Wednesday, June 21, 2017

चर्चा प्लस ... योग संवारता है जीवन को ... डॉ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
International Yoga Day
 
विश्व योग दिवस (21 जून) पर विशेष :
"योग संवारता है जीवन को" ... मेरा कॉलम #चर्चा_प्लस में "दैनिक सागर दिनकर" में ( 21.06. 2017) ..My Column #Charcha_Plus in "Sagar Dinkar" news paper....

 

चर्चा प्लस
विश्व योग दिवस (21 जून) पर विशेष :
योग संवारता है जीवन को

- डॉ. शरद सिंह 

योग जीवन को संवारने की एक व्यवहारिक शैली है जो आज वैश्विक रूप् ले चुकी है। योग किसी धर्म, जाति अथवा संप्रदाय से जुड़ी क्रिया नहीं है, यह तो जीवन को शारीरिक, आध्यात्मिक और संवेदनात्मक रूप से शांत एवं समृद्ध करने की कला है और यह तथ्य इस बात से साबित भी हो चुका है कि दुनिया के अनेक देश और उनके नागरिक योग की महत्ता को स्वीकार चुके है। योग को किसी भी पूर्वाग्रह से मुक्त हो कर अपना कर अपने तनावपूर्ण जीवन को तनाव से मुक्त किया जा सकता है। दरअसल, आज के कठिन युग में योग एक लाभकारी जीवनशैली है।
Charcha Plus Column of Dr Sharad Singh in "Sagar Dinkar" Daily News Paper

इसमें कोई संदेह नहीं कि आज के उत्तरआधुनिक युग यानी इलेक्टॉनिक युग में विश्वपटल पर योग को स्थापित करने का श्रेय प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी को ही दिया जा सकता है और इस सच्चाई को स्वीकारने के लिए तमाम राजनीतिक चश्मों को परे रख कर भारतीय संस्कृति एवं मूल्यों के वैश्विक प्रसार को ध्यान में रखना होगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 14 सिंतबर 2014 को पहली बार पेश किया गया यह प्रस्ताव तीन महीने से भी कम समय में संयुक्त राष्ट्रसंघ की महासभा में पास हो गया। भारतीय राजदूत अशोक मुखर्जी ने ‘अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस’ का प्रस्ताव संयुक्त राष्ट्रसंघ की सभा में रखा था, जिसे दुनिया के 175 देशों ने भी सह-प्रस्तावित किया था। संयुक्त राष्ट्रसंघ की जनरल असेंबली में किसी भी प्रस्ताव को इतनी बड़ी संख्या में मिला समर्थन भी अपने आप में एक रिकॉर्ड बन गया। इससे पहले किसी भी प्रस्ताव को इतने बड़े पैमाने पर इतने देशों का समर्थन नहीं मिला था। यह भी पहली बार हुआ था कि किसी देश ने संयुक्त राष्ट्रसंघ असेंबली में कोई इस तरह का प्रस्ताव मात्र 90 दिनों में पास हो गया हो।
प्रश्न उठता है कि 21 जून का दिन नही योग दिवस के लिए क्यों चुना गया? तो इसका उत्तर भारतीय खगोलगणना में विद्यमान है। 21 जून को इस दिन ग्रीष्म संक्रांति होती है। इस दिन सूर्य पृथ्वी के परिप्रेक्ष्य में उत्तर से दक्षिण की ओर चलना शुरू करता है। योग के दृष्टि से यह समय संक्रमण काल माना जाता है, यानी रूपांतरण के लिए आदर्श समय। योगिक कथाओं के अनुसार योग का पहला प्रसार शिव द्वारा उनके सात शिष्यों के बीच किया गया। कहते हैं कि इन सप्त ऋषियों को ग्रीष्म संक्राति के बाद आने वाली पहली पूर्णिमा के दिन योग की दीक्षा दी गई थी, जिसे शिव के अवतरण के तौर पर भी मनाते हैं। इस प्रकृतिक घटना को दक्षिणायन के नाम से जाना जाता है।
योग एक प्राचीन कला है जिसकी उत्पत्ति भारत में लगभग 6000 साल पहले हुई थी। ऐसा माना जाता है कि जब से सभ्याता शुरू हुई है तभी से योग किया जा रहा है। योग के विज्ञान की उत्पात्ति हजारों साल पहले हुई थी, पहले धर्मों या आस्थाय के जन्मत लेने से काफी पहले हुई थी। योग विद्या में शिव को पहले योगी या आदि योगी तथा पहले गुरू या आदि गुरू के रूप में माना जाता है। वैदिक कथाओं के अनुसार कई हजार वर्ष पहले, हिमालय में कांति सरोवर झील के तटों पर आदि योगी ने अपने प्रबुद्ध ज्ञान को अपने प्रसिद्ध सप्तऋषि को प्रदान किया था। सप्तऋषियों ने योग के इस विशिष्ट ज्ञान को विश्व में प्रसारित किया। सिंधु घाटी सभ्यता के अनेक जीवाश्म, अवशेष एवं मुहरें भारत में योग की उपस्थिति को साबित करती हैं। देवी मां की मूर्तियों की मुहरें, लैंगिक प्रतीक तंत्र योग का सुझाव देते हैं। लोक परंपराओं, सिंधु घाटी सभ्येता, वैदिक एवं उपनिषद की विरासत, बौद्ध एवं जैन परंपराओं, दर्शनों, ‘महाभारत’ एवं ‘रामायण’ महाकाव्यों, शैवों, वैष्णवों की आस्तिक परंपराओं एवं तांत्रिक परंपराओं में योग का उल्लेख है। वैदिक काल के दौरान सूर्य को सबसे अधिक महत्व दिया गया। सूर्य को प्रणाम करने की विशेष पद्धति से ’सूर्य नमस्कार’ का योगिक आसन विकसित हुआ। यद्यपि पूर्व वैदिक काल में भी योग किया जाता था, महान संत महर्षि पतंजलि ने अपने योग सूत्रों के माध्यम से उस समय विद्यमान योग की प्रथाओं, उसकी क्रियाओं एवं उससे संबंधित ज्ञान को व्यवस्थित किया। पतंजलि के बाद भी अनेक योगाचार्यों ने मनुष्य के जीवन को व्यवस्थित करने के लिए योग की महत्ता को सर्वोत्तम ठहराया। कई दशकों पहले पश्चिमी दुनिया का योग से भली-भांति परिचय कराया था स्वामी विवेकानंद ने, जब उन्होंने 1893 में अमेरिका के शिकागो में विश्व धर्म संसद को संबोधित किया था। उसके बाद से पूर्व के कई गुरुओं व योगियों ने दुनियाभर में योग का प्रसार किया और दुनिया ने योग को बड़े पैमाने पर स्वीकार किया। योग पर कई अध्ययन और शोध हुए, जिन्होंने मानव कल्याण में योग के विस्तृत और दीर्घकालिक फायदों को साबित किया। किन्तु दुर्भाग्यवश अपने ही देश में योग उपेक्षित होता चला गया।
प्राचीनकाल में लोग स्वस्थ और तनावमुक्त बने रहने के लिए अपने दैनिक जीवन में योग और ध्यान के के अपनाते थे। किन्तु आज के भगमभाग और व्यस्त वातावरण में योग करना दिन प्रति दिन कम होता जा रहा है। जो व्यक्ति उत्साह के साथ योग आरम्भ कर भी देते हैं तो वे एक या दो सप्ताह में ही उससे ऊब कर पुराने ढर्रे पर आ जाते हैं। इस ऊब का सबसे बड़ा कारण यह है कि ऐसे लोग अपनी अंतःप्रेरणा से नहीं बल्कि ‘‘तथाकथित व्यवसायिक योगा’’ की चमक-दमक से प्रभावित हो कर योग को अपनाते हैं। भ्रमित हो कर आरम्भ किया गया कोई भी कार्य उसकी वास्तविक महत्ता को कभी सिद्ध नहीं कर पाता है। यदि योग की वास्तविक महत्ता को अच्छी तरह समझ लिया जाए तो पता चल जाएगा कि जीवन को बेहतर बनाने के लिए इससे अच्छा सस्ता, सुंदर और टिकाऊ उपाय औा कोई नहीं है। योग करने के लिए किसी विशेष उपकरण की आवश्यकता नहीं होती है। न ही मंहगी व्यायामशालाओं (जिम) की फीस भरने की जरूरत होती है। देश में अनेक संस्थाएं हैं जो निःशुल्क योग की शिक्षा देती हैं तथा समय-समय पर शिविर लगा कर उन क्षेत्रों में भी योग के आसनों का ज्ञान देती हैं जहां कोई भी योग-केन्द्र नहीं होते हैं।
यदि योग के आसनों को अपने शरीर एवं अपनी शारीरिक आवश्यकताओं के हिसाब से सीख, समझ लिया जाए तो योग एक बहुत ही सुरक्षित क्रिया है और किसी के भी द्वारा किसी भी समय की जा सकती है, यहां तक कि इससे बच्चे भी लाभ ले सकते हैं। योग वह क्रिया है, जिसके अन्तर्गत शरीर के विभिन्न भागों को एक साथ लाकर शरीर, मस्तिष्क और आत्मा को सन्तुलित करने का एक अभ्यास है। बिना किसी समस्या के जीवन भर तंदरुस्त रहने का सबसे अच्छा, सुरक्षित, आसान और स्वस्थ तरीका योग है। इसके लिए केवल शरीर के क्रियाकलापों और श्वास लेने के सही तरीकों का नियमित अभ्यास करने की आवश्यकता है। यह शरीर के तीन मुख्य तत्वों; शरीर, मस्तिष्क और आत्मा के बीच संपर्क को नियमित करना है। यह शरीर के सभी अंगों के कार्यकलाप को नियमित करता है और कुछ बुरी परिस्थितियों और अस्वास्थ्यकर जीवन-शैली के कारण शरीर और मस्तिष्क को परेशानियों से बचाव करता है। यह स्वास्थ्य, ज्ञान और आन्तरिक शान्ति को बनाए रखने में मदद करता है। अच्छे स्वास्थ्य प्रदान करने के द्वारा यह हमारी भौतिक आवश्यकताओं को पूरा करता है, ज्ञान के माध्यम से यह मानसिक आवश्यकताओं को पूरा करता है और आन्तरिक शान्ति के माध्यम से यह आत्मिक आवश्यकता को पूरा करता है, इस प्रकार यह हम सभी के बीच सामंजस्य बनाए रखने में मदद करता है।
योग का नियमित अभ्यास हमें अनगिनत शारीरिक और मानसिक तत्वों से होने वाली परेशानियों को दूर रखने के द्वारा बाहरी और आन्तरिक राहत प्रदान करता है। योग के विभिन्न आसन मानसिक और शारीरिक मजबूती के साथ ही अच्छाई की भावना का निर्माण करते हैं। यह मानव मस्तिष्क को तेज करता है, बौद्धिक स्तर को सुधारता है और भावनाओं को स्थिर रखकर उच्च स्तर की एकाग्रता में मदद करता है। अच्छाई की भावना मनुष्य में सहायता की प्रकृति के निर्माण करती है और इस प्रकार, सामाजिक भलाई को बढ़ावा देती है। एकाग्रता के स्तर में सुधार ध्यान में मदद करता है और मस्तिष्क को आन्तरिक शान्ति प्रदान करता है। योग प्रयोग किया गया दर्शन है, जो नियमित अभ्यास के माध्यम से स्व-अनुशासन और आत्म जागरुकता को विकसित करता है। योग का अभ्यास किसी के भी द्वारा किया जा सकता है, क्योंकि आयु, धर्म या स्वस्थ परिस्थितियों परे है। यह अनुशासन और शक्ति की भावना में सुधार के साथ ही जीवन को बिना किसी शारीरिक और मानसिक समस्याओं के स्वस्थ जीवन का अवसर प्रदान करता है। योग्य शिक्षक से एक बार अच्छी तरह सीख लेने के बाद योग करने से स्वास्स्थ्य संबंधी अनेक कठिनाइयां दूर हो जाती हैं। साथ ही इसके कोई साईड इफैक्ट भी नहीं होते हैं।
देखा जाए तो योग जीवन को संवारने की एक व्यवहारिक शैली है जो आज वैश्विक रूप ले चुकी है। योग किसी धर्म, जाति अथवा संप्रदाय से जुड़ी क्रिया नहीं है, यह तो जीवन को शारीरिक, आध्यात्मिक और संवेदनात्मक रूप से शांत एवं समृद्ध करने की कला है और यह तथ्य इस बात से साबित भी हो चुका है कि दुनिया के अनेक देश और उनके नागरिक योग की महत्ता को स्वीकार चुके है। योग को किसी भी पूर्वाग्रह से मुक्त हो कर अपना कर अपने तनावपूर्ण जीवन को तनाव से मुक्त किया जा सकता है। दरअसल, आज के कठिन युग में योग एक लाभकारी जीवनशैली है।
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#InternationalYogaDay #Yoga #योग #अंतरराष्ट्रीय_योग_दिवस

Wednesday, June 14, 2017

चर्चा प्लस ... बुंदेली वैभव को समृद्ध करता सागर ... - डॉ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
"सभी स्थानीय संस्थाएं अलग-अलग अपने-अपने स्तर पर बुंदेली के विकास के लिए निरंतर कार्य कर रही हैं लेकिन पहली बार ये एकसूत्र में बंध कर एक छत के नीचे आ खड़ी हुईं, मानो यह सागर को बुंदेलखंड का सांस्कृतिक केन्द्र बनाने के लिए कटिबद्ध हो उठी हों।"...."बुंदेली वैभव को समृद्ध करता सागर" ... मेरा कॉलम #चर्चा_प्लस में "दैनिक सागर दिनकर" में ( 14.06. 2017) ..My Column #Charcha_Plus in "Sagar Dinkar" news paper....

