Wednesday, March 22, 2017

विश्व जल दिवस ... जल है तो कल है - डॉ. शरद सिंह

Dr Sharad Singh
22 मार्च : #विश्व_जल_दिवस पर विशेष लेख
"#जल_है_तो_कल_है" मेरे कॉलम #चर्चा_प्लस में "दैनिक सागर दिनकर" में ( 22.03. 2017) ..My Column #Charcha_Plus in "Sagar Dinkar" news paper
चर्चा प्लस
 



22 मार्च : #विश्व_जल_दिवस पर विशेष
जल है तो कल है
- डॉ. शरद सिंह 


विश्व के लोगों द्वारा हर वर्ष 22 मार्च को विश्व जल दिवस मनाया जाता है। वर्ष 1993 में संयुक्त राष्ट्र की सामान्य सभा के द्वारा इस दिन को एक वार्षिक कार्यक्रम के रुप में मनाने का निर्णय किया गया। जल का महत्व, आवश्यकता और संरक्षण के बारे में जागरुकता बढ़ाने के लिये इसे पहली बार वर्ष 1992 में ब्राजील के रियो डी जेनेरियो में “पर्यावरण और विकास पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन” की अनुसूची 21 में आधिकारिक रुप से जोड़ा गया था और वर्ष 1993 से इस उत्सव को मनाना शुरु किया। वर्ष 2017 के लिए थीम है “अपशिष्ट जल प्रबंधन“ ।

गर्मी का मौसम आते ही पानी की किल्लत सिर चढ़कर बोलने लगती है। जल ही तो जीवन हैं। यदि जल नही ंतो जीवन कहां? स्वतंत्र भारत में अनेक बांधों के निर्माण के बाद भी लापरवाही, अव्यवस्था और सजगता के अभाव के कारण जल-संकट निरन्तर बढ़ता गया है। जिन ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल के स्रोत कम होते हैं तथा जल स्तर गिर जाता है, उन क्षेत्रों की औरतों को कई किलोमीटर पैदल चल कर अपने परिवार के लिए पीने का पानी जुटाना पड़ता है। छोटी बालिकाओं से लेकर प्रौढ़ाओं तक को पानी ढोते देखा जा सकता है। स्कूली आयु की अनेक बालिकाएं अपनी साइकिल के कैरियर तथा हैंडल पर प्लास्टिक के ‘कुप्पे’ (पानी भरने के लिए काम में लाए जाने वाले डिब्बे) की कई खेप जलास्रोत से अपने घर तक ढोती, पहुंचाती हैं। भारत में हर साल 1 लाख से भी ज्यादा लोगों की जलप्रसारित बीमारियों की वजह से मौत होती है। ताजा आंकड़ों के मुताबिक भारत के कुल रोगियों में 77 फीसदी हैजा, पीलिया, दस्त, मियादी बुखार (टाइफाइड) जैसी जलप्रसारित बीमारियों से पीड़ित होते हैं। जल प्रदूषण इतना बढ़ गया है कि इससे देश के 70 फीसदी घरों पर असर होता है। योग्य शौचालयों और आरोग्य व्यवस्था का अभाव जल प्रदूषण की बड़ी वजह है। साफ न किया गया गंदा पानी जल स्रोत्रों में जाकर मिलता है, जिससे बीमारियां फैलती हैं। जलप्रसारित बीमारियों में सबसे गंभीर रोग दस्त है, जिससे सबसे ज्यादा बच्चों की मौत होती है। वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन के आंकड़ों के मुताबिक हर साल भारत में दस्त की वजह से 98,000 बच्चे जान गंवाते हैं। अगर इस स्थिति में सुधार लाना है तो शहरी विकास में अपशिष्ट जल प्रशोधन को प्राथमिकता देना जरूरी है।
Charcha Plus Column of Dr Sharad Singh in "Sagar Dinkar" Daily News Paper

पूरे विश्व के लोगों द्वारा हर वर्ष 22 मार्च को विश्व जल दिवस मनाया जाता है। वर्ष 1993 में संयुक्त राष्ट्र की सामान्य सभा के द्वारा इस दिन को एक वार्षिक कार्यक्रम के रुप में मनाने का निर्णय किया गया। लोगों के बीच जल का महत्व, आवश्यकता और संरक्षण के बारे में जागरुकता बढ़ाने के लिये हर वर्ष 22 मार्च को विश्व जल दिवस के रुप में मनाने के लिये इस अभियान की घोषणा की गयी थी। इसे पहली बार वर्ष 1992 में ब्राजील के रियो डी जेनेरियो में “पर्यावरण और विकास पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन” की अनुसूची 21 में आधिकारिक रुप से जोड़ा गया था और पूरे दिन के लिये अपने नल के गलत उपयोग को रोकने के द्वारा जल संरक्षण में उनकी सहायता प्राप्त करने के साथ ही प्रोत्साहित करने के लिये वर्ष 1993 से इस उत्सव को मनाना शुरु किया। यह अभियान यूएन अनुशंसा को लागू करने के साथ ही वैश्विक जल संरक्षण के वास्तविक क्रियाकलापों को प्रोत्साहन देने के लिये सदस्य राष्ट्र सहित संयुक्त राष्ट्र द्वारा मनाया जाता हैं। इस अभियान को प्रति वर्ष यूएन एजेंसी की एक इकाई के द्वारा विशेष तौर से बढ़ावा दिया जाता है जिसमें लोगों को जल मुद्दों के बारे में सुनने व समझाने के लिये प्रोत्साहित करने के साथ ही विश्व जल दिवस के लिये अंतरराष्ट्रीय गतिविधियों का समायोजन शामिल है। वर्ष 2017 के विश्व जल दिवस उत्सव के लिए विषय “अपशिष्ट जल“ रखा गया है।
क्या कभी किसी ने सोचा था कि एक दिन देश ऐसी भी स्थिति आएगी कि पानी के लिए धारा 144 लगाई जाएगी अथवा पेयजल के स्रोतों पर बंदूक ले कर चौबीसों घंटे का पहरा बिठाया जाएगा? किसी ने नहीं सोचा। लेकिन वर्ष 2016 की गर्मियों में ऐसा ही हुआ। पिछले दशकों में पानी की किल्लत पर गंभीरता से नहीं सोचे जाने का ही यह परिणाम है कि शहर, गांव, कस्बे सभी पानी की कमी से जूझते दिखाई पड़े। देश के कई हिस्सों में पानी की समस्या अत्यंत भयावह रही। विगत वर्ष महाराष्ट्र में कृषि के लिए पानी तो दूर, पीने के पानी के लाले पड़ गए थे। जलस्रोत सूख गए थे। जो थे भी उन पर जनसंख्या का अत्यधिक दबाव था। सबसे शोचनीय स्थिति लातूर की थी। पीने के पानी के लिए हिंसा और मार-पीट की इतनी अधिक घटनाएं सामने आईं। कलेक्टर ने लातूर में 20 पानी की टंकियों के पास प्रशासन को धारा 144 लगानी पड़ी।
मध्यप्रदेश में भी पानी का भीषण संकट मुंह बाए खड़ा रहा। मध्यप्रदेश में 32 हजार हैंडपम्प बंद हो गए थे। 12 हजार से अधिक नल-जल योजनाएं सीधे तौर पर बंद हो गई थीं। प्रदेश की करीब 200 तहसीलों सूखाग्रस्त और 82 नगरीय निकायों में भी गम्भीर पेयजल संकट का सामना करते रहे। मध्यप्रदेश के टीकमगढ़ में और भी अजीब स्थिति रही। वहां की नगर पालिका के चेयरमैन के अनुसार किसान पानी न चुरा पाएं, इसलिए नगरपालिका की ओर से लाइसेंसी हथियार शुदा 10 गार्ड तैनात किए। वहीं दूसरी ओर सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों में सूखे पर केंद्र से जवाब-तलब किया। स्वराज अभियान की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि 9 राज्य सूखे की चपेट में हैं और केंद्र कुछ नहीं कर रहा। साथ ही कोर्ट ने मनरेगा फंड में देरी पर फटकार लगाई थी। मनरेगा पर सुप्रीम कोर्ट ने की केंद्र की खिंचाई करते हुए कहा था कि मनरेगा के तहत 150 दिन की जगह सिर्फ 25 दिन रोजगार मिल रहा है। केंद्र की वजह से राज्यों को फंड में देरी हो रही है। आदालत का कहना था कि राहत में 6 से 7 महीने की देरी बर्दाश्त नहीं की जा सकती।
हमें धरती पर स्वच्छ जल के महत्व को समझना होगा और अपनी पूरी कोशिश करनी होगी कि हम पानी की बर्बादी करने के बजाए उसे बचाएं। हमें अपने स्वच्छ जल को औद्योगिक कचरे, सीवेज़, खतरनाक रसायनों और दूसरे गंदगियों से गंदा होने और प्रदूषित होने से बचाना ही होगा। यह सच है कि पानी की कमी और जल प्रदूषण का मुख्य कारण हमेशा बढ़ती जनसंख्या और तेजी से बढ़ता औद्योगिकीकरण और शहरीकरण है। स्वच्छ जल की कमी के कारण, निकट भविष्य में लोग अपनी मूल जरुरतों को भी पूरा नहीं कर पाएंगे। हाल ही में हुए अध्ययनों के अनुसार, ऐसा पाया गया कि लगभग 25 प्रतिशत शहरी जनसंख्या को साफ पानी मिल ही नहीं पाता है।
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मुताबिक भारत की कुल 445 नदियों में से आधी नदियों का पानी पीने के योग्य नहीं है। अपशिष्ट जल को साफ करके ये सुनिश्चित किया जा सकता है कि गंदे पानी से जल स्रोत्र प्रदूषित नहीं होंगे। जल संसाधनों का प्रबंधन किसी भी देश के विकास का एक अहम संकेतक होता है। अगर इस मापदंड पर भारत खरा उतरना है तो देश को ताजा पानी पर निर्भरता घटानी होगी और अपशिष्ट जल के प्रशोधन को बढ़ावा देना होगा। भविष्य में जल की कमी की समस्या को सुलझाने के लिये जल संरक्षण ही जल बचाना है। भारत और दुनिया के दूसरे देशों में जल की भारी कमी है जिसकी वजह से आम लोगों को पीने और खाना बनाने के साथ ही रोजमर्रा के कार्यों को पूरा करने के लिये जरूरी पानी के लिये लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। जबकि दूसरी ओर, पर्याप्त जल के क्षेत्रों में अपने दैनिक जरुरतों से ज्यादा पानी लोग बर्बाद कर रहें हैं। हम सभी को जल के महत्व और भविष्य में जल की कमी से संबंधित समस्याओं को समझना ही होगा।
2011 की जनगणना के मुताबिक सिर्फ 32.7 फीसदी शहरी निवासी नाली व्यवस्था से जुड़े हैं और शहरी इलाकों में रहने वाले 12.6 फीसदी लोग खुले में शौच करते हैं। ये आंकड़े दर्शाते हैं कि सभी नागरिकों के लिए योग्य शौचायल व्यवस्था करना देश के लिए अब भी बड़ी चुनौती बनी हुई है। शहरों में अवैध इमारतें और झुग्गियों के निर्माण से ये दिक्कत और भी बढ़ गई है। इन इमारतों और झुग्गियों से निकला गंदा पानी के उन जल स्रोत्रों में जाकर मिल जाता है जहां से नगरपालिकाएं पानी की आपूर्ति करती हैं। इसलिए जरूरी है कि अपशिष्ट जल को साफ किया जाए, ताकि प्रदूषण पर काबू पाया जा सके। पानी की किल्लत दूर करने और जलप्रसारित बीमारियों पर काबू पाने के लिए अपशिष्ट जल को सही तरीके से साफ करने की जरूरत है। अपशिष्ट जल के प्रशोधन के बाद उसे शहरों में सिंचाई, हीटिंग एंड वेंटलेशन, धुलाई और शौचालयों में इस्तेमाल किया जा सकता है। कई बड़े शहरों में कैंपस, रिहायशी प्रोजेक्ट ने अपने परिसर में ही साफ किए गए पानी का पुनर्प्रयोग करना शुरू भी कर दिया है। लेकिन छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों में पेयजल की कमी आज भी मुंहबाए खड़ी है।
चिंता की बात यह है कि जब हम स्वच्छ पानी के संरक्षण और संवर्द्धन के प्रति जागरूक नहीं हो पाए हैं तो अपशिष्ट जल का दोहन कैसे कर सकेंगे? हमें इस सच्चाई को हमेशा याद रखना होगा कि जल है तो कल है।
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Thursday, March 16, 2017

