Saturday, February 17, 2024

टॉपिक एक्सपर्ट | पत्रिका | स्पीड ब्रेकरन की कोनऊं खों सुध नईयां | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

पत्रिका | टॉपिक एक्सपर्ट | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली में
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टाॅपिक एक्सपर्ट
स्पीड ब्रेकरन की कोनऊं खों सुध नईयां
    - डॉ (सुश्री) शरद सिंह
       कोनऊं गिन के बता सकत का, के अपने शहर में कित्ते स्पीडब्रेकर आएं? नईं, जे कोनऊं नईं बता सकत। काय से के शहर भरे में इत्ते स्पीड ब्रेकर आएं के उनको गिनबे के लाने अलग से गिनबे वारे लगाने परहें। बे ब्रेकर सोई किसम-किसम के आएं। एक स्कूल तरफी एक मुंडी कट स्पीड ब्रेकर आए। मने स्पीडब्रेकर के ऊपरे जो कूबड़ निकरो रैत आए ऊको तनक सो काट दओ गओ आए। सो ईंसे का है के, औ अजीब सो दचका लगत आए। एक ठैरो बजरिया की तरफी। बा में दो ठईयां कूबड़ आएं। जे सोई होत के, रोड काट के पाईप डारी ओ ऊपे ब्रेकर बनवा दओ। ऊंसई अपने इते तो तनक रसूखवारो जो होय सो अपने दोरे एक ठईंयां स्पीड ब्रेकर बनवा लेत आए। मने ऐसो कोनऊं नियम नोंई के मन आए कऊं बी स्पीड ब्रेकर बना के बैठ गए। नियम तो जे आए के कऊं बी स्पीड ब्रेकर बनाबे के पैले नगरीय निकाय मने नगरपालिका से, ने तो नगर निगम से परमीशन लेनी परत आए। पर इते को ले रओ? स्पीड ब्रेकर होत आएं राह चलत वारन की सुरक्षा के लाने, मने अपने इते तो मुसीबत बने ठाड़े। ब्रेकर बनाबे के सोई नियम कायदा होत आएं। स्पीड बंप के दोई तरफी इत्ती ढलान दई जात आए रीढ़ की हड्डी पे दचका ने घले। मनो इते तो ठूंढ़ा से ब्रेकर बना दए जात आएं। के जो ध्यान ने जाए सो फुट भर उछरबो पक्को। ऊपे, ब्रेकर पे कोनऊं इंडीकटर नईं रैत। बिना परमीशन के औ गलत बने ब्रेकर तोड़बे को अभियान चलाओ जाने चाइए। ने तो शहर में कम्मर पिराबे की बिमारी बढ़त जैहे औ दुर्घटना होत रैहे।  
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Friday, February 16, 2024

शून्यकाल | ‘निराला’ के गद्य साहित्य में मानवतावाद का आग्रह | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नयादौर

दैनिक नयादौर में मेरा कॉलम.....        
शून्यकाल
‘निराला’ के गद्य साहित्य में मानवतावाद का आग्रह
      - डाॅ (सुश्री) शरद सिंह                                                                                 *आज मानवतावाद ज्वलंत विषय है। इस विषय पर बड़े-बड़े सेमिनार होते हैं, चर्चाएं होती हैं एवं गोष्ठियां आयोजित की जाती हैं। इन सबके द्वारा इस बात को परखने का प्रयास किया जाता है कि मानवदावाद आखिर है क्या? इसे समाज में कैसे स्थापित किया जाए? जबकि हिन्दी साहित्य की मूल चेतना ही मानवतावादी है। इसमें मानवजीवन के प्रत्येक मूल्यों को बारीकी से जांचा-परखा गया है। मानवतावाद के प्रति सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला का अपना एक अलग दृष्टिकोण रहा। वे जब मानव की बात करते थे तो सबसे पहले दुखी-पीड़ित मानवता के प्रति उनकी संवेदनाएं मुखर होती थीं। ‘निराला’ का मानवतावाद सदा प्रासंगिक है।*
