Wednesday, April 20, 2022

चर्चा प्लस | प्रथम पुण्यतिथि (20 अप्रैल) : साहित्य की मौन साधिका डाॅ. विद्यावती ‘मालविका | डॉ. (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर

चर्चा प्लस  
प्रथम पुण्यतिथि (20 अप्रैल) :
साहित्य की मौन साधिका डाॅ. विद्यावती ‘मालविका
           - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह                                                                                        
डाॅ. विद्यावती ‘मालविका’ एक ऐसा नाम है जिसे हिन्दी साहित्य जगत में आज भी सम्मान से लिया जाता है। उनका शोधग्रंथ ‘‘हिन्दी संत साहित्य पर बौद्ध धर्म का प्रभाव’’ आज भी वि़द्वानों एवं शोधार्थियों के लिए मार्गदर्शक का काम करता है। वे अपने समय की एक बड़ी लेखिका थीं। स्वयं राहुल सांकृत्यायन ने उन्हें पीएच डी में गाईड किया था। वे चाहती तो एक शोहरत और दिखावे वाला जीवन जी सकती थीं लेकिन उन्होंने चुना सादगी भरा जीवन और ख़ामोशी से रह कर लेखन कार्य करने का मार्ग।  
मैं हूं मालव कन्या मुझको, प्रिय है धरा बुंदेली।
शिप्रा मेरी बहिन सरीखी, सागर झील सहेली।।
उज्जैयिनी ने सदा मुझे स्नेह दिया
विक्रम की धरती ने मेरा मान किया,
बुंदेली वसुधा ने मुझे दुलार दिया
गौर-भूमि ने मुझे सदा सम्मान दिया,
सदा लुभाती मुझको सुंदर ऋतुओं की अठखेली।
मैं हूं मालव कन्या मुझको, प्रिय है धरा बुंदेली।।
महाकाल के चरणों में बचपन बीता
रहा न मेरा अंतस साहस से रीता,
यहां बुंदेली संस्कृति को अपनाने पर
हुई समाहित मेरे मन में ज्यों गीता,
ऋणी रहूंगी मैं नतमस्तक, बांधे युगल हथेली।
मैं हूं मालव कन्या मुझको, प्रिय है धरा बुंदेली।।
          -यह कविता मात्र एक कविता नहीं है वरन संक्षिप्त काव्यात्मक जीवन परिचय है जो डाॅ. विद्यावती ‘मालविका’ ने स्वयं अपने बारे में लिखा था। डॉ. विद्यावती ‘मालविका’ सागर नगर की एक ऐसी साहित्यकार थीं जिनका साहित्य-सृजन अनेक विधाओं, यथा- कहानी, एकांकी, नाटक एवं विविध विषयों पर शोध प्रबंध से ले कर कविता और गीत तक विस्तृत रहा है। लेखन के साथ ही चित्रकारी के द्वारा भी उन्होंने अपनी मनोभिव्यक्ति प्रस्तुत की। सन् 1928 की 13 मार्च को उज्जैन में जन्मीं डॉ. विद्यावती ‘मालविका’ ने अपने जीवन के लगभग 60 वर्ष बुन्देलखण्ड में व्यतीत किए हैं, जिसमें 30 वर्ष से अधिक समय से वे मकरोनिया, सागर में निवासरत रहीं। डॉ. ‘मालविका’ को अपने पिता संत ठाकुर श्यामचरण सिंह एवं माता श्रीमती अमोला देवी से साहित्यिक संस्कार मिले। पिता संत श्यामचरण सिंह एक उत्कृष्ट साहित्यकार एवं गांधीवादी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। उन्होंने छत्तीसगढ़ क्षेत्र में अस्पृश्यता उन्मूलन एवं नशाबंदी में उल्लेखनीय योगदान दिया था। संत श्यामचरण सिंह को अपनी गतिविधियों को अंग्रेज शासन से बचाए रखने के लिए एक नाम और धारण करना पड़ा। छत्तीसगढ़ के दुर्ग और उसके आसपास के क्षेत्र में जहां उन्होंने गांधीवादी आंदोलन चलाया, उन्हें पीलालाल चिनौरिया के नाम से भी जाना जाता रहा है। डॉ. विद्यावती अपने पिता के विचारों से अत्यंत प्रभावित रहीं और उन्होंने 12-13 वर्ष की आयु से ही साहित्य सृजन आरम्भ कर दिया था। बौद्ध धर्म एवं प्रणामी सम्प्रदाय पर उन्होने विशेष अध्ययन एवं लेखन किया।

