Friday, August 10, 2018

बुंदेलखंड की महिलाएं और सच्ची राजनीतिक भागीदारी - डॉ (सुश्री) शरद सिंह ... चर्चा प्लस

चर्चा प्लस
बुंदेलखंड की महिलाएं और सच्ची राजनीतिक भागीदारी
- डॉ. शरद सिंह
इस बार आमसभा चुनावों में कौन-सा राजनीतिक दल अपने उम्मीदवारों की सूची में महिलाओं का प्रतिशत बढ़ाएगा? यह एक अहम प्रश्न है जिसका उत्तर सूची जारी होने पर ही मिलेगा। किन्तु क्या सूची में दर्ज़ किया जाना ही पर्याप्त होगा महिलाओं के लिए या फिर उन्हें उनके असली राजनीतिक अधिकार भी दिए जाएंगे? क्या एक बार फिर ‘रबर स्टैम्प’ म
हिला उम्मीदवार रहेंगी जो पति के निर्णय की उंगली पकड़ कर चलती रहेंगी अथवा इस बार वास्तविक योग्य महिला उम्मीदवारों को सूची में स्थान दिया जाएगा? यह ध्यान रखना जरूरी है कि बुंदेलखंड की महिलाएं अपना अस्तित्व स्थापित करने के लिए आज भी सच्चे राजनीतिक अधिकारों की राह देख रही हैं।
बुंदेलखंड की महिलाएं और सच्ची राजनीतिक भागीदारी - डॉ (सुश्री) शरद सिंह ... चर्चा प्लस...Column of Dr (Miss) Sharad Singh in Sagar Dinkar News Paper
आमसभा चुनावों के निकट आते ही सबसे पहले प्रश्न उठते हैं, किसको टिकट मिलेगी और किसको नहीं? कौन-सा राजनीतिक दल अपने उम्मीदवारों में महिलाओं का प्रतिशत बढ़ाएगा? लेकिन क्या महिला उम्मीदवारों के आंकड़े बढ़ने से ही राजनीति में महिलाओं की पकड़ बढ़ जाएगी? सच तो यह है कि चुनाव निकट आते ही महिलाओं की तरफ़दारी करने वाले बयानों की बाढ़ आ जाती है किन्तु चुनाव होते ही किए गए वादे ठंडे बस्तों में बंधने लगते हैं, विशेषरूप से राजनीति में महिलाओं के प्रतिशत को ले कर। बुंदेलखंड के संदर्भ में देखा जाए तो बहुत ही विचित्र स्थिति दिखाई देती है। बुंदेलखंड जो दो राज्यों मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश में फैला हुआ है, दोनों की एक साथ बात की जाए तो आंकड़ों के अनुसार राजनीति में महिलाओं की स्थिति काफी बेहतर दिखाई देती है। लेकिन ज़मीनी सच्चाई आंकड़ों के परिदृश्य से अलग ही तस्वीर दिखाती है।
यदि उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड की बात की जाए तो उत्तर प्रदेश के हिस्से वाले बुंदेलखंड में अब तक हुए 15 विधानसभा चुनावों में 15 महिलाएं विधायक चुनी जा चुकी हैं। इनमें सबसे ज्यादा 11 दलित महिलाएं हैं और तीन पिछड़े और एक सामान्य वर्ग से हैं। इनमें से एक महिला छह बार विधायक चुनी जा चुकी है। मध्यप्रदेश में भी महिला विधायकों की गिनती अधिक तो नहीं लेकिन संतोषजनक है। समूचे बुंदेलखण्ड में सांसदों, विधायकों, सरपंचों, पंचों, नगरपालिका अध्यक्षों एवं पार्षदों के रूप में महिलाओं ने बेहतर उपस्थिति दर्ज़ कराई है। इन सारी राजनीतिक पदाधिकारी महिलाओं की यदि गिनती की जाए तो ऐसा प्रतीत होगा मानो बुंदेलखंड की महिलाएं पूर्णतः सशक्त हो गई हैं। मगर इस सिक्के का दूसरा पहलू भी है जो इस प्रगति के गुब्बारे की हवा निकालने के लिए काफी है। जनसेवा के पदों पर चुनी गई महिलाओं में अधिकांश ऐसी हैं जो प्रचार-प्रसार तक में स्वतंत्र रूप से अपने नाम का उपयोग नहीं कर पाती हैं। उनके नाम के साथ उनके पति का नाम जुड़ा रहता है जो कि उनकी असली पहचान पर भारी पड़ता है। इससे सभी के मन में यह बात घर कर जाती है कि निर्णय लेने के सारे काम तो ‘भैयाजी’ करते हैं। ‘भौजी’ तो नाम भर की हैं। उदाहरण के लिए यदि किसी को किसी महिला सरपंच से काम है तो वह महिला सरपंच के पास जाने के बजाए ‘सरपंचपति’ को ढूंढेगा जिससे उसका काम बन सके। कई पंचायतें ऐसी हैं जहां महिला सरपंच के स्थान पर सरपंचपति बैठकें आयोजित करते हैं तथा पत्नी की ओर से सारे निर्णय लेते हैं। यानी ऐसी महिला सरपंच होती हैं खालिस रबर-स्टैम्प। यदि इस व्यवस्था के तह में पहुंचा जाए तो पता चलता है कि वह महिला जिसे सरपंच की सीट के लिए चुनाव लड़वाया गया और जिता कर सरपंच बनवाया गया, वह न तो अधिक पढ़ी-लिखी है और न उसमें कभी कोई राजनीतिक रुझान रहा। चूंकि कतिपय कारणों से पति को टिकट नहीं मिल सकता था इसलिए पत्नी के लिए टिकट जुगाड़ लिया गया और पत्नी के नाम पर पति का शासन स्थापित हो गया।
