Sunday, June 12, 2022

संस्मरण | अचार, बड़ी, पापड़ और मसालों का उत्सव | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नवभारत

नवभारत मेंं 12.06.2022 को प्रकाशित/हार्दिक आभार #नवभारत 🙏
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संस्मरण
अचार, बड़ी, पापड़ और मसालों का उत्सव
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
     'नमक हराम' और 'नमक हलाल' बड़े संजीदा मुहावरे हैं। एक गद्दारी को तो दूसरा वफ़ादारी को व्याख्यायित करता है। बचपन में इन दोनों मुहावरों का अर्थ पता नहीं था और न ही इनसे कोई वास्ता था। हां, घर में 10 किलो खड़ा नमक ज़रूर मंगाया जाता था। हमारा परिवार कम सदस्यों वाला छोटा परिवार था इसके लिए 10 किलो नमक में लगभग साल भर काम चल जाता था। लगभग 5 किलो नमक आचार और पापड़ के लिए मंगाया जाता था। पन्ना शहर में दो ही बाजार मशहूर थे- छोटा बाजार और बड़ा बाजार देखा जाए तो यह दोनों कोई इतने बड़े भी नहीं थे। लेकिन शहर में यह दो ही बाजार थे जहां किराना, कपड़ा, मिठाई सभी कुछ मिलता था। छोटा बाजार में दम्मड़ सेठ की दुकान किराने की दृष्टि से सबसे समृद्ध थी। बड़ी परंपरागत दुकान थी। दुकान के बाहर तक बोरों में दाल, चावल, गेहूं, नमक आदि रखे रहते थे। दम्मड़ सेठ का वास्तविक नाम क्या था मुझे पता नहीं। शायद कुछ ही लोग जानते रहे होंगे क्योंकि दम्मड़ सेठ नाम ही प्रचलन में था। उस पर भी संक्षिप्तीकरण होकर उनकी दुकान को लोग "दम्मड़ की दुकान" कह कर पुकारते थे। "सेठ" शब्द भी विलोपित हो जाता था। मां को भी उनकी दुकान से कुछ मंगाना होता तो हम दोनों बहनों से यही कहतीं कि "जाओ, दम्मड़ की दुकान से फलां चीज ले आओ।" 
     हमारे घर किराने का पूरा सामान यहां तक कि बाल धोने के रीठे से लेकर कपड़ा धोने का कास्टिक सोडा भी दम्मड़ की दुकान से ही आता था। ग्रीष्म के आखिरी दिनों में और बारिश आने के पूर्व किराने का सभी सामान खरीद कर डब्बों में पैक कर रख दिया जाता था। आमतौर पर ये  खजूर छाप डालडा के छोटे बड़े डब्बे हुआ करते थे । डब्बों को धोकर सुखा लिया जाता था और उस पर सामान के नाम की चिट चिपका दी जाती थी। वर्षा दीदी की राइटिंग शुरू से ही बहुत अच्छी और सधी हुई थी इसलिए उन्हें चिट पर सामानों के नाम लिखने का काम सौंपा जाता था और चिट चिपकाने का काम मेरे जिम्में रहता था। पैक करने से पहले किन सामानों को धूप में सुखाना है और किन को छांव में, यह मां को अच्छी तरह से पता था। बारिश के पूर्व नमक भी मंगा लिया जाता था जो छोटे-बड़े डलों के रूप में होता था। इसी को खड़ा नमक कहते थे। खड़ा नमक की शुद्धता विश्वसनीय मानी जाती थी जबकि उस समय पिसा नमक आजकल की भांति स्टैंडर्ड पैक नहीं किया जाता था, वह तराजू में तौल कर कागज की पुड़िया में या कागज के पैकेट में रख कर दिया जाता था, इस पिसे नमक में मिलावट की पूरी संभावना रहती थी। इसलिए इसे कम ही लोग खरीदते थे। खड़ा नमक दुकान से मंगाकर पहले पानी से धोया जाता था ताकि उसके ऊपर जमी हुई धूल आदि साफ हो जाए और इसके बाद उसे धूप में सुखाया जाता था। नमक के सूख जाने के बाद उसे लोहे के खल-बट्टे में पहले कूटा जाता था। फिर और अधिक महीन पाउडर जैसा बनाने के लिए सिलबट्टे पर पीसा जाता था। यह काम पूरी शुद्धता के साथ किया जाता था। खड़ा नमक धोए जाने के बाद नमक की एकाध छोटी डली मुंह में डाल लिया करती थी और चूसने लगती थी। यह देखकर मां पहले डांटतीं और फिर समझातीं कि इस तरह से नमक चूसना बुरी बात है, यह नुकसान करता है। खाली नमक नहीं खाया जाता है। 
        मां अध्यापन कार्य करती थी। उन दिनों स्कूलों में 2 माह की गर्मी की छुट्टियां हुआ करती थीं। गर्मी की छुट्टियों में मां का प्रयास रहता कि छुट्टियां खत्म होने के पहले नमक, मसाले, अचार, बड़ी, पापड़ आदि सभी बनाकर तैयार कर लिए जाएं। स्कूल तो प्रायः 1 जुलाई से खुलते थे लेकिन उन दिनों मौसम इस तरह अनियमित नहीं था और 15 जून आते-आते मानसून की आहट आने लगती थी। इसलिए सभी यही कोशिश करते थे कि 15 जून से पहले इस तरह के सारे काम निपटा लिया जाएं।
