Wednesday, August 19, 2026

पुस्तक समीक्षा | संवेदनाओं से उपजे नवगीत जो बार-बार पढ़े जाने का आग्रह करते हैं | समीक्षक - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

पुस्तक समीक्षा    

संवेदनाओं से उपजे नवगीत जो बार-बार पढ़े जाने का आग्रह करते हैं                              

 - समीक्षक डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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काव्य संग्रह - आवाज़ मौसम की
कवि       - राजेन्द्र गौतम
प्रकाशक    - अनुज्ञा बुक्स, 1/10206, लेन नं. 1ई, वेस्ट गोरख पार्क, शाहदरा, दिल्ली- 110 032
मूल्य       - 400/-
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राजेन्द्र गौतम हिन्दी की नवगीत विधा के एक वरिष्ठ और स्थापित नाम हैं। उनका ताज़ा नवगीत संग्रह ‘‘आवाज़ मौसम की’’ मात्र 61 नवगीतों का संग्रह नहीं है वरन यह अपने-आप में नवगीत की गीतात्मक यात्रा की कथा है। यह यात्रा राजेन्द्र गौतम के लगभग 1972-73 के नवगीतों से आरम्भ होती है। इनसे नवगीत की उस समय की प्रकृति एवं प्रवृत्ति को समझा जा सकता है जब नवगीत विधा अपने स्वर्णकाल में विस्तार पा रही थी। हिन्दी साहित्य में गीत विधा पहले से विद्यमान थी, फिर भी नवगीत के शिल्प की आवश्यकता को अनुभव किया गया और इस विधा को भरपूर लोकप्रियता भी मिली। नवगीत में गीत की अपेक्षा कुछ छूटें ली गई थीं जिससे इसके कथ्य को चहुंमुखी दिशाएं मिलीं। सन् 2012 में नवगीत विधा पर नवगीतकार वीरेन्द्र आस्तिक का एक लंबा लेख प्रकाशित हुआ था जो आज भी ‘‘पूर्वाभास’’ की इन्टरनेट साईट पर पढ़ा जा सकता है। अपने इस महत्वपूर्ण लेख में वीरेन्द्र आस्तिक ने नवगीत की तत्कालीन सृदृढ़ स्थिति एवं संभावनाओं के साथ ही आवश्यकताओं पर भी प्रकाश डाला था। लेख का शीर्षक था-‘‘नवगीत का संक्षिप्त इतिहास और उसकी मौजूदा समस्याएं’’। अपने इस लेख में उन्होंने एक वाक्य लिखा था-‘‘आज नवगीत एक समृद्ध विधा है। बल्कि मुझे तो ऐसा लगता है कि भविष्य में नवगीत का सुनहरा युग आने वाला है।’’
निश्चित रूप से वह सुनहरा युग आया। यूं तो शंभूनाथ सिंह को नवगीत का प्रणेता माना जाता है, वहीं कुछ लोग राजेन्द्र प्रसाद सिंह को नवगीत का प्रवर्तक मानते हैं। बहरहाल, आरंभ जिसने भी किया हो किन्तु इसे सोपान चढ़ाया उन अनेक नवगीतकारों ने जिनमें से कुछ प्रमुख नाम हैं- त्रिलोचन शास्त्री, केदारनाथ सिंह, गोपालदास नीरज, धर्मवीर भारती, रवीन्द्र भ्रमर, रमेश रंजक, कुमार शिव, वीरेन्द्र मिश्र, कुंवर नारायण, देवेन्द्र शर्मा इन्द्र, बालस्वरूप राही, रामदरश मिश्र, नरेश सक्सेना, ओम प्रभाकर, बुद्धिनाथ मिश्र, अनूप अशेष, नईम, राजेन्द्र प्रसाद सिंह, उमाकांत मालवीय आदि। लेकिन फिर कुछ ऐसा हुआ कि नवगीत को नेपथ्य में धकेला जाने लगा। इस संदर्भ में मैं फिर वीरेन्द्र आस्तिक के लेख का एक अंश दे रही हूं जिसमें उन्होंने नवगीत के नेपथ्य मे जाने के भावी कारण की मानो पहले ही घोषणा कर दी थी-‘‘यहां मैं आलोचना पर जोर क्यों दे रहा हूं? विगत में डॉ नामवर सिंह जैसे गद्य कविता के आलोचक यह कहते आए हैं कि ‘गीत आलोचना की वस्तु नहीं है।’ यह कहकर वे एक तीर से दो निशाने साधते रहे हैं। एक- गीत इस लायक नहीं कि उसकी आलोचना हो और दो- शैक्षिक जगत में, गद्य कविता का एकाधिकार बरकरार रहे। मेरा मानना है कि यदि गीत पर विमर्श नहीं होगा तो वह मूल्यांकित भी नहीं होगा और यदि उसका मूल्यांकन नहीं होगा तो पाठ्यक्रमों आदि में प्रवेश का रास्ता भी नहीं बन पाएगा। यहां पर मैं बड़े आदर के साथ उन सभी आलोचकों-समीक्षकों को याद करता हूं जिनकी महती भूमिका से नवगीत समृद्ध हुआ। लेकिन बात वहीं की वहीं है कि नवगीत आज साहित्य की मुख्य धारा में नहीं है जिसका वह हकदार है, क्योंकि उसकी वकालत के लिए हमारे पास बड़े आलोचक नहीं है।’’

एक कारण और भी रहा है जिसका अनुमान लेख लिखने के समय आस्तिक जी को नहीं रहा होगा कि भविष्य में साहित्य सृजन के प्रति श्रम में घोर कमी आने लगेगी। नवगीत भी श्रम की मांग करता है अर्थात् नवगीत सृजन उन कवियों के लिए धैर्य चुका देने वाला कार्य था जो रातों-रात कवि कहलना जाना चाहते हैं। नवगीतकार  माहेश्वर तिवारी ने नवगीत की खूबी बताई थी कि-‘‘नवगीत अपने समय की आधुनिकता बोध से सम्पन्न संपृक्त छांदसिक रचना है।’’
संग्रह में अपने गीतों को राजेन्द्र गौतम ने पांच उपशीर्षकों में विभक्त किया है- लपटों भरा आकाश, मेघदूत आया, शरद की भोर, शीत लहर, नंगी डालें तथा देह थिरकती है मौसम की। सभी नवगीतों में प्रकृति की प्रधानता है। कवि ने प्रकृति को लक्ष्य कर के अपनी तमाम अभिव्यक्ति को शब्दबद्ध किया है। एक नवगीत है ‘‘दहकते छन्द’’। इसमें समसामयिक व्यंजना को स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है-
बचा कर भी
कहां ले जायें
हम ये झुलसती कलियां
सुलगती आग है अब झील-तल में
या कमल-वन में।
हुआ सम्बन्ध गहरा
आंधियों से
और अब इसका
तवे-सी तप रही जो
जेठ की दोपहर पल-पल है
क्षितिज पर
दूर धुंधले में
विवश मंडरा रहीं चीलें
न जाने कब गिरे भू पर भू
थका हर पंख निर्बल है
घटाओं के सपन ढोता फिरे
आकाश बंजारा
रचें पर दग्ध तलवे रेत की छुवनें,
चुभन तन में।

