Wednesday, December 19, 2012

पटना़, बिहार में......

Dr Sharad Singh with Memento of Nai Dhara Rachana Samman -2012
पटना़, बिहार में  ‘नई धारा रचनाकार सम्मान- 2012 पाने तथा सहधर्मी साथियों से मिलने के  सुखद पल..... 
Dr Sharad Singh,,Patna, Bihar- 30.11.2012

Dr Sharad Singh,,Patna, Bihar- 30.11.2012

Dr Mahip Singh ji, Siddheshwar Prasad ji, Ramkumar Krishak ji ..Patna, Bihar- 30.11.2012

Dr Mahip Singh ji, Siddheshwar Prasad ji, Ramkumar Krishak ji and Dr Sharad Singh, Patna, Bihar- 30.11.2012
Siddheshwar Prasad ji, Ramkumar Krishak ji and Dr sharad Singh, Patna, Bihar- 30.11.2012

Nai Dhara Rachana Samman Invitation Card - Front Page


Nai Dhara Rachana Samman Invitation Card - Back Page
Dainik Jagaran, Patna, Bihar- 01.12.2012


Rashtriya Sahara, Patna, Bihar- 01.12.2012
From Left- Dr Sharad Singh,Smt. Usha Kiran Khan and Shri Ramkumar Krishak at Smt Usha Kiran Khan's House, Patna, Bihar ‘नई धारा रचनाकार सम्मान’ के सिलसिले में पटना यात्रा के दौरान....(30.11.2012)

From Left- Shri Ramkumar Krishak, Usha Kiran Khan and Dr Sharad Singh Smt Usha Kiran Khan's House, Patna, Bihar ‘नई धारा रचनाकार सम्मान’ के सिलसिले में पटना यात्रा के दौरान....(30.11.2012)

From Left-Shri Ramkumar Krishak, Dr Sharad Singh with Dr Maheep Singh, Patna, Bihar ‘नई धारा रचनाकार सम्मान’ के सिलसिले में पटना यात्रा के दौरान....(30.11.2012)

Dr Sharad Singh with Dr Maheep Singh, Patna, Bihar ‘नई धारा रचनाकार सम्मान’ के सिलसिले में पटना यात्रा के दौरान....(30.11.2012)


From Left-Shri Ramkumar Krishak, Dr Sharad Singh, Dr Maheep Singh and Shri Mahesh Bhardwaj, Patna, Bihar ‘नई धारा रचनाकार सम्मान’ के सिलसिले में पटना यात्रा के दौरान....(30.11.2012)

Tuesday, November 20, 2012

‘डॉ. अम्बेडकर का स्त्री विमर्श’ का विमोचन


Shree Times,Hindi Daily, Lucknow,18.11.2012

मेरी पुस्तक डॉ. अम्बेडकर का स्त्री विमर्शका विमोचन विगत 17.11.2012 को लखनऊ (उप्र) के प्रेस क्लब में अरूणाचल प्रदेश के पूर्व राज्यपाल आदरणीय माता प्रसाद जी के करकमलों द्वारा सम्पन्न हुआ।
  

उक्त अवसर पर गुलाबचंद (अपर महानिदेशक प्रसार भारती लखनऊ) डॉ. परशुराम पाल (असोसिएट प्रोफेसर लखनऊ विश्वविद्यालय), सुरेश उजाला (संपादक ‘उत्तर प्रदेश’ पत्रिका), महेन्द्र भीष्म (कथाकार), वीरेन्द्र बाहरी (भारत बुक सेंटर), तरुण बाहरी (भारत बुक सेंटर) तथा  लखनऊ के जुझारू पत्रकारों एवं प्रेस छायाकारों सहित भी बड़ी संख्या में उपस्थित थे।  

उस महत्वपूर्ण पल को आप सब से साझा कर रही हूं .......

