Friday, June 21, 2024

शून्यकाल | च्यवन ऋषि बुंदेलखंड की वनस्पतियों से बनाते थे औषधि | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नयादौर

दैनिक नयादौर में मेरा कॉलम  "शून्यकाल"
च्यवन ऋषि बुंदेलखंड की वनस्पतियों से बनाते थे औषधि
 - डाॅ (सुश्री) शरद सिंह           
                  
      बुंदेलखंड प्राचीन काल से से अनेक विशिष्टिताओं का केन्द्र रहा है। आज च्यवन ऋषि और च्यवनप्राश का नाम सभी जानते हैं किन्तु यह कम ही लोगों को पता होगा कि च्यवन ऋषि ने बुंदेलखंड को अपना कर्मक्षेत्र बनाया था तथा यहां के औषधीय पौधों से कालजयी औषधियां तैयार की। बुंदेलखंड के निवासियों को गर्व होना चाहिए कि स्वस्थ जीवन के लिए अनेक आयुर्वेदिक औषधियों को तैयार करने के लिए च्यवन ऋषि ने बुंदेलखंड के वनक्षेत्र से वनस्पतियां चुनी थीं और औषधियां बनाई थीं। दुख है कि वे अनमोल, ऐतिहासिक जंगल आज खतरे में हैं।  

अपनी संस्कृति के लिए विख्यात बुंदेलखंड अपने वनसंपदा के लिए भी जाना जाता रहा है। बुंदेलखंड आदि काल से ही वनस्पतियों का धनी रहा है। बुंदेलखंड में बहुतायत में जड़ी- बूटियां पाई जाती हैं। बुन्देलखण्ड का भौगोलिक क्षेत्र लगभग 70000 वर्ग किलोमीटर है। इसमें उत्तर प्रदेश एवं मध्य प्रदेश के 13 जनपद तथा समीपवर्ती भू-भाग हैं। बुंदेलखंड के वन परिक्षेत्र में उच्च कोटि का सागौन होता है जिसकी गृह निर्माण और फर्नीचर के क्षेत्र में बहुत मांग रहती है। वहीं तेन्दू की पत्तों का बीड़ी उद्योग में उपयोग होने के कारण बुंदेलखंड के हजारों परिवारों का भरण-पोषण होता है। यद्यपि यह उद्योग बीड़ी के चलन में कमी के साथ  धीरे-धीरे सिमटता जा रहा है।  बुंदेलखंड के वनों में पाए जाने वाले खैर के वृक्षों पर कत्था उद्योग आधारित है। औषधि निर्माण के लिए कच्चे माल की कमी नहीं है। बबूल, महुआ, शीशम, सहजन, ढाक, तेंदू, खैर, हल्दु, बांस, साल, बेल, पलाश, अर्जुन और औषधीय वनस्पतियों का प्रचुर भंडार हुआ करता था बुंदेलखंड में। महुआ मदिरा बनाने, खाने तथा तेल निकालने के काम आता है। बेल, आंवला, बहेरा, अमलतास, अरुसा, सर्पगंधा, गिलोय, गोखरु आदि प्रचुर मात्रा में मिलते हैं। बुंदेलखंड का ललितपुर जिला वर्षों से औषधीय वनस्पतियों के लिए विख्यात रहा है। यही कारण है कि च्यवन ऋषि ने यहां पर अपना आश्रम बनाकर औषधियों को विश्वभर में प्रचलित किया। च्यवन ऋषि की धरती तहसील पाली से सात किलोमीटर दूर है। 
         माना जाता है कि च्यवन ऋषि जड़ी-बुटियों से ‘‘च्यवनप्राश’’ नामक एक औषधि बनाकर उसका सेवन करके वृद्धावस्था से पुनः युवा बन गए थे। महाभारत के अनुसार, उनमें इतनी शक्ति थी कि वे इन्द्र के वज्र को भी पीछे धकेल सकते थे। च्यवन ऋषि महान् भृगु ऋषि के पुत्र थे। इनकी माता का नाम पुलोमा था। महर्षि भृगु के भी दो विवाह हुए। इनकी पहली पत्नी दैत्यराज हिरण्यकश्यप की पुत्री दिव्या थी। दूसरी पत्नी दानवराज पुलोम की पुत्री पौलमी थी। पौलमी असुरों के पुलोम वंश की कन्या थी। पुलोम की कन्या की सगाई पहले अपने ही वंश के एक पुरुष से, जिसका नाम महाभारत शांतिपर्व अध्याय 13 के अनुसार दंस था, से हुई थी। परंतु उसके पिता ने यह संबंध छोड़कर उसका विवाह महर्षि भृगु से कर दिया। पहली पत्नी दैत्यराज हिरण्यकश्यप की पुत्री दिव्या देवी से भृगु मुनि के दो पुत्र हुए जिनके नाम शुक्र और त्वष्टा रखे गए। शुक्र आचार्य बन कर शुक्राचार्य के नाम से विख्यात हुए और त्वष्टा को शिल्पकार बनकर विश्वकर्मा के नाम से ख्यातिनाम हुए। 
     जब महर्षि च्यवन पौलमी के गर्भ में थे, तब भृगु की अनुपस्थिति में एक दिन अवसर पाकर दंस  अर्थात पुलोमासर पौलमी का हरण करके ले गया। शोक और दुख के कारण पौलमी का गर्भपात हो गया और शिशु पृथ्वी पर गिर पड़ा, इस कारण यह गिरा हुआ अर्थात च्यवन कहलाया। बाद में पौलमी के पांच पुत्र और हुए। 
च्यवन का विवाह गुजरात के भड़ौंच के राजा शर्याति की पुत्री सुकन्या से हुआ था। इस विवाह की भी एक रोचक कथा है। एक दिन राजा शर्याति अपनी रानी और पुत्री सुकन्या के साथ वन विहार के लिए निकले। राजा-रानी तो एक सरोवर के निकट विश्राम के लिए बैठ गए लेकिन सुकन्या घूमती हुई मिट्टी के एक टीले के पास पहुंच गई। टीले में दो चमकदार मणिया चमकती हुई उसे दिखाई। सुकन्या ने सूखी लकड़ी की सहायता से दोनों चमकदार मणियों को निकालने का प्रयास किया। तब मणियों से रक्त की धार बहने लगी। सुकन्या यह देख कर घबरा गई। उसने तत्काल यह बात अपने पिता राजा शर्याति को बताई। राजा ने जब निकट पहुंच कर देखा तो वह सन्न रह गया। उसने सुकन्या से कहा कि ‘‘बेटी अज्ञानता में तुमने अनर्थ कर दिया। ये मणियां नहीं तपस्यारत ऋषि च्यवन की आंखें हैं। वे वर्षों से यहां तपस्यारत हैं इसीलिए उनके शरीर पर मिट्टी का टीला बन गया है। तुम यह बात समझ नहीं सकीं।’’ पिता की बात सुन कर सुकन्या को बहुत पछतावा हुआ। और उसने अपने पिता से कहा कि वह अपनी इस भूल का प्रायश्ति करने के लिए ऋषि च्यवन से विवाह कर के उनकी आंखें बनेगी। ़षि उस समय वृद्धावस्था में पहुंच चुके थे जबकि सुकन्या नवयौवना थी। राजा ने उसे समझाना चाहा किन्तु वह अपने निर्णय पर अडिग रही। राजा ने सुकन्या का विवाह ऋषि च्यवन के साथ कर दिया। सुकन्या ऋ़षि का सहारा बनी। च्यवन ने उसका नाम सुकन्या से मंगला रख दिया। सुकन्या उर्फ मंगला की यह निष्ठा देख कर देवताओं ने च्यवन ऋषि को एक ऐसी औषधि की विधि बताई जिसका सेवन कर के ऋषि फिर से युवा हो गए। यही औषधि च्यवनप्राश थी।       
ग्राम बंट के जंगली क्षेत्र में च्यवन ऋषि का आश्रम था। आज भी यह क्षेत्र घने जंगल के रूप में है। यहां पर अनेक प्रकार की जड़ी-बूटियां पाई जाती हैं। यह पूरा वनक्षेत्र जड़ी-बूटियों से भरा पड़ा है। खासकर गौना वन रेंज और मड़ावरा के जंगल में बहुतायत में जड़ी बूटियां पाई जाती हैं। ऐसा माना जाता है कि च्यवन ऋषि ने बुंदेलखंड में ही च्यवनप्राश बनाया था। च्यवनप्राश का उपयोग करोड़ों लोग स्फूर्ति प्रदान करने वाले टॉनिक के रूप में करते हैं। किन्तु आज इन औषधीय पौधों एवं जड़ी-बूअियों का उत्पादन कम होने से आयुर्वेदिक औषधियों का लाभदायक उद्योग संकट से जूझ रहा है। 
औषधीय महत्व के वनोपज में बबूल का भी महत्वपूर्ण स्थान है। बुंदेलखंड के कई स्थानों पर बबूल की गोंद बड़ी मात्रा में एकत्रित की जाती है। शहद एवं लाख आदि का भी उत्पादन होता है। शंखपुष्पी, अश्वगंधा, ब्राह्मी, सफेद मूसली, पलाश, भूमि आंवला, खैर के बीज, गाद, कसीटा, धावड़ा, कमरकस जड़ी- बूटी प्रमुख हैं। विगत वर्ष 2000 में केंद्र सरकार ने औषधीय पौधों जिनमें सफेद मूसली, लेमन, मेंथा, पाल्मारोजा, अश्वगंधा आदि को संरक्षित करने के लिए केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री की अध्यक्षता में राष्ट्रीय औषधीय वनस्पति समिति का गठन किया था। इसके बाद समिति ने 32 औषधियों के विकास के लिए चिन्हित किया था। इसमें आंवला, अशोक, अश्वगंधा, अतीस, बेल, भूमि अम्लाकी, ब्राह्मी, चंदन, गुग्गल, पत्थरचुर, पिप्पली, दारुहल्दी, इसबगोल, जटामांसी, चिरायता, कालमेघ, कोकुम, कथ, कुटकी, मुलेठी, सफेद मूसली, केसर, सर्पगंधा, शतावरी, तुलसी, वत्सनाम, मकोय प्रजाति को संरक्षित करने की योजना तैयार की थी। इनके उत्पादन को बढ़ावा दिए जाने की बात भी सामने आई थी किन्तु आशातीत कार्य नहीं हुआ।
आज से लगभग पन्द्रह-बीस साल पहले औषधि में काम आने वाली सफेद मूसली वनों में भरपूर मात्रा में उत्पन्न होती थी। उल्लेखनीय है कि बुंदेलखंड में बसने वाले जनजाति के सहरिया परिवारों की गुजर-बसर इस औषधि के सहारे चलती। लेकिन, अब जंगलों की अवैध कटाई ने इस औषधि की उपलब्धा को भी बुरी तरह प्रभावित किया है। एक ओर इसकी उपलब्धता घटी है और दूसरी ओर इसके दाम भी बहुत कम मिल पाते हैं। प्राप्त जानकारी के अनुसार सफेद मूसली लगभग 100 रुपये प्रति किलोग्राम के हिसाब से बिकती है जिससे मुसली एकत्र करने वालों को पर्याप्त मुनाफा नहीं मिल पाता है।
वैसे विगत वर्षों में बुंदेलखंड में वानस्पतिक दृष्टि से नई संभावनाओं पर भी गौर किया जा रहा है। जिनमें फूलों की खेती और मशरूम का उत्पादन भी शामिल है। विशेषज्ञों के अनुसार बुंदेलखंड में फूलों की खेती की काफी संभावनाएं हैं। वहीं आयस्टर मशरूम के उत्पादन को भी बढ़ावा दिया जाने लगा है। यह माना जाता है कि आयस्टर मशरूम में औषधीय एवं पौष्टिक गुण पाए जाते हैं। यह वनस्पति जगत के तहत आने वाले खोने योग्य फफूंद है। जिसको गेहूं के भूसे पर उगाया जा सकता है। आयस्टर मशरूम में प्रोटीन खनिज पदार्थ, आयरन फोलिक अम्ल आदि पाए जाते हैं। यह मधु मेह रोगियों, उच्च रक्तचाप को कम करने में मददगार होता है।
विडम्बना यह है कि पहले वनवासी वन संपदा पर अपना अधिकार समझकर खैर, गोंद, शहद, आंवला, आचार, तेंदूफल व सीताफल का संग्रह कर उसे शहर व कस्बों में बेच कर अपने परिवार की भूख मिटाते थे, लेकिन अब इधर वन विभाग वन संपदा पर अपना अधिकार जता कर इन उत्पादों की नीलामी करने लगा है। अब तो वनवासी जंगल में वनोपज पाने के लिए बिना अनुमति के घुस भी नहीं सकते हैं। यदि कहीं बिना अनुमति के जाने पर पकड़े गए तो सजा और जुर्माना भुगतना पड़ता है। 
विचारणीय है कि जिस भू-भाग को च्यवन ऋषि ने औषधीय बनोपज की उपलब्धता के कारण अपना कर्मक्षेत्र बनाया, उसी भू-भाग को आज अपनी वनसंपदा को तेजी से नष्ट होते देखना पड़ रहा है। शहर गांवों को निगल रहे हैं और गांव जंगलों में प्रवेश करते जा रहे हैं। अवैध कटाई के चलते औषधि और गैर औषधि वाली वनस्पतियां असमय काल का ग्रास बनती जा रही हैं। एक सघन जागरुकता ही च्यवन ऋषि के औषधीय बुंदेलखंड को बचा सकती है।      
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Thursday, June 20, 2024

