Tuesday, October 24, 2023

पुस्तक समीक्षा | एक स्त्री के संघर्ष पर विचारोत्तेजक उपन्यास : जयकारी | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

प्रस्तुत है आज 24.10.2023 को  #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई  श्री सुखदेव प्रसाद दुबे जी के उपन्यास "जयकारी" की समीक्षा।
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पुस्तक समीक्षा      
एक स्त्री के संघर्ष पर विचारोत्तेजक उपन्यास : जयकारी   
- समीक्षक डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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उपन्यास     - जयकारी
लेखक       - सुखदेव प्रसाद दुबे
प्रकाशक     - इन्द्रा पब्लिशिंग हाउस, ई-5/21, अरेरा काॅलोनी, भोपाल
मूल्य        - 495/-
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यदि समाज के कतिपय कुछ विचारों एवं पुरातनपंथी सोच पर दृष्टिपात करें तो ऐसा लगता है मानो हम अभी 21वीं सदी में नहीं वरन 16-17वीं शताब्दी में जी रहे हैं। आज यह साबित हो चुका है कि स्त्रियां पुरुषों से किसी भी अर्थ में कमतर नहीं हैं, फिर भी स्त्रियों की अवहेलना किया जाना एवं कन्या-जन्म पर शोक मनाया जाना दुर्भाग्यपूर्ण है। एक अदद पुत्र की प्राप्ति की इच्छा में कई बेटियों को पैदा करना और फिर उन्हें ही कोसना कि उनकी जगह पुत्र पैदा क्यों नहीं हुआ, विचित्र है, हास्यास्पद है और दुखद भी। आज विज्ञान यह सिद्ध कर चुका है कि गर्भ में बालक होगा या बालिका, यह केवल मां पर निर्भर नहीं होता है। फिर भी मां को ही जिम्मेदार ठहराया जाता है। दो-तीन दशक पूर्व तक ऐसे अनेक मामले प्रकाश में आते थे जिनमें पुत्र की चाह में लगभग हर दो साल में एक शिशु को जन्म दिया जाता था। यह सिलसिला तभी थमता था जब पुत्र की प्राप्ति हो जाती थी। यानी उतने वर्षोंं में आधा समय स्त्री को गर्भवती जीवन व्यतीत करना पड़ता था, गोया पुत्र पैदा न करने की उसके लिए मुकर्रर सज़ा थी यह। लेखक सुखदेव प्रसाद दुबे का उपन्यास ‘‘जयकारी’’ ऐसी ही एक स्त्री की जीवनगाथा है जिसका जन्म लेते ही स्वागत नहीं किया गया, वरन उसे कोसा गया।
नारायण बाबू चार संतानों के पिता बन चुके थे। चारो लड़कियां थीं। अब तो हर हाल में उन्हें पांचवी संतान के रूप में पुत्र ही चाहिए था। यहां तक कि उन्होंने दूसरी स्त्री से संतान पाने का मन भी बना लिया था। नारायण बाबू की पत्नी लक्ष्मी जानती थी कि उसके हाथ में कुछ नहीं है, फिर भी एक परंपरागत पत्नी की भांति हर हाल में अपने पति को एक पुत्र का पिता बनाना चाहती थी। एक बड़े बाबू जिनकी नारायण और लक्ष्मी पर विशेष कृपा थी, वे भी उनसे सहानुभूति रखते थे। बड़े बाबू लक्ष्मी को पुत्रप्राप्ति के उपचार के लिए कोलकाता ले जाते हैं और इधर नारायण एक अन्य स्त्री से पुत्र प्राप्ति का प्रयास करता है। परिणामतः लक्ष्मी एक बार फिर कन्या को जन्म देती है और वह दूसरी स्त्री बालक को। वह दूसरी स्त्री नारायण की विधिवत विवाहिता नहीं थी अतः उसका पुत्र नारायण की वैध संतान नहीं रहता है, फिर भी नारायण का सबसे अधिक लाड़ला रहता है। वहीं, लक्ष्मी की कन्या जो ‘‘अमेच्योर डिलीवरी’’ के कारण सात माह में ही जन्म ले लेती है, कमजोर पैदा होती है। डाॅक्टर कहती है कि इसकी जाने बचाने के लिए इसे अस्पताल ले जाना जरूरी है तो नारायण कोसते हुए कहता है कि यह पैदा ही क्यों हुई? इसे मर जाने दो। वहीं, लक्ष्मी भी एक मां हो कर उसकी ओर देखने से भी मना कर देती है। मगर उस कन्या को जीना था और वह जी गई। उसकी सांवली रंगत पर उसे ‘‘कारी’’ नाम से पुकारा जाने लगा। गोया उसे हर समय अहसास कराया जाना जरूरी हो कि वह काली है, बदसूरत है, अनचाही है।      
      विगत कुछ अरसे पहले मैंने इससे मिलतेजुलते विषय पर एक कहानी और एक उपन्यास पढ़ा था। कहानी थी आराधना खरे की ‘‘भूल’’, जिसमें उन्होंने एक ऐसी स्त्री के बारे में लिखा था जो अपने पति को संतान प्राप्ति के लिए दूसरा विवाह करने की लिखित सहमति दे देती है जिसके लिए उसका पति उसे टोंकता भी है। वही पति संतान पाने के बाद अपनी दूसरी पत्नी और संतान में ऐसा रम जाता है कि अपनी पहली पत्नी के त्याग और अस्तित्व को ही अनदेखा करने लगता है। तब उस पहली पत्नी रूपी स्त्री को अपनी भूल का अहसास होता है। इससे कुछ वर्ष पूर्व पढ़ा था लेखक आर. के. तिवारी का उपन्यास ‘‘करमजली’’। एक ऐसी लड़की की कथा जिसका जन्म अवांछित माना गया और उसे करमजली यानी दुर्भाग्यशालिनी कहा गया। यहां तक कि उसका नाम ही ‘‘करमजली’’ रख दिया गया। अपशब्द समान अपने इसी नाम के साथ वह अपने जीवन के तमाम संघर्षों का सामना करती है और अपनी क्षमताएं साबित करती है।
कन्याओं के साथ इस प्रकार का दोहरा व्यवहार आज की 21 वीं कम्प्यूराईज़्ड सदी में होना समाज की दोहरेपन वाली सोच को उजागर करता है। आज भी लोग इंटरनेट पर ‘‘पुत्र कैसे प्राप्त करें’’ या ‘‘पुत्र पैदा करने के उपाय’’ सर्च करते मिलते हैं। देखा जाए तो यह वैज्ञानिक प्रगति का भी माखौल है। लेखक सुखदेव प्रसाद दुबे ने अपने उपन्यास ‘‘जयकारी’’ में नायिका कारी का वह संघर्ष लिखा है जो उसके जन्म से ही आरम्भ हो जाता है। इस बात का सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि जिस बालिका के जन्म लेते ही उसकी मृत्यु की कामना की गई हो, उस समयपूर्व जन्मी कमजोर बालिका को क्या कभी भरपेट पोषण दिया गया होगा? प्रायः ऐसे परिवारों में जहां एक पुत्र और अनेक पुत्रियां होती हैं, वे पुत्रियां अघोषित रूप में अपने भाई रूपी पुत्र की सेविकाएं होती हैं। पुत्रियों पर उतना ध्यान नहीं दिया जाता है जितना कि पुत्र के लालन-पालन पर। कारी का जीवन भी अपढ़ और उपेक्षित ही रह जाता किन्तु उसके जैविक पिता बड़े बाबू ने उसके लालन-पालन पर ध्यान दिया और उसे शिक्षित होने का अवसर दिया। किन्तु इससे भी परे कारी और उसके भाई को एक मनोवैज्ञानिक जटिलता का सामना करना पड़ता है। किसी पुत्र और पुत्री के लिए यह जानना कि जिसे वे अपना पिता समझते हैं वह उनका जैविक पिता नहीं है, आहत करेगा ही। पुत्री के लिए यह जानना और अधिक कष्टदायक होगा कि जब उसे पता चले कि उसकी मां को कथित ‘‘नियोग’’ परंपरा का वास्ता दे कर बलात्कार का शिकार बनाया गया था और परिणामस्वरूप उसका जन्म हुआ था। जीवन यदि सामान्य परिस्थितियों से तनिक भी हट कर हो तो संघर्ष बढ़ जाते हैं। सामाजिक एवं पारिवारिक संघर्ष के साथ मानसिक संघर्ष सबसे अधिक प्रभावित करता है। यह मानसिक संघर्ष कई बार गलत निर्णयों की ओर ले जाता है। अनेक भ्रम खड़े करता है। समाज में शक्ति और सम्मान पाने की अदम्य लालसा जगाता है। कारी के साथ भी ऐसा ही हुआ।
