Sunday, August 21, 2022

Article | What is a real threat, Asteroids or Climate Change? | Dr (Ms) Sharad Singh | Central Chronicle

Article | What is a real threat, Asteroids or Climate Change? | Dr (Ms) Sharad Singh | Central Chronicle 
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Article
What is a real threat, Asteroids or Climate Change?

-    Dr (Ms) Sharad Singh*l
Writer, Author & Social Activist
Blogger - "Climate Diary Of Dr (Ms) Sharad Singh"

   China has taken a big step to protect the earth. Although the pain of the corona virus pandemic which originated from Wuhan, has not yet been erased from the heart of the world. Yet China's move to save the earth from asteroids can be appreciated. But the matter of thinking is that who is big threat for our earth in an asteroid and climate change? China and other nations also trying to slow down the pace of climate change but us? And how far have our efforts reached?
Our Earth is always at risk from asteroids. Yes, on 18 August 2022, the Earth narrowly survived the collision of an asteroid. A 190 feet wide asteroid named Asteroid 2022 PC, nearly the size of a Boeing 747 airplane, just missed Earth in 18 August 2022 at around 05:37AM, according to NASA. It passed by Earth at a safe distance. This asteroid was missed by the space and sky monitoring agencies and was just recently discovered on August 1. Asteroid 2022 PC is different from previous asteroids that have flown past Earth recently as it does not belong to the Apollo group of asteroids but the Aten group. The asteroid orbits around the Sun, taking almost 295 days to complete 1 orbit. 
Asteroids are small, rocky objects that orbit the Sun. Although asteroids orbit the Sun like planets, they are much smaller than planets. There are lots of asteroids in our solar system. In 1801, while making a star map, Giuseppe Piazzi accidentally discovered a small object 1000 kilometers (600 miles) in diameter between the orbits of Mars and Jupiter. Piazzi named the object Ceres. It was the first asteroid to be discovered. But for the word "asteroid" credit goes to scientist Herschel. This word derived from a Greek word meaning "star like". Herschel introduced the term at a meeting of London's Royal Society in May 1802 and later published it in the Society's Philosophical Transactions. Asteroids probably consist of clay and silicate rocks, and are dark in appearance. They are among the most ancient objects in the solar system. The S-types ("stony") are made up of silicate materials and nickel-iron. The M-types are metallic (nickel-iron). The fact is that every asteroid has not harmful for earth. Every year, the earth is hit by about 6100 meteors large enough to reach the ground, or about 17 every day, research has revealed. While it is believed that our solar system is very big compared to the size of the Earth, which means that the chance that the Earth will be hit by another solar system object such as an asteroid is very small. Once in awhile, it happens. In another theory an asteroid comet caused the Triassic–Jurassic extinction, similar to the extraterrestrial object which was the main factor in the Cretaceous–Paleogene extinction about 66 million years ago. It means that about 66 million years ago, a "planet killer" - a 10-kilometer-wide asteroid - hit Earth. The Chicxulub impact caused a mass extinction on a planetary scale, killing off an estimated 76 percent of all species living on Earth at the time, including the dinosaurs.
Chinese researchers are working on a new method to detect and track asteroids, which will also determine if any giant piece of space rock poses any danger to Earth. The method involves building an array of more than 20 large antennas to bounce signals off asteroids to determine if they could possibly impact our planet. The project is named China Fuyan ("compound eye" in English) and is led by Beijing Institute of Technology, according to the Chinese ministry. The asteroids chosen for signal bouncing will be present within 93 million miles (150 million kilometers) of Earth (about as distant as the Sun), it further said. Asteroids are harmless space rocks that give us something to stare at when they pass by Earth. However, if they slightly deviate from their angle while approaching Earth, it could often mean deadly for us. After all, a large asteroid had done that almost 65 million years ago to wipe dinosaurs out of this planet. But what if humanity has to face such an extinction event in the future? Chinese scientists have proposed a way to use the Moon to protect us from these deadly space rocks. 
Surely this is an important work towards saving the earth. But the earth is threatened not only from outside but also from inner side. And this threat is climate change. The only difference between the collision of a large asteroid and the devastation caused by climate change is to shoot dead someone or kill someone with slow poison. Death is in both. We are giving slow poison to the entire climate by harming our environment. Many countries, including China, are seriously working to reduce the pace of climate change. It's sad that we do less work and show off more. Every season of rain reveals the reality of our efforts. Till now we have neither been able to manage dirty water nor clean water. We have not been able to pay attention to our habits which harm the environment. Have we completely stopped using non-standard polythene bags? No! Have we stopped growing fruits and vegetables by putting chemical medicines? No! Have we stopped the cutting of trees? No! With so much negativity, how can we say we are aware of climate change? In fact, climate change is a bigger threat to us than asteroids and we have to take responsibility for serious efforts to slowdown it.

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 (21.08.2022)
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संस्मरण | मैचमेकिंग का असफल प्रयास | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नवभारत

संस्मरण 
मैचमेकिंग का असफल प्रयास
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