Lokmat Samachar, Hindi Daily, Lucknow,18.11.2012
Amar Ujala, Hindi Daily, Lucknow,18.11.2012

High Tech News,Hindi Daily  Lucknow,18.11.2012

Hindustan, Hindi Daily, Lucknow,18.11.2012

Hindustan,City Live, Hindi Daily, Lucknow,18.11.2012
Awadh nama, Hindi Daily, Lucknow,18.11.2012

Rashtriya Swaroop, Hindi Daily, Lucknow,18.11.2012

Swadesh Chetna, Hindi Daily, Lucknow,18.11.2012
Swatantra Bharat, Hindi Daily, Lucknow,18.11.2012


 

Sunday, November 4, 2012

‘लिव इन रिलेशन’ यानी प्रेम और अधिकार का द्वन्द्व

लेख
  
- डॉ. शरद सिंह

 ‘ये किसने कहा कि मैं तुमसे शादी करना चाहती हूं? कि तुमसे बच्चे पैदा करना चाहती हूं? तुम्हें पसंद करती हूं.....बस, इसीलिए तुम्हारा साथ चाहती हूं।’ मैंने कहा था।
‘फिर पसंद? प्रेम नहीं?’
ां-हां, वहीं...प्रेम....प्रेम करती हूं तुमसे।’
‘मेरे साथ रहोगी...बिना शादी किए? लिव इन रिलेशन?’ रितिक ने चुनौती-सी देते हुए पूछा था और मैं रितिक के जाल में फंस गई थी। कारण कि मैं अपने जीवन को अपने ढंग से जीना चाहती थी और ‘लिव इन रिलेशन’ वाला फंडा मुझे अपने ढंग जैसा लगा था। बिना विवाह किए किसी पुरुष के साथ पति-पत्नी के रूप में रहने की कल्पना ने मुझे रोमांचित कर दिया था। इसमें मुझे अपनी स्वतंत्रता दिखाई दी। मैं जब चाहे तब मुक्त हो सकती थी....वस्तुतः मुझे तो मुक्त ही रहना था....बंधन तो व
ां होता जहां किसी नियम का पालन किया जाता।
बंधन!...... बंधन के जो रूप मैंने अब तक देखे थे उनमें स्त्र को ही बंधे हुए पाया था। पुरुष तो बंध कर भी उन्मुक्त था...पूर्ण उन्मुक्त। वह पत्नी के होते हुए भी एक से अधिक प्रेमिकाएं रख सकता था, रखैलें रख सकता था, यहां-वहां फ्लर्ट कर सकता था...फिर भी समाज की दृष्टि में वह क्षमा योग्य ही बना रहता। सच तो यह है कि मैंने अपने बचपन में ही बंधन को तार-तार होते देखा था। वैवाहिक बंधन का विकृत रूप ही तो था वह जो किसी फसिल के समान मेरे मन की चट्टानों के बीच दबा हुआ था, एकदम सुरक्षित।
- यह एक छोटा-सा अंश है ‘कस्बाई सिमोन’ उपन्यास का। जो अनेक प्रश्न सामने रख जाता है। 


                         
‘लिव इन रिलेशन’ महानगरों में एक नई जीवनचर्या के रूप में अपनाया जा रहा है। यह माना जाता है कि स्त्र इसमें रहती हुई अपनी स्वतंत्राता को सुरक्षित अनुभव करती है। उसे जीवनसाथी द्वारा दी जाने वाली प्रताड़ना सहने को विवश नहीं होना पड़ता है। वह स्वयं को स्वतंत्रा पाती है। लेकिन महानगरों में अपरिचय का वह वातावरण होता है जिसमें पड़ोसी परस्पर एक-दूसरे को नहीं पहचानते हैं। कस्बों में सामाजिक स्थिति अभी धुर पारंपरागत है। ऐसे वातावरण में एक
स्त्र यदि ‘लिव इन रिलेशन’ को अपनाती है तो उसे क्या मिलता है?... और वह क्या खोती है?....क्या एक कस्बाई औरत ‘लिव इन रिलेशन’ में मानसिक सुकून पा सकती है? उस किन-किन स्तरों पर समझौते करने पड़ते हैं? बड़ा ही कठिन विमर्श है यह।
यह माना जाता है कि
स्त्र को आर्थिक अधिकार पुरुषों के बराबर न होने के कारण विवाहिताएं अपने पति द्वारा छोड़ दिए जाने से भयभीत रहती हैं। वे जानती हैं कि परितक्त्या स्त्र को समाज सम्मान की दृष्टि से नहीं देखता है। लेकिन यदि वह आर्थिक रूप से समर्थ हो, स्वयं कमाती हो तो क्या उसे समाज में सम्मान मिल सकता है? यदि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद महिलाओं की एक पीढ़ी का बहुमुखी विकास हो चुका होता तो आज देश में महिलाओं की दशा का परिदृश्य कुछ और ही होता। उस स्थिति में न तो दहेज हत्याएं होतीं, न मादा-भ्रूण हत्या और न महिलाओं के विरुद्ध अपराध का ग्राफ इतना ऊपर जा पाता। उस स्थिति में झारखण्ड या बस्तर में स्त्रियों को न तो ‘डायन’ घोषित किया जाता और न तमाम राज्यों में बलात्कार की घटनाओं में बढ़ोत्तरी हो पाती। महिलाओं को कानूनी सहायता लेने का साहस तो रहता।
 
