Wednesday, November 23, 2022

चर्चा प्लस | कोप 27: हो गया यवनिका पतन, अब आगे क्या? | डॉ. (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर

चर्चा प्लस  
कोप 27: हो गया यवनिका पतन, अब आगे क्या?
- डाॅ (सुश्री) शरद सिंह                                                                                      
       कुल मिलाकर, कोप 27 का समापन खट्टे-मीठे परिणामों के साथ हुआ। जिसमें भारत की ओर से रखे गए प्रावधानों को एकबार फिर अनदेखा कर दिया गया। जबकि भारत एक ऐसा देश है जो पूरी तरह से तीसरी दुनिया के देशों का प्रतिनिधित्व करता है, इसलिए भारत के प्रस्ताव की अनदेखी इस सम्मेलन के दूरगामी परिणामों पर सवालिया निशान लगाती है। कुछ बड़े और विकसित देश विकासशील देशों के भाग्य का फैसला खुद नहीं कर सकते। इस सम्मेलन ने अपने पीछे कई ऐसे सवाल छोड़े हैं जिनका जवाब तलाशने की जरूरत है। जैसे तीसरी दुनिया की जनता की राय को शामिल किए बिना सही परिणाम कैसे प्राप्त किया जा सकता है? ऐसी योजना बनानी होगी कि इस तरह के प्रयास महज राजनीतिक नाटक न बन जाएं।
      सम्मेलन पर सम्मेलन, सम्मेलन पर सम्मेलन ...बतर्ज़ सनी देयोल का डायलाॅग ‘‘तारीख़ पे तारीख़, तारीख़ पे तारीख़’’। बस, अंतर इतना है कि उस अदालत में सिर्फ़ तारीख़ें आगे खिसक रही थीं पेशियों की और कोई निर्णय नहीं हो रहा था, मगर यहा हर सम्मेलन के बाद कई निर्णय लिए जाते हैं लेकिन अफ़सोस कि वे निर्णय पूरी तरह से अपने परिणामों तक नहीं पहुंच पाते हैं। कहीं रसूख वाले देशों का राजनीतिक दबाव तो कहीं  सीधे पूंजीपतियों का दबाव। विरोधों और आंदोलनों को बदनाम करके दबाया जाना तो हमेशा से एक सस्ती और घटिया चाल रही ही है। यद्यपि आज मीडिया कई दृश्य ऐसे भी दिखा देता है जो प्रकृति संरक्षण के ड्रामें को बेनकाब कर देता है। जैसे वृक्षारोपण के दौरान समारोहपूर्वक वृक्षारोपण किया जाता है। बाद में उन वृक्षों की दशा-दिशा पर कोई अखबार या टीवी चैनल फॅालोअप दिखा देता है तो पता चलता है कि वे सारी पौध पानी के अभाव में सूख कर मर चुकी है। यानी अगली बार वृक्षारोपण के लिए फिर ज़मीन उपलब्ध। बहरहाल, अभी 2022 के नवंबर माह में 6 से 18 नवंबर तक मिश्र (इजिप्ट) के शरम-अल-शेख में सीओपी-27 का सम्मेलन सम्पन्न हुआ। सम्मेलन के समापन के एक दिन पहले 17 नवंबर, 2022 की सुबह एक ‘‘नॉन पेपर’’ जारी किया गया। इसमें विभिन्न देशों से प्राप्त सूचनाओं का संकलन किया गया था, जिससे इस सम्मेलन में उठाए गए सभी मुद्दों पर प्रकाश डाला जा सके और निर्णय लिए जा सके। इस तरह ‘‘नॉन पेपर’’ जारी करना एक परम्परा है।  
इस ‘‘नॉन पेपर’’ ने पूरे सम्मेलन में मुद्दों और आम सहमति को संक्षेप में प्रस्तुत किया। साथ ही कार्यवाही कैसे होनी चाहिए, इसके लिए भी गाइडलाइन रखी गई थी। यह उल्लेखनीय है कि ग्लासगो में केाप-26 के निर्णयों, जिसे ग्लासगो क्लाइमेट पैक्ट (जीसीपी) के रूप में जाना जाता है, ने ‘‘जीवाश्म ईंधन’’ शब्द का उल्लेख करने वाला पहला कोप निर्णय होने का इतिहास बनाया था। जीवाश्म ईंधन का अर्थ है कोयला, तेल, प्राकृतिक गैस आदि। ग्लासगो में जारी जीसीपी आठ पेज लंबा था। वहीं, मिस्र में जारी यह दस्तावेज 20 पेज का था। दस्तावेज ने ऊर्जा संकट, जलवायु परिवर्तन पर अंतर सरकारी पैनल (आईपीसीसी) के निष्कर्षों और बहुपक्षीय विकास बैंकों (एमडीबी) की रिपोर्टों पर व्यापक विचार सहेजेे। जैसे कि इसमें यूएनएफसीसीसी के दायरे के भीतर और बाहर कई विषयों को शामिल करने वाले सुझावों की एक लंबी, व्यापक सूची शामिल थी। मसौदे में तेजी से बदलाव के साथ ऊर्जा प्रणालियों को अधिक सुरक्षित, विश्वसनीय और लचीला बनाने की आवश्यकता पर प्रकाश डाला गया। यह ऊर्जा सुरक्षा के बारे में था, जो कि अधिकांश देशों के लिए एक प्रमुख प्राथमिकता भी है। कागज ने अक्षय ऊर्जा की ओर झुकाव और झुकाव के साथ कोयला आधारित ऊर्जा को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने का आह्वान किया। हालांकि, यह जीवाश्म ईंधन सब्सिडी पर अधिक जोरदार तरीके से बात नहीं रखी गई।
उल्लेखनीय है कि ग्लासगो क्लाइमेट पैक्ट (जीसीपी) ने अक्षम जीवाश्म ईंधन सब्सिडी को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने का आह्वान किया था। जबकि कोप 27 में जारी इस मसौदे में ‘‘अक्षम जीवाश्म ईंधन सब्सिडी के चरणबद्ध और युक्तिकरण’’ का आह्वान किया गया। दुर्भाग्य से, मसौदे में सभी जीवाश्म ईंधन को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने के भारत के प्रस्ताव का भी उल्लेख नहीं किया गया। वास्तव में, मसौदे में जीवाश्म ईंधन का एकमात्र संदर्भ जीवाश्म ईंधन सब्सिडी को युक्तिसंगत बनाने के संदर्भ में है। यह एक ऐसा तथ्य है जो इस नॉन पेपर को कमजोर बनाता है। क्योंकि वैज्ञानिकों की राय में, 1.5 डिग्री सेल्सियस के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए जीवाश्म ईंधन को खत्म करना बहुत महत्वपूर्ण है। एचओडी बैठक में, जी-77 और चीन के दलों ने तर्क दिया कि मसौदा जलवायु वार्ता की यात्रा की दिशा को स्पष्ट नहीं करता है। वहीं, बोलीविया ने कहा कि इस मसौदे के जरिए पेरिस समझौते की दोबारा व्याख्या नहीं की जानी चाहिए। उन्होंने आगे कहा कि विकसित देशों के वित्तीय दायित्वों को कम नहीं किया जा सकता है।
कोप 27 के कुछ अच्छे और कुछ कमजोर पक्ष थे। नुकसान और मुआवजे को संबोधित करने के लिए वित्त पोषण या एक नया फंड भारत सहित गरीब और विकासशील देशों की लंबे समय से लंबित मांग रही है-उदाहरण के लिए, बाढ़ से विस्थापित लोगों को स्थानांतरित करने के लिए आवश्यक धन-लेकिन अमीर देशों ने एक दशक से अधिक समय तक कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है। लम्बे समय से इस पर चर्चा करने से परहेज किया जाता रहा है। विशेषज्ञों ने कहा कि यह आश्चर्यजनक है कि अधिकांश विकासशील देशों और अमेरिका और यूरोपीय संघ सहित कुछ विकसित देशों के समर्थन के बावजूद, सभी जीवाश्म ईंधन को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने के आह्वान को मसौदा पाठ में जगह नहीं मिली। कोप 27 के व्यापक निर्णय पर मसौदा पाठ हानि और क्षति को संबोधित करने के लिए वित्त पोषण तंत्र पर एक ‘‘प्लेसहोल्डर’’ डालता है, जिसका अर्थ है कि पार्टियों ने अभी तक इस मामले पर आम सहमति तक नहीं पहुंच पाई है। यह पुष्टि करता है कि वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित करने के लिए तीव्र और गंभीर उत्सर्जन कटौती की आवश्यकता है। इसमें 2010 के स्तर की तुलना में 2030 तक वैश्विक कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन को 45 प्रतिशत तक कम करना और सदी के मध्य के आसपास शुद्ध शून्य उत्सर्जन तक पहुंचना शामिल है।
कोप 27 के अंतिम दिन, मिस्र में समझौते का पहला औपचारिक मसौदा 18 नवंबर 2022 को प्रकाशित हुआ, जिसमें एक बार फिर भारत के सभी जीवाश्म ईंधन को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने और क्षति और मुआवजे के वित्तपोषण पर कोई प्रावधान शामिल नहीं किया गया। जबकि भारत एक ऐसा देश है जो पूरी तरह से तीसरी दुनिया के देशों का प्रतिनिधित्व करता है, इसलिए भारत के प्रस्ताव की अनदेखी इस सम्मेलन के दूरगामी परिणामों पर सवालिया निशान लगाती है। कुछ बड़े और विकसित देश विकासशील देशों के भाग्य का फैसला खुद नहीं कर सकते।
जलवायु परिवर्तन का पूरा परिदृश्य हमारे सामने है जिसे हल्के में नहीं लिया जा सकता। पृथ्वी की सतह का वैश्विक औसत तापमान समग्र ऊर्जा असंतुलन के परिणामों में से केवल एक है। अतिरिक्त ऊर्जा मौसम प्रणालियों को प्रभावित करती है और भारी वर्षा, बाढ़, चक्रवाती तूफान, सूखा, गर्मी की लहरों और जंगल की आग जैसी कई चरम मौसम की घटनाओं की संख्या और तीव्रता को सीधे बढ़ाती है। मौसम की घटनाएं ऊर्जा को स्थानांतरित करती हैं और जलवायु प्रणाली को अंतरिक्ष में ऊर्जा के विकिरण से रोकती हैं। इससे वैश्विक तापमान में भी वृद्धि होती है। इस अध्ययन से यह भी पता चला है कि संतुलन से 93 प्रतिशत अतिरिक्त गर्मी पृथ्वी के महासागरों में जाती है, जिससे समुद्र के जल स्तर का तापमान बढ़ जाता है। यही कारण है कि वर्ष 2021 अब तक के सबसे गर्म महासागरों वाला वर्ष था। पृथ्वी की सतह का वैश्विक औसत तापमान समग्र ऊर्जा असंतुलन के परिणामों में से केवल एक है। अतिरिक्त ऊर्जा मौसम प्रणालियों को प्रभावित करती है और भारी वर्षा, बाढ़, चक्रवाती तूफान, सूखा, गर्मी की लहरों और जंगल की आग जैसी कई चरम मौसम की घटनाओं की संख्या और तीव्रता को सीधे बढ़ाती है।
कोप-27 के समापन के साथ ही जलवायु परिवर्तन के चलते हो रहे नुकसान व क्षति के लिए कोष बनाने सहित लगभग सभी एजेंडों पर सहमति जता दी गई। इसे यूनाइटेड नेशंस फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज (यूएनएफसीसीसी) के पक्षकारों के 27वें सम्मेलन ( कोप-27) की एक बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है। कोप 26 की तुलना में कोप 27 ने नवीकरणीय ऊर्जा के संबंध में अधिक कड़ी भाषा का इस्तेमाल किया और ऊर्जा माध्यमों में बदलाव की बात करते हुए न्यायोचित बदलाव के सिद्धांतों को शामिल किया गया। इस योजना ने वैश्विक औसत तापमान में वृद्धि को पूर्व-औद्योगिक स्तर से करीब दो डिग्री सेल्सियस नीचे तक सीमित रखने के पेरिस समझौते के लक्ष्य की पुष्टि की। इसमें कहा गया कि यह ‘जलवायु परिवर्तन के जोखिम और प्रभावों को काफी कम करेगा।’
हानि एवं क्षतिपूर्ति के समाधान के लिए वित्तपोषण या एक नया कोष बनाना भारत सहित गरीब और विकासशील देशों की लंबे समय से लंबित मांग रही है, लेकिन अमीर देशों ने एक दशक से अधिक समय से इस पर चर्चा से परहेज किया है। विकसित देशों, खासकर अमेरिका ने इस डर से इस नए कोष का विरोध किया है कि ऐसा करना जलवायु परिवर्तन के चलते हुए भारी नुकसान के लिए उन्हें कानूनी रूप से जवाबदेह बनाएगा। ‘हानि और क्षति कोष’ का प्रस्ताव जी 77 और चीन (भारत इस समूह का हिस्सा है), अल्प विकसित देशों और छोटे द्वीप राष्ट्रों ने रखा था। अल्प विकसित देशों ने कहा था कि वे नुकसान और क्षति कोष पर समझौते के बिना कोप 27 से नहीं जाएंगे।
उल्लेखनीय है कि जलवायु परिवर्तन से संबंधित आपदाओं का सामना कर रहे गरीब देश अमीर देशों से जलवायु अनुकूलन के लिए धन देने की मांग कर रहे हैं। गरीब देशों का मानना है कि अमीर देश जो कार्बन उत्सर्जन कर रहे हैं, उसके चलते मौसम संबंधी हालात बदतर हुए हैं, इसलिए उन्हें मुआवजा दिया जाना चाहिए। संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन शिखर सम्मेलन के आधिकारिक ट्विटर हैंडल से ट्वीट किया गया, ‘‘शर्म-अल-शेख में आज कोप 27 में इतिहास रचा गया। पक्षकार उन विकासशील देशों की सहायता के लिए बहुप्रतीक्षित ‘हानि और क्षति’ कोष की स्थापना पर सहमत हुए जिन पर जलवायु परिवर्तन के प्रतिकूल प्रभावों का विशेष रूप से असर पड़ा है।’
क्या महज क्षतिपूर्ति जलवायु संकट से हम मनुष्यों को बचा सकती है? जलवायु परिवर्तन इस सदी की प्रमुख समस्या है। यह संकट मानवता के अस्तित्व के लिए चुनौती बनता जा रहा है। इस साल दुनिया के कई देशों को प्रतिकूल मौसमी परिघटनाओं की मार झेलनी पड़ी। पाकिस्तान में बाढ़ से 3.3 करोड़ आबादी प्रभावित हुई। डेढ़ हजार से अधिक लोगों की मौत हो गई। 44 लाख एकड़ भूमि पर लगी फसल चैपट हो गई। यूरोप के कई देशों में गर्मी के पुराने रिकार्ड टूट गए। गर्मी के कारण वहां जंगलों में लगने वाली आग ने जैव विविधता को जो क्षति पहुंचाई, उसकी भरपाई शायद ही हो पाएगी। भारत में भी मानसून की देरी के कारण पहले तो समय पर रोपाई नहीं हो सकी और बाद में इतनी बारिश हुई कि कई हिस्सों में फसलें चैपट हो गईं। भारत में भूकंप की आवृतियां और तीव्रता निरंतर बढ़ रही है, जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता है। मुआवजा देकर पूंजीवादी देश ग़रीब देशों को चुप रहने को मना तो सकते हैं लेकिन उस पृथ्वी की दशा को कैसे सुधारेंगे जिस पर वे स्वयं भी मौजूद हैं? अतः इस बात को ऐतिहासिक जीत (जैसा कि पाकिस्तान की ओर से कहा गया) नहीं माना जा सकता है। ऐतिहासिक जीत तो तब होगी जब विकसित देश अपनी जिम्मेदारियों को स्वीकार कर के जलवायु परिवर्तन रोकने के सच्चे प्रयास करेंगे।आवश्यकता इस बात की है कि जलवायु परिवर्तन के असर को कम करने और नए हालात के हिसाब से ढालने के उपायों पर वृक्षारोपण, जंगलों की सीमा बढ़ाने और काटे गए जंगलों को फिर से लगाने पर प्रत्येक सरकार को ध्यान देना होगा, जिससे कि जंगलों में कार्बन के भंडारण के संरक्षण के साथ-साथ उसे बढ़ाया भी जा सके। आमजन को जागरूक करना होगा जलवायु परिवर्तन के प्रति ताकि वह अपने छोटे-छोटे प्रयासों से स्थिति की भयावहता को कम कर सके।
कुल मिलाकर, कोप 27 का समापन खट्टे-मीठे परिणामों के साथ हुआ। सम्मेलन का यवनिका पतन हो गया। यवनिका पतन अर्थात् नाट्यमंच पर नाटक के समापन पर पर्दे का गिरना। यह सम्मेलन अपने पीछे कई ऐसे सवाल छोड़ गया है जिनका जवाब तलाशना जरूरी है। जैसे तीसरी दुनिया की जनता की राय को शामिल किए बिना सही परिणाम कैसे प्राप्त किया जा सकता है? ऐसी योजना बनानी होगी कि इस तरह के प्रयास महज राजनीतिक नाटक बन कर न रह जाएं। हम एक भयावह जलवायु परिवर्तन परिदृश्य का सामना कर रहे हैं जिसे हल्के में नहीं लिया जा सकता है।    
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Tuesday, November 22, 2022