       लगभग 30 मई से 15 जून तक घर में गहमागहमी बनी रहती है। मां कभी अकेली बाज़ार नहीं जाती थीं। या तो वह मुझे साथ ले जाती या फिर वर्षा दीदी को। छोटी होने के कारण मुझे ज्यादा मौके मिलते। मैं मां के साथ दम्मड़ की दुकान जाती लेकिन मां किस तरह से खरीदारी करती हैं, यह देखने के बजाय मैं उन मर्तबानों पर अपना ध्यान लगाए रखती जिनमें रंग-बिरंगी टॉफी, गोलियां भरी रहती थीं। यद्यपि वे मेरे लिए निषिद्ध थीं। मगर क्या किया जाए, जो चीज में निषिद्ध होती है उसी के प्रति मन ज्यादा ललचाता है। मां का कहना था कि वे टॉफी, गोलियां अच्छी नहीं होती हैं। वे मिलावटी और सस्ते किस्म की होती हैं। मां कभी-कभी हम दोनों बहनों के लिए अच्छी चॉकलेट खरीद दिया करती थीं। 
      हां, तो  चार-पांच जून तक खड़ा नमक, खड़ी मिर्च, खड़ा धनिया, खड़ी हल्दी, खड़ा गरम मसाला आदि सभी खड़े मसाले खरीद लिए जाते थे। यह बेचारे खड़े मसाले कभी चैन से बैठ नहीं पाते थे, इनको कूट पीसकर 'फ्लैट' कर दिया जाता था। बड़ी के लिए मूंग और उड़द की दाल लाई जाती थी जिसे अच्छी तरह धोकर रात भर भिगोया जाता था और दूसरे दिन सिलबट्टे पर पीसा जाता था। मां अकेली यह सब काम नहीं कर सकती थीं। इसलिए वे खाना बनाने वाली महिला जिसे हम लोग बऊ (मां) कह कर पुकारते थे, से सहायता लेती थीं। बऊ अपनी बहू के साथ आकर सुबह से जुट जाती। जब खाना बनाने का काम करती उस दौरान उसकी बहू धनिया साफ करना, हल्दी कूटना, छानना आदि का जिम्मा सम्हाले रखती। सास बहू दोनों हमारे घर हमारे साथ खाना खाती और बीच-बीच में छाछ, लस्सी, आम का पना आदि भी चलता रहता। उन दिनों हमारे घर चाय पीने का चलन नहीं था। वे दिन उत्सव की तरह लगते थे। घर के बाहरी आंगन में कच्ची ज़मीन पर लोहे की खल पर बट्टे की धमक सुनाई पड़ती रहती और बीच-बीच में सिलबट्टे कि ठक-ठक भी ताल से ताल मिलाती। आम का अचार डाला जाता। अचार की बर्नियों को उनके मुंह पर साफ़, सफेद कपड़ा बांध कर दो-तीन दिन तक धूप में रखा जाता। इस दौरान चावल, आलू और साबूदाने के पापड़ बना कर सुखाए जाते। उन दिनों बड़ियां बनाना सबसे मशक्कत का काम था। उड़द की दाल को पीसना और भूरे कुम्हड़े को कद्दूकस करना बड़ा मेहनत वाला काम था। थोड़ी बड़ी होने पर मैंने भी यह काम करके देखा था और मुझे समझ में आ गया था कि यह वाकई "फुल एक्सरसाइज" वाला काम है। दो-तीन दिन तक बांह, कंधे और कमर दुखती रही थी। जब बड़ियां बनतीं तो उसके साथ ही तिल वाली बिजौरियां भी बनाई जातीं।
      जब सूखी लाल मिर्चीयां खल में कूटी जातीं तो उस समय मां, बऊ और उसकी बहू तीनों चेहरे पर कपड़ा बांध लिया करतीं और हम लोगों को उस ओर आने की मनाही रहती। कभी भूलवश हम लोग उधर खेलते-खेलते पहुंच जाते तो उसके बाद मिर्ची की धांस से खांसते-खांसते लौटते।
      इस दौरान बड़ी, पापड़ और चिप्स इन तीनों के बन जाने पर उसमें से कुछ हिस्सा उपहार के रूप में मां बऊ को भी दिया करती थीं। यद्यपि उसे मासिक वेतन के अतिरिक्त मेहनताना भी दिया जाता था। मां का मानना था की क्योंकि बऊ और उसकी बहू दोनों यह सब बनाने में बहुत मेहनत करती हैं इसलिए मेहनताना के अतिरिक्त भी इसमें उनका कुछ हिस्सा बनता है। वस्तुतः यह कोई उदारता नहीं थी बल्कि संबंध प्रगाढ़ रखने और आत्मीयता बनाए रखने की परंपरा का एक सुंदर निर्वहन था। इसीलिए बचपन में बऊ को लेकर मेरे मन में नौकर-मालिक वाला भाव कभी नहीं जागा। हम दोनों बहनें बऊ का बहुत सम्मान करती थीं और वह भी हमें लकड़ी के चूल्हे पर ताजा-ताजा रोटियां से कर बड़े चाव से खिलाया करती थी।
        आलू की चिप्स भी बनाकर बहुत अच्छी तरह सुखा कर बड़े-बड़े डिब्बों में पैक कर दिए जाते थे। यह सारी तैयारी अगली गर्मियों तक अर्थात साल भर के लिए होती थी। बचपन के शुद्ध मसालों की महक आज भी मेरी सांसों में समाई हुई है। आज यह भी समझ में आता है कि उस समय महिलाएं शारीरिक रूप से इतनी चुस्त-दुरुस्त और स्वस्थ क्यों रहती थी? क्योंकि वे जमकर शारीरिक श्रम करती थीं। 
       बारिश आने के पूर्व अचार, बड़ी पापड़, मसाला आदि की पूरी तैयारी संपन्न हो जाने पर मां के चेहरे पर मुस्कुराता हुआ संतोष झलकता था। पिताजी की मृत्यु के बाद वे एक 'सिंगल मदर' के रूप में हम दोनों बहनों का पालन-पोषण कर रही थीं। वे नौकरी के साथ-साथ एक समर्थ गृहणी की भूमिका भी अदा कर रही थीं, जबकि उनके इस दुरूह जीवन से बेख़बर मैं उन दिनों के माहौल को एक उत्सव के रूप में जीती रही। आज की जीवनशैली में सब कुछ बदल चुका है। अब घरों में उस तरह मसाले पीसकर नहीं रखे जाते हैं । अचार-पापड़ भी कम ही घरों में बनाए जाते हैं। भागती-दौड़ती जिंदगी ने अतीत के अनेक सुनहरे अनुभव बहुत पीछे छोड़ दिए हैं।                 
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Saturday, June 11, 2022

