Thursday, May 18, 2023

बतकाव बिन्ना की | उनकी केमिस्ट्री, भैयाजी के लाने मिस्ट्री | डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम | बुंदेली व्यंग्य | प्रवीण प्रभात

"उनकी केमिस्ट्री, भैयाजी के लाने मिस्ट्री" - मित्रो, ये है मेरा बुंदेली कॉलम "बतकाव बिन्ना की" साप्ताहिक #प्रवीणप्रभात , छतरपुर में।
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बतकाव बिन्ना की  

उनकी केमिस्ट्री, भैयाजी के लाने मिस्ट्री              
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
     ‘दो-चार दिनां से दिखा नईं रईं। कां हतीं?’’ भैयाजी आतई साथ पूछन लगे।
‘‘कऊं नईं, इतई, घरै डरी रई।’’मैंने भैयाजी से कई।
‘‘डरी रई को का मतलब? हमें सोई तुमाई फिकर सी हो रई हती, मनो आज तुमाई भौजी बोलीं के जाओ, देख के आओ, कां आएं बिन्ना?’’ भैयाजी ने कई।
‘‘सच्ची मोरी भौजी खों मोरी कित्ती फिकर रैत आए।’’ भैयाजी की बात सुन के मोरो गला भर आओ।
‘‘जे का? तुम तो रोन लगीं? बे तो खुदई आ रई हतीं, मगर हमई ने कई के पैंलऊं हम देख लें के बिन्ना घरे आए के नईं, फेर जाइयो।’’ भैयाजी बोले।
‘‘अरे, मोए कां जाने? इत्ती सो गरमी पड़ रई औ ऊपे तबीयत की सल्ल बींध गई।’’मैंने कई।
‘‘हऔ, आवाजई बता रई के तुमाओ गरो लगो आए। कोनऊं दवा-दारू लई?’’ भैयाजी ने पूछी।
‘‘हऔ, दवा सो ले लई, मनो दारू को सो सवालई नईं उठत!’’ मैंने हंस के कई।
‘‘तुमें औ ठिठोली सूझ रई। हमाओ मतलब बा वारी दारू से नोईं।’’ भैयाजी सोई हंसत भए सफाई देन लगे।
‘‘अरे, मैं सो ऊंसई कै रई। बाकी डाॅक्टर खों दिखा के दवा लई रई। बा बोल रए हते के वायरल हो गओ आए।’’ मैंने भैयाजी खों बताओ।
‘‘चलो, जल्दी ठीक हो जेहो! बाकी जे वायरल सोई गजब की चीज कहानी। कछु के लाने बीमारी आए औ कछू के लाने पब्लीसिटी।’’ भैयाजी बोले।
‘‘का मतलब?’’ मैंने पूछी।
‘‘मतलब जे के जोन को वायरस वारो वायरल भओ बा सो डाक्टर की दवा खा के ठीक हो जात आए। मनो जोन की सोसल मीडिया को पोस्ट वारो वायरल होन लगत आए उने लगत आए के उनको वायरल वारो बुखार कभऊं उतरेई नोईं। का गजब की चीज बनाई भगवान ने जे वायरल।
‘‘भगवान ने काय बनाई? अपन ओरन नेई बनाई आए। जे जो सोसल मीडिया के वीर आएं बे अपनी पोस्ट खों वायरल करबे के लाने कौन-कौन सी जुगत करत रैत आएं। कभऊं रेल की पटरी पे ठांडे हो जात आएं, सो कभऊं खाई-खड्डा पे पौंच के अपनी जान पे खेलत आएं। बाकी जे सब सो जो है सो है, मनो बुरौ तब लगत आए जब जे ओरें कोनऊं एक्सीडेंट के धायलन की मदद करबे की बजाए उनकी रील बनावे टिक जात आएं।’’ मैंने भैयाजी से कई।
‘‘सांची कै रईं बिन्ना! एक तो बे ऊंसई पीरा में औ तुम उनकी फिलम बनान लगो, सच्ची जे ठीक नोईं। हमें सोई नईं जंचत!’’ भैया जी बोले। फेर मोसो पूछन लगे,-‘‘सो तुमने कछू न्यूज-म्यूज देखी - पढ़ी ने हुइए।’’
‘‘काए नईं? बिस्तर पे परे-परे औ करनेई का हतो।’’ मैंने भैयाजी से कई।
‘‘हऔ ठीक कई बिन्ना! सोत-सोत सो पूरे पांच बरस निकर जात आएं, सो जे पांच दिनां की का।’’ भैयाजी ने को जाने का समझी औ बे कहन लगे।
‘‘अरे, मोरो कैने को मतलब जे के परे-परे मोबाईल पे ख़बरें देखत रई। अब टेम पास सो करनेई रओ।’’ मैंने भैयाजी से कई।
‘‘सो तुमने देखो कर्नाटक में का भओ?’’ भैयाजी असल मुद्दा पे आ गए। मोए पतो के बे कोनऊं से उते के बारे में बतकाव करबे खों मरे जा रए हुइएं, मनो कोनऊं मिलो ने हुइए।
‘‘हऔ, देखो! औ बाद को सोई सगरो नजारों देख लओ।’’ मैंने अपनो अपडेट सोई बता दओ।
‘‘तुमें का लगत आए के अपने इते सोई कछू घट-बढ़ हुइए?’’ भैयाजी मोरी बात एक तरफा सरका के अपनी पूछन लगे।
‘‘आपको का लगत आए?’’ मैंने सोई उनको सवाल उनई पे दाग दओ।
‘‘जे का बात भई? जो हमाओ सवाल आए, औ हमने तुमसे पैले पूंछी सो तुम पैलऊं बोलो।’’ भैयाजी मों बनात भए बोले।
‘‘अब मोय का पतो के बिलौटा कोन करवट बैठहे?’’ मैंने भैयाजी से कई।
‘‘पैलऊं तो तुम कहनात ठीक बोलो, ई कहनात बिलौटा के बारे में नोईं, ऊंट के बारे में आए के ऊंट कोन से करवट बैठहे।’’ भैयाजी बोले।
‘‘मैंने बिलौटा ईसे कई के अपने इते सो ऊंट होत नइयां, बे तो राजस्थान में होत आएं। सो ऊंट कोन करवट बैठेहे, जे तो राजस्थान वारे बता सकत आएं। बाकी अपने इते सो बिलौटा पाए जात आएं। बे आंखंे मूंद के दूध-मलाई चट कर जात आएं औ अपन आंखें खोले रख के बी उने ऐसो करे से रोक नई पात आएं। सो, अपने इते बिलौटा वारी बात ठीक बैठत आए। औ कहनात को का? जां जैसी ठीक लगे, सो बदली जा सकत आए। जो कोनऊं केमिस्ट्री को फार्मूला नोईं के बदलो ने जा सके।’’ मैंने भैयाजी से कई।
‘तुमने कभऊं केमिस्ट्री पढ़ी?’’ भैयाजी खों मोए पे डाउट भओ।
‘‘आप ई पे ने जाओ के मैंने का पढ़ी औ का नईं पढ़ी! बाकी मैंने ग्यारहवीं बोर्ड परीक्षा लों केमिस्ट्री पढ़ी। जे बात अलग आए के ऊके फार्मूला याद करबे में मोय बड़ो कष्ट होत रओ। एक बेरा की किसां बताऊं के ऊ टेम मैं नौंवी में पढ़त्ती। परीक्षा को टेम हतो। मोरी वर्षा दीदी ने सोची के मोय केमिस्ट्री के फार्मूला रटवा दए जाएं। बे सारी रात मोय अपने आंगू बिठा के एसिटिक एसिड को फार्मूला रटात रईं-‘सी एच थ्री सी ओ ओ एच’’। रात के तीनेक बजे हम ओरे सो गए। भुनसारे जब जागे सो दीदी ने मोसे फार्मूला पूछी। मोसे नई बनो। सो दीदी झल्ला के बोलीं, ई केमिस्ट्री में तुमाओ कछू नई हो सकत! दे आओ पेपर, हम प्रार्थना करबी के एसिटिक एसिड को फार्मूला परीक्षा में ने पूछो जाए।’’
‘‘फेर? का बा फार्मूला पूछो गओ?’’ भैयाजी ने पूछो।
‘‘नईं, दीदी की प्रार्थना भगवानजी ने सुन लई। बाकी जो केमिस्ट्री को ले के उन्ने कई रई के केमिस्ट्री में तुमाओ कछू नई हो सकत सो बा सोई सही निकरी। मोरी कभऊं कोनऊं से केमिस्ट्री बनई नई पाई।’’ कैत भई मैं हंसन लगी।
मोरी बात समझबे में भैयाजी खों मिनट भर लगो, फेर बे सोई हंसन लगे।
‘‘अब तुमाई केमिस्ट्री की सो छोड़ो, बाकी जे बताओ के तुमे का लगत आए के ई बेरा अपने इते कांग्रेस की केमिस्ट्री बन पेहे के नईं?’’ भैयाजी घूम-फिर के फेर उतई आ गए।
‘‘भैयाजी! लगत आए के आपको मोरी स्टोरी से कोनऊं ज्ञान नई मिलो!’’ मैंने भैयाजी से गई।
‘‘का मतलब तुमाओ?’’ भैयाजी तनक चैंके।
‘‘अरे, सूधी सी बात आए के जोन की केमिस्ट्री परीक्षा से ले के जिनगी लों सध ने पाई बो का बतेहे कांग्रेस की केमिस्ट्री? आप सोई लगे हो!’’ मैंने भैयाजी से खुल के कई।
‘‘फेर बी, राजनीति अलगई चीज कहाउती आए।’’ भैयाजी बोले।
‘‘ठीक, मोरी केमिस्ट्री की छोड़ो आप, उते कांग्रेस के नेताजी की सोई अबे लो कोनऊं केमिस्ट्री ने बन पाई, सो कांग्रेस औ केमिस्ट्री को गुणा-भाग सो आप छोड़ई देओ।’’ मैंने भैयाजी से कई।
‘‘अरे, जे सो बतकाब करबे की बात आए। अब केमिस्ट्री ने कई जाए सो का कई जाए?’’ भैयाजी झुझलात भए बोले।
‘‘आप जे पूछो न, के कांग्रेस को इते को मौसम बदलहे के नोंई?’’ भैयाजी खों सुझाव दओ।
‘‘चलो जेई बता देओ!’’ भैयाजी ने पूछी।
‘‘मौसम के बारे में आजकाल कछू नई कओ जा सकत। सागर में धूप चटकत आए सो, गौरझामर में ओला गिरत रैत आएं।’’ मैंने हंस के कई।
‘‘हम समझ गए के तुम हमें बना रईं, असल बात ने बोलहो!’’ भैयाजी तनक रिसाए। मनो आपई बताओ के जब बदरा ऊंदें तभई बारिस की कई जाए, अभईं 22 तारीख से जेठ लगो जा रओ। अभईं से मैं का बताओं के सावन में पानी गिरहे के नोंई? बाकी भैयाजी अबे हफ्ता-खांड़ कांग्रेस की केमिस्ट्री की मिस्ट्री में उलझे रैहें।
मनो बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की। सो, सबई जनन खों शरद बिन्ना की राम-राम!
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Wednesday, May 17, 2023