पुस्तक समीक्षा | एक महत्वपूर्ण आलेख संकलन | समीक्षक डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

प्रस्तुत है आज 22.11.2022 को  #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई लेखक मुकेश तिवारी के लेख संग्रह "श्री महेन्द्र फुसकेले का साहित्य संसार" की समीक्षा... आभार दैनिक "आचरण" 🙏
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पुस्तक समीक्षा
एक महत्वपूर्ण आलेख संकलन
समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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लेख संग्रह  - श्री महेन्द्र फुसकेले का साहित्य संसार
संकलनकर्ता  - मुकेश तिवारी
प्रकाशक     - प्रगतिशील लेखक संघ सागर इकाई
मूल्य        - अंकित नहीं।
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आज की समीक्ष्य कृति है -‘‘श्री महेन्द्र फुसकेले का साहित्य संसार’’। स्व. महेन्द्र फुसकेले सागर शहर के वरिष्ठ साहित्यकार तो थे ही साथ ही वे साम्यवादी विचारों के समर्थक एवं प्रगतिशील लेखक संघ की सागर इकाई के दीर्घकाल तक अध्यक्ष भी रहे। यूं भी सागर संभाग में बीड़ी उद्योग का विस्तार रहा है और अनेक बीड़ी श्रमिक इसके अंतर्गत अपना जीवनयापन करते आए हैं। उनकी समस्याओं के प्रति महेन्द्र फुसकेले जी ने जहां एक ओर एक वरिष्ठ अधिवक्ता के रूप में आवाज़ उठाई वहीं अपने साहित्य सृजन के द्वारा भी उनके पक्ष को सदा पाठकों के  सामने रखा। वे एक कर्मठ और जिजीविषायुक्त जीवट इंसान थे। उन्हें परिस्थितियों से हार मानना पसंद नहीं था। चूंकि मेरा भी उनसे कई वर्षों का परिचय रहा अतः मुझे उनके विचारों को जानने-समझने का पर्याप्त अवसर मिला। महेन्द्र फुसकेले जी के साहित्यिक व्यक्तित्व को सहेजने तथा उनकी प्रथम पुण्य स्मरण समारोह के अवसर पर उसे लोकार्पित करने की त्वरित योजना बना कर लेखों को संकलित कर के एक संक्षिप्त किन्तु महत्वपूर्ण कृति तैयार कर के कवि एवं लेखक मुकेश तिवारी ने निश्चित रूप से प्रशंसनीय कार्य किया।
इस संकलन के बारे में मुकेश तिवारी ने अपनी भूमिका में लिखा है-‘‘बहुत यादें जुड़ी हैं, दादा फुसकेले जी से। सारी यादें और दादा का चेहरा बार-बार सामने आता है। लगता है, वह हमारे आसपास ही हैं। जीवन और मरण के बीच सब कुछ समाया है। मान-अपमान, ऊंच-नीच, मित्र-शत्रु सब ही तो केवल इस जीवन और मृत्यु के बीच ही हैं। मृत्यु के बाद केवल संस्मरण ही रह जाते हैं, और यह सारा जगत वहीं का वहीं रहता है। इस देह के रहते कुछ ऐसा हो जाता है जो कथाएं बनकर युगों-युगों तक हमारी स्मृति के किसी न किसी कोने में अपना बसेरा बनाए रहती हैं। यही विदेह कथाएं (संस्मरण) जीवित रखती हैं, हमारे विचारों और मनोभावों को। दादा फुसकेले जी  जीवन की अभिव्यक्ति अपने साहित्य- उपन्यास, कहानी, निबंध और कविताओं में पिरो कर रख गए हैं। हम उन्हें (दादा फुसकेले जी) को इस साहित्य में जीवित पाते हैं। उनकी प्रथम पुण्यतिथि पर उनके साहित्य की चर्चा के साथ पुनः पुनः दादा फुसकेले जी के विचारों को हम साझा करते हुए सादर श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।’’
संकलन के प्रकाशन प्रक्रिया के बारे में मुकेश तिवारी ने लिखा है कि-‘‘इस संकलन के लिए श्री महेंद्र जी के पुत्र पेट्रिस फुसकेले एवं पुत्रवधू डाॅ नम्रता फुसकेले का हार्दिक आभार व्यक्त करता हूं, इनके अति महत्वपूर्ण योगदान से प्रकाशित हो सका।’’ वे आगे लिखते हैं कि -‘‘अत्यंत अल्प समय में इस संकलन को मुद्रित करने के लिए मैं निमिष आर्ट एवं पब्लिकेशन सागर का आभारी हूं, जिन्होंने मात्र 3 दिन में इस संकलन को मुद्रित कर दिया।’’
जो संकलन पुस्तक मात्र तीन दिन में प्रकाशित हुई हो उसमें ढेर सारी सामग्री होना संभव नहीं हो सकता है, किन्तु प्रतिनिधि सामग्री इस संकलन में मौजूद है, जो साहित्यकार महेन्द्र फुसकेले के कृतित्व और व्यक्तित्व से परिचित कराने में सक्षम है। इस लेख संकलन में कुल सात लेख संकलित हैं। प्रथम लेख है लेखक टीकाराम त्रिपाठी का जिसका शीर्षक है-‘‘स्त्री: माक्र्सवादी सौंदर्यशास्त्र और श्री महेन्द्र फुसकेले’’। दूसरा लेख है पी.आर. मलैया का-‘‘स्मृतिशेष महेन्द्र फुसकेले एक सशक्त रचनाकार’’। तीसरा लेख है-‘‘कच्ची ईंट बाबुल देरी न दइयो’ और उपन्यासकार महेन्द्र फुसकेले का स्त्रीविमर्श’’। यह लेख डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह यानी मेरा लिखा हुआ है। चतुर्थ लेख है कैलाश तिवारी ‘विकल’ का, जिसका शीर्षक है-‘‘वैचारिक संर्घष का हृदय दर्पण: महेन्द्र फुसकेले’’। पंचम लेख है ‘‘सहज श्रद्धा के पात्र: स्मृतिशेष श्री महेन्द्र फुसकेले’’। इसके लेखक हैं डाॅ. सतीश पाण्डेय। छठा लेख है डाॅ. नम्रता फुसकेले का ‘‘घूम री पृथ्वी घूम घूम’’। अंतिम और सातवां लघु लेख है डाॅ. नलिन जैन ‘नलिन’ का ‘‘अनूठे व्यक्तित्व के धनी: श्री महेन्द्र फुसकेले’’।
इस लेख संकलन का प्रथम लेख ‘‘स्त्री: माक्र्सवादी सौंदर्यशास्त्र और श्री महेन्द्र फुसकेले’’ में लेखक टीकाराम त्रिपाठी ने महेन्द्र फुसकेले जी के उपन्यासों के आधार पर उनके स्त्री चिंतन को सामने रखा है। समग्रतापूर्ण अपने इस लम्बे लेख में लेखक त्रिपाठी ने माक्र्सवादी सौंदर्यशास्त्र की भी विवेचना की है। उन्होंने लिखा है-‘‘उनके उपन्यासों पर चर्चा करने के क्रम में सर्वप्रथम मैं इस तथ्य की ओर आपका ध्यान आकृष्ट कराना चाहता हूं कि उनके सभी उपन्यासों के केंद्र में स्त्री पीड़ा स्त्री शोषण स्त्री प्रवचना आदि के मिस स्त्री विमर्श ही है। साथ ही उनके शीर्षक नामकरण मातृभूमि बुंदेलखंड की मातृभाषा बुंदेली के स्वांग गीतों से अनुप्राणित है।’’ महेन्द्र फुसकेले  के उपन्यास ‘‘मोए ले चल बलम रेता में’’, ‘‘मैं तो ऊंसई अतर में भींजी’’, ‘‘तेंदू के पत्ता में देवता’’, ‘‘कच्ची ईंट बाबुल देरी न दइयो’’तथा ‘‘फूलवंती’’ पर अलग-अलग टिप्पणी करते हुए लेखक ने उपन्यास के कथानकों एवं मुख्य पात्रों का विस्तृत परिचय दिया है। इससे महेन्द्र फुसकेले जी के औपन्यासिक कौशल एवं कथानकों की विशिष्टता का ज्ञान हो जाता है।