आधुनिकयुग के साहित्यकारों में महाप्राण कहे जाने वाले सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ ने अपने साहित्य में मानवीय मूल्यों और संवेदनाओं को जिस सूक्ष्मता से उकेरा है, वह उन्हें वास्तव में ‘महाप्राण’ सिद्ध करता है। ‘निराला’ में कालिदास की उदात्त कोमल भावनाएं थीं तो कबीर का फक्कड़पन और विवेकानंद की गंभीरता भी थी। ‘निराला’ काव्यजगत् में जितने स्थापित हुए, उतने ही अपने गद्य साहित्य के लिए भी चर्चित हुए। वे बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। उन्होंने स्वयं पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि-‘‘देखते नहीं मेरे पास एक कवि की वाणी, कलाकार का हाथ, पहलवान की छाती और फिलासफर के पैर हैं।’’
‘निराला’ ने सन् 1915 से कविता लिखना आरंभ किया था। सतत् मंथन के बाद उनका पहला काव्य ‘परिमल’ सन् 1929 में प्रकाशित हुआ। ‘निराला’ ने काव्य के छायावादी दृष्टिकोण को अपनाया वहीं प्रयोगवादी मानकों को भी आत्मसात किया। उनके अन्य काव्य हैं- अनामिका, तुलसीदास, कुकुरमुत्ता, अणिमा, बेला, नए पत्ते, अर्चना एवं आराधना। अनामिका में संग्रहीत ‘तोड़ती पत्थर’ कविता मानवीय मूल्यों की उत्कृष्ट धरोहर है। आचार्य नरेन्द्र शर्मा ने ‘निराला’ एवं ‘तोड़ती पत्थर’ के बारे में लिखा है-‘‘वह आधुनिक कवियों में शैलीगत अपनी आधुनिकता के कारण आधुनिकतम, किन्तु वेदान्त, दर्शन और वीरपूजा संबंधी भावना के कारण पुरातन बने रहे। एक ओर वह घोर अहंवादी है तो दूसरी ओर अपनी उदार मनःसंवेदना के कारण वह पददलितों के हिमायती है। ‘तोड़ती पत्थर इलाहाबाद के पथ पर’ ऐसी भी है उनकी कविता। वह कविता एक ओर तो मार्गी है और दूसरी ओर वह पत्थर तोड़-तोड़ कर नए युग का मार्ग बनाती है।’’
कुछ आलोचकों ने निराला के काव्य पर क्लीष्टता का आरोप लगाया है। ऐसे आलोचकों ने ‘निराला’ को ‘कठिन काव्य का प्रेत’ कहा है। ‘निराला’ का ऐसा आकलन इसलिए हुआ क्योंकि वे आलोचक ‘निराला’ के काव्य में निहित मानवीय संवेदनाओं एवं रागात्मक लय को पूरी तरह समझ नहीं सकेे। उनकी इस दुर्बलता से परे ‘निराला’ के काव्य में मानव जीवन का विकासक्रम और उसका संगठन परिलक्षित होता है। मानव की सतत् संघर्षशीलता के चलते मानवमन में होने वाले परिवर्तनों एवं उतार-चढ़ाव का एक अनूठा दर्शन मिलता है ‘निराला’ के काव्य में। वस्तुतः कवि ‘निराला’ युगयुगीन मानवीय मूल्यों की पड़ताल करते हुए युग के साथ चलते रहे। 
‘निराला’ सम्पूर्ण गद्य के विविध रूपों और विशेषकर कथा साहित्य में आस्थावान रहे। ‘निराला’ का आध्यात्मिक दृष्टिकोण भी मानवतावादी था। इसीलिए मानव मन-मस्तिष्क में संचार करने वाले सुख-दुख, राग-द्वेष ‘निराला’ के गद्य साहित्य में मुखर रूप में विद्यमान हैं। ‘निराला’  का मानव देवत्व की तलाश में नहीं, उसकी ऊर्जा देवत्व को गंतव्य मान कर गतिमान नहीं होती किन्तु देवत्व का पर्याय बन कर सामने आती है। ‘निराला’ के गद्य में वेदान्त की अनुप्रेरणा और विवेकानंद की वाणी का प्रभाव ही नहीं बल्कि उनके व्यक्तित्व की विराटता भी विद्यमान है। जब हम ‘निराला’ के काव्य और उनके गद्य