Tuesday, April 15, 2025

पुस्तक समीक्षा | मानवीय संबंधों के बूझे-अबूझेपन रेखांकित करती कहानियां | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

आज 15.04.2025 को 'आचरण' में प्रकाशित - पुस्तक समीक्षा


पुस्तक समीक्षा    

मानवीय संबंधों के बूझे-अबूझेपन  रेखांकित करती कहानियां
- समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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कहानी संग्रह - मैं उन्हें नहीं जानती
लेखिका  - उर्मिला शिरीष
प्रकाशक -शिवना प्रकाशन, पी.सी.लैब सम्राट काॅप्लेक्स बेसमेंट, बसस्टेंड, सिहोर,म.प्र-466001
मूल्य    - 275/-
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हिन्दी कथा साहित्य जगत में उर्मिला शिरीष एक स्थापित नाम है। अब तक उनके दो दर्जन से अधिक कहानी संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। उनकी कहानियां मन को उद्वेलित करने में सक्षम होती हैं। उनकी कहानियों का धरातल सामाजिक होते हुए भी मनोवैज्ञानिक होता है। वे हर कारण की तह तक उतरती हैं और फिर उसे अपनी कहानी का विषयवस्तु बनाती हैं, यही खूबी है उनके कथा लेखन की। उनकी भाषा और शिल्प की चर्चा बाद में। पहले बात समीक्ष्य कहानी संग्रह ‘‘मैं उन्हें नहीं जानती’’। शिवना प्रकाशन, सिहोर से प्रकाशित इस संग्रह में उनकी चौदह कहानियां हैं।
उर्मिला शिरीष के जीवनानुभव की सीमा वृहद है जोकि उनकी कहानियों से गुज़रने के बाद दावे से कहा जा सकता है। वे मानवीय संबंधों की बारीकियों को बड़ी कोमलता से उठाती हैं और पूरे विश्वास के साथ उन्हें विस्तार देती हुईं उस क्लाईमेक्स की ओर ले जाती हैं जहां पहुंच कर पढ़ने वाले को यही लगता है कि इस कहानी का अंत इससे इतर और कुछ हो ही नहीं सकता था। ‘‘मैं उन्हें नहीं जानती’’ की कहानियों में विषय की विविधता है जिनमें विदेशी भूमि पर उपजी परिस्थियों की एक मार्मिक कहानी भी है जिसका नाम है ‘‘स्पेस’’। यह संग्रह की पहली कहानी नहीं है फिर भी मैं इसी कहानी से समीक्षा की शुरूआत करना चाहूंगी। बहुत पहले भारतीय मूल की अमेरिकी लेखिका झुम्पा लहरी का कहानी संग्रह ‘‘अनकस्टम्ड अर्थ’’ पढ़ा था। झुम्पा लहरी ने अमेरिका में बसे भारतीय परिवारों विशेष रूप से बंगाली परिवार के बारे में कहानियां लिखी थीं। अरसे बाद उर्मिला शिरीष की कहानी ‘‘स्पेस’’ पढ़ कर लगा कि जो पक्ष झुम्पा लहरी से छूट गया था, उसे उर्मिला जी ने बड़ी गहनता एवं मार्मिकता से सामने रखा। अमेरिका में बसे बेटे बहू की घोर उपेक्षित एवं प्रताड़ित मां की करुणामय कथा। जिस बेटे को अमेरिका में सेटल होने के लिए मां ने अपना सबकुछ दांव पर लगा दिया, वही बेटा मां को अपनी पत्नी के अत्याचारों से नहीं बचा पा रहा था। साथ ही वह स्वयं भी मात्र इसलिए अपनी पत्नी के अमानवीय व्यवहार को सहन कर रहा था कि बेसहारा मां को वह अपने से अलग नहीं कर पा रहा था। अमेरिका पारिवारिक संबंधों को ले कर कठोर है। एक फोनकाॅल पर पुलिस तुरंत हाज़िर हो कर दोषी को पकड़ कर जेल में डाल देती है, भारी जुर्माना करती है। एक बच्चा भी अपने माता-पिता की मार के विरुद्ध पुलिस बुला सकता है। एक भारतीय मां अपनी बहू के विरुद्ध किसी से शिकायत करने का साहस भी नहीं जुटा पाती है। कारण कि माता-पुत्र अपनी बहू की भांति निर्लज्ज नहीं थे। वे खामोशी से सब कुछ सह रहे थे। वह तो उनकी एक पड़ोसन से यह सब सहन नहीं हुआ। जबकि पड़ोसन की तो बहू भी विदेशी थी किन्तु भारतीय परम्पराओं एवं संस्कारों का आदर करने वाली। अतः पड़ोसन और उसकी बहू उस मां को उसकी बहू के अत्याचार से बचाने का बीड़ा उठाती हैं। जिस विस्तार से प्रताड़ना के विविध रूपों का वर्णन है उसे पढ़ कर कोई भी यही चाहेगा कि उस निरीह महिला की मदद की जानी चाहिए। इस कथानक के मूल में एक बहुत बड़ी पीड़ा इस बात की भी छिपी है कि बच्चों को विदेश भेजने और वहां उनके बसने पर खुश होने वाले माता-पिता अपने-आप में कितने अकेले पड़ जाते हैं। फिर चाहे वे भारत में रहें या बच्चों के साथ विदेश में। बेशक सब के साथ यह नहीं होता है किन्तु ऐसा भी होता है, इससे इनकार नहीं किया जा सकता है।