‘‘बुंदेलखण्ड की कवयित्रियां’’ ग्रंथ में डॉ शरद सिंह का परिचय एवं ग़ज़लें

Bundel Khand Ki Kavyitriyan
अपनी एक ग़ज़ल यहां दे रही हूं जो प्रकाशित हुई है ‘‘बुंदेलखण्ड की कवयित्रियां’’ ग्रंथ में। इस ग्रंथ में मेरी और मेरी दीदी डॉ वर्षा सिंह का परिचय एवं ग़ज़लें भी शामिल हैं। बुंदेली साहित्य परम्परा के संदर्भ में महत्वपूर्ण ग्रंथ है यह।

इसका संपादन किया है वरिष्ठ साहित्यकार हरिविष्णु अवस्थी जी ने और प्रकाशित किया है श्री वीरेन्द्र केशव साहित्य परिषद् टीकमगढ़ की ओर से सरस्वती साहित्य संस्थान, इलाहाबाद ने।
हरिविष्णु अवस्थी जी का आभार एवं उन्हें हार्दिक बधाई!

Bundel Khand Ki Kavyitriyan - Sharad Singh

Wednesday, March 15, 2017

हिन्दी साहित्य में उपेक्षित ही रहा रिकार्डतोड़ क्राइम पल्प फिक्शन - शरद सिंह

‘हंस’ ने मार्च 2017 के अंक को ‘ रहस्य-अपराध-वार्ता ’ विशेषांक के रूप में प्रकाशित किया है। इस विशेषांक के अतिथि संपादक हैं गौतम सान्याल जो गंभीर समीक्षक एवं वरिष्ठ लेखक हैं। 

इस अंक में मेरा भी एक लेख है- ‘‘ हिन्दी साहित्य में उपेक्षित ही रहा रिकार्डतोड़ क्राइम पल्प फिक्शन ’’। मेरा दावा है कि यह लेख आपकी बहुत-सी यादों को ताज़ा कर देगा।
इस पठनीय अंक को जरूर पढ़िए!

Hans, March 2017- Dr (Miss) Sharad Singh article

Hans, March 2017- Dr (Miss) Sharad Singh article

Hans, March 2017- Dr (Miss) Sharad Singh article

Hans, March 2017- Dr (Miss) Sharad Singh article

Wednesday, March 8, 2017


About Dr (Miss) Sharad Singh in Patrika, Sagar Edition, 08.03.2017  ... International Women's Day 2017
On the International Women's Day Patrika, Sagar edition published my Literary Achievement .... (08.03.2017)
Hearty Thanks Patrika !!!

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर विशेष : स्त्री-सशक्तीकरण ही है चतुर्दिक विकास की चाबी- डॉ. शरद सिंह

Dr Sharad Singh
मेरे कॉलम चर्चा प्लस में "दैनिक सागर दिनकर" में ( 08.03. 2017) .....My Column #Charcha_Plus in "Sagar Dinkar" news paper