कारी उच्चशिक्षा प्राप्त कर के काॅलेज में प्राध्यापिका बन गई किन्तु अपने अस्तित्व का प्रश्न उसे बार-बार भ्रमित करता रहा। काॅलेज का विचित्र वातावरण, यौनसंबंधों को ले कर एक छात्रा के प्रश्न, एक अध्यापिका की संदेहास्पद जीवनशैली आदि ऐसा बहुत कुछ था जो कारी को भ्रमित करता है। वह काली मां की भांति सबल बनना चाहती है। उसकी यही अभिलाषा उसे एक ऐसे स्वामीजी के पास ले जाती है जो तंत्रविद्या के नाम पर स्त्रियों का दैहिक शोषण करते हैं। समय रहते कारी को इस बात का भान हो जाता है और स्वामीजी के प्रति उसका मोहभंग हो जाता है। यद्यपि यहां यह तनिक विचित्र लगता है कि कारी जैसी एक विवेकशील स्त्री तंत्र-अनुष्ठान का नग्ननृत्य तक करती है। उसकी चेतना जागती है सार्वजनिक अर्थात् भक्तों के सम्मुख स्वामीजी से संभोग के प्रश्न पर। खैर, जिन विचित्र स्थितियों में कारी पली-बढ़ी थी वहां उसे उपेक्षा ही मिली थी और मांकाली जैसी शक्ति सम्पन्न बनने की जिजिविषा कारी को उस छोर तक ले जाती है।
      उपन्यास में ऐसे कई प्रसंग हैं जो नायिका कारी के लिए चुनौती भरे हैं। वह विचित्र परिस्थितियों में फंसती है, फिर उबरती है किन्तु एक स्त्री के रूप में सर्वशक्तिशाली बनने के अपने सपने को नहीं छोड़ पाती है। ‘शक्तिशाली बनने’ और ‘सर्वशक्तिशाली बनने’ में बहुत अंतर होता है। शक्तिशाली बनने का प्रयास व्यक्ति को कहीं न कहीं विवेकी बनाए रखता है किन्तु सर्वशक्तिशाली बनने का प्रयास उचित और अनुचित की बारीक लकीर को देखने की क्षमता छीन लेता है। कई बार अपने ही विचार, अपनी ही इच्छाएं व्यक्ति के आस-पास ऐसा मायाजाल रच देती हैं कि व्यक्ति दैवीय एवं चमत्कारी स्वरूप को सच मानने लगता है। वस्तुतः यह एक मनोवैज्ञानिक डिस्आॅर्डर है जिसे लेखक ने कारी के चरित्र और विचारों के रूप में बखूबी सामने रखा है। कथानक के अंतिम सोपान में भी ऐसा ही एक चमत्कार घटित होता है जो वैज्ञानिक दृष्टि से तो संभव नहीं है किन्तु चमत्कार के रूप में ही स्वीकार किया जा सकता है। यही चमत्कार एक संघर्षशील स्त्री कारी को ‘‘जयकारी’’ बना देता है और समाज उसके जयकारे लगाने लगता है।
मध्यप्रदेश के सोहागपुर में सन 1938 में जन्मे लेखक सुखदेव प्रसाद दुबे का यह तीसरा उपन्यास है। सन 1961 में जबलपुर से भौतिक विज्ञान में स्नातकोत्तर होने के बाद दो वर्ष देवास महाविद्यालय में प्राध्यापक के रूप में अध्यापन किया। फिर प्रशासनिक सेवा में क्रमशः कलेक्टर, कमिश्नर, प्रबंध संचालक एवं सचिव का कार्य किया। तीन मुख्य मंत्रियों के सचिव भी रहे। सन 1996 में सेवानिवृत्ति के बाद, म.प्र. प्रशासनिक अधिकरण में जज के रूप में चार वर्षों तक न्यायिक कार्य किया। एक वर्ष यूनिसेफ के साथ बाल अधिकारों के लिए काम किया। लगभग चालीस वर्षों तक सेवा करते हुए लगभग पूरा प्रदेश-देश घूमा और जाना। विदेशों में जापान, इंग्लैंड, फ्रांस, फिलिपिन्स एवं अमेरिका गए। शहरी तथा ग्रामीण सभी क्षेत्रों के जन-जीवन से परिचित हुए, समस्याएं जानी और समाधान भी दिए। शिक्षा, संस्कृति, समाज कल्याण, बाल एवं महिला विकास के क्षेत्रों में विशेष रूचि ली और विशेष कार्य भी किए। अपने दीर्घ जीवनानुभवों के आधार पर जो भी लिखा वह अब तक तीन काव्य संग्रह एवं तीन उपन्यास के रूप में प्रकाशित हो चुका है।
कुल 321 पृष्ठों के उपन्यास ‘‘जयकारी’’ में अनेक घटनाक्रम, अनेक उपकथानक एवं अनेक पात्र समेटे हुए है किन्तु सम्पूर्ण कथानक नायिका कारी के इर्दगिर्द ही घूमता है। किन्तु स्त्री जीवन की विडंबना को पूरी गंभीरता से सामने रखा गया है। कारी की मां लक्ष्मी भले ही परंपरावादी पत्नी थी और अपने पति को एक पुत्र देने की उसकी उत्कट अभिलाषा थी किन्तु प्राचीन समय पर किए जाने वाले ‘‘नियोग’’ अर्थात् परपुरुष से संतान पैदा करने की मान्यता प्राप्त प्रथा को वह अपने साथ किया गया बलात्कार ही मानती है- ‘‘लक्ष्मी अपनी उम्र, अपनी उम्मीदों अपनी लालसा, अपने भविष्य के गड़भगड़ विचारों से लड़ती अपनी देह की पूरी ताकत लगाकर अपने को उस अनपेक्षित अचानक आक्रमण से रोकती रही लेकिन फिर थककर बिस्तर पर लुढ़क गई थी और वासना प्रचालित बड़े बाबू के पशुबल का शिकार हो गई।’’
यहां लेखक ने यह बात स्पष्ट कर दी है कि स्त्री सबसे अधिक शिकार होती है समाज की बनाई कुरीतियों की। यदि लक्ष्मी अपनी पुत्री कारी के जन्म पर उसे कोसती है तो वह भी पितृसत्तात्मक समाज के दबाव में आ कर। उसे पता है कि यदि वह पुत्र नहीं दे सकेगी तो उसका पति दूसरा विवाह कर लेगा। जबकि समाज में ऐसा उदाहरण नहीं मिलता है कि संतान न होने अथवा पुत्र न होने पर किसी स्त्री को दूसरा विवाह करने की अनुमति दी गई हो। चाहे ‘बांझ’ कहलाए अथवा ‘निपूती’, सारे दोष स्त्री को ही झेलने पड़ते हैं। लेखक ने उपन्यास में अनेक स्थानों पर विचारोत्तेजक प्रश्न उठाए हैं। जैसे एक स्थान पर वे पौराणिक उदाहरण गिनाते हुए लिखते हैं-‘‘बनाने वाले ने जाने क्या सोचकर स्त्री को बनाया है कि एक भी स्त्री पुरुष के प्रेम छल से नहीं बच पाती। न मन्दोदरी, न तारा, न कुन्ती, न गांधारी, न रानियां, महारानियां, न देवियां, न अप्सराएं, न गरीब साधारण कन्याएं। पुरुष एक तरफ स्त्री को पवित्रता, यौनी शुचिता तथा सतीत्व की अग्निपरीक्षाओं में झोंकता आ रहा है तो दूसरी तरफ उन्हीं को अपने स्वार्थों के लिए, पराए पुरुषों के पौरुष का शिकार भी बनाते आ रहा हैं। अहिल्या, तो दोनों तरफ से मारी गई थी, इन्द्र ने बलात्कार करके, पति ने श्राप देकर। स्त्री को अकेली देखकर आसमान भी उस पर टूट पड़ता है। पुरुष कितने ही खोटे क्यों न हों, आज तक किसी ने पुरुषों की अग्निपरीक्षा नहीं ली।’’
      उपन्यास ‘‘जयकारी’’ में रोचकता है, वैचारिक तीक्ष्णता है, सरल-सहज भाषा है, देशकाल एवं वातावरण का प्रभावी प्रस्तुतिकरण है। यद्यपि कुछेक प्रसंग अव्यवहारिक एवं अवैज्ञानिक प्रतीत होते हैं किन्तु कथानक के साथ वे रचे-बसे हैं अतः विशेष बाधा नहीं पहुंचाते हैं। बस, इसका दीर्घकाय होना वर्तमान व्यस्तता भरे जीवन में अधिक समय की मांग करता है जो कि पाठक कठिनाई से जुटा पाता है। बहरहाल, यह स्त्रीविमर्श रचता पठनीय और विचारोत्तेजक उपन्यास है।  
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विजयादशमी की हार्दिक शुभकामनाएं 🙏 - डॉ (सुश्री) शरद सिंह