स्त्र की शिक्षा पर उसका परिवार उसका दस प्रतिशत भी व्यय नहीं करता है जितना वह उस स्त्र के विवाह में दिखावे और दहेज के रूप में व्यय कर देता है। परिवार के लिए पुत्र का महत्व पुत्र की अपेक्षा आज भी अधिक है। स्त्र का दैहिक शोषण आज भी आम बात है।  घर, कार्यस्थल, सड़क, परिवहन, चिकित्सालय, मनोरंजन स्थल आदि कहीं भी स्त्र स्वयं को पूर्ण सुरक्षित अनुभव नहीं कर पाती है। अभी स्त्रियों को अपना भविष्य संवारने के लिए बहुत संघर्ष करना है। उन्हें अभी पूरी तरह सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक, राजनीतिक एवं मातृत्व का अधिकार प्राप्त करना है जिस दिन उसे अपने सारे अधिकार मिल जाएंगे जो कि देश की नागरिक एवं मनुष्य होने के नाते उसे मिलने चाहिए, उस दिन एक स्वस्थ समाज की कल्पना भी साकार हो सकेगी। जिसमें स्त्र और पुरुष सच्चे अर्थों में बराबरी का दर्जा रखेंगे।
                          

हर औरत अपने अस्तित्व को जीना चाहती है, पुरुष के साथ किन्तु अपने अधिकारों के साथ। पुरुष से अधिक नहीं तो पुरुष से कम भी नहीं। क्योंकि कम होने की पीड़ा सदियों से झेलती आ रही है और अब बराबर होने का सुख पाना चाहती है। यही ललक उसे ‘लिव इन रिलेशन’ के प्रति आकर्षित करती है। किन्तु यह तो जांचना आवश्यक है कि इसमें भी स्त्र क्या-क्या खोती है और क्या-क्या पाती है?  ‘लिव इन रिलेशन’ वस्तुतः प्रेम और अधिकार का द्वन्द्व है जिसकी तह तक पहुंचना हर स्त्र के लिए आवश्यक है।    
 -------------------------------------------------------------
 

(साभार- दैनिक नेशनल दुनियामें 04.11.2012 को प्रकाशित मेरा लेख) 

Tuesday, October 23, 2012

रावणों पर विजय पाती आज की स्त्री



वामा
                     
 - डॉ. शरद सिंह

सतयुग में सीता रावण के छल का शिकार बनी। राम स्वर्णमृग को पकड़ने चल दिए। राम की पुकार समझ कर लक्ष्मण द्वार पर रेखा खींच कर राम की ओर चल पड़े। लक्ष्मण जाते-जाते सीता को समझा गए कि उनके द्वारा खींची गई रेखा को वे न लांघें। यह कथा सर्वविदित है कि लक्ष्मण के जाते ही रावण साधुवेश में आया और दान-धर्म का वास्ता दे कर सीता को विवश कर दिया कि वह लक्ष्मण-रेखा को लांघ जाएं। रेखा लांघते ही रावण ने सीता का हरण कर लिया। तब से यह कहावत चल पड़ी कि स्त्रियों को लक्ष्मण-रेखा नहीं लांघनी चाहिए। इसी कथा का दूसरा पहलू देखा जाए तो कहावत यह भी होनी चाहिए कि स्त्रियों को किसी भी अपरिचित पुरुष का विश्वास नहीं करना चाहिए। न जाने किस पुरुष रूप में रावण मौजूद हो? किन्तु स्त्री न तो सतयुग में डरी और न कलियुग में भयभीत है। भले ही जन्म से मृत्यु तक उसे भिन्न-भिन्न रूप में रावण का सामना करना पड़ता है।
स्त्री के जन्म से भी पहले अर्थात् कन्या भ्रूण को इस दुनिया में आने के लिए संघर्ष करना पड़ता है। उसका जन्म मां की दृढ़ता और पिता की सकारात्मक सोच पर निर्भर रहता है। जन्म के बाद भाइयों की अपेक्षा उपेक्षा का सामना उसकी नियति बन जाती है यदि परिवार दकियानूसी परिपाटी पर जी रहा हो तो। बेटी के लिए पढ़ाई, पौष्टिक खाना, खेल-कूद नहीं अपितु घर-गृहस्थी की चक्की के पाट तैयार रहते हैं। इसी चक्की को चलाने और उसमें स्वयं पिसने की शिक्षा उसे दी जाती है। यदि लड़की स्कूल-काॅलेज में पढ़ने जाती है तो उस पर हाजार पाबंदियां ठोंक दी जाती हैं। वह क्या पहने, क्या नहीं? वह क्या पढ़े, क्या नहीं? वह मोबाईल फोन रखे या नहीं? आदि-आदि। उस पर छेड़खानी करने वाले मजनुओं का सामना, शारीरिक क्षति पहुंचाने की धमकी का सामना, दोस्त बन कर अश्लील एम.एम.एस. बना कर ब्लैकमेल करने वालों का सामना।
जब कभी इस प्रकार के समाचार पढ़ने को मिलते हैं कि -‘ उत्तर प्रदेश के बागपत जिले के अलावलपुर गांव में छह महिलाओं को खरीदने के वास्ते एक दर्जन से ज्यादा लोग जमा थे। महिलाओं को बेचने वाले उनकी ओर इशारा करके बोली लगा रहे थे। ये महिलाएं दिल्ली के एक दलाल के माध्यम से बिहार से बागपत तक पहुंची थीं। बिहार में गरीबी का दंश झेल रहीं इन महिलाओं को यह ख्वाब दिखाकर लाया गया था कि उत्तर प्रदेश में उनकी शादी कराई जाएगी और वहां आराम से अपना घर बसाकर रहेंगी।’....तो रावण अपने दसों सिरांे के साथ दिखाई देने लगता है।

