Wednesday, May 17, 2017

एक बयान, एक टिप्पणी और भारतीय फेमिनिज़्म - डॉ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
"एक बयान, एक टिप्पणी और भारतीय फेमिनिज़्म" मेरे कॉलम चर्चा प्लस में "दैनिक सागर दिनकर" में ( 17.05. 2017) ..My Column Charcha Plus in "Sagar Dinkar" news paper....
 


चर्चा प्लस
एक बयान, एक टिप्पणी और भारतीय फेमिनिज़्म
- डॉ. शरद सिंह 


इस बार यानी सन् 2017 के अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस और अंतर्राष्ट्रीय मातृदिवस पर अलग-अलग दो घटनाएं घटीं। दोनों में समानता यह थी कि दोनों ही भारतीय स्त्री के प्रति टिप्पणी के रूप में थीं। दोनों घटनाओं में से एक ने भारतीय नारीवादियों अर्थात् इंडियन फेमिनिस्ट्स का ध्यान खींचा तो दूसरी घटना ने शायद सिर्फ़ मेरा ध्यान खींचा क्यों कि यह दूसरी घटना सिर्फ़ मुझसे संबंधित थी। लेकिन ये दोनों घटनाएं भारतीय फेमिनिज़्म और उसके प्रति लोगों के विचारों का खुलासा करती हैं। दोनों ही अपने-अपने स्तर पर महत्वपूर्ण हैं।