राजेन्द्र गौतम समय की नब्ज़ को पकड़ना बखूबी जानते हैं। वे स्थितियों पर कटाक्ष करते हैं, दुख प्रकट करते हैं, असंतोष जताते हैं। इन सबमें उनके शब्दों का चयन अपनी महत्ता स्वयं प्रकट कर देता है। उदाहरण के लिए संग्रह का नवगीत ‘‘पथरा चुकीं झीलें’’ को ही लें-
कभी मौसम के पड़ें कोड़े
कभी हाकिम जड़े सांटे खाल मेरे गांव की
कब तक दरिन्दों से
यहाँ खिंचती रहेगी!
दूर तक जो
भूख से सहमे हुए
सीवान ठिठके हैं
कान में उनके सुबकतीं
प्यास से पथरा चुकीं झीलें
रेत के विस्तार में
यों ठूंठ दिखते हैं करीलों के
ज्यों ठुकीं गणदेवता की
काल-जर्जर देह में कीलें

नवगीत की यह विशेषता रही है कि उसने जहां यथार्थवाद के गुणों को अपनाया, वहीं छायावाद के प्रकृति के मानवीय करण को भी आत्मसात किया। इससे नवगीत में कठोरता और कोमलता संतुलित रूप में एक साथ बनी रही। आंचलिक भाषा एवं बोलियों को भी नवगीत में पर्याप्त स्थान मिलता रहा है ताकि उनका लोक एवं जनमूल्य बना रहे। राजेन्द्र गौतम के नवगीत ‘‘हिम-सी जमी है’’ के एक बंद से नवगीत की इन खूबियों को भली-भांति समझा जा सकता है-
ओस की
बूंदों सरीखी की
दूब पातों पर उतरती
जा रही है नम उदासी
एक-
अनजानी विकलता
साथ अपने खे रही है
यह नदी क्यों विफलता-सी
ये बुरुसों
की कतारें
दूर तक हिलतीं, डुलातीं-
हों तटों को ज्यों बिजलियां।

‘‘आवाज़ मौसम की’’ संग्रह की भूमिकाएं वेद प्रकाश शर्मा ‘‘वेद’’ तथा डाॅ. कुसुम सिंह ने लिखी हैं। नवगीतकार राजेन्द्र गौतम का यह नवगीत संग्रह नवगीत के भाषिक संस्कार, शिल्प के सौष्ठव एवं प्रवाह लहरियों से ठीक उसी प्रकार परिचित कराता है, मानो नवगीत की सुरम्य घाटियों में भावनाओं की बांसुरी का सप्तक स्वर गूंज रहा हो जिसमें अव्यवस्था के प्रति रोष का भारी मंद सप्तक स्वर भी है और प्रकृति के सौंदर्य का पंचम मधुर सप्क स्वर भी। वस्तुतः नवगीत विधा के शोधार्थियों तथा नवगीत सृजनधर्मियों के लिए यह एक महत्वपूर्ण संग्रह है।      
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Saturday, August 15, 2026

टॉपिक एक्सपर्ट | उते नमक कानून तोड़ो गओ औ इते गानों गा के साथ दओ गओ रओ | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | पत्रिका | बुंदेली कॉलम

टाॅपिक एक्सपर्ट 🇮🇳

उते नमक कानून तोड़ो गओ औ  इते गानों गा के साथ दओ गओ रओ 🇮🇳

- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

अंग्रेजन की गुलामी से आजादी के लाने सागर में अपने सागर वारन ने बी कोनऊं कसर ने छोड़ी रई। सबसे पैले तो बात करी जाए 1842 की जबे बुंदेलखंड को पैलो संग्राम भओ। मधुकर शाह बुंदेला जू ने अंग्रेजन खों छठीं को दूद याद करा दओ तो। बा तो ठठरी के बंधे गद्दार ने उनें सोऊत में पकरवा दओ। मधुकर शाह बुंदेला जू खों इतई सागर की जेल में रखो गओ औ इतई उने फांसी दई गई। जे खबर जेसईं सागर वारों खों लगी, बे कसम खान लगे के अब तो अंग्रेजन खों भगा के रैबी। सो, जब-जब बायरे कछू कोसिस करी गई तो सागर वारों ने उनको साथ दओ। भौत जने जेल गए, गोलियां औ लट्ठ खाए। राजाराम बोहरे, सेठ प्यारेलाल जैन शाहगढ़ वारे, साबूलाल जू घांई मुतके रए जोन ने आगूं आ के लड़ाई लरी। बलेह गांव के तो सबई जने आजादी के लाने कूंद परे हते। 
     कओ जात आए के गांधी जू सोई सागर आए रए। ऊंसई बी जबे गांधी जू ने उते दांडी में नमक कानून तोड़ो, सो ऊ टेम पे इते सागर में गाने गा-गा के लुगाइन लौं ने साथ दओ रओ-
सुन लेओ जालिम हमें सोई 
नमक तोड़बे  जाने है
गांधी जू को संग निभाने है,
अंग्रेजन खों मार भगाने हैं....

एसईं एक औ गानो गाओ जात रओ -
मैंहगो नमक हमें नई खाने
अंग्रेजन को सबक सिखाने
आए हमाए ऐंगर गांधी
जेई बात हमखों समझाने…
 सो, का बच्चा, का बुड्ढा औ का लुगाइयां सबई ने गुलामी से आजादी पाबे के लानें अपनी जान लड़ा दई रई। तब कऊं जा के जा आजादी मिली। सो ई आजादी को मोल समझो चाइए औ ईको सम्मान करो चाइए। सो सबई जने याद राखियो के हमें अपनी आजादी की इज्जत राखने है, ईको दुरुपयोग नईं करने। सबई खों स्वतंत्रता दिवस की हमाई भौत-भौत बधाई पौंचे!
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Thank you Patrika 🙏
Thank you Dear Reshu Jain 🙏
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Wednesday, August 12, 2026

चर्चा प्लस | कालिदास के साहित्य में जीवंत है प्रकृति और पर्यावरण | सागर दिनकर


चर्चा प्लस
कालिदास के साहित्य में जीवंत है प्रकृति और पर्यावरण
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह 
                                                        v.  महान संस्कृत कवि कालिदास की रचनाओं जैसे ‘मेघदूत’, ‘रघुवंश’, ‘ऋतुसंहार’ और ‘कुमारसंभव’ में मानवीय भावनाओं और प्रवृत्तियों का अद्भुत वर्णन मिलता है। इसी तरह, इन महाकाव्यों में पर्यावरण और उसके संरक्षण के प्रति जो चिंतन प्रकट किया गया है, वह भी अद्वितीय है। कालिदास के महाकाव्यों को पढ़ते समय हम प्रायः पर्यावरण से जुड़े पहलू को अनदेखा कर देते हैं और मुख्य कथा पर ही ध्यान केंद्रित करते हैं। यद्यपि इन महाकाव्यों के अन्य पक्षों पर भी ध्यान दिया जाता है, लेकिन हम पाएंगे कि कालिदास ने अपनी हर रचना में पर्यावरण के प्रति गहरा प्रेम व्यक्त किया है। इसके साथ ही, पर्यावरण के संरक्षण और पर्यावरण में असंतुलन के कारण होने वाली प्राकृतिक आपदाओं या कष्टों की ओर भी ध्यान आकर्षित किया गया है।


