Wednesday, June 14, 2023

चर्चा प्लस | जो मैं ऐसा जानती प्रेम किए दुख होय | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर

चर्चा प्लस  
जो मैं ऐसा जानती प्रेम किए दुख होय...
        - डाॅ (सुश्री) शरद सिंह  
         इस समय सबसे बड़ा ज्वलंत प्रश्न है कि क्या उसे प्रेम कह सकते हैं जिसमें कोई कथित प्रेमी अपनी प्रेमिका के टुकड़े कर के उसे कुकर में उबाल दे या कुत्तों को खिला दे या मिक्सी में पीस का नाली में बहा दे? इस वीभत्सता में प्रेम दूर-दूर तक दिखाई नहीं देता है। चिंता की बात यह है कि ऐसी घटनाएं बढ़ती जा रही हैं। पहले यदाकदा ही ऐसी घटना घटित होती थी लेकिन अब दस-पंद्रह दिन या महीने भर में ऐसी कोई न कोई घटना समाचारों की सुर्खियों पर लाल संकेत की भांति चमकने लगती है। यह जानना भी तो कठिन है कि किसके मन में क्या है? तो क्या प्रेम करने से डरने का समय आ गया है?
‘प्रेम’ एक जादुई शब्द है। कोई कहता है कि प्रेम एक अनभूति है तो कोई इसे भावनाओं का पाखण्ड मानता है। जितने मन, उतनी धारणाएं। मन में प्रेम का संचार होते ही एक ऐसा केन्द्र बिन्दु मिल जाता है जिस पर सारा ध्यान केन्द्रित हो कर रह जाता है। सोते-जागते, उठते-बैठते अपने प्रेम की उपस्थिति से बड़ी कोई उपस्थिति नहीं होती, अपने प्रेम से बढ़ कर कोई अनुभूति नहीं होती और अपने प्रेम से बढ़ कर कोई मूल्यवान वस्तु नहीं होती।

कागा सब तन खाइयो, चुन-चुन खाइयो मांस।
दोइ नैना मत खाइयो, पिया मिलन की आस।।
- यह दोहा है हज़रत ख़्वाजा फ़रीद्दुद्दीन गंजशकर उर्फ़ बाबा फ़रीद का। बाबा फ़रीद की वाणी पवित्र श्री गुरुग्रंथ साहिब में ‘‘सलोक फ़रीद जी’’ के रूप में विद्यमान है। बाबा फ़रीद ने अपने इस दोहे में प्रेम में समर्पण की पराकाष्ठा का वर्णन किया है। एक प्रेमी या प्रेयसी अपनी मृत्यु के निकट है। कागा यानी कौवा उसकी मृत्यु की प्रतीक्षा कर रहा है ताकि वह उसकी देह को खा कर अपना पेट भर सके। तब वह प्रेमी या प्रेयसी के मुख से यह निवेदन निकलता है कि हे कागा! तुम मेरा पूरा शरीर खा लेना लेकिन मेरे दो नेत्रों को छोड़ देना क्योंकि मुझे अभी भी अपने प्रिय को देखने की आशा है। प्रेम की यह पराकाष्ठा, यह समर्पण अब क्या सिर्फ़ किताबों में सिमटता जा रहा है? कहां है ऐसी लगन? कहां है ऐसी चाह? अब तो प्रेम और प्रेम के विश्वास के नाम पर नृशंस धोखा ही देखने-सुनने में आने लगा है। ये घटनाएं अब मन में तिमिलाहट और बेचैनी पैदा करने लगी हैं। प्रेम के नाम पर ये कैसा आपराधिक दौर आ गया है जब एक कथित प्रेमी अपनी सच्ची प्रेमिका को अपने दोस्तों के आगे परोस देता है। फिर डरता है कि कहीं वह सबको बता न दे तो उसे इस दुनिया से ही रुख़सत कर देता है। एकदम ‘‘यूज़ एण्ड थ्रो’’। क्या ऐसे चलते रहने में लड़कियों का भरोसा टूटने नहीं लगेगा? क्या वे निडर हो कर किसी के प्रेम को स्वीकार कर सकेंगी? ये प्रश्न चिन्तित करते हैं, डराते हैं और क्रोध से भर देते हैं।

एक युवा लेखिका है सुजाता मिश्र। वर्तमान की दशा-दिशा को बड़ी बारीकी से परखती रहती है। जब कुछ आपत्तिजनक घटित होते देखती है तो अपना आक्रोश प्रकट करने से खुद को रोक नहीं पाती है। स्वाभाविक है। एक संवेदनशील मन जो प्रेम पर विश्वास रखता हो, वह घात पर तिलमिलाएगा ही। औरतों को टुकड़े-टुकड़े में काटा जाना, जलाया जाना, उबाला जाना आदि की घटनाओं ने सुजाता मिश्र को झकझोर दिया और उसने अपने फेसबुक पर एक पोस्ट डाली जिसे बिना अनुमति उसे यहां शेयर कर रही हूं क्योंकि मुझे विश्वास है कि जो ललकार उसने अपनी पोस्ट में की है वह हर व्यक्ति के लिए है। सुजाता की पोस्ट शब्दशः यूं है- ‘‘कोई प्रेमिका के टुकड़े -टुकड़े कर कुत्तों को खिला देता है,कोई बीच सड़क प्रेमिका को चाकूओं से गोद देता है तो कोई प्रेमिका के टुकड़े कर कूकर में उबाल देता है...कुत्तों को खिला देता है.... क्या हो गया है लोगों को...इतनी हिंसा...इतनी नफरत......लोगों ने प्रेम को हर बंधन,हर सीमा से मुक्त करना चाहा....परिणाम सामने हैं... लड़कियों मत करो प्रेम.... इस दौर के प्रेमियों में एक होड़ सी मची है वीभत्सता की सीमा पार करने की...  कुछ समय पूर्व लोग प्रेम में भागी हुई लड़कियों के लिए लिख रहे थे बढ़ - चढ़कर...कोई प्रेम में मारी गयी लड़कियों पर भी लिख दो....कुछ कविताएं....कुछ शोक गीत!’’
.        सुजाता मिश्र सही लिखती है कि अब शोकगीत लिखने का समय आ गया है क्योंकि लड़कियों, स्त्रियों के विरुद्ध अपराध थम नहीं रहे हैं। सुजाता का यह कहना कि ‘‘लड़कियों मत करो प्रेम’’ कोई नसीहत नहीं है, अपितु पीड़ा है, छटपटाहट है, आक्रोश है। ऐसा हो भी क्यों न, आखिर, अभी ही तो हमने ख़ुश होना शुरू किया था कि स्त्री और पुरुष की संख्याओं का अनुपातिक अंतर कम होता जा रहा है। लेकिन ऐसी घटनाओं ने ख़ुशी को फ़ीका कर दिया है। ऐसा लगता है कि अपराधों के आधार पर एक बार फिर से जनगणना की जानी चाहिए ताकि पता चले कि कितनी लड़कियां प्रेम में धोखा कर मारी गईं और कितनी लड़कियां प्रेम करने के कारण अपने ही माता-पिता, भाई-बहन के द्वारा अपराधी घोषित करके मरने को छोड़ दी गईं। ऐसी दशा में यदि लड़की को समय रहते धोखे का तनिक अनुमान भी लग जाए तो वह किससे मदद मांगे? कहां जाए? उसके सबसे पहले घर के दरवाज़े ही उसके मुंह पर बंद किए जा चुके हैं। अब या तो वह इंसानों की भीड़ में कूद पड़े या फिर अपने कथित प्रेमी रूपी दरिंदे के रहमोकरम पर स्वयं को ज़िन्दा रखने की कोशिश करे।
इन घटनाओं की आड़ में भी नसीहत लड़की को ही कि प्रेम किया है तो अब भुगतो! किसने कहा था प्रेम करो? तो क्या एक लड़की को सिर्फ़ निराकार, अदृश्य ईश्वर से ही प्रेम करने में ही सुरक्षा मिल सकती है? शायद वहां भी। क्योंकि मीराबाई का उदाहरण हमारे सामने है। मीरा ने तो निराकार (वस्तुतः), अदृश्य ईश्वर से प्रेम किया। अटूट प्रेम किया। फिर भी उसे विषपान करने को विवश किया गया। तो एक लड़की क्या करे? वह भी तो एक इंसान है। उसके शरीर में भी हार्मोन्स हिलोरें लेता है। वह रोबोट नहीं है कि जिसके पास अपना खुद का न दिल हो न दिमाग़। फिर प्रेम में बुराई क्या है? वस्तुतः प्रेम की भावना कलुषित नहीं होती है, कलुषित होते हैं धोखेबाज़ प्रेमी। प्रेम ऐसा वीभत्स तो कभी नहीं रहा।

प्रेमियों के बारे में रहीम ने बहुत रोचक और मर्मस्पर्शी बात कही है-

जे सुलगे ते बुझि गए, बुझे ते सुलगे नाहिं।
रहिमन दाहे प्रेम के, बुझि बुझि कै सुलगाहिं।।

अर्थात् रहीम कहते हैं कि आग से जलकर लकड़ी सुलग-सुलगकर बुझ जाती है, बुझकर वह फिर सुलगती नहीं। लेकिन प्रेम की आग में दग्ध हो जाने पर प्रेमी बुझकर भी सुलगते रहते हैं। लेकिन आज प्रेमियों की एक ऐसी खेप पनपने लगी है जो विक्षिप्त है, मानसिक विकृति से भरी हुई है, इसीलिए वह स्वयं नहीं सुलगी है बल्कि अपनी वासना की पूर्ति होते ही अपनी प्रेमिका को ही जीवित जला देने से नहीं हिचकती है।
कबीर को क्या पता था कि ढाई आखर लड़कियों के लिए कभी इतने घातक सिद्ध होंगे। उन्होंने तो बड़ी सहजता से प्रेम की पैरवी की। अब इसकी व्याख्या हर तरह से की जा सकती है कि यह बात सामाजिक प्रेम और सौहाद्र्य के लिए है, या फिर यह बात ईश्वर के प्रति प्रेम के लिए है अथवा दुनियावी विपरीत-लिंगी परस्पर प्रेम के लिए है। मूल में तो यही है कि प्रेम एक अच्छा वातावरण निर्मित करता है। शांति, सुरक्षा और विश्वास प्रदान करता है और जीवन का वास्तविक ज्ञान देता है-

पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुवा, पंडित भया न कोइ।
ढाई  आखर  प्रेम के,  पढ़ै सो  पंडित होइ।।
.        यदि प्रेम की भावना न होती तो क्या यह सामाजिक संरचना बन पाती या पारिवारिक ढांचा खड़ा हो पाता?

