Tuesday, October 29, 2024

पुस्तक समीक्षा | इन गीतों में ध्वनित यक्ष उत्तर ही प्रतिप्रश्न हैं | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

आज 29.10.2024 को  "आचरण" में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई श्रीमती समाहरि शर्मा जी के गीत संग्रह की समीक्षा।
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पुस्तक समीक्षा  
इन गीतों में ध्वनित यक्ष उत्तर ही प्रतिप्रश्न हैं
- समीक्षक डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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गीत संग्रह  - यक्ष उत्तर
कवयित्री     - सीमाहरि शर्मा
प्रकाशक  - श्वेतवर्णा प्रकाशन, 212, एक्सप्रेसव्यू एपार्टमेंट, सुपर एमआईजी, सेक्टर 93, नोएडा - 202304
मूल्य        - 249/-
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      यक्ष प्रश्न ‘महाभारत’ का एक रोचक प्रसंग है। वनवास के दौरान पाण्डवों को प्यास लगी। वे थक गए थे। तभी उन्हें एक जलाशय दिखा। वे सभी एक वृक्ष के नीचे विश्राम करने और पानी पीने के लिए रुके। तब सहदेव  सबसे पहले पानी पीने जलाशय के निकट गया। जलाशय के तट में रहने वाले यक्ष ने उसे रोका और पहले उसके प्रश्नों के उत्तर देने का आदेश दिया। सहदेव यक्ष के आदेश पर ध्यान दिए बिना पानी पीने लगा। दूसरे ही पल वह गिर कर मर गया। उसके बाद एक-एक कर के नकुल, भीम और अर्जुन आए। उन तीनों भाइयों का भी वही परिणाम हुआ। जब युधिष्ठिर वहां पहुंचा तो उसने अपने भाइयों को मृत पाया। तभी यक्ष प्रकट हुआ और युधिष्ठिर से भी प्रश्नों के उत्तर मांगने लगा। युधिष्ठिर ने यक्ष के सभी सौ प्रश्नों के सही-सही उत्तर दिए जिससे प्रसन्न हो कर यक्ष ने युधिष्ठिर के भाइयों को पुनः जीवित कर दिया।  यक्ष के प्रश्न इतने कठिन थे कि युधिष्ठिर के अतिरिक्त उनका उत्तर कोई और दे ही नहीं सकता था। इस प्रसंग से ही कठिनतम समाधान वाली समस्या को यक्ष प्रश्न कहा जाने लगा।

भोपाल निवासी कवयित्री सीमाहरि शर्मा के नवीनतम गीत संग्रह का नाम है ‘‘यक्ष उत्तर’’। अतः स्वाभाविक रूप से ‘‘यक्ष उत्तर’’ नाम पढ़ते ही यक्ष प्रश्न का प्रसंग मानस में कौंध गया। आज के जीवन में यक्ष प्रश्नों की कोई कमी नहीं है। अर्थात हर पग पर अनेक समस्याएं घेरे रहती हैं जिनमें से अधिकांश के जन्मदाता तो हम मनुष्य स्वयं हैं। जैसे बेटियों के अस्तित्व पर संकट, पर्यावरण पर संकट, बाजारवाद को आंखमूंद कर आत्मसात करना आदि-आदि। कवयित्री सीमाहरि शर्मा ने इन सारे प्रश्नों को उत्तर के बहाने प्रतिप्रश्न के रूप में अपने गीतों में पिरोया है। यद्यपि संग्रह के नामकरण के संबंध में उन्होंने ‘‘अपनी बात’’ के अंतर्गत लिखा है कि -‘‘संग्रह का नाम ‘उत्तर यक्ष हुए हैं जब-जब’ रखने का विचार मन में आया। परन्तु अधिक लम्बा होने के कारण विद्वजनों से परामर्श के पश्चात ‘यक्ष-उत्तर’ रखा।’’

संग्रह के गीतों पर वरिष्ठ गीतकार मयंक श्रीवास्तव ने अपने विचार व्यक्त करते हुए लिखा है कि -‘‘संग्रह के गीतों में सामाजिक पीड़ा है तथा अनुभूतियों, संवेदनाओं, पीड़ाओं की संगीतमयी अनुगूंज है। ये समय की नब्ज पर प्रतिक्षण अपना हाथ रखते हुए चलते हैं। गीत बहुत ही प्राणवान एवं संवेदना के धरातल पर खड़े हैं। युगबोध की मर्मस्पर्शी एवं चिन्तनमय अभिव्यक्तियों के गीत हैं।’’
यतीन्द्रनाथ राही ने संग्रह की रचनाओं को ‘‘कबीर की उलटबांसी की तरह है- यक्ष उत्तर’’ कहा है। वे लिखते हैं-‘‘उत्तर हैं, प्रश्न तो अब पाठकों को खंगालने हैं। जो बांचे सो पावे की बात है। ‘मन की दुनिया जग की माया’ है। शायद मिल जाए कहीं उत्तर का प्रश्न भी किसी ‘बसंत में’ किसी ‘ढलती सांझ में’ किसी ‘जलते दिए में’ ‘कुछ रोने कुछ गाने’ में, ‘सावन के किसी मेघ में’ या फिर ‘मौन साधे उत्तरों में’, कहीं तो होंगे ही वे यक्ष प्रश्न भी जिन्हें खोजा जाता रहा है सदियों से पल-पल।’’
 
 डॉ. राम वल्लभ आचार्य अध्यक्ष मध्यप्रदेश लेखक संघ, भोपाल के अनुसार ‘‘इन रचनाओं में आस्था विश्वास और परम सत्ता के प्रति समर्पण के भावों का भी समावेश है।’’ वहीं सौरभ पांडे ने संग्रह के गीतों को ‘‘सामाजिक बर्तावों पर सशक्त आईना दिखाते गीत’’ कहा है और डॉ. अशोक बाबूलाल सनोठिया सेवानिवृत श्रम न्यायाधीश ने इसे ‘’सामाजिक समस्याओं को उद्धृत करता गीत संग्रह’’ कहा है।
कवयित्री श्रीमती सीमाहरि शर्मा का यह दूसरा गीत संग्रह है। उल्लेखनीय है कि सीमाहरि शर्मा के जीवन साथी हरिवल्लभ शर्मा ‘‘हरि’’ स्वयं एक अच्छे रचनाकार हैं। सीमाहरि शर्मा की संवेदनाओं का धरातल विस्तृत है इसीलिए ‘‘यक्ष उत्तर’’ में वे सारे प्रश्न सामने रखती हैं जो वर्तमान जीवन से जुड़े हुए हैं। आधुनिक जीवनशैली ने प्रकृति से मनुष्य की दूरी किस प्रकार बढ़ा दी है इसे उन्होंने अपनी कविता ‘‘ओ बसन्त!’’ में पूरी गंभीरता से वर्णित किया है। कविता की कुछ पंक्तियां-
ओ बसन्त तुम मेरे घर तक
कैसे आओगे?
दूर-दूर तक पेड़ नहीं,
घर मल्टी में मेरा।
हवा बसन्ती को नभ छूते
मालों ने फेरा।
किरण अगर बरजोरी
खिड़की तक आ भी जाती।
ऊंची दीवारों की छाया
उसको डंस जाती।

कवियित्री ‘‘यक्ष उत्तर’’ कविता में उत्तरों की अनुत्तरिता को प्रश्नों के समकक्ष रखा है। उन्हीं के काव्यात्मक शब्दों में -
उत्तर जब हों यक्ष प्रश्न से
प्रश्नों ने स्वीकारे हैं।
प्रश्न खड़े हैं ठगे-ठगे से,
ये कैसे उत्तर पाये?
निर्धारित उत्तर सारे थे
प्रश्नों से पहले आये।
जब-जब हाथ बंधे उत्तर के
प्रश्न स्वयं से हारे हैं।