बतकाव बिन्ना की | ई दुनियां में किसम- किसम की भौजी होत आएं | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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बतकाव बिन्ना की
ई दुनियां में किसम-किसम की भौजी होत आएं
   - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
     ‘कल कऊं बाहरे गई रईं का? तुमाए इते अंदियारो दिखा रओ हतो।’’ भौजी ने मोसे पूछी।
‘‘अरे नईं! बाहरे की लाईट ऊसई बुझा रखी हती। जा गरमी में बिजली को बिल ऊंसई मुतको आ रओ। जो कऊं बाहरे जाती तो आप ओरन खों बता के जाती। काय से के आप आजकाल देखई रईं के भड़या हरें डोलत रैत आएं। औ जोन खों उने पकरो चाइए, बे धनी सलाहें देत फिरत आएं के अपनो खयाल खुदई राखो। सीटी औ डंडा घरे धरो। औ फेर जब सब कछू अपनई खों करने, तो जे पुलिस वारे काए के लाने आएं? मैंने भौजी से कई।
‘‘बे कछू नई कर रए। पैले तो रात खों गश्त होत्ती। इते अपन ओरन के दोरे से बी रात खों सायरन बजात भई पुलिस की गाड़ी कढ़त्ती। मनो अब तो कोऊ इते ढूंकत लौं नईयां। ऐसे में भड़या ने फिरहें तो को फिरहे?’’ भौजी बोलीं।
‘‘सई कई भौजी!’’ मैंने कई। फेर मोरो ध्यान गओ के भैयाजी कछू सोच में डूबे हते। सो, मैंने पूछी,‘‘का सोच रए भैयाजी?’’
‘‘नईं, हम जा सोच रए, के काय सबरी भौजी तुमाई भौजी घांई होत आएं, ऐसो हमें तो नई लगत। काय से के भौजियन की खटपट सो सबई जानत आएं।’’ भैयाजी बोले।
‘‘हऔ, जां नंद बाई टेढ़ी होत हुइएं उते भौजियन खों सोई टेढ़ी होने परत हुइए। हमाई शरद बिन्ना तो नोनी आएं, सो हमाई अच्छी पटत आए।’’ भौजी बोल परीं।
‘‘आप सोई अच्छी आओ भौजी, जेई से तो आप मोय पोसात आओ।’’ मैंने सोई भौजी की तारीफ करी। औ जे झूठी तारीफ ने हती, सच्चे दिल से सच्ची तारीफ हती।
‘‘सुन लई! अब हम ओरन के बीच में ने परो।’’ भौजी ने हंस के भैयाजी से कई।
‘‘वैसे भैयाजी आप सांची कै रए आओ। भौजी सोई किसम-किसम की होत आएं।’’ मैंने भैयाजी से कई।
‘‘मने?’’ भैयाजी ने पूछी।
‘‘मने जे के कोनऊं भौजी मताई घांई रैत आएं तो कोनऊं ताने मार-मार के जीनो हराम करे रैत आएं। आप को तो पतोई हुइए के अपने महाकवि भूषण की किसां।’’ मैंने भैयाजी से कई।
‘‘महाकवि भूषण की किसां? कैसी किसां?’’ भौजी पूछन लगीं। हो सकत के उनको बा किसां ने पतो हुइए।
‘‘का रओ भौजी के भूषण खों कविताई करबे को खीबई शौक रओ। और कछू काम में उनको मन ने लगत्तो। सो उनकी भौजी उनको ठेन करत रैत्तीं। चाए दुफेर को खाना होय, खए रात को खाबे को टेम होय, बे खाना परसबे के संगे जे याद कराबो ने भूलत्तीं के भूषण ठलुआ आएं। एक दिनां का भओ के रात की बेरा भूषण औ उनके भैया खाबे बैठे। भौजी ने कुनमुनात भए भूषण के लाने सोई खाना परोसो। भूषण ने जैसई दार खाई, सो उनके मों से निकर परो के ईमें तो नमकई नइयां। जा सुन के भौजी बमकत भईं बोलीं के- जो तुमें दार में नोन चाउनें तो पैले कछू कमा के लाओ, फेर टोंकियो! जा सुन के भूषण खों भौतई बुरौ लगो। उनके थारी के पैर परे औ थारी परे सरका के अपनी भौजी से बोले के - अब हम आप खों तभई अपनो मों दिखाबी, जबे हमें कछू कमाई हो जैहे। जे कै के बे घर छोर के निकर परे। बे कई दिनां भटकत-भटकत एक गांव में पौंचे। रात हो चली रई, सो उन्ने सोची के मंदिर में सुस्ता लओ जाए। बे उतई बैठ गए औ टेम पास करबे के लाने अपनो नओ छंद बोलन लगे। उनको ध्यान ने गओ के मंदिर में कोऊ औ बी आ पौंचो आए औ उनको छंद सुन रओ आए। भूषण जब चुप भए तो बा मानुस उनसे बोलो के भौतई अच्छो छंद आए, तनक एक बार फेर के सुना देओ। भूषण बड़े खुस भए। उन्ने फेर के पूरो छंद सुना दओ। बे घनाक्षरी बनाउत्ते। बे जब छंद सुना के चुप भए तो बा मानुस फेर के छंद सुनाबे खों कैन लगो। ऐसो करत-करत ऊने पूरे अठारा बेर छंद सुन डारो। अखीर में भूषण झुंझलात भए बोले के अब हम थक गए, अब कल सुनाबी। बा मानुस बोलो के ठीक कई, कल आप हमाए घरे आ जइयो, उतई भोजन-पानी करियो औ छंद सुनाइयो। दूसरे दिनां भूषण जा सोच के बा मानुस के बताए पते पे पौंचे के चलो, एक टेम को खाबे को जुगाड़ तो होई जैहे। जब बे उते पौंचे औ उन्ने अच्छे उजियारे में बा मानुस खों देखो तो उने पतो परो के बा तो शिवाजी महाराज हते। शिवाजी महाराज ने उनको खीबईं सत्कार करो औ अठारा बार छंद सुने के बदले अठारा गांव की जागीरें भूषण को दे दईं औ अपने राज्य में रहबे के लाने कई। भूषण ने कई के पैले एक दार अपने घरे हो आएं फेर आ के इतई रैंहें। फेर भूषण ने भैया-भौजी के लाने मुतकी भेंटें खरीदीं औ संगे अठारा बैलगाड़ी में नमक रखाओ औ अपने गांव पौंचे। भौजी ने देखी तो उने अपनी गलती समझ परी। उने लगो के भूषण के भैया अब लौं इत्ती कमाई ने कर पाए जिती भूषण ने कविताई कर के कमा लई। उन्ने भूषण से माफी मांगी। सो एक जे टाईप की भौजी हतीं।’’ मैंने भौजी खों भूषण की किसां सुना डारी।
‘‘औ दूसरे टाईप की भौजी?’’ भैयाजी पूछन लगे।
‘‘दूसरे टाईप की भौजी को सबसे अच्छो उदाहरण आए अपने हरदौल दाऊ की भौजी को। बे तो हरदौल दाऊ खों अपनो लरका मानत्तीं औ हरदौल सोई अपनी भौजी खों मताई घांई मानत्ते, मगर हरदौल के भैया कई-सुनी में आबे वारे निकरे। बे लड़ाई लड़बे खों गए औ जबें लौटे तो हरदौल से जरबे वारन ने उनके भैया के कान भर दए के हरदौल औ उनकी भौजी के संबंध ठीक नइयां। उनके अकल के अंधरे भैया खुद ने देख सके के दोई के संबंध कैसे हते? उन्ने हरदौल की भौजी खों कई के जो हरदौल को अपनो लरका मानत आओ तो ऊको जहर वारी खीर अपने हाथन से खवा देओ। भौजी जा सुन के सनाका खा के रै गईं। जो बे जहर देतीं तो उनको बेटा घांई हरदौल के प्रान जाते, औ जो बे जहर न खवातीं तो दोई पे लांछन लगते। सो, हरदौल ने भौजी खों समझाई के आप सोच-संकोच ने करो, जे अपन ओरन की मर्यादा को सवाल आए। आप तो खीर परोसो, हम खुसी-खुसी खा लेबी। सो, मर्यादा के लाने भौजी ने दिल पे पत्थर धरो औ हरदौल खों खीर परोस दई। जा सोचो के ऐसो करत भए उनके ऊपरे का बीती हुइए। फेर जबे भौजी की बिटिया के ब्याओ को टेम आओ तो सबने कई के बिटिया को मामा भात देत आए। मनो तुमाई बिटिया को मामा तो तुमाए हाथ से खीर खा के मर चुको आए, अब को भात दैहे? सो भौजी बोलीं के बा हमाए लाने बेटा घांई रओ औ एक बेटा अपनी मताई को सिर ने झुकबे दैहे, बा आहे औ अपने हाथन से भात दैहे। सबने उनको मजाक उड़ाओ, मनो भौजी को हरदौल पे भरोसो हतो। बे जानत्तीं के भले हरदौल अब ई दुनिया में नइयां, मनो बे मामा को धरम निभाने आहें जरूर। सो, जेई भऔ। ठीक टेम पे भात परसो गओ, मनो परसबे वारो कोनऊं खों दिखो नईं। सबई खों मानने परो के हरदौल खुदई आ के अपने धरम निभा गए। सो एक ई टाईप की भौजी रईं जिनने अपने देवर पे अपने मोड़ा घांई सच्चो भरोसो करो।’’ मैंने भैया जी खों जा किसां याद कराई।
‘‘औ कोन टाईप की भौजी होत आएं? जे तो सब पुरानी भौजियां रईं।’’ भैयाजी खों किसां कहानी में मजो आन लगो रओ।          
‘‘सो नई भौजिन में एक टाईप की रैत आएं एकता कपूर के सीरियल टाईप भौजियां, जोन बरहमेस घर में षडयंत्र करत रैत आएं औ सबको जीनो हराम करत रैत आएं औ दूसरी टाईप की नई भौजी मोरी भौजी टाईप की भौजी होत आएं जो सबई को खयाल राखत आएं। औ जो कभऊं आप ज्यादई सयानपन दिखान लगत आओ तो आपके दिमाग को नट-बोल्ट कस देत आएं।’’ मैंने हंस के कई।
मोरी बात सुन के भैयाजी औ भौजी दोई हंसन लगे। अब ईनके अलावा औ कोऊ टाईप की भौजी होत होंय सो आप ओरे सोचियो! बाकी बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की।
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Wednesday, June 19, 2024

