Tuesday, December 13, 2022

सागर का नाट्य परिदृश्य | लेख | डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह, नाट्यलेखिका एवं साहित्यकार

Dr (Miss) Sharad Singh, Author,
Novelist, Social Activist &
Drama Writer

लेख

सागर का नाट्य परिदृश्य

- डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह

नाट्यलेखिका एवं साहित्यकार


(इस लेख की लेखिका के दो नाटक संग्रह ‘‘आधी दुनिया पूरा धूप’’ तथा ‘‘गदर की चिंगारियां’’ प्रकाशित हो चुके हैं। इनके नाटक ‘‘छुईमुई डाॅट काॅम’’ का प्रसार भारती द्वारा देश के बड़े पांच शहरों में मंचन कराया जा चुका है। ये दूरदर्शन, रेडियो तथा यूनीसेफ के लिए भी नाटक लिख चुकी हैं।)                      

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सागर की भूमि साहित्य और प्रदर्शनकारी कलाओं के लिए अत्यंत उर्वर है। इस भूमि में कई नाटक रचे गए, कई नाटक मंचित हुए और कई रंगकर्मी देश की बड़ी-बड़ी नाट्य संस्थाओं एवं मिल्मी दुनिया तक पहुंचे हैं। लेकिन इस माटी का मोह उन्हें बार-बार सागर खींच लाता है। चाहे मुकेश तिवारी हों या गोविन्द नामदेव या फिर संगीत श्रीवास्तव ये सभी सागर आ कर नाट्यमंचन द्वारा अपने अतीत की स्मृतियों को ताज़ा करते हैं तथा युवा रंगकर्मियों को मार्ग दिखाते हैं। सागर में इप्टा की इकाई भी रही है जिसके अंतर्गत नुक्कड़ नाटक खेले गए किन्तु आज यहां इप्टा की सागर इकाई के बारे में जानकारी देने वालों की भी कहै। कारण कि लोग धीरे-धीरे अपनी-अपनी ज़िन्दगी में व्यस्त होते चले गए। सागर के समूचे नाट्य परिदृश्य को जानने के लिए अतीत में झांकने पर पता चला कि आज सागर के नाट्य कौशल को जिस नाट्य संस्था ‘‘अथग’’ के रूप में ख्याति प्राप्त है, इससे पहले एक और नाट्य संस्था यहां बड़ी मेहनत से काम कर चुकी है, जिसका नाम था ‘‘प्रयोग’’। इस संस्था के बारे में सबसे पहले उमाकांत मिश्र जी ने मुझे बताया जो स्वयं उसके नाटकों में अभिनय किया करते थे। फिर जयशेखर परोचे ने चर्चा की। इस संस्था से जुड़े अनिल शर्मा के बारे में उनके भतीजे जो पत्रकारिता विभाग में रहे हैं, डाॅ राकेश शर्मा से चर्चा के दौरान उन्होंने डाॅ विनोद दीक्षित से चर्चा करने का सुझाव दिया। डाॅ विनोद दीक्षित ने बताया कि डाॅ. कल्पना सैनी प्रयोग संस्था की सेक्रेटरी रह चुकी हैं,अतः मुझे उनसे जानकारी लेनी चाहिए। डाॅ. कल्पना सैनी से फोन पर चर्चा के दौरान उन्होंने अपने पति योगेन्द्र सैनी से संवाद कराया। डाॅ. योगेन्द्र सैनी ने मुझे संस्था के बारे में अत्यंत विस्तृत जानकारी दी।

यह पूरा सिलसिला बताने के पीछे मेरा उद्देश्य यह है कि मैंने प्रयास किया है कि सागर का समूचा नाट्य परिदृश्य इस छोटे से लेख में आ जाए किन्तु इसे लिखते समय मुझे लग रहा है कि सागर का नाट्य परिदृश्य एक महासागर है और इसे छोटे- से इस लेख रूपी गागर में नहीं समाया जा सकता है। फिर भी प्रस्तुत हैं कुछ प्रमुख जानकारियां। जो नाम, संदर्भ, प्रसंग छूट रहे हैं, वे इरादतन नहीं वरन सीमावश छूट रहे हैं। 

सागर के वरिष्ठ रंगकर्मी रविंद्र दुबे कक्का से प्राप्त जानकारी के अनुसार सागर में पंडित स्वर्गीय श्री लोकनाथ सिला कारी द्वारा स्वतंत्रता प्राप्ति के पूर्व ‘‘दीवान हरदौल जू’’े नाम से एक नाटक लिखा गया था। 50 के दशक में लिखे गए इस नाटक का मंचन सागर के तत्कालीन रंगकर्मी लक्ष्मी नारायण सिलाकारी, सेन बंधुओं और सर्राफ आदि ने मिलकर किया था। इसी प्रकार इसी समय काल में एक और नाटक का मंचन भी सागर स्थित राधा टॉकीज से लगकर बने एक हॉल में किया गया था, जिसमें अभिनेता और अभिनेत्री के रूप में राजा दुबे एवं रामकली मिश्रण थे। इसके बाद एक उसी दौर में प्रभात भट्टाचार्य के निर्देशन में कालीबाड़ी मंदिर परिसर गोपालगंज में मंचित किया गया था। इस तरह एक दीर्घ परंपरा जुड़ी हुई है सागर के नाटय जगत से।


प्रयोग थिएटर ग्रुप

प्राप्त जानकारी के अनुसार सागर में अन्वेषण थिएटर ग्रुप के पूर्व एक और थिएटर संस्था थी जिसका नाम था - प्रयोग थिएटर ग्रुप। इसे सुप्रसिद्ध कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान के पुत्र विजय चौहान ने स्थापित किया था। इस संबंध में हटा के लोक संस्कृतविद डाॅ श्यामसुंदर दुबे ने भी बताया। युवा उत्सव में चेखव की कहानी का मंचन किया था। प्रयोग संस्था के बैनर तले नाटक ‘‘अंधायुग’’ एवं ‘‘फरार फौज’’ का मंचन भी किया था और इस प्रस्तुति की एक खास बात यह थी कि जीप को चलाकर मंच पर लाया गया था जो अपने आप में सागर के मंच के लिए पहली घटना थी। नाटक ‘‘फरार फौज’’ में डॉ. विजय चौहान, जितेंद्र कुमार शर्मा, सत्येंद्र कुमार तिवारी, विवेकदत्त झा, मल्लिकार्जुन, रमेश दुबे, हंसराज नामदेव, कैलाश चंद्र सिंह आदि ने भी अभिनय किया था। इसमें रमेश दुबे ने मंच एवं मंच से प्रयोग किया था।

प्रयोग थिएटर ग्रुप में सचिव रह चुकी डाॅ. कल्पना सैनी तथा उनसे भी पहले से इस ग्रुप में से संबद्ध रहे उनके पति डाॅ. योगेन्द्र सैनी से विस्तृत चर्चा में प्रयोग संस्था के बारे में अनेक महत्वपूर्ण जानकारी मिली। उस समस्त जानकारी को इस सीमित लेख में दे पाना संभव नहीं है। अतः उस बारे में कभी अलग से स्वतंत्र लेख लिखूंगी। फिर भी कुछ बातें यहां देना चाहती हूं। जैसा कि डाॅ. योगेन्द्र सैनी जी ने बताया कि आरम्भ में महिला पात्र के लिए अभिनेत्रियां नहीं मिलती थीं अतः ऐसे नाटकों का चयन किया जाता था जिसमें सिर्फ़ पुरुष पात्र हों। प्रयोग के द्वारा ‘‘अंधेर नगरी चैपटराजा’’ और ‘‘मैकबेथ’’ जैसे नाटकों का सफलतापूर्वक कई बार मंचन किया गया। उस दिनों नाटकों के लिए किसी भी प्रकार की ग्रांट की व्यवस्था नहीं थी अतः नाट्यदल अपनी क्षमता के अनुसार पैसे कंट्रीब्यूट कर के मंचन के लिए सुविधाएं जुटाता था। बाद में कुछ महिलाएं इसमें बतौर अभिनेत्री जुड़ीं जिन्हें घर पहुंचाने का जिम्मा संस्था के पुरुषों का रहता था। इस संस्था उमाकांत मिश्र, अनिल शर्मा आदि भी जुड़े रहे। वर्तमान में श्यामलम संस्था का संचालन कर रहे उमाकांत मिश्र ने उत्पल दत्त लिखित नाटक ‘‘फरार फौज’’ का ब्रोशर उपलब्ध कराया। यह एक महत्वपूर्ण दस्तावेज़ है। ‘‘फरार फौज’’ नाटक का अनुवाद किया था - महेश प्रसाद जयसवाल, नरेन्द्र सिंह, मिहिर चटर्जी तथा विवेकदत्त झा ने। इसका निर्देशन भी मिहिर चटर्जी ने किया था। इसमें बलभद्र तिवारी, रघु ठाकुर, विष्णु पाठक, विवेकदत्त झा, श्रीनाथ शर्मा एवं उमाकांत मिश्र आदि का व्यवस्था से ले कर अभिनय तक सहयोग था।

बाद में प्रो. विजय सिंह चौहान अमेरिका चले गए और इसी तरह कई अन्य सदस्य भी अपनी-अपनी आजीविका के कारण दूसरे शहरों में चले गए। परिणामतः प्रयोग संस्था बंद हो गई। 


अन्वेषण थिएटर ग्रुप 

सागर शहर के गोविंद नामदेव का चयन राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय दिल्ली में हो गया था और वहां से निकलने के बाद वह वही रंग मंडल में शामिल होकर रंग कर्म करने लगे थे उनका जब भी सागर घर आना होता था तो वह सागर में स्थानीय शौकिया रंग कर्मियों को रंगकर्म की बारीकियों से अवगत कराया करते थे इसी से प्रेरणा लेकर मुकेश तिवारी, आशुतोष राणा, श्रीवर्धन त्रिवेदी, महेश मेवाती भी राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय दिल्ली में चयनित हुए और रंगकर्म की विधा में प्रवीणता प्राप्त की। मुकेश तिवारी ने वहां से अध्ययन करने के बाद सागर आकर सबसे पहले नाटक ‘‘कोर्ट मार्शल’’ का निर्देशन किया। सन 1992 में अन्वेषण थिएटर ग्रुप की नींव पड़ी। अन्वेषण थिएटर ग्रुप यानी ’’अथग’’ शौकिया रंग कर्मियों का दल के रूप में मुकेश, पंकज तिवारी, राकेश सोनी, जगदीश शर्मा, आनंद जैन, रविंद्र दुबे कक्का, के निर्देशन में अनेक नाट्य प्रस्तुति सागर सहित दमोह, जबलपुर, बालाघाट, भोपाल, दिल्ली, चंडीगढ़ आदि जगहों पर लगातार करते हुए भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय से प्राप्त ग्रांट से 18 कलाकारों का संपूर्ण रंगमंडल बना चुका है, जिसके गुरु गोविंद नामदेव हैं।

