Thursday, December 14, 2023

बतकाव बिन्ना की | जो हुइए, अच्छो ई हुइए ! | डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम | प्रवीण प्रभात

"जो हुइए, अच्छो ई हुइए !" - मित्रो, ये है मेरा बुंदेली कॉलम "बतकाव बिन्ना की" साप्ताहिक #प्रवीणप्रभात , छतरपुर में।
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बतकाव बिन्ना की
जो हुइए, अच्छो ई हुइए !
        - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
       टीवी पे अपने नए मुख्यमंत्री जू खों शपथ लेत देखो। संगे, दोई छुटकल सीम हरों मने डिप्टी सीएम हरों खों को सोई शपथ लेत भए देख लओ। मनो रओ तो जरा सो टेम को काम, पर भीतरे बैठे में जड़कारों लगन लगो हतो। अब आप ओरें कछू गलत ने सोचियो के मैं डिप्टी सीएम हरों खों छुटकल काए बोल रई? छुटकल बोलो, लोहरे बोलो कछू बी बोलो जा सकत लाड़-प्यार में। कभऊं-कभऊं घर के कक्का, दद्दा, जिज्जी कोनऊं बी लोहरे हरों खों बोल देत आएं के ‘‘काय रे नासमिटो! तुमें समझ में ने आ रई?’’ सो, ईको मतलब जे नोईं के बे ओरें उन लोहरे हरों को नासमिटत देखबो चात आएं। जे ऐसे बोल लाड़ में सोई बोले जात आएं। सो आप ओरें कछू औ ने समझियो, ने तो सोचो के मिटत जा रई पार्टी की हवा लग गई मोय। ऐसो कछू नइयां।
मनो मंच पे सबई जने बड़े नोने से लग रए हते। लाड़ली बैनों के भैया सोई उते मंच पे सहूरी बांधे बैठे दिखा रए हते। बाकी जैसे पैले दरबार में नवरतन होत्ते, ऊंसई छै ठइयां राज्य के मुख्यमंत्री हरें औ बड़े वारे नेता हरें, सबई मंच पे जंच रए हते। मोय तो सुन्ने रई अपने मोदी जी के दो बोल, मनो बे बिना बोले कढ़ गए। मोरे जैसे ने जाने कित्ते उने सुनबे के लाने उते मैदान में बैठे रए हुइएं औ ने जाने कित्ते मोए जैसे टीवी के आंगू धुनी रमाए हुइएं। मनो उन्ने सो जे दिसम्बर के जड़कारे खों सरप्राईजन से गरमाने की ठान रखी आए। पैले उन्ने उने ने बनाओ जिनके लाने सबई खों उम्मीद लगी हती। फेर आए, औ ऊंसई से कढ़ गए। माईक मनो छूंछो सो ठाड़ो रओ गओ। अब का कओ जाए, उनकी लीला बेई जाने, मोरी तो इत्ती बु़द्धि नोंई के जे इत्ती बड़ी वारी बातें मोरी समझ में आएं। सो मैंने सोची के तनक भैयाजी के लिंगे पौंचो जाए। बे मोसे ज्यादा सयाने ठैरे। बे कछू बताहें। औ उते उनके आंगन में तनक धूप सोई सेकों जा सकत आए। मैं निकर परी भैयाजी के इते के लाने। अपने घरे के दुआरे पे तारा डारो औ कुची अपने पैजामा की खींसा में रख लई। मनो अब जे सई व्यवस्था हो गई आए के लुगाइयन के पैजामा औ सलवार में सोई खींसा (जेबें) बनाए जान लगे। ने तो कुची तो मानो कऊं फेर बी खोंस लेओ, पर आजकाल के मोबाईल, बे सो कऊं समाई नईं सकत। उनके लानेई जे खींसा बनाए जान लगे। पनना वारे किशोरजी भली करें बे डिजाइनर हरों की!
सो जो मैं भैयाजी के इते पौंची, सो बे धूप में पलका डारे बैठे दिखाने।
‘‘काए बिन्ना, अब तुमें अपने भैयाजी की याद आई? अब लौं कां रईं?’’ भैयाजी ने मोय तानो मारो।
‘‘कऊं नईं घरे टीवी  देख रई हती। मैंने सोची के अपने नए वारे मुख्यमंत्री जू शपथ ले लेवें फेर आप के इते पौंचो जाए।’’ मैंने भैयाजी से कई।
‘‘काय, तो का हमाए इते टीवी नइयां, के हम टीवी देखत नईं जानत? के जो तुम अपने घरे टीवी ने देखतीं तो नए वारे मुख्यमंत्री जू शपथ ने लेते़?’’ भैयाजी ने औरई खिंचाई करी।
‘‘अरे, ऐसो कछू नईं! बस तनक आलस सी हो रई हती, सो बिस्तर पे लेटे-लेटे बा प्रोग्राम देखों, मनो उत्तेपेई जड़कारो लगन लगो। बाहरे उत्ती समझ नईं परत, मनो भीतरे ज्यादा ठंड लगत आए।’’ मैंने भैयाजी से कई।
‘‘चलो ठीक रओ! हमने सोई पूरो प्रोग्राम देखो। वैसे सांची कैं सो पैले उते को जंका-मंका देख के लग रओ हतो के प्रोग्राम लंबो चलहे। मनो पीएम के आतई सात तीनोई खों शपथ दिला दओ गओ औ फेर तुरतईं अपने पीएम जू छत्तीसगढ़ के लाने निकर गए। बाकी हम तो उनको सुनबे के लाने तरस गए।’’ भैयाजी ने बोई बात कै दई जो मोय लगी हती।
‘‘हऔ भैयाजी! मोय सोई दुख भओ, काय के उनको भाषण अच्छो सो लगत आए।’’ मैंने सोई अपने मन की बात कै दई। अपने पीएम सोई जेई पक्ष के आएं के अपने मन की बात कै दओ चाइए। सो मैंने सोई अपने मन की बात भैयाजी से कै दई।
‘‘अरे सुनो बिन्ना, काल बड़े मजे की बात भई! ’’ भैयाजी तनक चहक के बोले।
‘‘का बात भई?’’ मैंने पूछी।
‘‘ भई जे के तुम उनको जानत हो, बे पंडज्जी ढाना वारे! जो कभऊं-कभऊं हमाए इते आऊत रैत आएं।’’ भैयाजी ने मोसे पूछी।
‘‘हऔ! का भओ उनको?’’ मैंने पूछी।
‘‘उनको कछू नई भओ। बे काल हमाए इते आए रए दुफैरी में, जेई टेम पे। उने गल्लामंडी में कोनऊं काम रओ। उनको काम तनक जल्दी निपट गओ सो बे जात बेरा हमसे मिलबे खों चल आए रए। तुमाए लाने सोई पूछ रए हते।’’ भैयाजी बोले।
‘‘हऔ, एक-दो दारे उनसे आपई के इते भेंट भई रई। सज्जन आदमी आएं।’’ मैंने कई।
‘‘हऔ! औ मजाकिया सोई ठैरे। काल बे कैन लगे के भैया अपन ओरें तो झटका खा गए। हमने पूछी काय को झटका? सो बे कैन लगे के झटका ईको के अपन ओरन ने वोट दओ रओ बिही के लाने औ अपन ओरन खों पकरा दओ गओ अमरूद। सो हमने कई पंडज्जी, जे बताओ के बिही औ अमरूद में कोन सो फर्क आए जो तुम इत्ते बिलाप कर रए? सो बे बोले के भैया तनक ध्यान से सुनियो! जो बिही कई जाए सो बचपन की जानी-पैचानी सी चीज लगत आए। मनो बोई बिही खों जो अमरूद कै दओ जाए तो कछू बाहरे की चीज लगन लगत आए। कछू ज्यादई पढ़ी-लिखी सी चीज। पंडज्जी की बात सुन के मोय कछू समझ ने परी। सो मैंने कई के कछू खुल के बोलो, हमें समझ ने पर रई। सो बे बोले के अच्छा चलो जे छोड़ो। हम तुमें दूसरे ढंग से बता रए के तनक सोचो के भौजी ने चाय बनाई औ तुमाए लाने ला के ई स्टूल पे रख दई। इत्ते में तुमाओ मकान मालिक आओ औ ऊने बा चाय को मग्गा उठा के दूसरे किराएदार खों पकरा दओ। मनो अब तुम ऊसे का कैहो? जो तुम कछू कैहो सो बा बोलहे के जैसे तुम हमाए किराएदार, ऊंसई जे हमाओ किराएदार। हम जे चाए तुमें पीने देंवे या चाए ईको पिवाएं, जे हमाई मरजी।’’ भैयाजी बोलई रै हते के मैंने उने टोंक दओ।
‘‘जे कोन सी बात भई? बा चाय मकान मालिक की थोड़े हती, बा तो भौजी ने बनाई हती, वा बी आपके लाने। बे ऐसो कैसे कर सकत आएं?’’ मोसे कै आई।
‘‘जेई तो! ठीक जेई हमने पंडज्जी से कई के तुम जे ठीक एक्जाम्पल नईं दे रए। सो हमाई बात सुन के पंडज्जी बोले के तुमें एक्जाम्पल की परी, औ इते जेई सब कछू हो बी गओ। तनक देर से, मनो जब हमें समझ में आई सो हम दंग रै गए के जे पंडज्जी खों कां-कां की बातें सूझत रैत आए? सो हमने उने चाय-माय पिला के बिदा करी। अरे, कोनऊं जे सब सुन के कछू और समझ लेवे, सो हमें लेबो को देबो पर जाए।’’ भैयाजी बोले।
‘‘सई कई भैयाजी! जमानो खराब आए। तिल को ताड़ बनबे में देर नईं लगत। मनो जे सोचो के जो हुइए, अच्छो ई हुइए।’’ मैंने कई।
भैयाजी ने सोई अपनी मुंडी हिलाई औ तनक चैन की सांस लई। मनो बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की। सो, सबई जनन खों शरद बिन्ना की राम-राम!
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Wednesday, December 13, 2023

चर्चा प्लस | सिनेमा में खल-महिमा का ट्रेडीशन और ट्रेंड: संदर्भ ‘‘एनिमल’’ | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर

