Wednesday, September 14, 2022

प्रथम "डॉ वर्षा सिंह स्मृति युवा रचनाकार सम्मान" युवा आलोचक डॉ.सुजाता मिश्र को

ब्लॉग साथियों,  
इच्छा करना और उसे फलीभूत होते देखना, दोनों में बहुत अंतर होता है किंतु मेरे शहर में श्यामलम संस्था के कारण कुछ भी असंभव नहीं है। जब मेरे मन में यह विचार आया कि मैं वर्षा दीदी की स्मृति में युवा रचनाकारों के लिए एक सम्मान आरंभ करूं और यह बात मैंने अपने अग्रज उमाकांत मिश्र जी को बताइए तो उन्होंने कहा कि "ज़रूर!"... "यह अच्छा विचार है।" इसके बाद हमेशा की तरह सारा दायित्व उन्होंने अपने ऊपर ले लिया और आज मेरी वह इच्छा पूर्ण हुई, एक नई शुरुआत के साथ। 
        आज हिंदी दिवस के अवसर पर युवा आलोचक डॉ. सुजाता मिश्र को "डॉ वर्षा सिंह स्मृति युवा रचनाकार सम्मान" प्रदान करते हुए मुझे अत्यंत प्रसन्नता हुई किंतु साथ ही यह मेरे लिए मानसिक रूप से तथा आत्मिक रूप से दुरूह कार्य था। मैंने कभी सोचा नहीं था कि वर्षा दीदी की स्मृति में मुझे कोई आयोजन करना पड़ेगा। उनकी अनुपस्थिति की तो मैंने कभी कल्पना ही नहीं की थी। लेकिन आज मैं यही सोचती हूं कि भले ही वे शारीरिक रूप से मुझसे दूर चली गई हैं लेकिन आत्मिक रूप से सदा मेरे साथ है और मेरे साथ रहेंगी। उनकी स्मृति में डॉ. सुजाता मिश्र को सम्मानित किया जाना उन्हें भी सुखद लगेगा। क्योंकि युवा रचनाकारों में वे जिन खूबियों को देखना चाहती थीं, वे खूबियां सुजाता में मौजूद हैं। यदि उन्हें स्वयं चयन करना पड़ता तो वह सुजाता का ही चयन करतीं।
       कार्यक्रम के दौरान वर्षा दीदी का परिचय पढ़ा प्रिय भाई डॉ विनोद तिवारी ने तथा सम्मानपत्र का वाचन किया कवि एवं राजनेता श्री आशीष ज्योतिषी ने।
       मुझे प्रसन्नता है कि इस सम्मान समारोह के पहले सत्र के व्याख्यान में मुख्य वक्ता के रुप में पधारे श्री ध्रुव शुक्ल इस सम्मान समारोह के भी साक्षी बने। व्यंग विधा के पुरोधा डॉ सुरेश आचार्य, विवेकानंद विश्वविद्यालय के कुलपति श्री अनिल तिवारी, आर्ट एंड कॉमर्स कॉलेज के प्राचार्य डॉ रोहित ने महत्वपूर्ण उद्बोधन दिए। स्वागत उद्बोधन दिया श्री उमाकांत मिश्र जी ने तथा कार्यक्रम का संचालन किया साहित्यकार डॉ अमर जैन ने। इस अवसर पर नगर के बुद्धिजीवियों की उल्लेखनीय उपस्थिति रही।
     💐डॉ सुजाता मिश्रा एवं श्री माधव चंदेल को असीम हार्दिक शुभकामनाएं💐
🚩श्यामलम परिवार का हार्दिक आभार🚩
💴14.09.2022, शिक्षक दिवस📖

डॉ. वर्षा सिंह स्मृति युवा रचनाकार सम्मान 2022

"डॉ. वर्षा सिंह स्मृति युवा रचनाकार सम्मान"
      जी हां, मित्रो! ख्याति नाम श्रेष्ठ ग़ज़लकार अपनी प्यारी वर्षा दीदी की स्मृति में  "डॉ. वर्षा सिंह स्मृति युवा रचनाकार सम्मान" युवा साहित्यकारों के लिए आरम्भ करने जा रही हूं.... इस कड़ी में आज प्रथम सम्मान आलोचना विधा के लिए युवा आलोचक डॉ. सुजाता मिश्र को दिया जाएगा। उनकी प्रथम पुस्तक "18 समीक्षाएं" आलोचना पर ही केंद्रित है। यद्यपि हाल ही में भारतीय सिनेमा पर भी उनकी एक पुस्तक प्रकाशित हुई है।
      जी हां, आज 14 सितंबर को हिन्दी दिवस पर..... श्यामलम संस्था द्वारा आयोजित वार्षिक व्याख्यान माला के द्वितीय चरण में श्यामलम संस्था के सहयोग से इसे प्रदान किया जाएगा। आप सभी सादर आमंत्रित हैं🙏👇

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चर्चा प्लस | हिन्दी दिवस | बस, एक सीढ़ी और ऊपर चढ़ जाए हिन्दी | डॉ. (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर

चर्चा प्लस 
हिन्दी दिवस पर विशेष:
बस, एक सीढ़ी और ऊपर चढ़ जाए हिन्दी
            - डाॅ (सुश्री) शरद सिंह                                                                                     
   अनेक बार प्रयास किए गए कि हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्ज़ा मिल सके लेकिन हर बार हिन्दी एक सीढ़ी नीचे ही रह गई। जबकि हिन्दी में विविध भाषाओं के शब्द समाहित हैं और यह देश के विविध भाषा-भाषियों के बीच एक अच्छी, सरल संपर्क की भाषा की भूमिका निभा सकती है। बस, आवश्यकता है एक सच्चे प्रयास की। हमारे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जिस दृढ़ता से मुस्लिम महिलाओं को तीन तलाक के भय से मुक्त कराया, कश्मीर में लोकतांत्रिक मूल्य बहाल करने के लिए धारा 370 हटाया, इसी तरह वे यदि ठान कर लें तो हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनने से कोई नहीं रोक सकता है। यह बात स्मरणीय है कि गुजराती मूल के होते हुए भी हमारे प्रधानमंत्री पूरी प्रखरता से हिन्दी में भाषण देते हैं।
     