डॉ (सुश्री) शरद सिंह द्वारा संपादित "थर्ड जेंडर विमर्श" की समीक्षा "जनसत्ता" में

मेरे  द्वारा संपादित एवं सामायिक प्रकाशन, नई दिल्ली से प्रकाशित पुस्तक "थर्ड जेंडर विमर्श" की सारगर्भित समीक्षा "जनसत्ता" में ...

हार्दिक धन्यवाद #जनसत्ता 🙏
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Thursday, June 9, 2022

बतकाव बिन्ना की | उनकी सो निकर परी | डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम | साप्ताहिक प्रवीण प्रभात

 "उनकी सो निकर परी" ये है मेरा बुंदेली कॉलम-लेख "बतकाव बिन्ना की" अंतर्गत साप्ताहिक "प्रवीण प्रभात" (छतरपुर) में।
हार्दिक धन्यवाद #प्रवीणप्रभात 🙏
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बतकाव बिन्ना की
उनकी सो निकर परी
- डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
           ‘‘काए भैैयाजी का हो गओ?’’ मैंने भैयाजी से पूछी, काए से के बे भैराने से आ के मोरे आंगूं ठाड़े हो गए।
भैयाजी कछु ने बोले। अपने गमछा से अपने मों को पसीना पोंछन लगे। 
‘‘चलो आप पैले बैठ लेओ, ठंडो पानी पी लेओ। फेर बताओ के का भओ।’’
मैंने भैयाजी खों को मटको को ठंडो पानी दओ। बिजना सोई झलन लगी। काए से के ई दिना लाईट आवारा सी हो गई कहानी। जब मन परे आ जात आए, जब मन परे चली जात आए। ई टेम पे बी लाईट कहूं नैनमटक्का करबे गई हुइए। मैं सोई अपने लाने कुल्ल देर से बिजना डुला रई हती।
‘‘रैन दे बिन्ना, हाथ पिरान लगहें।’’ भैयाजी मोए रोकत भए बोले।
‘‘ने पिरेहें। बिजना सो डुलाने ई परहें। एक मिनट खों हवा ने लगें सो जी अकुलान लगत आएं। प्राण से कढ़त आएं। को जाने जे बारिस कबे हुइए?’’ मैंने कही।
‘‘हऔ, अब की बेरा सो गजबई हो गई आए। हमें सो लगत आए के अब चुनाव बाद ई पानी गिरहे।’’
‘‘पानी को चुनाव से का लेबो-देबो? मौसम बदलबे की, पर्यावरण की बात कैते सो समझ में आती, जे चुनाव वारी बात हमाई समझ में ने आई।’’ मैंने भैयाजी से कही।
‘‘अरे बिन्ना, सूदी सी बात आए के जबे चुनाव आत आएं सो सबई कछु चुनाव के हिसाब से होन लगत आए। ने मानो सो अभईं कोनऊ सरकारी दफ़्तर में जा के देख लेओ। इना-गिना जने अपनी सीट पे मिलहें। ओ तनक उनसे पूछो के जे आपके बाजू वारे भैया कहां निकर गए? सो जेई जवाब मिलत आए के कहूं निकरे नईयां, चुनाव की टरेनिंग में गए हैं। सो, बारिस सोई टरेनिंग के डर से ने आ रई हुइए।’’ कैत भए भैयाजी हंसन लगे।
‘‘खूबई कही भैयाजी आपने! मनो, जे बाजू में कागज़ को बंडल सो का दबा रखो आए? कोनऊ कचेरी-अदालत के कागज आएं का?’’ मैंने भैयाजी से पूछी। 
‘‘जे! अरे हऔ बिन्ना, जेई कागज सो दिखाने आए तुमें!’’ भैयाजी अपने दोई हाथ से कागज सीधे करत भए बोले।
‘‘जो का आए? जे कचेरी के कागज सो नई दिखा रए। सरकारी बी नोईं! काए के कागज आएं?’’ मैंने पूछी।
‘‘तनक गम्म खाओ बिन्ना! तुमाए लाने सो लाए हैं, दिखाए बिना ने लौटहें।’’ भैयाजी गोलमोल सो बोल गए।
‘‘बाद में सीधो कर लइयो, पैले बताओ तो के ईमें है का? काए के कागज आएं जे?’’ मोए सो रहाई नई पर रई हती।
‘‘जे! जे देखो!’’ कैत भए भैयाजी ने कागज मोरे हाथ पे धर दए।
‘‘जे तो कछु कविता सी दिखा रई।’’ मैंने कही।
‘‘हऔ, कवितई आए!’’ भैयाजी बोले।
‘‘कोन की आए?’’ मैंने फेर पूछी।
‘‘कोन की का मतलब? हमाई आए!’’ भैयाजी शान से बोले।
‘‘आपकी? आप कब से कविता लिखन लगे?’’ मोए बड़ो अचरज भओ। काए से भैयाजी सो कविता लिखन वारन की खिल्ली उड़ात रैत आएं, औ अब खुदई कविता लिख लाए? भौतई गजब???
‘‘जे ऐसे आंखें फाड़ के काए देख रईं, का हम पे कविता लिखत नईं बनत?’’ भैयाजी बोले।
‘‘बनत हुइए, मनो मैंने सो कभऊं आपकी कविता ने पढ़ी, ने सुनी। सो अचरज हुइए ई।’’ मैंने सोई कही।
‘‘हऔ, जे बात सांची आए के स्कूल-कालेज के दिना में लव-लेटर के लाने दो-चार कविताएं लिखीं रईं, मनो उनसे कछु काम नई बनो सो सब छोड़-छाड़ दओ।’’ भैयाजी बोले।
‘‘काए नई बनो काम? का आपने भौजी से लवमैरीज नईं करी हती? बाकी अब समझ में आई के आपने कविताएं लिख-लिख के भौजी खों मनाओ हुइए।’’ मैंने चुटकी सी लई।
‘‘अरे कहां बिन्ना, उने कविता-वमिता से कछु नई फरक परत रओ। बो तो एक दफा तुमाई भौजी किरोसिन लेबे के लाने राशन की लंबी लाईन में ठाड़ी हतीं। ठाड़े-ठाड़े उनके पांव दुखन लगे हते। इत्ते में हम उते पौंचे। हमसे उनको कष्ट ने देखो गओ। सो हमने उने लाई से बाहरे करो औ हम उनकी जांगा पे ठाड़े हो गए। हमें पूरे तीन घंटा उते ठाड़े रहने परो, मनो तुमाई भौजी हमाई ई तपस्या से प्रसन्न हो गईं। ऊके बाद किरोसिन की लाईन में तब तक हमई ने उनके बदले टांगें दुखाईं जब तक लों बे हमाए संगे शादी के लाने मान नई गईं। फेर कछु दिना बाद गैस को चूला आ गओ सो किरोसिन को काम ई खतम हो गओ।’’ भैयाजी कविता भूल के अपनी कहानी सुनान लगे।
‘‘फेर का भओ?’’ मैंने पूछी।
‘‘फेर जे भओ के तुम हमें बतकाव में ने उरझाओ, हमाई जे कविताएं पढ़ो औ बताओ के ईमें कोन सी काम की आएं और कोन सी फालतू आएं।’’ भैयाजी की गाड़ी फेर पटरी पे आ गई।
मैंने पैली कविता पढ़के ई चैंक परी। आप ओरें सोई पढ़ लेओ-
बेलन/ झाड़ू/मटका पे तुम बटन दबाओ।
पुरा, मोहल्ला, घर-घर में खुसियाली लाओ।

‘‘जे का है भैयाजी? जे कविता नईं, जे तो नारा आए, वो बी चुनावी नारा।’’ मैंने भैयाजी से कही।
‘‘हऔ, सो नारा कै लेओ। जो चाओ सो कहो, पर जे बताओ के जो है कैसो?’’ भैयाजी अकुलाने से पूछन लगे। 
‘‘मनो नारा कहो सो ठीक आए, पर ईमें सो आपने तीन-तीन उम्मीदवारान के लाने एक संगे वोटे मांग लईं। बेलन/ झाड़ू/मटका... कोनऊ एक पे रहो आप।’’ मैंने कही।
‘‘नईं, हम सो एक पे ई रैबी। जे सो नमूना आए। जोन दम्मीवार हमसे जे कविता लैहे, ऊको चुनाव चिन्ह ईमें रख दओ जेहे, बाकी के हटा लए जेंहें। है न सही?’’ भैयाजी बोले।
‘‘हऔ, एकदम सही। मनो जे तो बताओ आप खों जे नारे लिखबे को आपको विचार आओ हां से?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘अब तुमने का छिपाने बिन्ना! ऊ दिना गोबिंद से हमाई गिचड़ हो रई हती के कोन की लुगाई चुनाव में ठाड़ी हुइए। तुमने देखी हती। मनो हम दोनों की लुगाइयन ने साफ कै दओ के चुनाव में खड़े होबे की कही सो घरे खाना-पानी बंद समझियो। सो, बात उतई बढ़ा के रै गई। मनो हमने देखी के गोबिंद जे ई टाईप की कविता लिख रओ आए। पूछबे पे ऊके मों से निकर आओ के जे चुनाव के लाने आए। ऐसो लिखबे के उम्मींवार हरें पइसा देते आएं। सो हमें सोई बात जम गई। चुनाव को सीजन आए, कछु कमाई कर लई जाए। चुनाव के बाद सो जीतन वारे कमाई करहें, तब अपन ओरन खों कौन पूछ रओ। हम तो कै रै के तुम सोई ई टाईप की कविताएं लिख डारो। तुमाई बी कछु कमाई हो जेहे।’’ भैया जी बोले।
‘‘रैन दो भैयाजी! आपई कमाओ! आप खुस, सो मैं खुस।’’ मैंने कही। 
‘‘बात जे है बिन्ना के जोन खों उम्मीदवार बनने खों मिल रओ, उनकी सो निकर परी, अब हमाई सोई तनक निकर परे। जे बाकी कविताएं सोई देख के बताइयो के ठीक आएं के नईं। हम संझा खों आ के ले जाहें।’’ कहत भए भैयाजी अपने चुनावी नारे मोरे हाथ पे टिका के बढ़ लिए। खैर, पढ़ लेबी। चुनाव को सीजन आए सो जे सोई करने पड़हे। 
मोए सोई बतकाव करनी हती सो कर लई। अब चाए कोनऊ नारे लिखे, चाए वारे लिखे, मोए का? जीतबे वारे जीत बे के बाद कौन शकल दिखा हें। बाकी, बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की। सो, सबई जनन खों शरद बिन्ना की राम-राम!
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(09.06.2022)
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Wednesday, June 8, 2022

चर्च प्लस | विश्व महासागर दिवस, 8 जून | महासागर डाल सकते हैं सागर पर भी असर | डॉ. (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर

चर्चा प्लस 
विश्व महासागर दिवस (8 जून)
महासागर डाल सकते हैं सागर पर भी असर 
- डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह

       08 जून को विश्व महासागर दिवस मनाया जाता है। क्या सागर या इसके जैसे अन्य शहरों को भी मनाना चाहिए यह दिवस, जबकि इन शहरों से महासागरों की दूरी हजारों किलोमीटर की है। पर हमें याद रखना होगा कि महासागरों में होने वाली हर हलचल पूरी पृथ्वी पर असर डालती है और आज तो महासागर तेजी से पिघलते ग्लेशियर्स की समस्या से जूझ रहे हैं। जिसका असर किसी न किसी रूप में देश के हर शहर पर पड़ना शुरू हो चुका है।