    जब मैं पन्ना में स्कूल में पढ़ती थी तब मेरी सहपाठियों में सभी उत्तर भारतीय छात्र-छात्राएं थीं। फिर जब मैं अपने मामा जी के पास बिजुरी पढ़ने के लिए गई तो वहां पहली बार मुझे एक ऐसी सहेली मिली जो दक्षिण भारतीय थी। वह आयु में मेरे बराबर थी लेकिन उसकी शिक्षा में बीच में व्यवधान आ जाने के कारण मुझसे छोटी कक्षा में थी। यानी मैं 11वीं कक्षा में थी तो वह नवी कक्षा में पढ़ रही थी। लेकिन हम दोनों के बीच बहुत जल्दी घनिष्ट मित्रता हो गई। उसका नाम था सरोजिनी। उसका वास्तविक नाम लेने में मुझे कोई संकोच नहीं है क्योंकि मैं जानती हूं कि यदि उसे यह पता चले कि मैंने कहीं उसका उल्लेख किया है तो उसे कभी बुरा नहीं मानेगी। सरोजिनी के मामा जी पहले आर्मी में थे शार्ट सर्विस कमीशन में थे । फिर वहां से सेवानिवृत्त होकर रेलवे में काम करने लगे। किंतु किसी कारण से उन्हें रेलवे की नौकरी छोड़नी पड़ी और वह बिजुरी में आकर बस गए उनके साथ उनकी पत्नी और  दो बेटियां तथा एक बेटा था। सरोजिनी की मां का उसके पिता से  अलगाव हो चुका था। तभी से सरोजनी की मां अपने भाई के साथ रह रही थीं। इस तरह सरोजिनी भी अपने मामा जी के साथ रहती थी और मैं भी अपने मामा जी के पास रहती थी। बस अंतर यही था कि उसकी मां उसके साथ थीं, जबकि मेरी मां और मेरी दीदी मुझसे दूर थीं।
       यूं तो सरोजिनी सांवले रंगत की थी लेकिन उस के नाकनक्श गजब के सुंदर थे। वह देखने में किसी दक्षिण भारतीय सिने अभिनेत्री से कम दिखाई नहीं देती थी। जब वह अपने दक्षिण भारतीय शैली में लहंगा, ब्लाउज़, दुपट्टा पहनती और उस पर अपने घने लंबे काले बालों में सफेद मोंगरे  की वेणी लगाती, तो ऐसा लगता जैसे रेखा या वैजयंती माला साक्षात सामने आ गई हो। बेहद हंसमुख थी वह। किसी भी समस्या को बहुत गंभीरता से नहीं लेती थी। जबकि उसका जीवन आसान नहीं था। मैं जब भी मां और दीदी की याद में उदास होने लगती तो वह जबरदस्ती पकड़कर मुझे अपने घर ले जाती और अपनी मां के सामने खड़ा करके कहती, "लो, ये हैं मां। अब इनकी गोद में सिर रखकर रो लो, जितना रोना है।" उसकी बात सुनकर, मुझे झेंप भी लगती और हंसी भी आ जाती। 
       मैं शुरू में उसे मद्रासी मानती थी। क्योंकि उन दिनों दक्षिण भारतीय लोगों के लिए या तो "साउथ इंडियन" या फिर "मद्रासी" शब्द का प्रयोग किया जाता था। चाहे वह तमिलनाडु का हो, केरल का हो या कर्नाटक का, इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता था। उत्तर भारतीयों की दृष्टि में सब के सब मद्रासी थे। यह धारणा क्यों चली यह तो मुझे नहीं मालूम लेकिन मैं भी शुरू में सरोजिनी को मद्रासी ही समझती थी। 
     वहां मेरे साथ एक सिंधी लड़की भी पढ़ती थी। बहुत ही अलग थी और मासूम सी। उसका घरेलू नाम मोना था और हम लोग भी उसे मोना के नाम से ही पुकारते थे। उसका बहुत बड़ा परिवार था। जहां तक मुझे याद है, उसके नौ भाई-बहन थे। इसलिए वह परिवार में उतना प्रेम नहीं पा सकी थी जितना प्रेम उसे हम दोनों से मिलता था। वह भी हम लोगों की सहेली बन गई थी। यद्यपि वह इतनी घनिष्ट सहेली नहीं थी जितनी कि मैं और सरोजनी। हम दोनों बहनों की तरह थे। सरोजिनी को मोना के कारण कई बार अपने घर में डांट खानी पड़ती थी। मोना मैं बहुत चंचलता थी। वह सोचती कम थी और करती ज़्यादा थी। इसीलिए सरोजिनी के घर में धूप में रखे गए अचार के मर्तबान को छू देने पर न केवल उसको डांट पड़ती बल्कि सरोजनी को भी डांट खानी पड़ती।  सरोजिनी ने मोना के संदर्भ में ही मुझे बताया था  कि हम लोग तमिल हैं और हमारे यहां खानपान की शुद्धता और पूजा-पाठ का विशेष ध्यान रखा जाता है। हम तीनों सहेलियों में सरोजिनी को उन बातों का ज्ञान अधिक था जो लड़कियों को होना चाहिए। लेकिन मित्रता के बावजूद वह कभी भी किसी विषय पर सीमा का उल्लंघन नहीं करती थी। हंसी-मज़ाक में भी हम लोग शालीनता का पालन करते थे।
     सरोजिनी के परिवार की माली हालत अच्छी नहीं थी। उसके मामा को जितनी पेंशन मिलती थी, उससे उनके परिवार का गुज़ारा नहीं हो पाता था। मामी तनिक तेज स्वभाव की थीं। इसलिए जब-तब सरोजिनी की मां को उलाहना भी देती रहती थीं। यद्यपि कोई बड़ा मनमुटाव उनके बीच नहीं था। सरोजिनी की मां और मामा अतिरिक्त कमाई के लिए कपड़ा सिलने का काम करते थे। तुरपाई करना, बटन टांकना जैसे छोटे-मोटे काम सरोजिनी भी करती थी। उसके इस कामों ने मुझे बहुत प्रभावित किया था और मैंने सिलाई की पैर मशीन चलाना उसी से सीखा था। 