Charcha Plus Column of Dr Sharad Singh in "Sagar Dinkar" Daily News Paper
इस बार यानी सन् 2017 के अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस और अंतर्राष्ट्रीय मातृदिवस पर अलग-अलग दो घटनाएं घटीं। दोनों में समानता यह थी कि दोनों ही भारतीय स्त्री के प्रति टिप्पणी के रूप में थीं। दोनों घटनाओं में से एक ने भारतीय नारीवादियों अर्थात् इंडियन फेमिनिस्ट्स का का ध्यान खींचा तो दूसरी घटना ने शायद सिर्फ़ मेरा ध्यान खींचा क्यों कि यह दूसरी घटना सिर्फ़ मुझसे संबंधित थी। लेकिन ये दोनों घटनाएं भारतीय फेमिनिज़्म और उसके प्रति लोगों के विचारों का खुलासा करती हैं। दोनों ही अपने-अपने स्तर पर महत्वपूर्ण हैं। चलिए पहले पहली घटना के बारे में चर्चा की जाए जो कि पहले घटी। यह घटना अथवा टिप्पणी 08 मार्च 2017 को सामने आई थी। महिला दिवस के मौके पर एक इंटरव्यू के दौरान शाहिद कपूर की पत्नी मीरा राजपूत ने अपने बच्चों को घर पर छोड़ ऑफिस जाने वाली महिलाओं पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि उनकी बेटी मीशा कोई ’पपी’ नहीं है जिसे वह घर पर छोड़ दें और पूरे दिन में केवल एक घंटा उसके साथ बिताएं। मीरा की टिप्पणी की सोशल मीडिया पर काफी आलोचना हुई थी। उनके अभिनेता पति शाहिद कपूर उनके बचाव में सामने आए। उल्लेखनीय है कि शाहिद कपूर ने जुलाई 2015 में दिल्ली की रहने वाली मीरा राजपूत से शादी की थी। शाहि कपूर ने कहा, “मुझे लगता है कि वह सकारात्मक तौर पर बात कर रही थी। मैं समझ सकता हूं कि लोगों का एक मजबूत दृष्टिकोण होता है और लोगों की भावनाएं आहत होती हैं लेकिन मुझे यह भी लगता है कि आज हम जिस दौर में हैं वहां हर कोई हर चीज को लेकर आहत हो जाता है।“ अभिनेता शाहिद कपूर ने कहा कि मीरा ने निजी तौर पर अपनी राय व्यक्त की थी और लोगों का इसकी आलोचना करना काफी दुखद है। अपनी बेटी मीशा की परवरिश के लिए मीरा का शुक्रिया अदा करते हुए शाहिद कपूर ने कहा, “मुझे लगता है कि पति-पत्नी के तौर पर देखा जाए तो मुझे काम पर बाहर जाना चाहिए। मीशा के लिए मीरा जो कुछ भी कर रही हैं वह ज्यादा महत्वपूर्ण और प्रासंगिक है। मैं मीशा के साथ रहना चाहता हूं, पर हम दोनों में किसी एक को काम करना पड़ेगा और वह मैं हूं।“
बात यही तक रहती तो भी गनीमत थी, लेकिन मीरा राजपूत की एक सहपाठी ने अपना गुस्सा सोशल मीडिया पर प्रकट कर दिया। मीरा की एक क्लासमेट ने एक फेसबुक पोस्ट के माध्यम से अपने विचार इन शब्दो में रखे - ‘‘मीरा तुम्हारा इंटरव्यू देखने के बाद मुझे आज बहुत गुस्सा आया। मैंने कॉलेज में तुम्हारे ही बैच में तीन साल बिताए हैं। मैं आज पूरे आत्मविश्वास से कह सकती हूं कि नारीवाद को लेकर तुम्हारी सोच में बहुत खोट है। तुमने ऐसा किया ही क्या है खुद को किसी से नैतिक रूप से श्रेष्ठ बताकर किसी मुद्दे पर बात कर सको। दुनिया के बारे में तुम्हारा संकीर्ण नजरिया बहुत कम कह पाता है। और इसे भूलना नहीं चाहिए कि किस तरह वर्किंग वुमेन के बारे में तुम्हारा बयान हमें वास्तविक सशक्तिकरण से सालों पीछे ले जाता है, जिसके बारे में तुम्हें कुछ पता ही नहीं है। ढेर सारे गुस्से के साथ, एक जागरुक फेमिनिस्ट।’’
इस ‘‘एक जागरुक फेमिनिस्ट’’ ने विचारों के समुन्दर में ऊंची-ऊंची लहरें उठा दीं। यह प्रश्न एक बार फिर जाग उठा कि आखिर ‘फेमिनिज़्म’ है क्या, वह भी भारतीय संदर्भ में? तो जाहिर है कि पहले खंगालना होगा फेमिनिज़्म को। आज नारीवाद शब्द का उच्चारण करते ही कितने ही लोगों की भौंहें सिकुड जाती है । इसका कारण यह है कि ‘ नारीवाद ’ या ‘ नारीवादी ’ विचारधारा के बारे में आज-कल अच्छी-खासी भ्रान्तियां और ग़लतफहमियां फैली हुई हैं । ‘स्त्री-मुक्ति’ और ‘नारीवाद’ इन दो शब्दों को इतना तोड़ा-मरोड़ा गया है कि आज खुद कई स्त्रियां ‘नारीवादी’ कहलाने से झिझकने लगती हैं। जबकि ‘नारीवाद’ एक ऐसा विचार है जो पुरूष और स्त्री के बीच की असमानता को स्वीकार करते हुए नारी के सशक्तिकरण की प्रक्रिया को बौद्धिक एवं क्रियात्मक रूप से प्रस्तुत करता है । नारीवाद एक विचारधारा भी है और एक आंदोलन भी । 17वीं शताब्दी में जब सब से पहली बार ‘नारीवाद’ (फेमिनिज़्म) शब्द का प्रयोग किया गया, तब उसका एक विशेष अर्थ था, आज 2012 में उसका प्रयोग बिलकुल भिन्न अर्थ में होता है। नारीवाद के संबंध में कई भ्रान्तियां एवं ग़लत धारणाएं प्रचलित हैं। जैसे- नारी स्वतंत्रता का पक्ष लेने वाली महिलाएं पश्चिमी विचारों की पोषक होती हैं, वे उन्मुक्त यौन संबंधों में विश्वास रखती हैं या फिर वे देशज परम्पराओं एवं संस्कृति की घोर विरोधी होती हैं, आदि-आदि। ऐसी भ्रांतियां अक्षरशः सही नहीं हैं। अपवाद हर क्षेत्र में होते हैं और अतिवादी भी जिन्हें हम कट्टर विचारों वाला भी कह देते हैं। लेकिन वास्तविकता में फेमिनिज़्म वह वाद या विचार है जो स्त्री को समाज में पुरुषों के बराबर अधिकार दिलाने की पैरवी करता है। यह पुरुषविरोधी कदापि नहीं है।
मीरा राजपूत ने कामकाजी महिलाओं के परिप्रेक्ष्य में घरेलू महिलाओं का पक्ष लेते हुए अपनी बात कह डाली। उनके बयान ऐसा नहीं था कि उसके विरोध में हंगामा खड़ा किया जाता। वे जिस आर्थिक तबके की हैं, वहां वे नारीवाद की पक्षधर कहलाने भर के लिए पैसे कमाएं कि यह कहां का तर्क है? यदि कोई स्त्री आर्थिक रूप से समर्थ है, सम्पन्न परिवार की है तो उसे अपनी स्वतंत्रता साबित करने के लिए नौकरी करना या व्यवसाय करना ही जरूरी नहीं है, और भी कई रास्ते हैं स्वयं की स्वतंत्रता की घोषणा करने के। कम से कम भारत जैसे देश में जहां बेरोजगारों की संख्या असंख्य होती जा रही है, मीरा राजपूत की टिप्पणी विशेष अर्थ रखती है। इस बात में भी विशेष अर्थ रखती है कि वर्तमान समाज में पारिवारिक संबंध तेजी से बिखर रहे हैं। न्यूक्लियर फैमिली की विचारधारा ने युवा पीढ़ी और पुरानी पीढ़ी के बीच गहरी खाई खोद दी है। ऐसे में बच्चे के प्रति मां द्वारा विशेष ध्यान दिया जाता जरूरी हो गया है। अब यदि नानी या दादी ने नहीं तो कम से कम मां से तो बच्चों को संस्कार मिलने ही चाहिए। इससे स्त्री की स्वतंत्रता कहीं बाधित नहीं होती है बल्कि मां और बच्चे के बीच एक अच्छा रिश्ता कायम होता है।
मां रूपी स्त्री के प्रति हमारे दृष्टिकोण में भी गड़बड़ है। यह गड़बड़ी मुझे उस दूसरी घटना से महसूस हुई जो मातृ दिवस पर एक टिप्पणी के रूप में मेरे फेसबुक पर मुझे दिखाई दी। हुआ यह कि अंतर्राष्ट्रीय मातृ दिवस पर मैंने अपनी मां की तस्वीर पोस्ट की और उसमें उनका नाम लिखा ‘‘डॉ. विद्यावती’’। मेरे एक फेसबुक फ्रेंड ने टिप्पणी की कि ‘‘आपने अपनी मां के नाम के साथ उनकी उपाधि लिख कर उनका महत्व घटा दिया।’’ यह टिप्पणी पढ़ कर मैं चकरा गई। यदि मेरी मां ने पीएच. डी. की है और मैं उनके नाम के साथ ‘डॉक्टर’ शब्द का प्रयोग कर उनकी उपाधि लिख रही हूं तो इसमें उनका महत्व कम कैसे हो गया? मैंने इस टिप्पणी के निहितार्थ को तलाशने का बहुत प्रयास किया। इसी सिलसिले में मेरा ध्यान गया कि हम साहित्य के पन्नों पर मां के चरित्र को आज भी दीन, हीन, अपढ़, दिखाते हैं। यदि मां की महानता स्थापित करना ही होती है तो ‘‘पन्ना धाय’’ का चरित्र याद दिला देते हैं। कार्पोरेट , साईबर और स्पेस की दुनिया में स्वयं की साबित करने वाली मांओं के इस युग में हम उनकी योग्यताओं को कम कर के हम उनका सही आकलन नहीं कर कर सकेंगे। एक पढ़ी-लिखी स्कॉलर और अपने बच्चों के लिए, अपने परिवार के लिए एक आईकॉन मां का रूप अपने साहित्य में क्यों नहीं दिखाते हैं जबकि हर युग में ऐसी मांएं हुई हैं और वर्तमान में तो ऐसी मांओं की कोई कमी नहीं हैं। फिर भी गोबर के उपले थापती मां, बेटे की राह ताकती दुखियारी मां और बेटे से कमतर जानकारी रखने वाली मां को ही साहित्य में अधिक स्थान दिया जाता है। कहीं यह साहित्य में पुरुषवादिता तो नहीं है?
चाहे मीरा राजपूत का बयान हो या मेरे फेसबुक पर टिप्पणी, जरूरी है इन दोनों के परिप्रेक्ष्य में भारतीय फेमिनिज़्म का आकलन करना। कहीं हम फेमिनिज़्म की मूल भावना को पीछे छोड़ कर दोहरेपन के खेमे में तो नहीं जा पहुंचे हैं? बहस लम्बी है, कई किस्तों में जा सकती है लेकिन फिलहाल चिंतन के लिए यहीं अर्द्धविराम। वैसे यदि वूमेन एक्टीविस्ट कमला भसीन के शब्दों में देखें तो- “ पितृसत्तात्मक नियंत्रण व परिवार, काम की जगह व समाज में, भौतिक व वैचारिक स्तर पर औरतों के काम, प्रजनन और यौनिकता के दमन व शोषण के प्रति जागरूकता तथा स्त्रियों व पुरूषों द्वारा इन मौजूदा परिस्थितियों को बदलने की दिशा में जागरूक सक्रियता ही नारीवाद है।”
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Thursday, May 11, 2017

महात्मा बुद्ध के देश से ‘डिलीट’ हो हिंसा ... डॉ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
Buddha Jayanti !
"महात्मा बुद्ध के देश से ‘डिलीट’ हो हिंसा" मेरे कॉलम #चर्चा_प्लस में "दैनिक सागर दिनकर" में ( 10. 05. 2017) ..My Column #Charcha_Plus in "Sagar Dinkar" news paper....
चर्चा प्लस
बुद्ध जयंती पर विशेष :
महात्मा बुद्ध के देश से ‘डिलीट’ हो हिंसा

- डॉ. शरद सिंह

हिंसा हमारी संस्कृति का हिस्सा कभी नहीं रही। भारत ने हमेशा शांति और अहिंसा की अगुवाई की है। महात्मा गौतम बुद्ध की इस धरती पर हिंसा अथवा अराजकता के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए। इन दिनों हिंसा का जो तांडव काश्मीर की घाटी में दिखाई दे रहा है उसके कुछ संस्करण देश के उन हिस्सों में भी नज़र आने लगे हैं जहां कभी तोड़-फोड़, उत्पात अथवा हिंसा पिछले कई दशकों से नहीं हुई थी। बामियांन में ऐतिहासिक बुद्ध प्रतिमा को तोड़ने वाले भले ही अहिंसा का महत्व नहीं समझें लेकिन हमें तो समझना ही होगा और हिंसात्मक प्रवृत्त्यिं को समाप्त करने के लिए ‘अल्ट’, ‘कंट्रोल’ और ‘डिलीट’ ये तीनों शक्तियों का प्रयोग हमें आगे बढ़ कर करना होगा।

