Friday, March 22, 2024

आबिद सुरती जी से भेंट | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

13 मार्च 2024 की शाम को एक रेस्टोरेंट में Living Legend आबिद सुरती जी से अचानक भेंट हो गई... 
मेरे जैसे न जाने कितने लोग "धर्मयुग" के कार्टून कोना "डब्बू जी" को देखते हुए बड़े हुए हैं... कभी सोचा न था कि आबिद सुरती जी से अचानक यूं भेंट हो जाएगी वह भी नई दिल्ली के एक रेस्टोरेंट में... थोड़ी देर बाद हम सभी एक ही टेबल पर आ गए। चर्चा के दौरान आबिद सुरती जी ने बताया कि वे "पानी बचाओ अभियान" में सक्रियता से कम कर रहे हैं... जब उन्हें पता चला कि मैं भी इस दिशा में निरंतर सक्रिय रहती हूं तो उन्होंने मुझे एक पोस्टर भेंट किया...
       इसके बाद हम सभी ने एक-एक पोस्टर अपने हाथों में लेकर एक ग्रुप फोटो खिंचवाई।
     आबिद सुरती जी निश्चित रूप से ज़मीन से जुड़े व्यक्ति हैं... अत्यंत सज्जन, सरल और हंसमुख स्वभाव के... उनसे मिलना मेरी इस यात्रा की एक बहुत महत्वपूर्ण  उपलब्ध रही...
#डॉसुश्रीशरदसिंह #DrMissSharadSingh #savewater #savewatersavelife #savewatersaveearth

शून्यकाल | श्रीराम से होली खेलने वाली बुंदेला रानी | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नयादौर

दैनिक नयादौर में मेरा कॉलम...      
शून्यकाल
श्रीराम से होली खेलने वाली बुंदेला रानी
- डाॅ (सुश्री) शरद सिंह                                                                                           
     श्रीराम की ओर सभी कवियों ने दास भाव से देखा किन्तु सखीभाव से एक ही रानी ने देखा। बुंदेलखंड की विशेषता बहुत बड़ी सांस्कृतिक विशेषता इसी रामभक्ति में मौजूद है। सभी जानते हैं कि मीरा को कृष्णभक्ति करने पर राणा द्वारा विषपान कराया गया। लेकिन बुंदेलखंड में इससे बिलकुल अलग इतिहास है। यहां रानी की कृष्ण भक्ति को लेकर राजा के मन में मनिक रोष जागा किन्तु शत्रुता नहीं। बुन्देलखण्ड की ऐतिहासिक स्थली ओरछा में एक रानी हुई जिसका जीवन श्रीराम की भक्ति में डूबा हुआ था। इनका मूलनाम था गणेश कुंवरी अथवा कंचन कुंवरी।
जब बात हो बुंदेलखंड होली की तो यहां की परम्पराओं और कथाओं में स्त्रीशक्ति को बखूबी देखा जा सकता है। बुंदेलखंड की वे महिलाएं जो हर दिन समस्याओं का सामना करती हैं लेकिन उनके भीतर मौजूद उत्सवधर्मिता होली आते ही उनके साहसी व्यक्तित्व को सबके सामने ला देती है। कवि पद्माकर ने अपने इस कवित्त में बुंदेलखंड की महिलाओं के साहस भरे पक्ष को बड़ी सुंदरता से सामने रखा है -
फागु की भीर, अभीरिन ने गहि गोविंद लै गई भीतर गोरी
भाय करी मन की पद्माकर उपर नाई अबीर की झोरी
छीने पीतांबर कम्मर तें सु बिदा कई दई मीड़ि कपोलन रोरी
नैन नचाय कही मुसकाय ’’लला फिर आइयो खेलन होरी
बरसाने की ‘लट्ठमार‘ होली विश्वविख्यात है लेकिन बुंदेलखंड में भी कुछ स्थानों पर ‘लट्ठमार‘ होली खेलने की परम्परा सदियों से चली आ रही है। एक लट्ठमार होली का संबंध हिरण्यकश्यपु की कथा से ही है। झांसी जिले के रक्सा विकास खंड के पुनावली कलां गांव की लट्ठमार होली बरसाने से ज्यादा रोचक होती है। यहां महिलाएं गुड़ की भेली एक पोटली में बांधकर कर पेड़ की डाल पर टांग देती हैं। फिर महिलाएं लट्ठ लेकर स्वयं उसकी रखवाली करती है। यह पुरुषों के लिए चुनौती के समान होता है। जो भी पुरुष इस पोटली को पाने का प्रयास करता है, उसे महिलाओं के लट्ठ का सामना करना पड़ता है। इस रस्म के बाद ही यहां होलिका दहन होता है और फिर रंग खेला जाता है। इस परम्परा के संबंध में एक कथा प्रचलित है कि राक्षसराज हिरणकश्यपु के समय होलिका विष्णुभक्त प्रह्लाद को अपनी गोदी में लेकर जलती चिता में बैठी थी। वहां उपस्थित महिलाओं से यह दृश्य देखा नहीं गया और उन्होंने राक्षसों के साथ युद्ध करते हुए विष्णु से प्रार्थना की कि वे प्रहलाद को बचा लें। उन साहसी महिलाओं की पुकार सुन कर विष्णु ने प्रहलाद को बचा लिया। इसी घटना की याद में ’लट्ठमार होली’ का आयोजन किया जाता है, जिसके द्वारा महिलाएं यह प्रकट करती हैं कि वे अन्याय के विरुद्ध लड़ भी सकती हैं।
यूं तो कृष्ण के साथ गोपियों एवं भक्त रानियों द्वारा होली खेलने के प्रसंग अनेक ग्रंथों में मिलते हैं जबकि श्री राम को सदा मर्यादा पुरुषोत्तम माना जाने के कारण उनके साथ होली खेले जाने के प्रसंग मेरे संज्ञान में नहीं हैं। किन्तु बुन्देलखण्ड की ऐतिहासिक स्थली ओरछा में एक रानी हुई जिसका जीवन श्रीराम की भक्ति में डूबा हुआ था। उस रानी का नाम था कंचन कुंवरी। रानी कंचन कुंवरी ओरछा के राजा महाराज सुजान सिंह की पत्नी थी। वह बाल्यावस्था से ही श्रीराम की अनन्य उपासिका थी। विवाह के बाद ओरछा आने पर भी उसकी राम-भक्ति में कोई कमी नहीं आई। अपने राममय जीवन में वह अपनी कल्पनाओं में भला होली खेलने राम के पास नहीं जाती तो और कहां जाती?

