Thursday, May 30, 2024

बतकाव बिन्ना की | जो नौतपा नोईं, सूरज देवता की थर्ड डिग्री आए | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
------------------------
बतकाव बिन्ना की
जो नौतपा नोईं, सूरज देवता की थर्ड डिग्री आए 
   - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
       आज संकारे से भौजी को फोन आओ। बे कैन लगीं के ‘‘बिन्ना तुमाए पास बुखार उतारबे की कोनऊं गोली होय सो बताओ, हम आ जाएं लैबे।’’
‘‘कोन खों बुखार आ गओ?’’ मैंने पूछी।
‘‘तुमाए भैयाजी खों!’’ भौजी ने बताई।
‘‘अरे, सो मैं आ रई गोली ले के। आप परेसान ने हो।’’ मैंने भौजी से कई।
‘‘अरे नई बिन्ना, तुम ने निकरो बाहरै! कऊं तुमें सोई लपट लग गई तो बड़ी मुस्किल हो जैहे। तुम घरे रओ! हम आ रए लैबे।’’ भौजी बोलीं।
‘‘अरे, आप ने घबराओ, अबे इत्ती धूप ने चढ़ी। अबे तो आठ बजे आएं।’’ कै के मैंने फोन बंद करो औ तुरतईं बुखार उतारबे वारी गोली ढूंढी औ भैयाजी के इते जा पौंची।
‘‘इने आपने पना नईं दऔ का?’’ मैंने पौंचतई साथ भौजी से पूछी।
‘‘पना बी दओ औ संगे हाथ-गोड़े में प्याज को रस सोई मलो। हम तो इनसे कै रए हते के दो-चार बेर आप आम औ पुदीना को पना पी लेओ, सो बिलकुल ठीक हो जैहो। पर इने तो बुखार उतारबे की गोली खाबे की परी।’’ भौजी बतान लगीं।
‘‘सो का भओ! गोली से तनक आराम मिलहे। बाकी आप जो दे रईं वोई सई आए।’’ मैंने भौजी से कई। फेर मैं भौजी खों बतान लगी,‘‘जब मैं लोहरी हती तो मोरी नन्ना जू सुई-तागा में प्याज पिरो के बाजू में ताबीज घांईं बांध देत्तीं। बा तनक बसात तो हती, पर लू से सोई बचात्ती।’’
‘‘औ का अपने देसी नुस्खा खूबई काम के रैत आएं। इनको कोनऊं साईड इफैक्ट बी नईं होत।’’ भौजी बोलीं।
‘‘हऔ, एक बड़ों गजब को नुस्खा आए, के जोन को अधकपारी मने आधे मूड़ की पीरा हो रई होय, बा संकारे से जलेबी खा ले सो मूड़ की पीरा ठीक हो जात आए।’’ मैंने भौजी को बताई।
‘‘तुमें पता? मट्ठा में गुड़ डार के पीबे से हाजमा सही हो जात आए।’’ भौजी बोलीं।
‘‘हऔ, अजवाईन खों उबाल के ऊको पानी पीबे से सोई अफरा ठीक हो जात आए।’’ मैंने बी कई।
‘‘तुम दोई खों अपनी-अपनी डाॅक्टरी सूझ रई, हमाई फिकर दोई को नईयां।’’ भैयाजी रिसात भए बोले।
‘‘ऐल्लो! जो आपकी फिकर ने होती तो का मोय करिया कुत्ता ने काटी रई के मैं इत्ती गरमी में आपके लाने बुखार उतारबे वारी गोली ले के भगत आई।’’ मैंने सोई भैयाजी खों तनक हड़काओ, ‘‘अरे, तनक-सी लू लगी आए, ओई में नखरा पेल रए।’’
‘‘हऔ, औ बा बी ठीक-सी हो गई आए।’’ भौजी बोलीं। फेर बतान लगीं, ‘‘काल जब हमने इनसे कई रई के दुफारी को कऊं ने जाओ नौतपा लगे आएं, सो हमाई बात ने मानीं। कैन लगे के हमाओ दोस्त आओ बिदेस से ओसे मिलबे जाने। का पता फेर कब भेंट होय। जे ऊके इते गए, सो बे धनी एसी में सो रए हते। इने देख के उने कोई खुशी ने भई। ऊने मन मार के इने तनक देर बैठाओ औ फेर मूड़ पिरा रओ को बहानो कर के इने टरका दओ।’’
‘‘कऊं नईं, ऐसो नई भओ। ऊने टरकाओ नईं, ऊको सई में मूड़ पिरा रओ हतो।’’ भैयाजी अपनी छिपाबे के लाने ऊको पक्ष लेन लगे।
‘‘हऔ, चलो जे ई सई, पर आप खों तो ने रोको, औ दुफारी की लपटन में अपने घरे से लौटन दओ। जो आपको सई को दोस्त होतो तो आपको सोई अपने इते संझा लों रोक लेतो।’’ भौजी ने खरी-खरी कै दई।
‘‘अब बा सब छोड़ों, तुम सोई कां की ले बैठीं। लू-लपट लगने हती, सो लग गई। जो भुगतबे को लिखो रैत आए, सो भुगतनेई परत आए।’’ भैयाजी बात बदरवाने के लाने बोले।
‘‘गर्मी सो दिन ई दिन बढ़त जा रई। औ बढ़े काए न, पेड़ काट डारे, कुआ-तला सुका डारे, अब गर्मी ने पड़हे सो का पड़हे?’’ मैंने भैयाजी से कई।
‘‘अरे बिन्ना इत्तई नईं, जे पहड़ियां खोद-खोद के गढ़ा बनाए डार रए। सब कछू उलट-पलट होत जा रओ।’’ भैयाजी बोले।
‘‘जेई तो बात आए भैयाजी! आपई सोचो के जोन गरम हवाएं राजस्थान से अपन ओरन के तरफी आत्तीं तो जे जंगल, पहाड़ उने छेंक लेत्ते। इते आउत-आउत बे तनक ठंडी हो जात्तीं। अब का आए के, जोन जे चार लेन, आठ लेन के हाईवे बना दए गए, बोई हाईवे पे जे गरम हवाएं सोई सरपट दौड़त आऊत आएं। मनो बिकास के लाने जे हाईवे जरूरी आएं, पर ऊ जमीन के जित्ते पेड़ काटे गए का उत्ते ऊके आस’पास लगाए गए? कऊं कनेर लगे, तो कऊं बोगनबिलिया लगीं। देखत में नोंनी भले लगें, पर बे वृक्षन जैसी ने तो छाया दे सकत आएं औ ने लपटन वारी हवाओं खों ठंडी कर सकत आएं। काय से के बे सब लगाए गए डिवाईडर पे औ उने कर दओ गओ मुंडी-कट।’’ मैंने भैयाजी से कई।
‘‘हऔ बिन्ना! हमें तो जे लगत आए के अब कऊं कोनऊं पेड़ कटत आए तो कोऊं बिरोध नईं करत आए। पैले बो कोन सो आंदोलन चलो रओ, अरे उते उत्तराखंड मे, जोन में उते के लोग पेड़ से चिपट के ठाड़े हो जात्ते, के जो अब तुमें आरी चलाने तो पैले हमें काटो, फेर पेड़ काटियो।’’ भैयाजी बोले।
‘‘ऊको नांव हतो चिपको आंदोलन। सुंदरलाल बहुगुणा ऊके नेता हते। उनई ने गढ़वाल क्षेत्र में बा आंदोलन चलाओ रओ। अब बो टाईप के लोगन की सोच ने रई। अब तो जे आए के कां प्लाट ले लओ जाए, कां मकान बना लओ जाए, कां फारम हाऊस बना लओ जाए। चाए फारम जोग जमीन पे प्लाटिंग करत जा रए, मनो फारम हाउस चाउने। जे नईं सोचत आएं के निंदा रैबे के लाने हवा, पानी, अनाज पैले चाउने, बाकी सब सो बाद में।’’ मैंने कई।
‘‘हऔ बिन्ना! जो गरमी पड़त आए सो सब खों पेड़ कटबे को मलाल होत आए, औ जोन गरमी गई, सो फेर पेड़ की सुरता कोनऊं खों नईं रैत। कल की अब हम का बताएं तुमें, ऐसो लग रओ हतो के आसमान से आग बास रई होय। औ जमीन से झार छूट रई हती। रामधई ऐसो लग रओ हतो मनो कोनऊं भट्ठी में घुंस गए होंए। सांस लेन में करेजा तक तपो जा रओ हतो। जेई में तो लपट लग गई। जबके हम घरे से पना पी के निकरे हते। मनो सूरज भगवान सो भुट्टा सो भून रए हते।’’ भैयाजी बोले। फेर तनक धीरे से बोले,‘‘वैसे तुमाई भौजी सई कै रई हतीं। उन्ने तो पैलई हमें जाबे से रोकी हती, हमई ने माने। औ जब उन्ने देखो के हम दुफारी के एक पे गए औ पौने दो पे आ गए सो बे सब समझ गईं। मनो अब हम तुमाई भौजी से का कैते? बे तो हमाई फिकर कर रई हतीं। औ घरे आतई साथ हमाई तो दोई आंखें ऐसी लगें, मनो जलन से बर रई होंय। पुरो शरीर तपन लगो। मूड़ चटकन लगो। हम समझ गए के लपट लग गई। जो लों तुमाई भौजी सोई समझ गई रईं। उन्ने तुरतईं हमाई गदिया औ तलुवा में प्याज को रस मलो औ हमें पना पिआओ। तब कऊं जा के तनक ठंडक लगी। ने तो ऊ टेम पे तो ऐसो लग रओ हतो के हमाओ राम नाम सत्त भओ जा रओ।’’
‘‘ऐसो बुरौ ने बोलो भैयाजी! आप संझा लौं पूरे ठीक हो जैहो।’’ मैंने भैयाजी खों सहूरी बंधाई। बाकी मैं समझ गई हती के भैयाजी को बुखार उतारबे की गोली खाबे की उत्ती ने परी हती जित्ती के मोरे संग बतकाव करबे की परी हती। ऐसे कैते तो भौजी मना कर देतीं, के गरमी में बिन्ना खों ने बुलाओ, सो उन्ने गोली की बात करी। काय से उने पतो आय के मोरे पास बुखार की, पेट दरद की, औ हाथ-पांव दरद की गोलियां बरहमेस रैती आएं।  
‘‘बिन्ना!’’भैयाजी बोले।
‘‘का भैयाजी?’’ मैंने पूछी।
‘‘का भगवान खों तनकऊं दया नईं आत आए के मानुस गरमी से मरे जा रए, सो तनक रहम कर दओ जाए?’’ भैयाजी ने मोसे पूछी।
‘‘ई बात खों मैंने बी सोची रई। फेर मोय समझ में आई के लोग भगवान की बात कबे मानत आएं? भगवान ने गर्मी दई तो पेड़-पौधा सोई दए, के छाया रए। उन्ने तो नई कई के पेड़न खों काट डारो। जेई लाने सबरे भगवान जी ने सूरज भगवान खों पुलिस घांई अधिकार दे डारे के जे मानुस हरें पेड़ काटबे को अपराध कर रए, सो इने तनक थर्ड डिग्री को डंडा घुमा देओ। सो जे जो लू-लपट चल रई जे सूरज देवता की थर्ड डिग्री आए।’’ मैंने भैयाजी खों बताई।
‘‘सूरज देवता की थर्ड डिग्री! खूब कई! मनो बिन्ना हमने तो एकऊं पेड़ ने काटे, सो हमें काय लपट को डंडा घलो?’’ भैयाजी ने पूछी।
‘‘पेड़ ने काटो आपने, पर कटबे से रोकबे के लाने बी तो कछू नई करो। आपई भर नोंई, अपन ओरें सबई अपराधी आएं। सो, जो पकरो गओ ऊको डंडा तो घलहे ई। सो मोय लपट को डंडा नईं खाने। अब धूप चढ़न लगी। सो मोय चलो चाइए।’’ मैंने कई और उते से निकर पड़ी।  
सो, आप सब ओरें बी अपनो खयाल राखियो औ सूरज देवता की थर्ड डिग्री से बचे रइयो। बाकी बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की।
 -----------------------------   
#बतकावबिन्नाकी  #डॉसुश्रीशरदसिंह  #बुंदेली #batkavbinnaki  #bundeli  #DrMissSharadSingh #बुंदेलीकॉलम  #bundelicolumn #प्रवीणप्रभात #praveenprabhat  

