Wednesday, May 28, 2025

चर्चा प्लस | विचारणीय है स्त्री के विरुद्ध नृशंसता पर समाज का मौन | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर

चर्चा प्लस
विचारणीय है स्त्री के विरुद्ध नृशंसता पर समाज का मौन
     - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
‘‘यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमन्ते तत्र देवता’’ - यही सुनते आए हैं कि जहां नारी को सम्मान दिया जाता है वहां देवता वास करते हैं। इसे याद रखते हुए प्रश्न पूछने का मन करता है कि जहां आए दिन नारी यौनहिंसा एवं जघन्य अपराध की शिकार हो रही हो वहां देवता कितने दिन और वास करेंगे? हम किस जगह आ गए हैं जहां निर्भया कांड जैसी नृशंस खंडवा की घटना भी हमें विचलित नहीं करती है। उस घटना के विरोध या पीड़िता के पक्ष में एक सामूहिक आवाज़ भी नहीं उठती है। प्रश्न यहां सरकार या सरकारी तंत्र का नहीं वरन सकल समाज का है जिसमें आज स्त्री स्वयं को असुरक्षित पा रही है और समाज को मानो इससे कोई वास्ता ही नहीं है।  
हम बलात्कार के आंकड़ों का विषपान किए जा रहे हैं लेकिन वारदातें हैं कि थमने का नाम नहीं ले रही हैं। खंडवा की घटना निर्भया कांड से कम वीभत्स नहीं है। पीड़िता की दशा देख कर डाॅक्टर्स भी कांप उठे। पूरा समाचार पढ़ कर कोई भी इंसान कांप उठेगा। लेकिन आश्चर्य है कि प्रबल विरोध का वह स्वर कहीं सुनाई नहीं दे रहा है जो निर्भया कांड के समय उठा था या फिर कोलकता की ट््रेनी डाक्टर के समय आक्रोश के रूप में उमड़ा था। वस्तुतः किसी शासन या प्रशासन का नहीं बल्कि समाज को अपनी उस तटस्थता के विरोध करने की आवश्यकता है जो ऐसी घटना का शीर्षक पढ़ कर भी ठिठकता नहीं है, सिहरता नहीं है, उबलता नहीं है। क्या समाज अब ऐसी घटनाओं पर मौन साधने का अभ्यास कर रहा है अथवा खुद से नज़रें चुरा रहा है? क्या सामाजिक सहयोग एवं समर्थन के बिना अकेला कानून ऐसी जघन्य घटनाओं को रोक सकता है? क्या समाज का कोई दायित्व नहीं है? आखिर वह समाज ही तो है जिसमें ऐसे अपराधी पलते और बढ़ते हैं। उनके द्वारा की गई छेड़छाड़ की घटनाओं को यदि समय रहते समाज द्वारा संज्ञान में लिया जाने लगे तो क्या अपराधी के भीतर पलने वाला अपराध का कीड़ा समय रहते कुचला नहीं जा सकता है? महिलाओं के प्रति बढ़ती नृशंसता पर सामाजिक मौन पीड़ादायक है और चिन्तनीय भी।  

देश में महिलाओं को अपराधों और अपराधियों से बचाने के लिए यू ंतो ढ़ेर सारे कानून बनाए गए हैं, लेकिन अपराध के आंकड़े शर्म से सिर झुका लेने को विवश करते हैं। आज देश में बार-बार यह प्रश्न उठता है कि बलात्कार की घटनाओं पर कैसे अंकुश लगाया जाए? महिलाओं को यौन अपराध से कैसे सुरक्षित किया जाए? नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के अनुसार भारत महिलाओं के लिए अब भी सुरक्षित नहीं हो पाया है। सन् 2012 में नई दिल्ली में चलती बस में पैरामेडिकल की छात्रा से जघन्य बलात्कार और हत्या के ‘‘निर्भया कांड’’ के बाद देश में यौन हिंसा के मामले को लेकर सख्त कानून और फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाए गए लेकिन महिलाओं के खिलाफ हिंसा अब भी बेरोकटोक जारी है। एनसीआरबी के मुताबिक 2018 महिलाओं ने करीब 33,356 बलात्कार के मामलों की रिपोर्ट की। एक साल पहले 2017 में बलात्कार के 32,559 मामले दर्ज किए गए थे, जबकि 2016 में यह संख्या 38,947 थी।  एनसीआरबी के आंकड़े बताते हैं कि महिलाओं के विरुद्ध होने वाले अपराधों में हर साल बढ़ोतरी हो रही है। राज्यों की बात करें तो सन् 2018 में बलात्कार के मध्य प्रदेश में सबसे ज्यादा 5,433 मामले दर्ज हुए। दूसरे स्थान पर राजस्थान 4,335 तथा तीसरे स्थान पर उत्तर प्रदेश 3,946 था। यद्यपि 2022 तक आंकड़ों में उतार-चढ़ाव आया लेकिन घटनाएं कम नहीं हुईं। 

दिल्ली के निर्भया कांड के बाद कानूनों में सुधार के बावजूद रेप की बढ़ती घटनाओं ने सरकार और पुलिस को कठघरे में खड़ा कर दिया। आखिर महिलाओं के खिलाफ जघन्य मामलों पर अंकुश क्यों नहीं लग पा रहा है? बलात्कार के सरकारी आंकड़े भयावह है। एनसीआरबी के आंकड़ों में बताते हैं कि वर्ष 2019 के दौरान रोजाना औसतन 88 महिलाओं के साथ रेप की घटनाएं हुईं। यहां ध्यान रखना होगा कि ग्रामीण क्षेत्रों में सामाजिक कारणों एवं भय के कारण बलात्कार की हर घटना थाने में दर्ज़ नहीं हो पाती है। जिसका आशय है कि वास्तविक आंकड़े इससे और अधिक हो सकते हैं। यूं भी देश में बलात्कार को महिलाओं के लिए शर्म का मामला माना जाता है और इसकी शिकार महिला को कलंकित जीवन जीने के लिए मजबूर किया जाता है। बलात्कारी इसी मानसिक व सामाजिक सोच का फायदा उठाते हैं। कई मामलों में रेप का वीडियो वायरल करने की धमकी देकर भी पीड़िताओं का मुंह बंद रखा जाता है। 

2024 में कोलकाता ट्रेनी डॉक्टर के रेप-मर्डर केस में जब लोग सड़कों पर आ गए तब पूरे मामने को तत्परता से संज्ञान में लिया गया। कोलकाता में रेजिडेंट डॉक्टर की रेप और उसके बाद हत्या का मामला चर्चा में आया। कोलकाता के इस रेप कांड ने 2012 के निर्भया कांड की यादें ताजा कर दीं। इसके खिलाफ सिर्फ कोलकाता ही नहीं, बल्कि देशभर के कई शहरों में प्रदर्शन हुए। इसके बाद अपराधी पकड़े गए और पश्चिम बंगाल विधानसभा में 3 सितंबर 2024 को एंटी रेप बिल पास किया गया। नए कानून के तहत रेप केस की 21 दिन में जांच पूरी करनी होगी। इसके अलावा पीड़ित के कोमा में जाने या मौत होने पर दोषी को 10 दिन में फांसी की सजा होगी। भाजपा ने भी बिल का समर्थन किया। इसे अपराजिता महिला एवं बाल विधेयक 2024 (पश्चिम बंगाल आपराधिक कानून एवं संशोधन) नाम दिया गया।

देखा जाए तो महिलाओं के खिलाफ अपराध पर कड़े कानून हैं। आईपीसी में धारा 375 में रेप को परिभाषित किया गया है, जबकि 376 में इसके लिए सजा का प्रावधान है। जबकि, भारतीय न्याय संहिता में धारा 63 में रेप की परिभाषा दी गई है और 64 से 70 में सजा का प्रावधान किया गया है। आईपीसी की धारा 376 के तहत रेप का दोषी पाए जाने पर 10 साल तक की जेल की सजा का प्रावधान है। बीएनएस की धारा 64 में भी यही सजा रखी गई है। बीएनएस में नाबालिगों से दुष्कर्म में सख्त सजा कर दी गई है। 16 साल से कम उम्र की लड़की के साथ दुष्कर्म का दोषी पाए जाने पर कम से कम 20 साल की सजा का प्रावधान किया गया है। इस सजा को आजीवन कारावास तक बढ़ाया जा सकता है। आजीवन कारावास की सजा होने पर दोषी की सारी जिंदगी जेल में ही गुजरेगी। बीएनएस की धारा 65 में ही प्रावधान है कि अगर कोई व्यक्ति 12 साल से कम उम्र की बच्ची के साथ दुष्कर्म का दोषी पाया जाता है तो उसे 20 साल की जेल से लेकर उम्रकैद तक की सजा हो सकती है। इसमें भी उम्रकैद की सजा तब तक रहेगी, जब तक दोषी जिंदा रहेगा। ऐसे मामलों में दोषी पाए जाने पर मौत की सजा का प्रावधान भी है। इसके अलावा जुर्माने का भी प्रावधान किया गया है।

