Wednesday, February 23, 2022

चर्चा प्लस | जैवविविधता भी है खजुराहो की मूर्तियों में | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह

चर्चा प्लस  
जैवविविधता भी है खजुराहो की मूर्तियों में 
- डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह                                                                                        
       आज जब हम पर्यावरण और जैव विविधता की बातें करते हैं तो हमें लगता है कि जैव विविधता को लेकर हमारे भीतर ही जागरूकता उत्पन्न हुई है हमसे पहले अर्थात् हमारे पूर्वजों का ध्यान इस ओर गया ही नहीं था यह हमारा भ्रम है क्योंकि वेदों की ऋचाओं से लेकर खजुराहो की मूर्तियों तक जैव विविधता का विशेष उल्लेख एवं प्रदर्शन है। विशेष इस अर्थ में कि हमने प्रकृति और उसके तत्वों को मात्र जैव अथवा अजैव घटकों के रूप में देखा है जबकि हमारे पूर्वजों ने उन्हें जीवन के अभिन्न अंग के रूप में सम्मानित स्थान दिया, उन्हें देवत्व प्रदान किया और देवत्व प्रदान करते हुए संरक्षण का एक मजबूत धरातल दिया। यही कारण है कि हमारे पूर्वजों के समय न तो बेतहाशा जंगल काटे गए और न प्रकृति के प्रति निर्ममता का व्यवहार किया गया।
विश्व प्रसिद्ध कला तीर्थ खजुराहो अपनी मूर्ति कला की सुंदरता कलात्मकता और मानव समूहों की मनोहरी प्रस्तुति के लिए विख्यात है। खजुराहो में चंदेल राजवंश के शासकों के द्वारा मंदिरों का निर्माण कराया गया। खजुराहो का प्राचीन नाम ‘खर्जुरवाहक’ था। खजुराहो की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के संबंध में ह्वेनसांग, अबू रिहान-अली-बरूनी तथा इब्नबतूता के द्वारा दिए गए विवरणों से पता चलता है। अबू रिहान-अल-बरूनी सन् 1021 ई. में महमूद गजनवी के कालंजर अभियान के दौरान उसके साथ बुन्देलखण्ड आया था। उसने अपने यात्रा विवरण में ‘‘जिझोती’’ की राजधानी ‘‘खजुराहा’’ का उल्लेख किया है। चंदेलों का राजनीतिक जीवन गुर्जर-प्रतिहार सम्राटों के सामंत रूप में प्रारम्भ हुआ। चंदेलों ने खजुराहो में लगभग 85 मंदिरों का निर्माण कराया। वर्तमान में उनमें से लगभग 25 मंदिर विद्यमान हैं। सन् 1998-99 में आर्कियोलाॅजिकल सर्वे आॅफ इंडिया द्वारा कराए गए उत्खनन कार्य में एक और भव्य मंदिर के अवशेष मिले। जो कि खजुराहो में ही जटकारा नामक स्थान पर स्थित हैं। इन अवशेषों में मिथुन मूर्तियों की उपलब्धता हिन्दू मंदिर होने का संकेत करती है। खजुराहो के सभी मंदिर पूर्वमध्यकालीन स्थापत्यकला के बेजोड़ नमूने हैं। इन मंदिरों के शिखर नागर शैली के बने हुए हैं। मंदिरों को ऊंचे चबूतरों पर बनाया गया है। शैव और वैष्णव धर्म से संबंधित मंदिर एक स्थान पर बनाए गए हैं तथा जैन मंदिर कुछ दूर अलग स्थान पर स्थित हैं। इन सभी मंदिरों का निर्माण काल 950 से 1050 ईस्वी के मध्य का माना जाता है। दुख की बात है कि हम अपने अतीत को भी अपने दृष्टिकोण के हिसाब से देखते हैं। खजुराहो में मिथुन मूर्तियां अपेक्षाकृत कम हैं किन्तु हमारे व्यापार जगत को पता था कि इस तरह की मूर्तियों का होना पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए लाभप्रद है। इस धारणा के कारण खजुराहो शिल्प में मौजूद अन्य संदेशप्रद प्रतिमाएं उपेक्षित रह गईं। जबकि मंदिर भित्तियों पर बनी प्रतिमाओं में रहन-सहन-वेशभूषा, दैनिक जीवन, पठन-पाठन, क्रीड़ा और जैवविविधता जैसे अनेक विषय प्रदर्शित हैं।  
यह देखकर सुखद अनुभूति होती है कि चंदेल कालीन कलाकारों ने इन मूर्तियों में मानव के रचनात्मक एवं संहारात्मक संवेगों के साथ ही जैवविविधता को भी बड़ी सुंदरता से प्रदर्शित किया है। मंदिर भित्तियों पर जैव विविधता का यह प्रदर्शन इस तथ्य को सत्यापित करता है कि चंदेल काल में पर्यावरण और जैव विविधता के प्रति जागरूकता पाई जाती थी। स्वयं खजुराहो का नामकरण वानस्पतिक आधार पर किया गया था। यद्यपि खजुराहो के नामकरण को लेकर दो तरह के मत प्रचलित है किंतु दोनों मतों में यही माना गया है कि खजुराहो का नाम खर्जूर अर्थात खजूर के पेड़ों के कारण रखा गया। पहले मत के अनुसार खजुराहो ग्राम के द्वार पर खजूर के दो सुनहरे पेड़ थे। इसलिए ग्राम का नाम ‘खर्जूर’ यानी खजूर धारण करने वाला अर्थात् खजुराहो पड़ा। दूसरे मत के अनुसार खजुराहो ग्राम जहां बसाया गया वहां खजूर के पेड़ों की अधिकता होने के कारण यह नाम रखा गया।

बुंदेलखंड में स्थित खजुराहो के चारों और सघन वन क्षेत्र होने के कारण चंदेल नागरिकों में पर्यावरण एवं जैव विविधता के प्रति जागरूकता होनी स्वाभाविक थी। चंदेल मूर्तिकारों ने पशु, पक्षी, जलचर, वनस्पतियां, वायु, सूर्य, चंद्र आदि के साथ-साथ दिशाओं को भी मानवकृत रूप देते हुए मानव जीवन के प्रति उनके महत्व एवं उनकी उपादेयता को स्थापित किया है। इसके साथ ही प्रकृति एवं विविध प्राणियों के साथ मानव के पारस्परिक संबंधों का भी सूक्ष्मता से प्रदर्शन किया है।

