है। साथ ही इस पुस्तक में संग्रहीत लेखों के लेखकों एवं चर्चाओं के चर्चाकारों के नाम और पते दिए गए हैं। साथ ही ‘‘सापेक्ष’’ एवं ‘‘कथायन’’ के उपलब्ध विशेष अंकों की जानकारी भी दी गई है।
 कुल मिलाकर ‘‘सापेक्ष 60’’ एक महत्वपूर्ण पुस्तक बन गई है जो कृष्णा सोबती के रचना कर्म को समग्रता से प्रस्तुत करती है। यह एक संग्रहणीय पुस्तक है।
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Friday, December 10, 2021

मानवाधिकार दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

मानवाधिकार दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं

मानवाधिकार दिवस 2021 की थीम है-
"असमानताओं को कम करना, मानवाधिकारों को आगे बढ़ाना।"

जाति, धर्म, रंग एवं लैंगिक भेद को भुलाकर यह थीम पूरी दुनिया अपनाएगी, यही आशा है। - डॉ (सुश्री) शरद सिंह

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#HappyHumanRrightsDay2021
#humanrightsday2021 
#humanrightsday #humanrights 
#internationalhumanrightsday 
#internationalhumanrightsday2021 
Happy Human Rights Day 🌷

 The theme of Human Rights Day 2021 is-
 "Reducing inequalities, advancing human rights."

 Forgetting caste, religion, color and gender, this theme will be adopted by the whole world, that is the hope.  - Dr (Ms) Sharad Singh