संग्रह में एक बहुत चुलबुली कहानी है ‘‘दुपट्टा’’। यह कहानी शुरू होती है एक नाॅटी किस्म की घटना से और समाप्त होती है गहरे विमर्श पर। माॅर्निंग वाॅक पर जाने वाले एक दंपति का किस्सा है। पति एक पराई स्त्री को यह देख कर प्रभावित होता है कि वह चाहे भारतीय परिधान पहने या पाश्चात्य, पर एक दुपट्टा अवश्य ओढ़ती है। उसे देख कर वह अपनी पत्नी से भी दुपट्टा ओढ़े जाने की अपेक्षा करता है। बात बहस तक भी जा पहुंचती है। पत्नी सोचती है कि क्या दुपट्टा ओढ़ना या न ओढ़ना ही सब कुछ है? स्त्री की अपनी इच्छा कोई मायने नहीं रखती? एक वैचारिक द्वंद्व के बाद कहानी दिलचस्प मोड़ पर समाप्त होती है।
जब हम सोचते हैं कि हम अपने परिजन, परिचित, मित्र या संबंधी को पूरी तरह से जानते हैं, तभी कुछ ऐसा घटित होता है कि लगता है कि हम तो वस्तुतः उन्हें जानते ही नहीं थे। इसी धरातल की दो कहानियां हैं संग्रह में। रोचक बात ये है कि इसमें एक कहानी संग्रह की प्रथम कहानी है और दूसरी संग्रह की अंतिम कहानी। अंतिम कहानी की चर्चा पहले करना समीचीन होगा क्योंकि इसी कहानी के शीर्षक पर संग्रह का नाम है ‘‘मैं उन्हें नहीं जानती’’। परिवार में प्रायः सबसे बड़ी बहन पर अपने छोटे भाई-बहनों को सम्हालने का दायित्व होता है। भाई-बहनों को सम्हालते-सम्हालते वह कब अपनी मां में ढल जाती हैं, उसे स्वयं पता नहीं चलता। इसके विपरीत उसके भाई-बहन उसके बारे में कितना जानते हैं अथवा उसके दुख-सुख की कितनी परवाह करते हैं, यह दावे से नहीं कहा जा सकता है। सच तो ये है कि पूरा परिवार उससे अपनी समस्याएं कहता-सुनता है किन्तु उसकी समस्याएं उससे कभी पूछता नहीं है। सभी यही मान कर चलते हैं कि वह तो बड़ी है, उसका घर पहले बस गया है, वह पूरी तरह सुखी है। ठीक यही स्थिति है इस कहानी की प्रमुख पात्र जिया की। जिस बहन को जिया ने उंगली पकड़ कर चलना सिखाया, उसे भी वर्षों बाद इस बात का अहसास होता है कि वह जिया को बिलकुल नहीं जानती है।
इसी अजानेपन की दूसरी और संग्रह की पहली कहानी है ‘‘देखेगा सारा गांव बंधु’’। एक बेटी अपनी मां को कितना जानती है? या एक बेटा अपने पिता को कितना जानता है? यह एक जटिल प्रश्न है। क्योंकि संतान अपने माता-पिता को उसके एक पक्षीय रूप में अर्थात् माता-पिता के रूप में ही जानते हैं। वे यह कभी समझ नहीं पाते हैं कि एक व्यक्ति के रूप में माता और पिता का भी अपना एक निजी संसार होता है, निजी अनुभव होते हैं या यूं कहा जाए कि उनका अपना एक गोपन संसार होता है। एक पुत्र अपने पिता के बारे में बहुत कुछ जानते हुए भी, मानो कुछ भी नहीं जान पाता है। चारित्रिक विशेषताओं एवं विभिन्न मनोदशाओं की गलियों को पार करती यह कहानी एक नास्टैल्जिक दुनिया में पहुचा देती है। संग्रह की बेहतरीन कहानी है यह।
कहानी ‘‘चल खुसरो घर आपने’’ को भी इसी क्रम में रखा जा सकता है। एक मां, एक बेटी दोनों ही भरे पूरे परिवार के होते हुए भी अपने-अपने मोर्चे पर अकेलेपन से जूझने को विवश हैं। आयु के उस पड़ाव में जब सबसे अधिक सहारे की जरूरत होती है, उनकी आंतरिक पीड़ा समझने वाला कोई नहीं है। उस अवस्था में क्या मोक्ष का द्वार हीे उनके अपने घर का द्वार है, जहां लौट कर उन्हें सुकून मिल सकता है? कहानी का मर्म विचिलित करता है।  
