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चर्चा प्लस | विचारणीय है स्त्री के विरुद्ध नृशंसता पर समाज का मौन | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर
Tuesday, May 27, 2025
पुस्तक समीक्षा | कुण्डलिया छंद को पुनर्स्थापना दिला सकती है ‘‘ढाई आखर की कथा’’ | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण
आज 27.05.2025 को 'आचरण' में प्रकाशित - पुस्तक समीक्षा
पुस्तक समीक्षा
कुण्डलिया छंद को पुनर्स्थापना दिला सकती है ‘‘ढाई आखर की कथा’’
- समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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काव्य संग्रह - ढाई आखर की कथा (कुंडलिया-संग्रह)
कवि - डाॅ. श्याम मनोहर सीरोठिया
प्रकाशक - श्वेतवर्ण प्रकाशन, 212 ए, एक्सप्रेस व्यू अपार्टमेंट सुपर एमआईजी, सेक्टर 93, नोएडा-201304
मूल्य - 349/-
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हिन्दी काव्य जगत को छंदबद्धता ने जितना समृद्ध किया है उतना काव्य की और किसी विधा ने नहीं किया। यह सही है कि काव्य की अनेक विधाएं समान्तर चलन में रही हैं और आज भी हैं लेकिन अपने गेयता के गुण एवं स्मरण रखने में सहजता के कारण छंदबद्ध काव्य अधिक लोकप्रिय रहा है। गीत और नवगीत में भी छांदासिकता रही और यदि प्रवाह को ध्यान में रख कर छंदमुक्त काव्य लिखा गया तो उसमें भी कुछ प्रतिशत छांदासिकता का अनुभव किया जा सकता हैं। कुंडलिया छंद का स्वर्णकाल भक्तिकाल को माना जाता है जब 16-17वीं शताब्दी में कुंडलिया छंद का सर्वाधिक सृजन हुआ। तुलसीदास ने ‘‘रामचरितमानस’’ में कुंडलिया छंद का प्रचुरता से प्रयोग किया, मीराबाई ने भी भक्ति और प्रेम की सुंदर कुंडलिया लिखीं, रहीम ने भक्ति, नीति, प्रेम और श्रृंगार विषयों में कुंडलिया लिखी हैं। कबीर, रैदास, सूरदास आदि ने भी अपनी अभिव्यक्ति के लिए कुंडलिया छंद को अपनाया। किन्तु आधुनिक काल में काव्य के साथ विधागत श्रम न करने वालों ने छंदों को हाशिए में धकेल कर नई कविता की उस धारा को पोषित करना शुरू कर दिया जिसे आलोचकों ने ‘‘अकविता’’ एवं ‘‘गद्य कविता’’ जैसे नाम दिए। यह प्रसन्नता की बात है कि हिन्दी काव्य जगत में एक बार फिर छंदों के प्रति रुझान जागा है। दिलचस्प बात यह भी है कि जो छंदविधा के वर्तमान पुरोधा हैं उन्होंने सोशल मीडिया का एक पाठशाला की तरह उपयोग किया और छंद से घबराने वाले अथवा छंद विधान से अपरिचित कवियों को भी छंद में पारंगत करने का बीड़ा उठा लिया। डाॅ. श्याम मनोहर सीरोठिया उन कवियों में से एक हैं जो छंद विधा के पुरोधा भी हैं और जिन्होंने सोशल मीडिया पर अपनी छांदासिकता से एक बड़े वर्ग को प्रभावित भी किया है। दोहा, सोरठा, चैपाई, रोला, कुंडलिया आदि छंद के वे सिद्धहस्त हस्ताक्षर हैं। डाॅ. श्याम मनोहर सीरोठिया का सद्यः प्रकाशित कुंडलिया संग्रह है-‘‘ढाई आखर की कथा’’।