यहां प्रस्तुत अन्वेषण थिएटर ग्रुप की सम्पूर्ण जानकारी ग्रुप के वरिष्ठ रंगकर्मी रविन्द्र दुबे ‘कक्का के सौजन्य से प्राप्त है। उनका यह सहयोग इस लेख की लेखिका के लिए अति महत्वपूर्ण रहा है। इसमें उनके उस लेख के आधार पर साभार समाहित कर रही हूं जो डाॅ. लक्ष्मी पांडेय द्वारा संपादित ‘‘ये है बुंदेलखंड (भाग-दो)’’ में प्रकाशित हुआ था। बा व कारंत ने सन 1997 में प्रस्तुति परक कार्यशाला में बुंदेलखंड के साथ ही अविभाजित मध्यप्रदेश के सुदूर क्षेत्रों से आए जैसे भोपाल, इटारसी बालाघाट, दुर्ग, भिलाई के रंग कर्मियों को प्रशिक्षित किया गया था। जयंत देशमुख द्वारा बनाए गए मुक्ताकाश मंच पर सिविल लाइन स्थित मलैया बंगला में लगातार 9 दिन तक इसकी प्रस्तुतियां की गई थी जिन्हें देखने गोविंद नामदेव के साथ मुंबई से सिने अभिनेता अनुपम खेर भी आए थे। हबीब तनवीर जी ने भी भारत भवन के रंग कर्मियों को सागर लाकर अन्वेषण थिएटर ग्रुप के साथ 10 दिवसीय 1998 में आल्हा गायन और रंग कार्यशाला की थी इसमें उन्होंने ‘‘मुद्राराक्षस’’ और ‘‘जिन लाहौर नहीं देख्या, ओ जन्माई नई’’ का पाठ और अभ्यास कराया था। इसमें प्रमुख रूप से अनूप जोशी, विभा मिश्रा, सरोज शर्मा आदि वरिष्ठ रंगकर्मी भी शामिल हुए थे।

मुकेश तिवारी ने अन्वेषण थिएटर ग्रुप में प्रस्तुति पर 35 दिवसीय कार्यशाला आयोजित की थी, कि जिसके अंतर्गत 1996 में ‘‘मुख्यमंत्री’’ नामक नाटक का मंचन किया गया था। अन्वेषण थिएटर ग्रुप को भारतीय रंग महोत्सव में 2003 में प्रथम बार भाग लेने का सुअवसर प्राप्त हुआ था। इसके बाद दूसरी बार 2024 में जगदीश शर्मा निर्देशित नाटक ‘‘सुदामा के चावल’’ की प्रस्तुति भारतीय रंग महोत्सव में की गई। अन्वेषण थिएटर ग्रुप के द्वारा 1997-98 में रंग कबीर नाट्य समारोह, 1999 में तीन दिवसीय नाट्योत्सव, 2000 में पांच दिवसीय ग्रीष्मकालीन नाट्य महोत्सव, 2018 में चार दिवसीय अन्वेषण नाट्य समारोह आयोजित कर के बाहर के थिएटर ग्रुपों की प्रस्तुतियां सागर में की गई। 

वीर मधुकर शाह बुंदेला के गौरवपूर्ण कार्य और उनके जीवन पर फिल्म अभिनेता गोविंद नामदेव एक नाटक लिखा -‘‘मधुकर कौ कटक’’। इसका निर्देशन भी उन्होंने किया। उनके सह निर्देशक कर थे  मुंबई से आए डायरेक्टर संतोष तिवारी। एनएसडी, अथग और सागर विश्वविद्यालय के संयुक्त तत्वावधान में जो एक माह की वर्कशॉप की गई, उसी के प्रशिक्षणार्थियों को अभिनय के लिए चुना गया। यद्यपि कुछ अन्य लोग भी शामिल किया गया। इस नाटक ने सागर के जनमानस में गहरी पैंठ बनाई। 

अन्वेषण थिएटर ग्रुप के सदस्य रहे राकेश सोनी ने सागर हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय में सेवारत रहते हुए विश्वविद्यालय के छात्रों को लेकर रंगकर्म जारी रखा तथा अनेक बार राष्ट्रीय युवा महोत्सव में प्रथम स्थान प्राप्त किया। अन्वेषण थिएटर ग्रुप ने अनेक रंगकर्मियों को न केवल प्रशिक्षित किया अपितु मंच भी प्रदान किया। अथग ने आशीष ज्योतिषी, पंकज सिंह जार्ज, पदम सिंह, अवधेश कुशवाहा, असरार अहमद, अमजद खान, कपिल नाहर, आशुतोष तिवारी, जयशेखर परोची, राकेश शुक्ला, शिवकांत ढिमोले, अतुल श्रीवास्तव, आशीष चौबे, बृजेश शर्मा, सचिन नायक आदि को स्थापना  दी। 

तथागत नाट्य संस्था

अन्वेषण थिएटर ग्रुप द्वारा गोविंद नामदेव के निर्देशन में आयोजित की गई प्रस्तुति पर कार्यशाला 2013 में नए-नए अनेक रंग कर्मियों ने भाग लिया था इसमें लगभग 55 लोगों ने प्रशिक्षण पाया था। गोविंद नामदेव की कार्यशाला से प्रशिक्षण पाकर निकले कुछ तरुण रंग कर्मियों की टोली ने अन्य ऊर्जावान साथियों को जोड़ कर एक नाट्य ग्रुप बनाया जिसका नाम रखा तथागत नाट्य संस्था। इस संस्था में शुभम उपाध्याय, राहुल वर्मा आशीष तिवारी अप्रतिम मिश्रा विश्वनाथ पटेल संजय आशा डीप गंगा साहू दीक्षा साहू आदित्य, निर्मलकर आदि रंगकर्मी रहे हैं। 

रंग थिएटर फोरम 

थिएटर फोरम कलर के विभिन्न क्षेत्रों के प्रगतिशील कलाकारों का समूह है। क्षेत्र के प्रमुख हिंदी थिएटर समूह में से एक रंग थिएटर फोरम सौंदर्य वाली रूप से नवीन और सामाजिक रूप से प्रासंगिक थिएटर के लिए प्रतिबद्ध है। 2008 में इसकी स्थापना के बाद से रंग थिएटर फोरम ने रंगमंच के प्रशिक्षण के क्षेत्र में अद्भुत कार्य करते हुए देश के अनेक हिस्सों में कार्यशाला का आयोजन किया है जिसमें देश-विदेश के अनेक जाने-माने विद्वानों ने प्रशिक्षण दिया है। थिएटर कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य नए कलाकारों को रंगकर्म के लिए आत्मनिर्भर बनाना है तथा  समकालीन मुद्दों और प्रचलित सामाजिक समस्याओं पर एक संवाद के निर्माण करने हेतु प्रशिक्षित करना है। रंग थिएटर फोरम ने विभिन्न सामाजिक राजनीतिक परिदृश्य के नाटकों का मंचन करते हुए क्षेत्रीय रंगमंच के दृश्य में भी खुद को स्थापित किया है। यह समूह समकालीनता के साथ मनोरंजन के बेहतरीन साधन प्रदान करते हुए हमारी समय की रूपरेखा को रेखांकित कर रहा है।

रंग थिएटर फोरम आचार्य राधावल्लभ त्रिपाठी जैसे प्रसिद्ध साहित्यकार एवं संस्कृतविद्  के नाटकों का भी मंचन कर चुका है। राधावल्लभ त्रिपाठी संस्कृत को आधुनिकता का संस्कार देने वाले विद्वान माने जाते हैं। उनके द्वारा लिखी गई कथा ‘‘विक्रमादित्य कथा’’ एक असाधारण कृति है। संस्कृत के महान गद्यकार महाकवि दंडी पद लालित्य के लिए विख्यात हैं। ‘‘दशकुमार चरित’’ उनकी चर्चित कृति है। परंतु राधावल्लभ त्रिपाठी को उनकी एक और संस्कृत कृति ‘‘विक्रमादित्य कथा’’ की जीर्ण-शीर्ण पांडुलिपि हाथ लग गई। इस कृति को हिंदी में औपन्यासिक रूप देकर डॉ त्रिपाठी ने एक और मूल कृति के स्वरूप की रक्षा की है और वहीं दूसरी ओर उसे एक मार्मिक कथा के रूप में प्रस्तुत किया है। इस कृति से उस युग का नया परिदृश्य उद्घाटित होता है। नाट्य शास्त्र संस्कृत नाटक कार्यशाला 03.23 मार्च 2018 को विश्वविद्यालय में ‘‘विक्रमादित्य कथा’’ का मंचन रंग  थिएटर फोरम द्वारा किया गया था।

फोरम द्वारा 01-15 फरवरी 2021 को प्रोडक्शन वर्कशॅाप आयोजित किया गया था जिसमें संगीत श्रीवास्तव जैसे रंगकर्मी ने आ कर प्रशिक्षण दिया था। संगीत श्रीवास्तव ने राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से वर्ष 2013 में रंगमंच तकनीक और परिकल्पना में विशेषज्ञता के साथ स्नातक उपाधि प्राप्त की। उसके बाद वे परिकल्पना प्रशिक्षक तथा मार्गदर्शक के रुप में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से जुड़ गए। साथ ही मध्य प्रदेश नाट्य विद्यालय, भारतेंदु नाट्य अकादमी, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय सिक्किम केंद्र आदि नाट्य प्रशिक्षण केंद्रों के शैक्षणिक कार्यक्रमों से भी जुड़े रहे हैं। संगीत श्रीवास्तव ने भारत और विदेश में कई प्रसिद्ध प्रस्तुति निर्माताओं के साथ एक प्रकाश परिकल्पक एवं दृश्य रचनाकार के रूप में सहयोग किया है। एक परिकल्प प्रस्तुति निर्माता और मिक्स मीडिया कलाकार के रूप में 14 देशों में 300 से अधिक प्रस्तुतियां कर चुके हैं। ऐसे रंगकर्मी का आ कर प्रशिक्षण देना सागर के युवा रंगकर्मियों के लिए विशेष अनुभव रहा।


रंग प्रयोग थिएटर ग्रुप

लोक एवं शास्त्रीय रंगमंच तथा लोक संगीत के संवर्धन के उद्देश्य से नगर के सृजन कर्मियों ने सन 2001 में रंग प्रयोग की स्थापना की रंग प्रयोग ने अपनी यात्रा के दौरान लोक एवं शास्त्रीय प्रदर्शनकारी कलाओं के प्रति ना केवल अभिरुचि को जगाया अपितु कार्यशाला हूं उच्च समूह एवं परीक्षाओं के माध्यम से इनके सघन प्रशिक्षण का कार्य भी किया क्षेत्रीय एवं भाषिक सीमाओं को दरकिनार कर मध्य प्रदेश की समस्त लोक एवं शास्त्रीय शैलियों पर केंद्रित प्रस्तुतियां रंग प्रयोग की विशिष्ट पहचान बन चुकी है सन 2001 में 45 दिवसीय नाट्य कार्यशाला तथा नाटक एक था गधा उर्फ अल्लाह दादा की प्रस्तुति नाटक जंगल के शहर की ओर का मंचन बाल प्रतिभाओं के प्रोत्साहन हेतु छह दिवसीय राज्यस्तरीय उत्सव सागर उत्सव 2003 नगर की प्रतिभाओं को अभिनय प्रशिक्षण हेतु श्री आलोक चटर्जी तथा छाऊ नृत्य प्रशिक्षण हेतु श्री माधव वारिक द्वारा सात दिवसीय सघन प्रशिक्षण कार्यशाला। नाटक ‘‘बोझा’’ का मंचन सिने  एवं टेली तकनीक का प्रयोग। ईदगाह जैसे नाटक का मंचन। राजकुमार रायकवार के निर्देशन में यह संस्था सागर तथा सागर से बाहर  निरंतर नाटक करती रहती है।