Wednesday, December 8, 2021

चर्चा प्लस | मुख्यमंत्री की पहल ने महामना की याद दिला दी |डाॅ शरद सिंह

चर्चा प्लस
मुख्यमंत्री की पहल ने महामना की याद दिला दी
- डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने आह्वान किया है ‘दस्तयाब’ जैसे मुगलकालीन शब्दों को बदला जाना चाहिए। मुख्यमंत्री की इस पहल ने पंडित मदन मोहन मालवीय के प्रयासों की याद दिला दी। न्यायालय की कार्यवाही में तथा पुलिसिया लिखा-पढ़ी में आम हिन्दी का प्रयोग किया जाना चाहिए, यह विचार एक छोटी-सी घटना से प्रभावित हो कर महामना पं. मदन मोहन मालवीय के मन में आया था। लेकिन आज भी ‘मुखबिर’, ‘इत्तिला’, ‘हिकमतअमली’, ‘तफ्तीश’, ‘मसरूका’, ‘गुम इंसान’ ‘दस्तयाब’ ‘खात्मा’ जैसे शब्द लकीर के फ़कीर की तरह काम में लाए जा रहे हैं, जो आमजन की समझ से परे हैं।
मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने विगत दिनों कलेक्टर-कमिश्नर कान्फ्रेंस में जिस ‘दस्तयाब’ शब्द को मुगलकालीन बताते हुए सरल शब्दों का उपयोग करने की सलाह दी। यह सलाह महत्वपूर्ण है क्यों कि ऐसे ही उर्दू, अरबी और फारसी के लगभग 350 शब्द पुलिस की रोजमर्रा की कार्रवाई में अभी भी चल रहे हैं और जिनका अर्थ आमजन की समझ से परे है। ‘मुखबिर’, ‘इत्तिला’, ‘हिकमतअमली’, ‘तफ्तीश’, ‘मसरूका’, ‘गुम इंसान’ ‘दस्तयाब’ ‘खात्मा’ जैसे शब्द लकीर के फ़कीर की तरह काम में लाए जा रहे हैं। दिल्ली, राजस्थान और उत्तरप्रदेश में ऐसे कई शब्दों को बदला जा चुका है लेकिन मध्यप्रदेश में यह पहला अवसर था, जब मुख्यमंत्री ने इन शब्दों को बदलने के निर्देश दिए। उल्लेखनीय है कि भारतीय दंड संहिता को ‘‘ताजिरात-ए-हिंद’’ के नाम से ही जाना जाता है। इसमें तमाम अपराध और उनके दंड के प्रावधानों का विवरण है।
यह मानना पड़ेगा कि मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री व्यावहारिक सुधारों पर हमेशा ध्यान देते हैं। मुख्यमंत्री की इस पहल ने पंडित मदन मोहन मालवीय के प्रयासों की याद दिला दी। न्यायालय की कार्यवाही में तथा लिखा-पढ़ी में हिन्दी का प्रयोग किया जाना चाहिए, यह विचार एक छोटी-सी घटना से प्रभावित हो कर महामना पं. मदन मोहन मालवीय के मन में आया। हुआ यह कि पंडित मदन मोहन मालवीय के पास एक सामान्य पढ़ा-लिखा आदमी न्यायालयीन काग़ज़ ले कर पहुंचा। उसे कोर्ट से नोटिस मिला था किन्तु वह अरबी, फरसी मिश्रित ठेठ उर्दू में होने के कारण उसे समझ में ही नहीं आ रहा था कि नोटिस के जरिए कोर्ट उससे क्या चाहती है। महमना मालवीय ने उस आदमी को नोटिस का सार समझा दिया। लेकिन इसी के साथ महामना को लगा कि न्यायालय में खड़ी बोली हिन्दी का प्रयोग किया जाना चाहिए ताकि आमजन उसे समझ सके। पंडित मदन मोहन मालवीय को हिन्दी का उन्नायक माना जाता है। महामना के प्रयास के पहले परतंत्र भारत में कोई भी सरकारी पत्र हिन्दी में नहीं लिखा जाता था। पत्र सिर्फ अंग्रेजी में ही स्वीकार होते और उन पर कार्रवाई होती। महामना ने 15 अप्रैल, सन् 1919 में इलाहाबाद के न्यायालय में हिन्दी को कार्यालयीन एवं न्यायालयिक भाषा बनाने के लिए जमकर बहस की। इसके साथ ही उन्होंने हिन्दी को न्यायालय की भाषा बनवाने के लिए संघर्ष किया।
 दरअसल, देश में हिंदी भाषा को प्राथमिकता की पहल महामना मदन मोहन मालवीय ने की थी। मदन मोहन मालवीय ने वकालत के दौरान जब अंग्रेजी, पारसी और उर्दू भाषा का प्रयोग न्यायालय में देखा तो वे समझ गये की हिंदी भाषा का प्रयोग न्यायालय में करना जरूरी है। अंग्रेजों के शासनकाल में न्यायालय के भाषा के तौर पर सन 1900 में हिंदी को जगह दी गई। महामना मदनमोहन मालवीय जी के प्रयासों से ये संभव हुआ। इसके लिए महामना ने 60 हजार लोगों के हस्ताक्षर वाला एक प्रतिवेदन उस समय के गवर्नर जरनल को सौंपा था। जिसके बाद हिंदी को न्यायालय के भाषा के तौर पर शामिल किया गया।
