Wednesday, April 19, 2023

चर्चा प्लस | वर्तमान महाभारत-राग और बुन्देली लोकगाथाओं में ‘महाभारत’ | सागर दिनकर

चर्चा प्लस  
वर्तमान महाभारत-राग और बुन्देली लोकगाथाओं में ‘महाभारत’
     - डाॅ (सुश्री) शरद सिंह                                                                   
          ‘‘महाभारत’’ और ‘‘रामायण’’ जैसे महाकाव्य इसलिए रचे गए कि इंसान उनसे सबक ले और अपने वर्तमान तथा भविष्य को हर तरह के विवाद से दूर रखे। सुई की नोंक बराबर ज़मीन के चक्कर में अट्ठारह अक्षौहिणी  सेना मारी गई थी। महाभारत का युद्ध समाप्त होने के बाद हिंसा पर रुदन और पछतावे के अलावा और क्या बचा था? वर्तमान एक बार फिर महाभारत राग से गुंजायमान हो रहा है। लोकतंत्र में चुनाव किसी महाभारत से कम नहीं होते हैं। चुनाव का समय जैसे-जैसे निकट आते जाएंगे वैसे-वैसे महाभारत राग के स्वर तेज होते जाएंगे। फिलहाल हम सुनें बुंदेली लोकगाथाओं में महाभारत का स्वर।    
वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य महाभारत कालीन परिदृश्य से अलग नहीं दिख रहा है। परस्पर एक-दूसरे को नीचा दिखाने की प्रवृति और वैचारिक चीरहरण हर दूसरे बयान में ध्वनित हो रहा है। यह महाभारत राग नहीं तो और क्या है? आज महाभारत की सुई की नोंक की प्रसंग के भांति सत्ता की एक अदद कुर्सी का द्वंद्व है। किन्तु लोकगाथाओं में, विशेषरूप से बुंदेली लोगाथाओं में महाभारत के प्रसंग एक सबक की भांति गाए और सुनाए जाते हैं। इनमें संदेश निहित होता है युद्ध के विरुद्ध शांति का। इनमें द्रौपदी के चीरहरण की पीड़ा है तो कृष्ण-सुदामा के आपसी प्रेम की चर्चा भी है।  

बुन्देली की प्रसि़द्ध महाभारतकाल संदर्भित लोकगाथाएं हैं- बैरायठा, कृष्ण-सुदामा, द्रौपदी चीरहरण तथा मेघासुर दानव आदि। इनके अतिरिक्त राजा जगदेव की लोकगाथा में भी पाण्डवों की चर्चा का समावेश है। महाभारत कालीन चरित्रों से जुड़ी गाथाओं का इस प्रकार बुन्देलखण्ड में रुचिपूर्वक गाया जाना इस बात का द्योतक है कि बुन्देली जन प्रकृति से जितने वीर होते हें तथा मानवीय संबंधों के आकलन को लेकर उतने ही संवेदनशील होते हैं। उन्हें व्यक्ति के अच्छे अथवा बुरे होने की परख होती है तथा साहसी, वीर, उदार, दानी और सच्चा व्यक्ति अपना आदर्श प्रतीत होता है। इसीलिए जन-जन में गाए जाने वाली बैरायठा लोकगाथा में ‘महाभारत’ महाकाव्य की लगभग सम्पूर्ण कथा को जन-परिवेश में पस्तुत किया गया है।
इसी गाथा में द्यूतक्रीड़ा तथा चीर-हरण का अत्यंत दृश्यात्मक वर्णन मिलता है-
जब जूटो तो पकरो ओने आज रे कै
जब रानी खों लै गव अपने साथ रे कै
जब आ गई सभा के नोने बीच रे कै
जब सबरो से करी है गुहार रे कै
जब कोऊ खों ने आई लाज रे कै
जब भरी कचेरो महराज रे कै
जब कोनऊ ने करे सहाय रे कै
       इस विवरण में  जिन तथ्यों को विशेष रूप से रेखांकित किया गया है वे ध्यान देने योग्य हैं कि जब व्यक्ति अनुचित कर्म करने लगता है तो ‘धरम’ और ‘राज’ दोनों गंवा बैठता है। इसी प्रकार जब ‘पांच पती’ अर्थात् सगे-संबंधी भी रक्षा नहीं कर पाते हैं उस समय ‘हरि’ अर्थात् ईश्वर सहायता करता है। यह मानव मन की वह अवस्था है जो राजनीतिक अस्थिरता एवं असुरक्षा के दौर में प्रभावी हो उठती है। यही भाव ‘चीरहरण’ लोग गाथा में मिलते हैं।

दुश्शसन द्वारा चीरहरण किए जाने पर द्रौपदी पतियों द्वारा निर्धारित नियति नियति को चुपचाप स्वीकार करने के बदले सहायता के लिए कृष्ण को पुकारती है-
हे श्याम मेरी सुध लइयो, रे प्रभु मोरी लाज बचइयो रे
शकुनी दुर्योधन ने मिल के, कपट के पांसे डारे
जुआ खेल के पति हमारे, राजपाट सब हारे
मोरी बिगड़ी आज बनइयो, रे प्रभु मोरी लाज बचइयो रे
इसी गाथा में द्रौपदी की पुकार सुन कर श्री कृष्ण के आने का वर्णन भी कम महत्वपूर्ण नहीं है क्योंकि इसमें इस बात का ध्यान रखा गया है कि श्री कृष्ण द्रौपदी की लाज बचाने पहुंचे तो किन्तु किस साधन अथवा किस वाहन से?
बेगी चलो गरुड़ मोरे भाई, कारज बिगड़ो जाई
नौ सौ कोस हस्तिनापुर बसो है, जल्दी देव पहुंचाई, बेगी चलो .....
नौ गज चलत हवा से आगें, दस गज की ऊंचाई
तीन लोक को भार जो लावे, और चाल प्रभु कहां से आई, बेगी चलो .....
गरुड़ पर सवार हो कर श्री कृष्ण सभा में पहुंचे जहंा द्रौपदी के पांचों पति मूक दर्शक बने बैठे थे -
पांचई पति मौन हो बैठे, अर्जुन भीम सही
हरि से द्रौपति टेर करी
जब नन्दलाल आये सभा में, बढ़ गओ चीर सही
खेंचत चीर दुसासन हारे, चीर पे भीर भरी

बुन्देली लोकगाथाओं में महाभारत के विविध प्रसंगों के साथ ही विविध पात्रों एवं चरित्रों को भी स्थान दिया गया है। ‘कृष्ण सुदामा’ लोकगाथा में कृष्ण और सुदामा की मित्रता का सुन्दर वर्णन है।
दोई पढ़ें इक गुरुकुल में, नन्द नन्दन और सुदामा।
ईंधन की हुई महा तबाही, घर में से मिसरानी आई
जल्दी लकड़ी दो मंगवाई, अधकचरी है दाल
भोजन खों हो गई शामा, नन्द नन्दन और सुदामा।
जब गुरुकुल के लिए ईंधन हेतु लकड़ियां लाने कृष्ण और सुदामा जंगल में गए उसी समय दोनों की मित्रता का अनुकरणीय भविष्य तय हो गया।
चने चबा तेने सब लीने, हमको तनक भी न दीने
पिटबे के लांछन कर लीने
यह सोच किया है कान्हा, नन्द नन्दन और सुदामा।

वर्षों बाद अपनी पत्नी के कहने पर अपने मित्रा से मदद मांगने पहुंचे सकुचाए हुए सुदामा की आवभगत मित्र कृष्ण ने की। अपने हाथों से सुदामा के चरण धोए तथा सिंहासन बैठने को दिया। मित्र कृष्ण की सम्पन्नता देखकर सुदामा भेंट में लाए चावल देने का साहस नहीं कर पा रहे थे जिसे कृष्ण ने ताड़ लिया।
कासी दास श्रीकृष्ण कांख से, तुदुल खेंच चबावे
सुदामा जी के तंदुल मोहन खावें
तंदुल खाय मुट्ठी भर कें, मन में बहुत सराहवें
कंचन महल बनाय मित्रा के, संपति अमित भरवें
सुदामा जी के तंदुल मोहन खावें