बागपत की तरह सहारनपुर के घाटमपुर गांव में पंचायत ने बाजार में महिलाओं की खरीदारी पर रोक लगा दी है। महिलाएं खरीदारी के लिए बाजार में नहीं जाएंगी। महिलाएं घर के बाहर नल पर पानी नहीं भर सकेंगी। पंचायत ने पांच-पांच व्यक्तियों की छह टीमें बनाई हैं, जो गांव में घूमकर निगरानी करेंगी और दोषी से निर्धारित जुर्माना वसूलेंगी। विरोध करने पर दोगुना जुर्माना होगा। भला ऐसे गांवों-कस्बों की बेटियां सानिया मिर्जा, कण्णेश्वरी देवी, इंदिरा नूयी या सुनिता विलियम्स कैसे बन सकेंगी?  
इन सारी विपरीत परिस्थितियों में भी भारतीय स्त्री प्रतिदिन स्वयं को साबित करती जा रही है। जब कोई औरत कुछ करने की ठान लेती है तो उसके इरादे किसी चट्टान की भांति अडिग और मजबूत सिद्ध होते हैं। मणिपुर की इरोम चानू शर्मीला इसका एक जीता-जागता उदाहरण हैं। सन् 2011 की चार नवम्बर को उनकी भूख हड़ताल के ग्यारह साल पूरे हो गए। शुरू में कुछ लोगों को लगा था कि यह आम-सी युवती शीघ्र ही वह अपना हठ छोड़ कर सामान्य जि़न्दगी में लौट जाएगी। वह भूल जाएगी कि मणिपुर में सेना के कुछ लोगों द्वारा स्त्रियों को किस प्रकार अपमानित किया गया। किन्तु 28 वर्षीया इरोम शर्मीला ने ने संघर्ष का रास्ता नहीं छोड़ा। वे न्याय की मांग को लेकर संघर्ष के रास्ते पर जो एक बार चलीं तो उन्होंने कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा। यह स्त्री का वह जुझारूपन है जो उसकी कोमलता के भीतर मौजूद ऊर्जस्विता से परिचित कराता है।
     धनगढ़ (गड़रिया) परिवार में जन्मीं सम्पत देवी पाल उत्तरप्रदेश के बांदा जिले में कई वर्ष से कार्यरत हैं। सम्पत देवी पाल के दल का नाम है ‘गुलाबी गैंग’। सम्पत पाल के गुलाबी दल की औरतें निपट ग्रामीण परिवेश की हैं। वे सीधे पल्ले की साड़ी पहनती हैं, सिर और माथा पल्ले से ढंका रहता है किन्तु उनके भीतर अदम्य साहस जाग चुका है। सम्पत पाल के अनुसार ‘‘जब पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी हमारी मदद करने के लिए आगे नहीं आते हैं तब विवश हो कर हमें कानून अपने हाथ में लेना पड़ता है। यह गैरकानूनी गैंग नहीं है, यह गैंग फाॅर जस्टिस है। ’’ 
                                                         