 हजारी प्रसाद द्विवेद्वी लिखते हैं कि ‘प्रेम से जीवन को अलौकिक सौंदर्य प्राप्त होता है। प्रेम से जीवन पवित्र और सार्थक हो जाता है। प्रेम जीवन की संपूर्णता है।’ 

आचार्य रामचंद्र शुक्ल मानते थे कि "प्रेेम एक  संजीवनी शक्ति है। संसार के हर दुर्लभ कार्य को करने के लिए यह प्यार संबल प्रदान करता है। आत्मविश्वास बढ़ाता है। यह असीम होता है। इसका केंद्र तो होता है लेकिन परिधि नहीं होती।"

वहीं प्रेमचंद लिखते हैं कि-‘‘मोहब्बत रूह की ख़ुराक़ है। यह वह अमृतबूंद है, जो मरे हुए भावों को ज़िन्दा करती है। यह ज़िन्दगी की सबसे पाक, सबसे ऊंची, सबसे मुबारक़ बरक़त है।’’

दरअसल, प्रेम दोषपूर्ण नहीं होता है और न हो सकता है। प्रेम को आड़ बना कर वासनापूर्ति का लक्ष्य साधने वाले इसे कलंकित कर रहे हैं। क्योंकि जहां स्वार्थ है, वहां स्वार्थपूर्ति होते ही छुटकारे की भावना भी विकराल रूप ले लेती है। वर्तमान में ऐसा लग रहा है जैसे हम प्रेम के स्वरूप और उसकी प्रकृति को ले कर ही उलझ गए हैं। हर प्रेम को किसी न किसी ‘‘ऐंगल’’ से देखने लगे हैं और इसी का लाभ उठा रहे हैं सायकोपैथिक (मनोरोगी) लोग। जिनके लिए व्यक्ति नहीं वासना ही सबकुछ है।
जब उन अभागी स्त्रियों के बारे में विचार करो तो उनकी मानसिक और शारीरिक पीड़ा का अंदाज़ा लगाना भी कठिन हो जाता है। क्या बीती होगी उन पर जब उनका विश्वास रौंदा गया होगा? क्या बीती होगी उन पर जब उन पर प्राणघातक पहला प्रहार किया होगा? यदि मान लें कि देह से निकल कर आत्मा स्वतंत्र हो जाती है और वह सबकुछ देख सकती है तो क्या बीती होगी उनकी आत्माओं पर जब उन्होंने अपनी शरीर को अपने ही प्रेमी के हाथों काटे जाते, उबाले जाते या कुत्तों को खिलाते हुए देखा होगा? कोई इतना नृशंस, इतना निर्मोही, इतना घातक कैसे हो सकता है? विडंबना यह कि अब इस तरह के केस ‘‘रेयर ऑफ द रेयरेस्ट’’ नहीं रह गए हैं। ऐसी घटनाओं की संख्या बढ़ना युवाओं में आपराधिक मनोदशा के बढ़ने का अलर्ट अलार्म है। यदि अब भी इस अलार्म को नहीं सुना और समझा तो प्रेम का नाम सिर्फ़ पुरातन किताबों में रह जाएगा किसी ताड़पत्र में लिखे लेख की भांति।  

सच यह भी है कि हर प्रेम में घोखा नहीं होता और हर प्रेम घातक नहीं होता। आवश्यकता है प्रेमी के आचार-व्यवहार और मनोदशा को समझने की। लेकिन वह कहावत है न कि ‘‘प्रेम तो अंधा होता है’’। यदि प्रेम में कपट है तो उस प्रेमांध व्यक्ति (लड़की) को बचाने के लिए उसके लौटने का दरवाज़ा खुला रखा जाए। जीवन में छोटे-बड़े धोखे हर इंसान खाता है। जब पैसों के लेनदेन में धोखा मिलता है तो परिजन यही कह कर सांत्वना देते हैं कि ‘‘अरे, जाने दो, उसी की किस्मत का रहा होगा। हम फिर कमा लेंगे। मन छोटा मत करो!’’ तो फिर प्रेम को ले कर निष्ठुरतापूर्ण हठ क्यों? लड़की ने प्रेम किया। उसे सच्चा साथ मिला और वह खुश है तो परिजन भी खुश रहें। लेकिन लड़की को प्रेम में धोखा मिलता है तो उसे लौट कर आने के लिए एक दरवाज़ा को खुला छोड़ें। उसके सम्हलने का एक मौका तो दें। यदि सारे रास्ते बंद कर दिए जाएंगे तो हादसे का रास्ता उसकी प्रतीक्षा में मुंह बाए बैठे मिलेगा। पहले एक लड़की को जन्म दे कर इस दुनिया में लाना और फिर उसके प्रेमविवाह कर लेने पर उसके जीते जी उसका पिण्डदान कर के उसे मृत घोषित कर देना, उससे सारे नाते तोड़ लेना क्या यही दायित्व निर्वहन है? समाज में इतनी भी कठोरता नहीं आनी चाहिए। यदि पानी की सतह पर शैवाल फैल जाए तो पानी का भी दम घुट जाता है। लड़कियों, महिलाओं की सुरक्षा के लिए सामाजिक सोच में एक लचीलापन जरूरी है। 
बहरहाल, प्रेम के नाम पर नृशंसता की शिकार हुई सभी लड़कियों की ओर से मीराबाई का यह दोहा-

जो मैं ऐसा जानती प्रेम किए दुख होय।
नगर ढिंढोरा पीटती प्रेम न करियो कोय।।

आशा करनी चाहिए है कि हम स्वस्थ मनोदशा वाले वातावरण की ओर जल्दी लौट आएंगे और ये तमाम नृशंस घटनाएं किसी दुःस्वप्न की भांति सनद रहेंगी।      
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Tuesday, June 13, 2023

पुस्तक समीक्षा | प्रेम के संवाद रचती कविताएं | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