Wednesday, May 29, 2024

चर्चा प्लस | श्रीराम को छाया देने वाले वृक्ष आज कहां हैं? | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर

चर्चा प्लस   
श्रीराम को छाया देने वाले वृक्ष आज कहां हैं?
    - डाॅ (सुश्री) शरद सिंह                                                                                        
      हम श्रीराम के प्रति अगाध श्रद्धा रखने का दावा करते हैं। हम यह जानने को उत्सुक हैं कि जब श्रीराम सीता और लक्ष्मण सहित वनवास के लिए अयोध्या से निकले तो वे किन मार्गों से होकर लंका तक पहुंचे थे? इसीलिए श्रीराम के वन जाने का मार्ग खोजने का अभियान भी चलाया गया। बहुत कुछ सफलता भी मिली किन्तु एक कड़वा सच भी सामने आया कि हमने उन वृक्षों के साथ अमानवीयता बरती है जिन्होंने श्रीराम को वनगमन के दौरान शीतल छाया प्रदान की थी। आज हम गर्मी की प्रचंडता से घबराए हुए हैं, किन्तु हम सहानुभूति के पात्र नहीं हैं क्योंकि न हमने श्रीराम के वनगमन के उद्देश्य को समझा और न ‘‘रामायण’’ में उल्लेख किए गए वृक्षों का ध्यान रखा।
       ग्लोबल वार्मिंग कोई मिथक विचार नहीं है। वैज्ञानिक दशकों पहले से इसकी चेतावनी देते आ रहे हैं। ग्लोबल वार्मिंग का अर्थ है पृथ्वी का तापमान बढ़ना। पृथ्वी का तापमान बढ़ने से ग्लेशियर्स का पिघलना तेज होता जा रहा है। इससे एक ओर महासागरों का जलस्तर बढ़ रहा है तो दूसरी ओर पीने योग्य पानी के जलस्रोतों का जलस्तर घटता जा रहा है। जब अतिवृष्टि होती है, अति ठंड पड़ती है या अति गर्मी पड़ती है तो हम प्रकृति को कोसते हैं। लेकिन अपने गिरेबान में झांक कर नहीं देखते हैं कि इन सबके लिए हम मनुष्य ही जिम्मेदार हैं। वस्तुतः हम ऐसी आत्ममुग्धता से घिरे हुए प्राणी हैं जो स्वयं को सर्वश्रेष्ठ मान कर पृथ्वी पर मौजूद सभी जड़-चेतन के लिए संकट बढ़ाते जा रहे हैं। बात कहने में कठोर लग सकती है किन्तु सच्चाई यही है कि हम स्वयं को रामभक्त कहते हैं किन्तु यह क्यों नहीं समझ पाते हैं कि श्रीराम ने वनगमन को क्यों स्वीकार किया? महर्षि वाल्मीकि को क्या आवश्यकता थी कि वे वनगमन मार्ग के वृक्षों का उल्लेख अपने ग्रंथ में करते? वे तो श्रीराम की कथा लिख रहे थे, उन्हें प्रकृति-वर्णन की आवश्यकता क्या थी? यदि हम पल भर भी ठहर कर विचार करें तो हम इन प्रश्नों के उत्तर बड़ी आसानी से पा सकते हैं। हम मानते हैं कि श्रीराम एक अवतार थे। उनका जीवन एक ऐसी लीला थी जो शेष मनुष्यों को उचित ज्ञान दे सके। इसीलिए उन्होंने वनमार्ग को स्वीकार किया। वे जानते थे कि उनका वनमार्ग से गुजरना युगों-युगों तक वनसंपदा के प्रति मनुष्यों को जागरूक बनाए रखेगा।

महर्षि वाल्मीकि ने ‘‘रामायण’’ में ऐसे अनेक वृक्षों के नामों का उल्लेख किया है जिनके निकट से हो कर श्रीराम गुजरे थे अथवा उन्होंने उनकी छांह में विश्राम किया था अथवा जिनके बीच उन्होंने पर्णकुटी बना कर कुछ समय निवास किया था। महर्षि वाल्मिीकि भी शायद यही चाहते रहे होंगे की आने वाली पीढ़ियां उन वृक्षों से परिचित रहें और उनका संरक्षण एवं संवर्द्धन करें जिन्हें श्रीराम ने देखा था अथवा जिनकी छाया में उन्होंने विश्राम किया था। तब महर्षि वाल्मीकि को भी अनुमान नहीं रहा होगा कि कलियुग में मानव वृक्षों के प्रति इस तरह अमानवीय हो उठेगा कि उन वृक्षों को भी काटने से नहीं हिचकेगा जिनकी पूर्व पीढ़ी ने श्रीराम को साक्षात देखा था। महर्षि वाल्मिीकि नहीं जानते थे कि कलियुग में मनुष्यों में इतना दोहरापन आ जाएगा कि वह ईश्वर को मानने का धर्मांता की सीमा तक दावा तो करेंगे किन्तु उसके दिखाए मार्ग पर चलने के बारे में सोचेंगे भी नहीं, बल्कि उसके चले हुए मार्गों के चिन्ह ही मिटा देंगे।  

‘‘रामायण’’ एक ऐसा महाकाव्य है जिससे पूरा विश्व परिचित है। इस महाकाव्य में मूल कथा तो श्रीराम और सीता की है, लेकिन यह ग्रंथ उस समय के पेड़-पौधों के बारे में भी ज्ञान देता है। यह तो सभी जानते हैं कि जब श्रीराम वनवास गए तो सीता और लक्ष्मण भी उनके साथ गए थे। रास्ते में उनकी मुलाकात शबरी से हुई। शबरी ने अपने बेर तोड़े और श्रीराम को खिलाए। शबरी चाहती थीं कि जो बेर उन्होंने श्रीराम को खिलाए उनमें से कोई भी बेर खट्टा न हो। इसलिए उन्होंने चखकर बेर इकट्ठा किए और जब उनकी मुलाकात श्रीराम से हुई तो उन्होंने उन्हें अपने मीठे लेकिन झूठे बेर खिलाए। इस विवरण से पता चलता है कि उस काल में भी बेर के पेड़ पाये जाते थे। आज बेर के पेड़ कम होते जा रहे हैं। आधुनिक निर्माण के विस्तार ने बेर के पेड़ को हाशिए पर ला दिया है।

इसी तरह एक और पेड़ है जो ‘‘रामायण’’ पढ़ने वाले लगभग सभी लोगों को याद है। ये पेड़ है अशोक का वृक्ष़। जब रावण ने छल से सीता का हरण कर लिया था तो उसने सीता को अपने महल के बगीचे में अशोक के वृक्ष़ के नीचे रखा था। इसी संदर्भ में अशोक वृक्ष के आकार को लेकर भी एक रोचक घटना का उल्लेख मिलता है। जब वानर राजकुमार हनुमान सीता का पता लगाने के लिए लंका पहुंचे तो उन्होंने सीता माता को अशोक वृक्ष के नीचे बैठे देखा तो वे वृक्ष पर चढ़ गये और पत्तों में छिपकर बैठ गये। जब वे पहरेदारों से छिपकर सीता को श्रीराम का संदेश देने के लिए वृक्ष से नीचे उतर रहे थे तो उनका पैर फिसल गया, जिससे अशोक वृक्ष की एक तरफ की शाखाएं टूट गईं। किंवदंती है कि उस समय से अशोक वृक्ष की एक तरफ कोई शाखा नहीं रहती है। आज अशोक वृक्षों के लिए मंदिर परिसर के अलावा कम ही जगह बची है। कहीं-कहीं काॅलोनियों या होटल परिसर में में अशोक वृक्ष लगा भी दिए जाते हैं तो उन्हें कांट-छांट कर उनसे उनका प्राकृतिक विकास छीन लिया जाता है।  