गैंगरेप के मामलों में दोषी पाए जाने पर 20 साल से लेकर उम्रकैद और जुर्माने की सजा का प्रावधान है। बीएनएस की धारा 70(2) के तहत, नाबालिग के साथ गैंगरेप का दोषी पाए जाने पर कम से कम उम्रकैद की सजा तो होगी ही, साथ ही मौत की सजा भी सकती है। ऐसे मामलों में जुर्माने का भी प्रावधान है। जबकि, आईपीसी में 12 साल से कम उम्र की बच्ची के साथ गैंगरेप का दोषी पाए जाने पर ही मौत की सजा का प्रावधान था। बीएनएस की धारा 66 के तहत, अगर रेप के मामले में महिला की मौत हो जाती है या फिर वो कोमा जैसी स्थिति में पहुंच जाती है तो दोषी को कम से कम 20 साल की सजा होगी। इस सजा को बढ़ाकर आजीवन कारावास या फिर मौत की सजा में भी बदला जा सकता है।
बलात्कार की घटनाओं पर अंकुश लगाने के लिए कई कड़े कानून बनाए गए हैं लेकिन जैसाकि आए दिन होने वाली जघन्य घटनाओं से स्पष्ट है कि बलात्कारियों को किसी कानून का भय नहीं है। किसी जुनूनी हैवान की तरह वे अपराध को अंजाम दे डालते हैं। बलात्कार की निरंतर बढ़ती हुई आपराधिक प्रवृत्ति का कारण सभी अपने-अपने स्तर पर ढूंढते दिखाई देते हैं। बलात्कार के साथ जो सबसे खतरनाक और विकृत ट्रेंड जुड़ता जा रहा है, वह है बलात्कार के बाद नृशंसतापूर्वक हत्या किया जाना। एक तो बलात्कार का अपराध ही हमारी सामाजिक व्यवस्था में किसी भी स्त्री, युवती या बच्ची के सामान्य जीवन के अधिकार छीन लेता है, उस पर जीने का अधिकार छीन लिया जाना, वह भी प्रताड़ित कर के, विकृति की घातक स्थिति को दर्शाता है। 
चूक कहां हो रही है जो महिलाओं के विरुद्ध नृशंस अपराध के आंकड़े कम होने के बजाए बढ़ रहे हैं? राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की 2022 की रिपोर्ट की 546 पेज की रिपोर्ट के अनुसार देश में महिलाओं के विरुद्ध अपराध के कुल 4 लाख 45 हजार 256 केस दर्ज किए गए, यानी हर घंटे लगभग 51 एफआईआर हुईं। 2021 में यह आंकड़ा 4 लाख 28 हजार 278 था। जांच एजेंसियों के अनुसार भारत में हर घंटे 3 महिलाएं रेप का शिकार होती हैं, यानी हर 20 मिनट में 1 महिला। इन डरावने आंकड़ों के पीछे मौजूद एक कड़वा सच यह भी है कि देश में रेप के मामलों में 96 प्रतिशत से ज्यादा आरोपी महिला को जानने वाले होते हैं। क्या उन्हें दण्ड का भय नहीं होता?
दुखद यह है कि रेप के मामलों में 100 में से 27 आरोपियों को ही सजा होती है, बाकी बरी हो जाते हैं। 2022 तक देश में 2 लाख रेपकेस लंबित थे। इनमें 18517 का ही ट््रायल पूरा हुआ। 5067 कन्विक्ट रहे यानी दोषी ठहराए गए और 12062 बरी हुए। यह स्थिति भी कहीं न कहीं विचारणीय है। हमारे देश में बलात्कार गैर-जमानती अपराध है। लेकिन एक सर्वे के अनुसार ज्यादातर मामलों में सबूतों के अभाव में अपराधियों को जमानत मिल जाती है। ऐसे अपराधियों को राजनेताओं, पुलिस का संरक्षण भी मिला रहता है। न्यायाधीशों की कमी के चलते मामले सुनवाई तक पहुंच ही नहीं पाते। ज्यादातर मामलों में सबूतों के अभाव में अपराधी बहुत आसानी से छूट जाते हैं। लेकिन कानून में छेद भी सामाजिक व्यवस्था के चलते ही बने हैं। क्योंकि आज भी ऐसे अपराधों के बाद पीड़िता की तरफ ही उंगली उठती हैं। इससे अपराधियों का मनोबल बढ़ता है। कई पीड़िताएं और उनके परिजन बदनामी के डर से केस दर्ज ही नहीं कराते हैं और यह बदनामी सामाजिक सोच ही देती है जिसमें हर अपराध के जिए लड़की को ही जिम्मेदार ठहरा दिया जाता है। 

दरअसल कड़े कानून लागू किए जाने के साथ ही राजनीतिक दलों, सरकारों और पुलिस में उसे लागू करने की प्रबल इच्छाशक्ति का होना भी जरूरी है। इसके साथ ही सामाजिक सोच में बदलाव भी जरूरी है यानी बलात्कारी का सामजिक बहिष्कार भी जरूरी है। जब तक बलात्कारी मानसिकता वाले व्यक्ति के मन में कानून और समाज का भय नहीं होगा तब तक निर्भया कांड से ले कर खंडवा कांड तक के नृशंस अपराधों पर रोक लगना कठिन है। 
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Tuesday, May 27, 2025

पुस्तक समीक्षा | कुण्डलिया छंद को पुनर्स्थापना दिला सकती है ‘‘ढाई आखर की कथा’’ | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