भारत में जो भी विदेशी आया उसे हिन्दी सीखना सबसे आसान लगा, वह चाहे अंग्रेज हो या मुग़ल, अफ़गान। चौदहवीं सदी में अमीर खुसरो ने अपनी कविताओं में ‘हिन्दवी’ का प्रयोग किया जिसमें एक पंक्ति फारसी की तो दूसरी हिन्दी (हिन्दवी) की होती थी। वर्तमान में देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी गुजराती भाषी होते हुए भी धाराप्रवाह हिन्दी बोल लेते हैं। जिससे यह तथ्य सिद्ध होता है कि यदि हिन्दी के प्रति प्रेम और इच्छाशक्ति है तो हिन्दी को सीखना, बोलना और समझना सबसे आसान है, क्योंकि यह एक लचीली भाषा है। इसने विभिन्न भाषाओं और बोलियों के शब्द समाहित हैं। इसकी प्रकृति सार्वभौमिक (यूनीवर्सल) भाषा की प्रकृति है। हिंदी में एक भी ऐसा शब्द नहीं है जिसका उच्चारण उसके लिखने से थोड़ा भी अलग हो। इसी वजह से अंग्रेजों ने हिंदी को ‘फोनेटिक लेंग्वेज़’ कहा था। किन्तु उल्लेखनीय यह कि जहां हमारे देश के तीन-तीन नाम हैं- भारत, हिन्दुस्तान और इंडिया। वहां अभाव है तो एक राष्ट्रभाषा का। भारत में किसी भी भाषा को राष्ट्रीय भाषा का दर्जा नहीं दिया गया है। संविधान का अनुच्छेद 343, अंग्रेजी के साथ हिंदी (देवनागरी लिपि में लिखित) को संघ की आधिकारिक भाषा यानी भारत सरकार की अनुमति देता है। अनेक बार प्रयास किए गए कि हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्ज़ा मिल सके लेकिन हर बार हिन्दी एक सीढ़ी नीचे ही रह गई। जबकि हिन्दी में विविध भाषाओं के शब्द समाहित हैं और यह देश के विविध भाषा-भाषियों के बीच एक अच्छी, सरल संपर्क की भाषा की भूमिका निभा सकती है। बस, आवश्यकता है हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्ज़ा मिलने की।
पं. मदन मोहन मालवीय, पुरुषोत्तम दास टंडन, महात्मा गंाधी से ले कर अटल बिहारी वाजपेयी ने हिन्दी को राष्ट्रभाषा और राज्यों के बीच संपर्क की भाषा बनाने का अथक प्रयास किया। यहां तक कि थियोसोफिकल सोसाइटी की एनी बेसेंट ने कहा था, ‘भारत के सभी स्कूलों में हिंदी की शिक्षा अनिवार्य होनी चाहिए।’ लेकिन आज अंग्रेजी-भक्ति के आगे हिन्दी की उपेक्षा यथावत है। हिन्दी की चिंता दिवस, सप्ताह, पखवाड़े और मास में सिमट कर रह जाती है।
   किसी भी देश या राष्ट्र द्वारा किसी भाषा को जब अपने राजकार्य के लिए भाषा घोषित किया जाता है तो उसे उसकी राष्ट्र भाषा कहा जाता है। भारतीय संविधान में कोई भाषा राष्ट्रभाषा के रूप में उल्लिखित नहीं है। कई बार हिंदी को राष्ट्रभाषा कह दिया जाता हैै, लेकिन वास्तविकता यह है कि संविधान के सत्रहवें अध्याय में हिंदी को राजभाषा अर्थात राजकाज की भाषा के रूप में अंकित किया गया है। अन्य राज्यों या प्रदेशों की 22 भाषाओं को भी राज्य की राजभाषा के रूप में रखा गया है। भाषा, राजभाषा और राष्ट्रभाषा को लेकर देश में अनेक आंदोलन, प्रदर्शन और विरोध प्रदर्शन होते रहे हैं, फलतः देश की कोई भी भाषा राष्ट्रभाषा का दर्ज़ा नहीं पा सकी है। भारत की आधिकारिक भाषा, हिन्दी है और अंग्रेजी सहायक या गौण आधिकारिक भाषा है, भारत के राज्य अपनी आधिकारिक भाषा या भाषाएं विधिक रूप से घोषित कर सकते हैं। भारतीय संविधान और भारतीय कानून किसी भाषा को देश की राष्ट्रभाषा के रूप में  परिभाषित नहीं करता है। उल्लेखनीय है कि जिस समय संविधान लागू किया जा रहा था, उस समय अंग्रेजी आधिकारिक रूप से केन्द्र और राज्य दोनो स्तरों पर उपयोग में थी। संविधान द्वारा यह परिकल्पित किया गया था कि अगले 15 वर्ष में अंग्रेजी को चरणबद्ध रूप से हटा कर विभिन्न भारतीय भाषाओं, विशेषकर हिन्दी, को उपयोग में लाया जाएगा, लेकिन तब भी संसद को यह अधिकार दिया गया था कि वह विधिक रूप से उसके बाद भी अंग्रेजी का उपयोग हिन्दी के साथ केन्द्र स्तर पर और अन्य भाषाओं के साथ राज्य स्तर पर चालू रख सकती है।
भारतीय संविधान द्वारा, 1950 में, देवनागरी लिपि में लिखित हिन्दी को संघ की आधिकारिक भाषा घोषित किया गया। यदि संसद द्वारा तुष्टिकरण वाला निर्णय नहीं लिया जाता, तो 15 वर्षों बाद अर्थात 26 जनवरी, 1965 को अंग्रेजी का उपयोग आधिकारिक कार्यों के लिए समाप्त होना था। लेकिन अहिन्दी-भाषी राज्यों में विरोध की लहर चली। परिणामस्वरूप संसद द्वारा आधिकारिक भाषा अधिनियम के तहत आधिकारिक कार्यों के लिए अंग्रेजी के उपयोग को हिन्दी के साथ-साथ 1965 के बाद भी जारी रखने को स्वीकृति दी गई। परिणामस्वरूप, भारत की कोई राष्ट्रीय भाषा नहीं है। जबकि 22 आधिकारिक भाषाएं हैं।
   पं. मदन मोहन मालवीय ने हिन्दी को प्रतिष्ठा दिलाने के लिए सतत् प्रयास किया। न्यायालय में हिन्दी को स्थापित कराया। महामना पहले ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने हिंदी भाषा के उत्थान एवं उसे राष्ट्र भाषा का दर्जा दिलाने के लिए इस आन्दोलन को एक राष्ट्र व्यापी आन्दोलन का स्वरुप दे दिया और हिंदी भाषा के विकास के लिए धन और लोगों को जोड़ना आरम्भ किया। आखिरकार 20 अगस्त सन् 1896 में राजस्व परिषद् ने एक प्रस्ताव में सम्मन आदि की भाषा में हिंदी को तो मान लिया पर इसे व्यवस्था के रूप में क्रियान्वित नहीं किया। लेकिन 15 अगस्त सन् 1900 को शासन ने हिंदी भाषा को उर्दू के साथ अतिरिक्त भाषा के रूप में प्रयोग में लाने पर मुहर लगा दी। बीसवीं सदी में थियोसोफिकल सोसाइटी की एनी बेसेंट ने कहा था, ‘भारत के सभी स्कूलों में हिंदी की शिक्षा अनिवार्य होनी चाहिए।’
पुरुषोत्तम दास टंडन ने महामना के आदर्शों के उत्तराधिकारी के रूप में हिंदी को निज भाषा बनाने तथा उसे राष्ट्र भाषा का गौरव दिलाने का प्रयास आरम्भ कर दिया था। सन् 1918 ई. में हिंदी साहित्य सम्मेलन के इन्दौर अधिवेशन में सभापति पद से भाषण देते हुए महात्मा गांधी ने हिन्दी को राष्ट्रभाषा के योग्य ठहराते हुए कहा था कि, ‘मेरा यह मत है कि हिंदी ही हिन्दुस्तान की राष्ट्रभाषा हो सकती है और होनी चाहिए।’ इसी अधिवेशन में यह प्रस्ताव पारित किया गया कि प्रतिवर्ष 6 दक्षिण भारतीय युवक हिंदी सीखने के लिए प्रयाग भेजें जाएं और 6 उत्तर भारतीय युवक को दक्षिण भाषाएं सीखने तथा हिंदी का प्रसार करने के लिए दक्षिण भारत में भेजा जाएं। इन्दौर सम्मेलन के बाद उन्होंने हिंदीसेवा को राष्ट्रीय व्रत बना दिया। दक्षिण में प्रथम हिंदी प्रचारक के रूप में महात्मा गांधी ने अपने सबसे छोटे पुत्र देवदास गांधी को दक्षिण में चेन्नई भेजा। महात्मा गांधी की प्रेरणा से सन् 1927 में मद्रास में तथा सन् 1936 में वर्धा में राष्ट्रभाषा प्रचार सभाएं स्थापित की गईं। स्वतंत्र भारत में अटल बिहारी वाजपेयी ने संयुक्त राष्ट्रसंघ के अधिवेशन में हिन्दी में भाषण दिया था। वे चाहते रहे कि हिन्दी को राष्ट्रभाषा होने का सम्मान मिले। इसीलिए जो हिन्दी के प्रति अनिच्छा प्रकट करते थे उनके लिए अटल बिहारी वाजपेयी का कहना था कि ‘‘क्या किसी भाषा को काम में लाए बिना, क्या भाषा का उपयोग किए बिना, भाषा का विकास किया जा सकता है? क्या किसी को पानी में उतारे बिना तैरना सिखाया जा सकता है?’’
   22 फरवरी 1965 को राज्यसभा में राजभाषा नीति पर परिचर्चा के दौरान अटल बिहारी वाजपेयी ने जो कुछ कहा था, उसमें हिन्दी की उपेक्षा के प्रति उनकी पीड़ा को स्पष्ट रूप से अनुभव किया जा सकता है-‘‘सभापति जी! मेरा दुर्भाग्य है, मेरी मातृभाषा हिन्दी है। अच्छा होता यदि मैं किसी अहिन्दी प्रांत में पैदा हुआ होता क्योंकि तब अगर हिन्दी के पक्ष में कुछ कहता तो मेरी बात का ज्यादा वजन होता। हिन्दी को अपनाने का फैसला केवल हिन्दी वालों ने ही नहीं किया। हिन्दी की आवाज पहले अहिन्दी प्रांतों से उठी। स्वामी दयानंद जी, महात्मा गांधी या बंगाल के नेता हिन्दीभाषी नहीं थे। हिन्दी हमारी आजादी के आंदोलन का एक कार्यक्रम बनी और चौदह सूत्रीय कार्यक्रम के अंतर्गत उसका समावेश किया गया। हमारे संविधान का जो पहला मसविदा बना, उसमें अंग्रेजी के लिए पांच साल देना तय किया गया था, लेकिन श्री गोपालास्वामी अयंगार, श्री अल्लादि कृष्णास्वामी और श्री टी.टी. कृष्णमाचारी के आग्रह पर वह पांच साल की अवधि बढ़ाकर पन्द्रह साल की गयी। हिन्दी अंकों को अंतर्राष्ट्रीय अंकों का रूप नहीं दिया गया। राष्ट्रभाषा की जगह हिन्दी को राजभाषा कहा गया। उस समय अहिन्दी प्रान्तों से हिन्दी का विरोध नहीं हुआ था। संविधान में जो बातें थीं, उनका विरोध या तो राजर्षि पुरुषोत्तमदास टंडन ने किया, जो अंग्रेजी नहीं चाहते थे या स्वर्गीय मौलाना आजाद ने किया, जो हिन्दी की जगह हिन्दुस्तानी चाहते थे, मगर दक्षिण में हिन्दी के विरोध में आवाज नहीं उठी थी, लेकिन पंद्रह साल में हमने क्या किया?’’
  हिन्दी के संदर्भ में क्या हम आज महामना मदनमोहन मालवीय और अटल बिहारी वाजपेयी के उद्गारों एवं प्रयासों को अनदेखा तो नहीं कर रहे हैं? वस्तुतः ‘राष्ट्रभाषा’ शब्द प्रयोगात्मक, व्यावहारिक व जनमान्यता प्राप्त शब्द है। राष्ट्रभाषा सामाजिक, सांस्कृतिक स्तर पर देश को जोड़ने का काम करती है अर्थात् राष्ट्रभाषा की प्राथमिक दायित्व देश में विभिन्न समुदायों के बीच भावनात्मक एकता स्थापित करना है। राष्ट्रभाषा का प्रयोग क्षेत्र विस्तृत और देशव्यापी होता है। राष्ट्रभाषा सारे देश की सम्पर्कभाषा होती है। इसका व्यापक जनाधार होता है। राष्ट्रभाषा का स्वरूप लचीला होता है और इसे जनता के अनुरूप किसी रूप में ढाला जा सकता है। विश्व में हिन्दी का गौरव तभी तो स्थापित हो सकेगा जब हम अपने देश में हिन्दी को उचित मान, सम्मान और स्थान प्रदान कर दें। हिन्दी के मार्ग में कहीं न कहीं सबसे बड़ा रोड़ा इसकी रोजगार से बढ़ती दूरी की है। इस तथ्य से हम मुंह नहीं मोड़ सकते हैं कि हमारे युवाओं में यहां युवा का अर्थ एक पीढ़ी पहले के युवाओं से भी है, अंग्रेजी पढ़ कर अच्छे रोजगार के अवसर बढ़ जाते हैं जबकि हिन्दी माध्यम से की हुई पढ़ाई कथित ‘स्लम अपारच्युनिटी’ देती है। इस बुनियादी बाधा को दूर करने के लिए हमें तय करना होगा कि हम पढ़ाई के लिए हिन्दी का कौन-सा स्वरूप रखें जिससे हिन्दी रोजगार पाने के लिए की जाने वाली पढ़ाई का शक्तिशाली माध्यम बन सके। दो में से एक मार्ग तो चुनना ही होगा- या तो संस्कृतनिष्ठ हिन्दी को विभिन्न विषयों का माध्यम बना कर युवाओं को उससे भयभीत कर के दूर करते जाएं या फिर हिन्दी के लचीलेपन का सदुपयोग करते हुए उसे रोजगार की भाषा के रूप में चलन में ला कर युवाओं के मानस से जोड़ दें। यूं भी भाषा के साहित्यिक स्वरूप से जोड़ने का काम साहित्य का होता है, उसे बिना किसी संशय के साहित्य के लिए ही छोड़ दिया जाए। आखिर हिन्दी को देश में और विदेश में स्थापित करने के लिए बीच का रास्ता ही तो चाहिए जो हिन्दी को रोजगारोन्मुख बनाने के साथ उसके लचीलेपन को उसकी कालजयिता में बदल दे। इससे भी पहले हमें छोड़ना होगा अपने उस दोहरेपन जिसके चलते हिन्दी की भलाई दिवस, सप्ताह और मास में सिमट कर रह जाती है और शेष दिनों में हम अंग्रेजी की सेवा करते रह जाते हैं। हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्ज़ा दे कर ही इस बुनियादी बाधा को दूर किया जा सकता है। हिन्दी लोकप्रिय भाषा तो है ही, बस, एक सीढ़ी और ऊपर चढ़ जाए अर्थात् हिन्दी राष्ट्रभाषा बन जाए तो वह दुनिया में देश की भाषाई पहचान बन सकती है।
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Tuesday, September 13, 2022

