Friday, March 18, 2011
Saturday, March 12, 2011
Tuesday, March 8, 2011
Monday, March 7, 2011
बहस ज़ारी रहेगी......वेश्यावृत्ति को वैधानिक दर्जे पर
मैं उन सभी की आभारी हूं जिन्होंने वेश्यावृत्ति को वैधानिक दर्जे के ज्वलंत मसले की दूसरी कड़ी पर भी अपने अमूल्य विचार व्यक्त किए। कृपया इस चर्चा को यहां स्थगित न मानें, इस पर अपनी अमूल्य राय देते रहें। क्योंकि यह हमारे सामाजिक सांस्कृतिक मूल्यों और वेश्यावृत्ति के नारकीय जीवन जीने को विवश औरतों के भविष्य से जुड़ा मुद्दा है।
अपनी पिछली पोस्ट ‘कुछ और प्रश्न : वेश्यावृत्ति को वैधानिक दर्जे पर ’ में मैंने सांसद प्रिया दत्त की इस मांग पर कि जिस्मफरोशी को वैधानिक दर्जा दिया जाना चाहिए, कुछ और प्रश्न प्रबुद्ध ब्लॉगर-समाज के सामने रखे थे। विभिन्न विचारों के रूप में मेरे प्रश्नों के उत्तर मुझे भिन्न-भिन्न शब्दों में प्राप्त हुए। कुछ ने प्रिया दत्त की इस मांग से असहमति जताई तो कुछ ने सहमति।
डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर ने कहा कि ‘आधुनिक समाज में ये मुद्दे सिर्फ बहस करने के लिए उठाये जा रहे हैं. इस तरह के विषय उठाने वालों का (चाहे वे प्रिय दत्त ही क्यों न हों) कोई सार्थक अर्थ नहीं होता है. इस तरह की समस्या को यदि वैधानिक बना दिया जाए तो घर-घर, गली-गली वैश्यावृत्ति होती दिखेगी.’
sagebob के विचार रहे कि ‘प्रश्न सिर्फ वैश्याओं से जुडा नहीं है,बल्कि इसका असर समाज की दूसरी संस्थाओं पर भी पडेगा. विवाह,परिवार और युवा धन इस से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकेंगे.इसे पर्देदारी में ही चलने दीजिये.न वैश्याओं को न वैश्यागामिओं शराफत का चोला पहनाइए. थाईलैंड जैसे देश का हाल देख लीजिये.हाँ वैश्याओं के उत्थान के लिए बहुत कुछ किया जाना बाकी है.’
संजय कुमार चौरसिया ने लिखा कि ‘एक-एक प्रश्न अपने आप में बहुत मायने रखता है, सभी पर विचार करना बहुत जरूरी है।’
सुरेन्द्र सिंह " झंझट " ने अपनी विस्तृत टिप्पणी में लिखा कि ‘आज जब हम नारी-उत्थान और नारी सम्मान की बातें करते हैं, ऐसे में वैश्यावृत्ति को वैधानिक दर्जा देने का मतलब इसे बढ़ावा देना है | क्या हम इसी तरह नारी सम्मान की रक्षा करेंगे | आज महिलाएं पुरुषों से किसी भी मामले में पीछे नहीं हैं - चाहे वह सेवा हो , व्यवसाय हो , राजनीति हो , साहित्य हो , खेल हो या सेना हो | अगर कहीं इनकी सहभागिता कम है तो प्रयास जारी है कि इनकी सहभागिता बढ़े | दहेज़ उत्पीडन , यौन शोषण एवं आनर किलिंग जैसी विभीषिकाओं से जूझ रही नारी को निजात दिलाने के लिए कार्यपालिका ,न्यायपालिका , स्वयंसेवी संस्थाएं एवं प्रबुद्ध वर्ग प्रयासरत हैं | नारी मात्र भोग की वस्तु नहीं है बल्कि वह माँ,बहन , बेटी ,बहू और अर्धांगिनी जैसे पवित्र संबंधों से सकल श्रृष्टि को पूर्णता प्रदान करने वाली शक्ति है | फिर हम नारी के प्रति किस दृष्टि कोण के तहत वैश्यावृत्ति को वैधानिक दर्जा देने की बात सोच भी सकते हैं ? जो महिलाएं इस क्षेत्र में हैं उनमे से कम से कम ९०प्रतिशत