चर्चा प्लस
बुंदेली वैभव को समृद्ध करता सागर
- डॉ. शरद सिंह 


‘बुंदेली वैभव’ का शानदार आयोजन। इसमें बुंदेली के लोकनृत्य, लोकगीत, लोकसंगीत, कवि सम्मेलन, चर्चा-परिचर्चा, कथावाचन, अखाड़े, बाजे और लोक कलाकृतियों की झांकी भी शामिल रही। एक समग्रता थी इस पूरे आयोजन में और साथ ही अपने क्षेत्र की बोली की समृद्धि को सबके सामने लाने की उत्कट अभिलाषा भी। सभी स्थानीय संस्थाएं अलग-अलग अपने-अपने स्तर पर बुंदेली के विकास के लिए निरंतर कार्य कर रही हैं लेकिन पहली बार ये एकसूत्र में बंध कर एक छत के नीचे आ खड़ी हुईं, मानो यह सागर को बुंदेलखंड का सांस्कृतिक केन्द्र बनाने के लिए कटिबद्ध हो उठी हों। यह जरूरी भी है भावी पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने के लिए।
Charcha Plus Column of Dr Sharad Singh in "Sagar Dinkar" Daily News Paper

विगत 07 और 08 जून 2017 को सागर जिला मुख्यालय में ‘बुंदेली वैभव’ का शानदार आयोजन हुआ। इसमें बुंदेली के लोकनृत्य, लोकगीत, लोकसंगीत, कवि सम्मेलन, चर्चा-परिचर्चा, कथावाचन, अखाड़े, बाजे और लोक कलाकृतियों की झांकी भी शामिल रही। एक समग्रता थी इस पूरे आयोजन में और साथ ही अपने क्षेत्र की बोली की समृद्धि को सबके सामने लाने की उत्कट अभिलाषा भी। संस्कृति संचालनालय मध्यप्रदेश, भोपाल एवं आरुष वेलफेयर सोसायटी के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस समारोह में स्थानीय संस्थाओं ने भी आगे बढ़ कर अपना सहयोग दिया। स्थानीय संस्थाओं में श्यामलम कला, स्वर संगम, जीवनदान फाउण्डेशन, लोक रंग दर्पण, नवल प्रयास केन्द्र, चित्रांश शिक्षा समिति, रंग प्रयोग, लोक अभिनव सांस्कृतिक मंच, आर्य संस्कार समिति, आर्ष परिषद्, कलागुरू, इंक मीडिया, रंग संस्था, सर्वांगीण विकास संस्थान, रवीन्द्र भवन ट्रस्ट के साथ ही पं. ज्वाला प्रसाद ज्योतिषी कॉलेज ऑफ परफार्मिंग फाईन आर्ट्स ने अपनी क्षमता के अनुसार प्रयास किया कि ‘बुंदेली वैभव’ समारोह सफलतापूर्वक सम्पन्न हो। इस आयोजन की सफलता को देखते हुए ऐसा लगा जैसे ये सारी स्थानीय संस्थाएं बुंदेली के वैभव को सामने लाने के लिए अचानक जाग उठी हों। यद्यपि सच इससे भी अधिक रोचक है। वस्तुतः ये सभी स्थानीय संस्थाएं अलग-अलग अपने-अपने स्तर पर बुंदेली के विकास के लिए निरंतर कार्य कर रही हैं लेकिन पहली बार ये एकसूत्र में बंध कर एक छत के नीचे आ खड़ी हुईं, मानो यह सागर को बुंदेलखंड का सांस्कृतिक केन्द्र बनाने के लिए कटिबद्ध हो उठी हों। जाहिर है कि एकजुटता हमेशा अच्छे परिणाम देती है। इस एकजुटता के परिणामस्वरूप ‘बुंदेली वैभव’ समारोह ने अपनी सफलता के झंडे गाड़ दिए। साथ ही अनेक उम्मींदें भी जगा दीं।
सागर जिला मुख्यालय में वर्तमान में कई ऐसी संस्थाएं सक्रियता से काम कर रही हैं। साहित्य के क्षेत्र में मध्यप्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन की सागर इकाई, हिन्दी उर्दू मजलिस, श्यामलम कला, पाठक मंच आदि तथा संगीत के क्षेत्र में स्वर संगम जैसी संस्था महत्वपूर्ण है। वैसे श्यामलम कला संस्था बहुमुखी उद्देश्य ले कर चल रही है। यह संस्था साहित्य एवं कला के प्रत्येक क्षेत्र को निरंतर मंच प्रदान कर रही है। उल्लेखनीय है कि इस संस्था की स्थापना भी अत्यंत संवेदनात्मक आधार पर की गई थी। संस्था के संस्थापक स्व. श्यामाकांत मिश्र अभिनय के सिलसिले में मुंबई में निवास करते थे किन्तु उन्हें अपनी मातृभूमि सागर से बेहद लगाव था। उनके मन में विचार आया कि जीवित व्यक्तियों के सम्मान में तो सभी कार्यक्रम करते हैं किन्तु स्वर्गवासी व्यक्ति और यदि वह विशेष कार्य तो करता रहा किन्तु नामचीन नहीं हो सका तो उसके प्रति कोई रूचि नहीं दिखाता है। अतः उन्होंने श्रद्धांजलि कार्यक्रम को प्रमुखता देनेवाली संस्था के रूप में ‘श्यामलम कला’ संस्था की स्थापना अपने गृहनगर सागर में की। दुर्भाग्यवश वे अपनी संस्था को फलता-फूलता नहीं देख पाए किन्तु उनके दिखाए मार्ग पर चलते हुए उनके अनुज उमाकांत मिश्र, रमाकांत शास्त्री ने अपने सहयोगियों कुंदन पाराशर, कपिल बैसाखिया, डॉ मनीष झा, संतोष पाठक, श्याम पाण्डेय आदि के साथ मिल कर ‘श्यामलम कला’ के उद्देश्यों को पूरा करने का जिस ढंग से बीड़ा उठा रखा है, वह अनुकरणीय है। 


सागर ने फिल्मी दुनिया को गोविन्द नामदेव, मुकेश तिवारी और आशुतोष राणा जैसे शानदार अभिनेता दिए हैं। दिलचस्प बात ये है कि पिछले कुछ समय से शहर में लघुफिल्म निर्माण का दौर चल पड़ा है। ये फिल्में राजेश पंडित जैसे स्थानीय निर्माताओं के द्वारा बनाई जा रही है और ये फिल्में यू-ट्यूब पर अपलोड की जा रही हैं। इनमें से कई फिल्में तो सामाजिक संदेशयुक्त और बुंदेली संस्कृति के प्रति समर्पित हैं। नाटकों के क्षेत्र में भी सागर नए आयाम रच रहा है। ‘अथग’ जैसी संस्था ने नाटकों से आम जनता को जोड़ने का महत्वपूर्ण काम किया है किन्तु जब ये अभिनेता गोविन्द नामदेव ने अपने गृहनगर सागर में नाटकों का निर्देशन एवं मंचन किया तब से आमजन में नाटकों के प्रति रुचि चौगुनी हो गई है। साहित्य और संस्कृति के प्रत्येक क्षेत्र की गतिविधियों पर न जाते हुए यदि समग्र पर दृष्टिपात किया जाए तो एक ही तथ्य उभर कर आता है कि सभी सागर को साहित्यिक एवं सांस्कृतिक केन्द्र के रूप में विकसित होते देखना चाहते हैं। क्योंकि सागर बुंदेलखण्ड का अभिन्न हिस्सा है और बुंदेलखण्ड अपने आप में एक समृद्ध संस्कृति सहेजे हुए है।
दरअसल, बुंदेली बोली का विस्तार वर्तमान मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश के विभिन्न ज़िलों में है। इनमें मध्यप्रदेश के प्रमुख ज़िले हैं- पन्ना, छतरपुर, सागर, दमोह, टीकमगढ़ तथा दतिया। उत्तर प्रदेश में झांसी, जालौन, ललितपुर, हमीरपुर, बांदा तथा महोबा में बुंदेली अपने शुद्ध रूप में बोली जाती है। बुंदेली बोली में भी विभिन्न बोलियों का स्वरूप मिलता है जिन्हें बुंदेली की उपबोलियां कहा जा सकता है। ये उपबोलियां हैं- मुख्य बुंदेली, पंवारी, लुधयांती अथवा राठौरी तथा खटोला। दतिया तथा ग्वालियर के उत्तर पूर्वी क्षेत्रों में पंवार राजपूतों का वर्चस्व रहा। अतः इन क्षेत्रों में बोली जाने वाली बुंदेली को पंवारी बुंदेली कहा जाता है। इनमें चम्बल तट की बोलियों का भी प्रभाव देखने को मिलता है। हमीरपुर, राठ, चरखारी, महोबा और जालौन में लोधी राजपूतों का प्रभाव रहा अतः इन क्षेत्रों की बुंदेली लुधयांती या राठौरी के नाम से प्रचलित है। यहां बनाफरी भी बोली जाती है। पन्ना और दमोह में खटोला बुंदेली बोली जाती है। जबकि सागर, छतरपुर, टीकमगढ़, झांसी तथा हमीरपुर में मुख्य बुंदेली बोली जाती है। सर जार्ज ग्रियर्सन ने सन् 1931 ईस्वी में जनगणना के आधार पर बुंदेली का वर्गीकरण करते हुए मानक बुंदेली (मुख्य बुंदेली), पंवारी, लुधयांती , खटोला तथा मिश्रित बुंदेली का उल्लेख किया था।
किसी भी लोकभाषा अर्थात् बोली की अपनी एक जातीय पहचान होती है। यह जातीय पहचान ही उस बोली को अन्य बोलियों से अलग कर के स्वतंत्र अस्तित्व का स्वामी बनाती है। प्रत्येक बोली की अपनी एक भूमि होती है जिसमें वह पलती, बढ़ती और विकसित होती है। बुंदेली बोली की भी अपनी मूल भूमि है जिसे बुंदेलखण्ड के नाम से पुकारा जाता है। प्राचीन भारतीय इतिहास में बुन्देलखण्ड का उल्लेख दशार्ण, जेजाकभुक्ति तथा जुझौती के नाम से मिलता है। बुन्देलखण्ड के सबसे प्रतापी राजा महाराज छत्रसाल के समय बुन्देली बुन्देलखण्ड राज्य की राजभाषा का दर्जा रखती थी।
प्रत्येक बोली का अपना एक अलग साहित्य होता है जो लोक कथाओं, लोकगाथाओं, लोक गीतों, मुहावरों, कहावतों तथा समसामयिक सृजन के रूप में विद्यमान रहता है। अपने आरंभिक रूप में यह वाचिक रहता है तथा स्मृतियों के प्रवाह के साथ एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में प्रवाहित होता रहता है। बुंदेली में साहित्य का आरंभ लगभग बारहवीं शताब्दी से माना जाता है। बारहवीं शताब्दी में जगनिक ने ‘आल्हा’ काव्य का सृजन किया था जो एक उत्कृष्ट छंदबद्ध काव्य रचना है। बुंदेली बोली के अध्येताओं के अनुसार आल्हा मूलतः बुंदेली रचना है। आल्हा का वर्तमान स्वरूप वस्तुतः मिश्रित स्वरूप है। फर्रुखाबाद के अंग्रेज अधिकारी इलियट ने इसका अल्हैतों से गायन करा कर इसे लिपिबद्ध कराया तथा प्रकाशित कराया था। कवि लाल द्वारा रचित ‘छत्रप्रकाश’ अधिकांश बुंदेली में लिखा गया है। कवि केशवदास की ‘रामचंद्रिका’ तथा गोस्वामी तुलसीदास की ‘कवितावली’ में भी बुंदेली शब्दों का प्रचुर प्रयोग मिलता है। बुंदेली बोली में अनेक लोककथाएं मिलती हैं। ये लोककथाएं मूलतः जीवन के यथार्थ से जुड़े आदर्शों, नीतियों, परम्पराओं एवं विडम्बनाओं को मुखर करती हैं। रामलीला, स्वांग आदि के रूप में बुंदेली नाट्यविधा सतत प्रवाहित है।
बुन्देली लोक साहित्य गद्य और पद्य दोनों विधाओं में धनी है। जन्म से ले कर मृत्यु तक के संस्कारों का परिचय बुन्देली लोकगीतों में समाया हुआ है। बुन्देली में सामान्य जन जीवन से जुड़े संदर्भों के काव्य के साथ ही लोक गाथाएं भी सदियों से कहीं-सुनी जा रही हैं। इनमें भारतीय इतिहास के महाकाव्य काल कहे जाने वाले रामायण एवं महाभारत काल की कथाओं को भी गाथाओं के रूप में गाया जाता है। बुन्देलखण्ड में जगनिक के बाद विष्णुदास ने लगभग 14 वीं सदी में ‘महाभारत कथा’ और ‘रामायण कथा’ लिखी। विष्णुदास की महाभारत कथा को 1435 ई. रचित माना गया है। यह ‘गाथा शैली’ में दोहा, सोरठा, चौपाई तथा विविध छंदों से युक्त है।
खड़ी बोली में भी बुंदेली कथानकों का प्रयोग सदा होता रहा है। उल्लेखनीय है कि हिन्दी कथा सम्राट प्रेमचंद ने अपनी दो कहानियां बुंदेली कथानकों पर लिखी थीं। ये कहानियां हैं-‘राजा हरदौल’ और ‘रानी सारंध्रा’। बुंदेली बोली और बुंदेली वैभव की समृद्धि अकाट्य है सिर्फ ज़रूरत है तो इस समृद्धि को सहेजने के लिए लगातार प्रयासों की। बुंदेलखण्ड के भू-भाग की अपनी पहचान और अपने गौरव के संरक्षण और विकास के रूप में इस समृद्ध बुंदेली बोली के वैभव को नए आयाम मिलने ही चाहिए जिससे रोटी-रोटी की तलाश में बाहर जाने को विवश भावी पीढ़ी भी अपनी जड़ों को पहचान सके और उससे जुड़ी रह सके। यह तभी संभव है जब सागर बुंदेलखण्ड के सांस्कृतिक केन्द्र के रूप में समृद्ध करता रहे।
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Thursday, June 8, 2017

चर्चा प्लस ... अपनी गरिमा खोता आंदोलन ... - डॉ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
वर्तमान किसान आंदोलन जिस दिशा में जा रहा है, वह दुखद है ...इस विषय पर मैंने अपने कॉलम ‘चर्चा प्लस’’ में अपने विचार सामने रखे हैं ... ‘‘अपनी गरिमा खोता आंदोलन’’ ... मेरा कॉलम #चर्चा_प्लस में "दैनिक सागर दिनकर" में ( 08.06. 2017) ..My Column #Charcha_Plus in "Sagar Dinkar" news paper....