‘‘ढाई आखर की कथा’’ कुंडली संग्रह के ब्लर्ब में राहुल शिवाय ने लिखा है कि ‘‘कुण्डलिया छंद हिन्दी साहित्य के लिए कोई नया छंद नहीं है। दोहा और रोला छंद से बने इस छंद का नाम कुण्डलिया, कुण्डली मुद्रा में बैठे सर्प से लिया गया है, जिसका पूँछ और मुख एक-दूसरे के सभीप या जुड़े दिखायी देते हैं। इसी प्रकार दोहे के चतुर्थ चरण को रोले के प्रथम चरण में प्रयुक्त कर हम इस छंद में कुण्डलीनुमा आकृति बनाते हैं और दोहे में कहे गये वाक्य को रोले में व्याख्यायित करते हैं। आरम्भिक काल से लेकर कुण्डलिया छंद की भाषा और विषयों में निरंतर प्रयोग होते रहे हैं। नीति, अध्यात्म और जीवनानुभवों, हास्य, व्यंग्य से होता हुआ आज यह आमजन की पीड़ा तक पहुँच गया है। वैसे भी कविता की प्रथम अनिवार्यता उसकी समसामयिकता ही होती है और डॉ. सीरोठिया इस बात को गंभीरता से समझने और अभिव्यक्त करने वाले रचनाकार हैं।’’
राहुल शिवाय का कथन सही है कि डॉ. सीरोठिया समसामयिकता के महत्व को समझते हैं। उनके कुंडली संग्रह का नाम भले ही ‘‘ढाई आखर की कथा’’ है, जिससे ध्वनित होता है कि इस संग्रह में मात्र प्रेमासिक्त कुंडलिया होंगी, किन्तु डाॅ. सीरोठिया प्रेम को जिस व्यापक अर्थ में देखते हैं, उसी व्यापकता के दिग्दर्शन इस संग्रह की कुंडलियों में किए जा सकते हैं। इस संग्रह में संग्रहीत कुंडलियों में श्रृंगार जनित प्रेम है तो, प्रकृति के तत्वों से प्रेम और पारस्परिक भाईचारा युक्त प्रेम भी है। डाॅ. सीरोठिया ने कुंडलिया को छंद माध्यम के रूप में अपनाते हुए प्रेम की विराटता एवं व्यापकता की बात की है। शिल्प और कथ्य की दृष्टि से उनकी कुंडलिया इतनी सक्षम हैं कि वे हाशिए पर खड़ा कर दिए गए कुंडलिया छंद को पुनः मुख्य धारा से जोड़ सकती हैं। इस संबंध में संग्रह की भूमिका में फिरोजाबाद के साहित्य भूषण डॉ. रामसनेही लाल शर्मा ‘‘यायावर’’ ने लिखा है कि ‘‘कविवर डॉ. श्याम मनोहर सीरोठिया यद्यपि व्यवसाय से चिकित्सक हैं, परंतु उन्हें काव्य की प्रतिभा ईश्वरीय अनुकंपा के रूप में मिली है। वे बहुमुखी प्रतिभा संपन्न कवि हैं। उनके गीतों में ऐसा माधुर्य और लालित्य होता है कि वे अत्यंत हृदयग्राही हो जाते हैं। इसी तरह उनके दोहे भी संक्षेप में बड़ी और गहरी बात कहने में सक्षम होते हैं। इस बार वे अपनी प्रतिभा का उत्कर्ष कुंडलियों के रूप में लेकर उपस्थित हुए हैं।’’
‘‘चमकदार शुद्ध रत्नों जैसी बहुमूल्य कुंडलियों का संग्रह’’ शीर्षक से जबलपुर के वरिष्ठ गीतकार एवं साहित्य भूषण आचार्य भगवत दुबे ने लिखा है कि ‘‘मेरा विश्वास है कि डॉ. श्याम मनोहर सीरोठिया का कुंडलिया संग्रह ढाई आखर की कथा हिंदी साहित्य जगत में स्नेह के साथ पढ़ा जाएगा एवं सुधी पाठकों में आदर के साथ स्वीकार किया जाएगा। कालांतर में यह कुंडलिया संग्रह श्रेष्ठ संग्रहों के रूप में चर्चित होगा एवं डॉ. सीरोठिया गीतों की तरह कुंडलिया सृजन के क्षेत्र में अपने यश का परचम फहराने में सफल होंगे।’’