डॉ. विद्यावती ‘मालविका’ का जीवन अत्यंत संघर्षमय रहा। जैसी कि उन समय परंपरा थी, एक पारिवारिक परिचित की मध्यस्थता से उत्तरप्रदेश के देवरिया जिले के ठाकुर रामधारी सिंह जी के साथ उनका विवाह हुआ। ठाकुर रामधारी सिंह सुलझे हुए व्यक्ति थे और वे भी गांधीवादी विचारों के समर्थक थे। वे अपने परिवारजन की भांति पुरातनपंथी भी नहीं थे। वे बेटियों के जन्म को अभिशाप नहीं समझते थे। किन्तु वे विद्यावती ‘मालविका’ जी का अधिक साथ नहीं दे सके। दो बेटियों के जन्म के कुछ समय बाद ही विद्यावती जी को वैधव्य का असीम दुख सहन करना पड़ा, किन्तु वे अपने कर्तव्य से विमुख नहीं हुईं। ससुराल पक्ष से कोई सहायता न मिलने पर उन्होंने शिक्षिका के रूप में आत्मनिर्भरता पूर्वक अपने वृद्ध पिता को सहारा दिया और अपने अनुज कमल सिंह को पढ़ा-लिखा कर योग्य बनाया। जो कि आदिम जाति कल्याण विभाग मघ्यप्रदेश शासन के हायर सेकेंडरी स्कूल के प्राचार्य पद से सेवानिवृत्त हुए। वे प्रसन्न थीं कि अपने छोटे भाई का जीवन संवार सकी थीं। किन्तु उन्हें अपने छोटे भाई कमल सिंह के उस दुख को देखना पड़ा जो उन्हें वर्षों तक भीतर ही भीतर उन्हें सालता रहा। समयापूर्व प्रथम प्रसव के दौरान कमल सिंह जी की जीवन साथी एवं अजन्मे शिशु का निधन हो गया। वे अकेले रह गए। एक बार फिर डॉ. विद्यावती जी ने अपने छोटे भाई को सम्हलने में मदद की। यद्यपि वे अपने भाई को पुनर्विवाह के लिए मना नहीं सकीं। लेकिन बहन-भाई का आपसी स्नेह जीवन भर रहा। सेवानिवृत्ति के उपरांत कमल सिंह विद्यावती जी के पास सागर आ गए तथा सन् 2017 में हृदयाघात से मृत्यु के उपरांत ही अपनी बड़ी बहन की स्नेहिल छांव से अलग हुए।
                डॉ. विद्यावती ने अपने बलबूते पर अपनी दोनों पुत्रियों वर्षा सिंह और शरद सिंह का लालन-पालन कर उन्हें उच्च दिलाई। उन्होंने व्याख्याता के रूप में मध्यप्रदेश शासन के शिक्षा विभाग में उज्जैन, रीवा एवं पन्ना आदि स्थानों में अपनी सेवाऐं दीं और सन् 1988 में पन्ना के मनहर शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय से सेवानिवृत्त हुईं। डॉ. विद्यावती शासकीय सेवा के साथ ही लेखन एवं शोध कार्यां में सदैव संलग्न रहीं। स्वाध्याय से हिन्दी में एम.ए. करने के उपरांत सन् 1966 में आगरा विश्वविद्यालय से उन्होंने ‘‘मध्ययुगीन हिन्दी संत साहित्य पर बौद्ध धर्म का प्रभाव’’ विषय में पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की। पीएच.डी. में उनके शोध निर्देशक (गाइड) हिन्दी तथा बौद्ध दर्शन के प्रकाण्ड विद्वान राहुल सांकृत्यायन एवं पाली भाषा तथा बौद्ध दर्शन के अध्येता डॉ. भिक्षु धर्मरक्षित थे। उनका यह शोध प्रबंध आज भी युवा शोधकर्ताओं के लिए दिशानिर्देशक का काम करता है। डॉ. विद्यावती की अनेक पुस्तकें प्रकाशित हो हुईं, जिनमें प्रमुख हैं - कामना, पूर्णिमा, बुद्ध अर्चना (कविता संग्रह) श्रद्धा के फूल, नारी हृदय (कहानी संग्रह), आदर्श बौद्ध महिलाएं, भगवान बुद्ध (जीवनी) बौद्ध कलाकृतियां (पुरातत्व), सौंदर्य और साधिकाएं (निबंध संग्रह), अर्चना (एकांकी संग्रह), मध्ययुगीन हिन्दी संत साहित्य पर बौद्ध धर्म का प्रभाव, महामति प्राणनाथ-एक युगान्तरकारी व्यक्तित्व (शोध ग्रंथ) आदि। ‘‘आदर्श बौद्ध महिलाएं’’ पुस्तक का बर्मी एवं नेपाली भाषाओं में अनुवाद प्रकाशित हुआ।
                डॉ. विद्यावती जहां रहीं वहां उन्होंने अपनी साहित्यिक प्रतिभा से सबको प्रभावित किया। जब वे उज्जैन में थीं तो डाॅ. श्याम परमार ने उन्हें ‘‘मालव कन्या’’ कहते हुए ‘‘मालविका’’ उपनाम दिया। जब वे अपने पिताजी के साथ छत्तीसगढ़ में रहीं तो वहां उनकी प्रतिभा को सभी ने सराहा। इस संबंध में जानकारी मिलती है उस लेख से जिसे दुर्ग (छत्तीसगढ़) के साहित्यकार अरुण कुमार निगम ने अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर लिखा था और जिसका शीर्षक है - ‘‘दुर्ग जिले की सुप्रसिद्ध महिला साहित्यकार: डॉ. विद्यावती ‘‘मालविका’’। उनके लेख का एक अंश साभार यहां दे रही हूं-
दुर्ग जिला हिन्दी साहित्य सम्मेलन के चतुर्थ अधिवेशन, पाटन के अध्यक्ष श्री पतिराम साव ‘‘विशारद’’ के अभिभाषण दिनांक 23 अप्रैल 1961 के एक अंश में ‘‘नारी समाज और साहित्य चेतना’’ शीर्षक के अंतर्गत उल्लेखित है -‘‘हर्ष की बात है कि अपने दुर्ग जिले में श्रीमती मनोरमा पाटणकर और श्रीमती सुधा राजपूत कविता लिखती हैं तथा कवि सम्मेलनों में भाग लेती हैं। महिला समाज को साहित्य क्षेत्र में उतरने का नेतृत्व प्राप्त है। ‘‘श्रीमती विद्यावती मालविका’’ भी दुर्ग जिले की हैं, उन्होंने अपनी कम अवस्था में ही अनेक पुस्तकें लिखी हैं। आप श्री पीलालाल चिनौरिया की सुपुत्री हैं।’’
