Saturday, December 13, 2025

टॉपिक एक्सपर्ट | औ कित्ती मौतन के बाद जा स्पीड पे लगाम लगहे? | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | पत्रिका | बुंदेली कॉलम

टॉपिक एक्सपर्ट | औ कित्ती मौतन के बाद जा स्पीड पे लगाम लगहे? | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | पत्रिका | बुंदेली कॉलम
टाॅपिक एक्सपर्ट 
औ कित्ती मौतन के बाद जा स्पीड पे लगाम लगहे?
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

हात में गाड़ी आई नईं के उन्ने गदर मचाई - जेई हो रओ आजकाल अपने सागर में। जेई से आए दिनां कोऊ ने कोऊ भैकंर एक्सीडेंट की खबर सुनबे खों मिल रई। मनो चेत कोऊं नईं रओ। चाए सहर के बायरे होए, चाए भीतरे, ऐसी-ऐसी टक्करें भईं आएं के उनकी सोंस के ई जी सो कंप जात आए। छोटू अहिरवार नांव को एक ज्वान मोड़ा शायगढ़ से इते आओ रओ कोनऊं परीच्छा देबे के लाने। बा बिचारो गोपालगंज में रोड के कनारे-कनारे पैदल जा रओ हतो। इत्ते में एक बोलेरो आई औ ऊने ऊको इत्ती जोर से ठोंकी के बा बिचारो मोड़ा 5 फीट लौं उछल के गिरो। अब आपई सोंसो के ऊकी का दसा भई हुइए? जा टक्कर सीसीटीवी में पूरी दिखानी। बाकी जो आप ओरन खों याद होय सो कछू समै पैले जेई गोपालगंज के काली तिराहा पे एक स्याने  बुजुर्ग खों एक कार वारे ने ऐसी टक्कर मारी रई के बे कार के नैंचे फंस के 50 फीट लौं घसटत चले गए रए। उते सदर में सेना के दो ज्वानों खों एक गाड़ी ने भौतईं बुरी तरां से ठोंक दओ। सिविल लेन से मकरोनिया रोड पे सो आए दिन गाड़ियन से कोऊं ने कोऊं ठुंकत रैत आए। मनो स्पीड पे तो कोनऊं को लगाम नइयां। जो जे नए उमर के मोड़ा ठैरे उनखों तो कोनऊं की जान की परवा ई नइयां। चाए दो पहिया होय, चाए चार पहिया बे तो धौंकत रैंत आएं। उने पतो आए के बे कोऊं खों ठोंके उनके दद्दा सो उने बचाई लैहें।
     सहर के बायरे देखो सो फोर लेन मने NH-44 पे बम डिस्पोजल स्क्वॉड की गाड़ी औ एक कंटेनर में भिड़ंत हो गई, जीमें 4 ज्वान शहीद हो गए औ एक अस्पताल में डरो। बाकी फोर लेन की तो जो है सो है, इते सहर के भीतरे गाड़ियन की स्पीड पे लगाम काए नईं लग पा रई? औ कित्ती मौतन के बाद लगाम लगहे?
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Thank you Patrika 🙏
Thank you Dear Reshu Jain 🙏
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Friday, December 12, 2025

शून्यकाल | उत्तर आधुनिकता का ‘सेकेंड फेज़’ | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नयादौर

शून्यकाल | उत्तर आधुनिकता का ‘सेकेंड फेज़’ | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नयादौर
शून्यकाल 
उत्तर आधुनिकता का ‘सेकेंड फेज़’
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
       हम परिवर्तनों पर ख़ुश होते हैं या चिंता करते हैं यह आकलन करना शायद हमारे स्वभाव में ही नहीं है। हम औद्योगिक एवं प्रौद्योगिक प्रगति पर गर्व करने से नहीं चूकते हैं। चूकना भी नहीं चाहिए क्योंकि यह हमारे सुविधाभोगी उत्सवधर्मी मन को खुशी देता है। किन्तु यही प्रगति काबू से बाहर हो जाती है तो कोरोना महामारी के रूप में सारी दुनिया को कंपा देती है। यहां स्पष्ट कर दूं कि यह लेख मैंने  कोरोना पेंडेमिक के बहुत पहले “सामयिक सरस्वती’’ पत्रिका के अक्टूबर-दिसम्बर 2016 अंक के कार्यकारी संपादक के रूप में  संपादकीय लिखा था। 2016 से 2026 आने वाला है, क्या कुछ स्थितियां बदलीं, सोचिएगा।
     