आज 27.05.2025 को 'आचरण' में प्रकाशित - पुस्तक समीक्षा


 पुस्तक समीक्षा
कुण्डलिया छंद को पुनर्स्थापना दिला सकती है ‘‘ढाई आखर की कथा’’
       - समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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काव्य संग्रह  - ढाई आखर की कथा (कुंडलिया-संग्रह)
कवि        - डाॅ. श्याम मनोहर सीरोठिया
प्रकाशक  - श्वेतवर्ण प्रकाशन, 212 ए, एक्सप्रेस व्यू अपार्टमेंट सुपर एमआईजी, सेक्टर 93, नोएडा-201304
मूल्य     - 349/-
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हिन्दी काव्य जगत को छंदबद्धता ने जितना समृद्ध किया है उतना काव्य की और किसी विधा ने नहीं किया। यह सही है कि काव्य की अनेक विधाएं समान्तर चलन में रही हैं और आज भी हैं लेकिन अपने गेयता के गुण एवं स्मरण रखने में सहजता के कारण छंदबद्ध काव्य अधिक लोकप्रिय रहा है। गीत और नवगीत में भी छांदासिकता रही और यदि प्रवाह को ध्यान में रख कर छंदमुक्त काव्य लिखा गया तो उसमें भी कुछ प्रतिशत छांदासिकता का अनुभव किया जा सकता हैं। कुंडलिया छंद का स्वर्णकाल भक्तिकाल को माना जाता है जब 16-17वीं शताब्दी में कुंडलिया छंद का सर्वाधिक सृजन हुआ। तुलसीदास ने ‘‘रामचरितमानस’’ में कुंडलिया छंद का प्रचुरता से प्रयोग किया, मीराबाई ने भी भक्ति और प्रेम की  सुंदर कुंडलिया लिखीं, रहीम ने भक्ति, नीति, प्रेम और श्रृंगार विषयों में कुंडलिया लिखी हैं। कबीर, रैदास, सूरदास आदि ने भी अपनी अभिव्यक्ति के लिए कुंडलिया छंद को अपनाया। किन्तु आधुनिक काल में काव्य के साथ विधागत श्रम न करने वालों ने छंदों को हाशिए में धकेल कर नई कविता की उस धारा को पोषित करना शुरू कर दिया जिसे आलोचकों ने ‘‘अकविता’’ एवं ‘‘गद्य कविता’’ जैसे नाम दिए। यह प्रसन्नता की बात है कि हिन्दी काव्य जगत में एक बार फिर छंदों के प्रति रुझान जागा है। दिलचस्प बात यह भी है कि जो छंदविधा के वर्तमान पुरोधा हैं उन्होंने सोशल मीडिया का एक पाठशाला की तरह उपयोग किया और छंद से घबराने वाले अथवा छंद विधान से अपरिचित कवियों को भी छंद में पारंगत करने का बीड़ा उठा लिया। डाॅ. श्याम मनोहर सीरोठिया उन कवियों में से एक हैं जो छंद विधा के पुरोधा भी हैं और जिन्होंने सोशल मीडिया पर अपनी छांदासिकता से एक बड़े वर्ग को प्रभावित भी किया है। दोहा, सोरठा, चैपाई, रोला, कुंडलिया आदि छंद के वे सिद्धहस्त हस्ताक्षर हैं। डाॅ. श्याम मनोहर सीरोठिया का सद्यः प्रकाशित कुंडलिया संग्रह है-‘‘ढाई आखर की कथा’’।
‘‘ढाई आखर की कथा’’ कुंडली संग्रह के ब्लर्ब में राहुल शिवाय ने लिखा है कि ‘‘कुण्डलिया छंद हिन्दी साहित्य के लिए कोई नया छंद नहीं है। दोहा और रोला छंद से बने इस छंद का नाम कुण्डलिया, कुण्डली मुद्रा में बैठे सर्प से लिया गया है, जिसका पूँछ और मुख एक-दूसरे के सभीप या जुड़े दिखायी देते हैं। इसी प्रकार दोहे के चतुर्थ चरण को रोले के प्रथम चरण में प्रयुक्त कर हम इस छंद में कुण्डलीनुमा आकृति बनाते हैं और दोहे में कहे गये वाक्य को रोले में व्याख्यायित करते हैं। आरम्भिक काल से लेकर कुण्डलिया छंद की भाषा और विषयों में निरंतर प्रयोग होते रहे हैं। नीति, अध्यात्म और जीवनानुभवों, हास्य, व्यंग्य से होता हुआ आज यह आमजन की पीड़ा तक पहुँच गया है। वैसे भी कविता की प्रथम अनिवार्यता उसकी समसामयिकता ही होती है और डॉ. सीरोठिया इस बात को गंभीरता से समझने और अभिव्यक्त करने वाले रचनाकार हैं।’’
राहुल शिवाय का कथन सही है कि डॉ. सीरोठिया समसामयिकता के महत्व को समझते हैं। उनके कुंडली संग्रह का नाम भले ही ‘‘ढाई आखर की कथा’’ है, जिससे ध्वनित होता है कि इस संग्रह में मात्र प्रेमासिक्त कुंडलिया होंगी, किन्तु डाॅ. सीरोठिया प्रेम को जिस व्यापक अर्थ में देखते हैं, उसी व्यापकता के दिग्दर्शन इस संग्रह की कुंडलियों में किए जा सकते हैं। इस संग्रह में संग्रहीत कुंडलियों में श्रृंगार जनित प्रेम है तो, प्रकृति के तत्वों से प्रेम और पारस्परिक भाईचारा युक्त प्रेम भी है। डाॅ. सीरोठिया ने कुंडलिया को छंद माध्यम के रूप में अपनाते हुए प्रेम की विराटता एवं व्यापकता की बात की है। शिल्प और कथ्य की दृष्टि से उनकी कुंडलिया इतनी सक्षम हैं कि वे हाशिए पर खड़ा कर दिए गए कुंडलिया छंद को पुनः मुख्य धारा से जोड़ सकती हैं। इस संबंध में संग्रह की भूमिका में फिरोजाबाद के साहित्य भूषण डॉ. रामसनेही लाल शर्मा ‘‘यायावर’’ ने लिखा है कि ‘‘कविवर डॉ. श्याम मनोहर सीरोठिया यद्यपि व्यवसाय से चिकित्सक हैं, परंतु उन्हें काव्य की प्रतिभा ईश्वरीय अनुकंपा के रूप में मिली है। वे बहुमुखी प्रतिभा संपन्न कवि हैं। उनके गीतों में ऐसा माधुर्य और लालित्य होता है कि वे अत्यंत हृदयग्राही हो जाते हैं। इसी तरह उनके दोहे भी संक्षेप में बड़ी और गहरी बात कहने में सक्षम होते हैं। इस बार वे अपनी प्रतिभा का उत्कर्ष कुंडलियों के रूप में लेकर उपस्थित हुए हैं।’’
‘‘चमकदार शुद्ध रत्नों जैसी बहुमूल्य कुंडलियों का संग्रह’’ शीर्षक से जबलपुर के वरिष्ठ गीतकार एवं साहित्य भूषण आचार्य भगवत दुबे ने लिखा है कि ‘‘मेरा विश्वास है कि डॉ. श्याम मनोहर सीरोठिया का कुंडलिया संग्रह ढाई आखर की कथा हिंदी साहित्य जगत में स्नेह के साथ पढ़ा जाएगा एवं सुधी पाठकों में आदर के साथ स्वीकार किया जाएगा। कालांतर में यह कुंडलिया संग्रह श्रेष्ठ संग्रहों के रूप में चर्चित होगा एवं डॉ. सीरोठिया गीतों की तरह कुंडलिया सृजन के क्षेत्र में अपने यश का परचम फहराने में सफल होंगे।’’
डाॅ. सीरोठिया ने अपनी कुंडलिया सर्जना के संबंध में अपने प्राक्कथन में कुछ अनुभव एवं प्रेरणास्पद घटनाओं का उल्लेख किया है। उनमें से एक प्रसंग है- ‘‘कुछ समय पूर्व देश के प्रतिष्ठित कुंडलियाकार आद त्रिलोक सिंह ठकुरेला जी ने कुंडलियां लिखने का आग्रह किया कुछ कुंडलियां लिखीं भी लेकिन कोई उल्लेखनीय उपलब्धि इस क्षेत्र में नहीं हो सकी। सन 2023 में एक एक्सीडेंट के बाद मेरा बड़ा आपरेशन हुआ एवं इसी बीच धर्मपत्नी सरला जी को ब्रेन स्ट्रोक हो गया गहन अवसाद के इस दौर में कलम ने संबल दिया और मैंने प्रत्येक दिन सृजन को समर्पित कर दिया। इस बीच प्रथम सोरठा संग्रह चिंतन के आयाम लिखा गया एवं उसके बाद ही कुंडलिया संग्रह ‘ढाई आखर की कथा’ लिखा गया।’’
डाॅ. सीरोठिया के इस संग्रह की कुंडलियों के सरोकार व्यापक हैं। उन्होंने ‘‘सामाजिक जीवन की विसंगतियों के साथ-साथ व्यक्तिगत जीवन की कही-अनकही कथाएं, रिश्तों की इंद्रधनुषी छटाओं की सुकोमलता के साथ उनका खुरदरापन, अपनों के रंग बदलते चेहरों की भाव भंगिमाएं, प्रेम में डूबे हृदय की मिठास और स्निग्धता, राजनीति के मुखौटों की सच्चाई, जीव-जगत की उपादेयता, पर्यावरण की चिंता एवं चिंतन, मानवीय मूल्यों की संवेदनाओं के साथ व्यक्ति चेतना को कुंडलियों के माध्यम से ढाई आखर की कथा में’’ पिरोया है। इसीलिए इस संग्रह की गुणवत्ता उवं मूल्यवत्ता दोनों श्रेष्ठ हैं। जैसे वे संग्रह की प्रथम कुंडलिया में ही कहते हैंकि -
अपने चिंतन से करें, सारे निर्णय आप।
असफल भी होते कभी, मत समझो अभिशाप।
मत समझो अभिशाप, सफलता निश्चित आए।
हर पल का उत्साह, नया विश्वास जगाए।
कहे श्याम कविराय, कोशिशों से हैं सपने।
जीवन में दें साथ, सदा शुभ चिंतन अपने।।
कवि इस बात से व्यथित है कि आधुनिकता के जाल में जकड़ कर लोग पारस्परिक सौहाद्र्य, पारिवारिकता एवं सत्कार की भावना को भूलते जा रहे हैं-
रिश्तेदारी के सभी, बदल गए व्यवहार।
पहले जैसे अब नहीं, होते हैं सत्कार।
होते हैं सत्कार, लोग बनते अनजाने।
परंपरा को भूल, काम करते मनमाने।
कहे श्याम कविराय, हुए रिश्ते अब भारी।
खुशियों से है दूर, आजकल रिश्तेदारी।।
किन्तु ऐसा भी नहीं है कि कवि नूतनता का विरोधी है। कवि उन विचारों का पक्षधर है जो जड़ता को तोड़ कर नई तकनीक से नया जीवन गढ़ कर जीवन में नई ऊर्जा भर सकता है-
तोड़ो जड़ता सोच की, लाओ नए विचार।
चलो समय के साथ में, कहे लोक व्यवहार।
कहे लोक व्यवहार, नई तकनीकी आई।
दुनिया की आवाज, आज दे रही सुनाई।
कहे श्याम कविराय, नए से नाता जोड़ो।
जो बनता अवरोध, उसे हिम्मत से तोड़ो।।
          डाॅ. सीरोठिया ने धन कमाने के लोभ में देश से पलायन करने वालों पर भी दृष्टिपात किया है तथा उन्हें समझाने का प्रयास किया है-
रोजी-रोटी के लिए, भागें लोग विदेश।
लेकिन जाकर भूलते, वे अपना परवेश।
वे अपना परिवेश, संपदा बहुत कमाते।
फिर भी इसके बाद, हृदय से दुखी बताते।
कहे श्याम कविराय, नौकरी कर लो छोटी।
बना रहेगा चैन, यहाँ है रोजी-रोटी।।
      कवि ने जीवन के शाश्वत दर्शन को भी अपनी कुंडलिया के माध्यम से सामने रखा है और स्मरण कराया है कि शोक की घड़ी में धैर्य रखना ही एक मात्र विकल्प है-
रोने-धोने से नहीं, वापस आते लोग।
नहीं किसी के हाथ में, लिखती नियति कुयोग।
लिखती नियति कुयोग, साथ असमय में छूटे।
काल चले चुपचाप, प्राण पल भर में लूटे।
कहे श्याम कविराय, कौन रोके होने से।
जाने वाले लोग, नहीं आते रोने से।।

संग्रह में कुल 260 कुंडलिया हैं। ये सभी परस्पर भिन्न विषयों एवं समसामयिक प्रतिबद्धता लिए हुए हैं। इस प्रकार डाॅ श्याम मनोहर सीरोठिया ने अपन कुंडलियों में वर्तमान की स्थिति, परिस्थिति एवं संभावनाओं को रच कर कुंडलिया छंद को हर दृष्टि से प्रासंगिक बना दिया है। डाॅ. सीरोठिया का कुंडलिया संग्रह ‘‘ढाई आखर की कथा’’ प्रेम की व्यापकता, कथ्य की समकालीनता एवं कुंडलिया छंद शिल्प की पुनर्स्थापना की दृष्टि से महत्वपूर्ण है एवं पठनीय है।            

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Saturday, May 24, 2025

टॉपिक एक्सपर्ट | नल महराज बतकाव नईं करन देत | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | पत्रिका | बुंदेली कॉलम

पत्रिका | टॉपिक एक्सपर्ट | बुंदेली में
टॉपिक एक्सपर्ट 
नल महराज बतकाव नईं करन देत
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

      कछु टेम से बड़ो गड़बड़-झालो चल रओ। बात का आए के हमाए एक चिन्हारी वारे क्रिश्चियन कॉलोनी के इते रैत आएं। उनसे हमाई भौत घुटत आए। बे आएं तो हमसे बड्डे, मनो हम ओरें मोबाईल पे जब जुटत आएं तो रेता चालबे को चलना घांईं अपनी बतकाव से सगरी दुनिया को साहित्य चाल लेत आएं। कभऊं-कभऊं तो घंटा खांड़ लौं बतकाव चलत रैत आए। संगे भौजी के एक्सपर्ट कमेंट के कछु तड़का सोई लगत रैत आएं। मनो मसला जे नइयां। असल मसला जे आए के आजकाल उनके इते जब फोन करो सो बतकाव चालू हो नईं पात, के उनके इते नल महराज टपक परत आएं। औ फेर उनके इते पानी भरबे की भगदड़ मच जात आए। एक दिनां हमने संकारे फोन करो सो नल आ गए, एक दिनां दुफारी को फोन करो सो नल आ गए। फेर हमने दो-चार दिनां बाद संझा को फोन करो सो नल महराज आन टपके। हमने पूछी के का आपके इते तीन टेम नल आत आएं? काए से हम जब फोन करत आएं आप पानी भरबे खों भगत फिरत हो। ईपे बे दुखी होत भए बोले, जेई तो सल्ल आए के नल आबे को कोनऊं फिक्स टेम नइयां। कभऊं बी आ जात आएं, सुभै, सांझ, दुफारी औ कओ सोऊत टेम रात खों आ जाए।
  सो,  उते तो जे हाल ठैरो। हो सकत के औ मोहाल में बी जेई सल्ल होए। अबे हमने दूसरे मोहाल में बात नईं करी। कओ पूरी सिटी में जेई सल्ल बिंधी होए। सो, मालक हरों सब जांगा नल को टेम तो फिक्स कर देओ ताके लोगन को आपस में बतकाव को सई टेम निकर सके। हम ओरन को तो ठीक, मनो कोनऊं को समधियाने टाईप को संबंध होए तो कओ रार मचन लगे के हमाई बात नईं सुनी जात। काय सई कई के नईं?
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Thank you Patrika 🙏
Thank you Dear Reshu Jain 🙏
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Friday, May 23, 2025

शून्यकाल | 23 मई : विश्व कछुआ दिवस : केशव धृतकूर्मशरीर जय जगदीश हरे | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नयादौर