किसी न किसी मजबूरी के कारण नारकीय जीवन जीने को विवश हैं | अगर कोई सार्थक पहल करनी ही है तो कुछ सकारात्मक सोचा जाये | इस पेशे में लगी बुजुर्ग या अधेड़ महिलाओं को स्वावलंबी बनाने के क्रम में रोजमर्रा की जरूरतों वाले सामानों की छोटी-मोटी दूकाने खुलवाई जाएँ | समाज के लोग सामने आकर साहस का परिचय देते हुए मेडिकल जाँच के उपरांत लड़कियों का विवाह करवाएँ | भयंकर बीमारियों से जूझ रही महिलाओं का उचित इलाज कराया जाये | छोटी बच्चियों को इस माहौल से दूर करके प्रारंभिक और ऊंची शिक्षा दिलवाई जाये जिससे वे संभ्रांत समाज की मुख्य धारा में शामिल हो सकें | इनकी बस्तियों से दलालों को दूर किया जाये, न मानने पर दण्डित किया जाये | इनके गलियों-मोहल्लों में अस्पताल , स्कूल , आदि सभी आवश्यक सुविधाएँ उपलब्ध कराई जाएँ | कुल मिलाकर इस दलदल से इन्हें उबारा जाये न कि वैधानिक दर्ज़ा देकर सदा के लिए दलदल में धकेल दिया जाये |’
सुशील बाकलीवाल के विचार से ‘प्रश्न आपके जटिल इसलिये है कि पक्ष व विपक्ष दोनों दिशाओं में उदाहरण सहित काफी कुछ कहा जा सकता है । किन्तु सच यह है कि उन सभी स्त्रियों के हित में जो किसी भी मजबूरी या दबाव के चलते इस धंधे में सिसक रही हैं उनकी इस दलदल से मुक्ति के ठोस उपाय किये जाने चाहिये ।’
'राजेश कुमार ‘नचिकेता’ ने सुशील जी से सहमति प्रकट करते हुए लिखा कि ‘आपका भय अन्यथा नहीं है..... शायद इस कारण भी ये वैधानिक नहीं हुआ है. इस कुरीती को दूर करने के लिए इसका वैधानिक होना बिलकुल जरूरे नहीं है....बल्कि उन्मूलन का प्रयास होना ही बेहतर विकल्प है....किसी भी कुरीति को मान्य बनाना कोई तर्क नहीं हो सकता और ना ही इससे समस्या से निजात पायी जा सकती है...ठीक वैसे ही जैसे की घूसखोरी को वैधानिक बना के इससे नहीं निबटा जा सकता......वैधानिक बनाने के विपक्ष में एक प्रश्न मैं भी जोड़ देता हूँ...."वैधानिक करने से क्या इसे अपना व्यवसाय बनाने वालों को छोट नहीं मिल जायेगी....और अधिक अधिक पुरुष भी आ जायेंगे इस काम में....और मैं मानता हूँ की पुरुषों में इस काम को करने के मजबूरी हो ये काफी मुश्किल जान पड़ता है..."
ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ असमंजस में रहे कि ‘इस सामाजिक को कानूनी जामा पहनाने के विरूद्ध आपके सवाल पढकर मन भारी हो गया, समझ में नहीं आ रहा कि क्या कहूं।’
शिखा वार्ष्णेय ने लिखा कि ‘एकदम सही सवाल उठाये हैं आपने .वेश्यावृति को वैधानिक बना दिया गया तो जायज़ नाजायज़ के बीच की रेखा ही नहीं रह जायेगी।’
ज्ञानचंद मर्मज्ञ के अनुसार ‘आपके सारे सवालों के जवाब बस यही हैं कि वेश्यावृत्ति को संवैधानिक नहीं बनाना चाहिए। यह समाज पर लगा एक ऐसा धब्बा है जिसे मिटाने के लिए सदियां गुज़र जाएंगी फिर भी इंसानियत शर्मसार रहेगी।’
डॉ. श्याम गुप्ता ने कुछ और महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए ‘----किसी कुप्रथा को मिटाने के प्रयत्न की बज़ाय उसे संवैधानिक बनाना एक मूर्खतापूर्ण सोच है...जो मूलतः विदेशी चश्मे से देखने के आदी लोगों की है..