ऐसा लगता है जैसे हिंसक प्रवृत्तियां आम जनता के जीवन को घेरती जा रही हैं। नन्हीं बच्चियों से ले कर उम्रदराज़ महिलाओं तक के साथ बलात्कार की घटनाएं, जरा से वाद-विवाद पर सरेआम किसी को गाड़ी से बांध कर घसीटना और फिर उसे कुचल कर मार देना, एक-उूसरे पर शस्त्रों और पत्थरों से हमला करना- ये सब हिंया नही ंतो और क्या है? जबकि हिंसा हमारी संस्कृति का हिस्सा कभी नहीं रही। भारत ने हमेशा शांति और अहिंसा की अगुवाई की है। महात्मा गौतम बुद्ध की इस धरती पर हिंसा अथवा अराजकता के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए। महात्मा बुद्ध ने कहा था कि जो हिंसा को प्रश्रय देता है वह चैन की नींद कभी नहीं सो सकता। इन दिनों हिंसा का जो तांडव काश्मीर की घाटी में दिखाई दे रहा है उसके कुछ संस्करण देश के उन हिस्सों में भी नज़र आने लगे हैं जहां कभी तोड़-फोड़, उत्पात अथवा हिंसा पिछले कई दशकों से नहीं हुई थी। अफगानिस्तान के बामियांन में ऐतिहासिक बुद्ध प्रतिमा को तोड़ने वाले भले ही अहिंसा का महत्व नहीं समझें लेकिन हमें तो समझना ही होगा और हिंसात्मक प्रवृत्तियों को समाप्त करने के लिए ‘अल्ट’, ‘कंट्रोल’ और ‘डिलीट’ ये तीनों शक्तियों का प्रयोग आगे बढ़ कर करना होगा।
Charcha Plus Column of Dr Sharad Singh in "Sagar Dinkar" Daily News Paper

यदि हम भगवान बुद्ध द्वारा प्रदान किये गये पंचशील सिद्धांत को गौर से देखें तो यह जीवन के प्रति सहज दृष्टिकोण का परिचय देते हैं। यह पंचशील सिद्धांत क्या गलत है या क्या सही है की परिभाषा तय नही करते बल्कि यह हमे सिखाते हैं कि अगर हम होश रखें और जीवन को गौर से देखें तो हमारे कुछ कर्म हमको या दूसरों को दुःख पहुंचाते हैं और कुछ हमे प्रसन्नता का अनुभव भी कराते हैं । पंचशील समझौते पर 29 अप्रैल 1954 को हस्ताक्षर हुए थे। चीन के क्षेत्र तिब्बत और भारत के बीच व्यापार और आपसी संबंधों को लेकर ये समझौता हुआ था। इस समझौते की प्रस्तावना में पांच सिद्धांत थे जो अगले पांच साल तक भारत की विदेश नीति की रीढ़ रहे। इसके बाद ही हिंदी-चीनी भाई-भाई के नारे लगे और भारत ने गुट निरपेक्ष रवैया अपनाया। फिर सन् 1962 में चीन के साथ हुए युद्ध में इस संधि की मूल भावना को काफ़ी चोट पहुंची। ‘‘पंचशील’’ शब्द ऐतिहासिक बौद्ध अभिलेखों से लिया गया है जो कि बौद्ध भिक्षुओं का व्यवहार निर्धारित करने वाले पांच निषेध होते हैं। तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने वहीं से ये शब्द लिया था। इस समझौते के बारे में 31 दिसंबर 1953 और 29 अप्रैल 1954 को बैठकें हुई थीं जिसके बाद अंततः बेइजिंग में इस पर हस्ताक्षर हुएं थे। पंचशील समझौते की प्रस्तावना की वजह से जिसमें पाँच सिद्धांत हैं- एक दूसरे की अखंडता और संप्रभुता का सम्मान, परस्पर अनाक्रमण, एक दूसरे के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करना, समान और परस्पर लाभकारी संबंध, शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व।
एक चूक अवश्य हुई थी कि उस समय इस समझौते के तहत भारत ने तिब्बत को चीन का एक क्षेत्र स्वीकार कर लिया था। फिर भी उस समय इस संधि ने भारत और चीन के संबंधों के तनाव को काफ़ी हद तक दूर कर दिया था।
आज स्थितियां और अधिक जटिल हो गई हैं। भारत को अपनी प्रत्येक सीमा पर किसी न किसी खतरे से जूझना पड़ रहा है। एक ओर चीन और तिब्बत का मसला है तो दूसरी ओर काश्मीर समस्या अपने विकराल रूप में खड़ी हुई है। महात्मा बुद्ध ने मानव जीवन में सुख और शांति की स्थापना के लिए जो पांच उपदेश दिए थे उन्हें हम भूलते जा रहे हैं। उनके पांच उपदेश थे- - प्राणीमात्र के प्रति अहिंसा अपनाना।
- चोरी करने या जो दिया नही गया है उसको लेने की प्रवृत्ति से दूर रहना।
- लैंगिक दुराचार या व्यभिचार से दूर रहना ।
- असत्य बोलने से बचना।
- मादक पदार्थों से दूर रहना ।
किन्तु दशा यह है कि मानो हमने पांचों उपदेशों से मुंह मोड़ लिया है। भारत को महात्मा बुद्ध की धरती कहा जाता है। इसी धरती का अभिन्न हिस्सा है काश्मीर। इस काश्मीर को प्रकृति ने जहां आकूत सौंदर्य दिया है वहीं चंद स्वार्थी मनुष्यों ने मानो इसे नर्क की आग में झोंक दिया है। काश्मीर सदा से र्प्यटन स्थल रहा और पर्यटन के जरिए वहां के बाशिंदों ने खूब पैसे कमाए और अपनी ज़िन्दगी संवारी। भारतीय सिनेजगत के लिए काश्मीर सबसे पसंदीदा शूटिंग स्थल रहा। लेकिन पाकिस्तान के तालिबानी इरादों ने काश्मीर की सफ़ेद बर्फ़ पर जो खून की नदियां बहा रखी हैं, उसने काश्मीर की न केवल अर्थव्यवस्था बल्कि सुख-चैन को भी छीन लिया है। इन दिनों पत्थरबाजी की नृशंस घटनाओं ने काश्मीर घाटी को कलंकित कर रखा है। सड़कों पर की जाने वाली यह उपद्रवी हरकतें हमारी संस्कृति में कभी नहीं रहीं। यह हिंसात्मक विचारों के साथ सीमापार से भेजी जा रही है। अलगाववाद को पसंद करने वाले तत्व इसे निरंतर हवा दे रहे हैं। घाटी में हिंसा की साजिश के तहत सुरक्षा बलों पर पत्थरबाजी में महिला अलगाववादियों का हाथ है। श्रीनगर के साथ-साथ छात्राओं की पत्थरबाजी का यह सिलसिला उत्तरी कश्मीर और दक्षिणी कश्मीर में भी फैलाने की साजिश है। पिछले दिनों दुख्तरान-ए-मिल्लत की अध्यक्ष आसिया अंद्राबी की गिरफ्तारी भी इसी कड़ी का हिस्सा माना जा रहा है। कालेज की छात्राओं की ओर से अचानक सुरक्षा बलों पर पथराव की घटनाएं शुरू हो जाने से सुरक्षा बल इस नए ट्रेंड से चिंतित हो उठा। सुरक्षा एजेंसियों के पास इस बात के गुप्त जानकारी हैं कि घाटी में सक्रिय महिला अलगाववादियों को छात्राओं को भड़काने का जिम्मा सौंपा गया है। ये बुर्का धारण कर प्रदर्शनकारी छात्राओं की भीड़ में शामिल हो जाती हैं और सुरक्षा बलों को निशाना बनाती हैं। बुर्का होने की वजह से इनकी पहचान कर पाना आसान नहीं रहा। श्रीनगर महिला कालेज के साथ उत्तरी कश्मीर के सोपोर में भी छात्राओं ने प्रदर्शन करते हुए पत्थरबाजी की घटनाओं को अंजाम दिया। कहा जा रहा है कि सरकार के खिलाफ कश्मीरियों में गुस्से को दिखाने के लिए इन विरोध प्रदर्शनों को गति देने के लिए छात्राओं को ढाल बनाने की साजिश की गई। आसिया अंद्राबी की गिरफ्तारी के बाद महिला अलगाववादियों पर थोड़ा दबाव बढ़ा था, लेकिन अब भी हिंसा को भड़काने की साजिश के तहत इसे श्रीनगर से बाहर ले जाने की दिशा में कोशिशें चल रही हैं।
हिंसा एक संक्रामक रोग की तरह होता है। इसे वायरल होते देर नहीं लगती। इसका ताज़ा उदाहरण मध्यप्रदेश के एक संभागीय मुख्यालय #सागर के उस क्षेत्र में देखने को मिला जो कभी रजाखेड़ी ग्राम पंचायत के नाम से प्रदेश की सबसे बड़ी पंचायत रही और अब नवोदित नगरपालिका क्षेत्र है। महात्मा बुद्ध के दो सिद्धांत दिन-दहाड़े ध्वस्त होते दिखे। महात्मा बुद्ध ने मदिरापान से दूर रहने का उपदेश दिया था मगर #रजाखेड़ी में ठीक थाने के सामने शराब की दूकान खोलने जाने का लाईसेंस दिया गया। जबकि थाने के बाजू में देवी का प्राचीन मंदिर है, जहां महिलाओं और किशोरियों का निरंतर आना-जाना लगा रहता है। शराब की दूकान के विरोध में महिलाएं भी उतर आईं। शांतिपूर्ण धरना-प्रदर्शन चल रहा था किन्तु बुद्ध जयंती के ठीक दो दिन पहले वह घटना घटी जिसने काश्मीर की पत्थरबाजी को याद दिला दिया। हुआ यूं कि महिलाओं के समर्थन में #नरयावली क्षेत्र के विधायक प्रदीप लारिया भी शराब की दूकान का विरोध करने पहुंचे। तभी कुछ लोग गाड़ियों में भर कर आए और उन्होंने दूकान का विरोध करने वालों पर पत्थर बरसाने शुरू कर दिए। महिलाएं घायल हुईं, #विधायक #प्रदीप लारिया के पैर में भी पत्थर से चोट लगी और पुलिस वाले भी घायल हुए। उपद्रवियों द्वारा हवाई फायरिंग किए जाने के समाचार भी आए। इस तरह की हिंसात्मक घटना इस क्षेत्र में पहले कभी नहीं हुई। तो क्या काश्मीर में चल रही हिंसक प्रवृत्ति एक छोटे से कस्बाई क्षेत्र में भी आ पहुंची जहां हर व्यक्ति परस्पर एक-दूसरे को पसंद करता है और एक-दूसरे का खयाल रखता है। इस तरह की घटना घोर चिन्ता में डाल देने वाली है। बशर्ते यह चिन्ता उन्हें भी हो जो ऐसा घटनाओं को रोक सकते हैं। आश्चर्य की बात है कि स्थानीय प्रशान और प्रदेश शासन के बीच ये कौन-सी कूटनीति है कि एक और घने रिहायशी इलाकों में शराब की दूकानें खोलने के ठेके दिए जा रहे हैं और दूसरी ओर इसका विरोध करने वालों को धरना-प्रदर्शन की हद तक पहुंचने पर मजबूर किया जा रहा है। सत्ताधारी दल के विधायक को हिंसक उपद्रवियों के हाथों पत्थर खाने पड़ रहे हैं। इससे पहले की स्थितियां और अधिक पेंचीदा हो जाएं, इनका सुलझाया जाना अब निहायत जरूरी हो गया है। महात्मा #बुद्ध ने कहा था कि हिंसा के विचारों की जड़ों को जमने नहीं देना ही हिंसा से दूर रहने का सबसे अच्छा उपाय है।
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Monday, May 8, 2017