कालिदास को प्रकृति का कवि कहा जाता है। संस्कृत साहित्य में महान कवि और नाटककार कालिदास का एक महत्वपूर्ण स्थान है। उनकी रचनाओं की शाश्वत सुंदरता और उनकी बेजोड़ महानता के कारण उन्हें न केवल भारत में बल्कि पूरी दुनिया में ‘‘प्रकृति के कवि’’ का सम्मानजनक खिताब मिला है। कालिदास का पूरा साहित्य पर्यावरण संरक्षण की भावना से ओत-प्रोत है। कालिदास ने अपनी कविताओं के माध्यम से प्रकृति के प्रति अपने प्रेम और पर्यावरण संरक्षण के प्रति अपनी जागरूकता को व्यक्त किया है। महान संस्कृत कवि कालिदास की रचनाओं जैसे ‘मेघदूत’, ‘रघुवंश’, ‘ऋतुसंहार’ और ‘कुमारसंभव’ में मानवीय भावनाओं और प्रवृत्तियों का अद्भुत वर्णन मिलता है। इसी तरह, इन महाकाव्यों में पर्यावरण और उसके संरक्षण के प्रति जो चिंतन प्रकट किया गया है, वह भी अद्वितीय है। कालिदास के महाकाव्यों को पढ़ते समय हम प्रायः पर्यावरण से जुड़े पहलू को अनदेखा कर देते हैं और मुख्य कथा पर ही ध्यान केंद्रित करते हैं। यद्यपि इन महाकाव्यों के अन्य पक्षों पर भी ध्यान दिया जाता है, लेकिन हम पाएंगे कि कालिदास ने अपनी हर रचना में पर्यावरण के प्रति गहरा प्रेम व्यक्त किया है। इसके साथ ही, पर्यावरण के संरक्षण और पर्यावरण में असंतुलन के कारण होने वाली प्राकृतिक आपदाओं या कष्टों की ओर भी ध्यान आकर्षित किया गया है।
संस्कृत साहित्य के प्रसिद्ध कवि, महान कवि कालिदास की रचनाओं में प्रकृति के प्रति विशेष प्रेम दिखाई देता है। अपने महाकाव्यों में प्रकृति के वर्णन के माध्यम से, कालिदास ने न केवल प्रकृति की सुंदरता को उजागर किया है, बल्कि अपने नायक-नायिकाओं के माध्यम से आम जनता को प्रकृति संरक्षण के प्रति जागरूक करते हुए उन्हें नुकसान न पहुँचाने का संदेश भी दिया है। प्रकृति की विशेषताओं और महत्व का वर्णन करते हुए उन्होंने ‘‘ऋतुसंहार’’, ‘‘कुमारसंभव’’ और ‘‘रघुवंश’’ की रचना की है। अपने विश्व-प्रसिद्ध नाटक ‘‘अभिज्ञानशाकुंतलं’’ के मंगलाचरण में प्रकृति के मूल तत्वों (जल, अग्नि, सूर्य, चंद्रमा, आकाश, पृथ्वी, वायु) की ‘‘अष्टमूर्ति देव’’ के रूप में स्तुति करते हुए उन्होंने प्रकृति के दैवीय स्वरूप को भी प्रस्तुत किया है।
कालिदास ‘‘कुमारसंभव’’ की शुरुआत हिमालय के प्राकृतिक वर्णन से करते हैं-
अस्त्युत्तरस्यां दिशि देवतात्मा हिमालयो नाम नगाधिराजः।
पूर्वापरौ तोयनिधीवगाह्य स्थितः पृथिव्या इव मानदण्डः।।