मदनमोहन मालवीय ने हमेशा वकालत नहीं की लेकिन वे एक उच्चकोटि के वकील थे। वकालत के क्षेत्र में मदनमोहन मालवीय की सबसे बड़ी सफलता चैरी-चैरा कांड के अभियुक्तों को फांसी से बचा लेने की थी। फरवरी 1922 में गोरखपुर जिले के चौरी-चौरा नाम के स्थान में एक सनसनीपूर्ण घटना घटी। जनता ने पुलिस थाना जला दिया। मुकदमा चलने पर सेशन जज ने सभी अभियुक्तों को फांसी की सजा दे दी। जब मामला हाईकोर्ट में गया तो पैरवी के लिए मालवीय जी को बुलाया गया। मालवीय जी ने इतनी अच्छी बहस की और सबके सब अभियुक्तों को साफ बचा लिया। चौरी-चौरा जनप्रतिरोध ने अंग्रेजों के होश उड़ा दिए थे। 1857 के स्वतंत्रता संघर्ष के बाद यह पहला मौका था, जब सरकारी तंत्र के खिलाफ किसान इतना मुखर हुए। मात्र तीन साल पहले जलियांवाला बाग में निर्दोषों को गोलियों से भूनने की घटना लोगों की स्मृतियों में थी और अंग्रेजी सरकार का बर्बरता बार-बार याद दिला रही थी। इतिहासकारों का मानना हैैं कि चौरी-चौरा की घटना अंग्रेजी सरकार के लिए अप्रत्याशित थी। वह भारतीय के मन में इस बात का डर बनाए रखना चाहती थी कि किसी भी विद्रोह पर वह क्रूर शासनकर्ता ही है, इसलिए घटना की विवेचना पक्षपात पूर्ण तरीके से की गई। 225 लोगों को अभियुक्त बनाया गया। 172 लोगों को मृत्युदंड दे दिया। जागीरदारों से जुड़े लोगों को शक का लाभ देकर छोड़ दिया गया। किसानों की मर्सी अपील भी खारिज कर दी गई।
सेशन कोर्ट के फैसले के विरुद्ध महामना पं. मदनमोहन मालवीय ने हाईकोर्ट में अपील की। इस पूरे मामले की कुल छह सुनवाई हुई। 24 मार्च 1922 को जब फैसला आया तो सेशन कोर्ट द्वारा 172 लोगों की फांसी का फैसला हाईकोर्ट को बदलना पड़ा। हाईकोर्ट ने 19 सेनानियों को फांसी, 14 को आजीवन कारावास, 19 को 8 साल, 57 को पांच साल और बीस को तीन-तीन साल की सजा दी। दो सेनानियों की मौत ट्रायल के दौरान हो गई थी। सेशन कोर्ट ने 172 को सुनाई थी फांसी, 151 को बचा लिया। बाबा राघवदास ने इस मुकदमे के लिए चंदा इकट्ठा किया था ताकि वकालत से जुड़े खर्च को वहन किया जा सके। सब कुछ खो चुके किसानों पर बोझ न पड़े। महामना निःशुल्क मुकदमा लड़े और 151 को फांसी से बचा लिया।
दरअसल मुगलकालीन भाषा और शब्दावली का सबसे ज्यादा उपयोग इस समय पुलिस में भी हो रहा है। शुरुआत रोजनामचे से होती है। रोजनामचा एक रजिस्टर होता है, जिसमें पुलिसकर्मियों की दैनिक गतिविधियों के साथ ही अपराधों का जिक्र भी रहता है। किसी थाना क्षेत्र में जब कोई अपराध होता है तब उस घटनास्थल पर पहुंच कर अनुसंधान अधिकारी उस अपराध के संबंध में तथ्यों को जिस प्रथम पत्र में दर्ज करते हैं, उसे ‘‘देहाती नालसी’’ कहते है। दंड प्रक्रिया सहिंता 1973 की धारा 154 के तहत एफआईआर दर्ज की जाती है। अंत में धारा 173 के अंतर्गत चालान अंतिम प्रतिवेदन प्रस्तुत किया जाता है। चालान जब पेश किया जाता है जब पुलिस को प्रकरण में अपराध के होने के संबंध में साक्ष्य उपलब्ध होते है पर यदि साक्ष्य नहीं होते है तब पुलिस दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 169 के अंतर्गत ‘‘खात्मा’’ पेश करती है।
जब चालान की फाइनल रिपोर्ट में साबित होता है कि रिपोर्ट झूठी है, तो उसे रद्द करने के लिए जो पत्र लगाया जाता है उसे ‘‘खारिजी’’ कहते है। जब भी पुलिस कार्रवाई के लिए जाती है, तो उसकी रवानगी डालने की जो सूचना लिखी जाती है उसे‘‘हवाले साना’’ कहते हैं। इसीतरह माल जप्त होने को ‘‘माल वाजयाफ्ता’’ कहा जाता है।
बंधपत्र को ‘‘मुचलका’’ कहते हैं यह केवल घोषणा भी हो सकता है या प्रतिभूति सहित भी हो सकता है। नोटिस पत्र को परवाना, प्रतिभूति को जमानत, विचाराधीन कारावास में या अभिरक्षा में रखे जाने को हवालाती कहते हैं। विचाराधीन कारावास में या अभिरक्षा में रखा जाने वाला व्यक्ति हवालाती कहलाती है। पुलिस की किसी भी लिखित कार्रवाई को तहरीर कहा जाता है। वह व्यक्ति, जिस पर कोई आरोप लगा हो और उस पर अभियोजन किया गया हो तो उसे मुल्जिम कहते हैं जबकि आरोपी को दोषसिद्ध घोषित कर दिया जाता है, तब वह ‘‘मुल्जिम’’ से ‘‘मुजरिम’’ हो जाता है। परिवाद पत्र को ‘‘इस्तगासा’’ कहा जाता है। किसी भी सूचना की जांच-पड़ताल को ‘‘तफ्तीश’’ तथा गुम हुई वस्तु का मिल जाना ‘‘दस्तयाब’’ होना कहा जाता है। किसी भी सूचना की जांच-पड़ताल को ‘‘तफ्तीश’’ कहा जाता है। लूटा गया माल ‘‘माल मसरुका’ तथा डकैती में लूटा माल "मसरुका" कहलाता है।
ऐसी कठिन शब्दावली को बदल कर आम बोलचाल की हिन्दी को न्यायालय की भाषा बनाए की आवश्यकता को जिस प्रकार पं. मदन मोहन मालवीय ने समझा और पहल की उसी प्रकार मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कानूनी मामलों में वह चाहे पुलिस हो या न्यायालय हो भाषाई सुधार लाने के लिए पहल की है जो कि स्वागत योग्य है।  
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Tuesday, December 7, 2021