चर्चा प्लस | जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनके भी अपराध | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर

चर्चा प्लस  
जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनके भी अपराध
- डाॅ (सुश्री) शरद सिंह  

         दोनों ओर की सेनाएं धीरे-धीरे कमर कस रही हैं। इन दोनों सेनाओं के आकार-प्रकार में बेशक़ बहुत अंतर है लेकिन सेना तो आखिर सेना होती है। यह यौद्धिक सेना नहीं है लेकिन उस युद्ध के लिए तैयार हो रही है जिससे लोकतंत्र का निर्णय हुआ करता है। सुनने पढ़ने में विचित्र लग रहा है न? कि लोकतंत्र का चुनाव और सेनाओं का युद्ध के लिए तैयारी करना! पर सच तो यही है। अब आमचुनाव राजनीतिक विचारों के द्वंद्व से कहीं आगे निकल चुके हैं। अब ‘करो या मरो’ वाली स्टाईल में चुनाव लड़े जाते हैं। जो सेना यह जज़्बा नहीं रख पाती है वह हारती है और लोकतंत्र के मंदिर में एक अपमानित की तरह जगह पाती है। लोकतंत्र का वास्तविक ढांचा बहुत पीछे छूट चुका है। पर आज का लोकतंत्र ही ‘‘हमारा लोकतंत्र’’ है। यही सच है, चाहे कटु मानें या मीठा। फिर भी विचार उठता है मन में कि यदि रामधारी सिंह दिनकर आज होते तो वे ‘‘समर शेष है’’ का कौन-सा अध्याय लिखते?         
 