भौतिकतावाद की अंधी दौड़ से सबसे अधिक अभिशप्त है बचपन। बच्चा होश भी नहीं सम्हाल पाता है और उस पर बस्ते का भारी बोझ, नंबरों का दबाव और विलक्षणता प्रदर्शित करने का दायित्व लाद दिया जाता है। यही कारण है कि बचपन अपनी स्वाभाविकता खोता जा रहा है। इस बात को कवयित्री सीमाहरि ने अपनी ‘‘लौटा दो बचपन’’ कविता में यथार्थपरक शब्दों में कहा है-
हुए बोझ से बोझिल काँधे
बस्ते हैं भारी।
अंग्रेजी में हिंदी पढ़ना
कैसी लाचारी।
शिक्षा है व्यापार, लूटते
मात-पिता का धन।

कवयित्री को जितनी चिन्ता बचपन के रूप में मानव के भविष्य की है उतनी ही चिन्ता प्रकृति के निरंतर होते असीमित दोहन की भी है। ‘‘तेवर तुम्हारे’’ कविता में वे कहती हैं-
खजाने प्रकृति के सारे,
खड़े बाहें पसारे सब।
नहीं दोहन करो इतना
सभी जी भर तुम्हारे हैं।
हवा श्वासें लिये चलती
तुम्हारे ही लिए तो है।
धरा जलती अथक तपती
तुम्हारे ही लिए तो है।

सीमाहरि शर्मा के जनसरोकार जिन स्थितियों पर विचार करने का आग्रह करते हैं वे मन को द्रवित करने वाली हैं। इसका सटीक उदाहरण है ‘‘तारा’’ कविता। इसमें उन्होंने मज़दूर मां की बेटी का वर्णन किया है-
जर्जर छोर फ्रॉक का,
नन्हे भाई को पकड़ाकर।
नाजुक हाथों में गोदी के,
बालक को धकियाकर।
‘मजदूरी करने जाती हूँ
काम पड़ा है भारी’
नन्ही तारा को समझाकर,
कहती है महतारी।

संग्रह की सभी कविताएं पठनीय है तथा गहन चिंतन को विवश करती हैं। कवयित्री सीमाहरि शर्मा ‘‘यक्ष उत्तर’’ के रूप में अपनी सभी चिंताओं, अपने सभी सराकारों एवं मानव के उज्जवल भविष्य के प्रति अपनी सभी आकांक्षाओं को व्यक्त करने में पूर्णतः सफल हुई हैं। उनके भीतर की चिंतनशील कवयित्री को इस संग्रह की कविताओं में बखूबी देखा और उनके सृजन के प्रति आश्वस्त हुआ जा सकता है।
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Monday, October 28, 2024

आज बुंदेली संस्कृति और गौरैया दोनों को सहेजना, संरक्षित करना आवश्यक हो गया है। - विशिष्ट अतिथि डॉ (सुश्री) शरद सिंह, पुस्तक विमोचन

"आज बुंदेली संस्कृति और गौरैया दोनों को सहेजना, संरक्षित करना आवश्यक हो गया है। ऐसे जटिल, खुरदरे एवं संवेदनाओं में शुष्कता ढोते समय में ‘‘बुन्देली गौरैया’’ काव्य संग्रह अपने नाम से ही उस मधुरता का आभास कराता है जिसमें लोकधर्मिता समाई हुई है। बिहारी सागर की कविताओं में यही सबसे बड़ी विशेषता है कि उनकी कविताओं में लोक संस्कृति है और गौरैया का उनके प्रतीक सटीक है।" बतौर विशिष्ट अतिथि  मैंने (यानी डॉ. (सुश्री) शरद सिंह ने) स्थानीय कवि बिहारी सागर की कविताओं एवं सृजनकर्म पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए कहा। 
     अवसर था हिन्दी साहित्य भारती सागर इकाई के तत्वावधान में आयोजित कवि बिहारी सागर के गीत संग्रह "बुंदेली गौरैया" का विमोचन कार्यक्रम। मुख्य अतिथि थे स्वामी विवेकानंद विश्वविद्यालय के कुलाधिपति श्री अनिल तिवारी जी, विशिष्ट अतिथि आपकी यह मित्र तथा अध्यक्षता की पी.आर.मलैया जी ने। स्वागत भाषण दिया इकाई के अध्यक्ष श्री अंबिका यादव जी ने तथा संचालन किया श्री हरि सिंह ठाकुर जी ने। संस्था के कोषाध्यक्ष श्री आरके तिवारी जी ने अतिथियों का स्वागत किया तथा आभार प्रदर्शित किया।
      इस अवसर पर सुगम संगीत गायक श्री जगदीश सागर ने कवि बिहारी सागर के लोक शैलिबद्ध गीतों का सुमधुर गायन किया।
      विमोचन कार्यक्रम में श्यामलम अध्यक्ष श्री उमाकांत मिश्रा जी, भाई पूरन सिंह राजपूत जी, जगदीश सागर जी, मुकेश तिवारी जी, कपिल बैसाखिया जी सहित   बड़ी संख्या में साहित्यकार उपस्थित थे। 
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Saturday, October 26, 2024

टॉपिक एक्सपर्ट | पत्रिका | ई दिवारी सबके घरे रए उजियारो | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

पत्रिका | टॉपिक एक्सपर्ट | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली में
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टाॅपिक एक्सपर्ट
ई दिवारी सबके घरे रए उजियारो
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
    सांची में दिवारी भौतई नोनो त्योहार आए। ई टेम पे घरों की ऐसी लिपाई- पुताई होत आए के घर नओ सो लगन लगत आए। चाए मकान कच्चो होय, चाए पक्को मनो आंगन में ढिग धरी जात आए औ सातिया पूरो जात आए। किसम- किसम के पकवान छनत आएं। खुरमा, बतियां, गूझा, पपड़ियां, चकली, बरफी सबई कछु तो बनत आए। ऊपे बच्चन की तो मनो लाटरी लग जात आए। संकारे से रात लों उनके पटाखा चलत रैत आएं। औ ईके पैले कातिक लगे साथ कतकारियां भुनसारे से नदी, तला में नहाबे खों निकर परत आएं। ऊ टेम पे बे गाऊत चलत आएं-"उठो मोरे कान्हा भओ भुनसारो/ गऊअन ले के चलो सकारे/
सुरहिन हेरे, संगे टेरे/ उठो मोरे…
         शहर में तो अब कतकारियां नईं दिखाता, मनो गांव-देहात में अभी जे चलन आए।
     दिवारी में सबई अपने घरे दिया जलात आएं। फेर बी मुतके गरीब-गुरबां ऐसे होत आएं जिनके पास ने तो दिया जलाबे जोग पइसा होत आएं औ ने बे अपने बच्चन खों नओ हुन्ना-लत्ता दे पाऊंत आएं। सो ई दफा ऐसो करो जाए के भले अपने घरे दो दिया कम जलाओ जाए पर कोनऊं को घर आंदियारो ने रैने पाए। कछु नए हुन्ना-लत्ता उन ओरन खों बी दए जाएं, जोन खरीद नईं सकत। दिवारी के त्योहार को मजो तो तभई आहे जबे सबई के घर दिया जरें। संगे एक बात को खयाल सोई राखने के अच्छो खाइयो औ अच्छो खिलाइयो। नकली खोवा ने लइयो। मिलावटी मिठाइयन से बचियो। त्योहार के संगे सेहत सोई देखने। औ बच्चा पटाखा चलाएं सो ध्यान राखियो। सो सबई खों हैप्पी दिवारी! लछमी मैया सब पे किरपा करें औ सबके के घरे उजियारो रए।
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Friday, October 25, 2024

शून्यकाल | चित्रकार सैयद हैदर रज़ा: मध्यप्रदेश से विश्वपटल तक वाया कैनवास | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नयादौर