पुस्तक समीक्षा | अभिव्यक्ति की गहनता को प्रस्तुत करती काव्यात्मकता | समीक्षक - डॉ शरद सिंह

प्रस्तुत है आज 07.12. 2021 को #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई कवयित्री अनिमा दास के काव्य संग्रह "शिशिर के शतदल" की समीक्षा... 
आभार दैनिक "आचरण" 🙏
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पुस्तक समीक्षा
अभिव्यक्ति की गहनता को प्रस्तुत करती काव्यात्मकता   
समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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काव्य संग्रह  - शिशिर के शतदल
कवयित्री        - अनिमा दास
प्रकाशक     - सर्व भाषा ट्रस्ट, जे-49,स्ट्रीट नं.38, राजापुरी, मेन रोड,उत्तम नगर, नई दिल्ली-59
मूल्य        - 300/-
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साहित्य, विभिन्न भाषाओं के मध्य की दीवार गिराने में सक्षम होता है। कवयित्री अनिमा दास की मातृभाषा ओड़िया है, उनकी काव्यशैली पाश्चात्य सोनेट है और काव्य की अभिव्यक्ति की भाषा हिंदी। इस त्रिवेणी का सौंदर्य ‘‘शिशिर के शतदल’’ सोनेट संग्रह में देखा जा सकता है। यह मूल रूप से अनिमा दास का मौलिक सोनेट संग्रह है। इससे पूर्व वे ‘प्रतीची से प्राची पर्यंत’ के नाम से प्रकाशित पुस्तक में हिंदी सोनेटीयर डॉ. विनीत मोहन औदीच्य के साथ सम्वेत रूप में ओड़िया सोनेट के अनुवाद प्रस्तुत कर चुकी हैं। अनिमा दास ने  सोनेट शिल्प को बहुत बारीकी से ग्रहण किया है। उनके सोनेट पाश्चात्य सोनेट शिल्प के मानकों पर खरे उतरते हैं। इसके साथ ही हिंदी और ओड़िया में लिखे जा रहे सोनेट्स के पासंग भी उत्कृष्ट ठहरते हैं। अनिमा दास में हिंदी भाषा को लेकर अद्वितीय उत्साह दिखाई देता है। वे अपने सोनेट के लिए जिस हिंदी का प्रयोग करती है वह (जयशंकर) प्रसाद-काव्य की परंपरा की हिंदी कही जा सकती है। उनके सोनेट में अनुप्रास अलंकार की भी अद्भुत छटा देखने को मिलती है। वर्तमान में इतनी शुद्ध तत्सम शब्दों से युक्त हिंदी का प्रयोग कम ही देखने को मिलता है। इतनी सुंदर हिंदी भाषा का प्रयोग करते हुए सोनेट लिखने के लिए अहिंदी भाषी अनीमा दास बधाई के पात्र हैं।
अनिमा दास एक संवेदनशील कवयित्री हैं। वे अपनी सोनेट में मानवीय पीड़ा और प्रकृति के परिदृश्य में समानता को बड़े सुंदर ढंग से प्रस्तुत करती हैं उदाहरण के लिए उनका एक सोनेट है ‘प्रश्न’। इसकी कुछ पंक्तियां देखें - 
न करो प्रश्न जीर्ण शाखाओं से, मुक्त झरता उस मौन सुमन से
किस दिशा से चला था पवन, किस दिशा में उड़ी थी इच्छाएं 
न करो प्रश्न उन श्रृंग को जिन्हें कर स्पर्श, मेघ बरसता गगन से 
कैसे अपनी घनीभूत पीड़ाओं से बहा रहा था वह अनिच्छाएं।