दैनिक 'नयादौर' में मेरा कॉलम - शून्यकाल                                                             23 मई : विश्व कछुआ दिवस : केशव धृतकूर्मशरीर जय जगदीश हरे
           - डाॅ (सुश्री) शरद सिंह                                                                                       
    सन 2000 से प्रति वर्ष 23 मई को विश्व कछुआ दिवस मनाया जाता है। वही कछुआ जो हमारे ड्राईंरूम में गुडलक की निशानी के तौर पर सजा रहता है या फिर फिशपाॅण्ड में नन्हें जीव के रूप में तैरता रहता है। आज इस कछुए का अस्तित्व खतरे में हैं। इसके संरक्षण की जागरूकता लाने के लिए ही विश्व कछुआ दिवस मनाया जाता है। लेकिन भारतीय संस्कृति में कछुए को प्राचीनकाल से विष्णु के दशावतार में स्थान दे कर संरक्षित किया जाता रहा है। क्योंकि जो पूज्य है, उसे हानि नहीं पहुंचाई जा सकती है। वह तो पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव ने भारत में कछुओं पर संकट ला दिया अन्यथा दशावतार में दूसरे स्थान पर है कछुआ। जिसमें वैज्ञानिकता भी है। 
 
      विश्व कछुआ दिवस हर साल 23 मई को मनाया जाता है। इसकी शुरुआत अमेरिकन टॉर्टोइज रेस्क्यू द्वारा सन 2000 में हुई थी। इस दिन लोगों को कछुओं के बारे में विस्तृत जानकारी दी जाती है। कछुए के महत्व और उन पर मंडराते संकट के बारे में चर्चा की जाती है जिससे लोग जागरूक हों और कछुओं का संरक्षण हो सके। कछुए इस पृथ्वी के सबसे पुराने निवासियों में से एक हैं। वे लगभग 220 मिलियन वर्षों से वैश्विक पारिस्थितिक तंत्रों के अभिन्न अंग रहे हैं और कम से कम 400,000 वर्षों से मानव संस्कृति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे हैं। कछुए का खोल जैव विकास की वह विलक्षणता है जो उसे मीठे पानी और समुद्री खारे पानी के पारिस्थितिक तंत्रों में जीने की क्षमता प्रदान करता है। दुर्भाग्यवश, अभी तक कछुओं की 7 प्रजातियां विलुप्त हो चुकी हैं और लगभग 360 कछुआ प्रजातियों में से लगभग 187 प्रजातियां विलुप्त होने की कगार में हैं। इसीलिए यदि अभी भी कछुओं की प्रजातियों को नहीं बचाया गया तो फिर कभी नहीं बचा सकेंगे।
कछुए क्यों विलुप्त हो रहे हैं? संक्षेप में कहा जा सकता है कि उनके आवास को क्षति, भोजन और पारंपरिक दवाओं के लिए मनुष्यों द्वारा मारा जाना और अंतरराष्ट्रीय पालतू व्यापार के लिए संग्रह के कारण कछुओं की आबादी तेजी से घट रही है। यह सचमुच चिंताजनक है।
भारतीय संस्कृति में ऋषि-मुनियों ने जैव विकास के प्रत्येक जीव के महत्व को भली-भांति समझ लिया था। वे जानते थे कि यदि सभी जीवों को महत्व मानस में स्थापित कर दिया जाए तो उन जीवों का संरक्षण सुनिश्चित हो सकता है। इसका सबसे अच्छा उदाहरण है भगवान विष्णु के दशावतार की संकल्पना। इस दशावतार में प्रथम अवतार मीन अर्थात् मछली को माना गया है और दूसरा अवतार कूर्म अर्थात कछुए को। इस संबंध में पुराणों में एक रोचक कथा भी है। जब देवताओं और असुरों ने मिलकर समुद्र मंथन शुरू किया, तो प्रश्न उठा कि समुद्र को मथा कैसे जाए? तब वासुकी सर्प को रस्सी के रूप में प्रयोग में लाया गया और मंदराचल पर्वत को मंथन के स्तम्भ के रूप में चुना गया। किन्तु जैसे ही मंथन आरंभ किया गया, मंदराचल पर्वत समुद्र में डूबने लगा। तब भगवान विष्णु ने कछुए का रूप धारण किया और पर्वत को अपनी पीठ पर रख लिया। कछुए की उभरी हुई पीठ पर रखा गया मंदराचल पर्वत सटीकता से घूम कर मंथन कर सका जिससे 14 रत्न निकले थे। इसीलिए भारतीय संस्कृति में कछुए को स्थिरता और समृद्धि का प्रतीक माना गया है। 
जयदेव रचित ‘‘गीता गोविंदम’’ के दशावतार स्तोत्र में विष्णु के दशावतार की स्तुति की गई है। इसमें प्रथम और द्वितीय अवतार की स्तुति इस प्रकार है-
प्रलय पयोधि-जले धृतवान् असि वेदं
विहित वहित्र-चरित्रं अखेदं
केशव धृत-मीन-शरीर, जय जगदीश हरे।
क्षिति इह विपुलतरे तिष्ठति तव पृष्ठे
धरणि- धारण-किण चक्र-गरिष्ठे
केशव धृत-कूर्म-शरीर जय जगदीश हरे।
इसके बाद शूकर, नरहरि, वामन, भृगुपति, राम, हलधर, बुद्ध और कल्कि अवतारों का उल्लेख है।    वैज्ञानिक दृष्टि से जीवों के विकास क्रम पर दृष्टि डालते ही दशावतार की संकल्पना की वैज्ञानिकता भी स्पष्ट हो जाती है-1. एक कोशिकीय जीव, बहुकोशिकीय जीव, फिर बहुकोशिकीय जीवों ने विभिन्न प्रकार के जीवों का विकास किया, जिसमें पौधे, जानवर और अन्य जटिल जीवन रूप शामिल हैं। जीवों का विकास विभिन्न चरणों में हुआ, जैसे कि उभयचरों से सरीसृपों का विकास, और फिर सरीसृपों से स्तनधारियों का विकास। लेकिन न केवल हम भारतीय बल्कि पूरी दुनिया मानो विकासक्रम और प्रत्येक जीव के महत्व को भूलती या अनदेखा करती जा रही है। यद्यपि हर देश में अब कछुओं की हत्या अथवा अवैधानिक व्यापार के विरुद्ध कानून बनाए जा चुके हैं किन्तु यह अभी भी पूरी तरह कारगर नहीं है। 
मेडागास्कर में, प्लॉशेयर कछुआ या एंगोनोका ( एस्ट्रोचेलिस यनिफोरा ) को विलुप्त होने के कगार पर संरक्षित किया गया है और संभवतः यह दुनिया का सबसे लुप्तप्राय कछुआ है। इसे शायद ही कभी मेडागास्कर के बाहर पाला गया हो, और जैसे-जैसे इसकी आबादी घटी है, काले बाजार में इसका मूल्य बढ़ता गया है। कानूनी रूप से संरक्षित स्थिति के बावजूद, प्लॉशेयर को नियमित रूप से उच्च कीमतों पर इंटरनेट पर बिक्री के लिए रखा जाता है और उन्हें दक्षिण पूर्व एशिया में व्यापारिक केंद्रों के माध्यम से मेडागास्कर से अवैध बिक्री करना जारी है। कुछ समय पहले दक्षिणी मेडागास्कर के एक घर से लगभग 11,000 गंभीर रूप से लुप्तप्राय रेडिएटेड कछुए ( एस्ट्रोचेलिस रेडिएटा ) जब्त किए गए थे। छह महीने बाद, लगभग 7,000 और जब्त किए गए। उनमें से अधिकांश को अंतरराष्ट्रीय पालतू व्यापार के लिए एशिया में तस्करी किए जाने की संभावना थी, जिनमें से सबसे बड़े जानवर घरेलू खाद्य बाजार के लिए थे।
भारतीय स्टार कछुए जैसी प्रजातियां वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के तहत संरक्षित हैं। दण्ड संहिता में यह प्रावधान है कि जो लोग इन संरक्षित प्रजातियों के व्यापार, बिक्री या यहां तक कि इनके मालिक होने में संलिप्त पाए जाएंगे, उन्हें गंभीर दण्ड के भागी बन सकते हैं।
कछुओं के अस्तित्व के लिए संकट पैदा करने वाले कुछ प्रमुख कारण हैं- जलवायु परिवर्तन, अवैध शिकार, समुद्री कचरा, नदियों में कारखानों के विषैले पदार्थों का बहाव, तेज गति से चलने वाली नौकाएं आदि। दरअसल, समुद्र के स्तर में वृद्धि, तटीय कटाव, और गर्म तापमान कछुओं के लिए खतरा बन रहे हैं। भोजन और पारंपरिक चिकित्सा के लिए कछुओं का अवैध शिकार किया जा रहा है, जिससे कुछ प्रजातियां विलुप्त होने के कगार पर आ गई हैं। समुद्री प्लास्टिक कछुओं के लिए खतरनाक है, क्योंकि वे इसे भोजन समझकर खा लेते हैं या इससे फंस जाते हैं। समुद्री कछुओं के लिए एक और खतरा है जो उनके आवासों को नुकसान पहुंचाती हैं और उन्हें नुकसान पहुंचाती हैं। 
कोयला खनन, सीवेज अपवाह और नदी अवरोधों से गाद जमने से ये धाराएं क्षरित हो गई हैं। कछुआ प्रजातियों के ऐतिहासिक निवास का केवल लगभग 7 प्रतिशत ही बचा है, और आबादी में तेजी से गिरावट आई है। गाद और रेत खनन ने भी बाटागुर वंश के एशियाई नदी कछुओं की आबादी पर भारी असर डाला है । 
बांध बनाया जाना कछुओं के जीवन के लिए भी नुकसानदेह है। बांध निर्माण से जीन प्रवाह में बाधा उत्पन्न होती है। नदियों के तटीकरण और तटरेखा को सख्त करने से कछुओं के घोंसले और धूप सेंकने के क्षेत्र खत्म हो सकते हैं और आवास को बनाए रखने वाली हाइड्रोडायनामिक प्रक्रियाएं बदल सकती हैं । वैश्विक नदी की मात्रा का कम से कम 48 प्रतिशत प्रवाह विनियमन बांधों के कारण बदल गया है। इससे कछुओं को प्रजनन एवं जीवन विकास के अवसर कम होते जा रहे हैं।
कछुओं को बचाने के लिए उनके आवास को संरक्षित करके और पुनः स्थापित करना जरूरी है। इस दिशा में सबसे पहले जलवायु परिवर्तन की गति को कम करना भी आवश्यक है। इससे भी पहले अब तक बची हुई कछुओं की प्रजातियों को अवैध शिकार से बचाना जरूरी है। कछुओं को पालतू जीव के रूप में एक छोटे से पाॅण्ड में रखना ठीक उसी प्रकार है जैसे किसी पक्षी के पर काट कर उसे पिंजरे में कैद रखा जाए। माना जाता है कि स्फटिक कछुआ वित्तीय स्थिरता को बढ़ाता है और धन को आकर्षित करता है। अतः हम जिससे अपने शुभ-लाभ की प्रार्थना करते हैं, उसे बचाना भी हमारी जिम्मेदारी होनी चाहिए। यूं भी इकाॅलाॅजी सिस्टम का एक भी जीव कम होने से पूरा इकाॅलाॅजी सिस्टम गड़बड़ा सकता है क्योंकि इस पृथ्वी के स्वस्थ पर्यावरण के लिए हर जीव आवश्यक है।
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Thursday, May 22, 2025