श्रीराम की ओर सभी कवियों ने दास भाव से देखा किन्तु सखीभाव से एक ही रानी ने देखा। बुंदेलखंड की विशेषता बहुत बड़ी सांस्कृतिक विशेषता इसी रामभक्ति में मौजूद है। सभी जानते हैं कि मीरा को कृष्णभक्ति करने पर राणा द्वारा विषपान कराया गया। लेकिन बुंदेलखंड में इससे बिलकुल अलग इतिहास है। यहां रानी की कृष्ण भक्ति को लेकर राजा के मन में मनिक रोष जागा किन्तु शत्रुता नहीं। बुन्देलखण्ड की ऐतिहासिक स्थली ओरछा में एक रानी हुई जिसका जीवन श्रीराम की भक्ति में डूबा हुआ था। इनका मूलनाम था गणेश कुंवरी। जिसका उल्लेख लोकगीतों में मिलता है-
राजा मधुकर शाह की रानी कुंवर गणेश।
अवधपुरी से ओरछा लाई अवध नरेश।।

श्रीराम प्रतिमा की अयोध्या से ओरछा आने की कथा भी बहुत दिलचस्प है। ओरछा नरेश मधुकरशाह कृष्ण भक्त थे। एक दिन उन्होंने अपनी रानी कंचन कुंवरी से कृष्ण भक्ति के लिए वृंदावन चलने को कहा। लेकिन रानी श्रीराम भक्त थीं। उन्होंने वृंदावन जाने से मना कर दिया। क्रोध में आकर राजा ने उन्हें ताना मारते हुए कहा कि ‘‘तुम इतनी राम भक्त हो तो जाकर अपने राम को ओरछा ले आओ!’’
 कहा जाता है कि रानी कंचन कुंवरी ने अयोध्या पहुंचकर सरयू नदी के किनारे लक्ष्मण किले के पास अपनी कुटी बनाकर साधना आरंभ कर दी। कई माह व्यतीत हो गए किन्तु उन्हें श्रीराम के दर्शन नहीं हुए। अंततः वे निराश होकर अपने प्राण त्याग ने सरयू नदी में कूद गईं। यहीं जल की अतल गहराइयों में उन्हें श्रीराम के दर्शन हुए। रानी ने उन्हें अपना मंतव्य बताया। तब श्रीराम ने ओरछा चलना स्वीकार कर लिया किन्तु उन्होंने तीन शर्तें रखीं- पहली शर्त - यह यात्रा पैदल होगी। दूसरी शर्त - यात्रा केवल पुष्प नक्षत्र में होगी। और तीसरी शर्त - श्रीराम की मूर्ति जिस जगह रखी जाएगी वहां से पुनः नहीं उठेगी।
रानी ने सभी शर्तें मान लीं और राजा मधुकरशाह को संदेश भेजा कि वो रामराजा को लेकर ओरछा आ रहीं हैं। राजा मधुकरशाह ने श्रीराम के विग्रह को स्थापित करने के लिए करोड़ों की लागत से चतुर्भुज मंदिर का निर्माण कराया। लेकिन जब रानी ओरछा पहुंची तो उन्होंने यह मूर्ति अपने महल में रख दी। यह निश्चित हुआ कि शुभ मुर्हूत में मूर्ति को चतुर्भुज मंदिर में रखकर इसकी प्राण प्रतिष्ठा की जाएगी। लेकिन राम के इस विग्रह ने चतुर्भुज मंदिर जाने से मना कर दिया। श्रीराम ओरछा के रामराजा कहलाए और राजमहल ही उनका मंदिर बन गया। श्रीरामराजा महल में विराजमान हैं।
शयन आरती के पश्चात उनकी ज्योति हनुमानजी को सौंपी जाती है, जो रात्रि विश्राम के लिए उन्हें अयोध्या ले जाते हैं-
सर्व व्यापते राम के दो हैं खास निवास,
दिवस ओरछा रहत हैं, शयन अयोध्या वास।
रामराजा की इस मूर्ति के बारे में भी एक रोचक कथा प्रचलित है। लोक प्रचलित मान्यता है कि जब श्रीराम वनवास जा रहे थे तो उन्होंने अपनी एक बालमूर्ति मां कौशल्या को दी थी। मां कौशल्या उसी को बाल भोग लगाया करती थीं। जब श्रीराम अयोध्या लौटे तो कौशल्या ने यह मूर्ति सरयू नदी में विसर्जित कर दी। यही मूर्ति रानी गणेश कुंवरी को सरयू के तल में मिली थी।
रसखान, पद्माकर आदि कवियों ने श्रीकृष्ण और गोपियों के परस्पर होली खेलने का जी भर कर वर्णन किया है किन्तु रानी कंचन कुंवरी ने श्रीराम और सीता के साथ होली खेलने का वर्णन करते हुए कविताएं लिखीं। ये पंक्तियां देखिए -
रसिया है खिलाड़ी, होरी को रसिया।
अबीर गुलाल भरत नैनन में, डारत है रंग केशर को ।
पकड़ न पावत भाज जात है, मूठा भर-भर रोरी को।।

कंचन कुंवरी ने श्रीराम के साथ होली खेले जाने की कविता लिखते हुए परम्परागत शैली को तो अपनाया है किन्तु मर्यादाओं को कहीं भी नहीं लांघा है। जैसे-
खेलत ऐसी होरी, करत रघुबर बरजोरी।।  
नाको गेह खड़ो पनघट में छैल सकारी खोरी
धूम मचावत, रंग बरसावत, गावत हो-हो होरी
भरत अकम जोरा-जोरी।।
सारी तार-तार कर डारी,  मोतिन की लर तोरी
‘कंचन कुंवरी’ मुरक गई बेसर में बहुभांति निहोरी
सुनी ऊने एक न मोरी।।
सीता जी की सखी के रूप में स्वयं को देखती हुई रानी कंचन कुंवरी एक मधुर कल्पना को अपने गीत में पिरोती हैं कि फागुनी उमंग में डूबे अवध नरेश श्रीराम ने जब सहज भाव से होली खेलने के लिए रानी कंचन कुंवरी को मार्ग में रोकने का प्रयास किया तब रानी को कौशल्या माता का वास्ता देना पड़ा। यह वर्णन अपने आप में अद्वितीय और अनूठा है। इसमें भक्ति के दासभाव पर सखाभाव प्रभावी हो गया है और ब्रज के कान्हा की होली की छटा उभर आई है -
मोरी छैको न गैल खैल रसिया,
मदमाते छाक होरी के राजकुंवर
हो अवध बसिया,
संग की सखियां दूर निकर गईं
हो जों अकेली, मोरो डरपै जिया,
सास, ननद कहूं जो सुन पैहें
गारी दैहें, मोरे प्राण पिया,
‘कंचन कुंवरी’ कौशल्या बरै
तन मन तुम पै वार दिया,
मोरी छैको न गैल खैल रसिया।
श्री राम से होली खेलने के लिए सीता जी से अनुमति लेने का ध्यान भी रानी कंचन कुंवरी ने रखा है और सीता यानी मिथिलेश लली से अनुमति मिल जाने पर रानी श्रीराम को सीता की भांति सजा कर होली खेलना चाहती है। यहां रानी का श्रीराम के प्रति ‘सखी भाव’ प्रकट होता है-
रसिया को आज पकड़ लैबी, है आज्ञा मिथिलेश लली की,  
तुरतई पालन कर लैबी, सकल अभूषण प्यारी जी के
सज नागर भेष बना देबी, ‘कंचन कुंवरी’ चरनन में नूपुर
नखन महावर दे देबी।
श्रीराम की भक्त कवयित्री कंचन कुंवरी ने ब्रज और अवधी मिश्रित बुन्देली में भजन, बधाई, दादरा, बन्ना, झूला गीत और फाग गीतों की रचना की है जिन्हें आज भी समूचे बुन्देलखण्ड में ढोलक और मंजीरे के साथ गाया जाता है। किन्तु इन सभी रचनाओं में श्रीराम के साथ होली खेलने का वर्णन सबसे विशिष्ट कहा जा सकता है। भक्ति साहित्य में ऐसे उदाहरण कम ही देखने को मिलते हैं। तो यही है बुंदेली होली और बुंदेली स्त्री स्वाभभिमान की कथा।
---------------------------------
#DrMissSharadSingh #columnist #डॉसुश्रीशरदसिंह #स्तम्भकार #शून्यकाल  #कॉलम #shoonyakaal #column #दैनिक  #नयादौर  #होली #HappyHoli