       परिवर्तन एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। जो कल था, वह आज नहीं है। जो आज है, वह कल नहीं रहेगा। बड़ी से बड़ी शिलाओं का भी जल के प्रवाह से आकार बदल जाता है। स्टीफन हॉकिंग ने भविष्यवाणी की है कि पृथ्वी का भविष्य संकट में है और मानवजाति का जीवन लगभग एक हज़ार साल का बचा है। सुनने-पढ़ने में यह किसी साई-फाई फिक्शन जैसा लगता है। इसमें कोई शक़ नहीं कि मनुष्य ने कुछ सार्थक परिवर्तन किए और प्रागैतिहासिक जीवन से आगे बढ़ कर सभ्यताओं के सोपान पा लिए। लेकिन कुछ घातक परिवर्तन भी किए जैसे खनिज संपदा का अधैर्यपूर्ण दोहन, जंगलों की कटाई और वायु में ज़हरीली गैसों का निरंतर निष्पादन। किसने सोचा था कि दिल्ली में वायु प्रदूषण का स्तर मापने की क्षमता से भी कहीं अधिक पाया जाएगा। शाम होते-होते धुंधलका छा जाना कई वर्षोंं से दिल्ली के लिए आम बात रही है। सभी ने इसे लगभग अनदेखा किया। देश की राजधानी दिल्ली और उसके आस-पास के क्षेत्रों में छाई धुंध ने जता दिया कि हम अपनी सांसों के प्रति कितने लापरवाह हैं।
विकसित देशों का प्रत्येक नागरिक भी जान बचाने के लिए मंगलग्रह नहीं जा सकता है तो हमारी तो कोई बिसात ही नहीं है। हमें यहीं इसी पृथ्वी पर, इन्हीं शहरों, गांवों और कस्बों में सांस लेना है और हमारी आने वाली पीढ़ियों को भी, यदि वे सांस की बीमारियों से ग्रसित हो कर भी एक हज़ार साल तक प्रवाहमान रहीं तो। गंभीरता से सोचा जाए तो यक़ीनन स्थिति भयावह है। मगर इस स्थिति को बदला अथवा कुछ आगे भी बढ़ाया जा सकता है यदि हम अभी भी चेत जाएं और पर्यावरण के प्रति खुद की लापरवाहियों के विरुद्ध कुछ कठोर क़दम उठाएं।
       जैसे एक कठोर कदम उठाया गया कालेधन के विरुद्ध। देश की जनता ही नहीं, वैश्विक जगत ने भी नहीं सोचा था कि एक रात अचानक लगभग साढ़े तीन घंटे की अवधि में भारतीय मुद्रा की दो महत्वपूर्ण इकाइयां रद्दी के टुकड़े में बदल जाएंगी। यह एक इतना बड़ा निर्णय था जिसने सम्पूर्ण विश्व को चौंका दिया। भारत विपुल जनसंख्या का देश है और यहां वास्तविक साक्षरता का प्रतिशत भी विकसित देशों की तुलना में बहुत कम है। ऐसे में ‘लिक्विड मनी’ की ओर तेजी से क़दम बढ़ाना किसी जोखिम से कम नहीं है। फिर भी इस दिशा में इतना बड़ा डग धरा गया कि जैसे त्रेता युग में वामन ने अपने एक डग से एक लोक नाप लिया था। दफ़्तर के झगड़े, घरेलू पचड़े इन सब को भूल कर आमजन बैंकों के, एटीएम के दरवाज़ों पर कतारबद्ध हो गए। हज़ार और पांच सौ के पुराने नोट जमा करा देने के बाद पचास, बीस और दस के नोट इतनी संख्या में किसी के पास भी नहीं बचे कि वह दो-तीन महीने के लिए आश्वस्त हो सके। कालाधन बाहर आने के उत्साह के बीच घबराहट और तनाव का माहौल। इस परिवर्तन से साहित्य जगत भी प्रभावित हुआ है। मुद्रा की बात छोड़ दी जाए तो तथ्य और कथ्य साहित्य की हर विधा पर अपना प्रभाव छोड़ कर रहेगा। इसमें कोई संदेह नहीं है कि इस दौर के साहित्य में इस पूरे माहौल को स्थान मिलेगा। किसी कहानी में कसमसाता हुआ कालाबाज़ारी करने वाला दिखाई देगा तो वहीं किसी कविता में वह बेचैन पिता मिलेगा जिसने बेटी की शादी के लिए बैंक से बड़े नोट निकलवाए थे और आपाधापी में उसे उन्हें वापस जमा कराना पड़ा। वह चिन्तित खाली हाथ पिता किसी न किसी कविता में अपनी जगह जरूर बना लेगा। या फिर वह दिहाड़ी मज़दूर जो ‘नोटबंदी’ से उपजी आर्थिक समस्या के कारण कई रात भूखा सोया। साहित्य में सबके लिए जगह है। इतिहास से कहीं अधिक उदार होता है साहित्य।
           साहित्य में परिवर्तनकारी तत्व सदैव परिलक्षित होते रहे हैं। इन तत्वों से उपजनेवाली प्रवृत्तियों में अब तक हम सबसे नूतन प्रवृत्ति उत्तर आधुनिकता को मानते आए हैं। इतिहासकार अर्नाल्ड जे.टायनबी के अनुसार आधुनिकता के बाद उत्तर आधुनिकता तब शुरू होती है जब लोग कई अर्थों में अपने जीवन, विचार एवं भावनाओं में तार्किकता एवम् संगति को त्याग कर अतार्किकता एवम् असंगतियों को अपना लेते हैं। इसकी चेतना विगत को एवम् विगत के प्रतिमानों को भुला देने के सक्रिय उत्साह में दीख पड़ती है। इस प्रकार उत्तर आधुनिकतावाद आधुनिकीकरण की प्रक्रिया की समाप्ति के बाद की स्थिति है। जबकि पाउलोस मार ग्रगोरिओस ने उत्तर आधुनिकता को एक विचारधारा या लक्ष्य केंद्रित या नियम अनुशासित आंदोलन न मान कर पश्चिमी मानवतावाद की दुर्दशा माना। आज पश्चिम जगत में अनेक मानक टूट रहे हैं। जबकि हमारा देश नए मानक गढ़ रहा है। ये नए मानक उनसे भी ऊपर उभर कर आने की राह बना रहे हैं जो कल तक यू इलीट, कारपोरेट बुल, ब्यूरोक्रेट्स पावर, मीडिया मुगल्स, मॉस प्रोडक्शन, मॉस डिस्ट्रीब्यूशन, मॉस एजूकेशन, मॉस कम्यूनिकेशन तथा मॉस डेमोक्रेसी जैसे शब्दों से पहचाने जाते रहे हैं। ये सभी उत्तर आधुनिकता की ही देन हैं। अमेरिकी लेखक एवं भविष्यवादी एल्विन टाफ्लर ने तीन पुस्तकें लिखीं -‘फ्यूचर-शॉक’, ‘दि थर्ड वेब’, ‘पॉवर शिफ्ट’। इन तीनों पुस्तकों में उत्तर-आधुनिकतावाद के विभिन्न पक्षों का नवीन परिवर्तन के रूप में विवेचन किया गया है।  ‘फ्यूचर शॉक’ बेस्टसेलर रही, जिसकी विश्व भर में 6 मिलियन से अधिक प्रतियां बिकीं। 27 जून, 2016 को 87 वर्ष की आयु में लास एंजेल्स में उनका निधन हो गया। एल्विन टाफ्लर का कहना था कि ‘‘समाज को ऐसे लोगों की आवश्यकता है जो बुजुर्गों की देखभाल करें और उनके प्रति दयालु और ईमानदार रहें। अस्पताल में काम करने वालों की आवश्यकता है। विभिन्न प्रकार के कौशल वाले व्यक्तियों की आवश्यकता है। समाज भावना और कौशल के संयोग से चल सकता है, डाटा और कम्प्यूटर मात्रा से नहीं।’’
कुछ विद्वान उत्तर-आधुनिकतावाद को बहुलतावाद और नवसंस्कृतिवाद से जोड़ कर देखते हैं। इस परिप्रेक्ष्य में भूमंडलीकरण, उदारवाद और बाजारवाद अपने पूरे लक्षणों के साथ समाज पर असर डालता दिखाई पड़ता है। वहीं जब मैं टायनबी, पाउलोस मार ग्रगोरिओस और एल्विन टाफ्लर के विचारों के आधार पर हिन्दी साहित्य में उत्तर आधुनिकता को परखने का प्रयास करती हूं तो मुझे लगता है कि हम अब उत्तर आधुनिकता के ‘सेकेंड फेज़’ में प्रवेश कर चुके हैं। हम पारिवारिक विखण्डन को अपना चुके हैं, परिवार की नैनो इकाइयों की ओर बढ़ रहे हैं, लिव इन रिलेशन और समलैंगिकता को सहज रूप में लेने का मन बनाते जा रहे हैं, आर्थिक तौर पर प्लास्टिक मनी और लिक्विड मनी को आत्मसात करने के लिए कटिबद्ध हैं और इन सबसे अधिक परिवर्तनकारी प्रवृत्ति कि हम पहले की अपेक्षा अधिक आत्मकेन्द्रित हो चले हैं। यह उत्तर आधुनिकता का द्वितीय चरण ही कहा जा सकता है।

मैनेजर पाण्डेय ने हिन्दी साहित्य में बोध, विश्लेषण तथा मूल्यांकन के महत्व को स्थापित करने के साथ ही हिन्दी भाषा में साहित्य की समाजशास्त्रीय नूतन दृष्टि को विकसित किया है। वे आलोचना-कर्म में परम्परा के विश्लेषणात्मक पुनर्मूल्यांकन के पक्षधर रहे हैं। उन्होंने भक्त कवि सूरदास के साहित्य की समकालीन सन्दर्भों में व्याख्या कर भक्तियुगीन काव्य की परंपरागत प्रचलित धारणा से अलग एक सर्वथा नयी तार्किक प्रासंगिकता को रेखांकित किया है। दलित साहित्य और स्त्री-स्वतन्त्रता के समकालीन प्रश्नों पर भी मैनेजर पाण्डेय की अपनी एक स्वतंत्र दृष्टि है।

आलोचना संदर्भ के क्रम में भारत यायावर का लेख "नन्दकिशोर नवल की आलोचनात्मकता के तारतम्य में हिन्दी साहित्य" में आलोचना के नए पक्षों को सामने रखा है जिन पर चिंतन-मनन किया जाना आवश्यक है। यूं भी एक अरसे से यह माना जा रहा है कि हिन्दी का आलोचनात्मक पक्ष कमजोर होता जा रहा है।
    रोहिणी अग्रवाल इस प्रश्न को उठा कर झकझोरती हैं कि ‘क्या समूचा हिन्दी साहित्य गहरे राग या उदग्र द्वेष से बन्धे भावोच्छ्वासों का अखाड़ा है, जो अपने-अपने द्वीपों में कैद रचयिता को अपने-अपने हिसाब चुकता करने का अवसर देता है?’ उन्होंने इस तथ्य को भी याद दिलाया है कि मीराबाई के बाद हिन्दी साहित्य में स्त्री अभिव्यक्ति के स्वर आधुनिक काल में सुनाई पड़ते हैं। वहीं सुषमा सहरावत भी यही मानती हैं कि स्त्री विमर्श के बीज हमें मीराबाई के काव्य में मिलते हैं। इन्हीं बीजों ने प्रस्फुटित होकर आगे चलकर स्त्री विमर्श को व्यापक धरातल पर स्वरूप प्रदान किया।
समाज बदल रहा है, स्त्री का जीवन बदल रहा है, विचार और प्रवृत्तियां बदल रही हैं। यह साल भी बदल जाएगा।
परिवर्तन पर अपनी ये पंक्तियां याद आ रही हैं मुझे -
अब न वो वन है न कानन
न पेड़, न झुरमुट
न नदी के स्वच्छ किनारे
कोलाहल में गुम वंशीस्वर
और उजड़े हुए हमारे मिलन स्थल
कहो कान्हा! 
मैं तुमसे कहां मिलू?
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Thursday, December 11, 2025

बतकाव बिन्ना की | बिटियन के मामले में अब हल्के से काम ने चलहे | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बतकाव बिन्ना की | बिटियन के मामले में अब हल्के से काम ने चलहे | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम
बतकाव बिन्ना की