में मौजूद मानवचेतना से साक्षात्कार करते हैं तो इस सत्य का अहसास होने लगता है कि पद्य जल नहीं है और गद्य पाषाण नहीं है। वस्तुतः काव्य और गद्य के बीच स्पष्ट धारणात्मक रेखा खींचना कठिन है। हर गद्य में कविता संभव है और हर कविता में गद्य। यह भी सच है कि क्रियात्मक रूप में कविता और गद्य के बीच एक पारंपरिक अंतर माना जाता है और इसी आधार पर कविता में अधि सूक्ष्मता, वाक्संक्षिप्तता, संयम एवं लयात्मकता दिखाई पड़ती है तथा गद्य में अधिक विस्तार, खुलापन एवं व्यापकता का बोध होता है। कुछ आलोचक यह मानते हैं कि काव्य की अपेक्षा गद्य में मूल्यनिर्णय की क्षमता अधिक होती है। जबकि ‘निराला’ के काव्य और गद्य को एक-दूसरे के समान्तर रख कर देखा जाए तो दोनों ही विधाएं समान रूप से मूल्य-निर्णायक साबित होती हैं। अतः यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि वे कौन से कारण रहे होंगे जिन्होने ‘निराला’ को काव्य के साथ-साथ गद्य सृजन से भी जोड़ा, वह भी समउत्कृष्टता और समर्पण के साथ। इस प्रश्न का उत्तर इस एक तथ्य में निहित है कि ‘निराला’ के भीतर एक संवेगतत्व निरंतर प्रवाहित रहा। जीवन के विविध पक्षों में विचरण के कारण ही ज़मीन से जुड़े ‘निराला’ के भीतर हमेशा एक अंतद्र्वन्द्व चलता रहा। वे उद्वेलित होते रहे। जीवन की विषमताओं को ले कर उनके मन में सदा पीड़ा रही कि एक मानव दूसरे मानव का शोषण क्यों करता है? यह सहज प्रश्न और जिज्ञासा उन्हें आकुल करती रही और अंतर्मन में अनजाने में ही एक चिंतन प्रक्रिया बराबर चलती रही। यह उनके भीतर क्रांतिचेतना की पीठिका एवं प्रेरक बनी। यही क्रांतिचेतना अथवा मानववाद ‘निराला’ से काव्य के साथ-साथ गद्य सृजन भी कराती रही।
‘निराला’ का प्रथम उपन्यास ‘अप्सरा’ सन् 1931 में प्रकाशित हुआ। सन् 1933 में ‘अलका’, 1936 में प्रभावती एवं ‘निरुपमा’, 1946 में ‘चोटी की पकड़’ तथा 1950 में ‘काले कारनामे’ उपन्यास प्रकाशित हुआ। लगभग 25 वर्ष तक ‘निराला’ गद्य साहित्य के माध्यम से मानवमूल्यों एवं संवेदनाओं के आकलन और उद्घाटन में संलग्न रहे। इस सतत् प्रवाहित प्रक्रिया के चलते उन्होंने ‘अप्सरा’ में समर्पण, त्याग और बलिदान की प्रेरणा का आधार बनाया। जीवन को आस्वाद की आश्वस्ति दी, कर्म की मानववादी मनोभूमि पर निर्भीकता और स्वावलम्बन को स्थापित किया। ‘अलका’ में नारी के स्वाभिमान, मानव का अधूरापन, मानवीय विवशता, विडम्बना, अत्याचार, उत्पीड़न और शोषण के विविध रूपों को प्रस्तुत किया। ‘प्रभावती’ में नारी गौरव के साथ प्रेम की उन्मुक्त चेतना को रेखांकित किया। ‘निरुपमा’ में उन्होंने सामाजिक वैषम्य, नारी गरिमा के साथ मानसिक वृत्तियों का विश्लेषण एवं कर्मचेतना को प्रकट किया। ‘चोटी की पकड़’ और ‘काले कारनामे’ उपन्यास स्वदेशी आंदोलन और आंदोलन की सामाजिक भूमिका पर आधारित है, जिन्हें मानवीय गरिमा, मानवीय औदात्य के साथ-साथ मानवीय बोध और मनुष्य की साधना को मुखर किया है।