 जैव विविधता शब्द का प्रयोग पृथ्वी पर जीवन की विशाल विविधता का वर्णन करने के संदर्भ में किया जाता है। इसका उपयोग विशेष रूप से एक क्षेत्र या पारिस्थितिकी तंत्र में सभी प्रजातियों को संदर्भित करने हेतु किया जा सकता है। जैव विविधता पौधों, बैक्टीरिया, जानवरों और मनुष्यों सहित हर जीवित चीज को संदर्भित करती है। और सरल शब्दों में कहा जाए तो जैव विविधता या जीव भिन्नता पृथ्वी पर पाई जाने वाली विविध प्रकार की उन जैवीय प्रजातियों को कहते हैं जो अपने-अपने प्राकृतिक आवास क्षेत्रों में पाई जाती हैं। इसमें पेड़-पौधे, सूक्ष्म जीव, पशु-पक्षी आदि सभी प्राणी सम्मिलित हैं। जैव विविधता का महत्व पृथ्वी पर जीवन को बनाए रखने के लिए इसका रखरखाव करना बहुत महत्वपूर्ण है। जानवरों, पौधों और सूक्ष्मजीवों की एक विस्तृत श्रृंखला के बिना, हम स्वस्थ पारिस्थितिकी प्रणालियों की आशा भी नहीं कर सकते हैं। ये सभी पारिस्थितिकी तंत्र में अहम भूमिका निभाते हैं। ऐसी बहुत सी चीजें हैं जिसके लिए हम जैव विविधता पर निर्भर करते हैं और हमारे लिए इसे संरक्षित करना महत्वपूर्ण है। उदाहरण के लिए कृषि को ही ले लीजिए अकशेरूकीय पर अविश्वसनीय रूप से निर्भर है, वे मिट्टी के स्वास्थ्य को बनाए रखने में मदद करते हैं, जबकि कई फल, नट और सब्जियां कीटों द्वारा परागित होती हैं। दुनिया के एक तिहाई फसल उत्पादन में परागणकर्ता (पोलिनेटर) जैसे पक्षी, मधुमक्खी और अन्य कीड़े अहम भूमिका निभाते हैं। सूक्ष्म जीव मृदा में पोषक तत्वों को मुक्त करने के लिए महत्वपूर्ण हैं। महासागरों में, मछली और समुद्री जीवन के अन्य रूप लगभग एक अरब लोगों के लिए प्रोटीन का मुख्य स्रोत प्रदान करते हैं।

खजुराहो की मूर्तियों में प्रदर्शित जैव विविधता को मुख्य रूप से दो श्रेणियों में बांटा जा सकता है - 1.मौलिक रूप एवं 2. प्रतीक रूप।
मंदिर की बाहरी दीवारों पर उकेरी गई मूर्तियों में जैव विविधता के मौलिक रूप का सर्वत्र चित्रण है। मंदिरों के प्रवेश द्वारों पर वृक्ष की शाखाएं उकेरी गई हैं। यह शाखाएं भी तीन प्रकार की है त्रिशाखा, पंच शाखा और सप्त शाखा। इन शाखाओं में लताएं, पुष्प एवं बेलबूटों का अंकन है। इसी के साथ कल्पवृक्ष भी उकेरे गए हैं। कंदरिया महादेव मंदिर के गर्भगृह द्वार पर सप्त शाखाएं हैं। जबकि अधिकांश मंदिरों में पंच शाखाएं हैं। इन द्वारशाखाओं पर फूल, पत्तियां, मिथुन मूर्तियां तथा साधना में लीन तपस्वी बनाए गए हैं। इन द्वारशाखाओं के निचले सिरे पर एक और मकर वाहिनी गंगा तथा दूसरी ओर कूर्मवाहिनी यमुना की प्रतिमाएं हैं।

खजुराहो की मूर्तियों में फूलों का भी भरपूर प्रदर्शन है। लक्ष्मण मंदिर तथा दूल्हा देव मंदिर में चार पंखुड़ियों वाला फूल बनाया गया है तो चैसठ योगिनी मंदिर में पूर्ण विकसित त्रिचक्रीय शतदल पुष्प प्रदर्शित है। इसी मंदिर में चार और छह पंखुड़ियों वाले फूल भी बनाए गए हैं।
फूल, पत्तियों, लता, पेड़ों के अतिरिक्त वृक्षों को भी स्थान दिया गया है। लक्ष्मण मंदिर में एक स्त्री को आम्र वृक्ष की छाया में खड़े हुए दिखाया गया है। यह मानव और वनस्पति के पारस्परिक संबंध का द्योतक है। वामन मंदिर में चित्रकारी करती हुई स्त्री के पास में वृक्ष की शाखाएं अंकित हैं जो यह दर्शाती हंै कि वह स्त्री अपने कैनवास पर पेड़-पौधों और वृक्षों को चित्रित कर रही है।

खजुराहो की मूर्तियों में वनस्पतियों के साथ ही पशु, पक्षियों को भी स्थान दिया गया है। खजुराहो संग्रहालय में संग्रहीत नारी मूर्ति में र्दाइं हथेली पर एक पक्षी को दिखाया गया है। विश्वनाथ मंदिर में दो नारी मूर्तियां हैं जिनमें से एक में पक्षी को कलाई पर बैठे हुए तथा दूसरे में दाना चुगाते हुए दिखाया गया है। जगदंबा मंदिर में सारिका पक्षी, कंदरिया महादेव में तोता, वामन मंदिर में मैना तथा लक्ष्मण मंदिर में उलूक पालतू पक्षी के रूप में उकेरा गया है। मोर, हंस, और उल्लू आदि पक्षी वाहन प्रतीक के रूप में भी दर्शाए गए हैं।