बिटियन के मामले में अब हल्के से काम ने चलहे 

    - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह

‘‘हमाओ समाज कां से कां जा रओ आए? भैयाजी तनक गुस्से में दिखाने।
ं‘‘काए का हो गओ भैयाजी?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘होने का? बिटियन की कोनऊं खों तनकऊं फिकर नइयां।’’ भैयाजी ऊंसईं गुस्से में बोले।
‘‘अब ऐसो बी नइयां। सरकार कित्तो खयाल रखत आए लाड़ली बिटियन को।’’ मैंने कई।
‘‘जो ऐसो आए तो लोहरी-लोहरी बिटियन के संगे ऐसो भयानक काम काए हो रओ?’’ भैयाजी बोले।
‘‘का हो गओ?’’ मैंने पूछी।
‘‘काए तुमने सुनी-पढ़ी नईं का के एक छै साल की बिटिया के संगे निरभया घांईं कांड करो गओ। भला छै साल कोनऊं उम्मर होत आए?’’ भैयाजी गुस्सा में भर के बोले।
‘‘हऔ, बात तो आप सई कै रएं बा कांड के बारे में तो मैंने सोई पढ़ी रई। सई में ई टाईप के लोग इंसान कहे जाने जोग नोंईं। बे तो राकस आएं राकस। इत्ती लोरी बच्ची खों कोऊ इंसान तो इत्तो जुलम नईं ढा सकत।’’ मैंने कई। अब मोए भैयाजी के गुस्से को कारन समझ में आओ। उनको गुस्सा सई हतो। जो बी बा कांड के बारे में पढ़े चाए सुने, ऊको खून खौले बिगर नईं रै सकत।
‘‘जेई सो हम कै रए के अपने ई समाज को का होत जा रओ?’’ जे सब ठीक नइयां।’’ भैयाजी बोले।
‘‘पर भैयाजी, ईमें पूरो समाज को का दोस? पांचों उंगरियां बरोबर तो होत नइयां। ऊंसई सबई जने एक से तो होत नइयां। चार अच्छे हुइएं, सो एक बुरौ बी निकर सकत आए।’’ मैंने कई।
‘‘जा कोन सी बात भई? पांचों उंगरियां छोटी-बड़ी भले होएं मनो बे कोनऊं खों अपने मन से अलग से नईं नोंचत आएं। सो ई समाज में कोनऊं खों जो अधिकार नईयां के बे ऐसो घिनां अपराध करे।’’ भैयाजी बोले।
‘‘आपको कैबो सई आए, मनो जे बताओ के ईके लाने करो का जा सकत आए?’’मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘बई करो चाइए जो हैदराबाद में पुलिस वारन ने करो रओ।’ भैयाजी बोले।
‘‘पर उते तो बाद में कओ गओ के बा फर्जी इनकाउंअर रओ।’’ मैंने कई।
‘‘सो इते असली वारो कर देवें न! कोन ने रोकी आए?’’ भैयाजी बोले।
‘‘जी तो जोई करत आए मानो ऐसो हो नईं सकत। काए से के कानून ऐसो करबे की इजाजत नईं देत आए।’’ मैंने कई।
‘‘औ कानून ऐसे राकसों को सब कुछ करबे की छूट देत आए?’’ भैयाजी औ गरम हो गए।
‘‘मेरे मतलब जो नइयां। कानून सजा देत आए अपराधियन को।’’ मैंने कई।
‘‘हऔ! मनो अपराध करबे के बाद न! ऐसो डर काए नइयां के कोऊ ऐसो अपराधई ने करे।’’ भैयाजी बोले।
‘‘बो का आए के कानून को चक्कर बड़ो लंबो परत आए। बा ई लाने के चाए सौ अपराधी छूट जाएं मनो एक निरदोस खों सजा ने हो पाए।’’ मैंने कई।
‘‘हऔ, जेई लाने तो रोजीना के सौ अपराधी बढ़त जा रए।’’ भैयाजी बोले।
‘‘बात तो सई आए आपकी, मनो अब करो बी का जा सकत आए?’’ मैंने पूछी।
‘‘भौत कछू करो जा सकत आए।’’ भैयाजी बोले।
‘‘जैसे?’’ मैंने पूछी।
‘‘जैसे के कानून जल्दी रिजल्ट देवे औ कर्री से कर्री सजा सुनाए। ऐसी सजा के जोन की सुन के दूसरों की हिम्मत ने होए ऐसो गंदो अपराध करबे की।’’ भैयाजी बोले।
‘‘जा बात सई आए आपकी। कछू टेरर तो होने चाइए ऐसे लोग के लाने। तभई बे कछू करबे के पैले हजार बार सोंसे।’’ मैंने कई।
‘‘जा तो बात आए कानून की, मनो हम तो जा कै रए के अपराधी समाज से औ अपने परिवार से डराए। उनें लगो चाइए के जो हमने कछू खराब काम करो सो हमें भरी बजार में जूताई जूता परहें। तब कऊं जा के बे तनक डरहें। औ कैसे बे मताई-बाप आएं जो अपने मोड़ा खों कई से संस्कार नईं दे पा रए? अरे मोड़ा की सौ गलतियां माफ करो, मनो ऊ गलती में ने बख्सो। पैले तो समझा के रखो के सबई मोड़ियां इंसान होत आएं। छेड़ा-छाड़ी से उने बी दुख पौंचत आए। मोड़ियन की इज्जत करो। फेर बी ने माने सो पैलई सिकायत पे तबीयत से जूताई जूता मारो, जीसें ऊको समझ में आ जाए के मोड़ियन से कछु बी गलत नईं करो चाइए।’’ भैयाजी बोले।
‘‘सई कई भैयाजी! पैले तो सबरे बिगरे मोड़ा के बाप-मताई जेई कैत आएं के हमाओ मोड़ा गऊ सो सीदो आए, बा ऐसो कछु करई नईं सकत। फेर जो पकरा जाए सो दौरत फिरत आएं के बा को फंसाओ जा रओ आए। जे सई आए के सबई खों अपनो मोड़ा साजो लगत आए। मनो साजो को साजो बना के राखो सो कोनऊं सल्ल काए बींधे?’’ मैंने कई। 
‘‘औ का! आजकाल सो जे दसा होत जा रई के कोऊ चलत रोड पे मोड़ी खों काट छारे मनो कोऊ आगे बढ़ के ऊको रोकबे की कोसिस लौं ने करहे। औ कल्ल खो कओ ऊकी मोड़ी को नंबर आ जाए सो किलबिलात फिरहे। रामधई! पैले घर के मोड़ा नजर से डरात्ते। जो बब्बा ने घरे आंखें तरेर के देख लओ तो कओ पजामो गीलो हो जाए। पर अब मोड़ा अपने बब्बा खों ई कुचर डारे।’’ भैयाजी बोले।
‘‘बात सो सई कै रए आप। सबसे पैले तो घरई में सिखाओ जाओ चाइए के अच्छो का आए औ बुरौ का आए? मोड़ियन खों तो बरहमेस टोंको जात आए, तनक मोड़ों खों सोई टोंको जाए सो ऐसो कछू ने घटे। फेर मनो एक घरे के मताई-बाप खुदई लापरवा आएं सो ऐसे में परवार, समाज औ सहर के लोगन खों उने टोकने चाइए। अभईं कोनऊं मोड़ा-मोड़ी अपनी मरजी से ब्याओ करबे खों निकर पड़ें तो सबरी खाप-पंचात बैठ जात आए, ऊंसई मोड़ा खों सुदारबे के लाने बी तो समै रैत में समाज की पंचात खों बैठो चाइए।’’मैंने कई।
‘‘जेई सो हम कै रए के समाज खों जात-पांत की सल्ल छोड़ के पैले बिटियन खों ऐसे अपराध से बचाबे की फिकर करनी चाइए।’’ भैयाजी बोले।
‘‘सई बात आए भैयाजी! जरूरी जे आए के कानून औ समाज दोई मिल के ई खिलाफ मोर्चाबंदी करे तभई ऐसे अपराध रुकहें ने तो लोहरी-लोहरी मोड़ियन के लाने डर बनो रैहे।’’ मैंने कई। फेर हम दोई कछू देर तक जेई पे मूंड़ खपात रए।           
बाकी बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़िया हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की। मनो सोचियो जरूर के ई टाईप के अपराध से मोड़ियन खों कैसे बचाओ जा सकत आए?
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बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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Wednesday, December 10, 2025

चर्चा प्लस | इंडिगो संकट ने याद दिला दिया वह सुनामी-सा सैलाब | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर

चर्चा प्लस | इंडिगो संकट ने याद दिला दिया वह सुनामी-सा सैलाब | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर 
चर्चा प्लस
इंडिगो संकट ने याद दिला दिया वह सुनामी-सा सैलाब 
 - डाॅ (सुश्री) शरद सिंह                                                                          
      हवाई यात्राएं ललचाती हैं समय की बचत के प्रलोभन के रूप में। जहां 9 से 12 घंटे लगते हैं वहां चैक-इन और चैक-आउट मिला कर चार घंटे में यात्रा पूरी हो जाती है। आज के भागमभाग के जीवन में समय की बचत की यह खरीद मंहगी नहीं लगती है बशर्ते उड़ानें रद्द न हो। इंडिगो की हाल की रद्द उड़ानों से उत्पन्न हुई परेशानियों ने मुझे दिल्ली एयरपोर्ट टी-थ्री के सैलाब की यादें ताज़ा कर दीं। मुझे आज भी याद हैं वे परेशान, बदहवास चेहरे जबकि उस समय मात्र दो-तीन उड़ाने ही रद्द हुई थीं।         