चर्चा प्लस | क्या था श्रीराम कथा की सीता का वास्तविक स्वरूप | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर

चर्चा प्लस   
क्या था श्रीराम कथा की सीता का वास्तविक  स्वरूप?
    - डाॅ (सुश्री) शरद सिंह                                                                                        
      रामकथा सर्वविदित है। इस रामकथा की प्रमुख चरित्र सीता समस्त नारीजाति की प्रतिनिधि मानी जाती हैं। राजा जनक की पुत्री, राजा दशरथ की पुत्रवधु एवं मर्यादापुरूषोत्तम श्री राम की अर्द्धांगिनी सीता के स्वरूप से सभी परिचित है किन्तु यह सीता का मानवीय स्वरूप है। सीताजी के मानवीय स्वरूप मात्र को जानकर यह मान लेना कि सीताजी के सम्पूर्ण स्वरूप का ज्ञान हो गया है, एक मूल होगी। सीताजी के स्वरूप को जानने और समझने के लिए उनके तत्त्वीय स्वरूप को जानना और समझना भी आवश्यक है। अथर्ववेद के सीतोपनिषद् में सीताजी के तत्वीय स्वरूप की व्याख्या की गई है। वस्तुतः सीताजी का तत्वीय रूप दैवीय है जिसमें जनकल्याण एवं लोककल्याण की भावना निहित है।
श्रीराम की पत्नी एवं रामकथा की प्रमुख पात्र के रूप में सीता को सभी जानते हैं। राजा जनक की पुत्री, राजा दशरथ की पुत्रवधु एवं मर्यादापुरूषोत्तम श्री राम की अर्द्धांगिनी सीता के स्वरूप से सभी परिचित है किन्तु यह सीता का मानवीय स्वरूप है। सीताजी के मानवीय स्वरूप मात्र को जानकर यह मान लेना कि सीताजी के सम्पूर्ण स्वरूप का ज्ञान हो गया है, एक मूल होगी। सीताजी के स्वरूप को जानने और समझने के लिए उनके तत्त्वीय स्वरूप को जानना और समझना भी आवश्यक है। अथर्ववेद के सीतोपनिषद में सीताजी के तत्वीय स्वरूप की व्याख्या की गई है। वस्तुतः सीताजी का तत्वीय रूप दैवीय है जिसमें जनकल्याण एवं लोककल्याण की भावना निहित है।

सीतोपनिषद अथर्ववेद का उपनिषद है। विद्यानों के अनुसार अथर्ववेद को सामवेद और यजुर्वेद के समसामयिक रूप से, या लगभग 1200 ईसा पूर्व - 1000 ईसा पूर्व में एक वेद के रूप में संकलित किया गया था। अथर्ववेद की रचना महर्षि अंगिरा ऋषि ने किया है इसमें कुल 6000श्लोक हैं। इसकी रचना 7000 ईसा पूर्व से 1500 पूर्व तक की गई है। इसके अंतर्गत देवताओं की स्तुति के साथ-साथ चिकित्सा विज्ञान तथा दर्शन के भी श्लोक हैं। अथर्ववेद अनेक नामों से जाना जाता है, जैसे-अथर्ववेद, अथर्वाङ्गिरोवेद, ब्रह्मवेद, भिषग्वेद तथा क्षत्रवेद आदि. अथर्ववेद- श्थर्वश् धातु का अर्थ चलना, विचलित होना है. इस का निषेधात्मक अथर्व-निश्चल रहना है. निश्चल, अपरिवर्तनीय परमात्मा का अविनश्वर ज्ञान अथर्ववेद है, जिससे कोई हिंसा नहीं होती उसे अथर्व कहते हैं। अथर्ववेद की भाषा और स्वरूप के आधार पर ऐसा माना जाता है कि इस वेद की रचना सबसे बाद में हुई । वैदिक धर्म की दृष्टि से ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद चारों का बड़ा ही महत्त्व है। अथर्ववेद छन्दवेद कहलाता है। अंगिरा ऋषि को प्राप्त होने से इसे अथर्वाङ्गिरस वेद भी कहा जाता है। अथर्ववेद को अथर्वाङ्गिरस वेद भी कहा जाता था क्योंकि यह माना जाता है कि इसके  इसके दो ऋषि थे- अथर्वा और अङ्गिरा । अथर्ववेद के प्रमुख देवता हैं - वाचस्पति, पर्जन्य, आपरू, इंद्र, ब्रहस्पति, पूषा, विद्युत, यम, वरुण, सोम, सूर्य, आशपाल, पृथ्वी, विश्वेदेवा, हरिण्यमरू, ब्रह्म, गंधर्व, अग्नि, प्राण, वायु, चंद्र, मरुत, मित्रावरुण, आदित्य।