न प्रश्न करो कि कैसे ज्वालामुखी सी मैं, जली थी निर्मम धूप में
मरीचिका का अस्तित्व एवं दीर्घ परछाई की काया, वह मैं थी
मैं थी वह ऋतु जो बारंबार आती रहती थी मल्लिका के रूप में 
शुष्क तप्त मृदा में शून्यता की जो प्रलंबित छाया... वह मैं थी

भारतीय दर्शन एवं काव्य दोनों को महाभारत कालीन कृष्ण के चरित्र ने बहुत गहरे प्रभावित किया है। हिंदी साहित्य में भक्ति काल में कृष्ण पर केंद्रित अनेक काव्य रचनाएं लिखी गईं। आज भी कृष्ण काव्यसृजन के विषय के रूप में श्रृंगार रस के तारतम्य में विशेष स्थान रखते हैं, चाहे वह संयोग श्रृंगार हो अथवा वियोग श्रृंगार। कवयित्री अनिमा दास ने भी नीलवर्णी कृष्ण को अपने सोनेट में सहेजा है। जैसा कि भक्त कवयित्री मीराबाई ने लिखा है ‘‘मैं तो सांवरे के रंग राची’’ अर्थात मैं तो कृष्ण के रंग में रंग गई हूं। यही भाव अनिमा दास के सोनेट में देखे जा सकते हैं। उदाहरण के लिए ‘‘मोहना’’ शीर्षक सोनेट की यह पंक्तियां देखिए जिसमें वे अनुप्रास अलंकार का अति सुंदर प्रयोग करते हुए कृष्ण से प्रश्न करती है तथा उलाहना देती हैं-
सुनो, हे नील मधुकर ! नील स्वप्न के नील मेघावरि 
नील पराग के नील कणों में नीला आभा की सुरसरि 
मेरे नील दृगों के, नींद अश्रुओं  की  नील क्षीण धारा
हे, नील कृष्ण कहो क्यों नील प्रेम से मेरा गेह संवारा

प्रकृति में भावनाओं की अनुभूति को स्थापित करते हुए कवयित्री ने एक ऐसा भाव संसार रचा है जिसमें प्रेम की भावना अपने उत्कृष्ट स्वरूप में परिलक्षित होती है। ‘‘मेघ मल्हार’’ शीर्षक सोनेट में नायिका अपने प्रिय द्वारा मेघ मल्हार गाए जाने पर प्रकृति पर उसके गायन के प्रभाव को बता रही है-
तुम गा रहे हो मेघ मल्हार प्रियवर, वन पक्षी रो रहे
उमड़ रही है उन्मादी नदी प्रियवर, दृग हैं  सो रहे 
झर रही है अंतरिक्षीय मधु प्रियवर, मन मोर अधीर
वृक्षवासी  हैं  आल्हाादित  प्रियवर, इरा बहाए नीर 
हृद - शाखाएं पल्लवित प्रियवर, शब्दों में अलंकार 
तीर्ण देह पर शांत स्पर्श  प्रियवर, अधरों में झंकार 
वक्ष अंबर का भीगता प्रियवर, आशाओं में है गमक 
तिमिर की परछाई गहन प्रियवर, मुख पर है दमक 