पालतू पशु के रूप में गाय, बैल, वानर, घोड़ा, हाथी, कुत्ता, मेष आदि का प्रदर्शन किया गया है। वन्य पशुओं में शेर, हिरण, भालू, भेड़िया, वनशूकर को उत्कीर्ण किया गया है। इनके अतिरिक्त छोटे जानवर जैसे मूषक और नेवला को भी अंकित किया गया है। जलचर प्राणियों में मत्स्य, शंख, कूर्म और मकर को वाहन प्रतीक के रूप में उकेरा आ गया है।
पृथ्वी पर निवास करने वाले समस्त जीवधारी समस्त प्रकार के जीवित एवं अजैविक घटकों अर्थात प्राकृतिक संसाधनों पर आश्रित होते हैं। पर्यावरण ही प्राकृतिक संसाधनों जैसे ऊर्जा, वायु, जल, मृदा, खनिज तत्व आदि का स्रोत है। खजुराहो की मूर्ति शिल्प की एक विशेषता यह भी है कि जीवन और प्रकृति को मानव आकार प्रस्तुत किया गया है। जैसे नदी देवियां और जल देवता। ब्रह्मा मंदिर, जगदंबा मंदिर, कंदरिया महादेव मंदिर, विश्वनाथ मंदिर के प्रवेश द्वार पर गंगा और यमुना की मानव आकृति मूर्तियां बनाई गई हैं। यह मूर्तियां चंदेल कालीन जीवन में नदियों के महत्व की परिचायक है। वाराह मंदिर में वाराह प्रतिमा के विशालकाय शरीर पर गंगा तथा यमुना को मानवीय रूप में बनाया गया है। नदी देवियों के समान ही जल देवता को भी स्थान दिया गया है। वैदिक एवं पौराणिक कल्पना के अनुसार जल देवता वरुण की मूर्तियां वाराह के विशाल शरीर के अतिरिक्त लक्ष्मण मंदिर, जगदंबा मंदिर, चित्रगुप्त मंदिर, दूल्हा देव मंदिर, चतुर्भुज मंदिर, वामन मंदिर ,पार्श्वनाथ मंदिर तथा खजुराहो संग्रहालय में मौजूद हैं।

खजुराहो की मूर्ति कला में जैव विविधता को जिस विशिष्टता के साथ प्रस्तुत किया गया है वह अद्भुत है। इन मूर्तियों में विषैले जीव जंतुओं को भी स्थान दिया गया है। विभिन्न प्रकार के सर्प तथा बिच्छू का अंकन इस बात को प्रमाणित करता है कि चंदेल समाज जीवों के सभी रूपों को समान रूप से महत्व देता था। जैवविविधता के प्रत्येक रूप को पाषाण शिल्प में ढालकर प्रस्तुत किया गया है, फिर चाहे जैव जगत हो अथवा अजैव जगत।
खजुराहो के मूर्ति शिल्प में अंकित जैव विविधता यह भी संदेश देती है कि यदि खजुराहो के शिल्प की तरह है वर्तमान जीवन को भी कालजयी बनाना है तो जीवन के लिए आवश्यक समस्त तत्वों का संरक्षण करना होगा और उन्हें समाप्त होने से बचाना होगा, चाहे वह वन हो या वन्य जीवन अथवा हर प्रकार के पशुपक्षी और वनस्पतियां, सभी को संरक्षित करना होगा। लुप्त होने से बचाना होगा। जैवविधता के महत्व को समझते हुए खजुराहो के शिल्प की भांति हमें अपने वर्तमान तथा भविष्य को बचाना  होगा और इस दिशा में खजुराहो की मूर्तियों में मौजूद जैव विविधता का शिल्पांकन हमारे लिए प्रेरणा स्रोत है।
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(23.02.2022)
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Tuesday, February 22, 2022

पुस्तक समीक्षा | लौकिक-अलौकिक अनुभवों का रोचक संस्मरणात्मक आख्यान | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

प्रस्तुत है आज 22.02.2022 को  #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई लेखक श्री आनन्द कुमार शर्मा की पुस्तक "महाकाल के अद्भुत प्रसंग" की समीक्षा... आभार दैनिक "आचरण" 🙏
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पुस्तक समीक्षा
लौकिक-अलौकिक अनुभवों का रोचक संस्मरणात्मक आख्यान
 समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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पुस्तक - महाकाल के अद्भुत प्रसंग
लेखक - आनन्द कुमार शर्मा
प्रकाशक- सर्वत्र पब्लिकेशन, द्वितीय तल, उषा प्रीत काॅम्प्लेक्स, 42 मालवीय नगर, भोपाल-462003
मूल्य   - 225 रुपए
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‘‘महाकाल के अद्भुत प्रसंग’’- इस पुस्तक के लेखक हैं आनन्द कुमार शर्मा जो वर्तमान में मुख्यमंत्री के विशेष कर्तव्यस्थ अधिकारी हैं तथा पूर्व में विभिन्न उच्च प्रशासनिक पदों पर रह चुके हैं। पुस्तक में एक स्थान पर उन्होंने अपने बारे में लिखा है कि वे ‘‘नास्तिक प्रकार के आस्तिक हैं।’’ अर्थात् वे धार्मिक प्रवृति के हैं किन्तु आडंबरों पर विश्वास नहीं करते हैं। यही कारण है कि महाकाल की अपनी अलौकिक अनुभूूतियों को उन्होंने किसी धार्मिक दृष्टिकोण से नहीं लिखा है वरन् अनुभव एवं अनुभूतिजनित घटनाओं का विवरण दिया है जिन्हें वैज्ञानिक कसौटी पर कसना आवश्यक नहीं है। कई बार जीवन में ऐसे प्रसंग आते हैं जब असंभावित लगने वाला कार्य सुगमता से पूरा हो जाता है और तब हमारी चेतना हमसे कहती है कि कोई तो अलौकिक शक्ति है जिसने हमारी सहायता की। अपनी इस संस्मरणात्मक पुस्तक में आनन्द कुमार शर्मा ने महाकाल की नगरी उज्जैन में सन् 1995 से 2000 तक विभिन्न पदों में रहने के दौरान हुए लौकिक-अलौकिक अनुभवों का रोचक संस्मरणात्मक आख्यान प्रस्तुत किया है। दरअसल, स्मृतियां मनुष्य की सबसे बड़ी पूंजी होती है। इस पूंजी को वह सुना कर या लिख कर पुनः जी सकता है। स्मृति के आधार पर किसी विषय पर अथवा किसी व्यक्ति पर लिखित आलेख ‘‘संस्मरण’’ कहलाता है। संस्मरण को अं्रगेजी में ‘मेमोयर’ कहते हैं जिसे फ्रांसीसी शब्द ‘मेमोइरे’ और लैटिन के ‘मेमोरिया’ कहते हैं। सन् 314-394 ई. में प्राचीन ग्रीस और रोम में यह माना जाता था कि ‘मेमोज़’ लेखन के वे टुकड़े होते हैं जिनकी सहायता से लेखक अपनी विशेष कृतियों को पूरा करता है। पाश्चात्य विद्वानों ने माना है कि संस्मरण में उसके लेखक की स्मृतियां भावुकता के साथ सामने आती हैं, किन्तु यह कोरी भावुकता नहीं होती है, इसमें तत्कालीन यथार्थ की अनेक पर्तें होती हैं। जैसे- हिकमेन के संस्मरण ‘‘अक्टूबर स्काई’ या ‘राॅकेट ब्वाय’, ‘कोलवुड वे’ आदि। आधुनिक विश्व साहित्य में अनेक लेखक और लेखिकाओं के संस्मरण लोकप्रिय हुए हैं। जैसे- जुंग चेंग का ‘वाइल्ड स्वान’, हेडा मार्गोलुइस का ‘अंडर ए क्रुएल स्टार’, हेलेन ऐपेस्टाइन का ‘व्हेअर शी केम फ्राॅम’।  