पिछले दिनों जब मौसम बार-बार करवट ले रहा था और बादल घिरने लगते थे, बारिश होने लगती थी, ऐसे सुहाने मौसम में मैंने कुछ निकटवर्ती ग्रामीण अंचलों का भ्रमण किया। बस यूं ही! मामला सिर्फ़ प्रकृति प्रेम का था लेकिन वह कहावत है न कि जहां प्रेम हो वहां प्रेम में खलल डालने वाले भी होते हैं। ये खलल डालने वाले और कोई नहीं बल्कि वे परिस्थितियां थीं, जो मौसम के कारण ही उत्पन्न हुई थीं। खेतों में फसलें कट चुकी थीं। उन्हें गट्ठों के रूप में बांधा जा चुका था। मगर उन्हें खलिहान तक पहुंचाने के पहले ही बारिश और ओला किसानों की मेहनत पर वज्राघात करने लगा। सभी मौसम को दोष दे रहे थे। स्वाभाविक है कि जिसकी हाथ में बंदूक थमा कर चलवा दी जाए वही दोषी ठहरता है, पर्दे के पीछे मौजूद लोग नहीं। मौसम अपनी इच्छा से करवट नहीं ले रहा है, उसे इस अवस्था तक पहुंचाया गया है हमारी अव्यवस्थाओं एवं स्वार्थों ने। खैर, मैं अभी जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण परिवर्तन के कारणों पर चर्चा करने का इरादा नहीं रखती हूं, फिलहाल, मैं चर्चा करना चाहती हूं रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की कविता ‘‘समर शेष है’’ की। इसीलिए मुझे अपने भ्रमण का प्रसंग भी याद आया।
भ्रमण के दौरान मैं एक गांव में के निकट सुस्ताने को रुकी। वहां के एक-दो स्थानीय स्त्री-पुरुष मेरे पास आ खड़े हुए। पहले वे झिझके। मगर जल्दी ही हमारी बुंदेली बतकाव शुरू हो गई और उन्होंने अपनी समस्याएं गिनानी शुरू कर दीं। मैंने उनसे कहा कि आप अपने सरपंच से ये सब ठीक करने को क्यों नहीं कहते? तो उनका कहना था कि ‘‘पैलऊं बे मिलें तो!’’ ‘‘उनके इते पौंचों सो पैलऊं सो बे मिलत नईयां, जो मिल गए सो सुनत नईयां, औ जो कऊं सुन लओ, सो करत नईयां’’। अर्थात् अव्वल तो वे मिलते नहीं हैं, मिल जाएं तो सुनते नहीं हैं, और अगर जो मिल कर सुन भी लिया तो कुछ करते नहीं हैं। इस पर मैंने उनसे कहा कि ‘‘आखिर सरपंच है तो तुम्हारे ही गांव का, तुम्हारे बीच का आदमी। कहीं बाहर से तो आया नहीं है। वह अगर तुम्हारी नहीं सुनता तो बंद कर दो उसका हुक्का-पानी।’’
‘‘हऔ, बो हम ओरन को हुक्का-पानी पैलऊं बंद करा देहै।’’ (वे हम लोगों का हुक्का-पानी पहले ही बंद करा देंगे) वे लोग घबरा कर बोले।
क्या यही वह लोकतंत्र है जिसका हमारे पूर्वजों ने आह्वान किया कि जिसमें दुखी-पीड़ित आमजन अपने ही विजयी प्रतिनिधि से निराश रहे, घबराया हुआ, डरा हुआ रहे? सच तो यह है कि लोकतंत्र के वास्तविक स्वरूप में कीलें ठुंकने का काम कई दशक पहले शुरू हो गया था। आखिर रामधारी सिंह दिनकर ने यूं ही नहीं लिखा कि -
ढीली करो धनुष की डोरी, तरकस का कस खोलो,
किसने कहा, युद्ध की बेला चली गयी, शांति से बोलो?
किसने कहा, और मत बेधो हृदय वह्रि के शर से,
भरो भुवन का अंग कुंकुम से, कुसुम से, केसर से?
कुंकुम? लेपूं किसे? सुनाऊं किसको कोमल गान?
तड़प रहा आंखों के आगे भूखा हिन्दुस्तान।

हिन्दुस्तान आज बाज़ार के हवाले है। मानवता कहीं बची है तो उन लोगों में जो कुछ भी कर सकने में स्वयं को असमर्थ पाते हैं। इस तारतम्य में मैं एक घटना का उल्लेख करूंगी। यह घटना मेरे घर कुकिंग गैस का सिलेंडर आने की। कई माह बाद मुझे नया सिलेंडर मंगवाने की ज़रूरत पड़ी। सिलेंडरवाला हाॅकर आया तो वह देखते ही बोला,‘‘अब आपके यहां खाना-वाना नहीं बनता क्या? पहले तो दो-ढाई महीने में सिलेंडर खाली हो जाता था मगर अब तो...।’’
‘‘कोरोना काल में घर के दो सदस्य शांत हो गए।’’ मैंने उसकी बात पूरी होने से पहले ही उसे बता दिया। यह सुन कर वह थोड़ा सकते में आया फिर अपने परिवार की घटना बताने लगा,‘‘अट्ठाईस साल का लड़का था। उसके दो छोटे बच्चे और बीवी बची है। पिछले दो साल से वे लोग जूझ रहे हैं। कोरोना से मरने का जो पैसा मिला था वो उसके ससुराल वालों ने छुड़ा लिए...।’’ वह हाॅकर खाली सिलेंडर पर बैठ कर पसीना पोंछता हुआ मुझे उस पीड़ित महिला का दुख बताता रहा। फिर जब मैंने उसे परंपरागत रूप से कुछ रूपए उसके सेवाकार्य के लिए दिए जो कि ‘ऐच्छिक’ ही रहते हैं, तो वह हिचकते हुए लेने से मना करने लगा। मैंने उससे कहा, ‘‘रख लो! अब तो साल में दो-तीन बार ही मिलेंगे।’’ तो वह उदास भी हुआ और हंस दिया। मेरी पीड़ा वह गरीब हाॅकर समझ रहा था और इसीलिए उसे मुझसे ‘टिप’ लेने में हिचक हो रही थी लेकिन सरकार संवेदनाएं ताक में रख कर चलती है। हां, संवेदना के नाम पर कुछेक योजनाएं जरूर उस चके की भांति राजनीतिक पथ पर दौड़ा दी जाती हैं जैसे गांवों में छोटे बच्चे एक डंडी के सहारे चका दौड़ाते हैं और उसके साथ भी तक तक दोड़ते चले जाते हैं जब तक या तो वह चका न गिर जाए या फिर वे थक न जाएं। हर समय एक न एक चका राजनीति की सुचिक्कन सड़क पर दौड़ता ही रहता है।
यह वही सड़क है जिसकी चर्चा कवि दिनकर ने अपनी कविता में की है। बस, अंतर मात्र इतना ही ही है कि उन्होंने दिल्ली की सड़क को लक्षित किया जबकि आज हर शहर, गांव, कस्बे में वह सड़क दिखाई देती है-
अटका कहां स्वराज? बोल दिल्ली! तू क्या कहती है?
तू रानी बन गयी वेदना जनता क्यों सहती है?
सबके भाग्य दबा रखे हैं किसने अपने कर में?
उतरी थी जो विभा, हुई बंदिनी बता किस घर में
समर शेष है, यह प्रकाश बंदीगृह से छूटेगा
और नहीं तो तुझ पर पापिनी! महावज्र टूटेगा।