‘निराला’ की कहानियां हैं -चतुरी चमार, देवी, राजा साहिब ने ठेंगा दिखाया, हिरनी, अर्थ, सफलता, क्या देखा, सुकुल की बीवी, श्रीमती गजानन और कला की रूपरेखा। ‘चतुरी चमार’ और ‘सुकुल की बीवी’ दो समांतर धरातल की कहानियां हैं। एक में मानवीय विडम्बना और जीवन का आक्रोश उद्घाटित हुआ है तो दूसरी में नारीजीवन की विडम्बना के प्रति रूढ़ियों से मुक्ति का आह्वान किया गया है। ‘निराला’ ने ‘देवी’ में मानवीय पर्तांे की अंदरूनी बखिया को सामने रखा है तो ‘राजा साहिब ने ठेंगा दिखाया’ में अभिजात्यवर्ग के बौद्धिक दिवालियापन पर कटाक्ष किया है। ‘हिरनी’ मानवीयबोध का प्रश्न उठाती है और ‘श्रीमती गजानन’ नारी के स्वाभिमान से ओतप्रोत है। ‘क्या देखा’ स्वच्छंद प्रेम की मानववादी अभिव्यक्ति है तो ‘कला की रूपरेखा’ मानवीय दुष्प्रवृत्तियों पर चोट करती है। ‘‘चतुरी चमार’’ का यह अंश मानवीय संवेदना का श्रेष्ठ उदाहरण कहा जा सकता है-‘‘एक प्रसंग पर आने के विचार से मैंने कहा, ‘चतुरी, तुम्हारे जूते की बड़ी तारीफ है।’ खुश होकर चतुरी बोला, ‘हाँ काका, दो साल चलता है।’ उसमें एक दर्द भी दबा था। दुखी होकर कहा, ‘काका, जिमीदार के सिपाही को एक जोड़ा हर साल देना पड़ता है। एक जोड़ा भगवता देता है। एक जोड़ा पंचमा। जब मेरा ही जोड़ा मजे में दो साल चलता है तब ज्यादा लेकर कोई चमड़े की बरबादी क्यों करे?’ कहकर डबडबाई आँखों से देखता हुआ जुड़े हाथों सेवई सी बटने लगा।’’
‘कुल्लीभाट’ समलैंगिकता पर केन्द्रित संस्मरण है। इसमें निराला ने लिखा है कि उन्हें कुल्ली भाट के समलैंगिक होने का ज्ञान नहीं था जिससे वे उसकी चेष्टाओं को सामान्य रूप में लेते रहे। बाद में उन्हें आलोचना सहित बताया गया कि कुल्ली समलैंगिक है। फिर भी निराला ने कुल्ली का साथ नहीं छोड़ा और उसे सामान्य जीवन में प्रवृत्त होने में सहायता की- ‘‘कुल्ली ने विवाह किया। उस विवाह का बहुत विरोध हुआ किंतु निराला ने उसका पूरा-पूरा साथ दिया और पूर्ण होने तक उनके साथ डटे रहे। एक समलैंगिक कुल्ली में निराला नायकत्व देखते हैं और उसे अपनी कथा का नायक बनाने का जोखिमपूर्ण कार्य करते हैं ये निराला की सामाजिक प्रतिबद्धता का परिचायक है। सर्वविदित कि निराला स्वभाव से ही नहीं साहित्य में भी विद्रोही थे और उनके विद्रोही स्वभाव के कारण ही उनकी मित्रता कुल्ली से हो जाती है। निराला ने कुल्ली को देखकर लिखा था, मनुष्यत्व रह-रह कर विकास पा रहा है। अर्थात निराला ने कुल्ली में मनुष्यता का विकास देखा था।’’
‘निराला’ के रेखाचित्र एवं संस्मरणों में ‘कुल्लीभाट’ और ‘बिल्लेसुर बकरिहा’ का सृजन निराला-साहित्य की अनन्यतम घटना मानी जा सकती है। वस्तुतः ‘कुल्लीभाट’ में कुल्ली का स्वरूप विद्रोही चेतना के उद्वेलन से आंदोलित हुआ है वहीं ‘बिल्लेसुर बकरिहा’ को मनुष्य की महत्वाकांक्षा का प्रस्तुतिकरण कहा जा सकता है। ‘निराला’ ने मानवता को समझा, जिया और उसे अपने गद्य साहित्य में सम्पूर्णता के साथ उतारा। ‘परिमल’ के छायावादी ‘निराला’, ‘कुकुरमुत्ता’ के प्रयोगवादी ‘निराला’ और ‘बिल्लेसुर बकरिहा’ के चरित्र-अन्वेषी ‘निराला’ -इन तीनों में एक तत्व समान रूप से मौजूद है, वह है मानवतावादी दृष्टिकोण। निराला के गद्य साहित्य में मानवतावाद का उतना ही तीव्र आग्रह है जितना कि उनके पद्य साहित्य में।