प्रस्तुत है आज 13.06.2023 को  #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई  कवि लक्ष्मीचंद्र गुप्त के काव्य संग्रह "अन्जानी राहें" की समीक्षा... 
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पुस्तक समीक्षा
प्रेम के संवाद रचती कविताएं
- समीक्षक डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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काव्य संग्रह - अन्जानी राहें
कवि       - लक्ष्मीचन्द्र गुप्त
प्रकाशक    - मंगलम् प्रकाशन सर्किट हाउस मार्ग, छतरपुर (म.प्र.)
मूल्य       - 250/-
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‘‘वक्त की लय को देख न पाई। नियति के क्रम को समझ न पाई। इस पल कुछ, उस पल कुछ जान न पाई। जब आप चल दिए तब सुध आई। आपकी कोई बात नहीं, कोई सौगात नहीं। आपसे अधिक मीठा कुछ लगता नहीं। ममता, प्रेम के कोष को क्या दे सकती हूं? प्रेम, विश्वास, भावना के श्रद्धासुमन अर्पित करती हूं। पूज्य तुम्हें माना है मैंने, नित अर्चना करती हूं। उठ प्रभात नित नव किसलय संग, आपको वंदन करती हूं। प्यार की डोरी विंध जाती, जब भी अभिनंदन. करती हूं। बीते लम्हे संग उन यादों के, हे मेरे प्रिय तुम्हें वंदन करती हूं।’’ - ये काव्यात्मक शब्द हैं श्रीमती तारा गुप्ता के जिन्होंने अपने बिछड़े हुए जीवनसाथी की कविताओं को संग्रह के रूप में प्रकाशित कराते हुए स्मरण के तौर पर व्यक्त किए हैं।
साहित्यकार, चाहे वह गद्यकार हो या पद्यकार, कई बार ऐसा होता है कि उसके जीवनकाल में उसकी रचनाएं एक सीमित दायरे में सिमट कर रह जाती हैं। कभी वह संकोचवश, कभी आर्थिक कारणों से अथवा कभी आवश्यकता का अनुमान न लगा पाने के कारण अपनी रचनाओं को पुस्तक के रूप में प्रकाशित कराने से वंचित रह जाता है। साथ ही वंचित रह जाता है उन रचनाओं से पाठकों का एक बड़ा वर्ग। कई रचनाकारों की रचनाएं उनके दिवंगत होने के उपरांत उनके परिजन, उनके हितैषी, उनके इष्टमित्र पुस्तक के रूप में प्रकाशित कराते हैं और कई रचनाकार और उनकी रचनाएं विस्मृति की गर्त में समा जाती हैं। जहां तक इष्टमित्रों द्वारा अपने दिवंगत मित्र की रचनाओं को पुस्तक के रूप में प्रकाशित कराने का संदर्भ है तो मैं यहां एक प्रसंग का उल्लेख कर रही हूं। सागर नगर के चर्चित शायर यार मोहम्मद ‘यार’ का 2016 में निधन हो गया। उनकी अनेक उम्दा शायरी बिखरी पड़ी थी जिन्हें संग्रह के रूप में समेटे जाने की आवश्यकता थी। ऐसी स्थिति में उनके मित्र जो कि साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्था ‘श्यामलम’ के अध्यक्ष भी हैं, उमाकांत मिश्र ने ‘‘यारां’’ के नाम से उनकी शायरी का संग्रह प्रकाशित कराया। उस पर प्रशंसनीय यह कि उसका कोई मूल्य न रखते हुए उसे पाठकों को निःशुल्क उपलब्ध कराया गया। जबकि उमाकांत मिश्र स्वयं कोई पूंजीपति नहीं हैं, मध्यवर्गीय व्यक्ति हैं। इसीलिए तो कहा जाता है कि श्रेष्ठ भावनाएं हर बाधा के बीच से रास्ता निकाल ही लेती हैं। इसी क्रम में यह प्रसन्नता का विषय है कि कवि लक्ष्मीचंद्र गुप्त की अर्द्धांगिनी तारा गुप्ता ने उनकी कविताओं को ‘‘अन्जानी राहें’’ के रूप में प्रकाशित करा कर भावनात्मक एवं साहित्यक दोनों दृष्टि से एक महत्वपूर्ण कार्य किया है।      
पुस्तक की भूमिका गीतकार डॉ. विष्णु सक्सेना ने लिखी है। उन्होंने लिखा है कि -‘‘गुप्त जी की अधिकांश कविताएं प्रकृति, समाज और व्यक्तिगत सरोकारों से जुड़ी हुई हैं। सामाजिक विद्रूपताओं पर बड़े प्यार से चोट की है उन्होंने। अपनों के बीच रहकर व्यक्ति कैसे घुट-घुट कर जीता है इस प्रकार की संवेदनाओं से परिपूर्ण कवितायें पठनीय हैं।’’
संग्रह ‘‘अन्जानी राहें’’ की कविताएं पढ़ने के बाद यह टीस मन में उठती है कि इस कवि को तो अभी और सृजन करना चाहिए था, इसने इतनी जल्दी सबसे विदा क्यों ले ली? लेकिन जीवन और मृत्यु किसी के वश में नहीं। किन्तु यह भी सच है कि एक रचनाकार कभी मरता नहीं है, वह अपने विचारों एवं अपनी भावनाओं को अपनी रचनाओं में इस तरह पिरो जाता है कि उसकी उपस्थिति सदा बनी रहती है और वह सदा सबसे संवाद करता रहता है। कवि लक्ष्मीचंद्र गुप्त की कविताएं पाठकों से एक मधुर संवाद करती हैं। इन कविताओं में प्रेम के विविध पक्ष हैं। संयोग, वियोग, अनुनय, उलाहना आदि सभी कुछ। प्रेम की राहें हमेशा अन्जानी ही होती हैं। प्रेम किस सोपान को प्राप्त करेगा, इसका अनुमान पहले से नहीं लगाया जा सकता है। लक्ष्मीचंद्र गुप्त की कविताओं में छायावाद और रहस्यवाद दोनों की झलक मिलती है। क्योंकि वे प्रेम की ऐसी काव्यात्मक प्रस्तुति सामने रखते हैं जिसमें खुला निवेदन भी है और गोपन भी है। उदाहरणस्वरूप उनकी कविता ‘‘हर लहर मैंनें किनारों से मिलती देखी’’ की कुछ पंक्तियां देखिए-
हर लहर मैंने किनारों से मिलती देखी।
हर शाम सुबहो में बदलती देखी।।
कब तक रहोगी मौन, बता दो तेरी कविते
हर बात प्यार की तेरे अधरों पर मचलती देखी।।
जीता तो हूं, मगर जी नहीं पाता।
पीता भी हूं, तो पी नहीं पाता ।।
क्या करूं, मजबूर हूं, निगाहों के पहरे यहां
मिलता हूं पर तुम से मिल नहीं पाता ।।

लक्ष्मीचन्द्र गुप्त ने कुछ चुटीली कविताएं भी लिखी हैं जो इस संग्रह में मौजूद हैं। जैसे उनकी एक कविता है ‘‘बाकी वे सब हैं बोर’’। यह अत्यंत रोचक कविता है। इस कविता से कवि की सृजनात्मक तीक्ष्णता का भी पता चलता है। यह कविता इस प्रकार है-
जरूरी नहीं प्यारे
केवल जरूरी है
जैसे
लिखना जरूरी है।
ताकि
पटक सकूं मुट्ठियां
मचा सकूं शोर
कि हमें छोड़कर
बाकी वे सब हैं बोर।

कविता में व्यंजना का प्रयोग करते हुए विसंगतियों पर गहरी चोट की जा सकती है। इसीलिए व्यंजना को अपनाते हुए कवि ने अपनी कविता ‘‘इस कवि में सामर्थ कहां है’’ में साहित्यजगत में व्याप्त दुरावस्था पर कटाक्ष किया है-
समझ गया उद्देश्य आपका,
बाध्य नही, पर बतला सकता।
मेरी कविता का अर्थ, कविता से पूछो,
इस कविता में अर्थ कहां है?
सीधी-साधी कविता का भी अर्थ बताता हूं।
इस कवि में सामर्थ कहां है।
मैं यों ही नहीं बहला सकता  
मैं तो अनर्थ से अर्थ निकालता,
बड़े-बड़े बाजारों में क्या,
छोटा दर्पण बिक सकता है?
बड़ी-बड़ी सरिता धारा में,
नीर कहीं क्या रूक सकता है?
कहते तो है, धरा गगन भी,
सावन भादों मिल जाते हैं।
साहित्य-गगन में रवि-कवियों संग
तुच्छ कवि क्या टिक सकता है?

वैसे लक्ष्मीचंद्र गुप्त की कविताओं में प्रेम केन्द्रीय भाव है। प्रेमपत्रों के युग में पत्र के साथ कोई फूल या कोई उपहार भेजने का भी चलन था। उसी परिपाटी के तारतम्य में कवि ने ‘‘अनामिका के नाम एक पत्र’’ कविता में लिखा है कि -
पत्र के मैं साथ बोलो और क्या मैं भेज सकता।
भाव का भन्डार केवल कल्पना मैं भेज सकता ।।
पास मेरे कुछ नहीं अनुकूल कह संतोष करता -
संपदा की देवि को-कंकड़ दिखाना तुच्छ लगता ।।
हो भरा ज्यों सिंधु बोलो, बिन्दु का अस्तित्व क्या है।
सूर्य के सम्मुख कहो तुम इंदु का अस्तित्व क्या है।।
मौन तो अनुगामिनी है साधना की कल्पना -
भक्ति के सम्मुख कहो आस्तिक का अस्तित्व क्या है ।।
तुम स्वयं जब मेघ हो तो मेह की अभिलाष क्या है।

कवि लक्ष्मीचंद्र गुप्त ने प्रकृति का मानवीयकरण करते हुए छायावादी परम्परा का भी अवगाहन किया है। वे अपनी कविता ‘‘पनिहारी प्रीतम’’ में प्रकृति के तत्वों में प्रेम और प्रेयसी के सवरूप को देखते हैं-
पनिहारी प्रीतम
पनघट पर।
पनिहारी की गागर से घट से।
कुछ छलका।
कुछ बिजली सी चमकी,
शीतल कुछ झलका, अलिका मन से।

‘‘अन्जानी राहें’’ एक ऐसी धरोहर कृति है जो हिन्दी काव्य जगत को समृद्ध करने में सक्षम है। इसके प्रकाशन के लिए तारा गुप्त एवं प्रवीण गुप्त साधुवाद के पात्र हैं क्योंकि साहित्य का सृजन जितना महत्वपूर्ण होता है उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण होता है उसे सहेजना।
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Monday, June 12, 2023

डाॅ. सुश्री शरद सिंह की पुस्तक पढ़ाई जा रही है सिक्किम विश्वविद्यालय तथा सेंट्रल यूनीवर्सिटी ऑफ साउथ बिहार में

एक ख़ुशख़बरी... 
अपनों कीअपनत्व भरी बधाइयों सहित...अपने मित्रों के लिए .🌹❤️🌹
ख़बर यूं है कि....बतौर मीडिया...

