Tuesday, July 11, 2023

पुस्तक समीक्षा | कुंजीदाऊ की शादी की 50 वीं वर्षगांठ | समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह

व्यंग्यकार श्री आर के तिवारी के व्यंग संग्रह "कुंजीदाऊ की शादी की 50 वीं वर्षगांठ" की मेरे द्वारा की गई समीक्षा ...
हार्दिक आभार युवाप्रवर्तक ए्ंव भाई देवेंद्र सोनी जी 🙏

पुस्तक समीक्षा | बाल साहित्य को समृद्ध करतीं बाल कविताएं | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

प्रस्तुत है आज 11.07.2023 को  #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई  कवि बृंदावन राय के काव्य संग्रह "बाल कविताओं का उपवन" की समीक्षा... 
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पुस्तक समीक्षा
बाल साहित्य को समृद्ध करतीं बाल कविताएं
- समीक्षक डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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काव्य संग्रह - बाल कविताओं का उपवन
कवि       - बृंदावन राय सरल
प्रकाशक  - शाॅपीज़ेन, 201, अश्वमेघ एलीजेंस-2, अम्बावडी मुख्य बाज़ार, कल्याण ज्वेलर्स के समीप, अम्बावडी, अहमदाबाद, गुजरात -380006
मूल्य       - 227/-
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    कवि बृंदावन राय सरल एक अरसे से साहित्य सृजन के क्षेत्र में हैं। उन्होंने बड़ों के लिए दोहा, चौपाई ग़ज़ल आदि लिखे हैं। साथ ही उन्होंने बच्चों लिए भी साहित्य सृजन किया है। बच्चों के लिए लिखना आसान नहीं होता है। एक बाल साहित्यकार के लिए प्राथमिक शर्त यही होती है कि वह बाल मनोविज्ञान को समझता हो और बच्चों के अनुरुप लिखने की क्षमता रखता हो। कवि सरल ने बालसृजन को बखूबी साधा है।

वयस्क जब अपने जीवन में उलझ जाते हैं तो उनसे जाने-अनजाने बच्चों की उपेक्षा होने लगती है। ठीक यही स्थिति साहित्य के क्षेत्र में है। हिन्दी साहित्य में बाल साहित्य का अपना विशेष स्थान रहा है। लेकिन जब यथार्थवादी लेखन का दौर आया तो पराग, चंपक, चंदामामा जैसी कुछ पत्रिकाएं थीं जिन्होंने बाल साहित्य को उसके मौलिक स्वरूप में बचाए रखा तथा कई प्रसिद्ध रचनाकारों को बाल साहित्य सृजन करने के लिए प्रेरित किया। फिर भी साहित्य की मूलधारा में बाल साहित्य गौण होता चला गया। एक स्थिति तो यह भी आई कि बाल साहित्य के रचनाकारों को साहित्यकारों की श्रेणी में गिने जाने से भी परहेज किया जाने लगा। जबकि बाल साहित्य वयस्क साहित्य की नींव है। यहां वयस्क साहित्य का अर्थ ‘‘ए-क्लास’’ अथवा ‘‘मात्र वयस्कों के लिए’’ लिखे जाने वाले कामुक अथवा थ्रिलर साहित्य से नहीं है। यहां वयस्क साहित्य का अर्थ है वह साहित्य जो बालमनो श्रेणी से से ऊपर की आयु के व्यक्तियों को ध्यान में रख कर लिखा गया हो। वहीं बाल साहित्य 12-14 वर्ष तक की आयु के बच्चों के लिए लिखा जाता है। बालसाहित्य का उद्देश्य होता है कि किस्से, कहानियों, कविताओं, नाटकों आदि के माध्यम से बच्चों को शिक्षाप्रद बातें बताई जाएं। ठीक वैसे ही जैसे खेल-खेल में शिक्षा देना। इसीलिए गद्य में छोटे-छोटे सरल संवाद और कविताओं में तुकबंदी प्रधान छोटी-छोटी पंक्तियों को अपनाया जाता है। इससे बच्चे उन्हें आसानी से समझ सकते हैं, गुनगुना सकते हैं, याद रख सकते हैं। इसका सबसे श्रेष्ठ और बहुप्रचलित उदाहरण है-‘‘मछली जल की रानी है/ जीवन जिसका पानी है/हाथ लगाओ डर जाएगी/ बाहर निकालो मर जाएगी।’’ इन चार पंक्तियों में मछली के बारे में पूरी जानकारी दे दी गई है। यही सहजता, सरलता एवं उपादेयता बच्चों के लिए आवश्यक होती है।

कवि बृंदावन राय सरल के काव्यसंग्रह ‘‘बाल कविताओं का उपवन’’ बालपाठकों को ध्यान में रख कर ही लिखा गया है। इस संग्रह की भूमिका डॉ. विकास दवे ने लिखी है जो कि निदेशक, साहित्य अकादमी, मध्यप्रदेश शासन, भोपाल हैं। डाॅ. दवे ने संग्रह की कविताओं पर टिप्पणी करते हुए लिखा है कि ‘‘सभी रचनाएं एक ओर बच्चों को सृष्टि से जोड़ने का काम करेंगी वही राष्ट्रीय चेतना से जुड़े विषय बच्चों को अपने देश के सरोकारों से जोड़ने का काम करेंगे।’’
इस संग्रह की कविताओं की सबसे बड़ी विशेषता ये है कि उन्होंने उन विषयों को भी अपनी कविताओं में पिरोया है जो प्रायः छूट जाती हैं। संग्रह में भाषाई सरलता और सहजता के साथ विभिन्न विषयों को काव्य के रूप में प्रस्तुत किया हैै। जैसे ‘‘घड़ी’’ शीर्षक कविता में घड़ी की महत्ता को बताया है-
टिक टिक करती घड़ी हमारी।
अब भी हमको लगती प्यारी।
पल-पल का ये समय बताती।
मर्म समय का हमें सिखाती।
भिन्न-भिन्न आकार है इसके।
भिन्न भिन्न श्रृंगार हैं इसके।
इसमें तीन मिलेंगे कांटे।
अपने-अपने काम जो बांटे।
छोटा मुख्य समय बतलाए ।
बड़ा मिनट का पता दिखाए।
इसमें एक और है कांटा।
जो सैकिंड से हमें मिलाएं।