बतकाव बिन्ना की | फोटू को हंसा लील गओ मोतियन की माला | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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बतकाव बिन्ना की
फोटू को हंसा लील गओ मोतियन की माला
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
      ‘‘का सोच रए भैयाजी?’’ मैंने भैयाजी से पूछी। काए से के बे अपने मूंड़ पे हाथ धरे बैठे हते।
‘‘सोचबे को का आए? कछू नईं।’’ भैयाजी बोले।
‘‘ऐसो नईं, कछू तो सोच रए आप।’’ मैंने कई।
‘‘कछू नईं सोच रए।’’ भैयाजी लंबी संास भरत भए बोले।
‘‘अब आपको ने बताने होय सो ने बताओ।’’ भैयाजी खों उलायना दओ।
‘‘ऐसा कछू नईं। बस, जे ई आजकाल की दसा सोच के जी बढ़ा रओ हतो।’’ भैयाजी तनक दुखी होत भए बोले।
‘‘कोन सी दसा?’’ मैंने पूछी।
‘‘जे आजकाल का चल रओ, कछू समझ नईं परत।’’ भैयाजी फेर के गोलमोल बोले।
‘‘काए को? काए के बारे में सोच के दुखी हो रए आप?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘बड़े अंधरा से दौड़ रए कमाबे के लाने औ बच्चा हरों खों दौड़ा रए नंबरन के लाने। अरे, हमाए बब्बा कैत ते के उत्तई कमाओ जित्ते में अच्छे से गुजारा हो जाए। कोनऊं के आंगू हाथ ने फैलाने परे। पर इत्तो बी ने करो के कमातई भर रै जाओ औ ऊको चैन से खा बी ने सको।’’ भैयाजी बोले।
‘‘सई कैत ते आप के बब्बा जू। मोरो सोई जेई सोचबो आए। अरे, दो रोटी चाए सूकी होय, पर चैन से खाओ तो सरीर में लगत आए। नेतो मैंगो-मैंगो खा के बी अस्पताले डरे दिखात आएं।’’ मैंने भैयाजी से कई।
‘‘हऔ! मनो मैंगो जो खा रए ऊमें कोन सत आए? आजकाल बच्चा तो बच्चा, बड़े सोई पिज्जा औ बर्गर की होम डिलेवरी मंगा रए। आलस जे के को बनाए। एक फोन करो औ घरे के दोरे आ गओ पिज्जा, बर्गर। उते गुरुग्राम में हमाई फुआ के मोड़ा औ बहू कोनऊं कम्पनी में नौकरी कर रए। उनके घरे खाना तो कभऊं-कभऊं ई बनत आए। अभई पिछली मईना फुआ अपने मोड़ा के इते हो के आईं तो अंसुवां भर-भर के बता रई हतीं के उन्ने मोड़ा की दसा देखी तो बे उते ऊके लाने खाना बनाऊंन लगीं। मनो उनके हाथ की रोटी-सब्जी ने तो उनके मोड़ा खों पोसाई औ ने उनकी बहू खों। दोई ने साफ कै दई के तुमाए खाने में कोनऊं टेस्ट नोईं। बिचारी फुआ अपनो सो मों ले के रै गईं।’’ भैयाजी बतान लगे।
‘‘अब का करो जा सकत आए। उते ठैरी फास्ट लाईफ।’’ मैंने भैयाजी खों समझाओ चाओ।
‘‘लूघरा लगे ऐसी फास्ट लाईफ खों। अरे, कमा काए के लाने रए? इते अल्लम-गल्लम खा रए औ उते जिम जा के सेहत बनाबे में पइसा बहा रए। उत्तो टेम दोई मिल के घरे दे लेंवे सो जिनगी सुदर जाए।’’ भैयाजी बोले।
‘‘ऐसो आए भैयाजी के अपने सागर में सोई देख लेओ के बायरे को खाना घरे मंगाबे औ बायरे जा के खाबे को चलन बढ़ो आए के नईं?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘बढ़ो आए, हमने मानो! पर इते रोज-रोज को जा रओ? हप्ता में दो-चार दिनां तो चलत आए। मगर उते तो अत्तें हो रईं। फुआ खों तो जे बात की सोई फिकर हो रई के जबें बहू के मोड़ा-मोड़ी हुइएं तो का हुइए? उनकी बहू जजकी के लड़ुवा के बजाए चाउमिन खाहे का?’’ भैयाजी ने फुआ की चिंता बताई। बा सुन के मोए हंसी छूट परी।
‘‘बे तो कछू ज्यादई सोच रईं। अकेली उनकी बहू उते नई रै रई। मुतकी बहुएं उते रै के नौकरी कर रईं औ मताई बन रईं। औ सबरी भली-चंगी आएं। आजकाल की बहुएं अपनो खयाल रखबो खूब जानत आएं।’’ मैंने भैयाजी से हंस के कई। फेर मैंने भैयाजी खों जे सोई याद दिलाओ के ‘‘तनक आप सोचो के अब तो चंद्रमा पे औ अंतरिक्ष में बसबे की प्लानिंग चल रई, सो का उते रैबे वारी बहुएं जजकी के लड़ुआ खाहें?’’
‘‘बात तो तुमाई सई आए मनो, अब बूढ़े-पुराने लोगन खों चिंता तो होत आए। उने लगत आए के उनके बच्चा हरें सब कछू अच्छो खाएं औ अच्छे से रएं।’’ भैयाजी बोले।
‘‘जे सब समै-समै औ किस्मत की बात रैत आए। चात तो सबई आएं के सब कछू अच्छे से रए मनो फेर बी दसा बिगड़ जात आए। हऔ जे बात सई आए के अच्छे करबे वारे जल्दी सम्हर जात आएं औ गलत आदत वारे देर से सई पर ज्यादा पिरत आएं। आपने बा नल महराज की किसां सुनी हुइए।’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘नल महराज की कैसी किसां? हमने नई सुनी। का किसा आए?’’ भैयाजी पूछन लगे।
‘‘किसां जे आए के एक राजा नल हते। उनको बड़ो भारी राज हतो। मनो उनें एक खराब लत हती, जुआ खेलबे की। उनकी रानी दमयंती उनें टोंकत रैत तीं के जुआ ने खेलो करो। जे अच्छी बात नोंई। पर राजा खों तो लत रई। एक दफा राजा नल जुआ में अपनो सगरो राजपाट हार गए। उने अपनों राज, अपनो महल सबई कछू छोड़ने परो। बे अपनी रानी के संगे जंगल की गैल निकर परे। तभई उने ढूंढत भओ उनको एक मित्र आ गओ। बा उन दोई खों अपने महल में लिवा ले गओ। दोई को अच्छे से सत्कार करो। दोई खों अच्छो खाबे खों दओ औ नए हुन्ना-लत्ता दए। संझा गप्पें मारत गुजारी, फेर ब्यालू करी औ फेर राजा नल औ उनके मित्र बैठ गए जुआ खेलबे के लाने। रानी दमयंती ने उने समझाओ के इत्ते पे बी आपके लाने अकल ने आई? अब तो जुआ से हाथ जोड़ लेओ। पर लत तो लत आए। राजा नल ने दमयंती की एकऊं ने सुनीं। बाकी अपने मित्र से जे जरूर कई के हमाए पास दांव पे लगाबे के लाने कछू नइयां। जो ऊंसई खेलने होय तो हम खेल सकत आएं। उनको मित्र बोलो के कछू फिकर नईं, हम आपके लाने सोनो-चांदी दे रए। जो आप जीते तो बा सब आपको हो जाहे औ जो आप हारे तो बा सब हमाए पास वापस आ जाहे। सो, ई टाईप से दोई देर रात तक जुआ खेलत रए। राजा नल की ग्रहदसा ऊंसई सई नईं चल रई हती तो बे हारत चले गए। अखीर में उनको मित्र बोलो के अब जा के आप आराम करो। कल संकारे बातें करबी। जे कै के बा अपने कमरा में चलो गओ औ राजा नल अपने कमरा में आ गए।’’ मैं राजा नल की किसां भैयाजी खों सुनान लगी।
‘‘फेर का भओ?’’ भैयाजी ने पूछी।
‘‘फेर जे भओ के राजा नल अपने कमरा में आए तो देखी के रानी दमयंती गहरी नींद में सो रई हतीं। एक छोटो-सो दिया कमरा में जल रओ हतो। राजा नल धीमें से पलकां पे लेट गए। एक तो सबरो राज-पाट छिन गओ रओ औ ऊपे से जुआ में हार के चले आ रए हते, सो उनकी आंखन में नींद को नांव ने हतो। उनके पलकां के सामने वारी दीवार पे एक फोटू टंगो हतो। ऊ फोटू में एक हंसा बनो रओ। ऊ फोटू के ऊपर मोतियन की एक माला सजा के टंागी गई रई। राजा नल मन लगाबे खों बा हंसा की तरफी देखन लगे। अब बुरए दिनां की दसा देखो आप, के राजा ने देखी के बा फोटू को हंसा असली मोतियन की माला को खान लगो। देखत ई देखत ऊने पूरी माला निगल लई। अब राजा नल जे सोच के डरा गए के जब संकारे उनको मित्र उनके कमरा में मोतियन की माला ने पाहे तो बा तो जेई सोचहे के राजा नल ने चुरा लई आए। काए से के बे रात को जुआ में हारत चले गए रए। ऊको ई बात पे भरोसो थोड़ी हुइए के बा चि़त्र वारो हंसा माला खों निगल गओ। राजा नल खों लगो के जे तो बड़ी अपमान वारी बात हुइए। ईसे तो अच्छो आए के मों अंदियारे इते से निकर जाओ जाए। राजा नल रानी दमयंती खों जगाबे जा रए हते के उने लगो के अपनी बुरई लत को भोगना बे अकेले भोगें, बिचारी रानी खों काए परेसान करो जाए। सो बे रानी खों उतई सोऊत छोड़ के महल से चले गए। तभई से जे कैनात चल परी के जो बिपदा आत आए तो फोटू को हंसा बी मोतियन की माला निगल जात आए। पर जे बिपदा राजा नल की जुआ की लत के कारण आई रई। ने तो उनको अच्छो-खासो राजपाट रओ।’’ मैंने भैयाजी खों राजा नल की किसां सुना दई।
‘‘सई आए! बाकी रानी को का भओ?’’ भैयाजी ने पूछी।
‘‘संकारे रानी ने राजा नल खों उते ने पाओ तो ढूंढ-खोज कराई। पर राजा को पतो ने परो। राजा नल के मित्र ने रानी दमयंती खों अपने सिपाइयन के संगे उनके भैया के घरे भिजवा दओ। जां बे तब लौं रईं जब लौं राजा नल फेर के अपनो राज-पाट जीत के उने लेबे ने आएं। बाकी राजा नल खों जे जान के भारी अचरज भओ रओ के संकारे रानी ने बा माला हंसा के ऊपरे टंगी देखी रई। मने राजा नल खों अपने जुआ खेलबे के गलत काम के बदले भोगना भोगबे परो।’’ मैंने भैयाजी खों पूरी किसां बता दई।
‘‘जे तो सई आए। लोग चाए कित्तों बी भ्रष्टाचार कर लेबें कोनऊं ने कोनऊं तरीका से उनको गलत पइसा उनई खों रोवात आए। जे सई आए के कछू जने अबे बी बिदेस से पकर के अपने देस नई लाए गए आएं, पर मुतके ऐसे बी आएं के जो बंधे-बंधे फिर रए।’’ भैयाजी बोले। अब बे तनक चैन में दिखा रए हते। ने तो जब मैं उनके इते पौंची ती तो बे चिंता में मों लटकाए बैठे हते।         
बाकी बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लौं जुगाली करो जेई की। मनो सोचियो जरूर ई बारे में के आजकाल बी गलत को नतीजा गलत होत आए के नईं? 
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Wednesday, May 21, 2025