दैनिक 'नयादौर' में मेरा कॉलम शून्यकाल -                                                                            चित्रकार सैयद हैदर रज़ा : मध्यप्रदेश से विश्वपटल तक वाया कैनवास        
       - डाॅ (सुश्री) शरद सिंह                                                                                     
    नए विचार इंसान को एक अलग ऊंचे धरातल पर ले जाते हैं इसका एक सटीक उदाहरण हैं चित्रकार सैयद हैदर रज़ा। मध्यप्रदेश से फ्रांस तक का उनका सफर प्रगतिशील विचारों के रास्ते से ही गुज़रा। उनके जीवन को जानना हर उस इंसान के लिए रोचक होगा जो अपने जीवन में कुछ महत्वपूर्ण करना चाहता है।
‘‘मैं फ्रांस इसलिए गया क्योंकि इस देश ने मुझे चित्रकला की तकनीक तथा विज्ञान की शिक्षा दी। फ्रांस के सिजेन जैसे अमर कलाकार एक चित्र के निर्माण का रहस्य जानते थे, लेकिन मेरे फ्रांसीसी अनुभव के बावजूद, मेरे चित्रों का भाव सीधे भारत से आता है।’’ अपने एक साक्षात्कार में यह कहा था चित्रकार सैयद हैदर रज़ा ने। उनका यह कथन इस बात का भी द्योतक है कि इंसान दुनिया में कहीं भी चला जाए लेकिन अपनी जड़ों को कभी भुला नहीं सकता है।   

सैयद हैदर रज़ा प्रगतिशील कलाकार ग्रुप के एक महत्वपूर्ण सदस्य रहे। सन 1947 में बंबई (मुंबई) में गठित कलाकारों के समूह ने पारंपरिक कला बिम्बों के समकक्ष आधुनिक विचारों का समावेश करने का निश्चय किया और इसी उद्देश्य से समूह का गठन किया। इस ग्रुप के संस्थापक चित्रकार थे-  एस.एच. रज़ा, एफ.एन. सूजा, एम. एफ. हुसैन, के. एच. आरा, एच. ए. गाडे और एस.के. बाकरे। यदि देखा जाए तो इस ग्रुप का परिवेश ही वह बिन्दु था जहां से रज़ा वैश्विक धरातल की ओर बढ़ते चले गए।

सैयद हैदर रज़ा उर्फ एस.एच. रज़ा का जन्म 22 फरवरी 1922 को मध्य प्रदेश के मंडला जिले में हुआ  जहां उनके पिता उप वन अधिकारी थे। पिता सैयद मोहम्मद रज़ा और मां ताहिरा बेगम की छत्रछाया में रजा को 12 वर्ष की आयु में ही चित्रकला से लगाव हो गया। तेरहवें वर्ष में वे मध्यप्रदेश के ही दमोह जिले में चले गए जहां उन्होनें राजकीय उच्च विद्यालय, दमोह से अपनी स्कूली शिक्षा प्राप्त की। हाई स्कूल के बाद, उन्होंने नागपुर में नागपुर कला विद्यालय (1939-43) में शिक्षा ग्रहण की। इस बीच चित्रकला से उनका प्रेम परवान चढ़ता गया और उन्होंने सर जे.जे. कला विद्यालय, मुम्बई (1943-47) में चित्रकला की गहराइयों को जाना।
पहली एकल प्रदर्शनी 1946 में बॉम्बे आर्ट सोसाइटी सैलून में प्रदर्शित हुई थी और उन्हें सोसाइटी के रजत पदक से सम्मानित किया गया था। उनके चित्र इलेस्टशन ऑफ एक्सप्रेशन्स (अभिव्यक्ति के चित्रण) से लेकर लैण्डस्केप (परिदृश्य) चित्रकला तक विकसित हुए। 1940 के शुरुआती दशक में अपने परिदृश्यों तथा शहर के चित्रणों में उन्होंने उन्मुक्त भाव से जलरंगों का प्रयोग किया।

1947 उनके लिए एक बहुत महत्वपूर्ण वर्ष साबित हुआ, क्योंकि पहले उनकी मां की मृत्यु हो गई और यही वो वर्ष था जब उन्होनें के.एच. आरा तथा एफ.एन. सूजा (फ्रांसिस न्यूटन सूजा, के साथ क्रांतिकारी बॉम्बे प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट ग्रुप की सहस्थापना की। जिसने भारतीय कला को यूरोपीय यथार्थवाद के प्रभावों से मुक्ति दी तथा कला में भारतीय अंतःदृष्टि का समावेश किया। समूह की पहली प्रदर्शनी 1948 में आयोजित हुई थी। 
इसी दौरान उनके व्यक्तिगत जीवन में बड़ा उतार-चढ़ाव आया। जुलाई 1947 में मां का मुंबई में अपने घर में निधन हो गया। सन 1948 में साल के शुरू में पिता का मंडला में निधन हो गया। देश के विभाजन के बाद उनका परिवार पाकिस्तान चला गया। उस समय उनके परिवार में उनके चार भाई तथा एक बहन थी।
रज़ा तथा अन्य प्रगतिशील कलाकारों द्वारा गठित आर्ट ग्रुप भारत में चले आ रहे कला के मानकों को विस्तार देना चाहता था तथा उसमें नवीन मानकों को जोड़ने के लिए लालायित था। इस ग्रुप में रह कर रज़ा की चित्रकला में और अधिक निखार आया। इसका सुपरिणाम हुआ कि 1950 में फ्रांस सरकार से उन्हें छात्रवृत्ति पर फ्रांस जाने का अवसर मिला। फ्रांस में पेरिस के इकोल नेशनल सुपेरियर डे ब्यू आर्ट्स से चित्रकला की शिक्षा ग्रहण के बाद उन्होंने यूरोप के विभिन्न देशों की यात्रा की। वे योरोप में प्रचलित कला के विविध रूपों को करीब से देखना और समझना चाहते थे। इस दौरान पेरिस उनके कार्य के मुख्यालय के रूप में रहा। सन 1956 को उन्हें पेरिस में ‘‘प्रिक्स डे ला क्रिटिक पुरस्कार’’ से सम्मानित किया गया। यह पुरस्कार प्राप्त करने वाले वे पहले गैर-फ्रांसिसी कलाकार बने। फ्रांस में अभिव्यक्ति के चित्रण से निकल कर लैण्डस्कैपिंग की। 

1959 में उन्होंने फ्रांसिसी कलाकार जेनाइन मोंगिल्लेट से विवाह कर लिया। सन 1962 में वे बर्कले, अमेरिका के कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के अंशकालिक व्याख्याता नियुक्त हुए। 

कहावत है कि यदि कलाकार अपने काम से संतुष्ट हो जाए तो वह नया नहीं कर पाता है। रजा जैसे-जैसे उच्चता के शिखर की ओर बढ़ते जा रहे थे, वैसे-वैसे उनमें बेचैनी भी बढ़ती जा रही थी। फ्रांस से उन्होंने एक्सप्रेशन आर्ट से निकल कर लैण्डस्कैपिंग को अपनाया किन्तु उनका ठहराव यहीं नहीं था। उनकी बेचैनी उन्हें दर्शन और आध्यात्म की ओर ले जा रही थी। सन 1970 के दशक तक रज़ा अपने ही काम से इतने अप्रसन्न और व्याकुल हो गए कि वे नई दिशा खोजने लगे। वे उस चीज से दूर होना चाहते थे जिसे वे ‘‘प्लास्टिक कला’’ कहते थे। इस बीच उन्हें दो बार भारत की कला यात्रा करने का अवसर मिला। उन्होंने अजंता व एलोरा की गुफाचित्रों को देखा। फिर बनारस, गुजरात तथा राजस्थान की यात्राएं कीं। इन सभी यात्राओं ने उन्हें वह कड़ी पकड़ा दी जिसे थाम कर वे आगे बढ़ सकते थे। सन 1980 में उनकी चित्रकला में ‘‘डाॅट’’ यानी बिन्दु कला को अपने आर्ट में स्थान दिया। यह बिन्दु वस्तुतः ध्यान, आध्यात्म तथा ऊर्जा का स्रोत था। बिन्दु श्रृखंला के उनके चित्रों ने उन्हें कालजयी बना दिया। इन चित्रों में भारतीय ज्ञान और वैश्विक कला शैली का अद्भुत मेल था। अपनी विषयगत कृति में नए आयाम जोड़े जिनमें त्रिभुज के इर्द गिर्द केन्द्रित विषय थे, जो अंतरिक्ष तथा समय को भारतीय अवधारणाओं के साथ-साथ प्रकृति-पुरुष की ऊर्जा से जोड़ते थे। 