प्रतिवर्ष 08 जून को दुनिया भर में ‘विश्व महासागर दिवस’ का आयोजन किया जाता है। इसका उद्देश्य केवल महासागरों के प्रति जागरुकता लाना ही नहीं बल्कि दुनिया को महासागरों के महत्त्व और भविष्य की इनके सामने खड़ी चुनौतियों से भी अवगत कराना है। यह दिवस कई महासागरीय पहलुओं जैसे- सामुद्रिक संसाधनों के अनुचित उपयोग, पारिस्थितिक संतुलन, खाद्य सुरक्षा, जैव विविधता तथा जलवायु परिवर्तन आदि पर भी प्रकाश डालता है। यह सच है कि हममें से 99 प्रतिशत लोगों ने कभी ग्लेशियरों को जाकर नहीं देखा, केवल टीवी या इंटरनेट पर देखा है। ग्लेशियरों का पिघलना भी सीधे तौर पर नहीं देखा गया है। तो हम चिंता क्यों करें? अगर ग्लेशियर पिघल रहे हैं, तो हम बीच के मैदान के निवासी हैं? हालांकि हम मिडलैंड के निवासियों ने कभी बर्फबारी भी नहीं देखी। लेकिन जब पहाड़ों पर बर्फ गिरती है तो पूरा मध्य प्रदेश भी शीत लहरों के प्रभाव में आ जाता है। राजस्थान की धूलभरी आंधियां मध्यप्रदेश के आसमान को भी धुंधला कर देती हैं। तो क्या हमें वास्तव में चिंता नहीं करनी चाहिए?

08 जून, 1992 को ‘अर्थ समिट’ में कनाडा के ‘ओशियन इंस्टीट्यूट’ ने प्रतिवर्ष अंतर्राष्ट्रीय महासागर दिवस मनाने का विचार प्रस्तुत किया था।  संयुक्त राष्ट्र संघ ने वर्ष 2008 में संबंधित प्रस्ताव पारित किया और इस दिन को आधिकारिक मान्यता प्रदान की। पहली बार विश्व महासागर दिवस 8 जून, 2009 को मनाया गया था। वर्ष 2022 के लिए थीम रखी गई है-‘‘पुनरोद्धार: महासागर के लिए सामूहिक कार्यवाई’’ (रीवाइटेलाईजेशन: कलेक्टिव एक्शन फाॅर द ओशन)।

मैंने एक लेख लिखा था -‘‘केन ग्लेशियर मेल्टिंग एफैक्टेड ए सागेरियन?’’ ये सागेरियन कौन हैं? सागेरियन यानी सागर की निवासी। मैं सागेरीयन हूं। हां, मैं सागर में रहती हूं, भारत के मध्य में एक विकासशील शहर, और इसलिए मैं सागेरियन हूं। कुछ दिन पहले मैं एक परिचित से चर्चा कर रही था कि इन दिनों मौसम अस्थिर हो गया है। जलवायु परिवर्तन के साथ मौसम भी बदल रहा है जिसे हम अपने जीवन में नहीं समझ पाते हैं। जब तक हम समझेंगे तब तक बहुत देर हो चुकी होगी। मेरे परिचित ने लापरवाही से कहा कि ‘‘मौसम बदलता रहता है, चिंता किस बात की?’’ इसके बाद उन्होंने मुझसे कहा कि ‘‘आप बेवजह ही मौसम और मौसम की चिंता करती रहती हैं। अरे हम जिस जगह रहते हैं उसका यहां कोई असर नहीं होने वाला है।’’ मैंने कहा-‘‘वाह! क्या आपने यह कहावत नहीं सुनी होगी कि अगर कोई पत्ता धरती पर भी हिलता है तो उसका असर दूर अंतरिक्ष तक होता है। अतः जब कोई घटना पृथ्वी पर ही घटित होगी तो उसका प्रभाव पृथ्वी पर इस छोर से उस छोर तक रहेगा। अब देखिए, जैसे-जैसे ग्लेशियर पिघल रहे हैं, वैसे-वैसे पूरी धरती पर इसका असर होना स्वाभाविक है।’’ यह सुनकर उन्होंने कहा, ‘‘आप कहती हैं कि ग्लेशियर पिघल रहे हैं और यह चिंता का विषय है। बेशक़ यह चिंता का विषय होगा लेकिन हमारे लिए नहीं। हम बीच मैदान में रह रहे हैं। हमें चिंता क्यों करनी चाहिए? हम यहां समुद्र से दूर सागर में रहते हैं। हमें ग्लेशियरों के पिघलने से क्यों डरना चाहिए? अगर ग्लेशियरों के पिघलने से समुद्र का जलस्तर बढ़ता है तो हमें नहीं समुद्र के तटीय इलाकों की चिंता होनी चाहिए।’’

क्या सागेरियन, भोपाली, लखनवी या लुधियानवी को ग्लेशियरों के पिघलने से नहीं डरना चाहिए? दरअसल, ग्लेशियरों का पिघलना आज ग्लोबल वार्मिंग का सबसे स्पष्ट प्रमाण है। केवल ग्लेशियर की सफेद सतहें सूर्य की किरणों को परिवर्तित करती हैं, जिससे हमारी वर्तमान जलवायु के तापमान को हल्का रखने में मदद मिलती है। जब ग्लेशियर पिघलते हैं, तो गहरे रंग की उजागर सतहें गर्मी को अवशोषित और छोड़ती हैं, जिससे तापमान बढ़ जाता है। ग्लेशियर पानी के जलाशय के रूप में कार्य करते हैं जो गर्मियों के दौरान बने रहते हैं। ग्लेशियरों के लगातार पिघलने से पूरे शुष्क महीनों में पारिस्थितिकी तंत्र में पानी का योगदान होता है, जिससे जल स्रोत बन जाता है। हिमनदों से निकलने वाला ठंडा अपवाह नीचे के पानी के तापमान को भी प्रभावित करता है।

जलवायु परिवर्तन का अर्थ है पर्यावरण में परिवर्तन। यह बदलाव बेमौसम बारिश, बर्फबारी, बढ़ती गर्मी और सूखे के रूप में हमारे सामने आ रहा है। बढ़ती गर्मी के कारण ग्लेशियर लगातार पिघल रहे हैं। अंटार्कटिका से लेकर ग्रीनलैंड तक। ग्रीनलैंड का अस्तित्व खतरे में है। जीवनदायिनी नदियां सूख रही हैं। ग्लेशियरों के पिघलने से समुद्र का स्तर लगातार बढ़ रहा है। जिससे निकट भविष्य में दुनिया के नक्शे से कई देशों का अस्तित्व मिटने की संभावना है। पिछले कुछ वर्षों में प्राकृतिक आपदाओं में भी वृद्धि देखी गई है। जलवायु परिवर्तन के प्राकृतिक और मानवीय दोनों कारण हैं, लेकिन वर्तमान समय में जो परिणाम सामने आए हैं, वे मानवीय गतिविधियों के कारण हैं। हमारे सामने एक बड़ा संकट है और दुर्भाग्य से हमें इसकी जानकारी नहीं है। जलवायु परिवर्तन और वायु प्रदूषण हिमालय के ग्लेशियरों के पिघलने की गति को तेज कर रहे हैं, जिससे उन 750 मिलियन लोगों का जीवन और आजीविका खतरे में पड़ रही है जो इन ग्लेशियरों और हिमपात के पानी पर निर्भर हैं। पिघलने वाले ग्लेशियर बढ़ते समुद्र के स्तर में वृद्धि करते हैं, जो बदले में तटीय क्षरण को बढ़ाता है और तूफान की वृद्धि को बढ़ाता है क्योंकि गर्म हवा और समुद्र के तापमान तूफान और आंधी जैसे अधिक लगातार और तीव्र तटीय तूफान पैदा करते हैं। खतरनाक रूप से, यदि ग्रीनलैंड की सारी बर्फ पिघल जाती है, तो यह वैश्विक समुद्र के स्तर को 20 फीट तक बढ़ा देगा।