‘‘कुमारसंभव’’ में बताया गया है कि पार्वती ने शिव को पति के रूप में पाने के लिए गौरी शिखर पर्वत पर जाकर तपस्या करने के लिए अपनी कुटिया बनाई। वहाँ उन्होंने सबसे पहले पौधे लगाए और अपने बच्चों की तरह ही रोज़ दूध जैसे पानी से उन्हें सींचा और उनकी देखभाल की। यह काम उनकी तपस्या का ही एक हिस्सा था, जैसे यज्ञ वगैरह। इसी तरह, ‘‘रघुवंश महाकाव्य’’ में सिंह और दिलीप के बीच बातचीत के दौरान, सिंह दिलीप को एक पेड़ के बारे में बताता है और कहता है कि ‘‘हे राजा! यह वही देवदार का पेड़ है जिसे शिव और पार्वती ने मिलकर अपने पुत्र की तरह पाला-पोसा था और जब हाथी ने रगड़कर उसकी छाल हटा दी, तो पार्वती को वैसा ही दर्द हुआ जैसा उन्हें राक्षसों के साथ लड़ाई में अपने बेटे कार्तिकेय के घायल होने पर हुआ था। कालिदास ने लिखा है कि पार्वती खुद पेड़ से गिरी हुई पत्तियाँ ही खाने के तौर पर लेती थीं ताकि हरी पत्तियाँ तोड़ने से पेड़ को तकलीफ़ न हो।
यह प्रकृति के प्रति मानवीय संबंधों की गहनता का द्योतक है कि कालिदास ने एक वृक्ष की पीड़ा से ठीक उसी प्रकार व्यथित होते हुए पार्वती को वर्णित किया जिस प्रकार एक माता अपने पुत्र की पीड़ा से व्यथित हो उठती है। कातिदास द्वारा किया गया यह वर्णन प्रकृति के प्रति तत्कालीन संवेदना को प्रमाणित करता है।
महाकवि कालिदास से जुड़ी हुई बहुप्रचलित  रोचक कथा में भी प्रकृति से जीवन के मूल्यों को सीखने की शिक्षा दी गई है जिसमें बताया गया है कि जब राजा के सभासद किसी मूर्ख व्यक्ति को ढूढने निकले तो उन्हें एक ऐसा युवक दिखाई दिया जो एक वृक्ष की ऐसी डाल को काट रहा था जिस पर वह स्वयं बैठा हुआ था। इसी कथा से ही वह कहावत विकसित हुई कि ‘‘उस डाल को मत काटो जिस तुम स्वयं बैठे हो।’’ इस कथा की सत्यता की गहराई को छोड़ कर यदि इसके प्रकृति के पक्ष को देखा जाए तो इसमें प्रकृति के द्वारा जीवन की शिक्षा दे दी गई है। जबकि हमने इस शिक्षा को लगभग भुला दिया है। इसीलिए हम जिस पृथ्वी पर रहते हैं लगातार उसे क्षति पहुंचा रहे हैं। डाल कटने पर डाल सहित से गिरने पर तो चोट ही लगेगी किन्तु पृथ्वी का संतुलन बिगड़ने पर पृथ्वी से जीवन का अस्तित्व ही मिट जाएगा। 
कवि कालिदास का पौधों के प्रति लगाव इस बात से भी साबित होता है कि वे कहते हैं कि अगर कोई ज़हरीला पेड़ अपने-आप उग आए, तो उसे काटना नहीं चाहिए - ‘‘विषवृक्षोऽपि संवर्ध्य स्वयं छेत्तुमसाम्प्रतं’’। वे आगे कहते हैं कि यह ज़हरीला पेड़ जीवों को नुकसान पहुँचाने के बजाय उनके लिए फ़ायदेमंद ही होगा।
वस्तुतः चाहे वनस्पति कितनी भी विषाक्त क्यों न हो, उसमें कोई न कोई औषधीय गुण अवश्य होता है। जैसे धतूरा विषैला होता है किन्तु औषधीय तत्वों से भरपूर होता है। हमारे पूर्वजों, ऋषि-मुनियों ने वैदिक ग्रथों में धतूरे को भगवान शिव का प्रिय बता कर उसके अस्तित्व को सुरक्षित करने का महत्वपूर्ण कार्य किया।
‘‘रघुवंश’’ में ऋषियों की पत्नियों द्वारा हिरणों की अपने बच्चों की तरह देखभाल करने का वर्णन है। दूसरी ओर, कालिदास ‘‘कुमारसंभव’’ में लिखते हैं कि पार्वती की तपस्या के कारण तपोवन में एक-दूसरे के दुश्मन जानवर भी अपनी दुश्मनी भूल गए और बिना किसी बैर-भाव के प्यार से साथ रहने लगे। तपोवन में आकर, ब्रह्मचारी पार्वती से पूछते हैं कि ‘‘क्या बेलों और पेड़ों में नई कोंपलें ठीक से फूट रही हैं, क्या कोई रुकावट तो नहीं है? क्या जंगल का पानी आपके नहाने लायक है? क्या वे दूषित तो नहीं हैं?’’
कालिदास ने गर्मी के मौसम का वर्णन करते हुए, पशुओं के जीवन में पानी की ज़रूरत और पानी न होने पर उनके जीवन की भयावहता को दिखाया है। वे लिखते हैं कि ‘‘कितनी भीषण गर्मी है, सूरज की तेज़ धूप में सूखी घाटी में पानी की बूँदें मिलना भी मुश्किल है।श् तेज़ धूप और ज़बरदस्त प्यास से बेहाल हाथी पानी की चाह में यह भी भूल जाते हैं कि शेर उन्हें मार डालेगा। प्यास से व्याकुल होकर पानी की तलाश में वे शेर से भी नहीं डरते।’’
कवि कालिदास द्वारा वर्णित यह दृश्य प्रायः नेशनल जियोग्राफी अथवा बीबीसी अर्थ के कार्यक्रमों में दिखाई दे जाता है जिसमें आफ्रिका के मसाईमारा के जंगलों में सिमटे हुए जलस्रोत पर सभी प्रकार के वन्य पशु एक साथ पहुचते हैं पानी पीने। यह जियो या मरो का प्रश्न होते हुए भी चरितार्थ होता है। आखिर पानी जीवन का अति आवश्यक तत्व है।
कालिदास प्रकृति के कुशल चितेरे हैं। उनका प्रकृति वर्णन सूक्षम और यथार्थ है प्रकृति को जितना महत्त्व पूर्ण स्थान कालिदास के काव्य में मिला है उतना परवर्ती साहित्य में नहीं। नारी सौंदर्य एवं नायिकाओं के अलंकरण के लिए भी वे प्राकृतिक उपादानों का ही ग्रहण करते हैं। जैसे वसंत पुष्पों से अलंकृत पार्वती दृ
”अशोकनिर्भत्सितपद्मरागमाकृष्टहेमद्युतिकर्णकारम् द्य
मुक्ताकलापीकृत्सिन्दुवारं वसन्तपुष्पाभरणं वहन्ती द्यद्य” (कुमारसम्भवम् 3/53)
अर्थात अशोक के पुष्प से पद्मराग मणि का तिरस्कार करने वाले, सोने की कान्ति को ग्रहण करने वाले हार के समान किये गये निर्गुण्डी के पुष्पों वाले ऐसे वसन्त ऋतु के फूल रूप भूषण को धारण करति हुई (पर्वतराज कन्या दिखाई पड़ी।)
‘ऋतुसंहारं’ में एक श्लोक में कवि ने कहा है-
“विपांडूरं कीटरजस्त्रिन्नावितमं भुजंग्वाद्रकगतिप्रसपिर्तम”।
- अर्थात जब बरसात का पानी घरों के दीवारों से प्रथम बार टेढ़ी-मेढ़ी लकीरें बनाता हुआ पीले-पीले के सूखे पत्तों को हटाता हुआ ऐसा प्रतीत होता है, मानो काला भुजंग वन में विचरण कर रहा हो।
‘‘मेघदूत’’ में भी प्रकृति के अनुपम वर्णन की छटा हमें बहुत ही प्रभावित करती है, कोई यक्ष जब पहाड़ी ढलान पर मेघ को देखता है तो वह यह मेघ से अत्यंत प्रभावित हो जाता है और उसी समय वह यक्ष कह उठता है- “धूमो ज्योतिः सलिलमरुतां संनिपातः क्व मेघः”।
इस प्रकार धुँआ, अग्नि, जल और वायु के समन्वित रूप मेघ का ऐसा आकार कालिदास चित्रित करते हैं, मानो आकाश में मेघ स्वयं ही पर्वतशिखर- जैसा सजीव हो उठता है, न केवल मेघ अपितु मानचित्र से हिमालय की तराई में बसी अलका तक के वर्णन में कालिदास ने प्रकृति के विभिन्न क्षेत्रों का अत्यंत सजीव वर्णन किया है।
‘‘ऋतुसंहारम’’ छह ऋतुओं का संग्रह है जो एक प्रेमी द्वारा देखी जाने वाली अलग-अलग ऋतुओं के वर्णन के रूप में हैं। कालिदास का ‘‘ऋतुसंहारम’’ छह भागों में विभाजित है। सभी भाग 144 छंदों के साथ छह ऋतुओं से जुड़े हुए हैं। कविता में छह भारतीय ऋतुओं के लिए छह सर्ग हैं- ग्रिस्मा (ग्रीष्म), वर्षा (बरसात), शरत (शरद ऋतु), हेमंत (जाड़ा), सिसिर (शीतकालीन), वसंत (वसंत)। प्रत्येक ऋतु को दो महीनों में विभाजित किया गया है; सभी ऋतुएँ प्रकृति के चक्र के रूप में एक दूसरे से जुड़ी हुई हैं। यह उस तालिका ऋतु का कालक्रम है, जिसे हिंदू चंद्र कैलेंडर में भारतीय 12 महीनों के छह मौसमों में विभाजित किया गया है।
‘‘मेघदूतम’’ में कालिदास ने पर्यावरण के लगभग सभी घटकों - अग्नि, वायु, जल, आकाश, पृथ्वी, सूर्य, चंद्रमा, औषधि और वनस्पति आदि को प्रस्तुत किया है। ये सदैव बिना बदले की इच्छा के हमारी सहायता करते हैं, इसलिए ये देवताओं के समान हैं। इसके अधिकांश छंदों में पर्यावरणीय तत्वों का स्मरण किया गया है और यह संदेश दिया गया है कि प्रकृति के विरुद्ध कार्य नहीं करना चाहिए। पूर्वी मेघ में बाह्य प्रकृति का सबसे सुंदर रूप चित्रित किया गया है। एक ओर गंधावती, गंभीरा, चर्मण्वती, रेवा, जाह्न्वी, मंदाकिनी, यमुना, देवगंगा, सरस्वती जैसी नदियाँ हैं तो दूसरी ओर अलका, अवंती, विदिशा, कुरूक्षेत्र और उज्जयिनी ऊँची नगरियाँ हैं। कहीं रामगिरि, अमरकूट, देवगिरि, निचारगिरि जैसे पर्वत और पठार दिखाई देते हैं तो कहीं विशाल हिमालय, विंध्य और कैलाश। कहीं रामगिरि का पवित्र जल से भरा सरोवर है तो कहीं हंसों का प्रिय विश्व प्रसिद्ध मानसरोवर। कालिदास के काव्य में प्रकृति का सौंदर्य और प्रकृति के तत्व ही जीवन और संवेदनाओं के पर्याय हैं। इस प्रकार कालिदास का काव्य पर्यावरण और उसकी सुरक्षा के प्रति जागरूक प्रतीत होता है, हम बस इसे समझने की जरूरत है।                                                            
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(दैनिक, सागर दिनकर में 12.08.2026 को प्रकाशित) 
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पुस्तक समीक्षा | ज़िन्दगी के सवालों के खूबसूरती से ज़वाब ढूंढती ग़ज़लें समीक्षक - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