‘मेघासुर’ लोकगाथा में पांडवों के साहस एवं कौशल का वर्णन मिलता है। मेघासुर संग्राम से पूर्व  देवी भवानी पांडवों को एक मढ़िया बनाने का निर्देश देती हैं-
बोले भुवानी सुनो पांडवा, ले के गजा तुम जाय
गजा लाये जब अर्जुन डगरे, धरनी झोंका खाय
 भरे समुंद समतल करे माया, मढ़ के करे विस्तार
कै गज की माई नींव डराऊं, कै गज के विस्तार

‘राजा जगदेव’ लोकगाथा में भी पाण्डवों का उल्लेख आया है। यह उललेख प्रश्नों के रूप में है। किसने पृथ्वी को रचा? किसने संसार को रचा? किसने पाण्डवों को बनाया? पाण्डवों को किस उद्देश्य से बनाया गया? इन प्रश्नों का उत्तर भी इन्हीं के साथ दिया गया है कि देवी ने पाण्डवों को बनाया। पृथ्वी से अन्याय और अधर्म का विनाश करने के लिए पाण्डवों की रचना की गई।
कौना रची पिरथवी रे दुनियां संसार, कौना रचे पंडवां उनई के दरबार
बिरमा रची पिरथवी रे दुनियां संसार, माई रचें पंडवां रे अपने दरबार
रैबे खों रची पिरथवी रे दुनियां संसार, रन खों रचे पंडवा रे अपने दरबार ।।

लोक गाथाएं लोक परम्पराओं के साथ चलती हैं। इनमें जन की आस्था, विश्वास और धारणाएं निहित होती हैं। लोग गाथाएं जन के चरित्र को समझने में मदद करती हैं। कुल मिला कर ये सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, धार्मिक एवं चारित्रिक परम्पराओं का प्रतिबिम्ब होती हैं।  

भारतीय जनमानस को चरित्रों की विविधता से परिपूर्ण ‘महाभारत’ महाकाव्य ‘रामायण’ के बाद सबसे अधिक प्रभावित करता है। बुन्देली जनमानस इससे अलग नहीं है। अन्याय, दासता के विरुद्ध युद्धघोष करने वाले बुन्देलों के लिए महाभारतकालीन प्रसंगों का विशेष महत्व होना स्वाभाविक है। यदि मुग़लों अथवा अंग्रेजों के विरु़द्ध बुन्देलों के संघर्ष का इतिहास पढ़ा जाए तो यही तथ्य सामने आता है कि बहुसंख्यक शत्रुओं से अल्पसंख्यक बुन्देलों ने सदैव डट कर संघर्ष किया। ठीक उसी तरह जिस प्रकार पाण्डवों ने कौरवों का सामना किया था। अतः इसमें तनिक भी संदेह नहीं है कि ऐसे संघर्षपूर्ण अवसरों पर ये लोग गाथाएं आमजन में साहस का संचार करती रही होंगी। आज भी सुदूर ग्रामीण अंचलों में ये लोक गाथाएं गाई जाती हैं। यद्यपि आधुनिकता के आज के दौर में इन लोक गाथाओं के मूल स्वरूप के लुप्त होने का भय बढ़ चला है। बुन्देलखंड को अपनी लोकगाथाओं में मौजूद महाभारत राग के स्वरों को सुनना चाहिए ताकि लोकतंत्र में वैचारिक मतभेद भले ही हो मगर महाभारत न हो। 
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Tuesday, April 18, 2023

पुस्तक समीक्षा | ‘‘आत्मान्वेषी’’: एक महत्वपूर्ण जीवनी का सुंदर नाट्यरूपांतर | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

प्रस्तुत है आज 18.04.2023 को  #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई  श्रीमती अर्चना मलैया की नाट्यकृति "आत्मान्वेषी" की समीक्षा... 
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पुस्तक समीक्षा
‘‘आत्मान्वेषी’’: एक महत्वपूर्ण जीवनी का सुंदर नाट्यरूपांतर
- समीक्षक  डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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नाटक     - आत्मान्वेषी
रूपांतरकार - श्रीमती अर्चना मलैया
प्रकाशक    - बीएफसी पब्लिकेशन प्रालि., सीपी-61, विराजखण्ड, गोमती नगर, लखनऊ- 226010
मूल्य       - 175/-
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आज जिस पुस्तक की समीक्षात्मक चर्चा मैं यहां करने जा रही हूं उसकी मूल शैली मंचीय नाटक की है। पुस्तक का नाम है -‘‘आत्मान्वेषी’’। इसका कथानक दो वीतरागी संतों के जीवन से संबद्ध है। एक आचार्य विद्यासागर तथा दूसरे उनके शिष्य मुनि क्षमासागर। इस नाट्यकृति में एक का जीवन है तो दूसरे का लेखन और चिन्तन है। अर्थात् एक महत्वपूर्ण जीवनी पर लेखिका अर्चना मलैया ने अपनी कलम चलाते हुए उसे नाट्यशैली में ढाला है। अतः नाट्यकृति ‘‘आत्मान्वेषी’’ पर दृष्टिपात करने से पूर्व दोनों संतों के बारे में जान लेना आवश्यक है।  