इसी तारतम्य में एक महत्वपूर्ण कविता है-‘‘मजदूर’’। आमतौर पर बालसाहित्य में मजदूरों पर बहुत कम लिखा जाता है। मजदूरों का जीवन वर्णन बड़ों के लिए पठनीय साम्रगी माना जाता है। किन्तु कवि सरल ने मजदूरों की दशा-दिशा पर ज्ञानवर्द्धक कविता लिखी है-
गांवों में जो सड़क बनाते।
नहरों से जो खेत सजाते।
खेतों से जो फसल काटते।
गड्ढे पथ के रोज पाटते ।
रोज पार्क में पानी देते।
पत्थर पर भी जो सो लेते।
एक बार जो दिन में खाते ।
फिर भी दिन भर जो मुस्काते।
ये सब ही मजदूर कहाते।
शहर गांव को स्वच्छ बनाते।
इनसे है शहरों में रौनक ।
इनसे है कस्बों में रौनक ।
इन पर निर्भर शहरी जीवन।
इनपर निर्भर शहरी साधन।
आओ इनको गले लगाएं।
इनको अपना मित्र बनाएं

इस प्रकार की कविताएं बालमन को जहां जीवन की विविधता से जोड़ती हैं, वहीं समाज में उपेक्षित वर्ग के प्रति सहानुभूति एवं सम्मान का बीज बोने का काम करती हैं। कवि सरल ने दैनिक जीवन में स्वच्छता के महत्व को बताने के लिए ‘‘बाथरूम’’ शीर्षक से बाथरूम एवं शौचालय पर भी कविता लिखी है जो आम बालकविताओं से हट कर नूतनता की परिचायक है-
बाथरूम हो घर का सुंदर।
साफ स्वच्छ हो जिसका परिसर ।
नल बिजली की सुविधाएं हों।
शौचालय की सुविधाएं हों।
पानी की मत हों बाधाएं।
फब्बारे की हों सुविधाएं ।
बदबू हरगिज तनक न आए।
ऐसी सभी व्यवस्था पाएं।
बाथरूम हो घर का सुंदर ।
साथ स्वच्छ हो जिसका परिसर ।
खिड़की शुद्ध हवा को हो इक।
गर्म पानी का भी हो नल इक।
बाथरूम हो इतना सुंदर ।
साफ स्वच्छ हो जिसका परिसर ।

बच्चों को उनकी बाल्यावस्था से ही यातायात के नियमों से परिचित कराना, यातायात सिग्नल्स की लाल एवं हरी लाईट्स का अर्थ समझाना आवश्यक होता है, जिससे वे स्कूल के लिए अकेले जाते समय तथा बड़े हो कर यातायात नियमों का पालन करें और स्वयं को सुरक्षित रखें। ‘‘बत्ती...सिग्नल....’’ कविता यातायात के बुनियादी नियम को सरल एवं रोचक शब्दों में समझाती है-
चौराहों पर बत्ती जलती।
जिससे कारें रुकती बढ़ती।
जो इनके नियमों को तोड़े।
पुलिस से अपना नाता जोड़े।
हरी का मतलब है बढ़ जाना।
लाल का अर्थ यहां रुक जाना।
इनसे नहीं हादसा होते ।
दुख से नहीं सामना होते ।
जनहानि से हम बच जाते।
यह सब नियम अगर अपनाते ।

कवि बृंदावनराय सरल पर्यावरण और जीव-जन्तुओं के प्रति बच्चों में जागरूकता लाना चाहते हैं। उनकी कविता ‘‘सांप’’ इसी बात की द्योतक है कि सांप भी प्रकृति का अभिन्न अंग है। प्राणिजगत में उनका भी विशेष स्थान है। इस कविता में कवि ने सांपों के प्रकार तथा उनके पाए जाने वाले स्थानों को भी लक्षित किया है। इस कविता की कुछ पंक्तियां देखें-
अद्भुत अद्भुत सांप धरा पर ।
खेतों वन में रहते अक्सर।
जहरीले भी सभी न होते।
ये भी हँसते ये भी रोते।
आपस में ही इनमें अंतर ।
खेत वनों में रहते अक्सर ।
सांप कोबरा अति जहरीला ।
जिसको डसता होता नीला।
सबसे बढ़कर होता अजगर ।
ये जंगल में रहते अक्सर ।
घर में कभी कभी आ जाते।
पानी में भी इनको पाते।

  इस तरह देखा जाए तो कवि बृंदावन राय सरल की कविताओं में विषय की विविधता के साथ ही विषय के चयन में अनूठापन भी है जो उनके इस संग्रह को महत्वपूर्ण बनाती है। ऐसे समय में जब बच्चों के लिए मौलिक साहित्य कम लिखा जा रहा है,‘‘बाल कविताओं का उपवन’’ का प्रकाशित होना स्वागत योग्य है। बालोपयोगी पुस्तक के अनुरुप मुद्रण एवं साज-सज्जा आकर्षक है। कुल इक्यावन बाल कविताओं का यह संग्रह कवि के बालसृजन के प्रति आश्वस्त करता है।
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Sunday, July 9, 2023

Article | Mixing Of New & Old Can Make Us Eco Friendly| Dr (Ms) Sharad Singh | Central Chronicle

"समारोहों में दोना,पत्तल और कुल्हड़ को अपनाकर आसानी से बन सकते हैं इकोफ्रेंडली।" ⤵️
Article
Mixing Of New & Old Can Make Us Eco Friendly
        .. -    Dr (Ms) Sharad Singh
Writer, Author & Social Activist
Blogger - "Climate Diary Of Dr (Ms) Sharad Singh"
 
Modernity is a good thing. But being modern does not mean giving up everything that was good in our past. Artificial facilities cannot give us the health and happiness that natural facilities give us. We have to stop and think that what we are leaving is it worth leaving everything? And in the race of modernity, what we are adopting blindly is it all worth adopting? When we consider both these aspects, we will find a third way that we can improve our life, our environment and the future of our climate by combining the new and the old. So think twice before becoming a toy in the hands of modernity. Don't put environment and climate at stake but be eco friendly.
  