🚩प्रिय मित्रो, विजयादशमी की हार्दिक शुभकामनाएं  🙏🚩

धृतिःक्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः। 
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो,दशकं धर्मलक्षणम्॥
(मनुस्‍मृति 6/92)
(- जिस काम के करने से अभ्युदय और सर्वकल्याण की सिद्धि हो वही धर्म है। )

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Sunday, October 22, 2023

Article | It's Time To Adopt Minimalist Lifestyle For Healthy Climate | Dr (Ms) Sharad Singh | Central Chronicle

Article
It's Time To Adopt Minimalist Lifestyle For Healthy Climate

       -    Dr (Ms) Sharad Singh
Writer, Author & Social Activist
Blogger - "Climate Diary Of Dr (Ms) Sharad Singh"

        What is a minimalist environment? It's a simple question, but has deep meaning. This means making life climate friendly. This means that we should minimize the use of those things which are continuously harming the climate. If we think of an even shorter answer, we can say that we should make our carbon footprint as small as possible. Let us understand this in detail because it is the biggest need today.
           What is a minimalist environment? Why necessary minimalist lifestyle? These two questions are related to each other. But, firstly we need to know what minimalism in lifestyle is?
So first we have to understand what carbon footprint is and what are its disadvantages? After this, the need to adopt a minimalist lifestyle will automatically be understood. The amount of greenhouse gasses emitted per person or per industrial unit is called the carbon footprint of that person or industrial unit. Carbon footprint is measured in grams of carbon dioxide emissions. According to scientists, almost all the habits of humans, from eating habits to the clothes they wear, cause their carbon footprint. A big reason is the electricity used in the house. We can't even imagine how far-reaching our normally invisible carbon footprint impacts? Can you imagine that the carbon emitted from the ACs and other high voltage electrical appliances used in our homes produces so much heat in the atmosphere that it becomes a reason for increasing the temperature of the earth. Due to the increase in the earth's temperature, glaciers are melting rapidly and the seasons are becoming irregular. Due to which vegetation and water level are also being affected. In fact, every element of the earth is related to each other. If one element is unbalanced then it has a negative effect on all the elements. According to studies, it is concluded that hydro-electric, wind-electric and nuclear power always emit less CO2 per kilowatt-hour than other conventional fuels. Indeed, some new renewable energy source methods, such as wind power, produce no carbon emissions at all during operation. Yes, we definitely leave some carbon footprint during construction.
 Today families have become decentralized. Small family, small unit. Husband, wife and children. Sometimes the parents of the husband or wife also live together, but very rarely. Parents are left behind in small towns or villages and children settle in metropolitan cities with their families. Sometimes they settle abroad. In such a situation, those big houses which have many rooms suitable for a big family have no importance. Many times, big houses are built just for show so that one can have a high status in the society. Whereas such big houses leave a big carbon footprint and harm the climate. This can be understood in a more simple way that if there are many rooms in the house, then that many lights will be lit, that many fans will run and that many rooms will keep the land buried, which if it had been open, would have given an opportunity for trees and plants to grow on it. Humans can reduce their carbon footprint by reducing electricity use at home through the use of fluorescent bulbs. Washing the utensils by hand and drying them by keeping them in an open environment will also be beneficial. Glass, metals, plastics and paper should be reused more than once. The speed of the refrigerator should be kept slow. Light colored paint on the walls of the house also helps in this.
Can minimalism help climate change? Yes! Minimalism has a lot of potential benefits for the environment. By reducing consumption, you're helping to preserve resources, combat climate change, lower your carbon footprint, and reduce noise pollution. The question is how does a minimalist lifestyle help the environment? As you choose to live in a smaller house, you will consume a small fraction of energy on things such as heating, lighting, etc. This is useful in reducing CO2 emissions and preventing air pollution. As a wide array of people are now adopting this lifestyle, it has turned out to be more eco-friendly than ever.
How can I be eco-friendly and minimalist? So, the answer is 'Yes!', by adopting simple few things as Adopt a small house to live as per your requirement. Reduce food waste by planning meals and eating leftovers. Make leftover food and other biodegradable waste useful to nature by composting it. In a minimalist lifestyle, using solar energy for the electricity needs of your home will also be a big step. Most of our electricity and heat is powered by coal, oil and gas. We reduce energy use by reducing heating and cooling use, switching to LED light bulbs and energy-efficient electrical appliances, washing your laundry in cold water, or hanging things to dry instead of using the dryer can do. According to a study entitled ‘Environmental Impact Assessment of Household Consumption’, what people consume is responsible for up to 60% of global greenhouse gas emissions. Not only that, production of items imported from other countries to be consumed has also increased steadily, which only adds to carbon emissions. It follows, then, that consuming less stuff will directly result in a smaller carbon footprint. Living minimally encourages a more conscious buying culture, which has a focus on quality, rather than quantity. Instead of buying four or five cheap jumpers throughout the winter months – only to bin them at the end of the season – minimalist thinking would encourage the purchase of just one or two good quality jumpers that can be worn for many winters to come. It’s the opposite of impulse buying. Today marketism keeps promoting impulse shopping without thinking about its side effects on environment.
So, in our everyday life, a minimalist environment means that we have just as many objects, food, or services as we need. A minimalist lifestyle is intentionally living with fewer possessions – focusing only on the things you need. If we are feeling overwhelmed by clutter, if we want fewer distractions, or if we want to cut back on spending, living with less may be the right choice. That is, it is clear that if we want to slow down the pace of climate change, we will have to adopt minimalist lifestyle for healthy climate and this is the right time to adopt minimalist lifestyle.
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Thank you Central Chronicle 🙏
 (22.10.2023)
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Saturday, October 21, 2023

टॉपिक एक्सपर्ट | पत्रिका | जे घचापेल कबै मिटहे? | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

आज "पत्रिका" में "टॉपिक एक्सपर्ट" में...
Thank you #patrika 🙏
Thank you Dear Reshu Jain 🙏
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टाॅपिक एक्सपर्ट
जे घचापेल कबै मिटहे?
     - डॉ (सुश्री) शरद सिंह
      अपने इते का आए के जित्तो कओ जात है, उत्तो करो नईं जात। अब आप ओरें कैहो के अब सो आचार संहिता लग गई, सो अबे कछू नईं हो सकत। चुनाव पूरो होने लों गम्म खाओ। आपको कैबो अपनी जांगा ठीक आए, मनो इते तो गम्म खात-खात गमगीन भए जा रए। बात मूंड़ पे हाथ दे के सोचबे की आए। का होत है के, जो कोनऊं त्योहार आऊत आए सो बाजार जाबे के नांव पे फुरूरी-सी होन लगत आए। अब जे ना सोचो के नओ का भओ? जोन जो हम कै रए जो नओ नोईं। मुतकी सालें हो गईं, जे झेलत-झेलत, पर जे समस्या आज लों ऊंसई की ऊंसई ठाड़ी।
     जे अपने इते को ट्रेफिक मट्ठर समस्या आए। अब तो जे दसा हो आई है के ईपे कछू कैबे, लिखबे में शरम सी आऊत आए। एक तो ऊंसई रोडन-सी रोड नईं दिखात। चाए कटरा देख लेओ, चाए नमकमंडी, चाए गुजराती बाजार वारी रोड औ चाए विजय टॉकीज वारी रोड। औ बड़ा बाजार वारी रोड की सो कछू ने पूछो। भारी घचापेल मची रैत आए। आधी रोडों पे सो गाड़ियां ठाड़ी रैती आएं, बची आधी, सो ऊपे बा बैलवां औ सांड़ हरें टहलत रैत आएं। मनो मजे की बात तो जे कहानी के कटरा वारी रोड के तीनबत्ती वारे छोर पे तीन-चार ट्रेफिक वारे ड्यूटी देत रैत आएं औ रोड के दूसरी छोर पे ट्रेफिक वारन की चौकी ठाड़ी। औ बीच में ट्रेफिक इत्तो के मनो कुंभ के मेला में घूम रए होंए। रोडें चौड़ी ठैरीं, मनो लगत हैं कुलिया-सीं। अबे पार्किंगलाट बनबे में कुल्ल टेम लगहे, का जबलों ऐसई घचापेल मची रैहे? जे कैसी स्मार्टनेस आए ?
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Friday, October 20, 2023