चर्चा प्लस  
सिनेमा में खल-महिमा का ट्रेडीशन और ट्रेंड: संदर्भ ‘‘एनिमल’’
  - डाॅ (सुश्री) शरद सिंह                                                                                        
      ऐसा नहीं है कि मात्र हमारे देश में ऐसी फिल्में बनती हैं जिनमें खलनायकों को नायक की तरह प्रस्तुत किया जाता है। पर यह भी सच है कि बालीवुड में ‘‘खलनायक’’ जैसी फिल्म बन चुकी है जिसमें एक खल चरित्र वाला पात्र ही नायक था। यानी एक खलनायक नायक। अब हाल ही में एक और फिल्म आई है ‘‘एनिमल’’। बेशक ‘‘खलनायक’’ और ‘‘एनिमल’’ में मात्र इतना ही साम्य है कि दोनों में एक खल चरित्रवाला नायक है। ऐसा नायक जो बुराइयों से भरपूर है किन्तु उसमें भी नायकत्व को दिखाए जाने का प्रयास किया गया है। यदि इस तरह के सिनेमा के हिसाब से देखें तो ‘‘नायकत्व’’ (हीरोइज़्म) की परिभाषा ही औंधेमुंह गिरती दिखाई देती है। नायकत्व तो उस चरित्र को कहते हैं जिसका अनुकरण कर के जीवन में अच्छाइयों का, वीरता का, उदारता का, सम्मान का संचार किया जा सके। किन्तु सिनेमाई खल-नायकत्व को देखें तो ऐसे पात्र का अनुकरण करके व्यक्ति अपने रहे-सहे गुणों को भी बिसार बैठेगा।
यह बात विचार करने की है कि रजतपट पर जितने खलचरित्रों को महिमा मंडित कर के प्रस्तुत किया गया है, उसकी अपेक्षा सद्चरित्रों पर कम ही ध्यान दिया गया। धार्मिक सिनेमा इसमें शामिल नहीं है। आम जनजीवन से उठाए गए खास चरित्रों में से खलचरित्रों के जीवन को पूरी सहानुभूति एवं पक्षधारिता के साथ दर्शकों के सामने परोसने का काम क्यों किया जाता है? क्या इसके पीछे यह तो नहीं कि ऐसे चरित्रों के लिए आर्थिक सहयोग सुगमता से मिल जाता है? यह बात विवादास्पद हो सकी है क्योंकि किसी फिल्मकार की स्वतंत्रता का प्रश्न है। किन्तु स्वतंत्रता यदि उस दिशा की ओर जाने लगे जो युवाओं को गलत पाठ पढ़ा सकती है तो इस पर विचार किया जाना जरूरी है।  
सिनेमा में विपरीत चरित्रों को महिमामंडित करने का चलन हाॅलीवुड से ही शुरू हुआ था। फिल्म ‘‘गाॅड फादर’’ इसी चलन का एक हिस्सा थी। फिर भी वह फिल्म उन परिस्थितियों को न्यायोचित ढंग से प्रस्तुत करती थी जिसके चलते अपराध जगत के ‘‘गाॅड फादर’’ का जन्म हुआ। एक शरणार्थी बालक विदेशी, अपरिचित भूमि पर जीवन संघर्ष के लिए वह बनता चला जाता है जो उसे नहीं बनना चाहिए था। बेशक उस चरित्र में क्रूरता है, कठोरता है लेकिन वह मनोरोगी नहीं है। भारतीय सिनेमा तो हमेशा हाॅलीवुड की ओर मुंह किए बैठा रहता है। मर्लिन ब्रांडो और अल पचीनो जैसे अभिनेताओं द्वारा अभिनीत ‘‘गाॅडफादर’’ 1972 पर बाॅलीवुड में ‘‘धर्मात्मा’’ बनाई गई जिसमें मुख्यभूमिका फिरोजखान की थी। अब यही फिल्म 2022 में बनी सलमान खान और नयनतारा को ले कर जो वस्तुतः चिरंजीवी की दक्षिण की फिल्म की रीमेक थी। ‘‘जो जीता वही सिकंदर’’ ‘‘ब्रेकिंग अवे’’ पर थी, अब तो ओटीटी प्लेटफार्म तक में हाॅलीवुड की काॅपी रीमेक या इंस्पायर्ड के नाम पर धड़ल्ले से आ रही हैं। ‘‘‘प्लेयर्स’’ हाॅलीवुड की मशहूर फिलम ‘‘द इटालियन जाॅब’’ पर बनी, फिल्म ‘‘बैंग-बैंग’’ नाईट एण्ड डे’’ की रीमेक थी। ‘‘कांटे’’ को ‘‘रिज़वायर डाॅग’’ से प्रेरित कहा गया। ‘‘मर्डर’’ तो ‘‘अनफेथफुल’’ की काफपी ही थी। एक लम्बी सूची है जो गिनाई जा सकती है कि कौन-सी बाॅलीवुड फिल्म किस हाॅलीवुड फिल्म की काॅपी थी। बहरहाल, यहां मुद्दा काॅपी किए जाने का नहीं बल्कि ‘‘एंटीकैरेक्टर वर्शिपिंग’’ का है। यदि जिन चंद फिल्मों का यहां काफपी के सिलसिले में उल्लेख किया गया उन पर ध्यान दिया जाए तो वे सभी की सभी अपराध आधारित फिल्में हैं ‘‘जो जीता वही सिकंदर’’ को छोड़ कर। जैसा कि पहले ही उल्लेख किया गया कि पिछले कुछ दशक में यह अपराध और अपराधी को ग्लोरीफाई करने वाली फिल्मों का ट्रेडीशन-सा बनता जा रहा है। इधर जो फिल्में आईं उनमें अंडरवल्र्ड और गैंगस्टर की दुनिया के इर्दगिर्द बनीं ‘‘गॉड मदर’’, ‘‘वंस अपॉन अ टाइम इन मुंबई’’, ‘‘सरकार’’, ‘‘वास्तव’’, ‘‘शूटआउट एट लोखंडवाला’’, ‘‘शूटआउट एट वडाला’’, ‘‘हसीना’’, ‘‘काठियावाड़ी’’, ‘‘डी कंपनी’’ आदि बनीं। इनमें से कुछ तो बाकायदा खलचरित्रों की बायोपिक थी जो उनके संघर्ष से ज्यादा गलत मार्ग से दबदबा बनाने का रास्ता सुझाने वाली प्रतीत होती थीं। इस तरह की फिल्मों में जिस तबके के युवा दर्शकों को सबसे अधिक दिलचस्पी रहती है, उनके लिए ये फिल्मों गलत प्रेरणा देने वाली साबित होने के पूरे खतरे रहे हैं।
फिल्म रणवीर कपूर अभिनीत ‘‘एनीमल’’ में ‘‘कबीर सिंह’’ की तरह साइको पात्र हीरो के स्थान पर है। जिसकी हरकतों को देख कर मन में जुगुप्सा उत्पन्न होने लगेगी। यह पात्र ‘‘कबीर सिंह’’ से भी कई हाथ आगे है। ऐसे पात्र को हीरो की तरह पेश करने के पीछे निर्माता-निर्देशक की क्या संदेश देने की मंशा है, यह समझ पाना कठिन है। पिछले कुछ दशक में बाॅलीवुड में ऐसी फिल्में आईं जिनमें मनोरोगी व्यक्ति को हीरो के रूप में प्रस्तुत किया गया।

अनुराग कश्यप की ‘‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’’ को भारतीय सिनेमा की सबसे हिंसक फिल्म कहा गया था। लेकिन निर्देशक संदीप रेड्डी वांगा ने हिंसा का अपना ही पिछला रिकार्ड तोड़ते हुए ‘‘एनिमल’’ पेश कर दिया। जी हां, ‘‘कबीर सिंह’’ संदीप रेड्डी वांगा की ही फिल्म थी जिसमें एक साइको डाॅक्टर नशे और यौनसंबंध का पागलपन तक आदी है। अपने इस पागलपन के सामने उसे अपने पिता की आयु के व्यक्ति की भी परवाह नहीं रहती है और न ही एक डाॅक्टर के नाते अपने मरीज की परवाह करता है। ऐसे अजीबोगरीब कैरेक्टर को फिल्म के अंत तक खींचतान कर नायक का दर्जा दिलाया जाता है। अब ‘‘एनिमल’’ का हिंसा से भरा कथानक है जिसके लिए इसे अभी तक की की सबसे वायलेंट फिल्म कहा जा रहा है। ऐसा पात्र जो अपने पिता का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने के लिए सम्य समाज के सारे नियम तोड़ जानवर बन जाता है।
कहानी फ्लैशबैक से आरम्भ होती है जिसमें वृद्ध हीरो अपने अतीत के बारे में सोचता है। अतीत में वह एक ऐसा बालक था जो अपने पिता से अटूट प्रेम करता था। पिता के प्रेम में बचपन से ही उसने नियम तोड़ने शुरू कर दिए थे। जैसे पिता को जन्मदिन की शुभकामनाएं कहने के लिए वह अपने स्कूल से भागर कर पिता के पास जाता है। मगर पिता को अपने बिजनेस से फुर्सत नहीं रहती है। वह पिता का ध्यान अपनी ओर खींचने के लिए हिंसा अपनाने लगता है जिससे पिता-पुत्र के बीच की दूार कम नहीं होती, बल्कि और बढ़ जाती है।
युवा होते साइको विजय (रणबीर कपूर) की एक ही धुन है कि वो किसी तरह अपने पिता का अटेंशन हासिल करे और उन्हें प्रभावित कर सके। मगर उसकी हिंसक वृत्ति और हरकतें उसे पिता से दूर करती जाती हैं। विजय नाम का यह बालक एक दिन कॉलेज में पढ़ने वाली अपनी दीदी के साथ रैगिंग करने वालों को सबक सिखाने के लिए मशीनगन चला देता है। तब उसका पिता उसे हॉस्टल भेज देता है। उसका जीजा ने उसके पिता के बिजनेस एम्पायर को हड़प लेता है। वह जीजा के साथ अभद्रता करता है। तब तक वह स्वयं को सबसे शक्तिशाली पुरुष यानी अल्फा मेल समझने लगता है। अपने प्रभाव के मद में वह नायिका की मंगनी तुड़वा कर उसे लेकर विदेश चला जाता है और उससे विवाह कर लेता है। दो बच्चों क पिता बनने के बाद विजय को पता चलता है कि उसके पिता को गोली मार दी गई है तो वह भारत वापस आता है और हिंसा का तांडव शुरू कर देता है। हिंसक और विक्षिप्त पात्र के रोल को रणबीर कपूर ने भले ही अच्छे ढंग से निभाया हो लेकिन हीरो के रूप में इस पात्र का औचित्य समझना कठिन है। एक फिल्म रिव्यूवर के अनुसार-‘‘मार-काट के दृश्यों में जहां उनकी वहशत झलकती है, वहीं रोमांटिक दृश्यों में वे इरॉटिक अंदाज में दिखते हैं।’’