रावण कोई एक व्यक्ति नहीं अपितु पुरुष प्रधान समाज में मौजूद वह आसुरी प्रवृत्तियां हैं जो स्त्री को सदा दोयम दर्जे पर देखना चाहती हैं, उन्हें दलित बनाए रखना चाहती हैं। किन्तु सुखद पक्ष यह भी है कि इन आसुरी प्रवृत्तियों से जूझती हुई लड़कियां आईटी क्षेत्र और अनुसंधान क्षेत्र में भी तेजी से आगे आई हैं। वे अब पढ़ने की खातिर अकेली दूसरे शहरों में रहने का साहस रखती हैं। वे उन सभी क्षेत्रों में सफलतापूर्वक काम कर रही हैं जिन्हें पहले लड़कियों के लिए उपयुक्त नहीं माना जाता था। वस्तुतः समाज में विभिन्न रूपों में मौजूद बाधाओं रूपी रावणों पर स्त्रियां विजय पाती जा रही हैं, धीरे-धीरे ही सही।

(‘इंडिया इनसाइडके अक्टूबर 2012 अंक में मेरे स्तम्भ वामामें प्रकाशित मेरा लेख साभार)

Sunday, September 30, 2012

ज़रूरत है गांधी के स्त्रीविमर्श को समझने की


- डॉ. शरद सिंह

इसमें कोई दो मत नहीं कि महात्मा गांधी के विचार कालजयी हैं। दुख तो तब होता है कि गांधी के देश में कोई डी आई जी पद का अधिकारी कहता है कि यदि मेरी बहन अपने प्रेमी के साथ घर से भागती तो मैं उसे गोली मार देता। उस समय पीड़ा होती है जब न्यायाधीश की कुर्सी पर बैठा व्यक्ति कहता है कि पत्नी को पति के हाथों मार खाने से मना नहीं करना चाहिए। कई बार यह हुआ है कि जब महात्मा गांधी के स्त्रियों के प्रति दृष्टिकोण का विषय उठता है तो कस्तूरबा के प्रति उनके कठोर व्यवहार पर जा ठहरा है। चूंकि ऐसे समय में गांधी के व्यक्तिगत जीवन के समक्ष उनके सर्ववादी विचारों को अनदेखा किया गया। महिलाओं को सशक्त बनाने की कोशिश ही गांधी के नारी आंदोलन की बुनियाद थी। गांधी मानते थे कि स्त्रियों को जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में पुरुषों के समकक्ष सशक्त होना चाहिए। वे राजनीति में महिलाओं की सहभागिता के पक्षधर थे। वस्तुतः गांधी का अहिंसावादी आंदोलन स्त्रियों की उपस्थिति के कारण अधिक सार्थक परिणाम दे सका। इस तथ्य को गांधी जी ने स्वीकार करते हुए एक बार कहा था कि ‘‘स्त्रियां प्रकृति से ही अहिंसावादी होती हैं। स्त्रियां पुरुषों की तुलना में अधिक संवेदनशील और सहृदय होती हैं अतः स्त्रियों की उपस्थिति से अहिंसावादी आन्दोलन एवं सत्याग्रह अधिक कारगर हो सकते हैं।’’

महात्मा गांधी स्त्रियों को अबला कहने के विरोधी थे। वे मानते थे कि स्त्री पुरुषों की भांति सबल और शक्ति सम्पन्न है। जिस प्रकार एक सशस्त्र पुरुष के सामने निःशस्त्र पुरुष कमजोर प्रतीत होता है, ठीक उसी तरह सर्वअधिकार प्राप्त पुरुषों के सामने स्त्री अबला प्रतीत होती है जो कि वस्तुतः अबला नहीं है। उनका कहना था कि उन्हें अबला पुकारना महिलाओं की आंतरिक शक्ति को दुत्कारना है। यदि हम इतिहास पर नजर डालें तो हमें उनकी वीरता की कई मिसालें मिलेंगी। यदि महिलाएं देश की गरिमा बढ़ाने का संकल्प कर लें तो कुछ ही महीनों में वे अपनी आध्यात्मिक अनुभूति के बल पर देश का रूप बदल सकती हैं।’’