 

चर्चा प्लस
अपनी गरिमा खोता आंदोलन
- डॉ. शरद सिंह

 
अपने अधिकारों के लिए लड़ना कोई गलत बात नहीं है। प्रजातंत्र इसकी पूरी छूट देता है लेकिन वही प्रजातंत्र आंदोलनकारियों से उस सदव्यवहार की भी अपेक्षा रखता है जो आमनागरिकों की सुख-शांति के लिए ज़रूरी है। 27 हज़ार लीटर दूध सड़क पर बहा कर कोई अपना पक्ष सही कैसे ठहरा सकता है? सरकार भी मान रही है कि आंदोलन में असामाजिक तत्व घुस गए हैं जो ऐसी बेजा हरकतें कर रहे हैं। ऐसे में आंदोलनकारियों चाहिए कि वे अपने आंदोलन की गरिमा बनाए रखते हुए असामाजिक तत्वों को अलग चिन्हित होने दें। अन्यथा आंदोलन के हिस्से में अपयश ही आएगा।

यह पहली बार नहीं है कि किसान आंदोलन करने के लिए विवश हुए हैं। लेकिन यह पहला अवसर है कि मध्यप्रदेश के शांत और धैर्यवान किसानों ने बरबादी का तांडव किया हो। क्विंटलों फल और सब्ज़ियां नष्ट कर दी गईं, हज़ारों लीटर दूध सड़कों पर बहा दिया गया, रेल की पटरियां उखाड़ने भी जा पहुंचे, अपनी ड्यूटी देते पुलिसवालों पर इस तरह पत्थर बरसाए कि एक पुलिसवाले की आंख ही फूट गई, राजमार्गों पर चक्का जाम किया। यह चेहरा किसी स्वस्थ आंदोलन का तो हो ही नहीं सकता है। जब कोई बात गरिमापूर्ण ढंग से कही जाती है तो उसका असर भी सकारात्मक हांता है। जो जनता आज अपने नन्हें शिशुओं और बूढ़े, बीमार परिवाजन के लिए एक-एक बूंद दूध के लिए तरस रही है वही जनता सच्चे दिल से आंसू बहाती है जब कोई किसान कर्ज में उूब कर आत्महत्या करता है। वह दुआ करती है कि अब किसी और किसान को ऐसे आत्मघाती कदम न उठाना पड़े। मगर वर्तमान किसान आंदोलन के आंदोलनकारी क्या उसके लिए दुआएं करने वाली जनता के दुख-दर्द भूल बैठी है? जब फल, सब्ज़ी और दूध को बरबादी का निशाना बनाया गया तो यह भी बात उठी कि इससे तो अच्छा था कि इस तरह बरबाद करने के बदले ज़रूरतमंदों में बांट देते। आंदोलनकारियों के एक पक्ष ने इसे आत्मसात भी किया और अस्पताल में जा कर मरीजों में बांट दिया। निःसंदेह यह एक विवेकपूर्ण कदम कहा जा सकता है लेकिन यह तथ्य भूला नहीं जा सकता है कि फल, सब्ज़ी, दूध, दवाएं बुनियादी वस्तुओं में आते हैं। ये विलासिता की वस्तुएं नहीं हैं। ये दैनिक जीवन की आवश्यकताओं की वस्तुएं हैं। जिन पर हज़ारों बच्चों और बीमारों का जीवन निर्भर है। सामान्य सी बात है कि एक मलेरिया का मरीज़ दूध के बिना कुनैन की गरमी नहीं झेल सकता है।

Charcha Plus Column of Dr Sharad Singh in "Sagar Dinkar" Daily News Paper

यह आंदोलन महाराष्ट्र से शुरू हुआ था और अब इसने मध्यप्रदेश को अपनी चपेट में ले लिया है। आंदोलनकारियों की अनेक मांगें हैं, जिनमें कर्जमाफ़ी जैसी मांग भी शामिल है।
हमारे देश में किसान आंदोलनों का लम्बा इतिहास है। कई महत्वपूर्ण किसान आंदोलन हुए जिन्हें भारतीय इतिहास में सुनहरे अक्षरों से लिखा गया है क्यों कि वे अपने रास्ते से भटके नहीं थे। वे आमजनता को अपने साथ ले कर चले थे, उन्होंने आमजनता की सुख-शांति के मार्ग में रोड़े नहीं अटकाए थे। नील विद्रोह किसानों द्वारा किया गया एक आन्दोलन था जो बंगाल के किसानों द्वारा सन् 1859 में किया गया था। नील कृषि अधिनियम के विरोध में नदिया जिले के किसानों ने 1859 के फरवरी-मार्च में नील का एक भी बीज बोने से मना कर दिया। यह आन्दोलन पूरी तरह से अहिंसक था। सन् 1860 तक बंगाल में नील की खेती लगभग ठप पड़ गई। अंततः सन् 1860 में इसके लिए एक आयोग गठित किया गया। बिहार के बेतिया और मोतिहारी में 1905-08 तक उग्र विद्रोह हुआ। ब्लूम्सफिल्ड नामक अंग्रेज की हत्या कर दी गई जो कारखाने का प्रबन्धक था। जिससे आंदोलन को धक्का पहुंचा। अन्ततः सन् 1917-18 में गांधीजी के नेतृत्व में चम्पारन सत्याग्रह हुआ जिसके फलस्वरूप ’तिनकठिया’ नामक जबरन नील की खेती कराने की प्रथा समाप्त हुई।
गांधीजी के नेतृत्व में बिहार के चम्पारण जिले में सन् 1917-18 में एक सत्याग्रह हुआ। इसे चम्पारण सत्याग्रह के नाम से जाना जाता है। हजारों भूमिहीन मजदूर एवं गरीब किसान खाद्यान्न के बजाय नील और अन्य नकदी फसलों की खेती करने के लिये बाध्य हो गये थे। वहां पर नील की खेती करने वाले किसानों पर बहुत अत्याचार हो रहा था। अंग्रेजों की ओर से खूब शोषण हो रहा था। ऊपर से कुछ बगान मालिक भी शोषण करते थे। आंदोलन के दौरान गांधीजी ने अपने कई स्वयंसेवकों को किसानों के बीच में भेजा। यहां किसानों के बच्चों को शिक्षित करने के लिए ग्रामीण विद्यालय खोले गये। लोगों को साफ-सफाई से रहने का तरीका सिखाया गया। चंपारण के इस ऐतिहासिक संघर्ष में डॉ राजेंद्र प्रसाद, डॉ अनुग्रह नारायण सिंह, आचार्य कृपलानी समेत चंपारण के किसानों ने अहम भूमिका निभाई। चंपारन के इस गांधी अभियान से अंग्रेज सरकार परेशान हो उठी। सरकार ने मजबूर होकर एक जांच आयोग नियुक्त किया, गांधीजी को भी इसका सदस्य बनाया गया।। अंततः कानून बनाकर सभी गलत प्रथाओं को समाप्त कर दिया गया।
खेड़ा सत्याग्रह गुजरात के खेड़ा जिले में किसानों का अंग्रेज सरकार की कर-वसूली के विरुद्ध एक सत्याग्रही आन्दोलन था। यह महात्मा गांधी की प्रेरणा से वल्लभ भाई पटेल एवं अन्य नेताओं की नेतृत्व में हुआ था। इस आंदोलन के फलस्वरूप सरकार ने गरीब किसानों से लगान की वसूली बंद कर दी।
मध्यप्रदेश में इस वर्तमान किसान अांदोलन के विकृत रूप ढल जाने के बाद भी यह मानते हुए कि वास्तविक किसान इस तरह का आचरण नहीं अपना सकते हैं, यह तो उपद्रवियों का काम है, शिवराज सिंह सरकार किसानों की मांगे मानते जा रही है। भारतीय किसान संघ (बीकेएस) ने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के साथ वार्ता के बाद आंदोलन ख़त्म करने का फैसला किया। जबकि आंदोलन में अगुआ भारतीय किसान यूनियन और राष्ट्रीय किसान मज़दूर संघ ने संघर्ष का रास्ता नहीं छोड़ने का ऐलान किया। उज्जैन में बैठक के बाद तय हुआ कि किसान कृषि उपज मंडी में जो उत्पाद बेचते हैं, उनका 50 फीसदी उन्हें नकद मिलेगा जबकि 50 फीसदी आरटीजीएस के ज़रिए यानी सीधा उनके बैंक खाते में आएगा। ये भी तय हुआ कि मूंग की फसल को सरकार समर्थन मूल्य पर खरीदेगी। शिवराज सरकार ने यह भी घोषण की कि किसानों की प्याज 8 रुपए प्रति किलोग्राम की सरकारी दर से अगले आगामी 30 जून तक खरीदा जाएगा। सब्जी मंडियों में किसानों को ज्यादा आढ़त देनी पड़ती है, इसे रोकने के लिए सब्जी मंडियों को मंडी अधिनियम के दायरे में लाया जाएगा। फसल बीमा योजना को ऐच्छिक बनाने और किसानों के खिलाफ आंदोलन के दौरान दर्ज मामलों को भी वापस लेने का भी फैसला हुआ। बैठक के बाद भारतीय किसान संघ के शिवकांत दीक्षित ने घोषणा की कि चूंकि सरकार ने उनकी सारी बातें मान ली हैं इसलिए आंदोलन को स्थगित किया जाता है। वहीं राष्ट्रीय किसान मजदूर संघ ने इस समझौते की तीखी आलोचना करते हुए कहा कि सरकार इस आंदोलन से घबराकर ऐसे हथकंडे अपना रही है, वहीं भारतीय किसान यूनियन ने कहा कि हड़ताल उनके संगठन ने शुरू की थी और खत्म भी वही करेंगे।
इस आंदोलन का सबसे दुखद पक्ष यह है कि यह किसानों के प्रति जनता की सहानुभूति को क्षति पहुंचा रहा है। आंदोलन का घटनाक्रम दुखद इतिहास रचता जा रहा है। जैसे, 03 जून रात को चोइथराम मंडी के बाहर और बिजलपुर के कुछ लोगों उपद्रव और तोड़फोड़ किया गया। यद्यपि किसान सेना ने इसे अनुचित ठहराया और इस मामले से खुद को अलग कर लिया। किसान सेना के जगदीश रावलिया ने भी कहा कि जो हुआ गलत हुआ और इस उपद्रव से हमारा कोई लेना-देना नहीं है। रतलाम में रविवार रात किसान हिंसक हो गए थे। डेलनपुर में किसानों ने प्रदर्शन किया, जिस पर पुलिस ने लाठीचार्ज व आंसूगैस के गोले छोड़े। किसानों ने पथराव शुरू कर दिया। पथराव में सहायक उपनिरीक्षक पवन यादव की आंख में गंभीर चोट आई है। चार वाहनों को आग के हवाले कर दिया गया। इस दौरान भोपाल-इंदौर एक्सप्रेस-वे से गुजरने वाले वाहनों से आम, केले, अनार और सब्जियां लूटकर सड़क पर फेंकना शुरू कर दिया। धार के बदनावर में में किसानों ने हजारों लीटर दूध सड़कों पर बहा दिया और फलों के ट्रक लूट लिए। इसी तरह नीमच में किसानों ने प्रदर्शन किया, जबकि झाबुआ में किसानों और व्यापारियों के बीच झड़प हुई। हरदा में आम किसान यूनियन ने सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन किया। आंदोलन का असर यह हुआ कि आंदोलन के चौथे दिन राजधानी भोपाल में दूध की सप्लाई गड़बड़ा गई। करीब डेढ़ लाख ग्राहकों को परेशान होना पड़ा। शिमला मिर्च, टमाटर, करेला, सेम की फली, हरी मिर्च, अदरक, फूलगोभी और खीरे की आपूर्ति अधिकतर महाराष्ट्र से ही होती है लेकिन हड़ताल की वजह से बाजार में इन सब्जियों की कमी हो गई है। सोमवार को भी किसानों ने राज्य के हाईवे को रोक दिया।
किसानों कर्ज माफ किए जाने और स्वामीनाथन कमिशन की सिफारिशें लागू किए जाने की मांग कर रहे हैं। मांगे रखना और उन्हें पूरी करवाने के लिए आंदोंलन का रास्ता अपनाने में कोई दोष नहीं है लेकिन यदि आंदोलन जनहित को भूलने लगे और विध्वंसक हो जाए या फिर सरकार के झुकने के बावजूद भी उग्रता का रूख अपनाए रहे तो आंदोलन की गरिमा को ठेस पहुंचेगी ही। अपने अधिकारों के लिए लड़ना कोई गलत बात नहीं है। बहरहाल, जरूरी है कि आंदोलनकारी कम से कम जनहित में तो धैर्य से काम लें और अपने आंदोलन की गरिमा बनाए रखें।
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Thursday, June 1, 2017