शून्यकाल | सागर की प्रथम मनोनीत महिला सांसद | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

"दैनिक नयादौर" में मेरा कॉलम ...
शून्यकाल
सागर संभाग की प्रथम मनोनीत महिला सांसद           
- डाॅ (सुश्री) शरद सिंह                                                                                  
         सागर संभाग इस बात पर गर्व कर सकता है कि यहां स्वतंत्रता प्राप्ति से पहले और स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद, आरम्भिक दशकों में महिला नेतृत्व प्रखरता छाया रहा। मतदान द्वारा निर्वाचित सागर की प्रथम महिला सांसद श्रीमती सहोदरा बाई राय थीं तो उनके भी पूर्व सागर की प्रथम मनोनीत सांसद बनी थीं श्रीमती कलावती दीक्षित। वर्तमान में सक्रिय राजनीति में महिला नेतृत्व को जिस तरह हाशिए पर पहुंचाया जा रहा है, वह अतीत के गौरव को देखते हुए चौंकाता है। तो चलिए उस इतिहास की ओर चलते हैं जहां सांसद कलावती दीक्षित का नाम सुनहरे अक्षरों में दर्ज़ है।
इतिहास के जिन प्रसंगों को बार-बार याद नहीं किया जाता है वे धुंधले पड़ने लगते हैं। अतः अतीत के महत्वपूर्ण प्रसंगों पर चर्चा होती रहनी चाहिए। सागर में आज जो दशा राजनीति में महिला नेतृत्व की उपेक्षा की है उसे देखते हुए यह और अधिक आवश्यक हो जाता है कि हम पलट कर देखें कि सागर जिले के अतीत में महिलाओं के नेतृत्व पर न केवल भरोसा किया गया अपितु उन्हें सांसद के रूप में मनोनीत एवं निर्वाचित किया गया। इस बात को एक सबक के रूप में याद रखा जाना चाहिए। 
आरम्भ में ही बता दूं कि श्रीमती कलावती दीक्षित जी के संबंध में यहां मैं जो जानकारी दे रही हूं वह उनके पुत्र डाॅ. विनोद दीक्षित से प्राप्त जानकारी के आधार पर है। वस्तुतः जब मैंने सांसद सहोदरा राय के संबंध में कुछ बातें तस्दीक करने के लिए वरिष्ठ साहित्यकार एवं सागर नगर के गहन जानकार प्रो. सुरेश आचार्य जी से संपर्क किया तो उन्होंने मुझे कलावती दीक्षित जी के बारे में जानकारी दी, साथ ही उन्होंने मुझे सलाह दी कि मैं उनके पुत्र डाॅ. विनोद दीक्षित जो डाॅ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय में प्रोफेसर रह चुके हैं, उनसे इस संबंध में चर्चा करूं। मिलनसार स्वभाव के डाॅ. विनोद दीक्षित जी से मेरी फोन पर वार्ता हुई। उन्होंने वाचिक रूप में बहुत-सी जानकारियां दीं। तदोपरांत उन्होंने लिखित में भी मुझे जानकारी व्हाट्सअप की। डाॅ. दीक्षित के इस सहयोग के लिए मैं उनकी आभारी हूं।  
श्रीमति कलावती दीक्षित का जन्म कानपुर (उप्र) जिले के ग्राम पाल्हेपुर के एक पारंपरिक ब्राह्मण परिवार में 27 मई 1920 को हुआ था। अपने पिता शिवदत्त त्रिवेदी की छः संतानों में वे सबसे बड़ी थीं। पिता कानपुर के एक व्यवसायिक प्रतिष्ठान में कार्य करते थे। उन्होंने गांव की खेती एवं पारंपरिक पडिताई को अपने बड़े भाई को सौंप कर कानपुर की राह पकड़ी थी ताकि वहां रहकर बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलाई जा सके। कलावती दीक्षित की प्रारंभिक शिक्षा कानपुर के आर्य कन्या महाविद्यालय में हुई जहां से 10वीं की परीक्षा उत्तीर्ण की। किन्तु उन दिनों के चलन के अनुरुप छोटी आयु में ही उनका विवाह सागर निवासी चन्द्रशेखर दीक्षित के साथ कर दिया गया। चन्द्रशेखर दीक्षित उस समय होम्योपेथिक चिकित्सा में आध्ययनरत थे। 
यद्यपि ससुराल में पति एवं अन्य पुरुष सदस्य शिक्षित थे किंतु महिलाओं की शिक्षा की ओर ध्यान नहीं दिया जाता था। श्रीमती दीक्षित की अध्यययन में रुचि थी एवं उच्च शिक्षा के लिये गहरा आकर्षण। यह अच्छा था कि उनके पति डाॅ. चन्द्रशेखर दीक्षित आधुनिक विचारधारा के थे, अतः उनका प्रोत्साहन, समर्थन एवं सहयोग श्रीमती दीक्षित को मिला। आरंभ में घर पर पढ़ाई कर उन्होंने छुपकर मायके से परीक्षाएं दीं, पर कालांतर में उनकी लगन देखकर ससुराल में उनकी पढ़ाई के लिये विरोध समाप्त हो गया। इसके बाद उन्होंने आगरा विश्वविद्यालय से बी.ए. किया। फिर विदुषी (आनर्स), साहित्य रत्न रवं आयुर्वेद रत्न की उपाधियां अर्जित कीं। ‘आयुर्वेद रत्न’ की उपाधि के पश्चात के पति के साथ ही चिकित्सा कार्य करने लगीं। अल्पकाल के लिए उन्होंने झांसी में आयुर्वेदिक महाविद्यालय के प्राचार्य का पद भी संभाला। 