वाल्मिकी रामायण में 182 प्रकार के पेड़-पौधों का वर्णन है। वाल्मिकी रामायण के प्रथम बालकाण्ड के सर्ग 24 से 27 में ‘‘ताड़का वन’’ का उल्लेख मिलता है। यह वन गंगा और सरयू नदियों के संगम के पूर्व में ताड़का नामक राक्षसी द्वारा आतंकित था और राक्षसी ताड़का के नाम से जाना जाता था। यह माना जाता है कि ताड़का वन वर्तमान बिहार के भू-भाग में था। यद्यपि कुछ लोग इसे पश्चिम बंगाल में गंगा के मैदानी इलाकों के नम पर्णपाती वनों से भी जोड़ कर देखते हैं, जहां धातकी, साल, इंद्रजौ, पाटला, बिल्व, गैब, कुटज, अर्जुन, तेंदू जैसे घने पेड़ बहुतायत में उगते थे। इसी प्रकार अरण्य कांड के 1 से 11 सर्गों में श्रीराम द्वारा दण्डकारण्य क्षेत्र में गमन के दौरान मिले विभिन्न आश्रमों एवं तीर्थों के उल्लेख में जामुन, बकुल, चम्पा के वृक्षों के साथ-साथ ऊंचे-ऊंचे साल वृक्षों वाले नम पर्णपाती वन क्षेत्र का वर्णन है। जो आज भी पूर्वी मध्य प्रदेश में पाया जाता है। यही विशेषता छत्तीसगढ़ और निकटवर्ती महाराष्ट्र, उड़ीसा और आंध्र प्रदेश के जंगलों की भी है। जिससे अनुमान लगाया जा सकता है कि श्रीराम इन वनों से हो कर गए थे।

अरण्यकांड के 15वें सर्ग में गोदावरी के तट पर सह्याद्रि पर्वत में पंचवटी वनों का उल्लेख है, जिसमें पश्चिमी घाट की ऊंची चोटियों के साथ घास के मैदानों में मिश्रित पर्णपाती वनों का उल्लेख है। जहां नदी के तट पर खजूर, ताल के वृक्ष हैं, मैदान में कुश, काश, बांस, आम, कदम्ब, कटहल, शमी, बेर हैं तथा पर्वतों में विविध पुष्पों की लताओं से लदे हुए वन का वर्णन है। साल, पाटला, चंदन, पुन्नाग, अशोक के पेड़ों का भी उल्लेख है। यह विवरण आज भी महाराष्ट्र के पश्चिमी घाट के पाश्र्व पहाड़ी ढलानों के मुख्य भौगोलिक दृश्यों ये मेल खाताहै।
रामायण में अयोध्या कांड के सर्ग 54 से 55 तथा सर्ग 95 में प्रयाग से चित्रकूट तक वन मार्ग का वर्णन मिलता है, जिसमें और भी दूर यमुना नदी के तट पर बांस तथा नरकट के वन हैं। किनारों पर बरगद, नीम, आम हैं, कटहल के पेड़ों की सघनता वाले शुष्क पर्णपाती जंगल और फिर चित्रकूट की पहाड़ियों में साल के पेड़ों के नम पर्णपाती जंगल का उल्लेख है। इसके साथ ही इन वनों में विभिन्न प्रकार की कंदीय प्रजातियों के पौधों की प्रचुरता का भी उल्लेख मिलता है, जो आज भी प्रयाग से यमुना नदी के दक्षिण में उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के विंध्याचल वनों की विशेषता है। अयोध्या काण्ड 55 के अनुसार प्रयाग से चित्रकूट के रास्ते में एक बरगद का पेड़ था, जिसका दर्शन श्रीराम ने अपने वनवास के दौरान किये था। नासिक में पांच बरगद के पेड़ों का एक समूह है जिसे पंचवटी के नाम से जाना जाता है जहाँ श्री राम, लक्ष्मण और देवी सीता अपने वन निर्वासन (नासिक पंचवटी, नासिक जिला, महाराष्ट्र) के दौरान रुके थे।

अरण्यकांड के 75वें सर्ग में ऋष्यमूक पर्वत और पंपासरोवर का वन क्षेत्र का उल्लेख है जो वर्तमान कर्नाटक में है और पश्चिमी घाट पर्वत के उष्णकटिबंधीय वर्षा वनों के साथ-साथ किनारे पर पर्णपाती वन भी हैं। जिसमें झील में मौजूद कमल, विभिन्न किस्मों के कुमुदनी, किनारों पर ताल के पेड़ के साथ-साथ कुश, काश, बांस, आम, कदंब, तिलक, केला, कटहल, बकुल, मैदानी इलाकों में चंपा और साल, पाटला, चंदन, पुन्नाग शामिल थे। पर्वतों में अशोक के वृक्षों के साथ-साथ जूही, मालती, मोगरा आदि विभिन्न पुष्पों की लताओं से लदे वन थे।
रामायण में ही एक और कथा है जिसमें श्रीराम ने साल वृक्ष की ओट ली थी। किष्किंधा राज्य में पंपा नदी के निकट वानरों का राज्य था। बाली और सुग्रीव दो भाई थे जो किष्किंधा के राजा के पुत्र थे। दोनों के बीच राज्य को लेकर विवाद हो गया। सुग्रीव बाली को परास्त करने में असमर्थ थे। उसी दौरान वन जाते समय उनकी भेंट श्रीराम से हुई। उस समय तक रावण सीता का हरण कर चुका था और श्रीराम सीता की खोज कर रहे थे। तब सुग्रीव ने श्रीराम की मदद करने का वादा इस शर्त पर किया कि राम पहले उनकी मदद करें। उन्होंने राम से बाली को मारकर राज्य देने की प्रार्थना की। तब श्रीराम ने देखा कि बाली एक अत्याचारी राजा था, इसलिए उसके मारे जाने पर प्रजा को कोई हानि नहीं होगी। इसीलिए जब बाली और सुग्रीव आपस में लड़ रहे थे तो श्रीराम ने साल वृक्ष के पीछे छुपकर बाली पर तीर चलाया और उसे मार डाला। यद्यपि श्रीराम का यह कृत्य उचित नहीं माना जाता है, लेकिन इस कथा से पता चलता है कि वहां साल वृक्षों का घना जंगल है।

जब हम ‘‘रामायण’’ अथवा रामकथा का कोई भी ग्रंथ पढ़ते हैं तो क्या कभी सोचते हैं कि आज उन वृक्षों की क्या स्थिति है जिनका उल्लेख श्रीराम के काल में मिलता है? सच तो यह है कि अकसर हमारा ध्यान ही नहीं जाता है इन वृक्षों के उल्लेख के बारे में। हम श्रीरामकथा को पढ़ते समय उनकी ईश्वरीय शक्ति को ही ध्यान में रखते हैं जिससे उनकी स्तुति कर के हमें तात्कालिक व्यक्तिगत लाभ मिल सके। श्रीराम के वनगमन के मार्ग को ढूंढने में विविध भौगोलिक साक्ष्यों के साथ प्राचीन साहित्य का भी सहारा लिया गया। यदि जंगलों की अंधाधुंध कटाई न की गई होती तो अकेले ‘‘रामायण’’ में ही उल्लेख किए गए वृक्षों के ज्ञान के सहारे श्रीराम के वनगमन का मार्ग आसानी से ढूंढा जा सकता था। यह भी विचारणीय है कि श्रीराम ने एक सामान्य मनुष्य की भांति प्रकृति अर्थात वनमार्ग चुना क्योंकि वे वनसंपदा और वृक्षों की वंश परंपरा को सुरक्षित रखना चाहते थे। वे जानते थे कि वे सीता और लक्ष्मण के साथ जिस मार्ग से गुजरेंगे उस मार्ग की वनसंपदा के प्रति लोगों में स्नेह और श्रद्धा रहेगी। आज हम वंश परंपरा को तो मानते हैं किन्तु दूषित तरीके से। मात्र अपने कुल, परिवार के वंश बढ़ाने के लिए एक पुत्र की कल्पना करते हैं और इस चक्कर में पुत्रियों तक की अवहेलना कर देते हैं। ऐसी सोच के चलते वृक्षों की वंश परंपरा को बचाने के बारे में चिंता करने का तो सवाल ही नहीं उठता है। बस, जब गर्मी के मौसम में पारा 50 डिग्री को पार करने लगता है और हमें आसमान से आग बरसती हुई प्रतीत होती है, तभी हमें वृक्षों की कमी महसूस है। मौसम बदलते ही हम वृक्षों के प्रति पहले की तरह उदासीन और क्रूर हो जाते हैं। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है कि जैविक ईंधन फूंकती हुई हमारी गाड़ियों के लिए रास्ता चैड़ा करने के दौरान सौ-दो वर्षों की आयु के पुराने पेड़ काटे जाते हैं औरे हम ‘उफ!’ भी नहीं करते हैं। यदि हमने ‘‘रामायण’’ में उल्लेख किए गए वृक्षों के महत्व को ध्यान दिया होता कि वे वृक्ष ही थे जिन्होंने श्रीराम, सीता और लक्ष्मण को छाया और आश्रय प्रदान किया, तो शायद वृक्षों की बेतहाशा कटाई करते समय हमारे हाथ कांपते जरूर और हम ग्लोबल वार्मिंग से भी अपनी पृथ्वी को बचाने में अपना योगदान दे पाते।  
        --------------------------
#DrMissSharadSingh #चर्चाप्लस  #सागरदिनकर #charchaplus  #sagardinkar #डॉसुश्रीशरदसिंह 

Tuesday, May 28, 2024

पुस्तक समीक्षा | डॉ. पन्नालाल जैन साहित्याचार्य के काव्य पक्ष को मुखर करता कविता संग्रह | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

प्रस्तुत है आज 28.05.2024 को  #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई ब्रम्हचारी डी.राकेश जैन जी द्वारा संपादित काव्य संग्रह "वासंती बयार" की समीक्षा।
-------------------
पुस्तक समीक्षा
डॉ. पन्नालाल जैन साहित्याचार्य के काव्य पक्ष को मुखर करता कविता संग्रह
 - समीक्षक डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
--------------------------------
कविता संग्रह  - वासंती बयार
संपादक      - ब्र.डी.राकेश जैन
प्रकाशक      - साहित्याचार्य डॉ. पन्नालाल जैन स्मारक समिति, सागर, (मप्र)- 470002
मूल्य         - मुद्रित नहीं 
-------------------
डॉ. पन्नालाल जैन साहित्याचार्य संस्कृत साहित्य एवं जैन वांग्मय के उद्भट विद्वान के रूप में ख्यातिलब्ध रहे हैं। 5 मार्च 1911 को पारगुआं, जिला सागर में जन्मे डॉ. पन्नालाल जैन के जीवन आदर्श गणेश प्रसाद वर्णी जी रहे। उन्हें आचार्य श्री शिवसागर जी तथा आचार्य श्री विद्यासागर जी का भी मार्गदर्शन प्राप्त हुआ। वे एक उत्कृष्ट शिक्षक के रूप में भी जाने जाते थे। उन्हें आदर्श शिक्षक के रूप में उन्हें सन 1960 मैं राष्ट्रपति महामहिम डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद जी द्वारा तथा सन 1969 मैं राष्ट्रपति डॉ वराह व्यंकटगिरी के द्वारा सम्मानित किए गए थे। वे श्री गणेश दिगंबर जैन संस्कृत महाविद्यालय सागर के प्राचार्य रहे, श्री वर्णी दिगंबर जैन गुरुकुल जबलपुर के मानक निदेशक रहे तथा इसके साथ ही वे निरंतर जैन धर्म ग्रंथों का अध्ययन, चिंतन एवं मनन करते रहे। उन्हें संस्कृत का भी गहन ज्ञान था। सागर नगर का सकल समाज उन पर गर्व करता रहा है। 9 मार्च 2001 को सिद्ध क्षेत्र कुंडलपुर जिला दमोह में डॉ पन्नालाल जैन का देवलोक गमन हुआ तत्पश्चात उनके स्मरण में सागर में एक स्मारक समिति का गठन किया गया जिसका नाम रखा गया “साहित्याचार्य डॉ पन्नालाल जैन स्मारक समिति”। इस समिति द्वारा प्रतिवर्ष उनकी जन्म जयंती का आयोजन किया जाता है। 