चर्चा प्लस .. विश्व पर्यावरण दिवस पर विशेष : ...डॉ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
आगामी 05 June विश्व पर्यावरण दिवस पर विशेष लेख "अपनी ही डाल काटते हम" मेरे कॉलम  चर्चा_प्लस में "दैनिक सागर दिनकर" में ( 31.05. 2017) ..My Column Charcha Plus in "Sagar Dinkar" news paper....
चर्चा प्लस
विश्व पर्यावरण दिवस पर विशेष :

अपनी ही डाल काटते हम
- डॉ. शरद सिंह
कवि कालिदास के साथ जुड़ा एक किस्सा है कि वे जिस डाल पर बैठे थे उसे ही काट रहे थे, इस बात से बेखबर कि डाल कटने पर वे गिर जाएंगे। हम भी कुछ ऐसा ही तो कर रहे हैं। जो पर्यावरण हमें जीवन देता है हम उसी को तेजी के साथ नष्ट करते जा रहे हैं। #ग्लोबल_वार्मिंग, #ग्लेशियर्स_मेल्टिंग और #वेदर_चेंजिंग - ये तीनों हमारी खुद की पैदा की गई मुसीबतें हैं जो समूची दुनिया को भयावह परिणाम की ओर ले जा रही है। यदि हम अब भी नहीं चेते तो हमारे जीवन की डाल कट जाएगी और नीचे गिरने पर हमें धरती का टुकड़ा भी नहीं मिलेगा।
हम हरे-भरे जंगल को काट कर क्रांक्रीट के जंगल खड़े करते जा रहे हैं। हम अपने घरों में तापमान को नियंत्रित रखने वाली लकड़ी की खिड़कियां लगवाने के बजाए कांच की बड़ी-बड़ी ऐसी खिड़कियां लगवाना अपनी शान समझते हैं जिनसे हमारे घर अत्याधुनिक शैली के दिखने लगते हैं। जबकि अब यह वातारण वैज्ञानिकों क्षरा सिद्ध किया जा चुका है कि खिड़कियों के ये कांच सूरज की किरणों को परावर्तित कर के न केवल तापमान में वृद्धि करती हैं बल्कि आसपास के पेड़-पौधों को भी झुलसाती रहती हैं। हम अपने घरों का विस्तार करने में जुटे रहते हैं लेकिन सिकुड़ती हरियाली पर ध्या नही देते हैं जबकि ये हरियाली ही हमें जीवन-सांसे देती है।
Charcha Plus Column of Dr Sharad Singh in "Sagar Dinkar" Daily News Paper

ग्लोबल वार्मिंग का अर्थ है ‘पृथ्वी के तापमान में वृद्धि और इसके कारण मौसम में होने वाले परिवर्तन’ पृथ्वी के तापमान में हो रही इस वृद्धि जिसे 100 सालों के औसत तापमान पर 10 फारेनहाईट आँका गया है और जिसके के परिणामस्वरूप बारिश के तरीकों में बदलाव, हिमखण्डों और ग्लेशियरों के पिघलने, समुद्र के जलस्तर में वृद्धि और वनस्पति तथा जन्तु जगत पर प्रभावों के रूप के सामने आ सकते हैं। ग्रीन हाउस गैसों में सबसे ज्यादा महत्त्वपूर्ण गैस कार्बन डाइऑक्साइड है, जिसे हम जीवित प्राणी अपने सांस के साथ उत्सर्जित करते हैं। पर्यावरण वैज्ञानिकों का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में पृथ्वी पर कार्बन डाइऑक्साइड गैस की मात्रा लगातार बढ़ी है। वैज्ञानिकों द्वारा कार्बन डाइऑक्साइड के उत्सर्जन और तापमान वृद्धि में गहरा सम्बन्ध बताया जाता है। संयुक्त राष्ट्र के सदस्यों ने 2015 तक नई जलवायु संधि कराने के लिये पहला कदम उठाया है और इस पर बातचीत शुरू की है कि वे किस तरह इस लक्ष्य को पूरा करेंगे। यह संधि विकसित और विकासशील देशों पर लागू होगी। संयुक्त राष्ट्र के फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज (यू.एन.एफ.सी.सी.सी.) पर दस्तखत करने वाले 195 देशों ने बॉन में इस बात पर बहस शुरू की है कि पिछले साल दिसंबर में डरबन सम्मेलन में तय लक्ष्य पाने के लिये वह किस तरह काम करेंगे। उद्घाटन समारोह की अध्यक्षता करने वाली दक्षिण अफ्रीका की माइते एनकोआना मशाबाने ने सदस्य देशों से वार्ता के पुराने और नकारा तरीकों को छोड़ने की अपील की। उन्होंने समुद्र के बढ़ते जल स्तर की वजह से डूबने का संकट झेल रहे छोटे देशों का जिक्र करते हुए कहा, ‘‘समय कम है और हमें अपने कुछ भाइयों, खासकर छोटे द्वीपों वाले देशों की अपील को गम्भीरता से लेना है।’’
जर्मनी की पुरानी राजधानी बॉन में आयोजित सम्मेलन के अनुसार संधि की शर्त्तों को सन् 2020 से लागू कर दिया जाएगा। इसमें गरीब और अमीर देशों को ग्लोबल वार्मिंग रोकने के लिये और जहरीली गैसों के उत्सर्जन को कम करने के लिये एक ही कानूनी ढांचे में रखा जाएगा। वर्तमान में संयुक्त राष्ट्र के तहत विकसित और विकासशील देशों के लिये पर्यावरण सुरक्षा सम्बन्धी अलग-अलग कानूनी नियम हैं।
पर्यावरणीय खतरों से भारत अछूता नहीं है। हिमालय के ग्लेशियर पिघलने से खतरा बढ़ता जा रहा है। कुल 155 वर्ग किलोमीटर पर फैला ये ग्लेशियर पिछले पचास साल में करीब पंद्रह फीसदी सिकुड़ चुका है। कश्मीर में ग्लेशियरों से ढंकी जमीन में 21 प्रतिशत की कमी आई है। हिमालय के ग्लेशियर के पिघलने से भारत में आ सकती है बाढ़। हिमालय के ग्लेशियर के पिघलने से समंदर का बढ़ रहा है जल स्तर. हिमालय के ग्लेशियर के पिघलने का एक बड़ा खतरा खेती पर भी पड़ेगा। ग्लेशियर के कम होने से उत्पन्न चटियल जमीन सूरज की 80 फीसदी रोशनी को सोख लेती है जिससे तापमान बढ़ता है जबकि ग्लेशियर 80 फीसदी रोशनी को वापस परावर्तित कर देता है। परिणामतः पर्वतीय क्षेत्रों में बर्फबारी भी कम हो रही है जिससे वहां फसल चक्र बर्बाद होने का खतरा मंडरा रहा है। स्पष्ट है कि खतरा सिर्फ भारत को ही नहीं है बल्कि आसपास के दूसरे देशों को भी है। हिमालय के ग्लेशियर के पिघलने का एक बड़ा खतरा बाढ़ का भी है। ग्लेशियर से पिघला हुआ पानी एक जगह किसी झील में लगातार जमा हो सकता है जो किसी भी वक्त टूटकर अपने राह में पड़ने वाली हर चीज को तबाह कर सकता है। दुनिया का सबसे बड़ा डेल्टा सुंदरबन का अस्तित्व भी खतरे में है क्योंकि हिमालय और दुनियाभर के ग्लेशियर पिघलने की वजह से समंदर का जलस्तर भी अब बढ़ने लगा है। इसका असर सुंदरबन पर दिखने भी लगा है। हर साल 1 मिलीमीटर से लेकर 2 मिलीमीटर तक समंदर का जलस्तर बढ़ता जा रहा है। ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने से खासकर जम्मू कश्मीर का औसत तापमान लगातार बढ़ता ही जा रहा है। इंडियन स्पेस रिसर्च आर्गेनाइजेशन के स्पेस एप्लीकेशन सेंटर अहमदाबाद के सर्वे में से चौंकाने वाले तथ्य सामने आए कि कश्मीर में ग्लेशियरों से ढंकी जमीन में 21 प्रतिशत की कमी आई है। कभी अकेले जनस्कार में पांच सौ ग्लेशियर हुआ करते थे और पिछले पचास सालों में 200 ग्लेशियर खत्म हो चुके हैं। कारगिल और लद्दाख के करीब तीन सौ ग्लेशियर सोलह फीसदी पिघल चुके हैं। इससे तापमान बढ़ रहा है। पैदावार पर असर पड़ रहा है और कार्बन डाईऑक्साइड की मात्रा बढ़ रही है।
सबसे ज्यादा चिंता उत्तराखंड के ग्लेशियर्स का पिघलना है। 120 सालों में पिंडरी ग्लेशियर 2840 मीटर तक घट चुका है। यानी सालाना 23.5 मीटर के दर से ये ग्लेशियर पिघल रहा है। गंगोत्री ग्लेशिय़र जो देश की सबसे बड़ी नदी गंगा का जलस्रोत है, डेढ़ सौ सालों में 1147 मीटर नीचे आ चुका है। गंगोत्री पर किए गए एक और अध्ययन के मुताबिक 1971 से 2005 के बीच ये ग्लेशियर 565 मीटर तक पिघल चुका है, यानी हर साल गंगोत्री में 15 मीटर तक की कमी आ रही है। ठीक ऐसे ही मिलाम ग्लेशियर 85 सालों में 990 मीटर पिघल चुका है। 50 सालों में पोंटिंग ग्लेशियर 262 मीटर नीचे आ चुका है। अरवा वैली 198 मीटर घटा है जबकि संकल्प ग्लेशियर 518 मीटर तक घटा है। हिमाचल के त्रिलोकनाथ ग्लेशियर में सिर्फ 25 सालों में 400 मीटर की कमी आई है जबकि बड़ा सिंगरी ग्लेशियर सिर्फ 17 सालों में 650 मीटर तक पिघल चुका है। कुछ वर्ष पहले तक कई वैज्ञानिक जलवायु परिवर्तन को ग्लेशियर्स के पिघलने की वजह मानने से इंकार करते रहे हैं लेकिन हाल के सालों में वैज्ञानिकों के बीच ये आम राय बन चुकी है कि पिघलते ग्लेशियर्श बढ़ते तापमान का ही असर है और जल्द से जल्द इसे रोकना हम सब के लिए बेहद जरूरी है।
दुनिया के दूसरे छोर पर उत्तरपूर्व ग्रीनलैंड की एक विशाल हिमचादर बहुत तेजी से पिघलने लगी है, जिससे आगामी दशकों में अस्थिरीकरण और दुनियाभर में समुद्र का स्तर बढ़ेगा। वैज्ञानिकों ने पाया कि 2012 की गर्म हवा और समुद्र के तापमान से जाचारिया इस्ट्रोम हिम चादर नीचे समुद्रतल की ओर तेजी से खिसक रही है। इस ग्लेशियर में इतना अधिक पानी है कि दुनियाभर में समुद्र के स्तर में आधे मीटर की वृद्धि हो सकती है। पृथ्वी का औसत तापमान अभी लगभग 15 डिग्री सेल्सियस है, यद्यपि भूगर्भीय प्रमाण बताते हैं कि पूर्व में ये बहुत अधिक या कम रहा है। लेकिन अब पिछले कुछ वर्षों में जलवायु में अचानक तेज़ी से बदलाव हो रहा है।
मौसम की अपनी विशेषता होती है, लेकिन अब इसका ढंग बदल रहा है। गर्मियां लंबी होती जा रही हैं, और सर्दियां छोटी। पूरी दुनिया में ऐसा हो रहा है। यही है जलवायु परिवर्तन। 2013 में जलवायु परिवर्तन पर एक अंतरराष्ट्रीय समिति ने कंप्यूटर मॉडलिंग के आधार पर संभावित हालात का पूर्वानुमान लगाया था। उनमें से एक अनुमान सबसे अहम था कि वर्ष 1850 की तुलना में 21वीं सदी के अंत तक पृथ्वी का तापमान 1.5 डिग्री सेल्सियस बढ़ जाएगा। जलवायु परिवर्तन के प्रभाव कई रूपों में दिखते रहेंगे, जैसे - पीने के पानी की कमी, खाद्यान्न उत्पादन में कमी, बाढ़, तूफ़ान, सूखा और गर्म हवाओं में वृद्धि।
कवि कालिदास के साथ जुड़ा एक किस्सा है कि वे जिस डाल पर बैठे थे उसे ही काट रहे थे, इस बात से बेखबर कि डाल कटने पर वे गिर जाएंगे। हम भी कुछ ऐसा ही तो कर रहे हैं। जो पर्यावरण हमें जीवन देता है हम उसी को तेजी के साथ नष्ट करते जा रहे हैं। ग्लोबल वार्मिंग, ग्लेशियर्स मेल्टिंग और वेदर चेंजिंग - ये तीनों हमारी खुद की पैदा की गई मुसीबतें हैं जो समूची दुनिया को भयावह परिणाम की ओर ले जा रही है। यदि हम अब भी नहीं चेते तो हमारे जीवन की डाल कट जाएगी और नीचे गिरने पर हमें धरती का टुकड़ा भी नहीं मिलेगा। दरअसल, हमें अपने रहन-सहन के ढंग को अधिक से अधिक ‘इको फ्रेंडली’ बनाना होगा तभी हम अपनी भावी पीढ़ी को विरासत में यह पृथ्वी दे सकेंगे।
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चर्चा प्लस .. थलाइवा और दक्षिण की करवट लेती राजनीत ...डॉ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
थलाइवा और दक्षिण की करवट लेती राजनीति" मेरे कॉलम चर्चा प्लस में "दैनिक सागर दिनकर" में ( 24.05. 2017) ..My Column Charcha Plus in "Sagar Dinkar" news paper....