पुस्तक-चर्चा में ...Sharad Singh in a Book Discussion

Dr (Miss) Sharad Singh
#रविवार (07.05.2017 ) की एक #सार्थक #शाम ... जो एक #पुस्तक-चर्चा में व्यतीत हुई.... 

#Sunday .. a #meaningful #evening (07.05.2017) ... which has been spent in a book discussion ....  Dr (Miss) #SharadSingh in a #book_discussion, #Sagar, #MadhyaPradesh, #India 07.05. 2017

Dr (Miss) Sharad Singh in a book discussion, Sagar , 07.05. 21017
Dr (Miss) Sharad Singh in a book discussion, Sagar , 07.05. 21017 ..... Dainik Bhaskar, Sagar Edition, 08.05.2017
Thank You Dainik Bhaskar !!!
Dr (Miss) Sharad Singh in a book discussion, Sagar , 07.05. 21017 Navdunia,  Sagar Edition, 08.05.2017
Thank You Nav Dunia !!!

Dr (Miss) Sharad Singh in a book discussion, Sagar , 07.05. 21017 .... Patrika, Sagar Edition, 08.05.2017
Thank You Patrka !!!

 
Dr (Miss) Sharad Singh in a book discussion, Sagar , 07.05. 21017


Dr (Miss) Sharad Singh in a book discussion, Sagar , 07.05. 21017

 
Dr (Miss) Sharad Singh in a book discussion, Sagar , 07.05. 21017

Wednesday, May 3, 2017

कब तक चलेंगी पाक की नापाकियां ... - डॉ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
"कब तक चलेंगी #पाक की #नापाकियां "....."मेरे कॉलम #चर्चा_प्लस में "दैनिक सागर दिनकर" में ( 03.05. 2017) ..My Column #Charcha_Plus in "Sagar Dinkar" news paper.... चर्चा प्लस 

 
कब तक चलेंगी पाक की नापाकियां
- डॉ. शरद सिंह 


भारत और पाकिस्तान को अलग-अलग हुए लगभग 70 साल हो चुके हैं फिर भी पाकिस्तान अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहा है। सीमा पर हमलों की निरंतर घटनाओं के बाद भारतीय सेना के जवानों के शवों को क्षत-विक्षत करना उसके घिनौने इरादों को बयान करता है। जबकि सच तो यह है कि दुनिया के अधिकांश देश पाकिस्तान को आतंकवाद को पनाह देने वाला देश घोषित कर चुके हैं और स्वयं पाकिस्तान की आंतरिक दशा कोई अच्छी नहीं है, फिर भी मानो वह कोई सबक लेना ही नहीं चाहता है या फिर उकसाना चाहता है भारत को ताकि वह आतंकी देश की जगह पीड़ित का नकाब पहन सके। 
 