जब ऐसा लगने लगा कि बिन्दु शैली चित्रकार रजा की पर्याय बन गई है तभी उन्होंने इस बात को एक बार फिर साबित कर दिया कि कलाकार की कला ठहराव पसंद नहीं करती है। सन 2000 में उन्होंने भारतीय अध्यात्म पर अपनी बढ़ती अंतर्दृष्टि और विचारों को अपने चित्रों का मुख्य विषय बनाया और कुंडलिनी, नाग और महाभारत के विषयों पर आधारित चित्र बनाए।

यदि रज़ा की कलायात्रा के विषयों की चर्चा की जााए तो उनके ‘‘सिटीस्केप’’ (1946) और ‘‘बारामुला इन रुइन्स’’ (1948) चित्र हिंदुस्तान के विभाजन तथा मुंबई के दंगों में हूए उत्पीड़न की पीड़ा को दर्शाते हैं। रज़ा ने अपने चित्रों में निर्जन शहरों, सूनी इमारतों को दर्शाया। गोया विभाजन की पीड़ा को महसूस करते हुए पूछ रहे हों कि- ‘‘अब मुझे बताओ, क्या तुम अभी भी एक मुसलमान हो? क्या तुम अभी भी एक हिंदू हो?’’

उनके द्वारा बनाए गए पेरिस के ‘‘ब्लैक सन’’ (1953), ‘‘हॉट डे केन्स’’(1951) नामक चित्रों में घरों और कार्यस्थलों के बंद समूह दर्शाए गए हैं जो गर्म, असुविधाजनक और निर्जन हैं। इसके बाद आध्यात्म और भारतीय संस्कृति को अपने चित्रों में समेटना रज़ा के लिए अपनी जड़ों की ओर लौटने जैसा था। उन्होंने कहा था कि ‘‘तत्व की खोज ने मुझे दीवाना कर दिया। भारतीय अवधारणाओं, प्रतिमा विज्ञान, संकेतों और प्रतीकों ने इस खोज को मजबूत किया। कुदरत के रूप में प्रकृति, जो सर्वोच्च सृजन शक्ति है, बीज में निहित भ्रूण शक्ति, नर-मादा आधार, प्रकृति में सदैव मौजूद रहने वाली अंकुरण, गर्भावस्था तथा जन्म जैसी घटनाओं ने मेरी अवधारणा को ‘‘देखी गयी प्रकृति’’ से ‘‘प्रकृति-कल्पना’’ में बदल दिया।’’
23 जुलाई, 2016 को दिल्ली में लंबी बीमारी के बाद चित्रकार रज़ा का निधन हो गया। उस समय वे 94 वर्ष के थे। इस तरह रज़ा ने मात्र 40 रुपये की पेंटिंग से अपनी कला यात्रा शुरू करके करोड़ों रुपयों तक पहुंचाई। रजा द्वारा बनाई गई ‘‘गेस्टेशन’’ शीर्षक की पेंटिंग की नीमाली 51.75 करोड़ रुपये में हुई थी। वैसे कला अनमोल होती है और जो कलाकार कला में रच-बस जाता है मानवीय भावना की उच्चता के शिखर तक जा पहुंचता है। चित्रकार सैयद हैदर रजा इसके सटीक उदाहरण हैं। 
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Thursday, October 24, 2024