 
चर्चा प्लस
थलाइवा और दक्षिण की करवट लेती राजनीत
- डॉ. शरद सिंह 


थलाइवा का अर्थ ही होता है नेतृत्व करने वाला। तो क्या अब दक्षिण भारत में किसी ऐसे नेतृत्व का उदय होने जा रहा है जो उत्तर भारत की राजनीति को भी प्रभावित कर सकेगा? यूं तो दक्षिण भारत की राजनीति में किसी अभिनेता का पदार्पण कोई नई बात नहीं है, यदि नई बात है तो उत्तर भारत अथवा केन्द्रीय राजनीति की ओर से रजनीकांत को समर्थन मिलना। रजनीकांत का विशिष्ट प्रभाव दक्षिण भारत की राजनीति में एक नए युग का सूत्रपात कर सकता है, बशर्ते वे दक्षिण भारत की राजनीति कट्टर भाषावाद से ऊपर उठा सकें।

दक्षिण भारत में सिनेमा और राजनीति का एक अनेखा गठबंधन रहा है। कई फिल्मी सितारों ने अपनी सिनेमाई छवि के दम पर जनता का दिल जीता और राजनीति के सितारा बने। तमिलनाडु की पूर्व मुख्यमंत्री दिवंगत जयललिता दक्षिण भारतीय राजनीति का वो चमकता सितारा, जो जब तक जिंदा रहा अपने करिश्माई व्यक्त्वि की चमक बिखेरता रहा। जयललिता ने तमिलनाडु की राजनीति में अन्ना द्रमुक पार्टी में वह तीन बार मुख्यमंत्री की बागडोर संभाल चुकी हैं। ’अम्मा’ ने हिंदी फिल्म इज्जत के अलावा उन्होंने वेन्निरा आदिय, चिन्नादा गोम्बदे, अनबाई थेड़ी, कुमारी कोट्टम उनकी मुख्य फिल्में रहीं। तमिलनाडु की राजनीति में आज भी अम्मा का प्रभाव है। एन. टी. रामाराव दक्षिण के दिग्गज रह चुके हैं। वह एक अभिनेता, फिल्ममेकर, डायरेक्टर, एडिटर और राजनेता होने के साथ ही तीन बार आंध्र प्रदेश की सत्ता पर आसीन हुए। राजनीति में चमकने के अलावा एनटीआर ने तीन नेशनल फिल्म अवॉर्ड अपने नाम किए हैं। दखिण के एक और नामी अभिनेता चिरंजीवी राजनीति में पिछले काफी समय से सक्रिय हैं। तेलुगु एवं हिन्दी फिल्मों के अभिनेता चिरंजीवी का वास्तविक नाम है- कोणिदेल शिवशंकर वरप्रसाद। फिल्मी पारी खेलने के बाद चिरंजीवी ने भी राजनीति को अपनाया।

Charcha Plus Column of Dr Sharad Singh in "Sagar Dinkar" Daily News Paper

तमिलनाडु ही नहीं बल्कि देश की सियासत के कद्दावर नेता मुत्तुवेल करुणानिधि ऊर्फ एम.करुणानिधि दक्षिण भारत की राजनीति में अपना एक अलग प्रभाव और दबदबा बनाए रखा था। इस बेहद वरिष्ठ राजनेता की राजनीति में पहुंचने की कहानी भी बड़ी दिलचस्प है। वे पहले फिल्मि पटकथा, लेखक थे और फिल्मी पर्दे पर दिखाई गई उनकी इन्हीं कहानियों ने उनके लिए राजनीति का रास्ता तैयार किया। ईसाई समुदाय से संबंध रखने वाले करुणानिधि मूलतः एक फिल्म पटकथा लेखक रहे, लेकिन फिल्मों की यह दुनिया उन्हें ज्यादा दिनों तक रास नहीं आई और वे दक्षिण भारत के बड़े सामाजिक प्रभाव वाले नेता बन गए। करुणानिधि ईवी रामास्वायमी पेरियार के द्रविड़ आंदोलन से जुड़े और उस आंदोलन के प्रचार में उन्होंने अहम भूमिका अदा की। वे लगातार फिल्मों में विधवा पुनर्विवाह, अस्पृश्यता का उन्मूलन, आत्मसम्मान विवाह, ज़मींदारी का उन्मूलन और धार्मिक पाखंड के मुद्दे उठाते गए और लोकप्रिय होते गए।
करूणानिधि ने बाकायादा विधायक के रूप में तमिलनाडु की सियासत में प्रवेश सन् 1957 में किया, जब वे तिरुचिरापल्ली जिले के कुलिथालाई विधानसभा से जीते। इसके बाद वे 1961 में डीएमके कोषाध्यक्ष बने और 1962 में राज्य विधानसभा में विपक्ष के उपनेता बने और 1967 में जब डीएमके सत्ता में आई, तब वे सार्वजनिक कार्य मंत्री बने। उनके राजनीतिक जीवन का सबसे बड़ा बदलाव तब आया जब 1969 में डीएमके (द्रविड मुनैत्र कडगम) के संस्थापक अन्नादुरई की मौत हो गई और वे अन्ना दुरई के बाद न केवल डीएमके का न केवल चेहरा बने, बल्कि पहली बार तमिलनाडु के मुख्यमंत्री बने और राष्ट्रीय स्तर पर उनकी पहचान बनी। दक्षिणी सुपरस्टार एमजीआर ने सिनेमा की उंचाईयों को छूने के साथ ही दक्षिण भारत की राजनीति को एक नया मोड़ दिया है। अन्ना द्रमुक के संस्थापक एमजीआर ने वर्ष 1977 से 1987 तक तमिलनाडु की सत्ता में अपना वर्चस्व कायम किया है। इन दस वर्षों में उन्होंने सत्ता के गलियारों में खास जगह बनाई। साथ ही वहां की जनता का विश्वास जीता।
राष्ट्रपति चुनाव को लेकर भारत की हालिया राजनीतिक घटनाक्रम में दक्षिण भारत की राजनीति एक दिलचस्प मोड़ पर आकर खड़ी है। आंध्र प्रदेश में तेलुगु देशम, वाइएसआर कांग्रेस तथा तेलंगाना राष्ट्रीय समिति (टीआरएस) तीनों प्रमुख राजनीतिक पार्टियों ने राष्ट्रपति चुनाव के लिए भाजपा के उम्मीदवार को अपने समर्थन का वादा कर दिया है। दूसरी ओर, दक्षिण भारत की राजनीति का एक संजीदा पहलू भी है। पी चिदंबरम के पुत्र पर संकट के बादल घिर आये हैं। एआइएडीएमके के दो परस्पर विरोधी धड़े नरेंद्र मोदी एवं भाजपा सरकार को अपना समर्थन प्रदान करने की स्पर्धा कर रहे हैं. कर्नाटक में, जहां भारतीय जनता पार्टी अपनी स्थिति मजबूत करती जा रही है, वहीं कांग्रेस पूरी तरह कमजोर बन कर इस परिदृश्य से बाहर होती दिखती है।
एक दिग्गज राजनीतिज्ञ के रूप में रजनीकांत के उदय के पीछे कई दिलचस्प घटनाओं का सिलसिला जुड़ा है। यह माना जाता है कि नब्बे के दशक में रजनीकांत को मेगा-कामयाबी दो फ़िल्मों से मिली थी, ’अन्नामलाई’ और ’बाशा’. 1995 में जब ’बाशा’ फ़िल्म ब्लॉकबस्टर हो गई तो सार्वजनिक जीवन में उनकी हैसियत और लोकप्रियता तेज़ी से बढ़ी। इसी दौर में जयललिता सरकार (1991-96) से उनके टकराव के प्रसंग भी उभरे। पहला बड़ा राजनीतिक रुझान दिखाते हुए रजनीकांत ने 1996 के विधानसभा चुनावों में तमिल मनीला कांग्रेस (टीएमसी) के नेता जीके मूपनार का समर्थन कर दिया। एक टीवी इंटरव्यू में उन्होंने कहा, ’अगर जयललिता दोबारा जीतकर आईं तो तमिलनाडु को भगवान भी नहीं बचा पाएंगे।’ परिणाम चौंकाने वाले रहे। डीएमके-टीएमसी गठबंधन को ज़बरदस्त बहुमत मिला। जयललिता की पार्टी एआईएडीएमके चार सीटों पर सिमट गई और जयललिता ख़ुद अपनी सीट नहीं बचा पाईं। यद्यपि 2004 में रजनीकांत ने जयललिता से रिश्ते सामान्य करने की कोशिश की। जयललिता तब तक एक स्थायी ताक़त बन चुकी थीं और उनकी अनदेखी करना संभव नहीं था। नवंबर 2004 में रजनीकांत ने अपनी बेटी ऐश्वर्या की शादी में जयललिता को बुलाया। जयललिता पहुंचीं भी, लेकिन दोस्ती इससे आगे नहीं बढ़ी। फिर भी, अक्टूबर 2014 में जब जयललिता जेल से छूटकर आईं तो रजनीकांत ने एक चिट्ठी भेजकर उनका स्वागत किया। इसमें लिखा था, ’पोएस गार्डन में आपकी वापसी से मैं बहुत खुश हूं. आपके अच्छे वक़्त की दुआ करता हूं और आपको अच्छी सेहत और शांति की शुभकामनाएं देता हूं।’
2002 में रजनीकांत ने कावेरी जल मुद्दे पर राजनीतिक बयान दिए, विरोध प्रदर्शन किया। कर्नाटक सरकार से सुप्रीम कोर्ट का आदेश मानने की मांग करते हुए उन्होंने 9 घंटे अनशन रखा। इस अनशन में विपक्ष के कई नेता और तमिल फिल्म इंडस्ट्री के बड़े लोग उनके पीछे खड़े हुए। इसके बाद रजनीकांत ने उस वक़्त के राज्यपाल पीएस राममोहन राव को एक ज्ञापन भी दिया। उस समय रजनीकांत ने रिपोर्टरों से कहा था कि ज़रूरत पड़ी तो वह प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और कन्नड़ फिल्म इंडस्ट्री के लोगों से भी बात करेंगे। पूरे अनशन के दौरान रजनीकांत समर्थक फिल्म डायरेक्टर भट्टीराजा के खि़लाफ़ नारे लगाते रहे, जिन्होंने एक दिन पहले ’बाहरी’ रजनीकांत पर तमिल एकता को खंडित करने की कोशिशें करने का आरोप लगाया था।
मार्च 2017 में आरके नगर में उपचुनाव था। ट्विटर पर तस्वीरें चलीं जिसमें रजनीकांत अपने दोस्त और भाजपा प्रत्याशी गंगई अमारन से मिले थे। गंगई अमारन के बेटे वेंकट प्रभु ने ट्वीट करके लिखा कि ‘‘थलाइवा ने मेरे पिताजी को आशीर्वाद दिया है।’’ इससे पहले जब 2014 चुनाव से पहले नरेंद्र मोदी प्रचार पर निकले तो चेन्नई में रजनीकांत से भी मिले। मोदी ने उन्हें अपना अच्छा दोस्त और रजनी ने ख़ुद को मोदी का शुभचिंतक बताया। रजनीकांत ने कहा, ‘’सब जानते हैं कि मिस्टर मोदी एक मजबूत नेता और क़ाबिल एडमिनिस्ट्रेटर हैं। वो जो हासिल करना चाहते हैं, मैं उन्हें कामयाबी की शुभकामनाएं देता हूं।’’
रजनीकांत को क्षेत्रीय कट्टरता का भी सामना करना पड़ा है। इसका ताज़ा उदाहरण पिछले दिनों देखने को मिला। इस पर उनकी यह कहकर आलोचना हुई कि वह तमिल नहीं हैं, लेकिन खुद रजनीकांत ने कहा कि वह तमिल हैं। इस पर रजनीकांत ने अपने प्रशंसकों के साथ चर्चा के दौरान कहा था, “मुझे सोशल मीडिया पर कुछ तमिल लोगों द्वारा घृणा फैलाने पर दुख होता है. कभी नहीं सोचा था कि वे इतना गिर जाएंगे.” इसके साथ ही रजनीकांत ने कहा था कि “मैं 23 साल तक कर्नाटक में रहा और 43 साल से तमिलनाडु में रह रहा हूं। मैं कर्नाटक से एक मराठी के तौर पर यहां आया था, आप लोगों ने बहुत प्यार दिया, मुझे एक सच्चा तमिल बना दिया।” उन्होंने कहा कि वह सही समय आने पर राजनीति में आने का फैसला करेंगे।’’
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और रजनीकांत के बीच का तालमेल नया इतिहास रच सकता है क्यों कि इसे दक्षिण की राजनीति को उत्तर भारत की ओर से समर्थन के रूप में देखा जा रहा है। किन्तु इस समर्थन को बनाए रखने के लिए रजनीकांत को उदार नीतियां अपनानी होंगी। उल्लेखनीय है कि सन् 1965 में तमिलनाडु में भयंकर हिंदी विरोधी दंगे हुए. 50 के दशक में के कामराज और 70 के दशक में. एम. जी. रामचंद्रन ने हिंदी के खि़लाफ़ ज़ोरदार अभियान चलाया था। इन दोनों पूर्व मुख्यमंत्रियों ने तमिलनाडु में हिंदी पढ़ाने का विरोध किया था. लोगों से कहा गया कि इससे तमिल भाषा पिछड़ जाएगी और हिंदी हावी हो जाएगी। भाषा की इस राजनीति के नाम पर एम जी ने ख़ूब वोट भी बटोरे। रजनीकांत का विशिष्ट प्रभाव दक्षिण भारत की राजनीति में एक नए युग का सूत्रपात कर सकता है, बशर्ते वे दक्षिण भारत की राजनीति कट्टर भाषावाद से ऊपर उठा सकें।
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Wednesday, May 17, 2017

एक बयान, एक टिप्पणी और भारतीय फेमिनिज़्म - डॉ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
"एक बयान, एक टिप्पणी और भारतीय फेमिनिज़्म" मेरे कॉलम चर्चा प्लस में "दैनिक सागर दिनकर" में ( 17.05. 2017) ..My Column Charcha Plus in "Sagar Dinkar" news paper....
 