डाॅ. सुश्री शरद सिंह की पुस्तक पढ़ाई जा रही है सिक्किम विश्वविद्यालय तथा सेंट्रल यूनीवर्सिटी ऑफ साउथ बिहार में 

 सागर। सागर निवासी हिन्दी की प्रतिष्ठित लेखिका डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह की पुस्तक ‘‘भारत के आदिवासी क्षेत्रों की लोककथाएं’’ सिक्किम विश्वविद्यालय के हिन्दी के स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के थर्ड सेमेस्टर में संदर्भ ग्रंथ के रूप में पढ़ाई जा रही है। इसी प्रकार उनकी यही पुस्तक सेंट्रल यूनीवर्सिटी आॅफ साउथ बिहार, गया के स्नातकोत्तर हिन्दी पाठ्यक्रम के प्रथम सेमेस्टर में अनुशंसित सहायक ग्रंथ के रूप में शामिल है। डाॅ. सुश्री शरद सिंह की बहुचर्चित पुस्तक ‘‘भारत के आदिवासी क्षेत्रों की लोककथाएं’’ नेशनल बुक ट्रस्ट, नई दिल्ली से सन् 2009 में प्रकाशित हुई थी। इस पुस्तक में लेखिका ने उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक समूचे भारत की चालीस आदिवासी क्षेत्रों की लोककथाएं रोचक ढंग से हिन्दी में लिखी हैं। इस पुस्तक की लोकप्रियता विदेशों तक है। डाॅ शरद सिंह ने बताया कि इसी पुस्तक के संबंध में उनके पास जेरूसलम विश्वविद्यालय की प्राध्यापिका सुश्री मरीना रिमशा का ईमेल आया था, जिसमें उन्होंने लिखा था कि-‘‘मैं जेरूसलम के विश्वविद्यालय की हिंदी भाषा और साहित्य की प्राध्यापिका हूं। इस सेमेस्टर हम आदिवासी साहित्य पढ़ रहे हैं। जब मैंने कुछ साल पहले आदिवासी साहित्य पर कुछ लेक्चर सुने तो वहां आपकी किताब ‘भारत के आदिवासी क्षेत्रों की लोककथाएं’ से तीन छोटी-सी अंदमानी लोककथाएं पढ़ी गई थीं। मैं अपने विद्यार्थियों के साथ वही कहानियां पढना चाहती हूं।’’
      यह सागर नगर के लिए गर्व का विषय है कि सुश्री शरद सिंह की पुस्तकें देश-विदेश के विभिन्न विश्वविद्यालयों में रुचिपूर्वक पढ़ाई जा रही हैं। उल्लेखनीय है कि उनकी अब तक विभिन्न विषयों एवं विविध विधाओं में 57 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं और वे लेखनकार्य में निरंतर सक्रिय हैं। डॉ शरद सिंह को इस महत्वपूर्ण उपलब्धि पर सागर के साहित्यकारों ने उन्हें शुभकामनाएं देते हुए हर्ष व्यक्त किया।
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Sunday, June 11, 2023

Article | 1 Step +1 Step = 2 Steps Towards Healthy Environment | Dr (Ms) Sharad Singh | Central Chronicle

Article
1 Step +1 Step = 2 Steps Towards Healthy Environment
         -    Dr (Ms) Sharad Singh
Writer, Author & Social Activist
Blogger - "Climate Diary Of Dr (Ms) Sharad Singh"
 
 *"That's one small step for man, one giant leap for mankind." Astronaut Neil Alden Armstrong rightly said that our small efforts can be beneficial for the entire human civilization. These efforts can be of very small units like 1+1=2, because it is not important how small the efforts were, what is important is how big the results we get from those efforts. It is a not a new report that our climate is facing worrying changes. Due to this we can see changes in weather. A new report is more horrible that Glaciers will be completely melted till 2030 or till 2050. It means more changes and more disasters. But we can do something hopeful by our small efforts.*
 
What will happen when Glaciers melt completely? If the glaciers melt completely, then the temperature of the earth will increase rapidly, which will affect the entire animal world. Then whether it is trees and plants, insects, moths, aquatics or humans – all will be badly affected. It is possible that many species may become extinct forever. Or this earth may not be fit for human habitation. No doubt, it sounds like a story out of a sci-fi movie, unfortunately, it is  not a fictional story but a reality from the future. We can recognize this thing from big and small changes in our present life.

Look, the summer season of this year is almost over. If we look at the traditional weather pattern, then by June 15, the monsoon knocks in North India. Accordingly, the summer season passed without a strong heat wave. Intermittent rains in April, May and till June 15 prevented the temperature from reaching 48°C. But in between, when the weather became bitter hot, even 40 degree Celsius 'felt like' was 45-46 degree. What happened to the weather? Why did he keep taking turns every week? Have you ever thought about this? Didn't think! So now think!
Listen the call of weather who tell us that reduce the use of air conditioners. Because they use a large amount of energy, electricity production is increased, which emits more carbon dioxide into the atmosphere. At excessive levels, this greenhouse gas can trap heat near the planet's surface and contribute to global warming. Another factor is refrigerant.
Weather says us that protect the greenery, which will give us pure oxygen, soil conservation, no raise the temperature of earth and slow the speed of changes in climate and weather. Greenery can contribute to reducing the amount of pollution. Greenery in our living environment benefits more than just our health and well-being. It also facilitates water management and promotes biodiversity in built-up areas, and can help reduce the effects of any type of pollution. Recent studies also found that even looking at nature and greenery through a window or from a terrace can lower your blood pressure and anxiety levels. In fact, the longer you're exposed to green spaces, the more likely you are to have better mental health. Indoor plants purify the air: they reduce concentrations of CO2 and volatile organic compounds, keeping air fresh and healthy. Outdoor vegetation reduces heat in and around homes in the summer, lowering heat stress and reducing the need for air-conditioning. In other words, access to nature has also can be to improve sleep and reduce stress, increase happiness and reduce negative emotions, promote positive social interactions and even help generate a sense of meaning to life.

Well you can feel a dilemma that what relation between Greenery, Glaciers and our environmental goals? Glaciers act as reservoirs of water that persist through summer. Continual melt from glaciers contributes water to the ecosystem throughout dry months, creating perennial stream habitat and a water source for plants and animals. The cold runoff from glaciers also affects downstream water temperatures. Many aquatic species in mountainous environments require cold water temperatures to survive. Some aquatic insects--fundamental components of the food web--are especially sensitive to stream temperature and cannot survive without the cooling effects of glacial melt water. Such changes in stream habitat may also adversely impact native trout and other keystone salmon species. In the same, greenery gives a healthy atmosphere to glacier's life.
So, it should be our small effort to growing a plant, as indoor or outdoor. Another small step we can take is to reduce the use of plastic bags and bottles. Plastic bags are difficult and costly to recycle and most end up on landfill sites where they take around 300 years to photo-degrade. They break down into tiny toxic particles that contaminate the soil and waterways and enter the food chain when animals accidentally ingest them. Plastic bags kill about 100,000 animals annually. Many animals, including whales, dolphins, turtles, penguins, and dolphins, ingest plastic bags as they mistake them food. Production of plastic takes 60-100 million barrels of oil from the world’s petroleum reserves. Actually, plastic one of the main causes to the depletion of this valuable resource. So, it can be said that sometimes our little convenience can put us in great danger in the long run. Unfortunately, that danger is now closer to us.

Another one solution is to save the environment which can be easily adopted. The solution is that we should use organic manure for our gardening as well. This will keep the environment inside and outside the house pure and whatever we grow in our kitchen garden will be free from the poison of chemical fertilizers. It will also be good for our health. Because of the damage caused by chemical fertilizers to the soil, the use of chemical fertilizers in the fields is minimized now. Farmers have also started using organic fertilizers. That's why we should also use only organic products in the form of fertilizers or pesticides for our kitchen garden. 

We have to increase the use of solar, wind or thermal energy by reducing our dependence on fossil fuel. Like, we can increase the use of solar light, solar heater, solar fan and solar cookers for your home. In this way, we can get big results from our small efforts by becoming environmental friends. Just like two smaller units of 1+1 combine to form a double unit i.e. 2. In this sequence, we can get the results of increasing order like 2+2=4, 4+4=8 and the deteriorating environment can improve. All that is needed is to understand the seriousness of the situation and take small steps in our daily life towards improving the environment.
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 (11.06.2023)
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Thursday, June 8, 2023

बतकाव बिन्ना की | हमें तो आलिया भट्ट बनने आए | डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम | बुंदेली व्यंग्य | प्रवीण प्रभात