फिल्म ‘‘एनिमल’’ को ‘‘ए’’ सर्टीफिकेट के दायरे में रखा गया है। हमारे देश में जहां विदेशी फिल्मों पर सख़्ती से सेंसर किया जाता है, वहीं अपने देश की फिल्मों को उन्हीं प्रसंगो पर छूट दे दी जाती है। विदेशी फिल्म के चुंबन दृश्य आपत्तिजनक लगते हैं लेकिन हिरोईन का अश्लीलता की हद तक जा पहुंचने वाला आईटम डांस सेंसर की कैंची से बच निकलता है। जिन शब्दों को टेलीविजन पर विदेशी फिल्मों से ‘‘बीप’’ कर दिया जाता है, वे ही शब्द बाॅलीवुड की फिल्मों में धड़ल्ले से छोड़ दिए जाते हैं। फिल्म ‘‘मस्ती’’ और उसके सीक्वेल्स तो अधिकांश लोगों को याद होंगे क्योंकि वे आज भी टेलीविजन के चैनल्स पर आराम से दिखाए जाते हैं।
आज जब हम ‘‘जय श्रीराम’’ जैसे मर्यादा पुरषोत्तम के नाम के अभिवादन को प्रयोग में लाते हुए प्रसन्न होते हैं और शांति का अनुभव करते हैं वहीं, ‘‘एनिमल’’ जैसी हिंसक, इरोटिक फिल्म के जरिए युवाओं को क्या सिखाना चाहते हैं? यही कि बड़ों से कैसे अभद्रता की जाए? स्त्रियों को किस तरह उपभोग की वस्तु समझा जाए? या फिर हर समस्या का समाधान रक्त की नदी से हो कर ही निकले? जब हम अमेरिका के शहरों की ऐसी घटनाओं के बारे में पढ़ते हैं या सुनते हैं कि नाबालिग आयु के छात्र ने पिस्तौल या राईफल से अपने ही क्लास के बच्चों को गोलियों से भून दिया तो हम उस विकसित देश के विकास और खुलेपन को कोस कर तसल्ली कर लेते हैं। लेकिन यदि ‘‘एनिमल’’ से प्रभावित हो कर कोई युवा ऐसी ही हरकत अपने देश में कर बैठेगा तो हम किसे कोसेंगे? सामाजिक वातावरण यू भी कोई बहुत अच्छी स्थिति में नहीं हैं। आए दिन बलात्कार और अपहरण की घटना घटित होती रहती हैं। ऐसे में किसी साइको पात्र को महिमामंडन के साथ प्रस्तुत करना भला कहां तक उचित है? यदि हर नागरिक भारतीय संविधान को ताक में रख कर अपना-अपना संविधान निर्धारित करने लगेगा तो कानून व्यवस्था का तो पूरा सत्यानाश हो जाएगा। जो व्यवस्था पशु समाज में प्रचलित है उसे मानव समाज पर आरोपित किया जाने लगे तो पशुओं और इंसानों में अंतर ही कहा रह जाएगा? हजारों साल में विकसित हुई सभ्यता चकनाचूर हो जाएगी।

अब प्रश्न उठता है कि हमारी भारतीय फिल्मों में ऐसे विपरीत चरित्र के पात्रों को नायक क्यों बनाया जाता रहा है, जिसकी संख्या अब और अधिक बढ़ गई है। बीच में कुछ अच्छे कथानकों वाली फिल्में भी आईं जैसे मिल्खा सिंह, धोनी आदि की बायोपिक, पैडपैन, बजरंगी भाईजान आदि। लेकिन ‘‘हसीना’’ काठियावाड़ी’’ जैसी फिल्मों ने बीच-बीच में झटके भी दिए। यहां समझना होगा कि परिस्थितिजन्य अपराध और साइको अपराध में भी बारीक अन्तर होता है। परिस्थितिजन्य अपराध में सुधरने की गुंजाइश रहती है लेकिन साइको अपराध में अपराधी के सुधरने में संदेह रहता है। क्योंकि साइको अपराधी का मस्तिष्क अपराध के प्रति ही आकृष्ट रहता है। ऐसा व्यक्ति हिंसा को ही अपने सभी मसलों के हल मान लेता है। रहा सवाल फंडिग का तो ‘‘डी कंपनी’’ जैसी फिल्म के लिए कोई ‘‘डी टाईप’’ इंसान फंडिग कर भी सकता है लेकिन ‘‘एनिमल’’ के लिए धन उपलब्ध करा कर समाज और सभ्यता से भला कौन खिलवाड़ करना चाहेगा? अब क्या बाॅलीवुड हर कीमत की सनसनी को हर कीमत पर बेचने का ट्रेंड सेट करना चाहता है? यदि ऐसा है तो यह बात वाकई चिंताजनक है। या फिर यह ओटीटी पर मिली हुई छूट का साईड इफैक्ट तो नहीं है जिसके मुकाबले हिंसा और विक्षिप्तता को पैसा कमाने का माध्यम बनाया जा रहा हो?
गैंगस्टर वाली अपराध कथाओं के फिल्मांकन के ट्रेडीशन से साइको अपराध के ट्रेंड तक आ पहुंचना कोई अच्छा संकेत नहीं है। ‘‘एनिमल’’ के हीरोइज्म को ट्रेंड बनने से रोकने के लिए सरकार, दर्शकों, निर्माताओ, निर्देशकों तथा स्वयं अभिनेताओं को भी लगाम कसनी होगी। बाॅलीवुड के स्वर्णिम इतिहास को भी यूं ग्रहण नहीं लगने दिया जा सकता है।       
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Tuesday, December 12, 2023

पुस्तक समीक्षा | देश प्रेम की गौरवगाथा का स्मरण कराती ओजस्वी कविताएं | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण


प्रस्तुत है आज 12.12.2023 को  #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई कर्नल पंकज सिंह के काव्य संग्रह "वीरों के उद्गार" की समीक्षा।
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पुस्तक समीक्षा     
देश प्रेम की गौरवगाथा का स्मरण कराती ओजस्वी कविताएं        
- समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह
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काव्य संग्रह    - वीरों के उद्गार
कवि          - कर्नल पंकज सिंह
प्रकाशक       - साहित्यागार, धामाणी मार्केट की गली, चौड़ा रास्ता, जयपुर - 302003
मूल्य          - 200/-
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एक देश मात्र भौगोलिक भू-भाग नहीं होता है। ‘‘देश’’ शब्द में वे सारी भावनाएं एवं चेष्टाएं समाई हुई होती हैं जो मनुष्य को मनुष्य होने की प्रेरणा देती हैं। किसी मनुष्य में मनुष्यत्व का आकलन उसमें उपस्थित प्रेम, स्वाभिमान, आत्म सम्मान, आत्म गौेरव, श्रेष्ठ कर्म के लिए आत्मोत्सर्ग की ललक के आधार पर किया जा सकता है। इसीलिए देशप्रेम को जीवन में एक मानक स्थान दिया गया है। हमारे वैदिक ग्रंथों में देश की ‘राष्ट्र’’ शब्द से समुचित व्याख्या की गई है तथा देशप्रेम का तात्पर्य समझाया गया है। यही कारण है कि सदियों से हमारे संस्कारों के रूप में देश प्रेम हमारे रक्त में प्रवाहित है। इसीलिए हर युग में ऐसे वीर सेनानी हुए जिन्होंने अपने देश के लिए आत्मोत्सर्ग के मार्ग को सहर्ष स्वीकार किया। किन्तु आज चिन्ता का विषय यह है कि इलेक्ट्राॅनिक माध्यमों और इंटरनेट के द्वारा किए जा रहे सूचनाओं के विस्फोट से आज का युवा भ्रमित हो रहा है। वह समझ नहीं पाता है कि वह अपने देश के अतीत के गौरवशाली पन्नों को पढ़े और उन्हें याद रखे अथवा आभासीय मिथ्या को सच मानते हुए जिए। इस संक्रमण काल में देश प्रेम की भावना को प्रज्वलित रखने के लिए वीरों के बलिदान को सतत स्मरण करते रहना आवश्यक है। इस दिशा में काव्य संग्रह ‘‘वीरों के उद्गार’’ के प्रकाशन के लिए यही कहा जा सकता है कि यह तब प्रकाशित हुआ है, जब इसकी सबसे अधिक आवश्यकता है।
‘‘वीरों के उद्गार’’ भारतीय थल सेना में सैन्य अधिकारी कर्नल पंकज सिंह का काव्य संग्रह है। वे हिन्दी और अंग्रेजी भाषा पर समान अधिकार रखते हैं। 25 वर्ष से अधिक का उनका सैन्य अनुभव है किन्तु देश प्रेम की भावना उन्हें बाल्यावस्था से ही अपने संस्कारों के रूप में अपने माता-पिता एवं परिवार से मिली है। जब मेरे हाथों में कर्नल पंकज सिंह का यह काव्य संग्रह समीक्षार्थ आया तो स्वतः ही भारतीय नौसेना में कमोडोर ख़ुर्रम शहज़ाद नूर की याद आ गई, जिनके कहानी संग्रह ‘‘सोलह आने सच’’ की समीक्षा मैंने अपने इसी काॅलम में की थी। पनडुब्बीरोधी युद्धशैली के महाप्रशिक्षक रहे कोमोडोर नूर बेहतरीन शायर भी हैं। एक अप्रत्यक्ष तारतम्य का अनुभव हुआ जब भारतीय सेना के ही एक और अंग थल सेना के प्रतिष्ठित अधिकारी कर्नल पंकज सिंह के काव्य संग्रह की कविताओं से हो कर गुज़रने का अवसर मिला। इस काव्य संग्रह में बच्चा सिंह का ‘‘शुभाशीष’’ तथा डाॅ संदेश त्यागी की लिखी भूमिका के साथ ही कृष्ण कुमार ‘आशु’ के विचार दिए गए है। भूमिका में डाॅ संदेश त्यागी की इन सटीक पंक्तियों ने मेरा ध्यान आकर्षित किया जो उन्होंने कवि कर्नल पंकज सिंह के व्यक्ति के बारे में लिखी हैं-‘‘पंकज और सिंह की विशेषताओं का अपूर्व समन्वय उन्हें विरला बनाता है। पंकज जैसा मुलायम स्वाभाव उन्हें कवि बनाता है और सिंह जैसा हौसला और हृदय फ़ौजी।’’
आमतौर पर सैन्य सेवा में रत व्यक्तियों को कठोरता का पर्याय मान लिया जाता है। जबकि यह कठोरता अनुशासन की होती है भावनाओं की नहीं। सैन्य सेवा में संलग्न व्यक्ति भी संवेदनशील होते हैं, वे भी कोमल भावनाओं से परिपूर्ण होते हैं, तभी तो वे देश प्रेम की प्रतिमूर्ति होते हैं। यदि संवेदना नहीं है तो प्रेम हो ही नहीं सकता है और प्रेम नहीं है तो देश के लिए भी अपनत्व एवं आत्मोत्सर्ग की भावना भी नहीं हो सकती है। यह अवश्य है कि सैन्य अधिकारियों को अपने व्यस्ततम जीवन में साहित्य सृजन एवं उसके प्रकाशन का अवसर कम ही मिल पाता है किन्तु जब ‘‘वीरों के उद्गार’’ जैसी पुस्तक प्रकाशित हो कर हमारे सामने आती है तो हमें चैंका देती है।
कर्नल पंकज सिंह का यह काव्य संग्रह उनकी कविताओं का संग्रह मात्र नहीं है अपितु वीरों का काव्यात्मक इतिहास है। एक ऐसा गौरवशाली इतिहास जिसे पढ़ कर रोमांचित हुए बिना नहीं रहा जा सकता है। एक साहित्यकार के रूप में वे अपने दायित्वों को भली-भांति समझते हैं इसलिए उन्होंने संग्रह की पहली कविता युवाओं को समर्पित की है जिसका शीर्षक है ‘‘पहली उड़ान’’। इस कविता को समर्पित करते हुए कवि ने लिखा है कि ‘‘ यह कविता उन नवयुवकों और नवयुवतियों के लिए है जो अपने घरों की छांव से बाहर निकलकर जीवन समर में अपना पहला कदम रखते हैं। ये वह समय है जब उनके परिवार से मिले संस्कार ही उनका पथप्रदर्शन करेंगे। उन्हें जीवन में मनचाही सफलता मिलेगी यदि वे संकल्प के साथ परिश्रम करेंगे।’’ इस पहली कविता की कुछ पंक्तियां देखिए-
जाओ स्वप्नों से आगे बढ़ने का,
तुम में उत्साह भरा है।
रगों में यौवन के तपते,
शोणित का ज्वार उठा है।
जाओ अब अपने कर्मों से,
धर्म ध्वजा फहराओ।
तुम भी सदियों से अर्जित
अपने कुल का मान बढ़ाओ। 