पुस्तक समीक्षा | मन-संसार को अभिव्यक्त करती कहानियां | समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

प्रस्तुत है आज 13.09.2022 को  #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई लेखिका सुश्री उषा वर्मन के कहानी  संग्रह  "यादों के झरोखों से" की समीक्षा... आभार दैनिक "आचरण" 🙏
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पुस्तक समीक्षा
मन-संसार को अभिव्यक्त करती कहानियां
समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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कहानी संग्रह - यादों के झरोखों से
लेखिका     - सुश्री उषा वर्मन
प्रकाशक    - जे.टी.एस. पब्लिकेशन, वी-508, गली नं.17ए विजय पार्क, दिल्ली
मूल्य       - 395/-
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    उषा वर्मन एक उदयीमान कहानीकार हैं। ‘‘यादों के झरोखों से’’ उनका प्रथम कहानी संग्रह है। इस संग्रह में उनकी कुल 101 कहानियां हैं। इनमें अधिकांश कहानियां मन-संसार को अभिव्यक्त करती हैं। उषा वर्मन की कहानियों में सामाजिक गतिविधियों के मन पर पड़ने वाले प्रभावों को स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। ग्रेजुएट तक शिक्षित किन्तु स्वयं के विभिन्न व्यवसायों द्वारा अपने आपको कर्मठ बनाने वाली इस कथाकार के पास एक मौलिक अंतर्दृष्टि है। वे समस्याओं को अपनी दृष्टि और अपने अनुभव के आधार पर देखती हैं तथा उनका समाधान भी वे अपने दृष्टिकोण से ढूंढती हैं। इसीलिए उनकी कुछेक कहानियों में धर्म और विश्वास का चमत्कारी आग्रह मिलता है। जैसे इस संग्रह की पहली ही कहानी है ‘‘भक्ति का चमत्कार’’। कथानक के अनुसार श्रावण मास में अत्यधिक वर्षा से आप्लावित शहर की सड़कों से गुज़र कर कथानायिका जया मंदिर पहुंचती है। वहां पहुंच कर वह मंदिर में सफाई इत्यादि की सेवाकार्य करती है। इसी दौरान उसे मंदिर प्रांगण में फन फैलाया हुआ नाग दिखाई दे जाता है। वह उसे ईश्वर का चमत्कार मान कर नमन करती है और फिर पुजारी को बुला उसे भी दर्शन कराती है। वस्तुतः नागराज बाढ़ सदृश पानी में डूबे अपने बिल से निकल कर मंदिर प्रागण में शरणागत था जिसे ईश्वर का चमत्कार मान लिया गया।