थर्ड आई परफॉर्मर्स

नाट्य संस्था ‘‘थर्ड आई परफॉर्मर्स’’ की स्थापना 24 मार्च 2020 को शहरी एवं राष्ट्रीय पटल पर कला एवं  कलाओं द्वारा शिक्षा के विकास पर ध्यान केंद्रित करने हेतु किया गया। संस्था का मुख्य उद्देश प्रदर्शनकारी कलाओं का संरक्षण एवं संवर्धन करने के साथ  लोक कलाओं तथा बुंदेली संस्कृति का प्रचार प्रसार करना भी है। सर्व समाज में निर्धन एवं पिछड़े वर्ग के उत्थान के लिए लोक कल्याण में भागीदारी भी हमारा उद्देश्य है ,कोरोना काल के पूर्व संस्था द्वारा 50 दिवसीय नाट्य कार्यशाला के तहत नाटक पीयूष मिश्रा द्वारा लिखित ‘‘गगन दमामा बाज्यो’’ तैयार कराया गया, जिसमे लगभग 40 प्रतिभागियों ने भाग लिया। डा. हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय के सांस्कृतिक शाखा के संयुक्त तत्वाधान में शहर के विविन्न प्रायोजकों के साथ मिलकर इस नाटक की प्रस्तुति स्वर्ण जयंती सभागार हाल में की गई। वर्ष  2021 को 23 मार्च शहीद दिवस के उपलक्ष्य में संस्था द्वारा एक बार फिर नाटक ‘‘गगन दमामा बाज्यो’’ की तीन प्रस्तुति विश्वविद्यालय के स्वर्ण जयंती सभागार में की गईं । अपनी स्थापना से ही यह संस्था नाट्यकला एवं शिक्षा के क्षेत्र में कार्य करने हेतु प्रयासरत है। 

अन्य नाट्य संस्थाएं

सागर में बंसी कॉल के साथ रंग कर्म करने के बाद आकर राजेश शिल्पाचार्य, पद्मसिंह, आनंद,  राजेश पंडित और राजकुमार रैकवार ने सागर में रंगकर्म की धारा प्रवाहित करने में अपना योगदान दिया। सागर में थर्डबेल, भारतीय नाट्य कला मंच, सरस, रंग प्रयोग, रंग खोज, युवा थिएटर ग्रुप, नाट्य परिषद, तरुण सांस्कृतिक आर्ट, दर्पण थिएटर ग्रुप आदि जैसे रंगकर्मियों के समूहों ने समय-समय पर नाटकों का मंचन करके सागर में नाट्य-मंचन की परंपरा को बनाए रखने में अपना महत्वूर्ण योगदान दिया है।

सागर में नाट्यविधा के सम्पन्नता से परिपूर्ण वर्तमान परिदृश्य को देख कर आश्वस्त हुआ जा सकता है कि यहां नाट्य विधा अभी और परवान चढ़ेगी और देश के नक्शे में अपनी अलग पहचान स्थापित करेगी।

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(12.12.2022) 

पुस्तक समीक्षा | केदारनाथ अग्रवाल का काव्य | समीक्षक डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

प्रस्तुत है आज 13.12.2022 को  #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई लेखक डाॅ. महेश तिवारी के शोध ग्रंथ "केदारनाथ अग्रवाल का काव्य" की समीक्षा... 
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पुस्तक समीक्षा
केदारनाथ अग्रवाल की काव्य- विशेषताओं को रेखांकित करती पुस्तक  
समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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शोधग्रंथ  - केदारनाथ अग्रवाल का काव्य
लेखक    - डाॅ. महेश तिवारी
प्रकाशक     - वाणी प्रकाशन, 4695, 21-ए, दरियागंज, नई दिल्ली - 110002
मूल्य        - 350/-
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आलोचनाकर्म अपने आप में एक दुरूह कर्म है। आलोचना कार्य करते समय अगर कोई सबसे बड़ी बाधा आती है, तो है भावनात्मकता की। एक आलोचक को तटस्थ और कठोर होना पड़ता है। अतः उस समय यह कार्य और अधिक कठिन हो जाता है जब एक पूर्व स्थापित, पूर्व प्रतिष्ठित कवि के काव्यकर्म पर कोई शोधात्मक पुस्तक लिखी गई हो। वह भी ऐसे लेखक के द्वारा जो आलोचक के आत्मीय परिजन के समान रहा हो और अब संसार से विदा ले चुका हो। ‘‘केदारनाथ अग्रवाल का काव्य’’ ऐसी ही एक पुस्तक है जिसमें कवि केदारनाथ अग्रवाल के काव्य को शोध-संज्ञान में लिया गया है और जिसके लेखक डाॅ. महेश तिवारी इस पुस्तक के प्रकाशित हो कर उनके हाथों तक पहुंचने के ठीक दस-पंद्रह दिन पहले इस संसार से विदा ले चुके थे। चूंकि डाॅ. महेश तिवारी सागर शहर में अपने आत्मीय व्यवहार को ले कर लोकप्रिय रहे अतः उनके द्वारा अपनी इस पुस्तक को न देख पाना सभी के लिए दुखद रहा। शायद हम इसीलिए नियति अथवा प्रारब्ध का हवाला दे कर स्वयं को समझाने का रास्ता ढूंढ निकालते हैं। सो, जब यह पुस्तक समीक्षा हेतु मेरे पास आई तो मेरे लिए यह चुनौती थी कि मैं अपना आलोचनाकर्म ईमानदारी से कर सकूंगी या नहीं? किन्तु ईमानदारी मेरे स्वभाव में ही है अतः इस पुस्तक को पढ़ कर समीक्षा करते समय मैंने अपनी भावनात्मकता को आड़े नहीं आने दिया और सदा कि भांति एक कठोर आलोचक की भांति अपने कर्तव्य को पूरा किया।

केदारनाथ अग्रवाल की कविताओं में प्रगतिशीलता की एक ऐसी धारा प्रवाहित होती दिखाई देती है जिसमें अव्यवस्थाओं के प्रति ललकार के साथ आंतरिक कोमलता भी निहित है। वे प्रगतिशील आंदोलन की कविताओं की भांति प्रकृति को छोड़ कर नहीं चलते हैं वरन वे प्रकृति से तादात्म्य स्थापित करते हुए मनुष्यों के अमानवीय व्यवहार की बात करते हैं। केदारनाथ अग्रवाल की इस काव्यात्मक खूबी को लेखक डाॅ. महेश तिवारी ने बड़ी बारीकी से जांचा और परखा है। इस जांच-परख के सिलसिले में वे स्वयं केदारनाथ अग्रवाल के गांव, घर जा पहुंचें, जहां उन्होंने न केवल केदारजी की रचना प्रक्रिया को निकट से देखा बल्कि अपने प्रश्नों के उत्तर भी सीधे उन्हीं से पा लिए। इस बात का दूसरा पक्ष यह भी है कि इस पुस्तक में डाॅ. महेश तिवारी का अपने विषय के प्रति समर्पण एवं श्रम भी अनुभव किया जा सकता है।

यह पुस्तक कुल सात अध्यायों में निबद्ध है। पहला अध्याय है-‘‘केदारनाथ अग्रवाल: जीवनवृत्त, रचनाएं एवं विचारधारा’’। एक पाठक जिस कवि के रचनाकर्म के बारे में पढ़ने जा रहा हो, वह यह भी जानने को जिज्ञासु रहेगा कि वह कवि कहां रहता था? उस कवि का जीवन कैसा था? उसने किस-किस विधा में कौन-कौन-सी और कितनी रचनाएं लिखीं? पाठक को प्रायः यह जानने में भी रूचि रहती है कि जिसके बारे में वह पढ़ने जा रहा है, उस कवि की विचारधारा क्या थी? इन सभी बुनियादी प्रश्नों को ध्यान में रखते हुए डाॅ. महेश तिवारी ने पहले अध्याय की सामग्री संजोई है। इसमें केदारनाथ अग्रवाल के जन्म से ले कर अध्ययन, आजीविका और महाप्रयाण तक का पूरा विवरण मौजूद है। उनके दादा, परदादा तक के बारे में जानकारी इसमें दी गई है। इसी अध्याय में केदारनाथ अग्रवाल को मिले पुरस्कारों एवं सम्मानों का विवरण है। रचना वर्ष की जानकारी सहित उनकी गद्य एवं पद्य रचनाओं का उल्लेख है।
       केदारनाथ अग्रवाल की विचारधारा के संबंध में डाॅ. महेश तिवारी ने लिखा है कि - ‘‘प्रगतिशीलता को कवि ने अपने जीवन में दीर्घकालीन अनुभवों के दौरान ग्रहण किया है। इलाहाबाद तथा कानपुर प्रवास में उन्होंने जीवन को तथा मनुष्य को अधिक निकट से देखने का सुयोग प्राप्त किया और इन्हीं दिनों उनका सम्पर्क मार्क्सवाद विचारधरा के साथ हुआ। मार्क्सवाद को इस समय जितना कुछ समझ सके थे, उसकी अनेक बातों को उन्होंने औद्योगिक नगर कानपुर के जीवन में घटित होते हुए देखा। फलस्वरूप मार्क्सवाद दर्शन के प्रति केदारनाथ की जिज्ञासा प्रबल होती गई और बांदा आने के बाद उन्होंने माक्र्सवाद का विधिवत अध्ययन किया।’’
इस प्रकार डाॅ महेश तिवारी ने कवि के काव्य पर चर्चा करने के पूर्व उनकी विचारधरा के निर्माण की प्रक्रिया से बड़ी सहजता से परिचित करा दिया है। या यूं कहें कि केदारनाथ के काव्य को समझने के लिए एक ज़मीन तैयार कर दी है।

पुस्तक का दूसरा अध्याय है-‘‘छायावादोत्तर हिन्दी कविता’’। सन 1936 के बाद छायावाद युग की समाप्ति के लक्षण दिखाई देने लगते हैं और इसके बाद आरंभ होता है उत्तर छायावादी काव्य का युग। उत्तर छायावादी काव्य के साथ ही प्रगतिवाद का आरंभ भी हो जाता है और इसीलिए पूर्ण प्रगतिवाद आते-आते  कविताएं यथार्थ के और करीब पहुंच जाती हैं। इसी अध्याय में प्रोग्रेसिव राइटर्स एसोसिएशन कि भारत में प्रगतिशील लेखक संघ के रूप में स्थापना, प्रगतिशील लेखक संघ के अधिवेशनों एवं प्रयोगवादी कविता के सिद्धांत पक्ष को भी रखा गया है। ‘‘तार सप्तक’’ के रूप में अज्ञेय द्वारा आरंभ किए गए कविता संकलनों की जानकारी भी इस अध्याय में है। कवि केदारनाथ अग्रवाल और प्रगतिशीलता के पारस्परिक संबंध पर टिप्पणी करते हुए डॉ महेश तिवारी ने लिखा है कि- ‘‘कवि केदारनाथ अग्रवाल का संबंध यद्यपि मुख्य रूप से प्रगतिशील कविता से है फिर भी अपनी काव्य यात्रा में उन्होंने नई कविता के भी स्वस्थ पक्षों के प्रति अपना आग्रह प्रकट किया है।’’