डाॅ. सीरोठिया ने अपनी कुंडलिया सर्जना के संबंध में अपने प्राक्कथन में कुछ अनुभव एवं प्रेरणास्पद घटनाओं का उल्लेख किया है। उनमें से एक प्रसंग है- ‘‘कुछ समय पूर्व देश के प्रतिष्ठित कुंडलियाकार आद त्रिलोक सिंह ठकुरेला जी ने कुंडलियां लिखने का आग्रह किया कुछ कुंडलियां लिखीं भी लेकिन कोई उल्लेखनीय उपलब्धि इस क्षेत्र में नहीं हो सकी। सन 2023 में एक एक्सीडेंट के बाद मेरा बड़ा आपरेशन हुआ एवं इसी बीच धर्मपत्नी सरला जी को ब्रेन स्ट्रोक हो गया गहन अवसाद के इस दौर में कलम ने संबल दिया और मैंने प्रत्येक दिन सृजन को समर्पित कर दिया। इस बीच प्रथम सोरठा संग्रह चिंतन के आयाम लिखा गया एवं उसके बाद ही कुंडलिया संग्रह ‘ढाई आखर की कथा’ लिखा गया।’’
डाॅ. सीरोठिया के इस संग्रह की कुंडलियों के सरोकार व्यापक हैं। उन्होंने ‘‘सामाजिक जीवन की विसंगतियों के साथ-साथ व्यक्तिगत जीवन की कही-अनकही कथाएं, रिश्तों की इंद्रधनुषी छटाओं की सुकोमलता के साथ उनका खुरदरापन, अपनों के रंग बदलते चेहरों की भाव भंगिमाएं, प्रेम में डूबे हृदय की मिठास और स्निग्धता, राजनीति के मुखौटों की सच्चाई, जीव-जगत की उपादेयता, पर्यावरण की चिंता एवं चिंतन, मानवीय मूल्यों की संवेदनाओं के साथ व्यक्ति चेतना को कुंडलियों के माध्यम से ढाई आखर की कथा में’’ पिरोया है। इसीलिए इस संग्रह की गुणवत्ता उवं मूल्यवत्ता दोनों श्रेष्ठ हैं। जैसे वे संग्रह की प्रथम कुंडलिया में ही कहते हैंकि -
अपने चिंतन से करें, सारे निर्णय आप।
असफल भी होते कभी, मत समझो अभिशाप।
मत समझो अभिशाप, सफलता निश्चित आए।
हर पल का उत्साह, नया विश्वास जगाए।
कहे श्याम कविराय, कोशिशों से हैं सपने।
जीवन में दें साथ, सदा शुभ चिंतन अपने।।
कवि इस बात से व्यथित है कि आधुनिकता के जाल में जकड़ कर लोग पारस्परिक सौहाद्र्य, पारिवारिकता एवं सत्कार की भावना को भूलते जा रहे हैं-
रिश्तेदारी के सभी, बदल गए व्यवहार।
पहले जैसे अब नहीं, होते हैं सत्कार।
होते हैं सत्कार, लोग बनते अनजाने।
परंपरा को भूल, काम करते मनमाने।
कहे श्याम कविराय, हुए रिश्ते अब भारी।
खुशियों से है दूर, आजकल रिश्तेदारी।।
किन्तु ऐसा भी नहीं है कि कवि नूतनता का विरोधी है। कवि उन विचारों का पक्षधर है जो जड़ता को तोड़ कर नई तकनीक से नया जीवन गढ़ कर जीवन में नई ऊर्जा भर सकता है-
तोड़ो जड़ता सोच की, लाओ नए विचार।
चलो समय के साथ में, कहे लोक व्यवहार।
कहे लोक व्यवहार, नई तकनीकी आई।
दुनिया की आवाज, आज दे रही सुनाई।
कहे श्याम कविराय, नए से नाता जोड़ो।
जो बनता अवरोध, उसे हिम्मत से तोड़ो।।
डाॅ. सीरोठिया ने धन कमाने के लोभ में देश से पलायन करने वालों पर भी दृष्टिपात किया है तथा उन्हें समझाने का प्रयास किया है-