पति की समसामयिक राजनीति में रुचि, विचारों एवं प्रोत्साहन ने कलावती दीक्षित की सामाजिक विषयों में जागरूकता बढ़ाई। कुछ करने की तड़प ने उन्हें स्वतंत्रता आंदोलन की ओर आकर्षित किया और कांग्रेस की गतिविधियों में सक्रिय किया। सन 1940 से कलावती दीक्षित ने कांग्रेस की कार्यकर्ता के रूप में सक्रिय भूमिका निभानी शुरू की। इस कार्य के लिये उन्होंने रामायण मंडलियों के रूप में महिलाओं का संगठन तैयार करना, आंदोलन में जागरूकता लाने के लिए भाषण देना, चर्चा करना एवं वातावरण बनाना शुरू किया। सन 1942 के महात्मा गांधी के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में उनकी सक्रियता ने उन्हें एक कर्मठ कार्यकर्ता की पहचान दिलाई। महिलाओं एवं बच्चों को एकत्र कर जुलूस निकालना, धरना एवं नुक्कड़ सभाओं में भाषण देना उनके कार्य थे। उन्होंने लगभग 600 महिलाओं का जुलूस निकाल कर गिरफ्तारी दी। गिरफ्तारी के बाद पुलिस प्रशासन ने उन पर केस नहीं चलाया, किन्तु नगर से कई मील दूर छोड़ कर परेशान किया। 1942 का आंदोलन उग्र हुआ तो कलावती दीक्षित की गिरफ्तारी का वारंट निकला। तब वरिष्ठ नेताओं ने उन्हें निर्देशित किया कि वे गिरफ्तारी से बचें एवं भूमिगत गुप्त कार्यकर्ता के रूप में अपनी गतिविधियां जारी रखें। 
उन्हें आंदोलन के प्रचार-प्रसार के लिये बुलेटिन के प्रकाशन, प्रिंटिंग एवं वितरण का कार्य सौंपा गया। पुलिस की आंख बचाकर नए-नए ठिकानों पर बुलेटिन छापने की मशीन ले जाती थीं जिससे कि पुलिस मशीन एवं प्रचार सामग्री कभी जब्त नहीं कर सकी। बुलेटिन के प्रकाशन और वितरण की जबाबदारी के कठिन और चुनौती पूर्ण कार्य को उन्होंने बड़े साहस और सुगमता से किया। वे अपनी साथी महिलाओं के सहयोग से बुलेटिन को निरंतर ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों में पहुंचाती रहीं। बुलेटिन के मुद्रण प्रकाशन एवं वितरण का यह कार्य लगभग 8 महीने तक जारी रहा। आंदोलन के दौरान बंदी स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के परिवारों तक यथायोग्य सहायता पहुंचाना, उनका मनोबल बनाये रखना तथा चिकित्सकीय एवं उपचार की व्यवस्था एवं सेवा में भी कलावती दीक्षित ने तत्परता से सहयोग किया। सन 1942 के बाद भी वे आंदोलन एवं कांग्रेस के कार्यकलापों में सक्रिय रहीं। जिले की तत्कालीन महिला नेत्री श्रीमती  यमुना ठाकुर के साथ महिलाओं के दल का संचालन एवं धरना-प्रदर्शन का कार्य करती रहीं। इसके लिये उन्हें कई बार गिरफ्तार किया गया। 
स्वतंत्रता आंदोलन में उनकी कर्मठता, सक्रियता एवं उल्लेखनीय गतिशीलता में कांग्रेस में उनकी पहचान बनायी। फलस्वरूप देश की स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद प्रांतीय कांग्रेस कमेटी ने डाॅ हरीसींह गौर के निधन के से  रिक्त हुए पद पर मनोनीत संसद सदस्य हेतु उनका नाम प्रस्तावित किया। प्रोवीजनल पार्लियामेंट की शेष अवधि में 1950 से 1952 के लिए मनोनयन के आधार पर वे सांसद मनोनीत हुईं। इस प्रकार उन्हें सागर की प्रथम मनोनीत महिला संसद सदस्य बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। 
कलावती दीक्षित आल इंडिया वुमेन कांफ्रेस की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की वे सदास्य रहीं। वे नारी शिक्षा  एवं सम्मान के लिये समर्पित थीं। स्थानीय बीड़ी मजदूरों को संगठित कर इंटक की वरिष्ठ नेत्री रहीं तथा प्रांतीय एवं राष्ट्रीय समितियों की सदस्य रहीं। उन्होंने स्थानीय बीड़ी मजदूरों के शोषण के विरुद्ध कई आंदोलन चलाए। मजदूरी की दर को निर्धारित करने के लिए बनाई गई समिति की वे सदस्य थीं तथा उनकी सदस्यता वाली समिति की रिपोर्ट पर बीड़ी मजदूरी की दरें निर्धारित की गई थी।
श्रीमती दीक्षित सागर जनपद की सदस्य भी रहीं। सागर के नगर निगम में वे दो बार सन 1967 एवं 1983 में एल्डरमैन बनीं।  नगरनिगम की शिक्षा एवं स्वास्थ्य समिति के अध्यक्ष का दायित्व भी उन्होंने निभाया। समाज सेवा की विभिन्न गतिविधियों में वे सदैव सक्रिय रहती थीं। यद्यपि उनकी जीवनयात्रा सतत संघर्षशील रही। 1961 में जब वे 40 वर्ष की थीं, तभी उनके पति का निधन हो गया था। ऐसे कठिन समय में उन्होंने मजबूती से अपने परिवार को सम्हाला। 15 जून 1999 को 71 वर्ष की आयु में उनका देहावसान हुआ। निश्चित रूप से वे सागर की राजनीति का दैदिप्यमान नक्षत्र थीं।                            
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Thursday, October 19, 2023