महिला पार्षदों के पतियों द्वारा पत्नी के बदले बैठकों में भाग लेने पर कई बार आपत्तियां भी उठाई जाती हैं किन्तु इससे कोई दीर्घकालिक फर्क नहीं पड़ता है। ऐसी पहलकदमी कभी-कभी ही होती है। अधिकांश महिला सरपंच और पंच जिस सामाजिक माहौल से आती हैं उनमें उनका स्वतंत्र अस्तित्व बहुत कम होता है। पतियों की राजनीतिक लालसा उन्हें वैचारिकदृष्टि से अपाहिज बनाए रखती है। वे पति से पूछे बिना एक भी निर्णय नहीं ले पाती हैं। ऐसे उदाहरण देश के प्रत्येक हिससे में मिल जाएंगे किन्तु बुंदेलखंड सामाजिक, आर्थिक एवं शैक्षिक क्षेत्र में आज भी पिछड़ा हुआ है इसलिए इस क्षेत्र की महिलाओं का राजनीतिक अधिकार का स्वप्न आज भी दिवास्वप्न बना हुआ है।
यदि पंचायतों, पालिकाओं, निगमों, विधानसभाओं और लोकसभा के चुनावों में कुछ सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित न कर दी जातीं तो वह आंकड़ा भी शायद देखने को न मिल पाता जो आज कम से कम कुछ ढाढस तो बंधाता है। फिर भी यह मलाल तो रहता ही है कि राष्ट्रीय राजनीतिक दल भी 10-15 प्रतिशत से अधिक महिलाओं को लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए टिकट नहीं देते हैं। भारतीय राजनीति में अभी भी पुरुषवादी सोच ही हावी है। राजनीतिक दलों के एजेंडे में महिला और महिलाओं के मुद्दे काफी पीछे आते हैं। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि महिलाओं को देश में कोई भी राजनीतिक दल वोट बैंक के तौर पर नहीं मानता है। अमूमन सभी दल मानते हैं कि महिलाएं अपने घर के पुरुषों के मुताबिक ही मतदान करती हैं। कुछ जमीनी नेता ही ऐसे हैं जो महिलाओं के हित में ठोस कदम उठाने का प्रयास करते रहते हैं। लेकिन इससे परिवारों को आर्थिक लाभ तो मिलता है लेकिन उन परिवारों की महिलाओं को निर्णय की आजादी फिर भी नहीं दी जाती है। इस सामाजिक विडंबना के चलते बुंदेलखंड की विशेषरूप से ग्रामीण अंचल की महिलाएं आज भी शिक्षा और स्वास्थ्य संबंधी जरूरी ज्ञान से भी वंचित हैं। उन्हें अपने कानूनी अधिकारों की भी समुचित जानकारी नहीं है। वे स्वसहायता समूह से तो जुड़ जाती हैं किन्तु भुगतान के समय या तो अंगूठा लगाने की अथवा टेढ़े-मेढ़े हस्ताक्षर करने की स्थिति रहती है। उन्हें भुगतान के ब्यौरे का ज्ञान नहीं रहता है अतः वे पूरी तरह से समूह की मुखिया की ईमानदारी पर आश्रित होती हैं। बुंदेलखंड की ग्रामीण औरतें आज भी जीवन की बुनियादी जरूरतों के लिए जूझ रही हैं। कई गांव ऐसे हैं जहां की महिलाओं को पीने का पानी लाने के लिए आठ-दस किलोमीटर तक पैदल जाना पड़ता है। स्थिति बिगड़ने पर यदि जननी सुरक्षा वाहन अथवा 108 वाहन उपलब्ध न हो तो प्रसव पीड़ा से तड़पते हुए अपनी जान से हाथ धोना पड़ता है। महिलाओं के विरुद्ध अपराधों एवं घरेलूहिंसा के मामले में भी बुंदेलखंड पीछे नहीं है।
ये स्थितियां बदल सकती हैं यदि राजनीति में महिलाओं को ईमानदारी भरा प्रतिनिधित्व दिया जाए। अब आगामी लोकसभा चुनावों में राजनीतिक दल महिलाओं को उनकी योग्यता के आधार पर कितने प्रतिशत टिकट देते हैं, यह देखने का विषय रहेगा क्योंकि यही तय करेगा बुंदेलखंड में महिलाओं के विकास और उनके भविष्य को। यह सच है कि समूचा बुंदेलखंड ही अपने विकास की बाट जोह रहा है लेकिन उतना ही सच यह भी है कि इस क्षेत्र की महिलाएं अपना अस्तित्व स्थापित करने के लिए राजनीतिक अधिकारों की राह देख रही हैं।

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