रोजी-रोटी के लिए, भागें लोग विदेश।
लेकिन जाकर भूलते, वे अपना परवेश।
वे अपना परिवेश, संपदा बहुत कमाते।
फिर भी इसके बाद, हृदय से दुखी बताते।
कहे श्याम कविराय, नौकरी कर लो छोटी।
बना रहेगा चैन, यहाँ है रोजी-रोटी।।
कवि ने जीवन के शाश्वत दर्शन को भी अपनी कुंडलिया के माध्यम से सामने रखा है और स्मरण कराया है कि शोक की घड़ी में धैर्य रखना ही एक मात्र विकल्प है-
रोने-धोने से नहीं, वापस आते लोग।
नहीं किसी के हाथ में, लिखती नियति कुयोग।
लिखती नियति कुयोग, साथ असमय में छूटे।
काल चले चुपचाप, प्राण पल भर में लूटे।
कहे श्याम कविराय, कौन रोके होने से।
जाने वाले लोग, नहीं आते रोने से।।
संग्रह में कुल 260 कुंडलिया हैं। ये सभी परस्पर भिन्न विषयों एवं समसामयिक प्रतिबद्धता लिए हुए हैं। इस प्रकार डाॅ श्याम मनोहर सीरोठिया ने अपन कुंडलियों में वर्तमान की स्थिति, परिस्थिति एवं संभावनाओं को रच कर कुंडलिया छंद को हर दृष्टि से प्रासंगिक बना दिया है। डाॅ. सीरोठिया का कुंडलिया संग्रह ‘‘ढाई आखर की कथा’’ प्रेम की व्यापकता, कथ्य की समकालीनता एवं कुंडलिया छंद शिल्प की पुनर्स्थापना की दृष्टि से महत्वपूर्ण है एवं पठनीय है।
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Tuesday, May 20, 2025
पुस्तक समीक्षा | महिलाओं और बेटियों के अधिकारों की बात करती द्विभाषिक पुस्तक | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण
आज 20.05.2025 को 'आचरण' में प्रकाशित - पुस्तक समीक्षा
महिलाओं और बेटियों के अधिकारों की बात करती द्विभाषिक पुस्तक
समीक्षक - डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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पुस्तक - महिला सशक्तिकरण : बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ
लेखिका - डाॅ. वन्दना गुप्ता
प्रकाशक - स्वयं लेखिका, शिवराम शिशु चिकित्सालय, मोतीनगर वार्ड, सागर-470002
मूल्य - 225/-
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डॉ. वंदना गुप्ता सागर नगर की एक संवेदनशील, कर्मठ एवं उत्साही समाजसेवी तथा साहित्यकार हैं। वे स्त्रीरोग विशेषज्ञ भी हैं। वे स्त्रियों की पीड़ा को गहराई से समझती हैं। विशेष रूप से समाज में बेटी की स्थिति और बेटे की ललक के चलते महिलाओं को जिस प्रकार उपेक्षा और प्रताड़ना का शिकार होना पड़ता है, बतौर चिकित्सक उन्होंने इसे निकट से देखा और महसूस किया है। डॉ. वन्दना गुप्ता इस स्थिति से भी भली भांति अवगत है कि समाज में स्त्रियां अपने स्वास्थ्य के प्रति सबसे अधिक लापरवाह रहती है। स्त्रियां परिवार को प्राथमिकता देती हैं तथा स्वयं के स्वास्थ्य एवं खान-पान को हमेशा अनदेखा कर देती हैं। यही कारण है कि खून की कमी यानी एनीमिया जैसी बीमारियां स्त्रियों में सबसे अधिक पाई जाती है जिसका असर उनके मातृत्व और संतान