पुस्तक समीक्षा
ज़िन्दगी के सवालों के खूबसूरती से ज़वाब ढूंढती ग़ज़लें
 समीक्षक - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
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ग़ज़ल संग्रह- चलो ढूंढें जवाब अपने 
कवि       - कृष्ण बक्षी 
प्रकाशक  - बोधी प्रकाशन, सी-46, सुदर्शनपुरा इंडस्ट्रियल एरिया एक्सटेंशन, नाला रोड, 22 गोदाम, जयपुर - 302006
मूल्य      - 150/-  
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हिन्दी ग़ज़ल की दुनिया में कृष्ण बक्षी की एक विशेष पहचान है। जीवन से उनके गहरे सरोकार रहे हैं जो उनकी ग़ज़लों में साफ़ देखे जा सकते हैं। यूं भी ग़ज़ल साहित्य की एक ऐसी काव्य विधा है जिसके प्रत्येक शेर अपनी लयात्मकता के साथ स्वतंत्र संवाद करता है। इसलिए एक ग़ज़ल ही अपने आप में जीवन की पूरी कथा कह सकती है बशर्ते कहने वाले ने ग़ज़ल को पूरी तरह साधा हो। कृष्ण बक्षी वे ग़ज़लकार हैं जिन्होंने ग़ज़ल को न केवल साधा बल्कि उस पर अपनी छाप भी छोड़ी। ‘‘चलो ढूंढें जवाब अपने’’ कृष्ण बक्षी का एक ऐसा ग़ज़ल संग्रह है जिसमें उनकी ग़ज़लें जीवन के अनुत्तरित रह जरने वाले सवालों के जवाब ढूंढती दिखाई देती हैं। आधुनिक जीवन में जटिलताओं की कमी नहीं है। रोजी-रोटी की समस्या, सिर पर छत की समस्या, बच्चों के लालन-पालन की समस्या। उस पर भी कुछ समस्याएं इंसान स्वयं पैदा कर लेता है जैसे जाति, धर्म, रंग और समुदाय के भेद की समस्या। ऐसा क्यों होता है? इंसान सुकून पाना चाहता है लेकिन अपनी मुश्क़िलें भी खुद ही बढ़ाता है। ऐसा क्यों होता है? ऐसे ही ‘क्यों’ का जवाब ढूंढती है कृष्ण बक्षी की यह ग़ज़ल-

न दरिया में  रवानी है चलो ढूंढे जवाब अपने 
कहीं ठहरा सा पानी है चलो ढूंढे जवाब अपने 
अलहदा कैसे कर दोगे रगों में सबकी बहता है 
जो खूं हिंदोस्तानी है चलो ढूंढे जवाब अपने
अज़ब हालात में उलझा के रख दी है जवां पीढ़ी 
भटकती-सी जवानी है चलो ढूंढे जवाब अपने
 - ये अशआर हैं शायर कृष्ण बक्षी की गजल ‘‘चलो ढूंढे जवाब अपने’’ से। यह ग़ज़ल उनके जिस ताजा ग़जल संग्रह में संग्रहीत है, उसका नाम भी है ‘‘चलो ढूंढे जवाब अपने’’।
 वर्तमान परिदृश्य देखते हुए कवि कृष्ण बक्षी महसूस करते हैं कि समाज में हर स्तर पर हर ओर प्रश्नों का अंबार लगा हुआ है, जिनका जवाब ढूंढें बिना हल नहीं निकाला जा सकता है। जो प्रश्न अव्यवस्थाओं को देखकर, असंवेदनाओं को देखकर और विसंगतियों को देखकर मन में उमड़ते-घुमड़ते हैं, वही व्याकुलता का कारण बनते हैं। इसलिए भी उनका जवाब ढूंढना ज़रूरी है। यूं भी प्रश्नों से घिरा हुआ समाज कभी सही ढंग से विकास नहीं कर पाता है।
ग़म ही रह जाते हैं अक्सर गुनगुनाने के लिए 
छोड़ देता है कोई जब टूट जाने के लिए
छीन कर के चुलबुल आपन ले गए सारी हंसी
तुमने छोड़ी  तक खुशी न मुस्कुराने के लिए

इसी ग़ज़ल में जो कि आरंभ में इश्क़िया गजल होने का एहसास कराती है, वहीं आगे के शेर ज़िंदगी की पथरीली सच्चाइयों से सामना कराते हैं। जैसे ये शेर हैं-
पी गया है चिमनी यों का उनको जहरीला धुआं 
घर से जो  मजदूर  निकले  कारखाने के लिए 
खूब  इस्तेमाल  तुमने  कर लिया  आवाम का
काम आया है  फ़क़त  जो सर झुकाने के लिए

कवि ने सत्ता के खोखले वादों और दावों पर जहां तंज कसा हैं, वहीं सत्ता के इर्द-गिर्द झूठ के मायाजाल को भी उजागर किया है। एक ऐसा मायाजाल जो आमजन को वोटर संख्या अथवा सभाओं की भीड़ से अधिक कुछ नहीं मानती है। कवि कृष्ण बक्षी की गजलों में भाषाई समृद्धि स्पष्ट दिखाई देती है। प्रचलन में मौजूद शब्दों और मुहावरों को बड़ी सुंदरता से और सटीकता से अपने शेरों में पिरो देते हैं। जैसे यह गजल है ‘‘सभाओं ने हमें’’ -
हर कसौटी पर कसा है विपदाओं ने हमें
खूब जांचा खूब परखा आपदाओं ने हमें
सिर्फ हम मोहरे रहे जलसे, जुलूसों के 
दांव पर रक्खा हमेशा ही सभाओं ने हमें
साजिशों वाली अंधेरी कोठरी में क्यूं
बांध रक्खा है अभी तक बादशाहों ने हमें