---..आखिर हम सती-प्रथा, बाल-विवाह, बलात्कार, छेड्छाड सभी को क्यों नहीं संवैधानिक बना देते
--आखिर सरकार ट्रेफ़िक के, हेल्मेट के नियम क्यों बनाती है...जिसे मरना है मरने दे...
...जहां तक कानून के ठीक तरह से न पालन की बात है वह आचरण की समस्या है...चोरी जाने कब से असंवैधानिक है पर क्या चोरी-डकैती समाज से खत्म हुई..तो क्या पुनः चोरी को संवैधानिक कर दिया जाय...
...जहां तक कानून के ठीक तरह से न पालन की बात है वह आचरण की समस्या है...चोरी जाने कब से असंवैधानिक है पर क्या चोरी-डकैती समाज से खत्म हुई..तो क्या पुनः चोरी को संवैधानिक कर दिया जाय...
---सही है गैर संवैधानिकता के डर से निश्चय ही समाज में कुछ तो नियमन रहता है...बिना उसके तो ?’
संजय भास्कर भी मानते हैं कि ‘प्रश्न जटिल है जो सिर्फ वैश्याओं से जुडा नहीं है,बल्कि इसका असर समाज की दूसरी संस्थाओं पर भी पडेगा।’
सतीश सक्सेना मानते हैं कि ‘कानूनी जामा पहनना ही उचित है !’उन्होंने अपनी विस्तृत टिप्पणी में लिखा कि ‘इससे इस वर्ग का विकास होगा ! जहाँ तक नाक भौं सिकोड़ने का सवाल है लोगों की मानसिकता कोई नहीं रोक पाया है ! मानव विकास के शुरूआती दिनों से, आदिम काल से यह नहीं रुका है और न रुक सकता ! वेश्याएं समाज में समाज में गन्दगी नहीं फैलाती बल्कि गंदगी रोकने में सहायक है , सवाल केवल यह है कि आप के लिए ( पाठकों ) समाज और परिवार की परिभाषा क्या है !
१. प्रश्न अपने आप में बहुत सीमित है, वहां जाने वाले कौन हैं ..??? इसे समझना होगा !
२. हर एक का अपना निजी समाज होता है और प्रतिष्ठा के मापदंड ही अलग अलग होते हैं ! जरा इसी सन्दर्भ में हिजड़ों के बारे में विचार करें ...३. यह प्रश्न ही असंगत हैं ...यह विशेष वर्ग, अच्छे भले परिवारों में कौन सा सामंजस्य है ....?४. बहुत आवश्यक है ५. मेरे विचार से दोनों अलग अलग क्षेत्र है !आपके उपरोक्त प्रश्नों का उत्तर बेहद जटिल है ! ब्लाक मस्तिष्क से अगर इस पर विचार करेंगे तो इस महत्वपूर्ण विषय के साथ अन्याय ही होगा !’
२. हर एक का अपना निजी समाज होता है और प्रतिष्ठा के मापदंड ही अलग अलग होते हैं ! जरा इसी सन्दर्भ में हिजड़ों के बारे में विचार करें ...३. यह प्रश्न ही असंगत हैं ...यह विशेष वर्ग, अच्छे भले परिवारों में कौन सा सामंजस्य है ....?४. बहुत आवश्यक है ५. मेरे विचार से दोनों अलग अलग क्षेत्र है !आपके उपरोक्त प्रश्नों का उत्तर बेहद जटिल है ! ब्लाक मस्तिष्क से अगर इस पर विचार करेंगे तो इस महत्वपूर्ण विषय के साथ अन्याय ही होगा !’
विजय कुमार सप्पत्ती मानते हैं कि ‘i think that this profession shoul be given legal status only, kam se kam is kaaran se aurato ka shoshan to nahi honga.’