Charcha Plus Column of Dr Sharad Singh in "Sagar Dinkar" Daily News Paper

भारत विभाजन के सत्तर साल होना यह चाहिए था कि भारत और पाकिस्तान विकास के अपने-अपने सपनों को पूरा करते और विकसित देशों की पंक्ति में जा खड़े होते। मगर परिदृश्य इसके ठीक विपरीत है। पाकिस्तान आर्थिक, राजनीतिक एवं सामाजिक हर दिशा में पिछड़ा हुआ है। एक ब्राजीलियन कहावत है कि ‘‘हथियारों की खेती खून की नदियां बहाती है, पेट नहीं भरती।’’ यही दशा है पाकिस्तान की। साक्षरता का प्रतिशत औसत से भी कम है क्यों कि वहां की आधी आबादी यानी महिलाएं हर संभव तरीके से शिक्षा से दूर रखी जाती हैं। अगर यह सच नहीं होता तो मासूम मलाला को अपने सिर पर गोली नहीं खानी पड़ती। होना तो यही चाहिए था कि पाकिस्तान अपने नागरिकों की सुरक्षा और उनके बहुमुखी विकास के लिए समर्पित रहता लेकिन वहां के कतिपय राजनेता आतंकवादी गतिविधियों में अपनी शक्तिसम्पन्नता का आसरा ढूंढते हैं। यह माना जाता है कि विकास के मुद्दे को ले कर ही पाकिस्तान के जन्म की रूपरेखा तैयार की गई थी। मोहम्मद अली जिन्ना ने यही कहा था कि पाकिस्तान के रूप में अलग देश में रहते हुए मुस्लिम समुदाय तेजी से विकास कर सकेगा। लेकिन संभवतः मोहम्मद अली जिन्ना पाकिस्तान के भावी राजनेताओं की नीतियों का अनुमान नहीं लगा सके। भारत ने तो तरक्की की और भारत में रहने वाले मुस्लिम समुदाय ने भी तरक्की की लेकिन पाकिस्तान के नागरिकों के हाथ आया आतंकवाद और वैश्विक निंदा।
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से ही पाकिस्तान भारत से बैर रखने लगा था और कश्मीर पर कब्जा करने के इरादे से युद्ध के मैदान में भारत को ललकारता रहा। भले ही हर बार उसे मुंह की खानी पड़ी। इसीलिए जब उसे आभास हो गया कि सीधे युद्ध में भारत को पराजित करना या कश्मीर पर कब्जा करना संभव नहीं है, तब आतंकवाद को पाल-पोस कर छद्म युद्ध की राह पर चल पड़ा। एक ओर पाकिस्तान की भारत से दुश्मनी 70 साल बाद भी निरंतर जारी है वहीं दूसरी ओर, भारत में सरकारों के बदलने के साथ-साथ नीतियों में उतार-चढ़ाव आता रहा. पाकिस्तान के साथ दोस्ती के मकसद से नये-नये प्रयोग हुए, उदारता दिखाते हुए कई एकतरफा समझौते किए गए। लेकिन दुर्भाग्य से आज स्वतंत्र भारत की तीसरी पीढ़ी भी पाकिस्तान के साथ संबंधों को सामान्य करने के लिए जूझ रही है। भारत की ओर से हमेशा सद्भाव ही प्रकट किया गया। पाकिस्तान के गठन के समय नेहरू ने कहा था कि दोनों देशों में दोस्ताना रिश्ते रहेंगे, कोई वीजा-पासपोर्ट नहीं लगेगा। लेकिन, ऐसा नहीं हो पाया और नेहरू की यह सोच असफल हो गयी।
इसी तरह से अटल बिहारी वाजपेयी ने लाहौर डिक्लरेशन किया और उसके बाद लगा कि भारत-पाक के मसले पर बहुत से मसले हल हो जायेंगे, लेकिन हुआ कुछ नहीं। गुजराल डॉक्ट्रिन में भी सभी पड़ोसी देशों के साथ बातचीत और सहयोग की नीति अपनायी गयी, लेकिन वह डॉक्ट्रिन सफल नहीं हो पायी, जिसके चलते गुजराल की काफी आलोचना भी हुई थी। इसलिए इसे भी कूटनीतिक गलती कही गयी. यहां तक कि पाकिस्तान के गठन के समय नेहरू ने कहा था कि दोनों देशों में दोस्ताना रिश्ते रहेंगे, कोई वीजा-पासपोर्ट नहीं लगेगा। लेकिन, ऐसा नहीं हो पाया और नेहरू की यह सोच असफल हो गयी। नरेंद्र मोदी जी ने भी प्रधानमंत्री बनते ही पाकिस्तान के साथ संबंध सुधारने की पिछले दो साल में बहुत कोशिशें कीं। लेकिन, पाकिस्तान ने हमें पठानकोट, ताजपुर और उड़ी जैसे हमले दिए। कश्मीर की हालत अब और भी खराब हो गई है। हो सकता है कि लोग इसे प्रधानमंत्रा नरेन्द्र मोदी की कूटनीतिक गलती ठहराएं लेकिन यह कूटनीतिक गलती नहीं है। क्योंकि एक देश दूसरे देश से सद्व्यवहार की अपेक्षा ही रख सकता है, इसके लिए उसे प्रोत्साहित कर सकता है लेकिन उसे किसी प्रकार से बाध्य नहीं कर सकता है।
भारत और पाकिस्तान के बीच कई बार युद्ध छिड़ा। युद्ध की पहल पाकिस्तान ने की और जिसका शांति के साथ समापन भारत ने किया। अप्रैल, 1965 में गुजरात के कच्छ के रण के पास सीमा गश्ती दलों के बीच विवाद पैदा हो गया। अगस्त माह में स्थानीय कश्मीरियों के वेश में 26 हजार पाकिस्तानी सैनिक भारतीय सीमा में घुस आए। दोनों देशों के बीच युद्ध छिड़ गया और भारतीय सेना लाहौर स्थित अंतरराष्ट्रीय सीमा तक पहुंच गयी। कई दिनों तक चले युद्ध के बाद 22 सितंबर को संयुक्त राष्ट्र की दखल के बाद युद्ध समाप्ति की घोषणा कर दी गयी। पूर्वी पाकिस्तान के मुद्दे पर पाकिस्तान ने 1971 का युद्ध किया। ढाका में पाकिस्तानी सेना की ज्यादतियों के खिलाफ भारतीय सेना ने जवाबी कार्रवाई करनी पड़ी। इस युद्ध के परिणामस्वरूप पूर्वी पाकिस्तान बांग्लादेश के रूप में नया राष्ट्र बना। सन् 1972 में शिमला समझौता शांति बहाली के दिशा में एक सराहनीय प्रयास माना गया। वरना चाहता तो भारत बांगलादेश को अपने कब्जे में ले सकता था किन्तु उसने ऐसा नहीं किया क्यों कि भारतीय उपमहाद्वीप में शांति बनाए रखना उसका मून उद्देश्य था। फिर भी आदत से लाचार पाकिस्तान द्वारा सन् 1989 कश्मीर में आतंकवादी गतिविधियां की गईं। सन् 1999 का कारगिल युद्ध ने भारत के मन-मस्तिष्क को झकझोर दिया।
विभाजन के बाद भारत की पहल पर कई ऐसे समझौते किए गए जो कार्यरूप में पाकिस्तान द्वारा भी अपनाए जाते तो आज वातावरण इतना कटु नहीं होता। उल्लेखनीय है कि भारत और पाकिस्तान, इन दोनों देशों के सैन्य नेतृत्व के बीच 27 जुलाई, 1949 को सीजफायर समझौता किया गया था। सन् 1950 में लियाकत-नेहरू पैक्ट या दिल्ली पैक्ट के तहत दोनों देशों के बीच शरणार्थी, संपत्ति, अल्पसंख्यकों के अधिकार के मुद्दों पर समझौता किया गया था। सिंधु जल-संधि (1960) : सिंधु और उसकी अन्य सहायक नदियों के जल बंटवारों को लेकर 19 सितंबर, 1960 को सिंधु जल-संधि समझौता सम्पन्न हुआ था और आशा की गई थी कि भविष्य में सिंधु नदी के पानी के विषय पर भविष्य में कोई विवाद नहीं होगा। पाकिस्तान की ओर से यह आशा झूठी साबित हुई। फिर सन् 1965 में भारत-पाक युद्ध के बाद दोनों देशों के बीच 10 जनवरी, 1966 को ताशकंद समझौता हुआ था। सन् 1971 में हुए बांग्लादेश मुक्ति युद्ध के बाद विवादों खत्म करने के लिए शिमला में 2 जुलाई, 1972 को दोनों देश सहमत हो गये थे यह समझौता इतिहास में शिमला समझौता के नाम से विख्यात है। इसके बाद, 28 अगस्त, 1973 को भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश के बीच समझौता था दिल्ली समझौता हुआ था। सन् 1980 में भारतीय प्रधानमंत्री राजीव गांधी और पाकिस्तानी प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो के बीच 21 दिसंबर, 1988 को नॉन-न्यूक्लियर एग्रीमेंट के नाम से समझौता हुआ था जिसे ‘‘इस्लामाबाद समझौता’’ कहा जाता है।
पाकिस्तान और बांग्लादेश सहित कई देशों में भारत की नुमाइंदगी करनेवाले अनुभवी राजनयिक जेएन दीक्षित (1936-2005) ने अपनी किताब ‘भारत-पाक संबंध : युद्ध और शांति में’ में आजादी के बाद से कारगिल युद्ध तक के घटनाक्रमों और कूटनीतिक फैसलों का विश्लेषण किया है। उन्होंने अपनी पुस्तक में स्पष्ट लिखा है कि -‘‘भविष्य का अनुमान लगानेवाले एकमात्र राजनेता थे 1947 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष और भारत के प्रथम शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आजाद. उन्होंने भविष्यवाणी की थी कि पाकिस्तान का निर्माण भारत के मुसलमानों को नुकसान पहुंचायेगा और सीमा के दोनों ओर उनकी इसलामी पहचान के बारे में संकट उत्पन्न करेगा। उन्हें पूर्वाभास हो गया था कि जातीय-भाषायी और कट्टरवादी शक्तियां भारत और पाकिस्तान, खासकर पाकिस्तान को प्रभावित करेंगी। उनकी स्पष्ट धारणा थी कि भारत एवं पाकिस्तान एक दीर्घकालीन शत्रुतापूर्ण संबंधों के रास्ते पर चलेंगे।’’
भारत और पाकिस्तान को अलग-अलग हुए लगभग 70 साल हो चुके हैं फिर भी पाकिस्तान अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहा है। सीमा पर हमलों की निरंतर घटनाओं के बाद भारतीय सेना के जवानों के शवों को क्षत-विक्षत करना उसके घिनौने इरादों को बयान करता है। जबकि सच तो यह है कि दुनिया के अधिकांश देश पाकिस्तान को आतंकवाद को पनाह देने वाला देश घोषित कर चुके हैं और स्वयं पाकिस्तान की आंतरिक दशा कोई अच्छी नहीं है, फिर भी मानो वह कोई सबक लेना ही नहीं चाहता है या फिर उकसाना चाहता है भारत को ताकि वह आतंकी देश की जगह पीड़ित का नकाब पहन सके। कभी किसी निर्दोष को जासूस बता कर बंदी बना लेना और उसे अमानवीय ढंग से प्रताड़ित करना तो कभी सेना के जवानों पर हमले कर के उनके शवों का भी अपमान करना पाकिस्तान की गोया आदत बनती जा रही है। उसकी इस आदत को ध्यान में रखते हुए भारत को कुछ कड़े कदम उठाने ही होंगे। सिर्फ़ यह कहना कि अब भारत बर्दाश्त नहीं करेगा, र्प्याप्त नहीं है। पाकिस्तान की नापाकियों पर अंकुश लगाने के लिए जरूरी नहीं है कि युद्ध का बिगुल बजाया जाए। उसके विरुद्ध आर्थिक नाकेबंदी और वैश्विक दबाव भी बनाया जा सकता है जो एक शांतिपूर्ण लेकिन असरदार रास्ता होगा।
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#भारत #पाकिस्तान #कारगिल
#शिमला_समझौता #लियाकत_नेहरू_पैक्ट #दिल्ली_पैक्ट #ताशकंद_समझौता #दिल्ली_समझौता  #इस्लामाबाद_समझौता #आर्थिक_नाकेबंदी #वैश्विक_दबाव