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Wednesday, February 14, 2024

चर्चा प्लस | वसंत पंचमी एक पौराणिक उत्सव, जिसकी आज आवश्यकता है | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर


चर्चा प्लस  
वसंत पंचमी एक पौराणिक उत्सव, जिसकी आज आवश्यकता है
    - डाॅ (सुश्री) शरद सिंह                                                                                        
      वसंत पंचमी एक ऐसा उत्सव है जिसका पुराणों में विविध कथाओं के रूप उल्लेख है। आदि से लेकर अद्यतन साहित्य तक मौजूद वसंत पंचमी जो अतीत में एक विराट उत्सव के रूप में मनाया जाता था, आज औपचारिक एवं आभासीय दुनिया तक सिमट कर रह गया है। जबकि आज के मानसिक तनाव भरे जीवन में वसंत पंचमी जैसे उत्सवों की अत्यंत आवयकता है। यदि मानव के जीवन में उत्सवों का उल्लास रहे तो उसे किसी भी तरह का अवसाद घेर नहीं सकेगा और वह दूने उत्साह से अपने कार्यों को कर सकेगा। यूं भी वसंत पंचमी वह त्योहार है जो प्रकृति के सौंदर्य की ओर ध्यान आकर्षित करता है अतः प्रकृति संरक्षण में भी वसंतोत्सव अहम भूमिका निभा सकता है।  
   
वसंत पंचमी भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग है। यह सच है कि आधुनिकता की अंधी दौड़ में जीवन के अनेक उत्साही मूल्य पीछे छूटते चले गए। रही-सही कसर बाज़ारवाद ने पूरी कर दी। वसंतपंचमी पर अब वैसे उत्सव नहीं होते जैसे पहले हुआ करते थे। इसका कारण एक यह भी है कि इंसान अब भौतिकतावाद की भागमभाग में फंस गया है। वह इंटरनेट और सोशलमीडिया में तो उत्सव का उत्साह प्रकट करता है किन्तु पास-पड़ोस के साथ मिल कर उसे उत्सव में नहीं ढालता। कुछ औपचारिक आयोजनों को छोड़ दिया जाए तो वसंत पंचमी सरस्वती पूजन तक सिमट कर रह गया है। साहित्य समाज महाकवि निराला को याद कर लेता है। महिला समाज पीले रंग के कपड़े पहन कर अपना उत्साह प्रकट कर लेता है किन्तु वसंत पंचमी का वास्तविक मर्म और उत्साह मानो कहीं खो-सा गया है। मुझे अभी भी याद है कि जब मैं प्रायमरी कक्षा में पढ़ती थी तब पन्ना मुख्यालय में स्थित मनहर कन्या उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में बड़े धूम-धाम से वसंतपंचमी का उत्सव मनाया जाता था। मेरी मां डाॅ. विद्यावती ‘‘मालविका’’ वहां हिन्दी की व्याख्याता थीं तथा उस समय विमला बैसाखिया मैडम (जिनके पति ‘मानव’ सरनेम लिखते थे और शायद किसी राजनीतिक दल से जुड़े थे) वहां प्राचार्य थीं। बैसाखिया मैडम और मेरी मां परस्पर मिल कर पूरे आयोजन की बागडोर सम्हालती थीं। प्रातः 9-10 बजे के लगभग सरस्वती पूजन होता था। फिर छात्राएं अपना वसंत-नृत्य प्रस्तुत करती थीं। फिर स्कूल प्रांगण में ही भोजन पकाया जाता था और छात्राएं तथा स्कूल के सभी कर्मचारी एक साथ पंगत में बैठ कर भोजन करते थे। उस दिन सभी पीले रंग के कपड़े पहनते थे। यानी छात्राओं को भी यूनीफार्म से छूट रहती थी। सभी छात्राओं को कुछ उपहार भी दिए जाते थे, शायद पेन या पेंसिल। तीन-चार वर्ष तक चली इस परंपरा का तो मुझे स्मरण है फिर यह परंपरा कैसे, कब और क्यों बंद हो गई मुझे पता नहीं है। यह जरूर है कि इस समारोह के कारण सभी छात्राओं को वसंतपंचमी के महत्व का पता चलता था और जाहिर है कि एक छात्रा का परम्पराओं से परिचित होने का अर्थ होता है एक पूरे भावी परिवार का परम्पराओं से जुड़ना। चूंकि यह उत्सव स्कूल में होता था अतः उसका परिष्कृत और शैक्षिक पक्ष ही छात्राओं को ज्ञान के रूप में मिलता था। अंधविश्वास का उसमें तनिक भी अंश नहीं होता था।