रचना दीक्षित के अनुसार ‘जिस्मफरोशी को संवैधानिक दर्जा देने से वेश्यावृत्ति का उन्मूलन होगा, ये तो हास्यास्पद ही होगा। हाँ इसका समाज पर व्यापक असर होना स्वाभाविक है।’
मनप्रीत कौर ने रचना दीक्षित के विचारों पर सहमति प्रकट की और जिस्मफरोशी को संवैधानिक दर्जा देने की बात का विरोध किया।
अरविन्द जांगिड ने बहुत ही रोचक ढंग से अपने विचार प्रस्तुत करते हुए लिखा कि ‘जिस्म फरोशी को ही यदि सैवेधानिक दर्जा देना है तो फिर चोरी को भी दे दो, लूट खसोट, भ्रष्टाचार, आदि को भी सैवेधानिक दर्जा दे दो. सीधी सी बात है की हमारे वर्तमान समाज के नैतिक पक्ष का तीव्र गति से पतन होता जा रहा है. ये बहुत ही चिंता का विषय है और ये हुआ इसलिए है क्यों की अच्छे लोग अपनी मर्यादा की दुहाई देकर चुप हो जाते हैं, बोलते ही नहीं, बुराई इसलिए जीतती है क्यों की उसका संगठन होता है, और एक नेक व्यक्ति को जब नीलाम किया जाता है तो बाकी नेक व्यक्ति भेड़ बकरियों की तरह बस देखते ही रहते हैं. नेक बात पर लड़ना बिलकुल सही है और हमें इस और प्रयत्न भी करना होगा, अन्यथा यदि समाज के नैतिक पक्ष का पतन यूँ ही होता रहा तो हो सकता है की आने वाले समय में बच्चे शब्दकोश से पता लगाएंगे की "मामा" कहते किसे हैं।’
मुकेश कुमार सिन्हा ने अरविन्द जांगिड के तर्क से सहमति प्रकट करते हुए अपनी राय दी कि ‘जो अपराध की श्रेणी में है, उसको वैसे ही ट्रीट करना बेहतर है...नहीं तो फिर भगवान मालिक है। फिर तो बलात्कारी भी अगर कहे, मैं विवाह करने के लिए तैयार हूं मुझे सज़ा मत दो...क्या ऐसे किसी घृणित कार्य को सहमति दी जा सकती है ? ’
डॉ. अजीत के अनुसार ‘समाज़शास्त्रियों,मनोवैज्ञानिकों के लिए भी यह अभी यह तय करना थोडा मुश्किल काम होगा कि इस आफ्टर मैथ्स क्या रहेंगे कारण भारतीय समाज की संरचना अधिक संश्लिष्ट है। मेरी राय से इसके उन्मूलन के लिए इसको कानून वैद्य करना तार्किक नही होगा इससे और बढावा ही मिलेगी।’
Monday, February 21, 2011
कुछ और प्रश्न : वेश्यावृत्ति को वैधानिक दर्जे पर
-डॉ. शरद सिंह
मैं उन सभी की आभारी हूं जिन्होंने वेश्यावृत्ति को वैधानिक दर्जे के ज्वलंत मसले पर अपने अमूल्य विचार व्यक्त किए।
अपनी पिछली पोस्ट में मैंने सांसद प्रिया दत्त की इस मांग पर कि जिस्मफरोशी को वैधानिक दर्जा दिया जाना चाहिए, ‘वेश्यावृत्ति को वैधानिक दर्जे पर कुछ प्रश्न’ प्रबुद्ध ब्लॉगर-समाज के सामने रखे थे। विभिन्न विचारों के रूप में मेरे प्रश्नों के उत्तर मुझे भिन्न-भिन्न शब्दों में प्राप्त हुए। कुछ ने प्रिया दत्त की इस मांग से असहमति जताई तो कुछ ने व्यंगात्मक सहमति।
सुरेन्द्र सिंह ‘झंझट’ ने स्पष्ट कहा कि ‘सांसद प्रिया दत्त की बात से कतई सहमत नहीं हुआ जा सकता। किसी सामाजिक बुराई को समाप्त करने की जगह उसे कानूनी मान्यता दे देना, भारतीय समाज के लिए आत्मघाती ही साबित होगा ।’ साथ ही उन्होंने महत्वपूर्ण सुझाव भी दिया कि ‘इस धंधे से जुड़े लोगों के जीवनयापन के लिए कोई दूसरी सम्मानजनक व्यवस्था सरकारें करें। इन्हें इस धंधे की भयानकता से अवगत कराकर जागरूक किया जाये।’ अमरेन्द्र ‘अमर’ ने सुरेन्द्र सिंह ‘झंझट’ की बात का समर्थन किया। दिलबाग विर्क ने देह व्यापार से जुड़ी स्त्रियों के लिए उस वातावरण को तैयार किए जाने का आह्वान किया जो ऐसी औरतों का जीवन बदल सके। उनके अनुसार, ‘दुर्भाग्यवश इज्जतदार लोगों का बिकना कोई नहीं देखता ..... जो मजबूरी के चलते जिस्म बेचते हैं उनकी मजबूरियां दूर होनी चाहिए ताकि वे मुख्य धारा में लौट सकें।’ कुंवर कुसुमेश ने देह व्यापार से जुड़ी स्त्रियों की विवशता पर बहुत मार्मिक शेर उद्धृत किया-