#अंतर्राष्ट्रीय_महिला_दिवस पर विशेष : " स्त्री-सशक्तीकरण ही है चतुर्दिक विकास की चाबी " - मेरे कॉलम #चर्चा_प्लस में "दैनिक सागर दिनकर" में ( 08.03. 2017) .....My Column #Charcha_Plus in "Sagar Dinkar" news paper
चर्चा प्लस
अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर विशेष :
स्त्री-सशक्तीकरण ही है चतुर्दिक विकास की चाबी
- डॉ. शरद सिंह
संयुक्तराष्ट्र संघ की 2015-2016 की वार्षिक रिपोर्ट में कहा गया है कि हमने जो लक्ष्य निर्धारित किए थे, उनमें हमारी उल्लेखनीय उपलब्धियां रहीं लेकिन अनेक लक्ष्य ऐसे हैं जो अभी पूरे नहीं हो पाए हैं और उन लक्ष्यों को पूरा करना हमारा प्राथमिक दायित्व रहेगा। संयुक्तराष्ट्र संघ ने दुनिया भर की स्त्रियों के लिए जो लक्ष्य निर्धारित किए हैं उनमें समाज, राजनीति और अर्थजगत में स्त्रियों का नेतृत्व और भागीदारी बढ़ाने तथा स्त्रियों एवं बालिकाओं के प्रति हिंसा समाप्त करने को प्रमुखता दी है। इसे ‘ऐजेंडा-2030’ का नाम दिया गया है। इसके तहत भारत में भी कई योजनाएं चल रही हैं।
संयुक्त राष्ट्रसंघ के महासचिव बान की मून का मानना है कि ‘‘दुनिया अपने विकास लक्ष्यों को तब तक 100 प्रतिशत हासिल नहीं कर सकती है जब तक कि इसके 50 प्रतिशत लोगों अर्थात् महिलाओं के साथ सभी क्षेत्रों में पूर्ण और समान प्रतिभागियों के रूप में व्यवहार नहीं किया जाता है।’’
सन् 2016 ‘‘यूनाईटेड नेशन्स वूमेन’’ का छठां वर्ष था। संयुक्तराष्ट्र संघ की 2015-2016 की वार्षिक रिपोर्ट में कहा गया है कि ‘‘हमने जो लक्ष्य निर्धारित किए थे, उनमें हमारी उल्लेखनीय उपलब्धियां रहीं लेकिन अनेक लक्ष्य ऐसे हैं जो अभी पूरे नहीं हो पाए हैं और उन लक्ष्यों को पूरा करना हमारा प्राथमिक दायित्व रहेगा।’’ संयुक्तराष्ट्र संघ की इस इकाई ने दुनिया भर की स्त्रियों के लिए जो लक्ष्य निर्धारित किए हैं उनमें समाज, राजनीति और अर्थजगत में स्त्रियों का नेतृत्व और भागीदारी बढ़ाने तथा स्त्रियों एवं बालिकाओं के प्रति हिंसा समाप्त करने को प्रमुखता दी है। इसे ‘ऐजेंडा-2030’ का नाम दिया गया है। भारत में भी स्त्री के हित में कई योजनाएं चल रही हैं तथा इन योजनाओं के औचित्य और परिणामों का आकलन करने के लिए देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों में स्त्री अध्ययन केन्द्र भी स्थापित किए गए हैं।
Charcha Plus Column of Dr Sharad Singh in "Sagar Dinkar" Daily News Paper
 विकास के लिए वित्तीय प्रबंधन पर विगत जुलाई में अपनाए गए अदिस अबाबा एजेंडे और विगत सितम्बर में 2030 के सतत विकास के एजेंडे के निष्कर्ष में यह बात दृढ़ता से दिखाई देती है। अदीस अबाबा एजेंडे का पहले अनुच्छेद में ही घोषणा की गई है-‘‘हम लैंगिक समानता और महिला सशक्तिकरण प्राप्त कर के रहेंगे।’’ 2030 के एजेंडे में इस बात को माना गया है कि लैंगिक असमानता सभी असमानताओं की जननी है जिसमें देशों के बीच और देशों के अंदर मौजूद असमानताएं शामिल हैं।
महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी के अनुसार भारत सरकार लैंगिक समानता का लक्ष्य हासिल करने एवं महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा देने के साथ उनके खिलाफ सभी तरह के भेदभाव को खत्म करने के लिए प्रतिबद्ध है। ‘कमिशन ऑन स्टेटस ऑफ वीमेन’ (सीएसडब्ल्यू) के 60वें सत्र के गोलमेज सत्र के दौरान मेनका ने कहा कि भारत ‘सहस्त्राब्दि विकास लक्ष्य’ हासिल करने को प्रतिबद्ध है और उसने पारदर्शी एवं जवाबदेह तंत्रों के जरिए महिलाओं एवं पुरूषों को बराबरी का मौका देते हुए उनके लिए समान अवसर सुनिश्चित करने के मकसद से आगे बढ़ने का लक्ष्य निर्धारित किया है।
महिला-नीत विकास के महत्व पर जोर देते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी कहा है कि महिलाओं को प्रौद्योगिकी सम्पन्न और जनप्रतिनिधि के तौर पर और प्रभावी बनना चाहिए क्योंकि केवल व्यवस्था में बदलाव से काम नहीं चलेगा। वहीं, लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने चौथे वैश्विक संसदीय स्पीकर सम्मेलन की आयोजन समिति की बैठक में कहा, ‘‘लैंगिक समानता को मुख्यधारा में लाना विकास के आदर्श के केंद्र में है। लैंगिक समानता और महिला सशक्तिकरण को विकास प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभानी है, खासकर ऐसे तरीकों से , जिनका गुणात्मक प्रभाव हो।’’
जहां तक स्त्री विमर्श का प्रश्न है तो स्त्री विमर्श, स्त्री मुक्ति, नारीवादी आंदोलन आदि - इन सभी के मूल में एक ही चिन्तन दृष्टिगत होता है, स्त्री के अस्तित्व को उसके मौलिक रूप में स्थापित करना। स्त्री विमर्श को लेकर कभी-कभी यह भ्रम उत्पन्न हो जाता है कि इसमें पुरुष को पीछे छोड़ कर उससे आगे निकल जाने का प्रयास है किन्तु ‘विमर्श’ तो चिन्तन का ही एक रूप है जिसके अंतर्गत किसी भी विषय की गहन पड़ताल कर के उसकी अच्छाई और बुराई दोनों पक्ष उजागर किए जाते हैं जिससे विचारों को सही रूप ग्रहण करने में सुविधा हो सके। स्त्री विमर्श के अंतर्गत भी यही सब हो रहा है। समाज में स्त्री के स्थान पर चिन्तन, स्त्री के अधिकारों पर चिन्तन, स्त्री की आर्थिक अवस्थाओं पर चिन्तन तथा स्त्री की मानसिक एवं शारीरिक अवस्थाओं पर चिन्तन - इन तमाम चिन्तनों के द्वारा पुरुष के समकक्ष स्त्री को उसकी सम्पूर्ण गरिमा के साथ स्थायित्व प्रदान करने का विचार ही स्त्री विमर्श है।
महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा व भारतीय स्त्री अध्ययन संघ के संयुक्तच तत्वावधान में स्त्री अध्ययन के 13 वें राष्ट्रीय सम्मे्लन के अंतर्गत पांच दिवसीय सम्मेलन में ‘‘हाशिएकरण का प्रतिरोध, वर्चस्व को चुनौती : जेंडर राजनीति की पुनर्दृष्टि’’ पर गंभीर विमर्श करने के लिए गांधीजी की कर्मभूमि वर्धा में देशभर के 650 स्त्री अध्ययन अध्येताओं का सम्मेलन हुआ था। इससे पहले 11वां अधिवेशन गोवा में और 12 वां लखनऊ में आयोजित किया गया था। इस पांच दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन में अधिवेशन पूर्व कार्यशाला में देशभर के 60 से अधिक विश्वमविद्यालयों के लगभग 250 विद्यार्थियों ने भाग लिया था। स्त्री अध्ययन के विद्यार्थियों ने पहले सत्र के दौरान ‘‘स्त्री अध्ययन : शिक्षा शास्त्र और पाठ्यक्रम’’ पर विमर्श करते हुए कहा था कि-‘‘स्त्री अध्ययन महिला मुक्ति आंदोलन के परिणामस्वरूप निकला हुआ एक विषय है, जबकि स्त्री अध्ययन को लेकर केंद्रों, विभागों और स्नातकोत्तर व उच्च शिक्षा के स्तर पर बहुत सारे संघर्ष हुए हैं और किए जाने हैं।’’ विद्यार्थियों ने स्त्री अध्ययन के मुख्य अनुशासन के अभ्यासों और उससे पड़ने वाले प्रभावों के अनुभवों को साझा किया। शोधार्थियों ने विशेषकर इस विषय को पढ़ते समय परिवार द्वारा मिलनेवाली चुनौतियों को भी बताया कि किस तरह जब वह अपने विषय के तत्वों पर परिवार और समाज में बात करते हैं तो लोग उनका विरोध करते हैं। कुछ विद्यार्थियों ने यह अनुभव किया है कि यह मात्र समानता का सवाल नहीं है परंतु यह मानव की तरह व्यवहार किए जाने का सवाल है। विद्यार्थियों ने स्वीकार किया कि स्वयं शिक्षा व्यवस्था में जेंडर स्टडीज को एक पूर्ण विषय के तौर पर मान्यता नहीं मिल पायी है। यह मुद्दा भी उठाया गया कि स्त्री अध्ययन के अधिकांश केन्द्रों व विभागों के विभिन्न पद पर या तो दूसरे विषय के शिक्षकों को लाया जाता है या फिर वह पदरिक्त छोड दिया जाता है।
अटल बिहारी वाजपेयी हिंदी विश्वविद्यालय, भोपाल ने भी महिलाओें के उत्थान एवं जागरूकता की दृष्टि से जाबाला महिला अध्ययन केन्द्र की स्थापना हेतु कुछ महत्वपूर्ण उद्देश्य निर्धारित किए हैं, जैसे - परिवार व्यवस्था में महिला की भूमिका का अध्ययन करना, व्यापक सामाजिक जीवन में महिला की स्थिति एवं भूमिका का आकलन करना, भारतीय संस्कृति के संदर्भ में स्त्रीपुरुष सहअस्तित्व की संकल्पना को पुनर्स्थापित करना, समतामूलक समाज की पुनर्स्थापना के मध्य स्त्री की एक मानव के रूप में पहचान करना, स्त्री अपराध-मुक्त समाज की संकल्पना पर शोध करना, स्त्री सशक्तीकरण के मार्ग में आने वाले अवरोधों की पहचान कर उनके समाधानमूलक उपायों पर विचार करना, स्त्री क्रियाशीलता के प्रस्थान बिंदुओं की पहचान के साथ, राष्ट्र निर्माण में स्त्री की भूमिका को सुनिश्चित करना, महिला संबंधी भारतीय दृष्टिकोण या अवधारणा का अध्ययन तथा वैश्विक दृष्टिकोण की समीक्षा करना, वर्तमान समय में युवा महिलाओं के समक्ष आने वाली विभिन्न चुनौतियों (पारिवारिक, व्यावसायिक, सामाजिक) एवं समाधानों का अध्ययन करना तथा लिंगीय (जेण्डर) संवेदनशीलता पर अध्ययन एवं शोध आयोजित करना।
स्त्री अध्ययन के महत्व को देखते हुए यूजीसी ने स्त्री अध्ययन के लिए 7 क्षेत्रों को सूचीबद्ध किया है- 1. विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में महिलाओं पर शोध का विकास 2. मुख्यधारा के विकास में महिलाओं को शामिल किए जाने को बढ़ावा देना 3. भारतीय महिलाओं की विभिन्न आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए समावेशी समाज का विकास 4. महिला शिक्षकों की शैक्षिक नेतृत्व के लिए अनुकूल वातावरण एवं महिलाओं और आर्थिक विकास 5. साक्ष्य आधारित अनुसंधान 6. वैश्विक परिप्रेक्ष्य स्त्रियों के लिए नए ज्ञान का निर्माण तथा 7. वर्तमान और भविष्य की चुनौतियों का सामना करने के लिए भारतीय परिप्रेक्ष्य में महिलाओं पर नए ज्ञान का विकास करना।
अकसर यह देखने में आता है कि विश्वविद्यालयीन शोधकर्ता ज़मीनीतौर पर परिश्रम करने के बजाए सरकारी और गैरसरकारी अांकड़ों को आधार बना लेते हैं। जबकि कई बार ज़मीनी सच्चाई आंकड़ों से परे होती है। स्त्री-अध्ययन एक महत्वपूर्ण विषय है। यह विषय समाज की आधी आबादी की दशा और दिशा को तय करता है। आंकड़ों को खंगालने में कोई बुराई नहीं है किन्तु यह भी देखा जाना चाहिए कि किसी एक मुद्दे पर किसी एनजिओ और सरकारी आंकड़ों में अन्तर तो नहीं है? यदि अंतर है तो क्यों है? और यदि अंतर नहीं है तो क्यों नहीं है? इन दोनों पक्षों का स्वयं सत्यापन करना बेहद जरूरी होता है। स्त्री-अध्ययन के समय यदि ज़मीनी सच्चाई को ध्यान में रख कर शोध कार्य किया जाए तो एक ऐसी यथार्थपरक तस्वीर सामने आएगी जो भारतीय स्त्रियों के अधिकारों एवं सुखद भविष्य को सुनिश्चित कर सकती है। यूं भी स्त्री सशक्तीकरण ऐसा पहलू है, जिसकी उपेक्षा कर कोई देश तरक्की नहीं कर सकता, लेकिन यह केवल कागजों में नहीं हकीकत में होना चाहिए। शुरुआत घर से हो, लेकिन इच्छाशक्ति राजनीतिक स्तर पर हो। तभी स्त्री सशक्तीकरण की दिशा में सार्थक प्रयास किए जा सकते हैं क्योंकि स्त्री सशक्तिकरण ही है चतुर्दिक विकास की चाबी।
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Dr (Miss) Sharad Singh at AHI Dr Hari Singh Gour Central University, Sagar

From Left : Dr RP Singh, Pro. Nagesh Dubey, Dr Arun Pratap Singh, Dr (Miss) Sharad Singh, Dr Sneh Rani, Dr KK Tripathi, Dr Sharma, Dr Pradeep Shukla 
07.03.2017 को हरिसिंह गौर पुरातत्व संग्रहालय में आयोजित ‘‘जैन धर्म का भारतीय संस्कृति को अवदान’’ विषय पर प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग, डॉ हरिसिंह गौर केन्द्रीय विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित व्याख्यान के दौरान दो विद्वानों से सुखद मुलाक़ात हुई। ये थे बलिया के डॉ. अरूण प्रताप सिंह तथा सागर की डॉ. स्नेहरानी। दोनों ही जैन धर्म एवं संस्कृति के अच्छे जानकार हैं। प्रो. नागेश दुबे एवं डॉ. आर पी सिंह को धन्यवाद इस महत्वपूर्ण बौद्धिक आयोजन के लिए।

Saturday, March 4, 2017

आदिवासी कथा साहित्य का स्वरूप निर्धारण (आलेख-अंश) ... डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh

03 मार्च को 03 मार्च 2017 को वक्ता के रूप में मैंने ‘‘ आदिवासी कथा साहित्य का स्वरूप निर्धारण’’ विषय पर अपना व्याख्यान दिया। अवसर था हिन्दी विभाग, डॉ0 हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर(म.प्र.) और भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद्, नई दिल्ली के संयुक्त तत्वावधान में ‘‘आदिवासी  साहित्य विमर्श : समय और सन्दर्भ’’ विषय पर दिनांक 02-03 मार्च 2017 को दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का। ‘‘आदिवासी कथा साहित्य का स्वरूप निर्धारण’’ इस विषय पर मेरा एक लंबा आलेख भी है जिसका अंश आपके लिए यहां दे रही हूं ....