तीसरा अध्याय है- ‘‘प्रगतिशील काव्यादर्श और केदारनाथ अग्रवाल के काव्य संबंधी विचार’’। इस अध्याय में डॉ. महेश तिवारी ने केदारनाथ अग्रवाल की कविताओं को प्रगतिशील धारा की कविताएं सिद्ध करते हुए उन्हें प्रगतिशील धारा का एक समर्थ रचनाकार माना है। लेखक ने केदारनाथ के काव्य दर्शन पर टिप्पणी करते हुए लिखा है - ‘‘कवि न केवल माक्र्सवादी दर्शन का अनुयायी है बल्कि वह दृढ़तम जीवन का दर्शन भी स्वीकार करता है। कवि की इस माक्र्सवादी आस्था को उसके समूचे कृतित्व में देखा जा सकता है। माक्र्सवाद ने उसे जीवन और साहित्य को समझने और प्रस्तुत करने की वैज्ञानिक दृष्टि और सही विधि प्रदान की है।’’
         डाॅ. तिवारी ने तीसरे अध्याय में केदारनाथ अग्रवाल के काव्यादर्शों से परिचित कराने के कारण स्पष्ट किए हैं। वे लिखते हैं कि “केदारनाथ अग्रवाल जिस प्रगतिशील काव्यधारा से संबद्ध हंै, वह माक्र्सवादी दर्शन से अनुप्राणित है। स्वयं माक्र्सवादी जीवन दर्शन के अनुयायी हैं। ऐसी स्थिति में उनके काव्य का विस्तृत अनुशीलन करने के पूर्व माक्र्सवाद द्वारा प्रस्तुत प्रगतिशील काव्यादर्शों और कवि के काव्य संबंधी अपने विचारों की एक संक्षिप्त रूपरेखा प्रस्तुत करना आवश्यक है।’’

चतुर्थ अध्याय में ‘‘केदारनाथ अग्रवाल की कविता’’ शीर्षक से उनके समस्त काव्य से परिचित कराया गया है। इस अध्याय में लेखक ने केदारनाथ अग्रवाल के सन 1947 से 1997 तक के काव्य संग्रहों का परिचय दिया है। उन्होंने लिखा है कि प्रथम तीन काव्य संग्रह ‘‘युग की गंगा’’ (1947) ’‘नींद के बादल’’ (1948) ‘‘लोक और आलोक’’ (1957) छायावाद के रोमांटिक पद से प्रारंभ होकर प्रगतिवाद की मंजिल तक उसके पहुंचने की सूचना देते हैं। डाॅ. तिवारी लिखते हैं कि- ‘‘कवि के परवर्ती कविता संग्रह उसकी प्रगतिशील काव्यधारा से पूरी तरह जुड़े हुए हैं। परंतु कवि की प्रतिभा की कुछ अत्यंत विशिष्ट रेखाएं भी देखने को मिलती हैं। विभिन्न काव्य संग्रह की कविताओं में न केवल काव्य की प्रगतिशील भाव धारा अधिक परिपक्व, संतुलित और आकर्षक रूप में हमारे समक्ष प्रस्तुत हुई है बल्कि उसकी कविताओं में एक ऐसे नए शिल्प सौंदर्य को भी प्रमुखता मिली है। जिसमें एक स्तर पर उसके काव्य को अधिक सहज बनाकर प्रस्तुत किया है तथा दूसरे स्तर पर कवि की इस क्षमता को भी प्रमाणित किया है कि उसमें भाव सौंदर्य के साथ-साथ कला और शिल्प के सौंदर्य को समन्वित करने की पूरी प्रतिभा है।’’
इसी अध्याय में केदारनाथ अग्रवाल के काव्य संग्रह ‘‘फूल नहीं रंग बोलते हैं’’, ‘‘आग का आईना’’, ‘‘गुल मेहंदी’’, ‘‘आधुनिक कवि-16’’, ‘‘पंख और पतवार’’, ‘‘हे मेरी तुम’’, ‘‘मार प्यार की थापें’’,  ‘‘बंबई का रक्त स्नान’’, ‘‘कहंे केदार खरी खरी’’, ‘‘जमुन जल तुम’’, ‘‘अपूर्वा’’, ‘‘बोल बोल अबोल’’, ‘‘जो शिलाएं तोड़ते हैं’’, ‘‘आत्मगंध’’, ‘‘अनिहारी हरियाली’’, ‘‘खुली आंखें खुले डैने’’, ‘‘पुष्पदीप’’, ‘‘वसंत में प्रसन्न हुई पृथ्वी’’ तथा ‘‘कुहूकी कोयल खड़े पेड़ की देह’’ की कविताओं पर विस्तृत टिप्पणियां प्रस्तुत की गई है।

पंचम अध्याय में है-‘‘केदारनाथ अग्रवाल के काव्य का वस्तुपक्ष’’ तथा छठें अध्याय में ‘‘केदारनाथ अग्रवाल का शिल्पपक्ष’’ विवेचित किया गया है।

सातवां अर्थात् अंतिम अध्याय उपसंहार का है जिसमें लेखक ने अपनी पुस्तक का सार-संक्षेप प्रस्तुत करते हुए केदारनाथ अग्रवाल के काव्य पर अपने निष्कर्ष दिए हैं। महेश तिवारी केदारनाथ अग्रवाल की कविता पर टिप्पणी करते हुए लिखते हैं कि ‘‘केदार का काव्य कुंठाहीन काव्य है। वह संकीर्णता से परे प्रशस्त दिशाओं की ओर गतिशील होने वाला काव्य है।’’  लेखक ने केदार के काव्य की शाश्वतता के पक्ष में उन्हीं की एक कविता का यह अंश दिया है-ं

 मुझे इंसान प्यारा है/ इंसान का दिल प्यारा है
बहुत प्यारा है /बहुत प्यारा है
बजाएं धन, दौलत और मकान दुकान के
मेरे दोस्त/ मैं अभी बहुत साल जिउंगा
और मरा भी तो/ तुम्हारी उम्र में लगातार जिऊंगा
पीढ़ी पर पीढ़ी/इसी हिंदुस्तान में रहूंगा।

पुस्तक की भूमिका आनन्द प्रकाश त्रिपाठी, आचार्य एवं पूर्व अध्यक्ष हिन्दी विभाग, अध्यक्ष संस्कृत विभाग, डाॅ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय सागर ने लिखा है। उन्होंने केदारनाथ अग्रवाल के काव्य पर अपने विस्तृत विचार सामने रखते हुए इस पुस्तक के बारे में लिखा है कि -‘‘उन्होंने (अर्थात् डाॅ. तिवारी ने) इस कृति में केदारनाथ अग्रवाल के प्रगतिशील चिंतन, उनके सामाजिक सरोकार, प्रकृति प्रेम, मानवीय सौंदर्य व प्रेम, लोक चेतना आदि विभिन्न पहलुओं से हमें परिचित कराया है। केदार की वैचारिकी के आलोक में दलित, शोषित, पीड़ित और स्त्री के प्रति ग्रहण संवेदनशीलता और सहानुभूति ही नहीं दिखाया है, अपितु जनता के प्रतिरोधी स्वर को भी रेखांकित किया है। वस्तुनिष्ठ भाषा और काव्य की गहन समझ के आधार पर डॉ. तिवारी ने केदारनाथ अग्रवाल के काव्य का जो मूल्यांकन किया है, वह अत्यंत सारगर्भित और आलोचकीय है। विवेक का परिचायक है।’’

डाॅ आनन्द प्रकाश त्रिपाठी ने लेखक के जिस कौशल की ओर संकेत किया है, उसी कौशल के कारण इस पुस्तक के कलेवर और शिल्प में जो परिपक्वता है उसने मेरे आलोचकीयकर्म को धर्म संकट से बचा लिया। मुझे इस पुस्तक में ऐसा कोई तत्व नहीं मिला जिसके कारण मुझे आलोचकीय कठोरता बरतनी पड़े। यह पुस्तक कवि केदारनाथ अग्रवाल की काव्य विशेषताओं को सहजता, सरलता, रोचकता और बड़े ही चातुर्यता से प्रस्तुत करती है। इस एक पुस्तक को पढ़ कर ही केदारनाथ अग्रवाल के विचारों और उनकी कविताओं को भंली-भांति समझा जा सकता है। इस दृष्टि से यह पुस्तक न केवल पठनीय अपितु संदर्भ ग्रंथ के रूप में संग्रहणीय भी है।  
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#पुस्तकसमीक्षा #डॉसुश्रीशरदसिंह #BookReview #आचरण #DrMissSharadSingh  #शोधग्रंथ

Sunday, December 11, 2022

Article | Climate Change Vs Human Rights | Dr (Ms) Sharad Singh | Central Chronicle

Article
Climate Change Vs Human Rights
     -    Dr (Ms) Sharad Singh
Writer, Author & Social Activist
Blogger - "Climate Diary Of Dr (Ms) Sharad Singh"

When we talk about human rights, first of all we remember the legal rights of humans. Whereas along with legal rights. Those rights should also be remembered with it which should be found as a creature. Such as pure air, clean water, good health and better life. But the air filled with poisonous gases, the forests being cut, the water sources are also snatching the basic rights from humans. Therefore, we have to understand the mutual relations of climate change and human rights.
Developed countries have played the biggest role in climate change in the name of indiscriminate development, but the developing countries of the third world have to bear the brunt of it. There are not many discussions about climate change in our country, but the consequences of this change are taking away their health and breathe from humans like a silent killer. This harmful change affects even the clean looking areas. Not just a specific region, it has become a problem of the entire world climate.

India is the fourth largest consumer in the world in overall energy, as well as the third largest carbon emitter country in the world. Climate change is posing both direct and indirect threats to human rights. These include the right to food, the right to water and sanitation, the right to access affordable commercial energy and, by extension, the right to development. The issues of large-scale forced migration, the risk of climate-related conflict situations, direct and indirect threats to health and health systems, and impacts on land and livelihoods show that climate change and human rights concerns are closely intertwined are related to each other. At stake is not only the right to live with dignity but also the right to life. At the heart of the problem of climate change is a unique irony—the countries that have been least responsible for the problem are the ones most likely to be affected by it. Greenhouse gases are being generated due to the economic activities of the developed countries, but the greatest change of climate change will be seen on the poor countries. Those who are already problematic and disadvantaged will be more affected than those who are better equipped to cope. Climate change will affect all countries, but it will not affect everyone equally.

India is home to an estimated 33% of the world's poorest 1.2 billion people. This is especially relevant for an emerging economy like this one. It is very important to protect the right to development because here this fact is related to the right to life. A successful approach in this sense would be one in which environmental protection and poverty alleviation is not seen as completely separate goals. On what moral basis do you defend a universe in which one-third of human beings do not see more than four decades of life, while one-seventh of the population lives more than eight decades.
Countries around the world have expressed their concerns about climate change. In such a situation, a human rights group issued a warning about climate change. The human rights group said that about one billion children are at extreme risk due to damage from climate change. Water scarcity affects 920 million children worldwide, while diseases such as malaria and dengue affect about 600 million, said Dutch NGO Kids Rights, based on data gathered by UN agencies. That is, almost one out of every four children in the world is badly affected by it. As determined by the United Nations Human Rights Commission. It can be ensured that such responsibilities are applicable to the goals and promises of the states and hence climate change arrangements focus on protecting the rights of the population affected due to climate change. The announcement of the right to development declared by the UNFCCC has emphasized these human rights principles and emphasizes the resolve of these issues from the states. During this time, they have to take care of shared but different accountable and related abilities so that both the existing and future generations can benefit.