संग्रह में एक कहानी है ‘‘पुनर्जन्म’’। यह कहानी गोया पुनर्जन्म की धारणा को स्थापित करने की दिशा में लिखी गई है। निशा को अपनी भतीजी में अपनी मां की उपस्थिति अर्थात् पुनर्जन्म का अहसास होता है और जल्दी ही उसे अपनी इस धारणा पर विश्वास भी हो जाता है।
ऐसा नहीं है कि ‘‘यादों के झरोखों से’’ कहानी संग्रह की सभी कहानियां धार्मिक चमत्कार या पुनर्जन्म पर आधारित हों, कई कहानियां सामाजिक विसंगतियों को आईना दिखाती है, तो कुछ महिला सशक्तिकरण के उदाहरण प्रस्तुत करती हैं। मनोवैज्ञानिक धरातल की भी कहानियां हैं जिनमें जेनरेशनगैप के दोनों चेहरे दिखाए गए हैं। एक कहानी है-‘‘बच्चे जब समझदार हो जाते हैं’’। इस कहानी में मां को ले कर भाई-बहन के बीच संवाद के बहाने एक अच्छा कथानक सामने रखा गया है। भाई-बहन दोनों मां से दूर दूसरे शहर में रह रहे हैं। भाई ने मां को कह रखा है कि वह सुबह-शाम अपने भोजन की थाली की तस्वीर खींच कर उसे मोबाईल पर भेज दिया करे। बहन को लगता है कि इस प्रक्रिया में मां का भोजन ठंडा हो जाता होगा और उन्हें ठंडा भोजन करना पड़ता होगा। तब भाई अपने इस आग्रह का औचित्य बताता है कि डबलरोटी खा कर रह जाने वाली मां फोटो शेयर करने की जिद के कारण पूरा भोजन बनाती है और पूरा भोजन करती है। यह सुन कर बहन भी भाई के आग्रह से सहमत हो जाती है। यह एक सकारात्मक कहानी है जो एक स्वस्थ मनोविज्ञान भी प्रस्तुत करती है। एक मां को इस बात का अहसास होना कि उसका बेटा इस बात के प्रति जिज्ञासु रहता है कि उसने क्या खाया? खाया या नहीं? उस दशा में मां को ढाढस बंधाने के लिए पर्याप्त है, जब उसके बच्चे उससे दूर रह रहे हों। यह जेनरेशन गैप को भरने वाली कहानी हैं। इस कहानी का कथानक उम्दा है। यदि इसे और विस्तार दिया गया होता तो यह और अधिक प्रभावी कहानी साबित होती।

जेनरेशन गैप पर एक और कहानी है -‘‘कटुता भरी ज़िन्दगी’’। यह जेनरेशन गैप का दूसरा पहलू दिखाती है। कथानायिका आशा को पति से अलगाव के बाद पति के जीवित होते हुए भी एक विधवा जैसा जीवन जीना पड़ा। उसने हिम्मत नहीं हारी और अपने बलबूते पर अपने दोनों बच्चों की परवरिश की। बच्चों के बड़े होने और माता-पिता के वृद्धावस्था की ओर बढ़ने से दोनों के बीच जो जेनरेशन गैप बढ़ता है उसे लेखिका ने इन शब्दों में व्यक्त किया है-‘‘माता-पिता जी कब तक बच्चों का साथ देते। बढ़ती उम्र के साथ हैं इंसान का शरीर भी टूटता है और मन भी। कभी-कभी तो जीवन की डोर भी टूट जाती है। आशा की मां की भी जीवन की डोर टूट गई थी और आशा अब नितांत अकेली रह गई थी। खुली आंखों से देखे सपने टूट गए थे। पति था पर न होने के बराबर। अब उसे आशा से कोई वास्ता नहीं था। बच्चे थे पर शानोशौकत से जीने के आदी हो गए थे। बड़े से घर की सुख-सुविधाओं को छोड़कर वह आशा के छोटे से कमरे में क्यों जाते? यह दुनिया है सतरंगी।’’

कहानी ‘‘मां बेटे का रिश्ता’’ जिस सृदुढ़ता से आरम्भ होती है और एक मां के अपने बेटे के प्रति चिन्ता को जिस गंभीरता से चित्रित करती है, वह क्लाईमेक्स तक पहुंचती-पहुंचती बुरी तरह लड़खड़ा जाती है। कहानी में आरम्भिक दृश्य है कि -‘‘रात के अंधेरे में सांए-सांए करती हवा जब बंद कमरे के दरवाजों से टकराती तो मन में अजीब सी घबराहट होती। मन चीत्कार करने लगता- मेरा बेटा कहां होगा? कहां होगा और कैसा होगा? हे भगवान, मेरे बेटे की रक्षा करना। उसे कुछ भी नहीं होना चाहिए। वह मेरी जान है। हे प्रभु, मेरे वचन की लाज रखना। मेरी गोद मत उजड़ने देना। मैं आपको झूमर चढ़ाऊंगी। सवा पाव मिठाई और नारियल का प्रसाद चढ़ा आऊंगी।’’
   इसी कहानी में जब अंतिम पैरा आता है तो बिल्कुल ही विपरीत चिंतन दिखाई देता है- ‘‘ऐसा शास्त्रों में विदित है कि नौ माह का गर्भ किसी नर्क से कम नहीं है। मां के गर्भ में बच्चा सुख में नहीं बल्कि दुखी रहता है और बार-बार भगवान से यही प्रार्थना करता है कि मुझे इस नर्क से निकालो। भगवान बार-बार उसे पूर्व के बुरे कर्मों का एहसास दिलाते हैं और वह बार-बार माफी मांगता है और गर्भ से बाहर निकलने की चेष्टा करता है। ऐसा बुजुर्गों से सुना है। कथा भागवत में सुना है। और मां समझती है वह उसे पैर मार रहा है और वह आनंदित होती है।’’ कहानी का यह अंत स्तब्ध कर देता है और यही लगता है कि इस कहानी का कम से कम यह अंत नहीं होना चाहिए था। एक स्वस्थ चिंतन के साथ आरंभ कथा को एक कोरे गल्प के साथ यूं समाप्त करना लेखिका की चिंतनशीलता पर भी प्रश्नचिन्ह लगाने लगता है। इससे लेखिका को बचने की आवश्यकता है।
महिला सशक्तिकरण की कहानियों के अंतर्गत लेखिका ने आत्मानुभव को भी कथानक के रूप में रखा है। जैसे एक कहानी है -‘‘मेरी कहानी मेरी कलम से’’। इस कहानी में लेखिका ने बताया है कि वह शिक्षित बेरोजगारों द्वारा स्वयं के व्यवसाय के रूप में महिला टाईपिंग सेंटर खोलना चाहती थी। इसके लिए उसे बैंक से लोन की आवश्यकता थी। बैंक के मैनेजर ने परिचित होते हुए भी उसकी योग्यता पर विश्वास नहीं किया और उसे लोन नहीं दिया। तब एक गुरुजी और गुरुभाई ने उसकी मदद की, जिससे दूसरे बैंक से लोन मिल गया। टाईपिंग सेंटर सफलतापूर्वक चला। जिससे यह साबित हो गया कि उसमें योग्यता की कोई कमी नहीं थी, कमी थी तो उस पहले वाले बैंक के मैनेजर की सोच में जिसने मात्र इस कारण उसका लोन मना कर दिया था कि वह एक महिला है और वह न तो सफल हो सकेगी और न लोन की राशि चुका सकेगी। यह महिलाओं में आत्मविश्वास जगाने वाली और मार्ग सुझाने वाली एक अच्छी कहानी है।    