       सरोजिनी के मामा और मेरे मामा जी के बीच मित्रता थी इसीलिए हम लोगों का एक दूसरे के घर आना-जाना होता रहता था। एक दिन सरोजिनी ने बताया कि उस की शादी के लिए उसके मामा लड़का ढूंढ रहे हैं। मुझे यह सुनकर बड़ा अजीब लगा। वह मेरे ही उम्र की थी और शादी की कल्पना तो मेरे मस्तिष्क से भी कोसों दूर थी। मैंने यह बात अपने मामा जी को बताई। तब मेरे मामा जी ने सरोजिनी के मामा को समझाया कि कम से कम 11वीं क्लास तक तो सरोजिनी को पढ़ लेने दो, उसके बाद उसके विवाह के बारे में सोचना। तात्कालिक रूप से सरोजनी के मामा मान गए और मेरे वहां रहते तक फिर कभी सरोजिनी के विवाह की चर्चा नहीं हुई।
      11 वीं बोर्ड परीक्षा देने के बाद मैं वापस मां के पास पन्ना आ गई। वहां मैंने छत्रसाल स्नातकोत्तर महाविद्यालय में आर्ट फैकल्टी में दाखिला लिया। पन्ना आने के बाद मुझे बिजुरी की बहुत याद आती थी। मैंने वहां पढ़ाई के साथ और भी बहुत कुछ सीखा और जाना था। विशेष रुप से मुझे सरोजिनी की याद आती थी। उन दिनों फोन सुविधा इतनी आसान नहीं थी कि मैं सरोजिनी से बात कर पाती। हम लोग एक-दूसरे को अंतर्देशीय पत्र लिखते थे, जिन्हें आने-जाने में ही काफी समय लग जाता था। मैंने मां से कहा कि मैं एक बार बिजुरी घूमने जाना चाहती हूं ताकि सरोजिनी से मिल सकूं। मां ने सहर्ष स्वीकृति दे दी और तय हुआ कि फर्स्ट ईयर की परीक्षा देने के बाद मैं  बिजुरी जाऊंगी। 
       फर्स्ट ईयर में मेरा एक लड़के से परिचय हुआ। वह भी दक्षिण भारतीय था। यद्यपि वह मुझसे सीनियर था। मैं फर्स्ट ईयर में थी, तो वह थर्ड ईयर में था। मैं खिलंदड़ी स्वभाव की थी इसलिए उसकी मंशा भांप नहीं सकी। वह तो मुझे तब आश्चर्य हुआ जब उसने प्रेम-पत्र लिखकर एक किताब में रख कर मुझे पकड़ा दिया। खै़र इसकी चर्चा में बाद में अलग से करूंगी क्योंकि यह भी एक दिलचस्प घटना है। इस घटना से पूर्व मैंने उसे बताया कि मैं बिजुरी जाने वाली हूं। उसके भी कोई रिश्तेदार रेलवे में पोस्टेड थे और चिरमिरी में रहते थे। उसने मुझसे कहा कि मैं बिजुरी में मिलने आऊंगा। मैंने भी सहज भाव से कह दिया कि आ जाना। जब मैं बिजुरी पहुंची तो सरोजनी से मिलने के बाद मेरे दिमाग में यह बात कौंधी कि सरोजिनी और उस लड़के में दोस्ती हो जाए तो कितना अच्छा है। दोनों दक्षिण भारतीय हैं। यदि एक-दूसरे को पसंद कर लेंगे तो बहुत अच्छा रहेगा। यूं भी सरोजनी के मामा जी उसकी शादी के लिए एक बार फिर सक्रिय हो उठे थे। मैंने पहले सरोजिनी को कुछ नहीं बताया, लेकिन जब वह लड़का आया तो मैंने सरोजिनी के हाथों  उसके पास चाय भिजवाई और मैंने सरोजनी से कहा कि तुम दोनों तो दक्षिण भारतीय हो, अपनी भाषा में एक दूसरे से खूब सारी बातें करना, तब तक मैं नाश्ता बनाती हूं। लेकिन 5 मिनट में ही सरोजिनी वापस आ गई और बोली तुम जाकर बातें करो नाश्ता में बना देती हूं। मैंने पूछा क्या हुआ? तुम दोनों अपनी भाषा में बात क्यों नहीं कर रहे हो? तो वह हंसने लगी और बोली कि हम दोनों की भाषा एक नहीं है। मैं तमिल हूं और वह कन्नड़ है। अब यह सोचने की बात थी कि मैं कितनी बड़ी बेवकूफ थी कि फर्स्ट ईयर की परीक्षा दे चुकी थी लेकिन फिर भी मुझे इस बात का अहसास नहीं था कि तमिल और कन्नड़ अलग-अलग होते हैं या दक्षिण भारत में जो भाषाएं बोली जाती हैं वे सभी परस्पर एक-दूसरे से बहुत भिन्न हैं। सरोजिनी इस मामले में बहुत चतुर थी। वह भांप गई कि मैं उस लड़के से क्यों बात करवाना चाह रही थी। उसने मुझसे कहा कि उसके मामा कभी किसी कन्नड़ लड़के से मेरा विवाह करना स्वीकार नहीं करेंगे इसलिए इस बारे में कोई चर्चा मत करना। यानी कुल मिलाकर मैचमेकिंग का मेरा पहला और अंतिम प्रयास ही ध्वस्त हो गया। इसके बाद मैंने तौबा कर ली कि मैं ऐसी बेवकूफ़ी फिर कभी नहीं करूंगी। यद्यपि इससे यह जरूर लाभ हुआ कि मुझे दक्षिण भारत की संस्कृति और भाषा की विविधता के बारे में "प्रैक्टिकल तौर पर" पता चला जिसे बाद में किताबों में पढ़ कर मैंने और गहराई से जाना। तब मुझे यह महसूस हुआ कि हम दक्षिण भारतीयों को सिर्फ "मद्रासी" का संबोधन देकर कितना कम आंकते हैं। दक्षिण भारत में भी सांस्कृतिक विविधता और भाषाई विविधता पाई जाती है जो वहां की सांस्कृतिक समृद्धि की द्योतक है। वस्तुतः इस मैचमेकिंग प्रकरण ने मेरे ज्ञान चक्षु खोल दिए थे।        
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नवभारत | 21.08. 2022 
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Friday, August 19, 2022