आत्मान्वेषण गहन दर्शन का विषय है। आत्मान्वेषण का शब्दिक अर्थ होता है आत्मनिरीक्षण या आत्मालोचन। इसे सरल शब्दों में कहें तो आत्मान्वेषण का अर्थ है स्वयं को जान लेना। स्वयं को पूरी तरह वही जान सकता है जो वीतरागी हो, अन्यथा संासारिक व्यक्ति तो सांसारिक वस्तुओं को जानने में ही भटकता रहता है। दिगंबर जैन संत आचार्यश्री विद्यासागर एक ऐसे ही वीतररागी हैं जो आत्मज्ञान प्राप्त कर कर चुके हैं। वीतरागी होने के कारण वे स्वयं के बारे में नहीं सोचते हैं वरन समस्त मानवता के लिए, समस्त जीवधारियों के लिए उनका चिंतन रहता है। वस्तुतः वे जैनाचार्य होने के सााि ही साहित्य सर्जक एवं समाजचिंन्तक भी हैं। उनके अनेक योग्य शिष्यों ने समाज और साहित्य में अपना उल्लेखनीय योगदान दिया है। उनके सुयोग्य शिष्यों में मुनि क्षमासागर का नाम लिया जा सकता है। 20 सितम्बर 1957 को जन्में तथा 13 मार्च 2015 को समाधिस्थ हुए मुनि क्षमासागर ने सागर विश्वविद्यालय से एमटेक की शिक्षा ली थी। किन्तु उनके मन में वैराग्यभाव उत्पन्न होने से उन्होंने 10 जनवरी 1980 को नैनागिरि तीर्थ में क्ष्ुाल्लक दीक्षा ली। फिर 7 नवम्बर 1980 को उन्हें ऐलक दीक्षा दी गई। यह उनकी सन्यास योग्यता का परिचायक पड़ाव था कि उन्हें 29 अगस्त 1982 को मुनि दीक्षा दी गई। मुनि क्षमासागर अपने सांसारिक जीवन में भले ही तकनीकी शिक्षा से जुड़े रहे किन्तु उनके भीतर सुप्त साहित्यिकता सन्यास के बाद जाग उठी। वे कवि थे, अनुवादक थे, संस्मरणकार थे, जीवनीलेखक थे और एक उच्चकोटि के प्रवचनकर्ता थे। उनके काव्य संग्रह हैं-‘‘पगडंडी सूरज तक’’, ‘‘मुनि क्षमासागर की कविताएं’’, ‘‘अपना घर’’ एवं ‘‘मैं तुम्हारा हूं’’। ‘‘एकीभाव स्तोत्र’’ उनकी अनुवाद कृति है। ‘‘आत्मान्वेषी’’ तथा ‘‘अमूर्त शिल्पी’’ उनकी संस्मरण पुस्तकें हैं। इनके अतिरिक्त उनके प्रवचनों को पांच पुस्तकों के रूप में प्रकाशित किया जा चुका है।
मुनि क्षमासागर ने आचार्यश्री विद्यासागर के विचारों से प्रभावित हो कर सांसारिकता का परित्याग करते हुए दीक्षा ली थी। आचार्यश्री उनके गुरु एवं पथप्रदर्शक थे। मुनि क्षमासागर ने ‘‘आत्मान्वेषी’’ के रूप में आचार्यश्री विद्यासागर की संस्मरणात्क जीवनी लिखी। आचार्य विद्यासागर का जन्म 10 अक्टूबर 1946 को कर्नाटक के बेलगाम जिले के सदलगा में शरद पूर्णिमा के दिन हुआ था। उनके पिता का नाम श्री मल्लप्पा था, और उनके माता का नाम श्रीमती था। इनके पिता बाद में मुनि मल्लिसागर बने और उनके माता जो बाद में आर्यिका समयामती बनी। आचार्य विद्यासागर जी को 1968 में अजमेर में 22 वर्ष की आयु में आचार्य ज्ञानसागर ने दीक्षा दी जो कि आचार्य शांतिसागर के वंश के थे। आचार्य विद्यासागर को 1972 में ज्ञानसागर जी द्वारा आचार्य पद दिया गया था। विद्यासागर जी के बड़े भाई ही गृहस्थ जीवन व्यतीत करते हैं और उनके अलावा सभी घर के लोग सन्यास ले चुके हैं। उनके भाई अनंतनाथ और शांतिनाथ ने आचार्य विद्यासागर जी से दीक्षा ग्रहण की ओर मुनी योगसागर और मुनि समयसागर कहलाए। आचार्य विद्यासागर संस्कृत, प्राकृत, सहित कई आधुनिक भाषाओं हिंदी, मराठी और कन्नड़ में विशेष ज्ञान रखते हैं। उन्होंने हिंदी और संस्कृत के विशाल मात्रा में रचनाएं की है। उनकी कृतियों पर विभिन्न विश्वविद्यालयों में शोधकार्य किए जाते हैं तथा पाठ्यक्रम में उनकी कृतियां पढ़ाई जाती हैं।

‘‘आत्मान्वेषी’’ में मुनि क्षमासागर ने आचार्यश्री की जो जीवनी लिखी है उसी को लेखिका अर्चना मलैया ने रंगमंच पर प्रस्तुत करने योग्य नाटक में ढाल दिया है। वस्तुतः यह उस स्थिति में अत्यंत दुरूह कार्य है जब आप जीवनी के मूल व्यक्ति एवं जीवनीकार के प्रति श्रद्धाभावना रखते हों। यह उस स्थिति में भी एक जोखिम भरा कार्य हो जाता है जब लेखन की मूल कथावस्तु दो संतों से कार्य एवं व्यक्तित्व से जुड़ी हो जिन पर जनसमूह अपार श्रद्धा रखता हो। ऐसी स्थिति में आवश्यक हो जाता है कि मूलकृति का केन्द्रीय आग्रह ज्यों का त्यों रहे और संवाद ऐसे हों जो बाल्यावस्था से दीक्षावस्था में पहुंच कर आचार्य बनने की कथा तो कहते हों किन्तु कहीं भी गरिमा भंग न करते हों। वहीं, यह महज एक धार्मिक ग्रंथ नहीं वरन साहित्यिक नाट्य कृति है अतः इसका साहित्यिकता की शर्तों को पूरा करना भी आवश्यक है। इस सभी बिन्दुओं को ध्यान में रखते हुए लेखिका अर्चना मलैया ने बड़ा सुंदर नाटक सृजित किया है। यह इस नाटक की सबसे बड़ी विशेषता कही जा सकती है कि इसे पढ़ते समय यह किसी कृति का रूपांतर नहीं अपितु मौलिक नाट्यकृति प्रतीत होती है। इस नाट्य रूपांतर की प्रक्रिया के बारे में लेखिका अर्चना मलैया ने आत्मकथन में लिखा है कि -‘‘‘‘एक दुर्लभ स्वप्न के साकार होने की जो रोमांचक अनुभूति होती है वही अनुभूति मैं ‘आत्मान्वेषी’ के नाट्य रूपान्तरण के संदर्भ में अपनी बात कहते हुए महसूस कर रही हूं। याद कर रही हूँ वह क्षण जब नागपुर के वरिष्ठ साहित्यकार श्री राजेन्द्र पटोरिया जी के सुझाव पर ‘मैत्री-समूह’ की सुश्री निशा जैन का फोन- भोपाल से आया था। उनका आग्रह था कि समाधिस्थ मुनि क्षमासागर जी द्वारा रचित ‘आत्मान्वेषी’ का नाट्य रूपांतरण मैं करूं। इस कार्य को अपना पुण्योदय मानकर मैंने तुरंत सहमति दे दी थी। उन्होंने शीघ्र ही मुझे पुस्तक आत्मान्वेषी उपलब्ध करायी। शीर्षस्थ साहित्यकार श्री यशपाल जी द्वारा लिखी भूमिका, मुनि क्षमासागर जी के चिंतन और नपे तुने शब्दों की असीम गहराई उस पर गुरूवर-108 विद्यासागर जी महाराज जैसे दिग्दिगन्त व्यापी आभा का चित्रण एक क्षण तो लगा कि मेरी बौनी कलम क्या न्याय करने में सक्षम हो जायेगी? फिर तुरंत ही रवीन्द्रनाथ टैगोर जी की वे प्रसिद्ध पंक्तियां मेरे जेहन में हठ पूर्वक मचल उठीं कि- ‘जितना संभव हो सकेगा मैं करूंगा नाथ।’ अपनी समस्त शक्तियों को समेट कर मैं नाट्य रूपातंरण के कार्य में जुट गई।’’

समूचा नाटक 16 दृश्यों में विभक्त है। इसमें कुल नौ पात्र हैं- मालप्पाजी (आचार्य विद्यासागर के पिता), मंा (आचार्य विद्यासागर की माताश्री), महावीर (बड़े भाई), शांतिनाथ (भाई), अनन्तनाथ (भाई), सुवर्णा (बहन), शांता (बहन), विद्याधर (संयास के पूर्व पुत्र विद्यासागर-शैशव, बचपन, युवावस्था तीन रूपों में), आचार्य (आचार्य ज्ञानसागर जी महाराज), महिलर (1), महिला (2), नागरिक (4) तथा मुनि (4)।
आरम्भिक पृष्ठों में पाश्र्वस्वर और मुनि क्षमासागर की समर्पण रूपी कविता के उपरांत प्रथम दृश्य आचार्य विद्यासागर के जन्म के पूर्व उनके माता-पिता के मध्य संवाद से आरम्भ होता है। जिससे पता चलता है कि माता गर्भवती हैं तथा अपने गर्भस्थ शिशु को गर्भावस्था से ही योग्य बनाने की अभिलाषी हैं। दूसरे दृश्य में पिता मालप्पा और मां श्रीमती के पारस्परिक संवाद हैं। जिसमें श्रीमती अपना अनुभव बताती हैं कि वे पूर्व में भी गर्भधारण कर चुकी हैं किन्तु ऐसी अलौकिक अनुभूति उन्हें पहले कभी नहीं हुई। तीसरे दृश्य में पुत्र जन्म की घटना है और चौथे दृश्य में गीत के माध्यम से समय की गतिशीलता को दर्शाया गया है। शिशु शैशवावस्था से आगे 6-7 वर्ष की आयु का हो जाता है तथा इसमें बालसुलभ चेष्टाओं का वर्णन है। पांचवें दृश्य में पुत्र विद्याधर का अन्य बच्चों से अलग प्रतीत होना संवाद के माध्यम से व्यक्त किया जाता है। छठे दृश्य में विद्याधर द्वारा एक घायल चिड़िया को ला कर उसके प्राण बचाने के प्रयास करना तथा चिड़िया के न बच पाने पर आहत हो उठना प्राणिमात्र के प्रति उनकी दयाभावना के प्रस्फुटन का संकेत देता है। यहां से विद्याधर की विद्यासागर बनने की यात्रा का अप्रत्यक्ष आरम्भ होता है। शेष दृश्यों में छोटी-छोटी रोचक घटनाओं को रखते हुए जीवनी के दृश्यों को आगे बढ़ाया गया है।