‘‘स्मृतिशेष महेन्द्र फुसकेले एक सशक्त रचनाकार’’ लेख में पी.आर. मलैया ने महेन्द्र फुसकेले की कहानियों पर चर्चा की है। चूंकि यह लेख हस्तलिखित रूप में प्रकाशित किया गया है अतः यह पढ़ने में धैर्य की मांग करता है। संभवतः समयाभाव के कारण इस लेख को टंकित न करा कर हस्तलिखित में प्रकाशित करना विवशता रही होगी। फिर भी यह लेख अपनी विषय-महत्ता में किसी भी तरह से कम नहीं है। लेख में महेन्द्र फुसकेले जी के दोनों कहानी संग्रहों पर अपने विचार रखते हुए लिखा है कि -‘‘ दोनों संग्रह की कहानियों में जो तथ्य उभर कर सामने आए हैं उनमें व्यक्तिगत, सामाजिक, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय समस्याओं को श्रमजीवी अवधारणा के दृष्टिकोण से समझने की चेष्टा दृष्टिगोचर है। सभी कहानियों में लोक जागृति का तथ्य मुखर हैं। लेखक  की सहानुभूति सर्वत्र दबे-कुचले, साधनहीन, निरुपाय स्त्री पुरुषों के प्रति है, जिन्हें वह जागरूक समझसंपन्न बनाने अपनी लेखनी के माध्यम से प्रयासरत रहा।’’
‘‘कच्ची ईंट बाबुल देरी न दइयो और उपन्यासकार महेन्द्र फुसकेले का स्त्रीविमर्श’’ लेख में महेन्द्र फुसकेले जी के एक उपन्यास ‘‘कच्ची ईंट बाबुल देरी न दइयो’’ के आधार पर उनके स्त्रीविमर्श का आकलन करते हुए लेखिका डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह ने लिखा है कि ‘‘स्व. महेन्द्र फुसकेले एक ऐसे साहित्यकार थे जो मानवीय मूल्यों को भली-भांति समझते थे। साथ ही वे मानवीय मूल्यों को समाज में स्थापित होते हुए देखना चाहते थे। वे जीवन के प्रगतिशील स्वरूप पर विश्वास रखते थे। उनका मानना था कि जो परम्पराएं दूषित हो चुकी हैं, उन्हें समाप्त हो जाना चाहिए। सिर्फ वे ही परम्पराएं रहें जिनका सरोकार मानवहित से है। उनका ऐसा सोचना उचित था क्योंकि मानवीय जीवन को मूल्यवान बनाने की क्षमता रखने वाले गुणों को मानव मूल्य कहा जाता है। महेन्द्र फुसकेले जी मानते थे कि जब जीवन मूल्य और मुद्रा मूल्य परस्पर पर्याय बनने लगते हैं, वहीं समाज का स्वरूप बिगड़ने लगता है और इससे सबसे अधिक प्रभावित होती है इस पुरुष प्रधान समाज में दोयम दर्जे पर रखी जाने वाली स्त्री। महेन्द्र फुसकेले जी प्रखर स्त्रीवादी थे। वे स्त्रीविमर्श के हिमायती थे। वे मानते थे कि जब तक समाज के सबसे निचले तबके की खांटी स्त्रियों के दुख-कष्ट पर चिंतन या विमर्श नहीं किया जाएगा तब तक साहित्य की समाज-सुधारक भूमिका अधूरी रहेगी।’’
लेखक कैलाश तिवारी ‘विकल’ ने अपने लेख ‘‘वैचारिक संर्घष का हृदय दर्पण: महेन्द्र फुसकेले’’ में लिखा है कि -‘‘ महेंद्र फुसकेले 1952 से कहानी के क्षेत्र में सक्रिय रहे। उन्होंने अखबारों में स्तंभ भी लिखे, निबंध भी लिखें और अंत उपन्यास भी लिखे, कविता भी लिखी। ‘‘प्रकरांतर’’ संकलन में ‘‘बढ़ता कारवां’’ इंदौर, ‘‘दैनिक भास्कर’’ एवं ‘‘आचरण’’ में लिखें स्तंभ लेखन शामिल हैं। यह जिंदगी की समस्याओं, पड़ताल और भ्रमजाल को साफ करने उपकरण का काम करते हैं। छोटे-बड़े निबंधों की खासियत यह है कि जिन विषयों सें कठमुल्ले मार्क्सवादी दूर भागते हैं, जिन्होंने भारतीय दर्शन नहीं पढ़ा, उन विषयों की सांस्कृतिक खूबियों को उन्होंने रेखांकित किया है और रूढ़ियों को पीछे की तरफ धकेला है। जैसे-‘‘रक्षाबंधन’’, ‘‘श्री गणेशाय नमः’’ या ‘‘आदि शंकराचार्य: भारतीय दर्शन का तेजस्वी पुंज’’, ‘‘गीता युग की वाणी’’ या ‘‘भैया दूज विजय पवित्रता का दिन’’।’’ इस तरह लेखक ‘विकल’ के लेख से पता चलता है कि महेन्द्र फुसकेले जी माक्र्सवादी तो थे किन्तु भारतीय संस्कृति के परिपोषक भी थे। उनमें कट्टरवादिता नहीं थी।
  ‘‘सहज श्रद्धा के पात्र: स्मृतिशेष श्री महेन्द्र फुसकेले’’ लेख में लेखक डाॅ. सतीश पाण्डेय ने महेन्द्र फुसकेले जी के संबंध में लिखा है कि वे ‘‘प्रगतिशील साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर और श्रमिक आंदोलन के अग्रणी सिपाही थे। आपका नाम जेहन में आते ही मानवता के उस पुजारी का चेहरा सामने आता है, जिसने अपना पूरा जीवन मजदूरों, कामगारों के पक्ष में सही अर्थों में जिया और अपने कामरेड होने का भाव पूरी संवेदना ईमानदारी के साथ निभाया। समाज में स्त्रियों की पीड़ा और उनके स्थान को लेकर आपके लेख अविस्मरणीय है। आपने अन्याय, शोषण, पाखंड, धार्मिक कुरीतियों, कट्टरता, सांप्रदायिक ताकतों का आजीवन कड़ा विरोध किया।’’
डाॅ. नम्रता फुसकेले ने महेन्द्र फुसकेले जी द्वारा बच्चों के लिए लिखे गई कृति ‘‘घूम री पृथ्वी घूम घूम’’ को केन्द्र में रख कर लेख लिखा है जिससे स्व. फुसकेले जी के बाल साहित्य का भी परिचय मिलता है। डाॅ. नम्रता फुसकेले लिखती हैं कि- ‘‘कभी न कभी कोई बड़ा साहित्यकार अपने जीवन में बाल साहित्य का सृजन करता है। इसी के वशीभूत होकर श्री महेंद्र फुसकेले के लिए नहीं बच्चों के लिए ‘‘घूम रही पृथ्वी घूम घूम’’ का सृजन 2015 में किया।’’ वे आगे लिखती हैं कि ‘‘स्मृति शेष श्री महेंद्र फुसकेलेे का बाल साहित्य स्वच्छ पर्यावरण अंधविश्वास समाज में व्याप्त छुआछूत हिंदुस्तान का अर्थ गरीबी का कारण बेटी के पक्षपात को उजागर करता हुआ तथा अंत में मां की महिमा का बखान करता है। संदेश देती हुई कहानियों के माध्यम से खूबसूरत गुलदस्ता बच्चों को भेज किया है। बच्चों के साथ ही साथ बड़ों के लिए भी पठनीय है।
अंतिम और सातवें लेख के रूप में डाॅ. नलिन जैन ‘नलिन’ का लेख ‘‘अनूठे व्यक्तित्व के धनी: श्री महेन्द्र फुसकेले’’ है जिसमें उन्होंने स्व. फुसकेले जी से जुड़ा हुआ अपना एक संस्मरण साझा किया है।
मुकेश तिवारी द्वारा संकलित लेखों की यह कृति ‘‘श्री महेन्द्र फुसकेले का साहित्य संसार’’ एक वरिष्ठ माक्सवादी साहित्यकार के साहित्य के विविधपक्षों को जानने और समझने की दृष्टि महत्वपूर्ण पुस्तक है। मुकेश तिवारी जी से इस बात की आशा की जा सकती है कि वे भविष्य में इसमें और लेखों को समाहित करते हुए एक बड़े ग्रंथ के रूप में पाठकों के सामने लाएंगे जिससे पूर्ण समग्रता के साथ महेन्द्र फुसकेले जी का व्यक्तित्व एवं कृतित्व युवा पीढ़ी के सम्मुख रखा जा सकेगा। यद्यपि यह पुस्तक भी अपने आप में पूर्ण अर्थवत्ता लिए हुए है। पठनीय भी है और संग्रहणीय भी। वर्तमान में इसका कोई मूल्य नहीं रखा गया किन्तु ‘‘निःशुल्क’’ भी अंकित नहीं है। संभवतः इसके आगामी संस्करण में मूल्य अंकित किया जाए। फिलहाल इसका निःशुल्क वितरण किया जाना भी साहित्य सेवा की दिशा में उल्लेखनीय है। एक वरिष्ठ दिवंगत साहित्यकार के अवदान पर केन्द्रित इस कृति के लिए मुकेश तिवारी एवं प्रगतिशील लेखक संघ सागर इकाई बधाई के पात्र हैं। 
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Monday, November 21, 2022