उस समय दिल्ली को कोसना आसान था। पर आज हालात दूसरे हैं। आज दिल्ली में ही दो रसोई और दो चूल्हे हैं। वैसे उस हाॅकर को मेरे द्वारा दी जाने वाली राशि सिलेंडर की कीमत के सामने कुछ नहीं थी। सिलेंडर के दाम चुकाए थे पूरे ग्यारह सौ पच्चीस रुपए। भोजन पकाने के सबसे प्रमुख साधन की इतनी अधिक कीमत। इस हाल में तंत्र खुश हो सकता है, प्रजा नहीं। मुझे भी यह कीमत चुकाते हुए गुस्सा आ रहा था। केवल बातों से पेट नहीं भरता है। मंहगी गैस, मंहगा अनाज, मंहगा भोजन। गुस्सा क्यों नहीं आएगा?  
हर तरफ बढ़े हुए टैक्स। दो रूपए के सामान पर चार रूपए जीएसटी। ऑनलाईन शाॅपिंग वाले तो सभी टैक्स का पूरा ब्योरा रसीद में दर्ज़ कर के भेजते हैं ताकि अब समझ जाएं कि मूल हकदार के पास कितना पैसा पहुंच रहा है, कितना सरकारी खजाने में और आप कितने आर्थिक विपदा के शिकार हैं। अब तो ऑफ लाईन वाले भी कीमत का ब्यौरा देने लगे हैं। अब अगर आमजन उसे पढ़ कर भी ख़ामोश रहें और किसी फिल्म पर जुगाली करते रहें तो इसमें किसका दोष है? न टैक्स वसूलने वालों का और फिल्म बनाने वालों का। फिल्मी दुनिया तो हमेशा से व्यवसाय जगत का अभिन्न हिस्सा रही है। अगर किसी की पीड़ा को परोस कर भी उसे रिकार्डतोड़ पैसे मिलते हैं तो उसे इससे परहेज नहीं रहेगा। क्योंकि उसका काम फालोअप लेना नहीं है। उसने तो एक फिल्म बनाई, पैसे कमाए और फिर दूसरी फिल्म की ओर बढ़ ली। हम उनके साथ क्षणिक उत्तेजना में उत्तेजित होते हैं, स्वयं को बौद्धिक मानते हुए खुश होते हैं और इसी में खुद की सच्चाई को भूले रहते हैं। एक दिलचस्प फार्मूला! इसके लिए भी न तो सरकार दोषी है और न फिल्म वाले। आपने अपनी जेबें ढीली कर के टिकट खरीदा है, सिनेमाघर में बैठे हैं, अब आप फिल्म देखें, उस पर विचार करें या पूरे ढाई-तीन घंटे सोते रहें, इससे किसी का कोई लेना-देना नहीं है।
आज एक पल ठहर कर सोचने की जरूरत है कि हम वैमनस्यता की किस दिशा की ओर बढ़ते चले जा रहे हैं? कट्टरता किसी के भी स्वास्थ्य के लिए उत्तम नहीं होती है। तलवारें चलती हैं तो दोनों पक्ष लहूलुहान होते हैं। फिर हम तो वे लोग हैं जो खून के दरिया से नहा कर आए हैं। हमें मात्र भौगोलिक रूप से नहीं बांटा गया बल्कि हमारा रक्तस्नान कराया गया। ताकि हम उस रक्त की गंध से सदियों तक भ्रमित होते रहें और परस्पर एक-दूसरे पर भरोसा न कर सकें। घायल दोनों हुए लेकिन राजनीति हमेशा इस बात के लिए उकसाया कि ‘‘मेरा घाव तेरे घाव से ज़्यादा गहरा’’। जबकि घाव दोनों के गहरे थे। जरूरत थी कि दोनों सच्चाई को समझ कर एक-दूसरे के घाव पर पश्चाताप के फाहे रखते। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। और हम हैं कि नए घाव गढ़ने में कोताही नहीं बरतते हैं। हम चुनाव को लोकतंत्र के आवश्यक यंत्र की भांति संचालित होते देखने के बजाए, ‘‘20-20’’ के मैच की भांति देखना चाहते हैं। (जिस पर कभी-कभी फिक्सिंग के आरोप भी लगते रहते हैं।) जबकि चुनाव लोकतंत्र की रीढ़ है। पर हम आवश्यकता पढ़ने पर तटस्थता के अपने खोल में जा छुपते हैं। तत्कालीन स्थितियों को देखते हुए कवि ‘दिनकर’ ने लिखा था -      
तिमिर पुत्र ये दस्यु कहीं कोई दुष्काण्ड रचें ना
सावधान! हो खड़ी देश भर में गांधी की सेना
बलि देकर भी बली! स्नेह का यह मृदु व्रत साधो रे
मंदिर और मस्जिद दोनों पर एक तार बांधो रे
समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध
जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनके भी अपराध।

मैं सोचती हूं कि यदि आज राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर होते तो ‘‘समर शेष है’’ का कौन सा अध्याय लिखते? क्या आप सोच कर बता सकते हैं?
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Tuesday, May 16, 2023

पुस्तक विमोचन समारोह में डॉ (सुश्री) शरद सिंह द्वारा दीप प्रज्वलन

कुछ और तस्वीरें तथा समाचार...
हार्दिक धन्यवाद #स्वदेशज्योति 🙏
अवसर : कवि अंबिका यादव जी के काव्य संग्रह आसमानों से आगे का विमोचन समारोह 🎉
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पुस्तक समीक्षा | जीवन के सन्नाटे को स्वर देता काव्य संग्रह | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

प्रस्तुत है आज 16.05.2023 को  #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई नर्मदांचल के वरिष्ठ कवि विनोद निगम के काव्य संग्रह "जो कुछ हूं, बस गीत गीत हूं" की समीक्षा... 
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पुस्तक समीक्षा
जीवन के सन्नाटे को स्वर देता काव्य संग्रह
- समीक्षक डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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काव्य संग्रह - जो कुछ हूं,बस गीत गीत हूं
कवि        - विनोद निगम 
प्रकाशक    - पहले पहल प्रकाशन, भोपाल 25-ए, प्रेस कॉम्पलेक्स, एमपी नगर,भोपाल  
मूल्य       - 400/-
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     काव्य को अनुभव करना, उसे जीना और उसे अपनी अभिव्यक्ति का प्रमुख माध्यम बनाना, एक समर्थ कवि के रचनाकर्म को निर्धारित करता है। पं. भवानी प्रसाद मिश्र के नर्मदांचल के वरिष्ठ कवि विनोद निगम ने काव्य को अपने ही ढंग से जिया है। वे काव्य को उस कैनवास की भांति अपनाते दिखाई देते हैं जिसमें वे अपनी इच्छानुरूप रंग भरते हैं और भावनाओं को शाब्दिक आकार देते हैं। किन्तु इसका आशय यह नहीं है कि विनोद निगम फ़क़त कल्पनाओं में जीते हैं, वे जीवन के खुरदरे यथार्थ और जनहित नामक भोथरे प्रयासों को अपने गीतों में पिरोते हैं। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि विनोद निगम एक ऐसे कवि हैं जो गीत की संरचना में भी अपने मानक रचते हैं। वे नवगीतयुग के स्वर्णिमकाल में सक्रियता से नवगीत रचते रहे तथा नवगीत के प्रतिष्ठापक और प्रगतिशील कवि शंभुनाथ सिंह ने उन्हें अपने द्वारा संपादित ‘‘नवगीत दशक’’ के तीन खंडों में से तृतीय खंड में स्थान दिया था। 