Thursday, March 21, 2024

बतकाव बिन्ना की | होली के भड़या हरों खों को पकर सको | डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
------------------------
बतकाव बिन्ना की
होली के भड़या हरों खों को पकर सको    
   - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
       ‘‘काय भैयाजी, का कर रए? गूझा पपड़ियां बन गईं?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘हऔ बनत जा रईं। तुमाई भौजी जुटी आएं।’’ भैयाजी बोले।
‘‘औ आप? आप नईं हाथ बंटा रए? आप तो गूझा बांधबे में मास्टर आओ।’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘सई कई। हमें गूझा बांधबे में भौतई मजो आत आए। हम सो ऐसो किनारो मोड़त आएं के का मशीनें औ का तुमाई भौजी, दोई हमाओ मुकाबला नईं कर सकत।’’ भैयाजी शान देत भए बोले।
‘‘जेई से तो मैं पूछ रई के आप उते किचन में ने हो के इते बाहरे ठाड़े दिखा रए।’’ मैंने भैयाजी से कई।
‘‘बो का आए के तुमने देखी हुइए हमने इते एक बिरंच डाल रखी हती बैठबे के लाने। ऐसे तो हमने ऊको जंजीर से बांध रखो हतो, मगर तुम तो जानत आओ के जे होली के भड़या हरों को पकर सकत आए? इते डरो रैन देतो तो भैया हरें ओई की होली जरा डारते। सो बा बिरंच भीतरे के आंगन में पेल दई आए। बाकी औ कछू तो ने बचो, जे ई हम देख रए हते।’’ भैयाजी ने बताई।
‘‘सई कई भैयाजी! अब तो मनो इत्तो नईं रै गओ, ने तो पैले तो जे होत्तो कि बगिया के जरवा लों खचोड़ ले जात्ते। एक दार हम ओरन के संगे जेई भओ। जा ऊ टेम की बात आय जब मैं स्कूल में पढ़त्ती। उते पन्ना में हिरणबाग में रैत्ती। हमाए इते अच्छी बड़ी बगिया हती। ऊ टेम पे जरवा की फेंसिंग करी जात्ती। मोरी नन्ना जू ने लकड़िया वारे से जरवा मंगा के बगीचा में लगवाओ रओ। बाकी होली जलबे की एक रात पैले का भओ के कोनऊ हमाए इते को जरवा खचोड़ ले गओ। औ ई टेम घांई ऊ टेम पे बी आवारा गैयां फिरत्तीं। भुनसारे नन्ना जू ने उठ के देखो के बगीचा से जरवा नदारत हतो औ एक गाय पिड़ीं हती बगीचा में। हम ओरन खों जरवा जाबे को उत्तो दुख नईं भओ जित्तो बा गैया के पिड़बे को दुख भओ। काय से के ऊने अच्छे फूल वारे पौधा चगल डारे हते। मनो अब करो का जा सकत्तो। अनजान भड़या हरों खों गरिया के अपनो जी जुड़ा लओ।’’ मैंने भैयाजी खों आपबीती सुना दई।
‘‘अरे ने पूछो बिन्ना! ईसे ऊंची तो हमाए सगे दद्दा के संगे हो चुको।’’ भैयाजी बोले।
‘‘कैसी?’’ मैंने पूछी।
‘‘का भओ के हमाए दद्दा ने तै कर लओ हतो के होली के भड़यां हरों खों कछू चुराने ने दैहें। सो बे पलका डार के बाहरे के आंगन में सो गए। भड़या हरों ने सोई ठान लई हुइए के जो तुम शेर हो सो हम सवा शेर ठैरे। सकारें जबे दद्दा की नींद खुली तो उन्ने देखी के बे तो गद्दा-पल्ली समेत जमीन पे सो रए हते औ उनको पलकां गायब हतो। मने जब बे सो रए हते तो कोनऊ ने उनकी गहरी नींद की बेरा उन्हें गद्दा-पल्ली समेत पलका से उतार के जमीन पे सोवा दओ और पलकां ले गए। ससुरों ने कां ले जा के पलका बारो, कछू पतो नईं परो। कछू जने कैत रए के उन ओरन ने दद्दा खों कछू सुंधा दओ हुइए। जेई से उने पतो नईं परो। औ कछू जने कैत रए के जो कछू सुंघाओ होतो तो बे गद्दा-पल्ली काय छोड़ जाते? बे सोई संगे ले जाते। ऊके बाद तो हमाए दद्दा ने होली को टेम आतई सात सब कछू उठा के भीतरे धरबे को काम शुरू कर दओ रओ। काय से के होली के भड़या हरों को भला को पकर सकत?’’ भैयाजी ने अपने दद्दा की किसां सुना डारी।
रामधई पैले ऐसई होत रओ।
‘‘भैयाजी, मोय एक बात खयाल आ रई।’’ मैंने भैयाजी से कई।
‘‘का बात?’’ भैयाजी ने पूछी।
‘‘जे बात के पैले होली के भड़या ऐसे-ऐसे कांड कर देत्ते के अब सुने में अचरज होत आए। ऐसई आजकाल जो अपने इते की राजनीति में चल रओ ऊपे आबे वारे समै में लोगन खों अचरज हुइए।’’ मैंने कई।
‘‘मने?’’
‘मने, जे के चाए बड़े होंय, चाए छुटकुल होंय सबई के सबई नेता हरें अपनी पार्टी खों गरिया के भाजपा की कैंया पे चढ़े जा रए। जोन के दादा-परदादा हरें कांग्रेस में रए औ कभऊं नांय से मांय नई भए, बे कांग्रेस खों सौतेली कै के भाजपा खों सगी बता रए। खाली टिकट के लाने कोनऊं अपनी पार्टी से ऐसी कट्टी करत रओ,, ईपे आबे वारे समै में लोगन खों विश्वास ने हुइए।’’ मैंने भैयाजी से कई।
‘‘बोई तो बात आए बिन्ना के होली के भड़या हरों खों को पकर सकत आए? जे जो तनक-मनक में नांय से मांय होत रैत आएं, जे सबरे होली के भड़या आएं। उने तो होली जलाबे के लाने सामान से मतलब आए। चाय इते से मिले के उते से मिले। बस, मिलो चाइए। जित्ती बड़ी होलिका, उत्ती बड़ी बड़वारी। सो जे सब तो हुइए। ऊंसई चुनाव को टेम आए। अब हम तुमें का बताएं बिन्ना!’’ भैयाजी बोलत-बोलत ठैर गए।
‘‘का बताने? बताओ ने आप!’’ मैंने भैयाजी से कई।
‘‘का भओ के परों की बात आए। हमाए संग पढ़े रहे भैयाजी आजकाल राजनीति में मेवा मिलबे की आसा में लटके आएं। बे परों हमें मिले सो हमने उनसे साफ कई के भैया तुमाई कांग्रेस ने जो ई बार सई उम्मींदवारों खों टिकट ने दई तो समझ लइयो के कोनऊं नांव लेवा लों ने बचहे। सो बा कैन लगो। हमाई कांग्रेस काय? उते तो हमें कोनऊं पूछ बी नई रओ। हम तो होली के बाद भाजपा में जा रए। सो हमने ऊसे कई के तुम जा कैसे कै रए के तुमें उते कोनऊं पूछ नई रओ? तुम तो सबरे बड़े नेता हरों के खासमखास रए? तो जानत हांे, ऊने का कई?’’ भैया तनक सांस लेबे खों ठैरे।
‘‘का कई उन्ने?’’ मैंने पूछी।
‘‘बा कैन लगो के चाय कमलनाथ होंय, चाय दिग्विजय सिंह होंय, कोनऊं ठीक से मिलतई नइयां औ जो मिल जाएं तो सीधे मों बोलत नइयां। ऐसे में हम उते कैसे रै सकत आएं? तब हमने ऊसे कई के मगर तुम तो सैंकड़ा-खांड़ ऐसी फोटुवें सोशल मीडिया पे डार चुके हो जीमें तुम उन दोई के संगे सट के ठाड़े हो। कोऊ-कोऊ में तो उन ओरन ने तुमाए कंधा पे हाथ धरे आएं औ तुमसे बतियाते दिखात आएं। औ तुम कै रए के बे ओरे तुमें पूछ नईं रै? सो का, बे फोटुएं फोटोशाप वारी आएं? मैंने सोई पूछ लई। सो बा बमकत भओ बोलो के नईं बा सब सई की फोटुएं आएं, कोनऊं फोटोशाप वारी नोंई। सुनो, अब हम तुमें बता दें के जो पार्टी बदलने होय सो ऐसो कैने परत आए। ने तो जनता ने पूछहे के जब उते तुमाई पूछ-परख हती तो तुम काय उते से खसक रए? सो कछू तो कैनेई परत आए। अब तुमई बताओ के उते हमाओं का भविष्य रै गओ? बा मानुस हमई से पूछन लगो। सो, हमने कई भैया, जो तुमें साजो लगे से करो, हमें का?’’ भैयाजी ने अपने संगवारे को हाल-चाल बता डारो।
‘‘जेई तो सबई तरफी चल रओ भैयाजी! वैसे ई टेम सबसे सई टेम आए।’’ मैंने कई।
‘‘काय के लाने?’’ भैयाजी ने पूछी।
‘‘पार्टी बदलबे के लाने। जो काऊं खों कोनऊं से डील करने होय सो मों पे रंग डार के मिलबे जा सकत आए। कोनऊं पैचान ने पाहे। औ जो खुदई कऊं छुपने होय सो मों पे रंग मल के तिगड्डा पे बैठे रओ, कोऊं ने पैचान पाहे।’’ मैंने हंस के कई।
‘‘सई कई बिन्ना!’’ भैयाजी सोई हंसन लगे। फेर बोले, ‘‘हमें होरी को एक गाना याद आ रओ, चलो तुमें सुनात आएं।’’ कैत भए भैयाजी ने गाबो शुरू कर दओ-
मोय मिले ऐसे  करिया  सैंया
कोनऊं रंग डारो दिखत नईयां
साली ने डारो, सरहज ने डारो
डारो नंदेऊं,  ससुरा  ने  डारो
उनपे  तो  कछू  जंचत नइयां
कोनऊं रंग डारो दिखत नईयां
कोनऊं रंग डारो ........
भैयाजी को गानो सुन के भौजी सोई बाहरे कढ़ आईं। फेर हम तीनोई मिलके फगुआ गान लगे। न जाने कां से भौजी को जो होरी को जो गाना याद आ गओ औ बे गान लगीं-
जरवा ले जाओ चाय, खटिया ले जाओ
होलिका परमेसरी खों बारई के आओ
सुनो मोरे होली के भड़या हरो.....
भौजी को जो गाना सुनतई साथ हम दोई भैया-बैन की हंसी फूट परी। काय से के ईसे पैसे हम ओंरे होली के भड़यां हरों की तो बात कर रए हते। भौजी को कछू समझ ने परी के हम दोई काय हंसे? बे अपनो गीत गात चली गईं औ बाकी, बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की।
खेलियो होरी, मनो सूखी वारी।
पानी की ने करियो बरबादी।। 
हैप्पी होली।।
 -----------------------------   
#बतकावबिन्नाकी #डॉसुश्रीशरदसिंह  #बुंदेली  #batkavbinnaki  #bundeli  #DrMissSharadSingh #बुंदेलीकॉलम  #bundelicolumn  #प्रवीणप्रभात  #praveenprabhat 
#होली2024  #होलीहै  #HappyHoli