2019 में आजतक टीवी चैनल के साहित्य महाकुंभ में मुझे चर्चा सत्र में आमंत्रित किया गया था। चर्चा का विषय था ‘‘साहित्य की चुनौतियां’’। शानदार चकाचक व्यवस्था। बेहतरीन लक्जरी होटल में ठहराव। तत्कालीन इंदिरा कला केन्द्र परिसर में सारा आयोजन। होटल के विलासितापूर्ण सुविधाओं के आनन्द के साथ जब आयोजन स्थल पहुंची तो कुछ ही देर में मेरी आंखों में जलन होने लगी। मामला समझ में नहीं आया। नहाते समय साबुन का झाग भी आंखों में नहीं गया था। सच कहूं तो पलकों पर आई लाईनर लगा कर होटल से निकली थी। फिर भी आंखों में जलन। आयोजन स्थल पर कुछ नए-पुराने परिचित मिले। बातों ही बातों में पता चला कि यह जलन पराली के धुंए से उत्पन्न प्रदूषण की देन है। तब मुझे पहली बार पराली के धुंए के दुष्प्रभाव का स्वयं अनुभव हुआ। तीन दिन के प्रवास में उसी धुंए वाली हवा में सांसे लीं और आंखों से आंसू बहने दिए। यह साहित्य के लिए पैदा हुई चुनौतियों से भी बड़ी चुनौती थी। तीन दिनों में न जाने कितनी बार खांसी के ठसके लगे, अब तो उनकी गिनती भी याद नहीं है। चिंता थी कि चर्चा के दौरान खांसी न आने लगे। किन्तु दिल्ली की हवाएं चर्चापसंद हैं, सो उन्होंने मुझे मोहलत दे दी। सब कुछ ठीक-ठाक रहा। पहले दिन पहुंची थी, दूसरे दिन चर्चा-संवाद था और तीसरे दिन दोपहर बाद की रेल से लौटना था। पर मुझे क्या पता था कि एक बड़ी चुनौती मेरी प्रतीक्षा कर रही है।
मेरे आने-जाने की टिकट आजतक चैनल वालों ने ही बुक की थी। कंफर्म टिकट पर दिल्ली पहुंच गई थी किन्तु वापसी की टिकट वेटिंग पर थी। मुझे और मेरे परिचितों को लगा कि आजतक जैसे टीवी चैलन का मामला है तो वापसी तक टिकट कंफर्म हो ही जाएगी। शायद आजतक वालों को भी यही उम्मींद रही होगी। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। वेटिंग क्लियर नहीं हुई। वापसी वाले दिन जब मैं वापसी के लिए अपना सामान पैक कर रही थी मुझे फोन पर सूचना दी गई कि मेरा टिकट कंफर्म नहीं हुआ है। मेरे तो पांवों तले जमीन खिसक गई। अब क्या होगा? मैंने उस कोआर्डिनेटर महिला से पूछा। उसने मुझे सांत्वना दी कि ‘‘हम कुछ न कुछ प्रबंध करते हैं, आप चिंता न करें। मैं थोड़ी देर में आपको बताती हूं।’’
उसकी बात सुन कर कुछ तसल्ली हुई। मैंने तत्काल वर्षा दीदी को फोन लगाया और उन्हें सारी वस्तुस्थिति बताई। उन्होंने भी मुझे समझाया कि मैं चिंता न करूं, वे लोग कुछ न कुछ प्रबंध अवश्य करेंगे। खैर, मैंने अपना सामान पैक करना छोड़ दिया और उस महिला के फोन की प्रतीक्षा में बैठ गई। लगभग आधे घंटे बाद उसने मुझे बताया कि किसी भी रेल में ‘‘तत्काल’’ में भी सागर के लिए कोई कंफर्म टिकट नहीं है, सो उन्होंने दिल्ली से भोपाल तक के लिए मेरा टिकट स्पाईस जेट में बुक कर दिया है। उसकी बात सुन कर मैंने उससे पूछा कि उससे मैं भोपाल कितने बजे पहुंचूंगी? पता चला कि रात्रि साढ़े आठ या पौने नौ तक। मैंने उससे पूछा और फिर भोपाल से सागर कैसे पहुंचूंगी? उसने कहा मैं थोड़ी देर में बताती हूं। फिर प्रतीक्षा के पल। लेकिन जब उस महिला का फोन आया तो मुझे अहसास हुआ कि बड़ेे टीवी चैनल वाले कई मामलों में वाकई जिम्मेदार होते हैं। उस महिला ने मुझे बताया कि भोपाल एयरपोर्ट पर मुझे आजतक चैनल की टैक्सी मिलेगी जो मुझे सागर में मेरे घर के दरवाजे तक छोड़ कर आएगी। उनकी इस व्यवस्था ने मेरा दिल छू लिया। मैंने अपने सामन में से वे सारी चीजें अलग कीं और डस्टबिन में डाल दीं जो मैं रेल से तो ले जा सकती थी लेकिन प्लेन में नहीं। यानी मुझे अपने नए-नवेले हेयर स्प्रे और सेंट स्प्रे को डस्टबिन में डालने का घाटा सहना पड़ा। 
खैर, इसके बाद मुझे नियत समय पर होटल की ओर से सूचना दी गई कि एयरपोर्ट के लिए टैक्सी प्रतीक्षा कर रही है। मैंने होटल से खुशी-खुशी चैक आउट किया। टैक्सी वाले को बताया कि टी-थ्री एयरपोर्ट चलना है। टैक्सी वाले ने मुझे एयरपोर्ट पर पहुंचाया। मैं स्पाईस जेट के काउंटर पर पहुंची। कामर्शियल लोग बड़े प्यारे ढंग से स्वागत करते हैं। स्पाईस जेट वालों ने भी मेरा गर्मजोशी से वैलकम किया। मेरे सामनों पर टैगिंग की। मैंने उन्हें बताया कि मैं आपकी सर्विस पर पहली बार जा रही हूं। इस पर उन्होंने मेरा विशेष ध्यान रखते हुए मुझे अपने एक बंदे के साथ उस जगह को दिखाया जहां से मुझे अपनी फ्लाईट के लिए नीचे फ्लोर में जाना था। उस समय प्रवेश बंद था। लेकिन मैं समझ गई। उस बंदे ने भी मुझे आश्वस्त किया कि यदि कोई परेशानी महसूस करुं तो उन्हें संपर्क कर सकती हूं। एक लंबी प्रतीक्षा के बाद प्रवेश द्वार खोला गया। मैंने चैक-इन की औपचारिकताएं निपटा कर जैसे ही नीचे की ओर देखा तो मेरे हाथ-पांव फूल गए। नीचे परिसर में इंसानों का सैलाब हिलोरें ले रहा था। नीचे पहुंच कर मैंने एक स्टाल पर पानी की एक बोतल खरीदी और उससे ही पूछा कि इतनी भीड़ क्यों है? तो उसने बताया इंडिगो, गो एयर आदि की दो-तीन फ्लाईट्स रद्द हो गई हैं जिसके कारण यहां भीड़ का यह मंज़र है। किसी एयरपोर्ट पर वैसी बदहवास अपार भीड़ मैंने उसके पहले कभी नहीं देखी थी। लोग अनिश्चितता में भरे हुए, बहसें करते घूम रहे थे। अब उनका क्या होगा, उन्हें चिंता थी। इस तरह की चिंता से मैं कुछ घंटों पहले गुजर चुकी थी अतः उनकी व्याकुलता का मैं अनुमान लगा सकती थी। यद्यपि मैं एक बड़े आयोजक की व्यवस्था में थी अतः फिर भी उतनी चिंता नहीं हुई थी जितनी चिंता उन यात्रियों को हो रही थी। किसी का इन्टरव्यू छूट रहा था तो किसी की ज्वाइनिंग खतरे में पड़ रही थी। कोई बच्चों से मिलने के लिए व्याकुल थी तो कोई अपने प्रिय से। सबके बीच बाधा बनी हुई थी उड़ानों के रद्द होने की सूचना। बताया जा रहा था कि पराली के धुंए की सघनता तथा मौसम की खराबी के कारण ऐसा हुआ है। वैसे इस कारण पर विश्वास करना कठिन था क्योंकि स्पाईस जेट के विमान उड़ान भर रहे थे। जिस विमान से मुझे आना था वह भी तैयार हो रहा था। कुछ देर बाद मैं एंट््री गेट के निकट वेटिंग चेयर पर बैठ चुकी थी। मेरे सहयात्री भी वहां आ चुके थे। वहां जितनी शांति एवं संतोष था, उससे कुछ कदम आगे अजीब घबराहट, गुस्से और भीड़ का समुन्दर ऊंची लहरों के थपेड़े ले रहा था। अपार जनसमूह, मानो एक पूरी बस्ती ही वहां आ खड़ी हुई हो। 
‘‘इन लोगों का क्या होगा? यदि मेरी उड़ान भी रद्द हो गई तो?’’ यह विचार आते ही मैंने अपने सिर पर एक चपत लगाई और खुद से कहा कि शुभ-शुभ बोलो। लेकिन कहते हैं न कि बुरे विचार सिर चढ़ कर बैठ जाएं तो एक पल भी चैन नहीं लेने देते हैं। जब तक जहाज पर सवार होने का संकेत नहीं मिला तब तक मन ही मन मैं यही प्रार्थना करती रही कि मेरी उड़ान रद्द न हो, अन्यथा मैं बहुत बड़ी मुसीबत में फंस जाऊंगी। अंततः मैं अपने जहाज पर सवार हो गई। एयर होस्टेस की मुस्कान कुछ ज्यादा ही प्यारी लगी। मेरी सहयात्री एक स्टूडेंट थी। उसने मुझे अपनी कमर पेटी बांधने में मदद की। चूंकि मेरी कमरपेटी का बक्सुआ कहीं फंस रहा था। फिर ‘वेज या नानवेज?’ पूछ कर डिनर भी उसी ने आर्डर कर दिया। लेकिन वह चिपकू नहीं थी। पूरे रास्ते हमारे बीच कोई बात नहीं हुई। बस, एक बार उसने इतना ही कहा कि ‘‘थैंक्स गाॅड, हमारी फ्लाईट कैंसिल नहीं हुई।’’ मैंने भी समर्थन करते हुए कहा,‘‘थैंक्स गाॅड!’’
फिर मैं भोपाल से सागर आते समय टैक्सी में बैठी-बैठी यही सोचती रही कि हमारे देश की फ्लाईट्स भी भगवान भरोसे क्यों चलती हैॅं? माना कि भगवान सब कुछ संचालित करते हैं लेकिन इंसान? उसके भी तो अपने कुछ दायित्व हैं। 
इंडिगो के हाल के मामले ने एक बार फिर सोचने को मजबूर कर दिया है कि इतनी सारी उड़ानें रद्द होने से पहले क्या सचेत हो कर व्यवस्थाएं नहीं सुधारी जा सकती थीं? फिर एक कंपनी की चंद उड़ानें यदि रद्द होती हैं तो बाकी कंपनियां अपनी चांदी पीटने और यात्रियों की मजबूरी का फायदा उठाने में जुट जाती हैं। अनाप-शनाप किराया वसूला जाने लगता है। यहां तक कि उड़ाने रद्द न भी हों फिर भी त्योहार के करीब आते ही यात्रा दरें आसमान छूने लगती हैं। हवाई कंपनियां यह जानती हैं कि आज लोग अपने घरों से, अपनो से दूर रह रहे हैं, उनके पास मिलने का समय भी कम होता है अतः वे कोई भी कीमत चुकाने को तैयार हो जाएंगे। लेकिन हर कीमत की कोई तो सीमा होनी चाहिए। अतः सरकार ने स्थिति की गंभीरता को देखते हुए कुछ दरें तय कीं। दरअसल, इंडिगो संकट के दौरान कुछ शहरों के लिए हवाई किराया 50,000 रुपये या इससे अधिक तक पहुंच गया था, जिसके चलते सरकार को हस्तक्षेप करना पड़ा। नियम 6 दिसंबर 2025 से तुरंत लागू किया गया जिसके अनुसार 500 किलोमीटर की दूरी के लिए हवाई किराये की सीमा 7500 रुपये, 501 से 1000 किलोमीटर के लिए 12 हजार रुपये, 1001 से 1500 किलोमीटर दूरी के लिए 15 हजार और 1500 किलोमीटर से ज्यादा दूरी के लिए उड्डयन कंपनियां 18 हजार रुपये से ज्यादा किराया नहीं चार्ज कर सकती। लेकिन 500 किलोमीटर की दूरी के लिए हवाई किराये की सीमा 7500 रुपये कुछ अधिक नहीं हैं? सरकार को इस पर एक बार फिर विचार करना चाहिए। है न!
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(दैनिक, सागर दिनकर में 10.12.2025 को प्रकाशित)  
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Tuesday, December 9, 2025