Wednesday, April 26, 2017

कब तक खून से लाल होते रहेंगे #आदिवासी क्षेत्र... - डॉ. शरद सिंह -

Dr (Miss) Sharad Singh
" कब तक खून से लाल होते रहेंगे #आदिवासी क्षेत्र "....."मेरे कॉलम #चर्चा_प्लस में "दैनिक सागर दिनकर" में ( 26.04. 2017) ..My Column #Charcha_Plus in "Sagar Dinkar" news paper..


चर्चा प्लस
 कब तक खून से लाल होते रहेंगे आदिवासी क्षेत्र
  - डॉ. शरद सिंह                                                                                                                               
#छत्तीसगढ़ के #नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में हिंसा थमने का नाम नहीं ले रही है। #सुकमा और उसके जैसे अन्य क्षेत्र आए दिन खून से लाल हो रहे हैं। निर्दोष मासूम #आदिवासी जनता और अपनी ड्यूटी पर डटे रहने वाले बहादुर जवान दोनों के ही खून की नदियां बह रही हैं। आजकल के अत्याधुनिक इलेक्ट्रॉनिक संसाधनों जैसे ड्रोन तथा ट्रेक मशीनों के होते हुए भी नक्सली हिंसा पर लगाम नहीं लग पा रही है। स्थानीय पुलिस बल से कंधे से कंधा मिला कर सीआरपीएफ के जवान अपने प्राणों को दांव पर लगा रहे हैं लेकिन दशकों से चली आ रही समस्या ख़त्म होने के बजाए विकराल रूप धारण करती जा रही है। इस तथ्य की पड़ताल जरूरी है कि आखिर चूक कहां हो रही है? अब यह लक्ष्य निर्धारित करना ही होगा कि अब यह खूनी खेल बंद हो।