‘‘कहा-अनकहा’’ कहानी परिस्थितियों, अंतद्र्वंद्व एवं एक अदद सहारे की दबी हुई ललक के ताने-बाने से बुनी हुई है। एक अकेली महिला जिसकी बेटी-दामाद दूसरे शहर में हैं एक ऐसे व्यक्ति से अनायास टकराती है जो उसका मददगार बन कर सामने आता है। लेकिन आज कर समय आंख मूंद कर विश्वास कर लेने का भी समय नहीं है। वह महिला अस्पताल जाती है। कष्ट में है। अस्पताल में भीड़ है। परेशानियां हैं। तभी एक व्यक्ति उसकी मदद को तत्पर हो उठता है, निःस्वार्थ। अस्पताल में एक अनजान व्यक्ति मदद करे और वह भी निःस्वार्थ तो शंका जागना स्वाभाविक है। हर कदम पर मदद को बढ़ा हुआ हाथ और उस हाथ को थामते हुए भारी उधेड़बुन। यह संबंध किस मोड़ तक जा सकेगा यह उस महिला के निर्णय पर निर्भर है। घटनाक्रम की स्वाभाविकता ऐसी है गोया सब कुछ अपनी आंखों के सामने घटित हो रहा हो। सभी चरित्रों को उनकी पूर्णता के साथ प्रस्तुत करना उर्मिला शिरीष की लेखकीय विशिष्टता है जो कथानक को जीवंत बना देती है।
‘‘नियति’’ एक नाटकीय घटनाक्रम के साथ क्लाईमेक्स पर पहुंचने वाली कहानी है जो कुछ पाठकों को असंभावित लग सकती है किन्तु जीवन विविधताओं से भरा हुआ है। यहां कुछ भी असंभव नहीं है। यह कहानी एक ऐसा हल भी देती है जिससे किसी स्त्री का जीवन संवर सकता है। एक विधवा स्त्री जिसकी युवा होती बेटी है। उस बेटी की पढ़ाई-लिखाई, लालन-पालन, सुरक्षा आदि की जिम्मेदारी उठाना असान नहीं है, वह भी अपनी सास एवं ससुरालियों के ताने एवं प्रताड़ना सहते हुए। उस पर अनुबंध का समय समाप्त होने पर उसकी नौकरी भी चली जाती है। तब उसकी एक मैडम उसका साथ देती है। उसके लिए एक विधुर भी तलाशती है। तब प्रश्न आता है बेटी का। इस प्रश्न का समाधान अस्वाभाविक लग सकता है किन्तु असंभव नहीं। आखिर कहानी का नाम भी ‘‘नियति’’ है और नियति में कुछ भी असंभव नहीं होता।
‘‘सप्तधारा’’ कहानी में जिस मुद्दे को उठाया गया है वह लगभग हर दूसरे घर का मुद्दा है। बेटियां तो पराई होती हैं का पुरातन फार्मूला, विवाह के बाद बेटियों के उन अधिकारों को भी छीन लेता है जो उन्हें मानवता के नाते मिलना चाहिए। मान लीजिए कि वृद्वावस्था में बाल-बच्चे दुत्कार दें तो एक अकेली वृद्वा कहां अपना सिर छुपाएगी? कहां शरण पाएगी? क्या वृद्वाश्रम में? एक छोटी-सी मानवीय सोच और पहल वृद्वाश्रम के सरवाजे बंद कर के स्वामित्व और गरिमा भरे जीवन के दरवाजे खोल सकती हैं बशर्ते बचपन से राखी बंधवा कर बहन की ताज़िन्दगी रक्षा करने का वचन देने वाला भाई रास्ता ढूंढ निकाले। यह एक सार्थक कहानी है जो एक सार्थक सोच को प्रस्तावित करती है।
‘‘मैं उन्हें नहीं जानती’’ कहानी संग्रह उर्मिला शिरीष के चिरपरिचित अंदाज़ की कहानियां जिनमें वे संवेदनाओं किसी तार-वाद्य के तार की भांति झंकृत करती हैं और फिर उसकी अनुगूंज में शेष कथा कह जाती हैं। यह अनुगूंज पाठक के मन-मस्तिष्क में भी देर तक गुंजायमान रहती है। चाहे परिवार हो या समाज हो, वे हर स्तर पर मानवता को स्थापित करना चाहती हैं। वे सकारात्मकता पर विश्वास करती हैं और इसीलिए उनकी कहानियां भी एक सकारात्मक संभावना के साथ अपनी पूर्णता को प्राप्त करती हैं। यूं भी उर्मिला शिरीष की कहानियां मनोवैज्ञानिक खिड़कियां खोलती हैंैं। उनकी कहानियों में वर्णित संबंधों में स्वार्थपरता, एकाकीपन, अंतर्विरोध, सामाजिक एवं पारिवारिक द्वंद्व, मानो मौन यथार्थ को शब्द देते हैं। वे स्त्री स्वतंत्रता, स्त्रीशक्ति एवं स्त्री स्वाभिमान को अपनी कहानियों में रखती हैं किन्तु किसी स्त्रीवादी नारे की भांति नहीं अपितु मानवतावादी दृष्टिकोण से, सहज रूप में। उर्मिला जी का शिल्प और भाषाई कौशल उन्हें अन्य समकालीन कथा लेखिकाओं से अलग ठहराता है।  उर्मिला शिरीष का यह कहानी संग्रह इस दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें मात्र समस्याएं और प्रश्न नहीं उठाए गए हैं वरन उनके हल भी सुझाए गए हैं। यह पूरा संग्रह सामाजिक विमर्श का है।            
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Saturday, April 12, 2025