जो व्यक्ति संवेदनशील है उसका हृदय काव्यमय होना स्वाभाविक है। डॉ पन्नालाल जैन जी भी एक अच्छे कवि थे। किंतु जैन वांग्मय तथा संस्कृत ग्रंथों के अनुवाद कार्य कि उनकी ख्याति के सम्मुख उनकी कविताएं लोगों की स्मृतियों में कहीं पीछे छूटती गईं। इस संदर्भ में ब्र. डी.राकेश जैन ने “वासंती बयार” नाम से डॉक्टर पन्नालाल जैन की कविताओं का संपादन करके एक कविता संग्रह प्रकाशित करने का महत्वपूर्ण कार्य किया है। इस संग्रह की सबसे बड़ी उपादेयता यह है कि साहित्याचार्य डॉ पन्नालाल जैन की विविध मनोभावों की कविताएं पाठकों को एक ही संग्रह में प्राप्त हो जाएंगी तथा पाठक उनके काव्य पक्ष को समग्रता से जान सकेंगे।

बाल ब्रह्मचारी डी.राकेश जैन ने साहित्याचार्य की कविताओं का संकलन किया है तथा उन्हें चार भागों में विषय अनुसार विभक्त कर प्रस्तुत किया है। इससे संग्रह की कविताओं को पढ़ते समय एक ही भावभूमि की कविताओं को अलग-अलग प्रति भाग में पढ़ने का आनंद प्राप्त होगा। इससे पाठकों को विषय के मर्म को समझने का भी पर्याप्त अवसर  मिलेगा। प्रथम भाग में प्रकृति से संबंधित कविताएं हैं दूसरे भाग में धर्म एवं दर्शन से संबंधित कविताओं को रखा गया है तीसरे भाग में सामाजिक सरोकार की कविताएं हैं तथा चैथे भाग में कवि के नितांत निजी अनुभव से उपजी कविताएं हैं। 
“प्राकृतिक”, “धार्मिक”, “सामाजिक” तथा “प्रकीर्णक” शीर्षक में विभक्त प्रत्येक भाग में 10-10 कविताएं संग्रहित हैं।

संग्रह की भूमिका शोध सहायक जैन विद्या संस्थान श्री महावीर जी के नेमिचंद्र पटोरिया तथा सागर के साहित्यकार शायर एवं पूर्वप्राचार्य डॉ. गजाधर सागर ने लिखी है। ‘‘डॉ. पं. पन्नालाल जी साहित्याचार्य द्वारा रचित हिंदी कविताओं पर एक दृष्टि” शीर्षक से भूमिका लिखते हुए नेमीचंद्र पटोरिया ने  लिखा है कि “जैन साहित्य-जगत् ने विद्वान् पं. जी की रंग-बिरंगी गद्य-विधा को देखा, पढ़ा और बहुमान सराहा है। किन्तु हिन्दी में रचित पद्य-विधा या काव्यधारा से साधारण ही नहीं, अनेक विज्ञजन भी अनभिज्ञ हैं। इसका एक कारण तो यह है कि उनकी हिन्दी कवितायें एक ग्रन्थ में गुम्फित नहीं हैं। ये कवितायें अनेक पत्र-पत्रिकाओं में स्फुट प्रकाशित होकर बिखरी पड़ी हैं। साथ ही अब एक लम्बे अरसे से उनकी लेखनी पद्य रचना प्रसूत करने में उदासीन सी हो गयी है। लगभग 40-45 वर्ष पूर्व उनकी तरुण उमंग ने अपनी पद्यरचना को जैसा संवारा और सजाया था, उसमें उनकी प्रतिभा, कविता के अंग-अंग से अंगड़ाइयाँ लेती प्रतीत होती है। पं. जी का कवि उपनाम ‘वसन्त’ हैं।’’

‘‘डॉ. पं. पन्नालाल साहित्याचार्य जी की हिन्दी कवितायें मानवीय मूल्यों पर आधारित जीवन्त कवितायें’’ शीर्षक से भूमिका लिखते हुए डॉ. गजाधर सागर ने साहित्याचार्य की कविताओं के मानवीय मूल्यों को रेखांकित किया है। उन्होंने लिखा है कि ‘‘अपनी सभी कविताएं पंडित जी ने ‘वसंत’ उपनाम से रची हैं। कविताओं में आप रस, छंद, अलंकार यथा उपमा, अनुप्रास आदि आप खूब पाएंगे। समस्त कविताएं कोई न कोई संदेश अवश्य देती हैं। वे कविताएं मानवीय मूल्यों को उजागर करती हुई सबके कल्याण की बात करती हैं।’’

संस्कृत के विद्वान होने के कारण डॉ. पन्नालाल जैन की हिंदी भाषा पर भी गहरी पकड़ थी। उनकी कविताओं में शब्दों का चयन मनोभावों को जिस सुगमता से प्रकट करता है उतना ही लालित्य भी स्थापित करता है। कवि का सरोकार वैश्विक समाज से है इसीलिए अपनी कविता “प्रभात स्वागत” में सोती हुई विश्व जनता को जागने की बात की है। पंक्तियां देखिए-
दिव्य बोधमार्तण्ड प्रभा से 
भव्यों के मनकंज खिलाओ। 
बिछुरे हुए बन्धु चक्रों को 
प्रेम सूत्र से शीघ्र मिलाओ ।
सोती हुई विश्व जनता को 
मीठे स्वर से सद्य जगाओ। 
नई चेतना उसमें भर के 
सब अलसाई दूर भगाओ। 

साहित्याचार्य कवि ‘वसंत’ भारत के गौरव को पुनर्स्थापित होते हुए देखना चाहते थे उन दिनों गुलामी का समय था और देश स्वतंत्रता के लिए संघर्ष कर रहा था । उन दिनों उनकी “उषा” शीर्षक से उनकी कविता 16 अगस्त 1937 धर्मदिवाकर में, 22 मई 1937 शान्ति सिन्धु एवं जैन सन्देश में प्रकाशित हुई। यह कविता संग्रह में शामिल है। इसमें कवि की उत्कट आकांक्षा देखिए-
क्या कभी भारत गगन में 
वह उषा की दिव्य आभा । 
कर निशा का अन्त सत्वर 
फिर दिखावेगी स्व शोभा ?

धार्मिक कविताओं के भाग में वीर प्रार्थना, आओ भगवान महावीर, दशधर्म पद्यावली, अनित्य भावना, एकान्त और अनेकान्त, जैनी नीति, आत्मभावना, बाहुबली अष्टक, महावीर तथा दशधर्म सवैया शीर्षक से कविताएं हैं। “दशधर्म पद्यावली” शीर्षक कविता में दशधर्म के महत्व को समझाते हुए कवि ने “उत्तम तप” के अंतर्गत लिखा है -
इच्छाओं पर विजय प्राप्त कर जो तप करते, 
सदा हृदय को सत्य शान्ति से वे ही भरते। 
तप से कर्म समूह दूर सद्यः हो जाते।।

सामाजिक सरोकार की कविताओं में एक व्यंग्य कविता है “समाज का अभाग्य”। इस कविता के माध्यम से कवि ने समाज में व्याप्त दुरावस्था पर करारा प्रहार किया है। यह ऐसी कविता है जो वर्तमान में भी प्रासंगिक है। कविता की कुछ पंक्तियां देखिए-
माता वियोग मांहि सुत के तड़पती रहे 
कूट कूट छाती को रोते रहे बूढ़े बाप। 
बच्चे अनाथ चाहे खाने को तरसते रहें 
नारी असहाय हो पाती रहें भूरि ताप ।
बालिका जवान नित्य नाँख नाँख उष्ण सांस 
देती रहें प्रात शाम चाहे विशाल शाप। 
‘‘वसन्त’’ कवि ठेकेदार कहाके अहिंसा के 
लड्डू उड़ाना पर करना न बन्द आप ।

चतुर्थ भाग “प्रकीर्णक” के अंतर्गत संग्रहित कविताओं में कवि की आशा अभिलाष तथा आकांक्षा के सप्तरंग दिखाई पड़ते हैं। “मेरा पुस्तक प्रेम” कविता में भी लिखाते हैं-
त्रिलोक का राज्य कवीश में अभी 
सभी तुम्हारे पद-पद्म में अहो ! 
लिये सदा के प्रिय ! सौंपता कहो 
नहीं-नहीं पुस्तक खोलता हूँ कभी।

आज समाज में गुरु शिष्य परंपरा का शरण होता जा रहा है। गुरुओं के प्रति सम्मान की भावना में कमी दिखाई देती है। ऐसे समय में साहित्याचार्य कवि “वसंत” की “स्वागत गान” शिक्षक कविता बहुत अधिक महत्वपूर्ण है जो उन्होंने अपने गुरु की वंदना करते हुए लिखी है-
हे धन्य गुरुवर ! लोकहितकर ! पापनाशक ! 
शुभमति अज्ञानतम के नाशने को सूर्य सम प्रज्ञापते !।
संसार में खोजा बहुत पर तुल्य तेरे है कहाँ ?
स्वागत तुम्हारा आज करते हम सभी मिलकर यहाँ ।