चर्चा प्लस | जलवायु परिवर्तन की तेज गति में जरूरी है लचीली कृषि पद्धति | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर

चर्चा प्लस
जलवायु परिवर्तन की तेज गति में जरूरी है लचीली कृषि पद्धति
      - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
    पिछले कुछ वर्षों से जलवायु परिवर्तन और लचीली कृषि पद्धति बहुत चर्चाएं हुई हैं। यह एक बहुत ही आवश्यक चर्चा है। लेकिन मुझे लगता है कि हमें जलवायु परिवर्तन की गति के बारे में गंभीरता से जानने की आवश्यकता है ताकि हम भविष्य की कृषि के लिए सही रणनीति बना सकें। पृथ्वी का तापमान बढ़ रहा है। जलस्तर घट रहा है। हम कभी नहीं चाहेंगे कि हमारा भी माया सभ्यता जैसा हश्र हो। ऐसा माना जाता है कि माया सभ्यता भयंकर सूखे के कारण समाप्त हो गई थी, जबकि उनकी सिंचाई प्रणाली उच्च गुणवत्ता वाली थी। माया सभ्यता को याद करने का कारण यह है कि हम इन दिनों पूरी दुनिया में पर्यावरण शरणार्थियों या जलवायु शरणार्थियों की बढ़ती संख्या देख रहे हैं। इसलिए दुनिया के कई देशों में लचीली कृषि पद्धति यानी रेजिलिएंट एग्रीकल्चर को अपनाया जा रहा है। 
         मैं कोई प्राणीशास्त्री नहीं हूँ, मैं कोई कृषिशास्त्री नहीं हूँ, मैं कोई मृदाशास्त्री नहीं हूँ। लेकिन मैं एक पृथ्वीवासी हूँ। पृथ्वी को बचाने की दिशा में सोचना करना मेरा भी कर्तव्य है। मूल रूप से मैं एक लेखिका हूं और पर्यावरण संरक्षण के पक्ष में आवाज़ उठाती रहती हूंँ और मैं आने वाली पीढ़ी के लिए एक सुंदर स्वस्थ समाज और एक सुरक्षित पृथ्वी चाहती हूँ। स्वस्थ समाज और सुरक्षित पृथ्वी दोनों ही संतुलित जलवायु पर निर्भर हैं।
मौसम में अनियमितता, समुद्र के जलस्तर में वृद्धि और जंगलों का विनाश आदि कुछ ऐसे कारण हैं जो जलवायु परिवर्तन के लिए जिम्मेदार हैं। यहाँ एक नजर डालते हैं कि बाढ़ और हमारी गर्म होती दुनिया के बीच क्या संबंध है। हाँ! केवल एक चीज और वह है जलवायु परिवर्तन। 

जलवायु परिवर्तन हमें तापमान और मौसम में अनियमितताओं के रूप में लगातार चेतावनी दे रहा है। दुर्भाग्य से हम उसे गंभीरता से नहीं ले रहे हैं। इस तथ्य को हमेशा याद रखने की आवश्यकता है कि पहले केवल युद्ध शरणार्थी थे लेकिन अब पर्यावरण शरणार्थी हैं। सूडान और सोमालिया जैसे अफ्रीकी देशों में प्राकृतिक आपदाओं के कारण गृह युद्धों की तुलना में अधिक लोग शरणार्थी जीवन जीने को मजबूर हुए हैं। उनके गाँवों में पानी के स्रोत सूख गए, पानी की अनुपलब्धता के कारण उनके मवेशी मर गए और उनकी खुद की जान खतरे में पड़ गई। जिसके कारण उन्हें अपना गाँव, घर छोड़कर दूसरे देशों में शरण लेने के लिए मजबूर होना पड़ा। लेकिन उनका यह विस्थापन अवैध है क्योंकि पर्यावरण शरणार्थियों को शरण देने का कानून अभी तक किसी भी देश में नहीं बना है। ऐसे शरणार्थी, वास्तविक शरणार्थी होते हुए भी न तो शरणार्थी कहलाते हैं और न ही उन्हें कोई मदद मिलती है। ऐसा अनुमान है कि पर्यावरण परिवर्तन के कारण 2050 तक अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और दक्षिण एशिया से लगभग 140 मिलियन लोग पर्यावरण शरणार्थी के रूप में अपनी मुख्य भूमि को छोड़कर अन्य भूमि पर चले जाएंगे। भारत में भी पर्यावरण शरणार्थियों की संख्या बढ़ रही है। ये शरणार्थी पानी की अनुपलब्धता के कारण अपने गांवों को छोड़कर बड़े शहरों में काम की तलाश में भटक रहे हैं और दिहाड़ी मजदूर के रूप में अपना जीवन यापन करने की कोशिश कर रहे हैं। इसका एक उदाहरण देखते हैं कि हर दिन किसानों द्वारा आत्महत्या करने की खबरें आती रहती हैं। सरकार किसानों को हर संभव मदद देती है। फिर ये आत्महत्या क्यों? अगर राजनीतिक चश्मा उतारकर देखा जाए तो कारण समझ में आ जाएगा। आखिर सरकार द्वारा दिए गए पैसे से न तो फसल उगाई जा सकती है और न ही उसे बचाया जा सकता है। फसल उगाने के लिए पानी एक बुनियादी आवश्यकता है। हमारी लापरवाही के कारण पानी के स्रोत खत्म होते जा रहे हैं। तो भविष्य के लिए हमारा कृषि प्रयास क्या है? यही मुख्य बात है। इसलिए हमें जलवायु परिवर्तन की गति के बारे में जानना होगा। ताकि हम भविष्य की कृषि के लिए सही रणनीति बना सकें। 

मैं एक इतिहासकार हूं। इसलिए, आदतन मैं हमेशा अपनी एक नजर अतीत पर और दूसरी नजर भविष्य पर रखती हूं। सैंकड़ों साल पहले हमारी धरती पर माया सभ्यता मौजूद थी लेकिन कुछ कारणों से यह सभ्यता खत्म हो गई। माया सभ्यता के अंत के पीछे क्या रहस्य है, वैज्ञानिक इसे जानने की आज भी कोशिश कर रहे हैं। हाल ही में इस संबंध में एक और शोध सामने आया है। ऐसा कहा जाता है कि माया सभ्यता का अंत 100 साल से भी ज्यादा समय तक लगातार पड़े सूखे के कारण हुआ था। इसके लिए शोधकर्ताओं ने मरीन लाइफ बेलीज के मशहूर ‘‘ब्लू होल’’ और उसके आसपास पाए जाने वाले लैगून से लिए गए खनिजों का विश्लेषण किया। उन्होंने पाया कि 800 से 900 ईस्वी के बीच भयंकर सूखा पड़ा था, जो माया सभ्यता के अंत का मुख्य कारण बना। ‘‘लाइव साइंस’’ की रिपोर्ट के मुताबिक, 6वीं सदी से 10वीं सदी तक भयंकर सूखा पड़ा था। अब जरा भारत के वर्तमान पर दृष्टिपात करें तो भारत जलवायु परिवर्तन की मार झेल रहा है। बारिश के स्वभाव में बदलाव के कारण हिमालयी राज्यों की कई नदियों ने अपना रास्ता बदल लिया है। वैज्ञानिक भी मान रहे हैं कि मौसम अजीब व्यवहार करने लगा है। पिछले कुछ दशकों में अरुणाचल प्रदेश और असम के कई गांव बह गए हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक जलवायु परिवर्तन के कारण कई नदियों ने अपना रास्ता बदल लिया है। पूर्वोत्तर भारत में काफी बारिश होती है। विशेषज्ञों के मुताबिक पिछले कुछ दशकों में बारिश का स्वभाव बदल गया है। अब भारी और लंबे समय तक बारिश हो रही है। इस वजह से नदियों में बाढ़ आ रही है। भूगर्भीय आंकड़ों के विश्लेषण से पता चला है कि कुछ नदियों ने 300 मीटर दूर तक अपना रास्ता बदल लिया है, जबकि अन्य जगहों पर वे 1.8 किलोमीटर दूर चली गई हैं। नई दिल्ली स्थित विज्ञान और पर्यावरण केंद्र के अनुसार सामान्य जलवायु परिस्थितियों में पूरे साल वर्षा अच्छी तरह से वितरित होती थी, किन्तु अब ऐसा नहीं हो रहा है।