पुस्तक समीक्षा | अशोक कुमार ‘नीरद’ की उम्दा ग़ज़लों का बेहतरीन संपादन | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

पुस्तक समीक्षा | अशोक कुमार ‘नीरद’ की उम्दा ग़ज़लों का बेहतरीन संपादन | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण


पुस्तक समीक्षा
अशोक कुमार ‘नीरद’ की उम्दा ग़ज़लों का बेहतरीन संपादन
- समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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ग़ज़ल संग्रह-अंधेरे बहुत सर उठाने लगे हैं
कवि        - अशोक कुमार ‘नीरद’
संपादक     - हरेराम ‘समीप’
प्रकाशक     - लिटिल बर्ड पब्लिकेशन्स, 4637/20, शॉप नं.-एफ-5, प्रथम तल, हरि सदन, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली-110002
मूल्य       - 595/-
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हिन्दी ग़ज़ल दुष्यंत कुमार से पहले भी थी, बस, दुष्यंत कुमार की ग़ज़लों से उसे एक नई पहचान मिली। किन्तु इस आधार पर दुष्यंत के पहले की हिन्दी ग़ज़लों को कमतर नहीं माना जा सकता है। वे ग़ज़लें तो नींव थीं हिन्दी ग़ज़ल की। इसी तारतम्य में देखा जाए तो अशोक कुमार ‘नीरद’ वे कवि हैं जिन्होंने सन 1968 से ही हिन्दी ग़ज़ल लिखना शुरू कर दिया था। हर कवि को ‘ब्लाकबूस्टर’ नेम-फेम मिले यह जरूरी नहीं होता किन्तु इससे उसकी रचनाधर्मिता की मूल्यवत्ता भी कम नहीं हो जाती है। निष्ठावान रचनाधर्मिता का मूल्यांकन करने के लिए समय स्वयं मार्ग ढूंढ लेता है। अर्थात उचित समय आने पर कोई न कोई सुधी संपादक रचनाकार की रचनाओं को पुनः प्रकाश में लाने का माध्यम बनता है। इससे एक और नई पीढ़ी उन रचनाओं से हो कर गुजर पाती है जो सराही तो गईं किन्तु ‘बिलबोर्ड’ पर चमक नहीं सकीं। यह सब लिखने का आशय यह नहीं है कि अशोक कुमार ‘नीरद’ कोई गुमनामी में खोए हुए कवि रहे हों, वे तो सदा अपनी ग़ज़लों के माध्यम से चर्चा में बने रहे हैं किन्तु उनकी चयनित ग़ज़लों का संपादन कर के एक महत्वपूर्ण कार्य किया है साहित्यकार, ग़ज़लकार एवं संपादक हरेराम ‘समीप’ ने। आज के समय में जब हिन्दी साहित्य खुद को हाशिए पर धकेले जाने से बचने के लिए संघर्ष कर रहा है, किसी भी वरिष्ठ ग़ज़लकार की लोकप्रिय ग़ज़लों को एक ज़िल्द में पिरोकर सहेजना एक महत्वपूर्ण कार्य है।

नरसिंहपुर मध्यप्रदेश में सन 1951 में जन्मे अब फरीदाबाद निवासी हरेराम ‘समीप’ अब तक 32 पुस्तकों का संपादन कर चुके हैं। उनके स्वयं के सात ग़ज़ल संग्रह, आठ दोहा संग्रह, कविता, हायकु, कहानी संग्रह सहित साठ पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। पुस्तक संपादन का उन्हें दीर्घ एवं सफल अनुभव है जो उत्कृष्ट साहित्य को सहेजने की उनकी प्रतिबद्धता को रेखांकित करता है। हरेराम ‘समीप’ की शिक्षा नई दिल्ली में हुई जबकि बुरहानपुर में 1945 में जन्में अशोक कुमार ‘नीरद’ की शिक्षा मध्यप्रदेश के सागर विश्वविद्यालय से हुई। अब मुंबई में रह रहे अशोक कुमार ‘नीरद’ 12 वर्ष की आयु से साहित्य सृजन से जुड़ गए थे। उनके सात ग़ज़ल संग्रह एवं दो गीत संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। ‘नीरद’ एक समर्थ गीतकार होने के साथ ही प्रतिष्ठित हिन्दी ग़ज़लकार भी हैं। यदि यह कहा जाए कि उनकी ग़ज़लों ने उन्हें विशेष पहचान दी, तो यह कहना गलत नहीं होगा।