ट्रेवलर डॉ (सुश्री) शरद सिंह | ख़ुद को क़ैद मत करिए

मित्रो, घर से बाहर घूमने निकलने के बावजूद भी अगर आप अपनी ख़ुद की क़ैद से बाहर नहीं निकल पाए तो ऐसा घूमना भी किस काम का? दरअसल, पिछले दिनों ट्रेवलिंग के दौरान दो घटनाएं ऐसी रहीं जिन्होंने मुझे सोचने पर मज़बूर कर दिया। 😢🤔😗      
     चलिए मैं बताती हूं उन दोनों घटनाओं के बारे में... रास्ते में एक रेस्टोरेंट में हम लोग जब खाना खा रहे थे और हंसी-मज़ाक कर रहे थे, उसी दौरान एक छोटा परिवार वहां पहुंचा। छोटा यानी पति, पत्नी और दो बच्चे। बच्चे अपने स्वभाव के अनुसार चंचल थे। आसपास के और बच्चों के साथ वे दोनों बच्चे जल्दी घुलमिल गए। लेकिन जो पति महोदय थे, वे पूरे टाइम यानी जब से आकर कुर्सी पर बैठे तभी से, मोबाइल पर बात करने में जुट गए। बैरे ने मीनू दिया तो वह भी उन्होंने अपनी पत्नी के सामने कर दिया। पत्नी ने खाने का आर्डर दिया। खाना आया। बच्चे भी खेलना-कूदना छोड़कर खाना खाने आ गए। सभी लोग खाना खाने लगे। किंतु उस दौरान भी उन पतिदेव का मोबाइल पर संवाद समाप्त नहीं हुआ। वह व्यक्ति पूरे समय मोबाइल पर बात करता रहा। मुझे तो लगता है कि उसे इस बात का भी एहसास नहीं हो पाया होगा कि उसने क्या खाया और जो भी खाया उसका स्वाद क्या था। अरे, ऐसी भी क्या व्यस्तता? यदि वह सामने वाले से यह कहता है कि मैं अभी डिनर कर रहा हूं ,थोड़ी देर बाद कॉलबैक करता हूं, तो निश्चित रूप से सामने वाला व्यक्ति भी यही कहता कि- 'हां-हां आप खाना खा लीजिए, उसके बाद बात करते हैं।' कोई भी व्यक्ति यह नहीं कहेगा कि खाना पीना छोड़ कर और मोबाइल पर बातें करते रहो। चाहे कितना भी बड़ा कॉर्पोरेट का मामला क्यों न हो खाने का समय तो निकलता ही है और निकालना ही पड़ता है। फिर यह तो फैमिली टाइम बिताने का समय था। यदि आप पत्नी और बच्चों के साथ आए हैं तो उनके साथ अपनी उपस्थिति भी जताई है। यह क्या कि पूरे समय मोबाइल फोन पर ही जुटे रहे। यह तो हद है 🤔🤷
       इसके 2 दिन बाद ही एक अन्य रोडसाइड होटल में खाना खाने के लिए रुकने पर, वहां भी मैंने यही दृश्य देखा कि एक छोटी फैमिली पति, पत्नी और दो बच्चों वाली वहां आई। बाहर लॉन में हम लोग सभी बैठे थे, वे लोग भी एक अलग टेबल पर बैठ गए। बच्चे झूला देखते ही मचलने लगे और अपने पापा से कहने लगे कि चल के झूला झूला दें।स्वाभाविक था, बच्चे छोटे थे वे डर भी रहे थे और झूला भी झूला चाहते थे। लेकिन उनके पापा जी को मोबाइल से फ़ुर्सत नहीं थी। अंततः मां उठकर गई उसने बच्चों को झूला झुलाया। फिर खाने का आर्डर दिया और फिर सब ने खाना खाया। 👩‍👧‍👧
          वहीं, इसके ठीक पहले जब हम लोग वहां पहुंचे ही थे तो उस समय एक परिवार खाना खाकर जाने की तैयारी में था। इसी तरह का एक छोटा परिवार। वे लोग अपनी फोटो खींच रहे थे। सेल्फी ले रहे थे। फिर जब वे उठकर जाने लगे तो पति बच्चों के साथ खड़ा हो गया और पत्नी उनकी फोटो लेने लगी। मुझसे देखा नहीं किया और मैंने उनसे कहा कि- 'एक्सक्यूज़ मी! लाइए मैं आप लोगों की फोटो खींच देती हूं। मैम आप भी बच्चों के साथ खड़ी हो जाइए।' 📷💝
    वे बहुत खुश हुए। पूरा परिवार एक साथ उनके मोबाइल में कैप्चर करते हुए मुझे भी बड़ी खुशी हुई। फिर वे लोग खुशी-खुशी वहां से चले गए। एक यादगार पल उनके मोबाइल में कैद हो चुका था। वे सभी एक-दूसरे से जुड़े हुए थे, एक दूसरे पर ध्यान दे रहे थे। जबकि बाकी जो दो परिवार मैंने देखे, उनमें परिवार का मुखिया ही मोबाइल में डूबा हुआ था। बड़ा अज़ीब लगता है यह सब देख कर। 🤔🤷😞
         बेशक़ जब कोई काम कर रहा हो तो उसे पूरे समर्पण के साथ काम करना चाहिए, लेकिन जब वह अपने परिवार के साथ हो तो उसे पूरी तरह से अपने परिवार के साथ ही होना चाहिए। मुझे ऐसा लगता है।👨‍👩‍👦‍👦 विचारणीय है कि आप की अवहेलना पाकर कल को यदि आपका परिवार आप की अवहेलना करने लगेगा उस दिन जो पीड़ा आपको होगी उसका अभी आप अनुमान नहीं लगा सकते हैं। 👺👿🥺
          अब रही बात होटल में लगे हुए झूलों की तो उन्हें देख कर मेरा भी मन मचल उठा 🥳🤡😻 मित्रो, यह जरूरी नहीं है कि अपने भीतर मौजूद बालमन को खिलंदड़ापन करने के लिए बाल दिवस का ही इंतजार करना पड़े, वह तो कभी भी इंजॉय कर सकता है 🎠 🍬🍭आखिर दिल तो बच्चा है जी 🤹
 तो लीजिए देखिए मेरी कुछ तस्वीरें 📸
      🎏 झूले पर बैठकर बचपन के दिन याद आ गए .... वैसे seesaw पर मेरे सामने बैठने की किसी की हिम्मत नहीं हुई 💪✌️ हालांकि फिसल पट्टी पर चढ़ते समय मुझे ख़ुद इस बात का ख़तरा ज़रूर महसूस हुआ था कि मेरे अच्छे खासे वज़न से बच्चों वाली वह फिसल पट्टी कहीं धराशायी न हो जाए 😋😆 लेकिन गनीमत कि वह मज़बूत निकली। वरना होटल वाला भी मुझे कोसता 😁😛
वैसे, मुझे लगता है कि मुझे अपना वज़न घटाने पर ध्यान देना चाहिए... झूलों और फिसलपट्टी के हित में 🤸🏋️🚴😝⚠️ 