नाटक के संवाद पात्रों के अनुरुप सरल और सहज हैं। बालस्वरूप में माता-पुत्र के संवाद की बानगी देखिए-
‘‘विद्याधर (ठुनकते हुए)- हम जानते हैं तू रोकेगी... पर हम नहीं रूकेंगे। हम तुमसे घर से बाहर खेलने की जिद करेंगे और कहेंगे कि लो हम ये चले......हम जाते है मां। तुम पकड़ने आओगी... (अंगूठा दिखाते) पर हम पकड़ में थोड़े ही आयेंगे। (गर्व से ) बेटे हैं। ... अपनी मां के राजा।
श्रीमती जी (झूठा गुस्सा दिखाते) - कैंची की तरह जबान चलने लगी है तेरी। चल, भाग यहां से मुझे काम करने दे। अभी दही मथना है, मक्खन निकालना है फिर घी भी बनाना है। जा जरा बाहर खेल आ।
विद्याधर (जाते हुए ) - जाता हूं पर फिर कहना मत कि आता ही नहीं है खो जाता है।’’
लेकिन नाटक के अंतिम दृश्य तक आते-आते एक संत का चिंतन एवं गंभीरता संवादों में शनैः-शनैः स्थान लेने लगती है। दीक्षा के ठीक पूर्व अपना सर्वस्व त्याग करते समय भावी आचार्य वि़द्यासागर गुरुगंभीर घोषणा करते हैं जिसे शब्दों के चयन और विन्यास से सहज ही अनुभव किया जा सकता है-
‘‘विद्याधर- मैं सकल चराचर जीवों को क्षमा करता हूं, सभी मुझे क्षमा करें। मैं अंतिम तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी के द्वारा प्ररूपित अनादिकालीन श्रमण धर्म की शरण को स्वीकार करता हूं। मैं समस्त पूर्वाचार्यो की शरण को स्वीकार करता हूं, मैं चरित्र चक्रवती दिगम्बर जैनाचार्य श्री शांतिसागर जी, आचार्य श्री वीरसागर जी, आचार्य शिवसागर जी महाराज की परंपरा में अपने साक्षात् गुरू श्री ज्ञानसागर जी महाराज की चरण शरण को स्वीकार करता हूं। पूज्य महाराज मुझे जैनेश्वरी दीक्षा देकर अनुग्रहीत करें।’’

नाटक ‘‘आत्मान्वेषी’’ जीवनी के नाट्य रूपांतर के रूप में एक उत्कृष्ट कृति है। इसकी खूबी यह भी है कि इसे एक ब्रोशर के रूप में भी काम में लाया जा सकता है क्योंकि इसमें नाटक के बाद के पृष्ठों पर नाटक के मंचन की तस्वीरें, नाट्य निर्देशक का परिचय, मंच से परे रह कर अपना योगदान देने वालों का विवरण तथा दर्शकों की प्रतिक्रियाएं भी दी गई हैं। यह नाट्यकृति हर उस व्यक्ति के लिए पठनीय है जिसे साहित्यिक अभिरुचि हो या धर्म और साहित्य दोनों में रुचि हो। यह एक विलक्षण बालक के संत बनने तक की यात्रा कथा है तथा अपने गुरु के प्रति एक मुनि का प्रणम्य लेखन है और एक लेखिका द्वारा इन दोनों पक्षों को सहेजते हुए नाटक में गूंथ देने का बेहतरीन उदाहरण है।
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Sunday, April 16, 2023

Article | A Small Handling Can Avert A Big Disaster | Dr (Ms) Sharad Singh | Central Chronicle | Plastic Waste

Article
A Small Handling Can Avert A Big Disaster
 -    Dr (Ms) Sharad Singh
Writer, Author & Social Activist
Blogger - "Climate Diary Of Dr (Ms) Sharad Singh"

*One of the biggest problems the world is facing today is the problem of plastic waste. A large part of this plastic waste comes out of our homes only. It not only causes pollution but also chokes sewage and creates serious situations like floods. It kills stray animals and its toxic fumes can kill humans too. It is truth that we cannot completely stop the use of plastic but we have to focus on what we can do to tackle this problem?*
 
There are two incidents that I want to share with you. The first incident is that a new flyover has been built in my city. It looks very attractive at night. I reached that flyover and shot a video of myself with my mobile. When I came home and saw the video, I saw a stack of snacks lying near my feet. In that beautiful video he looked as bad as a black spot. I felt sad that why someone threw that empty packet there? Why not dumped in the dustbin? The second incident is that one day I was passing by a road and someone had burnt garbage on the side of it. The garbage also contained plastic items, the toxic fumes of which made me suffocate. The black smoke was heavy and was slowly spreading in the surrounding area. It was not dissolving quickly in the air. Actually this was a deadly way to dispose of plastic. If there was an asthma patient in that area, his life could have been in danger.

Plastic waste, or plastic pollution, is 'the accumulation of plastic objects (plastic bottles and much more) in the Earth's environment that adversely affects wildlife, wildlife habitat, and humans. Plastic pollution can alter habitats and natural processes, reducing ecosystems' ability to adapt to climate change, directly affecting millions of people's livelihoods, food production capabilities and social well-being. It has been observed that disposal of plastic waste is a serious concern due to improper collection and segregation system. Only 60% of the plastic produced is recycled, balance 9400 Tonnes of plastic is left unattended in environment causing land, air and water pollution. 
 
The Green colour dustbins are meant for wet and biodegradable wastes, kitchen wastes including vegetables and fruits skins.  Blue dustbins are meant for disposal of plastic wrappers and non- biodegradable wastes. Reducing the use of plastic is essential because it prevents pollution and reduces the demand for fossil fuel consumption while saving natural resources and energy. It also reduces greenhouse gas emissions, which are contributing to climate change. Plastic pollution can alter habitats and natural processes, reducing ecosystems’ ability to adapt to climate change, directly affecting millions of people’s livelihoods, food production capabilities and social well-being. 

Five Ways Plastic Harms the Environment. First, it is produce chemical pollution. Plastic also harms the environment through pollution. Plastics are essentially made from oil and gas. Mining these nonrenewable resources produces harmful chemicals like benzene, toluene, ethylbenzene, xylene, carbon monoxide, hydrogen sulfide, ozone, sulfur dioxide, and many more.

Second, it creates micro-plastics. Micro-plastics are now found just about everywhere. These small particles pollute waterways, soil, plants, animals and humans. The effects of micro-plastics are being newly studied. Micro-plastics have been shown to affect soil quality, the microbes that live in it, and the tiny insects responsible for decomposition. Micro-plastics also affect larger animals in many ways, from damaging their DNA, stunting their growth, damaging reproductive organs and more.