बतकाव बिन्ना की | रामधई सब्जियन के दाम में लुघरिया छुबी धरी | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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बतकाव बिन्ना की
रामधई, सब्जियन के दाम में लुघरिया छुबी धरी
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
          ‘‘का हो रओ भौजी? लिपाई-पुताई निपट गई?’’ मैंने भौजी से पूछी।
‘‘हऔ, निपट गई बिन्ना। सई में कम्मर पिरा गई। भौतई सल्ला होत आए जे काम में।’’ भौजी तनक चैन की संास लेत भई बोलीं।
‘‘औ भैयाजी कां गए? दिखा नहीं रए?’’ मैंने पूछी। काय से के जो भैयाजी घरे होते तो अबलौं निकर आउते।
‘‘बे तनक सब्जीमंडी लौं गए।’’ भौजी बोलीं।
‘‘काय? कोनऊं मैमान आबे वारे का? काय से उते तो सब्जी थोक मिलत आए।’’ मैंने पूछी।
‘‘नईं, कोनऊं नई आ रओ। बा तो हमाई संकारे से तनक गिचड़ हो गई, सो बे ताव-ताव में निकर पड़े मंडी के लाने।’’ भौजी ने बताई।
‘काय की गिचड़?’’ मैंने पूछी। बो का आए के चाए अपने खों सामने वारे की गिचड़ से कछू लेबो देबो होय, चाए ने होय, मनो जो गिचड़ के बारे में ने पूछी जाए तो सामने वारो बुरौ मान जात आए। काय से के जो सामने वारे ने कई के हमाई गिचड़ हो गई रई, तो बा जा चात आए के ऊसे पूछो जाय के कैसी गिचड़? काय की गिचड़? सो जेई लाने मैंने सोई भौजी से पूछ लई के काय की गिचड़।
‘‘बो का भओ के संकारे तुमाए भैयाजी छत पे गए पौधन में पानी डारबे खों। उते एक भटा को पौधा लगो। ऊमें चार दिनां से एक भटा फलो रओ। हमने उनसे कई रई के अबे ने तोड़ियो। तनक बड़ो हो जाए, इत्तो बड़ो के अपन दोई के लाने आलू-प्याज डार के सब्जी बन सके। मगर उने कोन चैन परी। आज बे ऊ भटा पटा लाए। हमने कई के जब हमने मना करी रई तो आपने ईको काय तोरो? तो बे कैन लगे के चार दिनां से तो जा इत्तो को इत्तोई आए, अब का बढ़हे? कऊं खराब ने हो जाए, जेई सोच के हम ईको ले आए। सो हमने कई के तनक सोचो तो होतो के इत्तो सो भटा की का सब्जी बनहे? सो बे बोले के अभईं सब्जी को ठिलिया वारो आहे सो और भटा लेय देत आएं ओई में मिला के बना लइयो। हमने बी कै दई के सब्जियन के दाम में सो लुघरिया छुबी धरी औ तुमें कोनऊ फिकर नोईं? सो बे कैन लगे के हमाए फिकर करे से तो दाम कम ने हुइएं। बाकी अब तुमने बोल दई आए तो हम जा रए सब्जीमंडी, उते से थोक के दाम वारी सब्जियां ला रए, तुमाए लाने। औ इत्तो कै के गाड़ी उठाई औ निकर परे।’’ भौजी ने अपनी गिचड़ की पूरी किसां मोय सुना डारी। 
‘‘आप बी सईं औ भैयाजी बी सई। काय से के एक भटा से का होतो? गमला में लगो भटां अब इत्तो बड़ो बी ने होतो के आप दोई के लाने सब्जी बन पाती। रई सब्जियन के दाम की, सो बा तो सई में प्रान लेय फिर रई। पुची-पुची होन वारी गिल्की औ भटां घांईं सब्जी बीस रुपइया औ पचीस रुपइया पाव मिल रई। औ अबे चार दिना पैले तो चालीस रुपैया पाव रई। मानुस का खाए औ का ने खाए?’’ मैंने कई।
‘‘सई में बिन्ना। जां देखो उतई सलाह दई जात आए के सेहत बनाबे के लाने रोजीना फल खाओ औ हरी सब्जियां खाओ! कां से खाओ? इत्ते तो मैंगे आएं। साजी बिही लौं दो सौ रुपैया किलो मिल रई, सेब औ पपीता की तो पूछोई नईं। औ जे सबरे फल में दवा डरी रैती आए बा ऊपरे से।’’ भौजी बोलीं।
‘‘औ का, दवा डार केई सो उने पकाओ जात आए। घनो कच्चो में तोर के ऊको बढ़ाबे औ पकाबे के लाने उनपे दवा डारी जाती आए। औ आजकाल तो चाए सेब होंय चाए बिही सबई में थ्री-डी चिट लगी रैत आए।’’ मैंने कई।
‘‘हऔ, तुमाए भैया बता रए हते के बा चिंहारी होत आय के कोन में दवा डर गई और कोन में नईं डरी?’’भौजी बोलीं।
‘‘को जाने? हो सकत के भैयाजी की बात सई होय। मनो भौजी तनक सोचो के जो हरी सब्जियां मैंगी हो जात आएं तो आलू, प्याज से काम चलत आए। मनो आजकाल तो आलू, प्याज सोई मैंगे चल रए। इंसान का खाए औ का ने खाय। औ ऊपे त्योहार मूंड़ पे ठाड़ो।’’ मैंने कई।
मैं औ भौजी बतकाव करई रै हते के बाहरे से भैयाजी की आवाज सुनाई परी। 
‘‘सुनो तनक बाहरे तो आओ!’’ भौजी ने पुकारो रओ।
‘‘हौ आ रए!’’ कैत भईं भौजी बाहरें खों गईं।
दोई मिनट में भैयाजी औ भौजी भीतरे आए। भैयाजी के हाथन में एक बोरी हती औ भौजी एक थैला धरी हतीं।
‘‘राम-राम भैयाजी! जे तो ऐसो लग रओ के आप पूरी मंडी उठा लाए हो।’’ मैंने भैयाजी से ठिठोली करी।
‘‘तुमाई भौजी की किरपा आए। ने जे संकारे से ठेन करतीं औ ने हम सब्जीमंडी जाते।’’ भैयाजी सोई हंस के बोले। फेर बे कैन लगे, ‘‘हम तुमाए लाने सोई ले आए।’’
‘‘अरे, मोय अकेली को का चाउने? कछू सब्जी सो धरी आएं।’’ मैंने कई।
‘‘जित्ती हम दुकेले को लगहे, ऊकी आधी तुम अकेली को लगहे। चलो देखत आएं के जे का-का ले आए?’’ भौजी सोई हंस के बोलीं।
‘‘अरे, कछू खास नोईं! उते बी कोनऊं खास सस्तो नइयां। बस, थोक औ फुटकर को अंतर आए। हमने तो भटा लए, लौकी लई, भिंडी लई औ आलू, प्याज लए। हऔ, औ दो ठईयां फूल गोभी सोई ले आए।’’ भैयाजी ने लाई भईं पूरी सब्जियां गिना दईं।
‘‘सो बिन्ना, तुम जा एक लौकी धरो, एक गोभी धरो औ ईमें से जित्ते भटा लेने होय सो ले लेओ।’’ भौजी लौकी औ गोभी मोरी तरफी बढ़ात भई बोलीं।
‘‘इत्ती सब्जी का करबी? जा लौकी सोई भौत बड़ी आए।’’ मैंने मना करी। काए से के मोय पतो के बे ओरें मोसे पइसा ने लैंहे। 
‘‘सकांेच ने करो! सई में तुमाए लाने बी लाए हैं।’’ भैयाजी बोले।
‘‘हऔ, जे दो भटा हम धरे दे रए। औ आलू,प्याज चाउने?’’भौजी ने पूछी।
‘‘तुम औ पूछ रईं! जे बिन्ना कभऊं कैहें का के चाऊने! तुम तो एक थैला में धर देओ, जो-जो देने होय।’’ भैयाजी भौजी से बोले।
मोय सई में सकोंच लग रओ हतो। जो बनी बनाई सब्जी होती तो मैं एक दार मंगा के खा लेती मनो ऐसे सब्जियां लेत भई मोय हिचक हो रई हती। काय से के एक तो जे सब्जियां इत्ती मैंगी औ ऊपे भैयाजी जे सब्जीमंडी से ले के आए हते। मनो दूसरी तरफी उन ओरन को प्रेम सोई दिखा रओ हतो। 
‘‘काय, हम सोच रए के हम सोई सब्जी की ठिलिया लगान लगें। मंडी से सब्जी लाहें औ इते बेचहें। खूब कमाई हुइए।’’ भैयाजी उचकत भए बोले।
‘‘रैन देओ! आपके बस की कछू नइयां। हमने तो कई रई के एकाद एकड़ की जमीन ले लेओ। उते सब्जी उगाबी और उतई एक कमरा डार के रैबी। मगर आप खों कोन पोसाओ हमाओ जा प्लान।’’ भौजी मों बनात भई बोलीं।
‘‘तुम बी रैन देओ! तुमने एक भटा में तो इत्तो दोंदरा दे दओ औ पूरे बगीचा में का करहो।’’ भैयाजी हंसत भए बोले।
‘‘खैर, ऊपे बाद में गिचड़बी, पैले आप ओरन के लाने चाय-माय लाई जाए।’’ कैत भईं भौजी चाय बनाबे खों कढ़ गईं। औ मैं औ भैयाजी बतकाव करन लगे।
‘‘सई में बिन्ना, मैंगाई कोनऊं रोक नईं पा रओ। को जाने आगे का हुइए।’’ भैयाजी चिंता करत भए बोले। 
‘‘हऔ, बाकी विज्ञापन देख लेओ तो ऐसो लगत आए के अपने इते सबई गाड़ी-घोड़ा औ सोना-चांदी खरीद रएं होएं।’’ मैंने भैयाजी से कई।
‘‘सो का? मुतके खरीद रए। कर्जा ले के। अब चाए साऊकार से लेबें, चाए बैंक से। कर्जा तो मनो कर्जा आए। सई कैं तो जे अच्छे दिन नोईं कर्जा वारे दिन आएं।’’भैयाजी बोले। तभई भौजी चाय ले आईं। 
 बाकी बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की। 
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Wednesday, October 23, 2024

चर्चा प्लस | क्यों आ रहे हैं तेंदुए विश्वविद्यालय परिसर में | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर

चर्चा प्लस
क्यों आ रहे हैं तेंदुए विश्वविद्यालय परिसर में ?  
- डाॅ (सुश्री) शरद सिंह  
     लगभग प्रति वर्ष सागर, म.प्र. के डाॅ. हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय परिसर में तेंदुआ आदि वन्य पशुओं के दिखने की घटनाएं होती रहती हैं। तेंदुए क्यों आ रहे हैं विश्वविद्यालय परिसर में? कम से कम पढ़ने तो नहीं। खैर, यह हंसी-मज़ाक का विषय नहीं, एक गंभीरता से विचारणीय विषय है। हाल ही में अलग-अलग समय में एक से अधिक तेंदुए विश्वविद्यालय परिसर में देखे गए। तेंदुआ एक वन्य प्राणी है। वन में रहना ही उसे पसंद है। वह कोलाहल भरे शहरी क्षेत्र मे आना पसंद नहीं करता हैं। फिर भी उसका इस तरह शहरी क्षेत्र की ओर रुख करना विचारणीय है। उन कारणों को टटोलना जरूरी है जो इन वन्य प्राणियों को जंगल से बाहर कदम रखने को विवश कर रहे हैं। कहीं हम मनुष्य स्वयं तो नहीं है इसके जिम्मेदार?    
       मैं पाठकों को याद दिलाना चाहूंगी कि 18.09.2019 को दैनिक ‘सागर दिनकर’ के मेरे इसी चर्चा प्लस काॅलम में मैंने लिखा था ‘‘इंसानी आबादी में क्यों प्रवेश कर रहे हैं वन्यपशु?’’। मुझे लगता है कि सागर के विश्वविद्यालय परिसर में बार-बार तेदुओं को देखे जाने के संदर्भ में एक बार फिर उस लेख पर दृष्टिपात करना जरूरी है क्योंकि उससे सभी जान सकेंगे कि वन्य पशु शहरी क्षेत्रों में बार-बार क्यों प्रवेश करते हैं? तो चलिए देखते हैं मेरे उस लेख में दिए कारणो को। 
इंसानी बस्तियों में शेर, तेंदुआ, हाथी या लकड़बग्घे के प्रवेश करने की घटनाएं बढ़ रही हैं। यह मनुष्य और वन्यपशुओं के बीच का अघोषित संघर्ष है। जिसमें दुर्भाग्यवश सबसे अधिक नुकसान झेल रहे है वह पक्ष जो मांसाहारी और हिंसक कहलाता है। मनुष्यों की भीड़ वन्यपशुओं पर भारी पड़ रही है। यदि वन्यपशु बस्तियों की ओर कदम बढ़ा रहे हैं तो इसका अर्थ है कि उनसे उनका आवास, भोजन, पानी छीना जा रहा है और भूख-प्यास से लाचार हो कर वे मानव-आबादी वाली बस्तियों की ओर बढ़ रहे हैं, जहां मनुष्य आत्मरक्षा के लिए उन्हें मौत के घाट उतरने को तत्पर रहता है। यह संघर्ष रुकना जरूरी है, बिना किसी नुकसान के। 