‘‘अंधेरे बहुत सर उठाने लगे हैं’’ अशोक कुमार ‘नीरद’ की चयनित ग़ज़लों का संपादन करते हुए अपने सम्पादकीय लेख ‘‘समकालीन गीत और कविता के समीप आती गजलें’’ में हरेराम ‘समीप’ ने लिखा है कि -‘‘अशोक कुमार ‘नीरद’ हिन्दी गीतिकाव्य के एक समर्थ गीतकार और दुष्यंतकुमार के समकालीन गजलकार हैं। वस्तुतः वे दुष्यंत से पूर्व सन् 1968 से गजल लेखन कर रहे है। इन्होंने गीत और गजल को नए आयाम प्रदान किये हैं, जिससे गजल को ताजगी और नयी चेतना मिली है। गजल पर निरंतर लेखन करते हुए उसमें विषयवस्तु की नूतनता तथा समकालीन सन्दर्भों के द्वारा गजल-विधा को आज की कविता-विधा के समानांतर प्रस्तुत कर दिया है। अपने विपुल गजल-लेखन और पांच दशकों से काव्यमंचों की प्रस्तुतियों ने उन्हें एक संजीदा और लोकप्रिय कवि के रूप में प्रतिष्ठा दी है। कुछ वर्षों से मुम्बई विश्वविद्यालय के बी.ए. के कोर्स में एक गजल-संकलन में नीरद की पाँच गजलें भी शामिल हैं।’’

अपने सम्पादकीय लेख के और अंत में ‘समीप’ लिखते हैं कि - ‘‘अर्थात नीरद ने गजल के परम्परागत लहजे को आधुनिक हिन्दी गजल के तेवर में ढालने का उल्लेखनीय कार्य किया है। विशेष बात यह भी है कि प्रारम्भसे अब तक उनकी रचनात्मकता में जो नैरन्तर्य है, वह स्तब्ध करता है। नीरद की गजलों में भाव और भाषा का वही हिंदी रूप दिखाई देता है, जो हिंदी के नवगीत या जनकविता का उभरता है। उन्होंने जाने-अनजाने कविता, गीत और गजल को, उनके विन्यास और माध्यम की भिन्नताओं के बावजूद एक दूसरे के बहुत समीप लाकर खड़ा कर दिया है। उनकी ये गजलें हिंदी कविता की इसी यथार्थवादी प्रकृति और मिजाज से पूर्णतः मेल खाती हैं। अतः कह सकते हैं कि नीरद के इस प्रतिनिधि संग्रह ‘अँधेरे बहुत सर उठाने लगे हैं’ की गजलें समग्र हिन्दी कविता की श्रीवृद्धि करते हुए हिन्दी-गजल का बहुआयामी विकास करती हैं।’’

जब हरेराम ‘समीप’ जैसा समीक्षक संपादक ऐसी टिप्पणी करता है तो वह बहुत अर्थ रखती है। उन्होंने ‘नीरद’ की 145 गजलों का चयन कर के इस संग्रह में सहेजा है। हर ग़ज़ल ‘नीरद’ ग़ज़लगोई की विविधापूर्ण विशेषताओं का प्रतिनिधित्व करती है। ‘नीरद’ की ग़ज़ल में ज़िन्दगी के कअु यथार्थ का अनुभव खुल कर बोलता है। जैसे यह बानगी देखिए-
थपेड़ों पर  थपेड़े   खा रहा हूँ
किनारा बन के मैं पछता रहा हूँ
दिलासों के थमाकर झुनझुने कुछ
अपाहिज सत्य को बहला रहा हूँ
जगत कुरुक्षेत्र था, कुरुश्रेत्र अब भी
मैं अर्जुन क्यों नहीं बन पा रहा हूँ
जो संवेदनशील है उसे वे सारे मुद्दे व्याकुल करते हैं जिनसे इंसानियत हताहत होती दिखाई देती है। जैसे धर्म के नाम पर बहुत शोर होता रहता है किन्तु दुखी, पीड़ित, शोषित इंसानों की ओर किसी का ध्यान नहीं जाता है। इस स्थिति से असहज हो कर ‘नीरद’ कहते हैं कि-
कभी है राम का मुद्दा कभी रहमान का मुद्दा
उठेगा तो उठेगा कब दुखी इन्सान का मुद्दा
बढ़ाये हाथ उसने तो सुनामी कह टूटा है
समंदर ने किया कब हल है रेगिस्तान का मुद्दा
जतन लाखों किये फिर भी न सुलझी दर्द की गुत्थी
ये जीवन है कि हिन्दुस्तान - पाकिस्तान का मुद्दा
‘नीरद’ की ग़ज़लों में कबीर का लहज़ा दिखाई देता है जब वे धर्म के नाम पर छलने और छले जाने पर चोट करते हैं। वे इस ओर भी ध्यान दिलाते हैं कि मानवता पर वहशीपन हावी होता जा रहा है जिसे दूर करने के लिए अब गंभीरता से यत्न किया जाना आवश्यक है -
पुण्य कहलाती ठगी, कुछ कीजिये
सोच को दीमक लगी, कुछ कीजिये
बज रहें घड़ियाल-घंटे बोध के
पर नहीं गैरत जगी, कुछ कीजिये
किस तरह वहशी हुआ मानव, उसे
लग रही नफरत सगी, कुछ कीजिये
अशोक कुमार ‘नीरद’ कटाक्ष करने में भी माहिर हैं। राजनीति का मोहपाश हो या ब्रेनवाश करने वाले केन्द्र हों, कोई भी उनकी पैनी दृष्टि ये ओझल नहीं हो पाते हैं। ‘नीरद’ उन सबको अपनी ग़ज़लों के माध्यम से आड़े हाथों लेते हैं। जैसे इस ग़ज़ल को देखिए-
सियासत है नगर ऐसा जहाँ बस, जाया जाता है
गये तो लौटकर वापस नहीं फिर आया जाता है
बड़ी ही सुर्खियों में हैं मिलन की पाठशालाए
कि जिनमें प्यार से नफरत का फन सिखलाया जाता है
भौतिकता और बाज़ारवाद की अंधी दौड़ ने भ्रष्टाचार और स्वार्थ को बेतहाशा बढ़ावा दिया है। सच क्या है, झूठ क्या है? इसे जानने का कोई साधन नहीं बचा है सिवाय स्वविवेक के। किन्तु भौतिक लिप्सा स्वविवेक को भी रौंदने लगती है। ऐसी स्थिति में ‘नीरद’ कहते हैं-
नजारे नजर कैसे आने लगे हैं
सितमगर पयंबर कहाने लगे हैं
तिजारत में डूबी हुई है मुहब्बत
दिलों को कपट गुदगुदाने लगे हैं
समय के हुए पारखी लोग कितने
मिले जो भी अवसर भुनाने लगे हैं

यही कारण है कि ‘नीरद’ खुले शब्दों में भी बयान करते हैं वर्तमान दशा का और कहते हैं कि ‘‘अंधा है इन्साफ सिंहासन बहरा है/सच वालों पर सख़्त सितम का पहरा है।’’ साथ ही, वे कहीं-कहीं विक्षुब्ध हो कर दार्शनिक स्वर में कह उठते हैं-
हीरा तजकर पत्थर अर्जित करता है
थोथा क्यों जग को आकर्षित करता है
जीवन है सद्भावों का संगम फिर क्यों
सभ्य मनुज विघटन संवर्धित करता है
अचरज है वो शामिल है विद्वानों में
पाखंडों को जो संदर्भित करता है