Mid November, 2022     
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Sunday, November 20, 2022

Article | COP 27 : The curtain of the stage has fallen, now what next? | Dr (Ms) Sharad Singh | Central Chronicle

Article
COP27 : The curtain of the stage has fallen, now what next?
-    Dr (Ms) Sharad Singh
Writer, Author & Social Activist
Blogger - "Climate Diary Of Dr (Ms) Sharad Singh"

Overall, Cope 27 ended with bittersweet results. While India is a country that fully represents third world countries, so ignoring India's proposal puts a question mark on the far reaching results of this conference. Few big and developed countries cannot decide the fate of developing countries on their own. This conference has left behind many such questions which need to be answered. Like how can the right results be achieved without involving third world public opinion? There has to be a plan that such efforts should not become mere political drama.

A 'non-paper' was released on the morning of November 17, 2022, during COP-27. In this, information received from different countries has been compiled, so that all the issues raised in this conference can be highlighted and decisions can be reached. This "non- paper" summarized the issues and consensus reached throughout the conference. Along with this, a guideline was also kept for how the action should proceed. It is notable that the cover decision of COP 26 in Glasgow, known as the Glasgow Climate Pact (GCP), made history for being the first COP decision to mention the term "fossil fuel". Fossil fuel means coal, oil, natural gas etc. The GCP issued in Glasgow was eight pages long. At the same time, this document released in Egypt was 20 pages. The document placed extensive sections on the energy crisis, the findings of the Intergovernmental Panel on Climate Change (IPCC) and the reports of the Multilateral Development Banks (MDBs). As such it included a long, comprehensive list of suggestions covering many topics within and outside the scope of the UNFCCC. The draft highlighted the need for energy systems to be more secure, reliable and resilient with rapid changes. It was about energy security, which is also a major priority for most countries. The paper called for phasing out of coal based energy with a shift and tilt towards renewable energy. However, it appears to be diluting the GCP's words on fossil fuel subsidies.

Note that the Glasgow Climate Pact (GCP) called for a phase-out of inefficient fossil fuel subsidies. While this draft, released at COP 27, called for the "phasing out and rationalization of inefficient fossil fuel subsidies". Unfortunately, the draft also did not mention India's proposal to phase out all fossil fuels. In fact, the only reference to fossil fuels in the draft is in the context of rationalizing fossil fuel subsidies. This is a fact which makes this non paper weak. Because in the opinion of scientists, it is very important to eliminate fossil fuels to achieve the goal of 1.5 ° C. At the HOD meeting, parties from the G77 and China contended that the draft did not clarify the direction of travel of climate negotiations. At the same time, Bolivia said that the Paris Agreement should not be reinterpreted through this draft. He further said that the financial obligations of developed countries cannot be reduced.
COP 27 had some good and some weak sides. Financing or a new fund to address loss and compensation has been a long-pending demand of poor and developing countries, including India—for example, the money needed to relocate people displaced by floods—but rich countries have not responded for more than a decade. From time immemorial, it has been avoided to discuss it. Experts said it was surprising that calls for a phase-out of all fossil fuels did not find a place in the draft text, despite support from most developing countries and some developed countries, including the US and the European Union. The draft text on the Comprehensive Decision of COP27 puts a "placeholder" on the funding mechanism to address loss and damage, meaning that the parties have yet to reach consensus on the matter. It reaffirms that rapid and severe emissions cuts are needed to limit global temperature rise to 1.5°C. This includes reducing global carbon dioxide emissions by 45 percent by 2030 relative to 2010 levels and reaching net zero emissions around the middle of the century.

The first formal draft of the UN climate summit agreement in Egypt published on 18 November 2022, once again omitting India's call for a phase-out of all fossil fuels and no provision on damage and compensation financing, offer not included. While India is a country that fully represents third world countries, so ignoring India's proposal puts a question mark on the far reaching results of this conference. Few big and developed countries cannot decide the fate of developing countries on their own.

The whole scenario of climate change is before us which cannot be taken lightly. The global average temperature of the Earth's surface is only one of the results of the overall energy imbalance. The excess energy affects weather systems and directly increases the number and intensity of many extreme weather events such as heavy rainfall, floods, cyclonic storms, droughts, heat waves and wildfires. Weather events move energy and prevent the climate system from radiating energy out into space. This also leads to increase in global temperature. This study has also revealed that 93 percent of the excess heat from the balance goes to the Earth's oceans, which increases the temperature of the sea water level. That is why the year 2021 was the year with the warmest oceans so far. The global average temperature of the Earth's surface is only one of the results of the overall energy imbalance. The excess energy affects weather systems and directly increases the number and intensity of many extreme weather events such as heavy rainfall, floods, cyclonic storms, droughts, heat waves and wildfires.

Overall, Cope 27 ended with bittersweet results. This conference has left behind many such questions which need to be answered. Like how can the right results be achieved without involving third world public opinion? There has to be a plan that such efforts should not become mere political drama. We are faced with an intimidating climate change scenario that cannot be taken lightly.
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(20.11.2022)

#climatechange  #MyClimateDiary #UNClimateChange #savetheeart#

DrMissSharadSingh #COP27  #cop27egypt #cop27sharm

Saturday, November 19, 2022

ट्रेवलर डॉ (सुश्री) शरद सिंह | हो जाइए रीचार्ज !

मित्रो! अगर खुद को रिचार्ज करना है तो ट्रैवलर बनिए🏍️🚴🚵🚙 ज़रूरी नहीं है कि ट्रैवलिंग के लिए आप गोवा, नेपाल या सिंगापुर जाएं। बस, सिर्फ़ इतना करने की ज़रूरत है कि अपनी रोज़मर्रा की जिंदगी से बाहर ... अपने घर से बाहर ... शहर से बाहर निकल जाइए। बहुत दूर नहीं, बस शहर से कुछ आगे जहां गांव और खेत शुरू होते हों। बहुत अधिक नहीं तो थोड़ी-सी झाड़ियां हों, छोटा-सा जंगल हो। भले ही खेत अभी सूने हों, बुवाई की प्रतीक्षा में बैठे हों, लेकिन उनकी सुंदरता शहर की भीड़भाड़ से कहीं दूर कल्पनिक लोक में ले जाने में सक्षम होती है। सड़क के किनारे लगे पेड़, लताएं और सुंदर अनजाने फल-फूल मन मोह लेते हैं।
 🍔🧁🍪 किसी ढाबे में खाना खाइए 
☕🍵☕ किसी टपरे पर चाय पीजिए 🍏🍋🍅 किसी के खेत या बगीचे से कुछ मौसमी ताज़ा फल-सब्ज़ी का जुगाड़ हो जाए, तो फिर तो, सोने में सुहागा है...🥦🌲🌳🌴
      #⃣ खुद को रिचार्ज करना है तो कुछ देर के लिए खु़द से खु़द को आज़ाद कर लीजिए और भूल जाइए उतनी देर के लिए कि आपने यह काम नहीं किया है या वह काम नहीं किया है, या यह करना है, वह करना है, फलां को यह मिल गया है मुझे नहीं मिला है, वगै़रह-वगै़रह! 
    मित्रो ! 🙋 हताशा, निराशा, जलन, छल, कपट, अति महत्वाकांक्षा आदि  में उलझ कर अपनी ज़िदगी का मज़ा ख़राब मत करिए।
    😍 मैं तो कम से कम यही मानती हूं...🤷 त्रस्त मत रहिए, मस्त रहिए!👩‍🎨 🎉🎈🌿🌹🎈❤️🎉
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Thursday, November 17, 2022