Third, plastic waste tends to accumulate as a waste that does not decompose on its own. Fourth, when this plastic waste reaches the sewage system, it chokes it. One of the major reasons for the floods in Mumbai a few years back was sewage choked by plastic waste.

Fourth, after being thrown in the dustbin, plastic waste is eaten by stray animals along with other food items in our country. There are incidents of cows dying due to eating plastic bags. Plastic bags are not digests and prove to be fatal for them by getting stuck in their intestines.
Fifth, many countries in the world illegally dump plastic waste into the ocean.  In the marine world large numbers of coral reeves are damaged. Plastic wastes are huge damage to marine life. By this cause marine beach are polluted too.

If seen, water, land, air all are harmed by plastic waste. That's why the best way to avoid plastic waste is to reduce the use of plastic. But it is also true that the utility of plastic has become a necessity in our life in such a way that we cannot leave it completely. Therefore, it is important that we learn to manage the waste of the plastic we use. Only then can we avoid the ill effects of plastic waste. Yes, we should keep the separate plastic waste of our homes  and should be dump it in the blue colored dustbin which is made for the same. This will facilitate those who dispose of plastic waste and we will be able to avoid the harmful effects of plastic waste. This small handling can save us from big danger.
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 (16.04.2023)
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Friday, April 14, 2023

बाबा साहेब डॉ. अंबेडकर के जन्म दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं - डॉ (सुश्री) शरद सिंह

🌹 बाबा साहेब डॉ. अंबेडकर के जन्म दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं! 🌹
    मित्रों "डॉ अंबेडकर का स्त्रीविमर्श" पुस्तक लिखने के दौरान मुझे डॉ. अंबेडकर के विचारों के विस्तार का पता चला। उन्होंने जाति धर्म से परे सभी स्त्रियों के हित बारे में सोचा। मेरा तो यही मानना है कि यदि बाबा साहब को संपूर्णता से जानना है तो उनके समग्र विचारों को पहले जानना और समझना जरूरी है।🙏
  प्रेस क्लब लखनऊ में 17.11.2012 को  अरूणाचल प्रदेश के पूर्व राज्यपाल महामहिम श्री माता प्रसाद जी ने मेरी इस पुस्तक ‘डॉ. अम्बेडकर का स्त्री विमर्श’ का लोकार्पण किया था। मेरे लिए अविस्मरणीय दिन था 🎉🤗🎉
     उक्त अवसर पर श्री गुलाबचंद (अपर महानिदेशक प्रसार भारती लखनऊ) डॉ. परशुराम पाल (असोसिएट प्रोफेसर लखनऊ विश्वविद्यालय), श्री सुरेश उजाला (संपादक ‘उत्तर प्रदेश’ पत्रिका), श्री महेन्द्र भीष्म (कथाकार), डॉ अमिता दुबे (साहित्यकार), श्री वीरेन्द्र बाहरी (भारत बुक सेंटर), श्री तरुण बाहरी (भारत बुक सेंटर) तथा  लखनऊ के जुझारू पत्रकारों एवं प्रेस छायाकारों सहित भी बड़ी संख्या में उपस्थित थे।  🌻
❗️ यह पुस्तक यह पुस्तक सन 2012 में प्रकाशित हुई थी। 
पुस्तक के प्रकाशक - भारत बुक सेन्टर, 17, अशोक मार्ग, लखनऊ (उत्तर प्रदेश)- 226001
  ❗️ उस महत्वपूर्ण पल की कुछ तस्वीरें आप से साझा कर रही हूं ...
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Thursday, April 13, 2023

बतकाव बिन्ना की | चुनाव आत-आत रोन-कुमरई की किसां होन लगहे | डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम | बुंदेली व्यंग्य | प्रवीण प्रभात