टॉपिक एक्सपर्ट | पत्रिका | छायरी औ पीबे को पानी की कबे रखे जैहें? | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

पत्रिका | टॉपिक एक्सपर्ट | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली में
टाॅपिक एक्सपर्ट
छायरी औ पीबे को पानी की कबे रखे जैहें?
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

          ई दफा गरमी कछू पैले से परन लगी। अबे जेठ ने आओ औ जेठ घांईं तपन लगो। जेई से ई बेर श्रीराम सेवा समिति वारन ने रेलवे स्टेशन पे एक मईना पैले से अपनी जलसेवा चालू कर दई। ओ सुभै से इते मकरोनिया वारी कचरागाड़ी के भोंपू पे आपदा प्रबंधन वारों की सलाय बजत भई सुनी के घरे से निकरो तो पानी पी के निकरो, दुफारी 12 से 3:00 बजे तक बाहरे निकरबे से बचियो, जो निकरियो सो मूंड़ पे गमछा डारे रहियो। ऐसी मुतकी बातें एनाउंस करी जा रईं ती। अच्छो करो उन्ने। बाकी जा सब से हमें ख्याल आई के बाकी इंतजाम को करहे? सेवा करबे वारे औ आपदा वारे भर पुन्न कमाहें के कछू पुन्न नगरपालिका औ नगरनिगम सोई कमा लेवे।
     पर की साल सिविल लाइन चौराहा पे छायरी बनाई गई रई, जीसें ट्राफिक सिग्नल पे रुकबे वारन की खपड़िया ने तपे। ई दार अबे लौं ऐसी छायरी नईं लगाई गई। जागां-जागां पे पियत को ठंडो पानी को घड़ा रखो जाओ चाइए। अब सब ओरें ने तो चार पहिया पे चलत आएं औ ने ठंडे पानी की बाटलें खरीद सकत आएं। ऊपरे से घनी गरमी पर रई। दफ्तरन को टेम सोई बदल दओ जातो तो अच्छो रैतो। बाकी का ऐसो नईं हो सकत का, के टोल नाका घांईं ट्राफिक सिग्नल वारे चौराहन पे सोई परमानेंट छायरी बना दई जाए। ईसे का हुइए के अबे गरमियन में तो बा काम दैहे औ बरसात में सोई भीगबे से बचाहे। औ ऊपरे से हर की साल छायरी लगाबे की सल्ल नोईं। बाकी चाए कच्चो काम करो जाए, चाए पक्को करो जाए, मनो अब छायरी बना दई जानी चाइए। औ ठंडो पानी को घड़ो सोई धरबो सुरू कर दओ चाइए। हमाओ तो जेई कैबो आए।
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Friday, April 11, 2025

शून्यकाल | दुनिया भर में तेजी से बढ़ रहे हैं इंवायरमेंटल रिफ्यूजी | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नयादौर

दैनिक 'नयादौर' में मेरा कॉलम - 
शून्यकाल

दुनिया भर में तेजी से बढ़ रहे हैं इंवायरमेंटल रिफ्यूजी
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

     भारत में बड़ी संख्या में लोग अभी भी जलवायु परिवर्तन के बारे में जागरूक नहीं है। वहीं यूनाईटेड नेशन्स के अनुसार ग्लोबल वॉर्मिंग के कारण सन् 2030 तक दुनिया में 10 करोड़ से ज्यादा पर्यावरणीय शरणार्थी होंगे। लिहाजा यदि अभी भी नहीं जागे तो शायद सवेरा कभी नहीं हो सकेगा। लिहाजा यदि अभी भी नहीं जागे तो शायद सवेरा कभी नहीं हो सकेगा। सिर्फ तस्वीरें खिंचा कर और मीडिया में प्रचार करके पर्यावरण नहीं बच सकता है, इसके लिए सच्ची कोशिशें करनी होंगी, यदि हमें भी इंवायरमेंटल रिफ्यूजी नहीं बनना है तो।
 
 इंवायरमेंटल रिफ्यूजी यानी पर्यावरणीय शरणार्थी अर्थात् वह व्यक्ति जो पर्यावरण में हुए प्राकृतिक एवं मानवजनित परिवर्तनों के कारण शरणार्थी बन गया हो। पहले सिर्फ़ युद्ध-शरणार्थी हुआ करते थे लेकिन अब पर्यावरणीय शरणार्थी यानी इंवायरमेंटल रिफ्यूजी होने लगे हैं। सूडान और सोमालिया जैसे अफ्रिकी देशों में गृहयुद्ध से कहीं अधिक लोग शरणार्थी जीवन बिताने को विवश हुए हैं प्रकृतिक आपदा के कारण। उनके गांवों के जलस्रोत सूख गए, पानी उपलब्ध न होने के कारण उनके मवेशी मरने लगे और उनके स्वयं के प्राणों पर संकट आ गया। जिससे मजबूर हो कर उन्हें अपना गांव, घर छोड़ कर दूसरे देशों में शरण लेनी पड़ी। लेकिन उनका यह विस्थापन अवैध है क्योंकि इंवायरमेंटल रिफ्यूजी को शरण देने का कानून अभी किसी भी देश में नहीं बनाया गया है। ऐसे शरणार्थी वास्तविक शराणार्थी होने पर भी न तो शराणार्थी कहलाते हैं और न उन्हें कोई सहायता मिल पाती है। यह संभावना व्यक्त की जा रही है कि पर्यावरण परिवर्तन के कारण सन् 2050 तक अफ्रिका, लैटिन अमरीका और दक्षिण एशिया से लगभग 140 मिलियन लोग इंवायरमेंटल रिफ्यूजी के रूप में अपनी मुख्य भूमि छोड़ कर दूसरे भू भाग में विस्थापित हो जाएंगे।    
भारत में भी इंवायरमेंटल रिफ्यूजी बढ़ते जा रहे हैं। ये रिफ्यूजी पानी की अनुपलब्धता के कारण अपना गांव छोड़ कर बड़े शहरों में काम की तलाश में भटक रहे हैं और दिहाड़ी मजदूर बन कर जिन्दा रहने की कोशिश कर रहे हैं। इसका एक उदाहरण देखें कि आए दिन किसानों द्वारा आत्महत्या किए जाने का समाचार मिलता है। सरकार किसानों को हर संभव सहायता देती है। तो फिर यह आत्महत्या क्यों? यदि राजनीतिक चश्मा उतार कर देखा जाए तो कारण समझ में आ जाएगा। आखिर सरकार द्वारा दी जाने वाली रुपयों की सहायता से न तो फसल उगाई जा सकती है और न बचााई जा सकती है। फसल उगाने के लिए बुनियादी जरूरत है पानी की। जिसे हम लगभग गंवाते जा रहे हैं। 