हिन्दी में संस्मरण विधा का आरम्भ द्विवेदी युग से माना जाता है। परंतु इस विधा का असली विकास छायावादी युग में हुआ। इस काल में ‘सरस्वती’, ‘सुधा’, ‘माधुरी’, ‘विशाल भारत’ आदि पत्रिकाओं में संस्मरण प्रकाशित हुए। इसके बाद संस्मरण को साहित्यिक निबन्ध की एक प्रवृत्ति माना गया। संस्मरण में लेखक जो कुछ स्वयं देखता है और स्वयं अनुभव करता है उसी का चित्रण करता है। लेखक की स्वयं की अनुभूतियां तथा संवेदनाएं संस्मरण का ताना-बाना बुनती हैं। संस्मरण लेखक एक निबन्धकार की भांति अपने स्मृतियों को गद्य के रूप में बंाधता है और एक इतिहासकार के रूप में तत्संबंधित काल को प्रदर्शित करता है। कहने का आशय है कि संस्मरण मूलतः निबंध और इतिहास का मिश्रित साहित्यिक स्वरूप होता है और जिसका मूल संबंध संस्मरण लेखक की स्मृतियों से होता है।

हिन्दी में संस्मरणात्मक लेखन की शुरुआत पाश्चात्य साहित्य के प्रभाव से मानी जाती है। हिन्दी में आरंभिक संस्मरण लेखकों में बनारसीदास चतुर्वेदी, महादेवी वर्मा तथा रामवृक्ष बेनीपुरी आदि हैं। बनारसीदास चतुर्वेदी के ‘संस्मरण’ तथा ‘हमारे अपराध’, महादेवी वर्मा की ‘स्मृति की रेखाए’ तथा ‘अतीत के चलचित्र’ एवं रामबृक्ष बेनीपुरी का ‘माटी की मूरतें’ को आरम्भिक संस्मरणों में गिना जा सकता है। प्रभाकर माचवे, विष्णु प्रभाकर, राजेन्द्र यादव, कृष्णा सोबती, रवीन्द्र कालिया, दूधनाथसिंह और काशीनाथ सिंह ने संस्मरण विधा को पर्याप्त गति दी। कृष्णा सोबती की ‘हम हशमत’, राजेन्द्र यादव की ‘औरों के बहाने’, दूधनाथसिंह की ‘लौट आओ धार’, काशीनाथ सिंह की ‘काशी के अस्सी’, विश्वनाथ प्रसाद त्रिपाठी की ‘नंगातलाई का गांव’ आदि को हिन्दी की संस्मरण विधा के विकास के रूप में देखा जा सकता है। लेकिन हिंदी संस्मरण विधा को एक विशेष रोचकता और अनूठापन देने का श्रेय जाता है कांति कुमार जैन को।

संस्मरण मानस में अवस्थित रहते हैं जो समय आने पर लिपिबद्ध रूप में सामने आते हैं। इस संबंध में लेखक आनन्द कुमार शर्मा ने अपने प्राक्कथन में लिखा है कि ‘‘कोई भी रचना चाहे वह कविता हो, कहानी हो या संस्मरण, मानव के अंतस में सबसे पहले उपजती है। कई बार मुझे यह भी लगता है कि जैसे यह पूर्व से ही अंतस में बसी हुई रहती है। आदमी उसको बाद में जान पाता है या कई बार जान भी नहीं पाता और बिना जाने उसका संवाहक हो जाता है, यह सब एक रहस्य की तरह हैं।’’
लेखक आनन्द कुमार शर्मा एक कवि हैं, यात्रावृत्तांत लेखक हैं और एक स्तम्भकार भी हैं। इस पुस्तक को पढ़ने से पूर्व उनके स्तम्भ लेखों में उनके संस्मरण पढ़ती रही हूं और उन्हीं लेखों के आधार पर यह दावे से कहा जा सकता है कि आनन्द कुमार शर्मा एक सिद्धहस्त संस्मरण लेखक हैं और अब इस पुस्तक के रूप में एक प्रत्यक्ष प्रमाण उपस्थित है। लेखक आनन्द कुमार जब किसी घटना का विवरण प्रस्तुत करते हैं तो वह इतना जीवन्त होता है कि मानो सब कुछ आंखों के सामने घटित हो रहा हो। वस्तुतः आनन्द कुमार शर्मा का लेखन एक टाईम मशीन की तरह है जिसके पोर्टल पर पहुंचते ही पाठक उनके विवरणों के जरिए अतीत के निश्चित कालखण्ड में पहुंच कर विचरण करने लगता है। सारे दृश्य आंखों के आगे किसी चलचित्र की भांति चलायमान हो उठते हैं। यह लेखक की लेखन कला में मौजूद बारीकियों का कमाल है।