इसी प्रकार दुर्ग जिला हिन्दी साहित्य सम्मेलन पंचम अधिवेशन में बालोद के अध्यक्ष श्री दानेश्वर शर्मा ने अपने भाषण (गुरुवार दिनांक 21 जून 1962) में ‘‘हमारे गौरव’’ शीर्षक के अन्तर्गत कहा था -‘‘श्री पीला लाल चिनौरिया (संत श्यामा चरण सिंह ), शिशुपाल सिंह यादव उदय प्रसाद ‘‘उदय’’ व पतिराम साव ने तो दुर्ग में साहित्य की ज्योति ही जलाई है।’’ इसी भाषण में ‘‘जगमगाते नक्षत्र’’ शीर्षक के अंतर्गत उल्लेखित है - ‘‘श्रीमती मनोरमा पाटणकर, विद्यावती मालविका तथा विद्यावती खंडेलवाल इस जिले की महिला साहित्यकार हैं जिन्होंने अच्छी रचनाओं का सृजन किया है।’’
विशेष उल्लेखनीय है कि जनकवि कोदूराम ‘‘दलित’’ के शिक्षा गुरु तथा काव्य गुरु सन्त श्यामचरण सिंह उर्फ श्री पीलालाल चिनौरिया जी थे। श्री श्यामाचरण सिंह उर्फ पीलालाल चिनौरिया का विवाह सुमित्रा देवी ‘‘अमोला’’ से सन् 1925 में हुआ था। वे उन दिनों भिलाई, छत्तीसगढ़ में प्रधान-अध्यापक हुआ करते थे। उसी वर्ष उनका स्थानांतरण अर्जुन्दा में हुआ था। 13 मार्च सन् 1928 में विद्यावती मालविका का जन्म हुआ। श्री श्यामाचरण सिंह जी अध्यापक होने के साथ-साथ आशुकवि, एक उत्कृष्ट साहित्यकार, समाज सुधारक एवं गांधीवादी विचारधारा के थे। विद्यावती की माता श्रीमती सुमित्रा देवी ‘‘अमोला’’ भी विदुषी महिला थीं। वे गृहणी होने के साथ भक्तिभाव की रचनाएं लिखती थीं। विद्यावती ‘मालविका’ जी को अपने पिता श्यामाचरण सिंह एवं माता श्रीमती सुमित्रा देवी ‘अमोला’ से साहित्यिक संस्कार मिले थे। उन्होंने 12-13 वर्ष की आयु अर्थात चालीस के दशक से ही साहित्य सृजन आरम्भ कर दिया था। शालेय शिक्षा पूर्ण करने के बाद उन्होंने साहित्य रत्न तथा एम.ए. की डिग्री प्राप्त की। तत्पश्चात ‘‘हिन्दी सन्त-साहित्य पर बौद्ध धर्म का प्रभाव’’ विषय में आगरा विश्वविद्यालय से पी एच डी की उपाधि प्राप्त की। इस दौरान पंडित हजारी प्रसाद द्विवेदी ने उनका वाईवा लिया था। वे 1944 में धरमजयगढ़ (छत्तीसगढ़) में अध्यापिका बनीं। 1945 में बौद्ध धर्म संबंधित उनकी पहली रचना ‘धर्मदूत’’ में प्रकाशित हुई थी।
            - उपरोक्त लेख से डॉ. विद्यावती जी के छत्तीसगढ़ में प्रभाव का पता चलता है। वहीं, वे जब सेवानिवृत्ति के बाद सागर की निवासी बनीं तो उन्होंने दैनिक भास्कर के सागर संस्करण में ‘‘सागर संभाग की कवयित्रियां’’ शीर्षक से धरावाहिक लेख लिखे। बुंदेलखंड के साहित्य जगत को समृद्ध करने में भी अपने मौलिक लेखन से उन्होंने महत्वपूर्ण योगदान दिया। अजयगढ़ के सुप्रतिष्ठित कवि एवं साहित्यकार अंबिका प्रसाद ‘दिव्य’’ उन्हें ‘‘बुंदेलखंड की साहित्य ज्योति’’ कहा करते थे। आचार्य त्रिलोचन शास्त्री उन्हें ‘‘विदुषी बहन’’ कह कह पुकारा करते थे। शिवमंगल सिंह सुमन, पं. सूर्यनारायण व्यास, ब्रजभूषण सिंह आदर्श आदि सुप्रतिष्ठित साहित्यकारों ने सदा उनकी प्रशंसा की। वे चाहती तो एक शोहरत और दिखावे वाला जीवन जी सकती थीं लेकिन उन्होंने चुना सादगी भरा जीवन और ख़ामोशी से रह कर लेखन कार्य करने का मार्ग।  
डॉ. ‘मालविका’ को हिन्दी साहित्य सेवा के लिए अनेक पुरस्कार एवं सम्मान प्राप्त हुए। जिनमें उल्लेखनीय हैं- सन् 1957 में स्वतंत्रता संग्राम शताब्दी सम्मान समारोह में मध्यप्रदेश शासन का साहित्य सृजन सम्मान, सन् 1958 में उत्तरप्रदेश शासन का कथा लेखन सम्मान, सन् 1959 में उत्तरप्रदेश शासन का जीवनी लेखन सम्मान, सन् 1964 में मध्यप्रदेश शासन का कथा साहित्य सम्मान, सन् 1966 में मध्यप्रदेश शासन का मीरा पुरस्कार प्रदान किया गया। सेवानिवृत्ति के बाद भी डॉ. विद्यावती ने अपना लेखन सतत् जारी रखा। उनके इस साहित्य के प्रति सर्मपण को देखते हुए उन्हें सन् 1998 में महारानी लक्ष्मीबाई शास. उ.मा. कन्या विद्यालय क्रमांक-एक, सागर द्वारा ‘‘वरिष्ठ साहित्यसेवी सम्मान’’, सन् 2000 में भारतीय स्टेट बैंक सिविल लाइनस् शाखा सागर द्वारा ‘‘साहित्यसेवी सम्मान’’, वर्ष 2007 में मध्यप्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन सागर द्वारा ‘‘सुंदरबाई पन्नालाल रांधेलिया स्वतंत्रता संग्राम सेनानी सम्मान’’ एवं सन् 2016 में हिन्दी दिवस पर श्यामलम् संस्था सागर द्वारा ‘‘आचार्य भगीरथ मिश्र हिन्दी साहित्य सम्मान’’ से सम्मानित किया गया। जुलाई 2020 में सागर के यूट्यूबर साहित्यकार वरुण प्रधान ने अपने प्रधाननामा चैनल में उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर एक एपीसोड प्रसारित किया था जिसे आज भी यूट्यूब पर देखा जा सकता है।