अथर्ववेद के सीतोपनिषद में कहा गया हैकि सीताजी लोककल्याण के लिए तीन दैवीय रूपों में प्रकट हुई थीं। ये रूप हैं इच्छाशक्ति, क्रियाशक्ति एवं साक्षात् शक्ति। ये तीनों रूप ब्रह्मा द्वारा सृजित जनलोक की रक्षा करने तथा कल्याण करने के लिए प्रकट हुए।
अथ मे कृषतः क्षेत्रं लांगलादुत्थिता ततः।
क्षेत्रं शोधयता लब्धा नाम्ना सीतेति विश्रुता।।

वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की नवमी को पुष्य नक्षत्र में भूमि से प्रकट हुई थी माता सीता। धार्मिक ग्रंथों में इस दिन को सीता नवमी और जानकी जयंती भी कहा गया है। राजा जनक की पुत्री होने के कारण इन्हे जानकी, जनकात्मजा अथवा जनकसुता भी कहते थे। मिथिला की राजकुमारी होने के कारण यें मैथिली नाम से भी प्रसिद्ध है। भूमि में पाये जाने के कारण इन्हे भूमिपुत्री या भूसुता भी कहा जाता है।

हमारे आदि, पौराणिक ग्रन्थों में उल्लेख है कि जब मानव कल्याण के लिये ईश्वर का अवतरण हुआ तब उनके साथ योग माया शक्ति भी अवतरित हुईं। पौराणिक ग्रंथों में श्रीराम को ब्रहम का स्वरूप बताया गया है तो सीताजी को शक्ति का स्वरूप कहा गया है।
शक्ति के रूवरूप को ले कर सीतोपनिषद में एक रोचक कथा है - एक बार देवताओं और प्रजापति के मध्य एक गोष्ठी में इस विषय पर विचार विमर्श चला कि,शक्ति का शाश्वत स्रोत क्या है, यह कैसे ज्ञात किया जाए? तब ब्रह्मा ने सुझाव दिया जिसके आधार पर समस्त देवी-देवताओं के नाम लिख कर उन्ही के नाम से भाग दिया गया। सभी में शेष कुछ नही बच रहा था परंतु भगवती सीता के नाम में सीता से भाग देने पर भागफल भी सीता और शेष भी सीता ही रहा, बस उसी क्षण भगवती सीता को शाश्वत शक्ति का आधार मान लिया गया।

कतिपय लोगों के मन में यह संशय जागता है कि जब सीता शक्ति स्वरूपा तात्विक क्षमता से परिपूर्ण थीं तो उन्होंने स्वयं रावण को दण्ड क्यों नहीं दिया? इस बारे में एक कथा यह भी है कि जब ससुराल आने पर सीताजी ने अपनी पहली रसोई में खीर बनाकर दशरथ जी को परोसी, तब उसमें घास का एक तिनका गिर गया जिसे सीताजी ने उसे अपनी दृष्टि के तेज से नष्ट कर दिया था। उनका यह प्रताप देख दशरथ ने उनसे प्रण लिया था कि वह क्रोध में कभी किसी की ओर दृष्टि नहीं उठाएंगी। सीताजी ने इसीलिए तिनके की ओट से रावण से संवाद किया था अन्यथा उनकी दृष्टि के तेज से रावण भस्म हो जाता।

सीताजी का क्रियाशक्ति रूप उस ध्वनि के रूप में है जिससे सम्पूर्ण स्वर एवं नाद का जन्म होता है। वे क्रियाशक्ति के रूप में श्रीहरि के मुख से नाद के रूप में प्रकट हुई। इसी नाद के बिन्दु से प्रकट हुआ। इसी ओम से चतुर्वेद की सृष्टि हुई। इन्हीं से वेदांग और स्मृतियों का जन्म हुआ। वेद, वेदांग, उपवेद एवं स्मृतियां जनजीवन को नियंत्रित एवं परिमसर्जित करती हैं। ये सभी मनुष्य को मनुष्यत्व का न केवल बोध कराती हैं अपितु प्राणिमात्र तथा वनस्पतिजगत के प्रति मनुष्य के दायित्व को निर्धारित करती हैं। अर्थात् सीताजी का क्रियाशक्ति रूप के माध्यम से जनजीवन की समस्त क्रियाओं को आधार प्रदान करता है।

सीतोपनिषद् में सीताजी के इच्छाशक्ति रूप का भी विस्तृत विवेचन किया गया है। सीताजी का इच्छाशक्ति रूप तीन रूपों में निहित है योगशक्ति, भोगशक्ति तथा वीरशक्ति । योगशक्ति सीताजी का वह रूप है जिसमें वे श्रीवत्स की आकृति धारण करके ईश्वर के वक्षस्थल में दायीं ओर विराजमान रहती हैं। इस रूप में वे प्रलय के समय शांति स्थापित करने वाली होती हैं। भोगशक्ति सीताजी का वह रूप है जिसमें वे नौ निधियों यथा कल्पवृक्ष, कामधेनु, शंख, पद्म आदि में निवास करती हैं।

वीरशक्ति रूप में सीताजी का स्वरूप चार भुजाओं वाला है। उनके एक हाथ में अभय की मुद्रा तथा दूसरे हाथ में वरदान की मुद्रा हाकती है। शेष दो हाथों में पद्म पुष्प रहते हैं। इस रूप में वे पूर्णरूप से सुसज्जित रहती हैं जोकि श्री एवं वैभव की पूर्णता की द्योतक हैं। वे किरीट, कुण्डल, ग्रैवेयक, कंकण, कटिमेखला, नूपुर आदि धारण किए हुए हैं। वे देवताओं से घिरी हुई हैं तथा चार श्वेत हाथी अमृत जल से उनका अभिषेक कर रहे हैं। वेद और शाख भी उनकी स्तुति कर रहे हैं। भृगु और पुण्य उनकी पूजा कर रहे हैं। सीताजी का वीरशक्ति रूप जगत् कल्याण, वैभव एवं वीरता का प्रतीक है।

सीताजी के ये तीनों रूप स्पष्ट करते हैं कि मानवीय स्वरूपा सीता का वास्तविक स्वरूप दैवीय है जो उनके समस्त लक्षणों से परिपूर्ण है इसीलिए सीताजी के समस्त रूपों के ज्ञान के बिना सीताजी के मानवीय स्वरूप को समझ पाना कठिन है। अथर्ववेदीय सीतोपनिषद में सीताजी के स्वरूप का तात्विक विवेचन करते हुए उनको शक्तिस्वरूपा बताया  गया है। उनके तीन स्वरूप हैं - पहले स्वरूप में वे शब्दब्रह्ममयी हैं, दूसरे स्वरूप में महाराज सीरध्वज (जनक) की यज्ञभूमि में हलाग्र (हल के अग्र भाग) से उत्पन्न तथा तीसरे स्वरूप में अव्यक्तस्वरूपा हैं। श्शौनकीय तंत्रश् नामक ग्रंथ के अनुसार, वे मूल प्रकृति कहलाने वाली आदिशक्ति भगवती हैं, जो इच्छाशक्ति, क्रियाशक्ति एवं साक्षात शक्ति, इन तीन रूपों में प्रकट हुई हैं।
ऋग्वेद में सीता का अर्थ पृथ्वी पर हल से जोती हुई रेखा होने से सीता भूमिजा तथा कृषि की अधिष्ठात्री देवी भी कहलाईं। विदेहराज जनक की पुत्री होने से उन्हें वैदेही तथा जानकी भी कहा जाता है। जनक को वैदिक ऋषि एवं मिथिला नरेश दोनों रूपों में जाना जाता है। वाल्मीकि रामायण में सीता को ‘‘जनकानां कुले जाता’’ कहा  गया है। पद्म पुराण, वायु पुराण, विष्णु पुराण और ब्रह्मांड पुराण में सीता के पिता का नाम सीरध्वज बताया  गया है। भवभूति ने ‘‘उत्तर  रामचरित’’ में सीरध्वज शब्द का प्रयोग ‘‘जनक’’ के पर्यायवाची के रूप में किया है।

‘‘कूर्मपुराण’’ के अनुसार, सीता अग्नि में समा गईं थीं और मायामयी सीता को ही रावण लंका ले  गया था। रावण-वध के उपरांत माया-सीता अग्नि में विलीन हो गईं और वास्तविक सीता ने अग्नि से पुनः प्रकट होकर राम के साथ अयोध्या लौटीं। तुलसीकृत रामचरित मानस में भी उल्लेख है, ‘‘जौं लगि करौं निशचर नासा। तुम पावक महं करहुं निवासा।।’’
श्रीराम द्वारा एक बार त्याग किए जाने के बाद सीता ने पुनः उनके साथ राजभवन में रहना उचित नहीं माना था और पृथ्वी से प्रार्थना की थी कि ‘‘यदि मैं निष्कलंक हूं, तो आप स्वयं प्रकट होकर मुझे अपने अंक में स्थान दें।’’ तभी अचानक पृथ्वी फट गई और भूदेवी सीता धरती में समा गईं। वस्तुतः रामकथा में सीता वह पात्र हैं जो दैवीय शक्तियों से परिपूर्ण होते हुए भी एक मानवी का जीवन व्यतीत करते हुए स्त्री शक्ति, सम्मान और स्वाभिमान का आदर्श रचती हैं।
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Tuesday, June 18, 2024

पुस्तक समीक्षा | शायर हरेराम समीप के दमदार शेरों का लुभावना संग्रह | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