बतकाव बिन्ना की | मोए सोई काल से करेला नई खाने | डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम | बुंदेली व्यंग्य | प्रवीण प्रभात

 "मोए सोई काल से करेला नई खाने"  मित्रो, ये है मेरा बुंदेली कॉलम "बतकाव बिन्ना की" साप्ताहिक #प्रवीणप्रभात , छतरपुर में।
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बतकाव बिन्ना की     
मोए सोई काल से करेला नई खाने                            
- डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
            ‘‘बिन्ना, तुमने कछु छोड़ो के नईं?’’ भैयाजी ने आतई साथ मोसे पूछी।
‘‘मोए का छोड़ने?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘कछु बी! मने जो तुम चाओ! चाय तो कटहल छोड़ सकत हो, ने तो नाॅनवेज छोड़ सकत हो।’’ भैयाजी बोले।
‘‘जो का कै रै भैयाजी? तबीयत सो ठीक आए न तुमाई? कोनऊ दिमागी बुखार सो नई हो गओ?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘अरे मोए कछु नई भओ! मोरी तबीयत सोई चंगी आए। बाकी तुम बताओ के तुम का छोड़ रईं?’’ भैयाजी ने फेर पूछी।
‘‘अब जो आप गिना रए हो, सो जानतई हो के मैं ठैरी पक्की वेजेटेरियन मने शुद्ध शाकाहारी। मैंने कभऊं नानवेज को हाथ लो नई लगाओ औ आप छोड़बे की कै रै? बाकी कटहल सोई जेई से मोसे खाओ नई जात, के बो सोई बनबे के बाद नानवेज घाईं दिखात आए। औ आप कै रै के कटहल छोड़ दो, नानवेज छोड़ दो। अरे, जोन को कभऊं छियो लो नईं, उनखों छोड़बे की का बात भई?’’ मोए कछु समझ में नई आ रई हती के भैयाजी मनो कैबो का चा रै आएं।
‘‘बात जे आए बिन्ना के आज एक सभा हती, जीमें सब ओरन से कसम ख्वाई गई के सब जने अपने मन से कछु एक चीज छोड़ देबें। सो हमने सोई कसम खा लई के काल से हम करेला ने खेबी।’’ भैयाजी बोले।
‘‘जे का बात भई? आप सो ऊंसई करेला नईं खात हो। सो करेला छोड़बे की काए कही?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘ऐसोई करो जात आए बिन्ना! जब कोनऊं ई टाईप की कसम ख्वाए, सो बो चीज छोड़बे की कसम खा लई जानी चाइए जो तुमे पैलई से नईं पोसात! ईसे का होत आए के छोड़बे वाली कसम सध जात आए। कभऊं टूटत नइयां।’’ भैयाजी सयापन से बोले।
‘‘खूब कही भैयाजी आपने! मनो अपन ओरन खों दारू ने पीने की कसम सोई खा लेनी चाइए। काए से के अपन ओरें दारू-मारू खों छीयत बी नइयां।’’ मैंने हंस के भैयाजी से कही।
‘‘हऔ! जे तुमने ठीक कही। अबकी अगली सभा में मोए दारू छोड़बे की कसम खा लेने है, देख लइयो!’’ भैयाजी उचकत भए बोले।
‘‘मैं सो ठिठोली कर रई हती औ आपने सो ठानई लई।’’ मैंने खों टोकों।
‘‘ईमें ठिठोली की का बात? अब तुम्हई बताओ बिन्ना के शराबबंदी पे उन ओरन से कसमें ख्वाई जाती आएं जिनको शराब से कोनऊ लेबो-देबो नइयां। अब हम तुमें का बताए! बे जो उते तिगड्डा के लिंगे बजरंगबली की मढ़िया आए न, उतई बे तिवारन बहनजी रैत आएं। बे प्रायमरी स्कूल में पढ़ाती आएं। बे एक दिना बता रई हती के उनके स्कूल में सबई से कसमें ख्वाई गईं के कोनऊं शराब खों हाथ नई लगाहे। ने तो पीहे औ ने पियन देहे। अब तुमई सोचो बिन्ना के बे तिवारन बहनजी ने कभऊं सपरे-खोंरे बिगर पानी लो ने पियो हुइए औ उनको कसम खानी परी के बे कभऊं दारू खों हाथ ने लगेहें। मने हम जो कैबो चा रै के जे टाईप की कसमें ऐसई चलत आएं। अब का हुइए के तिवारन बहनजी खों कभऊं दारू छीने नईयां औ ने तो उनके तिवारी जी कभऊं छीहें। कहबे को कहो जेहे के जित्ते लुगवा-लुगाइयन खों कसमें ख्वाई गईं, उनमें से दो जने ने कसम खाबे के बाद दारू के तरफी कभऊं देखो लो नईं।’’ भैयाजी बोले।
‘‘बात सो आप सही कै रै भैयाजी! आंकड़े बढ़ो चाइए, काम बढ़े चाए नई बढ़े। ने तो दारू के ठेका के दुआरे ठाड़े हो के दारू पियन वारों से कसमें ख्वाई जानी चाइए के बे दारू छोड़ दें। मनो अब कोनऊं पढ़ो लिखो सभ्य सो आए। ऊने कभऊं कोनऊं खों मां-बैन की गाली लो नई दई, मने ऊको ऐसी गालियां आती लो नइयां, और ऐसे लोगन से कसमें ख्वा लई जाएं के बे कभऊं मां-बैन की गाली ने देहें, सो ईसे का होने। अरे, कसमें सो उनसे उठवाओ जाओ चाइए जो मां-बैन की गालियों के बिगर एक लाईन नईं बोलत आएं। है के नईं भैयाजी!’’ मैंने भैयाजी से कही।
‘‘हऔ, मनो जे संकल्प-मंकल्प में सोई जेई होत आए। अपने जो जे सयाने हरें रैत आएं बे बोई चाज छोड़बे के लाने संकल्प ले लेत आएं जोन उने अच्छी नई लगत। ईसे का होत आए के घरे बा खाबे के लाने उनपे कोनऊं जोर नईं डाल सकत आए। जैसे हमें करेला नईं पोसात, पर तुमाई भौजी जब देखो तब हमाए पांछू परी रैत आएं के करेला खाओ चाइए। जे भौत फायदेमंद रैत आए, बगैरा-बगैरा। अरे, मोए नई पोसात सो नईं पोसात। अब का हुइए के हमने तुमाई भौजी को बता दओ आए के हमने करेला नई खाबे की कसम खा लई आए। सो, अब बे हमें करेला ख्वाने के लाने हमाओ मगज ने खाहें।’’ भैयाजी बोले।
‘‘आप सोई चतुर कहाने!’’ मैंने भैयाजी से कही।
‘‘औ का? जब जे नेता हरें चतुराई दिखा सकत आएं सो हम, तुम काए नई दिखा सकत?’’ भैयाजी बोले।
‘‘और का!’’ मैंने कही।
‘‘जेई लाने सो हम तुमसे कै रै के अगली बेरा जब सभा हुइए सो हमाए संगे चलियो औ अच्छे मंच पे ठाड़े हो के माईक के ऊपरे से संकल्प ले लइयो के काल से हम ने तो नानवेज खाबी औ न कटहल खाबी! औ कोनऊं चीज जो ने पोसाए बो छोड़ सकत हो।’’ भैयाजी खुस होते भए बोले।
‘‘कैने को सो कै दूं, बाकी मोसे जे चीटिंग ने हुइए!’’ मैंने भैयाजी से कही। फेर मैंने उन्हें बताई के ‘‘मोरी तो जेई से एक संगवारी से बिगाड़ होत-होत बची। बे बोली के तुम कसम खाओ के कभऊं मां-बैन की गाली ने देहो! मैंने उनसे कही के मैंने सपने लो में कभऊं ऐसी गाली नई दई, सो काए के लाने कसम खाऊं! आप सो उन ओरन को कसमें ख्वाओ जो जे टाईप की गालियां बकत आएं। उनको मोरी बात सुन के बुरौ लग गओ! औ बे कैन लगीं के जे मतलब के तुम गाली देबे को समर्थन करत हो। उनकी बात सुन के सो मोरा मुंडा घूम गओ! मनो मैंने जे न कही के मैं कभऊं कतल ने करबी, सो का ईको मतलब हो गओ के मैं कतल को समर्थन करती होऊं!’’
‘‘अरे, जे सब सो चलत रैत आए! ऐसे टेम पे सो तुमे सोई उनकी मन की कर देओ चाइए।’’ भैयाजी बोले।
‘‘उनके आकड़े बढ़ाबे के लाने मैं झूठ कै देओ? मोसे नईं हो सकत। मनो आप जो कछू छोड़बे की कै रए सो मैं सोच के बताबी की मोए का छोड़ने आए।’’ मैंने भैयाजी से कही।
‘‘ज्यादा ने सोचो, तुमें जो कटहल या नानवेज की नई कैने, सो अंडा ने खाबे की कसम खा लइयो!’’ भैयाजी हंसत भए बोले। 
‘‘सो, ईसे सो औ अच्छो आए के दारू छोड़बे की कसम खा लई जाए जोन को कभऊं ने हाथ लआगो आए औ ने कभऊं लगाने है।’’ मैंने हंस के भैयाजी से कही।
‘‘हऔ, जेई सो हम सोच रए। चलो, हम पता लगाबी के दारू छोड़बे की कसमों वारी सभा कबे औ कां हो रई। अपन दोई चलबी। बढ़िया कसमें खाबी औ अपनी फोटू-वोटू खेंच के अपने सोशल मीडिया पे डार देबी।’’ भैयाजी बोले।
‘‘हऔ, आपको सो कछु नईं, बाकी मोरे लाने कहूं लोग जे न समझ परें के जे दारू आएं औ जेई लाने अब छोड़बे की कसम खा रईं। रैन देओ, ईसे अच्छो आए के मैं सोई करेला-मरेला टाईप को कछू छोड़ देओं, जो मोय कम पोसात आए।’’ मैंने भैयाजी कही।
‘‘हऔ, एक-दो दिना में सोच लइयो! बाकी नशाबंदी की कसम खैहो सो बो नेता हरन के समर्थन में कही जेहे। आजकाल जेई को सीजन चल रओ।’’ भैयाजी हंसत भए बोले।
‘‘रैन देओ भैयाजी! मोए कच्ची में ने बिधाओ! मैंने सोच लई के मोए सोई काल से करेला नई खाने!’’ मैंने भैयाजी से कही।
बाकी मोए सोई बतकाव करनी हती सो कर लई। रही जे जे कसम-बसम की सो ईमें कछू नई धरो! जो कछू करने होय, सो उते करो जाओ चाइए जिते जरूरत आए! मने शराब के अहाता के लिंगे जा के कसमें उठवाओ औ पूरी कराओ सो कछू बात होय। है के नई? तो अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की। सो, सबई जनन खों शरद बिन्ना की राम-राम!
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(17.11.2022)
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Wednesday, November 16, 2022