‘‘जो कुछ हूं, बस गीत गीत हूं’’ विनोद निगम का एक वृहद काव्य संग्रह है जिसमें उन्होंने अपने काव्य को पांच अध्यायों में विभक्त किया है- जारी हैं लेकिन यात्राएं, मौसम के गीत, समवेत गायन के लिए गीत, उम्र के चढ़ाव पर और शुरू यहीं से हुआ था। इन पांचों अध्यायों पर गीतकार माहेश्वर तिवारी की यह टिप्पणी बड़े मायने रखती है कि -‘‘विनोद निगम, समकालीन गीत को समझने के लिए, पढ़े जाने वाले एक जरूरी कवि हैं उनके गीतों को पढ़ते हुए अपना अनुभव यदि कहूं तो उनके पास गीतों की आमद होती है, उतरते हैं, लिखे नहीं जाते। भाषा का वह तेवर और कहन का ऐसा सलीका कितनों के पास है, विनोद निगम के प्रतिनिधि गीतों से गुजरना, आत्मीय जीवन प्रसंगों से जुड़ा एक सुखद अनुभव तो होगा ही, विगत पांच दशकों का देश और समाज भी हमारे सामने होगा।’’ 
हिन्दी के प्रतिष्ठिक समालोचक डॉ. विजय बहादुर सिंह ने विनोद निगम के काव्य पर सटीक विचरा व्यक्त करते हुए लिखा है कि ‘‘उनकी कल्पनाएं बेहद जमीनी हैं इसीलिए वे ऊंचे ख्यालों के पुलाव नहीं बनातीं किन्तु इतनी सगी और आत्मीय हैं कि हमारी अपनी ही सोच के बेहद करीब लगती हैं। यही कारण है कि कविता का हिस्सा होकर भी वे जीवन की सच्चाईयों का प्रतिरूप जान पड़ती हैं। विनोद के कवि की यह सादगी ही उनकी कविता की सुन्दरता भी है। उनकी अनुभूतियां अपनी सादगी में बेमिसाल हैं और अभिव्यक्तियां भी अकृत्रिम और आमफहम। यही तो विनोद निगम हैं।’’ 

देखा जाए तो माहेश्वर तिवारी और डाॅ. विजय बहादुर सिंह की इन दो टिप्पणियों के बाद विनोद निगम के गीतों से जुड़ने के लिए किसी और मानसिक तैयारी (माइंड मेकअप) की आवश्यकता नहीं रह जाती है। फिर भी यह जानने की उत्सुकता होना स्वाभाविक है कि स्वयं रचनाकार अपने सृजन को ले कर क्या विचार रखता है? वह अपने सृजन के प्रति आश्वस्त है या नहीं? और है तो कितना? लेकिन इससे भी पहले कवि का आत्मकथन परिचित कराता है उसके उस परिवेश से जहां उसने इस दुनिया में आंखें खोलीं और फिर धीरे-धीरे किस तरह दुनिया और फिर साहित्यिक दुनिया से सरोकारित हुआ। विनोद निगम लिखते हैं-‘‘बाराबंकी (उ.प्र.) के सरावगी मोहल्ले में बचपन बीता, पास ही 8-10 कि.मी. दूर एक छोटा सा गांव मुजीमपुर है, जहां कुछ थोड़ी-सी जमीन और एक पुश्तैनी घर भी था। बाराबंकी में घंटाघर से लगी राजाराम हलवाई वाली गली के एक मकान में जन्म हुआ था, गोविन्ददास जैन के इस मकान में मेरे पिताजी, नौ रुपये में किराये से रहते थे।’’ फिर वे अपने आगे के जीवन के बारे में लिखते हैं कि ‘‘जब मेरा जन्म हुआ था तब घरों में, अम्मा-बाबू, चाचा-चाची, बाबा-दादी ये सब रहा करते थे, आज तो मॉम-डेड ही रह गए हैं, अंकल-आंटी और ग्रेन्ड पॉ तो अलग ही रहते हैं। मेरे घर में कविता लिखने-पढ़ने का कोई रिवाज या परम्परा नहीं थी, सब लोग प्रायः नार्मल थे, कोई कवि या साहित्यकार नहीं था, साहित्य विरासत में मुझे नहीं मिला था। मुझे पढ़ना-लिखना अच्छा लगता था सो स्कूल के दिनों से ही नगर के सबसे पुराने हिन्दी पुस्तकालय में नियमित रूप से जाया करता था। जहां ‘धर्मयुग’, ’साप्ताहिक हिन्दुस्तान’, ‘सारिका’, ‘कादम्बिनी’, ‘दिनमान’ और ‘ज्ञानोदय’ जैसी पत्रिकाएं और कर्नल विनोद तथा कैप्टन हमीद की ‘जासूसी दुनिया’ भी पढ़ने को मिलती थी, मेरे मोहल्ले में वरिष्ठ कवि-साहित्यकार श्री कल्पनाथ सिंह भी रहते थे, उस समय उनके गीत विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में खूब छपते थे, इन्हीं सब से कविता लिखने की प्रेरणा मिली। गीत लिखना मुझे बहुत अच्छा लगता था, गीतों को गुनगुनाते-गुनगुनाते ही पूरा करता था, शुरू के गीत तो कोमल और भावप्रवण थे किंतु धीरे-धीरे जैसे जैसे जीवन, समाज और परिवेश से साक्षात्कार होता गया गीतों में विविधता आई।’’

जी हां, विनोद निगम का लेखन उस दौर में मंजा जब प्रतिष्ठित पत्रिकाओं के नामचीन संपादक ‘‘सखेद रचना वापसी’’ के लिए रचना के साथ पता लिखा, पर्याप्त टिकट लगा लिफाफा मंगाते थे। पसंद न आने पर वे रचना वापस करके अपने दायित्व से स्वयं को मुक्त नहीं मानते थे अपितु सलाह का रुक्का भी वापसी के लिफाफे में सरका दिया करते थे। यह परम्परा ‘हंस’ के संपादक राजेन्द्र यादव तक चली। बहरहाल, विनोद निगम के लिए गीत का आकाश ऐसे कई गीतकारों, नवगीतकारों के साथ साझा था जो सभी एक से बढ़ कर एक थे। इन चुनौतियों के बीच उन्होंने काव्य की महत्ता को बखूबी समझा। गीत के साथ वे स्वयं को कितना ‘कम्फर्टेबल’ अनुभव करते हैं, इस बात को सामने रखने के लिए उन्होंने यह कविता ही रच डाली कि ‘‘गीत, मेरे लिए यात्रा होते हैं’’। कविता का एक अंश देखिए-
जो कुछ भी मेरे आसपास होता रहता है
मित्र होते हैं या घटनाएं 
या फिर भूख को केन्द्र में रखते हुए 
अनेक जारी संघर्ष, 
और इनके ऊपर पर्तों की तरह, 
इन सबकी अपनी अपनी अनुभूतियां हैं,
जिन्होंने शब्दों को तलाशा है, 
और उन्हें लेकर निकल आई हैं। 
गीतों की इस यात्रा में...।

इसके साथ ही विनोद निगम एक ग़ज़ल लिखते हुए गीत की दुनिया में अपने रमे रहने का कारण भी बड़ी सादगी से बता देते हैं-
सब गम के आसपास हैं, हम क्या गजल कहें।
फिर आप भी  उदास हैं, हम क्या गजल कहें।
कहते हैं सियासत में, जिन्हें मुल्क की दौलत 
बेघर वो  बे-लिबास हैं, हम क्या गजल कहें।