इस संग्रह की ग़ज़लें अपने प्रश्नों के जवाब मांगने के साथ ही हमारे आसपास रच-बस गए झूठ को बखूबी रेखांकित करता है। और हमें आगाह करने का प्रयास करता है कि हमें ज़रूरत है अपने स्वार्थ की गहरी नींद से जागने की। यूं तो शायरी का नाता प्यार-मोहब्बत, ग़म, शिक़ायत, दोस्ती, दुश्मनी आदि इन सब से बहुत क़रीब कर रहा है। लेकिन जब कृष्ण बक्षी अपनी शायरी में दोस्ती दुश्मनी की बात करते हैं तो उनका अंदाज निराला होता है बानगी देखिए -
दर्द अक्सर जब  मुझे पहचान लेता है 
बिन सबूतों के ही दुश्मन मान लेता है
बात उठते ही वो मेरे इन सवालों की 
पांव से सर तक वो चादर तान लेता है
यह व्यवस्था ही बहुत है जान लेने को
जहर का तू किसलिए एहसान लेता है

दर्द पर ही एक ग़ज़ल के कुछ और शेर देखिए जिनमें आंतरिक पीड़ा के साथ ऐतिहासिक उद्धरण का सुंदर सामंजस्य है-
ज़ख्म मेरे आज  मुझसे बात करने पर तुले हैं 
और उस पर दर्द तहक़ीक़ात करने पर तुले हैं
सांझ के सूरज बचा कर रख ज़रा सी रोशनी 
वक्त से  पहले सितारे  रात करने पर तुले हैं
वह  हमारे  दौर का  ही  आम सा इंसान है
आप आखिर क्यों उसे सुकरात करने पर तुले हैं

यह माना जाता है कि बड़े बहर की ग़ज़लें कहने से अधिक कठिन होता है छोटी बहर की ग़ज़लें कहना। सच भी है कि कम से कम शब्दों में सब कुछ कह देना एक साहित्यिक कला ही तो है। जो इस कला में पारंगत हो जाता है, वह आसानी से छोटे बहर की सटीक ग़ज़लें भी कह लेता है। इस संग्रह में बड़े बहर के साथ छोटे बहर की भी कई खूबसूरत गजलें हैं। जैसे यह एक गजल है ‘‘रोज़ मरते हैं’’ -
    हम जिसे  बहुत  प्यार करते हैं 
    उसकी  नाराज़गी  से डरते हैं 
    जिनको होता है खौफ लहरों का 
    सिर्फ  पानी  में  वो उतरते हैं 
    चल मोहब्बत से पूछ कर देखो 
    हम ही करते हैं कि वो भी करते हैं

छोटी बहर की ही एक और ग़ज़ल है जो आजकल के अव्यवस्था भरे माहौल पर तीखा कटाक्ष करती है। शेर देखें -
नए-नए रास्ते निकाल के 
ढूंढ रहे हैं हल सवाल के 
ग्रामसभा से  लौटे हैं वो 
कुछ ताजा मुद्दे उछाल के 
आपके घर के बदलो बंधु 
बूढ़े  कैलेंडर  दीवाल के

कवि कृष्ण बक्षी का गीत गजल की दुनिया में एक लंबा अनुभव रहा है। वे अपनी गजल में जो कुछ कहना चाहा उसे बखूबी कहने की महारत रखी। भाषा भी सरल है, आमबोलचाल की भाषा। इसीलिए कृष्ण बक्षी की गजलें, उसे पढ़ने या सुनने वाले से सीधा संवाद करने की ताकत रखती है। ‘‘चलो ढूंढे जवाब अपने’’ संग्रह की तमाम ग़ज़लें शिल्प के लिहाज़ से मुक़म्मल हैं, विचारों को उद्वेलित करती हैं और पठनीय हैं।
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Saturday, August 8, 2026

टॉपिक एक्सपर्ट | जे कछू आवारागर्दी बढ़त नईं जा रई अपने ई सहर में? | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | पत्रिका | बुंदेली कॉलम

टाॅपिक एक्सपर्ट
जे कछू आवारागर्दी बढ़त नईं जा रई अपने ई सहर में?
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
आजकाल तो कऊं कछू घटे ऊकी रपट तो पांछू लिखाई जाती आए, पैले ऊके वीडियो वायरल होन लगत आएं। ऐसईं पिछली एकई हप्ता में हमें सोसल मीडिया पे दो-चार वीडियो देखबे खों मिल गए। एक वीडियो में चार-छै लड़का एक मोड़ा की धुनाई कर रए हते। दूसरी वीडियो में दो मोड़ियां दो-चार मोड़ों से झगर रईं हतीं, वा बी बीच रोड पे। देखत-देखत में मोड़ा हरें मोड़ियन खों लपाड़े मारन लगे। जोई टाईप की एक औ वीडियो हती जीमें एक मोड़ा रोड कनारे एक मोड़ी खों पीट रओ तो। बा सब देख के हमें लगी के अपने ई सागर में जो का हो रओ? मोड़ियां रस्ता चलत पिट रईं! मनो हमें ज्यादा गम्म नईं खाने परो। काए से के दूसरे दिनां हमें अपने इते की बा वीडियो दिखा गई जीमें एक मोड़ी एक चौराए पे दो-तीन मोड़ों के संगे दिखा रई ती औ ऊके एक हात में छोटी सी तलवार घांई एक हथियार दिखा रओ थो। बा मोड़ी हथियार घुमा-घुमा के बतकाव कर रई हती। हमें लगो के अपने सहर में पिटत भईं दुखियारी मोड़ियां भर नोंई, ऐसी बीरंगनाएं सोई आएं जो खुले में हथियार लए मोड़ों के संगे घूम रईं। जा देख के हमें लगो के कछू ज्यादई स्मार्ट नईं होत जा रओ अपनों सहर। औ रई सई कसर पूरी कर देत आएं तला में कुद्दी मार के मरबे वारे। अब आप सोच रए हुइयो के का हम जेई टाईप की वीडियो देखत रैत आएं? सो ऐसो आए के सोसल मिडिया वारे अपने इते के लोकल चैनल वारे जे दिखात रैत आएं। सो दसा पता परत रैत आए। सो, अपने इते के कानून वारन खों बी जे आवारागर्दी पे तनक लगाम लगाओ चाइए। ने तो कोऊ दिनां कछू बड़ो घटहे तो पछतानों परहे। काए ठीक कई न!
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Thursday, August 6, 2026

बतकाव बिन्ना की | जो बुंदेली की कटक गाथाएं ने पढ़ीं, सो मनो कछू ने पढ़ो | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बतकाव बिन्ना की  
जो बुंदेली की कटक गाथाएं ने पढ़ीं, सो मनो कछू ने पढ़ो
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
      अपने बुंदेलखंड में भौतई पैले से साहित्त रचो जा रओ। इते की कवित्त किसाओं की सो बातई कछू औ ठैरी। इनें सुन के, पढ़ के बांहें फड़कन लगत आएं। इमें बहादुरी की बात जो होत आए। बुंदेला ऊंसई अपनी बहादुरी के लाने जाने जाऊत रहे। बे न मुगलों से डराने औ ने अंग्रेजन से। दोई खों छठी को दूद याद करा दओ रओ। जे ई कोई 12 मीं सताब्दी से 20 मीं सताब्दी लौं खास-खास तीन तरां के बहादुरी के साहित्त रचे गए। जोन में पैलो हतो रासो, दूसरो, कटक औ तीसरो राछरे। बाकी जे तीनोईं मों जबानी गाए जात्ते। बा तो बाद में कछू बिद्वान जनों ने इनखों इकट्ठो के, छपा के इतिहास घांईं पक्को कर दओ। मने लिखे में ले आए। ने तो पैले जे खाली गाए जात्ते। औ जे सोचो के जोन इनको सुनत्तो, ऊको जे याद रै जात्ते औ फेर बा याद रखे वारे गाऊत्ते। जीको साहित्त की भासा में ‘‘वाचिक परम्परा’’ कओ जात आए। माने मों बोले की परम्परा।  
  