अगर हम कृषि की दशा परं ध्यान देंगे तो हमें मिट्टी की चीखें सुनाई देंगी। हाँ! अगर मिट्टी बोल सकती तो अपने साथ हो रहे अन्याय का विरोध करती। पिछले कुछ दशकों में हमने उस मिट्टी के साथ बहुत बड़ा अन्याय किया है। जो मिट्टी हमें अनाज, फल, फूल, सब्जियाँ देती है, हमने उसे रासायनिक पदार्थों से दूषित कर दिया है, कभी रासायनिक खाद से, कभी रासायनिक और प्लास्टिक कचरे से तो कभी उसकी नमी को सुखाकर। अब स्थिति यह है कि हम पारंपरिक कृषि पद्धति से अपनी भविष्य नहीं बचा सकते हैं। वैज्ञानिक मानते हैं कि हमें समय रहते लचीली कृषि पद्धति को अपना लेना चाहिए जो कम से कम पानी में भी उत्पादन दे कर हमारा पेट भर सके। जलवायु परिवर्तन के प्रति सहनशील फसलों की 35 किस्मों में चने की सूखा झेलने वाली किस्म, मुरझान और बांझपन मोजेक प्रतिरोधी अरहर, सोयाबीन की जल्दी पकने वाली किस्म, चावल की रोग प्रतिरोधी किस्में और गेहूं, बाजरा, मक्का और चने की जैव-फोर्टिफाइड किस्में शामिल हैं। हमें कृषि विज्ञान पद्धति में और अधिक विकास की आवश्यकता है जो जलवायु परिवर्तन के प्रभाव से निपट सकें। उदाहरण के लिए, लचीली कृषि पद्धति को जलवायु परिवर्तन के विरुद्ध उत्तम उपाय माना जा रहा है। सरल शब्दों में का जाए तो उन फसलों की, उस पद्धति से खेती किया जाना जो जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का सामना कर सकें। जी हां, रेजिलिएंट एग्रीकल्चर या जलवायु-लचीली कृषि का अर्थ है ऐसी कृषि पद्धतियां जो जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को झेलने और उनके अनुकूल होने में सक्षम हों. इसमें बदलते मौसम के अनुकूल फसलें उगाना, पानी का संचयन, और मृदा स्वास्थ्य को बनाए की क्षमता हो।

जलवायु-अनुकूल कृषि के कुछ बुनियादी सिद्धांत हैं जिनसे इसकी विशेषताओं को समझा जा सकता है-
1. विविधीकरण- विभिन्न प्रकार की फसलें उगाना और विविध कृषि पद्धतियों का उपयोग करना एक ही फसल पर निर्भरता को कम करता है और पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं को बढ़ावा देता है।
2. मृदा संरक्षण- बिना जुताई या कम जुताई वाली खेती, कवर क्रॉपिंग और फसल चक्र जैसी प्रथाएँ मिट्टी के स्वास्थ्य को बेहतर बनाती हैं और कटाव को कम करती हैं।
3. जल संचयन- सिंचाई के लिए वर्षा जल को इकट्ठा करना और संग्रहीत करना भूजल पर निर्भरता को कम करता है और जल सुरक्षा को बढ़ाता है।
4. कृषि वानिकी- पेड़ों को खेती की प्रणालियों में एकीकृत करने से छाया मिलती है, मिट्टी के स्वास्थ्य में सुधार होता है और जैव विविधता को बढ़ावा मिलता है।
5. जलवायु मित्र फसलें और पशु किस्में- फसल और पशु किस्मों का उपयोग करना जो बदलती मौसम स्थितियों के प्रति सहनशील हैं, लचीलापन बढ़ाता है।
जलवायु-अनुकूल कृषि के कई लाभ ळैं जिनमें से कुछ प्रमुख लाभ हैं-
1. बेहतर फसल पैदावार- जलवायु अनुकूल कृषि किसानों को बदलती मौसम स्थितियों के अनुकूल ढलने में मदद करती है, जिससे फसल की पैदावार में सुधार होता है और नुकसान कम होता है।
2. बढ़ी हुई खाद्य सुरक्षा- स्थायी कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देकर, जलवायु-अनुकूल कृषि खाद्य उपलब्धता और पहुँच सुनिश्चित करती है।
3. बढ़ी हुई आजीविका- जलवायु अनुकूल कृषि किसानों को वैकल्पिक आय स्रोत प्रदान करती है, जिससे उनकी आजीविका में सुधार होता है।
4. पर्यावरण संरक्षण- जलवायु अनुकूल कृषि पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं को बढ़ावा देती है, प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण करती है और जलवायु परिवर्तन को कम करती है।

यह ज़रूर है कि छोटे किसानों को जलवायु-अनुकूल प्रौद्योगिकियों और पद्धतियों के अनुकूल बनना होगा, सरकारों को जलवायु-अनुकूल कृषि को बढ़ावा देने वाली नीतियाँ बनानी होंगी तथा इसके लिए को जलवायु-अनुकूल पद्धतियों को अपनाने के लिए प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण की सरकार को बडत्रे पैमाने पर व्यवस्था करनी होगी। लेकिन ये चुनौतियां उतनी बड़ी नहीं हैं जितनी की जलवायु परिवर्तन की चुनौती। अगर हम जलवायु परिवर्तन की गति को धीमा नहीं कर सकते, तो हमें बर्फ और आग, बाढ़ और सूखे में भी खेती करना सीखना होगा। क्या हम ऐसा कर पाएंगे? इस बारे में सोचते हुए कृषि की लचीली पद्धति को अपनाना होगा। यह अच्छा है कि ज्वार और बाजरे को अपने मुख्य खाद्य में अपना कर और इसकी खेती को बढ़ावा देकर हम लचीली कृषि पद्धति की ओर कदम बढ़ा चुके हैं। 
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Tuesday, May 20, 2025

पुस्तक समीक्षा | महिलाओं और बेटियों के अधिकारों की बात करती द्विभाषिक पुस्तक | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