अर्थात् विनोद निगम के भीतर का कवि अपनी मनोदशानुरूप काव्य-शैली चुनने का हिमायती है। यह उचित भी है क्योंकि जहां सहजता है, वहीं अभिव्यक्ति की स्पष्टता और सघन आग्रह बन पाता है। इस संग्रह में एक नवगीत है ‘‘टंगे हुए सम्बोधन’’। इसका एक बंद देखिए जो भावों की कोमलता, परिस्थितियों की अवशता और एक सन्नाटे को मुखर करने की पूरी ताकत रखता है-
अब तक एहसास के निकट है,
कन्धों पर झुका हुआ, भारीपन।
एक गन्ध का,
खुली हुई खिड़की के आसपास बहना, 
और किसी आहट का, 
गिरे हुए पर्दों के पास खड़े रहना, 
और तपे अधरों का, 
पंखुरियां छूना भर, 
मौन की लकीरों में कहना.
अब तक विश्वास के निकट हैं,
पलकों पर टंगे हुए, सम्बोधन।

  इस संग्रह के सभी गीत एक  बढ़ कर एक हैं और नवगीत की एक विशेष परंपरा से जोड़ने के साथ ही कहन की स्वतंत्रता को भी स्थापित करते हैं। अंत में, मैं उनकी उस कविता की कुछ पंक्तियां यहां रखना जरूरी समझती हूं जो एक मध्यम तथा निम्नमध्यम वर्गीय पिता की पीढ़ियों के संघर्ष को बखूबी रेखांकित करती है और आर्थिक विषमता की विरूपता के प्रति ध्यान आकृष्ट करती है-  
जीवन जिया बड़े दमखम से, 
या फिर चुनी चिता 
लड़े निरन्तर, संघर्षों से हारे नहीं, पिता ।
अस्सी रुपये का वेतन था 
और चार सन्तानें 
कैसे पाला-पोसा हमको, 
ईश्वर या वे जानें 
कटि तक धोती और उसी से 
पेट-पीठ ढंक लेना 
बच्चों को भी दूध-जलेबी, 
खुद को चना-चबेना 
गहन अभावों में भी, 
ऊंचा हाथ, उठा ही माथा 
अर्थ, त्याग, तप, स्वाभिमान का, 
सबको दिया बता। 

बाराबंकी में सन् 1944 में जन्में और नर्मदांचल के होशंगाबाद में रह कर सर्जना करने वाले विनोद निगम का यह काव्य संग्रह ‘‘जो कुछ हूं, बस गीत गीत हूं’’ काव्यप्रेमियों के लिए एक बेहतरीन पुस्तक है। इसमें उन्हें काव्य के रूप में जीवन का सांगोपांग चित्रण मिलेगा, ठीक एक कलात्मक म्यूरल पेंटिंग की तरह।       
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Sunday, May 14, 2023

काव्य के शिल्प और विचार पक्ष दोनों में संतुलन होना आवश्यक होता है। - डॉ (सुश्री) शरद सिंह

"कवि अंबिका यादव की कविताएं वैचारिक अनुष्ठान रचती हैं। इन कविताओं का वैचारिक पक्ष बहुत अधिक मजबूत है, वह पढ़ने वाले को आंदोलित करता है और सोचने को विवश करता है। काव्य के शिल्प और विचार पक्ष दोनों में संतुलन होना आवश्यक होता है। "आसमानों से आगे" संग्रह की कविताएं परिपक्व कविताएं हैं।" - मुख्य अतिथि के रूप में मैंने (डॉ सुश्री शरद सिंह ने) अपने ये विचार व्यक्त किए। अवसर था पाठकमंच, श्यामलम तथा इंकमीडिया की सहभागिता से कवि अंबिका यादव की प्रथम काव्य कृति "आसमानों से आगे" के विमोचन का। 
  🚩कार्यक्रम की अध्यक्षता की डॉ श्रीमती सरोज गुप्ता ने तथा  विशिष्ट अतिथि थे डॉ.हरि सिंह गौर विवि में सह-ग्रंथपाल डॉ. संजीव सराफ एवं समाजसेवी डॉ डी पी चौबे। 
   🚩 श्यामलम अध्यक्ष श्री उमाकांत मिश्र जी ने कार्यक्रम का परिचय दिया तथा पाठक मंच सागर इकाई के अध्यक्ष श्री आर के तिवारी जी ने स्वागत भाषण दिया। कार्यक्रम का सफल संचालन किया डॉ प्रदीप पाण्डेय ने तथा आभार प्रदर्शन किया इंक मीडिया के डॉ आशीष द्विवेदी जी ने।
  🚩 दीपक होटल के सभागार में आयोजित इस समारोह में दादा लक्ष्मी नारायण चौरसिया, श्री हरिसिंह ठाकुर, रमेश दुबे, शिवरतन यादव, प्रो. के कृष्णाराव, डॉ आर आर पाण्डेय,आशीष ज्योतिषी, डॉ गोविंद यादव, डॉ जी एल दुबे,श्री हरि शुक्ला,श्री कपिल बैसाखिया,  डॉ आनंद मंगल बोहरे, डॉ सर्वेश्वर उपाध्याय,  श्री आदर्श दुबे, डॉ. अतुल श्रीवास्तव,श्री दामोदर अग्निहोत्री, सुश्री दीपाली गुरु,श्रीमती मीनाक्षी यादव, श्रीमती सरिता यादव,श्रीमती ममता भूरिया आदि बड़ी संख्या में सुधिजन उपस्थित रहे।
(13.05.2023)
🌹हार्दिक आभार श्यामलम 🙏
🌹हार्दिक आभार पाठक मंच 🙏
🌹हार्दिक आभार इंक मीडिया 🙏
(14.05.2023)
✍️हार्दिक आभार दैनिक भास्कर 🙏
✍️हार्दिक आभार पत्रिका 🙏
✍️हार्दिक आभार आचरण 🙏

Article | Misses The Shadow In The Hot Sun | Dr (Ms) Sharad Singh | Central Chronicle

Article
Misses The Shadow In The Hot Sun
-    Dr (Ms) Sharad Singh
Writer, Author & Social Activist
Blogger - "Climate Diary Of Dr (Ms) Sharad Singh"
 