बुंदेली की बहादुरी की कवित्त किसां में सबसे फेमस रई जगनिक को लिखों गओ ‘‘आल्हाखंड’’। आज बी ईको बड़े मन से गाओ जात आए। जोन जगनिक ने ‘‘आल्हाखंड’’ लिखो उनईं ने ‘‘विजयपाल रासो’’ सोई लिखो। ‘‘विजयपाल रासो में राजा विजयपाल राठौर के शिकार पे जाबे की किसां आए। होत का आए के राजा विजयपाल राठौर शिकार पे जात आएं औ उते उनें राजा पृथ्वीराज के सैनिक टकरा जात आएं। दोई में भिड़ परत आएं। पृथ्वीराज जा खबर पा के खोखियां जात आए औ कन्नौज पे हमला बोल देत आए। ऊ टेम पे जगनिक जू दोई राजा में सुलह कराबे की कोसिस करत आएं। रासो तो मानों कई ठों लिखी गईं। एक आए ‘वीर सहदेव चरित’। ईको कवि केशवदास ने लिखो रओ। रासो की जेई परंपरा में जोगीदास भांडेरी को ‘दलपत राव रासो’, लाल कवि को ‘छत्र प्रकाश’, कवि सबसुख को ‘‘भगवंत सिंह रासो’’, गुलाब चतुर्वेदी को ‘करहिया का रासो’, श्रीधर को ‘पारीछत रासो’ औ आनंद सिंह कुड़रा को ‘बाघाट रासो’ गिनाएं जा सकत आएं। 
बहादुरी की कबित्त किसां मने कटक गाथाएं सोई रासो एवं राछरे  घांई आएं। इनमें सोई राजा-महाराजा की बहासदुरी की किसां कही गईं। पन्ना के महाराज छत्रसाल के समै पे एक कवि भए जिनको नांव रओ कवि दान। उन्ने जो छत्रसाल जू की बड़वारी में बहादुरी को जो कवित्त रखे आए ऊको नांव आए ‘‘छत्रसाल जू देव कौ कटक बंध’’। ई कटक में महाराज छत्रसाल औ मोहम्मद खान के बीच भए जुद्ध को पूरो विवरन आए। ईमें महाराजा छत्रसाल औ बुंदेली सैनिकों की बहादुरी को बखान करो गओ आए। दतिया के बिद्वान स्व. बाबूलाल गोस्वामी जू ने ‘छत्रसाल जूदेव कटक बंध’ को संपादन करो औ 1992 में भानु प्रिंटर्स दतिया से इको छपाओ।

भग्गी दाऊजू श्याम ने सोई कटक लिखो। साल 1900 में भग्गी दाऊ ने ‘झांसी कौ कटक’ लिखी। ईको 1969 में डॉ. भगवान दास महौर जू ने ‘लक्ष्मी बाई रासो’ के संगे ईको छपाओ। भग्गी दाऊजू श्याम झांसी के जनकवि कहाऊत्ते। उन्ने 1857 की लड़ाई सोई लड़ी रई। जेई से उन्ने ‘झांसी कौ कटक’ में रानी लक्ष्मीबाई की बहादुरी के गुन गाए। बाकी अपने बुंदेलखंड में 1857 से पैले बी अंग्रेजन को तगड़ो विरोध करो गओ रओ। ईको प्रमान ‘‘पारीछत कौ कटक’’ में मिलत आए। ई कटक में जैतपुर के महाराज पारीछत औ अंग्रेजों के बीच भओ जुद्ध को ब्यौरा दऔ गऔ आए। जा जुद्ध 1841 में भओ रओ। बेरमा नदी के किनारे बिलगांव में महाराज पारीछत ने अंग्रेजन खों से जुद्ध कर के उनको मजा चखा दओ रओ। जे बात औ आए के कछू जनों की गद्दारी के मारे राजा पारीछत जीत ने पाए औ पकर के जेल में डार दए गए। उनें बंदी बना के कानपुर की जेल में रखो गओ जां 1853 में उनें फांसी दे दई गई। जो मानो जात आए के ‘पारीछत कौ कटक’ कवि बृजकिशोर ने लिखो रओ। तनक ईकी कछू लकीरें देखो-
कर कूंच जैतपुर से बगौरा में मेले।
चौगान पकर गये मन्त्र अच्छौ खेले।।
बकसीस भई ज्वानन खाँ पगड़ी सेले।
सब राजा दगा दै गये नृप लड़े अकेले।।
कर कुमुक जैतपुर पै चढ़ आऔ फिरंगी।
हुसयार रहो राजा दुनियाँ है दुरंगी।।
जब आन परी सिर पै कोऊ न भऔ संगी।
अर्जन्ट खात जक्का है राजा जौ जंगी।।
एक कोद अर्जन्ट गऔ, एकवोर जन्डैल।
डांग बगोरा की घनी, भागत मिलै न गैल।।

भैरोंलाल को लिखो ‘भिलसांय कौ कटक’ में बघेल राजा ठाकुर रणमत सिंह औ अंग्रेजों के मध्य पुटरा नांव की जांगा 1857 में भए जुद्ध को हाल लिखो गओ आए। ऊ टेम पे, मने 1857 में ठा. रणमत सिंह की रीवा जागीर पन्ना रियासत में आत्ती। रणमत सिंह बघेल क्षत्रिय हते। मनों कोनऊं के लगाई-बुझाई से पन्ना औ रीवा रियासतन में इन गई। सन् 1850 में दोनों रियासतें लड़बे खों ठाड़ी हो गईं मनो अंगरेजन के कारन लड़ाई टल गई। ईके बाद रणमत सिंह जू जागीर छोड़कर अपने कुछ साथियों के संगे सागर आ गए। जां वे अंग्रेजी सेना में भरती हो के लेफ्टिनेंट हो गए। कछू दिनां बाद उने परमोशन पे नौगांव भेज दओ गओ। जां उने केप्टन के बना दओ गओ। तभईं 1857 की लड़ाई छिड़ गई। अंगरेजन ने उने आदेस दओ के बे बुंदेला क्रांतिकारी बख्तबली औ मर्दन सिंह खों पकड़बे को काम करें। मनों रणमत सिंह जू ने ऐसो कछू ने करो औ उन ओरन खों पकरबे के लाने यां-वां भगत फिरबे को ढोंग करत रए। मगर जे बात कां लौं छिपती, सो रणमत सिंह जू औ उनके सिपाइयों को बर्खास्त कर कर दओ गओ। संगे उनकी गिरफ्तारी को आदेश जारी कर दओ गओ। अंग्रेज फौज में रैते भए रणमत सिंह जू ने जेई कोई 300 लोगों की अपनी एक टुकड़ी बना लई रई। सो जब बे ओरे सेना से निकारे गए सो उन सबई ने खुल के बुंदेलन को साथ दओ। मगर अपने इते तो जित्ती बहादुरी की किसां आएं उत्तई धोखा की किसां मिलत आए। मे राणमत सिंह जू खों सोई धोखे से बंदी बना के बांदा जेल भेज दओ गओ। जां उनें 1 अगस्त 1859 को फांसी दे दी गई। जे पूरी किसां ‘‘भिलसांय कौ कटक’ में मिलत आए। 