वस्तुतः इस संग्रह की कहानियों को पढ़ कर लगता है कि एक कथालेखिका के रूप में उषा वर्मन गंभीरता से प्रयास करना चाहती हैं किन्तु अभी उन्हें कथालेखन की बारीकियों को समझने की नितान्त आवश्यकता है। जिसने भी कथा साहित्य पढ़ा है, जानता है कि कहानी के मूलतः छः तत्व होते हैं - विषयवस्तु अथवा कथानक, चरित्र, संवाद, भाषा शैली, वातावरण और उद्देश्य। एक कुशल लेखक अपनी सुन्दर शैली से साधारण से साधारण कथानक में भी जान डाल देता है। शब्दों की सम्मोहनशक्ति के द्वारा वह पाठकों को मन्त्रमुग्ध कर देता है। आधुनिक कहानियों में मन-संसार के निरूपण और अवचेतन मन के विभिन्न स्तरों को खोलने के लिए विभिन्न प्रकार की शैलियों का प्रयोग किया जा रहा है। इसी प्रकार प्रस्तुतिकरण की दृष्टि से कुछ नयी विधियों का प्रयोग किया जाने लगा है। कहानी का केन्द्रीय भाव ही वह हेतु या उद्देश्य है, जिसके लिए कहानी लिखी जाती है। संवेदना की विशिष्ट इकाई के मूल में लेखक का एक विशेष लक्ष्य होता है। जिस दिन उषा वर्मन कथालेखन की इन बारीकियों एवं महत्व को समझ जाएंगी उस दिन वे श्रेष्ठ, विचारशील एवं मनोरंजक कहानियां पाठकों को देने में सक्षम हो जाएंगी।    

उषा वर्मन के इस संग्रह को ले कर कुछ बातें और कहना मैं आवश्यक समझती हूं जो मात्र उषा वर्मन के लिए नहीं अपितु सभी नवोदित कथाकारों के लिए है। व्यस्तताओं से भरे वर्तमान जीवन में 244 पृष्ठों का 101 कहानियों का कहानी संग्रह पाठकों पर पहले ही मानसिक दबाव बना देता। यद्यपि ये सभी कहानियां छोटी-छोटी हैं फिर भी पृष्ठ संख्या को देखते हुए यह पहले ही समझ में आ जाता है कि पूरे संग्रह को पढ़ने के लिए बहुत सारे समय की आवश्यकता होगी। वहीं अधिक पृष्ठों की होने के कारण संग्रह का मूल्य भी रुपये 395/- है जोकि पाठक की जेब पर भी एक मुश्त अधिक भार डालता है। यदि ये कहानियां दो संग्रहों में विभक्त कर दी जातीं तो समय और मूल्य दोनों दृष्टि से पाठकों के लिए सुविधाजनक होती। बहरहाल, ‘‘यादों के झरोखों से’’ कहानी संग्रह की कहानियां पठनीय हैं विशेष रूप से उनके लिए जो कहानियों में विशेष नूतनता का आग्रह नहीं रखते हैं।  
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Sunday, September 11, 2022

Article | Gargoyles are surprised to see climate change | Dr (Ms) Sharad Singh | Central Chronicle


My Article published in Central Chronicle -
Gargoyles are surprised to see Climate Change

-    Dr (Ms) Sharad Singh*
Writer, Author & Social Activist
Blogger - "Climate Diary Of Dr (Ms) Sharad Singh"

If the Gargoyles of North India could talk to each other, they would have discussed each other's condition in such a way that why do you have a sore throat? To this one Gargoyle would reply to the other that my throat was sore due to the heavy rain. Then he asks Gargoyle what happened to your throat? So the second one would reply saying that my throat has dried up due to not getting enough rain and now the rainy season is also going so there is no hope left. Both Gargoyles looked at each other sadly and cursed their fate as to why so much art was spent on them. In fact, the Gargoyles are shocked, worried about climate change.


In addition to the practical function of projecting water away from a building, gargoyles were also intended to symbolize 'guardianship' of the building and to ward off evil spirits. Their open mouths were symbolic of them devouring giants. Gargoyles are carved stone creatures known as grotesques. Often made of granite, they serve an important purpose in architecture. Other than providing interesting decoration for buildings, they contain spouts that direct water away from the sides of buildings. Gargoyles prevent rainwater from running down stone walls and protect them. Sheila Kumar, writer and author says  in her article 'Mystique of the misshapen' that – "Gargoyles are traditionally thought to have been created during the Medieval period but examples date back to some ancient civilizations as well. They have been found on the roofs of Egyptian temples where their mouths served, of course, as a spout for water. Greek temples had their own version of gorges, often lions and other ferocious animals. The temple of Zeus originally had 102 lion-headed gargoyles or spouts, 39 of which remain. Europe, of course, is gargoyle heaven; they dot buildings in Toledo in Spain, Trondheim in Norway, Hillerod in Denmark, Vienna in Austria, Brugge and Mechelen in Belgium, Cologne in Germany, Zagreb in Croatia, and across the Netherlands and Portugal. Strangely, they are found also in Quito in Ecuador, the Forbidden City of Beijing, Ottawa in Canada, and Sydney in Australia. Closer home, a Shiva temple just outside Kollengode in Kerala and the temples of Uttarakhand come to mind, though these Indian spouts resemble your regular lion, horse and elephant. The gorges on newly-built structures usually have the mask of a raakshas or demon. Virtually, all the old Gothic churches in France sport gorges of varying monstrous proportions. The ones atop the Notre Dame in Paris have been a tourist attraction for ages, while the U.K. has its fair share atop the ancient academic buildings of Oxford, in Manchester, at Westminster Cathedral, at Winchester Cathedral, and in Cheshire, Gloucestershire, Herefordshire, Wales, Ireland and in the many abbeys of Scotland."
But I found a big difference between western and Indian gargoyles that Indian gargoyles have rich and soft aesthetic elements by the sculpture, while western gargoyles have scary and hard elements in aesthetically approach. In the Western Gargoyles, images of demons are made, which are often in the form of semi-animals. From which there is a very scary feeling when the water comes out with the sound of thunder. But Indian Gargoyles do not have any horror even though they have semi-human faces. Statues of lion, boar and Udan Gandharva have been made in Khajuraho temples. In which there is beauty. Other old temples and buildings in India have beautiful gargoyles more than this one. Whether Western or Indian, both the Gargoyles have the same function, to trick the water that collects on the roof and throw it away from the walls so that the walls are not damaged. In the Western Gargoyles, it is imagined that the real devil also hides among their fearsome figures, and when it rains heavily, the water flowing from the Gargoyles takes away those hidden devils along with them and gargoyles provides protection to homes.
You must be thinking that Gargoyles are lifeless artifacts of stone, then why am I saying that today they are amazed to see the climate change? It is natural for them to be surprised. Climate change is affecting the weather. The weather is getting uncertain. Sometimes it rains heavily and sometimes it starts raining all of a sudden. Those places where water used to rain less have started receiving heavy rains and where there used to be heavy rains, it has started raining below average. That's why gargoyles built for heavy rain appear dry today and gargoyles built for low rain are forced to withstand the pressure of heavy rain. If the Gargoyles of North India could talk to each other, they would have discussed each other's condition in such a way that why do you have a sore throat? To this one Gargoyle would reply to the other that my throat was sore due to the heavy rain. Then he asks Gargoyle what happened to your throat? So the second one would reply saying that my throat has dried up due to not getting enough rain and now the rainy season is also going so there is no hope left. Both Gargoyles looked at each other sadly and cursed their fate as to why so much art was spent on them. In fact, the Gargoyles are shocked, worried about climate change.
There has been a system since the time the earth came into existence. The season of a place is the average weather that affects it over a given period of time. Precipitation, sunlight, wind, humidity and temperature are the factors that affect the season of a place. Changes in weather can be sudden and can be felt, whereas it takes a long time to change seasons, so it is relatively difficult to experience. Seasons have been changing throughout the history of the Earth. This change is happening more rapidly during the last 150-200 years. Human activities are responsible for this pace of change and it is a cause for concern for scientists. In the name of so-called development in 100 years, we have exploited the sources of groundwater and water so much that the whole world is facing the shortage of drinking water. Thousands of small rivers have become extinct in the country and the world, ponds and wells have dried up. The groundwater level is going down. Looking at the statistics, today's picture is quite grim. Nowadays erratic rainfall, partial rainfall is emerging as a very big problem. This year we are seeing that the situation of rain, rainfall inside the whole country is very worrying.  That's why not only us but also the stone structure Gargoyles that shed rain water built by our forefathers are amazed and we can take care of ourselves and our gargoyles, by removing the reasons why the weather is becoming increasingly erratic. . We have to make every effort to slow down the pace of climate change, understanding the structural importance of the gargoyles.
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(11.09.2022)
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संस्मरण | जानवरों के बाड़े-सी आमसभा | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नवभारत