इस पुस्तक में कुछ ऐसी घटनाओं का विवरण है जो चौंकाती हैं। जैसे लेखक को उज्जैन में उस दिन ज्वाइनिंग का अवसर मिला जिस दिन सुबह महाकाल मंदिर में भगदड़ से कुछ लोगों की जानें चली गई थीं। इसके बाद लेखक को मंदिर के प्रशासक पद का भार दिया गया। मानो स्वयं महाकाल ने अपनी सेवा के लिए उन्हें बुलाया था। क्योंकि उज्जैन के पूरे सेवाकाल में उन्हें तीन और पदस्थापनाएं मिलीं किन्तु मंदिर प्रशासन उन्हीं के हाथों में रहा। उन्होंने प्रशासक के पद का दायित्व निभाते हुए मंदिर में सुरक्षा और साज-संवार के लिए जो भी संभव था वह सब कुछ किया। इस दौरान कई दिलचस्प घटनाएं घटीं। जिनमें से एक उनके नाबालिग भांजे का काम की तलाश में जबलपुर से मुंबई भाग जाना। इस घटना को ले कर लेखक ने महाकाल को उलाहना दिया। जबकि बाद में पता चला कि मुंबई में भांजे की एक टैक्सी ड्राईवर ने न केवल सहायता की अपितु भांजे को उसकी गलती का अहसास भी करा दिया। मायानगरी मुंबई में ऐसा व्यक्ति मिलना एक चमत्कार की भांति लगना स्वाभाविक है।

एक और घटना है कि लेखक ने जब मंदिर प्रशासन का भार सम्हाला था तब मंदिर की आय कुल 33 लाख थी। लेखक को लगा कि यह आया कम से कम एक करोड़ होनी चाहिए और तीन पदस्थापनाओं के बाद जिस दिन मंदिर की आय एक करोड़ से ऊपर पहुंची उस दिन लेखक का उज्जैन से स्थानान्तरण हो गया। मानो उनका संकल्प पूरा हो गया था। इसी प्रकार दो संतानों के बाद मेडिकली समस्या होने के बावजूद पुत्र का जन्म संभव होना, महाकाल मंदिर की सज्जा के लिए चांदी और सोने की स्वतः व्यवस्था होते जाना आदि पुस्तक में अनेक रोचक घटनाओं का विवरण है। एक घटना ऐसी भी है जो लेखक के स्वाभिमान से परिचित कराती है। यह स्वभिमान लेखक का निजी होने के साथ ही महाकाल की प्रतिष्ठा से भी जुड़ा हुआ था। मंदिर में रुद्रयंत्र के जीर्णोद्धार के लिए चांदी की आवश्यकता थी और समयानुसार व्यवस्था नहीं हो पा रही थी। तब किसी ने लेखक को सलाह दी कि दिल्ली के कनाॅट प्लेस में एक सेठ का ऑफिस है जहां सेठ से मिल कर चांदी की व्यवस्था की जा सकती है। लेखक एक पुजारी के साथ सेठ के पास पहुंचे। सेठ ने लेखक से पूछा-‘‘बताइए आपके महाकाल को कितनी चांदी चाहिए?’’ लेखक के ही शब्दों में -‘‘पता नहीं क्यों इन शब्दों को सुन कर ही मेरे तन-बदन में आग लग गई। मैं गुस्से से उठा और मैंने कहा महाकाल को तो कुछ भी नहीं चाहिए, पर तुमको यदि कुछ देना हो तो मंदिर में आ जाना। और बिना कुछ आगे बोले मैं दफ़्तर की सीढ़ियां उतरते नीचे चल पड़ा। पुजारी जी अवाक मेरे पीछे-पीछे लपक लिए। नीचे आ कर मुझसे बोले, आप क्यों गुस्सा हो गए, ये बड़ा सेठ था। अपने को अच्छी चांदी मिल सकती थी। मैंने कहा कि मुझे इस तरह के दानदाताओं की ज़रूरत नहीं है।’’ संयोग यह कि अप्रत्याशित रूप से समय रहते चांदी की व्यवस्था अन्य स्रोत से हो गई और लेखक का स्वाभिमान एवं महाकाल का सम्मान सुरक्षित रहा। इस पुस्तक में पौराणिक कथाओं के साथ ही ऐतिहासिक घटनाओं का भी उल्लेख किया गया है जैसे मराठा माहद जी सिंधिया की पानीपत युद्ध में पराजय और फिर महाकाल की कृपा से विजय। यह भी इतिहास का एक रोचक प्रसंग है।  

पुस्तक के कलेवर से हट कर एक तथ्य और उभर कर सामने आता है कि लेखक में हठधर्मिता नहीं है। इसका प्रमाण यह है कि पुस्तक में कुल सत्रह लेखात्मक अध्याय हैं और इन प्रत्येक अध्यायों के आरम्भ में उपनिषद्, रामचरित मानस और मेघदूत आदि से श्लोक दिए गए हैं। लेखक ने प्राक्कथन में स्पष्ट उल्लेख किया है कि ये सभी श्लोक उन्हें ओ.पी. श्रीवास्तव, अपर सचिव मुख्यमंत्री कार्यालय ने सुझाए। जबकि आजकल लेखको में यह प्रवृत्ति देखी जाती है कि एक तो वे सुझाव सुनना या मानना ही नहीं चाहते हैं और यदि कहीं सुझाव पर अमल कर लिया तो वे उसे अपने खाते में दर्ज़ करके अपनी पीठ थपथपाते नज़र आते हैं। किन्तु आनन्द कुमार शर्मा ने सहजता से उल्लेख किया है सुझाव देने वाले का। इसे एक लेखकीय संस्कार एवं शालीनता कह सकते हैं जो लेखक की लेखन-प्रतिबद्धता के प्रति आश्वस्त करती है। पुस्तक में महाकाल मंदिर के रंगीन छायाचित्र हैं जिनमें अमिताभ बच्चन, गोविंदा जैसे अभिनेताओं द्वारा पूजनअर्चन के दृश्य हैं।