*How difficult it is to stand on the traffic line in the hot summer days and wait for the red light of the signal to turn green, it can be understood by those who stand on the traffic line riding a two wheeler.  Helmets get hot, bodies start to burn and small children start to panic at the intensity of the sun.  People who go out for urban planning riding on four wheelers cannot understand this.  If once he goes on his two wheeler and stands on the traffic line in the scorching heat, surely he will start getting good ideas to save the general public from the sun.  It is in the interest of the general public only by whose payment of taxes town planning becomes a reality.  So let's think about it.*
           Last days I had to go somewhere by scooty around 1:00 pm.  As soon as they reached the civil line intersection, a red traffic light appeared there.  Due to which we had to stop before the zebra crossing.  Within no time my helmet started heating up and my hands felt like they were scorching.  While the hot air has not started blowing yet.  The edge of sweat started flowing from the temple.  It looked like taking off the helmet and wiping off the sweat.  But there was not enough time in the traffic line to take off the helmet, wipe the sweat and wear it again.  The red light countdown was on.  But to tell the truth, standing there, even half a minute seemed like half an era.  I saw a motorcycle stopped next to me which was being driven by a man and his wife was sitting behind him with a small child in her arms.  The wife had covered the child's head with her saree which was a very thin shade.  That child was getting restless in the sun.  For those who were in the four wheeler, there was a dense shadow on their head but those who were on bike or scooty had only a helmet on their head which was basking in the sun.  Soon the red light changed to green and we all raced past the intersection.
       At the time of return, the same situation prevailed, at that time it was around 2:00-2:30.  The sun was so hot.  Then had to wait for the red light to turn green on the same traffic line.  Similarly, the bike riders around wearing helmets were wiping their sweat.  The bikes on which small children were present, those children were squirming.  Seeing all this, I thought that if there is a shed on the toll block, now it is necessary that such sheds should be made on the traffic line also because the sun is very hot. It is unbearable.  Those who walk on a bicycle or bike have to face the hot sun.  If sheds are made on the traffic lines then it will be a good shade for those waiting on the traffic line even in rainy season.  Standing under which they will be able to avoid getting wet in the rain.
          Well, when I returned home, I started remembering all the pages of history in which details of kings planting shady trees on both sides of the road are found.  We blame monarchy, of course it is more to blame than democracy.  But the way good works were done for the general public at that time can be adopted today.  Today we are very happy to see wide beautiful CC roads in our cities.  Beautiful ornamental plants grow on the dividers in the middle of the roads.  Plants with beautiful flowers are also planted at many places.  Somewhere Bougainvillea and somewhere Kaner.  Of course, these add to the beauty of the road and the city, but these small trees and plants do not provide shade to the pedestrians.  As long as a shadow is needed in the sun, then only the hot sun is available on the head. If we have the right to get shade only while paying the toll tax at the toll barrier, then it should also be remembered that we also pay tax for the arrangement of the road.  That way we have the right to get shade anywhere on the street.
       Ok!  Suppose for a minute that we cannot provide shade to those standing on the traffic line, while it is not difficult to do so, dense shade trees should be planted on both sides of the road.  So that balance is maintained in the temperature of the city and road users do not have to face excessive heat.  If necessary, they can rest in the shade of a tree.  This seemingly unnecessary thing is actually very important. If the town planners and beautifiers of the city once get down from their four wheelers and ride on two wheelers and wait for the signal to change on the traffic line in strong sunlight or heavy rain, then they too will start getting many such ideas which will give rest to passersby.
      Actually, the Green Mission prepared for urban planning can help a lot in this direction.  It was launched in February, 2014 with the objective to safeguard the biological resources of our nation and associated livelihoods against the peril of adverse climate change and to recognise the vital impact of forestry on ecological sustainability, biodiversity conservation and food, water and livelihood security. Urban areas are facing increasing climate risks and threats to human comfort and environmental justice. Of the four major global risks projected to have a negative decadal consequence on countries through temperature increases, three are primarily environmental—natural disaster, extreme weather and biodiversity loss, with climate action failure as the fourth. In attempts to address these challenges, growing attention is being paid to the potential role of green (such as trees, parks, gardens, playgrounds and forests) and blue (seas, rivers, lakes, wetlands, and water utilities) spaces, often approached through the concept of green and blue infrastructure.
      Urban town planning cannot be called just making tall buildings or making wide roads.  Arrangement of water and greenery is necessary for all in urban town planning.  It does not make sense to develop a small city forest in one area in a big city.  It is necessary that at least 4 city forests should be developed in a city with a population of 60 lakh to one crore.  Only then the temperature of the city can be kept balanced and a good environment can be given to the citizens. But an even smaller and more immediate task is to create sheds in the traffic line and toll barrier sheds are the best example for this task.  Work can also be done to plant dense shady trees on both sides of the companion road, whose spread is up to the pathway only so that there is no problem in the traffic and the pedestrians can get shade when needed. So, go green and stay cool.
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 (14.05.2023)
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Thursday, May 11, 2023

बतकाव बिन्ना की | जे, जे दे रए - बे, बे दे रए | डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम | बुंदेली व्यंग्य | प्रवीण प्रभात