In fact, getting a balanced environment and a good climate is the right of every human being who has taken birth on this earth and is living his life on this earth. But often we see that there is a lot of clutter and filth in the areas called the lower township of the city. The people living there neither get neither clean air nor healthy environment. Which is their the human rights to achieve. Actually, climate change affects the whole economy of country. At the same time, the violation of human rights of the people is also widespread. Basic human rights such as right to food, right to life, right to health, and access to water, housing, sanitation, affordable commercial energy are most affected by climate change. Forced migration, hindered economic growth and increased inequality are just some of the issues that show how climate change is a threat to human rights. Although global warming is a threat to the whole world, certain regions, poverty, gender, age or people of a particular community who are already disadvantaged and problematic are affected more severely. A report released by the Intergovernmental Panel on Climate Change (IPCC) clearly states, “Human influence on the climate system is clear and recent anthropogenic greenhouse gas emissions are the highest in history. Climate change has a wide range of impacts on humans and the environment. Along with this, the report states that people who are socially, economically, culturally, politically and institutionally marginalized are particularly vulnerable to climate change. Only then the right results will be revealed and every human being will be able to get pure air, clean water, plenty of food, a house full of natural elements as their right. In fact, the effects of climate change should be seen as human rights violations, only then we will be able to turn the pace of climate change in a positive direction in human interest.
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 (11.12.2022)
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Saturday, December 10, 2022

अध्यक्षता डॉ सुश्री शरद सिंह साहित्यकार एवं भारत तिब्बत मैत्री संघ | मानवाधिकार दिवस

"परम पावन दलाई लामा एक ग्लोबल व्यक्तित्व हैं। वे समूचे विश्व की शांति और सुरक्षा के बारे में सोचते हैं। इसका प्रमाण देखा जा सकता है राजगीर घोषणा पत्र 2022 में। जिसमें तिब्बत के ग्लेशियर्स के पिघलने और जलवायु परिवर्तन के घातक परिणामों के बारे में चिंता व्यक्त की गई है। भारत-तिब्बत मैत्री संघ के संयुक्त प्रयास से तिब्बत क्षेत्र के पर्यावरण संकट को दूर करके समूचे विश्व के पर्यावरणीय संकट को कम किया जा सकता है।" मैंने (डॉ सुश्री शरद सिंह ने) अपने अध्क्षीय उद्बोधन में कहा। अवसर था भारत तिब्बत मैत्री संघ, सागर द्वारा मानवाधिकार दिवस मनाया जाना। इस अवसर पर दलाईलामा जी को शांति का नोबल प्राईज़ दिए जाने के ऐतिहासिक घटना का भी स्मरण किया गया। 
        केशरवानी धर्मशाला सागर में भारत तिब्बत मैत्री संघ ने मुख्य अतिथि तिब्बती सांसद मेंगुर दोर्जी ,  विशिष्ट  अतिथि अजय खरे, अध्यक्षता डॉ  सुश्री शरद सिंह साहित्यकार एवं भारत तिब्बत मैत्री संघ  (Indo Tibetan Friendship Association)  के महामंत्री पंडित महेश दत्त त्रिपाठी ने विधिवत पूजा  अर्चना कर 101 दीप प्रज्वलित कर दलाई लामा की दीर्घायु होने की प्रार्थना की । तदोपरांत, सांसद मेंगुर दोर्जी द्वारा तिब्बती अंग वस्त्र खाता प्रदान कर अतिथियों का सम्मान किया गया। मैंने सांसद दोर्जी को अपनी पुस्तक "Climate Change : We can slow the speed" भेंट की। जिसे उन्होंने "एक ज़रूरी किताब" कहा।
     इस अवसर पर सत्यम बुंदेली संग्रहालय के अध्यक्ष दामोदर अग्निहोत्री ने भगवान बुद्ध एवं दलाई लामा के  दुर्लभ समाचार पत्रों की प्रदर्शनी लगाई। तिब्बत  गर्म कपड़ा व्यापारी संघ के अध्यक्ष शेरिन्ग पलजोर  एवं पोर्वो जी ने अतिथि स्वागत किया कपिल स्वामी ने  आभार माना।
#IndoTibetanFriendshipAssociation #Dalilama #HumanRightsDay2022  #DrMissSharadSingh

Friday, December 9, 2022

बतकाव बिन्ना की | समान नागरिक संहिता औ भैयाजी को ब्याऔ | डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम | बुंदेली व्यंग्य | प्रवीण प्रभात

"समान नागरिक संहिता औ भैयाजी को ब्याऔ"  मित्रो, ये है मेरा बुंदेली कॉलम "बतकाव बिन्ना की" साप्ताहिक #प्रवीणप्रभात , छतरपुर में।
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बतकाव बिन्ना की      
समान नागरिक संहिता औ भैयाजी को ब्याऔ                             
- डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
            भैयाजी आए, सो उनके मूंड़ पे बंधों गमछा देख के मोसे रहो नई गऔ। मैंने पूछी-‘‘भैयाजी, अबे तो सीतलहर नई चल रई फेर आप काए के लाने अपने मूंड़ पे जे गमछा बांधें फिर रए हो?’’
‘‘ने पूछो बिन्ना! बड़ो मूंड़ पिरा रओ।’’ भैयाजी मुरझाए भए बोले।
‘‘ठंड-मंड लग गई का? दिन में सो नई पड़ रई, मनो रात की बेरा जरूर ठंड हो जात आए। रात को ठंड खा लई आपने, है न!’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘नईं, हमें ठंड नईं लगी।’’ भैयाजी ने कही।
‘‘फेर काए के लाने पिरा रओ? आपने कछू ज्यादई सोच-फिकर कर लई का? बाकी सोच-फिकर में सो आपको घूंटा दुखो चाइए।’’ मैंने भैयाजी से ठिठोली करी।
‘‘हऔ-हऔ, उड़ा लेओ मजाक! बिपदा के मारे को कोनऊ सहूरी नईं बंधात।’’ भैयाजी कछु ज्यादई दुखियारे से हो के बोले। मोए लगो कि हो न हो, बात सीरियस आए।
‘‘अरे, मैं माजक नईं उड़ा रई। आप बताओ तो के भओ है?’’ मैंने भैयाजी से फेर के पूछी।
‘‘बतानेई परहे?’’ भैयाजी बोले।
‘‘औ का! बताबे से मूंड़ की पीरा सोई कम हो जेहे।’’ मैंने भैयाजी से कही।
‘‘पीड़ा सो कम ने हुइए। मनो तुम जाने बिना पीछा सो छोड़हो नईं।’’ भैयाजी बोले।
‘‘जे तो आपने सांची कई। आप सो जानत हो के जबलों मोय पूरी बात पतो ने पर जाए, मोरे कलेजे खों ठंडक नईं परत।’’ मैंने भैयाजी से कही।
‘‘चलो, हम बता रए। बाकी हमपे हंसियो नईं।’’ भैयाजी ने कही। जाने कोन सी बात हती के बे बताबे में इत्तो हिचक रए हते। उनकी हिचक देख के मोए रहाई नईं पर रई हती।
‘‘अब बताई दो भैयाजी! बुझव्वल ने बुझाओ!’’मैंने भैयाजी से कही। जानबे के लाने मनो मोरे प्रान कलेजा से निकर के बाहरे टहलन लगे।
‘‘भओ जे बिन्ना के हम पढ़ रए हते अखबार! हमें दिखा गई बा वारी खबर, जीमें समान नागरिक संहिता लागू करबे के लाने अपने शिवराज भैया ने कई हती के एक लुगाई होत भए दूसरो ब्याओ नईं भओ चाइए। जे कानून लागू हो जेहे सो, कोनऊं एक से ज्यादा घरवारी ने रख पाहे। जे पढ़के हमें ठिठोली सूझी। रामधई जाने कोन सी मनहूस घड़ी हती के हमने तुमाई भौजी से कही के, जे लेओ हम सो सोच रए हते के अपनो धरम बदल के दो-चार ब्याऔ कर लओ जाए, मनो जे कानून आ गओ सो कछू ने हो पाहे। बस, इत्तो सुनाई परी के तुमाई भौजी ने चौका सेई ऐसो फेंक बेलन मारो के किरकेट को कोनऊं बाॅलर बी ने मार पाहे। बाॅलर की बाॅल से विकेट औ गुल्ली गिरे ने गिरे बाकी तुमाई भौजी को बेलन ऐसो निशाने पे परो के हमाओ मूंड चटक गओ। जे देखो!’’ कैत भए भैयाजी अपने मूंड पे बंधो गमछा खोल दओ।
‘‘अई दईया!! जे का हो गओ?? जे इत्त्तो बरो गूम्मड़??’’ मोरी आंखें मिचमिचा के रै गईं। भैयाजी के मूंड पर जेई कोई डेढ़ इंची को गूम्मड़ निकर आओ हतो। अब मूंड़ पे इत्तो बरो गूम्मड़ हुइए सो मूंड़ पिराहेई।
‘‘देख लओ! पड़ गई सहूरी?’’ भैयाजी बोले।
‘‘अरे, काय की सहूरी? आपके मूंड़ को जे गूम्मड़ देख के सो मोरो मूंड़ पिरान लगो। कहूं कोनऊं हड्डी-मड्डी सो नईं चटक गई?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘जी टेम पे बेलन घलो हतो, ऊ टेम पे तो मोए सोई जे लगो हतो के गई कोनऊ हड्डी। ऐसो मूंड़ भिन्नाओ के कछू देर सो कछू समझ में ने आई के हो का गओ? ऐसो लगो के मनो छत टूट के मूंड़ पे आ गिरी होय। घींच मोड़ के ऊपर खों देखी तो समझ में आओ के छत सो अपनी जांगा पे आए, हमाओ मूंड़ई कहूं सरक गओ।’’ भैयाजी बोले।
‘‘जे सो वाकई बड़ी वारी ट्रेजडी हो गई आपके संगे!’’ मैंने भैयाजी से कही।
‘‘अब हमें का पतो रओ के तुमाई भौजी हमाई ठिठोली खों इत्ती सीरियस ले लेहें के हमाई दसा सीरियस कर देहें।’’ भैयाजी बोले।
‘‘फेर भौजी सो बड़ी दुखी भई होई हुइएं।’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘अरे, राम को नांव लेओ! बे औ दुखी? हमने उनसे कही के हम सो तुमाए संगे ठिठोली कर रए हते औ तुमने हमाओ मूंड़ फोड़ दओ! कहूं ऐसो करो जात आए? सो बे बोलीं, हऔ ऐसी-कैसी ठिठोली? ऐसी बात तुमाए मूंड़ में आई, सो आई कैसे? अबे सो हमने तुमाओ मूंड़ चटकाओ है, औ जो कहूं तुमने दूसरो ब्याऔ के बारे में फेर के सोची बी सो जान लेओ, चलन-फिरन जोग ने बचहो!’’ भैयाजी ने बताई।
‘‘ऐसी कई उन्ने?’’ मोए हंसी आई गई।
‘‘हमें पतो रओ के तुम हंसहो जरूर हमाई दसा पे।’’ भैयाजी मों बनात भए बोले।
‘‘अरे नईं भैयाजी, मैं आपकी दसा पे नईं हंस रई, मोए तो जे बात सोच के हंसी आ गई के सारी भौजियां ऐसईं हो जाएं सो कोनऊं कानून की जरूरतई ने परहे। सबरे लुगवा एकई घरवाली से खुसा रैहें, दूसरी के बारे में सोचबे की हिम्मतई ने करहें। ई तरहा ब्याऔ के मामले में समान नागरिक संहिता खुदई लागू हो जेहे।’’ मोए फेर के हंसी आ गई।
‘‘हंस लेओ, हंस लेओ! मोरी दसा सो ऊंसई हो गई के- खाओ न पियो औ गिलास फोड़ो बारा आना!’’ भैयाजी बोले। फेर कहन लगे,‘‘बात का है बिन्ना के कछू हरें मनो खाली दूसरो, तीसरो ब्याऔ करबे के लाने धरम बदल लेत आएं। ऐसो करो नई चाइए। ऐसो कर के एक तो आप धरम को मज़ाक बनात हो, ऊपे लुगाइयन की जिनगी से खिलवाड़ करत हो। बाकी तुमाई भौजी जे मामले में बड़ी कड़क ठैरीं। बे हंसी-ठिठोली में बी ऐसी बातें सहन नईं करत आएं। उनको कैनो रैत आए के आप ने गलत बात सोची तो जे मानो के आप के मन में बा गलत करबे की इच्छा कहूं ने कहूं, कोनऊं रूप में पाई जात है। ई मामले में सो बे ठक्का-ठाई ठैरीं। हम का, हमाई जांगा कहूं कोनऊं ओर होतो, सो ऊको मूंड बी बे चटका देतीं।’’ भैयाजी बोले।
‘‘सो सही, सो आए! ऐसो सोचोई काए जाओ चाइए? जेई लाने जे समान नागरिक संहिता कानून आ जेहे सो अच्छो रैहे! न रैहे बांस औ न बजहे बांसुरी। अब आपई सोचो के ऐसो कहूं ने होतो सो आपको बी ने सूझतो। औ ने आपको मूंड़ फूटतो!’’
‘‘हऔ, जे कानून ससुरा लागू होई जाए! वैसे बी, सबई जने के लाने एकई टाईप को कानून रओ चाइए। जे नईं के एक बेचारो एक ठइयां पे गुजारा करे औ दूसरा चार ठइयां ले आए।’’ भैयाजी बोले।
‘‘आपने फेर के बोई मूंड़ फोड़बे वारी बात कही। भौजी ने ठीकई करो, जो करो! बाकी अभई आपके दिमाग की पूरी सफाई नईं भई आए। एकाध बेलन औ परो चाइए।’’ मैंने भैयाजी से कई।
‘‘रैन दे बिन्ना! अब कभऊं ऐसो ने कैबी! अब तुम हमाओ मूंड़ फोड़ देओ, अच्छो रैहे के मैं इते से खिसक लेऊं।’’ कैत भए भैयाजी अपने मूंड़ पे फेर के गमछा बांधत भए चले गए।  
बाकी मोए सोई बतकाव करनी हती सो कर लई। रई बात समान नागरिक संहिता की, सो जे कानून लागू भओ चाइए। ईसे सबई को भलो हुइए, चाय बो कोनऊं जात, धरम को होय। तो अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की। सो, सबई जनन खों शरद बिन्ना की राम-राम!
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(09.12.2022)
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Thursday, December 8, 2022