प्रस्तुत है आज 18.06.2024 को  #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई हरेराम समीप जी के काव्य संग्रह "चुने हुए शेर" की समीक्षा।
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पुस्तक समीक्षा    
शायर हरेराम समीप के दमदार शेरों का लुभावना संग्रह                           
- समीक्षक डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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पुस्तक  - चुने हुए शेर
कवि   - हरेराम समीप
प्रकाशक  - लिटिल बर्ड पब्लिकेशन, 4687/20, शाॅप नं. एफ-5,प्रथम तल, हरि सदन, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली - 110002 
मूल्य     - 160/- 
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शायरी काव्य की वह विधा है जो अमूमन हर पाठक के दिल को छू जाती है। वर्तमान साशल मीडिया के जमाने में लम्बी शायरी से कहीं अधिक पढ़े और लिखे जाने लगे हैं दो लाईन की शायरी अर्थात् शेर। लम्बी शायरी में से भी कुछ शेर ऐसे  होते हैं जो लम्बे समय तक याद रह जाते हैं और लोगों की जुबान पर चढ़ जाते हैं। ऐसे शेरों में वह दम रहता है कि वे आमजन के बीच से संसद के गलियारों तक दोहराए जाते हैं क्यों कि इनमें सचबयानी होती है। चूंकि सच हमेशा दिल को छूता है इसलिए ऐसे शेर भी दिल और दिमाग में अपनी जगह बना लेते हैं। मीर तकी मीर का यह एक शेर हर किसी को याद रहता है जबकि पूरी ग़ज़ल कम ही लोगों को याद रह पाती है-‘‘राह-ए-दूर-ए-इश्क़ में रोता है क्या/आगे आगे देखिए होता है क्या।’’ इसी तरह मिर्जा गालिब का शेर -‘‘ये न थी हमारी किस्मत कि विसाल-ए-यार होता/ अगर और जीते रहते यही इंतिजार होता।’’ और फिर यदि दुष्यंत कुमार की बात की जाए तो हौसलाअफ़ज़ाई के हर मौके पर उनका यह शेर याद आ जाता है कि -‘‘कैसे आकाश में सूराख़ नहीं हो सकता /एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो।’’

तात्पर्य यह है कि किसी ग़ज़ल के हर शेर के बजाए कोई एक या दो शेर पूरी ग़ज़ल और शायर के प्रतिनिधि बन कर छा जाते हैं और उनकी धमक दशकों तक सुनाई पड़ती है। इसीलिए एक ही कवि या शायर के चुने हुए शेरों का संग्रह भी उतना ही पसंद किया जाता है जितना की एक ग़ज़ल संग्रह।

‘‘चुने हुए शेर’’ यह काव्य संग्रह है चर्चित ग़ज़लकार हरेराम समीप के चुने हुए शेरों का। इसकी भूमिका लिखी है कुसुमलता सिंह ने। इस संग्रह में हरेराम समीप के वे चुनिंदा शेर हैं जो बेहद चर्चित हुए और जिन्होंने पाठकों के मानस में अपनी जगह बना ली। हरेराम समीप की ग़ज़लगोई की यह विशेषता है कि वे ऐसी उपमाएं चुनते हैं जो जनजीवन के सबसे निकट होती है जिससे शेर पढ़ते समय पाठक उसके शब्दों में स्वयं को पाता है और उसे वह शेर अपना-सा लगता है। जैसे उन्होंने अपने एक शेर में समय को शार्पनर और ज़िन्दगी केा पेंसिल कहा है। शेर देखिए- 
वक्त के इस शार्पनर में जिन्दगी छिलती रही 
मैं बनाता ही रहा  इस पेंसिल को नोंकदार।

ऐसा शेर भला याद क्यों नहीं रह जाएगा? इस एक शेर में किसी भी आमआदमी के जीवन संघर्ष की पूरी कथा को महसूस किया जा सकता है। एक आम इंसान अपना जीवन बेहतर बनाने के लिए पूरे जीवन भर जूझता रहता है। यदि वह बेहतर ज़िन्दगी मिल भी जाए तो इसकी कोई गारंटी नहीं होती है कि वह कब छिन जाएगी? बिलकुल एक पेंसिल की नोंक की तरह। कई बार पेंसिल को और नुकीला बनाने के प्रयास में उसकी नोंक ही टूट जाती है। आम आदमी की ज़िदगी की उपलब्धियां भी इसी तरह अनिश्चत रहती हैं। दरअसल, शार्पनर की उपमा सब कुछ कह जाती है।
यह माना जाता है कि काव्य पीड़ा से उपजता है। मिथुनरत निरीह क्रौंच पक्षी के. वध होने से क्षुब्ध वाल्मीकि ऋषि के मुख से निकले श्लोक को संस्कृत काव्य का प्रथम श्लोक माना जाता है - ‘‘मा निषाद प्रतिष्ठां त्वगमःशास्वतीः समाः।’’ शायरी भी भी पीड़ा से उपजी हुई मानी जाती है। इसी प्रचलित मान्यता को आत्मसात करते हुए कवि हरेराम समीप ने अपने इस शायरी में अपने शेर को दुख से उत्पन्न माना है। वे कहते हैं-    
ग़ज़ल का शेर हूँ बेशक दुखों का जाया हूं
मैं अपने वक़्त  की  उम्मीद का सरमाया हूं

शायरी में जब भावनाएं मुखर हो कर सामने आती हैं तो उनमें सच्चाई की आंच भी होती है। एक निडर कवि इस आंच को अपनी पंक्तियों में पिरोने में माहिर होता है। ऐसा करते हुए वह किसी भी जोखिम से घबराता नहीं है क्यों कि वह सच बोलना चाहता है, बुराई को मिटा कर अच्छाई को स्थापित करना चाहता है। जैसे समीप जी का यह शेर देखिए-
सुलगते शब्द हाथों में उठाए चल रहा हूं मैं
मुझे मालूम है इस राह में दरिया नहीं आता।

एक कवि के लिए उसकी कविता किसी शस्त्र से कम नहीं होती है। आखिर शब्द तलवार से कहीं अधिक धारदार साबित होते हैं। यदि फ्रांस का इतिहास उठा कर देख लिया जाए तो लेखकों, कवियों और विचारकों के शब्दों ने एक ऐसी क्रांति को जन्म दिया जिसने राजशाही को उखाड़ फेंका और जनतंत्र की स्थापना कर दी। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में भी कवियों और लेखकों के शब्दों के जोश ने आमजन में स्वतंत्रता पाने की चाह बलवती की। अब यदि कोई मित्र कवि को यह सलाह दे तो उसे शायरी करना छोड़ देनी चाहिए, तो क्या यह एक शायर के लिए संभव है? इस प्रश्न का उत्तर मौजूद है हरेराम समीप के इस शेर में-
दोस्तों की राय है मैं शायरी अब छोड़ दूँ 
जंग में ये आखिरी हथियार कैसे डाल दूँ
एक कवि अपने विचारों की धार को कभी मंद नहीं होने दे सकता है। वह जानता है कि उसका दायित्व है सुप्तप्राय लोगों में अपनी लेखनी से चंतना का संचार करना, लेकिन इसके लिए आवश्यक हो जाता है कि पहले कवि स्वयं हर हाल में जाग्रत कना रहे। इस बात को कहने के लिए शायर हरेराम समीप ने एक बेहद मासम-सी उपमा का प्रयोग किया है जो इस शेर को अलग ही ऊंचाइयों पर ले जाता है-
बच्चे की तरह अपना जगाता हूं मैं जमीर
कहता हूँ सुबह उठ कि तेरा इम्तिहान है।

कवि समीप से छोटे बहर के कई शेर हैं जो अत्यंत चर्चित हुए क्योंकि इनमें गहरा कटाक्ष है। इनमें वे सारे प्रश्न मौजूद हैं जो आमजन अपने आकाओं से करना चाहता है किन्तु कर नहीं पाता है। ऐसे में ये शेर उसे अपनी आवाज़ लगते हैं। कुछ उदाहरण देखिए- 
ये न पूछो है गोल-माल कहां
ये  बताओ है कोतवाल  कहां।

जो गरीबों का है मसीहा आज 
घर उसी का विशाल है यारो।

मुक़दमे में खपा दी उम्र सारी 
बता अब क्या करूँ इस फैसले का

आज इक बेगुनाह कत्ल हुआ 
देखना कल तुम्हारी बारी है

जो तेरा घर जलाकर आ रहा है 
वो मातम में तुम्हारे सम्मिलित है्

सच कहेगा तो जान जाएगी 
बोल क्या चीज तुझको प्यारी

छोटे बहर की शायरी में हरेराम समीप ने गागर में सागर भरने का काम किया है। उनकी तीक्ष्ण दृष्टि राजनीति के हर पैंतरे पर है। वे अपने शेर में कहते हैं - 
ये सियासत हमारे दौरां की
इक नया इंद्रजाल है यारो।

‘‘डुएल पर्सनालिटी’’ मनोविज्ञान में एक डिसआॅर्डर माना जाता है किन्तु आज यह डिसआॅर्डर इंसान के चरित्र में इस तरह घुलमिल गया है कि वह बुरे इंसानों को छांटना या बुरे इंसान को पहचान पाना कठिन हो गया है। इसीलिए कवि समीप कहते हैं कि जहां सब भ्रष्टाचार में लिप्त हों,वहां भष्टाचारियों की गिनती करना कठिन है-
किसे  वाजिब,  किसे  खारिज करेंगे
फसल का जब हर इक दाना घुना है।