जैसा कि ऊपर चर्चा की गई है, ग्लेशियरों का पिघलना ग्लोबल वार्मिंग के गंभीर प्रमाणों में से एक है। यह इस बात का प्रमाण है कि ग्लोबल वार्मिंग से न केवल पृथ्वी का तापमान बढ़ रहा है, बल्कि यह मौसम और जलवायु को भी बदल रहा है। ग्लोबल वार्मिंग का मौसम पर पड़ने वाले असर का मतलब है कि लंबा सूखा पड़ रहा है और कहीं भारी बारिश हो रही है। इसका सीधा असर कृषि और बागवानी पर पड़ रहा है। पेयजल की समस्या भी पानी का स्तर कम होने के कारण उत्पन्न होती है। पिछले पांच वर्षों के दौरान बुंदेलखंड क्षेत्र में सूखे के दौरान हम इस सब के उदाहरण पहले ही देख चुके हैं। इसलिए, यह सोचना कि हिमालय या ध्रुवीय क्षेत्रों में ग्लेशियरों के पिघलने से हमारे देश की मध्यभूमि पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा, अपने आप में एक भ्रम है। इसलिए विश्व के प्रत्येक व्यक्ति के लिए यह महत्वपूर्ण है कि वह ग्लोबल वार्मिंग की गति को धीमा करने में योगदान करे। हमें यह समझना होगा कि ग्लेशियरों के पिघलने का असर अगर तटीय इलाकों पर 50 फीसदी पड़ेगा तो केंद्रीय भूमि में रहने वाले लोगों पर कम से कम 10 से 20 फीसदी का ही असर होगा। तो जागें, सागेरियंस, भोपाली, लखनवी या लुधियानवी या हम कहीं के भी नागरिक हैं।

संयुक्त राष्ट्र के अनुसार लगभग तीन अरब से अधिक लोग महासागर आधारित उद्योगों में कार्यरत हैं और यह संख्या समय के साथ और अधिक बढ़ती रहेगी। महासागरीय संसाधनों को समाप्त होने से बचाने के लिये जागरुकता की आवश्यकता है। पृथ्वी की सतह पर पाया जाने वाला लगभग 97 प्रतिशत जल महासागरों में मौजूद है। भले ही वह मीठे पानी में बदले बिना पीने योग्य नहीं है लेकिन जलीय पारिस्थितिक तंत्र में मछलियों और पौधों की अनगिनत प्रजातियां मौजूद हैं। जो पृथ्वी के पर्यावरण का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। हम सभी जो महासागरों से दूर मुख्यभूमि पर निवास करते हैं, महासागरों के पुनरुद्धार में सहभागी बन सकते हैं। हम सभी जानते हैं कि हमारे देश की सभी नदियां सागरों में जा कर मिलती हैं। हम अपनी नदियों के जल को स्वच्छ रख कर महासागरों की स्वच्छता के सहभागी बन सकते हैं। कारखानों से निकलने वाले विषाक्त रसायनों को नदियों में जाने से रोक कर समुद्री जीवों को घातक रसायनों से बचा सकते हैं। जंगलों को बचा कर, नए पेड़ उगा कर हम उस ग्लोबल वार्मिंग की गति को कम करने में सहयोग कर सकते हैं, जो ग्लेशियर्स को पिघला रही है और समुद्र के जलस्तर को बढ़ा रही है। ग्लेशियर्स के भीमकाय टुकड़ों का टूट कर समुद्र में गिरना सुनामी आने का कारण भी बन जाता है। यदि सुनामी, बाढ़, तूफान  आदि से समुद्रतटीय आर्थिक व्यवस्था बिगड़ती है तो उसका असर पूरे देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। जापान में आई सुनामी से जापान के द्वारा की जाने वाली वैश्विक आपूर्ति बाधित हो गई थी जिससे कई देशों में वस्तुओं के दाम बढ़ गए थे। जापान में आघात सह कर खड़े हो जाने की जो क्षमता है वह हमारे देश में नहीं है। अतः इस दिशा में प्रयासरत रहना जरूरी है कि आघात की स्थितियां कम से कम आएं और हमारे भारत जैसे विकासशील देश पर्यावर्णीय और आर्थिक आपदाओं से बचे रहें। वस्तुतः ये सारी बातें याद करते हुए आगे कदम बढ़ाने का दिन है ‘‘विश्व महासागर दिवस’’।   
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(08.06.2022)
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Tuesday, June 7, 2022

पुस्तक समीक्षा | दुनियावी सवालों के ज़वाब ढूंढती ग़ज़लें | समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह | आचरण


प्रस्तुत है आज 07.06.2022 को  #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई वरिष्ठ कवि कृष्ण बक्षी जी  के ग़ज़ल संग्रह "चलो ढूंढें ज़वाब अपने" की समीक्षा... आभार दैनिक "आचरण" 🙏
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पुस्तक समीक्षा
दुनियावी सवालों के ज़वाब ढूंढती ग़ज़लें
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ग़ज़ल संग्रह - चलो ढूंढें जवाब अपने
कवि       - कृष्ण बक्षी
प्रकाशक  - बोधी प्रकाशन, सी-46, सुदर्शनपुरा इंडस्ट्रियल एरिया एक्सटेंशन, नाला रोड, 22 गोदाम,जयपुर - 302006
मूल्य      - 150/- 
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न दरिया में  रवानी है चलो ढूंढे जवाब अपने
कहीं ठहरा सा पानी है चलो ढूंढे जवाब अपने
अलहदा कैसे कर दोगे रगों में सबकी बहता है
जो खूं हिंदोस्तानी है चलो ढूंढे जवाब अपने
अज़ब हालात में उलझा के रख दी है जवां पीढ़ी
भटकती-सी जवानी है चलो ढूंढे जवाब अपने
- ये अशआर हैं शायर कृष्ण बक्षी की गजल ‘‘चलो ढूंढे जवाब अपने’’ से। यह ग़ज़ल उनके जिस ताजा ग़जल संग्रह में संग्रहीत है, उसका नाम भी है ‘‘चलो ढूंढे जवाब अपने’’।
वर्तमान परिदृश्य देखते हुए कवि कृष्ण बक्षी महसूस करते हैं कि समाज में हर स्तर पर हर ओर प्रश्नों का अंबार लगा हुआ है, जिनका जवाब ढूंढें बिना हल नहीं निकाला जा सकता है। जो प्रश्न अव्यवस्थाओं को देखकर, असंवेदनाओं को देखकर और विसंगतियों को देखकर मन में उमड़ते-घुमड़ते हैं, वही व्याकुलता का कारण बनते हैं। इसलिए भी उनका जवाब ढूंढना ज़रूरी है। यूं भी प्रश्नों से घिरा हुआ समाज कभी सही ढंग से विकास नहीं कर पाता है।

ग़म ही रह जाते हैं अक्सर गुनगुनाने के लिए
छोड़ देता है कोई जब टूट जाने के लिए
छीन कर के चुलबुल ले गए सारी हंसी
तुमने छोड़ी  तक खुशी न मुस्कुराने के लिए

इसी ग़ज़ल में जो कि आरंभ में इश्क़िया गजल होने का एहसास कराती है, वहीं आगे के शेर ज़िंदगी की पथरीली सच्चाइयों से सामना कराते हैं। जैसे ये शेर हैं-
पी गया है चिमनियों का उनको ज़हरीला धुआं
घर से जो  मजदूर  निकले  कारखाने के लिए
खूब  इस्तेमाल  तुमने  कर लिया  आवाम का
काम आया है फ़क़त जो सर झुकाने के लिए