चर्चा प्लस | समान नागरिक संहिता के कठिन रास्ते में वोट बैंक | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर

चर्चा प्लस  
समान नागरिक संहिता के कठिन रास्ते में वोट बैंक
        - डाॅ (सुश्री) शरद सिंह                                                                                      
       हमारे देश की विशेषता है, विविधता में एकता। इस विविधता पर हम गर्व करते हैं। फिर भी कभी-कभी यह विविधता कानूनी परेशानियां पैदा कर देती है। तब प्रश्न उठने लगता है कि जब भारत के सभी नागरिक एक समान हैं तो उन पर एक-सा कानून लागू क्यों नहीं होता? देश की स्वतंत्रता के बाद से ही यह प्रश्न सुगबुगाता रहा है लेकिन वोट बैंक टूटने का डर जोख़िम उठाने नहीं देता है। लेकिन एक बार फिर आवाज़ उठ रही है, वह भी सत्तापक्ष की ओर से। क्या सत्तापक्ष जोखिम उठा सकेगा? क्या वोट बैंक टूटने का भय सच या मिथ्या? चलिए देखते हैं कि क्या कठिनाइयां हैं समान नागरिक संहिता में।
सबसे पहले तो समझना होगा कि समान नागरिक संहिता दरअसल है क्या? विश्व के अधिकतर आधुनिक देशों में ऐसे कानून लागू हैं। समान नागरिक संहिता से संचालित पन्थनिरपेक्ष देशों की संख्या बहुत अधिक है-जैसे कि अमेरिका, आयरलैंड, पाकिस्तान, बांग्लादेश, मलेशिया, तुर्की , इंडोनेशिया, सूडान, इजिप्ट, जैसे कई देश हैं जिन्होंने समान नागरिक संहिता लागू किया है। भारत में समान नागरिक संहिता लागू नहीं है, बल्कि भारत में अधिकतर निजी कानून धर्म के आधार पर तय किए गए हैं। हिंदू, सिख, जैन और बौद्ध के लिए एक व्यक्तिगत कानून है, जबकि मुसलमानों और इसाइयों के लिए अपने कानून हैं। मुसलमानों का कानून शरीअत पर आधारित है अन्य धार्मिक समुदायों के कानून भारतीय संसद के संविधान पर आधारित हैं।
समान नागरिक संहिता (यूसीसी अर्थात यूनीफाॅर्म सिविल कोड) पर देश में पहली बार ब्रिटिश सरकार ने सन 1885 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करते हुए अपराधों, सबूतों और अनुबंधों जैसे विभिन्न विषयों पर भारतीय कानून के संहिताकरण में एकरूपता लाने की आवश्यकता पर बल दिया था। यद्यपि इसमें भी वह अपने मूल उद्देश्य को भूली नहीं और उसने रिपोर्ट में हिंदू और मुस्लिमों के व्यक्तिगत कानूनों को इस एकरूपता से बाहर रखने की सिफारिश की। अन्यथा फूट डालो, राज करो का उनका उद्देश्य पूरा कैसे होता? फिर सन 1941 में हिंदू कानून को संहिताबद्ध करने के लिए बी.एन. राव समिति गठित की गई। बी.एन. राव समिति  ने कई सिफारिशें की। इन सिफारिशों के आधार पर हिंदुओं, बौद्धों, जैनों और सिखों के लिए निर्वसीयत उत्तराधिकार से संबंधित कानून को संशोधित एवं संहिताबद्ध करने हेतु वर्ष 1956 में हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के रूप में एक विधेयक को अपनाया गया। यद्यपि मुस्लिम, ईसाई और पारसी समुदाय के अपने अलग-अलग व्यक्तिगत कानून थे। जिन्हें यथावत रहने दिया गया।
देश की स्वतंत्रता के बाद से समान नागरिक संहिता की मांग समय-समय पर उठाई जाती रही है। इसके तहत ऐसे कानून की अनुशंसा की जाती है जिसमें किसी धर्म, लिंग और लैंगिक झुकाव की परवाह नहीं की जाएगी। जवाहरलाल नेहरू ने भी समान नागरिक संहिता का समर्थन किया था लेकिन उन्हें कई वरिष्ठ नेताओं द्वारा विरोध का सामना करना पड़ा था। जिससे मामला जहां के तहां अटक गया था। कानून में समरूपता लाने के लिए विभिन्न न्यायालयों ने भी कई बार अपने निर्णयों में कहा कि सरकार को एक समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने की दिशा में प्रयास करना चाहिए।
वर्तमान में भारत में गोवा ही एकमात्र ऐसा राज्य है जहां समान नागरिक संहिता लागू है। यह अवश्य है कि अधिकांश भारतीय कानून, सिविल मामलों में एक समान नागरिक संहिता का पालन करते हैं, जैसे- भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872, नागरिक प्रक्रिया संहिता, संपत्ति हस्तांतरण अधिनियम, 1882, भागीदारी अधिनियम, 1932, साक्ष्य अधिनियम, 1872 आदि। वैसे राज्यों ने कई कानूनों में संशोधन किए भी हैं परंतु धर्मनिरपेक्षता संबंधी कानूनों में अभी भी विविधता है।
भारत में हिन्दुओं के लिए हिन्दू कोड बिल लाया गया था। देश में इसके विरोध के बाद इस बिल को चार हिस्सों में बांट दिया गया था। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इसे हिन्दू मैरिज एक्ट, हिन्दू सक्सेशन एक्ट, हिन्दू एडॉप्शन एंड मैंटेनेंस एक्ट और हिन्दू माइनोरिटी एंड गार्जियनशिप एक्ट में बांट दिया था। समय के साथ इसमें और संशोधन हुए और इस कानून ने महिलाओं को सीधे तौर पर सशक्त बनाया। इनके तहत महिलाओं को पैतृक और पति की संपत्ति में अधिकार मिला। भिन्न जातियों के लोगों को परस्पर वैवाहिक संबंध बनाने का अधिकार मिला। साथ ही यह भी सुनिश्चित किया कि कोई व्यक्ति एक पत्नी  के रहते दूसरी शादी नहीं कर सकता है।
वहीं देश के मुस्लिमों के लिए मुस्लिम पसर्नल लॉ बोर्ड बनाया गया। इसके अंतर्गत शादीशुदा मुस्लिम पुरुष अपनी पत्नी को महज तीन बार तलाक कहकर तलाक दे सकता था। यद्यपि मुस्लिम पर्सनल लॉ में तलाक के और भी तरीके दिए गए हैं, लेकिन उनमें से तीन बार तलाक भी एक प्रकार का तलाक माना गया है, जिसे अब भारतीय कानून के विरुद्ध घोषित किया जा चुका है। देखा जाए तो तीन तलाक की पृष्ठभूमि में भी अप्रत्यक्ष रूप से बहुविवाह प्रेरणा का काम करता रहा है। मुस्लिम पसर्नल लॉ विशेष परिस्थिति में एक से अधिक पत्नियां रखने की भी अनुमति देता है।
यहां फिर उल्लेख करना आवश्यक है कि समान नागरिक संहिता का उल्लेख भारतीय संविधान के भाग 4 के अनुच्छेद 44 में है। इसमें नीति-निर्देश दिया गया है कि समान नागरिक कानून लागू करना हमारा लक्ष्य होगा। सर्वोच्च न्यायालय भी कई बार समान नागरिक संहिता लागू करने की दिशा में केन्द्र सरकार के विचार जानने की पहल कर चुका है। समान नागरिक संहिता में शादी, तलाक और जमीन-जायदाद के बंटवारे में सभी धर्मों के लिए एक ही कानून लागू होगा।