डॉ. पन्नालाल जैन साहित्याचार्य अर्थात कवि “वसंत” की 40 कविताएं इस काव्य संग्रह “वासंती बायार” में संग्रहित है। इस संग्रह की कविताएं भाषा शिल्प एवं देश काल की विशिष्टताओं से परिपूर्ण हैं। इन कविताओं को पढ़ा जाना परंपरागत संस्कारों से परिचित होने के समान है। यद्यपि यह कविताएं उपदेशात्मक नहीं अपित आग्रह करती हुई संदेशात्मक हैं। इन कविताओं के द्वारा संस्कृत विद्वान तथा जैन वांग्मय के अनुवादक एवं लेखक का काव्य पक्ष मुखर होकर सामने आता है। अतः यह काव्य संग्रह डॉ. पन्नालाल जैन साहित्याचार्य की सृजनात्मक एवं विचारों को जानने का एक उत्कृष्ट स्रोत है। इस काव्य संग्रह के संपादक ब्रह्मचारी डी. राकेश जैन साधुवाद के पात्र हैं। यह संग्रह पठनीय भी है और संग्रहणीय भी।         
---------------------------- 
#पुस्तकसमीक्षा  #डॉसुश्रीशरदसिंह  #bookreview #bookreviewer  #आचरण  #DrMissSharadSingh

Saturday, May 25, 2024

टॉपिक एक्सपर्ट | पत्रिका | तनक तो गम्म खाओ | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

पत्रिका | टॉपिक एक्सपर्ट | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली में
..................................
टाॅपिक एक्सपर्ट
तनक तो गम्म खाओ
    - डॉ (सुश्री) शरद सिंह
      मुतकी गरमी पड़ रई। मुतकी लाईटें जा रईं। मुतके ढोर-डांगर रोडन पे दंगल कर रये। मुतकी रोडें खुदी डरीं। मुतकी रोडन पे जाम लग रये। पर सब कछू मुतको नई हो रओ। पानी की सप्लाई कऊं मोहाल में दो दिनां में हो रई, तो कऊं-कऊं तीन दिनां में हो रई। सो अब कोन खों फिकर? काय से के इते वोटें तो गिर गईं। चुनाव कढ़ गए। अब रिजल्ट आबे औ आचार संहिता हटबे के पैलई गुणा-भाग होन लगे टैक्स बढ़ाबे के लाने। तनक देखो तो, कितेक जल्दी मची परी। इत्ती जल्दी तो काम पूरो करबे में कभऊं ने दिखानी। सई में, जो आचार संहिता ने लगी होती तो बे ओरें कब के टैक्स-मैक्स बढ़ा चुके होते। मजे की बात तो जे के, टाटा वारों की पानी की लेन अबे ठीक से चालू बी ने भईं औ पानी को टैक्स बढ़ाबे की बात पक्की हो गई। मने इत्ती तेजी से औ कऊं बिकास होय चाए ने होए, पर टैक्स को विकास की योजना सबई तरफी बनन लगी। आचार संहिता हटी नईं के बढ़ो भओ टैक्स घींच पकरन लगहे। 
        मुतके मुहाल औ कालोनियां ऐसी आएं, जां नाली लौं ठीक से नईं बनीं। औ ने नालियन की सफाई भई आए। अबई बरसातें आईं जा रईं, सो घरों में नरदा को पानी घुंसहें। ऊपे भैया हरें घर को टैक्स बढ़ाबे खों उधारे घूम रए। संगे कओ जा रओ के इंदौर घांईं इते सोई सबरे टैक्स बढ़ाने। हऔ, बढ़ा लेओ, मनो पैले ई शहर खों इन्दौर घांईं बना तो लेओ। चलो, इन्दौर घांई ने बना पाओ, लेकन अपने शहर की कमियां सो दूर करो, मनो फेर, टैक्स ऊके बाद बढ़ा लइयो।
-----------------------------
Thank you Patrika 🙏
Thank you Dear Reshu Jain 🙏
#टॉपिकएक्सपर्ट #डॉसुश्रीशरदसिंह #DrMissSharadSingh #पत्रिका  #patrika #rajsthanpatrika #सागर  #topicexpert #बुंदेली #बुंदेलीकॉलम

Friday, May 24, 2024

शून्यकाल | प्राचीन भारत में उपभोक्ता संरक्षण | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नयादौर