आलेख-अंश ...
आदिवासी कथा साहित्य का स्वरूप निर्धारण
    - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
     
Key Note : कथा साहित्य शब्द का उच्चारण करते ही कथा संसार मस्तिष्क में कौंध जाता है। लेकिन जब आदिवासी कथा साहित्य की चर्चा होती है तो एक उलझन पैदा हो जाती है कि आदिवासी कथा साहित्य किसे माना जाए - 
1. उन कथाओं को जो आदिवासियों में परम्परागत रूप से पीढ़ी दर पीढ़ी प्रवाहमान है और जिसका स्वरूप मूलतः वाचिक रहा है। अथवा, 
2. उन कथाओं को जो आदिवासी जीवन के अनुभवों के आधार पर लिखी गईं और जिनके लेखक आदिवासी समुदाय के हैं। अथवा, 
3. उन कथाओं को जो आदिवासी एवं गैर आदिवासी दोनों तरह के लेखकों द्वारा लिखी गईं। 
वस्तुतः आदिवासी कथा संसार से जुड़ने के लिए उसका स्वरूप निर्धारण किया जाना आवश्यक है। साथ ही यह जानना भी कि आदिवासी जीवन पर रचे गए कथा साहित्य की मूल्यवत्ता के लिए वे कौन से तत्व आवश्यक हैं जिनके आधार पर गैरआदिवासी कथा साहित्य को भी आदिवासी कथा साहित्य में गिने जाने का आग्रह किया जा सकता है। 

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जब कोई व्यक्ति किसी को पूरी तरह जाने बिना उसके बारे में निष्कर्ष निकालने लगता है अथवा धारणाएं बनाने लगता है तो यह उसके प्रति अन्याय करने जैसा होता है। आदिवासी समाज के प्रति भी यही रवैया लम्बे समय तक अपनाया जाता रहा है। सुनी-सुनाई बातों अथवा पढ़ी-पढ़ाई बातों को ले कर निष्कर्ष निकाल लेना कि एक बड़ा समुदाय ज्ञान से दूर है, मेरे विचार से सबसे बड़ी मूर्खता ही कहलाएगी। अक्षर ज्ञान और जीवन के ज्ञान में बहुत अंतर होता है। अक्षर ज्ञान के बिना जीवन का ज्ञान आ सकता है लेकिन जीवन के ज्ञान के बिना अक्षर-ज्ञान का कोई अर्थ ही नहीं होता है। जब हम किसी समाज अथवा क्षेत्र विशेष के कथा साहित्य की बात करते हैं तो हमें सबसे पहले यह तय करना चाहिए कि हम आधुनिक एवं लिखित कथा साहित्य को चुन रहे हैं अथवा परम्परागत वाचिक कथा साहित्य को। वैसे किसी संस्कृति एवं उसके आधुनिक साहित्य को समझने के लिए उसके परम्परागत वाचिक साहित्य का ज्ञान होना बहुत आवश्यक है। परम्परागत वाचिक साहित्य में जीवन के ज्ञान का वह भंडार होता है जिसमें किसी एक व्यक्ति के साथ अनक व्यक्तियों के अनुभव एवं कल्पनाशीलता एकाकार होती जाती है।

आदिवासी साहित्य से तात्पर्य उस साहित्य से है जिसमें आदिवासियों का जीवन और समाज उनके दर्शन के अनुरूप अभिव्यक्त हुआ है। आदिवासी साहित्य को विभिन्न नामों से पूरी दुनिया में जाना जाता है। यूरोप और अमेरिका में इसे नेटिव अमेरिकन लिटरेचर, कलर्ड लिटरेचर, स्लेव लिटरेचर और अफ्रीकन-अमेरिकन लिटरेचर, अफ्रीकन देशों में ब्लैक लिटरेचर और ऑस्ट्रेलिया में एबोरिजिनल लिटरेचर, तो अंग्रेजी में इंडीजिनस लिटरेचर, फर्स्टपीपुल लिटरेचर और ट्राइबल लिटरेचर कहते हैं। भारत में इसे हिंदी एवं अन्य भारतीय भाषाओं में सामान्यतः ‘आदिवासी साहित्य’ ही कहा जाता है।
गैर-आदिवासी साहित्य की अध्ययन परंपरा आदिवासी साहित्य को दो श्रेणी में विभाजित करती है -
ऽ    वाचिक परंपरा का आदिवासी साहित्य
ऽ    लिखित आदिवासी साहित्य
  
भारत में अनेक आदिवासी जातियां आज भी अपनी मौलिक मान्यताओं, रीति-रिवाज़ों एवं लोकथाओं के साथ जीवनयापन कर रही है। किन्तु समय और समाज में परिवर्तन के क्रम में ये आदिवासी जनजातियां भी धीरे-धीरे अपनी वाचिक धरोहरों को खोने लगी हैं। आदिवासी रीति-रिवाज एवं वैचारिकता हमारे लिए उतनी ही महत्वपूर्ण हैं जितनी कि कोई पुरातात्विक धरोहर क्योंकि इनमें जीवन के अनुभवों एवं कल्पनाओं को बिना किसी कृत्रिमता के प्रस्तुत किया जाता है, इनमें आदि जीवन का निचोड़ है तथा इनमें संचित ज्ञान का प्रवाह है। यह प्रवाह कहीं सरस्वती नदी की भांति लुप्त न हो जाए इसलिए इन्हें सहेज लेना आवश्यक है।      
 भारत में अनेक जनजातियां निवास करती हैं जो आदिमयुग से अपनी परम्पराओं को अपनी संस्कृति में समेटे हुए हैं और इन्हें आदिवासी जातियों के नाम से भी जाना जाता है। इनमें मध्यप्रदेश में बैगा, माड़िया, भील, मुड़िया, गोण्ड, कोरकू, खैरबार, हल्बा, हल्बी, भारिया, कोल, मुण्डा, उरांव, पारधी, सौंर आदि जनजातियां हैं। छत्तीसगढ़ में बैगा, भैइना, भारिया, भील, बिंझवार, बीरहोर, गोण्ड, हल्बा, हल्बी, सौंर, कमार,कोरकू, खैरबार, कोल, उराव जनजातियां प्रमुख हैं। झारखण्ड में मुण्डा, उरांव, संथाल, गोण्ड, बिरहोर, हो, माल पहाड़िया जनजातियां पीढ़ियों से निवास करती आ रही हैं। इसी प्रकार राजस्थान में भील, गरासिया, ढोली, भिलाला, मीणा, धाकां, कथोडी, पटेलिया, सहारिया तथा कुमाऊं में भूटिया, थारू, जानसारी आदि जनजातियां निवासरत हैं। उड़ीसा की जुआन, भुइया जनजाति प्रमुख हैं।  पश्चिम बंगाल एवं महाराष्ट्र में  कोण्ड जनजाति बसी हुई है। दक्षिण भारत में कर्नाटक में टोडा जनजाति, तमिलनाडु की कुडिया जनजाति केरल में एरावाल्लान, पल्लेयन, पानियन, पुलया, कदर, कनैक्कर, उल्लादान, मलासार, मन्नान, उरली, कम्मारा, कपु, कोंडरेड्डीज़, कुरुम्बा, मालामालासार, मराती आदि जनजातियां प्रमुख हैं।  अण्डमान निकोबार द्वीपसमूह में अण्डमान में ग्रेट अण्डमानी, ओंगी, जारवा, सेटिनली -ये चारो नेग्रीटोज़ मूल की जनजातियां हैं। अण्डमानी जनजाति में भी प्रमुख सात समुदाय हैं जैसे अकाबोआ, अकाकोरा, अकाजेरू और अकावी आदि हैं।  शोम्फेन -ग्रेट निकेबार की जनजाति है। यह मंगोल प्रजाति की है। इसकी दो उपजातियां हैं- शोम्फेन और मावा शोम्फेन। कई आदिवासी जातियां विभिन्न प्रदेशों में बसी हुई हैं। जो संभवतः कई पीढ़ियों पहले अर्थोपार्जन की दृष्टि से घूमती, भटकती अपने मूल उद्गम स्थान से दूर दूसरे प्रदेशों में जा बसी। इसीलिए एक ही आदिवासी जाति एक से अधिक प्रदेशों में मिलती है । जैसे भील मध्यप्रदेश के मालवा क्षेत्रा में बसे हुए  हैं और राजस्थान में भी उनका निवास है। वर्ली जनजाति दक्षिणी गुजरात के साथ-साथ उत्तरी महाराष्ट्र में भी पाई जाती है।
लोक कथाओं का जन्म उस समय से माना जा सकता है जब मनुष्य ने अपनी कल्पनाओं एवं अनुभवों को कथात्मक रूप में कहना शुरू किया। लोककथाएं लोकसाहित्य का अभिन्न अंग हैं। हिन्दी में लोक साहित्य शब्द अंग्रेजी के ‘फोकलोर’ के पर्याय के रूप में प्रयुक्त होता है। अंग्रेजी में ‘फोकलोर’ शब्द का प्रयोग सन् 1887 ई. में अंग्रेज विद्वान सर थामस ने किया था। इससे पूर्व लोक साहित्य तथा अन्य लोक विधाओं के लिए ‘पापुलर एंटीक्वीटीज़’ शब्द का प्रयोग किया जाता था। भारत में लो साहित्य का संकलन एवं अध्ययन 18 वीं शती के उत्तरार्द्ध में उस समय हुआ जब सन् 1784 ई. में कलकत्ता हाईकोर्ट के तत्कालीन न्यायाधीश सर विलियम जोन्स ने ‘रॉयल एशियाटिक सोसायटी’ नामक संस्था की स्थापना की। इस संस्था के द्वारा एक पत्रिका का प्रकाशन प्रारम्भ किया गया जिसमें भारतीय लोक कथाओं एवं लोक गीतों को स्थान दिया गया। भारतीय लोककथाओं के संकलन का प्रथम श्रेय कर्नल जेम्स टॉड को है जिन्होंने सन् 1829 ई. में ‘एनल्स एण्ड एंटीक्वीटीज़ ऑफ राजस्थान’ नामक ग्रंथ लिखा। इस गं्रथ में उन्होंने राजस्थान की लोक कथाओं एवं लोक गाथाओं का संकलन किया।
कर्नल टॉड के बाद कुछ और गं्रथ आए जिनमें भारतीय लोकथाओं का अमूल्य संकलन था। इनमें प्रमुख थे- लेडी फेयर का ‘ओल्ड डेक्कन डेज़’ (1868), डॉल्टन का ‘डिस्क्रिप्टिव इथनोलॉजी अॅाफ बेंगाल’ (1872), आर.सी. टेंपल का ‘लीज़ेण्ड ऑफ दी पंजाब’ (1884), मिसेस स्टील का ‘वाईड अवेक स्टोरीज़’ (1885) आदि। वेरियर एल्विन की दो पुस्तकें ‘फॉकटेल्स ऑफ महाकोशल’ तथा ‘मिथ्स ऑफ मिडिल इंडिया’, रसेल एवं हीरालाल की ‘कास्ट्स एण्ड ट्राइब्स ऑफ साउथ इंडिया’, थर्सटन की ‘दी ट्राईब्स एण्ड कास्ट्स ऑफ नार्थ-वेस्टर्न प्राविन्सेस एण्ड कास्ट्स ऑफ अवध, इंथोवेन की ‘ट्राईब्स एण्ड कास्ट्स ऑफ बॉम्बे’ आदि पुस्तकों में जनजातीय लोककथाओं का उल्लेख किया गया। इन आरम्भिक ग्रंथों के उपरान्त अनेक गं्रथों में जनजातीय लोककथाओं को सहेजा और समेटा गया।
जब आदिवासी जीवन पर केन्द्रित कथा साहित्य का लेखन अथवा अध्ययन किया जाए इससे पहले उस जीवन की मूल परम्पराओं, रीति-रिवाजों को जानना श्रेयष्कर होता है। आज बड़ी मात्रा में लोकसाहित्य लेखबद्ध रूप में उपस्थित है और उसे पढ़ कर आदिवासी जीवन की जड़ों तक पहुंचने का रास्ता पाया जा सकता है। ‘रास्ता’ शब्द का प्रयोग यहां इसलिए कर रही हूं कि जीवन के बारे में जानने का सबसे सटीक ढंग होता है, उस जीवन को समीप से देखना और संभव हो तो उसे जी कर देखना। किसी जाति विशेष अथवा समाज विशेष के जीवन को जानने के लिए उस समाज अथवा जाति समुदाय के बीच जा कर रहना और अनुभव संजोना सबसे उत्तम तरीका होता है। मात्र अध्ययनकक्ष में बैठ कर किसी समुदाय के जीवन के बारे में सही चित्र नहीं उकेरा जा सकता है और दोषपूर्ण चित्र से सही ज्ञान का संचार नहीं हो सकता है। इसलिए यह आवश्यक हो जाता है कि यदि आदिवासी कथा साहित्य लिखा जा रहा हो तो पहले आदिवासी क्षेत्र में जा कर वहां के अनुभवों से तादात्म्य स्थापित किया जाए। यह दोनों ही स्थितियों में आवश्यक हो जाता है- जब आदिवासी कथा साहित्य अर्थात् आदिवासी लोककथाओं को संग्रहीत कर लेखबद्ध कर रहे हों, उसका अनुवाद कर रहे हों या फिर जब आदिवासी जीवन पर केन्द्रित नया साहित्य रच रहे हों।
बुनियादी रूप से प्रश्न यह उठता है कि आदिवासी साहित्य अथवा आदिवासी कथा साहित्य हम किसे कह सकते हैं? वाचिक अथवा ऑरेचर को अथवा लिखित साहित्य को?