चर्चा प्लस | राष्ट्रीय प्रेस दिवस : हम पत्रकारिता के किस जनरेशन में हैं? | डॉ. (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर

चर्चा प्लस      

राष्ट्रीय प्रेस दिवस : हम पत्रकारिता के किस जनरेशन में हैं?
- डाॅ (सुश्री) शरद सिंह 
                                            राष्ट्रीय प्रेस दिवस पर हमें इस पर विचार करना चाहिए कि हम पत्रकारिता के किस जनरेशन में चल रहे हैं? क्योंकि आज पत्रकारिता का स्वरूप वह नहीं है जो देश की स्वंतत्रता के पूर्व या देश की स्वतंत्रता के कुछ दशक बाद तक रहा। डिज़िटल क्रांति ने सबकुछ उलट-पलट दिया है। आज का पत्रकार नोटबुक और कलम ले कर नहीं घूमता है, उसके हाथ में एंड्रायड फोन और आईपैड होता है। यदि आज के पत्रकार के साथ प्रेस फोटोग्राफर न हो तो भी वह अपने मोबाईल से इवेंट या मूवमेंट को कैप्चर कर सकता है। यहां तक कि लाईव स्ट्रीमिंग भी कर सकता है।

अकबर इलाहाबादी ने यह शेर कहा था-

न खींचो कमान,  न तलवार निकालो,
जब तोप हो मुकाबिल, तब अखबार निकालो।

और जब अख़बार मुक़ाबिल हो तो? स्पष्ट है कि सेंसरशिप जैसे हथियार निकाल लिए जाते हैं। खैर, बात यहां सेंसरशिप की नहीं बल्कि राष्ट्रीय प्रेस दिवस की है। जी हां, हमारे देश में 16 नवंबर को राष्ट्रीय प्रेस दिवस मनाया जाता है। यह दिवस देश में एक स्वतंत्र और तथ्य की समर्थक प्रेस की उपस्थिति के उत्सव के रूप में मनाया जाता है। इसीलिए इस दिन पत्रकारों का सम्मान भी किया जाता है। यह परंपरा सन् 1966 के बाद आरम्भ हुई। दरअसल, 1956 में प्रथम प्रेस आयोग ने पत्रकारिता की नैतिकता और प्रेस की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए एक समिति गठित करने का विचार किया। इस विचार को क्रियान्वित होने में लगभग 10 वर्ष लग गए और 10 वर्ष बाद सन् 1966 में एक प्रेस परिषद का गठन किया गया। भारतीय प्रेस परिषद अथवा प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया देश में जहां पत्रकारिता के दायित्वों पर नज़र रखती है, वहीं पत्रकारिता जगत के अधिकारों की रक्षा के प्रति भी सचेत रहती है। भारतीय प्रेस परिषद यह भी सुनिश्चित करता है कि भारत में प्रेस किसी दबाव में काम करने को विवश न किया जाए। यूं तो 4 जुलाई 1966 को भारतीय प्रेस परिषद की स्थापना हुई थी लेकिन 16 नवंबर 1966 को इसने विधिवत काम करना शुरू किया था। इसीलिए प्रति वर्ष 16 नवंबर को राष्ट्रीय प्रेस दिवस के रूप में मनाया जाता है।

राष्ट्रीय प्रेस दिवस पर हमें इस पर विचार करना चाहिए कि हम पत्रकारिता के किस जनरेशन में चल रहे हैं? क्योंकि आज पत्रकारिता का स्वरूप वह नहीं है जो देश की स्वंतत्रता के पूर्व या देश की स्वतंत्रता के कुछ दशक बाद तक रहा। डिज़िटल क्रांति ने सबकुछ उलट-पलट दिया है। आज का पत्रकार नोटबुक और कलम ले कर नहीं घूमता है, उसके हाथ में एंड्रायड फोन और आईपैड होता है। यदि आज के पत्रकार के साथ प्रेस फोटोग्राफर न भी हो तो भी वह अपने मोबाईल से इवेंट या मूवमेंट को कैप्चर कर सकता है। यहां तक कि लाईव स्ट्रीमिंग भी कर सकता है। आज बाईनरी दुनिया के सहारे सक्रिय पत्रकारिता का आकलन भी जनरेशन के रूप में ही किया जाना चाहिए। जैसे कम्प्यूटर टेक्नाॅलाॅजी के विकास की प्रक्रिया को दर्शाने के लिए जनरेशन शब्द का प्रयोग किया जाता है। जनरेशन यानी पीढ़ी। मनुष्य की पीढ़ी और कम्प्यूटर की पीढ़ी में बहुत अंतर है। हमने अपनी एक ही पीढ़ी में कम्प्यूटर की अनेक पीढ़ियां देख ली हैं। दिलचस्प बात यह है कि हम इसी दौरान पत्रकारिता की भी कुछ पीढ़ियों से गुज़र चुके हैं।

सन् 1988 तक मध्यप्रदेश के सागर जैसे मंझोले शहरों से निकलने वाले दैनिक समाचारपत्र कम्पोजिटर्स द्वारा एक-एक अक्षर सेट कर के छपाई के लिए तैयार किए जाते थे। लेकिन आज इसी शहर में राष्ट्रीय समाचारपत्रों के संस्करण अत्याधुनिक मशीनों से छापे जा रहे हैं। वैसे, भारतीय पत्रकारिता का इतिहास अंग्रेजों के जमाने से ही शुरू होता है। पहला भारतीय अंग्रेजी समाचार पत्र 1816 ई. में कलकत्ता में गंगाधर भट्टाचार्य द्वारा ‘‘बंगाल गजट’’ नाम से निकाला गया। यह साप्ताहिक समाचार पत्र था। 1818 ई. में मार्शमैन के नेतृत्व में बंगाली भाषा में ‘‘दिग्दर्शन’’ मासिक पत्र प्रकाशित हुआ, लेकिन यह पत्र जल्दी ही बंद हो गया। इसी समय मार्शमैन के संपादन में एक और साप्ताहिक समाचार पत्र ‘‘समाचार दर्पण’’ प्रकाशित किया गया। 1821 ई. में बंगाली भाषा में साप्ताहिक समाचार पत्र ‘‘संवाद कौमुदी’’ का प्रकाशन हुआ। इस समाचार पत्र का प्रबन्ध राजा राममोहन राय के हाथों में था। राजा राममोहन राय ने सामाजिक तथा धार्मिक कुरीतियों के विरोधस्वरूप ‘‘समाचार चंद्रिका’’ का मार्च, 1822 ई. में प्रकाशन किया। इसके अतिरिक्त उन्होंने अप्रैल, 1822 में फारसी भाषा में ‘‘मिरातुल’’ अखबार एवं अंग्रेजी भाषा में ‘‘ब्राह्मनिकल मैगजीन’’ का प्रकाशन किया। 1790 के बाद भारत में अंग्रेजी भाषा की और कुछ अखबार स्थापित हुए जो अधिकतर शासन के पक्षधर थे। सन् 1819 में भारतीय भाषा में पहला समाचार-पत्र प्रकाशित हुआ था। वह बंगाली भाषा का पत्र ‘संवाद कौमुदी’ था। उसके प्रकाशक थे राजा राममोहन राय। 1822 में गुजराती भाषा का साप्ताहिक ‘मुंबईना समाचार’ प्रकाशित होने लगा, जो दस वर्ष बाद दैनिक हो गया और गुजराती के प्रमुख दैनिक के रूप में आज तक विद्यमान है। भारतीय भाषा का यह सब से पुराना समाचार-पत्र है। 1826 में ‘उदंत मार्तंड’ नाम से हिंदी के प्रथम समाचार-पत्र का प्रकाशन प्रारंभ हुआ। यह साप्ताहिक पत्र 1827 तक चला और पैसे की कमी के कारण बंद हो गया। सन् 1830 में राममोहन राय ने बड़ा हिंदी साप्ताहिक ‘बंगदूत’ का प्रकाशन शुरू किया। यह बहुभाषीय पत्र था, जो अंग्रेजी, बंगला, हिंदी और फारसी में निकलता था।
1857 ई. में हुए विद्रोह के परिणामस्वरूप सरकार ने 1857 ई. का ‘‘लाईसेंसिग एक्ट’’ लागू कर दिया। अनुज्ञप्ति अधिनियम 1857 और समाचार-पत्र पंजीकरण अधिनियम 1867 ने हर मुद्रित पुस्तक एवं समाचार पत्र के लिए यह आवश्यक कर दिया कि वे उस पर मुद्रक, प्रकाशक एवं मुद्रण स्थान का नाम लिखें। पुस्तक के छपने के बाद एक प्रति निःशुल्क स्थानीय सरकार को देनी होती थी। इसे हम भारतीय पत्रकारिता की पहली जनरेशन का नाम दे सकते हैं।
दूसरी जनरेशन में उन छापेखानों में समाचारपत्र छपते रहे जहां फर्मा में एक-एक अक्षर को सेट कर के अखबार के पन्ने तैयार किए जाते थे। इस मामले में अंग्रेजी के समाचारपत्र की अपेक्षा हिन्दी के अखबारों के लिए यह कहीं अधिक दुरूह काम था क्योंकि कम्पोजीटर्स को अक्षरों के साथ मात्राएं और अनुस्वार की बिन्दी भी सेट करनी पड़ती थी। आंखे गड़ा कर करने वाला काम। इस काम की कठिनाई वे नहीं समझ सकते हैं जिन्होंने सीधे ग्लोबलयुग में पत्रकारिता जगत पांव रखा हैं। भारत में समाचारपत्रों की छपाई और पत्रकारिता के विकास को जानने एवं समझने के लिए एक महत्वपूर्ण स्थान है भोपाल स्थित माधवराव सप्रे स्मृति समाचार पत्र संग्रहालय एवं शोध संस्थान।