It is the rainy season when nature comes to our house to meet us. Grass sprouts sprout from between the flore tiles of the courtyard. Where the water stops, the moss settles there. Rain brings with it the beauty of nature like a guest. The coming of rain after the scorching heat is as pleasant as the feeling of happiness after sorrow. So when nature itself has come to our house, then we should make it a friend forever. Actually nature itself knocks at the door of the heart. In this context, let me tell you an incident. It so happened that I went to a tea-bar to drink tea recently. There tea is served in an earthen kulhad. Eco friendly as well as hygienic. After drinking tea, the kulhads are thrown in the waste bin. I was also going to throw away my kulhad terracotta mug after drinking tea that suddenly I felt that this is a very useful thing. I wrapped it in a paper napkin. I brought it home and washed it thoroughly. Then made a small hole in its bottom. Now that kulhad has turned into a small pot. I filled some soil in it and cut a small branch of money plant and planted in it. It just became a tiny pot with greenery. I have kept it decorated on the center table of my living room. When I shared the picture of my little pot on social media, many people liked it. Many people were also inspired by this. Then I shared my thoughts on my social media that- "If you love nature, then nature has also found a way to reach you".

Just imagine that if that tea had been given to me in a plastic glass, I would not have thought of taking it home and planting a plant in it. I casually throw it in the waste bin. When the garbage collector comes from the waste bin, he takes that plastic glass along with the garbage. If the glass did make it to the dumping ground without getting blown up and thrown around, it would be sorted out and sent to the recycling pile. Before he got a new life, if he had reached somewhere else by flying or falling, he would have choked the drain somewhere and would have spread pollution somewhere. Whereas if I had not brought that clay glass home and thrown it in the waste bin, even then it would have been of great use. That is, when it was dumped in the garbage cart, it would break down, melt and mix with the ground and then become soil. That soil proves useful in all its forms. If nothing else, it would have helped the little grass to grow. The biggest thing is that it does not choke any drain nor does it spread any kind of pollution. That is, just think that instead of plastic items, we have traditional very good items which we can reduce the harm caused by plastic by bringing them in our daily use.
Recently an important thing was seen, that too in a wedding reception. Pattal means the dinner plate which is made from leaves. When plastic and melamine dinner plates and buffets were not in vogue in our country, food was served in leaves at weddings, ceremonies etc. Over time, the work of making plates was also done with machines and a beautiful and useful dinner plates started being made. But melamine plates made it obsolete. It is true that metal or melamine plastic plates can be washed and used over and over again and are manageable for caterers but the flip side is dangerous. If carelessness is taken in washing them, then no one can save the guests from infection and stomach diseases. On the other hand, dinner plates made of leaves are use and throw. That's why there is no fear of spreading diseases from them. They are easily disposed of in the garbage. Yes, so I was telling that I had the opportunity to eat on a dinner plate made of leaves in a wedding reception last day. The theme of that marriage was Countryside theme. And so the event organizer and the caterers came up with a beautiful way to have a great dinner. Tables were placed in rows at the dining place, on which food could be served by placing leaves plates. The arrangement was half buffet and half traditional 'Pangat'. Means buffet style dinner was to be done while standing but on plates made of leaves. Those plates were being kept in a dustbin after use. About whom the catering person told that they would take these plates of leaves to a farm where they would be composted. I was very happy to see and hear all this. This is the right innovation to make it eco-friendly by mixing tradition with innovation.
In both these incidents mentioned above, two things are worth thinking that when we use clay items instead of plastic disposable items, then we will feel the need to take care of the soil. We will focus on maintaining the quality of the soil. Will prevent soil erosion. And we will introduce our new generation to the uses of soil which our forefathers adopted for generations and we left them in the name of modernity. Similarly, when we promote leaf plates and bowls, it will provide employment to the villagers who make these things, as well as we will feel the importance and need of trees. For example, in the Bundelkhand region of North India, double-leaf plates are made from teak leaves. While teak trees are also used as wood for making furniture. Although the work of forest conservation is done by the government, but thieves illegally cut teak from the forests and take it away. When teak leaves are also used on a large scale, the number of people saving those trees will also increase. Due to this, while on one hand the cities will be saved from plastic pollution, on the other hand the forests will be saved from illegal felling.  Two works will be done by one hand.
So, think about it that by mixing of new and old we can protect our environment and climate for our new generation. Nothing beats eco friendly innovations and inventions for our safe future.
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 (09.07.2023)
#climatechange  #MyClimateDiary 
#UNClimateChange 
#savetheearth  #nature 
#CentralChronicle
#DrMissSharadSingh

Friday, July 7, 2023

ट्रैफिक समस्या से जूझता मकरोनिया - डॉ (सुश्री) शरद सिंह

आज "पत्रिका" समाचारपत्र में 'शहर की समस्या' के संदर्भ में मकरोनिया उपनगर की सबसे बड़ी समस्या पर मेरे विचार... 
हार्दिक धन्यवाद #पत्रिका एवं आभार प्रिय Reshu Jain 🙏😊🌹
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ट्रैफिक समस्या से जूझता मकरोनिया
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
   वरिष्ठ साहित्यकार, सागर
      