Charcha Plus Column of Dr Sharad Singh in "Sagar Dinkar" Daily News Paper
 
24 अप्रैल को #छत्तीसगढ़ के #सुकमा में #सीआरपीएफ के जवानों पर #नक्सलियों द्वारा किए गए हमले से पूरा देश बौखला उठा है। इस हमले में कुल 25 जवान शहीद हुए हैं, तो वहीं 7 जवान घायल हुए। #नक्सली भी और सीआरपीएफ के जवान भी दोनों ही भारतीय नागरिक हैं। एक ही ज़मीन के बाशिंदे और एक ही जैसी समस्याओं से जूझने वाले। यदि भुखमरी और ग़रीबी नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में है तो उन क्षेत्रों में भी हैं जहां से ये जवान भर्ती हो कर आते हैं। बहादुर दोनों हैं नक्सल ब्रिगेड में शामिल जवान भी और सीआरपीएफ के जवान भी। दोनों अपने प्राण देना जानते हैं। लेकिन सबसे बड़ा अन्ता यही है कि नक्सली ब्रिगेड के जवान अपनी ऊर्जा गलत दिशा में लगा रहे हैं। हिंसा से कभी कोई समस्या हल नहीं होती है। यदि हिंसा ही एकमात्र रास्ता होता तो महात्मा गांधी अहिंसा का मार्ग चुन कर देश की आज़ादी की बात अंग्रेजों को नहीं समझा पाते। हाल ही हुए इस हमले में जो 25 सीआरपीएफ के जवान शहीद हुए उनके बारे में क्या नक्सलियों ने कभी सोचा कि उन जवानों के भी घर-परिवार हैं। किसी के घर में बूढ़े माता-पिता तो किसी के घर में नन्हें बच्चे। स्वयं नक्सल ब्रिगेड के जवानों की हालत इससे अलग नहीं है। वे भी अनाथालय में बड़े नहीं हुए हैं, उनके भी परिवार हैं किन्तु उन्हें अपने परिवार को हिंसा की आग में झोंकते हुए हिचक नहीं होती है अथवा वे यह नहीं समझ पा रहे हैं कि उनके लिए सही रास्ता कौन-सा है। कई बार राजनीतिक स्वार्थ जाने-अनजाने हिंसा को बढ़ावा देते चले जाते हैं। नक्सली हिंसा के पीछे भी ऐसा कोई सच मौजूद हो तो कोई आश्चर्य नहीं।  
आज नक्सलियों के इतिहास पर एक नज़र डालना जरूरी है। ‘‘नक्सल’’ शब्द की उत्पत्ति पश्चिम बंगाल के छोटे से गांव #नक्सलबाड़ी से हुई है जहां भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी के नेता #चारू_मजूमदार और #कानू_सान्याल ने 1967 में सत्ता के खिलाफ़ एक सशस्त्र आंदोलन की शुरुआत की भी। जी हां, आज देश जिस नक्सलवाद से जूझ रहा है उसकी शुरुआत प. बंगाल के छोटे से गांव नक्सलबाड़ी से हुई। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के चारू मुजुमदार और कानू सान्याल ने 1967 में एक सशस्त्र आंदोलन को नक्सलबाड़ी से शुरू किया इसलिए इसका नाम नक्सलवाद हो गया। उनका मानना था कि भारतीय मज़दूरों और किसानों की दुर्दशा के लिए सरकारी नीतियां और पूरी लोकतांत्रिक व्यवस्था जिम्मेदार है। सिलिगुड़ी में पैदा हुए चारू मजूमदार आंध्र प्रदेश के तेलंगाना आंदोलन से व्यवस्था से बागी हुए। इसी के चलते 1962 में उन्हें जेल में रहना पड़ा, जहां उनकी मुलाकात कानू सान्याल से हुई। वैसे नक्सलवाद के असली जनक कानू ही माने जाते हैं। कानू का जन्म दार्जिंलिग में हुआ था। वे पश्चिम बंगाल के सीएम विधानचंद्र राय को काला झंडा दिखाने के आरोप में जेल में गए थे। कानू और चारू मुजुमदार जब बाहर आए तो उन्होंने सरकार और व्यवस्था के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह का रास्ता चुना। कानू ने 1967 में नक्सलबाड़ी में सशस्त्र आंदोलन की अगुवाई की। आगे चलकर कानू और चारू के बीच वैचारिक मतभेद बढ़ गए और दोनों ने अपनी अलग राहें, अलग पार्टियों के साथ बना लीं।
उल्लेखनीय है कि मजूमदार चीन के कम्यूनिस्ट नेता माओत्से तुंग के बहुत बड़े प्रशंसकों में से थे और उनका मानना था कि भारतीय मज़दूरों और किसानों की दुर्दशा के लिये सरकारी नीतियां जिम्मेदार हैं जिसके कारण न केवल उच्च वर्गों का शासन तंत्र स्थापित हो गया है बल्कि कृषितंत्र पर भी उन्हीं की पकड़ बन गई है। दोनों नक्सली नेताओं का मानना था कि ऐसे न्यायहीन दमनकारी वर्चस्व को केवल सशस्त्र क्रांति से ही समाप्त किया जा सकता है। सन् 1967 में नक्सलवादियों ने कम्युनिस्ट क्रांतिकारियों की एक अखिल भारतीय समन्वय समिति बनाई। इन विद्रोहियों ने औपचारिक तौर पर स्वयं को भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से अलग कर लिया और सरकार के खिलाफ़ भूमिगत होकर सशस्त्र लड़ाई छेड़ दी। सन् 1971 में सत्यनारायण सिंह के नेतृत्व में आंतरिक विद्रोह हुआ और मजूमदार की मृत्यु के बाद यह आंदोलन एकाधिक शाखाओं में विभक्त हो गया। चारू मुजुमदार की मृत्यु 1972 में हुई, जबकि कानू सान्याल ने 23 मार्च 2010 को फांसी लगा ली। यद्यपि, दोनों की मृत्यु के बाद नक्सलवादी आंदोलन भटक गया। लेकिन यह भारत के कई राज्यों आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ, उड़ीसा, झारखंड और बिहार तक फैलता गया, पर जिन वंचितों, दमितों, शोषितों के अधिकारों की लड़ाई के लिए शुरू हुआ, ना तो उनके कुछ हाथ आया, न नक्सलवादियों के। हिंसा की बुनियाद पर रखी। यह माना जाता है कि चारू मुजुमदार और कानू सान्याल की मृत्यु के बाद नक्सली मुहिम अपने मूल उद्देश्यों से भटक गई।
भारत जैसे शांतिप्रिय देश में ऐसे हिंसात्मक रास्ते को ज़मीन कैसे मिली यह एक शोध का विषय है। बहरहाल, स्थितियों एवं परिस्थितियों पर ध्यान दिया जाए तो कई प्रश्नों के उत्तर मिलने लगते हैं। यदि स्वतंत्रता प्राप्ति के कई वर्ष बाद भी देश के वनांचलों एवं दूरस्थ इलाकों में रोटी, कपड़ा, मकान, सड़क, स्वास्थ्य और रोजगार जैसी बुनियादी सुविधाओं के अभाव बना रहेगा तो जनता में असंतोष होना स्वाभावित है। शिक्षा की कमी और पेट की आग जब आपस में मिल जाती है तो बुद्धि अच्छे या बुरे में भेद करना छोड़ देती है। संसाधनों के अभाव और लालफीता शाही में फंसी व्यवस्था में बड़े पैमाने पर लोगों का शोषण, अधिकारों का हनन हुआ, जिसका नतीजा व्यवस्था से नाराजगी के रूप में सामने आया और आगे चलकर इसने विद्रोह का रूप ले लिया, जिसकी परिणित हिंसा के रूप में हुई। नक्सलवादी हिंसा में सैंकड़ो निर्दोषों की मौत हो चुकी है जबकि देश का आदिवासी समुदाय भी अप्रत्यक्ष और प्रत्यक्ष रूप से इस हिंसा का शिकार है।
यदि नक्सली प्रभावित क्षेत्रों के संदर्भ में राजनीति की बात की जाए तो आज कई नक्सली संगठन वैधानिक रूप से स्वीकृत राजनीतिक पार्टी बन गये हैं और संसदीय चुनावों में भाग भी लेते है। लेकिन बहुत से संगठन अब भी छद्म लड़ाई में लगे हुए हैं। नक्सलवाद के हिंसात्मक कार्यवाहियों की आंच से आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ, उड़ीसा, झारखंड और बिहार झुलस रहे हैं।