लेखक आनन्द कुमार शर्मा भाषाई क्लीष्टता में नहीं पड़े हैं वरन उन्होंने आम बोलचाल की भाषा अपनाई है। जिससे पढ़ते समय ऐसा प्रतीत होता है मानो कोई सामने बैठ कर अपने अनुभव सुना रहा हो। उनके लेखन में वाचिक स्वर हैं। यह विश्वासपूर्वक कहा जा सकता है कि ‘‘महाकाल के अद्भुत प्रसंग’’ अत्यंत रोचक पुस्तक है और यह हर स्तर के पाठकों को रुचिकर लगेगी। इसके साथ ही यह पुस्तक संस्मरण विधा को पुष्पित, पल्लिवित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कृति मानी जा सकती है।
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Monday, February 21, 2022

"किसी भी विधा को साधने के लिए साधना करना ज़रूरी है।" - डॉ (सुश्री) शरद सिंह

"किसी भी विधा को साधने के लिए साधना करना ज़रूरी है। डॉ विनीत मोहन औदिच्य ‘फ़िक्र सागरी’ की ग़ज़लें न केवल ख़ुद को एक उम्दा ग़ज़ल साबित करती हैं बल्कि शायर की मेहनत और साधना की भी ग़वाही देती हैं। उनके दोनों ही ग़ज़ल संग्रह बेहतरीन हैं और साहित्य को समृद्ध करने वाले हैं।" - विशिष्ट अतिथि के रूप में मैंने (यानी डॉ (सुश्री) शरद सिंह ने) अपने विचार प्रकट करते हुए कहा। अवसर था सागर नगर के शाइर एवं सॉनेटियर डॉ विनीत मोहन औदिच्य फ़िक़्र सागरी के दो ग़ज़ल संग्रह का लोकार्पण - "अंदाज़ ए सुख़न" और "कारवां ए सुख़न"।
     साहित्य भाषा कला और संस्कृति को समर्पित नगर की प्रतिनिधि संस्था श्यामलम द्वारा आयोजित इस लोकार्पण समारोह में मुख्य अतिथि के देश के प्रतिष्ठित शायर श्री अशोक मिज़ाज तथा अध्यक्षता की सुप्रसिद्ध साहित्य मनीषी डॉ सुरेश आचार्य ने। इस अवसर पर दोनों पुस्तकों पर दो समीक्षात्मक आलेख पढ़े गए । एक आलेख डॉ हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के चिंतनशील प्राध्यापक डॉ राजेंद्र यादव द्वारा प्रस्तुत किया गया तथा दूसरा आलेख उर्दू विभाग के विद्वान प्राध्यापक डॉ वसीम अनवर द्वारा प्रस्तुत किया गया। शाइर फ़िक़्र सागरी का परिचय पढ़ा संस्था के सचिव श्री कपिल बैसाखिया ने, संचालन किया श्री प्रदीप पाण्डेय ने तथा आभार प्रदर्शन किया सहसचिव श्री संतोष पाठक ने। आयोजन की संकल्पना तथा रूपरेखा थी संस्था के अध्यक्ष श्री उमाकांत मिश्र की, जिन्होंने उद्घाटन भाषण देकर कार्यक्रम का आगाज़ किया।
        आयोजन में विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग से डॉ शशि कुमार सिंह, हिंदी अधिकारी डॉ छबील कुमार मेहेर, हिंदी विभाग से डॉक्टर आशुतोष मिश्र तथा नगर से सर्वश्री जेपी पाण्डेय, आर के तिवारी, मुकेश तिवारी, टीआर त्रिपाठी, डॉ सरोज गुप्ता, डॉ श्रीमती चंचला दवे, श्रीमती सुनीला सराफ, श्रीमती नंदिनी आदि बड़ी संख्या में साहित्य मनीषियों की उपस्थिति रही। यह समारोह कल 20.02.2022 को होटल वरदान के सभागार में संपन्न हुआ।
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Sunday, February 20, 2022

Article | The message of biodiversity conservation in Khajuraho sculpture | Dr (Ms) Sharad Singh | MP Chronicle

⛳Friends ! Today my article "The message of biodiversity conservation in Khajuraho sculpture" has been published in the Sunday edition of #MP_Chronicle. Please read it.  
🌷Hearty thanks MP Chronicle🙏
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Article | The message of biodiversity conservation in Khajuraho sculpture

-    Dr (Ms) Sharad Singh
Writer, Author & Social Activist
Blogger - "Climate Diary Of Dr (Ms) Sharad Singh"

The sculpture of Khajuraho, a world famous tourist destination called Kalatirth, is unique. The temples of Khajuraho are famous for their Mithun idols but in fact the entire life has been carved in those idols. Looking at the sculptures of Khajuraho, it is known that the people of Chandela were very much aware of nature and biodiversity. The temple walls of Khajuraho have more biodiversity than the Mithun sculptures. We must understand a message that has been left for us by the Chandelas. In this message, showing the presence of biodiversity in life, it has been told that every living being is important for human life.
 Today, when we talk about the environment and biodiversity, we feel that awareness has arisen within us about biodiversity, that is, our ancestors had not noticed this before us, this is our illusion because from the hymns of the Vedas to the There is a special mention and display of biodiversity till the sculptures of Khajuraho. Particularly in the sense that we have seen nature and its elements as mere biotic or non-living components whereas our ancestors revered them as an integral part of life, giving them divinity and giving by divinity a strong sense of protection. This is the reason that at the time of our ancestors, neither the forests were cut wildly nor nature was treated ruthlessly.

The
Chandelas built about 85 temples in Khajuraho. Presently there are about 25
temples out of them. The remains of another grand temple were found in the
excavation work done by the Archeological Survey of India in 1998-99. According
to scholars, the construction period of all these temples is between 950 to
1050 A.D. It is a pleasant feeling to see that the artists of the Chandela era
have beautifully displayed the creative and destructive emotions of humans as
well as biodiversity in these sculptures. This display of biodiversity on the
temple walls attests to the fact that there was an awareness of the environment
and biodiversity during the Chandela period. Khajuraho itself was named on a
botanical basis. Although two types of opinions are prevalent regarding the
naming of Khajuraho, but, in both the views it is believed that Khajuraho was
named because of Kharjoor i.e. date palm trees. According to the first opinion,
there were two golden palm trees at the gate of Khajuraho village. Hence the
name of the village was 'Kharjur' which means the one who wears dates, that is,
Khajuraho. According to the second opinion, this name was given due to the abundance of date trees in Khajuraho village where it was settled.