संग्रह में एक कविता है ‘‘आह्वान’’। इसमें कवि पंकज सिंह ने एक नवीन भारत के निर्माण के लिए गौरवमयी इतिहास से प्रेरणा लेकर प्रत्येक नागरिक से श्रम और रक्त के योगदान का आह्वान किया है। अपनी इस कविता में कवि ने लिखा है-
सूखी हुई धरती भी क्या कभी
सिंच पाई है आंसू से,
तपती जलती सूरज की किरणें,
क्या रुकी हैं ठंडी आहों से।
तुमको स्वः से ऊपर उठकर
श्याम मेघ बन जाना होगा,
तड़क कड़क गर्जन कर कर के,
अमृत जल बरसाना होगा
तुमको भी तो आना होगा।

युवाओं एवं देश के प्रत्येक नागरिकों से देश के प्रति यथायोग्य समर्पण के आह्वान के साथ ही कवि ने उन वीरों के जीवन का अपनी कविताओं उल्लेख किया है जिनके बारे में या तो लोग भूलते जा रहे अथवा उन्हें जानकारी ही नहीं है। चूंकि ये कविताएं कवि ने अपने राजस्थन प्रवास के कार्यकाल के दौरान लिखी हैं अतः इनमें अधिकतर राजस्थान के बलिदानियों का उल्लेख है। इस दृष्टि से यह कविताएं और अधिक महत्वपूर्ण हो उठती हैं क्योंकि इन कवितओं के माध्यम से राजस्थान के उन वीरों की जानकारी देश के अन्य प्रांतों के लोगों को भी हो सकेगी जो अभी उन नामों से अपरिचित हैं। कवि ने एक और उत्तम कार्य किया है कि ऐसे वीरों पर अपनी कविता प्रस्तुत करने की पूर्व-पीठिका में उनके बारे में संक्षिप्त परिचय भी दिया है। जैसे राजस्थान के वीर शिरोमणि झाला मान सिंह के बारे में अधिकतर वे लोग ही जानते हैं जिन्होंने महाराणा प्रताप के समय का भारतीय इतिहास पढ़ा है। कवि ने झाला मान सिंह के बारे में परिचय देते हुए लिखा है कि -‘‘एक परम वीर स्वामी भक्त राजपूत योद्धा जिन्होंने हल्दीघाटी युद्ध में हिन्दू हृदय सम्राट महाराणा प्रताप की रक्षा करने के लिए महाराणा प्रताप का छत्र और मुकुट पहन कर शत्रुओं को भ्रमित कर दिया और शौर्य की नवीन परिभाषा लिखते हुए अपने प्राणों की आहुति दे दी। इसी प्रकार झाला मान सिंह के दादा झाला बीड़ा ने भी खानवा के युद्ध में महाराणा सांगा की प्राण रक्षा के लिए महाराणा सांगा का रूप धर लिया था और स्वयं बलिदान हो गए थे।’’ इसके बाद उन्होंने अपनी कविता प्रस्तुत की है जिसकी कुछ पंक्तियां इस प्रकार हैं-
सूर्य उगा हल्दीघाटी पर,
माटी पत्थर वायु तपा।
राणा का छत्र आलोकित कर,
पराक्रम का साक्ष बना।
एक लाख तुर्कों की सेना,
सहम उठी सुनकर ललकार,
ग्यारह सहस्त्र सिंहों का गर्जन,
खींची हुई उनकी तलवार।

इसी प्रकार राजस्थान के लोक देव परमवीर घोघा बप्पा पर भी एक कविता है। घोघा राणा उर्फ़ घोघा बप्पा ने सोमनाथ मंदिर के विध्वंस के लिए जाते हुए महमूद गजनवी को रोकने के लिए उसके साथ युद्ध करते हुए अपने प्राणों की बलि दे दी थी। उस समय उनकी आयु 92 वर्ष थी। वस्तुतः देश के लिए प्राणों की आहुति देने की कोई निर्धारित आयु नहीं होती है। इसी संग्रह में कवि पंकज सिंह ने ‘‘वीरव्रती मेजर नन्दिका जवाहर रेड्डी’’ शीर्षक कविता लिखी है जिसमें उन्होंने मात्र 25 वर्ष की आयु में हिमालय के दुर्गम बर्फीले क्षेत्रों में अपने राष्ट्र की सीमाओं की रक्षा करते हुए उनके शहीद हो जाने का उल्लेख किया है।  इसी संग्रह में ‘‘मरण कला के नायक: मेजर नारायण सिंह’’ शीर्षक कविता है जिसमें कवि ने 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के ‘‘वीर चक्र विजेता’’ मेजर नारायण सिंह के बलिदान बारे में लिखा है। उन्हें ‘‘फाजिल्का का रक्षक’’ भी कहा जाता है। मेजर नारायण सिंह ने पाकिस्तान के मेजर शब्बीर शरीफ को द्वंद्वयुद्ध की चुनौती दी थी। यह द्वंद्वयुद्ध आसफवाला गांव में हुआ था। इस द्वंद्वयुद्ध में ये दोनों वीर अन्तिम सांस तक लड़ते रहे और अपने-अपने वतन के लिए बलिदान हो गए। जोश से भर देने वाली इस कविता की चंद पंक्तियां देखिए-
जब बंदूकें ही कलम हुईं,
स्याही अपना ही लोहू हो,
शब्द शब्द ही अंगारा
और बनी जवानी ज्वाला हो
है तभी कहानी लिख पाएगी।

कर्नल पंकज सिंह ने भारतीय स्त्रियों की वीरता और जीवटता को भी अपनी कविताओं में मुखरित किया है। एक ओर जहां वे अतीत के पन्नों पर दर्ज़ जौहर की चर्चा करते हैं वहीं आज की नारी के साहस की प्रशंसा करते हुए लिखते हैं ‘‘नारी तुम ही शक्ति हो’’। कुल उन्नीस कविताओं के इस ओजपूर्ण काव्य संग्रह में महाराणा प्रताप, झाला मान सिंह के चित्रों के साथ ही शहीद भगत सिंह, मेजर नारायण सिंह, मेजर नारायण सिंह की पत्नी तथा पुत्र, वीर चक्र तथा आसफवाला युद्ध स्मारक, मेजर नन्दिका जवाहर रेड्डी, हिम विदर एवं राष्ट्रीय युद्ध स्मारक के छायाचित्र भी दिए गए हैं जिससे संग्रह की मूल्यवत्ता द्विगुणित हो गई है।
‘‘वीरों के उद्गार’’ काव्य संग्रह में कवि कर्नल पंकज सिंह ने वीरों की ओर से अपनी काव्यात्मक भावप्रस्तुति दी है जिससे संग्रह का नाम सार्थक हो उठा है। भाषा सरल, सहज और ओजस्वी शब्दों से परिपूर्ण है। देशप्रेम की भावना को बल प्रदान करने वाला यह काव्य संग्रह न केवल पठनीय अपितु संग्रहणीय भी है। 
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Saturday, December 9, 2023

टॉपिक एक्सपर्ट | पत्रिका | लगन लगे बिजली के स्मार्ट झटका | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