    सागर का मकरोनिया क्षेत्र एक तेजी से बढ़ता उपनगर है। यहां मॉल्स हैं, शोरूम्स हैं, प्रतिष्ठित कंपनियों के आउटलेट्स हैं, बड़े-बड़े होटल्स तथा शादीघर हैं। यहां एजुकेशन हब है।  कॉलोनियों का एक संजाल विकसित हो चुका है। बस, यदि किसी चीज का सबसे बड़ा अभाव है तो, वह है सुचारु ट्रैफिक व्यवस्था का। मकरोनिया का मुख्य चौराहा जो 'मकरोनिया तिगड्डा' के नाम से भी जाना जाता है, वस्तुतः अब वहां पांच सड़कों का मेल है। एक शहर की ओर, दूसरी रेलवे स्टेशन की ओर, तीसरी नरसिंहपुर रोड, चौथी जबलपुर व दमोह  रोड और पांचवीं बटालियन रोड। पांच सड़कों के संगम के कारण यह अत्यंत व्यस्त चौराहा है। लेकिन अफ़सोस है कि यहां ट्रैफिक लाईट्स तक सही ढंग से नहीं लगी हैं। अकसर ट्रैफिक लाईट्स बंद रहती हैं और जब चालू हालत में रहती है तो वाहनचालकों को सिग्नल समझने में परेशानी होती है। सड़कों के दोनों ओर गाड़ियां भी बेतरतीब ढंग से दो-तीन लेयर में पार्क की जाती है जिससे लगभग आधी सड़क यातायात के लिए बचती है और वाहनों की अधिकता के दबाव के चलते वाहनों के बीच छोटी-मोटी टक्कर लगभग रोज ही होती रहती है। ट्रैफिक की इस समस्या को हल करने के लिए सिर्फ़ दो क़दम उठाने की ज़रूरत है- पहला क़दम कि चौराहे पर यातायात की स्थिति को देखते हुए किसी अर्बन ट्रैफिक एक्सपर्ट से सलाह लेकर पांचों सड़कों के लिए अलग-अलग ट्रैफिक सिगनल्स लगाए जाएं। और, दूसरा कदम है कि पांचों रास्तों पर अतिक्रमण तथा गाड़ियों का बेतरतीब खड़ा किया जाना बंद कराया जाए। इससे आए दिन होने वाली सड़क दुर्घटनाओं में कमी आएगी और मकरोनिया क्षेत्र यातायात के लिए सुरक्षित हो सकेगा।
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#डॉसुश्रीशरदसिंह #DrMissSharadSingh #sagarcity #makronia #सागर #मकरोनिया #शहरकीसमस्या #यातायातसमस्या #TrafficProblem

DIY प्लांटर 🌱- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

मित्रो, आपको एक प्यारे से पौधे के साथ एक प्यारी सी सुबह की एक प्यारी सी #goodmorning  ❤️🌱😊 .... इस पौधे के प्लांटर की यानी गमले की एक दिलचस्प कहानी है 🤪 चलिए आपको सुनाती हूं हुआ यह कि मैं एक ☕Tea Bar में चाय पीने गई चाय पीने के बाद चाय का कुल्हड़ मैं फेंकने ही वाली थी कि अचानक मुझे लगा यह तो बड़ी दिलचस्प चीज़ है ... और मैंने पेपर नैपकिन में लपेट कर उसे रख लिया 🤷 घर में लाकर उसे अच्छे से धोया ... उसके तले में एक छोटा-सा छेद किया.. थोड़ी-सी मिटटी भरी और लगा दिया यह मनी प्लांट का पौधा....🌱🦉🌱 तो ये है मेरे मिनी प्लांटर की कहानी ... और अब यह मेरे ड्राइंग रूम के सेंटर टेबल पर ठाट से विराजमान है ❤️🌱😄🤩🥰
🚩 मेरा Morning विचार : यदि आपको प्रकृति से प्यार है तो प्रकृति भी आपके पास पहुंचने का रास्ता ढूंढ ही लेती है 😍

Friends, a lovely morning to you with a lovely plant #goodmorning ❤️🌱😊 .... There is an interesting story about the planter of this plant i.e. the pot 🤪 Let me tell you that I am a ☕Tea  After drinking tea I was about to throw away the tea pot that suddenly I felt it is very interesting thing... and I wrapped it in paper napkin and kept it 🤷 brought it home and washed it well..  .. made a small hole in its base.. filled some soil and planted this money plant plant....  Sitting gracefully on the center table ❤️🌱😄🤩🥰
🚩 My Morning Thought: If you love nature then nature also finds a way to reach you.


#डॉसुश्रीशरदसिंह #DrMissSharadSingh #प्रकृति #मनीप्लांट  #गमला #nature #beautifulnature #miniplanter #moneyplant  #Aureum  #Epipremnumaureum  
#beautifulday #pederbhelland

Thursday, July 6, 2023

बतकाव बिन्ना की | नांव में का रक्खो ? | डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम | बुंदेली व्यंग्य | प्रवीण प्रभात