पर भी पड़ता है। यह सारी स्थितियां लेखिका को हमेशा विचलित करती रहती हैं इसीलिए डॉ. गुप्ता का लेखन समाजिक उत्थान के प्रति समर्पित रहता है। वे समाज को सभी प्रकार की बुराइयों से दूर और अच्छाइयों से युक्त देखना चाहती हैं। उनकी यही भावना उनकी रचनाओं में प्रतिबिंबित होती है। वे समाज से अपशब्दों शब्दों के विलोपन के लिए भी कृत संकल्प हैं। इस संबंध में उन्होंने देशव्यापी अभियान भी चला रखा है। वे बेटियों को सशक्त महिला के रूप में पुष्पित, पल्लवित होते देखना चाहती हैं। डॉक्टर वंदना गुप्ता की अब तक 18 कृतियां प्रकाशित हो चुकी हैं उनके ताज़ा कृति "महिला सशक्तिकरण : बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ" समाज में बेटियों को उनके बुनियादी आधिकार दिलाने की दिशा में एक सराहनीय कदम है।
सर्व विदित है कि समाज में आदिकाल में महिलाओं की बहुत अधिक प्रतिष्ठा थी किंतु पहले विदेशी आक्रमण कार्यों की कुदृष्टि और फिर पाश्चात्य अंधानुकरण ने धीरे-धीरे समाज में वह अवनति ला दी कि स्त्रियां दोयम दर्ज़े की प्राणी समझी जाने लगीं। बेटियों को शिक्षा से दूर रखा जाने लगा। यदि बेटे और बेटी में से किसी एक को शिक्षित करने का प्रश्न हो तो सबसे पहले बेटी से ही उसके शिक्षा का अधिकार छिना जाता है और यह कृत्य स्वयं उसके माता-पिता करते हैं। कारण यही कि पीढ़ियों से यह धारणा चली आ रही है कि बेटियों को घर-गृहस्थी का काम आना चाहिए, पढ़ाई लिखाई उनके लिए जरूरी नहीं है। देखा जाए तो यह सबसे बड़ा दुर्भाग्य है और इस सोच ने भारतीय समाज में स्त्रियों को उनके अधिकारों से धीरे-धीरे वंचित कर दिया। लेकिन अब समाज में यह जागरूकता लाने की मुहिम विगत कई वर्षों से चलाई जा रही है कि बेटियों की भ्रूण हत्या न होने पाए, उन्हें इस दुनिया में आंखें खोलने दिया जाए तथा उन्हें शिक्षित होने का पूरा अवसर मिले। इस विषय में गांधी जी ने एक बहुत ही सटीक बात कही थी की "यदि एक पुरुष शिक्षित होता है तो इसका अर्थ है कि एक व्यक्ति शिक्षित होता है। वहीं जब एक स्त्री शिक्षित होती है तो उसका अर्थ होता है कि पूरा एक परिवार शिक्षित होता है।"
निःसंदेह, मां ही बच्चे का लालन- पालन करती है और बुनियादी संस्कार और शिक्षा प्रदान करती है। व्यक्ति अपनी बाल्यावस्था में अपनी मां के ही सबसे निकट रहता है और जीवन के प्रत्येक गुण अपनी मां से ही ग्रहण करता है। यदि मां शिक्षित होगी तो अपने बच्चों को भी अच्छी शिक्षा दे सकेगी। इसके साथ ही आवश्यकता पड़ने पर धन कमा कर अपने परिवार को आर्थिक सहयोग भी कर सकेगी। इसी उत्कृष्ट विचारधारा को केंद्र में रखकर डॉ. वंदना गुप्ता ने यह पुस्तक लिखी है।