Wednesday, March 20, 2024

डॉ (सुश्री) शरद सिंह साहित्य अकादमी के विश्व के सबसे बड़े साहित्योत्सव में (प्रथम दिवस)

#प्रथमदिन #नईदिल्लीमें #साहित्यअकादमी 
🚩 रवींद्र भवन के अकादमी परिसर में आयोजित विश्व के सबसे बड़े साहित्योत्सव ... मेरा प्रथम दिवस ... सबसे पहले मीराबाई सभागार ढूंढना था मुझे, जहां अगले दिन मेरा कहानी पाठ था। वहां व्यवस्थाएं इतनी अच्छी थीं कि मीराबाई सभागार का तुरंत पता चल गया ... और संयोग कि मीराबाई सभागार के द्वार पर ही भेंट हो गई महुआ माजी से। एक ज़िंदादिल महिला। हम कई वर्ष बाद मिले।
    🌹 इसके बाद पूर्व परिचितों से मिलने का सिलसिला चल निकला... डॉ बलराम जी, डॉ शिवनारायण जी, डॉ उर्मिला शिरीष जी, अशोक मिश्र जी,  डॉ दामोदर खड़से जी, डॉ मीनाक्षी जोशी जी ...। बोधिसत्व जी, आभा बोधिसत्व जी और शकुंतला तरार जी से यूं तो परिचय रहा किन्तु भेंट पहली बार हुई... यह बात और है कि ऐसा लगा नहीं कि पहली बार मिल रहे हैं... हंसी के ठहाके और आत्मीयता का माहौल ...
     इस दौरान गहन चर्चाएं भी हुईं और सहभोज का आनंद भी लिया... कई सत्र अटैण्ड किए .... चिंतन मनन के लिए ढेर सारी ख़ुराक मिली... प्रत्येक सत्र बहुभाषी थे अतः विभिन्न भाषाओं की प्रतिनिधि अपने विचार कहानी, कविता एवं अनुभवों के रूप में सामने रख रहे थे .... अत्यंत सारगर्भित...