बुंदेलखंड की कटक खों नओ मंच देबे के लाने 2013 में बॉलीवुड के हीरो औ नाटकों के निरदेशक गोविंद नामदेव जू ने एनएसडी, अथग औ सागर विश्वविद्यालय के संगे मिल के एक वर्कशाप करो। ऊके बाद गोविंद नामदेव जू के डायरेक्सन में, 30 दिसंबर 2013 को लगातार तीन दिनां को मंचन करो। ई कटक में बुंदेला वीर मधुकर शाह बुंदेला की की बीरता को बखान आए। ललितपुर जिला के नाराहट में पैदा भए बुंदेला वीर मधुकर शाह जू ने अंगरेजन के बिरुद्ध बुन्देला विद्रोह छेड़ दओ रओ। बे खूब लड़े। मनों मधुकर शाह खों सोई सोऊत में धोके से पकरवा दओ गओ। उने सागर की बड़ी जेल में रखो गऔ औ ऊतई फांसी दे दी गई। ऊ टेम बे केवल 21 बरस के रए। 

ऐसे बीरन के बारे में लिखो गओ आए कटक। सो इनखों जरूर पढ़ो जाओ चाइए। बाकी बतकाव हती सो बढ़ा गई, हड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हप्ता करबी बतकाव तब तक लौं जेई की जुगाली करो। मनो सोचियो जरूर के अपने बुंदेलखंड को इतिहास कित्तो गजब को आए, बो चाए बहादुरी को होए चाए कटक घांईं साहित्त को होए। सो अपनों जै बुंदेलखंड!!    
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बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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हम सभी को ऐसे तत्वों का सभी मंचों पर सक्रिय विरोध करना चाहिए जो क्षत्रिय समाज व समाज की नारीशक्ति के इतिहास को गलत तरीके से प्रस्तुत कर भ्रांतियां फैलाने का काम करते हैं। - डॉ (सुश्री) शरद सिंह

🚩 "हम सभी को ऐसे तत्वों का सभी मंचों पर सक्रिय विरोध करना चाहिए जो क्षत्रिय समाज व समाज की नारीशक्ति के इतिहास को गलत तरीके से प्रस्तुत कर भ्रांतियां फैलाने का काम करते हैं।" सम्मान समारोह को संबोधित करते हुए मैंने (डॉ सुश्री शरद सिंह ने) मैंने कहा। अवसर था क्षत्रिय महासभा जिला सागर की महिला विंग द्वारा आयोजित क्षत्रिय महिला सम्मान समारोह का।
      🚩जिस समाज में महिलाओं का सम्मान होता है, वह समाज अधिक संगठित, समृद्ध और सुरक्षित बनता है। क्षत्रिय समाज की प्रगति भी नारीशक्ति के सम्मान और सहभागिता पर निर्भर है। अगले वर्ष 101 बेटियों का सामूहिक निशुल्क कन्यादान समारोह आयोजित किया जाएगा।" यह उद्गार क्षत्रिय महासभा जिला सागर की महिला विंग द्वारा आयोजित क्षत्रिय महिला सम्मान समारोह को संबोधित करते हुए वरिष्ठ संरक्षक पूर्व गृहमंत्री, खुरई विधायक श्री भूपेन्द्र सिंह ने व्यक्त किए। 
    🚩 होटल दीपाली के कोहिनूर हॉल में आयोजित इस कार्यक्रम में क्षत्रिय समाज की उन महिला सदस्यों का सम्मान किया जिन्होंने विगत दिनों क्षत्रिय महासभा सागर द्वारा समाज की 21 बेटियों के सामूहिक कन्या विवाह आयोजन में योगदान किया और सक्रिय भूमिका निभाई। 
     कार्यक्रम का आभार क्षत्रिय महासभा जिला सागर की महिला विंग की अध्यक्ष श्रीमती प्रीति सिंह ने किया। मंच संचालन वंदना सिंह ने किया। कार्यक्रम में मंच पर साहित्यकार सुश्री शरद सिंह, श्रीमती प्रमिला सिंह, क्षत्रिय महासभा के अध्यक्ष लखन सिंह, अभिषेक गौर उपस्थित रहे।
🚩इनका हुआ सम्मान 👇

पूर्व गृहमंत्री, खुरई विधायक श्री भूपेन्द्र सिंह ने क्षत्रिय समाज की जिन बहिनों को प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया उनमें डॉ सुश्री शरद सिंह, श्रीमती प्रमिला सिंह, श्रीमती प्रीति सिंह, श्रीमती सीमा ठाकुर बन्नाद, श्रीमती सीता ठाकुर घूघर, श्रीमती नेहा राजपूत बरकोटी, श्रीमती नंदिनी हरिसिंह खुरई, श्रीमती मनीषा सिंह खुरई, श्रीमती रुचि सिंह खुरई, श्रीमती श्रद्धा सिंह सागर, श्रीमती ज्योति चौहान मकरोनिया, श्रीमती अंशु सिंह, श्रीमती ऋतु सिंह ठाकुर, श्रीमती सीमा चौहान, श्रीमती मंजू सिंह महुआखेड़ा, श्रीमती अनीता भरत सिंह केसली, श्रीमती सुमन राजपूत, श्रीमती अर्चना सिंह भैंसा, श्रीमती राजबाला सिंह, श्रीमती रेखा ठाकुर खुरई, श्रीमती अनुपमा राजपूत, श्रीमती साक्षी सिंह भैंसा, श्रीमती रेशु सिंह सागर, श्रीमती रीना बैस सागर, श्रीमती वंदना सिंह, श्रीमती निरुपमा गौर, श्रीमती आरती सिंह बंडा शामिल हैं।
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प्रिय प्रीति सिंह जिस प्रकार तत्परता कर्मठता और उत्साह पूर्वक आयोजन करती हैं तथा समाज की सभी महिलाओं को परस्पर जोड़े रखा है वह प्रशंसा योग्य है। मुझे पूरा विश्वास है कि उनके नेतृत्व में क्षत्रिय महिला समाज निरंतर प्रगति करेगा तथा समाज की महिलाओं में सक्रियता की भावना जागृत होगी।
     आदरणीय भाई साहब भूपेंद्र सिंह जी के निर्देशन में इस अत्यंत सफल एवं ऊर्जावान आयोजन के लिए मैं प्रीति सिंह जी को हार्दिक बधाई देती हूं तथा उनके उज्जवल भविष्य की कामना करती हूं। - डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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