आज इंसान की सच्चाई को जानना भी कठिन हो गया है। हर चेहरे पर एक नहीं अनेक मुखौटे रहते हैं-
बना जो मसीहा, सदाक़त का पैकर 
मिला रात मुझको मुखौटा उतारे

इसी बात को अपने एक और शेर में कवि समीप ने कुछ इस तरह कहा है-
दोस्ती किससे निभाऊँ और किससे दुश्मनी 
लोग चारों ओर मिलते हैं मुखौटों में सभी

इस संग्रह में एक बहुत ही उम्दा शेर है जिसे यहां रखना जरूरी लग रहा है क्योंकि यह हरेराम समीप के बिम्बविधान को बड़ी बारीकी से रेखांकित करता है-
वो शाख-शाख मेरी काट कर जलाता है
मुझे समझता है सूखे हुए शजर की तरह।
‘‘चुने हुए शेर’’ काव्य संग्रह में हरेराम समीप के जिन शेरों को रखा गया है वे सभी एक से बढ़ कर एक हैं। वस्तुतः यह उनके छंटे हुए, बहुचर्चित दमदार शेरों का लुभावना संग्रह है जिसे पाठक बार-बार पढ़ना चाहेगा और इस संग्रह को अपने पास सहेज कर रखना चाहेगा। यह संग्रह शायर हरेराम समीप की शायरी के अंदाज़ को समझने में भी भरपूर सहायक है।               
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Saturday, June 15, 2024

टॉपिक एक्सपर्ट | पत्रिका | नओ बसस्टैंड को नओ-नओ टंटा | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

पत्रिका | टॉपिक एक्सपर्ट | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली में
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नओ बसस्टैंड को नओ-नओ टंटा
    - डॉ (सुश्री) शरद सिंह       
      अपने सागर में जब से नओ बसस्टैंड चालू भओ, तभईं से कोनऊं ने कोनऊं टंटा रोजीना बिधो रैत आए। ऊंसई फैलान फैलाए घांईं शहर को विकास करो जा रओ। मने पूरब में रेलवे स्टेशन आए तो पच्छिम में नओ बसस्टैंड। अकेली सिटी से उते लौं पौंचबे में दो-तीन सौ रुपइया घल जात आएं। ऐसी उन ओरन ने टेंसुआ ढरकात भइ बताई, जोन को जे ऑटो किराया घले आएं। अब हटाबे खों तो उते से दूसरो कछु बी हटाओ जा सकत्तो। मनो चलो बसस्टैंड आंखन की किरकिरी बनो हतो, सो ऊको ऊकी पुरानी जांगा से धकिया दओ गओ। अपने इते की पब्लिक ऊंसईं मों बोल के नईं जानत। सो, ऊने कछू नईं कई। अब पब्लिक घबड़ा रई, जब ऊको नए बसस्टैंड में सई से छायरीं लौं नई मिल रई औ ऑटो को किराओ घल रओ ऊपरे से। अब नओ टंटा बिधो जे के शहर में बसों के लाने कोनऊं स्टॉप हुइए, के नईं? बस ऑपरेटर एसोसिएशन ने हड़ताल कर दई। प्रशासन को कैबो आए के हड़ताल आचनक करी गई औ एसोसिएशन वारे कै रए के बसों के पुराने रूट अचानक बंद करे गए। जे दोई पाटन के बीच पिस रई पब्लिक।
       भाजपा के पूर्व राज्यमंत्री गोपाल भार्गव जू से पब्लिक को दरद ने देखो गओ, सो बे सोई ई मामले में बोल परे। उन्ने तो साफ कै दई के जिले के जनप्रतिनिधियों से पूछे बिगैर बसस्टैंड शिफ्ट कर दओ गओ। उनको ऐसो कैबो मायने रखत आए। बाकी उन्ने हल सोई सुझाओ, के भोपाल के नादरा बसस्टैंड घांईं इते बी पुराने बसस्टैंड से सोई बसें चलाई जाएं। मनो, जे टंटा को चाए कोऊं हल निकरे, बाकी बस पकरबे वारों खों सुविदा मिलो चाइए।
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Thank you Patrika 🙏
Thank you Dear Reshu Jain 🙏
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Friday, June 14, 2024

शून्यकाल | आवारा पशु, पर्यावरण और बेख़बर हम | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नयादौर

दैनिक नयादौर में मेरा कॉलम 
"शून्यकाल"

आवारा पशु, पर्यावरण और बेख़बर हम
 - डाॅ (सुश्री) शरद सिंह                                                                                                हम पशुओं का सम्मान करते हैं। गाय को अपनी माता मानते हैं। हम यह बर्दाश्त नहीं कर सकते कि कोई भी गाय माता को जरा भी चोट पहुँचाए। जब हम सड़क पर कुत्तों को घूमते देखते हैं, तो हमें उन पर दया आती है। जब कोई गाय किसी वाहन की चपेट में आकर मर जाती है, तो हमें उसकी दुखद मृत्यु पर दुःख होता है। हमारे मन में पशुओं के लिए कोमल भावनाएँ हैं। लेकिन ये भावनाएँ अक्सर सुप्त क्यों रहती हैं? क्या आपने कभी सोचा है? विदेशी सड़कों पर आवारा पशु नहीं घूमते, लेकिन हमारे देश की सड़कें हमेशा आवारा पशुओं से भरी रहती हैं। कभी सोचा है कि ये आवारा पशु कहाँ से आते हैं और ये क्या हैं और इनका पर्यावरण पर क्या प्रभाव पड़ता है? आप मेरे इस लेख के आईने में अपने-अपने शहर का प्रतिबिंब देख सकते हैं।
      मेरा शहर सागर (म.प्र.) उन कई भारतीय शहरों में से एक है, जहां लोग रोजाना आवारा पशुओं की समस्या से जूझता रहते हैं। जी हां, सागर में भी अन्य शहरों की तरह डेयरी विस्थापन की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। यह अलग बात है कि इस प्रक्रिया को लागू हुए दो दशक बीत चुके हैं। लेकिन, मुद्दा डेयरी पशुओं का नहीं है। उन्हें डेयरी से सैर-सपाटे के लिए भी ले जाया जाता था, इसलिए उनका एक निश्चित समय होता था। मुद्दा उन आवारा गायों और कुत्तों का है, जो सड़कों पर घूमते हैं। मान लीजिए कि हमारे देश में कुत्ते पीढ़ियों से घूमते आ रहे हैं। फिर, जब से माननीय मेनका गांधी जी ने यह कानून बनवाया कि आवारा कुत्तों को जहर की गोलियां देकर नहीं मारा जाना चाहिए, तब से उनकी संख्या में काफी वृद्धि हुई है। मैं खुद पशु हत्या के खिलाफ हूं। किसी भी पशु को जहर देकर मारना मानवीय विकल्प नहीं है। इसके लिए एक प्रावधान को बढ़ावा दिया गया कि आवारा कुत्तों की नसबंदी की जानी चाहिए। लेकिन मुद्दा यह है कि हमारे देश में कई अच्छे प्रावधान हैं, लेकिन उनके क्रियान्वयन में कई खामियां हैं। इन खामियों के कारण आज भी गाँवों और शहरों में कुत्ते बड़ी संख्या में घूम रहे हैं और सभी आवारा पशु अपना-अपना दुर्भाग्य जी रहे हैं।

वेदों और पुराणों को उठाकर देख लीजिए कि हमारे गौवंश कभी आवारा नहीं रहे। वे या तो पशुपालकों के आश्रमों में होते थे या ऋषि-मुनियों के आश्रमों में। गौवंश में गौदान को विशेष रूप से पुण्य का कार्य माना जाता था। वेदों में गाय को पूजनीय बताया गया है क्योंकि इसमें 33 कोटि यानी 33 प्रकार के देवताओं का वास माना गया है। इन 33 प्रकार के देवताओं में 12 आदित्य, 8 वसु, 11 रूद्र और 2 अश्विन कुमार हैं। इसलिए माना जाता रहा है कि केवल एक गाय की सेवा-पूजा कर लेने से 33 कोटि देवताओं का पूजन संपन्न हो जाता है। लेकिन हम सुबह घर के दरवाजे पर भिक्षुक सी खड़ी भूखी गाय को एक रोटी दे कर 33 कोटि देवताओं को प्रसन्न करने का भ्रम पाल लेते हैं। 
गायों को भूखे मरने के लिए आवारा पशु के समान छोड़ देना भी गोहत्या ही है। जबकि ऋग्वेद में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि गौहत्या महापाप है और यह मनुष्य की हत्या के समान है।
हे गोहा नृह वधो वो अस्तु (ऋग्वेद 7/56/17)