           20 अप्रैल 2021 को हृदयाघात से डाॅ विद्यावती ‘‘मालविका’’ ने इस संसार से विदा ले ली। उनके निधन से व्यथित उनकी बड़ी पुत्री डाॅ. वर्षा सिंह ने ‘‘छोड़ गईं मां हमें अकेला.’’ शीर्षक से यह भावभीना गीत लिखा था-
दीपक जल कर फैलाता है
यादों का उजियाला।
मां ने किस ममता से हमको
संघर्षों में पाला।

लगा हुआ है जग का मेला
छोड़ गईं मां हमें अकेला
पल-पल भारी सी लगती है
आज कठिन यह दुख की बेला
भूख-प्यास सब गायब जैसे
भाता नहीं निवाला।

माना यह दुनिया है फानी
सबकी लगभग एक कहानी
किन्तु ये मन है नहीं मानता
सुनना चाहे मां की बानी
आएं कितनी ‘‘वर्षा’’ ऋतुएं
बुझे न मन की ज्वाला।
उस समय डाॅ विद्यावती जी की छोटी पुत्री डाॅ शरद सिंह को यह पता नहीं था कि मां के दुख में व्यथित उसकी वर्षा दीदी भी कोरोना संक्रमित हो कर जल्दी ही उसे छोड़ कर जाने वाली हैं।

हर बेटी को अपनी मां पर गर्व होता है, मुझे भी है। मेरे जीवन की सार्थकता यही है कि मैं डाॅ विद्यावती ‘‘मालविका’’ जी की बेटी और डाॅ. वर्षा सिंह जी की बहन हूं। मां की प्रथम पुण्यतिथि पर उन्हें नमन करती हूं और प्रर्थना करती हूं कि प्रत्येक जन्म में वे ही मेरी मां रहे।
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(20.04.2022)
#शरदसिंह  #DrSharadSingh #चर्चाप्लस #दैनिक #सागर_दिनकर
#डॉसुश्रीशरदसिंह #डॉविद्यावतीमालविका #प्रथमपुण्यतिथि #श्रद्धांजलि #tribite

Tuesday, April 19, 2022

मेरे पुराने पारिवारिक चित्र | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

#यादें .. तस्वीर में कुर्सी पर बैठे हैं मेरे नाना जी  गांधीवादी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी संत श्याम चरण सिंह। बाएं से दाएं खड़े हुए - मेरी दीदी वर्षा सिंह, मामाजी कमल सिंह, मां डॉ विद्यावती 'मालविका' और मैं शरद सिंह। स्थान :  हिरणबाग, पन्ना (मप्र) में घर के आंगन में।

#Memories.. In the picture, my maternal grandfather is sitting on the chair, Gandhian freedom fighter Sant Shyam Charan Singh.  Standing from left to right - my sister Varsha Singh, maternal uncle Kamal Singh, mother Dr Vidyavati 'Malvika' and me Sharad Singh.  Location: In the courtyard of the house at Hiranbagh, Panna (MP).
मां डॉ विद्यावती 'मालविका' 
मां डॉ विद्यावती 'मालविका' और दीदी वर्षा सिंह
मां डॉ विद्यावती 'मालविका' और मैं शरद सिंह
मैं शरद सिंह, मां डॉ विद्यावती 'मालविका'  और दीदी वर्षा सिंह। मेरी गोदी में है सफ़ेद धवल रंग का हमारा बिल्ला जिसका नाम बिल्लोश था।
मै शरद सिंह और मेरी दीदी वर्षा सिंह (खड़ी हुईं)
मेरी दीदी वर्षा सिंह और मैं शरद सिंह
मेरी दीदी वर्षा सिंह
मेरी दीदी वर्षा सिंह
मैं शरद सिंह
मेरी दीदी वर्षा सिंह मां की साड़ी में

पुस्तक समीक्षा | प्रतिरोध को शब्द देती कविताएं | समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह


प्रस्तुत है आज 19.04.2022 को  #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई मणिकांत चौबे  ‘बेलिहाज़’ के कविता  संग्रह "बेलिहाज़ कलम" की समीक्षा... आभार दैनिक "आचरण" 🙏
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पुस्तक समीक्षा
प्रतिरोध को शब्द देती कविताएं
समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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काव्य संग्रह - बेलिहाज़ कलम
कवि       - मणिकांत चौबे  ‘बेलिहाज़’
प्रकाशक    - बुंदेलखंड हिंदी साहित्य-संस्कृति विकास समिति (मंच)
मूल्य       -  100 रुपए
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मैं पूछता हूं आसमान में उड़ते हुए सूरज से
क्या वक्त इसी का नाम है
कि घटनाएं कुचलती हुई चली जाएँ
मस्त हाथी की तरह
एक समूचे मनुष्य की चेतना को ?
   - ये पंक्तियां हैं अपने समय के जुझारू कवि अवतार सिंह पाश की।