Due to the dense forest area around Khajuraho located in Bundelkhand, it was natural for the Chandel citizens to have awareness about the environment and biodiversity. Chandela sculptors have established their importance and their utility towards human life by giving humanized form to animals, birds, aquatics, vegetation, air, sun, moon etc. Along with this, the mutual relations of human beings with nature and various creatures have also been demonstrated minutely. The biodiversity displayed in the sculptures of Khajuraho can be mainly divided into two categories - 1. Original form and 2. Symbolic form.

The original form of biodiversity is depicted everywhere in the sculptures carved on the outer walls of the temple. Tree branches have been carved at the entrances of the temples. These branches have three types, Tri Shakha (three branches) , Pancha Shakha (five branches) and Sapta Shakha (seven branches). On these branches shown vines, flowers and motifs. Along with this, Kalpavriksha (divine tree)has also been carved. There are seven branches at the sanctum sanctorum of the Kandariya Mahadev temple. While most of the temples have Panch Shakhas. Flowers, leaves, erotic idols and ascetics absorbed in meditation have been made on these gate branches. On the lower end of these gate branches are the statues of Makar Vahini Ganga (River Goddess Ganga riding on a crocodile) and Kurma Vahini Yamuna (River Goddess Yamuna riding on a turtle) on the other side.

Apart from flowers, leaves, creepers, trees, trees have also been given a place. In the Lakshmana temple, a woman is shown standing under the shade of a mango tree. It signifies the mutual relationship between human and plant. Tree branches are inscribed near the woman painting in the Vamana temple, indicating that the woman is painting trees and plants on her canvas. Along with plants, animals and birds have also been given place in the sculptures of Khajuraho. The Nari idol, stored in the Khajuraho Museum, depicts a bird on the right palm. The Vishwanath temple has two female idols, one of which depicts a bird sitting on the wrist and the other one is shown munching on grains. Sarika bird in Jagdamba temple, parrot in Kandariya Mahadev, Maina in Vamana temple and Uluk (owl) in Lakshman temple are carved as pet birds. Birds like peacock, swan, and owl are also depicted as vehicle symbols. wild boar have been engraved. Apart from these, small animals like mice and mongooses have also been inscribed. Among the aquatic creatures, Fish, Shell, Turtle and Crocodile have been engraved as vehicle symbols. The uniqueness with which biodiversity is presented in the sculpture of Khajuraho is amazing. Venomous creatures have also been given place in these idols. The marking of different types of snakes and scorpions proves that the Chandela society gave equal importance to all forms of living beings. Every form of biodiversity has been presented by molding it in stone craft, whether it is the organic world or the non-living world.

The biodiversity inscribed in the sculpture of Khajuraho also gives a message that if the present life is to be made for worth living for many generations to come like the sculpture of Khajuraho, then all the elements necessary for life will have to be conserved. They will have to be saved from extinction, whether it is forest Be it wildlife or all kinds of animals and plants, all have to be protected. These must be saved from extinction. Understanding the importance of biodiversity, like the sculptures of Khajuraho, we have to save our present and future and in this direction, the sculpture art of the biodiversity present in the sculptures of Khajuraho is a source of inspiration for us.

(The author of this article is Doctorate on Khajuraho Sculpture.)
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 (20.02.2022)
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Saturday, February 19, 2022

अपनी जड़ों को पहचानने के लिए लोक संस्कृति को जानना जरूरी है - डॉ (सुश्री) शरद सिंह


"आज शादियों में डीजे संस्कृति के चलते हम विवाहोत्सव में  गाए जाने वाले संस्कार गीतों को भूलते जा रहे हैं जबकि यह हमारी सांस्कृतिक पहचान हैं। लोक से ही हम जन्मे हैं और लोक ही हमारी वास्तविक ज़मीन हैं जिसे जानना ज़रूरी है यानी अपनी जड़ों को पहचानने के लिए लोक संस्कृति को जानना जरूरी है और इस दिशा में लोक भाषा में लिखी हुई किताबें बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।" मैंने (डॉ सुश्री शरद सिंह) अपने ये विचार व्यक्त किए स्थानीय कवि बिहारी सागर की काव्य कृति "बुंदेली मकुइया" के लोकार्पण के अवसर पर।


    📙पुस्तक लोकार्पण के पूर्व पाठक मंच की सागर इकाई द्वारा लेखक सूर्यकांत बाली के उपन्यास "दीर्घतमा" पर डॉ प्रदीप पाण्डेय द्वारा समीक्षा आलेख का वाचन किया गया। जिसकी अध्यक्षता कवयित्री श्रीमती कुसुम सुरभि ने की तथा अध्यक्षता की दामोदर अग्निहोत्री जी ने। पाठक मंच सागर के संयोजक श्री आर के तिवारी द्वारा आयोजित इस गोष्ठी का संचालन किया हरीसिंह ठाकुर जी ने तथा आभार प्रदर्शन किया मुकेश तिवारी जी ने। इसी आयोजन के अंतर्गत श्री उमाकांत मिश्र जी एवं श्यामलम संस्था के सहयोग से "बुंदेली मकुइया" काव्य संग्रह का लोकार्पण हुआ। श्यामलम संस्था की ओर से कवि बिहारी सागर को शॉल, श्रीफल और सम्मानपत्र से सम्मानित भी किया गया।


  🏛️जेजे इंस्टीट्यूट के सभागार में आयोजित इस कार्यक्रम में बड़ी संख्या में नगर के साहित्य मनीषी उपस्थित हुए।