पत्रिका | टॉपिक एक्सपर्ट | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली में
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टाॅपिक एक्सपर्ट
लगन लगे बिजली के स्मार्ट झटका
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
         बिजली खों छूबोई गलत आए। जो बिजली खों छूहो सो झटका लगहेई। मनो जो बिजली खों छिए बिगैर झटका लगन लगे, सो का करो जाए? अब आप सोच रए हुइयो के जे कां की फकाईं दे रईं, जो ऐसो कऊं हो सकत के बिजली खों बिगैर छुए झटका लग जाए? पर ऐसोई हो रओ अपनी स्मार्ट सिटी में। जोन खों ने मानने, सो ने माने, मानो हमने तो अपने जेई दोई सगे कानों से सुनी आए औ दोई सगी आंखन से पढ़ी आए।
    होत का आए के अपने इते धरारपटी में योजनाएं लागू कर दईं जात आएं। ने कोनऊं होमवर्क औ ने कोनऊं बाद की फिकर। औ उने काए फिकर हुइए? जोन को मुस्किल आहे, बा खुदई भगत फिरहे। जेई सो हो रओ। का आए के अपनी मोंबोली स्मार्ट सिटी के मुतके घरों में लगा दए गए स्मार्ट मीटर। जे मीटर खपत की रीडिंग खुदई बिल के लाने भेज देत आएं। रीडिंग वारे को काम खतम। मनो उनके लाने भौतई अच्छो आए जोन के घरे मीटर अहाता में लगे औ बे दुफैरी में घरे नई रहत। मनो सल्ल जे आए के मीटर बदलत समै जोन रीडिंग बताई गई हती बिल पौंच रए ऊसे ज्यादा। अब स्मार्ट मीटर के स्मार्ट बिल को झटका खाबे वारे इते-उते भगत फिर रए। बाकी बिजली वारे कए रए के जोन शिकायत लेके हमाए इते आहे, सो हम शिकायत दूर कर देबी। जै हो! बिचारो उपभोक्ता अपनों सबरो काम-धंधा छोड़ के बिल सुधराबे फिरत रए। कायदे से तो स्मार्ट मीटर वारे मोहल्लों में शिविर लगाओ चाइए। कछू तो स्मार्टली सोचो चाइए उपभोक्ता की सुबिधा के  लाने।
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Thursday, December 7, 2023

बतकाव बिन्ना की | बे आए, उन्ने लड़ो... औ बे हार गए! | डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम | प्रवीण प्रभात

"बे आए, उन्ने लड़ो... औ बे हार गए!" - मित्रो, ये है मेरा बुंदेली कॉलम "बतकाव बिन्ना की" साप्ताहिक #प्रवीणप्रभात , छतरपुर में।
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बतकाव बिन्ना की
बे आए, उन्ने लड़ो... औ बे हार गए!
        - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
       अब आप कैहो के जे कोन टाईप को शीर्षक आए के - ‘‘बे आए, उन्ने लड़ो औ बे हार गए!’’ लड़ाई में सो हार-जीत लगई रैत आए। जब दो जने लड़हें सो उनमें एक जीतहे औ एक हारहे। हऔ, बिलकुल सई बात! पर जे तो सोचबे की बात आए के बे आए तो हते लड़बे खों मनो सामने वारे से लड़बे से कऊं ज्यादा तो बे आपसई में लड़त रए। सो मोय सो जे नईं समझ परी के लड़बे कोन से आए रए, सामने वारे से के अपनई वारे से? आप सोच रए हुइए के मैं कां की बतकाव कर रई? सो भैया-बैन हरों, अबई तो चुनाव भए अपन ओरन के इते विधान सभा के लाने, अबे तो मईना खांड़ ओई की बतकाव चलत रैहे।
चुनाव के पैले कोनऊं-कोनऊं कैत्ते के अब कुल्ल दिनां हो गए, अब कछू बदलाव भओ चाइए। मने हमें तो लगत आए के जोन के जा टाईप के विचार हते बे सोई बदलाव छोड़ के दोहराव पे आ गए। काय से के उने लगो हुइए के जिन ओरन खों आपसई में लड़बे से फुंर्सत नईयां बे जनता के लाने का कर पाहें? सांची कई जाए तो ई बेर के चुनाव ने बा किसां याद करा दई, बा लकरिया वारी। कौन सी? अरे आप ओरन ने सोई सुन रखी आए। अरे बोई वारी किसां के एक रओ बब्बा। ऊके रए छै ठइयां लरका। बे छै के छै रैत तो संगे हते मनो उनकी आपस में खटापटी चलत रैत्ती। एक दफा उनपे कर दओ दुस्मन ने हमला। बब्बा ने कई के बेटा हरों, जाओ औ जा के दुस्मन खों धूरा चटा आओ। बे छै के छै अपने बब्बा के पांव पर के घरे से निकरे। दुस्मन के लिंगा पौंचत-पौंचत उनमें आपसई में खटापटी होन लगी। एक कैन लगो के देखियो हम कैसे कूटबी दुस्मन खों, सो दूजो बोलो तुम का उखाड़ लैहो? दुस्मन खों तो हम दाई-मताई सबई याद करा दैहें। तीसरे ने अपनी दई, सो चैथे ने अपनी दई। पांचवों सो ऐसो दिखान लगो के मनो ऊने जंग जीतई लई होय औ छठे की तो पूछोई नई। छठां कैन लगो के हम तो जीतई कहाय, अब तुम ओरें हमाऐ गोंड़े दबाव। सो, जे टाईप से बे छै के छै अपसई में लड़त-लड़त दुस्मन के आगूं जा ठाड़े भए। दुस्मन सोई छै-सात भैया हते। बाकी बे ओरें सामने वारे से लड़बे की फुल तैयारी कर के आए हते। उन्ने देखी के बब्बा के जे छै मोड़ा सो आपई में उलझ रए, सो उनको काम आसान हो गओ। उन्ने छै के छै को एक-एक ठूंसा मारो औ कर दओ चारो खाने चित्त।
छैओ भैया कूट-पिट के घरे लौटे। बब्बा ने उनकी दसा देखी सो बे चकरा गए। उन्ने पूछी के तुम ओरे तो दुस्मन खों धूरा चटाबे खों गए रए, औ खुदई धूरा चाट आए, जे कैसे भओ?’’
‘‘ईमें हमाई कोनऊं गलती नोईं, जे बड़े भैया की गलती आए।’’ सबसे छोटो वारो बोलो।
‘‘हमाई का गलती? तुमई तो फंकाई दे रए हते के तुम सब कछू कर सकत आओ।’’ बड़ो वारो बमकत भओ बोलो।
मने जेई टाईप से छै के छै एक-दूसरे खों गरियान लगे। उनके बब्बा ने देखी सो उनकी खपड़िया भिन्ना गई।
‘‘चोप्प! बिलकुल चोप्प!!! तुम ओरे कभऊं ने सुधरहो। ऊंसई तो आपस में गिचड़ कर रैत आओ, मनो हमने सोची हती के दुस्मन के आगूं पौंच के तो मिल के लरहो, मनो तुम ओरन को कछू नईं हो सकत। हमें तो लगत आए के तुम ओरे हमाए मोड़ा नोंई, कोनऊं लड़इया के पिल्ला आओ।’’ बब्बा को मत्था फिर गओ। उन्ने अपने छैओ मोड़ा हरों को आड़े हाथ लओ। बे छैओ अपनों मों बंाध के सुनत रए। औ सुनत नईं, सो का करते? करमई ऐसो कर के आए हते। उनके दुस्मन ने उन ओरन की ऐसी ठुकाई करी हती के हाड़-गोड़ सबई चींख-चींख के गवाई दे रए हते।
बब्बा को जब तनक गुस्सा ठंडो भओ तो उन्ने सोची के जे ओरें एक दफा कुट-कुटा के चले आए, सो बा दुस्मन सो गर्रात फिरहे औ कभऊं बी फेर के अटैक कर सकत आए। ईसे अच्छो के इन छैओ निकम्मों खों तनक सिखा-सुखू के पैलई दुसमन खों ललकारो जाए। 
    सो बब्बा ने उठाई छै ठइयां लकरियां और पकरा दई एक-एक ठइयां उन सबई खों। फेर उनसे बोली के अपनी-अपनी लकरिया खों तोड़ के दिखाओ। उन छै के छै ने अपनी-अपनी लकरिया तोड़ के दिखा दई। फेर बब्बा ने छै ठइयां लकरियां औ उठाईं, औ उने एक पतरी सी रस्सी से आपस में संगे बंाध दई। फेर अपने छैओ मोड़ा से कई के अब तुम ओरें एक-एक कर के लकरियन को जे गट्ठा तोड़ के दिखाओ। पैले बड़े ने कोसिस करी। बा फेल हो गओ। दूसरे वारे ने कोसिस करी, बा सोई ने तोड़ पाओ। तीसरे ने हाथ आजमाओ, बा सोई फिस्स हो गओ। चैथे को तो पसीना मार गओ मनो ऊसे गट्ठा ने टूटो। पांचवे ने औ दम लगाई, पर बा सोई थक के उतई बैठ गओ। सबसे छोटो मने छठे वारे ने कोसिस करी, बा बी ने तोड़ पाओ।
‘‘तुम ओरें ने तोड़ पाए जे गट्ठा? काए?’’ बब्बा ने लरकन से पूछी।
‘‘नईं! काय से के जे लकरियां संगे बंधी आएं, जो अलग-अलग होतीं तो हम कब के चटका चुके होते।’’ बड़े वारे मोड़ा ने कई।
‘‘जेई तो बात आए समझबे की नईं, नासमिटो? अबे तुम ओरें दुस्मन के आगूं जा के ठाड़े भए पर आपस में लड़त रए। जोन को फायदा मिलो दुस्मन को। उन ओरन खों तो कछू मेनत करनेई ने परी हुइए औ तुम ओरन की कुटाई कर के चले गए। जो तुम ओरे जे गट्ठा घाईं संगे मिल के अपने दुस्मन से लड़ते तो मनो इत्ते तो ने कुटते।’’ बब्बा ने छैओ को समझाई।
‘‘हऔ बब्बा जू! आप सांची कै रए। हम ओरें अब कभऊं ऐसो ने करहें। जो कोनऊं से लरने परो सो हम सब मिल के ऊसे लरहें।’’ मंझलो वारो बोलो।
‘‘सो चलो, चिंता ने करो! जल्दई फेर के लड़बो को टेम आन वारो आए, तनक दिखा दइयो अपनो संगठन।’’ बब्बा खुस होत भए बोले। उने समझ में आ गई के उनके मोड़ा हरें सबक सीख गए।
    मनो जे तो रई एक फेमस किसां। जे हर भाषा-बोली में पाई जाती आए औ हर जुग में सुनाई गई। मनो फेर बी कछू जने जे किसां भूला के अपनी लुटिया डुबान लगत आएं। ऊमें बी बब्बा की उमर के बूढ़े-पुराने सयाने। हऔ, जेई तो भओ ई दफा के चुनाव में। एक तो दो अषाढ़, ऊपर से दूबरे औ ऊपे बी आपसी गिचड़। चुनाव के लाने टिकट के देबे के टेम पेई दिखा गओ रओ के बे ओरें आपसई में कोन टाईप से उलझ रए। दो बब्बा हरें आपसई में लड़त रै गए के हमाए आदमियन खों टिकट मिलो चाइए, के हमाए आदमियन खों टिकट मिलो चाइए। उने जोन से लड़ने रओ, बा सोई देख-देख के मुस्कात रओ के जो का हो रओ? ऊके लाने सो अच्छोई हतो। जोन में संगठन नांव की चिरैया ने होय बा संगठन वारे से का खा के लरहे?
   बा हती किसां, सो ऊमें बब्बा के लरका हरों को अपने बब्बा की बात समझ में आ गई रई, मनो इते तो बब्बा हरें ईं आपस में लड़त रए। अब उनके लाने को समझा सकत आए? कऊं ऐसो ने होय के अगली बेरा औरई सफाया हो जाए। बाकी जोन खों जीतबे खों मौका मिलो, उनके लाने जेई कओ जा सकत आए के उन ओरन की संगठन की ताकत ने उने जिताओ आए। बाकी धनी-धोरियन खों सोई उनसे कछू सीखो चाइए के भैया हरों आपस में ने लड़ो, कभऊं-कभऊं पब्लिक खों अपनी सकल दिखा दओ करे, कभऊं- कभऊं कछू पब्लिक को बी हाल पूछ लओ करे। मनो मोय पतो के बे मोरी बात कोन सुनहें, बे सो खुदई खों मिटाबे को कमिटमेंट करे बैठे आएं, तभई तो खुद अपनई नईं सुन रए।
    खैर, सो अब तो आप ओरने खों जा शीर्षक समझ में आ गओ हुइए के ‘‘बे आए, उन्ने (आपस में) लड़ो औ बे (बिरोधी से) हार गए!’’            
    बाकी जो आए सो अच्छे आए, औ जो गए सो अच्छे गए। मनो बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की। सो, सबई जनन खों शरद बिन्ना की राम-राम!
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Wednesday, December 6, 2023