      बहरहाल, चर्चाओं की विस्तार से चर्चा फिर कभी ... शाम लगभग छ: साढ़े छ: बजे एक रेस्टोरेंट की ओर निकल पड़ी गोलगप्पे खाने ... मित्रों का साथ हो तो गोलगप्पे और स्वादिष्ट लगते हैं 😀... 
     🍿 रेस्टोरेंट जाते समय मुझे नहीं पता था कि उसे रेस्टोरेंट में एक बिग सरप्राइस मेरा इंतजार कर रहा है....
  Date : 13.03.2024
#साहित्यअकादमी  #कहानीपाठ  #Storytelling #storyteller  #कथाकार  #storywriter  #SahityaAkademi

इस पर्व का अर्थ है सबका एक जैसे रंग में रंग जाना - डॉ (सुश्री) शरद सिंह

हिंदी के प्रतिनिधि समाचार पत्र "हरिभूमि" की साप्ताहिक पत्रिका "सहेली" में होली के रंग और उनमें एक रंग मेरे विचारों का ... 
🎈हार्दिक आभार विनीत जी 🙏 
#डॉसुश्रीशरदसिंह #drmisssharadsingh #happyholi #happyholi2024 #होलीमुबारक 

चर्चा प्लस | गौरैया पास हो तो प्रसन्नता भी पास होगी | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर

चर्चा प्लस  
वर्ल्ड हैप्पीनेस डे एवं वर्ल्ड गौरैया डे:
गौरैया पास हो तो प्रसन्नता भी पास होगी
    - डाॅ (सुश्री) शरद सिंह                                                                                        
      20 मार्च अर्थात विश्व प्रसन्नता दिवस, 20 मार्च अर्थात विश्व गौरैया दिवस। दो उत्सव एक ही दिन। दोनों को यदि एक-दूसरे का परस्पर पूरक बना दिया जाए तो गौरैयां हमें खुश रहने के अनेक अवसर दे सकती है। वरना गौरैयें हमसे दुखी हैं और हम अपनी ज़िन्दगी में खुशी न मिल पाने के चक्कर में सदा खुशियों की तलाश में भटकते रहते हैं। तो चलिए खुश रहने का सबसे आसान तरीका ढूंढ निकालते हैं।  
जिसके पीछे भाग रहे हो
वह तो असली खुशी नहीं
अस्ल खुशी तो दिल के भीतर
हरदम बैठी रहती है

हर साल दुनियाभर में 20 मार्च को अंतर्राष्ट्रीय हैप्पीनेस डे यानी विश्व प्रसन्नता दिवस मनाया जाता है। इस दिन का मुख्य उद्देश्य खुश रहना और अपने जीवन में खुशी के महत्व को महत्व देना है। इसके साथ ही यह दिन खुशी के महत्व के बारे में जागरूकता बढ़ाता है और दुनियाभर के लोगों को खुशी ढूंढने और बनाए रखने में मदद करता है। पहली बार यह दिवस 2013 में यूनाइटेड नेशन्स द्वारा मनाया गया था। तब से लेकर हर साल यह दिवस मनाया जा रहा है। दरअसल भौतिकता के चलते हमने अपने जीवन को कठिन बना लिया है। सुबह से शाम तक हम खुशी पाने के लिए धन कमाने में जुटे रहते हैं और धन कमाने में इतने डूब जाते हैं कि वास्तविक खुशी कभी मिल ही नहीं पाती है। अंतर्राष्ट्रीय ख़ुशी दिवस की स्थापना से पहले, वर्ल्ड हैप्पीनेस फाउंडेशन के अध्यक्ष लुइस गैलार्डो के साथ मिलकर, जयमे इलियन ने ‘‘हैप्पीटलिज्म’’ की स्थापना की। इलियन ने खुशी, कल्याण और लोकतंत्र की प्रधानता को प्रोत्साहित करने और आगे बढ़ाने के लिए 2006 से 2012 तक संयुक्त राष्ट्र में एक अभियान चलाया।    
2011 में, जयमे इलियन ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में अंतर्राष्ट्रीय खुशी दिवस का विचार प्रस्तावित किया। वह चाहते थे कि संयुक्त राष्ट्र महासभा सभी देशों के आर्थिक विकास में सुधार करके दुनिया भर में खुशहाली अर्थशास्त्र को बढ़ावा दे। इस विचार को संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा अपनाया गया था। 19 जुलाई 2011 को, संयुक्त राष्ट्र महासभा ने संयुक्त राष्ट्र प्रस्ताव 65/309, विकास के लिए एक समग्र दृष्टिकोण की ओर खुशी, भूटान के तत्कालीन प्रधान मंत्री जिग्मे थिनले की एक पहल पारित की, जो एक ऐसा देश है जो खुशहाल देश के रूप में जाना जाता है। अंतर्राष्ट्रीय खुशी दिवस ने आधिकारिक तौर पर इसे 2012 में स्थापित किया और पहली बार 2013 में इसे मनाया। जयमे इलियन की अवधारणा पर निर्माण करते हुए, संयुक्त राष्ट्र ने लोगों के जीवन में खुशी के महत्व के बारे में लोगों को सूचित करने के लिए विश्व खुशी दिवस के साथ एक कदम आगे बढ़ाया है। सार्वजनिक नीतियों में खुशी को शामिल करने की आवश्यकता है।
रिपोर्ट के अनुसार, 137 देशों के वर्ल्ड हैप्पीनेस इंडेक्स में भारत को 125 वें स्थान पर रखा गया है। 2022 में भारत 136 वें स्थान पर था। जबकि 2021 में भारत 139वें पायदान पर था। इसका कारण पता लगाया गया तो अधिकांश सर्वे वालों ने यही पाया कि जिस तबके के पास घर, गाड़ी, अच्छी नौकरी आदि सब कुछ था, वे ही अपनी जिन्दगी से सबसे अधिक नाखुश निकले। और पाने की चाहत उन्हें उन सबकी खुशी का अवसर ही नहीं दे रही थी जो उनके पास था। वहीं निम्न मध्यमवर्ग एवं निम्नवर्ग अपनी तंगियों के बावजूद खुश रहना जानता था। यहां तक कि एक फकीर भी एक रोटी मिलने पर उसमें से आधी रोटी एक आवारा कुत्ते को खिला कर खुश रहने का हुनर वाला पाया गया।