सिमोन गिकांडी रूलेग ने ‘‘इनसाइक्लोपीडिया ऑफ आफ्रीकन लिटरेचर’’ नामक पुस्तक संपादित की। इसमें उन्होंने वाचिक परम्परा के साहित्य को ‘‘ऑरेचर’’ माना। ( "Orature means something passed on through the spoken word, and because it is based on the spoken language it comes to life only in a living community. " – 'Encyclopaedia of African Literature' edited by Simon Gikandi Routledge 2003 edition )

उगांडा के स्कॉलर पियो ज़िरीमू ने ओरल साहित्य को ‘‘ऑरेचर’’ नाम दिया। (The Anthem Dictionary of Literary Terms and Theory By Peter Auger Anthem Press, 2010 at Page 210 and Uhuru's Fire: African Literature East to South By Adrian Roscoe CUP Archive 1977 at page 9)

इस संबंध में यहां मैं वंदना टेटे के विचार सामने रखना चाहूंगी। वंदना टेटे  प्रखर आदिवासी लेखिका, कवयित्री और आदिवासी दर्शन की प्रवक्ता हैं। आदिवासियों की वैचारिकी और सौंदर्यबोध को कलाभिव्यक्तियों का मूल तत्व मानते हुए उन्होंने आदिवासी साहित्य को ‘प्रतिरोध का साहित्य’ की बजाय ‘रचाव और बचाव’ का साहित्य कहा। आदिवासी साहित्य की दार्शनिक अवधारणा प्रस्तुत करते हुए उनकी स्थापना है कि आदिवासियों की साहित्यिक परंपरा औपनिवेशिक और ब्राह्मणवादी शब्दावलियों और विचारों से बिल्कुल भिन्न है। आदिवासी जीवनदृष्टि पक्ष-प्रतिपक्ष को स्वीकार नहीं करता। आदिवासियों की दृष्टि समतामूलक है और उनके समुदायों में व्यक्ति केन्द्रित और शक्ति संरचना के किसी भी रूप का कोई स्थान नहीं है। वे आदिवासी साहित्य का ‘लोक’ और ‘शिष्ट’ साहित्य के रूप में विभाजन को भी नकारती हैं और कहती हैं कि आदिवासी समाज में समानता सर्वोपरि है, इसलिए उनका साहित्य भी विभाजित नहीं है। वह एक ही है। वे अपने साहित्य को ‘ऑरेचर’ कहती हैं। ऑरेचर अर्थात् ऑरल लिटरेचर। उनकी स्थापना है कि  ‘‘आदिवासी लेखकों का आज का लिखित साहित्य भी उनकी वाचिक यानी पुरखा (लोक) साहित्य की परंपरा का ही साहित्य है। उनकी यह भी स्थापना है कि गैर-आदिवासियों द्वारा आदिवासियों पर रिसर्च करके लिखी जा रही रचनाएं शोध साहित्य है, आदिवासी साहित्य नहीं। आदिवासियत को नहीं समझने वाले हिंदी-अंग्रेजी के लेखक आदिवासी साहित्य लिख भी नहीं सकते।’’

नवगठित झारखण्ड राज्य में नवंबर 2003 में आदिवासी व देशज लेखकों, भाषाविदों, संस्कृतिकर्मियों, साहित्यकारों और बुद्धिजीवियों के संगठन ‘झारखण्डी भाषा साहित्य संस्कृति अखड़ा’ की स्थापना की। जिसका पहला महाजुटान 2006 में हुआ। जिसमें देश भर से शामिल 600 से अधिक देशज व आदिवासी संस्कृतिकर्मियों ने मार्गदर्शी सिद्धांत, संविधान और कार्यक्रम गृहित करते हुए ‘अखड़ा’ को देशव्यापी संगठन का स्वरूप दिया। वंदना टेटे इसकी संस्थापक महासचिव चुनी गईं।

अगस्त 2011 में झारखंडी भाषाओं को द्वितीय राजभाषा का संवैधानिक दर्जा देने के सवाल पर अखड़ा ने अन्य कई संगठनों का साथ लेते हुए झारखंड विधानसभा को घेरा। जिसके परिणामस्वरूप अर्जुना मुंडा की तत्कालीन राजग सरकार ने झारखंड की पांच आदिवासी भाषाओं - मुंडारी, हो, खड़िया, संताली व कुड़ुख और चार देशज भाषाओं - कुड़मालि, खोरठा, नागपुरी व पंचपरगनिया को द्वितीय राजभाषा के रूप में मंजूरी दी। आजादी के बाद देश में यह पहली बार हुआ कि किसी सांस्कृतिक संगठन ने भाषा के सवाल पर विधानसभा को घेरा और राज्य ने सामुदायिक दबाव में नौ देशज-आदिवासी भाषाओं को द्वितीय राजभाषा के रूप में स्वीकार किया।

12 से 14 मार्च 2012 को अखड़ा ने देश का पहला तीन दिवसीय आदिवासी-दलित नाट्य समारोह और आदिवासी-दलित रंगभाषा पर दो दिवसीय सिम्पोजियम का आयोजन किया।
14-15 जुलाई 2012 को अखड़ा ने रांची में ही ‘आदिवासी दर्शन और समकालीन आदिवासी साहित्य सृजन’ पर दो दिवसीय अंतर्देशीय सेमिनार किया। इस सेमिनार ने पहली बार आदिवासी साहित्य की सैद्धांतिकी को आदिवासी दर्शन का अभिन्न अंग मानते हुए 15 सूत्री ‘आदिवासी साहित्य का रांची घोषणा पत्र’ जारी किया।
सेमिनार के समापन पर आदिवासियों की ओर से भारतीय साहित्य और समाज को दिए गए अपने संदेश में वरिष्ठ आदिवासी कवयित्री ग्रेस कुजूर ने कहा कि आदिवासी समाज न अपनी औरतों का अपमान करता है और न ही उनके साथ हिंसा से पेश आता है। वह दुनिया में सहअस्तित्व और सहजीविता का सबसे बड़ा पैरोकार है। लेकिन हिंसा और गैर बराबरी के खिलाफ डटकर खड़े इस आदिवासी समाज को ही खत्म करने की कोशिश हो रही है। इस आदिवासी दर्शन को विस्थापित करके दुनिया को बचाया नहीं जा सकता है।
समापन के ठीक पहले वंदना टेटे ने आदिवासी साहित्य का 15 सूत्री रांची घोषणा जारी किया-
1. प्रकृति की लय-ताल और संगीत का जो अनुसरण करता हो।
2. जो प्रकृति और प्रेम के आत्मीय संबंध और गरिमा का सम्मान करता हो।
3. जिसमें पुरखा-पूर्वजों के ज्ञान-विज्ञान, कला-कौशल और इंसानी बेहतरी के अनुभवों के प्रति आभार हो।
4. जो समूचे जीव जगत की अवहेलना नहीं करें।
5. जो धनलोलुप और बाजारवादी हिंसा और लालसा का नकार करता हो।
6. जिसमें जीवन के प्रति आनंदमयी अदम्य जिजीविषा हो।
7. जिसमें सृष्टि और समष्टि के प्रति कृतज्ञता का भाव हो.।
8. जो धरती को संसाधन की बजाय मां मानकर उसके बचाव और रचाव के लिए खुद को उसका संरक्षक मानता हो।
9. जिसमें रंग, नस्ल, लिंग, धर्म आदि का विशेष आग्रह न हो।
10. जो हर तरह की गैर-बराबरी के खिलाफ हो।
11. जो भाषाई और सांस्कृतिक विविधता और आत्मनिर्णय के अधिकार पक्ष में हो।
12. जो सामंती, ब्राह्मणवादी, धनलोलुप और बाजारवादी शब्दावलियों, प्रतीकों, मिथकों और व्यक्तिगत महिमामंडन से असहमत हो।
13. जो सहअस्तित्व, समता, सामूहिकता, सहजीविता, सहभागिता और सामंजस्य को अपना दार्शनिक आधार मानते हुए रचाव-बचाव में यकीन करता हो।
14. सहानुभूति, स्वानुभूति की बजाय सामूहिक अनुभूति जिसका प्रबल स्वर-संगीत हो।
15. मूल आदिवासी भाषाओं में अपने विश्वदृष्टिकोण के साथ जो प्रमुखतः अभिव्यक्त हुआ हो।