"हमें तो आलिया भट्ट बनने आए !" - मित्रो, ये है मेरा बुंदेली कॉलम "बतकाव बिन्ना की" साप्ताहिक #प्रवीणप्रभात , छतरपुर में।
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बतकाव बिन्ना की  
हमें तो आलिया भट्ट बनने आए !              
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
     ‘‘भैयाजी, परों की रोज बड़े गजब की हो गई।’’ मैं चाय सुड़कत भई बोली। और कोनऊं के इते तो सुड़क-सुड़क पियो नईं जा सकत, काए से, के जे गंवारूंपना कओ जेहे। पर, भैयाजी के इते चाए जित्ती जोर से चाय सुड़को, कोऊ कछू कैने वारो नोईं। भौजी सोई सुड़क-सुड़क के चाय पीती आएं। पैलऊं जब कप के संगे बसी चलत्ती सो ऊ टेम पे सुड़कत में औ मजा आओ करत्तों। मनो मताई से डांट सोई खाने परत्ती। कभऊं-कभऊं मूड़ पे एकाध चपतियां सोई घल जात्ती।
‘‘का सोचन लगीं? कोन से गजब की कै रई हतीं? कछू बताओ।’’
‘‘कछू नईं, मैं जे सोच रई हती के जे चाय सुड़कत में कित्तों मजो आत आए!’’ मैंने कई।
‘‘बात ने बदलो।’’ भैयाजी ने तनक गुस्सा दिखाओ। कोनऊं बात उगलवाने के लाने उनके जे सब हथकंडा रैत आएं। मोय पतो।
‘‘तनक चाय तो खतम कर लेन देओ, फेर बताबी।’’ मैंने भैयाजी से कई।
सो मैंने पैलऊं चाय खतम करी फेर बताबो चालू करो-‘‘बात जे भई भैयाजी! के परों मोरे इते एक बिटिया आई।’’
‘‘कां से आई? कित्ती बड़ी हती?’’ भैयाजी पूछन लगे।
‘‘उते आसमान से टपकी हती औ भैंसिया जित्ती बड़ी हती!’’ मैंने कई।
‘‘का कै रईं? ऐसो कऊं हो सकत का?’’ भैयाजी को मों खुलो के खुलो रै गओ।
‘‘जो आप मोय पूरी बात बोलन ने देहो औ बीच में ऐसई टोका-टाकी करत रैहो तो ऐसई होत रैहे। कओ बा बिटिया के दो सींग सोई उंग आएं।’’ मैंने भैयाजी खों तनक हड़काओ।
‘‘हऔ-हऔ, हम समझ गए! अब ने बोलहें बीच में। तुम बताओ के का भओ?’’ भैयाजी नंे पूछी।
‘‘भओ जे के बा बिटिया अपनी अम्मा के संगे आई रई। अच्छी छोटी-सी, लोहरी-सी आए बा। अबे तीसरी में पढ़त आए। कौनऊ अंग्रेजी वारे स्कूल में। स्कूल को नांव सोई बताओ रओ ऊने, बाकी अब मोय याद नईं। सो, का भओ के मैंने ऊ बिटिया से पूछो के का पढ़त हो? सो वा बतान लगी के स्कूल जांत आएं, फेर आॅफ लाईन कोचिंग पढ़त आएं, औ रात को सोबे से पैले आॅन लाईन कोचिंग पढ़त आएं। ऊकी बात सुने के मोय लगो के जमाना कित्ती तेजी से बदल गओ। अपन ओरन से कोनऊं पूछत्तों के का पढ़त आओ सो अपन ओरें हिन्दी, अंग्रेजी, संस्कृत, जुलाॅजी, बाॅटनी, इतिहास, भूगोल घांई सब्जेक्ट गिनान लगत्ते। मगर अब के मोड़ा-मोड़ी आॅन लाईन, आॅफ लाईन गिनाऊत आएं।’’    
‘‘हऔ, सही कई! अपन ओरने के लड़कोरे में जे लाईने-माईने कां हतीं? बस, एक ठईयां लाईन हती जोन को मारबे के लाने मोड़ा हरें गल्र्स स्कूल के चक्कर लगाउत्ते।’’ कैत साथ भैयाजी हंसन लगे।
‘‘हऔ! मनो ऊ टेम पे अपन ओरन को फिलम देखबे के लाने कम मिलत्तो। मोरे इते तो पैलऊं मताई पतो कर लेत्तीं के बा फिलम हम ओरन के देखबे जोग आए के नईं। जो देखबे जोग रैत्ती सो बे हम ओरन को अपने संगे टाॅकीज ले जात्तीं और लेडीज़ क्लास की टिकट कटाई जात्ती। ऊ टेम पे हम ओरें पन्ना में हते औ उते भौतई नोनी टाॅकीज रई, कुमकुम टाॅकीज। ऊ टेम पे हम ओरन खों अल्लम-गल्लम फिलमी गाना नईं गान दओ जात्तो। औ फिलम बी ऐसे टाईप से दिखाई जात्ती के ऊ फिलम में जो चीज दिखाबे के लाने ले जाओ गओ रैतो, बोई याद रैतो, औ कछू नईं। मोय आज लौं याद आए के एक फिलम हती ‘‘अनमोल मोती’’ ऊमें बबिता हिरोइन रई। बबिता मने वोई करिश्मा औ करीना की मताई। सो, मोरी मताई खों पतो परो के ऊमें ऑक्टोपस दिखाओ गओ आए। बस, अम्मा को लगो के हम दोई बहनों को सोई ऑक्टोपस दिखा दओ जाए। बे हम ओरन खों ले के कुमकुम टाॅकीज पौंची। अब बा हती तो हिन्दी फिलम, सो ऊमें गाना, रोना, प्रेम-मोहब्बत, मार-कुटव्वल सबई कछू हतो, मनो जब हम ओरें फिलम देख के बाहरे आए सो बा ऑक्टोपस याद रओ औ कछू नईं।’’ मैंने भैयाजी खों बताओ।
‘‘मनो, बा हिरोईन सोई याद रई।’’ भैयाजी मुस्कात भए बोले।
‘‘हऔ, सो हिरोईन याद रई, हीरो नोईं!’’ मैंने सोई नैले पे दैला ठोंक दओ। भैयाजी तनक झेंप गए कहाने।
‘‘मनो, हमें जे समझ नईं पर रई के ई बात से ऊ बिटिया को का लेबो-देबो?’’ भैयाजी ने पूछी।
‘‘अरे, भौतई लेबो-देबो आए! भओ का, के मैंने बा बिटिया से पूछी के तुम बड़ी हो के का बनो चात आओ? सो बा तुरतईं बोली के हमें तो आलिया भट्ट बनने आए।’’
‘‘का? का कई? सच्ची? ऊने आलिया भट्ट बनबे की कई?’’ भैयाजी चैंक परे।
‘‘हऔ तो! हमने ऊसे पूछी के काय तुमें डाॅक्टर, इंजीनियर, कलेक्टर नईं बनने बल्कि आलिया भट्ट बनने, ऐसो काय? ऐसो काय कै रईं तुम?’’ मोय सोई अचम्भो भओ रओ।
‘‘फेर? ऊने का जवाब दओ?’’ भैयाजी ने पूछी।
‘‘अब हम का बताएं आप के लाने। ऊको जवाब सुन के सो मोय लगो के मोय सोई जा के पैली कक्षा में भरती हो जाओ चाइए औ फेर से मोय पढ़बे की जरूरत आए।’’
‘‘ऐसो का कओ ऊने?’’ भैयाजी ऊको जवाब जानबे के लाने मरे जा रए हते।
‘‘भैयाजी, ऊने कई के जो हम आलिया भट्ट बन जेहें से हमें जे डाॅक्टर, इंजीनियर, कलेक्टर वारे रोल सो ऊंसईं मिल जेहें।’’ मैंने बताई।
‘‘ऐं? ऊने ऐसी कई? गजब!!’’ भेयाजी हैराने से रै गए।
‘‘हओ! बित्ता भर की ब्टििया ने इत्तो बड़ो जवाब दओ के मोय कछू कैत नईं बनो।’’ मैंने भैयाजी से कई।
‘‘रामधई! गजब की मोड़ी कहानी बा तो!’’ भैयाजी सोई भैरां गए।
‘‘बाकी मोय समझ में आ गई के चक्कर का हतो!’’ मैंने तनक राज खोलबे के स्टाईल में कई।
‘‘का चक्कर हतो?’’ भैयाजी ने पूछी।
‘‘चक्कर जे हतो के फेर हमने मजाक में ऊ बिटिया की अम्मा से कई के जो तुमाई बिटिया आलिया भट्ट बनहे सो कऊं तुमाए मिस्टर महेश भट्ट ने बन जाएं? सो, बा मोसे बोली के, कछू नईं! बे तो ऊंसई महेश भट्ट बने फिरत आएं। सो मैंने पूछी के तुमें बुरौ नईं लगत आए? सो बा तुरतईं बोली हम तो उनकी तरफी ध्यानई नईं देत आएं। हम तो बिटिया खों तैयारी करा रै। जो ईको सिलेक्शन हो जाए कोनऊं टेलेंट शो में सो मताई-बिटिया दोई की जिनगी बन जेहे। रामधई! जे मोसे कई ऊ बिटिया की मताई ने!’’ मैंने भैयाजी खों बताई।
‘‘हें, परमेसर! हम सोच रै हते के खाली बिटिया बिगर गई, मनो इते तो बिटिया की मताई-बाप को कछू ठिकानों नईंया।’’ भैयाजी हक्का-बक्का से रै गए।
‘‘अब आपई बताओ के जे कोन टाईप को जेनरेशन गैप आए?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘काय को जेनरेशन गैप? लूघरा!!! मनो नओ काम करबे में कोनऊं बुराई नोंईं, पर पैलऊं पढ़ाई-लिखाई सो हो जाए।’’ भैयाजी बोले।
‘‘जेई बात हमने ऊ बिटिया की मताई से कई सो बताएं ऊने का कई?’’
‘‘का कई?’’
‘‘पढ़-पढ़ के तुमने कोन सो झंडा गाड़ लओ? एमए करी, पीएचडी करी औ कलम घिसत अपने कमरा में बैठी रैत आओ। अब आपई बताओ के ईके बाद मैं का कैती? सो अपनों सो मों ले के रै गई। वैसे एक बात आए भैयाजी के जो मैं सोई कोनऊं फिलम में चली जाती सो मोय सोई जे राईटर वारो रोल ऊंसई मिल जातो।’’ मैंने भैयाजी से कई।
‘‘तुमें कोनऊं रोल नईं देतो। तुमसे एक्टिंग-वेक्टिंग बनत नईंयां, जो बनत आए बोई करो! समझीं!’’ भैयाजी ने मोय समझाओ।
‘‘बाकी कछू कओ भैयाजी! बा बिटिया आए समझदार!’’ मैंने देखी के भैयाजी खुदई सोच में डूब गए हते। आप ओरें सोई सोचियो ई बारे में।
मनो बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की। सो, सबई जनन खों शरद बिन्ना की राम-राम!
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Wednesday, June 7, 2023