दैनिक नयादौर में मेरा कॉलम 
"शून्यकाल"
प्राचीन भारत में उपभोक्ता संरक्षण
 - डाॅ (सुश्री) शरद सिंह                                                                                        
       वर्तमान समय उपभोक्तावाद का समय माना जाता है। बाज़ार के विस्तार ने उपभोक्ताओं का भी विस्तार किया है और उपभोक्ताओं के लिए उतने ही जोखिम बढ़ा दिए हैं। खरीदते समय अच्छे और बुरे प्रोडक्ट में अंतर जानना कठिन हो चला है। प्रयोग करने के बाद ही सच्चाई सामने आती है और तब ग्राहक स्वयं को ठगा-सा अनुभव करता है। इसीलिए उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम बनाया गया है। वैसे उपभोक्ताओं का सरंक्षण कोई नूतन विचार नहीं है। प्राचीन भारत में भी उपभोक्ता संरक्षण का प्रावधान था। बल्कि आज की अपेक्षा अधिक कठोर रूप में। 
     जब से मनुष्य ने विनिमय के क्षेत्र में प्रवेश किया तब से उसमें प्राकृतिक रूप से यह जागरूकता आ गई कि चाहे वस्तु के रूप में हो अथवा मुद्रा के रूप में मूल्य चुकाने के बाद उसे जो वस्तु अथवा सुविधा प्राप्त हो रही है वह उस मूल्य के बाराबर है अथवा नहीं। इसी प्राकृतिक चेतना के वशीभूत मनुष्य ने नाप एवं तौल प्रणालियों का प्रयोग प्रारम्भ किया तथा नाप एवं तौल के लिए समय-समय पर विभिन्न  मानक निर्धारित किए। जैसे- पूर्व वैदिक काल में गाय विनिमय का माध्यम मानी जाती थी। तब यह सुनिश्चित किया जाता था कि गाय दे कर प्राप्त होने वाली वस्तु का महत्व (मूल्य) दी जा रही गाय के बराबर है या नहीं। उत्तरवैदिक काल में निष्क, शतमान आदि मुद्राओं के माध्यम से मूल्य का निर्धारण किया जाने लगा। सैन्धव काल में लम्बाई नापने के लिए स्केलनुमा नाप-चिन्हित पट्टी का उपयोग किया जाता था। 
मुद्रा एवं बाजार व्यवस्था के विकास के साथ-साथ विनिमय के क्षेत्र में भी विस्तार हुआ तथा वे बुराइयां भी इसमें आती गईं जो मनुष्य की संग्रहण, लालच आदि प्राकृतिक बुराइयों से जन्मीं। व्यापारी एवं दूकानदार उपभोक्ताओं को धोखा देने का प्रयास करने लगे। वे अधिक  मूल्य लेकर कम सामान देते तथा सामान की उत्तमता में भी धोखाधड़ी करते। ऐसी स्थिति में राज्य की ओर से ऐसे अधिकारी नियुक्त किए जाने लगे जो नाप-तौल प्रणाली पर नियंत्रण रखें तथा उपभोक्ताओं को ठगे जाने से बचने में उनकी सहायता करें। धोखा देने वालों को कड़ी से कड़ी सजा देने का विधान राज्य की ओर से किया जाने लगा।                     
‘‘नारद स्मृति’’ में नारद ने उन नियमों का स्पष्ट उल्लेख किया है जिसमें किराए से गााड़ी लेने वालों के साथ धोखा करने वालों के लिए दण्ड का विधान है। व्यापारियों को अपना व्यापारिक माल एक स्थान से दूसरे स्थान ले जाने के लिए गाड़ी, नाव अथवा जहाज किराए पर लेना पड़ता था। ऐसे समय एक उपभोक्ता के रूप में उनके ठगे जाने के भी अनेक अवसर रहते थे। इस संबंध में नारद ने लिखा है कि  यदि व्यापारी आधा रास्ता चले जाने पर गाड़ी को छोड़ दे तो भी उसे पूरा किराया देना होगा किन्तु यदि गाड़ीवाला पूरे रास्ते माल न ले जाए तो उसे बिलकुल किराया नहीं मिलेगा। यदि गाड़ीवाले की असावधानी से माल की क्षति हो तो उसे क्षतिपूर्ति करनी होती थी। देश के अन्दर जिन वस्तुओं का व्यापार होता था उनमें अधिकतर दैनिक उपभोग की वस्तुएं होती थीं। जैसे-दूध, दही, घी, शहद, लाख, गरम मसाले, मदिरा, मंास, पकाया हुआ चावल, तिल, फूल, फल, मणियां, दास और दासियां, शस्त्र, नमक, रोटी, पौधे, कपड़े, रेशम, चमड़ा, हड्डियां, कंबल, पशु, मिट्टी के बर्तन, छाछ, शाक, अदरक तथा जड़ी-बूटी। नारद के अनुसार इन वस्तुओं की तौल तथा बिक्री ईमानदारी से की जानी चाहिए तथा ऐसा न करने वाले को दण्डित किया जाना चाहिए।
उपरोक्त सभी वस्तुएं गंाव के बाजारों में भी मिलती थीं किन्तु कुछ ऐसी वस्तुएं थीं जो व्यापारी दूर-दूर से ला कर शहरों में बेचते थे। ये व्यापारी कालीमिर्च, चंदन और मूंगा दक्षिण भारत से, कस्तूरी, केशर तथा चमर की पूंछ हिमालय क्षेत्र से, हाथी कलिंग, अंग और आसाम से तथा घोड़े उत्तरी-पश्चिमी भारत से लाते थे। ये व्यापारी सोना, तंाबा, लोहा और अभ्रक दक्षिण बिहार से और संभवतः सोना मैसूर से लाते थे। नमक समुद्रतट से और नमक की चट्टानों वाले स्थानों से लाया जाता था। संभवतः जहंा अनाज की कमी होती थी वहंा व्यापारी कुछ खाद्यान्न भी। इन वस्तुओं के मूल्य निर्धारण पर राज्य दृष्टि रखता था ताकि व्यापारी उपभोक्ता से अतिरिक्त धन न वसूल सकें।
मौर्यकाल में व्यापारियों को व्यापार करने के लिए ‘‘पण्य अनुमति’’ (लाइसंेस) देने तथा राजकीय व्यापारियों की गतिविधियों पर नियंत्रण स्थापित करने के लिए राज्य स्तर पर एक अधिकारी नियुक्त किया जाता था जिसे ‘’पणाध्यक्ष’’ कहते थे। पणाध्यक्ष प्रत्येक मंडियों में अपना प्रतिनिधि नियुक्त करता था जो संस्थाध्यक्ष कहलाते थे। संस्थाध्यक्षों के निरीक्षण के अंतर्गत निजी व्यापारी हाटकेषुओं (बाजारों) में अपना व्यवसाय संचालित करते थे। संस्थाध्यक्ष बाजार में वस्तुओं की आपूर्ति, वस्तुओं की मंाग एवं मूल्य की स्थिति पर दृष्टि रखते थे तथा समय-समय पर पणाध्यक्ष को इनकी स्थिति से अवगत कराते रहते थे। 
कौटिल्य ने बाजार तथा व्यापारियों के हितों को ध्यान में रखते हुए मूल्य को नियंत्रित करने के लिए बाजार में वस्तुओं की कृत्रिम कमी उत्पन्न करने को भी आवश्यक ठहराया है किन्तु वहीं उसने इस बात पर बल दिया है कि प्रजा का आर्थिक हित सर्वोपरि है। व्यक्तिगत एवं अतिशय लाभ के लिए प्रजा का आर्थिक शोषण करना दण्डिनीय अपराध है। जो व्यापारी अधिक लाभ के लालच में निर्धारित मूल्य अथवा वास्तविक मूल्य से अधिक मूल्य उपभोक्ता से लेते हों उन्हें अर्थ दण्ड, कारावास अथवा अपराध की प्रकृति के अनुसार दोनों में से कोई एक या दोनों दण्ड एक साथ दिए जाने का विधान था।
नारद और बृहस्पति ने बेचने वाले और खरीददार दोनों के हितों की रक्षा के लिए अनेक नियम दिए हैं। नारद ने लिखा है कि यदि खरीददार वस्तु खरीदने के बाद यह समझे कि उसने उस वस्तु का मूल्य अधिक दे दिया है तो उस वस्तु को बिना उसका प्रयोग किए लौटा सकता था और अपना मूल्य वापस ले सकता है। परन्तु यदि वह खरीद के दिन से अगले दिन वस्तु लौटाए तो उसे खरीद के मूल्य से 1/30 भाग कम मूल्य मिलता था। तीसरे दिन लौटाने पर 1/15 भाग मिलता था। तीसरे दिन के बाद दूकानदार उस वस्तु को नहीं लौटाता था। इन नियमों से स्पष्ट है कि बाजार का नियंत्रण सुव्यवस्थित नियमों के द्वारा होता था।  कोई व्यापारी मनमानी नहीं कर सकता था। बृहस्पति ने लिखा है कि यदि वस्तु के दोष को बिना बताए हुए कोई व्यापारी किसी वस्तु को बेचता था तो खरीददार को उसे उस मूल्य का दूना लौटाना पड़ता था और उसे सरकार को मूल्य के बराबर जुर्माना देना पड़ता था। 
‘‘मृच्छकटिकम’’ में उल्लेख है कि उपभोक्ता संरक्षण के नियमों के होते हुए भी बाजार में बेईमान व्यापारी विद्यमान थे। ऐसी कहावत थी कि ऐसा व्यापारी जो धोखेबाज न हो, ऐसा सुनार जो चोर न हो और ऐसी वेश्या जो लालची न हो दुर्लभ है। इसलिए बृहस्पति ने मिलावट करने वालों को दण्ड देने के लिए अनेक नियम दिए हैं। नारद के अनुसार यदि कोई व्यापारी समय पर बेची वस्तु न दे और उस वस्तु का मूल्य कम हो जाए तो व्यापारी को जितना मूल्य कम हुआ है उतना धन और यह वस्तु खरीददार को देनी होगी। 
नारद स्मृति में स्पष्ट किया गया है कि व्यापारी लाभ उठाने के लिए सब प्रकार की वस्तुएं खरीदते और बेचते थे परन्तु यह लाभ वस्तु की खरीद के मूल्य के अनुपात में होना चाहिए। मौर्यकाल में वस्तुओं के मूल्य सरकार द्वारा निश्चित किए जाते थे किन्तु गुप्तकाल के संबंध में कोई ऐसा साक्ष्य नहीं मिलता है जिससे यह प्रमाणित हो कि इस काल में वस्तुओं के मूल्य सरकार द्वारा निश्चित किए जाते थे। यदि कोई व्यक्ति ऐसी वस्तु को बेच दे जिसका वह स्वामी न हो तो ऐसी बिक्री मान्य नहीं थी। वस्तुओं का मूल्य मंाग पर निर्भर होता था। जब खरीददार कम होते थे और व्यापारियों को बहुत हानि उठानी पड़ती थी किन्तु जब खरीददार अधिक होते और वस्तुएं कम उपलब्ध होतीं तो व्यापारी साधारण मूल्य से दो गुने और तिगुने मूल्य पर अपनी वस्तुएं बेचते थे। किन्तु इस स्थिति में उपभोक्ता पर अनावश्यक बोझ न पड़े इसका ध्यान रखना बाजार नियंत्रक अधिकारियों का कत्र्तव्य होता था।
गुप्तकाल में माल ढोनेवालों और व्यापारियों के लिए जो नियम थे वे गुप्तोत्तर काल में भी लागू किए जाते थे। उदाहरण के लिए मेघातिथि ने लिखा है कि यदि कोई व्यापारी माल लेजाने के लिए किसी से गाड़ी किराए पर ले और गाड़ीवाला माल ले कर नहीं जाए तो उसे किराया नहीं देना चाहिए। इसी प्रकार व्यवसायी ने वस्तु का जो मूल्य लिया हो यदि वह उसी मूल्य के योग्य की वस्तु उपभोक्ता को न दे तो उपभोक्ता को चाहिए कि वह तुरन्त राजकीय सेवकों के पास इसकी शिकायत करे जिससे धोखा देने वाला व्यवसायी दण्डित किया जा सके।  
 आशय यह है कि प्राचीन भारत में बाजार, व्यवसाय एवं व्यापार के विकास पर जितना ध्यान दिया जाता था उतना ही प्रजा अर्थात उपभोक्ताओं के अधिकारों की भी रक्षा की जाती थी। उपभोक्ता संरक्षण का विचार आधुनिक नहीं अपितु प्राचीनकाल से चला आ रहा है। 
(विशेष: इस विषय पर विस्तार से विश्वविद्यालय प्रकाशन, वाराणसी से प्रकाशित मेरी पुस्तक ‘‘प्राचीन भारत का सामाजिक एवं आर्थिक इतिहास’’ में पढ़ा जा सकता है।)               
---------------------------------
#DrMissSharadSingh #columnist  #डॉसुश्रीशरदसिंह #स्तम्भकार #शून्यकाल  #कॉलम  #shoonyakaal #column #दैनिक  #नयादौर