कवि ने सत्ता के खोखले वादों और दावों पर जहां तंज़ कसा हैं, वहीं सत्ता के इर्द-गिर्द झूठ के मायाजाल को भी उजागर किया है। एक ऐसा मायाजाल जो आमजन को वोटर संख्या अथवा सभाओं की भीड़ से अधिक कुछ नहीं मानती है। कवि कृष्ण बक्षी की ग़ज़लों में भाषाई समृद्धि स्पष्ट दिखाई देती है। प्रचलन में मौजूद शब्दों और मुहावरों को बड़ी सुंदरता से और सटीकता से अपने शेरों में पिरो देते हैं। जैसे यह ग़ज़ल है ‘‘सभाओं ने हमें’’ -
हर कसौटी पर कसा है विपदाओं ने हमें
खूब जांचा खूब परखा आपदाओं ने हमें
सिर्फ हम मोहरे रहे जलसे, जुलूसों के
दांव पर रक्खा हमेशा ही सभाओं ने हमें
साज़िशों वाली अंधेरी कोठरी में क्यूं
बांध रक्खा है अभी तक बादशाहों ने हमें

इस संग्रह की ग़ज़लें अपने प्रश्नों के जवाब मांगने के साथ ही हमारे आसपास रच-बस गए झूठ को बखूबी रेखांकित करता है। और हमें आगाह करने का प्रयास करता है कि हमें ज़रूरत है अपने स्वार्थ की गहरी नींद से जागने की। यूं तो शायरी का नाता प्यार- मोहब्बत, ग़म, शिक़ायत, दोस्ती, दुश्मनी आदि इन सब से बहुत क़रीब कर रहा है। लेकिन जब कृष्ण बक्षी अपनी शायरी में दोस्ती-दुश्मनी की बात करते हैं तो उनका अंदाज़ निराला होता है बानगी देखिए -

दर्द अक्सर जब  मुझे पहचान लेता है
बिन सबूतों के ही दुश्मन मान लेता है
बात उठते ही वो मेरे इन सवालों की
पांव से सर तक वो चादर तान लेता है
यह व्यवस्था ही बहुत है जान लेने को
ज़हर का तू किसलिए एहसान लेता है

दर्द पर ही एक ग़ज़ल के कुछ और शेर देखिए जिनमें आंतरिक पीड़ा के साथ ऐतिहासिक उद्धरण का सुंदर सामंजस्य है-

ज़ख्म मेरे आज  मुझसे बात करने पर तुले हैं
और उस पर दर्द तहक़ीक़ात करने पर तुले हैं
सांझ के सूरज बचा कर रख ज़रा सी रोशनी
वक़्त से  पहले सितारे  रात करने पर तुले हैं
वह  हमारे  दौर का  ही  आम सा इंसान है
आप आखिर क्यों उसे सुकरात करने पर तुले हैं

यह माना जाता है कि बड़े बहर की ग़ज़लें कहने से अधिक कठिन होता है छोटी बहर की ग़ज़लें कहना। सच भी है कि कम से कम शब्दों में सब कुछ कह देना एक साहित्यिक कला ही तो है। जो इस कला में पारंगत हो जाता है, वह आसानी से छोटे बहर की सटीक ग़ज़लें भी कह लेता है। इस संग्रह में बड़े बहर के साथ छोटे बहर की भी कई खूबसूरत गजलें हैं। जैसे यह एक गजल है ‘‘रोज़ मरते हैं’’ -
    हम जिसे  बहुत  प्यार करते हैं
    उसकी  नाराज़गी  से डरते हैं
    जिनको होता है खौफ लहरों का
    सिर्फ  पानी  में  वो उतरते हैं
    चल मोहब्बत से पूछ कर देखो
    हम ही करते हैं कि वो भी करते हैं

छोटी बहर की ही एक और ग़ज़ल है जो आजकल के अव्यवस्था भरे माहौल पर तीखा कटाक्ष करती है। शेर देखें -
नए-नए रास्ते निकाल के
ढूंढ रहे हैं हल सवाल के
ग्राम सभा से  लौटे हैं वो
कुछ ताजा मुद्दे उछाल के
आपके घर के बदलो बंधु
बूढ़े  कैलेंडर  दीवाल के

कवि कृष्ण बक्षी का गीत-ग़ज़ल की दुनिया में एक लंबा अनुभव है। वे अपनी ग़ज़ल में जो कुछ कहना चाहते हैं बखूबी कहने की महारत रखते हैं। भाषा भी सरल है, आम बोलचाल की भाषा। इसीलिए उनकी ग़ज़लें, उसे पढ़ने या सुनने वाले से सीधा संवाद करने की ताकत रखती है। ‘‘चलो ढूंढे जवाब अपने’’ संग्रह की तमाम ग़ज़लें शिल्प के लिहाज़  से मुक़म्मल हैं और पठनीय हैं।
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Monday, June 6, 2022

विश्व पर्यावरण दिवस की सुबह जंगल में पेंटिंग वर्कशॉप के साथ - डॉ (सुश्री) शरद सिंह


विश्व पर्यावरण दिवस की सुबह यदि जंगल में आप हों और  चित्रकारों को कैनवास पर लाईव स्पॉट लैंडस्केपिंग करते हुए देखें तो इससे सुखद और सुकून देनेवाला कुछ हो ही नहीं सकता है... जी हां, मेरी 05 जून'22 की सुबह ऐसी मज़ेदार रही...💁🌳🙋🌴🚵❤️
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अपनी रिपोर्ट का टेक्स्ट यहां साझा कर रही हूं और कुछ तस्वीरें भी...इस आग्रह के साथ कि आप सब को भी हफ़्ता-पंद्रह दिन में एक बार आऊटिंग ज़रूर करना चाहिए इससे तन-मन की इनर्जी की बैटरी रीचार्ज होती रहेगी 🌷😀🌷
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विश्व पर्यावरण दिवस पर स्पॉट पेंटिंग कर  प्रकृति के प्रति अपनी जागरूकता को कैनवास पर चित्रित किया रंग के साथियों ने