चर्चा प्लस | महिला पहलवानों के बहाने ज्वलंत स्त्री-प्रश्न | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर

चर्चा प्लस  
महिला पहलवानों के बहाने ज्वलंत स्त्री-प्रश्न
- डाॅ (सुश्री) शरद सिंह  
         एक पुरुष की अस्मत क्या है? उसका स्वाभिमान। वहीं एक स्त्री की अस्मत क्या है? उसकी देह की शुचिता। यह मानक हमारे समाज ने ही बनाए हैं। पुरुषवादी समाज का स्त्री के प्रति संकुचित दृष्टिकोण का इससे बढ़कर उदाहरण और कोई हो ही नहीं सकता है। इसीलिए तो स्त्री की शक्ति को तोड़ने का सबसे आसान तरीका बन गया उसका दैहिक शोषण। फिर दैहिक शोषण पर कोई शोर न हो इसलिए उससे जोड़ दिया गया सामाजिक लांछन, और फिर भी हम उंगली उठाते हैं कि फलां स्त्री ने अपने दैहिक शोषण के विरुद्ध तत्काल शोर क्यों नहीं मचाया? हमारी महिला पहलवानों द्वारा उठाई गई आवाज़ एक बार फिर आग्रह कर रही है कि इस ज्वलंत प्रश्न पर गंभीरता से विचार किया जाए।
हमारी सामाजिक सोच इतनी राजनीतिक हो चली है कि किसी भी मुद्दे पर हमारा समाज चट् से दो फड़ में बंट जाता है। अभी हाल ही में ओलम्पिक पदक विजेता सहित कई महिला पहलवानों ने अपने कोच पर यौनशोषण का आरोप लगाया और उसे दण्डित किए जाने की मांग करते हुए दिल्ली के जंतर-मंतर पर धरना दिया। स्त्रियों के प्रति असंतुलित रवैया अपनाने के लिए हमेशा विवाद के घेरे में रहने वाली खाप-पंचायतों ने भी महिला पहलवानों का समर्थन किया। आशा जागी कि सकारात्मक परिणाम जल्दी सामने आएंगे। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। वहीं, आज के समाज का मानसिक आईना बन चुका सोशल मीडिया इस मुद्दे पर वाद-विवाद के ऊलजलूल विचारों से भरने लगा। कुछ पक्ष में, तो कुछ विपक्ष में। स्त्री की अस्मत के प्रश्न के विपक्ष में कोई कैसे हो सकता है? लेकिन यही हो रहा है क्योंकि कुछ ऐसे लोगों ने अपनी आंखों पर उस राजनीति का चश्मा पहन लिया है जिससे उनका दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं है। वे अपराध को भी राजनीतिक चश्मे से देखने लगे हैं।

कुछ टिप्पणियों को पढ़ कर तो स्तब्ध हो जाने वाली स्थिति रही। सोशल मीडिया पर ही एक टिप्पणी पढ़ी थी-‘‘वे अपने मेडल तो गंगा में बहा रही हैं, तो फिर उन्हें उस खेल से मिले लाभ और नौकरी भी उन्हें लौटा देनी चाहिए।’’ यह कैसी सोच? क्या खेल से मिले लाभों को लौटाने के बाद कोई उन्हें वह स्थिति लौटा सकेगा जो शोषण के पहले थी? उन्मुक्त, चंचल, मानसिक दबाव के बिना ऊंचे आकाश उड़ने के स्वप्न- क्या यह सब कोई उन्हें लौटा सकेगा? ऐसी टिप्पणी करने वाले क्या उन महिला पहलवानों की जगह अपनी बहन-बेटियों या पत्नी को रख कर देख पाते हैं? नहीं! यदि वे ऐसा कर पाते तो शायद उन खिलाड़ियों की पीड़ा को समझ पाते जो खेल या किसी भी क्षेत्र में आगे बढ़ने की शर्त पर यौन शोषण का शिकार बनाई जा रही हैं।

कुछ वर्ष पहले ‘‘हैशटैग मी टू’’ कैम्पेन उन महिलाओं के द्वारा चलाया गया था जो कभी न कभी अपने घर अथवा कार्यक्षेत्र में यौन शोषण का शिकार हुई थीं। उस समय कई मामले दस-बारह वर्ष या उससे भी अधिक पुराने समय के भी सामने आए। उस समय भी कुछ स्वर इस प्रकार के उठे थे कि ‘‘उन औरतों ने उसी समय आवाज क्यों नहीं उठाई, जब उनका यौन शोषण किया गया था?’’

लोग यह क्यों नहीं समझना चाहते हैं कि जो सामाजिक सोच बना दी गई है उसके कारण अपने साथ हुए यौनअपराध को स्वीकार करना एक स्त्री के लिए सबसे बड़ा साहसिक और दुष्कर कार्य है। बदनामी! हां, बदनामी के डर की जंजीरों से ऐसी स्त्रियों को बांध कर रखा जाता है। तो भला वे कैसे साहसी बनें? वे चुपचाप सहती रहती हैं लेकिन अपनी आवाज़ बुलंद नहीं कर पाती हैं, प्रतिरोध नहीं कर पाती हैं। जब थक जाती हैं तो आत्महत्या कर लेती हैं। फिर भी जब कभी उनके जैसी चार अन्य पीड़ित महिलाएं साहस का परिचय देती हैं और अपने साथ किए गए अपराध का खुलासा करती हैं, तब बदनामी के चाबुक से डरा कर रखी गईं कुछ औरतों का भी साहस जागता है और वे भी बोल उठती हैं कि उनका भी शोषण किया गया था। इस तरह के साहस को जुटने में कई बार वर्षों लग जाते हैं और कई बार सच कभी सामने नहीं आ पाता है और शोषक प्रतिष्ठित नागरिक बना, सिर उठाए इसी समाज में सरेआम शान से घूमता रहता है।

धर्म ओर अधर्म की व्याख्या बहुत स्पष्ट है, यदि हम उसे समझने का प्रयास करें। जो सही है वह धर्म है और जो गलत है वह अधर्म है। यहां धर्म कर्म पर आधारित है न कि उन नामों पर जो हमने बनाए हैं-हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, जैन, बौद्ध, पारसी, यहूदी या कोई और। ये नाम प्रतीक हैं उस कर्म के जो सद्मार्ग पर चलने को कहता है। जो सत्य का पक्ष लेने को कहता है। जो पीड़ित को राहत देने को कहता है। लेकिन हमने धर्म को पहले भौतिक आकार से बांधा और फिर उस आकार को आधार बना कर अपनी भावनाओं को संकुचित कर लिया। जबकि धर्म का मूल संकुचित नहीं विस्तृत है। धर्म में प्रत्येक प्राणी समान रूप से जीवन जीने का अधिकारी है। धर्म यह कभी नहीं कहता है कि किसी निरपराध को बंदी बनाओ या किसी भी प्रकार के अनुचित बंधनों में बांधो। इस संबंध में यदि कृष्ण जन्म की कथा पर ध्यान दें तो बहुत सुंदर उदाहरण हमें मिलेगा। कंस ने कृष्ण को बंधनकारी स्थितियों में जन्म लेने को विवश किया। फिर शिशु कृष्ण को मारने के मंसूबे बनाए। तब प्रकृति ने साथ दिया और बाढ़ आई यमुना नदी ने उस पिता वासुदेव को रास्ता दिया जो एक टोकरी में अपने शिशु पुत्र कृष्ण को रख कर, सिर पर ढो कर यमुना पार कर रहा था ताकि वह धर्म और अन्याय की तलवार से अपने निर्दोष शिशु को बचा सके। तब प्रकृति भी सत्य और सत्कर्म के साथ थी, उसने वासुदेव की मदद की और कृष्ण की जीवनरक्षा की। द्वापरयुग में ही यदि हम कौरवों की राजसभा तक जाएं तो वहां जिस घड़ी दुश्शासन द्रौपदी का चीरहरण करता है, उस घड़ी का स्मरण मात्र हमें विचलित कर देता है। हमारा मन गुस्से से भर उठता है। फिर जब कृष्ण द्रौपदी के वस्त्र को अनंत बना देते हैं तो हमारा मन करतल ध्वनि कर उठता है। इन कथाओं से गुज़रने के बाद भी हम सत्य और वास्तविक धर्म का पक्ष क्यों नहीं ले पाते हैं? स्वयं को धार्मिक मानने वाले कुछ लोगों की भीरुता इतनी बढ़ जाती है कि वे सत्य का पक्ष लेना तो दूर असत्य और अपराधी के पाले में जा खड़े होते हैं और फिर भी सोचते हैं कि हमारा स्त्रीपक्ष सुरक्षित रहेगा। कमाल है!