हर वर्ष बढ़ती गरमी अपने पिछले रिकाॅर्ड तोड़ती नज़र आती है। जल स्रोत तेजी से सूखते जा रहे हैं या फिर उनका जलस्तर निरंतर गिरता जा रहा है। वृक्षों और पोखरों में स्वच्छन्द जीवन बिताने वाले पक्षियों के लिए मुट्ठी भर दाने और एक सकोरा पानी रख देने भर से हम अपने दायित्वों से मुक्त नहीं हो सकते हैं। यह एक सकोरा पानी भी तब तक ही हम पक्षियों को दे सकेंगे जब तक हमारे पास अपनी प्यास बुझाने के लिए प्र्याप्त पानी होगा लेकिन हमारी प्यास भी अब संकट के दायरे में आती जा रही है। हमने अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारते हुए मौजूदा पीढ़ीें के लिए ही गंभीर संकट खड़े कर दिए हैं। वृक्षों की अंधाधुंध कटाई, नदियों से रेत का असीमित उत्खनन, जहरीली गैस उत्सर्जन करने वाले वाहनों की सीमा तोड़ती संख्या, खाद्यान्न की आपूर्ति पर जनसंख्यावृद्धि का भारी दबाव जैसे वे प्रमुख कारण हैं जो आज पानी की उपलब्धता, सांस लेने को शुद्ध हवा और तापमान के संतुलन को बिगाड़ रहे हैं और देश का पढ़ा-लिखा तबका यह सब देख कर भी अनदेखा कर रहा है। 

सन् 1992 में जब रियो में संयुक्त राष्ट्र के जलवायु कंवेशन पर दस्तखत हुए, तो अमेरिका ने ग्रीनहाउस गैस पर किसी भी प्रकार की सीमा लगाने का विरोध किया। इसके विपरीत वाशिंगटन ने हमेशा राष्ट्रीय संप्रभुता की बात की, जब भी यह तय करने की बात हुई कि किस गैस को कम करना है, किस तरह, कितना और कब। सन् 1997 में अमेरिका ज्यादातर देशों की तरह क्योटो संधि में शामिल होने को तैयार हो गया, जिसमें सिर्फ धनी देशों के लिए उत्सर्जन में कमी के बाध्यकारी लक्ष्य तय किये गये थे, जो ग्लोबल वॉर्मिंग का स्रोत समझे जाने वाले कार्बन प्रदूषण के लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार माने जाते हैं। अमेरिका कई रियायतें हासिल करने के बाद इसके लिए तैयार हुआ.बिल किं्लटन के उपराष्ट्रपति अल गोर ने 1998 में अमेरिका की ओर से इस संधि पर हस्ताक्षर किये, लेकिन डेमोक्रैटिक प्राशासन इस संधि के औपचारिक अनुमोदन के लिये सीनेट में जरूरी दो तिहाई बहुमत कभी नहीं जुटा पाया। और जब बिल किं्लटन के बाद जॉर्ज डब्ल्यू बुश राष्ट्रपति बने तो सारी स्थिति बदल गई। पिता जॉर्ज बुश की तरह जूनियर बुश भी ऐसी संधि के विरोधी थे जो उनके विचार में विकासशील देशों को फोसिल इंधन जलाने और अपनी अर्थव्यवस्था को बढ़ाने की छूट देता था जबकि धनी देशों के हाथ उत्सर्जन की सीमाओं के साथ बांध दिये गये थे। यह संधि 2005 में अमेरिका की भागीदारी के बिना शुरू हुई। रूस के हस्ताक्षर के साथ संधि को लागू करने के लिए जरूरी 55 देशों ने इस पर अनुमोदन के बाद दस्तखत कर दिये थे। कनाडा बाद में संधि से बाहर निकल आया जबकि न्यूजीलैंड, जापान और रूस ने कार्बन कटौती के दूसरे चरण में भाग नहीं लिया। सन् 2009 में दुनिया भर के देश क्योटो प्रोटोकॉल की जगह पर एक नई संधि करने के लिए इकट्ठा हुए जिसमें अमेरिका, चीन और भारत सहित सभी देशों को कार्बन कटौती के लिए सक्रिय कदम उठाने थे। लेकिन धनी और गरीब देशों के बीच बोझ के बांटने के मुद्दे पर मतभेदों के बीच कोपेनहैगन सम्मेलन विफल हो गया। कुछ दूसरे देशों के समर्थन के साथ अमेरिका ने इस पर जोर दिया कि डील को संधि न कहा जाए। अंत में बैठक में एक अनौपचारिक समझौता हुआ जिसमें औसत ग्लोबल वॉर्मिंग को औद्योगिक पूर्व स्तर से 2 डिग्री पर रोकने पर सहमति हुई, लेकिन उत्सर्जन में कटौती का कोई लक्ष्य तय नहीं हुआ.अगला लक्ष्य 2015 तक वैश्विक संधि कर लेने का हुआ जब अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने चीन के शी जिनपिंग के साथ मिलकर भारत सहित 195 देशों को जलवायु संधि के लिए इकट्ठा किया। उत्सर्जन लक्ष्यों को प्रतिबद्धता के बदले योगदान कहा गया जिसकी वजह से ओबामा इस संधि का अनुमोदन कर पाए। डोनाल्ड ट्रम्प इसके लिए कुछ प्रयास भी किया। लेकिन फिर एक बार सबकुछ अधर में लटका हुआ है।