गांधी जी मानते थे कि स्त्रियों की उपस्थिति पुरुषों को भी आचरण की सीमाओं में बांधे रखती है। यही कारण है कि उन्होंने कांग्रेस में महिलाओं को नेतृत्व का पूरा अवसर दिया। विभिन्न आंदोलनों में स्त्रियों को भरपूर अवसर दिया। उन्होंने कांग्रेस के अंतर्गत स्त्रियों के सामाजिक, शैक्षिक, आर्थिक और राजनीतिक उत्थान के कार्यक्रम भी चलाए। वे स्त्रियों को एक स्त्री के रूप में न देख कर एक पूर्ण व्यक्ति के रूप में देखते थे। वे स्त्रियों को सम्पत्ति पर पुरुषों के बराबर स्वामित्व दिए जाने के भी पक्षधर थे।
इससे भी बढ़ कर गांधी ने उस विचार का समर्थन किया जिस पर आज भी वाद-विवाद चलता रहता है। गांधी का मानना था कि विवाह के बाद भी स्त्री को अपने शरीर पर पूरा अधिकार रहता है। इसलिए उसकी अनुमति के बिना उसकी देह को स्पर्श करने का किसी भी पुरुष को अधिकार नहीं है, वह पुरुष भले ही उसका पति ही क्यों न हो। यह एक ऐसा विचार था जो स्त्री को एक व्यक्ति का दर्जा देने के साथ ही उसके अधिकारों की पूर्णता पर भी मुहर लगाता है। पुरुषसत्तात्मक सामंती सामाजिक व्यवस्था ने गांधी के इस विचार को गहरे दबा दिया और सोलहवीं शताब्दी की उसी परिपाटी को जिलाए रखा कि मां, बहन, पत्नी के रूप में स्त्री पुरुष की सम्पत्ति होती है। वह न अपनी इच्छा से जीवन साथी चुन सकती है, न तो अपने ढंग से अपना जीवन जी सकती है और अब तो एक बार फिर यह तय किया जाने लगा है कि स्त्रियां क्या पहनें, क्या नहीं या फिर वे बाज़ार-हाट जाएं या नहीं। उस पर एक विज्ञापन ने तो हद कर दी है कि छेड़छाड़ से बचना है तो फोन कर के घर पर सामान मंगवा लें।  

कई बार इस बात पर भी उंगली उठाई गई कि गांधी जी युवतियों के कंधे पर हाथ रख कर चलते थे। इस तथ्य का दूसरा पहलू देखें तो कि गांधी स्त्रियों और पुरुषों के आपसी व्यवहार को सहज भाव से ले कर चलने का संदेश देना चाहते थे। आज तो स्थिति इसके ठीक विपरीत है। आज भाई भी अपनी बहन को अपने साथ ले कर चलने में हिचकता है कि कहीं लोग भाई-बहन को प्रेमी-प्रेमिका न समझ बैठें। यही तो सोच का अन्तर है। गांधी इसी सोच को बदलना चाहते थे। वे स्वयं ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करते थे। इतना कठोर पालन कि उन्होंने कस्तूरबा से भी संतानोत्पत्ति तक ही दैहिक संबंध रखा। वे संभवतः सिद्ध करना चाहते थे कि पुरुषों में भी इच्छाओं पर लगाम लगाने की क्षमता होती है, वह भी स्त्रियों के स्पर्श एवं उपस्थिति होते हुए भी। वे योगियों अथवा साधुओं वाले ब्रह्मचर्य को नहीं अपितु एक सामान्य पुरुष के आत्म संयम के ब्रह्मचर्य को सामने रखना चाहते थे। यदि गांधी के ब्रह्मचर्य की सही व्याख्या समाज के सामने समय रहते आई होती आज सामाजिक परिदृश्य कुछ और होता। आज स्त्रियों को खाप-पंचायतों के तानाशाही फरमान नहीं सुनने पड़ते और न ही महानगरों के भीड़ भरे चौराहे पर आवारा शोहदों के हाथों प्रताडि़त होना पड़ता।
महात्मा गांधी मानते थे कि सामाजिक व्यवस्था ने स्त्रियों को संयमित रहने का पाठ हमेशा पढ़ाया है किन्तु पुरुषों को भी इस संयम के पाठ की आवश्यकता है। वस्तुतः महात्मा गांधी के स्त्री विमर्श को गहराई से समझने आवश्यकता आज भी है।  
(साभार- दैनिक नेशनल दुनियामें 30.09.2012 को प्रकाशित मेरा लेख)