मुंबई की नगरीय आबादी में शेर या तेंदुए के प्रवेश करने के बारे में कल्पना करना भी कठिन है लेकिन नेशनल जियोग्राफी चैनल ने एक वीडियो शूट किया जिसमें शेर को पुल पार कर नगरीय बस्ती में घूमते दिखा था। यह सौ प्रतिशत सच्चा किन्तु चैंका देने वाला वीडियो था। आज छोटे-बड़े शहरों में जिस तरह गाड़ियों के हॉर्न, लाउडस्पीकरों का शोर-शराबा रहता है, वैसे माहौल में शांति पसंद वन्यपशु क्यों आना पसंद करेंगे? लेकिन उनका आना लगातार बढ़ रहा है। 09 सितम्बर 2019 को दमोह शहर के मुख्य बाजार क्षेत्र घंटाघर के समीप नगर पालिका टाउन हॉल परिसर में एक तेंदुआ के घुसे होने की जानकारी के बाद हड़कंप मच गया। जिसे पुलिस की डायल हंड्रेड टीम के सदस्य द्वारा रात में करीब 1ः30 बजे नगर पालिका टाउनहॉल में तेंदुआ को देखा था और उसका एक वीडियो भी बनाया था, जिसमें किसी जानवर की पूंछ दिखाई दी। रात करीब 1ः30 बजे आई तेंदुआ होने की खबर के बाद पुलिस और वन विभाग की टीम मौके पर अलर्ट हो गई थी।

15 सितम्बर 2019 को सागर जिले की रहली तहसील के धार्मिक महत्व के क्षेत्र टिकीटोरिया से लगे हुए जंगल में ग्रामीणों ने तेंदुआ देखा। उन्होंने इसकी सूचना सुबह वन विभाग को दी। वन आरक्षक ने मौके पर जाकर वन्य प्राणी के पद चिन्ह लिए हैं। इस संबंध में रेंजर का कथन था कि यह पुष्टी के साथ नहीं कहा जा सकता कि पग चिन्ह तेंदुए के ही हैं, यह पग चिन्ह लकड़बग्घा के भी हो सकते हैं। जबकि चश्मदीद व्यक्ति ने दावा किया कि वह तेंदुआ ही था। रात 11 बजे के करीब तीखी गांव के संजय पटेल अपने गांव जा रहे थे। तभी उन्होंने तेंदुए को देखा। संजय पटेल का कहना है कि चांदनी रात होने की वजह से उन्हें तेंदुआ स्पष्ट रूप से दिखाई दिया। टिकीटोरिया के पास तेंदुए ने उनका रास्ता काटा। वह बड़े आराम से जा रहा था। दौड़ नहीं रहा था। अपने इतने करीब तेंदुए को देख कर संजय पटेल को पसीना आ गया। वे घबराए हुए अपने घर पहुंचे और सुबह वन विभाग को इसकी सूचना दी। रहली में पदस्थ वनरक्षक सुबह संजय पटेल को लेकर टिकीटोरिया के उस स्थान पर गए जहां संजय पटेल ने तेंदुए को देखा था। उन्होंने उस वन्यपशु के पग चिन्ह और वीडियोग्राफी भी कराई गई। इसकी जानकारी वरिष्ठ अधिकारियों को दी। गांववालों का कहना था कि यह तेंदुआ के ही पग चिन्ह हैं। वन विभाग ने आसपास के लोगों को सावधान रहने की चेतावनी दी तथा खेतों में रहने वालों को रात में रोशनी किए रहने की सलाह दी।
अभी तक यही सुनने में आता था कि अभ्यारण्य अथवा राष्ट्रीय पार्क की सीमा से सटे हुए गांवों में यदाकदा शेर, तेंदुआ आदि प्रवेश कर जाते हैं किन्तु शहरी आबादी में ख़तरनाक वन्यपशुओं के प्रवेश करने का कोई को विशेष कारण होगा। वन्यपशुओं के लिए यह विख्यात है कि वे अकारण किसी को नुकसान नहीं पहुंचाते हैं। यहां तक कि यदि शेर का पेट भरा हुआ हो तो, वह भी शिकार नहीं करता है। जंगलों के शांत वातावरण में रहने वाले वन्यपशु शोर और प्रदूषण से भरी बस्तियों की ओर क्यों रुख करेंगे? अप्रैल 2014 में एक तेंदुआ भटककर लखनऊ की आबादी में घुस आया था। तेंदुए की आमद से क्षेत्र में दहशत फैल गई थी। वन विभाग की टीम तेंदुए को पकडने की तैयारी ही कर रही थी कि इस बीच रेस्क्यू आपरेशन में पुलिस की गोली से तेंदुए की मौत हो गई। इस घटना से ऐसा प्रतीत हुआ मानो अपने निवास क्षेत्र को ले कर मनुष्यों और वन्यपशुओं के बीच कोई युद्ध छिड़ा हुआ हो।     
     
आखिरकर जंगली जानवर मानव बस्तियों का रूख क्यों कर रहे हैं। क्यों मनुष्य और जंगली जीवों में संघर्ष बढ़ रहा है? इसका सबसे बड़ा और प्रमुख कारण है बस्तियों का फैलना और जंगलों का सिकुड़ते जाना। असंतुलित एवं अनियंत्रित विकास से जंगल नष्ट हो रहे हैं। जिससे जंगलों में रहने वाले वन्यपशुओं के लिए उनका रिहाइशी क्षेत्र छोटा पड़ने लगा है।  दूसरा सबसे बड़ा कारण है पानी का अनियंत्रित और असंतुलित दोहन। नदियों के किनारे के खेतों के लिए अवैध तरीके से असीमित मात्रा में बिजली की मोटरों से पानी खींच लिया जाता है। कहीं-कहीं तो नदी के बहाव में अवैध बांध बना कर नदी के पानी का असंतुलित बंटवारा कर दिया जाता है। इन सबके बीच इस बात का कोई ध्यान नहीं रखता है कि वन क्षेत्र में आवश्यक जल-आपूर्ति हो पा रही है या नहीं। पानी की कमी में घास के मैदान घटने लगते हैं जिससे पेट भरने के लिए हिरण, चिंकारा, नीलगाय आदि को गांवों अथवा बस्तियों का रुख करना पड़ता है। इन पशुओं को खा कर अपना पेट भरने वाले मांसाहारी पशु इनके पीछे-पीछे बस्तियों की ओर कदम बढ़ाने लगते हैं। एक बार बस्तियों में पहुंचने के बाद पालतू पशु के रूप में आसान शिकार भी उन्हें बार-बार घुसपैंठ करने का लालच देते हैं।  ऐसे में इंसान और जगली जानवरों के बीच मुडभेड़ की घटनाएं होना स्वाभाविक है। किन्तु जब मुडभेड़ की संख्या चिंताजनक स्थिति में पहुंच जाए तो इस पर विचार करना जरूरी है।