बतकाव बिन्ना की | भैयाजी को नओ गठबंधन | डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम | साप्ताहिक प्रवीण प्रभात


 "भैयाजी को नओ गठबंधन"  मित्रो, ये है मेरा बुंदेली कॉलम-लेख "बतकाव बिन्ना की" साप्ताहिक #प्रवीणप्रभात (छतरपुर) में।
🌷हार्दिक धन्यवाद "प्रवीण प्रभात" 🙏
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बतकाव बिन्ना की          
भैयाजी को नओ गठबंधन                             
- डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
     ‘‘काए भैयाजी! का हो गओ? जो आपको मों चोखरवा सो काए दिखा रओ?’’ भैयाजी खों मों देख के ऐसो लग रओ हतो मनो बे कोनऊ बड़ी मुसीबत में आएं। भैयाजी ने मोरी बात खों कछु जवाब नई दओ।
‘‘का हो गओ?’’
‘‘का कहौं बिन्ना, मों से बोल नई फूट रए।’’ भैयाजी बोले, ‘‘काल संझा से कछु खाबे को नई मिलो। पेट में हरूड़ी सी पड़ रई।’’ भैयाजी मरी-डरी आवाज में बोले।
‘‘ऐं? काए? तबीयत सो ठीक आए?’’ मैंने पूछी।
‘‘हऔ! तबीयत को का होने? बा सो ठीक आए।’’ भैयाजी ने कही।
‘‘सो, कहूं भौजी की तबीयत तो नईं बिगर गई?’’ अब मोए औरई चिंता भई।
‘‘अरे, नईं! उनको का होने! बे सो ऊंसई टन्न-मन्न धरीं।’’ भैयाजी तनक चिढ़त भए बोले। सो, मोए समझ में आ गई के कछु ने कछु भैयाजी औ भौजी में रार भई आए।
‘‘सो, लड़ आए हमाई भौजी से!’’ मोरे मों से निकरई गओ।
‘‘पैलऊं कछु खाबे खों लाओ, फेर पूछियो!’’ भैयाजी बिनती करत सी बोले।
‘‘अरे, लेओ, अभई ला रई!’’ मैंने कही औ भीतरे किचन में गई। भैयाजी के लाने थाली परस लाई। बाकी थाली परसबे खों मतलब जो नोई के ऊमें पूरो भोजन होय। मैंने अपने दोई टेम के लाने सब्जी औ दाल डार के दलिया पकाई रही, सो बोई ले आई। हंा, बाकी छतरपुर वारी भौजी ने जो अचार औ पापड़ भेजे रए, ऊंमें से आम को अचार रख दओ औ पापड़ तल दए।
भैयाजी ने जी भर के खाओ। फेर हाथ धोत भए बोले,‘‘जी जुड़ा गओ बिन्ना! तुमें का बताएं के हमें काल से खाबे के लाने कछु नई मिलो। ने तो काल ब्यारी परसी गई औ ने आज कलेवा मिलो। सच्ची, ऐसी जल्लाद लुगाई कोनऊं खों न मिले।’’ भैयाजी भौजी खों कोसत भए बोले।
‘‘हमाई भौजी खों ने कोसो, भैयाजी! आपई ने कछू ऐसो करम करो हुइए के उन्ने आपको हुक्का-पानी बंद कर दओ।’’ मैंने भौजी को पक्ष लओ।
‘‘अब तुम ने गुस्सा करो! एक तो तुमाई भौजी ने भूको मार डारो, अब तुम गुस्सा हो जे हो सो हम सो भूक से बिलकुलई टें बोल जेहें।’’ भैयाजी ऐसे बोले के मोए हंसी फूट परी।
‘‘चलो बोलो, का भओ?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘अरे कछु नईं, बात तनक सी हती, हाथी की पूंछ घांई। मनो तुमाई भौजी ने ऊको पूरो हाथी बना दओ।’’ भैयाजी बोले।
‘‘का मतलब?’’
‘‘मतलब जे के आजकाल तुम सोई देख रईं के इते से उते होबे खों सीजन आ गओ आए। बिहार में नई देखी का, के कैसे सबरे नाए से मांए हो गए औ इके पैलऊं महाराष्ट्र में अपन ओंरें देखई चुके।’’
‘‘सो?’’ मैंने पूछी।
‘‘सो, जे के नऔ-नऔ गठबंधन होत में भौतई लाभ रैत आए। बे अपने नितीश कुमार भैया खों देखो कैसे फेर के मुख्यमंत्री बन गए। औ उत्तई नईं, उनके सेवक हरों को सोई मलाई छानबे खों मिल गई।’’
‘‘जे तो आप राजनीति को हाल सुनान लगे। ई सब से हमाई भौजी को का?’’
‘‘गम्म खाओ बिन्ना, बेई पे आ रए। भओ का, के काल संझा खों तुमाई भौजी गैसचूला पे भरता के लाने भंटा भूंज रई हतीं, तभई हमने उनसे कही के हम सोच रए के हम सोई नओ गठबंधन कर लें। बस, इत्तो सुनो के बे सो बमक परीं। कैन लगीं के तुमाई टांगे ने तोड़ देबी, कर के दिखाओ नओ गठबंधन! हमने कही के अरी मोरी दुलैया, तनक समझो तो के हम का कै रए? कभऊं सो हमाई पूरी बात सुन लेओ करे।’’
‘‘फेर?’’
‘‘फेर का, बे काए खों सुनबे वारीं! उन्ने भंटा पटको उतई जमीन पे औ अपने पैरन से कुचर-कुचर के सत्यानास कर दओ ऊको! हमने कही के जे का कर रईं? जे भंटा खों काए कुचर रईं? सो बोलीं के अबे सो हम तुमें सोई ऐसई कुचरबी! तुम दूसरो गठबंधन कर के सो दिखाओ! इत्तई पे बे ने रुकीं औ कैन लगीं के हम सो जानत हते के तुमाओ कहूं और नैन-मटक्का चल रओ। तभई तो बिन्ना सोई कै रई हती के आजकाल भैयाजी कम दिखात आएं। अब भैयाजी खों नैन-मटक्का से फुरसत मिले सो कहूं दिखाएं।’’ भैयाजी बतात जा रए हते।
‘‘हऔ परों के रोज हमने भौजी से कही सो रई। काए से के आप दो-तीन दिनां से दिखे नईं रए।’’ मैंने भैयाजी खों बताओ।
‘‘बड़ो अच्छो करो!’’ भैयाजी खिसियात भए बोले।
‘‘बाकी आगे बोलो के फेर का भओ!’’ मैंने तुरतईं पूछी।
‘‘होने का हतो? तुमाई भौजी कभऊं हमाई पूरी बात सुनतई नइयां! उन्ने समझी के हम उनके रैत भए कोनऊं और लुगाई से गठबंधन करबे जा रए, औ बे सो ठठिया पटकन लगीं। हम कछु बोलबे की कोसिस करें के उन्ने स्टील को गिलास हमाए मूंड पे दे मारो। बा तो हम ऐन मौका पे एक ओरे झुक गए ने तो अबे हम अस्पताल के पलकां पे डरे होते औ उतई हमें देखबे के लाने तुमे आनो परतो।’’
‘‘सो उनको गुस्सा ठंडो भओ के नईं?’’ मैंने पूछी।
‘‘काए को ठंडो होने? उन्ने ने तो ब्यारी बनाई औ ने हमें कराई। हमें सो भूके सोने परो। भुनसारे हमें आस हती के रात भरे में उनको गुस्सा ठंडो हो गओ हुइए औ कछु कलेवा मिल जेहे। पर काए को, बे सो फनफनात भई ठाड़ी हतीं। हमने पूछी के काए कलेवा बना लओ? रात से कछु नईं खाव आए, भूक के मारे पेट में हरूड़ी सी पड़ रई। सो बे चिंचियात भई बोलीं के अब अपनी नई वारी से कहियो, बेई तुमें कलेवा कराहें। मनो तुम ले के सो आओ, दोई खों सिल-बट्टा पे ने पीस दओ सो हमाओ नांव बदल दइयो।’’
‘‘माने मामलो गंभीर कहानो!’’
‘‘भौतई गंभीर, बिन्ना! अरे, हम कै रए हते के अभई के चुनाव में अपने इते को निर्दलीय उम्मीदवार जीतो रहो। अबे लो ऊने कोनऊं पार्टी ने पकरी, सो हम काए अपनो टेम खराब करें? हमें सो कोनऊ नोनी सी पार्टी पकर लेओ चाइए। ऊंसई ई पार्टी से ऊ पार्टी आबे-जाबे खों सीजन चल रओ। नओ गठबंधन करबे से हमाओ सोई कछु भलो हो जेहे। कछु नईं सो रुतबा ई बढ़ जेहे।’’ भैयाजी बोले।
‘‘सो जे सब चर्चा भौजी से काए करी? औ जो करनी हती तो सो पैलऊं अपने नितीश कुमार भैया की बात करते, फेर अपनी पे आते। आप सीधे गठबंधन पे कूंद परे, सो जे तो होनई तो।’’ मैंने भैयाजी से कही।
‘‘हऔ बिन्ना! बात सो तुम सांची कै रईं। हमें सोई जे रिलाईज भओ के हमने गलती कर दई आए। बाकी एक बात सो है के जो तुमाई भौजी जैसीं कोनऊं पार्टी में होंए सो ऊ पार्टी से कोनऊं नाएं से माएं नईं हो सकत। काए से के तुमाई भौजी के आगूं चाए एकनाथ शिंदे होंए, के नितीश कुमार होंए, कोनऊं कछु ने कर पाते। इते तो तुमाई भौजी ने कछु ठीक से सुनोई नईयां औ घरे संसद घांई दोंदरा मचा दओ। बाकी संसद में दोंदरा देन वारे खुदई बाहरे भगत आएं औ इते हमें भगा दओ जात आए।’’ भैयाजी अपनी दुर्दसा बतात भए बोले।
‘‘मनो, अब सो आप जाओ औ भौजी खों मनाओ। कहूं उन्ने अपनो नओ गठबंधन करबे की ठान लई सो आप धरे के धरे रै जेहो।’’ मैंने हंसत भई कही।       
‘‘हंस लेओ, हंस लेओ!’’ कैत भए भैयाजी निकर परे।
बाकी मोए सोई बतकाव करनी हती सो कर लई। अब चाए कोनऊं नांए से माएं होय, चाए मांए से नांए होय, मोए का? अपन ओरन खों ससुरी मैंगाई डायन से छुटकारा सो मिलने नइयां। बाकी, बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की। सो, सबई जनन खों शरद बिन्ना की राम-राम!
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(18.08.2022)
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#Bundelkhand #Binna #Bhaiyaji #batkav #बुंदेलीव्यंग्य

Thursday, August 18, 2022

समसामयिक लेख | बधाई ! बच्चे रातोंरात बड़े हो गए | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | युवा प्रवर्तक