दरअसल, जिस कवि में इस तरह के प्रश्न करने का साहस होता है वही अपनी अभिव्यक्ति के साथ न्याय कर पाता है। कवि भी एक इंसान होता है जो अपने अनुभव से सीखता है और अपने अनुभवों को अगर उसे सही शब्दों में पिरोना आ गया तो वह एक ऐसा कवि बनने में सक्षम हो जाता है जो आम आदमी की आवाज को अपने शब्द दे सके।
प्रतिरोध के ऐसे ही कवि हैं मणिकांत चौबे बेलिहाज जी। इनकी कविताएं समाज, राजनीति और अर्थतंत्र में व्याप्त विसंगतियों को अभिव्यक्त करती हैं। हमारे चारों ओर बिखरी हुई जटिलता और जीने की निर्मम शर्तों के प्रति हमारी चेतना को झकझोरती हैं। विरोधाभासों को खंगालना और उनके विरुद्ध आवाज उठाना हर किसी के बस की बात नहीं होती है।
यदि सच कहने में लिहाज आड़े आ रहा हो तो सच कहते नहीं बनता है और तब बेलिहाज होकर ही सच्चाई को प्रखरता से सामने रखा जा सकता है।
यह उस समय और भी संभव हो जाता है जब विचार एहसास बनकर कवि के मन में समाए रहते हैं उदाहरण के लिए बेलिहाज कि ‘एहसास‘ शीर्षक कि यह कविता देखें-
मैं तो हूं एहसास तुम्हारा
मुझे कब तक अनकहा रखोगे
जब भी अंतस को उकसाऊंगा
तुम मुझे सहसा ही कह दोगे
मैं सिहरन को भी कंपन दूंगा
सोते जगते की भी लाचारी दूंगा
रग-रग मुझ से प्रभावित होगी
मैं नया शक्तिपुंज गढ़ूंगा
सच क्या तुम यह सब
सह लोगे जब भी?

अपनी समय को प्रतिबिंबित करती कविताएं ही कालजयी होती हैं। यही वे कविताएं हैं जिनसे पाठक या श्रोता स्वयं को जुड़ा हुआ महसूस करता है और उसे इन कविताओं में आत्मकथात्मकता दिखाई देती है। ‘जिंदगी‘ शीर्षक कविता इसकी बानगी है-
हां सचमुच, बहुत जटिल
व्यवस्था है जिंदगी
अनजान राहों पर चलती
फुटपाथों पर पलती
कहीं अय्याशी में कटती
कहीं एड़िया रगड़ती
और कहीं यूं ही जाती जिंदगी
बारूद से मरती है
आत्मघात भी करती है
कहीं दीर्घायु बनती है
कहीं अल्पायु है जिंदगी
धर्मांधता में लुटाई जाती है
समर्पण कर जलाई जाती है
कभी जिद में मिटाई जाती है
अगर बच जाए जाते-जाते
कहते हैं हजार न्यामत है जिंदगी
गोलियां भी छीनती है
बोलियां भी छीनती है
माले मुफ्त हो जैसे बेलिहाज
सियासी बिसात है जिंदगी।

कवि मणिकांत चौबे ‘बेलिहाज‘ की कविताएं  मानवता का आह्वान करती हुईं, शोषण और अन्याय के विरुद्ध डट कर खड़ी हैं। उनकी कविताएं वर्तमान की विसंगतियों और कटु सत्य को उजागर करने का नैतिक साहस रखती है। संग्रह की कुछ कविताएं अंतस को गहरे तक झकझोरती हैं। ‘अवसरवाद‘ ऐसी ही एक कविता है-
आज फिर रमिया के बर्तन सूखे हैं
आज फिर कलुआ के बच्चे भूखे हैं
आज फिर पिछड़ी बस्ती में हाहाकार है
इसका कौन जिम्मेदार है?
उत्तर में सब मौन
उत्तर दे भी कौन?
राजनीति अवसरवादिता की है
कभी आंख फाड़ फाड़ कर देखती है
और किसी को लक्ष्य करके घेरती है
और कभी आंख मूंद
सूरदास की तरह जीती है

धर्म अर्थ और समाज से जुड़ी जीवन की कठिनाइयां, विसंगतियां, भय, निराशा और तमाम अंतर्विरोध कवि के चिंतन को पैरालाइज्ड नहीं कर पाते हैं। वह इन सब से जूझता हुआ इन्हें ललकारता है। इस तेवर की सबसे प्रखर कविता है इस संग्रह में ‘- बात कहूं मैं खुल्लमखुल्ला‘। इस कविता का एक अंश देखें -
कहीं अड़े हैं पंडित पंडा
तो कहीं खड़े हैं काजी-मुल्ला
पर यह धर्म कर्म की बात नहीं
बात कहूं मैं खुल्लम खुल्ला
न घर के बाहर राम खड़े हैं
न बेघरबार मिले हैं अल्ला
अपनी-अपनी ढपली और अपना राग
सब राजनीति का गोरखधंधा

जमीनी सच्चाई से उनका जुड़ाव एवं अनुभव उनकी हर कविताओं में मुखर होकर सामने आया है जिससे उनकी कविताएं विश्वसनीयता की शर्त को पूरा करती हैं। बेलिहाज जी निश्चित रूप से एक समर्थ एवं सशक्त कवि हैं। संग्रह में अधिकांश  छंद मुक्त कविताएं हैं जो पूर्णतः सशक्त हैं। किंतु इन कविताओं के साथ ही कुछ दोहे और कुछ गजलें भी संग्रह में रखी गई हैं। इनमें कुछ कविताएं ऐसी भी है जो शेष कविताओं से साम्य  नहीं बिठा पाई हैं। जैसे- ‘प्यारे बच्चों‘ ‘वर्षारितु‘, ‘26 जनवरी‘ आदि। यदि कविताओं के चयन में कवि ने लोभ संवरण किया होता तो यह पूर्णतः एक निश्चित भावभूमि की कविताओं का और अधिक प्रभावी काव्य संग्रह होता। किंतु इसका आशय यह भी नहीं है कि ये सभी कविताएं पठनीय नहीं है। प्रत्येक कविता की अपनी अलग उपादेयता है तथा कुलमिलाकर उनका यह प्रथम काव्य संग्रह ‘बेलिहाज कलम‘ प्रतिरोध से भरपूर पठनीय कविताओं का संग्रह है।
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Sunday, April 17, 2022

जिस कवि में प्रश्न करने का साहस होता है वही अपनी अभिव्यक्ति के साथ न्याय कर पाता है।- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

मैं पूछता हूँ आसमान में उड़ते हुए सूरज से
क्या वक़्त इसी का नाम है
कि घटनाएँ कुचलती हुई चली जाएँ
मस्त हाथी की तरह
एक समूचे मनुष्य की चेतना को ?
- ये पंक्तियां हैं विचारों से जुझारू कवि अवतार सिंह पाश की।
     दरअसल, जिस कवि में इस तरह के प्रश्न करने का साहस होता है वही अपनी अभिव्यक्ति के साथ न्याय कर पाता है। कवि भी एक इंसान होता है जो अपने अनुभव से सीखता है और अपने अनुभवों को अगर उसे सही शब्दों में पिरोना आ गया तो वह एक ऐसा कवि बनने में सक्षम हो जाता है जो आम आदमी की आवाज को अपने शब्द दे सके। यदि सच कहने में लिहाज़ आड़े आ रहा हो तो सच कहते नहीं बनता है और तब बेलिहाज़ होकर ही सच्चाई को प्रखरता से सामने रखा जा सकता है।- लोकार्पित पुस्तकों में से एक बेलि कलम पर अपना समीक्षात्मक वक्तव्य देते हुए मैंने (यानी आपकी मित्र डॉ सुश्री शरद सिंह ने)कहा।
        वस्तुतः सागर नगर में जब से श्यामलम संस्था ने साहित्यिक आयोजनों की सक्रियता को पुनर्स्थापित किया नगर के सृजनात्मक क्षेत्र में भी तेजी से गति आई है आज अपरान्ह आदर्श संगीत महाविद्यालय के सभागार में बुंदेलखंड हिंदी साहित्य संस्कृत विकास मंच द्वारा पुस्तक विमोचन समारोह का आयोजन किया गया जिसमें एक साथ तीन काव्य-पुस्तकों का लोकार्पण किया गया। यह पुस्तकें 'बेलिहाज़ कलम' (कवि मणिकांत चौबे बेलिहाज़), 'फगनौटे पूरन' (कवि पूरन सिंह राजपूत) तथा 'कवित्त कौशल' (कवि राजकुमार तिवारी)। कार्यक्रम के मुख्य वक्ता थे डॉक्टर सुरेश आचार्य। समीक्षात्मक वक्तव्य  दिया डॉ. टीकाराम त्रिपाठी, डॉ.एमडी त्रिपाठी एवं डॉ. सुश्री शरद सिंह ने। संचालन किया डॉ नलिन जैन नलिन ने एवं  परिचय वाचन किया श्री उमाकांत मिश्र अध्यक्ष श्यामलम ने।