"जे, जे दे रए - बे, बे दे रए" - मित्रो, ये है मेरा बुंदेली कॉलम "बतकाव बिन्ना की" साप्ताहिक #प्रवीणप्रभात , छतरपुर में।
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बतकाव बिन्ना की  
जे, जे दे रए - बे, बे दे रए              
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
     ‘‘तुम अच्छी आ गईं, बिन्ना! अब तनक अपनी भौजी खों समझाओ!’’ भैयाजी मोए देखतई बोले।
‘‘काय? का हो गओ? अब आप दोई के बीच मैं कैसे कछू बोल सकत? अपनो मामलो आप दोई खुदई सुलटा लेओ!’’ मैंने भैया जी से कई।
‘‘अरे, काय को अपनो मामलो! इते तो बड़ी सल्ल परी आए, बिन्ना!’’ भैया जी ने कई।
‘‘काय की सल्ल?’’ भैयाजी की बात सुन के भौजी बोल परीं,‘‘इते कोनऊं सल्ल नोईं, बिन्ना।’’
‘‘हऔ, तुमें नईं दिखा रई सल्ल? बे हरें तुमें बेवकूफ बना रए। तुम समझ नईं रईं।’’ भैयाजी भौजी से बोले।
‘‘हमें काए? सबई के लाने आए बा प्लान। आप सो ऐसे कै रए मनो कोनऊं अकेले हमाए लाने होय!’’ भौजी बोलीं।
‘‘कोन सो प्लान?’’ अब मोय समझ में आई के जे मियां-बीवी को झगड़ा नोईं, कोनऊं औरई बात आए।
‘‘अपने भैयाजी से पूछ लेओ! इने सो चार पईसा घर आए में खटकत आएं।’’ भौजी ने भैयाजी खों ताना मारो।
‘‘जे भौजी कोन से प्लान की बोल रईं?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘अब इनकी कछू ने पूछो! जे ठैंरीं भोली जनता। इने सो कोऊ कछू पकड़ा देबे बोई खों हेरत बैठी रैंहे।’’ भैयाजी ने कही।
‘‘हऔ, सो तुम तो चतुर सयान ठैरे, फेर बी तुमें कछू समझ में ने आ रई।’’ भौजी बमकत भईं बोलीं। बे जब भैयाजी के लाने आप से तुम पे आ जाएं तो मानो के बस, बम फूटनेई वारो आए।
‘‘आप ओरें कछू मोय बता रए के नईं? ने तो मैं जा रई।’’ मैंने भैयाजी औ भौजी दोई से कई।
‘‘अरे तुम ने जाओ! तुमें सोई जे बताने है हमें। काय से के तुम सोई फारम भर दइयो।’’ भौजी ने मोसे कई।
‘‘काय को फारम?’’ आप ओरें का कै रए मोय सो कछू समझ में नईं आ रई, रामधई!’’ मैं अपनो मूंड़ पकर के उतई बैठ गई।
‘‘देखो, तुमने जे का करो! बिचारी बिन्ना घबड़ा गई!’’ भैयाजी ने भौजी खों डांटो।
‘‘काय, हमने ऐसी का कै दई? काय बिन्ना हमने तुमसे कछू गलत कई का?’’ भौजी ने मोसे पूछी।
‘‘अरे, आप ओरें मोसे कछू कै नई रए जेई सो सल्ल आए! कछू बताओ तो के कोन सो प्लान? काय को फारम? जे आप ओरन की गिचड़ सुनत-सुनत मोरो तो मुंडा चकरा गओ, बाकी पल्ले कछू नई परो!’’ मैंने दोई से कई।
‘‘चलो हम समझा दे रए तुमें!’’ भौजी ने कई औ बे सोई मोरे लिंगे बैठ गईं। फेर कैन लगीं,‘‘बिन्ना तुमने सोई सुनी, पढ़ी हुईए के बे कांग्रेस वारे सबई लुगाइयन खों बारा सौ रुपइया देबे के लाने बोल रए और उके लाने फारम भरो जा रओ।’’
‘‘सो?’’
‘‘सो का? हम सोच रए के बा लाड़ल़ी बहना योजना में सो अपन ओरें आए नईं, जबकि ईमें अपन दोई खों फायदा मिल सकत आए। तुमई सोचो के बिना कछू करे, धरे बारा सौ रुपइया मईना मिल लगें सो ईमें का बुराई आए? बस, इत्ती-सी बात तुमाए भैया खों समझ में ने आ रई।’’
‘‘सो तो ठीक कै रईं भौजी आप, मनो बे ओरें अबे सिरफ फारम भरा रए औ कै रए के फारम भरे की रसीद जतन से राखियो। जो कहूं बे ओरे जीत गए, तभईं देहैं रुपइया। बाकी जे ओरें सो अभई देन लगे।’’ मैंने भौजी से कई।
‘‘जेई सो हम तुमाई भौजी खों समझाबे टिके आएं के, भागवान! परमेसरी! कछू दिमाग लगाओ! जे सो जोन को देने सो दे रए, मनो बे सो कै रए के जबे नौ मन तेल हुइए तबे राधाजी को डांस हुइए!’’ भैयाजी बोले।
‘‘राधे-राधे! ऐसो तो ने बोलो! कछू तो सरम करो!’’ भौजी ने भैयाजी खों टोको।
‘‘अरे, जे सो हम कहनात आ कै रए, राधाजी की कोनऊं इंसल्ट नोईं कर रए। तुम सोई, कोई बी बात को कां से कां ले जान लगत हो!’’ भैयाजी घबड़ा के बोले।
‘‘हऔ भौजी! भैयाजी कहनात आ कै रए! मनो, आप जे सोचो के जबलौं लाड़ली बहना योजना ने आई हती, तबलौं जे भैया हरें कां हते? उने अपन ओरन की सुरता तभईं आई जबें अपने शिवराज भैया ने अपनी योजना चालू करी! जे सो ऊसईं बाहरे बैठे, इने सो पैलऊं सोचने चाइए रओ के कोन के लाने का करो जाए। औ उत्तई नईं, जे ओरें लाॅलीपाॅप बी नोईं थमा रए, खाली मों चला रए के जबें हम जीत जेबी, सो देन लगबी। मनें, बारा सौ रुपइया मईना जो चाउनें सो इन ओरन खों जिताओ!’’ मैंने भौजी से कई।
‘‘तुम दोई भैया-बहन एकई से कहाने! दोई एक सी कै रए!’’ भौजी तनक उदास हो गईं।
‘‘दुखी ने हो भौजी, आप बात खों समझो! एक जने अपन ओरन मने लुगाइन में से कछू को एक हजार दे के उनको मना रए, औ कछू जने खाली मों चला के वोट पीटबो चात आएं। का अपन ओरें बिकाऊं दिखात आएं इने?’’ मैंने भौजी से पूछी।
‘‘नईं, ऐसो तो नइयां। बाकी बात सो तुम ठीक कै रईं। दोई जने तनक से रुपइया के कल्ला पे अपनी-अपनी गांकड़ें सेंक रए।’’ भौजी कछू सोचत भई बोलीं।
‘‘जेई सो हम इत्ती देर से तुमें समझा रए हते!’’ भैयाजी खुस होत भए बोले। काए से के उन्ने देखो के अब भौजी को असली बात समझ पर रई।
‘‘हऔ तो, का हमें समझ नईं परत? समझ सो मनो हम सोई रए पर संगे जे सोई सोच रए के फारम भरबे में का जा रओ? मनो कऊं कांग्रेस की लाटरी लग गई सो अपनी सोई लाटरी लग जेहे।’’ भौजी बोलीं।
बाकी भौजी को सोचबो गलत नईयंा, काय से के मैंगाई इत्ती चल रई के कऊं से चार पइसा मिलबे की उम्मींद दिखाए जाए सो लोग लेन लगा के ठाड़े हो जात आएं। रसोई गैस के दाम ग्यारा सौ रुपइया ये ऊंपरे चल रए, बिजली के दाम गरमी को मौसम आउत साथ बढ़ा दए जात आएं। सब्जी-भाजी, सबई कछू पे सो मैंगाई सवार आए। जेई से तो जे दसा हो गई के हजार-बारा सौ रुपइया के लाने सबरे मों बाए ठाड़ें हो जात आएं। सो, भौजी ऐसो सोच रईं सो कछू गलत नोईं सोच रईं। कभऊं कोनऊं ने सोची के जे इन ओरने के इत्ते बड्डे-बड्डे होर्डिंग कित्ते में बनत आएं। औ जो होर्डिंग पे कोनऊं को नांव छूट जात आए या के छोड़ दओ जात आए सो ऊंपे कटकटाव होन लगत आए। ऊं टेम पे जे ओरें नईं सोचत के जे दिखावा में पइसा फूकबे के बदले गरीबन को भलो करो जाए। बड़ी से बड़ी मूर्तियां बनत जा रईं मनो, पढ़ाई के लाने हर मोहल्ला में एक लाइबरेरी खोलत नईं बनत। काए से के लाइबरेरी में पढ़बे वारे कोन काम के?
‘‘का सोचन लगीं बिन्ना?’’ भैयाजी ने मोय टोकों।
‘‘मैं जे सोच रई के अखबार, टीवी वारे गेमिंग के नांव को जुआ खेला रए औ राजनीति वारे अपनों-अपनो पासा फेंक रए... आगे जाने का हुइए?’’ मैंने भैयाजी से कई।
‘‘चलन दो, सब ऐसई चलत आए। अपन दोई के सोचबे से कछू नईं बदलो जा रओ।’’ भैयाजी बोले। फेर भौजी से बोले,‘‘औ तुम कां चल दीं?’’
‘‘चाय बनाबे खों जा रए।’’ भौजी बोलीं।
‘‘सो फारम को का भओ?’’ भैयाजी चिड़कात भए बोले।
‘‘बा सो भरनेई आए, पैले तुमें चाय तो पिला दओ जाए। हो सकत के चाय पी के तुम मान जाओ!’’ कैत भईं भौजी हंस परीं।
हम दोई भैया-बहन सोई हंस परे।
अभईं सो देखत चलो के का-का हुइए! जे सबरे अपन ओरन की गदेली पे कोन-कोन से बतासा धरहें, आगे-आगे पता परहे। मनो बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की। सो, सबई जनन खों शरद बिन्ना की राम-राम!
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