उसने तो जिस्म को ही बेचा है, एक फाकें को टालने के लिए।
लोग ईमान बेच देते हैं, अपना मतलब निकलने के लिए।
मनोज कुमार, रचना दीक्षित, ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ एवं विजय माथुर ने ‘वेश्यावृत्ति को वैधानिक दर्जे पर कुछ प्रश्न’ उठाए जाना को सकारात्मक माना।
राज भाटिय़ा ने प्रिया दत्त की इस मांग के प्रति सहमति जताने वालों पर कटाक्ष करते हुए बड़ी खरी बात कही कि -‘सांसद प्रिया दत्त की बात से कतई सहमत नहीं हूं ,और जो भी इसे कानूनी मान्यता देने के हक में है वो एक बार इन वेश्याओं से तो पूछे कि यह किस नर्क में रह रही है , इन्हें जबर्दस्ती से धकेला जाता है इस दलदल में, हां जो अपनी मर्जी से बिकना चाहे उस के लिये लाईसेंस या कानूनी मान्यता हो, उस में किसी दलाल का काम ना हो, क्योंकि जो जान बूझ कर दल दल में जाना चाहे जाये... वै से हमारे सांसद कोई अच्छा रास्ता क्यों नही सोचते ? अगर यह सांसद इन लोगो की भलाई के लिये ही काम करना चाहते हैं तो अपने बेटों की शादी इन से कर दें, ये कम से कम इज्जत से तो रह पायेंगी।’
उसने तो जिस्म को ही बेचा है, एक फाकें को टालने के लिए।
लोग ईमान बेच देते हैं, अपना मतलब निकलने के लिए।
मनोज कुमार, रचना दीक्षित, ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ एवं विजय माथुर ने ‘वेश्यावृत्ति को वैधानिक दर्जे पर कुछ प्रश्न’ उठाए जाना को सकारात्मक माना।
राज भाटिय़ा ने प्रिया दत्त की इस मांग के प्रति सहमति जताने वालों पर कटाक्ष करते हुए बड़ी खरी बात कही कि -‘सांसद प्रिया दत्त की बात से कतई सहमत नहीं हूं ,और जो भी इसे कानूनी मान्यता देने के हक में है वो एक बार इन वेश्याओं से तो पूछे कि यह किस नर्क में रह रही है , इन्हें जबर्दस्ती से धकेला जाता है इस दलदल में, हां जो अपनी मर्जी से बिकना चाहे उस के लिये लाईसेंस या कानूनी मान्यता हो, उस में किसी दलाल का काम ना हो, क्योंकि जो जान बूझ कर दल दल में जाना चाहे जाये... वै से हमारे सांसद कोई अच्छा रास्ता क्यों नही सोचते ? अगर यह सांसद इन लोगो की भलाई के लिये ही काम करना चाहते हैं तो अपने बेटों की शादी इन से कर दें, ये कम से कम इज्जत से तो रह पायेंगी।’
संजय कुमार चौरसिया ने जहां एक ओर देह व्यापार से जुड़ी स्त्रियों की विवशता को उनके भरण-पोषण की विवशता के रूप में रेखांकित किया वहीं साथ ही उन्होंने सम्पन्न घरों की उन औरतों का भी स्मण कराया जो सुविधाभोगी होने के लिए देह व्यापार में लिप्त हो जाती हैं।