खुशी मनाने का सबसे आसान तरीका है कि अपनी छोटी-छोटी खुशियों को दोस्तों और परिवार के साथ खुशियां साझा करें। जिन चीजों के लिए स्वयं को आभारी होना चाहिए, उन्हें नोट करने और उनकी सराहना करने के लिए समय निकाले, यहां तक कि छोटी-छोटी चीजों के लिए भी, लोगों को जीवन में अधिक खुशी और अधिक संतुष्टि महसूस होगी। इसे दैनिक आदत बनाने पर खुशी अपने आप मिलती रहेगी। प्रियजनों के साथ समय बिताएं और उन रिश्तों को सुधारने का प्रयास करें जो कठिन दौर से गुजर रहे हैं क्योंकि अच्छी गुणवत्ता वाले रिश्ते खुशी के लिए महत्वपूर्ण हैं। समान विचारधारा वाले व्यक्तियों से मिलना। जरूरतमंदों की मदद  करना। शहर की भीड़ छोड़ कर कम से कम एक दिन गांवों की ओर निकल पड़ना एक अच्छा विकल्प है। सोशल नेटवर्किंग भी खुशियां पाने का एक अच्छा तरीका है। बस, जरूरत है सकारात्मक सोच रखने वाले लोगों से जुड़ने की।
वैसे सच तो यह है कि खुशी ढूंढने कहीं जाने की जरूरत नहीं है, न तो घर से बाहर और न सोशल नेटवर्किंग पर, बस एक गौरैया परिवार को अपने घर की बाल्कनी, टैरेस या आंगन में घोंसला बनाने दें। फिर देखिए हर दिन उसकी नई गतिविधियां आपको ढेर सारी खुशियां देंगी।    
नन्हीं चिड़िया रोज सबक दे जाती है
खुश रहने के हुनर सिखाती जाती है

पहले गौरैयें हमारे घर में रहती थीं। हमारे घर में एक सदस्य की तरह। फिर हमने अपनी आधुनिक जीवन शैली में गौरैयों को अपने घरों से निष्कासित कर दिया। इसके साथ ही अपनी खुशियों के एक स्वाभाविक अवसर को भी खो दिया। वैसे गौरैया के संरक्षण और उनके सामने आने वाली चुनौतियों के बारे में जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से हर साल यह दिवस मनाया जाता है। भारत व अन्य देशों में पक्षी गौरैया की संख्या लगातार कम हो रही है। ऐसे में 2009 में भारत के संरक्षणवादी डॉ. मोहम्मद दिलावर ने कल्पना की और फिर 2010 में फ्रांस में इको-सिस एक्शन फाउंडेशन के सहयोग से 20 मार्च को पहला विश्व गौरैया दिवस आयोजित किया गया था। तब से हर साल यह दिवस मनाया जा रहा है।
 हर साल 20 मार्च को नेचर फॉरएवर सोसाइटी (भारत) और इको-सिस एक्शन फाउंडेशन (फ्रांस) के सहयोग से विश्व गौरैया दिवस मनाया जाता है। इसकी शुरुआत नासिक के रहने वाले मोहम्मद दिलावर ने गौरैया पक्षी की लुप्त होती प्रजाति की सहायता करने के लिए नेचर फॉरएवर सोसायटी की स्थापना कर की थी। विश्व गौरैया दिवस मनाने का उद्देश्य गौरैया पक्षी की लुप्त होती प्रजाति को बचाना है। पेड़ों की अंधाधुंध होती कटाई, आधुनिक शहरीकरण और लगातार बढ़ रहे प्रदूषण से गौरैया पक्षी विलुप्त होने के कगार पर पहुंच चुकी है। एक वक्त था जब गौरैया की चीं-चीं की आवाज से ही लोगों की नींद खुला करती थी लेकिन अब ऐसा नहीं है। यह एक ऐसी पक्षी है जो मनुष्य के इर्द-गिर्द रहना पसंद करती है। गौरैया पक्षी की संख्या में लगातार कमी एक चेतावनी है कि प्रदूषण और रेडिएशन प्रकृति और मानव के ऊपर क्या प्रभाव डाल रहा है। तो इस ओर काम करने की जरूरत है।
संरक्षणवादी मोहम्मद दिलावर ने नासिक में घरेलू गौरैया की विशेष देखभाल के लिए अभियान शुरू किया। अभियान को आधिकारिक बनाने का विचार नेचर फॉरएवर सोसाइटी के कार्यालय में एक अनौपचारिक चर्चा के दौरान पैदा हुआ था। इसके बाद, दुनिया भर में 2010 में पहला विश्व गौरैया दिवस मनाया गया। इसमें पक्षी संरक्षणवादियों के नेटवर्क और संरक्षण में सुधार के लिए विचारों का आदान-प्रदान करने के लिए एक मंच तैयार किया। इसका उद्देश्य दुनिया भर के लोगों को एक साथ आने और आम जैव विविधता या कम संरक्षण वाली प्रजातियों की सुरक्षा के लिए आवश्यकता के बारे में जागरूकता पैदा करने के लिए संपर्क बिंदु प्रदान करना है।
गौरैया या घर की गौरैया को शहरी क्षेत्रों में हरे-भरे हिस्सों और पिछवाड़े में चहकने के लिए जाना जाता है, हालांकि, भयंकर गर्मियों के दौरान, उन्हें ठंडी छाया और पानी की आवश्यकता होती है। वे हमेशा आवासीय क्षेत्रों में काफी आम रहे हैं, लेकिन वर्तमान में ध्वनि प्रदूषण, आधुनिक इमारतों में घोंसले के शिकार स्थलों की कमी, कीटनाशकों के उपयोग और भोजन की अनुपलब्धता के कारण विलुप्त होने के कगार पर हैं, जैसा कि पक्षी विज्ञानी द्वारा बताया गया है। जागरूकता पैदा करने के कारण 2012 में घरेलू गौरैया दिल्ली का राज्य पक्षी बन गई।
तो ये है आईडिया कि दो उत्सवों यानी विश्व प्रसन्नता दिवस और विश्व गौरैया दिवस जो दोनों ही एक ही दिवस को मनाए जाते हैं, इन्हें परस्पर पूरक बना लिया जाए। यानी गौरैयों को दाना दें, पानी दें, अपने घर में आश्रय दें और अपने दिल को खुशियों से हमेशा भरा-पूरा रखें। खुश रहने वाले ही खुशियां बांटना जानते हैं, वो कहते हैं न कि ‘मुर्दा दिल क्या ख़ाक जिया करते हैं?’।
        --------------------------
#DrMissSharadSingh #चर्चाप्लस  #सागरदिनकर #charchaplus  #sagardinkar #डॉसुश्रीशरदसिंह #WorldHappinessDay  #WorldSparrowDay #विश्वप्रसन्नतादिवस #विश्वगौरैयादिवस

Tuesday, March 19, 2024

पुस्तक समीक्षा | भारतीय संस्कृति की परंपराओं का पोषण करती कविताएं | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