संस्मरण | नवभारत | 11.09. 2022
जानवरों के बाड़े-सी आमसभा
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
       चुनाव और आमसभा का चोली- दामन का साथ होता है. चुनाव का समय निकट आते ही प्रत्येक राजनीतिक दल भीड़ जोड़ने की जुगत में लग जाता है. यह कोई आज की बात ही नहीं है, मेरे विचार से देश की स्वतंत्रता के बाद से प्रत्येक आमसभा चुनावों के समय यही परिदृश्य रहता रहा होगा. मैंने अपने अब तक के जीवन में कुल तीन आमसभाएं ही देखी, सुनी हैं, वह भी छोटे शहर या ग्रामीण अंचल में. सबसे पहली आमसभा में मुझे जाने का अवसर मिला था अपनी मां डॉ. विद्यावती ‘‘मालविका जी के साथ. वे कोई राजनीतिक व्यक्ति नहीं थीं. मेरी मां तो ईमानदार एवं समर्पित शिक्षिका थीं. लेकिन उन दिनों तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का भारी क्रेज था. उनकी साड़ियों, उनकी हेयर स्टाईल सभी कुछ महिलाओं के बीच चर्चा का विषय बना रहता था. मेरी मां और उनके साथ की शिक्षिकाएं अकसर इस विषय पर बातचीत किया करती थीं. निश्चित रूप से उस दिनों छोटे शहरों की महिलाएं भी इंदिरा जी जैसी हेयरस्टाईल रखने के स्वप्न देखा करती रही होंगी, जो वास्तविक में उनके लिए संभव नहीं था.  मैं उस समय छोटी थी. स्कूल में पढ़ती थी. मुझे याद है कि जब यह पता चला कि इंदिरा गंाधी पन्ना में एक आमसभा में आने वाली हैं तो हमारे घर में ही मां की पांच-छः महिला सहकर्मियों की एक छोटी-मोटी टी-पार्टी हो गई. पार्टी में इस पर विचार-विमर्श किया गया कि उस आमसभा में कैसे पहुंचा जाए. उन दिनों पन्ना में मात्र पैडल रिक्शा चला करते थे और एक रिक्शे पर अगर तन्दुरुस्त सवारी हुई तो दो, यदि दुबली-पतली सवारी हुई तो तीन ही बैठ पाती थीं. सो, तय हुआ कि चार रिक्शे कर लिए जाएंगे क्यों कि मां ने स्पष्ट बता दिया कि मैं अपने साथ अपनी दोनों बेटियों को भी ले जाऊंगी. यानी एक रिक्शे पर दो महिलाओं के साथ मुझे और वर्षा दीदी को भी सवारी करनी थी अतः तीसरी महिला के लिए उसमें गुंजाइश नहीं थी. उसमें भी हम दोनों को सीट के सामने लगी लकड़ी की पट्टी पर बैठना था. मां चाहती थीं कि हम दोनों बहनें उस ‘‘लौह महिला’’ को देखें. यह बात और है कि ‘‘आयरन लेडी’’ की उपाधि बाद में ब्रिटेन की प्रधानमंत्री मार्गरेट थ्रेचर को दी गई लेकिन वास्तविक ‘लौह महिला’ निःसंदेह इंदिरा गांधी ही थीं. क्योंकि भारतीय राजनीति पर दीर्घकाल तक अपना प्रभाव जमाए रखने का काम एक लौह महिला ही कर सकती थी. बहरहाल, नीयत तिथि पर पर हम लोग सभा-स्थल पर पहुंचे. अपार जनसमूह था. ऐसा लग रहा था कि मानो पूरा पन्ना शहर ही नहीं वरन पूरा पन्ना जिला सभा स्थल में उमड़ पड़ा हो. हमें बहुत पीछे जगह मिली थी. उतनी दूर से इंदिरा जी की बहुत स्पष्ट झलक नहीं मिल पा रही थी. फिर भी सभी महिलाएं प्रसन्न थीं कि उन्होंने एक झलक तो पा ली. हम लोग पूरे समय सभा में नहीं रुके. भाषण सुनना हमारा उद्देश्य नहीं था, मात्र देखना उद्देश्य था और वह उद्देश्य पूरा हो गया था. शीघ्र ही हम अपने घर लौट आए. तब मुझे पता नहीं था कि यह भी मेरी मां और उनकी सखियों की योजना का एक हिस्सा था. हमारे घर में चाय-भजियों का दौर चलता रहा. लगभग एक-डेढ़ घंटे बाद हम दोनों बहनों को घर के बाहर खड़े होने को कहा. बल्कि हमारे लिए मां ने दो कुर्सियां भी रख दी थीं और उन पर खड़ी करते हुए कहा था कि,‘‘देखना गिरना नहीं, सम्हल कर खड़ी रहना. अभी इंदिरा जी सर्किटहाउस जाएंगी और फिर कुछ ही देर में वहां से लौटेंगी भी, तब हम उन्हें फिर से देख सकेंगे.’’ तो सभास्थल से जल्दी लौट आने के पीछे यह थी योजना.
चूंकि जहां हमारा घर था हिरणबाग में, वह ठीक उस जगह पर था जहां से सर्किटहाउस के लिए रास्ता पहाड़ी की ओर चढ़ता था. उन दिनों उस रास्ते के किनारे कोई घर नहीं बने थे अतः दूर तक हम लोग उस रास्ते पर आने-जाने वालों को देख पाते थे. सचमुच कुछ देर बाद इंदिरा जी की कार उस रास्ते से गुजरी. उनके सर्किट हाउस जाते समय हमें निराशा हाथ लगी क्योंकि वे विपरीत दिशा में बैठी थीं किन्तु उनकी वापसी पर वे हमारी दिशा में ही थीं. तब हमने उन्हें देखा भी और हाथ हिला-हिला कर उनका अभिवादन भी किया.