पुरुष प्रधान समाज ने स्त्री की देह को एक टैबू बना रखा है। पुरुषों ने अपने धैर्य और संयम के कच्चेपन को दृढ़ता में बदलने के बजाए उसे स्त्रियों पर थोप दिया। क्षमा कीजिएगा कि यह बात कहने, सुनने और पढ़ने में कुछ अभद्र लग सकती है किन्तु इसके मर्म को समझने का प्रयास कीजिए कि एक पुरुष खुले तालाब, कुए या किसी भी सार्वजनिक स्थान पर कच्छा पहन कर नहा सकता है, अपनी देह का प्रदर्शन कर सकता है और स्त्रियों से यह आशा की जाती है कि वे ऐसे दृश्य को देख कर अपने मन में विकार न लाएं तथा अपना संयम बनाए रखें। स्त्रियां सदियों से संयम बनाए हुए हैं। लेकिन यदि किसी स्त्री ने दो इंच छोटे कपड़े पहन लिए तो उसके प्रति होने वाला हर अपराध उस दो इंच पकड़े की कमी पर ही जा कर ठहर जाता है। यही कहा जाता है कि ‘‘उसने ऐसे कपड़े पहने थे इसलिए मनचलों ने उसे छेड़ा।’’ अब ऐसी वैचारिकता को किस श्रेणी में रखा जाए जबकि ये मनचले भी एक स्त्री की कोख से ही जन्म लेते हैं।
आज लड़कियां रानी पद्मिनी की तरह जौहर नहीं करना चाहती हैं अपितु वे रानी लक्ष्मीबाई या रानी चेनम्मा की भांति अनुचित का प्रतिरोध करना चाहती हैं। वे कल्पना चावला बनना चाहती हैं, वे बछेन्द्रीपाल बनना चाहती हैं। लेकिन यदि उन्हें उनके सपने चूर-चूर कर देने का डर दिखा कर दैहिक शोषण का शिकार बनाया जाए तो क्या कोई बछेन्द्रीपाल बन सकेगी? क्या कोई कल्पना चावला बन सकेगी? जितनी दैहिक उन्मुक्तता गलत है, उतना ही गलत है दैहिक शोषण। समाज के प्रत्येक परिवार को अब बेटियों की नहीं, वरन बेटों की माॅनीटरिंग करने की ज़रूरत है। इस पर ध्यान देने की ज़रूरत है कि उनका बेटा जो  पुरुष समाज का प्रतिनिधित्व करता है, उसमें स्त्री को बराबर मानने और उसकी इज्जत करने की मानसिकता विकसित हुई है कि नहीं? यह बात इसलिए अर्थ रखती है कि जब हमारी महिला पहलवान यौनशोषण के विरुद्ध जंतर-मंतर पर आवाज़ उठा रही थीं, ठीक उसी दौर में, उसी राजधानी की एक सड़क पर खुलेआम एक लड़की को एक लड़के ने नृशंसतापूर्वक मार दिया। वहां से गुज़रने वाले लोग उस लड़की को मारी जाती हुई देखते रहे लेकिन रोकने का साहस कोई नहीं जुटा पाया। अब सभी को यह बात समझनी होगी कि अपराध के बाद मृतका की याद में मोमबत्ती जलाने से कुछ नहीं होगा, बल्कि अपराध को उसी समय सामूहिक रूप से रोकने से अपराध रुकेंगे और तभी स्त्री समुदाय सुरक्षित रह सकेगा। ‘‘मारी जाने वाली या बलत्कृत होनी वाली हमारी बेटी या हमारी बहन तो नहीं थी’’- इस प्रकार की सोच से बाहर निकलने का समय आ गया है।

उन स्त्रियों के लिए भी सोचने का समय आ गया है जिनके पुरुष परिजन स्त्री के विरुद्ध अपराध करते हैं। हम देख चुके हैं कि जब ‘‘निर्भया’’ के दोषियों को जेल में रखा गया था, तब उन्हें फांसी चढ़ाए जाने तक किस तरह उन नृशंस अपराधियों के परिवार की महिलाओं या पत्नियों ने उनके पक्ष में जनमत जुटाने और केस को प्रभावित करने का प्रयास किया था। निःसंदेह यह कठिन बात है कि अपने किसी परिजन को फांसी की सजा सुनाते देखा जाना। लेकिन उस पल उन स्त्रियों को उस लड़की ‘‘निर्भया’’ की जगह पर स्वयं को रख कर विचार करना चाहिए था जिसने अकल्पनीय प्रताड़ना सही, वह भी मात्र वासनालोलुप इच्छाधारियों के हाथों। ऐसे अपराधी जो एक लड़की के साथ ऐसा जघन्य व्यवहार कर सकते हैं, वे कैसे अपनी पत्नी, मां या बहन को मान दे सकते हैं? ऐसे परिजनों को एक मनोरोगी पुरुष मान कर ही स्त्रियों को विचार करना होगा। अन्यथा, हमारे ही देश में कहीं-कहीं व्यवस्थाएं तो ऐसी भी बना दी गईं कि बलात्कारी के साथ ही बलत्कृत का विवाह करा दिया जाए। जहां समाज एक ओर सम्मान और गर्व से उन ऋ़षिकाओं का स्मरण करता है जिनका उल्लेख ऋग्वेद में किया गया है, वहीं समाज स्त्रियों को अपराधों से बचा नहीं पा रहा है। ऋग्वेद/10/85 के संपूर्ण मंत्रों की ऋषिकाएं ‘‘सूर्या सावित्री’’ है। ऋग्वेद की ऋषिकाओं की सूची ब्रह्म देवता के 24 अध्याय में इस प्रकार है-
घोषा गोधा विश्ववारा अपालोपनिषन्नित् ।
ब्रह्म जाया जहुर्नाम अगस्त्यस्य स्वसादिति।। 84।।
इन्द्राणी चेन्द्र माता चा सरमा रोमशोर्वशी ।
लोपामुद्रा च नद्यश्च यमी नारी च शाश्वती।। 85।।
श्रीलछमीः सार्पराज्ञी वाकश्रद्धा मेधाचदक्षिण ।
रात्रि सूर्या च सावित्री ब्रह्मवादिन्य ईरितः ।। 86।।
अर्थात- घोषा, गोधा, विश्ववारा, अपाला, उपनिषद्, जुहू, आदिति, इन्द्राणी, सरमा, रोमशा, उर्वशी, लोपामुद्रा, यमी, शाश्वती, सूर्या, सावित्री आदि ब्रह्मवादिनी हैं। लेकिन आज ब्रह्मवादिनियों की भांति ज्ञानप्राप्त करती, आगे बढ़ती लड़की, समाज में अपनी पहचान बनाती लड़की सुरक्षित नहीं है। वैदिक ज्ञान रटने नहीं, समझने का तथ्य है। ‘‘जहां नारी है, वहां देवता का वास है’’-यह कह देने मात्र से असुरों से मुक्ति नहीं हो सकती है। असुरों को यानी अपराधियों को बचाने की मानसिकता से ऊपर उठ कर ही यह निश्चिंतता पाई जा सकती है कि जो फलां स्त्री के साथ घटित हो चुका है वह हमारी बेटी या बहन के साथ कभी घटित नहीं होगा।

इससे भी बड़ा और ज्वलंत प्रश्न यह है कि यदि पीड़ित खिलाड़ियों के साहस को समर्थन और न्याय नहीं मिला तो क्या कभी कोई और स्त्री अपने प्रति हुए यौन अपराध के विरुद्ध आवाज़ उठाने का साहस कर सकेगी? इस प्रश्न को अपना उत्तर मिलना जरूरी है क्योंकि इस उत्तर पर ही टिका है स्त्रियों के विरुद्ध होने वाले अपराधों का भावी परिदृश्य।
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Tuesday, June 6, 2023

पुस्तक समीक्षा | छायावाद का आस्वाद कराते काव्यबंद | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

प्रस्तुत है आज 06.06.2023 को  #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई  डॉ रामरतन पाण्डेय के काव्य संग्रह "एकाकी पथिक" की समीक्षा... 
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पुस्तक समीक्षा
छायावाद का आस्वाद कराते काव्यबंद
- समीक्षक डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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काव्य संग्रह - एकाकी पथिक
कवि        - डाॅ. रामरतन पाण्डेय
प्रकाशक     - (स्वयं कवि) डॉ. रामरतन पाण्डेय, 398 वेयर हाउस के आगे,गोपालगंज, सागर,  मोबाईल: 8305306882
मूल्य        - 100/-
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एकाकी पथिक की भांति,
मैं जाता था अपने पथ पर।
मधुर, मृदुल, पताका बनकर,
छाये तुम जीवन रथ पर ।।
- ये पंक्तियां हैं कवि डाॅ. रामरतन पाण्डेय की। इन पंक्तियों में छायावाद के जो स्वर फूट रहे हैं, वे मन की कोमल भावनाओं को उद्दीप्त करने में सक्षम हैं। यही तो विशेषता रही छायावादी कविताओं की।
छायावाद का नाम आते ही प्रकृति और प्रेम की कोमल भावनाओं से ओतप्रोत कविताओं का स्मरण हो जाता है। जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानंदन पंत, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’, महादेवी वर्मा जैसे रचनाकारों की कविताएं मानस में गूंजने लगती हैं। प्रकृति में मानव का चित्रण और अपनी भावनाओं बहाने जीवन के दार्शनिक पक्ष का उद्घाटन छायावादी युग के काव्य की प्रमुख विशेषता रही है। उस दौर में हिन्दी का भाषाई परिष्कार भी हुआ। यहां तक कहा जाने लगा था कि यदि अपनी हिन्दी भाषा सुधारनी है तो ‘प्रसाद साहित्य’ पढ़ना चाहिए। उन दिनों संस्कृतनिष्ठ शब्दों का बाहुल्य खड़ी बोली हिन्दी को समृद्ध कर रहा था। वैसे ‘छायावाद’ नामकरण का श्रेय मुकुटधर पाण्डेय को जाता है। मुकुटधर पाण्डेय ने ‘‘श्रीशारदा’’ पत्रिका (जबलपुर) में एक निबंध प्रकाशित किया जिसमें उन्होंने ‘‘छायावाद’’ शब्द का प्रथम बार प्रयोग किया। उन्होंने छायावादी काव्य की प्रकृति प्रेम, नारी प्रेम, मानवीकरण, सांस्कृतिक जागरण, कल्पना की प्रधानता आदि प्रमुख विशेषताएं विशेषताओं को रेखांकित किया। इसमें कोई संदेह नहीं कि छायावाद ने हिंदी में खड़ी बोली कविता को पूर्णतः प्रतिष्ठित किया। इससे हिन्दी कािव्य ब्रज के प्रभाव से भी मुक्त हुआ। इसने हिंदी को नए शब्द, प्रतीक तथा प्रतिबिंब दिए। इसीलिए छायावाद को ‘‘साहित्यिक खड़ीबोली का स्वर्णयुग’’ कहा गया।