मित्रो,  दूध की कीमतें लगातार बढ़ने और रेल में 1 साल से अधिक आयु वाले बच्चे की टिकट लगने की न्यूज़ वायरल होने के डायरेक्ट इफेक्ट को आप अनुभव करें मेरे इस लेख में जिसे प्रकाशित किया है वेब मैगजीन "युवा प्रवर्तक" ने....
https://yuvapravartak.com/68277/
हार्दिक धन्यवाद #युवाप्रवर्तक 🙏

आप युवा प्रवर्तक की साइट पर जाकर इसे पढ़ सकते हैं। वैसे मित्रो आपके लिए यहां भी अपने लेख का टेक्स्ट साझा कर रही हूं...👇
समसामयिक लेख
बधाई ! बच्चे रातोंरात बड़े हो गए
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
     यदि मैं कहूं कि इन दिनों बच्चे रातोंरात बड़े हो रहे हैं, तो लोग समर्थन में मुंडी  हिलाएंगे और कहेंगे, "बिलकुल यह सब इंटरनेट की कृपा है।" लेकिन मैं अगर यह कहूं की बच्चे रातों-रात बड़े हो गए, तो लोग चौंकेंगे और यही कहेंगे कि 'यह कैसे संभव है? इंटरनेट से भी प्रभावित होकर बड़े होने की प्रक्रिया में समय लगता है, आप लगता है पगला गई हैं।"
      क़ायदे से तो मुझे पगला ही जाना चाहिए, बल्कि सबको पगला जाना चाहिए, यह सब देखकर लेकिन अफ़सोस  है कि अकल अभी भी साथ दे रही है और महसूस कर रही है कि रातोंरात बच्चों को कैसे बड़ा किया जा रहा है। जो विज्ञान से भी फिलहाल संभव नहीं है वह सरकारी व्यवस्थाओं के चलते संभव हो रहा है। बेशक़, सरकारी व्यवस्था चाहे तो उसके पास ऐसी जादू की छड़ी है कि वह रातों-रात बच्चों को बड़ा कर सकती है। सरकार अर्थात शासन व्यवस्था। किसी एक राज्य की सरकार नहीं, अकेली केंद्र सरकार नहीं, बल्कि कई राज्यों की सरकारें और केंद्र सरकार सब मिलकर इस जुगत में लगे हुए हैं कि एक रात में बच्चों को कैसे बड़ा कर दिया जाए और उन्होंने यह कर दिखाया है। मेरी बात पर विश्वास न हो रहा हो तो ठोस आंकड़े देखे जा सकते हैं।
       एक छोटे बच्चे को कितने वर्ष की आयु तक दूध पीना आवश्यक रहता है। इस प्रश्न का उत्तर हर माता-पिता बड़ी आसानी से दे सकता है। विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य संगठन कहता है कि  6 माह तक ही शिशु को मां का दूध पिलाना चाहिए और इसके बाद दो साल की उम्र तक उसे धीरे-धीरे ठोस आहार देना शुरू करना चाहिए जिसमें बाहरी दूध (गाय, भैंस, बकरी इदि का) भी शामिल है। कुछ शिशु विशेषज्ञ मानते हैं कि शिशु के एक साल के होने के बाद ही उसे गाय का दूध पिलाना चाहिए। दरअसल, दूध को संपूर्ण आहार कहा जाता है, क्योंकि इसमें लगभग वे सभी पोषक तत्व पाए जाते हैं जो शारीरिक विकास के लिए बेहद जरूरी होते हैं। यही कारण है कि छोटे बच्चों के लिए दूध बेहद जरूरी होता है। छोटे बच्चों का शरीर विकसित हो रहा होता है, जिसके लिए उन्हें पर्याप्त मात्रा में पोषक तत्वों की आवश्यकता पड़ती है। जिन बच्चों को पर्याप्त पोषण नहीं मिल पाता है, तो उनकि सामान्य शारीरिक विकास रुक जाता है और कुछ गंभीर स्थितियों में बच्चे कुपोषण का शिकार भी हो जाते हैं। इसलिए डॉक्टर बच्चों को पर्याप्त मात्रा में दूध पिलाने का सुझाव देते हैं।
     हर माता-पिता पूरी कोशिश करता है कि अपने बच्चे को दूध की पर्याप्त मात्रा उपलब्ध करा सके किंतु दूध की बढ़ती हुई कीमतें माता-पिता की इच्छाओं का घर गला घोंट रही है। यह जानते हुए भी कि दूध युवाओं और वयस्कों के लिए भी आवश्यक है लेकिन महंगाई के चलते उसे गैर जरूरी श्रेणी में रखकर वयस्क समझौता कर लेते हैं और यह सोचते हैं कि उनके घर के बच्चों को दूध मिल सके यही बहुत है, वयस्क तो चाय से भी काम चला सकते हैं। जबकि आज स्थिति यह है कि चाय में भी दूध की मात्रा घटती जा रही है। अब यदि एक वर्ष में दूध की कीमत कई बार बढ़े तो एक मध्यम वर्गीय परिवार या आर्थिक स्तर से कमजोर परिवार के वयस्क न तो स्वयं दूध पी सकते हैं और न अपने बच्चों के लिए दूध का जुगाड़ कर सकते हैं। व्यक्ति जब सुबह सो कर उठता है और अखबार की खबरों के बीच दूध की बढ़ी हुई नई कीमत का पता चलता है तो उसे पहले अपने बजट याद आता है और फिर उसे लगता है कि अब का बच्चा बड़ा हो गया है, अब उसे दूध की इतनी जरूरत नहीं है, उसके दूध में कटौती की जा सकती है या फिर उसे चाय के सहारे जिंदा रखा जा सकता है। यानी रात को सोते समय तक जो बच्चा, बच्चा ही था वह सुबह उठते ही वयस्कों की श्रेणी में खड़ा मिलता है ताकि उसके द्वारा पिए जाने वाले दूध को या तो बंद कर दिया जाए या उस में कटौती कर दी जाए क्योंकि और कोई विकल्प नहीं है घर के संपूर्ण बजट को संतुलित करने का।
      आंकड़ों पर जाएं तो  पीछे बहुत दूर तक लौटने की जरूरत नहीं है । 15 अगस्त 2022 को हमने अपना स्वतंत्रता दिवस मनाया और 16 अगस्त को दूध की बढ़ी हुई कीमत का उपहार मिल गया। देशवासियों को महंगाई का एक और झटका लगा। मदर डेयरी और अमूल दोनो ने ही दूध के दामों में 2-2 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी कर दी। यह 6 महीने के अंदर ये दूध की कीमतों में लगातर दूसरी बढ़त रही। इससे पहले 6 मार्च को ही मदर डेयरी, अमूल और पराग मिल्क ने भी अपने अपने दूध उत्पादों की कीमतों को 2 रुपये प्रति लीटर बढ़ा दिया था। यानि 6 महीने के अंदर पराग और मदर डेयरी के उत्पाद 4 रुपये प्रति लीटर महंगे हो चुके हैं। वहीं एक साल से कुछ ज्यादा वक्त यानि 13 महीने में कीमतें 6 रुपये प्रति लीटर बढ़ी हैं। पिछले साल पहली जुलाई से अब तक 3 बार में 2-2 रुपये दूध महंगा हो चुका है। इस डर को देखते हुए बच्चों का एक झटके में बड़ों की श्रेणी में आ जाना स्वाभाविक है क्योंकि अब उनके माता-पिता की क्षमता से यह बाहर होता जा रहा है कि वह अपने बच्चों को दूध खरीद कर पिला सकें। 
     बच्चों को रातों-रात बड़ा करने में अगर कोई कसर बाकी थी तो वह भी एक अदद ख़बर ने पूरी कर दी । खबर वायरल हुई कि भारतीय रेलवे ने ट्रेन में यात्रा करने वाले बच्चों के लिए टिकट बुकिंग के संबंध में नियम बदल दिया है। एक मीडिया रिपोर्ट में यह दावा किया गया कि अब एक से चार साल की उम्र के बच्चों को ट्रेन में सफर करने के लिए टिकट लेना होगा। जब इस ख़बर ने सबको परेशान कर दिया, तब रेलवे ने इस रिपोर्ट का खंडन किया। उसने कहा कि ट्रेन में यात्रा करने वाले बच्चों के लिए टिकट बुकिंग संबंधी नियम में कोई बदलाव नहीं किया गया है। रेल मंत्रालय ने एक बयान जारी किया कि यह समाचार सामग्री और मीडिया रिपोर्ट भ्रामक हैं। रेल मंत्रालय ने कि भारतीय रेलवे ने ट्रेन में यात्रा करने वाले बच्चों के लिए टिकटों की बुकिंग के संबंध में कोई बदलाव नहीं किया है। यात्रियों की मांग पर उन्हें टिकट खरीदने और अपने 5 साल से कम उम्र के बच्चे के लिए बर्थ बुक करने का विकल्प दिया गया है। यदि वे बच्चे के लिए अलग बर्थ नहीं चाहते हैं, तो यह सुविधा निशुल्क है, जैसे पहले हुआ करती थी। मगर सवाल उठता है कि अगर यह ख़बर भ्रामक थी तो इसे मीडिया में वायरल करने से किसका भला होने वाला था? कहीं यह "माइंड मेकअप" जैसी कोई बात तो नहीं कि निकट भविष्य में इसे लागू करने की ज़मीन तैयार की जा रही हो। यदि ऐसा होता है और इस तरह के नियम लागू किए जाते हैं तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए क्योंकि अब जब बच्चे दुधमुंहे नहीं रहेंगे, 1 साल की उम्र के बाद उनका दूध पीना वैसे ही कम हो जाएगा या छूट जाएगा और वे खानपान के मामलों में बड़ों की श्रेणी में शामिल हो जाएंगे तो रेल विभाग यदि उनके भी टिकट के पैसे वसूलने लगे तो इसमें कोई बड़ी बात नहीं है।
      हमें तो खुश होना चाहिए कि अब अपने बच्चों को बड़ा करने की चिंता उनके माता-पिता को नहीं करनी पड़ेगी बल्कि यह सब काम सरकार और सरकार की निगरानी में काम कर रही एजेंसियां बखूबी निभाने लगी हैं। यदि साल भर में 4 बार दूध के दाम बढ़ें और 1 साल की आयु से अधिक बच्चे के फुल टिकट लगने की संभावना बनने लगे तो यह मान लेना चाहिए कि अब बच्चे रातोंरात बड़े हो गए हैं।
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(18.08.2022)
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तीन पर्तों में देवता | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | कविता संग्रह