जहां तक भारत में पत्रकारिता के स्वरूप में आए आधुनिक बदलाव की बात की जाए तो 1995 में भारत में इंटरनेट की शुरुआत हुई और उसी समय से भारतीय पत्रकारिता का ग्लोबल स्वरूप विकसित होने लगा। नई मीडिया प्रौद्योगिकियों ने अपने उपभोक्ताओं को ‘कनवर्जेंस’ (सहज उपलब्धता) का उपहार दिया जो मोबाइल फोन के जरिए उन तक पहुंचने लगा। इससे मीडिया का जो विस्तार हुआ कि संचार माध्यम और पत्रकारिता ने एकरूप हो कर ‘मीडियास्फेयर’ जैसी स्थिति बना दी।  मीडियास्फेयर अर्थात मीडिया की सामूहिक पारिस्थितिकी, जिसमें समाचार पत्र, पत्रिकाएं, टेलीविजन, रेडियो, किताबें, उपन्यास, विज्ञापन, प्रेस विज्ञप्ति, प्रचार और ब्लाग जगत यानी सभी मीडिया प्रसारण और प्रकाशित दोनों शामिल हों। लेकिन यहां यह सब बताने का उद्देश्य भारतीय पत्रकारिता का इतिहास बताना नहीं है बल्कि इस बात को देखना है कि हमारा पत्रकारिता जगत कहां से चल कर कहां आ गया है। इसने इंटरनेट के जरिए बड़ी छलांग लगाई है। यह अपडेट और लाईव अपडेट के द्वारा हमें चौंकाता है। मुद्रित सामग्री डिज़िटल मुद्रण के द्वारा ‘‘फील एलाइव’’ कराती है। गोया हम सब कुछ करीब से देख रहे हो। किन्तु इसके साथ ही आज की पत्रकारिता पर जो सबसे बड़ा संकट दिखाई देता है, वह है पूंजीपतियों और राजनीति का दबाव। आज हम बड़े-बड़े मीडिया संस्थान बिकते हुए देखते हैं। प्रखर और मुखर पत्रकारों का मनोबल तोड़ने के लिए उन्हें ‘‘ट्रोल’’ होते हुए देखते हैं।

आज की पत्रकारिता का एक और पक्ष है जो आज भी ‘‘पीत पत्रकारिता’’ को चरितार्थ करने में जुटा रहता है और ऐसे तत्वों के हाथ लग चुका है डिजिटल माध्यम का हथियार। निजी एप्प, यूटयूब चैनल, व्हाट्सअप्प आदि के जरिए ऐसे कई समाचार माध्यम काम कर रहे हैं जिनका न तो कोई पंजीयन है और न कोई प्रिंटलाईन। इसके एक स्वरूप का अनुभव मुझे स्वयं भोपाल में हुआ जब मैं कोरोना काल के पूर्व वहां रवीन्द्र भवन में कहानी पाठ के लिए गई थी। कार्यक्रम समाप्त होने पर जैसे ही हम दो-तीन कथाकार भवन से बाहर आए वैसे ही दो युवक माईक और कैमरा लिए मेरे सामने आ खड़े हुए। एक ने कहा कि ‘‘मैम हम आज के इस आयोजन पर आपकी एक बाईट चाहते हैं। क्या आप बताएंगी कि आपको यह आयोजन कैसा लगा?’’ यह देखकर मुझे अच्छा लगा कि साहित्यिक आयोजन के प्रति इलेक्ट्राॅनिेक मीडिया में इतनी गहरी रुझान है। मैंने उस युवक के सभी प्रश्नों के प्रसन्नतापूर्वक उत्तर दिए। उसके साथ वाला युवक वीडियोग्राफी कर रहा था। मेरे बाद वे लोग दूसरे साहित्यकार की ओर मुखातिब हो गए। तभी मेरा ध्यान गया कि उनके माईक पर कोई लोगो नहीं था। सो, मैंने उनसे पूछा कि यह किस चैनल के लिए आप लोगों ने लिया है? तभी एंकर टाईप की एक युवती प्रकट हुई और उसने मुझसे कहा,‘‘मैम आप अपना फोन नंबर दे दीजिए, हम आपको सारी जानकारी व्हाटसअप्प कर देंगे।’’ मैं कुछ कह पाती इससे पहले ही वह बोल उठी,‘‘और हां मैम, आप हमारी कुछ आर्थिक मदद भी कीजिए।’’ मैंने उसे टटोलने के हिसाब से कहा कि ‘‘ठीक है मैं आर्थिक मदद कर दूंगी लेकिन ये तो बताइए कि आपका चैनल कौन-सा है?’’ आर्थिक लाभ की आशा में उसने बता दिया कि उन लोगों का यूट्यूब चैनल है। यह सुनते ही मेरी समझ में सारा माज़रा आ गया। मैंने उसे दो-टूक शब्दों में कह दिया कि मैं कोई सहायता राशि देने वाली नहीं हूं, चाहे तो मेरी बाईट मत दिखाइए। लेकिन इसके साथ ही मुझे लगा कि यह आधुनिक पत्रकारिता को बदनाम करने वाला वह फेज़ है जो अपनी हरकतों से सेंसरशिप के रास्ते खोल देता है और इससे स्वस्थ पत्रकारिता को भी चोट पहुंचती है।
डिजिटल माध्यम के कई ऐसे कथित न्यूज चैनल्स और अखबारों (टोटली पीडीएफ बेस्ड) के कारण आम आदमी के मन में भी यह विचार उठने लगता है कि इन पर कोई लगाम क्यों नहीं लगाता? शायद राॅबर्ट रेडफोर्ड ने इसीलिए कहा था कि -‘‘सूचना के लोकतंत्रीकरण के कारण पत्रकारिता बहुत बदल गई है। कोई भी व्यक्ति इंटरनेट पर कुछ भी डाल सकता है। इसलिए सच का पता लगाना और ज्यादा मुश्किल हो गया है।’’

इलेक्ट्राॅनिक मीडिया सनसनी फैलाने की पत्रकारिता में ढल गया है और प्रिंट मीडिया भी पीछे नहीं है। वह भी अपराध की खबरों को इस प्रकार से छापता है जैसे कभी ‘‘मनोहर कहानियां’’ या ‘‘सत्यकथा’’ जैसी पत्रिकाएं छापा करती थीं। उस समय ये पत्रिकाएं हर घर में नहीं आती थीं, लेकिन आज समाचारपत्र हर घर में आता है और टीवी हर घर में देखी जाती है। ऐसा नहीं है कि स्थिति सिर्फ़ बुरी ही हो। लेकिन चांद पर दिखने वाला एक दाग भी उसकी खूबसूरती को कम कर देता है। अतः यदि तकनीकी पक्ष को छोड़ दिया जाए तो समूचे परिदृश्य को देख कर यह तय करना कठिन हो जाता है कि हम पत्रकारिता के किस जनरेशन में चल रहे हैं? एक ओर दुनिया के बड़े से बड़े आतंकी संगठन पत्रकारों के दुश्मन बने हुए हैं, बड़े-बड़े राजनेता पत्रकारिता को अपने पक्ष में करने के लिए हर तरह के प्रयास में जुटे रहते हैं क्योंकि आज पत्रकारिता का जो स्वरूप है वह सेंसेक्स को उठाने और गिराने की क्षमता रखता है, सत्ता परिवर्तन की ताकत रखता है और आमजन को सच की तस्वीर दिखाने का माद्दा रखता है। इनटेल के अनुसार इस समय कम्प्यूटर युग की 12 वीं जनरेशन चल रही है तो हम यह मान सकते हैं कि अपनी तमाम कमियों और कमजोरियों के बाद भी भारतीय पत्रकारिता की कम से कम सातवीं जनरेशन को चल ही रही है।

तो सातवीं जनरेशन (मेरे अपने आकलन के अनुसार) की इस पत्रकारिता में एक कमी यह है कि इसमें अभी भी लैंगिक अनुपात में भारी अंतर है। फिर भी राष्ट्रीय प्रेस दिवस पर यह आशा की जा सकती है कि आधुनिक पत्रकारिता छद्म या पीत पत्रकारिता के दाग को पोंछ कर, लैंगिक अनुपात सुधारते हुए जल्दी ही छलांग लगा कर कई जनरेशन आगे बढ़ जाएगी। साथ ही यह भी आशा करनी चाहिए कि स्वस्थ पत्रकारिता सभी दबावों से मुक्त रहे। वरना अंत में फिर बकौल अकबर इलाहाबादी -

चश्म-ए-जहां से हालत-ए-असली छुपी नहीं
अख़बार में जो चाहिए वो छाप दीजिए।
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