दरअसल हम इस सच्चाई को अनदेखा कर रहे हैं कि एक बाघ को जंगल में कम से कम 70 वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र रहने के लिए चाहिए। जिसमें वो विचरण कर सके। लेकिन जंगलों की तरफ बढ़ती इंसानी आबादी का दबाव इतना ज्यादा हो गया है कि अब बाघों सहित वन्य पशुओं का क्षेत्र सिमट रहा है। ऐसे में उन्हें शिकार नहीं मिलता। पीने के लिए पानी नहीं मिलता। ऐसे में वो भटकता हुआ शहरों की तरफ आ सकता है। दूसरी ओर संरक्षण के कारण वन्य जीवों की जनसंख्या में भी वृद्धि हुई है। लेकिन वहीं उनका रिहाइशी क्षेत्र सिकुड़ रहा है। वन्य पशुओं के रहवास क्षेत्र में मनुष्यों के रहवास वाली कॉलोनियां बसती जा रही हैं। दुधवा और पीलीभीत का उदाहरण लीजिए, यहां कभी तराई क्षेत्र होता था, जंगल होते थे, लेकिन अब ऐसा नहीं हैं। इसी तरह सागर विश्वविद्यालय के आसपास जो वनक्षेत्र था तथा कृषि क्षेत्र था वह बस्तियों में बदल गया है। थोड़ा-सा क्षेत्र बचा है वन के रूप में जिसमें जब-तब जंगल-कटवों की घुसपैंठ होती रहती है। पीले जंगल काटकर खेत बना दिए गए हैं। और अब खेत काॅलोनियों में बदल गए हैं। अब अन्य वन्य जीव आखिर कहां जाएंगे? 
देव कुमार वासुदेवन, सेक्रेटरी, द नेचर वॉलिंटियर्स, महू ने अपनी एक चर्चा में बहुत मुद्दे की बात कही थी कि ‘‘यह दुखद है कि हमारे सिस्टम में वाइल्ड लाइफ कोई मुद्दा नहीं है।’’ निःसंदेह, एक पर्यटन के रूप में वाइल्ड लाईफ को महत्व दिया जाता है किन्तु उस वन्य जीवन की बुनियादी ज़रूरतों को अनदेखा कर दिया जाता है जिसका परिणाम शहरी क्षेत्रों में वन्य पशुओं की घुसपैंठ के रूप में हमारे सामने आता है।
देश भर में जंगली जानवरों के हमलों में हर साल सैंकड़ों लोग अपनी प्राणों से हाथ धोते हैं। अनेक लोग गंभीर रूप से घायल भी होते हैं। इंसान और वन्यपशुओं के बीच इस संघर्ष में दोनों पक्ष मारे जा रहे हैं। भारत में हाथी और बाघ जैसे जानवर औसतन प्रतिदिन एक व्यक्ति को मार रहे हैं जबकि इंसान भी लगभग प्रतिदिन औसतन एक वन्यपशु को मार रहा है। आहारचक्र में असंतुलन पैदा होने का यह एक घातक परिणाम है। घास प्रबन्ध अर्थात शाकाहारी जानवरों के लिए भोजन प्रबन्ध बिगड़ गया है। जब इनका भोजन अर्थात चारा जंगलों में नहीं होगा तो ये शहर-गांवों की तरफ आएंगे ही बाघ, तेंदुआ आदि जंगल छोड़कर आबादी की तरफ आने लगें तो इसे उनके संघर्ष की गंभीरता को स्वीकार कर ही लेना चाहिए और समय रहते आवश्यक कदम उठाने चाहिए। वनपरिक्षेत्र और वन्यपशुओं के धनी बुंदेलखंड में समय रहते इस प्रकार की घटनाओं को रोकने का गंभीरता से प्रयास करना होगा।  
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Tuesday, October 22, 2024

पुस्तक समीक्षा | स्मारिका: परसाई जन्म शताब्दी वर्ष एवं महेन्द्र फुसकेले स्मरण अंक | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

आज 22.10.2024 को  #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई श्री मुकेश तिवारी द्वारा संपादित स्मारिका की समीक्षा।
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पुस्तक समीक्षा
स्मरण उस अतीत से जोड़ता है जो हमें बहुत कुछ सिखाता है
- समीक्षक डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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पुस्तक       - स्मारिका: परसाई जन्म शताब्दी वर्ष एवं महेन्द्र फुसकेले स्मरण अंक
संपादक      - मुकेश तिवारी 
प्रकाशक     - प्रगतिशील लेखक संघ, सागर ईकाई, सागर
मूल्य        - 100/- 
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‘‘जहां श्रमिक निवास करते हैं वहां उनके हित की बात करने वाले भी रहते हैं।’’- मक्सिम गोर्की ने कहा था। गोर्की का यह कथन सागर के उस परिवेश पर एकदम सटीक बैठता है जहां बड़ी संख्या में बीड़ी श्रमिक रहते हैं और उन अशिक्षित एवं शोषित होते रहे श्रमिकों के पक्षधर भी समय-समय पर आगे आते रहे हैं। ऐसे ही एक पक्षधर हुए महेन्द्र फुसकेले। जिन्हें लोग ‘काॅमरेड फुसकेले’ के नाम से भी पुकारते थे। वे बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। वे प्रतिष्ठित अधिवक्ता थे और उच्चकोटि के साहित्यकार थे। उन्होंने हमेशा दलित शोषित श्रमिकों एवं स्त्रियों का पक्ष लिया। वे जानते थे कि समाज में स्त्रियों की स्थिति दलितों से बेहतर नहीं है। 02 फरवरी 1934 को जन्मे महेन्द्र फुसकेले का 12 अक्टूबर 2021 में निधन हो गया। इसके बाद से उनके पुत्र पेट्रिस फुसकेले और पुत्रवधू डाॅ नमृता फुसकेले प्रगतिशील लेखक संघ, सागर इकाई के तत्वावधान में प्रतिवर्ष 12 अक्टूबर को उनका स्मरण दिवस मनाते हैं। इस अवसर पर एक स्मारिका का भी प्रकाशन किया जाता है। इस वर्ष यह स्मारिका महेन्द्र फुसकेले जी पर केन्द्रित है किन्तु इस वर्ष स्व. हरिशंकर परसाईं जन्म शताब्दी वर्ष होने के कारण इसमें परसाईं के व्यक्तित्व एवं कृतित्व का भी स्मरण किया गया है। स्मारिका का सबसे बड़ा महत्व यही होता है कि उसके माध्यम से अतीत के महत्वपूर्ण व्यक्ति, पलों एवं कार्यों का स्मरण किया जाता है और स्मरण उस अतीत से जोड़ता है जो हमें बहुत कुछ सिखाता है।  
स्मारिका में महेन्द्र फुसकेले जी से संबंधित संस्मरण लेख हैं जो उनके व्यक्तित्व पर समुचित प्रकाश डालते हैं- ‘‘महेन्द्र फुसकेले: जो सत्य के कट्टर पक्षधर थे’’ (डाॅ. सुश्री शरद सिंह), ‘‘महेन्द्र फुसकेले: जैसा मैं जान सका’’ (सेवाराम त्रिपाठी), ‘‘अविस्मरणीय व्यक्तित्व: श्रीमान महेन्द्र कुमार फुसकेले’’ (निरंजना जैन), प्रतिबद्धता के साथ एक एक्टिविस्ट लेखक थे कामरेड फुसकेले’’ (सत्यम सत्येन्द्र पाण्डेय), ‘‘मानवतावादी दृष्टिकोण के सजग प्रहरी’’ (डाॅ. वंदना मिश्र), ‘‘वटवृक्ष की छांव अब न रही’’ (आविंद मिश्र) तथा ‘‘मजदूरों, शोषितों और निचले तबकों की समस्याओं को उजागर करनेवाले अग्रणी नेता और साहित्यकार श्री महेन्द्र फुसकेले’’ (डाॅ. गजाधर सागर)। 