बतकाव बिन्ना की | चुनाव मने परीक्षा के टेम पे बंजरंगबली याद आऊत आएं | डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम | बुंदेली व्यंग्य | प्रवीण प्रभात

"चुनाव मने परीक्षा के टेम पे बंजरंगबली याद आऊत आएं" - मित्रो, ये है मेरा बुंदेली कॉलम "बतकाव बिन्ना की" साप्ताहिक #प्रवीणप्रभात , छतरपुर में।
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बतकाव बिन्ना की      
चुनाव मने परीक्षा के टेम पे बंजरंगबली याद आऊत आएं
 - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
            आजकाल भैयाजी औ भौजी दोई जने बिजी चल रए। काय से के चुनाव को टेम आए। आचार संहिता सोई लग चुकी आए। सो, अब तो घरे जा-जा के संपर्क करने पड़ रओ सबई पार्टी वारन खों। अब चुनाव के लाने टेम कम्म बचो आए, औ जोन को एरिया बड़ो ठैरो उनको ज्यादा मानुस की जरूरत पड़ रई। सो, अबई एक दिनां भैयाजी ने सोची के जेई टेम आए के कछू टेम पास कर लओ जाए औ कछू ब्योहार कमा लओ जाए। सो, उन्ने एक पार्टी वारन के लाने प्रचार करबे औ घरे-घरे जा के मिलबे को ठेका ले लओ। बे अपने संगे भौजी खों सोई लेवा जा रए हते। मनो भौजी ठैरीं औ सयानी। उन्ने कई के ‘‘हमें तुमाए संगे नई जाने।’’
‘‘काय? हमाए संगे जाबे से का हो जैहे?’’ भैयाजी ने तनक तिनकत भए पूछी हती।
‘‘होने खों तो कछू ने हुइए, मनो तनक अकल से काम लेओ करो!’’ भौजी सोई बोल परी हतीं।
‘‘काय? का हम अकल से काम नईं लेत का? तुम कैबो का चा रईं, के हम पे अकल नोईं?’’ भैयाजी खों भौजी की बात तनक बुरई लगी।
‘‘अकल तो तुम पे खूब आए, बाकी जे नई सोच रए के सगे भैया आमने-सामने ठाड़े होबे की कर रए, सगी बहुएं एक-दूसरे के खिलाफ लड़बे जा रईं, औ कऊं-कऊं तो बाप औ बेटा आमने-सामने रमतूला बजा रए, सो अपन ओरें काय खों एकई पार्टी के संगे जाएं?’’ भौजी ने भैयाजी खों समझाओ।
‘‘देखों धना! उन ओरन की बात दूसरी कहानी। बो का कहाउत आए के चित बी अपनी औ पट बी अपनी। जे पार्टी जीती सो अपनो भैया जीतो औ बा पार्टी जीती सो अपनो भैया जीतो। दोई हाथन में लड़ुआ धर लओ, कोनऊं हाथ को तो खाबे के लाने मिलई जैहे।’’ भैयाजी ने सोई भौजी को समझाबे को प्रयास करो।
‘‘जेई सो हम कै रए आपके लाने। के अपन ओरें सोई अलग-अलग पार्टी के संगे हो के उनको प्रचार करबी। ईसे हुइए जे के कल को जोन पार्टी जीतहे बोई अपनो केंडीडेट कहलाहे।’’ भौजी चतुराई दिखात भई बोलीं।
‘‘कै तो तुम सांची रईं!’’ भैयाजी खों समझ में आ गई।
‘‘औ का!’’ भौजी बोलीं।
‘‘सो चलो, तुम रामजी की पार्टी वारन के संगे जइयो औ हम वामजी की पार्टी के संगे।’’ भैयाजी खुस होत भए बोले।
‘‘सुनो, अब कोनऊं राम-वाम नई रओ! सबई बंजरंगबली के इते अपनो मत्था टेक रए।’’ भौजी बोली हतीं। भौजी भैयाजी से कऊं ज्यादा अपडेट निकरीं।
‘‘देखो धना! ऐसो आए के परीक्षा के टेम पे सबई बजरंगबली के इते मत्था टेकन लगत आएं। हम सोई जबे स्कूल में पढ़त्ते सो केबल मंगलवार औ शनीवार खों हनुमान जी की मढ़िया पे जात्ते। बाकी जोन टेम पे परीक्षा शुरू होबे वारी रैत्ती, सो संझा, संकारे मढ़िया पे मत्था टेकबो शुरू कर देत्ते। दो अगरबत्ती सोई उते जलात्ते। औ कभऊं-कभऊं चिरौंजी दाना औ चना सोई चढ़ा आउत्ते।  बो का आए के परीक्षा के टेम पे सबई खों बजरंगबली याद आऊत आएं।’’ भैयाजी ने भौजी खों बताई रई।
‘‘हऔ, सोई संगे बदत रए हुइए के जो अच्छे नंबरन से पास हो जेबी सो आपके लाने शुद्ध घी को पेड़ा औ नरियल चढ़ाबी। काए सई कई ने!’’ भौजी हंसत भईं बोली रईं।
‘‘‘‘औ का, अब बजरंगबली को खुस करबे के लाने उने पैलई से बताने तो परतई रओ के हम उनके लाने का करबी।’’ भैयाजी मनो सीरियसई मूड में बोले।
‘‘चलो, अब जे ओरें अपनी परीक्षा मने चुनाव के टेम पे बजरंगबली खों जप रए, सो अच्छो कर रए। जेई बहाने नांव सो ले रए।’’ भौजी ऊंसई हंस के बोलीं रईं।
फेर दोई जने अपनी-अपनी पार्टी पकर के चुनाव प्रचार के लाने निकर परे। जेई से आजकाल उनसे मोरी भेंट नईं हो रई आए। बे ओरें सुभे नौ-दस बजे से निकर परत आएं। औ तब लौं मोरो चैेका-बासन हो पात आए।
‘‘तुम काय नईं चल रईं? तुम सोई चलो संगे। मजो आहे।’’ भैयाजी ने मोय सोई आफर करो रओ।
‘‘मोय नईं जानें! आपई ओरें जाओ। मोय राजनीति में नईं परने।’’ मैंने साफ मना कर दई रई।
‘‘ईमें राजनीति में परबे की का? अपन ओरें कोन कोनऊं से कुर्सी मांग रए? पार्टी अपन ओरन खों खाबे-पीबे के लाने खर्चा दैहे औ संगे कओ धुतिया, हुन्ना सोई मिल जाएं।’’ भैयाजी ने तनक लालच दिखाओ रओ।
‘‘कऊं नईं! आजकाल चाुनाव आयोग वारे कछू नईं बाटन देत आएं।’’ मैंने भैयाजी खों याद दिलाई रई।
‘‘अरे, सो बे पार्टी वारे वोट देबे वारन खों थोड़ी, प्रचार करबे वारन खों दैहें। अब तुमई सोचो के मनो अपने घरे कोनऊं को ब्याओ हो रओ होय औ अपन कोनऊं चिनारी वारे से बोलें के भैया तनक हमाए कार्ड सो बांट आओ! सो का कार्ड बांटबे वारे की फटफटिया में पेट्रोल के लाने ऊंको पइसा ने देबी, के ऊंको चाय-पानी के चाले कछू ने देबी। इत्तो ब्यौहार तो साधेनई परत आए। सो, जेई ब्योहार जे ओरें साधहें। अपने प्रचार के लाने काम करबे वारन के खाबे-पीबे को खयाल राखहें के नईं? तुमई कओ?’’ भैयाजी बोले।
‘‘हऔ, आप सांची कै रए। ऐसई ब्योहार में तो पैले पेटियां चलत्तीं।’’ मैंने सोई ठिठोली करी रई।
‘‘चलो, तुमें नई जाने सो ने जाओ! हम दोई सो जा रए। कछू टेम सोई पास हो जाहे।’’ भैयाजी मुस्कात भए बोले रए।
सो, ऊं दिना से भैयाजी औ भौजी टेम पास माने प्रचार करत फिर रए। सो बोई दिनां से दिखा नईं पर रए। मोय तो लगत आए के बे दोई जने प्रचार के लाने घरे-घरे सो जाई रै हुइएं, बाकी उन ओरन के संगे बंजरंगबली के इते मत्था टेकबे सोई पौंच जात हुइएं।
खैर, जे तो अपनो-अपनो तरीका आए काम बनाबे को। जैसे लड़का हरें परीक्षा के टेम पे हनुमान जी की मढ़िया पे जात्ते, ऊंसईं लड़कियां हरें देबी मैया के लिंगे जल ढारबे खों भुनसारे से निकर परत्तीं। चाए ऊं टेम पे नवरातें होंए, चाए ने होंए। बे ओरें मातारानी के लाने बदत्तीं के जो आप हमें पास करा दैहो सो हम साजी सी चुनरिया चढ़ाहें। बाकी ऊं टेम पे, मने जब मैं स्कूल में पढ़त्ती, ऊं टेम पे अपने इते दुर्गा मैया खों मातारानी नई कओ जात्तो। जे तो जब से टीवी के सीरियल आन लगे सो ऊंमें देख-देख के दुर्गा मैया खों मातारानी कओ जान लगो। ने तो अपने बुंदेलखंड में चाए दुर्गा मैया होंए, चाए शारदा मैया होंए, चाए अनगढ़ माईं, चाए नरबदा जी, सबई खों सो मैया औ माई कओ जात्तो। बे असली वारे लोकगीतन में देख लेओ पतो पर जैहे। बाम्बुलिया में देख लेओ, ऊंमें नरबदा मैया खों मैया कओ गओ आए-
नरबदा मैया ऐसी मिली रें,
ऐसी तो मिली के जैसे मिले
मताई औ बाप रे, नरबदा मैया हो.....।
जेई टाईप को एक भजन औ आए जीमें ऊंची टेकरी पे रैबे वारी देवी मैया की बड़वार करी गई आए। ने मानो, सो देख लेओ जे लाईने-
सबई की बिपदा टार रई मैया
हमरी बी बिपदा टारियो मां...
ऊंची टेकरी मैया बसत हैं
मोसे चढ़ो ने जाए, हो मां
अंसुवा जो देख लए मैया ने मोरेे
नैचे खों खुद चली आई हो मां...
सबई के अंसुवां पोछ रई मैया
मोरे बी अंसुवां पोछियो मां....
बाकी ईसे कोनऊं फरक नई परत के देवी मैया खों मातारानी कओ जाए के मैया औ माई कओ जाए। मनो जोन अपने इते कओ जात रओ, बोई कओ जाए सो नोनो लगत आए। बाकी जैसी जोन की मरजी।    
तो, चुनाव लौं अपनई ओरें बतकाव करबी, काय से के भैयाजी औ भौजी सो बिजी चल रए। आप ओरे सोई देखत रओ के कोन-कोन कां-कां मत्था टेक रओ। काय से के उन ओरन की आस्था भगवान पे नोंई वोटन पे रैत आए। मनो बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की। सो, सबई जनन खों शरद बिन्ना की राम-राम!
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Wednesday, October 18, 2023

चर्चा प्लस | वे तीन अखबार जो पं. दीनदयाल उपाध्याय और आमजन के बीच संवाद का माध्यम बने | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर

चर्चा प्लस  
वे तीन अखबार जो पं. दीनदयाल उपाध्याय और आमजन के बीच संवाद का माध्यम बने
  - डाॅ (सुश्री) शरद सिंह                                                                                        
       भारतीय राजनीति आज अपनी स्वतंत्रता की स्थापना से बहुत दूर, बहुत आगे निकल आई है। लोकतंत्र ने अपना नया ढांचा गढ़ लिया है। आज भारत के लोकतांत्रिक चुनाव मतपत्र के द्वारा नहीं बल्कि इलेक्ट्राॅनिक मशीन (ईवीएम) के द्वारा होते हैं। सोशल मीडिया आज चुनावों का आभासीय हथियार बन चुका है। लेकिन तब, जब यह सब साधन नहीं थे, आमजन से संवाद के लिए अखबार की सबसे सशक्त और विश्वसनीय माध्यम था। देश की स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद पं. दीनदयाल उपाध्याय को आमजन से संवाद स्थापित करने के लिए समाचारपत्र की आवश्यकता का अनुभव हुआ। यह एक कटु सत्य है कि किसी न किसी रूप में राजनीति अभिव्यक्ति के हमेशा आड़े आई है। पं. दीनदयाल उपाध्याय को भी एक के बाद एक तीन समाचारपत्रों को आरम्भ करना पड़ा। वे रुके नहीं, झुके नहीं और उन्होंने आमजन से निरंतर संवाद बनाए रखा। (यह लेख सामयिक प्रकाशन नई दिल्ली से प्रकाशित राष्ट्रवादी व्यक्तित्व श्रृंखला की मेरी पुस्तक ‘‘दीनदयाल उपाध्याय’’ से लिया गया एक छोटा-सा अंश है।)
पं. दीनदयाल उपाध्याय विचार विनिमय के लिए प्रकाशित सामग्री को महत्वपूर्ण मानते थे। इसीलिए उन्होंने अपने विचारों को समाचारपत्र द्वारा जन-जन तक पहुंचाने का कार्य किया था। वह समय देश की आजादी एवं नवनिर्माण का था। बंटवारे का दंश जनमानस को आहत किए हुए था। जनमानस में दिग्भ्रम की स्थिति थी। राष्ट्र का स्वरूप कैसा हो? पत्रकारिता के कौन-से दायित्व हों? और आमजन अपने और देश के बहुमुखी विकास के लिए किस दिशा को चुने? ये अहम प्रश्न थे जो सन् 1947 में प्रत्येक राजनेता, प्रत्येक देशभक्त और प्रत्येक दिशानिर्देशक के मन-मस्तिष्क को झकझोर रहे थे।
स्वतंत्रता के बाद अंग्रेजों के शासन से भले ही मुक्ति मिल गई किन्तु अंग्रेजी संस्कृति का मानस पर गहरा असर स्पष्ट दिखाई देता था। आर्थिक रूप से सम्पन्न वर्ग स्वयं को अंगे्रजियत का पोषक साबित करने पर तुला हुआ था, वहीं निर्धन विपन्नता के बोझ तले दबा जा रहा था। समाज में वर्गभेद की मानसिकता बढ़ती जा रही थी। इस मानसिकता को राष्ट्र के सांस्कृतिक उत्थान में बाधक बताते हुए दीनदयाल उपाध्याय ने ‘पांचजन्य’ में लिखा था कि ‘‘राष्ट्रभक्ति की भावना को निर्माण करने और उसको साकार स्वरूप देने का श्रेय भी राष्ट्र की संस्कृति को ही है तथा वही राष्ट्र की संकुचित सीमाओं को तोड़कर मानव की एकात्मता का अनुभव कराती है। अतः संस्कृति की स्वतंत्रता परमावश्यक है। बिना उसके राष्ट्र की स्वतंत्रता निरर्थक ही नहीं, टिकाऊ भी नहीं रह सकेगी।’’

राष्ट्रधर्म प्रकाशन लिमिटेड की स्थापना

बंटवारे से उपजा अविश्वास का वातावरण फन फैलाए था। ऐसे में सौहाद्र्य स्थापित किया जाना आवश्यक था। इसी विकट समय में सभी दुरूह प्रश्नों के उत्तर जन-जन तक पहुंचाने के लिए पं. दीनदयाल  ने समाचारपत्र को माध्यम बनाने का निश्चय किया और सन् 1947 में पं. दीनदयाल  ने राष्ट्रधर्म प्रकाशन लिमिटेड की स्थापना की थी। जिसके अंतर्गत स्वदेश, राष्ट्रधर्म एवं पांचजन्य नामक पत्र प्रकाशित होते थे। यह राष्ट्रधर्म प्रकाशन लिमिटेड वही प्रकाशन समूह था जिसने वचनेश त्रिपाठी, महेन्द्र कुलश्रेष्ठ, गिरीश चन्द्र मिश्र, अटलबिहार वाजपेयी, राजीव लोचन अग्निहोत्री को पत्रकारिता के क्षेत्र में स्थापित किया। ‘राष्ट्रधर्म’ का पहला अंक 31 अगस्त 1947 को प्रकाशित हुआ। पाठकों द्वारा इसका भरपूर स्वागत किया गया। इस सकारात्मक प्रतिक्रिया ने पं. दीनदयाल  को उत्साह से भर दिया। उन्हें विश्वास हो गया कि उनका निर्णय गलत नहीं था। ‘राष्ट्रधर्म’ में देशभक्ति के आलेखों के साथ ही उन विचारों का भी प्रकाशन हुआ जो आमजन में जागरूकता बढ़ा सकते थे। सन् 1947 के पूर्व जिस आमजन के पास देश को स्वतंत्र कराने का महत्वपूर्ण उद्देश्य था वह स्वतंत्रता की घोषणा के साथ ही पूरा हो चुका था। स्वतंत्र देश की अपनी संभावनाओं एवं आकांक्षाओं को ले कर मतैक्य अधिक थे और निश्चितता की घोर कमी थी। इस कमी को दूर करने वाले लेखों के प्रकाशन ने ‘राष्ट्रधर्म’ को जनमानस के मध्य स्थापित कर दिया।
पं. दीनदयाल ने अपने विचारों को पत्रकारिता के माध्यम से जन-जन तक पहुंचाने का कार्य किया था। वह पत्रकारिता जो आजादी के उपरांत अपने लिए किसी लक्ष्य अथवा सन्मार्ग की तलाश में थी। उसे दीनदयाल उपाध्याय ने अपनी पत्रकारिता के माध्यम से राह दिखाने का कार्य किया था। सन् 1947 में पं. दीनदयाल  ने राष्ट्रधर्म प्रकाशन लिमिटेड की स्थापना की थी। जिसके अंतर्गत स्वदेश, राष्ट्रधर्म एवं पांचजन्य नामक पत्र प्रकाशित होते थे। राष्ट्रधर्म प्रकाशन लिमिटेड ने वचनेश त्रिपाठी, महेन्द्र कुलश्रेष्ठ, गिरीश चन्द्र मिश्र, अटल बिहार वाजपेयी, राजीव लोचन अग्निहोत्री जैसे श्रेष्ठ पत्रकारों को तैयार किया था। पं. दीनदयाल ने ‘पांचजन्य’, ‘राष्ट्रधर्म’ एवं ‘स्वदेश’ के माध्यम से राष्ट्रवादी जनमत निर्माण करने का महत्वपूर्ण कार्य किया था। उनके लेख पांचजन्य के घोष वाक्य के अनुरूप ही राष्ट्र जागरण का शंखनाद करते थे।