चर्चा प्लस
एक बयान, एक टिप्पणी और भारतीय फेमिनिज़्म
- डॉ. शरद सिंह 


इस बार यानी सन् 2017 के अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस और अंतर्राष्ट्रीय मातृदिवस पर अलग-अलग दो घटनाएं घटीं। दोनों में समानता यह थी कि दोनों ही भारतीय स्त्री के प्रति टिप्पणी के रूप में थीं। दोनों घटनाओं में से एक ने भारतीय नारीवादियों अर्थात् इंडियन फेमिनिस्ट्स का ध्यान खींचा तो दूसरी घटना ने शायद सिर्फ़ मेरा ध्यान खींचा क्यों कि यह दूसरी घटना सिर्फ़ मुझसे संबंधित थी। लेकिन ये दोनों घटनाएं भारतीय फेमिनिज़्म और उसके प्रति लोगों के विचारों का खुलासा करती हैं। दोनों ही अपने-अपने स्तर पर महत्वपूर्ण हैं।

Charcha Plus Column of Dr Sharad Singh in "Sagar Dinkar" Daily News Paper
इस बार यानी सन् 2017 के अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस और अंतर्राष्ट्रीय मातृदिवस पर अलग-अलग दो घटनाएं घटीं। दोनों में समानता यह थी कि दोनों ही भारतीय स्त्री के प्रति टिप्पणी के रूप में थीं। दोनों घटनाओं में से एक ने भारतीय नारीवादियों अर्थात् इंडियन फेमिनिस्ट्स का का ध्यान खींचा तो दूसरी घटना ने शायद सिर्फ़ मेरा ध्यान खींचा क्यों कि यह दूसरी घटना सिर्फ़ मुझसे संबंधित थी। लेकिन ये दोनों घटनाएं भारतीय फेमिनिज़्म और उसके प्रति लोगों के विचारों का खुलासा करती हैं। दोनों ही अपने-अपने स्तर पर महत्वपूर्ण हैं। चलिए पहले पहली घटना के बारे में चर्चा की जाए जो कि पहले घटी। यह घटना अथवा टिप्पणी 08 मार्च 2017 को सामने आई थी। महिला दिवस के मौके पर एक इंटरव्यू के दौरान शाहिद कपूर की पत्नी मीरा राजपूत ने अपने बच्चों को घर पर छोड़ ऑफिस जाने वाली महिलाओं पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि उनकी बेटी मीशा कोई ’पपी’ नहीं है जिसे वह घर पर छोड़ दें और पूरे दिन में केवल एक घंटा उसके साथ बिताएं। मीरा की टिप्पणी की सोशल मीडिया पर काफी आलोचना हुई थी। उनके अभिनेता पति शाहिद कपूर उनके बचाव में सामने आए। उल्लेखनीय है कि शाहिद कपूर ने जुलाई 2015 में दिल्ली की रहने वाली मीरा राजपूत से शादी की थी। शाहि कपूर ने कहा, “मुझे लगता है कि वह सकारात्मक तौर पर बात कर रही थी। मैं समझ सकता हूं कि लोगों का एक मजबूत दृष्टिकोण होता है और लोगों की भावनाएं आहत होती हैं लेकिन मुझे यह भी लगता है कि आज हम जिस दौर में हैं वहां हर कोई हर चीज को लेकर आहत हो जाता है।“ अभिनेता शाहिद कपूर ने कहा कि मीरा ने निजी तौर पर अपनी राय व्यक्त की थी और लोगों का इसकी आलोचना करना काफी दुखद है। अपनी बेटी मीशा की परवरिश के लिए मीरा का शुक्रिया अदा करते हुए शाहिद कपूर ने कहा, “मुझे लगता है कि पति-पत्नी के तौर पर देखा जाए तो मुझे काम पर बाहर जाना चाहिए। मीशा के लिए मीरा जो कुछ भी कर रही हैं वह ज्यादा महत्वपूर्ण और प्रासंगिक है। मैं मीशा के साथ रहना चाहता हूं, पर हम दोनों में किसी एक को काम करना पड़ेगा और वह मैं हूं।“
बात यही तक रहती तो भी गनीमत थी, लेकिन मीरा राजपूत की एक सहपाठी ने अपना गुस्सा सोशल मीडिया पर प्रकट कर दिया। मीरा की एक क्लासमेट ने एक फेसबुक पोस्ट के माध्यम से अपने विचार इन शब्दो में रखे - ‘‘मीरा तुम्हारा इंटरव्यू देखने के बाद मुझे आज बहुत गुस्सा आया। मैंने कॉलेज में तुम्हारे ही बैच में तीन साल बिताए हैं। मैं आज पूरे आत्मविश्वास से कह सकती हूं कि नारीवाद को लेकर तुम्हारी सोच में बहुत खोट है। तुमने ऐसा किया ही क्या है खुद को किसी से नैतिक रूप से श्रेष्ठ बताकर किसी मुद्दे पर बात कर सको। दुनिया के बारे में तुम्हारा संकीर्ण नजरिया बहुत कम कह पाता है। और इसे भूलना नहीं चाहिए कि किस तरह वर्किंग वुमेन के बारे में तुम्हारा बयान हमें वास्तविक सशक्तिकरण से सालों पीछे ले जाता है, जिसके बारे में तुम्हें कुछ पता ही नहीं है। ढेर सारे गुस्से के साथ, एक जागरुक फेमिनिस्ट।’’
इस ‘‘एक जागरुक फेमिनिस्ट’’ ने विचारों के समुन्दर में ऊंची-ऊंची लहरें उठा दीं। यह प्रश्न एक बार फिर जाग उठा कि आखिर ‘फेमिनिज़्म’ है क्या, वह भी भारतीय संदर्भ में? तो जाहिर है कि पहले खंगालना होगा फेमिनिज़्म को। आज नारीवाद शब्द का उच्चारण करते ही कितने ही लोगों की भौंहें सिकुड जाती है । इसका कारण यह है कि ‘ नारीवाद ’ या ‘ नारीवादी ’ विचारधारा के बारे में आज-कल अच्छी-खासी भ्रान्तियां और ग़लतफहमियां फैली हुई हैं । ‘स्त्री-मुक्ति’ और ‘नारीवाद’ इन दो शब्दों को इतना तोड़ा-मरोड़ा गया है कि आज खुद कई स्त्रियां ‘नारीवादी’ कहलाने से झिझकने लगती हैं। जबकि ‘नारीवाद’ एक ऐसा विचार है जो पुरूष और स्त्री के बीच की असमानता को स्वीकार करते हुए नारी के सशक्तिकरण की प्रक्रिया को बौद्धिक एवं क्रियात्मक रूप से प्रस्तुत करता है । नारीवाद एक विचारधारा भी है और एक आंदोलन भी । 17वीं शताब्दी में जब सब से पहली बार ‘नारीवाद’ (फेमिनिज़्म) शब्द का प्रयोग किया गया, तब उसका एक विशेष अर्थ था, आज 2012 में उसका प्रयोग बिलकुल भिन्न अर्थ में होता है। नारीवाद के संबंध में कई भ्रान्तियां एवं ग़लत धारणाएं प्रचलित हैं। जैसे- नारी स्वतंत्रता का पक्ष लेने वाली महिलाएं पश्चिमी विचारों की पोषक होती हैं, वे उन्मुक्त यौन संबंधों में विश्वास रखती हैं या फिर वे देशज परम्पराओं एवं संस्कृति की घोर विरोधी होती हैं, आदि-आदि। ऐसी भ्रांतियां अक्षरशः सही नहीं हैं। अपवाद हर क्षेत्र में होते हैं और अतिवादी भी जिन्हें हम कट्टर विचारों वाला भी कह देते हैं। लेकिन वास्तविकता में फेमिनिज़्म वह वाद या विचार है जो स्त्री को समाज में पुरुषों के बराबर अधिकार दिलाने की पैरवी करता है। यह पुरुषविरोधी कदापि नहीं है।
मीरा राजपूत ने कामकाजी महिलाओं के परिप्रेक्ष्य में घरेलू महिलाओं का पक्ष लेते हुए अपनी बात कह डाली। उनके बयान ऐसा नहीं था कि उसके विरोध में हंगामा खड़ा किया जाता। वे जिस आर्थिक तबके की हैं, वहां वे नारीवाद की पक्षधर कहलाने भर के लिए पैसे कमाएं कि यह कहां का तर्क है? यदि कोई स्त्री आर्थिक रूप से समर्थ है, सम्पन्न परिवार की है तो उसे अपनी स्वतंत्रता साबित करने के लिए नौकरी करना या व्यवसाय करना ही जरूरी नहीं है, और भी कई रास्ते हैं स्वयं की स्वतंत्रता की घोषणा करने के। कम से कम भारत जैसे देश में जहां बेरोजगारों की संख्या असंख्य होती जा रही है, मीरा राजपूत की टिप्पणी विशेष अर्थ रखती है। इस बात में भी विशेष अर्थ रखती है कि वर्तमान समाज में पारिवारिक संबंध तेजी से बिखर रहे हैं। न्यूक्लियर फैमिली की विचारधारा ने युवा पीढ़ी और पुरानी पीढ़ी के बीच गहरी खाई खोद दी है। ऐसे में बच्चे के प्रति मां द्वारा विशेष ध्यान दिया जाता जरूरी हो गया है। अब यदि नानी या दादी ने नहीं तो कम से कम मां से तो बच्चों को संस्कार मिलने ही चाहिए। इससे स्त्री की स्वतंत्रता कहीं बाधित नहीं होती है बल्कि मां और बच्चे के बीच एक अच्छा रिश्ता कायम होता है।
मां रूपी स्त्री के प्रति हमारे दृष्टिकोण में भी गड़बड़ है। यह गड़बड़ी मुझे उस दूसरी घटना से महसूस हुई जो मातृ दिवस पर एक टिप्पणी के रूप में मेरे फेसबुक पर मुझे दिखाई दी। हुआ यह कि अंतर्राष्ट्रीय मातृ दिवस पर मैंने अपनी मां की तस्वीर पोस्ट की और उसमें उनका नाम लिखा ‘‘डॉ. विद्यावती’’। मेरे एक फेसबुक फ्रेंड ने टिप्पणी की कि ‘‘आपने अपनी मां के नाम के साथ उनकी उपाधि लिख कर उनका महत्व घटा दिया।’’ यह टिप्पणी पढ़ कर मैं चकरा गई। यदि मेरी मां ने पीएच. डी. की है और मैं उनके नाम के साथ ‘डॉक्टर’ शब्द का प्रयोग कर उनकी उपाधि लिख रही हूं तो इसमें उनका महत्व कम कैसे हो गया? मैंने इस टिप्पणी के निहितार्थ को तलाशने का बहुत प्रयास किया। इसी सिलसिले में मेरा ध्यान गया कि हम साहित्य के पन्नों पर मां के चरित्र को आज भी दीन, हीन, अपढ़, दिखाते हैं। यदि मां की महानता स्थापित करना ही होती है तो ‘‘पन्ना धाय’’ का चरित्र याद दिला देते हैं। कार्पोरेट , साईबर और स्पेस की दुनिया में स्वयं की साबित करने वाली मांओं के इस युग में हम उनकी योग्यताओं को कम कर के हम उनका सही आकलन नहीं कर कर सकेंगे। एक पढ़ी-लिखी स्कॉलर और अपने बच्चों के लिए, अपने परिवार के लिए एक आईकॉन मां का रूप अपने साहित्य में क्यों नहीं दिखाते हैं जबकि हर युग में ऐसी मांएं हुई हैं और वर्तमान में तो ऐसी मांओं की कोई कमी नहीं हैं। फिर भी गोबर के उपले थापती मां, बेटे की राह ताकती दुखियारी मां और बेटे से कमतर जानकारी रखने वाली मां को ही साहित्य में अधिक स्थान दिया जाता है। कहीं यह साहित्य में पुरुषवादिता तो नहीं है?
चाहे मीरा राजपूत का बयान हो या मेरे फेसबुक पर टिप्पणी, जरूरी है इन दोनों के परिप्रेक्ष्य में भारतीय फेमिनिज़्म का आकलन करना। कहीं हम फेमिनिज़्म की मूल भावना को पीछे छोड़ कर दोहरेपन के खेमे में तो नहीं जा पहुंचे हैं? बहस लम्बी है, कई किस्तों में जा सकती है लेकिन फिलहाल चिंतन के लिए यहीं अर्द्धविराम। वैसे यदि वूमेन एक्टीविस्ट कमला भसीन के शब्दों में देखें तो- “ पितृसत्तात्मक नियंत्रण व परिवार, काम की जगह व समाज में, भौतिक व वैचारिक स्तर पर औरतों के काम, प्रजनन और यौनिकता के दमन व शोषण के प्रति जागरूकता तथा स्त्रियों व पुरूषों द्वारा इन मौजूदा परिस्थितियों को बदलने की दिशा में जागरूक सक्रियता ही नारीवाद है।”
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Thursday, May 11, 2017

महात्मा बुद्ध के देश से ‘डिलीट’ हो हिंसा ... डॉ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
Buddha Jayanti !
"महात्मा बुद्ध के देश से ‘डिलीट’ हो हिंसा" मेरे कॉलम #चर्चा_प्लस में "दैनिक सागर दिनकर" में ( 10. 05. 2017) ..My Column #Charcha_Plus in "Sagar Dinkar" news paper....
चर्चा प्लस
बुद्ध जयंती पर विशेष :
महात्मा बुद्ध के देश से ‘डिलीट’ हो हिंसा