कहानी | थोड़ा सा पागलपन | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | दैनिक भास्कर | रसरंग

प्रिय मित्रो, आज दैनिक भास्कर के "रसरंग" 
परिशिष्ट में (यानी सभी संस्करणों में) मेरी कहानी प्रकाशित हुई है- "थोड़ा-सा पागलपन"... 
💁मुझे लगता है कि यह थोड़ा सा पागलपन हम सब में होना चाहिए!.. तो मेरी कहानी पढ़िए और बताइए कि आप इससे सहमत है या नहीं...
🌷मेरी कहानी प्रकाशित करने के लिए हार्दिक धन्यवाद एवं आभार #दैनिकभास्कर  🙏
दैनिक भास्कर के "रसरंग" में प्रकाशित कहानी      
थोड़ा-सा पागलपन
- डॅा. (सुश्री) शरद सिंह
        सब उसे एक ही नाम से पुकारते थे - बूढ़ी माई। बूढ़ी माई की उम्र कितनी थी, यह बताना कठिन है। काले-सफेद खिचड़ी बाल, उसकी उम्र का अनुमान लगाने में बाधा बनते थे।  
बूढी माई सुबह होते ही पता नहीं कहां से हमारी कॅालोनी में आती और रात होते-होते पता नहीं कहां चली जाती। शुरू-शुरू में सबने उसके इस आने-जाने को संदेह की दृष्टि से देखा। कोई कहता कि वह उठाईगीर है। तो कोई कहता कि वह बच्चे उठाने वाले गिरोह से है। मगर इस तरह की अटकलबाजियां धीरे-धीरे समाप्त हो गईं और बूढ़ी माई के प्रति सबके मन में दया उपजने लगी। एक दिन किसी ने बताया कि उसने बूढ़ी माई को रात के समय रेलवे स्टेशन के बाहर गुड़ीमुड़ी हो कर सोते देखा हैं तब से रहा-सहा संदेह भी दूर हो गया।
कॅालोनी की औरतें बूढ़ी माई को बचा हुआ खाना दे दिया करतीं। खाना अच्छा हो या बुरा बूढ़ी माई बड़ी रुचि से खाती। उसे इस तरह खाना खाती देख कर मन भर आता। यही लगता कि अगर बूढ़ी माई का कोई अपना सगा होता तो क्या उसे इस तरह सब के घर के बचे हुए खाने पर निर्भर रहना पड़ता? कभी लगता कि बूढ़ी माई को जरूर उसके घरवालों ने निकाल दिया होगा। छिः! आज के जमाने में रिश्ते-नातों भी स्वार्थी हो चले है।
बूढ़ी माई ने मेरे मन में जाने कब जगह बना ली मुझे पता ही नहीं चला। वह मुझे देखती और उसकी अंाखों में ममता छलकने लगती। जल्दी ही उसने मेरे घर के खुले बरामदे में रात बिताना शुरू कर दिया।
रात भर वह मेरे घर के बरामदे में सोती और सुबह होते ही काॅलोनी परिसर में लगे नीम के पेड़ के नीचे जा बैठती। फिर दिन भर वहीं बैठी रहती। क्या गरमी, क्या जाड़ा, क्या बरसात। वह नीम के पेड़ के नीचे से हिलने का नाम नहीं लेती। वह नीम का पेड़ काफी पुराना था। इस कॅालोनी के बनने के दौरान पता नहीं कैसे वह कटने से बचा रह गया। वरना इस इलाके के सारे पेड़ काट कर कॅालोनी बना दी गई थी। कॅालोनी में रहने वाले किसी को भी इससे कोई अन्तर भी नहीं पड़ता था। फिर गमलों में उगने वाले पौधे या इनडोर प्लांट तो थे ही बागवानी प्रेम के लिए। यह बात अलग है कि वह नीम का पेड़ बूढ़ी माई की भांति सबके जीवन का अनिवार्य अंग बन गया था। कॅालोनी की धर्मप्रिय स्त्रियां नीम को जल चढ़तीं। उसके तने में धागा बंाध कर मन्नतें मंागती। यही नीम का पेड़ बूढ़ी माई की दिन भर की आश्रयस्थली बन गया था।
जब कभी बूढ़ी माई की चर्चा चलती तो लोग यही कहते-‘होगी वहीं, उसी नीम के पेड़ के नीचे।’
जल्दी ही बुढ़ी माई हमारे जीवन का ऐसा हिस्सा बन गई कि हमने उसकी ओर अलग से ध्यान देना ही छोड़ दिया। उसे बचा हुआ खाना देना, पुराने कपड़े देना आदि एक सामान्य-सा व्यवहार बन गया। बूढ़ी माई ने कब मेरे घर के बरामदे छोड़ कर नीम की छांव को पूरी तरह अपना लिया, इस पर मेरा भी ध्यान नहीं गया।
ज़िन्दगी यूं ही चलती रहती अगर उस दिन शोर न मचता। सुबह के यही कोई नौ-साढ़े नौ का समय था। लगभग हर घर में आपाधापी मची हुई थी। दफ़्तर जाने वालों के तैयार होने का समय। स्कूल-बस आने का समय। कामवाली बाई के लेट करने से बेहाल महिलाओं के बड़बड़ाने का समय। लेकिन एक शोर ने सबके कामों पर ब्रेक लगा दिया। ऐसा लगा कि जैसे कोई आत्र्तनाद कर रहा है, चींख रहा है, झगड़ रहा है। मैं हड़बड़ा कर दरवाजे की ओर लपकी। बाहर दरवाजे पर ही इला मिल गई।
‘क्या हुआ इला? ये शोर कैसा?’ मैंने इला से पूछा।
‘सुना है, बूढ़ी माई पागल हो गई है। लोगों को पत्थर मार रही है।’ इला ने बताया।
‘‘कहां है बूढ़ी माई?’’
‘‘वहीं नीम के नीचे।’’
‘चलो, चल कर देखते हैं।’ मैंने इला से कहा।
वहां भीड़ एकत्र थी। नीम के पेड़ के नीचे खड़ी बूढ़ी माई चिल्ला रही थी और बुलडोजर जैसी डिगिंग मशीन पर पत्थर मार रही थी। वहां खड़े लोगों से पूछने पर पता चला कि वह जगह बिक गई है और उसे खरीदने वाला पेड़ हटा कर वहां अपनी दूकान बनवाना चाहता है। इसीलिए वह पेड़ उखाड़ने के लिए मशीन ले कर आया है। हमेशा गुमसुम रहने वाली बूढ़ी माई मशीन देखते ही भड़क गई। मशीन चालक ने जितनी बार नीम के पेड़ की ओर बढ़ने का प्रयास किया उतनी बार बूढ़ी माई ने न केवल उस पर पत्थर बरसाए बल्कि मशीन के इतने करीब आ खड़ी हुई कि मशीन चालक ने घबरा कर मशीन बंद कर दी। उसने मशीन चलाने से साफ़ इनकार कर दिया।
नीम के पेड़ के चारो ओर अच्छी-खासी भीड़ जमा हो गई थी। मगर सबके सब तमाशाबीन थे। वे मानो किसी खेल को टकटकी लगाए देख रहे थे। सभी को यही लग रहा था कि अभी पुलिस आएगी और बूढ़ी माई को पकड़ ले जाएगी। हो सकता है उसे पागलखाने भेज दिया जाए।  
मगर हुआ कुछ ऐसा जो किसी ने सोचा ही नहीं था। बूढ़ी माई के इस हंगामे की ख़बर किसी ने मीडियावालों को दे दी। देखते ही देखते वहां रिपोर्टर्स की भीड़ लग गई। एक रिपोर्टर आंखों देखा हाल सुनाते हुए कैमरे पर कहने लगा,‘‘यहंा इतनी भीड़ के बावजूद कोई भी इंसान नीम के पेड़ को बचाने के लिए आगे नहीं आ रहा है। मगर एक पागल औरत जिसे लोग बूढ़ी माई कहते हैं, पेड़ से लिपटी हुई है अब आप ही बताएं कि पागल कौन है, बूढी माई या यहंा मौजूद भीड़?’’
रिपोर्टर की बात सूनते ही माहौल बदल गया। भीड़ ‘बूढ़ी माई ज़िन्दाबाद’ के नारे लगाने लगी। अब भीड़ आगे बढ़ कर नीम के पेड़ और मशीन के बीच अपनी दीवार की भांति खड़ी हो गई। अंततः जमीन मालिक ने हार मान ली और मामला यूं तय हुआ कि वह अपनी दूकान तो बनवाएगा लेकिन नीम के पेड़ को कटवाए बिना।
धीरे-धीरे भीड़ छंट गई। लोग अपने-अपने घरों को चले गए। मशीन लौट गई। लेकिन बूढ़ी माई उसी तरह पेड़ से लिपट कर खड़ी रही। मैं बूढ़ी माई के निकट पहुंची। उसने आहट पा कर पलट कर मेरी ओर देखा। उसकी अंाखें अभी भी क्रोध से जल रही थीं, लेकिन अपने सामने मुझे पा कर उन अंाखों में शीतलता छा गई। अचानक बूढ़ी माई ने मुझे अपने गले से लगा लिया। शायद वह अपनी खुशी जाहिर करना चाहती थी। मेरी भी आंखों से खुशी के आंसू छलक पड़े। हम दोनों के सिर के ऊपर नीम का पेड़ अपनी नन्हीं हरी प¬ित्तयों को हिला-हिला कर अपनी ठंडक बिखेर रहा था। उस समय बूढ़ी माई क्या सोच रही थी ये तो मुझे पता नहीं लेकिन मैं यही सोच रही थी कि काश ! बूढ़ी माई जैसा थोड़ा-सा पागलपन हर इंसान में होता तो ऐसे न जाने कितने नीम के पेड़ कटने से बच गए होते।  
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संस्मरण | बचपन की ठांव, तारों की छांव| डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नवभारत