प्रस्तुत है आज 19.03.2024 को  #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई संतोष श्रीवास्तव ‘‘विद्यार्थी’’ के काव्य संग्रह "सब तेरे सत्कर्मी फल हैं" की समीक्षा।
--------------------------------------
पुस्तक समीक्षा       
भारतीय संस्कृति की परंपराओं का पोषण करती कविताएं
- समीक्षक डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
-------------------
काव्य संग्रह  - सब तेरे सत्कर्मी फल हैं
कवि       - संतोष श्रीवास्तव ‘‘विद्यार्थी’’
प्रकाशक    - एन.डी. पब्लिकेशन, नई दिल्ली-3
मूल्य       - 150/-
-------------------
हमारी भारतीय संस्कृति में यह स्पष्ट शब्दों में कहा गया है कि कोई भी व्यक्ति उसी तरह विकसित होता है जैसे उसे संस्कार मिलते हैं। यह संस्कार देने का दायित्व माता-पिता और गुरुजन का होता है। चूंकि अब गुरुकुल पद्धति नहीं है अतः संतान की बाल्यावस्था सबसे अधिक अपने माता-पिता के साथ व्यतीत होती है। इसीलिए वे ही प्रथमतः निर्णायक होते हैं अपनी संतान के भविष्य निर्माण के। इसीलिए माता-पिता स्तुत्य होते हैं। इस बात को पौराणिक ग्रंथों, उपनिषदों आदि में पद्यात्मक रूप में कहा गया है। यूं भी साहित्य में हर कथन अधिक प्रभावकारी होता है। ‘‘पद्मपुराण’’ के सृष्टिखंड (47/11) में कहा गया है-
सर्वतीर्थमयी माता सर्वदेवमयरू पिता।
मातरं पितरं तस्मात् सर्वयत्नेन पूजयेत।।
- अर्थात माता सर्वतीर्थ हैं और पिता सम्पूर्ण देवताओं का स्वरूप हैं इसलिए सभी प्रकार से यत्नपूर्वक माता-पिता का पूजन करना चाहिए।
विगत कुछ दशकों से यथार्थ के कठोर परिदृश्य को कविता में उतारने के प्रयास ने भावनात्मक संबंधों पर लेखनी को हाशिए में कर दिया है। माता-पिता पर काव्य सृजन करना गोया पिछड़ी हुई बात हो। किन्तु कुछ कवि हैं जो ऐसे भ्रम को तोड़ कर भारतीय संस्कृति की परंपराओं का पोषण कर रहे हैं। ऐसे कवि अपने माता-पिता के प्रति समर्पित कविताएं लिख रहे हैं। संतोष श्रीवास्तव ‘‘विद्यार्थी’’ भी ऐसे ही एक कवि हैं जिन्होंने अपने प्रथम काव्य संग्रह को पूरी तरह अपने माता-पिता को समर्पित करते हुए तथा अपने दिवंगत पिता के प्रति संबोधित होते हुए संग्रह का नाम दिया है- ‘‘सब तेरे सत्कर्मी फल हैं’’।
आज के दौर में जब बच्चे माता-पिता तथा परिवार की वरिष्ठजन से दूर होते जा रहे हैं, ऐसे समय में कवि विद्यार्थी  की कविताओं का बहुत अधिक महत्व है यह कविताएं बड़ों के प्रति रागात्मक व्यवहार का अनुमोदन करती हैं। यह जननी तथा जनक के महत्व को स्थापित करती हैं। ये कविताएं बड़ी सामयिक हैं क्योंकि हमारी भारतीय संस्कृति में वानप्रस्थ आश्रम की संकल्पना है किन्तु वृद्धाश्रम की नहीं। वानप्रस्थ आश्रम वह होता था जिसमें व्यक्ति अपने समस्त पारिवारिक दायित्वों को पूर्ण कर के प्रकृति के निकट रहने के लिए वन में प्रस्थान कर जाता था। किन्तु उसके जीवनयापन की सम्पूर्ण व्यवस्था उसके परिजन करते थे तथा उससे सदा भेंट कर करते रहते थे। किन्तु वृद्धाश्रम व्यवस्था में उपेक्षापूर्ण ढंग से अपने माता-पिता को वृद्धाश्रम के हवाले कर के, चंद रुपयों का सहयोग कर के इतिश्री मान लिया जाता है। इसमें माता-पिता के सुख की भावना नहीं वरन् उनसे छुटकारे की भावना प्रबल रहती है। इसका एक सबसे बड़ा कारण यह भी है कि लगभग पिछली एक पीढ़ी से माता-पिता धन कमाने के चक्कर में बच्चों के उचित लालन-पालन से विरत होते चले गए हैं। यह रवैया और अधिक बढ़ता जा रहा है।
संतोष श्रीवास्तव ‘‘विद्यार्थी’’ ने बढ़ते जा रहे इस सामाजिक दोष को दूर करने की दिशा में माता-पिता एवं वरिष्ठजन पर कविताएं लिख कर उत्तम कार्य किया है। माता-पिता पर केंद्रित उनकी कविताएं जहां संवेदनशील और भावपूर्ण है वही उनकी सामाजिक अर्थवत्ता बहुत अधिक है। अपने जन्मदाता एवं जन्मदात्री को समर्पित करते हुए वे लिखते हैं - ‘‘सब तेरे सत्कर्मी फल हैं’’। इस कविता की कुछ पंक्तियां देखिए-
मेरे हृदय पटल तुम शाश्वत, मेरे नयन सुमिरनी जल है।
इसमें मेरी कौन बड़ाई, सब तेरे सत्कर्मी फल है।।
सत्कर्मों के बीज परिष्कृत, जो धरती उर्वरा न पाई।
बोलो बीज करे क्या प्रियवर, या ऊसर है या निर्जल है।।
तुमनें ही तो मन-मस्तिष्की, मेरे फसल-क्षेत्र को साधा।
खून-पसीने का जल सींचा, मेरी चिंता, रहे विकल हैं।।
मेरे जनक, परम प्रिय जननी, मेरे आत्मरथी सुख करनी।
तेरे पुण्य, हस्त-पग मेरे, मेरी तरनी है, भुजबल हैं।।