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Wednesday, August 17, 2022

चर्चा प्लस | राजनीतिक दलबदल | अध्याय-1 | हम और हमारा लोकतंत्र | डॉ. (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर

चर्चा प्लस  
 राजनीतिक  दलबदल: अध्याय-1
    हम और हमारा लोकतंत्र
  - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह                                                                                             
        महाराष्ट्र, बिहार, मध्यप्रदेश, गोवा, कर्नाटक, उत्तरप्रदेश या कई अन्य राज्यों के नाम लिए जा सकते हैं जिन्होंने दल-बदल के ऐसे उदाहरण सामने रखें कि अपने लोकतंत्र पर तरस आने लगा। प्रश्न यह है कि क्या लोकतंत्र में यह दलबदल रोग नया है या इसकी जड़ें कहीं बहुत गहराई में हैं? तो चलिए खंगालते हैं ‘चर्चा प्लस’ में दलबदल के चाल, चेहरा, चरित्र को। चूंकि इस विस्तृत चर्चा को एक लेख में नहीं समेटा जा सकता है अतः अलग-अलग अध्यायों के रूप में धरावाहिक चर्चा करूंगी। आरंभ कर रही हूं लोकतंत्र के स्वरूप को पहचानने से।  

(डिस्क्लेमेयर: इस पूरी धारावाहिक चर्चा का उद्देश्य किसी भी नए या पुराने राजनीतिक दल, जीवित अथवा स्वर्गवासी राजनेता अथवा राजनैतिक विचारकों की अवमानना करना नहीं है, यह मात्र इस उद्देश्य से लिख रही हूं कि भारतीय राजनीति की चाल, चेहरा, चरित्र के बदलते हुए स्वरूप का आकलन करने का प्रयास कर सकूं। अतः अनुरोध है कि इस धारावाहिक आलेख को कोई व्यक्तिगत अवमानना का विषय नहीं माने तथा इस पर सहृदयता और खुले मन-मस्तिष्क से चिंतन-मनन करे। - डाॅ (सुश्री) शरद सिंह)
हमने समय-समय पर राजनीति में बड़े उतार-चढ़ाव आते देखे हैं। एक व्यक्ति, किसी दल के कुछ सदस्य या फिर कभी-कभी पूरा का पूरा दल ही दूसरे दल के पक्ष में जाते देखा है। इसे हमने हमेशा अपने लोकतंत्र की विशेषता माना है। क्योंकि यह लोकतांत्रिक व्यवस्था में ही संभव है कि मतदाता यदि एक राजनीतिक दल की नीतियों से रुष्ट हो कर दूसरे राजनीतिक दल के उम्मीदवार को अपने अमूल्य मतदान से विजय दिलाता है, इस आशा के साथ कि वह उसकी आशाओं पर खरा उतरेगा और पराजित दल की खामियों को दूर करेगा। किन्तु अचानक मतदाता को यह पता चलता है कि उसके द्वारा जिताया गया उम्मीदवार न केवल अकेले अपितु अपने दल-बल सहित उसी राजनीतिक दल की शरण में चला गया जिसे मतदाता ने पराजय का मुंह दिखाया था। तब मतदाता स्वयं को ठगा हुआ अनुभव करता है और यह सोच कर स्वयं को दिलासा देने का प्रयास करता है कि यही तो लोकतंत्र है। किसी भी राजनीतिक व्यक्ति को कोई भी दल अपनाने की छूट है। इसलिए इस स्थिति में आवश्यक है कि पहले हम अपनी लोकतांत्रिक प्रणाली को एक बार फिर समझ-बूझ लें।