वसंत पंचमी की परम्परा पौराणिक काल से चली आ रही है। पौराणिक कथाओं के अनुसार वसंत को कामदेव का पुत्र कहा गया है। कवि देव ने वसंत ऋतु का वर्णन करते हुए कहा है कि रूप व सौंदर्य के देवता कामदेव के घर पुत्रोत्पत्ति का समाचार पाते ही प्रकृति झूम उठती है, पेड़ उसके लिए नव पल्लव का पालना डालते है, फूल वस्त्र पहनाते हैं पवन झुलाती है और कोयल उसे गीत सुनाकर बहलाती है।

वसंत पंचमी के संबंध में ‘‘भविष्य पुराण’’ में उल्लेख मिलता है कि वसंत माघ की पंचमी में उल्लास के देव ‘कामदेव’ और सौन्दर्य की देवी ‘रति’ की मूर्ति बनाकर सामूहिक रूप से पूजन किया जाता है। राजा भोज के ‘सरस्वती कण्ठाभरण’ नामक ग्रंथ में इस उत्सव का बड़े सुन्दर ढंग से चित्रण किया गया है। ‘हरि विलास’ में स्पष्ट ही उल्लेख मिलता है कि वसंत का उद्भव माघ शुक्ल वसंत पंचमी के दिन हुआ। कालिदास के ‘ऋतु संहार’ नामक ग्रंथ में प्रकृति और मानव सौन्दर्य के अनेक पहलुओं का वर्णन किया गया है। ‘रत्नावली’ ग्रन्थ में इसका ‘वसंतोत्सव’ एवं ‘मदनोत्सव’ दोनों ही नामों से उल्लेख मिलता है। कालिदास, माघ, भारवि आदि संस्कृत कवियों से लेकर वर्तमान संस्कृत-हिन्दी कवियों ने भी वसंत-वर्णन किया है। ग्रंथों में वसंत को ऋतुराज, कामसखा, पिकानन्द, पुष्पमास, पुष्प समय, मधुमाधव आदि नामों से सम्बोधित किया गया है।

पुराणों में वसंत पंचमी के दिन मां सरस्वती के अवतरण की एक रोचक कथा मिलती है। कथा के अनुसार भगवान विष्णु के कहने पर भगवान ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना की। किन्तु सृष्टि में चारो ओर उदासी छाई हुई थी। जीव थे किन्तु वे मौन थे। उनके जीवन में उल्लास की कमी थी। ब्रह्मा को समझ में नहीं आ रहा था कि वे क्या ऐसा उपाय करें जिससे सृष्टि में उल्लास का वातावरण छा जाए। अपनी इस समस्या को ले कर वे भगवान विष्णु के पास पहुंचे। विष्णु ने उन्हें अपने कमंडल का जल सृष्टि रूपी पृथ्वी पर छिड़कने को कहा। पृथ्वी पर जल छिड़ते ही एक सुंदर देवी प्रकट हुई। जिसकी चार भुजाएं थीें। यह देवी विद्या, बुद्धि और संगीत की देवी थीं। उस देवी के एक हाथ में वीणा दूसरे हाथ में मुद्रा तथा अन्य दो हाथों में पुस्तक व माला थी। देवी ने वीणा वादन किया। वीणा के स्वर के कारण पृथ्वी पर रहने वाले सभी जीवों, मनुष्यों को वाणी प्राप्त हुई। देवी ने जीवों को संगीतमय स्वर दिया। जिससे सारा वातावरण संगीतमय और सरस हो उठा। सृष्टि में स्वर और संगीत की सरसता तथा ज्ञान की गंगा प्रवाहित करने वाली देवी को सरस्वती कहा गया। सृष्टि में उल्लास छाते ही प्रकृति भी प्रफुल्लित हो उठी और चारो ओर फूल खिल गए, भौरें गुनगुनाते लगे। माघ मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी को देवी सरस्वती का अवतरण हुआ था। इसलिए वह दिन वसंत पंचमी कहलाया और तभी से सरस्वती का पृथ्वी पर अवतरण दिवस मनाया जाने लगा। वसंत के इस पर्व पर विद्या की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती के पूजन का भी विधान है।