माता-पिता के संस्कार ही संतान को अच्छा या बुरा बनाते हैं मुझे एक कहानी याद आती है जो मुख्य रूप से भीली लोक कथा है। एक गांव में एक युवक था जिसे चोरी करने की आदत थी। वह इतनी कुशलता से चोरी करता कि कभी पकड़ा नहीं जाता और जब भी वह चोरी का सामान लेकर घर पहुंचता तो उसकी मां उससे बहुत शाबाशी देती। वह बेटे की पीठ ठोंक कर कहती कि ‘‘वाह बेटा, तूने बहुत बढ़िया काम किया है।’’ अपनी मां से शाबाशी पा कर उस चोर का साहस बढ़ता गया। एक समय ऐसा आया कि वह राजमहल में चोरी करने घुस गया। उसे लगा कि यदि मैं कोई राजसी सामान चुरा कर ले जाऊंगा तो मेरी मां गर्व से भर उठेगी। दुर्भाग्यवश वह राजमहल में घुसते ही पकड़ा गया। राजा ने उसे सरेआम हजार कोड़े लगाए जाने की सजा सुनाई। जब मां को पता चला तो वह रोती हुई कोड़े मारने वाले के पास पहुंची और पुत्र को छोड़ देने का अनुरोध करने लगी। वह कोड़े मारने वाले से रो-रो कर कहने लगी कि ‘‘मैं अपन पुत्र को दण्डित होते नहीं देख सकूंगी।’’ तब पुत्र ने मां से कहा कि ‘‘मंा यह तो तुम्हें उस समय सोचना था जब मैंने पहली बार चोरी की थी और तुमने मेरी पीठ थपथपा कर मुझे शाबाशी दी थी। यदि तुमने उसी दिन एक थप्पड़ मेरे गाल पर मारा होता तो आज मुझे हजार कोड़े खाने की सज़ा न मिलती। तुम मेरी मां हो लेकिन मुझे दुख है कि तुमने मां का सही दायित्व नहीं निभाया।’’ यह सुन कर मां अपना-सा मुंह ले कर रह गई। उसका बेटा जो कह रहा था, सच कह रहा था। संतोष श्रीवास्तव ‘‘विद्यार्थी’’ ने अपने पिता और माता दोनों को समान रूप से स्मरण करते हुए कविताएं लिखी हैं। पिता पर लिखी उनकी कविता ‘‘ऐ मेरे जन्मदाता’’ की पंक्तियां देखिए-
ऐ मेरे जन्मदाता, मैं हूँ तेरी निशानी।
कुछ भी नहीं है मेरा, सब तेरी मेहरबानी ।।
जिस दिन मैं बीज बनकर, माँ के गरभ में आया,
उस दिन से ही तुम्हारे मश्तिष्क में समाया।
उस दिन से शुरू कर दी, गढ़ना मेरी कहानी,
कुछ भी नहीं है मेरा, सब तेरी मेहरबानी ।।
 फिर माता के प्रति उन्होंने अपना समर्पण भरा अनुराग एवं श्रद्धा व्यक्त की है। ‘‘पुण्य तेरा हम सबके माथे सूर्य किरण जैसा चमके’’ शीर्षक कविता में वे लिखते हैं-
प्रसव वेदना में जिसके, दिखता क्रंदन,
हृदयांचल में सदा, मधुर मुस्कान लिया।
धरा पदार्पण में तेरे, जिस देवी ने,
कर विस्मृत पीड़ा, चुंबन प्रतिदान दिया।।
मेरे जीवन का आधार, चुंबन तेरा,
मेरे चेहरे के आकाश दामिनी दमके।
पुण्य तेरा हम सबके माथे,
सूर्य किरण जैसा चमके ।।
ऐसा नहीं है कि कवि ‘‘विद्यार्थी’’ ने मात्र अपने माता-पिता का स्मरण किया हो, उन्होंने देश के ‘‘बापू’’ महात्मा गंाधी पर भी कविता बापू के ‘‘मधुरिम सपनों का, फैला भारतवर्ष वहां’’ लिखी है-
छोड़ छाड़ वैभव बापू ने, जिस कल का बलिदान किया।
आज वही कल हम जीते हैं, हमको जीवन दान दिया।।
इस कल को गढ़ना अरु बढ़ना, आज हमारा सपना है।
जो देखा बापू ने सपना, स्वर्णिम सपना अपना है।।

लगभग 25 पृष्ठ तक ईश्वर की आराधना, माता-पिता की स्तुति, राष्ट्र शहर तथा विश्वविद्यालय के संस्थापक डॉ हरि सिंह गौर की वंदना की गई है। तदोपरांत निर्वाचन लोकतंत्र का पर्व, दान नहीं मतदान, जैसी कविताओं के द्वारा जन जागरूकता के विषयों को रखा गया है। कवि विद्यार्थी ने हिंदी और बुंदेली पर भी कविताएं लिखी हैं। कवि विद्यार्थी  की कविताओं की विशेषता यह है कि वे विभिन्न छंदों में निबद्ध हैं जिससे उनके छांदासिक ज्ञान का पता चलता है और इससे उनकी रचनाओं की मधुरता भी बढ़ गई है। जब भाव और शिल्प समान रूप से अभिव्यक्ति पाते हैं तो रचना और अधिक लुभावनी हो जाती है तथा स्मृति में देर तक बनी रहती है।
डॉ सुरेश आचार्य जी ने पुस्तक की भूमिका में उचित लिखा है कि ‘‘कवि विद्यार्थी  नाम से भले विद्यार्थी हैं किंतु काम से शिक्षक हैं।’’ इसी तरह गीतऋषि डॉ. श्याममनोहर सीरोठिया ने भूमिका में लिखा है- ‘‘कवि ‘‘विद्यार्थी’’ जी ने लोक जीवन के अनेक आदर्श-पात्रों को अपने काव्य में उतारा है, जिनमें महर्षि बाल्मिकी, संत शिरोमणि तुलसीदास, राष्ट्रकवि मैथलीशरण गुप्त, रामधारी सिंह दिनकर जी की सृजनशीलता के संस्कारों को काव्य में आत्मसात करने का बड़ा कार्य किया है। इसी क्रम में युग-संत स्वामी विवेकानंद, महात्मा गांधी, डॉ. हरिसिंह गौर जैसे महापुरूषों के उदात्त चरित्रों को अपनी रचनाओं में सम्मानजनक स्थान दिया है। ये रचनाऐं शुचिता की ऐसी त्रिवेणी हैं जिनमें अवगाहन कर पाठक अपने आपको परिष्कृत करने का अवसर भी पाता है।’’
आचार्य पं. महेश दत्त त्रिपाठी ने कवि के कला पक्ष को रेखांकित करते हुए लिखा है कि- ‘‘विद्यार्थी जी की रचनाएँ छंदबद्ध हैं जिनमें मनहरण घनाक्षरी, लावनी, दोहे, चैपाई, मत्तगयंद सवैया, ताटंक जैसे छन्द पठनीय होने के साथ गेय हैं। अपने माता-पिता का पुण्य-स्मरण, राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी, सागर सपूत डॉ. हरिसिंह गौर को समर्पित रचनाएँ मनमोहक हैं, साथ ही राष्ट्र के अमर वीरों का पुण्य-स्मरण भी पाठकों को मातृभूमि के प्रति समर्पण की प्रेरणा देता है। ‘‘विद्यार्थी जी’’ का यह काव्य-संग्रह सृजन का सुकृत प्रयास सराहनीय एवं स्तुत्य है।’’
संतोष श्रीवास्तव ‘‘विद्यार्थी’’ की कविताएं आस्थावान पारंपरिक मूल्यों एवं पारिवारिक संबंधों की उष्मा से परिपूर्ण  हैं। परिवार के प्रति पिता के दायित्वों एवं कर्तव्यों पर लिखी कविताओं के माध्यम से कवि ने सम्पूर्ण पिताओं के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त की है। भारतीय संस्कृति की परम्पराओं के पोषण की दिशा में संतोष श्रीवास्तव ‘‘विद्यार्थी’’ का यह प्रथम काव्य संग्रह महत्वपूर्ण कहा जा सकता है।
           -------------------------
#पुस्तकसमीक्षा  #डॉसुश्रीशरदसिंह  #bookreview #bookreviewer  #आचरण  #DrMissSharadSingh