😲शरद पवार, शरद जोशी, शरद सक्सेना, शरद सिंह, शरदचंद्र ....ये 'नांव' यानी नाम ही तो हैं... फिर लफड़ा क्या है...ज़रा सोचिए?🤪🙃😜
"नांव में का रक्खो ?" - मित्रो, ये है मेरा बुंदेली कॉलम "बतकाव बिन्ना की" साप्ताहिक #प्रवीणप्रभात , छतरपुर में।
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बतकाव बिन्ना की  
नांव में का रक्खो ?          
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
         ‘‘आओ शरद बिन्ना, आओ पधारो!’’ भैयाजी ने मोए देखतई साथ कई। उनको कैबो को टोन सुन के मोय बड़ो बुरौ लगो।
‘‘जे ऐसे ताना सो काय मार रए, भैयाजी? मैंने आपके कौन से खेत पटा लए?’’ मोय बी कै आई।
‘‘अरे, हम तुमाए लाने ताना नोई मार रए, हम तो तुमाओ स्वागत कर रए।’’ भैयाजी बोले।
‘‘जो कोन टाईप को स्वागत आए? लट्ठ-सी दे रए औ कै रए के परघा रए। मोरो आनो बुरो लग रऔ होय सो सूधी बोलो, कभऊं ने आबी।’’ मैंने भैयाजी से कई। मोय बुरौ लग रओ हतो औ संगे रोबो सोई आन लगो। भैयाजी से ऐसी उम्मींद ने हती।
‘‘अरे बिन्ना, तुम तो बुरौ मान गईं। सच्ची, रामधई! हम तुमें ताना नोई मार रए हते।’’ भैयाजी तनक घबड़ात भए बोले।
‘‘सो जे का हतो- शरद बिन्ना, पधारो- जो का हतो? ऐसे सो आप कभऊं नईं पधरात आएं मोए, फेर आज ऐसो काय कओ?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘चलो बैठो, तनक ठंडो पानी पियो! अपनो मुण्डा ठंडो करो, फेर हम तुमें बता रए।’’ भैयाजी बोले।
‘‘नईं, पैले आप मोय बताओ, ने तो मोय नईं बैठने आपके इते।’’ सच्ची मोय भौतई गुस्सा आ रओ हतो।
‘‘अच्छा चलो सुनो! बात का आए के आजकाल चाय टीवी होय, के अखबार होय, सबई में शरद पवार की खबरें दिखा रईं। मनो शरद नांव को डंका बज रओ।’’ भैयाजी बोले।
‘‘उनको काय को डंका? कच्चे में बिंधे दिखा रए शरद पवार दद्दा!’’ मैंने कई।
‘‘डंका माने बाजे सो बज रए अब चाय सूधे बाजे होंए चाय उल्टे वारे। बाजे बजत सुनाई सो पड़ रए। औ रई चाचा-भतीजा की रार, सो बा तो अपने देस में हमेसई से होत रई आए। मनो शरद पवार को नांव सुन के मोय ई नांव के कुल्ल जने याद आ गए।’’ भैयाजी बोले।
‘‘कोन-कोन को नांव याद आ गओ?’’ मैंने पूछी।
‘‘बाद में बताबी, पैले जे तो देखो के अपने प्रफुल्ल पटेल भैया कां बोल गए।’’ भैयाजी बोले।
‘‘का बोलो उन्ने?’’ मैंने पूछी।
‘‘काय तुमने टीवी नई देखी?’’ भैयाजी  ने मोसे पूछी।
‘‘नईं, न्यूज नई देखी। बाकी एक सीरियल को विज्ञापन जरूर देखो। अच्छो नईं लगो हमें।’’ मैंने भैयाजी से कई।
‘‘कौन सो विज्ञापन?’’
‘‘बा धारावाहिक को नांव बरसात या बरसातें कछू ऐसई रओ, बाकी ऊके विज्ञापन में हीरो ऐसो ऐंडू दिखाओ गओ आए के ने पूछो। बा हीरो पानी बरसत में बिना छत्ता के सड़क पे चल रओ, वा बी ऐसो के बाजू से गुजरन वालों को ऊके चलबे से धक्का लग रओ। औ इत्तई नईं, बा ऊकी हिरोईन एक टैक्सी रुकात आए औ अपनो छाता बंद कर के टैक्सी में बैठ पाए के ईके पैले बा हीरो टैक्सी में घुस जात आए औ अपनो हात बढ़ा के हिरोईन को छाता फेर के खोल के टैक्सी ले के चलो जात आए। मनो, मोय जे समझ में ने आई के जे धारावाहिक वारे दिखन का चात आएं? अरे, बात तो जे होती के हीरो हिरोईन के लाने टैक्सी रुकातो, ने तो अपनी टैक्सी हिराईन खों दे देतो और खुद खड़ो भींगत रैतो। बाकी ऊको ई टाईप से भींगत देख के हिराईन ऊको अपने संगे चलबे को आॅफर दे देती। मनो जे तो लुगवा हरों खों, संगे मोड़ा हरों खों बत्तमीजी करबो सिखा रए।’’ मैंने भैयाजी को पूरो विज्ञापन सुना दओ। बाकी ऊ धारावाहिक के दूसरे विज्ञापन सोई जेई टाईप के आएं, मनो कहां लौं मैं सुनाती।
‘‘हऔ जे सो ठीक नईयां! बा ऊमें देखो टाईटेनिक फिलम जेई से सो दुनिया में हिट हो गई के हीरो ने हिरोईन खों बचाबे के लाने अपनी जान दे दई। बाकी बिन्ना, हम तो जे मानत आएं के जो कोनऊं लुगाई नौकरी कर रई औ घरे चलाबे खों पईसा कमाबे में साथ दे रई, सो उके आदमी को सोई घर के काम-काज में ऊको हाथ बटाओ चाइए। अब जे का बात भई के लुगाई नौकरी बी करे, बच्चा बी पाले औ चूला-चैका बी करे, औ उतई ऊको आदमी 20-20 देखत पसरो रए।’’ भैयाजी ने बड़ी साजी बात कई।
‘‘ठीक कै रए आप भैयाजी! ऐसोई होन चाइए।’’ मैंने भैयाजी से कई।
‘‘का खाक होन चाइए? बिन्ना, तुमने सो हमें असल बात से बिलमा दओ। कां हम शरद पवार औ प्रफुल्ल पटेल की बात कर रए हते औ तुम सीरियल के विज्ञापन की बात करन लगीं।’’ भैयाजी कुड़मुड़ात भए बोले।
‘‘बा तो आपई ने टीवी देखबे वारी बात बोली, सो मोय बा विज्ञापन याद आ गओ। बाकी अब बता देओ आप के प्रफुल्ल पटेल ने का कई? अबे कोन सी देरी हो गई कहाई?’’ मैंने भैयाजी से कही।
 ‘‘जे ना कओ बिन्ना, आजकाल राजनीति औ मौसम एकई सो हो गओ आए। कओ अभई पानी गिर रओ औ कओ पांच मिनट बाद धूप कढ़ आए। ऐसई हाल राजनीति को चल रओ। जो मानुस पांच मिनट पैले ‘क’ पार्टी को गुन गा रओ हतो, बा पांच मिनट बाद ‘ख’ पार्टी को गुन गान लगे।’’ भैयाजी बोले।
‘‘सो जे तो हुइए, जो ‘क’ वारो खाबे खों ना देहे और ‘ख’ वारो कोनऊं अच्छी ‘डील’ ख्वा देहे, सो धनी ‘ख’ के बाजू में बैठो दिखाहे।’’ मैंने हंसत भई कई।
‘‘सई कै रई बिन्ना! अब सो जेई चलन चल गओ। अरे हऔ, सुनो तो बा प्रफुल्ल पटेल ने का कई के जो हम शिवसेना के संगे चल सकत आएं सो बीजेपी के संगे चलबे में का दिक्कत आए? उन्ने सो जे बी कै दई के शरद पवार बिना बहुमत के बदलाव लाबे की कोसिस कर रए, जे देख के मोय हंसी आन लगत आए।’’ भैयाजी ने अखीरकार प्रफुल्ल पटेल को कओ भओ मोय सुनाई दओ।
‘‘ऐसो आए भैयाजी के आजकाल राजनीति में कोनऊं ठिकानो नईं रओ, के कोन सो ऊंट कब कोन से करवट बैठ जाए। जनता जोन खों जितात आए, बेंचबे-खरीदबे वारे ऊको पटकनी दे के कोनऊं औरई खों कुर्सी पकरा देत आएं। मनो राजनीति में सोई खेल घांईं फिक्सिंग चलन लगी आए।’’ मैंने भैयाजी से कई।
‘‘हऔ, अपन ओरें सो ऊंसई खुस होत रैत आएं के हमने जिताओ, हमने हराओ। अरे, हऔ! सो हम बता रए हते के शरद पवार के नांव से हमें कुल्ल जने याद आ गए ऊमें पैले सो तुमाई याद आई।’’  भैयाजी बोले।
‘‘हऔ, आप मोय खुस करबे के लाने झूठी कै रए। आतई साथ तो ऐसो स्वागत करो के मनो संसद भवन में राहुल भैया पौंच गए होंय।’’ मैंने मुस्क्या के कई।
‘‘तुम और! कां से कां पौंच गईं।’’ भैयाजी की हंसी फूट परी। फेर अपनी हंसी पे ब्रेक देत भए बोले,‘‘सच्ची, पैले तुमाई याद आई के शरद नांव वारों को कछू नांव-गांव सो होत रैत आए। बे एक हते शरद जोशी जी। बे उन्ने कित्ते अच्छे ब्यंग्य लिखे।’’
  ‘‘हऔ, शरद जोशी को बा ब्यंग्य ‘जीप पे सवार इल्लियां’ सो कभऊं भूलत नईयां। गजब की कटाई करी आए।’’ मैंने कई।
‘‘बे एक औ रए शरद जोशी, जोन ने शेतकरी आंदोलन चलाओ रओ। और बे शरतचंद्र चट्टोपाध्याय। बे उते बंगाल में भए सो ‘शरत बाबू’ कहाए, इते होते सो ‘शरद बाबू’ कहाते। औ बा जो एक एक्टर आए शरद सक्सेना। बाकी हमें जे खयाल आओ के सबई शरद ओरें अच्छे नोने काम में रए, कोनऊं क्रिमिनल ने बनो।’’ भैयाजी सोचत भए बोले।
‘‘सो आप का चा रए के अब मोय सुपारी लेबे को धंधा शुरू कर देओ चाइए?’’ मैंने हंस के पूछी।
‘‘रैन देओ, तुमसे चिटियां लों नई मरत, कोनऊं की सुपारी का लैहो?’’ भैयाजी बोले।
‘‘हऔ भैयाजी, जेई से तो कओ जात आए के नांव में का रक्खो? जो कछू रक्खो, काम में रक्खो! काम साजो, सो सब साजो!’’ मैंने कई औ भैयाजी से विदा ले लई।
     काए से के मनो बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की। सो, सबई जनन खों शरद बिन्ना की राम-राम!
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चर्चा प्लस | रामकथा में पर्यावरणीय चेतना | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर

चर्चा प्लस  
रामकथा में पर्यावरणीय चेतना
        - डाॅ (सुश्री) शरद सिंह  
         फिल्म ‘‘आदिपुरुष’’ रिलीज हुई। हंगामा हुआ। संवाद को ले कर, कथानक में तोड़-मरोड़ को ले कर, पहनावे को ले कर। इस तरह कई घंटे, कई दिन हमने सोच-विचार, बहसें कीं, एक अदद फिल्म के बारे में। लेकिन क्या हमारी चर्चाओं में रामकथा के वे पक्ष तत्परता से रखे जाते हैं जिन्हें अगर हम समझ लें तो अपनी आने वाली पीढ़ी का भविष्य सुरक्षित कर सकते हैं? रामकथा मात्र एक कथा नहीं है, वह एक ऐसी जीवन शैली है जिसमें प्राकृतिक तत्वों की महत्ता को कदम-कदम पर स्थापित किया गया है। इस कथा में प्रत्येक जड़-चेतन का पारस्परिक महत्व और उसमें संतुलन को पात्रों के रूप में सामने रखा गया है। यदि हम तुलसीदास की ‘‘रामचरित मानस’’ के ही दोहों और चौपाइयों का समरण कर लें तो समस्त जड़-चेतन के साथ मनुष्य के अंतर्संम्बंधों का ज्ञान हो जाता है। पाषाण बनी अहिल्या, वनवासी मनुष्य, वानर, जटायु जैसे पक्षी आदि का प्रसंग यूं ही नहीं है, अपितु इनके द्वारा संदेश दिया गया है प्रकृति की महत्ता को समझने का। चलिए डालते हैं एक संक्षिप्त दृष्टि-  
आज जब हम ग्लोबल वार्मिंग के भय से आक्रांत हो कर पर्यावरण चेतना को बढ़ावा देने की बात करते हैं वहीं हमारे वेदों, पुराणों, उपनिषदों एवं महाकाव्यों में पर्यावरण के संतुलन का संदेश निहित है । ‘‘रामायण’’ तथा ‘‘रामचरित मानस’’ में वर्णित रामकथा पर्यावरण के एक-एक तत्व के महत्व को प्रस्तुत करते हैं । वस्तुतः रामकथा धर्म और आस्था से जुड़ी हुई कथा ही नहीं है वरन् उसमे पर्यावरणीय चेतना का अद्भुत स्वरूप देखने को मिलता है।