नवभारत मेंं 17.04.2022 को प्रकाशित
हार्दिक आभार #नवभारत 🙏


संस्मरण
बचपन की ठांव, तारों की छांव
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
          माह अप्रैल और तापमान 43 डिग्री तक जा पहुंचे तो अतीत का वे अप्रैल बड़ी तीव्रता से याद आ रहे हैं जब घने पेड़ों के बीच छोटा-सा शहर था, गर्मी में भी ठंडक सहेजने वाला। वाकई, वे दिन कितने अच्छे थे जब पन्ना के हिरणबाग वाले अपने सरकारी घर में हम रहते थे। छोटे-छोटे दो कमरों, एक भीतरी आंगन और एक छोटे-से बरामदे वाला बहुत छोटा-सा घर। लेकिन मेरे लिए वह राजमहल से कम नहीं था क्योंकि वहीं मैंने आंखें खोली थीं और वहीं रहते हुए मैंने दुनिया को जानना और समझना शुरू किया था।
       मैं और मेरी वर्षा दीदी ! हम गर्मियों में शाम से ही घर के बाहरी आंगन में पानी का छिड़काव करके और नारियल से गुंथी हुई खटियां बिछा दिया करते थे। ज़रा ठंडापन होने पर बिस्तर बिछा देते थे और खाना बनने का इंतज़ार करते हुए बिस्तर पर पड़े-पड़े तारे देखा करते थे। बुधवार की रात को रेडियो सिलोन से 'बिनाका गीतमाला' सुना करते थे और शनिवार की शाम को विविध भारती से 'जयमाला' कार्यक्रम सुना करते थे। कभी-कभी 'हवा महल' कार्यक्रम के नाटक भी सुना करते थे, जब मां भी वहां मौज़ूद होतीं और रेडियो लगा देतीं। यह सब सुना जाता खुले आसमान के नीचे बिस्तर पर लेट कर।
      हम दोनों ही छोटे थे । स्कूल में पढ़ते थे। वैसे, दीदी मुझ से 5 साल बड़ी थीं और मुझसे अधिक समझदार थीं।  उस समय दीदी मुझे तारों के बारे में बताया करती थीं। वे जानती थीं कि कौन सा मेजर उर्सा है यानी बड़ी सप्तऋषि और कौन सा माईनर उर्सा यानी छोटी सप्तऋषि। हम सप्तऋषि तारों को 'बड़ी चोर खटिया' और 'छोटी चोर खटिया' भी कहा करते थे क्योंकि उन तारों के साथ कथाएं भी जुड़ी हुई थीं, जो हमारे नाना जी ने हमें सुनाई थीं। वर्षा दीदी को ध्रुवतारे का भी पता था। मुझको बताया करती थीं कि " वो देखो नीम के पेड़ के ठीक ऊपर जो तारा चमक रहा है वहीं ध्रुवतारा है। देखना, सुबह तक वह वही रहेगा।। वहां से हिलेगा भी नहीं।" सचमुच वह तारा वहां से नहीं हिलता क्योंकि वह ध्रुव तारा जो था। उन्हीं दिनों से मेरी खगोल विज्ञान के प्रति रुचि जागी। उन दिनों हमारे घर वाराणसी से प्रकाशित होने वाला दैनिक "आज" अखबार डाक से आया करता था, जिसमें कभी-कभी रात्रिकालीन आकाश का नक्शा यानी तारों की स्थिति प्रकाशित की जाती थी।  मैं उसकी कटिंग काट के रख लेती थी और बाद में टॉर्च की रोशनी में उसे देखते हुए आकाश की ओर देखकर पहचानने की कोशिश करती थी कि इसमें से वृषभ की आकृति कौन-से तारे बना रहे हैं और सिंह का आकार कौन सितारे बना रहे हैं? बृहस्पति कहां पर स्थित है और मंगल कहां दिपदिपा रहा है? मुझे उन दिनों पता चल चुका था कि शुक्र को भोर का तारा कहा जाता है। वैसे वह संध्या का तारा भी कहलाता था क्योंकि संध्या होने के समय ही वह क्षितिज पर दिखाई देने लगता था जबकि सुबह होने के समय भी वह क्षितिज पर दिखता था। बृहस्पति सबसे अधिक चमकने वाला तारा और मंगल हल्की लालिमा लिए हुए। इन सबके बीच चमकता शुक्र अपने आप में बड़ा खूबसूरत लगता था। तब पता नहीं था कि शुक्र यानी वीनस गर्म और जहरीली गैसों से भरा हुआ है। उस समय बस, मंगल के बारे में पता था कि वह एक गर्म ग्रह है।  
        आज जब गर्मी के दिन आते हैं और रात को कमरे के अंदर पंखा, कूलर चलाकर घुटन भरे माहौल में सोना पड़ता है तो खुले आसमान के नीचे गुज़ारी गई वे रातें  बहुत अधिक याद आती हैं। वे निश्चिंत राते़ं। चमकते तारों के नीचे बिस्तर पर लेट कर कल्पनाओं में डूबी हुई रातें। और हां, जब शुक्ल पक्ष होता था तो हम चंद्रमा की स्थिति को गौर से देखा करते थे। पूर्णिमा आते-आते उस पर दिखाई देने वाला धब्बा गहराने लगता था। जिससे कभी चंद्रमा पर चरखा चलाती बुढ़िया तो कभी बड़े क्रेटर का एहसास जाग उठता था। यानी फिक्शन और रियलिटी के बीच एक द्वंद चलता था। जब परस्पर विद्वता दिखानी होती तो हम आपस में क्रेटर्स की बातें करते और जब कल्पना लोक में विचरण करने का मन होता तो चरखा चलाती बुढ़िया की बातें करते। वर्षा दीदी बताती थीं ये जो चांद की किरणें हैं, वे उस बुढ़िया के द्वारा काते जा रहे रेशमी चांदी के धागे हैं जो पृथ्वी तक लटकते रहते हैं। उन्होंने यह कहानी नानाजी से सुनी थी और जिसमें अपनी तरफ से कुछ और काल्पनिकता का समावेश करके मुझे सुना दिया करती थीं। जब मां आकर हमें टोंकती कि "चलो, खाने का समय हो गया है, उठो! खाना खा लो फिर बिस्तर पर पड़े-पड़े बतियाना।" तब हमारी आकाश लोक की यात्रा थम जाती। लेकिन सिर्फ़ रात्रि भोजन करने तक के लिए। उसके बाद फिर हम अपने बिस्तरों पर आ लेटते।
      शुरू से ही मैं और दीदी अलग-अलग खटियों पर सोया करते थे। लेकिन हमारी खटियां परस्पर सटी हुई बिछी रहती थीं। हम आजू-बाजू लेटे हुए ढेर सारी बातें करते रहते थे। दीदी मुझे बहुत-सी कहानियां सुनाया करती थीं। शायद उसी समय से मेरे मन में कहानियों के बीज रोपित हो चुके थे जो धीरे-धीरे प्रस्फुटित, पल्लवित होते गए। दीदी ने तो ग़ज़ल की राह पकड़ी लेकिन मैंने घूम फिर कर उन कहानियों की राह पर ही कदम बढ़ाए जो कहीं मेरे मानस में बहुत गहरे दबी हुई थी।
      काश! वे दिन लौट आते। खुले आसमान के नीचे, तारों की छांव में, खुली हवा में सांस लेते हुए, चांद और तारों वाली वे चमकीली रातें। किसी तरह का कोई भय नहीं। पन्ना के उस छोटे कस्बाई शहर का उस समय का निरपराध-सा वातावरण। यद्यपि हमारी कॉलोनी के अहाते की दीवार से ही सटा हुआ था ज़िला जेल का परिसर। शाम होते ही जहां से कैदियों के सामूहिक प्रार्थना किए जाने का स्वर सुनाई देता। वहां किन अपराधों के कैदी रखे जाते थे यह मुझे ठीक से याद नहीं है लेकिन इतना जरूर याद है कि उन दिनों भी मुझे उन से डर नहीं लगता था। हम बाहर टेबल फैन भी लगाते थे। जब मैं छोटी थी तो घर में नानाजी थे, मां थीं, कमल सिंह मामा थे वर्षा दीदी थीं और मैं थी। फिर मामा जी की नौकरी लग गई और वे ट्राईबल वेलफेयर के हायरसेकंडरी स्कूल में बतौर शिक्षक तत्कालीन शहडोल जिले के बेनीबारी नामक स्थान में पोस्टिंग में चले गए। तब नानाजी, मां, दीदी और मैं - हम चार लोग रह गए। लेकिन उन दिनों स्कूलों में गर्मी की 2 माह की छुट्टी और  दशहरे से दीपावली तक की 1 माह की छुट्टी हुआ करती थी। जिसमें मामाजी पन्ना आ जाया करते थे। वह हमारी छोटी सी सुंदर दुनिया थी जिसमें उस कॉलोनी में रहने वाले शेष पांच परिवार भी शामिल थे। कोई कृत्रिमता नहीं, बस सच्ची आत्मीयता!
         आज घरों में दुबकी गर्मी की रातें, उन दिनों की खुली हवा की रातों के सामने कुछ भी नहीं हैं। हमने बहुत कुछ गवां दिया है पिछले 30-40 वर्षों में।  वह स्वच्छ प्रकृति और वह निर्भयता, शायद तभी लौट सकती है जब हम प्रकृति को उसकी हरियाली लौटा दें और हम इंसानों के परस्पर गहन विश्वास को पुनर्स्थापित कर दें, तभी लौट सकेंगे वो बचपन की ठांव, तारों की छांव वाले दिन।
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Friday, April 15, 2022

बतकाव बिन्ना की | हनी कऔ, मनी कऔ, उनखों सबई जनी की कऔ | डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम | सा. प्रवीण प्रभात