यहां यह चर्चा संदर्भगत् है कि जहां कैल्टिक सोनेट श्रमिकवर्ग के उन्मुक्त, उच्श्रृंखल प्रेम का बखान करता है, वहीं शेक्सपीयर के सोनेट में प्रेम एक साहित्यिक गंभीरता के साथ प्रकट होता है। सोनेट नं. 18 में शेक्सपीयर सभ्रांत ढंग से प्रश्न करते हैं - ‘‘क्या मैं तुम्हारी तुलना गर्मी के दिन से करूं? ’’ और सोनेट नं. 73 तक आते-आते वे प्रकृति को जीवन की घटनाओं से और अधिक जोड़ कर देखते हैं -‘‘मुझ में तुम ऐसे दिन का धुंधलका देखते हो/जैसे सूर्यास्त के बाद पश्चिम में छा जाता है धुंधलका।’’ इस तरह शेक्सपीयर के सोनेट का स्मरण करते हुए अनिमा के सोनेट पढ़ते समय यह बात तय करना कठिन नहीं रह जाती है कि उन्होंने शेक्सपीयर अथवा आंग्ल सोनेट के शिल्प और भाषा की रूपांकारी छवि को हिन्दी में पिरोया है। यह अनुवाद नहीं है और न ही प्रतिकृति है, वरन् शेक्सपीयर से प्रभावित सोनेट क्रम में मौलिकता और भारतीय बिम्बों के साथ वे प्रस्तुत होती हैं। 
प्रेम में एक स्थिति वह भी आ जाती है जब विरह भी प्रेम की सम्पूर्णता का प्रतीक बन जाता है। प्रेम के इस चर्मोत्कर्ष को कवयित्री ने ‘‘विरह से प्रेम’’ शीर्षक सोनेट में व्याख्यायित किया है-
तुम्हें प्रेम से प्रेम है असीम, मुझे विरह से प्रगाढ़ आत्मीयता
तुम्हें मिलती नदी से गहराई, मुझे मिलती ताल से निगूढ़ता
है मुझे मिलती स्वप्न तरंग, इस शून्य आकाश के विस्तारण से
तुम्हें है मिलते दीप्त अंभसार, मधुर पयोधर के आवरण से