‘पांचजन्य’ का प्रकाशन

पं. दीनदयाल  ‘राष्ट्रधर्म’ का प्रकाशन आरम्भ करके ही नहीं रूके। उन्होंने एक और समाचारपत्र आरम्भ करने की ठानी। 14 जनवरी, सन् 1948 को ‘पांचजन्य’ का पहला अंक प्रकाशित किया।
पं. पं. दीनदयाल  जैसे अडिग व्यक्तित्व के कारण ही ‘पांचजन्य’ साधनविहीन होने पर भी सत्ता की ओर से आने वाली रुकावटों को पार करते हुए भी अपने ध्येय के प्रति कृतसंकल्प रहा। उसके जन्म का एक माह भी पूरा नहीं हुआ था कि गांधी जी की हत्या से क्षोभित वातावरण का लाभ उठाकर सरकार ने फरवरी, 1948 में ‘पांचजन्य’ का गला घोंटने का प्रयास किया। उसके सम्पादक, प्रकाशक एवं मुद्रक को जेल में बंद कर दिया गया तथा उसके कार्यालय पर ताला ठांेक दिया गया। लगभग साढ़े चार माह बाद न्यायालय की अनुमति से ‘पंाचजन्य’ का प्रकाशन एक बार फिर संभव हो सका। यद्यपि यह राहत अल्पकालिक सिद्ध हुई। छह महीने निकलने के बाद दिसम्बर, 1948 में ‘पांचजन्य’ को एक बार फिर सात माह के लिए बंद करा दिया गया। जुलाई, 1949 में यह प्रतिबंध हटते ही ‘पंाचजन्य’ का शंखनाद पुनः गूंज उठा।  ‘पंाचजन्य‘ का राष्ट्रहित में निर्भीक स्वर सरकारों के लिए हमेशा सिरदर्द बना रहा।
सन् 1949 में कम्युनिस्ट चीन द्वारा तिब्बत की स्वाधीनता के अपहरण और दलाई लामा के निष्कासन के समय ‘पंाचजन्य’ ने नेहरु जी की अदूरदर्शिता और चीन की नीति की निर्भय होकर आलोचना की। 1962 में भारत पर चीन के हमले के लिए ‘पांचजन्य’ ने नेहरु जी की असफल विदेश नीति एवं रक्षा नीति को दोषी ठहराया, जिससे तिलमिलाकर नेहरु सरकार ने ‘पांचजन्य’ को धमकी भरा नोटिस दिया।
‘पांचजन्य‘ के लेखक वर्ग में डाॅ. सम्पूर्णानन्द, राजर्षि पुरुषोत्तम दास टण्डन, डाॅ. राममनोहर लोहिया, आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी, अमृतलाल नागर, महादेवी वर्मा, किशोरी दास वाजपेयी, कृष्णचन्द प्रकाश मेढ़े जैसे मूर्धन्य विचारकों, राजनेताओं तथा साहित्यकारों का योगदान रहा है। इनके अतिरिक्त ‘पांचजन्य’ ने भविष्य में भी समय-समय पर विभिन्न राजनैतिक दलों के शिखर नेताओं के साक्षात्कार प्रकाशित करके राष्ट्रीय समस्याओं पर बहस चलाने की सार्थक प्रयास किया। ऐसे नेताओं में मोरारजी देसाई, चैधरी चरण सिंह, चन्द्रशेखर, मुलायम सिंह यादव, शरद पवार, शरद यादव, ए. बी. वर्धन, एम. फारूखी, मौलाना वहीदुद्दीन खान आदि प्रमुख रहे।

‘हिमालय पत्रिका’ का प्रकाशन

‘पांचजन्य’ के द्वारा संघ के विचारों का प्रचार-प्रसार तत्कालीन कांग्रेस सरकार को चिन्ता में डालने लगा। तरह-तरह से बाधाएं डालने के बाद अंततः ‘पांचजन्य’ पर प्रतिबंध लगा दिया गया। पं. दीनदयाल  ऐसी बाधा से घबराने वाले व्यक्ति नहीं थे। उन्होंने ‘पांचजन्य’ पर प्रतिबंध लगने पर ‘हिमालय पत्रिका’ नामक समाचारपत्र प्रकाशित करना आरम्भ कर दिया। यह भी ‘पांचजन्य’ की भांति लोकप्रिय रहा। सत्ताधारियों ने देखा कि ‘पांचजन्य’ पर प्रतिबंध के बाद भी संघ के विचारों का प्रसार नहीं थमा है तथा ‘हिमालय पत्रिका’ ने ‘पांचजन्य’ का स्थान ले लिया है, तो ‘हिमालय पत्रिका’ को भी प्रतिबंधित कर दिया गया।
संघ के कार्यकत्र्ताओं को लगा कि एक बार फिर वे माध्यमविहीन हो रहे हैं। किन्तु पं. दीनदयाल  ने उन्हें ढाढस बंधाया और ‘देशभक्त’ के नाम से तीसरा समाचारपत्र छापना शुरू कर दिया। यह पं. दीनदयाल  की कुशाग्रबुद्धि का ही कमाल था कि सत्ताधारियों के द्वारा उत्पन्न की जाने वाली रुकावटें संघ के मार्ग को अवरूद्ध नहीं कर पा रही थीं। ऐसे में बौखलाई हुई सरकार ने पं. दीनदयाल  को बंदी बनाने का निश्चय किया। इसमें भी सरकार को सफलता नहीं मिली। इससे संघ के अन्य कार्यकत्र्ताओं पर संकट छाने लगा। तब पं. दीनदयाल  ने स्वयं को पकड़वा दिया। यह एक सोची-समझी रणनीति थी। वस्तुतः संघ के विरोधी चाहते थे कि संघ के कार्यकत्र्ता कोई ऐसा कदम उठाएं जिससे उनकी साख आमजन की दृष्टि में गिर जाए। अतः विरोधियों ने संघ के कार्यकत्र्ताओं को भड़काने का भी प्रयास किया। किन्तु पं. दीनदयाल  ने बंदीकाल में भी कार्याकत्र्तओं से तारतम्य बनाए रखा और उन्हें शांति बनाए रखने की निरन्तर सलाह देते रहे। जिसके परिणामस्वरूप कार्यकत्र्ताओं ने पं. दीनदयाल  को बंदी बनाए जाने के विरोध में शांतिपूर्ण सत्याग्रह किया। आखिरकार पं. दीनदयाल  को मुक्त कर दिया गया।  
राष्ट्रीय एकता के मर्म को समझाते हुए उन्होंने लिखा था-‘‘यदि हम एकता चाहते हैं तो भारतीय राष्ट्रीयता जो हिंदू राष्ट्रीयता है तथा भारतीय संस्कृति जो हिंदू संस्कृति है, उसका दर्शन करें। उसे मानदंड बनाकर चलें। भागीरथी की पुण्यधाराओं में सभी प्रवाहों का संगम होने दें। यमुना भी मिलेगी और अपनी सभी कालिमा खोकर गंगा में एकरूप हो जाएगी। (पांचजन्य, 24 अगस्त, 1953)
सांस्कृतिक एकता के साथ ही एकात्म संस्कृति को पं. दीनदयाल  देश के लिए उचित मानते थे। वे कहते थे कि यदि ‘‘किसी गुलदस्ते में अलग-अलग किस्म के फूल लगे हैं तो वह देखने में भले ही सुन्दर दिखता है किन्तु किसी एक किस्म के फूल की सुगंध का आनन्द नहीं लिया जा सकता है और न ही उस गुलदस्ते को किसी एक फूल के नाम से पहचाना जा सकता है। यदि गुलदस्ते को एक विशिष्ट पहचान देनी है, उसकी सुगंध में स्पष्ट पहचानी जा सकने वाली एकरूपता रखनी है तो एक ही किस्म के फूलों का होना आवश्यक है। इसी तरह देश की विशिष्ट पहचान को दुनिया के सामने स्थापित करने के लिए इसकी सांस्कृतिक एकात्मता सर्वोपरि होनी चाहिए।’’
  सांस्कृतिक एकात्मता के संबंध में उन्होंने ‘राष्ट्रधर्म’ में अपने एक लेख में लिखा कि-‘‘भारत में एक ही संस्कृति रह सकती है, एक से अधिक संस्कृति का नारा देश के टुकड़े-टुकड़े करके हमारे जीवन का विनाश कर देगा। अतः आज लीग का द्वि-संस्कृतिवाद, कांग्रेस का प्रच्छन्न द्विसंस्कृतिवाद तथा साम्यवादियों का बहुसंस्कृतिवाद नहीं चल सकता। आज तक एक संस्कृतिवाद को सम्प्रदायवाद कहकर ठुकराया गया किंतु अब कांग्रेस के विद्वान भी अपनी गलती समझकर इस एक संस्कृतिवाद को अपना रहे हैं। इसी भावना और विचार से भारत की एकता तथा अखंडता बनी रह सकती है तथा तभी हम अपनी समस्याओं को सुलझा सकते हैं।’’
पं. दीनदयाल  के विचारों में स्पष्टता थी। वे अपने विचारों को खुल कर सामने रखने का प्रभावी ढंग और उसके महत्व को भली-भांति समझते थे। उल्लेखनीय है कि राष्ट्रधर्म, पांचजन्य व दैनिक स्वदेश के प्रकाशन में पं. दीनदयाल  औपचारिक रूप से न तो सम्पादक थे और न स्तंभकार थे किन्तु वे इन समाचारपत्रों के सर्वेसर्वा थे। अपना नाम दिए बिना भी इन समाचारपत्रों में वे लेख लिखा करते थे। उन्हें नाम कमाने की लालसा नहीं थी, वे तो समाचार पत्रों के माध्यम से आमजन के साथ सम्वाद स्थापित करना चाहते थे। वे झूठ नहीं परोसना चाहते थे बल्कि सच सामने रखना चाहते थे।
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