बाबा साहब अम्बेडकर, जिनके प्रयासों से हिन्दू कोड बिल पारित हो सका था, उन्होंने कहा था कि ‘‘मैं व्यक्तिगत रूप से समझ नहीं पा रहा हूं कि किसी धर्म (मजहब) को यह विशाल, व्यापक क्षेत्राधिकार क्यों दिया जाना चाहिए। ऐसे में तो धर्म, जीवन के प्रत्एक पक्ष पर हस्तक्षेप करेगा और विधायिका को उस क्षेत्र पर अतिक्रमण से रोकेगा। यह स्वतंत्रता हमें क्या करने के लिए मिली है? हमारी सामाजिक व्यवस्था असमानता, भेदभाव और अन्य चीजों से भरी है। यह स्वतंत्रता हमे इसलिए मिली है कि हम इस सामाजिक व्यवस्था में जहां हमारे मौलिक अधिकारों के साथ विरोध है वहाँ सुधार कर सकें।’’ क्योंकि हिन्दू कोड बिल लाने के पीछे उनका उद्देश्य तत्कालीन परिस्थितियों में हिन्दू महिलाओं के अधिकारों को सुनिश्चित करना था।  
ऐसे कई चर्चित मामले सामने आए जब तीन तलाक और बहुविवाह को चुनौती दी गई। सन 1985 में शाहबानो मामला, 1995 में सरला मुद्गल मामला आदि। इन मामलों के दौरान यह बात उठाई गई कि ‘तीन तलाक’ और बहुविवाह जैसी प्रथाएं एक महिमहिलाओं के सामजिक सम्मान को चोट पहुंचाने के साथ ही उनमें असुरक्षा की भावना बढ़ाती हैं। याचिकाकर्ताओं द्वारा इन्हें महिलाओं के मौलिक अधिकारों का भी हनन माना गया। याचिकाकर्ताओं ने विवाह, तलाक, भरण-पोषण और गुजारा भत्ता (पूर्व पत्नी या पति को कानून द्वारा भुगतान किया जाने वाला धन) को विनियमित करने वाले व्यक्तिगत कानूनों में एकरूपता की मांग की थी। याचिकाओं में तलाक के कानूनों के संबंध में विसंगतियों को दूर करने और उन्हें सभी नागरिकों के लिए एक समान बनाने तथा बच्चों को गोद लेने एवं संरक्षकता के लिए समान दिशा-निर्देश देने की मांग की गई थी। यहां याद रखने योग्य बात है कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 44 में कहा गया है, ‘‘राज्य भारत के पूरे क्षेत्र में नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता को सुरक्षित करने का प्रयास करेगा।’’
अतः यदि आज समान नागरिक संहिता की बात फिर से उठाई जा रही है तो इसे वर्तमान सामाजिक एवं आर्थिक परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए न कि उस परिप्रेक्ष्य में जब हिन्दू कोड बिल या मुस्लिम पर्सनल लाॅ लागू किए गए। स्थितियां बहुत बदल चुकी हैं। आज एक से अधिक विवाह परिवार की आर्थिक स्थिति को बुरी तरह से बिगाड़ देता है। बहुपत्नियां यानी बहुत सारे बच्चे। इस मंहगाई में सबका भरण-पोषण करना और उन्हें अच्छा जीवन दे पाना कठिन है। यह माना जा रहा है कि समान नागरिक संहिता लागू होने से भारत की हर धर्म की महिलाओं की स्थिति में सुधार आएगा। कुछ धर्मों के पर्सनल लॉ में महिलाओं के अधिकार सीमित हैं। इतना ही नहीं, महिलाओं का अपने पिता की संपत्ति पर अधिकार और गोद लेने जैसे मामलों में भी एक समान नियम लागू होंगे। नागरिक संहिता लागू होने से भारत की महिलाओं, बच्चों के साथ ही पुरुषों की स्थिति में भी सुधार आएगा।
एक समान नागरिक संहिता पूरे देश के लिए एक कानून सुनिश्चित करेगी जो सभी धार्मिक और आदिवासी समुदायों पर उनके व्यक्तिगत मामलों जैसे संपत्ति, विवाह, विरासत, गोद लेने आदि में लागू होगा। इससे हिंदू विवाह अधिनियम (1955), हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम (1956) और मुस्लिम व्यक्तिगत कानून आवेदन अधिनियम (1937) जैसे धर्म पर आधारित मौजूदा व्यक्तिगत कानून तकनीकी रूप से भंग हो जाएंगे।
कुछ राज्यों ने समान नागरिक संहिता लागू किए जाने की दिशा में प्रयास आरम्भ कर दिए हैं जिनमें एक है उत्तराखंड। लेकिन वह इसे लागू करने में जल्दबाजी नहीं करना चाहते हैं तथा जनमत पर आधारित परामर्श और सुझावों पर कार्य करना चाहते हैं। इसीलिए उत्तराखंड के लिए समान नागरिक संहिता (यूसीसी) का मसौदा तैयार करने वाली विशेषज्ञों की समिति का कार्यकाल छह महीने के लिए बढ़ा दिया गया। अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) राधा रतूड़ी द्वारा जारी एक आदेश में कहा गया कि समान नागरिक संहिता का मसौदा तैयार करने के उद्देश्य से गठित समिति का कार्यकाल अगले साल 27 मई तक बढ़ा दिया गया है। इस संबंध में राज्य में 30 विभिन्न स्थानों पर लोगों के साथ परामर्श किया जा चुका है और अब तक लगभग 2.25 लाख सुझाव प्राप्त हुए हैं। यद्यपि सार्वजनिक परामर्श प्रक्रिया अपने अंतिम चरण में है, समिति समान नागरिक संहिता का मसौदा तैयार करने से पहले सुझावों का विस्तार से अध्ययन करेगी।
वहीं मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान ने भी समान नागरिक संहिता लागू किए जाने का पक्ष लेते हुए स्पष्ट कहा कि ‘‘एक से ज्यादा शादी कोई क्यों करे? एक देश में दो विधान क्यों चलें? एक ही होना चाहिए। समान नागरिक संहिता में एक पत्नी रखने का अधिकार है, तो एक ही पत्नी होनी चाहिए।’’
एक बात तो स्पष्ट है कि भाजपा अथवा भाजपा समर्थित कुछ राज्य समान नागरिक संहिता को ले कर बहुत उत्साहित हैं, शेष राज्यों में इसी उत्साह की आवश्यकता का अनुभव किया जा रहा है। राजनीति विश्लेषक इस बात पर भी नज़र गड़ाए हुए हैं कि आगामी आम चुनावों में इसका कैसा असर पड़ेगा? लोकतंत्र में कोई भी कानून जबरन नहीं लादा जा सकता है। किसी भी कानून को बदलने या लागू करने के लिए संबंधित समुदायों की सहमति भी जरूरी होती है। फिर यह तो धर्म और समाज दोनों से संयुक्त रूप से जुद्दा मुद्दा है। इसलिए इसकी राह आसान नहीं है।
इस संदर्भ में यदि विदेशी परिदृश्य देखा जाए तो मुस्लिम बाहुल्य देश जैसे पाकिस्तान, बांग्लादेश, मलेशिया, तुर्की, इंडोनेशिया, सूडान और इजिप्ट आदि  समान नागरिक संहिता कानून को अपने यहां लागू कर चुके हैं। अर्थात् इस तरह का कानून धर्म की राह में बाधा नहीं पहुंचाता है अपितु आम नागरिकों के अधिकार को बढ़ाता है। कानून विशेषज्ञों का मानना है कि लगभग अप्रासंगिक होते जा रहे जिन पुराने पर्सनल लाॅ के कारण जिन अधिकारों से वंचित रहना पड़ता है, वे अधिकार भी इस कानून के लागू होने पर प्राप्त हो सकेंगे। देश में जब भी किसी नवाचार की बात होती है तो कुछ विरोध के स्वर भी बुलंद होते हैं। यही तो लोकतंत्र की विशेषता है। यह विशेषता किसी भी कानून को लागू करने के लिए पुख़्ता धरातल तैयार करती है। विरोध की एक कठिन राह से गुज़र कर जो कानून लागू होता है, वह ठोस और असरदार परिणाम भी देता है। यही आशा की जा सकती है समूचे देश में समान नागरिक संहिता लागू किए जाने की उतार-चढ़ाव वाली प्रक्रिया से। यूं भी जो कानून सभी नागरिकों को समान कानूनी अधिकार दे उसे स्वीकार किए जाने में कोई विशेष बाधा नहीं आनी चाहिए बशर्ते राजनीतिक दलों द्वारा अपने वोट बैंक टूटने का भय अस्वीकार कर दिया जाए। 
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Tuesday, December 6, 2022