‘‘स्कंद पुराण” के अनुसार, ‘‘गाय सर्वोच्च देवता है और वेद सर्वोच्च हैं।’’ जबकि ‘‘श्रीमद्भगवद्गीता’’ में भगवान कृष्ण ने स्वयं को कामधेनु कहा हैदृ ‘‘धेनुनामस्मि कामधेनु’’ अर्थात मैं गायों में कामधेनु हूं। वेदों में भी माना गया है कि- ‘‘गावो विश्वस्य मातरः।’’ अर्थात गाय विश्व की माता है। 
ऋग्वेद 6/48/13 के अनुसार गाय प्रत्यक्ष रूप से तो दूध देती ही है, पर अप्रत्यक्ष रूप से जैविक कृषि के माध्यम से संसार को अन्न भी देती है। ऋग्वेद 1/29 का प्रथम मंत्र कहता है कि अल्प ज्ञान वाला अर्थात् बुद्धिहीन और साधनहीन व्यक्ति भी गोवंश का पालन करके हजारों प्रकार के वास्तविक ज्ञान को प्राप्त कर लेता है, परिश्रमी बनता है और फिर यशस्वी और ऐश्वर्यशाली बनता है।
यच्चिद्धि सत्य सोमपा अनाशस्ताइव स्मसि।
आ तू न इन्द्र शंसय गोष्वश्वेषु शुभ्रिषु सहस्रेषु तुवीमघ।।
भावार्थ - आलस्य के मारे अश्रेष्ठ अर्थात् कीर्ति्तरहित मनुष्य होते हैं, वैसे हम लोग भी जो कभी हों तो हे इन्द्र! हम लोगों को प्रशंसनीय पुरुषार्थ और गुणयुक्त कीजिए, जिससे हम लोग बहुत उत्तम-उत्तम हाथी, घोड़े, गौ, बैल आदि पशुओं को प्राप्त होकर उनका पालन वा उनकी वृद्धि करके उनके उपकार से प्रशंसावाले हों।
इसीलिए हमने गोवंश को सदैव सम्मान दिया। 

आज भी ऐसे बहुत से लोग दिख जाएंगे जो गोमाता के सामने झुकते या उसके पास से गुजरते समय उसके माथे को छूकर उसे सम्मान देते हैं। पर क्या आपने कभी सोचा है कि वह भावना कहां चली गई जिसमें गायों को गोशाला में रखकर उन्हें सम्मानपूर्वक पालने की प्रथा थी। आज सड़कों पर ऐसी बहुत सी गायें दिखती हैं जो दूध देना बंद कर चुकी हैं, अर्थात वे पशुपालकों के लिए अनुपयोगी हो गई हैं। ऐसे बहुत से बैल दिखते हैं जो बिना किसी उपयोग के सड़कों पर मरने के लिए छोड़ दिए जाते हैं। वे दूसरों को कष्ट पहुंचाते हैं और स्वयं भी कष्ट पाते हैं। उनकी इस स्थिति के लिए हम स्वार्थी मनुष्य ही जिम्मेदार हैं, अर्थात जो हमारे काम के नहीं हैं, उनकी हम परवाह नहीं करते। हमारे घर के दरवाजे पर कई आवारा गायें आ जाती हैं। हम उन्हें पुण्य कमाने की नीयत से दो रोटी या बचा हुआ खाना दे देते हैं। क्या उनका इतना बड़ा शरीर उस दो रोटी या बचे हुए खाने से जिंदा रह सकता है? हमने अपनी गौ माता को भिखारी बना दिया है। वह दो रोटी की भीख मांगने के लिए हमारे दरवाजे पर खड़ी रहती है। कहने, सुनने या लिखने में यह कड़वा है लेकिन यह सच है। गााय-बैलों के सड़कों पर बैठने या आपस में लड़ने के कारण आए दिन सड़क दुर्घटनाएं होती रहती हैं। उस समय हम गौवंश को कोसते हैं और उन लोगों को कोसना भूल जाते हैं जो गौवंश को इस तरह सड़कों पर ला रहे हैं। कांजीहाउस वह जगह हुआ करती थी जहां आवारा पशुओं को पकड़कर रखा जाता था। वहां उन्हें खाना-पीना दिया जाता है और उनकी पूरी देखभाल की जाती है अब तो ‘‘कांजीहाउस’’ शब्द भी सुनाई नहीं देता है

कुछ कुत्ते पालतू के रूप में अच्छा जीवन पा जाते हैं किन्तु अधिकांश आवारा पशु के रूप में भूख, मार और नृशंस मृत्यु की भेंट चढ़ जाते हैं। जबकि भारतीय संस्कृति में कुत्ते को पवित्र पशु माना गया है। बैदिक कालीन कुछ ग्रंथों में कहा गया है कि कुत्ते स्वर्ग और नरक के दरवाजे की रक्षा करते हैं। 
भगवदगीता के अध्याय 5 श्लोक 18 में कहा गया है कि ज्ञानीजन विद्या और विनययुक्त ब्राह्राण में तथा गौ, हाथी, कुत्ते और चाण्डाल में भी समदर्शी ही होते हैं-
विद्याविनयसंपन्ने ब्राह्राणे गवि हस्तिनि ।
शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः।।

महाभारत के अनुसार धर्मराज युधिष्ठिर की मृत्यु नहीं हुई थी, वे सशरीर ही स्वर्ग गए थे तथा उनको धरती से स्वर्गलोक ले जाने के लिए स्वयं यमराज श्वान का रूप धारण करके आए थे। पांचों पांडवों व द्रौपदी में से सबसे पहले द्रौपदी की मृत्यु हुई थी, तत्पश्चात क्रमशः सहदेव, नकुल, अर्जुन तथा भीम की मृत्यु हुई थी। किन्तु युधिष्ठिर सशरीर स्वर्गलोक पहुंचे थे तथा श्वान के रूप में यमराज निरंतर उनके साथ रहे। यदि इसे दूसरे शब्दों में व्याख्यायित करें, तो श्वान धर्म और जीवन का रक्षक होता है। यूं भी कुत्ता सबसे वफादार प्राणी माना जाता है। किन्तु हम ऐसे प्राणी को आवारा जीवन जीने को विवश करते हैं। उनके नन्हें पिल्ले जब भूख से लड़खड़ाते दिखते हैं तब भी हम उनके लिए कोई स्थाई व्यवस्था किए जाने के बारे में गंभीरता से विचार नहीं करते हैं।

हमारे तमाम कानूनों और संवेदनशीलताओं के बावजूद सड़कों पर आवारा पशु घूम रहे हैं। क्या हमें उन विदेशों से आवारा पशुओं की समस्या से निपटना नहीं सीखना चाहिए, जिनसे हम अपने देश की सड़कों की तुलना करते हैं? अमेरिका की सड़कों पर आवारा पशु नहीं दिखते, क्योंकि वहां पशुओं को आवारा छोड़ना अपराध है और इसके लिए कड़ी सजा का प्रावधान है। वहां पालतू जानवरों को बाहर ले जाते समय गंदगी फैलाना भी अपराध है। ऐसा करने वाले को जुर्माना भरना पड़ता है, अन्यथा जेल की सजा काटनी पड़ती है। हमने इस मामले में उनके जैसा बनने में रुचि नहीं दिखाई है। सुबह-सवेरे संपन्न, पढ़े-लिखे लोग अपने अच्छे नस्ल के कुत्तों को इधर-उधर ‘‘पाॅटी’’ कराते नजर आते हैं। क्या यह अच्छी नागरिकता की निशानी है? पालतू कुत्तों को इस तरह शौच के लिए गंदी जगहों पर ले जाने से जहां कुत्तों के स्वास्थ्य के लिए खतरा रहता है, वहीं वातावरण भी प्रदूषित होता है। इससे मानव स्वास्थ्य के लिए भी खतरा बढ़ता है। जो पालतू कुत्तों को ‘‘पाॅटी’’ के लिए घर से बाहर ले जाते हैं, वे भला आवारा पशुओं की चिंता क्यों करेंगे? इससे भी अधिक आवारा पशु वातावरण में जहां-तहां गंदगी फैलाते हैं, किन्तु हम उस ओर ध्यान ही नहीं देते हैं। गोया न हमें प्रदूषण की चिंता है और न अपने स्वास्थ्य की।

हममें से ज्यादातर लोग ऐसे हैं जिन्हें आवारा पशु अधिनियम के बारे में कोई जानकारी नहीं है। इस संबंध में न तो सरकार की ओर से कोई गंभीर जानकारी दी जाती है और न ही कोई सख्ती बरती जाती है। आवारा पशुओं के लिए सुरक्षित आश्रय स्थलों का भी अभाव है। कांजीहाउस लगभग गायब हो चुके हैं। नगर निगम या नगर पालिका के कर्मचारियों को आवारा पशुओं को पकड़ने का कोई औपचारिक प्रशिक्षण नहीं दिया जाता, इसलिए जब वे ड्यूटी पर होते हैं, तो अपनी जान जोखिम में डालकर जैसे-तैसे काम करते हैं। हम चाहे जितना भी स्मार्ट सिटी या शहरों के सौंदर्यीकरण का राग अलापें, लेकिन जब तक हम आवारा पशुओं की समस्या का समाधान नहीं करेंगे, तब तक सारी प्रगति अपने हाथों अपनी पीठ थपथपाने जैसी ही होगी। हमारे द्वारा छोड़े जा रहे आवारा पशु हमारे पर्यावरण को प्रदूषित और नष्ट कर रहे हैं और हम चुपचाप देख रहे हैं, क्योंकि इसके लिए हम ही जिम्मेदार हैं।      
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Thursday, June 13, 2024

बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात

बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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बतकाव बिन्ना की
जे टीवी सीरियल आएं के भूत-चुड़ैल के अड्डा आएं
   - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
       ‘‘बिन्ना तनक आ तो जाओ, तुमाई भौजी पगला रईं।’’ भैयाजी ने संकारे से मोय फोन करो। उनकी जे बात सुन के मोय बड़ो अचरज भओ। भैयाजी ने कई के भौजी बीमार भई जा रईं, अब ईको का मतलब भओ? ऐसो का कर रईं बे? खैर, उते जाए बिगैर पतो चलने ने हतो, सो मैंने झट्टई तारा-कुची उठाई औ घरे तारा डार के भैयाजी के इते जा पौंची।
‘‘भौजी को का हो गओ?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘तुमई देख लेओ!’’ भैयाजी ने भौजी की तरफी इशारा करो।
मैंने देखो के बे डरी-डरी सी दिखा रईं हतीं।
‘‘काय भौजी का हो गओ?’’मैंने भौजी से पूछी।
‘‘कछू नईं।’’ भौजी टालत भईं बोलीं।
‘‘सो, आपको मों सुफेद सो काय परो जा रओ औ आप डरी सी काय दिखा रईं? कोनऊं ने धमकाओ-वमकाओ तो नई?’’ मैंने भौजी से कई।
‘‘तुम और! इनको को आ धमका सकत आए? जे तो सबई खों उल्टो लटकाए फिरत आएं।’’ भैयाजी हंस के बोले।
‘‘चुड़ैलें लटकत आएं उल्टी, औ बेई सब खों उल्टो लटकाए फिरत आएं। का हम आपके लाने चुड़ैल दिखा रए?’’ भौजी भैयाजी पे बमक परीं।
भैयाजी तनक हड़बड़ा गए, मनो ईसे भौजी के मों पे तनक रौनक लौट आई। बे अपनो डर भूल-भाल के भैयाजी खों फटकारन लगीं।
‘‘मनो भओ का आए? तनक मोय सोई बताओ आप ओरें!’’ मैंने दोई से पूछी।
‘‘अब हम तुमें का कताएं बिन्ना, जे जो तुमाई भौजी आएं, परमेसरी अजूबई आएं।’’ भौयाजी बोले।
‘‘आपने फेर हमाई बुराई करी!’’ भौजी को मुंडा खराब हो गओ।
‘‘अरे, हम तुमाई बुराई नोई कर रए। बस, हम तो बिन्ना खों जे बता रए के तुमाई जे दसा काय भई जा रई।’’ भैयाजी भौजी खों समझात भए बोले।
‘‘का भई हमाई दसा खों? ठीक तो आए।’’ भौजी तनक सम्हरत भईं बोलीं।
‘‘सो रात से तुम डरा काय रईं?’’ भैयाजी ने भौजी से पूछी औ फेर मोय बतान लगे,‘‘का भओ आए बिन्ना के आजकाल तुमाई भौजी बे भूत-चुड़ैल वारे टीवी सीरियल देखन लगीं आएं। हमने इने समझाई रई के तुमें तो भूत-चुड़ैल से डर लगत आए, फेर काय के लाने ऐसे सीरियल देखत आओ? सो जे बोलीं के लड़कौंरी में डरात्ते, अब डर नईं लगत। सो, दो-चार दिनां तो इन्ने खूबई मजा ले-ले के देखो औ फेर डरान लगीं। कल रात खों तो को जाने कोन सो सीरियल देख रई हतीं के बा सीरियल खतम ने हो पाओ औ जे डरान लगीं।’’
‘‘कनऊं नई, हम नईं डरा रए हते।’’ भौजी ने टोंको।
‘‘औ जो नईं डरा रईं हतीं तो इत्ती गरमी में मों से चदरा ओढ़ के काय सो रई हतीं?’’ भैयाजी बोले।
‘‘बा तो ऊंसई। मछरा काट रए हते।’’ भौजी ने झूठी कई।
‘‘हऔ, हमें तो एकऊ ने नई काटो! का बे स्पेसल तुमें काटबे के लाने आए हते?’’ भैयाजी भौजी से बोले।
‘‘हऔ, ऐसई हतो!’’ भौजी झुंझलात भईं बोलीं।
‘‘औ इत्तई नई बिन्ना! अब हम तुमें का बताए के इन्ने हमाए संगे अब लौं रैत भर की जिनगी में पैली बार हमें जगाओ औ बोलीं के हमाए संगे बाथरूम लो चलो। हम तो इनकी जे बात सुन के डरा गए के कऊं इनकी तबीयत तो ने बिगर रई? हमने इनसे पूछी के काय तुमें चक्कर-मक्कर आ रए का? तो जे बोलीं नईं बस तुम संगे चलो। सो हम इनके संगे बाथरूम के दोरे लौं गए। उते भीतरे से जे इत्ती जल्दी बाहरे लौंटीं के हमें लगो के इन्ने बाथरूम करो के ऊंसई भाग आईं। अब तुमई बताओ के जे सोचबे वारी बात आए के नईं? काय से के तुमाई भौजी कभऊं मों से चदरा ओढ़ के नईं सोतीं औ ने जे अंदियारे में जाबे से डरात आएं। मगर अब को जाने का हो गओ इने।’’ भैयाजी ने बताई।
‘‘आप ठीक कै रए, जे बा सीरियल देख के डरा गईं हुइएं। हो जात आए कभऊं-कभऊं।’’ मैंने भैयाजी से कई।
फेर मैंने उन दोई को अपनी किसां बताई के ‘‘जब मैं लोहरी हती तो मोय सोई अंदियारे में जाबे से डरात्ती।’’
‘‘तुमाई तो समझ में आई के तुम जबें लोहरी हतीं, पर जे तो सयानी ठैरीं।’’ भैयाजी बोले।
‘‘डर को का? डर तो कभऊं बी लग सकत आए। डर कोनऊं उम्मर नईं देखत आए।’’ मैंने भैयाजी से कई। मैं जा कै के भौजी की साईड बी लेबो चा रई हती। जीसे उनको डर कम होय। औ ईको असर बी भओ।
‘‘देखो ने बिन्ना! तुमाए भैयाजी हमाए लाने ठेन करे जा रए। अरे हमने चुड़ैल खों छत पे उल्टे लटको देखो, तो का हमें डर न लगहे?’’ भौजी अखीर बोल परीं।
‘‘आपने कां देख लओ चुड़ैल खों?’’ मैंने भौजी से पूछी।
‘‘अरे बा सीरियल आउत आए ने, ‘डायन को बदला’ बोई में देखो। तुमने देखो?’’ भौजी फेर के तनक डरात भई बोलीं।
‘‘बा सीरियल तो नई देखो, बाकी मोय सोई डरावनी फिल्में पसंद आउत आएं।’’ मैंने भौजी से कई।
‘‘सो तुमें डर नईं लगत?’’ भौजी ने पूछी।
‘‘उने देख के काय को डर? बे ओरें कलाकार ठैरे। उने भूल-चुड़ैल बनबे के मिल रए लाखों रुपैया। उनसे का डराने?’’ मैंने भौजी से कई।
‘‘पर सई मानों के जे डायने-मायने होत आएं, तभई तो ऐसो सीरियल बनाओ जात आए।’’ भौजी बोल परीं।
‘‘जे खूब कई भौजी आपने! आप पढ़ी-लिखी आओ औ फेर बी ऐसी बात कर रईं? अब तो आपको ई टाईप के सीरियल देखबो छोड़ देनो चाइए। आप तो डिस्कवरी और नेशनल जियोग्राफी के सीरियल देखो करे। उनखों देख के आप समझ जैहो के जे भूत-चुड़ैल कछू नई होत आएं।’’ मैंने भौजी खों समझाई। फेर मैंने भैयाजी से कई,‘‘भैयाजी, मोय तो जा सोच के चिंता हो रई के जे कोन टाईप के सीरियल आजकाल टीवी पे दिखाए जा रए? जबें अपनी भौजी घांई समझदार लुगाई डरान लगीं तो बाकी के संगे का होत हुइए? जे तंत्र-मंत्र, भूत-चुड़ैल वारे सीरियल के लाने परमीशन कोन देत आए? फिलम तो मानो ढाई-तीन घंटा में बढ़ा जात आए, पर जे सीरियल तो रोजीना तनक-तनक डोज़ सो देत रैत आएं।’’
‘‘सई कई बिन्ना! पैले कित्ते नोने सीरियल आत्ते टीवी पे। हमने पैले ‘भारत एक खोज’ ‘तमस’ ‘हमलोग’ ‘चंद्रकांता’, ‘रामयण’, ‘महाभारत’ घांईं कित्ते अच्छे सीरियल देखे रए।’’ भैयाजी बोले।
‘‘हऔ भैयाजी, बा ‘नुक्कड़’ सीरियल कित्तो अच्छो रओ, औ बा ‘मालगुडी डेज’। औ एक रओ ‘रजनी’ सीरियल। ऊमें बताओ जात्तो के कछू गलत होत देखो तो तुरतई आवाज उठाओ। सई में भौतई अच्छे सीरियल रए बे। बाकी रामसे वारन ने ‘जी हाॅरर शो’ बनाओ रओ। फेर ‘आहट’ ‘श्श्श कोई है’ घांई सीरियल सोई चलत रए, मनो बे ज्यादा रात को आत्ते, औ जोन खों देखने रैत्तो, बेई देखत्ते। अब तो सबई चैनल में दो-चार ऐसे वारे सीरियल चलत रैत आएं। बाकी भूत-प्रेत लौं होंय तो ठीक, मनो अब तो तंत्र-मंत्र सोई खूब दिखाओ जान लगो आए। जो अंधविश्वास फैलाबे को काम हो रओ।’’ मैंने भैयाजी से कई।
‘‘हऔ-हऔ, अब हम समझ गए, अब ने देखहें ऐसो सीरियल।’’ भौजी मुस्कात भईं बोलीं। हम ओरन की बतकाव सुन के उनको डर दूर हो गओ।
‘‘बाकी बिन्ना हमें जे समझ में ने आत आए के जे टीवी सीरियल आएं के भूत-चुड़ैल के अड्डा आएं?’’ कैत भए भैयाजी हंसन लगे।    
आप ओरें बी सोचियो के जे सब का चल रओ? बाकी बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की।
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