वसंत ऋतु के बारे में ऋग्वेद में भी उल्लेख मिलता है- ‘‘प्रणो देवी सरस्वती वाजेभिर्वजिनीवती धीनामणित्रयवतु।’’ इसका अर्थ है सरस्वती परम् चेतना हैं। वे हमारी बुद्धि, समृद्धि तथा मनोभावों की सुरक्षा करती हैं। ‘‘श्रीभगवद गीता’’ में भगवान श्रीकृष्ण ने वसंत को अपनी विभूति माना है और उसे ‘ऋतुनां कुसुमाकर’ कहा है।

प्राचीन पुराणों में ‘‘ब्रह्मवैवर्त पुराण’’ के प्रकृति खंड में सरस्वती के स्वरूप के बारे में वर्णन मिलता है। जिसके अनुसार दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती, सावित्री और राधा ये पांच देवियां प्रकृति कहलाती हैं। ये श्रीकृष्ण के विभिन्न अंगों से प्रकट हुई थीं। उस समय उनके कंठ से प्रकट होने वाली वाणी, बुद्धि, विद्या और ज्ञान की जो अधिष्ठात्री देवी हैं उन्हें सरस्वती कहा गया है। ‘‘ब्रह्मवैवर्त पुराण’’ के अनुसार वसंत पंचमी को श्रीकृष्ण ने देवी सरस्वती को प्रसन्न होकर वरदान दिया था।
वसंत पंचमी से जुड़ी अनेक महत्वपूर्ण कथाएं मिलती हैं। एक कथा में विवरण मिलता है कि वसंत पंचमी के दिन भगवान शिव ने मां पार्वती को धन और सम्पन्नता की देवी होने का वरदान दिया था। इसलिए मां पार्वती का नाम ‘नील सरस्वती’ पड़ा। कहा जाता है कि इस दिन भगवान श्रीराम शबरी के आश्रम में पधारे थे। इसी दिन वाल्मीकि को सरस्वती मंत्र मिला था तथा कालिदास द्वारा भगवती उपासना की थी। ‘‘मत्स्य पुराण’’ में सरस्वती विवाह के प्रसंग हैं तो दूसरी ओर ज्ञान की देवी के रूप में सरस्वती की आराधना विधान है।

वसंत पंचमी पर सबसे महत्वपूर्ण प्रसंग मिलता है ‘‘शिव पुराण’’ में। जो देवी सती से संबंधित है। इस पौराणिक कथा के अनुसार, अपने पति महादेव का अपने पिता दक्ष द्वारा तिरस्कार किए जाने से क्षुब्ध हो कर देवी सती ने हवन कुंड में कूदकर आत्मदाह कर लिया। इस घटना से महादेव विचलित हो उठे। वे शोकाकुल हों कर तपस्यालीन हो गए। उस समय तारकासुर ने ब्रह्मा जी की तपस्या की और उन्हें प्रसन्न कर वरदान मांगा कि उसकी मृत्यु सिर्फ शिव के पुत्र के हाथों से ही हो। तारकासुर जानता था कि शिव सती के वियोग में तपस्यालीन हैं। न तो उनका ध्यान भंग करना संभव है और न ही शिव का आसानी से दूसरा विवाह हो सकता है। ब्रह्मा भी तारकासुर का उद्देश्य समझ गए किन्तु वे वर देने के लिए वचनबद्ध हो चुके थे अतः उन्होंने तारकासुर को वरदान दे दिया। तारकासुर को लगा कि शिव का पुत्र ही उसे मार सकता है,जोकि कभी जन्म ही नहीं लेगा। अतः वह निर्द्वन्द्व हो कर देवताओं और ऋषियों पर अत्याचार करने लगा।  देवता तथा ऋषि तारकासुर के अत्याचरों से त्राहि-त्राहि कर उठे और भगवान विष्णु की शरण में पहुंचे। तब विष्णु ने देवताओं को बताया कि तारकासुर का विनाश तभी संभव है जब महादेव की तपस्या भंग हो और वे संतानोत्पत्ति के लिए मान जाएं। विष्णु ने देवताओं से कहा कि इस संबंध में वे कामदेव से सहायता मांगे।