पुस्तक समीक्षा | दाम्पत्य जीवन की त्रासदियों को उकेरती कहानियां | समीक्षक डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

प्रस्तुत है आज 06.12.2022 को  #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई लेखक चन्द्रभान राही के कहानी संग्रह "रोटी की कीमत तथा अन्य कहानियां" की समीक्षा... 
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पुस्तक समीक्षा
दाम्पत्य जीवन की त्रासदियों को उकेरती कहानियां  
समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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कहानी संग्रह - रोटी की कीमत तथा अन्य कहानियां
लेखक      - चन्द्रभान राही
प्रकाशक     - इंदिरा पब्लिशिंग हाऊस, ई-5/21, अरेरा काॅलोनी, हबीबगंज पुलिस स्टेशन रोड, भोपाल
मूल्य        - 295/-
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कथा और उपन्यास जगत में चंद्रभान राही तेजी से अपनी जगह बनाते जा रहे हैं। उनका कहानी संग्रह ‘‘रोटी की कीमत’’ पारिवारिक एवं सामाजिक स्तर पर संवेदनशील कहानियों का संग्रह है। कहानियों में परिवार एवं दाम्पत्य जीवन की समस्याओं को ले कर प्रेमचंद और उनके पूर्व के युग में बहुत-सी कहानियां लिखी गईं। दरअसल वह सामाजिक परिवर्तन का युग था जिसमें स्त्रियों ने घर से बाहर कदम रखना शुरू किया था। उस समय एक ऐसी समझ-बूझ की आवश्यकता थी जिसमें स्त्रियों के घर से बाहर निकलने को संवेदना के स्तर पर देखा जाए और उसे सकारात्मक दृष्टिकोण से स्वीकार किया जाए। इसके साथ ही स्त्रियों से भी यह आग्रह किया गया कि वे अपनी स्वतंत्रता और घरेलू दायित्वों के बीच संतुलन बनाए रखें। वह आरंभिक दौर था इसलिए इस प्रकार की सर्तकता एवं अपेक्षाएं स्वाभाविक थीं। इसके बाद ‘‘नई कहानी’’ का दौर आया जिसे कमलेश्वर और उत्तर कमलेश्वर कहानियों के रूप में भी देखा जाता है। इसी दौर में मन्नू भंडारी और ममता कालिया जैसी लेखिकाओं ने पारिवारिक एवं दाम्पत्य संबंधों में स्त्री और पुरुष के दायित्वों में संतुलन पर प्रश्न उठाए। इसी दौर में घर के बाहर के सामाजिक एवं आर्थिक जगत की कहानियां लिखी गईं। इन दोनों तरह की कहानियों की छाप चंद्रभान राही की कहानियों में देखी जा सकती है। उनके इस संग्रह की कुल कहनियों की पचहत्तर प्रतिशत कहानियों का मूल स्वर दाम्पत्य जीवन एवं स्त्री-पुरुष के सामाजिक संबंधों का है, शेष पच्चीस प्रतिशत कहानियां सामाजिक-आर्थिक आधार के कथानकों की हैं।
‘‘रोटी की कीमत तथा अन्य कहानियां’’ में कुल पचास कहानियां हैं। अपने संग्रह की शीर्षक कहानी के बारे में लेखक ने पुस्तक की भूमिका में लिखा है कि -‘‘रोटी की कीमत कहानी की घटना ने मुझे अन्दर तक हिला कर रख दिया था। कहानी लिखने के बाद जब भी उसे पढ़ा करता था, तब शरीर के रोम-रोम में एक कम्पन हो जाती है। मन यह सोचने पर विवश हो जाता है कि क्या मानव समाज अपने नैतिक दायित्वों का इतना पतन कर बैठा है कि उसे सामान्य और असमान्य व्यक्ति में अन्तर दिखाई नहीं देता।’’ तो संग्रह की कहानियों पर दृष्टिपात करने का क्रम ‘‘रोटी की कीमत से ही आरम्भ किया जाए। यह उन अनाथ लड़कों की कहानी है जो होटलों की फिंकी हुई जूठन के सहारे अपना जीवन चलाते हैं। न रहने का कोई स्थाई ठिकाना और न पेट भरने का कोई स्थाई जुगाड़। परिवार का अर्थ तो वे जानते भी नहीं। गली के आवारा कुत्तों से होड़ करते हुए रोटी के दो निवाले पाने की ज़द्दोजहद वाकई अंतर्मन को झकझोर देती है। जो भी इस कहानी को पढ़ेगा उसके मन में यही प्रश्न उठेगा कि क्या हम जिस समाज में रहते हैं, यह उसी का दृश्य है? अविश्वसनीय-सा लगने वाला सौ टका सच। इस कहानी का कथानक इतने में ही नहीं ठहरता है, इससे भी आगे एक और कटु सत्य, बल्कि वीभत्स सत्य सामने आता है जब यह कहानी स्मरण कराती है कि पागल भिखारिनों को भी किस तरह एक देह मात्र समझा जाता है। यह सामाजिक, आर्थिक एवं मनोवैज्ञानिक संवाद करती कहानी है। इस कहानी को संग्रह का नाम दिया जाना सार्थक है। यद्यपि उत्साहवश लेखक ने इसमें एक भूल कर दी है। एक स्थान पर लेखक ने कथा नायक लड़का झिन्कू की ओर से लिखा है-‘‘मैंने एक जगह कोयले के पुल की अंदर की दीवार पर अपना नाम लिख दिया था- झिन्कू। वहीं अपना बिस्तर, एक फटी चादर में, एक गिलास और एक फूटी प्लेट के साथ लपेट रखा था।’’ यहां भूल यह है कि जो लड़का पेट भरने के लिए कुत्तों से होड़ कर के जूठन पाता है, झिन्कू ने अपनी पगली मां को नहीं देखा था बल्कि एक भिखारिन की गोद में अपनी आंखें खोली थीं तोे उसने लिखना कब और कहां से सीख लिया? उसका लिखना सीख पाना यथार्थ से हट कर लगता है। या तो यह प्रसंग आना चाहिए था कि उसे किसी ने लिखना सिखाया या फिर उसे निरक्षर ही रहने देना था।  
जैसाकि मैंने पहले कहा कि संग्रह की अधिकांश कहानियां दाम्पत्य जीवन की त्रासद दशाओं पर है। एक कहानी है ‘‘वापसी’’। इसमें तलाकशुदा पति-पत्नी संयोगवश एक ही ट्रेन में एक ही बोगी में आमने-सामने की सीट पर सफ़र करते हैं। दोनों अनुभव करते हैं कि परस्पर एक-दूसरे से उनकी अपेक्षाएं और आग्रह अभी भी छूटे नहीं हैं। जैसे, बोगी में चायवाले के आने पर पति सोचता है कि यदि मैं अपने लिए चाय लूंगा तो अपनी इस पूर्व पत्नी के लिए भी चाय लेनी पड़ेगी। यदि मैं इसके लिए चाय ले भी लूं और कहीं इसने सबके सामने मना कर दिया तो मेरा उपहास होगा। ठीक इसी समय पत्नी सोचती है कि मेरे पूर्व पति की हेठी अभी भी बरकरार है। इससे यह  भी पूछते नही बन रहा है कि क्या तुम चाय पियोगी? इसी तरह भोजन मंगाने के समय अंतद्र्वन्द्व चलता है। अंततः पति अपने लिए भोजन मंगा लेता है लेकिन उसमें बैंगन की सब्ज़ी दे कर वह दुखी हो जाता है। उसे बैंगन पसंद नहीं। पत्नी भी यह देख कर चिन्ता में पड़ जाती है कि अब वह कैसे खाएगा? पत्नी जब देखती है कि उसके पूर्व पति से खाया नहीं जा रहा है तो वह अपने साथ लाए हुए भोजन में से सब्ज़ी निकाल कर ख़ामोशी से उसकी थाली में रख देती है। यहां स्त्री की कोमल भावना स्पष्ट दिखाई देती है। फिर दोनों मौन धारण किए हुए भोजन करते हैं। इन घटनाओं से पता चलता है कि दोनों के बीच तलाक का कारण छोटी-छोटी बातों को ले कर का टकराव रहा होगा। यात्रा के अंत में दोनों एक ही स्थान पर पहुंचते हैं, जहां पति के मित्र का विवाह है। पति के मित्र ने अपनी भाभी को ‘‘पूर्व भाभी’’ न मानते हुए आमंत्रित किया। शायद वह चाहता था कि पति-पत्नी दोनों के बीच एक बार फिर संवाद हो। दरके हुए रिश्तों में भी एक बार सहज संवाद कई नवीन संभावनाओं को जन्म दे देते हैं, यही पक्ष कथाकार ने कहानी में रखा है। यह पक्ष ही कहानी को सकारात्मक बनाता  है। अन्यथा मात्र एक वाक्य जो नायक नायिका को अकेली यात्रा करते हुए देख कर दुर्भावनावश सोचता है, उसके वैचारिक चरित्र को उजागर करने के लिए पर्याप्त है-‘‘महेन्द्र सोच रहा था कि जब मैं बाजार जाने के लिए कहता था तो पूनम कहती -‘नहीं मैं अकेली नहीं जाऊंगी, मुझे डर लगता है। और आज देखो, अकेले ही सफ़र कर रही है। कहा जाता है कि औरत और जानवर पर से यदि अंकुश हटा दिया जाए तो उसकी रफ़्तार आंकना आसान नहीं।’’ अर्थात् जो व्यक्ति स्त्री और जानवर को एक समान मानता हो उसके दाम्पत्य संबंध में टकराव होना सुनिश्चत है, यदि उसकी पत्नी उससे सम्मान भरा व्यवहार चाहती हो।
‘‘बात’’ शीर्षक कहानी में एक नूतन कथानक उठाया गया है। कहानी की नायिका ऐसा पति नहीं चाहती है जो दास भाव से उसकी सेवा करता रहे और उसे महज रानी बना कर रखे। वह चाहती है कि एक सामान्य गृहणी की भांति उसे घर-गृहस्थी के काम करने दे। अपने पति के दासत्व भरे व्यवहार से तंग आ कर वह उसे छोड़ कर चली जाती है। तब पति का दोस्त उसे उसकी गलती बताता है। वस्तुतः लेखक ने इस कहानी में यह कहने का प्रयास किया है कि पति-पत्नी के पारस्परिक संबंध यदि सहज रहें तो दाम्पत्य जीवन सुखद रहता है। एक भी पलड़ा भारी या हल्का होने पर मामला गड़बड़ा सकता है। किन्तु दिलचस्प बात यह है कि यहां भी उत्साहवश लेखक से एक चूक हो गई है। पत्नी जब पति के साथ वापस घर लौटने पर राजी हो जाती है तब का दृश्य है-‘‘बाहर आने के बाद अनिल ने रजनी से सूटकेस लेने के लिए हाथ बढ़ाया ही था कि न जाने क्या सोच कर पीछे हट गया, जिसे देख कर रजनी के होंठों पर एक मीठी-सी मुस्कान दौड़ गई।’’ वस्तुतः यहां कोई और उदाहरण होना चाहिए था। यह उदाहरण आगामी विपरीत असंतुलन की ओर संकेत करता नज़र आता है। कहीं पति अब की बार पत्नी के प्रति दासभाव के बजाए पत्नी को दासी बनाने का प्रयास तो नहीं करने लगेगा? बहरहाल, ऐसी चूकों के प्रति लेखक को सर्तकता बरतने की आवश्यकता है क्योंकि इनसे अच्छी-भली कहानी एक झटके से पटरी से उतर जाती है।
एक कहानी है ‘‘कीमत’’। इस कहानी का कथानक कार्यालयीन संबंधों के स्याह पक्ष की ओर ले जाता है। कथानायिका रजनी एक कार्यालय में क्लर्क है। वह अपने नए स्टेनो बाॅस के पास एक फाईल ले कर जाती है ताकि उस फाईल पर अधिकारी से हस्ताक्षर करा सके। स्टेनो अपने अधिकार का प्रयोग करते हुए फाईल वहीं छोड़ जाने को कहता है और बताता है कि अभी अधिकारी नहीं आया है। रजनी उससे कहती है कि जब अधिकारी आए तो उसे सूचित कर दे ताकि वह हस्ताक्षर करा सके। क्योंकि आज ही हस्ताक्षर जरूरी है। अंततः अधिकारी का फोन आ जाता है कि वह कार्यालय नहीं आएगा। तो स्टेनो वह फाईल ले कर अधिकारी के घर चला जाता है, हस्ताक्षर कराने। रजनी केबिन में स्टेनो और फाईल दोनों को नदारत पा कर नाराज़ हो जाती है। इस संबंध में उसे बड़े साहब से डांट भी खानी पड़ती है। दूसरे दिन वह अपना रोष स्टेनो पर प्रकट करती है। स्टेनो उसे न बता पाने की अपनी गलती स्वीकार करता है और दोनों ही कुछ देर बाद मित्रवत हो जाते हैं। रजनी सोचती है कि उसने स्टेनों को बुरा-भला कह कर भूल की। उसे पहले स्टेनो से शांत भाव से पूछताछ करनी चाहिए थी। लेकिन इसके बाद कहानी एक अचानक करवट लेती है और रजनी अपनी भूल की ऐसी कीमत अदा करती है जिसे कीमत कहा जाए या अदमित इच्छा की पूर्ति कहा जाए, यह विवाद का प्रश्न हो सकता है। या फिर यह भी हो सकता है कि वह एक स्याह रास्ते पर चल कर अपना भविष्य सुरक्षित करना चाहती हो। ये प्रश्न पाइकों के विवेक पर छूट जाते हैं।
बहरहाल, चन्द्रभान राही की कहानियों में दाम्पत्य जीवन के संतुलन और सौंदर्य को ले कर जो आग्रह है वह महत्वपूर्ण है। बस, कमी है तो इस बात की कि वे कहीं-कहीं स्त्री की परंपरागत अनुचित-सी समझौतावादी भूमिका पर जोर देने लगते हैं। जिससे यह प्रश्न उठता है कि दाम्पत्य जीवन बनाए रखने के लिए हर बार स्त्री ही क्यों झुके? क्या दाम्पत्य जीवन बनाए क्या सिर्फ़ उसी की जिम्मेदारी है? वस्तुतः दाम्पत्य के परिदृश्य में झुकना किसी एक को नहीं चाहिए वरन दोनों को परस्पर एक-दूसरे के प्रति समान भाव से समर्पित रहना चाहिए। इस तरह के प्रश्नों का उठना भी कहानियों को विचारशीलता का पुट प्रदान करता है और इस दृष्टि से सभी कहानियां रोचक हैं। आरंभ से अंत तक पढ़ते जाने को विवश करती हैं। भाषा सरल और सहज है। संग्रह की कुछ कहानियां तो देर तक मन को उद्वेलित करने में सक्षम हैं। निःसंदेह यह संग्रह पठनीय है। 
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