प्रत्येक नक्सली हमले के बाद कई सवाल उठ खड़े होते हैं। ये सवाल राजनीति, सुरक्षा और क़ानून व्यवस्था से जुड़े हुए है। इनमें आरोप हैं, प्रत्यारोप है और नाराज़गी भी शामिल रहती है। नक्सली ख़ुद स्वीकार कर चुके हैं कि नक्सलियों के विरुद्ध कथित स्वतःस्फ़ूर्त जनआंदोलन ’सलवा जुड़ूम’ से सबसे ज़्यादा लाभ ंनक्सलियों को ही हुआ। फिर आखिर ऐसे कौन-से कारण हैं कि यह समस्या दशक दर दशक हल होने की बजाय और विकट होती जाती है?
#नक्सल_समस्या का हल नहीं निकलने के दो कारण स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। एक तो ये कि राजनीतिक दलों में इस बता पर सहमति ही नहीं है कि ये समस्या सामाजिक आर्थिक समस्या है या क़ानून व्यवस्था की। इस सवाल पर विभिन्न दलों के बीच विवाद चलता रहता है जबकि यह समस्या विवाद को परे रख कर सुलझाए जाने योग्य है। जरूरी है कि इस पर सभी दलों में एक सहमति बने। ऐसा होने से कम से कम उन आदिवासी नागरिकों को राहत मिलेगी जो हिंसा के पाट में पिसे जा रहे हैं। दूसरा मुद्दा है अर्थशास्त्र का। नक्सल प्रभावित हर ज़िले को केंद्र और राज्य सरकार इतना पैसा देती है कि अगर उसे पूरी तरह खर्च किया जाए तो ज़िलों की तस्वीर बदल जाए। लेकिन यह कटु सत्य है कि अपार पैसों के बावजूद बस्तर की बहुसंख्यक आबादी बिजली, पानी और शौचालय के अभाव में जीने को विवश है। दरअसल, ऐसी मॉनीटरिंग की जरूरत है जो सरकारी पैसे पर पूरी नज़र रखे कि वह जिस मद के लिए दिया जा रहा है, उस मद में पूरा का पूरा पहुंच रहा है या नहीं तथा जिस तरह उसका उपयोग किया जाना चाहिए, उस तरह उसका समुचित उपयोग हो रहा है या नहीं।
यदि छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में हिंसा थमने का नाम नहीं ले रही है। सुकमा और उसके जैसे अन्य क्षेत्र आए दिन खून से लाल हो रहे हैं। निर्दोष मासूम आदिवासी जनता और अपनी ड्यूटी पर डटे रहने वाले बहादुर जवान दोनों के ही खून की नदियां बह रही हैं। आजकल के अत्याधुनिक इलेक्ट्रॉनिक संसाधनों जैसे ड्रोन तथा ट्रेक मशीनों के होते हुए भी नक्सली हिंसा पर लगाम नहीं लग पा रही है। स्थानीय पुलिस बल से कंधे से कंधा मिला कर सीआरपीएफ के जवान अपने प्राणों को दांव पर लगा रहे हैं लेकिन दशकों से चली आ रही समस्या ख़त्म होने के बजाए विकराल रूप धारण करती जा रही है। इस तथ्य की पड़ताल जरूरी है कि आखिर चूक कहां हो रही है? अब यह लक्ष्य निर्धारित करना ही होगा कि अब यह खूनी खेल बंद हो।
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#छत्तीसगढ़ #सुकमा #सीआरपीएफ #नक्सली #नक्सलबाड़ी #चारू_मजूमदार #कानू_सान्याल #विधानचंद्र_राय #सशस्त्र_विद्रोह 

Saturday, April 22, 2017

Thursday, April 20, 2017

भारत भवन में डॉ शरद सिंह का कहानी पाठ ... in News Papers

My Storytelling at Bharat Bhavan's News in Sagar News Papers ... 
Thank You Dainik Bhaskar, Patrika and Sagar Dinkar ... 
Your affinity always encourage me !!!
Dainik Bhaskar, Sagar Edition, 19.04.2017,
Storytelling by Dr (Miss) Sharad Singh at Bharat Bhavan, Bhopal, 15.04.2017

Patrika, Sagar Edition,  19.04.2017, Storytelling by Dr (Miss) Sharad Singh at Bharat Bhavan, Bhopal, 15.04.2017

Sagar Dinkar, Sagar Edition,  19.04.2017, Storytelling by Dr (Miss) Sharad Singh at Bharat Bhavan, Bhopal, 15.04.2017

भारत भवन में डॉ शरद सिंह का कहानी पाठ ...

Storytelling by Dr (Miss) Sharad Singh at Bharat Bhavan, Bhopal, 15.04.2017

Storytelling by Dr (Miss) Sharad Singh at Bharat Bhavan, Bhopal, 15.04.2017

Storytelling by Dr (Miss) Sharad Singh at Bharat Bhavan, Bhopal, 15.04.2017

Storytelling by Dr (Miss) Sharad Singh at Bharat Bhavan, Bhopal, 15.04.2017

Storytelling by Dr (Miss) Sharad Singh at Bharat Bhavan, Bhopal, 15.04.2017

Before Storytelling I am with authors, writers and poets at Bharat Bhavan, Bhopal, 15.04.2017
Before Storytelling Dr (Miss) Sharad Singh with authors, writers and poets at Bharat Bhavan, Bhopal, 15.04.2017
For Story Telling in 'Aadya ' function at Bharat Bhavan, Bhopal (15.04.2017) - Dr Sharad Singh.
With beautiful sculpture at Bharat Bhavan, Bhopal, 15.04.2017

उत्साही युवा लेखिका डॉ. लता अग्रवाल की Facebook Wall से उनके आत्मीय उद्गार ..... ‘‘आज वरिष्ठ साहित्यकार सुश्री शरद जी से भेंट हुई। साहित्य के विविध विषयों एवं वर्तमान लेखन को लेकर उनसे लम्बी चर्चा हुई। साथ में हैं सतना से श्रीमती सुषमा मुनीन्द्र जी। दो - दो वरिष्ठ अनुभवी साहित्यक मित्रों के साथ अविस्मरणीय पल।’’
धन्यवाद डॉ. लता...   

With Dr Lata Agrawal in my room at Hotel Palash Residency, Bhopal

With Dr Lata Agrawal in my room at Hotel Palash Residency, Bhopal

With Dr Lata Agrawal in my room at Hotel Palash Residency, Bhopal
With Dr Lata Agrawal in my room at Hotel Palash Residency, Bhopal

With poetess Poonam Aurora at Hotel Palash, Bhopal ... Occasion Aadya Samaroh, Bharat Bhavan, Bhopal, 16.04 2017

With writer Savita Singh & Sushma Munindra at Hotel Palash, Bhopal ... Occasion Aadya Samaroh, Bharat Bhavan, Bhopal MP, 16.04.2017