जब अंधेरे बहुत सर उठाने लगते हैं तो कवि अपने काव्य की मशाल ले कर आगे आता है। कवि अशोक कुमार ‘नीरद’ भी अपनी ग़ज़लों के माध्यम से समस्त अव्यवस्थाओं एवं मानसिक पंगुता को ललकारा है। उनकी इस प्रकार की ग़ज़लों का चयन कर उन्हें सहेजने का जो कार्य हरेराम ‘समीप’ ने किया है, वह ‘नीरद’ की ग़ज़लों को एक दीर्घकालिक समय यात्रा पर ले जाने में सक्षम है। देखा जाए तो यह भी एक विशेष सौजन्यता एवं साहित्यधर्मिता की मिसाल है कि एक ग़ज़लकार अपने समकालीन दूसरे ग़ज़लकार की ग़ज़लों की मुक्तकंठ पैरवी करे। इससे हिन्दी साहित्य का भविष्य दृदृढ़ होता दिखाई देता है। साथ ही उस दीर्घ परंपरा से भी जुड़ने का अवसर इस गंज़ल संग्रह के द्वारा मिलता है जो दुष्यंत के पहले से और दुष्यंत के बाद तक सतत चली आ रही है। निश्चित रूप से यह एक महत्वपूर्ण ग़ज़ल संग्रह है जो शोधार्थियों एवं पाठकों के लिए समान रूप से उपयोगी है।  
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Saturday, December 6, 2025

टॉपिक एक्सपर्ट | चलो, आवारा पशुअन खों सोई मताई-बाप मिल जैहैं | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | पत्रिका | बुंदेली कॉलम

टॉपिक एक्सपर्ट | चलो, आवारा पशुअन खों सोई मताई-बाप मिल जैहैं | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | पत्रिका | बुंदेली कॉलम
टाॅपिक एक्सपर्ट
चलो, आवारा पशुअन खों सोई मताई-बाप मिल जैहैं
       - डॉ (सुश्री) शरद सिंह

         जे अपने ई सहर में रोडन की तीन पिराबलम बरहमेस बनी रैत हैं- एक तो जे बनत हैं फेर खुदत हैं, बनत हैं खुदत हैं, बनत हैं खुदत हैं। दूसरी पिराबलम जे के इनपे टिरेफिक की अत्ते मची रैत हैं। को कब कां से निकर आए ईको कोनऊं ठिकानों नईं। कब कोऊं फर्राटा भरत भओ बाजू से कढ़ जाए, कछू कओ नईं जा सकत। गलियन-कुलियन में कछू रोडें सो बच्चा हरों के खेलबे को मैदान बनी रैत आएं तो कछू स्पीड ब्रेकरन से पटी रैत आएं। जेई से तो जे चुटकुला चलत आए के जोन ने सागर की रोडन पे गाड़ी चला लई बा देस के कोनऊं बी सहर में गाड़ी चला सकत है। खैर, तीसरी सबसे बड़ी पिराबलम आए आवारा पशुअन की। बे छुट्टा-छोर घूमत रैत आएं। कऊं बी पसर गए, कऊं बी ठाड़़े हो गए। औ कभऊं बी आपस में लड़ परत आएं। जबें भरी रोड पे दो सांड लड़ परें, सो आपई सोंस लेओ के का होत हुइए। दो-चार जने के हात-गोंड़ तो टूटतई आएं।
     अब जे अच्छो होबे जा रओ के आवारा पशुअन खों गोद ले लौ जैहे। रामधई, कित्तो नोनों आइडिया आए जे। उन पशुअन खों ठिकानों मिल जाहे औ रोडन खों उनसे छुटकारो। मनो जे तो प्लान बनाओ गओ आए आवारा गइया, बैलवा के लाने, बाकी कुत्तन खों को गोद ले रओ? काए से के शहर में कुत्ता सोई मुतके आएं जो ईको, ऊको काटत फिरत हैं। बाकी जित्ते आवारा पशुअन खों गोद लओ जा रओ उनखों औ उनको गोद लेबे वारों खों बधाई! उमींद आए के ईको रिजल्ट अच्छो रैहे।
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Thank you Patrika 🙏
Thank you Dear Reshu Jain 🙏
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Friday, December 5, 2025

शून्यकाल | अटल जी के विचार धर्मस्थलों के राजनीतिक उपयोग पर | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नयादौर

शून्यकाल | अटल जी के विचार धर्मस्थलों के राजनीतिक उपयोग पर | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नयादौर
शून्यकाल
अटल जी के विचार धर्मस्थलों के राजनीतिक उपयोग पर
 - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह

     ‘‘जो राजनीति को सम्प्रदाय के साथ जोड़ते हैं या सम्प्रदाय को राजनीति के साथ सम्बद्ध करते हैं, वे अंतःकरण से असाम्प्रदायिकता के सिद्धांत में विश्वास नहीं करते। फिर चाहे वे साम्प्रदायिकता के विरुद्ध कितने ही भाषण दें, अधिवेशन में बैठ कर लम्बे-लम्बे प्रस्ताव पास करें। आज राजनीति और सम्प्रदाय को मिलाने के फिर से प्रयत्न हो रहे हैं। अगर इनको रोका नहीं जा सका तो देश में साम्प्रदायिकता फिर से सिर उठाएगी और हमारी स्वतंत्रता और राष्ट्रीय एकता के लिए एक भयंकर संकट खड़ा हो जाएगा।’’- यही तो कहा था अटल बिहारी वाजपेयी ने जो सर्वकालिक सटीक आग्रह कहा जा सकता है।
 

धार्मिक स्थलों का राजनीतिक मामलों के लिए उपयोग किया जाना चाहिए या नहीं? यह एक विवाद का प्रश्न रहा है। एक पक्ष सहमत होता है तो दूसरा असहमत। इस ज्वलंत प्रश्न पर अटल बिहारी वाजपेयी ने 17 फरवरी, 1961, लोकसभा में धर्मस्थलों का राजनीतिक उपयोग करने से रोकने के सम्बन्ध में प्रस्ताव के अंतर्गत भाषण देते हुए अपने जो विचार प्रकट किए थे, वे इस प्रकार थे-
‘‘सभापति जी, 
मैं इस प्रस्ताव का समर्थन करने के लिए खड़ा हुआ हूं, यद्यपि चाहता हूं कि प्रस्ताव के अंतर्गत प्लेसस आॅफ पिलग्रिमेज का,े तीर्थ के जो स्थान हैं, उनको लाने के सम्बन्ध में प्रस्तावक महोदय को फिर से विचार करना चाहिए। जहां तक पूजा के स्थानों का राजनीतिक प्रचार के लिए दुरुपयोग रोकने का प्रश्न है, इस सम्बन्ध में दो मत नहीं हो सकते और अगर हम भारतीय गणराज्य के असाम्प्रदायिक स्वरूप को सुरक्षित रखना चाहते हैं तो इस सम्बन्ध में हमारे सामने अंतिम निर्णय लेने की स्थिति आ गई है। जिन परिस्थितियों में देश का विभाजन हुआ, विभाजन के जिन दुष्परिणामों को हम अभी तक भूल नहीं सके हैं, उनको ध्यान में रख कर हमें ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति को रोकना है जो राष्ट्रीय एकता को दुर्बल करती हैं, भारतीय गणराज्य के असाम्प्रदायिक स्वरूप पर कुठाराघात करती हैं और देश में फिर से साम्प्रदायिकता के उन्माद का जागरण करती हैं।
‘‘हमने एक असाम्प्रदायिक राज्य का निर्माण किया है। इसका स्वाभाविक पर्याय यह है कि राजनीति और सम्प्रदाय को अलग-अलग रखा जाना चाहिए। जो राजनीति को सम्प्रदाय के साथ जोड़ते हैं या सम्प्रदाय को राजनीति के साथ सम्बद्ध करते हैं, वे अंतःकरण से असाम्प्रदायिकता के सिद्धांत में विश्वास नहीं करते। फिर चाहे वे साम्प्रदायिकता के विरुद्ध कितने ही भाषण दें, अधिवेशन में बैठ कर लम्बे-लम्बे प्रस्ताव पास करें। आज राजनीति और सम्प्रदाय को मिलाने के फिर से प्रयत्न हो रहे हैं। अगर इनको रोका नहीं जा सका तो देश में साम्प्रदायिकता फिर से सिर उठाएगी और हमारी स्वतंत्रता और राष्ट्रीय एकता के लिए एक भयंकर संकट खड़ा हो जाएगा। 
‘‘हमने लोकतंत्रात्मक मार्ग का अवलम्बन किया है। किसी भी सम्प्रदाय को स्वतंत्रता है कि वह राजनीतिक दल का निर्माण करे, खुले मैदान में आकर चुनाव लड़े, अपनी आर्थिक और सांस्कृतिक समस्याओं पर विचार करे। इसके लिए मंदिर में, मस्जिद में, गुरुद्वारे या गिरजाघर में जाकर आंदोलन चलाने की क्या आवश्यकता है? मुझे ताज्जुब हुआ कि श्री सरहदी साहब ने जहांगीर के काल का उदाहरण दिया। समय बीत गया है। यह केवल सिख बन्धुओं के लिए ही सही नहीं है। अतीत काल में स्वतंत्रता के लिए जितने संघर्ष हुए, वे सब धर्म के साथ जुड़े हुए थे लेकिन आज पूजा की पद्धति को और राजनीति को जोड़ने का कोई औचित्य नहीं है। हां, गुरुद्वारे में बैठकर, मंदिर में बैठकर अगर पूजा करने में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है, राज्य की ओर से कोई भेद-भाव की नीति बरती जाती है, शुद्ध धार्मिक मामलों में, तो उसका विचार हो सकता है लेकिन मस्जिदों में चुनावों के सम्बन्ध में फतवे दिए जाएं, गुरुद्वारों से एक पृथक राज्य के निर्माण का राजनीतिक और साम्प्रदायिक आंदोलन चलाया जाए, गिरजाघरों को भारत की एकता को खंडित करने का केन्द्र बनाया जाए और फिर उसकी प्रतिक्रिया के फलस्वरूप लोग मंदिरों में भी राजनीतिक गतिविधियों को ले जाने का प्रयत्न करें, इसका समर्थन नहीं किया जा सकता। तेरह वर्ष हुए देश का विभाजन हुए।’’
(सांसद नवल प्रभाकर के इस हस्तक्षेप पर कि, ‘आर. एस. एस. की मीटिंगें मंदिरों में ही होती हैं।’)
‘‘आर.एस.एस. कोई राजनीतिक दल नहीं है और मेरा निवेदन है कि अगर होता हैं तो वह भी गलत हैं और वह चीज भी बंद होनी चाहिए, और जब मैं इस बात का समर्थन करता हूं तो आर. एस. एस. भी बचने वाला नहीं है मगर कांग्रेस के माननीय सदस्यों में यह नैतिक साहस होना चाहिए कि इस प्रस्ताव का वे समर्थन करें, मगर यह वे नहीं कर सकते। वे साम्प्रदायिकता के विरुद्ध भाषण दे सकते हैं मगर चुनाव लड़ने के लिए साम्प्रदायिक तत्वों से समझौता करते हैं। वे राष्ट्रीयता की बात करते हैं मगर दलों के स्वार्थों को बलि पर नहीं चढ़ा सकते। यही कारण है कि तेरह वर्ष के बाद भी साम्प्रदायिकता फिर से पनप रही है और यह तब तक नहीं मिटेगी जब तक कि हम इस साम्प्रदायिकता के सम्बन्ध में कभी न समझौता करने वाला दृष्टिकोण नहीं अपनाएंगे।
‘‘कोई भी दल हो, पूजा का कोई भी स्थान हो, उसको अपनी राजनीतिक गतिविधियां वहां चलाने की छूट नहीं होनी चाहिए। अभी कहा गया है कि राजनीतिक गतिविधियों की परिभाषा क्या हो, किसे कहा जाए कि यह राजनीतिक गतिविधि है और किसे कहा जाए कि यह नहीं है। मेरा निवेदन है कि केन्द्रीय सरकार ने अपने कर्मचारियों के लिए नियम बना रखे हैं कि वे राजनीति में भाग नहीं ले सकते। यह परिभाषा की कठिनाई उनके सामने तो नहीं आती है। सरकार का कोई कर्मचारी अगर राजनीतिक गतिविधि में भाग लेता है तो उसे दण्ड भोगना पड़ता है और अगर कोई परिभाषा की कठिनाई है भी तो उस पर बैठ कर विचार किया जा सकता है। उसके सम्बन्ध में लोगों की राय ली जा सकती है और एक ऐसी सर्वसम्मत परिभाषा बनाई जा सकती है, जिसके अंतर्गत सत्ता प्राप्ति को या राजनीतिक चुनाव लड़ने को इसमें शामिल करते हुए बाकी के सांस्कृतिक और धार्मिक अधिकारों पर किसी प्रकार का प्रतिबंध न लगे। 