महेन्द्र फुसकेले जी के कृतित्व को रेखांकित करने वाले लेख हैं-‘‘साहित्य में झांकता हुआ बुंदेलखंड’’(कैलाश तिवारी विकल), ‘‘श्री फुसकेले का उदात्त औपन्यासिक कौशल’’ (टीकाराम त्रिपाठी)।
जन्म शताब्दी वर्ष को ध्यान में रखते हुए हिन्दी के सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई पर कई लेख हैं। जैसे -‘‘अव्यवस्था के छत्ते पर परसाई का पत्थर’’ (मनीष दुबे), ‘‘एक ही थैली के चट्टे-बट्टे’’ (कैलाश तिवारी विकल), ‘‘व्यंग्य विधा को प्रतिष्ठित कराने वाले अग्रणी साहित्यकार, श्री हरिशंकर परसाई’’ (डाॅ. गजाधर सागर), प्रेमचंद की परंपरा में हरिशंकर परसाई’’ (कैलाश तिवारी विकल), ‘‘प्रेमचंद के फटे जूते और परसाई’’ (डाॅ. महेन्द्र खरे), ‘‘परसाई की व्यंग्योक्तियां’’ (डाॅ. एम.के. खरे)। इनमें ‘‘एक ही थैली के चट्टे-बट्टे’’  लेख में कैलाश तिवारी विकल ने महेन्द्र फुसकेले एवं हरिशंकर परसाई के व्यक्त्वि तथा कृतित्व में समानता के त्तवों का उल्लेख किया है जिससे यह लेख लघु होते हुए भी महत्वपूर्ण है।
स्मारिका में महेन्द्र फुसकेले तथा हरिशंकर परसाई के साथ ही प्रेमचंद पर भी प्रचुर सामग्री है। ‘‘प्रेमचंद का समय और वर्तमान परिदृश्य’’ (डाॅ. नलिन निर्मल), ‘‘कहानी ईदगाह के बारे में मेरे विचार (वृंदावन राय सरल), ‘‘प्रेमचंद को याद करते हुए (वीरेन्द्र प्रधान), ‘‘मुंशी प्रेमचंद और सागर जिला-सागर’’(लक्ष्मी नारायण चैरसिया), ‘‘प्रेमचंद और हम’’ (डाॅ. दिनेश कुमार साहू), तथा ‘‘मुंशीजी की राजनैतिक प्रखर दृष्टि और दूरदर्शिता’’(पी.आर. मलैया)। 

काव्य खण्ड में अरुण दुबे, डाॅ. अनिल कुमार जैन ‘अनिल’, मुकेश सोनी रहबर, प्रभात कटारे तथा महेश सोनी ‘दर्पण’ की ग़ज़लें, ममता भूरिया, देवी सिंह राजपूत, श्रीमती ज्योति झुड़ेले, पुष्पेंद्र दुबे कुमार सागर, आनंद मिश्र ‘अकेला’, सतीश पाण्डे के गीत हैं। डाॅ. नमृता फुसकेले, सी.एल. कंवल, देवकी भट्ट ‘दीपा’, सुमन झुड़ेले ‘केशर’ पेट्रिस फुसकेले, परमानंद आनंद, के.एल. तिवारी ‘अलबेला’ की कविताएं हैं। अशोक तिवारी ‘अलख’ तथा वृंदावनराय ‘सरल’ के दोहे हैं। 

स्मारिका में पेट्रिस फुसकेले की कविता ‘‘मेरे पापा मेरे पापा...’’ मार्मिक एवं हृदयस्पर्शी है। क्योंकि यह कविता इस बात को जताती है कि जैसे कहा जाता है कि ‘बड़ों की दृष्टि में बच्चे हमेशा बच्चे रहते हैं,’ ठीक उसी तरह बच्चे उम्र में चाहे कितने भी बड़े क्यों न हो जाएं, उनकी दृष्टि में बड़े तो बड़े ही रहते हैं। फिर पिता का स्थान तो यूं भी अद्वितीय होता है। पेट्रिस फुसकेले की यह कविता देखिए-
स्मृति पटल पर याद आते 
मेरे पापा मेरे पापा।
जिस टेबल कुर्सी पर बैठकर 
अर्द्ध रात्रि तक लिखते रहते 
उस टेबल कुर्सी पर बैठकर 
होता है पापाजी का अहसास
उपन्यास वह कैसे लिख लेते 
सोचकर मैं हूं हैरान
एक नहीं अनेक उपन्यास 
कहानियों का है उनका भंडार 
रामायण, महाभारत से लेकर 
सत्यप्रकाश, गीता, कुरान 
बाईबिल हो या कबीर दर्शन 
करते रहे सबका अध्ययन 
निबंधों का क्या कहना 
हर विषय पर था अधिकार ।
पात्र उनके जीवंत होते 
मैनें देखा उनके लेखन में 
नारी उत्पीड़न हो या 
बच्चों को वैज्ञानिक शिक्षा।
कलम उनकी हमेशा चलती 
मजदूरों का नेतृत्व करते 
देखा उन्हें सड़कों पर 
कर्मचारियों को 
न्यायालय में न्याय दिलाते 
प्रगतिशील की मशाल थामें 
साहित्य को दिशा देते 
याद आते मेरे पापा मेरे पापा.....।
- एक स्मारिका में अपने पिता के प्रति पुत्र के ये काव्यात्मक शब्द समाज में प्रवेश कर चुकी उस दुरावस्था पर भी प्रहार करते हैं जिसमें ‘‘जैनरेशन गैप’’ का वास्ता देकर परिवार के वृद्धों का अनादर किया जाता है। पेट्रिस फुसकेले की यह रचना एक विशिष्ट व्यक्तिव के धनी पिता के प्रति पुत्र के दृष्टिकोण की भी अनुभूति कराती है।  
स्मारिका के अंतिम पृष्ठ पर महेन्द्र फुसकेले जी की प्रकाशित कृतियों के छायाचित्र रखे गए हैं। आवरण के अंतःभाग में प्रगतिशील लेखक संघ की सागर इकाई की गतिविधियों के छायाचित्रों को प्रस्तुत किया गया है जिससे इकाई की सक्रियता प्रमाणित होती है।
इस स्मारिका का संपादन किया है मुकेश तिवारी ने। विगत वर्ष की स्मारिका का संपादन भी उन्होंने ही किया था। वे कवि, लेखक होने के साथ ही प्रकाशन क्षेत्र से जुड़े हैं अतः उन्हें प्रकाशन का अनुभव है। कागज एवं छपाई की दृष्टि से स्मारिका उत्तम है। मुद्रण की त्रुटियों के संबंध में स्वयं संपादक ने ‘‘आत्मविचार’’ के अंतर्गत लिखा है कि -‘‘आज कम्प्यूटर के युग में प्रतिदिन अपडेट होती नई-नई टेक्नोलॉजी से जहाँ हमें सुविधाएँ उपलब्ध हो रही हैं वहीं हमें कुछ असुविधाओं का सामना भी करना पड़ा। आप सभी के आलेख, संस्मरण, रचनाएँ हमें ऑनलाइन प्राप्त हुईं और हमने यूनिकोड कन्वर्टर से फॉन्ट बहुत सतर्कता के साथ बदलने का प्रयास किया है, टंकण (टाइपिंग) का समय तो बच गया, परन्तु यूनिकोड कन्वर्टर के कारण कुछ अशुद्धियाँ रह गई हैं। इन अशुद्धियों के लिए मैं सभी लेखकों से एवं सभी पाठकों से क्षमा प्रार्थी हूँ।’’ यूं भी स्मारिका के कलेवर के समक्ष मुद्रण की त्रुटियां नगण्य हैं। 

फिर भी एक कमी अवश्य खटकती है इस स्मारिका में और वह है अनुक्रमणिका का अभाव। अनुक्रमणिका होने से पाठक को पुनःपाठ हेतु अपनी रुचि के संस्मरण, लेख, कविता आदि पढ़ने सुगमता होती है। बिना किसी बुकमार्क के वह सीधे उसी पृष्ठ पर पहुंच सकता है। साथ ही आरम्भ में ही सामग्री की संक्षिप्त जानकारी भी प्राप्त हो जाती है। अतः अनुक्रमणिका का अभाव इसी एक बड़ी कमी है अन्यथा शेष संपादन उत्तम है। देखा जाए तो यह स्मारिका महेन्द्र फुसकेले जी पर केन्द्रित होते हुए भी ‘‘प्रेमचंद, परसाई और फुसकेले’’ की त्रयी से मिलाती है। इससे इसकी अर्थवत्ता और अधिक हो गई है।                                                                                                                
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