-डॉ (सुश्री) शरद सिंह
कलासमीक्षक, पर्यावरण चिंतक एवं वरिष्ठ साहित्यकार

विश्व पर्यावरण दिवस पर रंग के साथी ग्रुप ने  सागर ने सिटी फॉरेस्ट पहुँच कर पेड़ों के बीच   चित्रकारी कर विश्व पर्यावरण दिवस मनाया । रंग के साथी ग्रुप  ने निःशुल्क स्पॉट पेंटिंग  आयोजन किया जिसमें 8 वर्ष  लेकर बडे बच्चों और महिलाओं ने भी आकर आज पेंटिंग का आनंद लिया। सिटी फ़ॉरेस्ट में सुबह 6 बजे से 9 बजे तक बच्चों व बड़ों ने रंग के साथी कलाकारों के साथ स्पॉट पेंटिंग  की और साथ ही ये संदेश दिया कि अगर ये हरे भरे जंगल हैं तभी पृथ्वी है और तभी ये जीवन भी  है। 
स्पॉट पेंटिंग स्थल चित्रण चित्रकला की मौलिक विधा है इसे लैंडस्केप आर्ट के रूप में भी जाना जाता है। इसमें प्राकृतिक दृश्यों जैसे पहाड़ों , घाटियों , पेड़ों , नदियों और जंगलों का चित्रण शामिल है। आठवीं शताब्दी से चली आ रही लैंडस्केप आर्ट की परंपरा अत्यंत चुनौती भरी है क्योंकि इसमें प्रकृति के सौंदर्य रंग और अनुपात को हूबहू चित्रित करना होता है जिसके लिए प्रकृति से आत्मिक संबंध जोड़ना कलाकार के लिए आवश्यक है।
     आज तक समूचा पर्यावरण ग्लोबल वार्मिंग जैसे संकट से जूझ रहा है ऐसे समय में हर व्यक्ति के लिए यह आवश्यक हो गया है कि वह प्रकृति की महत्ता को समझें और उसके संरक्षण के लिए व्यक्तिगत स्तर पर भी सक्रियता से प्रयास करें। प्रकृति से मनुष्य का सीधा आत्मिक संबंध स्थापित करने का सबसे सशक्त माध्यम है चित्रकला। इस विषय पर रंग के साथी ग्रुप के असरार अहमद ने बताया की इस चित्रकला वर्कशॉप का उद्देश्य यही है के लोग पर्यावरण दिवस के महत्व को समझें साथ ही पर्यावरण की सुंदरता से स्वयं को जोड़ें जब मनुष्य को कोई चीज सुंदर लगती है तो वह उसे क्षति पहुँचाने से हिचकता है। 
    ए4 साईज़ के काग़ज़  पर जल रंग से प्रकृति की सुंदरता इन साथी कलाकरो ने बहुत सुंदर ढंग से चित्रित किया है  रंग के साथी ग्रुप के कलाकरों ने  नगर के बच्चों के साथ बैठ कर प्रकृति के सौंदर्य को अपनी कला से काग़ज़ पर जीवंत करते हुए नवोदित चित्रकारों का मार्गदर्शन किया। प्रतिभागियों का उत्साह देखते हुए रंग के साथी ग्रुप की अंशिता बजाज वर्मा ने बताया कि अब प्रति रविवार  हम साथी कलाकार सागर की किसी मनोरम स्थान पर जाकर स्पॉट पेंटिंग आयोजित करेंगे जिससे प्रतिभागियों में प्रकृति से जुड़ाव बढ़े तथा वे प्रकृति के बहुरंगी वातावरण को आत्मसात कर सकें। और साथ हम  कलाकार अपने नगर की सुंदरता को चित्रकारी के माध्यम से दिखा सके। 
     इस अवसर पर वनमाली सृजनपीठ सागर इकाई की अध्यक्ष डॉ (सुश्री) शरद सिंह, रंगकर्मी एवं कलानिदेशक अतुल श्रीवास्तव, आर्ट एंड कॉमर्स कॉलेज के प्रो. अमर जैन, मीडियाकर्मी पंकज सोनी तथा सिक्योरिटी सर्विस के पंकज शर्मा की उल्लेखनीय उपस्थिति रही।
     स्पॉट पेंटिंग की वर्कशॉप में जिन प्रतिभागियों ने अपनी कला को प्रकृति से प्रेरणा लेकर निखारा उनके नाम हैं - अनुष्का जैन, अनन्या देवलिया, अनिवा जैन, दिव्यांशी शुक्ला, अभय पुरोहित, पुष्प प्रणव सोनी, पुण्य जैन, प्रांजल जैन माही, मनीषा, सोहम, दिव्या नायक, आयुषी जैन, शालू सोनी, चारु अग्रवाल एवं आरुषि श्रीवास्तव। इन सभी चित्रकारों ने जल रंग से वृक्षों गहरे भूरे रंग की शाखाओं हरियाली के हरे हरे वन को अपने  कैनवास पर उतारा 
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Sunday, June 5, 2022

संस्मरण | मंदिरों की नगरी और कोतवाली की गजर | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नवभारत

नवभारत मेंं 05.06.2022 को प्रकाशित/हार्दिक आभार #नवभारत 🙏
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संस्मरण
मंदिरों की नगरी और कोतवाली की गजर
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
      पन्ना शहर का दूसरा नाम है मंदिरों की नगरी। मैंने जब चलना भी नहीं सीखा था तब से अपने कमल मामा की गोद में चढ़ कर उन विशालकाय मंदिरों में जाया करती थी। मंदिरों और देवताओं के बारे में जानने-समझने की क्षमता उन्हीं मंदिरों के प्रांगण में नन्हें पैरों से चलने का अभ्यास करते और खेलते-कूदते मेरे भीतर विकसित हुई। बल्देव जी के मंदिर से मेरा विशेष जुड़ाव रहा। कारण यह कि वह मेरे घर के निकट था और उसका प्रांगण बहुत खुला-खुला और बड़ा-सा था।। अंदर से भी उसका आर्किटेक्चर इस प्रकार का था कि वहां पहुंचकर सब कुछ बहुत बड़ा महसूस होता था। शायद यह पन्ना के मंदिरों के स्थापत्य सौंदर्य की ही देन थी कि बड़े होकर जब मैंने प्राचीन भारतीय इतिहास संस्कृति एवं पुरातत्व विषय में एम.ए. के फाइनल ईयर में "आर्ट एंड स्कल्पचर" के विषय को स्पेशल पेपर के रूप में चुना। उस विषय से मुझे इतना अधिक लगाव था कि मैं मंदिर स्थापत्य की बारीकियों को बहुत ध्यान से पढ़ती थी, समझती थी और उनके स्ट्रक्चरल प्लान ड्रा भी करती थी। इस प्रश्न पत्र में मुझे 100 में 89 अंक प्राप्त हुए थे। यद्यपि मेरा वह पेपर इतना अच्छा हुआ था कि उसमें मुझे 100 में 100 भी मिल सकते थे, किंतु इतिहास विषय ऐसा है कि जिसमें पूरे के पूरे नंबर नहीं मिलते हैं। यह बात और है कि पीएचडी के लिए विषय चुनते समय मैंने मंदिर स्थापत्य के स्थान पर मूर्तिकला को चुना क्योंकि मूर्ति कला में भी मेरी अगाध रुचि थी। विशेष रूप से प्राचीन मूर्तियों की कलात्मकता में।


  खैर, मैं बात कर रही थी अपने बचपन की। वह बचपन जो निश्चिंत था। खेलकूद में व्यस्त और मस्त रहता था। लेकिन इसी खिलंदड़े बचपन में कहीं अवचेतन में मंदिरों और देवताओं के प्रति आकर्षण तथा श्रद्धा के बीच रोपित होने लगे थे। मेरा परिवार कभी धर्म को लेकर संकीर्ण विचारधारा का नहीं रहा तथा आडंबरों को भी कभी नहीं ओढ़ा। इसीलिए मेरी दृष्टि में हर मंदिर एक समान था, चाहे वह किसी भी संप्रदाय अथवा विचारधारा का हो। मेरे लिए जितना महत्व बल्देव जी के मंदिर था, जुगल किशोर जी के मंदिर था, उतना ही महत्व प्राणनाथ जी के मंदिर का भी था। बल्देव जी का मंदिर पाश्चात्य स्थापत्य पर आधारित है। यह प्रमाण मिलता है कि बलदेव जी के मंदिर की डिजाइन लंदन के सेंट पॉल कैथेड्रल की भांति बनाई गई है। मंदिर के अंदर बहुत बड़ा आराधना स्थल, जिसमें सुचिक्कन बड़े-बड़े ऊंचे स्तंभ बहुत ही आकर्षक लगते हैं। बचपन में तो वह स्तंभ और भी बड़े और ऊंचे लगते थे। मैं और वर्षा दीदी इस स्तंभ के दोनों ओर खड़े होकर एक दूसरे का हाथ पकड़ने का प्रयास करते ताकि हम उसे अपने घेरे में ले लें। लेकिन उन स्तंभों के व्यास इतने चौड़े थे कि हमारी छोटी-छोटी बाहों के घेरे में नहीं आ पाते थे।
       जुगल किशोर जी का मंदिर हमारे घर से कुछ दूर पड़ता था। इसलिए वहां महीने में एक बार ही जा पाते थे। लेकिन वहां जाकर बहुत अच्छा लगता था। वह भी बहुत खूबसूरत मंदिर था। जुगल किशोर जी की प्रतिमा की मुरली में जड़े हुए हीरो़ं पर तो लोकगीत भी प्रचलित है-
       *पन्ना के जुगल किशोर*
       *मुरलिया में हीरे जड़े....*