पुस्तक का संपूर्ण कलेवर तीन भागों में विभक्त है प्रथम भाग में स्वामी विवेकानंद के विचार वैचारिक स्वच्छता अभियान के बारे में जानकारी समाज की प्रकृति में नारी का योगदान जैसे आलेखों के साथ ही मां की शुभकामनाएं शामिल हैं। पुस्तक के संबंध में प्रो. नीलिमा गुप्ता कुलपति डॉ. हरि सिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय डॉ. आर.एच. लता भोपाल तथा डॉ. शरद सिंह वरिष्ठ साहित्यकार के पुस्तक के संबंध में उद्गार हैं। पुस्तक का प्रकृति बृजेश त्रिपाठी डीपीओ महिला बाल विकास सागर ने लिखा है।
पुस्तक में हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं की रचनाएं हैं। पुस्तक के प्रथम भाग में महिला सशक्तिकरण से संबंधित जो लेख और कविताएं समाहित की गई हैं उनके शीर्षक हैं महिला सशक्तिकरण ( वैदिक मध्यकाल एवं आधुनिक काल), आज महिला सशक्तिकरण की आवश्यकता क्यों?, महिला सशक्तिकरण के महत्वपूर्ण बिंदु, महिला सशक्तिकरण कैसे संभव?, विचार करें हमें अपने आप को कहां-कहां सुधारना है, सख़्त कानून के बाद भी महिलाओं के प्रति बढ़ते अपराध का कारण, भारतीय नारी गौरव गरिमा एवं महिमा। इस प्रकार पुस्तक के प्रथम भाग में स्त्री सशक्तिकरण के संपूर्ण स्वरूप की चर्चा की गई है जिसे पढ़कर कोई भी पाठक भारत में महिला सशक्तिकरण की दशा और दिशा को भली भांति समझ सकता है।
पुस्तक के दूसरे भाग को “बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ” पर केंद्रित किया गया है। इस भाग में लेखों के साथ चार केस स्टडीज़ भी हैं। लेखों और कविताओं के शीर्षक हैं - मां मुझको जग में आने दो, चेतावनी, बेटी बचाओ की आवश्यकता क्यों पड़ी?, बेटियां कैसे बचेंगी?, दरिंदगी पर लगाम कब और कैसे?, चलो आज संकल्प उठाएं - बालिका शिक्षा देना, बेटी पढ़ाओ।
“मां मुझको जग में आने दो” कविता के माध्यम से डॉक्टर वंदना गुप्ता ने उस बालिका भ्रूण की पीड़ा को व्यक्त किया है जिसे गर्भ में ही मार दिया जाता था और आज भी इस दिशा में चोरी से प्रयास किया जाता है। एक बालिका भ्रूण की मार्मिक पुकार इस कविता में मौजूद है। इस कविता का अंग्रेजी संस्करण भी पुस्तक में दिया गया है जिसका शीर्षक है- “द वॉयस ऑफ ईच डॉटर हू लेफ्ट टू सून टेल्स अस समथिंग। मदर, लेट मी कम इन द वर्ल्ड”।
“चेतावनी” भी कविता है जिसमें कन्या भ्रूण हत्या करने के दुष्परिणाम को संक्षिप्त शब्दों में बड़े सुंदर ढंग से व्यक्त किया गया है। यह कविता भी हिंदी और अंग्रेजी दोनों में दी गई है। इस कविता की पंक्तियां देखिए-
हत्या कन्या भ्रूण करोगे,
नारी समाज मिट जायेगा।
बेटे के लिए वधू कहाँ से,
यह समाज फिर पायेगा।।
वधू नहीं मिल पाने से,
वहशीपन बढ़ जायेगा।
दरिंदगी की घटनाओं से
यह समाज दुख पायेगा ।।
यह यथार्थ संवाद प्रत्येक पाठक को सोचने को विवश करेगा। जब तक सरकार की ओर से लिंग जांच पर प्रतिबंध नहीं लगाया गया था तब तक बालक और बालिकाओं के अनुपात में चिंताजनक अंतर आता जा रहा था। लेखिका ने बेटी बचाओ की आवश्यकता क्यों पड़ी इस लेख में उद्धृत किया है कि “2011 की जनगणना के अनुसार भारत में बाल लिंगानुपात 0.6 आयु वर्ग में प्रति 1000 लड़कों पर केवल 919 लड़कियां थीं।”