चलिए सैद्धांतिक दृष्टि से देखते हैं कि क्या है लोकतंत्र? तो राजनीतिक विचारकों के अनुसार लोकतंत्र एक प्रकार का शासन व्यवस्था है, जिसमे सभी व्यक्ति को समान अधिकार होता हैं। एक अच्छा लोकतंत्र वह है जिसमे राजनीतिक और सामाजिक न्याय के साथ-साथ आर्थिक न्याय की व्यवस्था भी है। देश में यह शासन प्रणाली लोगो को सामाजिक, राजनीतिक तथा धार्मिक स्वतंत्रता प्रदान करती हैं। नागरिक समाज निर्माण करने की आकांक्षा ने मनुष्य को लोकतंत्र की ओर अग्रसर होने के लिए प्रेरित किया क्योंकि यही ऐसी व्यवस्था है जिसमें सर्वसाधारण को अधिकतम भागीदारी का अवसर मिलता है। इससे केवल निर्णय करने की प्रक्रिया ही में नहीं अपितु कार्यकारी क्षेत्र में भी भागीदारी उपलब्ध होती है। ग्रीस, दुनिया का पहला लोकतांत्रिक देश है और सन् 1947 के बाद भारत को दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश बनने का गौरव मिला। वैसे भारत सहित अमेरिका, फ्रांस, जर्मनी, ब्राजील, ऑस्ट्रेलिया समेत केवल 56 देशों में लोकतांत्रिक प्रक्रिया का पालन किया जाता है। लेकिन भारतीय लोकतांत्रिक प्रणाली बुनियादी रूप से कुछ तत्वों में उनसे भिन्न है।

लोकतंत्र शब्द बोलने में छोटा परंतु इसका अर्थ उतना ही बड़ा और जटिल निकलता है। ‘‘डेमोक्रेटिक’’ शब्द यूनानी भाषा के ‘‘डेमोस’’ और ‘‘क्रेटिया’’ यह 2 शब्दों से मिलकर बना है, जिसका अर्थ होता है लोग और शासन। इसीलिए डेमोक्रेटिक का शाब्दिक अर्थ में जनता का शासन। लोकतंत्र की परिभाषा के अनुसार यह “जनता द्वारा, जनता के लिए, जनता का शासन है”। लोकतंत्र को ‘‘प्रजातंत्र’’ के नाम से भसी पुकारा जाता है। एक ऐसी शासन प्रणाली है, जिसके अन्तर्गत जनता अपनी इच्छा से निर्वाचन में आए हुए किसी भी दल को अपना वोट देकर अपना प्रतिनिधि चुन सकती है और उनकी सरकार बना सकती है। विभिन्न युगों के विचारकों ने लोकतंत्र की विभिन्न परिभाषाएं दी हैं-
“लोकतंत्र वह होगा जो जनता का, जनता के द्वारा हो, जनता के लिए हो।” यूनानी दार्शनिक वलीआन।
“लोकतंत्र शासन के क्षेत्र में केवल एक प्रयोग है।’’ विचारक लावेल।
”लोकतंत्र जनता का, जनता के लिए तथा जनता द्वारा शासन है।” अमेरिकी राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन।
“प्रजातंत्र वह शासन प्रणाली है जिसमें की शासन शक्ति एक विशेष वर्ग या वर्गों में निहित न रहकर समाज के सदस्य में निहित होती है।” लॉर्ड ब्राइस।
“प्रजातंत्र शासन का वह रूप है जिसमें प्रभुसत्ता जनता में सामूहिक रूप से निहित हो।” जॉनसन।
“प्रजातंत्र वह शासन है, जिसमें प्रत्येक व्यक्ति का भाग होता है।” सिले।

अनेकानेक परिभाषाएं हैं लोकतंत्र की जिनका सार यही है कि यह राजनीतिक व्यवस्था शासन में जनता की भूमिका सुनिश्चित करती है। अर्थात् जनता अपना शासक खुद चुनती है। लोकतांत्रिक सरकार का तात्पर्य है कि ऐसी सरकार जिसे जनता द्वारा, जनता के लिए और जनता के हित में चुना जाता है उसे ही लोकतांत्रिक सरकार कहते हैं। संवैधानिक कानून के भीतर नियम के अनुसार एक लोकतांत्रिक देश में सत्ताधारी सरकार सर्वोपरि नहीं होती है। अपितु यह विधायी निकाय है जो देश के संविधान द्वारा निर्धारित सर्वोच्च शक्ति रखता है। चूंकि एक नई सरकार एक निश्चित अवधि के बाद चुनी जाती है, उसके पास केवल कुछ स्थापित कानूनों में संशोधन करते हुए निर्णय लेने और उन्हें लागू करने की शक्तियां होती हैं। ऐसी सभी गतिविधियां देश के कानून की देखरेख में ही की जा सकती हैं, जो सत्ताधारी सरकार से स्वतंत्र होती है और देश के लोगों द्वारा उनकी योग्यता और कौशल के आधार पर पदों पर कब्जा किया जाता है।

लोकतंत्र में भाषण, अभिव्यक्ति और पसंद की स्वतंत्रता होती है। एक लोकतंत्र जो जनता की आवाज को दबाता या रोकता है, वह वैध नहीं है। यदि कोई लोकतांत्रिक सरकार ऐसा करती है तो वह लोकतंत्र की बुनियादी विशेषताओं में से एक का उल्लंघन करती है। जनता की आवाज, भले ही वह सत्ताधारी पार्टी के लिए विपरीत हो, उसे स्वतंत्र रूप से प्रकट होने का अधिकार होता है। लोगों को उत्पीड़न के डर के बिना, अपने विचारों और अभिव्यक्तियों को प्रस्तुत करने का अधिकार होता है। यद्यपि इसका अर्थ यह नहीं है कि नागरिक अपने अधिकारों का उदंडता से प्रयोग करें। एक लोकतांत्रिक देश के नागरिक को अपने विवेक के आधार पर स्वतंत्र निर्णय लेने में सक्षम होना चाहिए, ताकि उसके विचार देश के कानूनों एवं प्रतिष्ठा को या किसी अन्य व्यक्ति की स्वतंत्रता को बाधा न पहुंचाएं। अभिव्यक्ति की यह स्वतंत्रता ही लोकतंत्र को सफल बनाती है। लोकतंत्र में प्रत्येक व्यक्ति को गलत का विरोध करने का कानूनी अधिकार होता है जिससे आमजन शासक वर्ग को उसके कार्यों और नीतियों को जनहित विरोधी बनने से रोक सके।

लोकतंत्र में सभी के लिए समान कानून व्यवस्था होती है। यह व्यवस्था समाज में समानता स्थापित करती है जिसमें जाति, वर्ग, धर्म अथवा आर्थिक स्थिति से परे समान अधिकार और कानून प्रदान किया जाता है। लोकतांत्रिक प्रावधान के अनुसार किसी भी राजनेता, विशेष श लोकप्रिय व्यक्ति या सरकारी निकाय के साथ विशेष व्यवहार नहीं किया जाता है। देश के आम लोगों पर लागू कानून मशहूर हस्तियों या प्रसिद्ध व्यक्तियों पर भी समान रूप से लागू होता है। भारतीय संविधान के अनुसार देश में हर परिस्थिति में कानून सभी लोगों के लिए एक समान रखा गया है।