Thursday, May 23, 2024

बतकाव बिन्ना की | अपनो बुंदेलखंड हेरीटेज़ को धनी आए, मनो... | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
------------------------
बतकाव बिन्ना की
अपनो बुंदेलखंड हेरीटेज़ को धनी आए, मनो... 
   - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
       ‘का सोच रईं बिन्ना?’’ भैयाजी दोरे पे ठाड़े पूछ रए हते। मोय पतई नईं परो के भैयाजी कबे आए? काय से के मैं वाकई सोच में परी हती।
‘‘कछू खास नोंई।’’ मैंने भैयाजी से कई।
‘‘कछु तो खास हुइए, ने तो तुमें हमाए आने की पता ने पर जाती? तुम तो सोचबे में ऐसी मगन रईं के हमने घंटी बजाई, तुमने बोई ने सुनीं। तभई हम बाहरे को दरवाजो खोल के इते कढ़ आए।’’ भैयाजी अपनी सफाई-सी देत भए बोले।
‘‘सो का भओ भैयाजी! जो बी आप ई को घर आए। आपकी बिन्ना को घर मने आपको घर। काय सई कई ना?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘औ का! तुमाए भैयाजी को घर मने तुमाओ घर।’’भैयाजी बोल परे। फेर तनक ठैर के बोले,‘‘तुम हमें ने बिलमाओ। हमें तो जे बताओ के तुम का सोच रई हतीं?’’
‘‘एक बात होय सो बताई जाए। कभऊं-कभऊं ई मुड़िया में दो-चार बातें संगे घूमन लगत आएं। मनो जे सब तो चलत रैत आए। आप सुनाओ के का चल रओ।’’ मैंने कई।
‘‘आगी-सी बरत गर्मी के दिन आएं बिन्ना! सो गर्मी चल रई, फाग तो ने चलहे।’’ भैयाजी टीवी को एक विज्ञापन की याद दिलात भए हंस के बोले।
‘‘हऔ, कोनऊं-कोनऊं विज्ञापन कित्ते नोने होत आएं, के जबान पे चढ़े रैत आएं। जैसे वो वारो - ठंडा माने कोकाकोला। औ डर के आगे जीत है। ऐसे मुतके विज्ञापन आएं जोन भुलाए नईं भूलत। उनके प्रोडक्ट मनो काम में लाओ, चाए ने लाओ, पर उनके विज्ञापन याद रैत आएं।’’ मैंने भैयाजी से कई।
‘‘हो गओ तुमाओ विज्ञापन पुराण? सो अब मुद्दे पे आ जाओ औ बताओ के का सोच रई हतीं?’’ भैयाजी जाने बिना मानबे वारे तो हते नईं।
‘‘मैंने कई ने, के एक नईं दो-चार बातें संगे रईं।’’ मैंने कई।
‘‘सो ऊमें से एकई बता देओ। हमाए कलेजे में ठंडक सो पर जाए। ऊंसई बड़ी गर्मी भई जा रई।’’ भैयाजी बोले।
‘‘का है भैयाजी, के चार दिनां पैले मोरे संगे एक चुटकुला सो हो गओ।’’ मैंने कई।
‘‘कैसो चुटकुला? का हो गओ?’’ भैयाजी ने पूछी।
‘‘भओ का, के मोय जाने रओ म्यूजियम। मगर उते तो सबरी सड़कें खुदी परीं। उते तो स्कूटी लौं खड़ी करबे की जांगा नइयां। सो मैंने सोची के आॅटो कर लई जाए। मैंने आॅटो वारे से कई के भैया, म्यूजियम चलने। ऊको कछु समझ में ने आई। आॅटो तो मनो ऊने स्टार्ट कर दई, फेर पूछन लगो के आपने कां जाने की बताई? मैंने कई म्यूजियम। सो बोलो के हम नईं समझे। सो मोय कह आई के म्यूजियम मने पुरातत्व संग्रहालय चलने। इत्तो सुन के ऊने आॅटो पे ब्रेक मार दओ। बा आॅटो रोक के पूछन लगो के कोन तरफी जाने। तब मोय समझ में आई के जे कछू नईं समझ पा रओ। तब मैंने ऊसे कई के भैया, पुरानी डफरिन अस्पताल चलने, उते तीन मढ़िया के लिंगे। तब कऊं जा के ऊके समझ में आई औ ऊने फेर के आॅटो चालू करी।’’ मैंने भैयाजी खों बताई।
‘‘जे तो सई में मजेदार किसां हो गई।’’ भैयाजी हंसन लगे।
‘‘अब आगे कि सुनो आप। का भओ के जो मैं उते म्यूजियम पौंची तो उते पैले तो मोंय छिड़ियां समझ में ने परीं। फेर जो समझ परी, सो छिड़ियां चढे में दम फूल गई। बोई टेम मोय खयाल आओ के जे पुरानी डफरिन अस्पताल को हिस्सा रओ। इते तो ज्यादातर प्रसूती वारी लुगाइयां आउत्तीं। बे ऐसी ऊंची छिड़ियां कैसे चढत्तीं? का उने रोड से ऊपरे लौं स्ट्रेचर पे लेजात्ते?’’मैंने कई।
‘‘हऔ! बात तो सई कै रईं, बिन्ना। हम तो एकई बार बा अस्पताले गए रए। उते हमाए एक दोस्त की घरवाली एडमिट रई। ऊकी डिलेवरी होने रई। ऊ टेम पे हमें सोई बे छिड़ियां ऊंची लगी रईं। मनो हमने उत्तो ध्यान ने दओ तो। खैर, अब तो डफरिन अस्पताल उते रई नई।’’ भैयाजी बोले।
‘‘हऔ! मनो अब उते म्यूजियम बन गओ आए। बिल्डिंग मनो अच्छी आए। पुरानी आए। लार्ड डफरिन के जमाने की आए। तभईं तो लेडी डफरिन के नांव पे अस्पताल को नांव रखो गओ रओ। मनो मोय खयाल आओ के जे छिड़ियां तो सीनियर सिटिजन के जोग नईयां। औ जो कोनऊं ज्वान बी तनक कमजोर पांव वारो होय तो कैसे उते चढ़हे। सो मैंने उते एडीएम साब से बोलई दई। सो बे बी समझ गए रए औ उन्ने फौरन ऊको समाधान सोई सोच लओ।’’मैंने भैयाजी को बताओ।
‘‘जो तो अच्छो भओ। जो प्रशासन तुरतई समाधान ढूंढ ले, सो काम होई जात आए, चाए दिन कित्तऊं लगें।’’ भैयाजी हंस के बोले।
‘‘हऔ भैयाजी! दिन लगबे की ने पूछो। उतई नगर निगम के एक बड़े अधिकारी ठाड़े हते। बे बतान लगे के आप ओरे देखियो चार दिनां में पूरो लाखा बंजारा तला साफ दिखान लगहे। मोसो नई रओ गओ औ मोरे मों से निकर गओ के, सच्ची? बे अपनी पीठ सी ठोंकत भए बोले, औ का! आप सोई देख लइयो। ई पे मोय जी करो के तनक पूछूं के पानी के ऊपरे की जलकुंभी भर साफ करी जा रई के तला खों गहरो करने को बिचार सोई आए? काय से के तला को चार दिनां में तो गहरो करो नईं जा सकत। मनो, उते माहौल ने हतो, सो मैंने पूछी नईं।’’ मैंने भैयाजी को बताओ।
‘‘सई करी। का होतो पूछ के। उने जो करने, जब करने तभई करहें। पब्लिक चिंचियात रैत आए, अखबार वारे छाप-छाप के दूबरे होत रैत आएं, मनों बे ठैरे अपने मन के राजा। बाकी औ का भओ उते?’’ भैयाजी ने पूछी।
‘‘उते यूनीवर्सिटी के विद्वान हरें आए रए, सो बतात रए के कां-कां खोज करी गई। का-का करो गओ। बाकी जे तो आए के अपनो बुंदेलखंड हेरीटेज को धनी आए। मनो कमी आए तो उते लौं पौंचबे की। एक तो रस्ता की दसा खराब ऊपे जो वां कोनऊं पौंच जाए तो उते कओ पीबे खों पानी लौं ने मिले। ऊपे मजे की बात जे के उते एक अधिकारी बोले के मैंने एरण जैसी वस्र्ट साईट ने देखी। उनकी बात सुन के मोरो जी करो के उनसे कई जाए के आप से पैले इते आपई घांई अधिकारी रै हते। अब उन्ने वस्र्ट बनो रैन दऔ सो ईको जिम्मेदार आप ओरन को शासनई आए। मनो संगे जे बी खयाल आओ के चलो इने उते की दीन दसा दिखानी तो।’’ मैंने भैयाजी खों बताई।       ‘‘सई कई बिन्ना! जो कोनऊं अधिकारी सोचे सो भौत कछू कर सकत आए। ईमें कोनऊं शक नोंई के अपनो बुंदेलखंड में घूमबे जोग मने पर्यटन जोग कुल्ल जांगा आए।’’ भैयाजी बोले।
‘‘औ का भैयाजी! इते ऊ टेम से इंसान आ के बसन लगे रए जब बे पथरा के हथियार बनाउत्ते। इते आबचंद की गुफाओं में उनकी बनाई पेंटिंग्स आज लौं मौजूद आएं। औ बा एरण, उते तो ध्रुवस्वामिनी की पूरी किसां भई रई।’’ मैंने भैयाजी से कई।
‘‘ध्रुवस्वामिनी की किसां? जे कोन सी किसां आए?’’ भैयाजी ने कभऊं ढंग से ने तो इतिहास पढ़ो, औ ने जयशंकर प्रसाद को नाटक पढो, सो बे का जाने?
‘‘बा किसां मैं फेर कोऊं दिनां सुनाबी। आप तो जे सोचो के अपने इते के कालंजर के बारे में शिवपुराण लों में किसां मिलत आए। इत्तो पुरानो आए अपनो बुंदेलखंड। बुंदेलखंड पैले दशार्ण कहाउत्तो। इते के राजा हिरण्य की बिटिया राजा द्रुपद के इते ब्याही रई। जे महाभारत में मिलत आए। औ रामजी तो बनवास के लाने इतई से हो के गए रए। ऐसो अच्छो आए अपनो बुंदेलखंड। मनो, इते पर्यटन को सई तरीके से विकास हो जाए तो इते देखबे वारों की भीड़ लगन लगे। ईसे पइसा बी मिलहे औ नांव बी मिलहे। है के नई?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘सई कई बिन्ना!’’ भैयाजी बोले। भैयाजी जान गए के मैं का सोच रई हती, सो बे जै रामजी की कर के चलत बने। अब आप ओरें सोचो अपने-अपने इलाके की ऐसी जांगा के बारे में जां पर्यटन को विकास करो जा सकत होय। बाकी बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की।
 -----------------------------   
#बतकावबिन्नाकी  #डॉसुश्रीशरदसिंह  #बुंदेली #batkavbinnaki  #bundeli  #DrMissSharadSingh #बुंदेलीकॉलम  #bundelicolumn #प्रवीणप्रभात #praveenprabhat  

चर्चा प्लस | राजा राममोहन राय ने स्त्रियों को मुक्त कराया था क्रूर सती प्रथा से | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर

चर्चा प्लस   
राजा राममोहन राय ने स्त्रियों को मुक्त कराया था क्रूर सती प्रथा से
    - डाॅ (सुश्री) शरद सिंह                                                                                        
      एक विवाहित स्त्री को अपने पति के शव के साथ जीवित जल कर मरने को विवश कर देने वाली कुप्रथा को समाप्त करवाने का श्रेय यदि किसी को है तो वे हैं राजा राममोहन राय। सती प्रथा की पीड़ा को उन्होंने बहुत करीब से महसूस किया था इसीलिए उन्होंने ठान लिया कि अंग्रेज सरकार पर दबाव डालेंगे कि वे इस प्रथा पर रोक लगाने के लिए कानून लागू करें। सती प्रथा पर रोक लगने से समाज की अन्य कुप्रथाओं पर भी रोक लगने का मार्ग प्रशस्त हो गया था। वह कौन-सी घटना थी जिसने उन्हें सती प्रथा के उन्मूलन के लिए प्रेरित किया?  
    राजा राममोहन राय भारत के एक महान समाज सुधारक एवं ब्रह्मसमाज के संस्थापक के रूप में जाने जाते हैं। उनका जन्म 22 मई सन् 1772 ई. में बंगाल के एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके पूर्वज नवाबों के दरबार में उच्चपदों पर कार्य करते थे किन्तु नवाबों की विलासिता से क्षुब्ध हो उनके पूर्वजों ने धीरे-धीरे नवाबों से नाता तोड़ लिया। राजा राममोहन राय को बंगाली, अंग्रेजी तथा अरबी तीनों भाषाओं पर समान अधिकार था। वे बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि के थे। आगे चल कर उन्होंने और भी विदेशी भाषाओं का ज्ञान अर्जित किया। 20 वर्ष की आयु में उन्होंने लगभग पूरे देश का भ्रमण कर लिया था। इस दौरान अपनी शिक्षा पूरी करने के उपरांत उन्हें उच्च शासकीय पद भी प्राप्त हो गया था। किन्तु उनका मन नौकरी करने से अधिक सामाजिक कार्यों में लगता था। वे पूरी लगन से समाजसेवा करना चाहते थे। सन् 1803 में उनके पिता का निधन हो गया जिसके बाद उन्होंने नौकरी छोड़ कर कोलकता में अपने परिवार के साथ रहते हुए समाजसेवा आरम्भ कर दी।
राजा राममोहन राय को एक बात हमेशा कचोटती थी कि देश में स्त्रियों की दशा बहुत खराब है। उन्होंने अपने भारत भ्रमण के दौरान इस बात को गहराई से महसूस किया था। उन्होंने पाया कि आम स्त्रियों को न तो पढ़ने का अधिकार है और न उन्हें अपनी इच्छानुसार जीवन जीने का अधिकार है। यदि स्त्री विधवा है तो उसका जीवन नरक से बदतर हाल का होता था। उसके केश मुड़वा दिए जाते थे। उसे पलंग या चारपाई पर सोने अधिकार नहीं रह जाता था। उसे जमीन पर सोने को विवश किया जाता था। उसे अच्छा, सुस्वाद भोजन करने का अधिकार नहीं था। वह अच्छे वस्त्र या आभूषण नहीं पहन सकती थी। शुभ कार्यों में उसका दिखाई पड़ जाना ही अपशकुन मान लिया जाता था। उनके साथ अपृश्य-सा व्यवहार किया जाता था। समाज में व्याप्त इन कठोर परिस्थितियों से घबरा कर कई स्त्रियां सती प्रथा के द्वारा आत्महत्या कर लेती थीं। ध्यान देने योग्य बात यह भी है कि उन दिनों बाल विवाह का चलन था। अबोध आयु में लड़के और लड़की का विवाह करा दिया जाता था। उस पर यदि अल्प आयु में बाल पति की मृत्यु हो जाए तो बालिका वधू के प्रति आयु के आधार पर कोई रियायत नहीं बरती जाती थी। अर्थात ऐसी बाल विधवा यदि सती न हो तो उससे सामान्य जीवन के सारे अधिकार छीन लिए जाते थे। यह भयानक स्थिति राजा राममोहन राय को इस बात के लिए प्रेरित करती रही कि वे कोई ऐसा रास्ता निकालें जिससे इस तरह की कुप्रथाएं बंद हो सकें।
समाज सुधार का रास्ता सबसे कठिन होता है। सदियों से चली आ रही परंपराओं के प्रति आमजन के मन में समाया अंधविश्वास एक झटके में दूर नहीं किया जा सकता था। राजा राममोहन राय कोई उपाय सोच पाते कि इसी दौरान उनके परिवार में ही एक हृदय विदारक घटना कर गई जिसने उन्हें हिला कर रख दिया। सन 1816 में सन 1816 में राजा राममोहन राय के बड़े भाई की मृत्यु हो गई। उनकी मातृतुल्य भाभी को सती प्रथा की आग में झोंक दिया गया। वे चाह कर भी इस अप्रिय घटना को होने से नहीं रोक पाए। किन्तु इस घटना ने ही उनके मन को वह दृढ़ता प्रदान की जिससे आगे चल कर वे स्त्री समाज की दशा बदलने में सफल हो सके।      
राजा राममोहन राय सती प्रथा के विासेध में चर्चा-परिचर्चा करते किन्तु लोग उनकी बातों को नकार देते। इसी के साथ उन्होंने स्त्री शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए भी आवाज उठाई। धीरे-धीरे उनके प्रयासों की कड़िया जुड़ती गईं। वे समझ गए थे समाज सुधार को धर्म सुधार के मार्ग से आगे बढ़ाया जा सकता है। अतः उन्होंने ऐकश्वरवादी विचार के आधार पर सन 1828 ब्रह्मसमाज की स्थापना की।
दूसरा रास्ता उन्होंने शिक्षा का चुना। वे जानते थे कि जब तक कुप्रथाओं के विरुद्ध ज्ञान और तार्किकता का विकास नहीं होगा तब तक कुप्रथाएं दूर नहीं हो सकती हैं। समाज को यह स्वयं भी समझना होगा कि कौन-सी प्रथा अच्छी है और कौन-सी बुरी। इसके लिए राजा राममोहन राय ने अंग्रेजी शिक्षा को उपयुक्त एवं आवश्यक बताया। उनके प्रयास से सन् 1827 में हिन्दू कालेज की स्थापना हुई जो बाद में प्रेसीडेंसी कालेज के रूप में विख्यात हुआ। अंग्रे शासकों को भले ही भारतीयों के हित से विशेष लेनादेना नहीं था किन्तु भारत में व्याप्त सती प्रथा जैसी अमानवीय प्रथा को वे भी समाप्त करना चाहते थे। महिलाओं के सती होने की मानवीय प्रथा के खिलाफ उन्होंने जो ऐतिहासिक आंदोलन चलाया, वह सामाजिक बुराई के खिलाफ उनके जीवन भर के संघर्ष का सबसे अच्छा उदाहरण था। 1818 की शुरुआत में, उन्होंने इस मुद्दे पर जनता को जागरूक करना शुरू किया।
 समाज सुधार के अपने प्रयासों की भावभूमि तैयार करने के बाद सन 1885 में उन्होंने सती प्रथा के विरोध में अपना प्रथम लेख लिखा। यह लेख मात्र लेख नहीं था अपितु सती प्रथा के विरोध में यह उनका सार्वजनिक उद्घोष था। राजा राम मोहन राय भारत में पश्चिमी शिक्षा के प्रबल समर्थक थे। परिणामस्वरूप, वे भारत में अंग्रेजी शिक्षा और प्रबुद्ध पत्रकारिता दोनों में अग्रणी बन गये। उन्होंने बंगाली पत्रिका ‘संवाद कौमुदी’ की स्थापना और संपादन भी किया था। उन्होंने अंग्रेजी अखबार का भी संपादन किया। अंग्रेज सरकार भारत में सामाजिक सुधार तभी कर सकती थी जब स्वयं भारतीयों से उसे समर्थन प्राप्त हो। कुप्रथा ही सही किन्तु सदियों से चली आ रही परम्पराओं पर अंकुश लगा कर वे जनसंख्या के एक बड़े भाग को रुष्ट करने का जोखिम नहीं ले सकते थे। अतः जब राममोहन राय और ब्रह्म समाज के प्रयासों का उन्हें आधार मिला तो अंग्रेज साकार के लिए कुप्रथाओं के विरोध में कानून बनाना आसान हो गया। रूढ़िवादी हिंदुओं ने सती प्रथा पर प्रतिबंध लगाने वाले ब्रिटिश भारत के तत्कालीन गवर्नर जनरल लॉर्ड बेंटिक के कदम को रोकने के लिए संसद में याचिका दायर की, तो संसद सहमत हो गई। किन्तु  राजा राममोहन राय ने सती प्रथा विरोधी कानून का भरपूर समर्थन किया। अंततः कानून लागू कर दिया गया और सती प्रथा को न्यायालयों द्वारा अवैध एवं दंडनीय घोषित कर दिया गया।
राजा राममोहन राय महिलाओं के अधिकारों के कट्टर समर्थक थे। उन्होंने महिलाओं की दासता की निंदा की और इस व्यापक धारणा को खारिज कर दिया कि महिलाएं बौद्धिक या नैतिक रूप से पुरुषों से कमतर थीं। बहुविवाह, जातिगत कठोरता और बाल विवाह सभी उनके निशाने पर थे। उन्होंने इस बात की वकालत की कि महिलाओं को आधुनिक भारत के निर्माण के लिए जिम्मेदार अपनी स्थिति को ऊंचा उठाने के लिए विरासत और संपत्ति रखने की शक्ति दी जानी चाहिए। राजा राममोहन राय और देवेन्द्रनाथ टैगोर ने 20 अगस्त, 1828 को 19वीं सदी के बंगाल पुनर्जागरण की शुरुआत की, जो उस समय के प्रचलित ब्राह्मणवाद के सुधार के रूप में था, जिसने 19वीं सदी में हिंदू समुदाय की धार्मिक, सामाजिक और शैक्षिक उन्नति का नेतृत्व किया। राजा राममोहन राय के प्रयासों से प्रभावित हो कर सन 1830 में एक अंग्रेज यात्री अलेक्जेण्डा उफकों ने अंग्रेजी स्कूल खोलने में उनकी सहायता की।
राजा राम मोहन राय बाल विवाह के भी प्रबल विरोधी और विधवा पुनर्विवाह के समर्थक थे। वे चाहते थे कि योरोपीय स्त्रियों की भांति भारतीय स्त्रियां भीं शिक्षा प्राप्त करें तथा समाज के विकास की सहभागी बनें। वे जातिप्रथा के भी विरोधी थे। वे यह भी नहीं चाहते थे कि जाति के आधार पर शिक्षा अथवा स्त्री शिक्षा को बांटा जाए। राजा राम मोहन राय मानते थे कि चाहे स्त्री हो या पुरुष, वह कोई भी जाति, धर्म का क्यों न हो, एसे शिक्षा पाने का अधिकार होना चाहिए।
राजा रामामेहन राय द्वारा अंग्रेजी शिक्षा के समर्थन को आगे चल कर महात्मा गांधी ने अनुचित ठहराया जबकि रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने उसे उचित कहा। वस्तुतः तत्कालीन परिस्थितियों एवं सामाजिक दशा में अंग्रेजी शिक्षा तुलनात्मक ज्ञान के लिए आवश्यक थी। जब रूढ़िवादी हिन्दू अपनी कुप्रथाओं को पौराणिक ग्रंथों के उदाहरण दे कर बचाने का प्रयास कर रहे थे तब उदारवादी हिन्दुओं के लिए यह जानना जरूरी था कि भारत के बाहर की दुनिया में स्त्रियों का जीवन किस प्रकार का है। रवीन्द्रनाथ ठाकुर महात्मा गांधी के विचारों का सम्मान करते थे किन्तु अंग्रेजी शिक्षा के विरोध के मुद्दे पर उन्होंने कटाक्ष किया था कि गांधी जी स्वयं शिक्षा प्राप्त करने विदेश गए थे। किन्तु यह भी सच है कि महात्मा गांधी ने राजा राममोहन राय के एकेश्वर मानववाद एवं स्त्रियों की दशा सुधारने के प्रयासों का सम्मान भी किया और अनुकरण भी किया। आधुनिक भारत में राजा राम मोहन राय का योगदान भी उल्लेखनीय है। वे एक ऐसे अग्रणी थे जिन्होंने 19वीं सदी के सामाजिक-धार्मिक क्षेत्र में महत्वपूर्ण प्रगति करने का प्रयास किया। सती प्रथा का उन्मूलन आधुनिक भारत के सामाजिक इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण निर्णायक मोड़ों में से एक है।   
        --------------------------
#DrMissSharadSingh #चर्चाप्लस  #सागरदिनकर #charchaplus  #sagardinkar #डॉसुश्रीशरदसिंह 
#राजाराममोहनराय