"‘चुनाव आत-आत रोन-कुमरई की किसां होन लगहे" - मित्रो, ये है मेरा बुंदेली कॉलम "बतकाव बिन्ना की" साप्ताहिक #प्रवीणप्रभात , छतरपुर में।
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बतकाव बिन्ना की  
चुनाव आत-आत रोन-कुमरई की किसां होन लगहे                 
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
      जो मैं भैयाजी के इते पौंची सो वे हलके चच्चा से बतकाव कर रए हते।
‘‘राम-राम चच्चा!’’ मैंने हलके चच्चा खों राम-राम करी। कहबे को बे चच्चा कहाऊत आएं बाकी उनकी उम्मर चच्चा वारी नोंई।
मनो हल्के चच्चा के ‘‘चच्चा’’ कहाबे के पांछू सोई एक किसां आए। का भओ रओ के उने चायने रई नगरपालिका पार्षद के चुनाव की टिकट। उने कोनऊं पूछ ने रओ हतो। उन्ने अपने वारे विधायकजी से कई के हमें सोई पार्षद के लाने ढ़ाड़ो करा देओ। सो, विधायकजी ने ठक्का-ठाई कै दई के ‘‘एक तो तुमाओ नांव हल्के, ऊपे तुमाई पर्सनाल्टी सोई हल्की। सिंगल हड्डी के धरे हो। कोनऊं तुमसे इम्प्रेस नईं होत। पैले कछू दमदार बनों फेर आइयो! विधायकजी ने कै दई खरी-खरी। अब इत्ती खरी को सुन सकत आए? अपने हल्के महराज खों लग गई बुरई। उन्ने वोई दिनां से दंड पेलने चालू कर दओ औ अंडा-बदाम सबई कछु खान लगे। पंद्रा दिनां में उने समझ परी के जे सब में सो टेम लग जेहे सो उन्ने एक शार्टकट निकारो। बे अपने नांव के संगे चच्चा बोलन लगे। मने, बे कोनऊं से बात कर रए होंए सो खुदई कैते के ‘‘बे हमसे बोले काय हल्के चच्चा’’, मनो ई टाईप से बे सब के मन में अपने लाने चच्चा फिट करन लगे। औ उनको काम बन गओ। छोटे-बड़े सबई उने हल्के चच्चा कैन लगे। अब बे अकेले हल्के नोईं रए, बे बन गए हल्के चच्चा। बन गई पर्सनाल्टी। उनकी जे बुद्धिमानी देख के विधायक जी सोई ग्लेड हो गए। अखीर में उने पार्षदी हाथ लग गई।
‘‘काय, हल्के चच्चा औ का चल रओ?’’ मैंने हल्के चच्चा से पूछी।
‘‘अरे बिन्ना! आपको आशिर्वाद मिल जाए सो अपनों भाग खुल जाए!’’ हल्के चच्चा बोले।
‘‘का मतलब?’’ उनकी बात सुन के मोय झटका सो लगो। कऊं इने उधारी के पइसा-वइसा सो नई चाउंने?
‘‘मतलब जे के ई बेरा हम सोच रए के विधायक के लाने जोर लगाएं। अब भैंन हरों को आशीर्वाद हुइए, सो मिल जेहे विधायकी।’’ कैत भए हल्के चच्चा ने धड़ से मोरे पांव पर लए।
‘‘अरे-अरे, जो ने करो! मोरो आशीर्वाद सो हमेसई आपके लाने रिजर्व आए।’’ मैंने हल्के चच्चा से कई।
‘‘अब जे सो पूछ लेओ ई महराज से के कोन-सी पार्टी से ठाड़े होबे की सोच रए?’’ हम ओरन की बातें सुन के भैयाजी बोल परे।
‘‘जोन पार्टी ऊ समै लों जीतबे वारी समझ में आहे, बोई की टिकट के लाने जुगत करबी।’’ हल्के चच्चा दंतनिपोरी करत भए बोले।
‘‘सुनी इनकी!’’ भैयाजी मोसे बोले। फेर कैन लगे,‘‘अबे सो कछू नईं, तनक चुनाव को टेम सो आन देओ। चुनाव आत-आत रोन-कुमरई की किसां हुइए।’’
‘‘रोन-कुमरई? मने काय की किसां?’’ हल्के चच्चा पूछन लगे।
‘‘तुमे नई पता जे किसां?’’ भैयाजी ने हैरानी से पूछीं, ‘‘काय तुम बुंदेलखंड में रैत आओ के लंदन में, जो जे किसां नई सुनी तुमने?’’ भैयाजी खों मनो यकीन नई भओ।
‘‘हऔ, सो का भओ? नईं सुनी सो नई सुनी! जे बिन्ना ने सोई ने सुनी हुइए।’’ हलके चच्चा बोले।
‘‘बिन्ना की छोड़ो। बिन्ना ने जे किसां सुनी सो ठीक मनो लिखी औ छापाई सोई आए। वो बी साहित्य अकादमी दिल्ली से। इनकी किताब आए-‘बुंदेलखंड की लोककथाएं’। समझे कछू। पढ़त-लिखत सो हो नईयां। ने तो इत्तो तो पतो रैतो।’’ भैयाजी बोले।
मोय जे सुन के अच्छो लगो के भैयाजी ने मोरी बड़वारी करी। मनो कोन खों अपनी बड़वारी भली ने लगहे।
‘‘चलो हम सुना रए तुमाए लाने रोन-कुमरई की किसां।’’ भैयाजी बोले। फेर उन्ने किसां सुनानी शुरू करी - ‘‘एक हती कुतिया। बा बड़ी लालची हती। ऊको मनो जे पता पर जाए के फलां गांव में पंगत हो रई सो बा सौ मील लों भगत चली जात्ती। ऊके संगवारे कुत्ता-कुतिया ऊको समझात रैत्ते के इत्तो लालाच ने करो। इते-उते भगत फिरत आओ, जे ठीक नइयां। मनो बा काय को कोनऊं की सुनती। एक बेर का भओ के एक रओ गांव। जीको नांव हतो रोन। उते के लंबरदार ने रखी एक पंगत। रोन गांव बा कुतिया के गांव से दूर ने हतो, सो बा और ऊके संगवारन ने पंगत में पौंचबे को प्लान करो औ चल परे। बे ओरें कछू दूर पौंचे हते के उने खबर मिली के कुमरई गांव के लंबरदार ने सोई पंगत रखी आए। कछू कुत्ता-कुतिया हते सो बे रोन जाबे के लाने कैन लगे औ कछू बोले के हमें तो कुमरई जाने। बे ओरे दो फड़ में बंट गए कहाने। उन ओरन ने बा कुतिया से पूछी के तुम कोन तरफी जेहो? सो बा बोली के जोन के इते अच्छो खाना बन रओ हुइए, उतई जाबी औ खाबी। सो ईपे बाकी कुत्ता-कुतियन ने कई के जे सो उतई जा के पता परहे। सो बा कुतिया बोली के फिकर नाट, मैं पैले रोन जैहों, ईके बाद कुमरई। दोई जांगा पौंच के पता चल जेहे के कोन के इते अच्छो खानो बन रओ। जा सुन के सब ने कई के जे तुमाई मर्जी, जो ठीक लगे सो करो।
सो बा कुतिया पैले रोन पौंची। ऊने देखी के उते तो पुड़ी तली जाबे की तैयारी चल रई हती।  सो ऊने सोची के जो लौं पुड़ी बन रईं तब लौं कुमरई खों चक्कर लगा लओ जाए। पतो पर जेहै के उते का बन रओ। सो बा भगत-भगत कुमरई पौंची। उते ऊने देखी के हलवा बनाओ जा रओ आए। जा देख के ऊकी लार टपकन लगी। ऊने सोची के आज सो हलवा-पुड़ी दोई खाबे खों मिलहे। जेई संगे ऊके मन में खयाल आओ के जा के पैले पुड़ी खा लई जाए। उत्ती देर में इते हलवा बन जेहे। बा फेर के भगी और रोन पौंची। उते जा के देखी के पुड़ी को एक घना खतम हो गओ रओ और दूसरे घना की तैयारी चल रई हती। जे देख के ऊने सोची के जित्ते में इते पुड़ी को दूसरो घना उतरहे, उत्ते में कुमरई जा के हलवा खा लओ जाए। सो बा दौड़त-दौड़त कुमरई पौंची। उते ऊने देखी के जो लों बा रोन गई उत्ते में इते कुमरई में हलवा खतम हो गओ रओ। अब फेर के हलवा बनाबे को काम चल रओ हतो। सो बा जे सोच के घबरा गई के कऊं उते पुड़ी ने बढ़ा जाए। सो बा फेर रोन खों भागी। रोम और कुमरई में मनो सात कोस की दूरी हती। बा हांफत-हांफत रोन पौंची। जब लौं उते कछू बचोई नई हतो। ऊके संगवारे कुत्ता-कुतियन ने जूठा दोना-पत्तल लौं चाट-चूट के सफा कर दओ हतो। जा दसा देख के ऊको लगो के तुरतई कुमरई पौंचो जाए, ने तो उते बी कछू ने मिलहे। बाकी जे भागा-भागी में ऊकी दम कढ़ी जा रई हती। औ भूक बी जोर की लग आई हती। बा लालची कुतिया फेर के कुमरई की तरफी भागी। आधी रस्ता में पौंचत-पौंचत भूक, प्यास औ थकान से ऊकी दम कढ़ गई औ बा उतई टें बोल गई। इत्ते में रोन और कुमरई दोई तरफी से ऊके संगवारे कुत्ता-कुतिया लौटे। उन्ने बा कुतिया की दसा देखी सो उने कै आई के-‘‘जा लालच के फेर में ने परती औ कोनऊं एक पंगत में टिकी रैती तो कछू तो खाबे खों मिल जातो। जे जो जान से तो ने जाती।’’- सो, हल्के चच्चा! जे हती रोन-कुमरई की किसां। औ बोई दिनां से अपने इते लालच करबे वारन खों रोन-कुमरई की कुतिया कओ जान लगो।’’ भैयाजी किसां खतम करत भए बोले।
‘‘किसंा सो मनो नोनी हती, बाकी जा सुना के तुम हमसे का कैन चात आओ?’’ हल्के चच्चा ने भैयाजी से पूछी।
‘‘अरे हमें का कैने? तुम खुदई समझदार आओ। हम सो बस जे कै रै के चुनाव आत-आत रोन-कुमरई की किसां होन लगहे के ई पार्टी में चलो आए के ऊ पार्टी में?’’ कैत भए भैयाजी हंसन लगे।
अब हल्के चच्चा इत्ते बी हल्के ने हते के भैयाजी को टांट ने समझ पाउते। बे खिसिया के उते से खिसक लिए। मोए सोई कऊं जाने रओ सो मैंने भैयाजी से राम-राम करी। बाकी अब आप ओरें सोई सोचियो के जे जो भैयाजी ने कई बा सांची कई के झूठी? मनो बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की। सो, सबई जनन खों शरद बिन्ना की राम-राम!
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चर्चा प्लस | आवारा पशुओं की समस्या और हम | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर

चर्चा प्लस  
आवारा पशुओं की समस्या और हम
     - डाॅ (सुश्री) शरद सिंह                                                                   
        हम पशुओं का आदर करते हैं। गौ को अपनी माता मानते हैं। हम यह सहन नहीं कर पाते हैं कि गौ माता को कोई ज़रा भी चोट पहुंचाए। हम कुत्तों को सड़क पर आवारा घूमते देखते हैं तो हमें उन पर दया आती है। जब कभी कोई आवारा कुत्ता किसी वाहन से कुचल कर मर जाता है तो हमें उसकी इस बेरहम मौत पर दुख होता है। हमारे भीतर पशुओं के प्रति कोमल भावनाएं हैं लेकिन ये भावनाएं अकसर सोई हुई क्यों रहती हैं? कभी सोचा है? विदेशी सड़कों पर आवारा पशु नहीं घूमते लेकिन हमारे देश की सड़कें हमेशा आवारा  पशुओं  से सुसज्जित रहती हैं। कभी सोचा है कि कहां से आते हैं ये आवारा पशु और क्या है आवारा पशु अधिनियम? मेरे इस लेख के आइने में आप अपने शहर का प्रतिबिम्ब देख सकते हैं।    
मेरा सागर शहर उन अनेक भारतीय शहरों में से एक है जो आवारा पशुओं की समस्याओं से रोज़ ही दो-चार होता रहता है। हां, डेयरी विस्थापन की प्रक्रिया अन्य शहरों की भांति सागर में भी आरम्भ हो चुकी है। यह बात और है कि इस प्रक्रिया को क्रियान्वित होने में दो-तीन दशक तो निकल ही गए हैं। बहरहाल, मसला डेयरी में पाले जाने वाले पशुओं का नहीं है। वे तो डेयरी से भ्रमण के लिए निकाले भी जाते थे तो उनका एक फिक्स टाईम था। मसला तो है उन आवारा गौ वंशियों का और कुत्तों का है जो सड़कों पर जीवनयापन करते रहते हैं। चलिए कुत्तों को मान लिया जाए कि वे पीढ़ियों से हमारे देश में आवारागर्दी करते आ रहे हैं। फिर जब से माननीया मेनका गांधी जी ने यह कानून बनवा दिया कि आवारा कुत्तों को नगरपालिका वाले ज़हर की गोलियां दे कर न मारें, तब से उनकी संख्या में अच्छा-खासा ईज़ाफ़ा हुआ। मैं स्वयं भी पशु हत्या का विरोध करती हूं। किसी भी पशु को ज़हर खिला कर मार देना कोई मानवीय विकल्प नहीं है। इसके लिए इस प्रावधान को बढ़ावा दिया गया कि आवारा कुत्तों का बंध्याकरण किया जाए। लेकिन मसला क्या है कि हमारे देश में अच्छे-अच्छे प्रावधान तो बहुत हैं किन्तु उनके क्रियान्वयन में अनेक झोल रहते हैं। इन झोलों के चलते कुत्ते आज भी बड़ी संख्या में गांवों और शहरों में घूम रहे हैं और सड़कों पर भटकते गौवंशी अपने दुर्भाग्य को जी रहे हैं।

  वेद-पुराण उठा कर देख लें कि हमारे गौवंशी कभी आवारा नहीं रहे। वे या तो पशुपालकों की पशुशाला में होते थे या फिर ऋषि-मुनियों के आश्रमों की पशुशाला में। गौवंशियों में विशेष रूप से गौदान पुण्य का कार्य माना जाता था। ऋग्वेद में स्पष्ट कहा गया है कि गोहत्या महापाप है औ यह मनुष्य के वध के समान है -
आरे गोहा नृहा वधो वो अस्तु (ऋग्वेद 7/56/17)

‘‘स्कंद पुराण’’ के अनुसार ‘गौ सर्वदेवमयी और वेद सर्वगौमय हैं।’’ वहीं ‘‘श्रीमद् भगवद्गीता’’ में भगवान कृष्ण ने स्वयं को कामधेनु कहा है- ‘धेनुनामस्मि कामधेनु’ अर्थात मैं गायों में कामधेनु हूं। वेदों में यह भी माना गया कि -‘‘गावो विश्वस्य मातरः।’’ अर्थात् गाय विश्व की माता है।
 
ऋग्वेद 6/48/13 के अनुसार गौ प्रत्यक्ष में तो केवल दूध देती है, परन्तु परोक्ष में विश्व को जैविक कृषि के द्वारा भोजन भी देती है। ऋग्वेद 1/29 का पहला मंत्र कहता है कि अल्पज्ञ यानी बुद्धिहीन और साधनविहीन व्यक्ति भी गौवंश का पालन करने से हजारों प्रकार के वास्तविक ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं, कर्मठ बनते हैं और फिर वे यशस्वी और ऐश्वर्यशाली बनते हैं। इसीलिए हमने गौवंश को सदा सम्मान दिया। आज भी अनेक लोग ऐसे दिख जाएंगे जो गौमाता के सामने पड़ने अथवा उनके पास से गुज़रते समय उनका स्पर्श अपने माथे से लगा कर उन्हें सम्मान देते हैं। लेकिन कभी सोचा है कि वह भावना कहां गई जिसमें गौमाता को पशुशाला में रख कर सम्मान सहित पालने का चलन था। आज अनेक ऐसी गायें सड़कों पर दिख जाती हैं जो अब दूध देना बंद कर चुकी हैं यानी पशुपालक के लिए अनुपयोगी हो गई हैं। अनेक ऐसे बैल दिख जाते हैं जो किसी भी उपयोग के न होने के कारण सड़कों पर मरने-खपने के लिए छोड़ दिए जाते हैं। वे दूसरों को चोट पहुंचाते हैं और खुद भी चोट खाते हैं। उनकी इस दशा के लिए हम स्वार्थी मनुष्य जिम्मेदार हैं यानी जो हमारे काम के नहीं हैं, हमें उनकी परवाह नहीं है।

कई आवारा गाएं हमारे घर के दरवाज़े तक आ पहुंचती हैं। हम पुण्य कमाने की भावना से उन्हें दो रोटी या बचा हुआ भोजन दे देते हैं। क्या उनका इतना बड़ा शरीर उस दो रोटी या बचे हुए भोजन पर टिका रह सकता है? हमने अपनी गौ माता को भिखारिन बना दिया है। दो रोटी की भीख के लिए वे हमारे दरवाज़े पर आ खड़ी होती हैं। बात कहने, सुनने या लिखने में कटु है लेकिन सच यही है। गौवंशियों के सड़कों पर बैठे रहने या आपस में लड़ने से आए दिन सड़क दुर्घटनाएं होती रहती हैं। हम उस समय गौवंशियों को कोसते हैं जबकि उनको कोसना भूल जाते हैं जो इस तरह गौवंशियों केे सड़कों पर होने के लिए जिम्मेदार हैं।

अभी कुछ दिन पहले की घटना है। चैत्र नवरात्रि के समापन के ठीक दूसरे दिन मुझे नर्मदातट पर बने तीर्थस्थान बरमान जाने का अवसर मिला। बरमान तक आने-जाने में नेशनल हाईवे 44 से हमने यात्रा की। अलग-अलग दो स्थानों दो गायों के मृत शरीर देखने पड़े जो किसी वाहन से टकरा कर मरी थीं। स्पष्ट है कि कोई भी वाहन चालक गौवंशियों को कुचल कर मारना नहीं चाहेगा लेकिन यदि अचानक सड़क पर वे आ जाएं और हाईवे पर तेज चलते वाहन के चालक चाहकर भी उन्हें बचा नहीं सकते हैं। मुझे वे दोनों दृश्य देख कर दुख हुआ। पता नहीं कौन थे उनके असली मालिक जिन्होंने सड़क पर भटकने के लिए उन गायों को छोड़ दिया था।
 