लोककथा एवं आधुनिक कथा की सम-महत्ता

1.    लोककथा की महत्ता

किसी भी क्षेत्र के विकास में उस क्षेत्र की संस्कृति की अहम् भूमिका रहती है। संस्कृति में भाषा, बोली आदि के साथ-साथ उस क्षेत्र की ऐतिहासिक विरासत, लोकसाहित्य, लोकविश्वास,जनजीवन की परम्पराएं एवं लोकाचार निबद्ध रहते हैं।
किसी भी लोकभाषा अर्थात् बोली की अपनी एक जातीय पहचान होती है। यह जातीय पहचान ही उसे अन्य भाषाओं से अलग कर के स्वतंत्र अस्तित्व का स्वामी बनाती है। पहले बोली एक सीमित क्षेत्र में बोली जाती थी किन्तु धीरे-धीरे सीमित क्षेत्र के निवासियों के असीमित फैलाव ने बोली को भी असीमित विस्तार दे दिया है। इसलिए आज बोली का महत्व मात्र उसके क्षेत्र विशेष से जुड़ा न हो कर पूरी तरह से जातीय गुणों एवं जातीय गरिमा से जुड़ गया है।
प्रत्येक लोकभाषा का अपना अलग साहित्य होता है जो लोक कथाओं, लोक गीतों, मुहावरों, कहावतों तथा समसामयिक सृजन के रूप में विद्यमान रहता है। अपने आरंभिक रूप में यह वाचिक रहता है तथा स्मृतियों के प्रवाह के साथ एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में प्रवाहित होता रहता है।
 किसी भी संस्कृति के उद्गम के विषय में जानने और समझने में वाचिक परम्परा की उस विधा से आधारभूत सहायता मिलती है जिसे लोककथा कहा जाता है। लोककथाएं वे कथाएं हैं जो सदियों से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी और दूसरी पीढ़ी से तीसरी पीढ़ी के सतत क्रम में प्रवाहित होती चली आ रही हैं। यह प्रवाह उस समय से प्रारम्भ होता है जिस समय से मनुष्य ने अपने अनुभवों, कल्पनाओं एवं विचारों का परस्पर आदान-प्रदान प्रारम्भ किया। लोकसमुदायों में लोककथाओं का जो रूप आज भी विद्यमान है, वह लोककथाओं के उस रूप के सर्वाधिक निकट है जो विचारों के संप्रेषण और ग्रहण की प्रक्रिया आरम्भ होने के समय रहा होगा। लोककथाओं में मनुष्य के जन्म, पृथ्वी के निर्माण, देवता के व्यवहार, भूत, प्रेत, राक्षस आदि से लेकर लोकव्यवहार से जुड़ी कथाएं निहित हैं।
लोक कथाओं का जन्म उस समय से माना जा सकता है जब मनुष्य ने अपनी कल्पनाओं एवं अनुभवों को कथात्मक रूप में कहना शुरू किया। लोककथाएं लोकसाहित्य का अभिन्न अंग हैं। हिन्दी में लोक साहित्य शब्द अंग्रेजी के ‘फोकलोर’ के पर्याय के रूप में प्रयुक्त होता है। अंग्रेजी में ‘फोकलोर’ शब्द का प्रयोग सन् 1887 ई. में अंग्रेज विद्वान सर थामस ने किया था। इससे पूर्व लोक साहित्य तथा अन्य लोक विधाओं के लिए ‘पापुलर एंटीक्वीटीज़’ शब्द का प्रयोग किया जाता था। भारत में लोक साहित्य का संकलन एवं अध्ययन 18 वीं शती के उत्तरार्द्ध में उस समय हुआ जब सन् 1784 ई. में कलकत्ता हाईकोर्ट के तत्कालीन न्यायाधीश सर विलियम जोन्स ने ‘रॉयल एशियाटिक सोसायटी’ नामक संस्था की स्थापना की। इस संस्था के द्वारा एक पत्रिका का प्रकाशन प्रारम्भ किया गया जिसमें भारतीय लोक कथाओं एवं लोक गीतों को स्थान दिया गया। भारतीय लोककथाओं के संकलन का प्रथम श्रेय कर्नल जेम्स टॉड को है जिन्होंने सन् 1829 ई. में ‘एनल्स एण्ड एंटीक्वीटीज़ ऑफ राजस्थान’ नामक ग्रंथ लिखा। इस गं्रथ में उन्होंने राजस्थान की लोक कथाओं एवं लोक गाथाओं का संकलन किया।
         कर्नल टॉड के गं्रथ के बाद कुछ और गं्रथ आए जिनमें भारतीय लोककथाओं का अमूल्य संकलन था। इनमें प्रमुख थे- लेडी फेयर का ‘ओल्ड डेक्कन डेज़’ (1868), डॉल्टन का ‘डिस्क्रिप्टिव इथनोलॉजी अॅाफ बेंगाल’ (1872), आर.सी. टेंपल का ‘लीज़ेण्ड ऑफ दी पंजाब’ (1884), मिसेस स्टील का ‘वाईड अवेक स्टोरीज़’ (1885) आदि। वेरियर एल्विन की दो पुस्तकें ‘फॉकटेल्स ऑफ महाकोशल’ तथा ‘मिथ्स ऑफ मिडिल इंडिया’, रसेल एवं हीरालाल की ‘कास्ट्स एण्ड ट्राइब्स ऑफ साउथ इंडिया’, थर्सटन की ‘दी ट्राईब्स एण्ड कास्ट्स ऑफ नार्थ-वेस्टर्न प्राविन्सेस एण्ड कास्ट्स ऑफ अवध’, इंथोवेन की ‘ट्राईब्स एण्ड कास्ट्स ऑफ बॉम्बे’ आदि पुस्तकों में क्षेत्रीय लोककथाओं का उल्लेख किया गया। इन आरम्भिक ग्रंथों के उपरान्त अनेक गं्रथों में क्षेत्रीय लोककथाओं को सहेजा और समेटा गया।
उदाहरण के लिए यदि कोई लकड़हारा जंगल में लकड़ी काटने जाता है और वहां उसका सामना शेर से हो जाता है, तो अपने प्राण बचा कर गांव लौटने पर वह शेर के खतरे को इस उद्देश्य से बढ़ा-चढ़ा कर कहेगा कि जिससे जंगल में जाने वाले अन्य व्यक्ति सावधान और सतर्क रहें। शेर से सामना होने तथा शेर के प्रति भय का संचरण होने पर सहज भाव से किस्सागोई आरम्भ हो जाती है। यह स्थापित किया जाने लगता है कि अमुक समय में अमुक गांव के अमुक व्यक्ति को इससे भी बड़ा और भयानक शेर मिला था। जिसे उस व्यक्ति ने अपनी चतुराई से मार भगाया था। वनों के निकट बसे हुए ग्राम्य जीवन में इस प्रकार की कथाओं का चलन निराशा में आशा का , भय में निर्भयता का और हताशा में उत्साह का संचार करता है।
    वस्तुतः लोककथा वह कथा है जो लोक द्वारा लोक के लिए लोक से कही जाती है। इसका स्वरूप वाचिक होता है। इसमें वक्ता और श्रोता  अनिवार्य तत्व होते हैं। वक्ता एक होता है किन्तु श्रोता एक से अनेक हो सकते हैं। इन कथाओं को गांव की चौपालों, नीम या वटवृक्ष के नीचे बने हुए चबूतरों पर, घर के आंगन में चारपरई पर लेटे हुए अथवा अलाव को धेर कर बैठे हुए कहा-सुना जाता है। ‘कथा’ शब्द का अर्थ ही यही है कि ‘जो कही जाए’। जब कथा कही जाएगी तो श्रोता की उपस्थिति स्वतः अनिवार्य हो जाती है। लोककथा को कहे और सुने जाने के मध्य ‘हुंकारू’ की अहम भूमिका होती है। ‘हुंकारू’ कथा सुनते हुए श्रोता द्वारा ‘हूं’-‘हूं’ की ध्वनि निकालने की प्रक्रिया होती है। जिसके माध्यम से श्रोता द्वारा यह जताया जाता है कि  वह सजग है और चैतन्य हो कर कथा सुन रहा है। साथ ही  कथा में उसकी उत्सुकता बनी हुई है। इस ‘हुंकारू’ से कथा कहने वाले को भी उत्साह मिलता रहता है। उसे भी पता चलता रहता है कि श्रोता उसकी कथा में  रुचि ले रहा है, चैतन्य हो कर सुन रहा है, सजग है तथा कथा में आगे कौन -सा घटनाक्रम आने वाला है इसके प्रति उत्सुक है। लोककथा की भाषा लोकभाषा और शैली प्रायः इतिवृत्तात्मक होती है।

लोककथाओं के प्रकार :

लोककथाओं में विषय की पर्याप्त विविधता होती है। इन कथाओं के विषय को देश, काल परिस्थिति के साथ ही कल्पनाशीलता से विस्तार मिलता है। लोककथाओं के भी विषयगत कई प्रकार हैं-
1. साहसिक लोककथाएं - इस प्रकार की कथाओं में नायक अथवा नायिका के साहसिक अभियानों का विवरण रहता है।
2. मनोरंजनपरक लोककथाएं- इन कथाओं में हास्य का पुट समाहित रहता है।
3. नीतिपरक लोककथाएं- वे कथाएं जो जीवन सही ढंग से जीने की शिक्षा देती हैं ,
4. कर्मफलक एवं भाग्यपरक लोककथाएं- इन कहानियों में कर्म की प्रधानता अथवा कर्म के महत्व को स्थापित किया जाता है। ,  
5. मूल्यपरक लोककथाएं- जीवन में मानवीय मूल्यों के महत्व को स्थापित करती हैं।
6. अटका लोककथाएं- वे लोककथाएं जिसमें एक पात्र किसी रहस्य के बारे में जिज्ञासा प्रकट करता और दूसरा पात्र रहस्य को सुलझा कर उसकी जिज्ञासा शांत करता।  
7. धार्मिक लोककथाएं- लोकजीवन में धार्मिक मूल्यों के महत्व को रेखांकित करती है।