दूसरी आम सभा बहुत बाद देखने को मिली. उन दिनों मैं दमोह में बीए फाईनल में पढ़ रही थी. उस दौरान हम स्टूडेंट्स को पता चला कि देश के दिग्गज नेता चंद्रशेखर वहां आमसभा करने आने वाले हैं. अटल बिहारी वाजपेयी के बाद उनके भाषणों की भी बहुत प्रशंसा की जाती थी. उस समय चन्द्रशेखर प्रधानमंत्री नहीं बने थे और कई लोग उनके भाषणों के मुरीद थे. मेरे सहपाठियों में दो-तीन को छोड़ कर राजनीतिक विषयों अथवा समसामयिक विषयों में किसी की तनिक भी रुचि नहीं थी. जब मैंने उनसे आमसभा में चलने को कहा तो सबने मना कर दिया. बस, सखी धर्म निभाती हुई मेरी मात्र एक सहेली मेरे साथ चलने को सहमत हुई. सो, मैंने और मेरी सहेली रीता धगट ने आमसभा में जाने का निर्णय किया. सभा दोपहर को थी और हमारा काॅलेज सुबह के समय का रहता था. काॅलेज के बाद हम दोनों वहां पहुंचीं. चंद्रशेखर जी का कुछ देर भाषण सुना. किन्तु पता नहीं क्यों मुझे उनका भाषण उतना प्रभावी नहीं लगा जितना कि मैंने सुन रखा था और सोच रखा था. संभवतः मैंने कुछ अधिक उम्मींद लगा ली थी. रीता को यूं भी भाषणबाजी में रुचि नहीं थी, वह तो मेरा साथ देने वहां पहुंच गई थी. उस दिन की आमसभा की उपलब्धि यह रही कि हमने सभास्थल के बाहरी हिस्से में खड़े चाट के ठेले पर जी भर कर चाट खाई. रीता ने तीखे गोलगप्पे भी खाए थे पर मैंने नहीं. क्योंकि मुझे गोलगप्पों के उस पानी से समस्या हो जाती है जिसमें बार-बार नंगे हाथों को डुबाया जाता है. मुझे तो लगता था कि मैं बाजार के गोलगप्पे कभी खा ही नहीं सकती हूं. फिर एक बार एक बड़े माॅल में गोलगप्पे खाने पड़ गए. डरते-डरते मैंने गोलगप्पे खाए कि अब तो पक्का बीमार पडूंगी. लेकिन आश्चर्य की बात थी कि मुझे कुछ नहीं हुआ. तब मेरा ध्यान गया कि वहां के कर्मचारी दस्ताने पहने हुए थे, उस पर भी गोलगप्पे के पानी में बार-बार हाथ डुबाने के बजाए एक डिस्पोजल गिलास में पानी भर कर गोलगप्पों के साथ दे रहे थे. उस दिन मुझे समझ में आ गया कि गड़बड़ी कहां थी. नंगे हाथों को गोलगप्पे के पानी में बार-बार डुबाने से पानी में जो प्रदूषण पनपता होगा उससे मुझे फूडप्वाइजन होने लगता था. हां, तो हम लोगों ने उस दिन जम कर चाट खाई और इस तरह आमसभा के आनन्द की भरपाई की.

तीसरी आमसभा एक बार फिर पन्ना में देखने को मिली जिसने आमसभाओं में नेताओं और आम जनता के बीच की बढ़ती दूरियों को दिखा दिया. उस समय मैं पत्रकारिता की दुनिया में प्रवेश कर चुकी थी. तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के आने की सूचना मिली. वे पन्ना के एक ग्रामीण क्षेत्र में आने वाले थे. हमारे प्रवेश-पत्र जारी कर दिए गए. सूचना प्रकाशन विभाग की एक तयशुदा गाड़ी में हम कुछ पत्रकारों को सभा स्थल में पहुंचना था. यद्यपि देश की बड़ी-बड़ी समाचार ऐजेंसियों से भी बड़े-बड़े पत्रकार वहां पहुंचने वाले थे. सभास्थल पर राजीव गांधी के पहुंचने के लगभग तीन घंटे पहले हमें सभास्थल पर पहुंचा दिया गया. तरह-तरह के डिटेक्टर्स से कड़ी जांच-पड़ताल. वहां पहुंच कर मैं अवाक रह गई. वहां लकड़ी के मोटे-मोटे लट्ठों को आपस में बांध कर अनेक खंड बनाए गए थे. लट्ठे भी ऐसे कि उनके लिए समूचे हरे-भरे खड़े पेड़ों को काटा गया था. एक खंड पत्रकारों के लिए था तो दूसरा वीआईपी व्यक्तियों के लिए के लिए. एक खंड स्थानीय, छोटे नेताओं के लिए और इन सब के पीछे एक बड़ा खंड आम जनता के लिए. आमजनता में भी उतने ही व्यक्यिों को उसमें प्रवेश की अनुमति थी जितने उस खंड में समा सकें. शेष को बहुत दूर खड़े रहने की छूट थी. राजीव गांधी के सभास्थल पर पहुंचने के ठीक एक घंटे पहले सभी खंड लकड़ी के लट्ठों से ‘‘लाॅक’’ कर दिए गए. पुलिस बलों के अतिरिक्त पैरा मिलिट्री फोर्स भी वहां थी. विचित्र माहौल था. मुझे ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे हम सभी को जानवरों के बाड़े में जानवरों की भांति कैद कर दिया गया है. इससे पहले जिन दो आम सभाओं का मुझे अनुभव था उसमें इस तरह की व्यवस्था नहीं थी. मंच से लगभग दस मीटर की दूरी के बाद से ही आमजन के लिए पूरा मैदान समान रूप से खुला रहता था. किन्तु राजीव गांधी की सभा में ऐसा नहीं था. उस समय इस बाड़ाबंदी ने मेरे मन को भारी ठेस पहुंचाई थी. मुझे प्रत्यक्ष उदाहरण देखने को मिल गया था कि किस प्रकार आमजन से बड़े नेताओं की दूरियां बढ़ने लगी हैं. हो सकता है कि इसे पहले इंदिरा जी के मारे जाने और तत्कालीन आतंकी गतिविधियों के भय के कारण इस प्रकार की व्यवस्था की गई हो. फिर भी जन के द्वारा चुने गए जनप्रतिनिधि के सामने जन को बाड़े में बंद रखा जाए, यह लोकतांत्रिक स्वरूप उस समय मेरे लिए हजम करना कठिन था. इसके बाद मैं और किसी आमसभा में नहीं गई. मेरा मन भी नहीं हुआ. अब तो टीवी के पर्दे पर ही आमसभाओं की बारीकियां देखने को मिल जाती हैं, ‘‘विथ स्पेशलिस्ट्स स्पेशल कमेंट’’. जिसमें ढेर सारे कामर्शियल ब्रेक्स के साथ आग उगलती बहसों की कांव-कांव भी शामिल रहती है.             
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Friday, September 9, 2022

बतकाव बिन्ना की | अपडेट अम्मा औ लप्सी के भाव | डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम | प्रवीण प्रभात

"अपडेट अम्मा औ लप्सी के भाव"  मित्रो, ये है मेरा बुंदेली कॉलम-लेख "बतकाव बिन्ना की" साप्ताहिक #प्रवीणप्रभात (छतरपुर) में।