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Friday, February 18, 2022

स्व. पुष्पदंत हितकर एक सरल हृदय व्यक्ति थे - डॉ (सुश्री) शरद सिंह

मित्रो, मैं बताना चाहूंगी कि मेरे शहर में साहित्य, कला, भाषा और संस्कृति को समर्पित संस्था है "श्यामलम"।साहित्यकारों एवं कलाकारों के दिवंगत होने पर उन्हें श्रद्धांजलि देने के उद्देश्य से इस संस्था की स्थापना श्री उमाकांत मिश्र जी ने अपने अग्रज बॉलीवुड अभिनेता स्व. श्यामाकांत मिश्र जी की स्मृति में की थी। क्योंकि, कई बार यह होता है कि  साहित्यकार एवं कलाकारों के परिजन भी समाज में उनके महत्व को समझ नहीं पाते हैं किंतु जब इस प्रकार के आयोजन में वहां उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति अपने श्रद्धासुमन अर्पित करता है तो परिजन को भी यह गौरव महसूस कर पाते हैं कि उनके अपने परिवार का सदस्य समाज में कितना महत्वपूर्ण स्थान रखता था। इस प्रकार की श्रद्धांजलि सभा का आयोजन करते समय आर्थिक रूप से समर्थ अथवा असमर्थ का भेदभाव नहीं किया जाता है अपितु सभी के लिए समान भावना से श्रद्धांजलि सभा आयोजित की जाती है।    
      एक पवित्र उद्देश्य को लेकर स्थापित श्यामलम संस्था का कारवां जैसे-जैसे बढ़ता गया, वह बहुआयामी क्षेत्रों में विस्तारित होता गया। यह अपने आप में एक अनूठी और अद्वितीय संस्था है।
       🚩इसी श्यामलम संस्था ( Shyamlam Kala ) द्वारा आज  आयोजित श्रद्धांजलि सभा में सागर नगर के हम सभी साहित्यकारों ने अपने वरिष्ठ साथी स्वर्गीय पुष्पदंत हितकर जी को श्रद्धांजलि अर्पित की, जिनका विगत 15 फरवरी 2022 को देहावसान हो गया था। इस अवसर पर मैंने उस आलेख का अंश पढ़ा जो अपने कॉलम "सागर : साहित्य एवं चिंतन" के अंतर्गत 12 सितम्बर 2018 को मेरी दीदी डॉ वर्षा सिंह जी ने पुष्पदंत हितकर जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर लिखा था। अंशवाचन के साथ ही मैंने अपने श्रद्धासुमन भी अर्पित किए.......

पुष्पदंत हितकर जी को विनम्र श्रद्धांजलि - डॉ (सुश्री) शरद सिंह

वासांसि जीर्णानि यथा विहाय
नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णा
न्यन्यानि संयाति नवानि देही।।
         अर्थात....जिस प्रकार मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर नये वस्त्रों को ग्रहण करता है, उसी प्रकार आत्मा पुराने शरीर को त्यागकर नये शरीर को प्राप्त करती है।

पुरानी तेरे को त्याग चुके हमारे वरिष्ठ साथी पुष्पदंत हितकर जी का स्मरण करती हूं उन्हें अपने श्रद्धा सुमन अर्पित करती हूं 🙏
..........

एक साहित्यकार अपने विचारों और अपनी कृतियों अपनी रचनाओं के रूप में हमेशा हमारे साथ अस्तित्व में रहता है और इसीलिए जो मैं मेरी दीदी डॉक्टर वर्षा सिंह द्वारा लिखा गया लेख का अंश यहां पढ़ने जा रहे हो उसमें वर्तमान काल का संबोधन है अतः उसे उसी रूप में स्वीकार करें यह लेख 12 सितंबर 2018 को आचरण में प्रकाशित हुआ था जिसे मेरी दीदी डॉ वर्षा सिंह ने अपने कॉलम  "सागर : साहित्य एवं चिंतन" के अंतर्गत कवि "पुष्पदंत हितकर सहज अभिव्यक्ति ही जिनकी खूबी है" - शीर्षक से एक लेख हितकर जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व को रेखांकित करते हुए लिखा था। उसी का एक अंश मैं यहां प्रस्तुत कर रही हूं....

"कवि हितकर के जीवन पर अपने माता-पिता के धार्मिक विचारों एवं सहृदयता का गहरा प्रभाव पड़ा। सागर विश्वविद्यालय से बी.एस-सी. फाइनल तक शिक्षा ग्रहण करने वाले पुष्पदंत हितकर ने सन् 1975 से लेखन कार्य आरम्भ किया। साहित्य में रुचि रखने वाले कवि हितकर की कविताएं अनेक पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहीं।
साहित्य सेवा के साथ ही पुष्पदंत हितकर समाज सेवा से जुड़ गए। इसी तारतम्य में जैन छात्र समिति के द्वारा प्रकाशित वार्षिक पत्रिका ‘रश्मि’ का संपादन किया। इसी दौरान उन्हें जैन संतो ंके समागम में काव्यपाठ का सुअवसर प्राप्त हुआ। सन् 1993 में पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव में आचार्य श्री विद्यासागर महराज का सानिध्य प्राप्त होने के साथ ही कवि हितकर को गजरथ स्मारिका का संपादन करने का अवसर भी प्राप्त हुआ। कवि हितकर का अभी तक कोई काव्य संकलन तो प्रकाशित नहीं हो सका है किन्तु नगर की साहित्यिक गोष्ठियों में उनकी सक्रियता निरंतर बनी रहती है।

पुष्पदंत हितकर यह मानते हैं कि यदि प्रत्येक मनुष्य मनुष्यता का पाठ पढ़ ले और स्वयं को बुराईयों से बचा ले तो व्यक्तिगत कठिनाईयों के साथ ही समाज में व्याप्त बुराईयां भी दूर हो सकती हैं। ‘‘हमें ऐसे इंसान चाहिए’’ शीर्षक कविता में उन्होंने अपनी इसी आकांक्षा को व्यक्त किया है -
क्या ज़रूरी है कि हम
गीता कुरान पर हाथ रख कर
झूठी कसमें खाएं
गुनाहों को छिपाने के लिए
और गुनाह करते जाएं।
हमें तोड़ने वाले धर्म नहीं
जोड़ने वाले मन चाहिए।
प्रार्थना, इबादत तो हम कभी भी
बैठ कर कर लेंगे
जो दूसरों के दुख-दर्द को समझें
हमें ऐसे इंसान चाहिए

कवि पुष्पदंत हितकर सरल शब्दों में अपने भाव व्यक्त करने वाले लगनशील कवि हैं, जो सागर की साहित्यिकता में वृद्धि करते रहते हैं।"
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पुष्पदंत हितकर जी एक सरल हृदय व्यक्ति थे। उन्हें मेरा विनम्र नमन 🙏
विनम्र श्रद्धांजलि 🙏
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Newspapers of 19.02.2022