‘‘इसके लिए आवश्यक है कि इस प्रस्ताव की मूल भावना से सब सहमत हों। राजनीतिक गतिविधियों की परिभाषा नहीं हो सकती, इसलिए धार्मिक स्थानों में राजनीति चलती रहे, इस चीज को स्वीकार करने के लिए मैं तैयार नहीं हूं। सिद्धांत के रूप में मैं चाहता हूं कि हम स्वीकार कर लें कि समय आ गया है कि पूजा के स्थान राजनीति के अड्डे न बनाए जाएं और फिर इसके लिए कैसा कानून बनाया जाए, उसकी परिभाषा क्या हो, उसकी परिधि क्या हो, ये विचार के विषय हो सकते हैं। इन पर मिल बैठ कर गम्भीरता से सोच सकते हैं। 
‘‘मेरा निवेदन है कि राष्ट्रीय एकता पर जो संकट है, कोई भी राष्ट्रवादी उसकी ओर से आंखें नहीं मूंद सकता और यह संकट भिन्न-भिन्न रूपों में खड़ा है। मेरा निवेदन है कि हम किसी भी सम्प्रदाय की साम्प्रदायिकता को बर्दाश्त न करें। चाहे वह कम संख्या वालों की हो, चाहे अनेक संख्या वालों की। जो नियम बनते हैं, वे सबके लिए एक से होते हैं मगर देखा गया है कि पंजाब में गुरुद्वारों में पुलिस नहीं जा सकती पर चंडीगढ़ के आर्यसमाज मंदिर में पुलिस प्रवेश कर सकती है। अगर नियम बने हुए हैं तो सभी के लिए एक से होने चाहिए। अभी जालंधर में आर्यसमाज मंदिर में प्रवेश पर रोक लगा दी गई थी, जबकि महीनों तक गुरुद्वारों का उपयोग क्या एक साम्प्रदायिक आंदोलन को चलाने के लिए नहीं होता रहा है?
‘‘वह रोक उठा ली गई है, इसका मैं स्वागत करता हूं। मैं इस बात का समर्थन नहीं करता कि आर्यसमाज के मंदिरों में राजनीतिक गतिविधियां चलें। मैं कहता हूं कि किसी को भी इस तरह की कार्रवाई करने का अधिकार नहीं होना चाहिए, फिर चाहे वो गुरुद्वारे हांे, चाहे आर्यसमाज मंदिर हों या दूसरे धर्मस्थान हों। इस सम्बन्ध में हमें कट्टरता और कठोरता की नीति अपनाने की आवश्यकता है। अगर हमने इस नीति को नहीं अपनाया तो असाम्प्रदायिक राज्य स्थापित करने का हमारा स्वप्न कभी भी सत्य नहीं हो सकेगा। 
‘‘देश के विभाजन से भी अगर हम शिक्षा नहीं लेंगे, राजनीति को मजहब से अलग नहीं रखेंगे, इस सम्बन्ध में जनमत की भावना का कानून के रूप में प्रयोग नहीं करेंगे तो केवल यह कह कर कि जनमत जाग्रत किया जाए, कोई अधिक परिणाम नहीं निकल सकता। मैं पूछना चाहता हूं कि हिन्दू कोड बिल के बारे में जनमत कितना जाग्रत किया गया था? हिन्दू कोड बिल तो बन गया मगर सिविल कोड बिल अभी तक नहीं बना है। गुरुद्वारों में पुलिस प्रवेश नहीं कर सकती, आर्यसमाज मंदिरों में कर सकती है। मस्जिदों में चुनाव जीतने के लिए फतवे दिए जा सकते हैं, विदेशी मिशनरी गिरजाघरों में बैठकर राष्ट्रीय एकता विच्छेदन करने के षड्यंत्र कर सकती हैं और इन सब चीजों को आज बर्दाश्त किया जाता है। अगर इन संकटों को हम आज भी नहीं समझेंगे तो हमारी स्वतंत्रता और हमारी राष्ट्रीयता की रक्षा नहीं हो सकेगी।
‘‘मैं कहना चाहता हूं कि यह प्रस्ताव नहीं है, यह शासन को कसौटी पर कसा जा रहा है और एक-एक कांग्रेसी की राष्ट्रीयता को मानो आज चुनौती दी जा रही है। अगर वे चाहते हैं कि राजनीति का साम्प्रदायिकता में प्रवेश नहीं होना चाहिए तो इस प्रस्ताव का उनको समर्थन करना चाहिए, वरना कहा जाएगा कि वे राष्ट्रीय एकता की बातें तो कर सकते हैं मगर उसके निर्माण के लिए कदम नहीं उठा सकते। धन्यवाद!’’
अटल बिहारी वाजपेयी के लोकसभा में इस भाषण से साफ पता चलता है कि वे धार्मिक स्थलों को समान राजनीतिक दृष्टि से देखे जाने के पक्षधर थे तथा धार्मिक स्थलों का राजनीति से दूर रहना उचित समझते थे।
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