- डॉ. शरद सिंह

हिंसा हमारी संस्कृति का हिस्सा कभी नहीं रही। भारत ने हमेशा शांति और अहिंसा की अगुवाई की है। महात्मा गौतम बुद्ध की इस धरती पर हिंसा अथवा अराजकता के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए। इन दिनों हिंसा का जो तांडव काश्मीर की घाटी में दिखाई दे रहा है उसके कुछ संस्करण देश के उन हिस्सों में भी नज़र आने लगे हैं जहां कभी तोड़-फोड़, उत्पात अथवा हिंसा पिछले कई दशकों से नहीं हुई थी। बामियांन में ऐतिहासिक बुद्ध प्रतिमा को तोड़ने वाले भले ही अहिंसा का महत्व नहीं समझें लेकिन हमें तो समझना ही होगा और हिंसात्मक प्रवृत्त्यिं को समाप्त करने के लिए ‘अल्ट’, ‘कंट्रोल’ और ‘डिलीट’ ये तीनों शक्तियों का प्रयोग हमें आगे बढ़ कर करना होगा।

ऐसा लगता है जैसे हिंसक प्रवृत्तियां आम जनता के जीवन को घेरती जा रही हैं। नन्हीं बच्चियों से ले कर उम्रदराज़ महिलाओं तक के साथ बलात्कार की घटनाएं, जरा से वाद-विवाद पर सरेआम किसी को गाड़ी से बांध कर घसीटना और फिर उसे कुचल कर मार देना, एक-उूसरे पर शस्त्रों और पत्थरों से हमला करना- ये सब हिंया नही ंतो और क्या है? जबकि हिंसा हमारी संस्कृति का हिस्सा कभी नहीं रही। भारत ने हमेशा शांति और अहिंसा की अगुवाई की है। महात्मा गौतम बुद्ध की इस धरती पर हिंसा अथवा अराजकता के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए। महात्मा बुद्ध ने कहा था कि जो हिंसा को प्रश्रय देता है वह चैन की नींद कभी नहीं सो सकता। इन दिनों हिंसा का जो तांडव काश्मीर की घाटी में दिखाई दे रहा है उसके कुछ संस्करण देश के उन हिस्सों में भी नज़र आने लगे हैं जहां कभी तोड़-फोड़, उत्पात अथवा हिंसा पिछले कई दशकों से नहीं हुई थी। अफगानिस्तान के बामियांन में ऐतिहासिक बुद्ध प्रतिमा को तोड़ने वाले भले ही अहिंसा का महत्व नहीं समझें लेकिन हमें तो समझना ही होगा और हिंसात्मक प्रवृत्तियों को समाप्त करने के लिए ‘अल्ट’, ‘कंट्रोल’ और ‘डिलीट’ ये तीनों शक्तियों का प्रयोग आगे बढ़ कर करना होगा।
Charcha Plus Column of Dr Sharad Singh in "Sagar Dinkar" Daily News Paper

यदि हम भगवान बुद्ध द्वारा प्रदान किये गये पंचशील सिद्धांत को गौर से देखें तो यह जीवन के प्रति सहज दृष्टिकोण का परिचय देते हैं। यह पंचशील सिद्धांत क्या गलत है या क्या सही है की परिभाषा तय नही करते बल्कि यह हमे सिखाते हैं कि अगर हम होश रखें और जीवन को गौर से देखें तो हमारे कुछ कर्म हमको या दूसरों को दुःख पहुंचाते हैं और कुछ हमे प्रसन्नता का अनुभव भी कराते हैं । पंचशील समझौते पर 29 अप्रैल 1954 को हस्ताक्षर हुए थे। चीन के क्षेत्र तिब्बत और भारत के बीच व्यापार और आपसी संबंधों को लेकर ये समझौता हुआ था। इस समझौते की प्रस्तावना में पांच सिद्धांत थे जो अगले पांच साल तक भारत की विदेश नीति की रीढ़ रहे। इसके बाद ही हिंदी-चीनी भाई-भाई के नारे लगे और भारत ने गुट निरपेक्ष रवैया अपनाया। फिर सन् 1962 में चीन के साथ हुए युद्ध में इस संधि की मूल भावना को काफ़ी चोट पहुंची। ‘‘पंचशील’’ शब्द ऐतिहासिक बौद्ध अभिलेखों से लिया गया है जो कि बौद्ध भिक्षुओं का व्यवहार निर्धारित करने वाले पांच निषेध होते हैं। तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने वहीं से ये शब्द लिया था। इस समझौते के बारे में 31 दिसंबर 1953 और 29 अप्रैल 1954 को बैठकें हुई थीं जिसके बाद अंततः बेइजिंग में इस पर हस्ताक्षर हुएं थे। पंचशील समझौते की प्रस्तावना की वजह से जिसमें पाँच सिद्धांत हैं- एक दूसरे की अखंडता और संप्रभुता का सम्मान, परस्पर अनाक्रमण, एक दूसरे के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करना, समान और परस्पर लाभकारी संबंध, शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व।
एक चूक अवश्य हुई थी कि उस समय इस समझौते के तहत भारत ने तिब्बत को चीन का एक क्षेत्र स्वीकार कर लिया था। फिर भी उस समय इस संधि ने भारत और चीन के संबंधों के तनाव को काफ़ी हद तक दूर कर दिया था।
आज स्थितियां और अधिक जटिल हो गई हैं। भारत को अपनी प्रत्येक सीमा पर किसी न किसी खतरे से जूझना पड़ रहा है। एक ओर चीन और तिब्बत का मसला है तो दूसरी ओर काश्मीर समस्या अपने विकराल रूप में खड़ी हुई है। महात्मा बुद्ध ने मानव जीवन में सुख और शांति की स्थापना के लिए जो पांच उपदेश दिए थे उन्हें हम भूलते जा रहे हैं। उनके पांच उपदेश थे- - प्राणीमात्र के प्रति अहिंसा अपनाना।
- चोरी करने या जो दिया नही गया है उसको लेने की प्रवृत्ति से दूर रहना।
- लैंगिक दुराचार या व्यभिचार से दूर रहना ।
- असत्य बोलने से बचना।
- मादक पदार्थों से दूर रहना ।
किन्तु दशा यह है कि मानो हमने पांचों उपदेशों से मुंह मोड़ लिया है। भारत को महात्मा बुद्ध की धरती कहा जाता है। इसी धरती का अभिन्न हिस्सा है काश्मीर। इस काश्मीर को प्रकृति ने जहां आकूत सौंदर्य दिया है वहीं चंद स्वार्थी मनुष्यों ने मानो इसे नर्क की आग में झोंक दिया है। काश्मीर सदा से र्प्यटन स्थल रहा और पर्यटन के जरिए वहां के बाशिंदों ने खूब पैसे कमाए और अपनी ज़िन्दगी संवारी। भारतीय सिनेजगत के लिए काश्मीर सबसे पसंदीदा शूटिंग स्थल रहा। लेकिन पाकिस्तान के तालिबानी इरादों ने काश्मीर की सफ़ेद बर्फ़ पर जो खून की नदियां बहा रखी हैं, उसने काश्मीर की न केवल अर्थव्यवस्था बल्कि सुख-चैन को भी छीन लिया है। इन दिनों पत्थरबाजी की नृशंस घटनाओं ने काश्मीर घाटी को कलंकित कर रखा है। सड़कों पर की जाने वाली यह उपद्रवी हरकतें हमारी संस्कृति में कभी नहीं रहीं। यह हिंसात्मक विचारों के साथ सीमापार से भेजी जा रही है। अलगाववाद को पसंद करने वाले तत्व इसे निरंतर हवा दे रहे हैं। घाटी में हिंसा की साजिश के तहत सुरक्षा बलों पर पत्थरबाजी में महिला अलगाववादियों का हाथ है। श्रीनगर के साथ-साथ छात्राओं की पत्थरबाजी का यह सिलसिला उत्तरी कश्मीर और दक्षिणी कश्मीर में भी फैलाने की साजिश है। पिछले दिनों दुख्तरान-ए-मिल्लत की अध्यक्ष आसिया अंद्राबी की गिरफ्तारी भी इसी कड़ी का हिस्सा माना जा रहा है। कालेज की छात्राओं की ओर से अचानक सुरक्षा बलों पर पथराव की घटनाएं शुरू हो जाने से सुरक्षा बल इस नए ट्रेंड से चिंतित हो उठा। सुरक्षा एजेंसियों के पास इस बात के गुप्त जानकारी हैं कि घाटी में सक्रिय महिला अलगाववादियों को छात्राओं को भड़काने का जिम्मा सौंपा गया है। ये बुर्का धारण कर प्रदर्शनकारी छात्राओं की भीड़ में शामिल हो जाती हैं और सुरक्षा बलों को निशाना बनाती हैं। बुर्का होने की वजह से इनकी पहचान कर पाना आसान नहीं रहा। श्रीनगर महिला कालेज के साथ उत्तरी कश्मीर के सोपोर में भी छात्राओं ने प्रदर्शन करते हुए पत्थरबाजी की घटनाओं को अंजाम दिया। कहा जा रहा है कि सरकार के खिलाफ कश्मीरियों में गुस्से को दिखाने के लिए इन विरोध प्रदर्शनों को गति देने के लिए छात्राओं को ढाल बनाने की साजिश की गई। आसिया अंद्राबी की गिरफ्तारी के बाद महिला अलगाववादियों पर थोड़ा दबाव बढ़ा था, लेकिन अब भी हिंसा को भड़काने की साजिश के तहत इसे श्रीनगर से बाहर ले जाने की दिशा में कोशिशें चल रही हैं।
हिंसा एक संक्रामक रोग की तरह होता है। इसे वायरल होते देर नहीं लगती। इसका ताज़ा उदाहरण मध्यप्रदेश के एक संभागीय मुख्यालय #सागर के उस क्षेत्र में देखने को मिला जो कभी रजाखेड़ी ग्राम पंचायत के नाम से प्रदेश की सबसे बड़ी पंचायत रही और अब नवोदित नगरपालिका क्षेत्र है। महात्मा बुद्ध के दो सिद्धांत दिन-दहाड़े ध्वस्त होते दिखे। महात्मा बुद्ध ने मदिरापान से दूर रहने का उपदेश दिया था मगर #रजाखेड़ी में ठीक थाने के सामने शराब की दूकान खोलने जाने का लाईसेंस दिया गया। जबकि थाने के बाजू में देवी का प्राचीन मंदिर है, जहां महिलाओं और किशोरियों का निरंतर आना-जाना लगा रहता है। शराब की दूकान के विरोध में महिलाएं भी उतर आईं। शांतिपूर्ण धरना-प्रदर्शन चल रहा था किन्तु बुद्ध जयंती के ठीक दो दिन पहले वह घटना घटी जिसने काश्मीर की पत्थरबाजी को याद दिला दिया। हुआ यूं कि महिलाओं के समर्थन में #नरयावली क्षेत्र के विधायक प्रदीप लारिया भी शराब की दूकान का विरोध करने पहुंचे। तभी कुछ लोग गाड़ियों में भर कर आए और उन्होंने दूकान का विरोध करने वालों पर पत्थर बरसाने शुरू कर दिए। महिलाएं घायल हुईं, #विधायक #प्रदीप लारिया के पैर में भी पत्थर से चोट लगी और पुलिस वाले भी घायल हुए। उपद्रवियों द्वारा हवाई फायरिंग किए जाने के समाचार भी आए। इस तरह की हिंसात्मक घटना इस क्षेत्र में पहले कभी नहीं हुई। तो क्या काश्मीर में चल रही हिंसक प्रवृत्ति एक छोटे से कस्बाई क्षेत्र में भी आ पहुंची जहां हर व्यक्ति परस्पर एक-दूसरे को पसंद करता है और एक-दूसरे का खयाल रखता है। इस तरह की घटना घोर चिन्ता में डाल देने वाली है। बशर्ते यह चिन्ता उन्हें भी हो जो ऐसा घटनाओं को रोक सकते हैं। आश्चर्य की बात है कि स्थानीय प्रशान और प्रदेश शासन के बीच ये कौन-सी कूटनीति है कि एक और घने रिहायशी इलाकों में शराब की दूकानें खोलने के ठेके दिए जा रहे हैं और दूसरी ओर इसका विरोध करने वालों को धरना-प्रदर्शन की हद तक पहुंचने पर मजबूर किया जा रहा है। सत्ताधारी दल के विधायक को हिंसक उपद्रवियों के हाथों पत्थर खाने पड़ रहे हैं। इससे पहले की स्थितियां और अधिक पेंचीदा हो जाएं, इनका सुलझाया जाना अब निहायत जरूरी हो गया है। महात्मा #बुद्ध ने कहा था कि हिंसा के विचारों की जड़ों को जमने नहीं देना ही हिंसा से दूर रहने का सबसे अच्छा उपाय है।
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Monday, May 8, 2017

पुस्तक-चर्चा में ...Sharad Singh in a Book Discussion

Dr (Miss) Sharad Singh
#रविवार (07.05.2017 ) की एक #सार्थक #शाम ... जो एक #पुस्तक-चर्चा में व्यतीत हुई.... 

#Sunday .. a #meaningful #evening (07.05.2017) ... which has been spent in a book discussion ....  Dr (Miss) #SharadSingh in a #book_discussion, #Sagar, #MadhyaPradesh, #India 07.05. 2017

Dr (Miss) Sharad Singh in a book discussion, Sagar , 07.05. 21017
Dr (Miss) Sharad Singh in a book discussion, Sagar , 07.05. 21017 ..... Dainik Bhaskar, Sagar Edition, 08.05.2017
Thank You Dainik Bhaskar !!!
Dr (Miss) Sharad Singh in a book discussion, Sagar , 07.05. 21017 Navdunia,  Sagar Edition, 08.05.2017
Thank You Nav Dunia !!!