"बतकाव बिन्ना की" अंतर्गत प्रकाशित मेरा लेख प्रस्तुत है- "हनी कऔ, मनी कऔ, उनखों सबई जनी की कऔ" साप्ताहिक "प्रवीण प्रभात" (छतरपुर) के मेरे बुंदेली कॉलम में।
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बतकाव बिन्ना की
हनी कऔ, मनी कऔ, उनखों सबई जनी की कऔ
- डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
      ई दिना गर्मी इत्ती परन लगी के घरे से निकरबे में पसीनो चुअत आए। बाकी निकरने सो परतई आए। कल कछु काम से निकरने परो सो पैले मुतको पनी पी लओ। पुदीना चबा लओ। मनो हल्के में तो मताई संगे प्याज धरा देत्तीं, मनो अब नई धरो जात। काए से के प्याज बसान लगत आए। ने तो प्याज से अच्छो कछु नइयां लू-लपट से बचबे के लाने। मनो अब डियो के आंगू प्याज को ले के को चलहे? बाकी मों पे हुन्ना लपेट लओ रओ। मूंड़ पे कैप सोई लगा लई हती। कारो चस्मा लगा लओ रओ। अब कछु ने कछु तो जतन करनई हतो लपट से बचबे के लाने। जेसई काम निपटो सो मैंने घर के लाने दौड़ लगा दई। पर जाने कहां लों भैयाजी आ टकराने।
‘‘अच्छी मिली बिन्ना! कुल्ल टेम से तुमाए लाने हेर रए हम तो।’’ भैयाजी अकुलाए से बोले।
‘‘ऐसो का हो गओ भैयाजी?’’
‘‘अरे कछु ने पूछो! हमाओ तो मूंड़ पिरा गओ सोंचत लों।’’ भैयाजी अपनो मूंड़ खुजात भए बोले। मोए समझ में आ गई के भैयाजी अपनी सुनाए बिगैर ने मानहें।
‘‘घरे चलो भैयाजी! जो कछु कैने-सुनने है उतई कइयो। इते ठाड़ी रई तो कछु देर में मोरो मूंड़ जरन लगहे। ऊंसई बाल झड़ रए, रए सए और बढ़ा जेहें।’’ मैंने कही औ भैयाजी के संगे घरे बढ़ लई।
कुंडी खोली। कमरा में पोंच के जान में जान आई। जैसई पंखों चलाओ के भैयाजी बोल परे,‘‘चाए तो पंखों ने चलाओ बिन्ना, बिजली मैंगी हो गई आए।’’
‘‘अब कछु हो जाए भैयाजी! गरमी से प्राण निकर जाएं ऊंसे तो भलो के जित्तो को बी आए बिल भर देबी। अभईं तो कूलर चलाने परहे। तब का करबी? बो कहो जात आए ना के मरे बिना स्वरग नईं मिलत, सो बिल भरे बिना हवा नईं मिलत। खैर, आप बैठो, हवा खाओ! जो लो ठंडो पानी ला रई आप के लाने।’’ मैंने कही।
‘‘फ्रिज को ने लाइयो! मटकिया को चल जेहे।’’ भैयाजी अपने माथे को पसीना पोंछत भए बोले।
‘‘मैं सोई फ्रिज को पानी नईं पियत हों। मोए सोई घड़े को पानी पोसात आए।’’ मैंने कही औ चैका में जा के भैयाजी के लाने पानी निकारो, संगे चाय को पानी चढ़ा दओ। 
भैयाजी पानी पियत-पियत जो लो सुस्ताए, इत्ते में चाय बन गई।
‘‘अरे, ई की का जरूरत हती बिन्ना?’’ भैयाजी ने जे कहत भए चाय को मग पकर लओ। मनो उनकी बांछे खिल आईं हतीं। 
‘‘भैयाजी, बो कहो जात आए ना के गरमी, गरमी को मारत आए, सो मैंने जेई सोच के चाय बना लई।’’ मैंने कही।
‘‘बड़ो अच्छो करो, बिन्ना! सांची कहों, मोए कुल्ल देर से चाय की तलब लग रई हती। तुमाई जैकारें होएं बिन्ना, तुमने हमाए मन की सुन लई।’’ भैयाजी गदगद होत भए बोले।
‘‘हमाई जैकारें की छोड़ो भैयाजी, आप तो जे बताओ के आप मोए से का बात करन चात हो?’’ मैंने पूछी।
‘‘हऔ, पूछने तो है मनो कछु सकोंच सो सोई लग रओ आए।’’ भैया जी हिचकत भए बोले।
‘‘सकोंच कैसो? पूछ लेओ जो पूछने होए।’’ मैंने कही।   
‘‘तो जे बताओ के जे हनी को कहाउत आएं?’’ भैयाजी ने मनो एकई सांस में पूछ लओ।
‘‘हनी माने शहद। अब इत्तो तो आप सोई जानत हो।’’ मोए ऐसे सवाल की आशा ने हती।
‘‘नईं, नई! बो वारो हनी नईं। बो आजकाल अखबारन में छपत रैत आए ना के ई हनीट्रैप हो गओ, ऊ हनीट्रैप हो गओ! मनो वैसे तो हमने जेई सुनी हती औ फिलम में बी देखी हती के अंग्रेजन घांई लुगाईयां अपने घरवारे खों हनी कै के पुकारत्तीं। हमने सोई तुमाई भौजी खों एक दफा हनी कैहबो सिखान चाओ, पर बे ठैरीं चिकनो घड़ो घांई। एक बेरा बी उन्ने मोए हनी कै के ने पुकारो। अब तो मुतकी साल हो गई ई बात खों। बाकी जे अखबार में हनी-मनी छपत आए, जो का आए?’’ भैयाजी अपनी रामकथा सुनात भए पूछन लगे।    
‘‘अरे भैयाजी! आप सोई कहां की ले के बैठे हो। कछु लुगाइयां अपनी ब्यूटी दिखा के, मीठी-मीठी बोल के लुगवा हरन से पईसा ऐंठन के लाने उनखों उल्लू बना लेत आएं। मनो बेई ओरें बनत आएं जो चरित्तर के कच्चे रैत आएं। ने तो कोनऊं ढंग-ढार को ऐसो काए फंसहे? जेई तो हनीट्रेप कहाउत आए।’’ मैंने भैयाजी खों समझाओ।
‘‘हओ, सुनी तो हमने बी जेई हती।’’
‘‘सो मोसे काए पूछी?’’ मोए गुस्सा सी हो आई।
‘‘अरे, बिगड़ो ने! हमने सो ई से पूछी के जब शहद से लेबो-देबो नईयां तो इने हनी काए कहो जाए आए? जे हमाई समझ में ने आई।’’ भैयाजी बोले।
‘‘बो कहनात सुनी आए ना के जनम के आंदरे को नाव नैनसुख। कैबे में का, कछु कै लेओ। जे मीडिया वारन खों तनक तड़क-भड़क वारो नाम चाहने परत है ना, तनक जोन में चटखारे आएं। उनकी टीआरपी जेई में तो बढ़त आए।’’ मैंने भैयाजी से कही।
‘‘हऔ, सही कै रईं बिन्ना! बे पैले जित्ती बी डकैत लुगाईयां होत्तीं, उने सुंदरी कहो जात हतो। चाए बे देखबे में ताड़का काए ने दिखात रईं, मनो दस्युसुंदरी कै के खबरें छपत हतीं। बो एक फिलम वारो हतो ना, शेखर कपूर। ऊके डायरेक्सन में बनी हती ‘बैंडिट क्वीन’। काए की क्वीन? डकैत को मनो डकैत बोलो। काए की सुंदरी, काए की क्वीन? हऔ, मनो अब हमें समझ में आ गई के जे हनी काए कहाउत आएं?’’ भैयाजी चमक के बोले।
‘‘का समझ में आ गई?’’ मोए अचरज भओ के डकैतन की कैत-कैत भैयाजी खों हनी हरन के बारे में का समझ में आ गई?
‘‘बोई जो तुमने पैलऊं कही हती के आंदरे को नाव नैनसुख, ऊंसई ताड़का खों नाव सुंदरी औ अब जे मकड़ियन खों नाव हनी कहानो। बाकी जे सोई मोए समझ में गई के जे हनी ओरें पईसन के लाने मकड़िया घांई जाल बुनत आएं औ लंपट लुगवा हरें खों फंसाउत आएं। सो इने हनी कओ, मनी कओ, उनखों सबई जनी की कओ। जोन के पास पइसा उनई के पांछू लग गईं। नासमिटीं...’’ भैयाजी तैस खात भए बोले।
‘‘जे का कै रए भैयाजी? तनक गम्म खाओ, मोरे आंगू ऐसो-वैसो ने बोलो। साजो नई लगत।’’ मैंने टोंकी।
‘‘काए, हमने का गलत कही? जेई घांई लुगाइयां सो सबई लुगाइन खों नाव खराब करत आएं। इनके बारे में ऐसो सजा-बजा के नई छापो चइए के दस्युसुंदरी घांई दो-चार जनी और हनीसुंदरी बनबे के लाने चल परें।’’ भैयाजी ने बात पते की करी। मनो अब हो चली हती कुल्ल देर सो मैंने भैयाजी से कही,‘‘आप बैठो, मैं तनक बासन मांज लेओं।’’
बे इशारा समझ गए औ बोले,‘‘नई बिन्ना, अब हमें चलन देओ। बाकी आज मजो आ गओ बतकाव कर के। का नाव बनाओ हमने ‘हनीसुंदरी’। अब कोनऊ अखबार या न्यूज चैनल वारे खों पकर के जे नाव बताने है। देखियो, उन ओरन खों पतो परन देओ, फेर जेई नाव चल परहे।’’ भैयाजी मुस्कात भए चले गए। रई बात हनीसुंदरी नाव की, सो जो कल-परों कोनऊ मीडिया में पढ़ो-सुनो सो समझ जइयो के जे भैयाजी की ईजाद आए। मनो मोए लगत आए के हनी हरन खों बी जे नाव पोसाहें।         
मोए सोई बतकाव करनी हती सो कर लई। बाकी हनी जाने, मनी जाने, फंसन वारन की जनी जाने। मोए का करने। बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की। सो सबई जनन खों शरद बिन्ना की राम-राम!
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(07.04.2022)
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