अनिमा दास ने पौराणिक और महाकाव्यों के पात्रों को भी अपने सोनेट में स्थान दिया है। उनका एक सोनेट है ‘‘चित्रांगदा’’। ‘महाभारत’ महाकाव्य के अनुसार, चित्रांगदा मणिपुर नरेश चित्रवाहन की पुत्री थी। जब अर्जुन इन्द्रप्रस्थ की ओर से मैत्री संदेश ले कर मणिपुर पहुंचे तब वहां की राजकुमारी चित्रांगदा अर्जुन पर मोहित हो गई। जब चित्रांगदा ने अर्जुन के सामने अपना प्रेम प्रस्ताव रखा तो अर्जुन ने उसे ठुकरा दिया जिससे चित्रांगदा को अत्यंत पीड़ा हुई और उसने आत्महत्या करने का निश्चय कर लिया। तब महाराज चित्रवाहन और कृष्ण के समझाने पर अर्जुन ने यह प्रस्ताव स्वीकार कर चित्रांगदा से विवाह किया। किन्तु कुछ माह उपरांत अर्जुन नागलोक पहुंचे तो उनकी पत्नी नागकन्या उलूपी ने द्वेष भावना से चित्रांगदा के विरुद्ध अर्जुन को भड़का दिया। अर्जुन ने निराधार संदेह के कारणवश चित्रांगदा को उस समय त्याग दिया जब वह गर्भवती थी। तब चित्रांगदा ने ठान लिया की वो इस अपमान का बदला अर्जुन की पराजय से लेगी और अर्जुन को यह पराजय अपने पुत्र के हाथों स्वीकार करनी होगी। इस प्रकार चित्रांगदा ‘‘महाभारत’’ की विरहणी, अपमानित और प्रतिशोध की भावना परिपूर्ण पात्र है। अनिमा ने चित्रांगदा का विरह पक्ष अपनी कविता में प्रस्तुत किया है। ये पंक्तियां देखिए-
तुम्हारे विक्षिप्त हृदय का, मैं हूं एकमात्र भग्नांश
स्पंदन में मेरे, अभिगुंजित क्षताक्त कल्पित स्वन
मेरे विस्मृत आयुकाल का, मैं हूं मात्र एक क्षणांश
तुम्हारे अधरों में है, चिरजीवित मृदुल स्वप्न ध्वन
मैं हूं महार्णव के वक्ष पर दिग्भ्रांत तरंगित प्रवाह
हूं मैं उद्विग्न निम्नगा की उद्वेलित उर्मिल मौनता
हे चित्रांगदा! मैं आग्नेय शिला का तीव्र अंतर्दाह
हूं इस विदीर्ण मन की अश्रुपूर्ण सिक्त निर्जनता 

संग्रह के अंतिम सोनेट के रूप में है संग्रह का शीर्षक सोनेट ‘‘शिशिर के शतदल’’। इसकी कुछ पंक्तियां देखें जिनमें अतीत और वर्तमान के संधिस्थल पर ‘‘विधुर दिवस’’ जैसी उपमा से विरह की पीड़ा को दृष्टव्य बना दिया गया है। साथ ही कवयित्री अतीत में काग़ज़ की भांति लिखने के काम आने वाले भुर्जपत्र (भोजपत्र) को वर्तमान की करुण कथा का आधार पटल कहती हुईं मौन निवेदन को अवधूत की संज्ञा देती हैं-
अतीत की लिखी वर्तमान के भुर्जपत्र पर वह करुण कथा
हो रही नादित श्रृंगशीर्ष पर, कर रही स्पर्श श्यामल व्यथा
विधुर दिवस को अब विश्रांति कहां? कहां है प्रेयसी निशि?
अवधूत बना मौन निवेदन यहां अन्वेषी बना  विरही शशि

निःसंदेह यह बारम्बार प्रशंसनीय है कि अनिमा दास को मातृभाषा ओड़िया के साथ ही हिन्दी का गहन ज्ञान है। वे संस्कृतनिष्ठ परिष्कृत हिन्दी को अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम बनाती हैं। किन्तु यह भी विचारणीय है कि आज जब युवा पीढ़ी इंग्लिश और हिंग्लिश के द्वंद्व में फंसी हुई है, उसके लिए संस्कृत निष्ठ हिन्दी समझ पाना कठिन है। शब्दकोश का सहारा ले कर साहित्य पढ़ने का न तो उसमें धैर्य है और न उसके पास समय है। अतः संग्रह में संग्रहीत सुंदर सोनेट्स को पढ़ने और समझने में युवाओं तथा साहित्य रसिक आमपाठकों को तनिक असुविधा का अनुभव हो सकता है। वहीं भाषाई परिष्कार और भाषाई श्रेष्ठता का अनुभव करने वाले पाठकों के लिए यह संग्रह अनुपम सिद्ध होगा। फिर भी सोनेट विधा जो हिन्दी साहित्य में पर्याप्त स्थान अभी भी नहीं बना सकी है, उसे लोकप्रिय बनाने के लिए भाषाई क्लीष्टता से बच कर चलना होगा। लेकिन इस तथ्य को भी विस्मृत नहीं किया जा सकता है कि हिन्दी भाषा और साहित्य में अहिन्दी भाषी अनिमा दास का मौलिक सोनेट संग्रह के रूप में योगदान रेखांकित किए जाने योग्य है। 
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