यद्यपि सरकार द्वारा लिंग जांच को अपराध घोषित किए जाने के बाद स्थिति में सुधार आया है। लेखिका ने अपने इस संक्षिप्त लेख में बेटी बचाओ की आवश्यकता के अन्य कारण भी गिनाएं हैं जैसे शिक्षा का अभाव, बाल विवाह आदि।
इस पुस्तक में एक महत्वपूर्ण लेख है “दरिंदगी पर लगाम कब और कैसे?” वास्तुतः बालिका का जन्म लेना और उसका पालन पोषण एक स्वस्थ सुरक्षित माहौल में होना दोनों आवश्यक हैं। किंतु जैसा कि हम सभी आए दिन पढ़ने सुनते रहते हैं कि महिलाओं के विरुद्ध हिंसा बढ़ती जा रही है। यह हिंसा घर के भीतर और घर के बाहर दोनों जगह होती है। दुर्भाग्यपूर्ण बात है कि गालियों और मारपीट का सामना करना लगभग हर मध्यम वर्गीय एवं निम्न मध्यम वर्गीय स्त्रियों के जीवन का अनिवार्य हिस्सा होता है। ऐसी महिलाएं समाज और पारिवारिक दबाव के कारण अपनी प्रताड़ना की पीड़ा किसी से कह नहीं पाती है और चुपचाप सब कुछ सहती रहती हैं। उच्च वर्ग भी इससे अछूता नहीं है। वही प्रताड़ना का दूसरा और भयानक रूप है यौन हिंसा। वर्तमान में यौन हिंसा की दर बढ़ी है जो की चिंताजनक है। लेखिका ने स्त्रियों के विरुद्ध प्रताड़ना और हिंसा के कारण को खंगालते हुए इस बात को सामने रखा है कि शराब सोशल मीडिया तथा पारिवारिक दबाव सबसे अधिक जिम्मेदार हैं। लेखिका ने यह भी रेखांकित किया है कि इस दिशा में सरकार को जिम्मेदारी भली भांति निभानी चाहिए और स्त्रियों को सुरक्षित वातावरण उपलब्ध कराना चाहिए। लेखिका ने तीखा किंतु सटीक प्रश्न उठाया है कि “बलात्कारी का अपराध सिद्ध हो जाने के बाद भी लगातार सजा से बचाने वाली मानसिकता, न्याय में लगातार देरी, बलात्कारी की मनोदशा को बिना समझे कुछ समय की सजा के बाद जमानत पर छोड़ देना, वा ऐसे बलात्कारी का समाज में पुनः घटनाओं को अंजाम देना राष्ट्र के सभी कानूनविदों व न्यायविदों को मालूम है, सभी के घर परिवार हैं, फिर भी न्यायिक दंड प्रक्रिया क्यों आधी आबादी के इस दर्द को महसूस नहीं करती?”
लेखिका ने इस संदर्भ में मोहिंदर सिंह केस, निर्भया केस आदि का संदर्भ दिया है जो की आज भी स्मरण करने पर मानस को विचलित कर देता है।
पुस्तक के तीसरे भाग में कविताएं हैं जो नई की दशा और उसके जीवन पर केंद्रित हैं। बानगी के तौर पर “बेटी जन्म” शीर्षक की यह छोटी सी कविता देखिए-
कन्या रूप तुम्हारे घर में,
मातृशक्ति है आई।
जिसके आने के स्वागत में,
चहुँ ओर खुशी है छाई ।।
प्रेम सुधा रस छलके अविरल,
अनुपम छटा है छाई।
किलकारी आंगन में गूंजी,
तुमको आज बधाई ।।
मुझे पूर्ण विश्वास है कि यह पुस्तक समाज को बेटियों के प्रति जागरूक बनाने तथा स्त्री सशक्तिकरण के महत्व को समझने में अपना भरपूर योगदान देगी।
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