लोककथा और मानवमूल्य :
मानव जीवन को मूल्यवान बनाने की क्षमता रखने वाले गुणों को मानव मूल्य कहा जाता है। आज मूल्य शब्द का प्रयोग सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, आध्यात्मिक आदि सभी क्षेत्रों में समान रूप से व्यवहार के लिए होने लगा है। मूल्य शाश्वत व्यवहार है। इसका निर्माण मानव के साथ-साथ हुआ है। यदि इसका अंत होगा तो फिर सभ्यता के साथ मानवता भी समाप्त हो जायेगी। ‘मूल्य’ उन्हीं व्यवहारों को कहा जाता है जिनमें मानव जीवन का हित समाविष्ट हो, जिनकी रक्षा करना समाज अपना सर्वाच्च कर्त्तव्य मानता है। मूल्य परम्परा का प्राण तत्त्व है। ये जीवन के आदर्श एवं सर्वसम्मत सिद्धान्त होते हैं। मूल्यों को अपनाकर जाति, धर्म और समाज को, मानव जीवन को सुन्दर बनाने का प्रयास किया जाता है।
मूल्य सामाजिक मान्यताओं के साथ बदलते भी रहते हैं, किन्तु उनमें अन्तर्निहित मंगल कामना और सार्वजनिक हित की भावना कभी तिरोहित नहीं होती। नए परिवेश में जब पुरानी मान्यताएं कालातीत हो जाती हैं तो समाज नयी मान्यताओं को स्वीकार कर लेता है और वे ही मान्यताएं ‘मूल्य’  बन जाती हैं। पुरातन काल में जीवन मूल्यों के रूप में श्रद्धा, आस्था, धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष को स्वीकार किया गया है। वहीं नवीन मूल्यों में सत्य, अहिंसा, सहअस्तित्व, सहानुभूति, करुणा, दया आदि आते हैं।
लोक कथाएं मानव मूल्यों पर ही आधारित होती हैं और उनमें मानव-जीवन के साथ ही उन सभी तत्वों का विमर्श मौजूद रहता है जो इस सृष्टि के आधारभूत तत्व हैं और जो मानव-जीवन की उपस्थिति को निर्धारित करते हैं। जैसे- जल, थल, वायु, समस्त प्रकार की वनस्पति, समस्त प्रकार के जीव-जन्तु आदि।
लोक कथाओं में मानव मूल्य को जांचने के लिए इन बिन्दुओं पर ध्यान दिया जा सकता है कि -
1.    लोक कथाएं संस्कृति की संवाहक होती हैं।
2.    लोक कथाओं की अभिव्यक्ति एवं प्रवाह मूल रूप से वाचिक होती है।
3.    इसका प्रवाह कालजयी होता है यानी यह एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी
   प्रवाहित होती रहती है।
4.    सामाजिक संबंधों के कारण लोककथाओं का एक स्थान से दूसरे
   स्थान तक विस्तार होता जाता है।
5.    एक स्थान में प्रचलित लोक कथा स्थानीय प्रभावों के सहित दूसरे
   स्थान पर भी कही-सुनी जाती है।
6.    लोकथाओं का भाषिक स्वरूप स्थानीय बोली का होता है।
7.    इसमें लोकोत्तियों एवं मुहावरों का भी खुल कर प्रयोग होता है जो स्थानीय अथवा आंचलिक रूप में होते हैं।
8.    कई बार लोक कथाएं कहावतों की व्याख्या करती हैं। जैसे सौंर कथा है-‘ आम के बियाओं में सगौना फूलो’।
9.    लोक कथाओं में जनरुचि के सभी बिन्दुओं का समावेश रहता है।
10.    इन कथाओं में स्त्री या पुरुष के बुद्धिमान या शक्तिवान होने के विभाजन जैसी कोई स्पष्ट रेखा नहीं होती है। कोई कथा नायक प्रधान हो सकती है तो कोई नायिका प्रधान।
11.    विशेष रूप से बुंदेली लोक कथाओं में नायिका का अति सुन्दर होना या आर्थिक रूप से सम्पन्न होना पहली शर्त नहीं है। एक मामूली लड़की से  ले कर एक मेंढकी तक कथा की नायिका हो सकती है और एक दासी भी रानी पर भारी पड़ सकती है।
12.    लोक कथाओं का मूल उद्देश्य लोकमंगल हेतु रास्ता दिखाना और ऐसा आदर्श प्रस्तुत करना होता है जिससे समाज में प्रत्येक व्यक्ति को महत्व मिल सके।
13.    कथ्य में स्पष्टता होती है। जो कहना होता है, वह सीधे-सीधे कहा जाता है, घुमा-फिरा कर नहीं।
14.    उद्देष्य की स्पष्टता भी लोक कथाओं की अपनी मौलिक विशिष्टता है। सच्चे और ईमानदार की जीत स्थापित करना इन कथाओं का मूल उद्देष्य होता है, चाहे वह मनुष्य की जीत हो, पशु-पक्षी की या फिर बुरे भूत-प्रेत पर अच्छे भूत-प्रेत की विजय हो।
15.    असत् सदा पराजित होता है और सत् सदा विजयी होता है।
16.    आसुरी शक्तियां मनुष्य को परेशान करती हैं, मनुष्य अपने साहस के बल पर उन पर विजय प्राप्त करता है। वह साहसी व्यक्ति शस्त्रधारी राजा या सिपाही हो यह जरूरी नहीं है, वह गरीब लकड़हारा या कोई विकलांग व्यक्ति भी हो सकता है।
17.    जो मनुष्य साहसी होता है, बड़ा देव उसकी सहायता करते हैं।
18. लगभग प्रत्येक गांव में एक न एक ऐसा विद्वान होता है जिसके पास सभी प्रश्नों और जिज्ञासाओं के सटीक उत्तर होते हैं। यह ‘सयाना’ कथा का महत्वपूर्ण पात्र होता है।
एक वाक्य में कहा जाए तो लोक कथाएं हमें आत्म सम्मान, साहस और पारस्परिक सद्भावना के साथ जीवन जीने का तरीका सिखाती हैं।
लोककथाओं का मूल उद्देश्य मात्र मनोरंजन कभी नहीं रहा, इनके माध्यम से अनुभवों का आदान-प्रदान, मानवता की शिक्षा, सद्कर्म का महत्व तथा अनुचित कर्म से दूर रहने का संदेश दिया जाता रहा है। इसीलिए इन कथाओं में भूत-प्रेत के भय की कल्पना और विभिन्न प्रकार के मिथक विद्यमान हैं जिससे मनुष्य ऐसे कार्य न करे जिससे उसे किसी भी प्रकार का कष्ट उठाना पड़े। इसे मनुष्यता के विरुद्ध कार्य करने वालों के लिए लोकचेतना का आग्रह कहा जा सकता है।

2.    आधुनिक कथालेखन की महत्ता

आदिवासी जीवन पर लिखे गए एवं लिखे जा रहे कथा साहित्य की अपनी अलग महत्ता है और इसे नकारा नहीं जा सकता है। आदिवासी जीवन पर केन्द्रित वही आधुनिक कथा साहित्य पाठक को सही जानकारी दे पाता है जिसको लिखने से पूर्व कथाकार ने आदिवासी क्षेत्रों का भ्रमण किया हो, वहां के जीवन को भली-भांति जाना समझा हो और उनके दुख-सुख को आत्मसात किया हो। यही शर्त आदिवासी साहित्य को पढ़ने वाले पर भी लागू होती है लेकिन इस संशोधन के साथ कि उसने संबंधित क्षेत्र का भ्रमण नहीं किया हो तो कोई बात नहीं लेकिन उसे संबंधित क्षेत्र और वहां के जनजीवन के बारे में अधिक से अधिक ज्ञान प्राप्त कर लेना चाहिए। इससे उस साहित्य के मर्म को समझने में सुगमता हो ती है। उदाहरण के लिए रणेन्द्र का उपन्यास ‘‘ग्लोबल गांव के देवता’’ लिखने के पूर्व जिस प्रकार रणेन्द्र ने झारखण्ड की असुर जनजाति के जीवन को खंगाला अथवा ‘‘अल्मा कबूतरी’’ लिखते समय बुन्देलखण्ड में बसने वाली कबूतरा जनजाति के जीवन को एक पात्र की तरह अनुभव किया।
 To be Continued ........................

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निष्कर्ष :
जनजातियों को उनकी परम्पराओं सहित सहेजने और उसी के साथ उन्हें ससम्मान, बिना किसी भेद-भाव के विकास की मुख्यधारा में रचने-बसने का अवसर बनाए रखने के लिए आवश्यक है कि आदिवासी कथा साहित्य का एकमत से स्वरूप निर्धारित किया जाए और आदिवासी आधुनिक साहित्य को एक आवश्यक विमर्श के रूप में गंभीरता से लिया जाए क्यों आदिवासी कथाविमर्श मात्र आदिवासी समुदाय का विमर्श नहीं अपितु समाज के विकास का प्रमाणिक लेखाजोखा है।
To be Continued .........
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डॉ. शरद सिंह 03.03.2017 को आयोजित जनजातीय साहित्य पर डॉ हरिसिंह गौर सेंट्रल यूनिवर्सिटी के राष्ट्रीय संगोष्ठी में वक्ता के रूप में

03 मार्च को 03 मार्च 2017 को वक्ता के रूप में मैंने ‘‘ आदिवासी कथा साहित्य का स्वरूप निर्धारण’’ विषय पर अपना व्याख्यान दिया। अवसर था हिन्दी विभाग, डॉ0 हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर(म.प्र.) और भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद्, नई दिल्ली के संयुक्त तत्वावधान में ‘‘आदिवासी  साहित्य विमर्श : समय और सन्दर्भ’’ विषय पर दिनांक 02-03 मार्च 2017 को दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का।
(उस अवसर के कुछ फोटो ....)
Dr (Miss) Sharad Singh as a Speaker at National Seminar of Dr Harisingh Gour Central University on Tribal Literature held on 03.03.2017
Dr (Miss) Sharad Singh as a Speaker at National Seminar of Dr Harisingh Gour Central University on Tribal Literature held on 03.03.2017
Dr (Miss) Sharad Singh as a Speaker at National Seminar of Dr Harisingh Gour Central University on Tribal Literature held on 03.03.2017
Dr (Miss) Sharad Singh as a Speaker at National Seminar of Dr Harisingh Gour Central University on Tribal Literature held on 03.03.2017
Dr (Miss) Sharad Singh as a Speaker at National Seminar of Dr Harisingh Gour Central University on Tribal Literature held on 03.03.2017
Dr (Miss) Sharad Singh as a Speaker at National Seminar of Dr Harisingh Gour Central University on Tribal Literature held on 03.03.2017
Dr (Miss) Sharad Singh as a Speaker at National Seminar of Dr Harisingh Gour Central University on Tribal Literature held on 03.03.2017
Dr (Miss) Sharad Singh as a Speaker at National Seminar of Dr Harisingh Gour Central University on Tribal Literature held on 03.03.2017
Dr (Miss) Sharad Singh as a Speaker at National Seminar of Dr Harisingh Gour Central University on Tribal Literature held on 03.03.2017
Dr (Miss) Sharad Singh as a Speaker at National Seminar of Dr Harisingh Gour Central University on Tribal Literature held on 03.03.2017
Dr (Miss) Sharad Singh as a Speaker at National Seminar of Dr Harisingh Gour Central University on Tribal Literature held on 03.03.2017
Dr (Miss) Sharad Singh as a Speaker at National Seminar of Dr Harisingh Gour Central University on Tribal Literature held on 03.03.2017
Dr (Miss) Sharad Singh as a Speaker at National Seminar of Dr Harisingh Gour Central University on Tribal Literature held on 03.03.2017

Dr (Miss) Sharad Singh as a Speaker at National Seminar of Dr Harisingh Gour Central University on Tribal Literature held on 03.03.2017
Dr Vandna Tete & Dr Sharad Singh (Dr (Miss) Sharad Singh as a Speaker at National Seminar of Dr Harisingh Gour Central University on Tribal Literature held on 03.03.2017)

Wednesday, March 1, 2017

हर स्त्री में होती है लहना की सूबेदारनी

Dr Sharad Singh
मेरे कॉलम चर्चा प्लस में "दैनिक सागर दिनकर" में ( 01.03. 2017) .....My Column "Charcha Plus' in "Sagar Dinkar" news paper
 

 
चर्चा प्लस :
हर स्त्री में होती है लहना की सूबेदारनी

- डॉ. शरद सिंह

लिखे जाने के लगभग 103 वर्ष बाद भी प्रासंगिक लगती है गुलेरी जी की कहानी ‘‘उसने कहा था’’ .... सूबेदारनी का लहना के प्रति प्रेम किसी परिधि में बंधा हुआ नहीं था। उसके साथ न तो कोई सम्बोधन जुड़ा हुआ था और न कोई रिश्ता। वस्तुतः ‘उसने कहा था’’ कहानी में सूबेदारनी एक औरत का बाहरी स्वरूप था। उसके भीतर की औरत अपनी भावनाओं को दो तरह से जी रही थी। एक पति के प्रति समर्पिता और दूसरी अपने उस प्रेमी की स्मृति को संजोए हुए जिसको कभी उसने दुनियावी प्रेमी की दृष्टि से शायद देखा ही नहीं था। 