पर्यावरण का सीधा संबंध प्रकृति से है, जहां समस्त जीवधारी प्राणियों और निर्जीव पदार्थों में सदा एक दूसरे पर निर्भरता और समन्वय की स्थिति रही है। पर्यावरण शब्द का निर्माण पऱिआवरण से हुआ है जिसका सामान्य अर्थ है घेरनेवाला। पर्यावरण के अंतर्गत वह सब कुछ आता है जो पृथ्वी पर और उसके चारों और दृश्य एवं अदृश्य रूप में विद्यमान है। हमारे चारों ओर का अवरण अर्थात हमारा भौतिक एवं सामाजिक परिवेश जिससे समस्त जैविक एवं अजैविक घटक प्रभावित होते हैं। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो पर्यावरण का निर्माण उन सभी जैविक एवं अजैविक घटकों से हुआ है जो इस पृथ्वी और इसके चारों ओर उपलब्ध है। पर्यावरण के अंतर्गत पृथ्वी, आकाश, जल, अधि और वायु सम्मिलित है। पृथ्वी पर उत्पन्न होने वाली वनस्पतियां, जीव-जन्तु पर्वत, नदियां, खनिज पदार्थ आदि सभी कुछ पर्यावरण के है । वस्तुतः पर्यावरण की अवधारणा अत्यंत व्यापक है। इसमें पृथ्वी और पृथ्वी पर उपस्थित समस्त जैव एवं अजैव घटकों के पारस्परिक संबंध, उपस्थिति, सह जीवन, संतुलन एवं संयोजन का समावेश रहता है। पर्यावरण वह है जिसका स्वस्य एवं संतुलित स्वरूप पृथ्वी के अस्तित्व एवं जैव विविधता का निर्धारण करता है। जहां संतुलित पर्यावरण नहीं है वहां जीवन अथवा जैव विविधता भी नहीं है। पृथ्वी पर जीवन का महत्वपूर्ण अंग है मनुष्य । अतः पर्यावरण के संतुलन एवं संरक्षण में मनुष्य की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। मनुष्य सर्वाधिक क्रियाशील प्राणी है। उसकी क्रियाएं पर्यावरण पर सीधा प्रभाव डालती है। इसीलिए पर्यावरण के अंतर्गत समस्त जैव-अजैव घटको के साथ-साथ मानव क्रियाओं के समस्त रूपों का भी अध्ययन एवं आकलन आवश्यक होता है।
रामकथा में जैव, अर्जव अर्थात् जड़ और चेतन सभी तत्वों को मानवीय दृष्टिकोण से देखा गया है। जैसा कि तुलसीदास ने लिखा है- "सियाराम मय सब जग जानी। करहु प्रनाम और जुग पानी ।।" श्रीराम के भक्तों में पशु और पक्षी दोनों वर्ग के प्राणि है। वानर, हरिण, हाथी, घोडे, ऊंट, खच्चर आदि पशुओं का उल्लेख है। इसी प्रकार मोर, चकोर, तोते, कबूतर, सारस, हंस, कौआ, गिद्ध, गरुड़ आदि पक्षियों का महत्वपूर्ण स्थान है।

पर्णकुटी के आसपास हरिणों के घूमने तथा स्वर्णमृग का वर्णन जहां वन्य पशुओं की उपस्थिति दर्शाता है वहीं स्वर्णमृग की घटना हरिण के आखेट के दुष्परिणाम को सामने रखती है।

हमहि देखि मृग निकर पराही।
मृगी कहहिं तुम्ह कह भय नाहीं।
तुम्ह आनंद करहु मृग जाए।
कंचन मृग खोजन ए आए।।

सीता का रावण द्वारा अपहरण कर लिए जाने पर श्री राम व्याकुल हो कर प्रत्येक प्राकृतिक तत्व से सीता का पता पूछते हैं।

हा गुन खानि जानकी सीता।
रूप सील ब्रत नेम पुनीता।।
लछिमन समुझाए बहु भाँति।
पूछत चले लता तरु पाँती

अर्थात् श्री राम विलाप करते हुए कहते हैं कि हे गुणों की खान जानकी! हे रूप, शील, व्रत और नियमों में पवित्र सीते! तुम कहां हो? लक्ष्मणजी उन्हें बहुत प्रकार से समझाते हैं फिर भी श्री राम लताओं और वृक्षों की से पूछते हैं-

हे खग मृग हे मधुकर श्रेनी।
तुम्ह देखी सीता मृगनैनी।।
खंजन सुक कपोत मृग मीना।
मधुप निकर कोकिला प्रबीना।।

अर्थात हे पक्षियों! हे पशुओं! हे भौंरों! तुमने कहीं मृगनयनी सीता को देखा है? खंजन, तोता, कबूतर, हिरन, मछली, भौंरों का समूह, प्रवीण कोयल तुम्हीं बताओ कि तुमने सीता को देखा हैं?

कुंद कली दाड़िम दामिनी।
कमल सरद ससि अहिभामिनी।।
बरुन पास मनोज धनु हंसा।
गज केहरि निज सुनत प्रसंसा।।

रामकथा में कौए और गरुड़ को विशेष स्थान दिया गया है। ये दोनों वन्य एवं नगरीय पक्षियों के प्रतिनिधि समान हैं। कागमुशुण्डि, जटायु, संपाति तथा गरुड़ के रूप में पक्षियों के महत्व को निरूपित किया गया है। कागभुशुण्डि तो वह चरित्र हैं जिसने पक्षीराज गरुड के संदेह निवारण के लिए उन्हें रामकथा सुनाई -

कहेछु न कछु करि जुगति विषेखी।
यह सब मैं निज नयनन्हि देखी ।।

जटायु ने रावण से सीता को छुड़ाने के लिए अपने प्राण भी दांव पर लगा दिए। यह भी मानव जीवन में पक्षियों के महत्व को सिद्ध करने वाला प्रसंग है। जब रावण सीता का हरण करके लंका ले जा रहा था तो जटायु ने सीता को रावण से छुड़ाने का प्रयत्न किया था। इससे क्रोधित होकर रावण ने उसके पंख काट दिये थे जिससे वह भूमि पर जा गिरा। जब राम और लक्ष्मण सीता को खोजते-खोजते वहां पहुंचे तो जटायु से ही सीता हरण का पूरा विवरण उन्हें पता चला। स्मरण रहे कि जटायु गिद्ध प्रजाति का था। अर्थात् रामकथा हमें बताती है कि जिस पक्षी को हम मृतपशुओं का मांस खाने वाला पक्षी कह कर हेय दृष्टि से देखते हैं, वह भी मानव जीवन के लिए हितकारी है। यदि वैज्ञानिकदृष्टि से देखा जाए तो गिद्ध उच्चकोटि का सफाईकर्मी है।

रामकथा में अहिल्या की कथा जड़ तत्व के रूप में पाषाण के महत्व को उद्घाटित करती है।