Dr (Miss) Sharad Singh in a book discussion, Sagar , 07.05. 21017 .... Patrika, Sagar Edition, 08.05.2017
Thank You Patrka !!!

 
Dr (Miss) Sharad Singh in a book discussion, Sagar , 07.05. 21017


Dr (Miss) Sharad Singh in a book discussion, Sagar , 07.05. 21017

 
Dr (Miss) Sharad Singh in a book discussion, Sagar , 07.05. 21017

Wednesday, May 3, 2017

कब तक चलेंगी पाक की नापाकियां ... - डॉ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
"कब तक चलेंगी #पाक की #नापाकियां "....."मेरे कॉलम #चर्चा_प्लस में "दैनिक सागर दिनकर" में ( 03.05. 2017) ..My Column #Charcha_Plus in "Sagar Dinkar" news paper.... चर्चा प्लस 

 
कब तक चलेंगी पाक की नापाकियां
- डॉ. शरद सिंह 


भारत और पाकिस्तान को अलग-अलग हुए लगभग 70 साल हो चुके हैं फिर भी पाकिस्तान अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहा है। सीमा पर हमलों की निरंतर घटनाओं के बाद भारतीय सेना के जवानों के शवों को क्षत-विक्षत करना उसके घिनौने इरादों को बयान करता है। जबकि सच तो यह है कि दुनिया के अधिकांश देश पाकिस्तान को आतंकवाद को पनाह देने वाला देश घोषित कर चुके हैं और स्वयं पाकिस्तान की आंतरिक दशा कोई अच्छी नहीं है, फिर भी मानो वह कोई सबक लेना ही नहीं चाहता है या फिर उकसाना चाहता है भारत को ताकि वह आतंकी देश की जगह पीड़ित का नकाब पहन सके। 
 
Charcha Plus Column of Dr Sharad Singh in "Sagar Dinkar" Daily News Paper

भारत विभाजन के सत्तर साल होना यह चाहिए था कि भारत और पाकिस्तान विकास के अपने-अपने सपनों को पूरा करते और विकसित देशों की पंक्ति में जा खड़े होते। मगर परिदृश्य इसके ठीक विपरीत है। पाकिस्तान आर्थिक, राजनीतिक एवं सामाजिक हर दिशा में पिछड़ा हुआ है। एक ब्राजीलियन कहावत है कि ‘‘हथियारों की खेती खून की नदियां बहाती है, पेट नहीं भरती।’’ यही दशा है पाकिस्तान की। साक्षरता का प्रतिशत औसत से भी कम है क्यों कि वहां की आधी आबादी यानी महिलाएं हर संभव तरीके से शिक्षा से दूर रखी जाती हैं। अगर यह सच नहीं होता तो मासूम मलाला को अपने सिर पर गोली नहीं खानी पड़ती। होना तो यही चाहिए था कि पाकिस्तान अपने नागरिकों की सुरक्षा और उनके बहुमुखी विकास के लिए समर्पित रहता लेकिन वहां के कतिपय राजनेता आतंकवादी गतिविधियों में अपनी शक्तिसम्पन्नता का आसरा ढूंढते हैं। यह माना जाता है कि विकास के मुद्दे को ले कर ही पाकिस्तान के जन्म की रूपरेखा तैयार की गई थी। मोहम्मद अली जिन्ना ने यही कहा था कि पाकिस्तान के रूप में अलग देश में रहते हुए मुस्लिम समुदाय तेजी से विकास कर सकेगा। लेकिन संभवतः मोहम्मद अली जिन्ना पाकिस्तान के भावी राजनेताओं की नीतियों का अनुमान नहीं लगा सके। भारत ने तो तरक्की की और भारत में रहने वाले मुस्लिम समुदाय ने भी तरक्की की लेकिन पाकिस्तान के नागरिकों के हाथ आया आतंकवाद और वैश्विक निंदा।
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से ही पाकिस्तान भारत से बैर रखने लगा था और कश्मीर पर कब्जा करने के इरादे से युद्ध के मैदान में भारत को ललकारता रहा। भले ही हर बार उसे मुंह की खानी पड़ी। इसीलिए जब उसे आभास हो गया कि सीधे युद्ध में भारत को पराजित करना या कश्मीर पर कब्जा करना संभव नहीं है, तब आतंकवाद को पाल-पोस कर छद्म युद्ध की राह पर चल पड़ा। एक ओर पाकिस्तान की भारत से दुश्मनी 70 साल बाद भी निरंतर जारी है वहीं दूसरी ओर, भारत में सरकारों के बदलने के साथ-साथ नीतियों में उतार-चढ़ाव आता रहा. पाकिस्तान के साथ दोस्ती के मकसद से नये-नये प्रयोग हुए, उदारता दिखाते हुए कई एकतरफा समझौते किए गए। लेकिन दुर्भाग्य से आज स्वतंत्र भारत की तीसरी पीढ़ी भी पाकिस्तान के साथ संबंधों को सामान्य करने के लिए जूझ रही है। भारत की ओर से हमेशा सद्भाव ही प्रकट किया गया। पाकिस्तान के गठन के समय नेहरू ने कहा था कि दोनों देशों में दोस्ताना रिश्ते रहेंगे, कोई वीजा-पासपोर्ट नहीं लगेगा। लेकिन, ऐसा नहीं हो पाया और नेहरू की यह सोच असफल हो गयी।
इसी तरह से अटल बिहारी वाजपेयी ने लाहौर डिक्लरेशन किया और उसके बाद लगा कि भारत-पाक के मसले पर बहुत से मसले हल हो जायेंगे, लेकिन हुआ कुछ नहीं। गुजराल डॉक्ट्रिन में भी सभी पड़ोसी देशों के साथ बातचीत और सहयोग की नीति अपनायी गयी, लेकिन वह डॉक्ट्रिन सफल नहीं हो पायी, जिसके चलते गुजराल की काफी आलोचना भी हुई थी। इसलिए इसे भी कूटनीतिक गलती कही गयी. यहां तक कि पाकिस्तान के गठन के समय नेहरू ने कहा था कि दोनों देशों में दोस्ताना रिश्ते रहेंगे, कोई वीजा-पासपोर्ट नहीं लगेगा। लेकिन, ऐसा नहीं हो पाया और नेहरू की यह सोच असफल हो गयी। नरेंद्र मोदी जी ने भी प्रधानमंत्री बनते ही पाकिस्तान के साथ संबंध सुधारने की पिछले दो साल में बहुत कोशिशें कीं। लेकिन, पाकिस्तान ने हमें पठानकोट, ताजपुर और उड़ी जैसे हमले दिए। कश्मीर की हालत अब और भी खराब हो गई है। हो सकता है कि लोग इसे प्रधानमंत्रा नरेन्द्र मोदी की कूटनीतिक गलती ठहराएं लेकिन यह कूटनीतिक गलती नहीं है। क्योंकि एक देश दूसरे देश से सद्व्यवहार की अपेक्षा ही रख सकता है, इसके लिए उसे प्रोत्साहित कर सकता है लेकिन उसे किसी प्रकार से बाध्य नहीं कर सकता है।
भारत और पाकिस्तान के बीच कई बार युद्ध छिड़ा। युद्ध की पहल पाकिस्तान ने की और जिसका शांति के साथ समापन भारत ने किया। अप्रैल, 1965 में गुजरात के कच्छ के रण के पास सीमा गश्ती दलों के बीच विवाद पैदा हो गया। अगस्त माह में स्थानीय कश्मीरियों के वेश में 26 हजार पाकिस्तानी सैनिक भारतीय सीमा में घुस आए। दोनों देशों के बीच युद्ध छिड़ गया और भारतीय सेना लाहौर स्थित अंतरराष्ट्रीय सीमा तक पहुंच गयी। कई दिनों तक चले युद्ध के बाद 22 सितंबर को संयुक्त राष्ट्र की दखल के बाद युद्ध समाप्ति की घोषणा कर दी गयी। पूर्वी पाकिस्तान के मुद्दे पर पाकिस्तान ने 1971 का युद्ध किया। ढाका में पाकिस्तानी सेना की ज्यादतियों के खिलाफ भारतीय सेना ने जवाबी कार्रवाई करनी पड़ी। इस युद्ध के परिणामस्वरूप पूर्वी पाकिस्तान बांग्लादेश के रूप में नया राष्ट्र बना। सन् 1972 में शिमला समझौता शांति बहाली के दिशा में एक सराहनीय प्रयास माना गया। वरना चाहता तो भारत बांगलादेश को अपने कब्जे में ले सकता था किन्तु उसने ऐसा नहीं किया क्यों कि भारतीय उपमहाद्वीप में शांति बनाए रखना उसका मून उद्देश्य था। फिर भी आदत से लाचार पाकिस्तान द्वारा सन् 1989 कश्मीर में आतंकवादी गतिविधियां की गईं। सन् 1999 का कारगिल युद्ध ने भारत के मन-मस्तिष्क को झकझोर दिया।
विभाजन के बाद भारत की पहल पर कई ऐसे समझौते किए गए जो कार्यरूप में पाकिस्तान द्वारा भी अपनाए जाते तो आज वातावरण इतना कटु नहीं होता। उल्लेखनीय है कि भारत और पाकिस्तान, इन दोनों देशों के सैन्य नेतृत्व के बीच 27 जुलाई, 1949 को सीजफायर समझौता किया गया था। सन् 1950 में लियाकत-नेहरू पैक्ट या दिल्ली पैक्ट के तहत दोनों देशों के बीच शरणार्थी, संपत्ति, अल्पसंख्यकों के अधिकार के मुद्दों पर समझौता किया गया था। सिंधु जल-संधि (1960) : सिंधु और उसकी अन्य सहायक नदियों के जल बंटवारों को लेकर 19 सितंबर, 1960 को सिंधु जल-संधि समझौता सम्पन्न हुआ था और आशा की गई थी कि भविष्य में सिंधु नदी के पानी के विषय पर भविष्य में कोई विवाद नहीं होगा। पाकिस्तान की ओर से यह आशा झूठी साबित हुई। फिर सन् 1965 में भारत-पाक युद्ध के बाद दोनों देशों के बीच 10 जनवरी, 1966 को ताशकंद समझौता हुआ था। सन् 1971 में हुए बांग्लादेश मुक्ति युद्ध के बाद विवादों खत्म करने के लिए शिमला में 2 जुलाई, 1972 को दोनों देश सहमत हो गये थे यह समझौता इतिहास में शिमला समझौता के नाम से विख्यात है। इसके बाद, 28 अगस्त, 1973 को भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश के बीच समझौता था दिल्ली समझौता हुआ था। सन् 1980 में भारतीय प्रधानमंत्री राजीव गांधी और पाकिस्तानी प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो के बीच 21 दिसंबर, 1988 को नॉन-न्यूक्लियर एग्रीमेंट के नाम से समझौता हुआ था जिसे ‘‘इस्लामाबाद समझौता’’ कहा जाता है।
पाकिस्तान और बांग्लादेश सहित कई देशों में भारत की नुमाइंदगी करनेवाले अनुभवी राजनयिक जेएन दीक्षित (1936-2005) ने अपनी किताब ‘भारत-पाक संबंध : युद्ध और शांति में’ में आजादी के बाद से कारगिल युद्ध तक के घटनाक्रमों और कूटनीतिक फैसलों का विश्लेषण किया है। उन्होंने अपनी पुस्तक में स्पष्ट लिखा है कि -‘‘भविष्य का अनुमान लगानेवाले एकमात्र राजनेता थे 1947 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष और भारत के प्रथम शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आजाद. उन्होंने भविष्यवाणी की थी कि पाकिस्तान का निर्माण भारत के मुसलमानों को नुकसान पहुंचायेगा और सीमा के दोनों ओर उनकी इसलामी पहचान के बारे में संकट उत्पन्न करेगा। उन्हें पूर्वाभास हो गया था कि जातीय-भाषायी और कट्टरवादी शक्तियां भारत और पाकिस्तान, खासकर पाकिस्तान को प्रभावित करेंगी। उनकी स्पष्ट धारणा थी कि भारत एवं पाकिस्तान एक दीर्घकालीन शत्रुतापूर्ण संबंधों के रास्ते पर चलेंगे।’’
भारत और पाकिस्तान को अलग-अलग हुए लगभग 70 साल हो चुके हैं फिर भी पाकिस्तान अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहा है। सीमा पर हमलों की निरंतर घटनाओं के बाद भारतीय सेना के जवानों के शवों को क्षत-विक्षत करना उसके घिनौने इरादों को बयान करता है। जबकि सच तो यह है कि दुनिया के अधिकांश देश पाकिस्तान को आतंकवाद को पनाह देने वाला देश घोषित कर चुके हैं और स्वयं पाकिस्तान की आंतरिक दशा कोई अच्छी नहीं है, फिर भी मानो वह कोई सबक लेना ही नहीं चाहता है या फिर उकसाना चाहता है भारत को ताकि वह आतंकी देश की जगह पीड़ित का नकाब पहन सके। कभी किसी निर्दोष को जासूस बता कर बंदी बना लेना और उसे अमानवीय ढंग से प्रताड़ित करना तो कभी सेना के जवानों पर हमले कर के उनके शवों का भी अपमान करना पाकिस्तान की गोया आदत बनती जा रही है। उसकी इस आदत को ध्यान में रखते हुए भारत को कुछ कड़े कदम उठाने ही होंगे। सिर्फ़ यह कहना कि अब भारत बर्दाश्त नहीं करेगा, र्प्याप्त नहीं है। पाकिस्तान की नापाकियों पर अंकुश लगाने के लिए जरूरी नहीं है कि युद्ध का बिगुल बजाया जाए। उसके विरुद्ध आर्थिक नाकेबंदी और वैश्विक दबाव भी बनाया जा सकता है जो एक शांतिपूर्ण लेकिन असरदार रास्ता होगा।
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