गिरीश पंकज ने प्रिया दत्त की इस मांग पर व्यंगात्मक सहमति जताते हुए टिप्पणी की, कि -‘ जिस्मफरोशी को मान्यता देने में कोई बुराई नहीं है। कोई अब उतारू हो ही जाये कि ये धंधा करना है तो करे। जी भर कर कर ले. लोग देह को सीढ़ी बना कर कहाँ से कहाँ पहुँच रहे है(या पहुँच रही हैं) तो फिर बेचारी वे मजबूर औरते क्या गलत कर रही है, जो केवल जिस्म को कमाई का साधन बनाना चाहती है। बैठे-ठाले जब तगड़ी कमाई हो सकती है, तो यह कुटीर उद्योग जैसा धंधा (भले ही लोग गन्दा समझे,) बुरा नहीं है, जो इस धंधे को बुरा मानते है, वे अपनी जगह बने रहे, मगर जो पैसे वाले स्त्री-देह को देख कर कुत्ते की तरह जीभ लपलपाते रहते हैं, उनका दोहन खूब होना ही चाहिये.. बहुत हराम की कमाई है सेठों और लम्पटों के पास। जिस्मफरोशी को मान्यता मिल जायेगी तो ये दौलत भी बहार आयेगी। ये और बात है, की तब निकल पड़ेगी पुलिस वालों की, गुंडों की, नेताओं की. क्या-क्या होगा, यह अलग से कभी लिखा जायेगा। फिलहाल जिस्मफरोशी को मान्यता देने की बात है। वह दे दी जाये, चोरी-छिपे कुकर्म करने से अच्छा है, लाइसेंस ही दे दो न, सब सुखी रहे। समलैंगिकों को मान्यता देने की बात हो रही है...लिव्इनरिलेशनशिप को मान्यता मिल रही है। इसलिए प्रियादत्त गलत नहीं कह रही, वह देख रही है इस समय को।’
संगीता स्वरुप ने एक बुनियादी चिन्ता की ओर संकेत करते हुए कहा कि ‘क़ानून बनते हैं पर पालन नहीं होता ..गिरीश पंकज जी की बात में दम है ...लेकिन फिर भी क्या ऐसी स्त्रियों को उनका पूरा हक मिल पाएगा ? ’
वहीं, राजेश कुमार ‘नचिकेता’ ने बहुत ही समीक्षात्मक विचार प्रकट किए कि -‘ इस काम के वैधानिक करने या ना करने दोनों पक्षों के पक्ष और उलटे में तर्क हैं....वैधानिक होने में बुरी नहीं है अगर सही तरह से कानून बनाया जाए। अगर शराब बिक सकती है ये कह के कि समझदार लोग नहीं पीयेंगे। तो फिर इसमें क्या प्रॉब्लम है....जिनको वहाँ जाना है वो जायेंगे ही लीगल हो या न हो । लीगल होने से पुलिस की आमदनी बंद हो जायेगी थोड़ी। अगर ना हो और उन्मूलन हो जाए तो सब से अच्छा.....वैधानिक न होने की जरूरत पड़े तो अच्छा.....लेकिन देह व्यापार से जुड़े स्त्री-पुरुष के लिए कदम उठाना जरूरी है। ’
संगीता स्वरुप ने एक बुनियादी चिन्ता की ओर संकेत करते हुए कहा कि ‘क़ानून बनते हैं पर पालन नहीं होता ..गिरीश पंकज जी की बात में दम है ...लेकिन फिर भी क्या ऐसी स्त्रियों को उनका पूरा हक मिल पाएगा ? ’
वहीं, राजेश कुमार ‘नचिकेता’ ने बहुत ही समीक्षात्मक विचार प्रकट किए कि -‘ इस काम के वैधानिक करने या ना करने दोनों पक्षों के पक्ष और उलटे में तर्क हैं....वैधानिक होने में बुरी नहीं है अगर सही तरह से कानून बनाया जाए। अगर शराब बिक सकती है ये कह के कि समझदार लोग नहीं पीयेंगे। तो फिर इसमें क्या प्रॉब्लम है....जिनको वहाँ जाना है वो जायेंगे ही लीगल हो या न हो । लीगल होने से पुलिस की आमदनी बंद हो जायेगी थोड़ी। अगर ना हो और उन्मूलन हो जाए तो सब से अच्छा.....वैधानिक न होने की जरूरत पड़े तो अच्छा.....लेकिन देह व्यापार से जुड़े स्त्री-पुरुष के लिए कदम उठाना जरूरी है। ’
इस सार्थक चर्चा के बाद भी मुझे लग रहा है कि कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न अभी भी विचारणीय हैं जिन्हें मैं यहां विनम्रतापूर्वक आप सबके समक्ष रख रही हूं -
1.- यदि जिस्मफरोशी को वैधानिक रूप से चलने दिया जाएगा तो वेश्यावृत्ति को बढ़ावा मिलेगा, उस स्थिति में वेश्यागामी पुरुषों की पत्नियों और बच्चों का जीवन क्या सामान्य रह सकेगा ?