परसत पद पावन सोकनसावन प्रगट भई तपपुंज सही।
देखत रघुनायक जन सुखदायक सनमुख होइ कर जोरि रही।।
अति प्रेम अधीरा पुलक शरीरा मुख नहिं आवइ बचन कही।
अतिसय बड़भागी चरनन्हि लागी जुगल नयन जलधार बही।।

 - भावार्थ यह है कि श्री रामजी के पवित्र और शोक को नाश करने वाले चरणों का स्पर्श पाते ही सचमुच वह तपोमूर्ति अहल्या प्रकट हो गई। भक्तों को सुख देने वाले श्री राम को देखकर वह हाथ जोड़कर सामने खड़ी रह गई। अत्यन्त प्रेम के कारण वह अधीर हो गई। उसका शरीर पुलकित हो उठा, मुख से वचन कहने में नहीं आते थे। वह अत्यन्त बड़भागिनी अहल्या प्रभु के चरणों से लिपट गई और उसके दोनों नेत्रों से प्रेम और आनंद के आंसुओं की धारा बहने लगी।

यदि अहिल्या की कथा को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो पृथ्वी के अजैविक घटकों के निर्माण में जैविक घटकों के पाए जाने की प्रक्रिया मिलती है। विशालकाय वृक्ष गिर कर भूमि में दब जाने पर लाखों, करोड़ों वर्ष में पाषाण में बदल जाते हैं। अहिल्या भी पहले जीवित स्त्री थी जो शापग्रस्त हो कर शिला में परिवर्तित हो गई थी। श्रीराम के चरणों का स्पर्श पाकर वह पुनः जीवन्त हो उठी। जिस प्रकार वातावरणीय अनुकूलकता पा कर चट्टानों से भी अंकुरण फूट पड़ते हैं।
जिन कूपों, नदियो, सरोवरो एवं समुद्र आदि जलाशयों का उल्लेख रामकथा में किया गया है वे सभी पानी से लबालब भरे हुए है, किसी में भी पानी के कम होने का संकेत नहीं है। इन जलाशयों का त्यानी मी स्वच्छ एवं जलचरों से युक्त है। अर्थात त्रेतायुग में जल संरक्षण जीवनचर्या का अभिन्न अंग था। किसी को भी जल की कमी का राकट नहीं झेलना पड़ता था। रामकथा में सुरम्य उपानहै जिसमें सीता श्री राम के प्रथम दर्शन करती है। ऐसा उपवन जहां सरोवर भी है, कमल भी है, पक्षी कल कल कहे हैं और भौंरे गुनगुना रहे हैं।

वन्य-उत्पादन आज तेजी से घटता जा रहा है। जब वन ही कम होते जा रहे हैं तो वनोपज अधिक कहां से होगी? शहरों के फैलाव ने भी पर्यावरण को अपार क्षति पहुंचाई है। किन्तु रामकथा में शहरों के साथ-साथ गांवों एवं वनवासियों का भी समान रूप से वर्णन है।

सीता लखन सहित रघुराई।
गांव निकट जब निकसहिं जाई।
लगभग सभी ऋषि-मुनि अरण्य में कुटी बना कर निवास करते थे। निषाद, शबरी आदि वनवासी कुटियों में अपने परिवार और समूहों के साथ रहते थे-

काचर कोल किरात बिचारे के बिलोकि पनिक हियं हारे।।

आज हम समुद्र के तटों को सुखा कर उस पर अपनी बस्तियां फैलाते जा रहे हैं। यह अतिक्रमण है सागरीय जल-भूमि पर। इसी संदर्भ में उस प्रसंग को याद करना जरूरी है जब श्री राम समुद्र की तीन दिन तक स्तुति करते हैं किन्तु समुद्र पार जाने के लिए रास्ता नहीं देता है। तब श्री राम मानवीय अवतार के वशीभूत समुद्र पर क्रोध करते हैं और उसे सुखा देने के लिए धनुष पर बाण चढ़ा लेते हैं। तब समुद्र प्रकट होता है और श्री राम से कहता है कि आप सर्वशक्तिमान हैं, आप चाहें तो मुझे पल भर में सुखा सकते हैं किन्तु सूखना मेरी प्रकृति नहीं है। अतः इसमें आपका यश नहीं होगा। तब श्री राम समुद्र से कहते हैं कि तुम्हीं कोई उपाय सुझाओ। ‘‘रामचरित मानस’’ में दिया गया संवाद देखिए-

प्रभु प्रताप मैं जाब सुखाई। उतरिहि कटकु न मोरि बड़ाइ।।
प्रभु अग्या अपेल श्रुति गाई। करौं सो बेगि जो तुम्हहि सोहाइ।।
सुनत बिनीत बचन अति। कह कृपाल मुसुकाइ।
जेहि बिधि उतरै कपि कटकु। तात सो कहहु उपाइ।।
मैं पुनि उर धरि प्रभु प्रभुताई। करिहउँ बल अनुमान सहाई।।
एहि बिधि नाथ पयोधि बँधाइअ। जेहिं यह सुजसु लोक तिहुँ गाइअ।।

इस पर समुद्र रामनाम की शिलाओं को जल में तैराने का उपाय बताता है। जिस पर अमल करते हुए वानर और भालुओं की सेना शिलाओं पर श्री राम का नाम लिख कर ‘‘रामसेतु’’ बना देती है। अर्थात् रामकथा यही कहती है कि चाहे समुद्र हो या नदी, प्रकृति को क्षति पहुंचाए बिना विकास का रास्ता ढूंढना चाहिए।
रामकथा में किसी भी स्थान पर पर्यावरण असंतुलन अथवा पर्यावरण को क्षति पहुंचाए जाने का उल्लेख नहीं मिलता है। जब लक्ष्मण क्रोधवश अपने बाण से जल में आग लगा देने को उद्यत हो उठते हैं वहां भी जलदेवता जलचरों की रक्षा का स्मरण कराते हैं और जलचरों को क्षति नहीं पहुंचती है । अतः यदि रामकथा के पर्यावरणीय मर्म को आत्मसात किया जाए तो पर्यावरण के संरक्षण के रास्ते में आने वाली बाधाएं सुगमता से दूर हो सकती हैं तथा बड़ी आसानी से जन सामान्य में पर्यावरण चेतना का संचार हो सकता है।    
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