मेरे शहर के मकरोनिया उपनगर में अर्द्धसाप्ताहिक सब्जी हाट भरता है। अर्द्धसाप्ताहिक यानी सप्ताह में दो दिन- बुधवार और रविवार को। ग़ज़ब का दृश्य होता है वहां का। खरीददारों की भारी भीड़ के बीच बड़े-बड़े सींगों वाले गाय-बैल सब्जियों पर झपट्टा मारते रहते हैं। सब्जीवाले उन्हें डंडे मार कर भगाते हैं तब वे गौवंशी खरीदारों से टकरा जाते हैं। गौवंशियों के पेट की भूख उन्हें ढीठ बनने को विवश कर देती है। वे मार खाते हैं और झपट्टा मारते रहते हैं। भूख और मार का यह डरावना खेल चलता रहता है। चलिए सब्जीबाजार छोड़ कर यदि मुख्य मार्गों पर चलें तो वहां भी बीच सड़क पर गौवंशी बैठे मिल जाएंगे। जिन्हें लोग मज़ाक में ‘‘आरटीओ’’, ‘‘डिवाईडर’’ और न जाने क्या-क्या कहते हैं। लेकिन गौवंशी कोई मज़ाक नहीं बल्कि जीवित प्राणी हैं। हम उनकी जिन्दगी के साथ बेहिचक खिलवाड़ कर रहे हैं।

मुझे याद आता है कि बचपन में मैंने अपनी मां से कांजीहाउस के बारे में सुना था। वे बताती थीं कि कांजीहाउस वह जगह है जहां आवारा घूमते पशुओं को पकड़ कर बंद कर दिया जाता है। वहां उन्हें खाना-पीना दिया जाता था और उनका पूरा ध्यान रखा जाता था। शाम के बाद पालतू पशुओं के मालिक अपने पशुओं को ढूंढते हुए कांजीहाउस पहुंचते थे। इससे उनके असली मालिक का पता चल जाता था और उन मालिकों को फटकार लगाने के साथ, उनसे जुर्माना भी वसूला जाता था। अब मुझे ‘‘कांजीहाउस’’ शब्द ही सुनने को नहीं मिलता है।
 
बात करें यदि आवारा कुत्तों की तो इसके लिए बाकायदा अधिनियम है। भारतीय दंड संहिता की धारा 428 और 429 और 1960 के पशु क्रूरता अधिनियम में किसी भी जानवर को अपंग बनाना या चोट पहुंचाना अवैध है। सड़कों पर कुत्तों, बिल्लियों और गायों को जानबूझकर घायल करना वाहनों के लिए भी अवैध है। यदि कोई व्यक्ति जो इन कानूनों का उल्लंघन करते हुए पकड़ा जाता है, उसकी सूचना स्थानीय पशु संरक्षण समूह और पुलिस को दी जा सकती है। उपरोक्त धाराओं के तहत भी मुकदमा दर्ज किया जा सकता है। इसके तहत आवारा पशुओं को रखने वाले लोगों को राज्य सरकार प्रतिदिन 30 रुपये (महीने में 900 रुपये) देती है। पीसीए अधिनियम, 1960 की धारा 11(1) (प) और धारा 11(1) (जे) के तहत आवारा पशुओं को स्थानांतरित करना अवैध है। बोरियों में भरकर अपने क्षेत्र से दूर फेंकना भी अपराध है। पीसीए अधिनियम, 1960 की धारा 11 (1) (एच) के तहत, जानबूझकर आवारा कुत्तों को भूखा मारना और उनका आश्रय छीन लेना अवैध है। लेकिन दूसरी ओर यही आवारा कुत्ते मनुष्यों को काट लेते हैं। कमजोर पशु, छोटे बच्चों को इनसे विशेष खतरा रहता है। इसलिए बेहतर है कि पशुओं को आवारा स्थिति में न रहने दिया जाए। उन्हें आवास प्रदान किया जाए जैसा कि योरोप और अमेरिकी देशों में होता है।
पशुओं के साथ नैतिक व्यवहार के पक्षधर लोगों का संगठन है प्यूपिल फाॅर द एथिकल ट्रीटमेंट ऑफ एनिमल्स यानी पेटा। यह संगठन आवारा पशुओं के हित में काम करता है। इसका मुख्यालय यूएसए के वर्जिनिया के नॉर्फोल्क में स्थित है। विश्व भर में इसके लगभग 20 लाख से अधिक सदस्य हैं। भारत में भी पेटा के सदस्य बड़े शहरों में कार्यरत हैं। उनका कार्य स्वयंसेवी होता है।

हमारे तमाम नियमों, कानूनों एवं संवेदनाओं के बावजूद सड़कों पर आवारा पशु भटक रहे हैं। क्या हमें यह नहीं सीखना चाहिए कि जिन विदेश की सड़कों से हम अपने देश की सड़कों की तुलना करते हैं वहां आवारा पशुओं की समस्या से कैसे निपटा जाता है? अमेरिका की सड़कों पर आवारापशु दिखाई नहीं देते हैं क्योंकि वहां पशुओं को आवारा छोड़ना अपराध है और इसके लिए कड़ा दंड दिया जाता है। वहां तो पालतू पशुओं यानी पालतू कुत्तों को बाहर घूमाते समय गंदगी फैलाना भी अपराध है। ऐसा करने वाले को जुर्माना भरना पड़ता है, वरना जेल की सज़ा काटनी पड़ती है। हमने इस बात में उनके जैसे बनने में रुचि नहीं दिखाई है। सुबह-सवेरे अच्छे-भले सभ्रंात, सुशिक्षित लोग अपने अच्छी नस्ल के कीमती कुत्तों को यहां-वहां पौटी कराते दिखाई दे जाते हैं। क्या यह सम्य नागरिकता की निशानी है? या फिर अपने उन पालतू कुत्तों के जीवन से खिलवाड़ नहीं है जिनके लिए एक ओर सब कुछ हाईजेनिक रखते हैं लेकिन पौटी कराने के लिए गंदी जगहों में ले जाते हैं। वहीं इंसानों की सेहत के लिए भी खतरा बढ़ाते हैं। ऐसे लोग आवारा पशुओं की भला क्या चिंता करेंगे?
 
हम में से अधिकांश लोग ऐसे हैं जिन्हें आवारापशु अधिनियम की कोई जानकारी नहीं है। इस बारे में सरकार की ओर से भी न तो कोई गंभीरता से जानकारी दी जाती है और न कोई कड़ाई बरती जाती है। आवारा पशुओं के लिए सुरक्षित शेल्टर्स की भी बहुत कमी है। कांजीहाउस तो समाप्तप्राय हैं। नगरनिगम या नगरपालिका के कर्मचारियों को आवारा पशु पकड़ने का कोई विधिवत प्रशिक्षण भी नहीं दिया जाता है अतः ड्यूटी लगने पर वे अपनी जान जोखिम में डालते हुए जैसे तैसे कार्य करते हैं। हम स्मार्टसिटी या शहरों के सौंदर्यीकरण का चाहे जितना राग अलाप लें किन्तु जब तक आवारापशुओं की समस्या को हल नहीं कर लेते तब तक सारी प्रगति अपने हाथों अपनी पीठ थपथपाने जैसी ही होगी।     
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Tuesday, April 11, 2023

डॉ (सुश्री) शरद सिंह जागरण सखी, अप्रैल 2023 की कवर स्टोरी में

प्रिय मित्रो,  
महिलाओं की लोकप्रिय पत्रिका "जागरण सखी", अप्रैल 2023 की कवरस्टोरी "बेतरतीब... लेकिन खूबसूरत है जिंदगी" में मेरे अनुभव और विचार भी शामिल किए गए हैं जिसके लिए मैं प्रिय विनीता जी की हार्दिक आभारी हूं 🌹🙏🌹
      इस कवरस्टोरी में मेरे साथ हैं वरिष्ठ साहित्यकार मैत्रेयी पुष्पा जी, वीणावादक पं सलिल भट्ट, मोटिवेशनल स्पीकर यश तिवारी, पटकथा लेखक कल्याण आर गिरि तथा चित्रकार संजू दास... सभी देश की जानी-मानी शख़्सियत हैं 🌹
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