चर्चा प्लस | डाॅ. अम्बेडकर के महापरिनिर्वाण दिवस (6दिसम्बर) पर विशेष | बाबा साहब के जीवन में विशेष महत्व रखने वाली स्त्रियां | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर

चर्चा प्लस  
डाॅ. अम्बेडकर के महापरिनिर्वाण दिवस (6दिसम्बर) पर विशेष:
  बाबा साहब के जीवन में विशेष महत्व रखने वाली स्त्रियां
  - डाॅ (सुश्री) शरद सिंह                                                                                        
       डाॅ. भीमराव अम्बेडकर ने हिन्दू कोड बिल’ के जरिए स्त्रियों को समान अधिकार और संरक्षण दिए जाने की पैरवी की। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि स्त्रियों को संपत्ति, विवाह-विच्छेद, उत्तराधिकार, गोद लेने का अधिकार दिया जाए। स्त्री का विवाह की उसकी मर्जी के बिना न किया जाए। स्त्रियों को पढ़ने का भरपूर अवसर दिया जाए। ऐसे स्त्री-अधिकारों के पक्षधर डाॅ. अम्बेडकर के जीवन को भी कुछ स्त्रियों ने प्रभावित किया था। डाॅ. अम्बेडकर के महापरिनिर्वाण दिवस के अवसर पर यहां प्रस्तुत हैं मेरी पुस्तक ‘‘डाॅ. अम्बेडकर का स्त्रीविमर्श’’ का एक अंश।
डाॅ. भीमराव अम्बेडकर ने अपने जीवन में स्त्रियों के हित की रक्षा करने के लिए अनेक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक कदम उठाए। उनके इन कदमों के पीछे वे स्त्रियां मौजूद थीं जिन्होंने जाने-अनजाने डाॅ. अम्बेडकर के जीवन को प्रभावित किया। उनमें जीवनदायिनी मां भीमाबाई, बुआ मीराबाई, सौतेली मां जिजाबाई, प्रथम पत्नी रमाबाई प्रमुख थीं।

       जीवनदायिनी मां भीमाबाई - डाॅ. अम्बेडकर की मां भीमाबाई वाक्चातुर्य की धनी, सुन्दर, सुशील और धर्मपरायण थीं। वे अत्यन्त स्वाभिमानी थीं। रामजी सकपाल अपने अल्प वेतन से पैसे बचाकर भीमाबाई के पास भेजते थे जो पूरे परिवार के लिये पर्याप्त नहीं था। परिवार के खर्चों को पूरा करने के लिये भीमाबाई ने सान्ताक्रूज में सड़क पर बजरी (कंकड़-पत्थर) बिछाने की मजदूरी का काम करना शुरू कर दिया। कुछ समय बाद भाग्य ने करवट ली और रामजी सकपाल की योग्यता को पहिचान कर उन्हें पूणे के पन्तोजी विद्यालय में पढ़ने का अवसर दिया गया परीक्षा पास करने के उपरान्त उन्हें फौजी छावनी के विद्यालय में अध्यापक का पदभार सौंपा गया। शीघ्र ही उन्हें प्रधान अध्यापक बना दिया गया। वे लगभग चौदह वर्ष तक प्रधान अध्यापक रहे। जिससे उनकी आर्थिक स्थिति सुदृढ़ होती गयी। इस बीच भीमाबाई ने तेरह संतानों को जन्म दिया जिनमें सात संताने ही जीवित रहीं, शेष का बचपन में ही निधन हो गया था।
भीमाबाई बहुत अधिक व्रत-उपवास करती थीं। साथ ही उनकी बीमारी का सही निदान न होने के कारण स्वास्थ्य लगातार गिरने लगा। रामजी सकपाल का स्थानांतरण अलग-अलग छावनियों में होता रहता था। महू (मध्यप्रदेश में इन्दौर के निकट) में रहते समय रामजी सकपाल और भीमाबाई ने कामना की कि उनका एक ऐसा पुत्र उत्पन्न हो जो दीन दुखियों की सेवा करे। भीमाबाई की यह प्रार्थना शीघ्र ही फलीभूत हुई और उन्होंने 14 अप्रैल 1891 को एक पुत्र को जन्म दिया जिसका नाम भीमराव रखा गया। भीमराव को अपनी मां का स्नेह अधिक समय तक नहीं मिल पाया। अस्वस्थता के कारण भीमाबाई का निधन हो गया।
भीमराव अपनी मां को ‘बय’ कह कर पुकारते थे। उन्हें अपनी मां से अगाध स्नेह था। मां की मृत्यु के उपरान्त भी वे अपनी ‘बय’ को कभी भुला नहीं सके। स्वाभिमान, दृढ़ इच्छाशक्ति और किसी भी संकट का साहस के साथ सामना करने का गुण भीमराव को अपनी मां भीमाबाई से मानो अनुवांशिक रूप में मिला था। यह गुण भी उन्हें अपनी मां से ही मिला था कि कोई भी काम छोटा नहीं होता है। ये सारे गुण भीमराव को जीवन में सतत आगे बढ़ाते रहे।

    बुआ मीराबाई - मीराबाई डाॅअम्बेडकर की बुआ थीं। वे उत्साही होने के साथ परिवार-प्रबंधन में निपुण थीं। दुर्भाग्यवश उनका वैवाहिक जीवन सुखद नहीं था। पति से अनबन के कारण उन्हें मायके में अपने छोटे भाई रामजी सकपाल के साथ रहना पड़ रहा था। भीमराव की मां भीमाबाई का निधन होने के बाद मीराबाई ने भीमराव को मां की कमी नहीं होने दी। भीमराव के प्रति उनका अगाध स्नेह था। मीराबाई अत्यंत मितव्ययी थीं। किन्तु बालक भीमराव को यही लगता था कि बुआ के पास पर्याप्त पैसा है। इसीलिए जब भीमराव के मन में विचार आया कि कुली का काम कर के वे परिवार को इच्छित सहयोग नहीं कर सकते हैं और उन्हें मुंबई जा कर मिल में काम करना चाहिए, तो उन्हें मुंबई जाने के लिए धन की आवश्यकता का अनुभव हुआ। उन्हें लगा कि बुआ जिस बटुवे को हमेशा अपनी कमर में खोंसे रहती हैं, उसमें अवश्य इतना पैसा निकल आएगा कि वे उस पैसे से मुंबई पहुंच जाएंगे। वे बुआ से पैसे मांग कर अपने मुंबई जाने का इरादा प्रकट नहीं करना चाहते थे। अतः उन्होंने बुआ के बटुए से चुपचाप पैसे निकालने का निश्चय किया। रात को भीमराव और उनके बड़े भाई बुआ की दाईं-बाईं ओर सोते थे तथा यह क्रम बदलता रहता था। जिस रात भीमराव बटुवे की ओर सोए, उन्होंने चुपके से बटुवा खोल कर देखा। बटुवे में झाँकते ही वे सन्न रह गए। बटुवे में मात्र दो पैसे थे। भीमराव का यह भ्रम टूट गया कि बुआ के पास पर्याप्त पैसे हैं। वे सोच में पड़ गए कि इतने कम पैसों में बुआ इतने सारे सदस्यों का लालन-पालन कैसे कर रही हैं? उन्हें अपने किए पर पश्चाताप हुआ और उन्होंने मुंबई जाने का निश्चय छोड़ कर पढ़ाई में मन लगाने का निश्चय किया। उन्हें लगा कि पढ़-लिख कर ही वे परिवार का सहारा बन सकते हैं। इस घटना के बाद भीमराव के व्यक्तित्व का कायाकल्प हो गया। पढ़ाई के प्रति उदासीन रहने वाला बालक पढ़ाई के प्रति समर्पित हो गया। जो शिक्षक पहले भीमराव के ठीक से न पढ़ने की शिकायत उनके पिता से करते रहते थे, वे अब भीमराव की बुद्धिमानी को देखते हुए उन्हें आगे पढ़ाने का आग्रह करने लगे। यह परिवर्तन बुआ मीराबाई के मितव्ययी स्वभाव और ममत्व के कारण हुआ।