भारत पर जलवायु परिवर्तन की मार दिखने लगी है। बारिश के स्वभाव में आए बदलाव की वजह से हिमालयी राज्यों में कई नदियां रास्ता बदल चुकी हैं। वैज्ञानिक भी मान रहे हैं कि मौसम अजीब ढंग से व्यवहार करने लगा है। बीते कुछ दशकों में अरुणाचल प्रदेश और असम के कई गांव बह चुके हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक जलवायु परिवर्तन की वजह से कई नदियों ने अपना रास्ता बदल दिया है। पूर्वोत्तर भारत में काफी बारिश होती है। विशेषज्ञों के मुताबिक बीते कुछ दशकों में बारिश का स्वभाव बदला है। अब कुछ क्षेत्रों में बारिश बहुत ज्यादा और लंबे समय तक होती है। इसकी वजह से नदियां लबालब भर कर अपना रास्ता बदलने लगती हैं। नदियों के रास्ता बदलने से असम के लखीमपुर और धेमाजी जिले के कई गांव साफ हो चुके हैं। भूगर्भीय आंकड़ों के विश्लेषण से पता चला है कि कुछ नदियों ने अपना रास्ता 300 मीटर दूर तक बदला है तो कहीं कहीं नदियां 1.8 किलोमीटर दूर जा चुकी हैं। नई दिल्ली स्थित सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरन्मेंट (सीएसई) के अनुसार जलवायु की सामान्य स्थिति में बरसात पूरे साल अच्छे ढंग से बंटी रहती है। लेकिन अब जलवायु परिवर्तन की वजह से उसका स्वभाव बदला है। भारत सहित पूरी दुनिया में बड़े शहरों की आबादी तेजी से बढ़ रही है। लेकिन विशेषज्ञों की राय में यह सिर्फ शुरुआत है। सन् 2050 तक दुनिया की सत्तर फीसदी आबादी शहरों में रहेगी। भारत जैसे देश जिसकी आबादी सवा अरब है। तेजी से बढ़ती जा रही है, इन बड़े शहरों के पर्यावरण को बचाने के लिए काम करना होगा। सवा करोड़ के भारत में शहरों की घनी आबादी पर्यावरण के लिए खतरे की घंटी बजा रही है। आबादी के मामले में साठ सत्तर लाख से लेकर करोड़ के आंकड़े को छूते इन शहरों में अगर फौरन पर्यावरण पर ध्यान नहीं दिया गया, तो स्थिति बेहद गंभीर हो सकती है। पहले से ही घनी आबादी वाले इन शहरों पर दबाव बढ़ेगा। बिजली की जरूरत के अलावा बुनियादी सुविधाओं की भी व्यवस्था करनी होगी। नासा की ताजा रिपोर्ट कहती है कि 2060 तक धरती का औसत तापमान चार डिग्री बढ़ जाएगा, जिससे एक तरफ प्राकृतिक जलस्त्रोत गर्माने लगेंगे, तो दूसरी तरफ लोगों का विस्थापन भी बढ़ेगा। पिछले दशक में दिल्ली की आबादी डेढ़ करोड़ से ज्यादा हो गई है। वहीं मुंबई की भी आबादी लगभग दो करोड़ का आंकड़ा पार हो चली है।

यदि इंवायरमेंटल रिफ्यूजी की बढ़ती दर को रोकना है तो हमें सबसे पहले उन सब कामों को रोकना होगा जिनसे पर्यावरण को क्षति पहुंच रही है। वृक्षों को बचाना होगा तथा नए वृक्षों की पौध लगानी होगी तथा उस पौधों की ईमानदारी से रक्षा करनी होगी। सिर्फ तस्वीरें खिंचा कर और मीडिया में प्रचार करके पर्यावरण नहीं बच सकता है, इसके लिए सच्ची कोशिशें करनी होंगी, यदि हमें भी इंवायरमेंटल रिफ्यूजी नहीं बनना है तो।
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Thursday, April 10, 2025

बतकाव बिन्ना की | बा ऊपरे सुफेद बनो रओ, भीतरेे करिया निकरो | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम


बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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बतकाव बिन्ना की
बा ऊपरे सुफेद बनो रओ, भीतरेे करिया निकरो
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
         दोरे की घंटी बजी। मैंने बायरे झांक के देखो। भैयाजी औ भौजी दिखानीं। 
इत्ते टेम? दुफैर के साढ़े ग्यारा बज रए हते। जा टेम तो उन ओरन के खाबे-पीबे को होत आए? ऐसे टेम पे बे घाम में काए निकरे? मोय तनक अचरज भओ। चिन्ता भई। बाकी मैंने तुरतईं बायरे जा के दोरे खोलो।
‘‘आप ओरे ई टेम पे? सब ठीक तो आए?’’ मोसे पूछे बिगर ने रओ गओ।
‘‘हऔ सब ठीक आए! पैले तो पानी पिला बिन्ना! बायरे भौतई गरमी आए।’’ भैयाजी कैत भए सोफा पे आ बैठे। पांछू से भौजी सोई रुमाल से अपनो मों पोंछत भईं भीतरे आईं औ कैन लगीं,‘‘जा तो घाम में अभई से लुघरिया सी छू रई। ऐसो लग रओ मनो बायरे आगी-सी लगी होय।’’
‘‘हऔ, जब के अबे तो अप्रैल ई चल रओ। मई औ जून में का हुइए?’’ कैत भई मैंने पंखा चलाओ औ किचन में जा के दो गिलास पानी ले आई।
‘‘अबे फ्रिज में बाॅटलें धरनी सुरू र्नइं करी?’’ भैयाजी एक बेर में गिलास को पूरो पानी गटकत भए पूछन लगे।
‘‘अबे नईं! अबे का आए के मौसम बदल सो रओ आए औ ऊंसई मोय प्रिज को ठंडो पानी नईं पोसात। मोय तो घड़े को पानी अच्छो लगत आए। बाकी नओ घड़ो अबे ले ने पाई। एकाद दिनां जाबी तो लाबी।’’ मैंने भैयाजी खों बताई औ पूछी, ‘‘औ लाओं?’’
‘‘नईं! तनक देर में चाय जरूर बना लइयो।’’ भैयाजी बोले।
‘‘आप औ, बिन्ना खों काए परेसान कर रए? घरे चलियो सो हम पिबा देबी।’’ भौजी ने भैयाजी खों टोंको। 
‘‘ईमें परेसानी काय की? आप सोई गजब की कै रईं? अभईं बनाऊं के तनक देर में?’’ मैंने भौजी से कई।
‘‘तनक ठैर के!’’ भौजी बोलीं।
‘‘आप ओरें आ कां से रए?’’ मोए पूछे बिगर रओ नईं जा रओ हतो।
‘‘अरे का बताएं, बिन्ना! संकारे चार बजे बा दमोए वारी चाची को फोन आओ के बे ओरें सागरे आ रए चाचा जू खों इते चेकअप कराने खों। औ उन्ने हम दोई खों उते तला के ऐंगर वारे अस्पताल पे मिलबे खों बोलो। सो सुभै सात बजे हम दोई उते अस्पतालें पौंचे।’’ भैयाजी ने बताई।
‘‘सरकारी वारे में?’’ मैंने पूछी।
‘‘नईं, उते जोन प्राईवेट अस्पताल बनी आए। बा संजय ड््राईव के इते, ऊ वारे में।’’ भैयाजी ने बताई।
‘‘का हो गओ चाचा जी खों?’’ मैंने पूछी।
‘‘अबे कछू नईं भओ। बाकी हम दोई खों बी जेई लगो हतो के उनकी तबीयत ज्यादा बिगरी हुइए, तभईं बे ओरें उने ले के सागरे आ रए। मनो उते अस्पताले पौंच के पतो परो के अबे उने कछू नईं भओ, बस, तनक डरा गए।’’ भैयाजी ने बताई।
‘‘डरा गए मने? काय से डरा गए?’’ मैंने पूछी।
‘‘भओ का के दो-ढाई मईना पैले उनके सीने में दरद उठो रओ। उन्ने उतई दमोय में डाक्टर खों दिखाओ। दो दिनां भरती बी रए। डाक्टर ने बताई रई के हल्को सो अटैक आओ रओ। बाकी अब तो लग रओ के बा हार्ट को अटैक रओ के गैस को अटैक? डाक्टर ने सई बताओ रओ के नईं?’’ भैयाजी बोले।
‘‘काए? आप ऐसो काए कै रए? जबे डाक्टर ने हार्ट को अटैक कओ रओ, तो हार्ट ई को अटैक रओ हुइए।’’ मैंने कई।
‘‘कछू नईं कओ जा सकत बिन्ना! देख नई रईं, बा फर्जी डाक्टर खों कैसे पुलिस पकर लाई।’’ भौजी बोलीं।
‘‘हऔ, बा तो गजब को फ्राडिया निकरो।’’ मैंने कई।
‘‘औ का! ओई को तो दिखाओ रओ इन ओरन ने। सो अब डरा गए के का पता ऊने का दबाई दई, औ का करो। कईं अब ने कछू हो जाए। मनो इत्ते दिनां बाद कछू ने हुइए। पर दिल में डर तो बैठई जात आए। सो चाचा जू खों जब से पता परी के बा डाक्टर फर्जी निकरो तब से बे घबड़ा रए हते। फेर उनके बड़े वारे मोड़ा ने सोची के जो पैले सई को हार्ट अटैक ने बी आओ रओ हुइए तो अब घबड़ात-घबड़ात सई को हार्ट अटैक आ जाहे। सो ऊने चाचा जू से कई के सागरे चल एक बेर पूरो चेकअप करा लेत आएं सो सबरी संका मिट जैहे। जेई लाने बे ओरे भुनसारे निकर परे इते के लाने।’’ भैयाजी ने बताई।
‘‘तो बे ओरें अब कां आए? लौट गए का?’’ मैंने पूछी।