🌷हार्दिक धन्यवाद "प्रवीण प्रभात" 🙏
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बतकाव बिन्ना की
अपडेट अम्मा औ लप्सी के भाव
- डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
          ‘‘का कर रईं अम्मा?’’ बजरिया से लौटत बेरा हिम्मा की मताई अपने आंगने में बैठी दिखानीं, सो मैंने उनसे पूछ लई। भलऊं हमें कित्तऊं दिखा रओ होय के को का रओ, मनो ऐसो पूछो जात आए के ‘‘का कर रईं?’’
‘‘आओ बिन्ना! बजरिया से आ रईं?’’ अम्मा ने मोसे पूछी।
‘‘हऔ! मनो कछु खास तो नई लेने हतो पर सोची के जेई बहाने घूम आबी।’’ मैंने अम्मा से कही।
‘‘हऔ ठीक करो! अभईं तुमाए भैयाजी नईं लौटे?’’ अम्मा ने पूछी।
‘‘अभई कहां? उने सो आंठें के बाद आने। बाकी तुम का कर रईं? औ जे घुन्ना काए टेसुआ बहा रओ?’’ मैंने अम्मा से पूछी।
‘‘हमाओ नांव घुन्ना नोई मुन्ना आए!’’ मुन्ना ने रोबो छोड़ मोरी गलती पे मोए टोंको। बाकी मोए पतो आए के ऊको नांव मुन्ना आए, पर मैंने जान के ऊके लाने छेड़ो हतो जीसे बो रोबो भूल जाए। औ जेई भओ।
‘‘अरे हऔ! हमें सो तुमाओ नांव घुन्ना याद रओ।’’ मैंने मुन्ना से कही। फेर बोई से पूछी,‘‘सो तुम रो काए रए?’’
‘‘अम्मा हमें नव टाईप को बाल कटान नईं दे रईं।’’ मुन्ना ने अपनो मसलो बताओ।
‘‘नव टाईप को? मनें?’’ मोए कछु समझ में ने आई।
‘‘अरे, बोई तरहा जोन में खपड़िया के बाल सूजा घांई ठाड़े रैत आएं। हम सो कभऊं ऊ तरहा के बाल ने कटवान देहें।’’ अम्मा बमकत भईं बोलीं।
कै सो सांची रई हतीं अम्मा। ऊ टाईप के बाल सबई पे साजे नईं दिखात। कोनऊं-कोनऊं ठीक दिखात आए, पर कोनऊं लफरा टाईप दिखान लगत आए। औ जे मुन्ना पे सो कभऊं सूट ने करहें ऐसे बाल।
‘‘आजकाल के मोड़ा कोन सुनत आएं, अम्मा! कर लेन देओ अपने मन की ईको। जब मन भर जेहे सो स्टाईल बदलवा लेहे।’’ मैंने अम्मा खों समझाई। मोरी बात सुन के मुन्ना खिल उठो।
‘‘देखो, अपने जी की बात सुन के कैसो मुस्कान लगो! मनो हम सो ने कटान देहें। जे थोड़ी हो सकत के जो अपनो मूंड़ पटा लेवे औ हम देखत रैहें।’’ अम्मा बड़बड़ात भईं बोली।
‘‘सो आप का कर लेहो? आज काल बड़े नईं देखत-सुनत, सो जे तो लोहरो मोड़ा आए।’’ मैंने अम्मा से कही।
‘‘को नईं देखत-सुनत? कोन की कै रईं।’’ अम्मा को मनो तनक जिज्ञासा भई।
‘‘अरे, अम्मा कोन को नांव लेऊं? चाए मुन्ना कओ, चाए पप्पू कओ, मनो जिद करने ई आए, चाए पतो कछू ने होय। किलो को लीटर औ लीटर को किलो बता रए। जे सो कहो को के पिसी खों मीटर में ने नाप दओ। देख नईं रईं अम्मा! कोन टाईप को माहौल चल रओ।’’ मैंने अम्मा से कही।
‘‘जे सब तुम का कै रईं बिन्ना? मोए सो कछू समझ में ने आ रई।’’ अम्मा झुंझलात भई बोलीं। अब अम्मा को जे सब कहां पतो हुइए? बे ने तो अखबार पढ़त आएं, ने तो टीवी में समाचार देखत आएं औ ने तो बे सोसल मीडिया चलाउत आएं। बे का जाने के कोन ने का बक दओ औ कोन काए पे ट्रोल हो रओ?
‘‘अरे, कछू नईं अम्मा! अपने इते के एक नेता आएं, उन्ने अपने भाषण में आटा को भाव 40 रुपइया लीटर बोल दओ! अब कहूं आटा लीटर में नपत आए? उने इत्तो लो पतो नइयां औ बे सयाने राजनीति करबे की अड़ी में ठाड़े।’’ मैंने को बताई।
‘‘अरे, सो ईमें का बिन्ना? पैलऊं जे बताओ के उन्ने सूको आटो के लाने कही के गीलो आटो के बारे में?’’ अम्मा ने उलट मोए से पूछ लओ।
‘‘सूको ई के बारे में कहो हुइए।’’ मैंने कही।
‘‘हुइए नोईं। ठीक-ठीक बताओ!’’ अम्मा ने फेर के पूछी।
‘‘गीलो, सूको सो नईं कहो उन्ने!’’ मोए बतानई परो।
‘‘सो हमें लगत आए के ऊने गीलो आटा के बारे में कहो हुइए। काए से के ऐसो कोनऊं नईंयां के जोन खों आटा के बारे में पतो ने होय। पक्को ऊने गीलो आटा के बारे में कहो हुइए। औ कओ, लप्सी वारो आटा के बारे में बोलो होय।’’ अम्मा बोलीं।
‘‘लप्सी वारो आटा कां बिकत आए, अम्मा? मैंने सो कभऊं ने सुनीं।’’ मैंने कही।
‘‘हऔ, सो बिकबे में का आए? जोन जे तुमाएं नेता हरें आजकाल बिकत रैत आएं सो लप्सी को आटो काए नईं बिक सकत?’’ अम्मा को तर्क ने मोए चौंका दओ? मैं  समझत्ती के अम्मा को ई राजनीति-माजनीति के बारे में कछु पतो नइयां, मनो उन्ने सो मोए अचरज में डार दओ।
‘‘तुमने खूब कही अम्मा! लप्सी को आटा काए नईं बिक सकत! ऊंसई ऊकी पार्टी की दसा ऊ कहनात घांई हो गई आए के -गरीबी में आटा गीलो। सो बे गीलो ई आटे के बारे में ई बोलहे, सूको के बारे में नोंई। ट्रोल ब्रिगेड वारन ने फालतू ई में उनखों ट्रोल कर डारो।’’ मोसे कै आओ।
‘‘का कही? टरोल? जो का कहाउत आए?’’ अम्मा पूछन लगीं।
‘‘अरे, तुमाए मतलब को नईं जे सब।’’ मैं टरकात भई बोली।
‘‘काए हमाए मतलब को काए नईंयां? तुम जे ई लाने कै रईं के हम बुढ़ा गए कहाने?’’ अम्मा तिनकत भईं बोलीं।
‘‘अरे नईं अम्मा! अभईं तुमाई उमरई का आए! अभईं सो तुम ज्वान ठैरीं!’’ मैंने अम्मा से कही।
‘‘हऔ, मस्का ने मारो! हमें पतो आए के हमाई उम्मर का आए!’’ अम्मा ठसक के बोलीं।
उनकी जे मस्का मारबे वारी बात ने मोए फेर के चौंका दओ।
‘‘तुम का सोच रईं? हमें सब पतो आए। हमाए मुन्ना ने, बो का कहाउत आए वाटसअप पे हमाओ खातो खोल दओ आए। हमाई दो-चार संगवारी ऊमें हमाए संगे बात करत रैत आएं। कभऊं-कभऊं हम ओरें अपनी फोटू सोई डार देत आएं। अभई दो दिना पैलऊं ममता की मताई चित्रकूट कई रई, सो ऊने उतई से मुतकी फोटुएं डारी हतीं हमाए खाते में। सो हमें घर बैठे रामजी के दरसन हो गए।’’ अम्मा गदगद होत भईं बोलीं। औ उनकी बातें सुन के मोरी दसा जे हती, के मोए पे पानी छिड़कबे की जरूरत हती।
‘‘काए तुमाओ सोई खातो आए वाटसअप पे? ने होय सो हमें बताइयो, हम मुन्ना से कै के तुमाओ खातो सोई खुला देबी। फेर तुमें सोई भगवान जी की फोटुएं भेज दई करबी।’’ अम्मा बोलीं।
‘‘अम्मा तुमाई जै हो! तुमाए पांव कहां आएं, तनक आंगू खों करो औ हमें पांव पड़ लेन देओ।’’ मोरे मों से खुदई जे सब कै आई।
‘‘काए का हो गओ?’’ अम्मा चौंक परीं।
‘‘होने को का बचो? तुम सो सबई जानत आओ! तुमें औ कछू जानबे की जरूरत नईंयां। जो तुमाई घांई मताई ऊकी बी होती सो ऊ बेचारो कभऊं ट्रोल ने हो पातो।’’ मैंने अम्मा से कही और उनको घूटां दबान लगी।
‘‘पांव ने मिले सो घूंटा दबान लगीं? बाकी आजकाल घूंटां पिरात रैत आएं।’’ अम्मा हंसत भईं बोलीं।
मैंने अम्मा से बिदा लई, काए से के अब कछू बोलने के लाने बचो नई हतो। यूनीवर्सिटी के लाने अनवरसिटी घांईं व्हाट्सअप्प के लाने वाटसअप सुन के ऊंसई जी जुड़ा गओ हतो।       
बाकी मोए सोई बतकाव करनी हती सो कर लई। अब चाए ऊने सूको आटा के लाने कहो होय चाए गीलो लाने, मोए का? बाकी अम्मा खों अपडेट पा के मोरो सो मूंड चकरा गओ। बाकी, बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की। सो, सबई जनन खों शरद बिन्ना की राम-राम! 
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(09.09.2022)
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