  सौतेली मां जिजाबाई - भीमाबाई की मृत्यु के बाद डाॅ. अम्बेडकर के पिता रामजी सकपाल ने दूसरा विवाह जिजाबाई से किया। जिजाबाई विधवा थीं। जिजाबाई भी रामजी सकपाल के प्रति पूर्ण समर्पिता रहीं। किन्तु बालक भीमराव को उस समय अपनी सौतेली मंा पर बहुत क्रोध आता था जब वे उनकी ‘बय’ अर्थात् मां भीमाबाई के कपड़े और जेवर पहन लेती थीं। एक बार त्यौहार के अवसर पर जिजाबाई ने भीमाबाई के कपड़े-जेवर पहन लिए। यह देख कर उन्हें अपनी सौतेली मंा पर बहुत क्रोध आया। वे अपनी सौतेली मंा जिजाबाई से झगड़ा करने लगे। उसी समय रामजी सकपाल घर आ गए। उन्होंने झगड़े का कारण पूछा तो बालक भीम ने कारण बता दिया। यह सुन कर पिता ने भीमराव को ही डांट दिया। इस पर भीमराव को लगा कि उन्हें स्वयं पैसे कमाने होंगे। इसीलिए उन्होंने ढोर चराए, खेत पर काम किया और तो और कुली का भी काम किया। यद्यपि इसके बाद उनके ज्ञानचक्षु खुल गए और वे समझ गए कि यदि वे परिवार की सहायता करना चाहते हैं तो उन्हें अध्ययन में मन लगाना होगा।
आयु के बढ़ने के साथ-साथ भीमराव अपनी सौतेली  मां  जिजाबाई के मनोविज्ञान को समझते गए और वे उनके चिड़चिड़े स्वभाव को अनदेखा कर उन्हें सदा मान-सम्मान देते रहे। यहां तक कि जिजाबाई की मृत्यु के शोक में डूबे होने के कारण उन्होंने नवम्बर 1997 में दलित वर्ग द्वारा आयोजित सम्मेलन में भाग नहीं लिया।

           पत्नी रमाबाई - डाॅ. अम्बेडकर जब मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण की तभी उनके विवाह के लिए योग्य लड़की की खोज शुरू कर दी गई। उनके लिए रामीबाई को पसन्द किया गया। उस समय रामीबाई नौ साल की थीं और भीमराव सोलह साल के थे। विवाह के बाद रामीबाई का नाम बदल कर रमाबाई रखा गया। रमाबाई बचपन से ही शांत स्वभाव की थीं। वे मितव्ययी और सहनशील भी थीं। मैट्रिक उत्तीर्ण छात्र भीमराव को संविधान निर्माता बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर के स्वरूप तक पहुंचने में रमाबाई के समर्पित सहयोग को अनदेखा नहीं किया जा सकता है। डाॅ. अम्बेडकर उच्चअध्ययन के लिए अमेरिका गए उन दिनों रमाबाई गर्भवती थीं। शीघ्र ही उन्होंने एक पुत्र को जन्म दिया जिसका नाम गंगाधर रखा गया। दुर्भाग्यवश गंगाधर बचपन में ही परलोक सिधार गया। उनके दूसरे पुत्र यशवंत का स्वास्थ्य प्रायः खराब रहता था जिसकी चिकित्सा के लिए वे जूझती रहती थीं किन्तु अपने पति डाॅ. अम्बेडकर के अध्ययनकार्य को बाधित नहीं होने देती थीं। लंदन में अध्ययन के समय डाॅ. अम्बेडकर को अपने मित्र से उधार  मांग कर काम चलाना पड़ा। उस समय भी रमाबाई ने धन की कमी का उलाहना अपने पति को कभी नहीं दिया। उनका प्रयास यही रहता था कि पारिवारिक विषमताओं का प्रभाव डाॅ. अम्बेडकर के जीवन पर न पड़ने पाए और वे निश्चिन्त भाव से अपने महान उद्देश्यों की पूर्ति में संलग्न रहें। रमाबाई के इस समर्पित भाव का डाॅ. अम्बेडकर के जीवन पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा और वे भारतीय समाज की प्रत्येक स्त्री की जीवनदशा एवं संघर्षों के बारे में गहराई से समझ सके।
     सविता देवी - पत्नी रमाबाई की मृत्यु के उपरान्त डाॅ. अम्बेडकर ने सामाज में जातिगत एकता का आदर्श स्थापित करते हुए ब्राह्मण परिवार की विधवा स्त्री सविता देवी से विवाह किया। सविता देवी सुशिक्षित थीं। पुत्र यशवंत राव के विवाह में डाॅ. अम्बेडकर के सम्मिलित न हो पाने पर सविता देवी ने मां के रूप में विवाह में सहयोग दिया।  वे डाॅ. अम्बेडकर के अंतिम समय तक उनके साथ रहीं तथा उनके कार्यों में उन्हें सहयोग देती रहीं। विवाह से पहले उनकी पत्नी का नाम शारदा कबीर था। डाॅ. अम्बेडकर के साथ ही उन्होंने ने भी बौद्ध धर्म ग्रहण कर लिया था।
         डाॅ. अम्बेडकर के जीवन से जुड़ी इन सभी स्त्रियों ने प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप से उन पर अपना स्थाई प्रभाव डाला। इन स्त्रियों के जीवन और समाज में उनके स्थान तथा उनके कर्तव्यबोध के प्रति डाॅ. अम्बेडकर सदा चिन्तनशील रहे तथा इससे उन्हें समाज में स्त्री की दशा को समझने का पर्याप्त अवसर मिला।       
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Tuesday, December 5, 2023

पुस्तक समीक्षा | प्रेमचंद की कथा-परंपरा का स्मरण कराता उपन्यास: ‘‘मुक्तिधाम’’ | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