आज 20.05.2025 को 'आचरण' में प्रकाशित - पुस्तक समीक्षा
     महिलाओं और बेटियों के अधिकारों की बात करती द्विभाषिक पुस्तक
     समीक्षक - डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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पुस्तक  - महिला सशक्तिकरण : बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ
लेखिका   - डाॅ. वन्दना गुप्ता
प्रकाशक  - स्वयं लेखिका, शिवराम शिशु चिकित्सालय, मोतीनगर वार्ड, सागर-470002
मूल्य     - 225/-
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   डॉ. वंदना गुप्ता सागर नगर की एक संवेदनशील, कर्मठ एवं उत्साही समाजसेवी तथा साहित्यकार हैं। वे स्त्रीरोग विशेषज्ञ भी हैं। वे स्त्रियों की पीड़ा को गहराई से समझती हैं। विशेष रूप से समाज में बेटी की स्थिति और बेटे की ललक के चलते महिलाओं को जिस प्रकार उपेक्षा और प्रताड़ना का शिकार होना पड़ता है, बतौर चिकित्सक उन्होंने इसे निकट से देखा और महसूस किया है। डॉ. वन्दना गुप्ता इस स्थिति से भी भली भांति अवगत है कि समाज में स्त्रियां अपने स्वास्थ्य के प्रति सबसे अधिक लापरवाह रहती है। स्त्रियां परिवार को प्राथमिकता देती हैं तथा स्वयं के स्वास्थ्य एवं खान-पान को हमेशा अनदेखा कर देती हैं। यही कारण है कि खून की कमी यानी एनीमिया जैसी बीमारियां स्त्रियों में सबसे अधिक पाई जाती है जिसका असर उनके मातृत्व और संतान पर भी पड़ता है। यह सारी स्थितियां लेखिका को हमेशा विचलित करती रहती हैं इसीलिए डॉ. गुप्ता का लेखन समाजिक उत्थान के प्रति समर्पित रहता है। वे समाज को सभी प्रकार की बुराइयों से दूर और अच्छाइयों से युक्त देखना चाहती हैं। उनकी यही भावना उनकी रचनाओं में प्रतिबिंबित होती है। वे समाज से अपशब्दों शब्दों के विलोपन के लिए भी कृत संकल्प हैं। इस संबंध में उन्होंने देशव्यापी अभियान भी चला रखा है। वे बेटियों को सशक्त महिला के रूप में पुष्पित, पल्लवित होते देखना चाहती हैं। डॉक्टर वंदना गुप्ता की अब तक 18 कृतियां प्रकाशित हो चुकी हैं उनके ताज़ा कृति  "महिला सशक्तिकरण : बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ" समाज में बेटियों को उनके  बुनियादी आधिकार दिलाने की दिशा में एक सराहनीय कदम है।
     सर्व विदित है कि समाज में आदिकाल में महिलाओं की बहुत अधिक प्रतिष्ठा थी किंतु पहले विदेशी आक्रमण कार्यों की कुदृष्टि और फिर पाश्चात्य अंधानुकरण ने धीरे-धीरे समाज में वह अवनति ला दी कि स्त्रियां दोयम दर्ज़े की प्राणी समझी जाने लगीं। बेटियों को शिक्षा से दूर रखा जाने लगा। यदि बेटे और बेटी में से किसी एक को शिक्षित करने का प्रश्न हो तो सबसे पहले बेटी से ही उसके शिक्षा का अधिकार छिना जाता है और यह कृत्य स्वयं उसके माता-पिता करते हैं। कारण यही कि पीढ़ियों से यह धारणा चली आ रही है कि बेटियों को घर-गृहस्थी का काम आना चाहिए, पढ़ाई लिखाई उनके लिए जरूरी नहीं है। देखा जाए तो यह सबसे बड़ा दुर्भाग्य है और इस सोच ने भारतीय समाज में स्त्रियों को उनके अधिकारों से धीरे-धीरे वंचित कर दिया। लेकिन अब समाज में यह जागरूकता लाने की मुहिम विगत कई वर्षों से चलाई जा रही है कि बेटियों की भ्रूण हत्या न होने पाए, उन्हें इस दुनिया में आंखें खोलने दिया जाए तथा उन्हें शिक्षित होने का पूरा अवसर मिले। इस विषय में गांधी जी ने एक बहुत ही सटीक बात कही थी की "यदि एक पुरुष शिक्षित होता है तो इसका अर्थ है कि एक व्यक्ति शिक्षित होता है। वहीं जब एक स्त्री शिक्षित होती है तो उसका अर्थ होता है कि पूरा एक परिवार शिक्षित होता है।"
     निःसंदेह, मां ही बच्चे का लालन- पालन करती है और बुनियादी संस्कार और शिक्षा प्रदान करती है। व्यक्ति अपनी बाल्यावस्था में अपनी मां के ही सबसे निकट रहता है और जीवन के प्रत्येक गुण अपनी मां से ही ग्रहण करता है। यदि मां शिक्षित होगी तो अपने बच्चों को भी अच्छी शिक्षा दे सकेगी। इसके साथ ही आवश्यकता पड़ने पर धन कमा कर अपने परिवार को आर्थिक सहयोग भी कर सकेगी। इसी उत्कृष्ट विचारधारा को केंद्र में रखकर डॉ. वंदना गुप्ता ने यह पुस्तक लिखी है।
       पुस्तक का संपूर्ण कलेवर तीन भागों में विभक्त है प्रथम भाग में स्वामी विवेकानंद के विचार वैचारिक स्वच्छता अभियान के बारे में जानकारी समाज की प्रकृति में नारी का योगदान जैसे आलेखों के साथ ही मां की शुभकामनाएं शामिल हैं। पुस्तक के संबंध में प्रो. नीलिमा गुप्ता कुलपति डॉ. हरि सिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय डॉ. आर.एच. लता भोपाल तथा डॉ. शरद सिंह वरिष्ठ साहित्यकार के पुस्तक के संबंध में उद्गार हैं। पुस्तक का प्रकृति बृजेश त्रिपाठी डीपीओ महिला बाल विकास सागर ने लिखा है।
      पुस्तक में हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं की रचनाएं हैं। पुस्तक के प्रथम भाग में महिला सशक्तिकरण से संबंधित जो लेख और कविताएं समाहित की गई हैं उनके शीर्षक हैं महिला सशक्तिकरण ( वैदिक मध्यकाल एवं आधुनिक काल), आज महिला सशक्तिकरण की आवश्यकता क्यों?, महिला सशक्तिकरण के महत्वपूर्ण बिंदु, महिला सशक्तिकरण कैसे संभव?, विचार करें हमें अपने आप को कहां-कहां सुधारना है, सख़्त कानून के बाद भी महिलाओं के प्रति बढ़ते अपराध का कारण, भारतीय नारी गौरव गरिमा एवं महिमा। इस प्रकार पुस्तक के प्रथम भाग में स्त्री सशक्तिकरण के संपूर्ण स्वरूप की चर्चा की गई है जिसे पढ़कर कोई भी पाठक भारत में महिला सशक्तिकरण की दशा और दिशा को भली भांति समझ सकता है।
      पुस्तक के दूसरे भाग को “बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ” पर केंद्रित किया गया है। इस भाग में लेखों के साथ चार केस स्टडीज़ भी हैं। लेखों और कविताओं के शीर्षक हैं - मां मुझको जग में आने दो, चेतावनी, बेटी बचाओ की आवश्यकता क्यों पड़ी?, बेटियां कैसे बचेंगी?, दरिंदगी पर लगाम कब और कैसे?, चलो आज संकल्प उठाएं - बालिका शिक्षा देना, बेटी पढ़ाओ।
        “मां मुझको जग में आने दो” कविता के माध्यम से डॉक्टर वंदना गुप्ता ने उस बालिका भ्रूण की पीड़ा को व्यक्त किया है जिसे गर्भ में ही मार दिया जाता था और आज भी इस दिशा में चोरी से प्रयास किया जाता है। एक बालिका भ्रूण की मार्मिक पुकार इस कविता में मौजूद है। इस कविता का अंग्रेजी संस्करण भी पुस्तक में दिया गया है जिसका शीर्षक है- “द वॉयस ऑफ ईच डॉटर हू लेफ्ट टू सून टेल्स अस समथिंग। मदर, लेट मी कम इन द वर्ल्ड”।
         “चेतावनी” भी कविता है जिसमें कन्या भ्रूण हत्या करने के दुष्परिणाम को संक्षिप्त शब्दों में बड़े सुंदर ढंग से व्यक्त किया गया है। यह कविता भी हिंदी और अंग्रेजी दोनों में दी गई है। इस कविता की पंक्तियां देखिए-
हत्या कन्या भ्रूण करोगे,
नारी समाज मिट जायेगा।
बेटे के लिए वधू कहाँ से,
यह समाज फिर पायेगा।।
वधू नहीं मिल पाने से,
वहशीपन बढ़ जायेगा।
दरिंदगी की घटनाओं से
यह समाज दुख पायेगा ।।
      यह यथार्थ संवाद प्रत्येक पाठक को सोचने को विवश करेगा। जब तक सरकार की ओर से लिंग जांच पर प्रतिबंध नहीं लगाया गया था तब तक बालक और बालिकाओं के अनुपात में चिंताजनक अंतर आता जा रहा था। लेखिका ने बेटी बचाओ की आवश्यकता क्यों पड़ी इस लेख में उद्धृत किया है कि “2011 की जनगणना के अनुसार भारत में बाल लिंगानुपात 0.6 आयु वर्ग में प्रति 1000 लड़कों पर केवल 919 लड़कियां थीं।”
     यद्यपि सरकार द्वारा लिंग जांच को अपराध घोषित किए जाने के बाद स्थिति में सुधार आया है। लेखिका ने अपने इस संक्षिप्त लेख में बेटी बचाओ की आवश्यकता के अन्य कारण भी गिनाएं हैं जैसे शिक्षा का अभाव, बाल विवाह आदि।
       इस पुस्तक में एक महत्वपूर्ण लेख है “दरिंदगी पर लगाम कब और कैसे?” वास्तुतः बालिका का जन्म लेना और उसका पालन पोषण एक स्वस्थ सुरक्षित माहौल में होना दोनों आवश्यक हैं। किंतु जैसा कि हम सभी आए दिन पढ़ने सुनते रहते हैं कि महिलाओं के विरुद्ध हिंसा बढ़ती जा रही है। यह हिंसा घर के भीतर और घर के बाहर दोनों जगह होती है। दुर्भाग्यपूर्ण बात है कि गालियों और मारपीट का सामना करना लगभग हर मध्यम वर्गीय एवं निम्न मध्यम वर्गीय स्त्रियों के जीवन का अनिवार्य हिस्सा होता है। ऐसी महिलाएं समाज और पारिवारिक दबाव के कारण अपनी प्रताड़ना की पीड़ा किसी से कह नहीं पाती है और चुपचाप सब कुछ सहती रहती हैं। उच्च वर्ग भी इससे अछूता नहीं है। वही प्रताड़ना का दूसरा और भयानक रूप है यौन हिंसा। वर्तमान में यौन हिंसा की दर बढ़ी है जो की चिंताजनक है। लेखिका ने स्त्रियों के विरुद्ध प्रताड़ना और हिंसा के कारण को खंगालते हुए इस बात को सामने रखा है कि शराब सोशल मीडिया तथा पारिवारिक दबाव सबसे अधिक जिम्मेदार हैं। लेखिका ने यह भी रेखांकित किया है कि इस दिशा में सरकार को जिम्मेदारी भली भांति निभानी चाहिए और स्त्रियों को सुरक्षित वातावरण उपलब्ध कराना चाहिए। लेखिका ने तीखा किंतु सटीक प्रश्न उठाया है कि “बलात्कारी का अपराध सिद्ध हो जाने के बाद भी लगातार सजा से बचाने वाली मानसिकता, न्याय में लगातार देरी, बलात्कारी की मनोदशा को बिना समझे कुछ समय की सजा के बाद जमानत पर छोड़ देना, वा ऐसे बलात्कारी का समाज में पुनः घटनाओं को अंजाम देना राष्ट्र के सभी कानूनविदों व न्यायविदों को मालूम है, सभी के घर परिवार हैं, फिर भी न्यायिक दंड प्रक्रिया क्यों आधी आबादी के इस दर्द को महसूस नहीं करती?”
      लेखिका ने इस संदर्भ में मोहिंदर सिंह केस, निर्भया केस आदि का संदर्भ दिया है जो की आज भी स्मरण करने पर मानस को विचलित कर देता है।
        पुस्तक के तीसरे भाग में कविताएं हैं जो नई की दशा और उसके जीवन पर केंद्रित हैं। बानगी के तौर पर “बेटी जन्म” शीर्षक की यह छोटी सी कविता देखिए-
कन्या रूप तुम्हारे घर में,
मातृशक्ति है आई।
जिसके आने के स्वागत में,
चहुँ ओर खुशी है छाई ।।
प्रेम सुधा रस छलके अविरल,
अनुपम छटा है छाई।
किलकारी आंगन में गूंजी,
तुमको आज बधाई ।।
       मुझे पूर्ण विश्वास है कि यह पुस्तक समाज को बेटियों के प्रति जागरूक बनाने तथा स्त्री सशक्तिकरण के महत्व को समझने में अपना भरपूर योगदान देगी।             
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