देश पर सम्यवादी विचारों की पकड़ मजबूत होने का असर काव्य पर भी पड़ा और खुरदुरे यथार्थ की अतुकांत कविताओं ने अपनी जगह बनानी आरम्भ कर दीं। आज भी छायावादी भाव की कविताओं से अधिक अन्य शिल्प की कविताएं लिखी जा रही हैं जिनमें गीत, गीतिका, नवगीत, ग़ज़ल, सजल, दोहे, कुंडलिया, तथा बड़े पैमाने पर अतुकांत कविताएं लिखी जा रही हैं। आज काव्य विधा ने अपना शिल्पगत विस्तार कर लिया है तथा छोटे पैमाने पर हायकू, हायगा, साॅनेट जैसे विदेशी शिल्प को भी आत्मसात किया है। इन सबके बीच यथार्थ की कठोरता ने छायावादी कोमलता को कहीं पीछे धकेल दिया है। अतः उस समय सुखद अनुभूति होती है जब कोई छायावादी आस्वाद का काव्य संग्रह पठनीयता से गुज़रता है। संस्कृत में डीलिट् डाॅ. रामरतन पाण्डेय कर्म से कवि नहीं हैं किन्तु मन-मस्तिष्क से कवि हैं। उन्होंने प्रायः स्वांतःसुखाय काव्यसृजन किया है। किन्तु उनकी छः पुस्तकें भी प्रकाशित हुई हैं जिनमें से एक है काव्य संग्रह ‘‘एकाकी पथिक’’। यह छायावादी स्वर का संग्रह है। इसे पढ़ते हुए यही भान होता है मानो कोई छायावादी युगीन काव्यसंग्रह पढ़ रहे हों।

अपनी सृजनशीलता के बारे में डाॅ. रामरतन पाण्डेय ने भूमिका में लिखा है कि -‘‘लगभग चालीस, बयालीस वर्ष पूर्व जब मैं एम.ए. पीएच.डी. का छात्र था, मि. इन्द्रमोहन सिंह जी हमारे परम मित्र थे। वर्तमान में इन्द्रमोहन जी पंजाबी वि.वि. पटियाला संस्कृत विभाग के सेवानिवृत् प्रोफेसर तथा अध्यक्ष और वाल्मीकि पीठ के निदेशक पद पर कार्यरत हैं। मैं हमेशा इनसे कुछ न कुछ सीखता रहता था। एक दिन इनके छात्रावास कक्ष में एक पत्रिका हाथ लगी जो इनके कालेज समय की वार्षिक पत्रिका थी। इसमें इनकी एक कविता छपी थी, नीचे इनके प्राचार्य की टिप्पणी थी कि ‘‘लगता है जयशंकर प्रसाद का अवतरण फिर से हो चुका है।’ मैंने सरदार जी से प्रश्न किया कि तुम इतनी सुन्दर-सुन्दर कवितायें कैसे लिख लेते हो मुझे भी इसका रास्ता बताओ। सरदार जी बोले देख पंडित तू एक लापरवाह प्रवृत्ति का विद्यार्थी है कविता-अविता तेरे बस का रोग नहीं, मेरे रहते पी.एच.डी. पूरी कर और यहां से भाग ले। लेकिन मेरे बार-बार पूछने पर सरदार जी ने एक दिन कहा कि कविता लिखने के लिये मन में दर्द हो, वियोग हो, पीड़ा हो और शब्द भण्डार हो, आदि कवि वाल्मीकि के मन में क्रौंच पक्षी का दर्द ही तो आया, जरूरी नहीं कि दर्द आपका व्यक्तिगत हो । कविता आप किसी अन्य की पीड़ा को भी आत्मसात् कर लिख सकते हो अथवा कोई कल्पना से भी अच्छी कविता कर सकते हो। कल्पना शब्द मुझे गुरु मंत्र की तरह लगा।’’ 
     डाॅ. रामरतन पाण्डेय आगे लिखते हैं कि-‘‘मैं रोज दो एक आधे-अधूरे छन्द लिखता, सरदार जी को दिखाता, वे उसमें कांट-छांट करते कुछ सुझाव देते इत्यादि। इस प्रकार मैंने उनके निर्देशन में लगभग सौ पद लिख डाले।’’ कालांतर में डाॅ. पाण्डेय ने कुछ नए पद भी लिखे और फिर नए और पुराने पदों को मिला कर इस काव्य संग्रह ‘‘एकाकी पथिक’’ को आकार दिया। इस संग्रह के काव्यबंदों में प्रेम का आग्रहपूर्ण कोमल स्वरूप सुंदरता से मुखर हुआ है। अपने प्रिय के लिए व्यक्त की गई ये पंक्तियां प्रसादकालीन काव्य को पुनर्जाग्रत कर देती हैं-
साथी हो समझ तुम्हें मैं,
अपने मन में हरषाया।
जैसे उजड़े उपवन में,
एक मृदुल फूल मुस्काया।।

प्रकृति और मानव का तादात्म्य सर्वांगीण छायावादी काव्य में देखा जा सकता है। यही विशेषता डाॅ. पाण्डेय की कविताओं में प्रस्फुटित हुई है। उषा की आभा और प्रातःकालीन किरणपुंज में स्त्री के सौंदर्य के प्रतिबिम्ब को व्यक्त करती ये पंक्तियां ध्यान देने योग्य हैं -
नारी का लेकर स्वरूप,
अब किरण पुंज बिखरा है।
उषा की आभा से मंडित,
कोई रूप यहां निखरा है ।।

देह को सरिता मान कर उसकी लहरों के प्रति मन के आकर्षण को जताना, मानो शालीनता से अपनी प्रेम भावनाओं को व्यक्त करना ही तो है। वहीं, जब वास्तविक देह के स्पर्श की संभावना न हो तो काल्पना में स्पर्श और अवगाहन का मार्ग चुनना सिगमंड फ्रायड के आत्मरति सिंद्धांत के करीब जा पहुंचता है। सिगमंड फ्रायड के अनुसार, हमारे व्यक्तित्व का विकास पूरी तरह से हमारे सचेत अनुभवों पर निर्भर नहीं है, हालांकि, अधिकांश व्यक्तित्व लक्षण अचेतन के माध्यम से विकसित होते हैं। इदमः इदम हमारे मानस का आवेगी (और अचेतन) हिस्सा है जो बुनियादी आग्रहों, जरूरतों और इच्छाओं के लिए सीधे और तुरंत प्रतिक्रिया करता है।
तेरी देह सरिता में,
मेरा मन लहरें खाया।
काल्पनिक देह बनाकर,
अवगाहन सुख था पाया ।।

किन्तु डाॅ. पाण्डेय के छायावादी स्वर में फ्रायड की भांति ठहराव नहीं अपितु परिस्थितिजन्य प्रभाव और प्रवाह है। उनकी काव्य में वर्णित मनोदशा घटना के प्रभाव की द्योतक है-
मन को कुछ साहस देकर,
मैंने आवाज लगायी ।
रुककर तो तुमने देखा, पर
यह बात तुम्हें न भाय।।

डा. रामरतन पाण्डेय अपनी कविताओं में उस प्रेम का वर्णन करते हैं जो किसी पवित्र प्रकाश की भांति दीप्तिवान है, प्रकाशित है और आशा का संचार करने में सक्षम है। इसीलिए आकांक्षा की ध्वनि शब्दों में कुछ इस प्रकार ढलती है -
हे रश्मि दोगी प्रकाश,
कब जीवन की राहों में।
सारी पीड़ा विस्मृत होगी,
पाकर तुमको बाहों में ।।

इसी तारतम्य में एक और बंद   देखें-
जिस दिशि को देखा करता,
तू वही दिशा बन जाती।
हल्का सा देकर प्रकाश,
सन्ध्या लाली बन जाती ।।

वस्तुतः काव्य सर्वकालिक होता है। यदि हृदय में प्रेम का संवेग है तो कलिदास का ‘मेघदूतम’ समसामयिक प्रतीत होगा और यदि पीड़ा का अथाह सागर हृदय को आलोड़ित कर रहा है तो महादेवी वर्मा की व्यथित पंक्तियां अपनी-सी लगेंगी। डाॅ रामरतन पाण्डेय की कविताएं भी छायावादी युगीन आस्वाद लिए होने के कारण हर युग और प्रत्येक कोमल मनोदशा के अनुकूल हैं। डाॅ. पाण्डेय का काव्य संग्रह ‘‘एकाकी पथिक’’ को कोमल भावनाओं की मधुर प्रस्तुति कहा जा सकता है। छायावादी काव्य में रुचि रखने वालों के लिए यह मनोनुकूल कृति है।  
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