लोकतंत्र में न्यायपालिका स्वायत्त निकाय की भांति कार्य करती हैं। हमारे देश में भी न्यायपालिका प्रणाली या न्यायालय एक स्वायत्त निकाय हैं और किसी भी सरकारी संगठन या पार्टी के नियंत्रण में नहीं हैं। भारत के न्यायपालिका निकाय द्वारा पारित राय, कानून या कार्य किसी भी विधायिका प्राधिकरण और उनके स्वतंत्र निर्णय से प्रभावित नहीं होते हैं।

वैसे लोकतंत्र के भी कई प्रकार हैं। के मुख्य रूप से दो प्रकार माने जाते हैं। जिनमें दो प्रमुख लांकतांत्रिक व्यवस्था है- विशुद्ध या प्रत्यक्ष लोकतंत्र। दूसरी लोकतांत्रिक व्यवस्था है- प्रतिनिधि सत्तात्मक या अप्रत्यक्ष लोकतंत्र। इन दोनों बुनियादी स्वरूपों के अतिरिक्त लोकतंत्र के अन्य भी गई रूप हैं जो विश्व के विभिन्न देशों में क्रियाशील हैं। जैसे- सत्तावादी लोकतंत्र, राष्ट्रपति लोकतंत्र, संसदीय लोकतंत्र, भागीदारी प्रजातंत्र, सामाजिक लोकतंत्र तथा इस्लामी लोकतंत्र आदि। इन सभी की बुनियाद में प्रत्यक्ष लोकतंत्र और अप्रत्यक्ष लोकतंत्र ही है। इसलिए कुछ पंक्तियों में यह समझना आवश्यक है कि लांकतंत्र के ये दोनों बुनियादी स्वरूप अखिर हैं क्या? तो पहले विशुद्ध या प्रत्यक्ष लोकतंत्र को देखते हैं। वर्तमान में स्विट्जरलैंड में प्रत्यक्ष लोकतंत्र चलता है। इस प्रकार का लोकतंत्र प्राचीन यूनान के नगर राज्यों में पाया जाता था। प्रत्यक्ष लोकतंत्र से तात्पर्य है कि जिसमें देश के सभी नागरिक प्रत्यक्ष रूप से राज्य कार्य में भाग लेते हैं। इस प्रकार उनके विचार विमर्श से ही कोई फैसला लिया जाता है । प्रसिद्ध दार्शनिक रूसो ने ऐसे लोकतंत्र को ही आदर्श व्यवस्था माना था।
दूसरा है प्रतिनिधि सत्तात्मक या अप्रत्यक्ष लोकतंत्र। कई देशों में आज का शासन प्रतिनिधि सत्तात्मक या अप्रत्यक्ष लोकतंत्र है जिसमें जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों द्वारा निर्णय लिया जाता है। इसमें देश की जनता सिर्फ अपना प्रतिनिधि चुनने में अपना योगदान देती है, वह किसी शासन व्यवस्था और कानून निर्धारण  लेने में भागीदारी नहीं निभाती है। इसे ही प्रतिनिधि सत्तात्मक या अप्रत्यक्ष लोकतंत्र कहते हैं। प्रत्यक्ष लोकतंत्र में जनता खुद कानून बनाती है और उसे लागू करती है ,प्राचीन यूनान में अपनाया गया था। अप्रत्यक्ष लोकतंत्र में जनता अपने प्रतिनिधियों को चुनती है और वह प्रतिनिधि कानून बनाता है ज्यादातर देशों में अप्रत्यक्ष लोकतंत्र को अपनाया गया है। प्रत्यक्ष लोकतंत्र को आसानी से नहीं अपनाया जा सकता, वह केवल वही अपनाया जा सकता है जहां की  जनसंख्या कम होती है। प्राचीन समय में जनसंख्या 500 से 600 लोगों की हुआ करती थी, इसलिए आपस में ही मिलकर कानून बनाते थे और उसे लागू करते थे। परंतु आज के समय में कोई भी छोटे से छोटा देश या राज्य ऐसा बिल्कुल नहीं कर सकता, वर्तमान में प्रत्येक राज्य या देश की संख्या लाखों और करोड़ों में है। इसलिए वर्तमान में अधिकतर अप्रत्यक्ष लोकतंत्र को अपनाया गया है। अप्रत्यक्ष लोकतंत्र में प्रणालीगत सुविधा यह है कि इसमें देश के राज्य की जनता अपने मनपसंद प्रतिनिधियों को चुनती है और वह प्रतिनिधि देश के लिए  कानून बनाते हैं और उसे लागू करवाते हैं।

इससे समझा जा सकता है कि हम भारतीय अप्रत्यक्ष लोकतंत्र प्रणाली के भागीदार हैं। लेकिन इसका अर्थ यह भी कदापि नहीं है कि भारतीय नागरिकों के अधिकार कमतर हैं। यह रूमरणीय है कि आमचुनावों द्वारा जनता के द्वारा अपना प्रतिनिधि अपने हित के अनुसार चुना जाता है। जनता जब चाहे उसका विरोध कर के उसे सत्ताच्युत कर सकती है। किसी भी योजना के सफल या असफल होने पर सरकार जनता के प्रति उत्तरदायी होती है। लोकतांत्रिक सरकार में कोई व्यक्ति स्वतंत्र रूप से निर्णय नहीं ले सकता है। सभी जनप्रतिनिधि मिल कर बहुमत के आधार पर कोई भी निर्णय को पूर्णता देते हैं। लोकतंत्र में स्वतंत्रता, समानता, अधिकार, धर्मनिरपेक्षता और न्याय जैसी अवधारणाओं का प्रमुख स्थान है।

लोकतंत्र को जॉन स्टूअर्ट मिल ने जनता का शासन बताया कहा है। उन्होंने अपने सुप्रसिद्ध किताब ‘‘रिप्रेजेंटेटिव गवर्नमेंट’’ में लोकतंत्र के बारे में लिखा है कि ‘‘किसी भी सरकार में गुण दोषों का मूल्यांकन करने के लिए दो मापदंडों की आवश्यकता होती है। उसकी पहले कसौटी यह है कि क्या सरकार का शासन उत्तम है अथवा नहीं? और उसकी दूसरी कसौटी है कि उसके शासन का प्रजा के चरित्र निर्माण पर अच्छा प्रभाव पड़ रहा है अथवा बुरा।’'

        कुछ और भी गहराई से लोकतंत्र को टटोलते हुए हम आगे देखेंगे कि हमारा भारतीय लोकतंत्र अपनी दलबदल की राजनीति के आधार पर किस सांचे में रखा जा सकता है और हम अपने द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों के द्वारा क्या सचमुच छले जा रहे हैं? पढ़िए अगली किस्त में।
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Monday, August 15, 2022

स्वतंत्रतादिवस की हार्दिक शुभकामनाएं 🇮🇳 - डॉ (सुश्री) शरद सिंह

मित्रो, #स्वतंत्रतादिवस की #हार्दिकशुभकामनाएं  🌷 🇮🇳 🌷
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