2.- यदि जिस्मफरोशी को वैधानिक दर्जा दे दिया जाए तो जिस्मफरोशी करने वाली औरतों, उनके बच्चों और उनके परिवार की (विशेषरूप से) महिला सदस्यों की सामाजिक प्रतिष्ठा का क्या होगा ?
1.- यदि जिस्मफरोशी को वैधानिक रूप से चलने दिया जाएगा तो वेश्यावृत्ति को बढ़ावा मिलेगा, उस स्थिति में वेश्यागामी पुरुषों की पत्नियों और बच्चों का जीवन क्या सामान्य रह सकेगा ?
2.- यदि जिस्मफरोशी को वैधानिक दर्जा दे दिया जाए तो जिस्मफरोशी करने वाली औरतों, उनके बच्चों और उनके परिवार की (विशेषरूप से) महिला सदस्यों की सामाजिक प्रतिष्ठा का क्या होगा ?
3.- क्या स्त्री की देह को सेठों की तिजोरियों से धन निकालने का साधन बनने देना न्यायसंगत और मानवीय होगा ? क्या कोई पुरुष अपने परिवार की महिलाओं को ऐसा साधन बनाने का साहस करेगा ? तब क्या पुरुष की सामाजिक एवं पारिवारिक प्रतिष्ठा कायम रह सकेगी ?
4.- विवशता भरे धंधे जिस्मफरोशी को वैधानिक दर्जा देने के मुद्दे को क्या ऐच्छिक प्रवृति वाले सम्बंधों जैसे समलैंगिकों को मान्यता अथवा लिव्इनरिलेशनशिप को मान्यता की भांति देखा जाना उचित होगा ?
5.-भावी पीढ़ी के उन्मुक्तता भरे जीवन को ऐसे कानून से स्वस्थ वातावरण मिलेगा या अस्वस्थ वातारण मिलेगा ?
Friday, February 11, 2011
वेश्यावृत्ति को वैधानिक दर्जे पर कुछ प्रश्न
- डॉ. शरद सिंह
3-जो वेश्याएं इस दलदल से निकलना चाहती हैं, उनके मुक्त होने के मनोबल का क्या होगा ?
4-जहां भी जिस्मफरोशी को वैधानिक दर्जा दिया गया वहां वेश्याओं का शोषण दूर हो गया ?
5- क्या वेश्यावृत्ति के कारण फैलने वाले एड्स जैसे जानलेवा रोग वेश्यावृत्ति को संरक्षण दे कर रोके जा सकते हैं ?
6- क्या इस प्रकार का संकेतक हम अपने शहर, गांव या कस्बे में देखना चाहेंगे?
7- अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुसार विष्व में लगभग 60 लाख बाल श्रमिक बंधक एवं बेगार प्रथा से जुड़े हुए है, लगभग 20 लाख वेश्यावृत्ति तथा पोर्नोग्राफी में हैं, 10 लाख से अधिक बालश्रमिक नशीले पदार्थों की तस्करी में हैं। सन् 2004-2005 में उत्तरप्रदेश, छत्तीसगढ़, कर्नाटक आदि भारत में सेंटर फॉर एजुकेशन एण्ड कम्युनिकेशन द्वारा कराए गए अध्ययनों में यह तथ्य सामने आए कि आदिवासी क्षेत्रों तथा दलित परिवारों में से विशेष रूप से आर्थिकरूप से कमजोर परिवारों के बच्चों को बंधक श्रमिक एवं बेगार श्रमिक के लिए चुना जाता है। नगरीय क्षेत्रों में भी आर्थिक रूप से विपन्न घरों के बच्चे बालश्रमिक बनने को विवश रहते हैं।
"भारतीय दंडविधान" 1860 से "वेश्यावृत्ति उन्मूलन विधेयक" 1956 तक सभी कानून सामान्यतया वेश्यालयों के कार्यव्यापार को संयत एवं नियंत्रित रखने तक ही प्रभावी रहे हैं। जिस्मफरोशी को कानूनी जामा पहनाए जाने की जोरदार वकालत करते हुए कांग्रेस सांसद प्रिया दत्त ने मंगलवार को कहा कि यौनकर्मी भी समाज का एक हिस्सा हैं और उनके अधिकारों की कतई अनदेखी नहीं की जा सकती।
प्रिया दत्त ने कहा कि जिस्मफरोशी को वैधानिक दर्जा दिया जाना चाहिए, ताकि यौनकर्मियों की आजीविका पर कोई असर नहीं पड़े। मैं इस बात की वकालत करती हूँ। उन्होंने कहा कि जिस्मफरोशी को दुनिया का सबसे पुराना पेशा कहा जाता है। यौनकर्मियों की समाज में एक पहचान है। हम उनके हकों की अनदेखी नहीं कर सकते। उन्हें समाज, पुलिस और कई बार मीडिया के शोषण का भी सामना करना पड़ता है। उत्तर-मध्य मुंबई की 44 वर्षीय कांग्रेस सांसद ने कमाठीपुरा का नाम लिए बगैर कहा कि देश की आर्थिक राजधानी के कुछ रेड लाइट क्षेत्रों में विकास के नाम पर बहुत सारे यौनकर्मियों को बेघर किया जा रहा है।
प्रिया दत्त की इस मांग पर कुछ प्रश्न उठते हैः-
1-क्या किसी भी सामाजिक बुराई को वैधानिक दर्जा दिया जाना चाहिए ?
2-क्या वेश्यावृत्ति उन्मूलन के प्रयासों को तिलांजलि दे दी जानी चाहिए ?
3-जो वेश्याएं इस दलदल से निकलना चाहती हैं, उनके मुक्त होने के मनोबल का क्या होगा ?
4-जहां भी जिस्मफरोशी को वैधानिक दर्जा दिया गया वहां वेश्याओं का शोषण दूर हो गया ?
5- क्या वेश्यावृत्ति के कारण फैलने वाले एड्स जैसे जानलेवा रोग वेश्यावृत्ति को संरक्षण दे कर रोके जा सकते हैं ?
6- क्या इस प्रकार का संकेतक हम अपने शहर, गांव या कस्बे में देखना चाहेंगे?
7- अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुसार विष्व में लगभग 60 लाख बाल श्रमिक बंधक एवं बेगार प्रथा से जुड़े हुए है, लगभग 20 लाख वेश्यावृत्ति तथा पोर्नोग्राफी में हैं, 10 लाख से अधिक बालश्रमिक नशीले पदार्थों की तस्करी में हैं। सन् 2004-2005 में उत्तरप्रदेश, छत्तीसगढ़, कर्नाटक आदि भारत में सेंटर फॉर एजुकेशन एण्ड कम्युनिकेशन द्वारा कराए गए अध्ययनों में यह तथ्य सामने आए कि आदिवासी क्षेत्रों तथा दलित परिवारों में से विशेष रूप से आर्थिकरूप से कमजोर परिवारों के बच्चों को बंधक श्रमिक एवं बेगार श्रमिक के लिए चुना जाता है। नगरीय क्षेत्रों में भी आर्थिक रूप से विपन्न घरों के बच्चे बालश्रमिक बनने को विवश रहते हैं।
वेश्यावृत्ति में झोंक दिए जाने वाले इन बच्चों पर इस तरह के कानून का क्या प्रभाव पड़ेगा ?
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