कामदेव जानता था कि महादेव का तप भंग करना उसकी मृत्यु का कारण बन सकता है किन्तु देवताओं और ऋषियों की रक्षा तथा तारकासुर के वध के लिए वह तप भग करने को तैयार हो गया। कामदेव ने शिवजी का तप भंग करने के लिए बंसत ऋतु को उत्पन्न किया और अपनी पत्नी रति के साथ मिल कर इंद्रजाल रचा।। जिससे ऋतु में परिवर्तन हो गया। ठंडी व सुहावनी हवाएं चलने लगीं, पेड़ों में नए पत्ते आना शुरू हो गए, सरसों के खेत में पीले फूल खिलने लगे, आम के पेड़ों पर बौर आ गए। फिर कामदेव ने तपस्यालीन शिव पर काम बाणों की वर्षा की, इससे शिव का तप भंग हो गया। तप भंग होने पर शिव को भयानक क्रोध आया और क्रोध में उनका तीसरा नेत्र खुल गया, जिससे कामदेव भस्म हो गया। कुछ समय बाद जब महादेव का क्रोध शांत हुआ तब देवताओं ने उन्हें बताया कि कामदेव को ऐसा क्यों करना पड़ा। इसके बाद कामदेव की पत्नी रति ने महादेव से निवेदन किया कि किसी तरह वे कामदेव को पुनः जीवित कर दें। तब शिव ने कामदेव को पुनः जीवन देते हुए रति को वरदान दिया कि द्वापर युग में कामदेव श्रीकृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न के रूप में जन्म लेंगे। इसके कुछ समय बाद पार्वती की तपस्या से शिव प्रसन्न हुए और उनका विवाह पार्वती के साथ हो गया। शिव और पार्वती के पुत्र के रूप में कार्तिकेय ने जन्म लिया। इसी शिवपुत्र कार्तिकेय ने तारकासुर का वध करके देवताओं को उसके अत्याचार से रक्षा की।

वसंत ऋतु को प्रकृति के यौवन के रूप में जाना जाता है क्योंकि यह ऋतु सर्दी और गर्मी के मध्य का आनन्ददायक समय होता है। प्राचीन और मध्यकाल में वसंतोत्सव एक महत्वपूर्ण उत्सव हुआ करता था। इसका विवरण छठी शताब्दी ईस्वी में हर्ष लिखित ‘‘रत्नावली’’ में मिलता है। इस रचना में रत्नावली उस उन्मुक्तता का आग्रह करती है जो इस त्योहार की विशेषता है और प्रेम देवता काम की अनुष्ठानिक पूजा के बारे में बताती है। कालिदास ने ‘‘कुमारसंभव’’ में लिखा है कि वसंत काम की प्रभावशीलता में सहायक होता है। "विक्रमोर्वशीयम्" ‘(विक्रमचरित) में भी वसंतोत्सव का उल्लेख है।
आज के मानसिक तनाव भरे माहौल में वसंतोत्सव जैसे पौराणिक उत्सवों की शालीन वापसी आवश्यक है जिससे लगभग यांत्रिक हो चुकी मानवीय दिनचर्या में सरसता का संचार हो सके तथा उसे अपने सांस्कृतिक उत्सवधर्मिता का अहसास हो सके। यूं भी वसंत पंचमी वह त्योहार है जो प्रकृति के सौंदर्य की ओर ध्यान आकर्षित करता है अतः प्रकृति संरक्षण में भी वसंतोत्सव अहम भूमिका निभा सकता है। वसंत पर कवि पद्माकर का यह छंद स्वतः याद आने लगता है -
कूलन में केलिन कछारन में कुंजन में,
क्यारिन में कलिन-कलीन किलकंत है।।
कहै पद्माकर परागन में पौन हूं में,
पानन में पिकन पलासन पगंत है।।
द्वार में दिसान में दुनी में देस-देसन में,
देखो दीप-दीपन में दीपत दिगंत है।
बीथिन में ब्रज में नबेलिन में बेलिन में,
बनन में बागन में बगरो बसंत है।।
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