      जिसने भी चन्द्रधर शर्मा गुलेरी की ‘उसने कहा था’ पढ़ी है, उसे वह संवाद कभी नहीं भूल सकता कि लहना लड़की से पूछता है-‘तेरी कुड़माई हो गई?’ और लड़की ‘धत्’ कह कर शरमा जाती है। लहना का इस तरह पूछना लड़की के मन को गुदगुदाया तो अवश्य होगा, जब कभी अकेले में यह प्रश्न उसके मन में कौंधा होगा। ‘कुड़माई’ का न होना लहना के लिए सुखद था क्यों कि तब उसके मन में लड़की को पा लेने की सम्भावना थी। यह पा लेना ‘दैहिक’ नहीं ‘आत्मिक’ था। फिर भी लहना को वह लड़की नहीं मिली। लड़की ने एक दिन ‘तेरी कुड़माई हो गई’ का उत्तर दे दिया कि ‘हां, हो गई....!’ लहना विचलित हो गया। और वह लड़की? उस लड़की का विवाह जिससे हुआ, वह आगे चल कर सेना में सूबेदार बना और वह लड़की कहलाई सूबेदारनी। एक भरा-पूरा परिवार, वीर, साहसी पति, वैसा ही वीर, साहसी बेटा। आर्थिक सम्पन्नता। सामाजिक दृष्टि से सुखद पारिवारिक जीवन। सुबेदारनी ने अपना दायित्व निभाने में कहीं कोई कमी नहीं रखी। उससे न सूबेदार को शिकायत और न उसके परिवार के किसी अन्य सदस्य को। अपने सामाजिक रिश्तों को निभाने में सूबेदारनी ने अपने जीवन, अपनी भावनाओं को समर्पित कर दिया। मन बहुत कोमल होती है, चाहे स्त्री का हो या पुरुष का। मन अपना अलग जीवन रचता है, अपनी अलग दुनिया सजाता है और सबसे छिप कर हंस लेता है, रो लेता है।
         यदि लहना सिंह उस लड़की को भुला नहीं सका तो ‘वह लड़की’ यानी सूबेदारनी के मन के गोपन कक्ष में लहना की स्मृतियां किसी तस्वीर की भांति दीवार पर टंगी रहीं। सूबेदारनी ने ही तो पहचाना था लहना सिंह को और सूबेदार से कह कर बुलवाया था अनुरोध करने के लिए। स्त्री अपने प्रति प्रकट की गई उस भावना को कभी नहीं भूलती है जो निष्कपट भाव से प्रकट किए गए हों। सूबेदारनी के बारे में सोचते हुए अकसर मुझे अपनी ये पंक्तियां याद आती हैं-
                   छिपी रहती है
                    हर औरत के भीतर एक औरत
                    अकसर हम देख पाते हैं सिर्फ़ बाहर की औरत को।
 
Charcha Plus Column of Dr Sharad Singh in "Sagar Dinkar" Daily News Paper
     हिन्दी साहित्य में ‘उसने कहा था’ की गिनती फ्लैशबैक शैली में लिखी गई कहानियों में तो की ही जाती है, साथ ही श्रेष्ठ प्रेमकथा भी इसे माना जाता है। प्रेम श्रेष्ठ तभी माना जाता है जब वह प्रेम करने वालों के मध्य परस्पर भावनाओं के सम्मान को बनाए रखता हो। चंद्रधर शर्मा गुलेरी (1883-1922) संपादक के साथ-साथ निबंधकार और कहानीकार भी थे। उन्होंने कुल तीन कहानियां लिखी हैं - ‘‘बुद्धू का कांटा’’, ‘‘सुखमय जीवन’’ और ‘‘उसने कहा था’’। इन तीनों कहानियों में गुलेरी जी को अमरत्व प्रदान किया ‘‘उसने कहा था’’ ने। इसके लिखे जाने के 103 वर्ष बाद भी यह प्रासंगिक लगती है। ‘‘उसने कहा था’’ पांच काल-दृश्यों और 25 वर्षों के लंबे अंतराल को खुद में समेटती यह कहानी विषय और अपने अद्भुत वर्णन में किसी औपन्यासिक यात्रा जैसी लगती है। लहना के प्रेम की डोर पकड़ कर सूबेदारनी तक पहुंचने की एक पूरी यात्रा। विशेषता यह कि प्रेम, कर्तव्य और देशप्रेम तीनों एक साथ चलते हैं, एक-दूसरे का अतिक्रमण किए बिना। गुलेरी जी ‘‘उसने कहा था’’ लिखते समय लहना और सूबेदारनी के प्रेम को ले कर आश्वस्त थे इसलिए इसे कहानी के रूप में ढालते हुए वे कहीं भटके नहीं, कहीं चूके नहीं। लहना का प्रेम उन्होंने प्रत्यक्ष में रखा और सूबेदारनी का प्रेम परोक्ष में लेकिन किसी भी दृष्टि से कम नहीं रखा सूबेदारनी के प्रेम को। यदि देखा जाए तो सूबेदारनी के प्रेम की कठिनाइयों और जटिलता को किसी मनोवैज्ञानिक की भांति गुलेरी जी ने परखा और प्रस्तुत किया। न कोई पुरुष विमर्श और न कोई स्त्री विमर्श। इस कहानी में यदि कोई विमर्श है तो वह निष्कपट प्रेम और प्रेम के प्रति विश्वास और समर्पण का।
         क्या सचमुच परिधि नहीं होती प्रेम की? यदि प्रेम की परिधि नहीं होती है तो सामाजिक संबंधों में बंधते ही प्रेम सीमित क्यों होने लगता है? क्या इसलिए कि धीरे-धीरे देह से तृप्ति होने लगती है और प्रेम एक देह की परिधि से निकल कर दूरी देह ढूंढने लगता है? निःसंदेह इसे प्रेम की स्थूल व्याख्या कहा जाएगा किन्तु पुरुष, पत्नी और प्रेमिका के त्रिकोण का समीकरण भी जन्म ले लेता है जबकि एक प्रेयसी से ही विवाह किया गया हो। यदि देह नहीं तो अधिकार भावना वह आधार अवश्य होगी जिस पर कोई भी प्रेम त्रिकोण बना होगा। यदि प्रेमी, प्रेमी न रह जाए और प्रेयसी, प्रेयसी न रह जाए तो प्रेम कैसा? फिर उनके बीच ‘सोशल कांट्रैक्ट’ हो सकता है, प्रेम का मौलिक स्वरूप नहीं।
            प्रेमचंद ने लिखा है कि ‘मोहब्बत रूह की खुराक है। यह वह अमृतबूंद है, जो मरे हुए भावों को ज़िन्दा करती है। यह ज़िन्दगी की सबसे पाक, सबसे ऊंची, सबसे मुबारक़ बरक़त है।’ वहीं हजारी प्रसाद द्विवेद्वी लिखते हैं कि ‘प्रेम से जीवन को अलौकिक सौंदर्य प्राप्त होता है। प्रेम से जीवन पवित्र और सार्थक हो जाता है। प्रेम जीवन की संपूर्णता है।’ आचार्य रामचंद्र शुक्ल मानते थे कि प्रेम एक संजीवनी शक्ति है। संसार के हर दुर्लभ कार्य को करने के लिए यह प्यार संबल प्रदान करता है। आत्मविश्वास बढ़ाता है। यह असीम होता है। इसका केंद्र तो होता है लेकिन परिधि नहीं होती।’
         सूबेदारनी का लहना के प्रति प्रेम किसी परिधि में बंधा हुआ नहीं था। उसके साथ न तो कोई सम्बोधन जुड़ा हुआ था और न कोई रिश्ता। वस्तुतः ‘उसने कहा था’’ कहानी में सूबेदारनी एक औरत का बाहरी स्वरूप था। उसके भीतर की औरत अपनी भावनाओं को दो तरह से जी रही थी। एक पति के प्रति समर्पिता और दूसरी अपने उस प्रेमी की स्मृति को संजोए हुए जिसको कभी उसने प्रेमी की दृष्टि से शायद देखा ही नहीं था। लहना का शब्दों से छेड़ना उसके मन को अवश्य ही गुदगुदाया था तभी तो लहना उसे याद रहा। फिर भी उसने लहना के प्रति अपने अनुराग या आकर्षण अथवा स्मरण को कभी प्रकट नहीं किया। यदि युद्ध के मैदान में जाते हुए पति और बेटे के जीवन की चिन्ता न होती तो वह सूबेदार से यह कभी नहीं कहती कि लहना नामक किसी व्यक्ति को वह कभी जानती थी। युद्धकाल एक ऐसे संकट की घड़ी था जो सूबेदारनी से उसका सर्वस्व छीन सकता था सिवाय स्मृतियों के। संकट की घड़ी में एक स्त्री उसी व्यक्ति पर विश्वास करती है जिसे उसने कभी, एक पल के लिए भी सही अपने मन के बहुत करीब पाया हो। सूबेदारनी ने लहना पर विश्वास किया। उसे अपने पति और बेटे की सुरक्षा का दायित्व सौंपा। सूबेदारनी को विश्वास था कि जो युवक उसे कभी शब्दों से छेड़ा करता था और जो उसके विवाह हो जाने के बाद कभी उसके सामने नहीं आया वह उसके अनुरोध का मान रखेगा क्यों कि उस युवक में स्त्री के सामाजिक सम्मान को बचाए रखने की भावना है, वह छिछोरा नहीं है। उसने कभी किसी से नहीं कहा कि वह फलां लड़की को छेड़ता था जो अब सूबेदारनी बन गई है। बल्कि उसने तो पता भी नहीं लगाया कि विवाह के बाद वह लड़की कहां गई? ऐसे संयत युवक को भला कौन स्त्री भुला सकती है? जीवन के तमाम दायित्वों को निभाते हुए भी सूबेदारनी नहीं भुला पाई लहना को।
‘‘उसने कहा था’’ कहानी से परे यथार्थ जीवन में भी स्त्री संयत पुरुष को कभी नहीं भुला पाती है। वह उसे याद रखती है और हर संकट की घड़ी में उसी को याद करती है। यदि संभव हुआ तो उसे बुलाती है, उससे अपनी समस्या बताती है और यदि उसे बुला पाना या उससे मिल पाना संभव न हो सके तो उसे मन ही मन याद कर के तसल्ली कर लेती है कि यदि आज वह इस समय यहां होता तो आगे बढ़ कर मुझे संकट से उबार लेता। यह कल्पना, यह सोच स्त्री को ढाढस बंधाती है और वह अपने उसी ‘प्रिय’ की कल्पना के सहारे संकट का रास्ता स्वयं ढूंढ निकालती है। पुरुष स्त्री के किसी भी ‘प्रिय’ के बारे में सुनना कभी पसन्द नहीं करता है, इसके विपरीत वह अपने गहन-संबंधों के बारे में भले ही खुल कर चर्चा कर ले किन्तु स्त्री के संबंध में वह यही मान कर चलता है कि उसके मन में वह कोना हो ही नहीं सकता है जहां उसके किसी ‘प्रिय’ की छवि मौजूद हो या फिर ऐसा कोना स्त्री के मन में होना ही नहीं चाहिए, यही आकांक्षा रहती है हर पुरुष की। लेकिन सच तो यही है कि हर स्त्री में होती है लहना की सूबेदारनी। अब यह तो दुनियावी सूबेदार को समझना चाहिए कि सूबेदारनी के मन में अंकित लहना की छवि उसका हित ही करेगी, अहित नहीं। बस, इतनी-सी समझ बड़े-बड़े अलगाव और टकराहट को दूर कर सकती है।
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