प्रस्तुत है आज 05.12.2023 को  #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई युवा उपन्यासकार कार्तिकेय शास्त्री के उपन्यास "मुक्तिधाम" की समीक्षा।
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पुस्तक समीक्षा      
प्रेमचंद की कथा-परंपरा का स्मरण कराता उपन्यास: ‘‘मुक्तिधाम’’         
- समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह
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उपन्यास    - मुक्तिधाम
लेखक      - कार्तिकेय शास्त्री
प्रकाशक     - नोशन प्रेस डाॅट काॅम
मूल्य        - 199/-
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क्या है प्रेमचंद की कथा परंपरा? यह प्रश्न बार-बार उठता है जब कोई कथाकार कहता है कि वह प्रेमचंद की कथापरंपरा का अनुसरण कर रहा है। वस्तुतः यह कोई इतना कठिन प्रश्न नहीं है कि जिसका उत्तर न दिया जा सके। किन्तु प्रेमचंद की परंपरा को निर्वाह करना अवश्य कठिन है क्योंकि प्रेमचंद की कथा-परंपरा उन विचारों पर आधारित है जिन्हें हम संक्षेप में मानवीय-मूल्य कहते हैं। समाज के दलित, शोषितसमुदाय के पक्ष में पैरवीकार लेखन ही है प्रेमचंद कथापरंपरा। इस परंपरा का अनुसरण करते हुए एक युवा कथाकार ने अपना पहला हिन्दी उपन्यास लिखा है। उपन्यास का नाम है ‘‘मुक्तिधाम: पीड़ा में अनंत मैन की गाथा’’ और उपन्यासकार हैं कार्तिकेय शास्त्री। हिन्दी में उनका यह पहला उपन्यास वस्तुतः उनका दूसरा उपन्यास है। उनका पहला उपन्यास अंग्रेजी में था -‘‘दी नाईट आउट’’।
       एक युवा कथाकार। अपनी मातृभूमि से हजारों मील दूर दुबई में कार्यरत। लेकिन उसका मन में हर समय समाई रहती हैं अपने देश की स्थितियां और वातावरण। युवा उपन्यासकार कार्तिकेय के लेखन ने मुझे उनके पहले उपन्यास से ही प्रभावित किया था। कार्तिकेय का पहला उपन्यास - ‘‘दी नाईट आउट’’ । बहुराष्ट्रीय कंपनी में काम करने वाले कुछ दोस्तों कुछ दोस्तों के नाईट आउट पर निकलने का खिलंदड़ा-सा कथानक। यद्यपि वह उपन्यास मामूली नहीं था, उसमें युवाविमर्श का गहरा रंग था। वर्तमान युवा जगत का गंभीर मनोविज्ञान था। उस उपन्यास को पढ़ कर सहजता से जाना जा सकता है कि आज का युवा कैसा जीवन जी रहा है तथा कैसा जीवन जीना चाहता है? यह उन्यास अंग्रेजी में था। ईमानदारी से कहूं कि उस उपन्यास को पढ़ने के बाद मुझे कार्तिकेय शास्त्री की रचनात्मक खूबियों का अनुमान तो हो गया था किन्तु यह नहीं सोचा था कि वे अपना अगला उपन्यास अपनी मातृ भाषा हिन्दी में लिखेंगे। जैसा कि आज कल कार्पोरेट जगत से जुड़े युवा कथाकारों का रुझान आंग्ल भाषा की ओर रहता है क्योंकि वह उनके लिए दैनिक जीवन से जुड़ी उनके लिए आसान भाषा होती है। दूसरी बात यह कि उन्हें लगता है कि वे एक ग्लोबल भाषा में साहित्य रच कर जल्दी ही वैश्विक स्तर पर छा जाएंगे। यद्यपि यह उनका सरासर भ्रम होता है। क्योंकि अगर रचना को कालजयी बनाने का श्रेय भाषा को ही होता तो कालिदास अथवा प्रेमचंद की कभी कोई वैश्विक पहचान नहीं होती। किसी भी रचना को वैश्विक बनाता है उसका कथानक एवं उसकी आत्मस्पर्शी शैली।
      अपने प्रथम उपन्यास के लोकार्पण के लिए कार्तिकेय शास्त्री के भारत (सागर) आने पर जब मेरी उनसे भेंट हुई थी तो उन्होंने चर्चा के दौरान बताया था कि उन्होंने जब प्रेमचंद की एक कहानी पढ़ी थी तो वे चकित रह गए थे। उन्हें देश का वह दृश्य दिखाई दिया था जो उनके लिए जाना-पहचाना तो था लेकिन उसके मर्म से वे परिचित नहीं थे। फिर उन्होंने कथाकार प्रेमचंद का और साहित्य पढ़ा। वे जितना पढ़ते गए, उतना प्रभावित होते गए। यह क्रम ‘‘दी नाईट आउट’’ के पहले का था। प्रेमचंद उनके मन-मस्तिष्क में समा गए किन्तु उन्होंने ‘‘दी नाईट आउट’’ पहले लिखा। शायद इसलिए कि उसका कथानक उनके जीवन के बहुत कंरीब था। शायद वे उस कथानक के साथ स्वयं को अधिक ‘कम्फर्टेबल’ अनुभव कर रहे थे। उनके इस निर्णय का परिणाम यह रहा कि ‘‘द नाईट आउट’’ के आज के युवाओं के यथार्थ के विवरण को सभी ने सराहा और उस दस्तक को सहर्ष स्वीकार किया जो कार्तिकेय ने अपने पहले उपन्यास के द्वारा साहित्य जगत के दरवाजे पर दी थी। संवेदनाओं की गहरी पकड़, रोचक बयानी और पात्रों से आत्मीय जुड़ाव कार्तिकेय के कथाकर्म की विशेषताएं हैं। ये सारी विशेषताएं उनके इस दूसरे तथा हिन्दी में पहले उपन्यास में शब्दशः मौजूद हैं।
        इसमें कोई संदेह नहीं कि कार्तिकेय ने प्रेमचंद के पात्रों को अपने उपन्यास में पुनर्जीवित करने का प्रयास किया है। यह आवश्यक भी है क्योंकि प्रेमचंद के पात्र आज भी समाज में मौजूद हैं और अपनी विडम्बनाओं को अथक झेल रहे हैं। जब हम समाचारपत्रों में पढ़ते हैं कि महाराष्ट्र या मध्यप्रदेश में सूखे और कर्जे के कारण किसी किसान ने आत्महत्या कर ली है तो हमें सहसा प्रेमचंद के उपन्यास ‘गोदान’ के होरी, धनिया, गोबर याद आ जाते हैं। ‘पूस की रात’ आंखों के सामने कौंध जाती है। तब महसूस होता है कि किसानों की परिस्थितियां उतनी नहीं बदली हैं जितनी बदल जानी चाहिए थीं। ग्रामीण अंचल में तो दशा बदतर ही है। शोषित वर्ग आज भी शोषण का शिकार बना हुआ है। वस्तुतः आज उसके शोषित होने के लिए वह स्वयं जिम्मेदार है। क्योंकि जिसमें प्रतिरोध का साहस नहीं है वह, शोषण का शिकार होगा ही। ऐसे ही शोषित पात्र मिलेंगे कार्तिकेय शास्त्री के इस उपन्यास ‘‘मुक्तिधाम’’ में। इस उपन्यास की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि जहां जीवन के अंत के बाद अस्तित्व का समापन होता है अर्थात् मुक्तिधाम में ठीक वहीं से कथानक का वास्तविक उद्देश्य धनुष टंकार की ध्वनि के समान गूंजता है। जिसकी झंकार देत तक विचारों को झंकृत करती रहती है। उपन्यास को पढ़ते हुए कई स्थानों पर यह स्मरण नहीं रह जाता है कि हम किसी नवोदित उपन्यासकार की कृति पढ़ रहे हैं। एक सधा हुआ कथानक, मंजी हुई शैली। पात्रों की सटीक प्रस्तुति। लेखक के रचनाकर्म के प्रति आश्वस्ति जगाता है यह उपन्यास।
      प्रेमचंद ने हिन्दी कहानी और उपन्यास की एक ऐसी परंपरा का विकास किया जिसने हिन्दी साहित्य को विषयगत विस्तार दिया तथा कथा साहित्य द्वारा समाज को समझने का एक नया दृष्टिकोण दिया। प्रेमचन्द का कथा साहित्य जितना तत्कालीन परिस्थितियों पर खरा   उतरता है, उतना ही वर्तमान परिवेश में भी प्रतिबिम्बित होता है। प्रेमचंद की रचनाओं में गरीब   श्रमिक, किसान और स्त्री जीवन का सशक्त चित्रण मिलता है। ‘सद्गति’, ‘कफन’, ‘पूस की रात’   और ‘गोदान’ में मिलता है। ‘रंगभूमि’, ‘प्रेमाश्रम’ और ‘गोदान’ के किसान आज भी गांवों में देखे   जा सकते हैं। प्रेमचंद का वास्तविक नाम ‘धनपत राय’ था। उन्होंने सरकारी सेवा करते हुए   ‘‘नवाब राय’’ के नाम से कहानी लिखना आरम्भ किया। जब सरकार ने उनका पहला कहानी  संग्रह ‘सोजे वतन’ ज़ब्त कर लिया,  तब उन्हेांने प्रेमचंद के नाम से कहानियां लिखनी आरंभ कीं।  प्रेमचंद के लेखन से जुड़ी यह घटना बड़ी दिलचस्प है कि जब वे गोरखपुर में थे तो वहां में बुद्धिलाल नाम के पुस्तक विक्रेता से उनकी मित्रता हो गई। वे बुद्धिलाल की दूकान की कुंजियां स्कूलों में बेचने लगे और बदले में उन्हें उसकी दूकान से उपन्यास घर ले जा कर पढ़ने को मिल जाते थे। इस प्रकार दो-तीन वर्ष तक वे लगातार उपन्यास पढ़ते रहे। इसी दौर में उन्हें अहसास हुआ कि उपन्यास में भारतीय ग्रामीण सच्चाई का अभाव है, जो कि कथा साहित्य में प्रमुखता से आना चाहिए। इसीलिए प्रेमचंद ने अपने कथा साहित्य में शोषण, रूढ़ियों, अंधविश्वास, कुरीतियों आदि पर कठोर प्रहार किया और मानवीय संवेदना को आधार त्तव के रूप में समाहित किया।  
                         हर युग की समस्याएं और जटिलताएं अलग अलग होती हैं। इसी तरह हर व्यक्ति  अपनी परंपरा का अभिन्न और अविच्छिन्न अंग है, लमही और सागर के ग्रामीण अंचल की समस्याएं समपीड़ा का बोध कराती हैं। लमही के प्रेमचंद अगर होरी की पीड़ा को देखते हैं तो सागर के कार्तिकेय हरि की त्रासदी को अपने शब्दों में बांधते हैं। प्रेमचंद यदि धनिया साहस और संघर्ष को लिपिबद्ध करते हैं तो कार्तिकेय प्रेमिला की जीवटता को मुखर करते हैं। दरअसल, कार्तिकेय प्रेमचंद के लेखन से प्रभावित ही नहीं अपितु तादात्म्य स्थापित कर चुके हैं अतः वे आज के समाज में प्रेमचंद के पात्रों की उपस्थिति का अन्वेषण करते हैं तथा यथास्थिति उन्हें सामने लाते हैं। यह लेखक की खूबी है कि वह पाठकों को अपने साथ ले कर चलने में सक्षम है। पाठक इस उपन्यास से गुजरते हुए नौ रस का अनुभव करेगा। वह हरि के भोलेपन और नासमझी पर हंसेगा, उसके प्रेम को देख कर आह्लदित होगा, उसके समर्पण को देख कर प्रसन्नता का अनुभव करेगा और उसके संघर्ष को देख कर विषाद की लहरों में डूब जाएगा। गोपाल, मुंशी जैसे खलपात्र उसे क्रोधित करेंगे तो वहीं, चिकित्सालय परिसर के अमानवीय व्यवहार जुगुप्सा से उसका साक्षात्कार कराएंगे। अर्थात् पाठक जीवन के नौरस के साथ चलवित्र की भांति घटनाओं को अपनी आंखों के सामने घटित होते हुए अनुभव करेगा। हरि, गांव का सफाई कर्मचारी है जो अपने परिवार की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए किसी भी सीमा तक जाने को तैयार है। उसकी पत्नी, प्रेमिला, शारीरिक शोषण का शिकार होती है। यह एक इंसान की पीड़ा की, विवशता की पराकाष्ठा है। इस उपन्यास में अनेक छोटी-बड़ी घटनाएं हैं जो पात्रों के पाश्र्व में ले जा कर खड़ा कर देंगी, चौंकाएंगी, हंसाएगीं, रुलाएंगी और बार-बार सोचने पर विवश करेंगी कि हम यह किस तरह के समाज में जी रहे हैं। आद्योपांत पढ़ लेने पर भी उपन्यास के कथानक कई-कई दिनों तक मन को आलोड़ित करता रहेगा और यह अनुभव कराएगा कि आप एक सशक्त उपन्यास के पन्नों से हो कर गुज़रे हैं।  
        कार्तिकेय शास्त्री ने अपने उपन्यास में लेखक ने निम्नवर्ग एवं निम्न-मध्यम वर्ग की दशा को बड़ी बारीकी से रेखांकित किया है। प्रेमिला जैसे स्त्रीपात्र एक अलग स्त्रीविमर्श रचते हैं। संघर्ष के नाना रूप उपन्यास में आए हैं जो आंदोलित करते हैं। साथ ही लेखक की गहरी संवेदनशीलता से भी परिचित कराते हैं। कार्तिकेय शास़्त्री का शैक्षिक एवं कार्यक्षेत्र हिन्दी माध्यम का नहीं है किन्तु पारिवारिक वातावरण ने उन्हें हिन्दी से सतत जोड़े रखा है। इसीलिए उनकी भाषाई पकड़ यदि अलंकारिक नहीं तो कमजोर भी नहीं है। उन्होंने आम बोलचाल की भाषा को चुना है। यह आम पाठकों के लिए सुविधाजनक है। बेशक उपन्यास का शिल्पपक्ष कहीं-कहीं शिथिल हो गया है तथा कुछ विसंगतियां भी हैं किन्तु कथानक सशक्त है। किसी भी युवा कथाकार के पहले उपन्यास में उससे बहुत अधिक आशाएं रखना भी उचित नहीं है क्योंकि साहित्य जब जीवन के अनुभवों अथवा अनुभवों की निकटता से हो कर गुज़रता है तो धीेरे-धीरे और अधिक सशक्त होता जाता है। साथ ही यह अकाट्य सत्य है कि साहित्य में ‘‘परफेक्शन’’ को ले कर हर व्यक्ति का अपना अलग दृष्टिकोण होता है। विशेष यह है कि यह उपन्यास अपने पीछे कई प्रश्न छोड़ जाता है जिनमें सबसे बड़ा प्रश्न है कि हम 21 वीं सदी में ‘विश्वगुरु’ बनने का सपना देखते हैं लेकिन हमारे अपने समाज और व्यवस्था में एक बड़ा वर्ग शोषण और उपेक्षा का जीवन जीने को विवश है, यह स्थिति आखिर कब सुधरेगी? यह प्रश्न समाज को आत्मावलोकन करने का तीव्र आग्रह करता है। ‘‘मुक्तिधाम’’ अर्थात् श्मशान, यानी वह स्थान जो जीवन के थम जाने का साक्ष्य-स्थल होता है, यह उपन्यास उस अंतिम स्थल को प्रतीक बना कर जीवन को संवारने का रास्ता प्रस्तावित करता है। ‘‘मुक्तिधाम’’ को पढ़ने के बाद कार्तिकेय शास्त्री के भीतर उपस्थित कथाकार में प्रबल संभावनाएं स्पष्ट अनुभव की जा सकती हैं। यह भी आशा की जा सकती है कि आगे चल कर वे हिन्दी कथा साहित्य में अपनी एक अलग पहचान बनाएंगे।  
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