सच तो यह है कि पन्ना के हर मंदिर की हर मुख्य प्रतिमा में हीरे जड़े हुए हैं। प्राणनाथ जी के मंदिर में प्रतिमा नहीं है। वहां एक विशाल परिसर में दो मंदिर हैं। एक मंदिर जिसमें भगवान कृष्ण की मुरली रखी हुई है और दूसरा जिसमें प्रणामी संप्रदाय का पवित्र ग्रंथ "कुलजमस्वरूप" रखा है। वहां मंदिर प्रांगण में एक बहुत ऊंचा ध्वज स्तंभ भी है। प्राणनाथ जी का मंदिर हमारे घर से और भी अधिक दूर था। आज के फैलते हुए शहरों के हिसाब से देखा जाए तो यह दूरी किसी एक सेक्टर से दूसरे सेक्टर की कही जा सकती है लेकिन उस समय उस छोटे से शहर के लिए यह दूरी शहर के एक छोर से दूसरे छोर की थी। प्राणनाथ जी का मंदिर जिस स्थान पर स्थित है उसके चारों ओर प्रणामी संप्रदाय को मानने वालों के निवास है। प्रणामी संप्रदाय के इस मंदिर को प्राणनाथ जी का पुण्य धाम कहा जाता है इसीलिए वह मोहल्ला धाम मोहल्ला कहलाता है। वहां संकरी गलियां हैं, पत्थर की फर्शियों से ढंकी हुई। विधिवत नालियों की व्यवस्था युक्त। कम से कम उस समय तो यही स्थिति थी। उन दिनों उस क्षेत्र में स्वच्छता का भी पूरा ध्यान रखा जाता था। जिस दिन हमें प्राणनाथ जी के मंदिर जाना होता था वह दिन हम लोगों के लिए एक पिकनिक जैसा दिन होता था।
        प्रणामी संप्रदाय से जुड़ी एक और विशेषता जिसने बचपन से ही मेरे दिलो-दिमाग पर अपनी छाप छोड़ी वह थी शरद पूर्णिमा पर आयोजित होने वाले 'महारास' की छवि। इस महारास में गुजरात, नेपाल आदि दूर-दूर से श्रद्धालु आते थे। पूरा शहर एक मेला ग्राउंड में तब्दील हो जाता था। एक-दो बार तो ऐसा भी हुआ कि श्रद्धालुओं की संख्या अधिक होने पर उनके ठहरने की व्यवस्था उस स्कूल भवन में की गई जो हमारे हिरणबाग कॉलोनी के परिसर में बना हुआ था। तब मुझे गुजरात से आए हुए संभवत वे कच्छ के निवासी थे, उनकी वेशभूषा और उनके आभूषणों को देखने का अवसर मिला। जो कि मेरे लिए बिल्कुल नई वस्तुएं थीं। प्राणनाथ मंदिर परिसर में शरद पूर्णिमा की रात्रि को सभी श्रद्धालु एकत्र होते और डांडिया रास खेलते थे। वह अद्भुत दृश्य होता था। यह परंपरा आज भी क़ायम है किंतु बाल्यावस्था में वह सब कुछ बहुत कौतूहलमय था।
       प्रणामी संप्रदाय में पूजा के समय घुटने टेक कर, भूमि पर माथा रखकर भूमि को चूमा जाता है। मुझे यह क्रिया बहुत अनोखी और अच्छी लगी थी। मुझे याद है कि एक बार जब मैं प्राणनाथ जी के मंदिर से लौट कर घर आई और मां शाम की पूजन आरती की। उसके बाद हम सब लोगों को भगवान की अलमारी के सामने माथा टेकना था, तब मैंने प्रणामी पद्धति से घुटने टेककर जमीन पर माथा रखते हुए जमीन को चूमा। तब मां ने मुझे समझाया कि यह प्रणामी परंपरा है, हमारे परिवार की परंपरा नहीं है। मुझे अच्छी तरह से याद है कि यह समझाते हुए उन्होंने "धर्म" शब्द का प्रयोग नहीं किया था। उन्होंने यह नहीं कहा था कि यह प्रणामी धर्म में होता है हिंदू धर्म में नहीं। ऐसे शब्दों का प्रयोग न करने के पीछे निश्चित रूप से उनका उद्देश्य यही था कि मेरे बाल मन में धार्मिक भिन्नता की भावना किसी भी तरह मन में न आने पाए।
        प्राणनाथ जी के दोनों मंदिरों में से एक में महामती प्राणनाथ जी का समाधि स्थल भी है। इसलिए उन दिनों गैरप्रणामियों में वहां का प्रसाद खाने का चलन नहीं था। लेकिन इससे उन मंदिरों के प्रति आमजन में श्रद्धा की कोई कमी नहीं थी। हर धर्म, हर संप्रदाय का व्यक्ति प्राणनाथ जी के मंदिर में भी जाया करता था। वहां की आरती बड़ी ही मनोरम होती थी।
        पन्ना में बल्देव जी का मंदिर, जुगल किशोर जी का मंदिर, राम मंदिर आदि विशालकाय मंदिर हैं जिन्हें बचपन से ही  देखने के बाद अब किसी भी मंदिर की विशालता प्रभावित नहीं करती है। उन भव्य मंदिरों की मेरे मन मस्तिष्क पर बहुत गहरी छाप है।
        सुबह और शाम नियत समय पर मंदिरों में घंटे बजाए जाते थे। जो इस बात की सूचना होते थे कि अब आरती का समय हो गया है। निश्चित रूप से यह चलन उस समय आरंभ हुआ होगा जब लोगों के पास घड़ियां नहीं होती थीं। अतः समय की सूचना देने के लिए घंटों का प्रयोग किया जाता था। मंदिरों के साथ ही नगर कोतवाली में भी घंटे बजाए जाते थे। लेकिन यह घंटे किसी आरती की समय सूचना के लिए नहीं बल्कि समय बताने के लिए ही होते थे। यानी हर घंटे घड़ी के अनुसार घंटे बजाए जाते थे। जैसे 1:00 बजे एक घंटा बजता था, 2:00 बजे 2 घंटे, 3:00 बजे 3 घंटे और इसी क्रम में 12:00 12 घंटे बजते थे। चूंकि कोतवाली  हमारे घर से बहुत नज़दीक थी इसलिए उसके घंटे हमेशा सुनाई देते रहे। जब शहर में भीड़ बढ़ने लगी, गाड़ियों की अधिकता हो गई और कोलाहल बढ़ गया तो मंदिरों के घंटों की ध्वनियां उस कोलाहल में विलीन-सी हो गईं। जब मैं कॉलेज में पढ़ती थी, तब मैं और वर्षा दीदी हम दोनों रात को जाग कर पढ़ाई किया करते थे। ज़ाहिर है कि मैं कम देर जागती थी और दीदी देर तक जागा करती थीं। लेकिन जब तक मैं जागती थी तब तक मुझे कोतवाली में बजने वाले घंटे सुनाई देते थे। लेकिन मंदिरों के घंटों की ध्वनि जो 'गजर' कहलाती थी, वह हमारे घर तक आना बंद हो चुकी थी। हमें सिर्फ कोतवाली की गजर ही सुनाई देती थी। दिन को भी और रात को भी। बिना नागा हर घंटे। घड़ी देखने की आवश्यकता नहीं थी यदि उस गजर की आवाज़ पर ध्यान रखा जाता।
      उन घंटो की ध्वनि को गजर क्यों कहते थे यह मुझे समझ में नहीं आता था किंतु आज गजर की याद आने पर वह पुराना गाना कौंध जाता है जो 1950 में बनी फिल्म "बाजी" में फिल्माया गया था। इस फिल्म को दूरदर्शन में देखने का मुझे अवसर मिला था, संभवतः 1987 में। गाने के बोल इस प्रकार थे -
    सुनो गज़र क्या गाए
    समय गुजरता जाए
    ओ रे जीने वाले, ओ रे भोले भाले
    सोना न, खोना न ...

    बहुत सी व्यवस्थाएं समय के साथ बदल जाती हैं। शहरों के परिदृश्य बदल जाते हैं। वातावरण बदल जाता है। किंतु स्मृतियां अतीत को सहेजे रखती हैं। मेरी स्मृतियों में भी मेरे बचपन का शहर यथावत मौजूद है। एक भोला भाला, प्यारा-सा शहर, जिसमें विशालकाय मंदिरों के घंटों के स्वर और कोतवाली के गज़र की ध्वनियां अभी भी गूंज रही हैं।             
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