‘‘नईं, बे ओरे उतई आएं। पूरी जांच कराबे में अबे टेम लगहे। बाकी अरजेंट में ज्यादा पइसा दे के संझा लों रिपोर्टें मिल जैहे। जे ठीक रओ के अबे जो डाक्टर ने चेकअप करो तो बे बोले के घबड़ाने की कोन ऊं बात नोंई, सब ठीक आए। बाकी जांच में पूरो पतो पर जैहे।’’ भैयाजी बोले।
‘‘हमने तो उन ओरन से कई रई के घरे चलो, भोजन-पानी कर के अस्पताले पौंच जाइयो। सो बे ओरें कैन लगे के दूर परहे। औ अबे मुतकी जांचे होने, इतई रुकबे से रिपोर्ट के लाने टोंकत रैबी। फेर बे ओरे हम ओरन से बोले के आप ओरे जाओ, जो कछू जरूरत परहे तो हम फोन कर देबी औ जो सब ठीक निकरहे सो बा बी बता देबी। सो, उनको कैबो बी ठीक हतो, हम ओरें उते रुक के करत बी का? इन्ने उन ओरन खों उते नास्ता-पानी करा दओ औ उतई की एक होटल में एक कमरा दवा दओ, के बे ओरें आराम कर सकें। सपर-खोंर सकें।’’ भौजी ने बताई।
‘‘जा ठीक करो। इते तक आबे में उन ओरन खों परेसानी तो होती। संगे टेम बी खराब होतो। चलो मैं अब चाय बना रई। चाय पियत भए आगे की कैबी-सुनबी।’’ कैत भई मैं उठ खड़ी भई।
किचन में पौंच के मैंने तुरतईं। कुकर में एक डब्बा में दाल धरी और दूसरे में चाऊंर। दूसरे छोटे कुकर में आलू उबलने खों धर दए। फेर चाय को पानी चढ़ाओ। तीन बर्नर वारो चूला को जेई तो फायदा रैत आए के तीन काम एक संगे करो जा सकत आएं। जब लौं मैं चाय छान के बैठक में पौंची, उत्ते में दोई कुकर सीटी मारन लगे। 
‘‘काय, तुमाओ खाना नईं बनो का? तुम तो जल्दी बना लेत आओ?’’ भौजी ने कुकर की सीटी सुन के पूछी।
‘‘मोरो खाना तो बनो धरो, जा तो आप ओरन के लाने बना रई। अब का थके-थकाए घरे जा के आप बनाहो का?’’ मैंने भौजी से कई।
‘‘बिन्ना, तुम औ परेसान हो रईं!’’ भौजी खों संकोच लगी।
‘‘ऐसो बोल के मोरो जी ने दुखाओ। आप ओरे चाय पी लो फेर सब्जी छौंक के तुरतईं रोटी बना देबी, सो अच्छे से भोजन करियो औ आराम करियो। काय से जब कोनऊं के बीमारी की खबर मिले तो सरीर से ज्यादा जी में थकान हो जात आए।’’ मैंने कई।
‘‘सई में! पर देख तो बिन्ना, बा कैसो राच्छस डाक्टर आए, ऊको तनकऊं ने लगो के बा कित्तो बड़ो पाप कर रओ?’’ भौजी बोलीं।
‘‘औ का।’’ भैयाजी सोई बोल परे,‘‘ ऊने तो राष्ट्रपती जू की नकली सील-सिक्का लगा के फर्जी सर्टीफिकेट बना लओ। औ ऊपे गजब की बात जे के हार्ट की सर्जरी करत्तो ससुरो...।’’भैयाजी ने ऊके लाने तनक गारी-सी दई। बाकी ऊने कामई ऐसो करो, गरियाबे जोग।
‘‘सई कै रए भैयाजी आप! आदमी डाक्टर खों भगवान मानत आए औ अपनी जिनगी ऊके हाथ में सौंपे के सोचत आए के जा सब ठीक कर दैहे। जो ठीक आए के डाक्टर भगवान नईं होत, पर जा तो शैतान निकरो। डाक्टरी पढ़ी नईं औ कलेजा चीरन लगो, ऐसे में मरीज को रामनाम सत्त ने होतो तो औ का होतो? ऊ पापी खों तो कर्री सजा मिलो चाइए।’’ मैंने कई।
‘‘बा तो ठीक आए बिन्ना! अब तो ऊको पुलिस ने पकर लओ आए और केस फाईल कर दई गई हुइए, मनो जे बताओ के ऊके कागज-पत्तर पैले कोनऊं ने चैक ने करे? औ जोन ने नईं करो या मिली-भगत करी, उने बी पकरो जाओ चाइए। बोलो सई के नईं?’’ भैयाजी बोले।
‘‘बिलकुल सई। ऊकी लाईसेंस औ डिगरी पैलई चैक कर लए जाते तो इत्ते लोग बेमौत ने मरते।’’ मैंने कई।
‘‘सई में बिन्ना! सबने ऊको देवता घांईं समझो औ मों मांगी फीस दई। औ मिलो का? जान औ चली गई। औ जोन की जान नईं गई बे अब चाचा जू घांई डरात फिर रए के उनको इलाज पैले ठीक करो गओ के नईं। बे ओरंे ऊसईं डरा-डरा के मरे जा रए। कित्तो नीच आदमी आए बा। डाक्टर को सुफेद कपड़ा पैन्ह के करिया काम कर रओ हतो।’’ भौजी बोलीं। 
‘‘हऔ, बा ऊपरे से सुफेद बना रओ, भीतरे से करिया निकरो। बाकी अब ऊ को औ ऊ के सबई संगवारों खों अच्छी बत्ती दओ जाओ चाइए।’’ भैयाजी बोले। औ कोनऊं बात होती तो मोय भैयाजी को ऐसो कैबो बुरौ लगतो, मनो बा पापी तो गरियाबे जोग ई आए।
‘‘चलो मैं सब्जी छौंक के रोटी बना रई, तब तक आप ओरें हाथ मों धो लेओ।’’ मैंने भैयाजी औ भौजी से कई।       
बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लौं जुगाली करो जेई की। तब लौं मनो सोचियो जरूर ई बारे में के ईमें सासन वारन की भी लापरवाई आए के नईं? 
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