Wednesday, July 27, 2016

चर्चा प्लस ... थर्ड जेंडर‬ के ‪ ‎पक्ष में‬ ‪ ‎साहित्यिक‬ ‪ विमर्श‬ की ‪‎घोषणा ... - डाॅ. शरद सिंह

                                             
मेरा कॉलम  "चर्चा प्लस" "दैनिक सागर दिनकर" में (27. 07. 2016) .....

My Column Charcha Plus‬ in "Dainik Sagar Dinkar" .....
 
चर्चा प्लस

थर्ड जेंडर‬ के ‪ ‎पक्ष में‬ ‪ ‎साहित्यिक‬ विमर्श‬ की ‪‎घोषणा
                                                   
  - डाॅ. शरद सिंह  


Dr (Miss) Sharad Singh in Pavas Vyakhyanmala, Bhopal - 2016, 23-24 July
23-24 जुलाई 2016 को हिन्दी भवन, भोपाल में आयोजित दो दिवसीय 23वीं पावस व्याख्यानमाला में ‘‘समकालीन उपन्यासों में थर्ड जेंडर की सामाजिक उपस्थिति’’ विषय पर अपना व्याख्यान देते हुए मैंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि ‘‘इस मंच से थर्ड जेंडर विमर्श को आरम्भ किए जाने की मैं घोषणा करती हूं।’’ वहां उपस्थित बुद्धिजीवियों ने मेरी इस घोषणा का स्वागत किया। मैंने कहा कि थर्ड जेंडर को सामाजिक समानता के अधिकार दिलाने में साहित्य महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है और आवश्यकता है ऐसे साहित्य पर एक स्वतंत्र विमर्श की। सभी ने मेरी बात का समर्थन किया। मैंने अनुभव किया कि सभी उत्सुक हैं इस नए विमर्श के आगाज़ के लिए।


बीसवीं शती के उत्तर्राद्ध और इक्कीसवीं सदी के आरम्भ में हिन्दी साहित्य जगत में स्त्री विमर्श और दलित विमर्श जैसे महत्वपूर्ण विमर्श उभर कर सामने आए। इन विमर्शों के अंतर्गत् भारतीय समाज के उन पक्षों पर विस्तार से चर्चा हुई जो मुख्य विषय बन ही नहीं पाते थे। सदियों से उपेक्षित जीवन जी रहे दलितों के जीवन को उपन्यासों का हिस्सा बनाया गया, समाज में दोयम दर्जे पर देखी जाने वाली स्त्रियों की दशा और अधिकारों की सशक्त वक़ालत की गई। अब एक नए विमर्श की आवश्यकता है, वह है- ‘थर्ड जे़ंडर’ पर विमर्श।
ऐसा नहीं है कि साहित्य में ‘थर्ड जे़ंडर’ पर पहली बार कुछ लिखा गया हो, महाकाव्यकाल में ‘महाभारत’ महाकाव्य में ‘शिखण्डी’ एक ऐसा ही पात्र था जो ‘थर्ड जे़ंडर’ था। अर्जुन ने अपने अज्ञातवास का एक साल का समय भी किन्नर का रूप धारण कर ‘बृहन्नला’ के नाम से बिताया था। कौटिल्य ने अर्थशास्त्र में किन्नरों का उल्लेख किया है। ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार, हिंदू और मुसलिम शासकों द्वारा किन्नरों का इस्तेमाल खासतौर पर अंतःपुर और हरम में रानियों की पहरेदारी के लिए किया जाता था। इसके पीछे उनकी सोच यह थी कि रानियां पहरेदारों से अवैध संबंध स्थापित नहीं कर पाएं। दिल्ली की सल्तनत के दौरान किन्नर महत्वपूर्ण पदों पर रहे हैं। अलाउद्दीन खिलजी के शासनकाल में किन्नर वरिष्ठ सैनिक अधिकारी रहे हैं। खिलजी का एक प्रमुख पदाधिकारी मलिक गफूर था, जो किन्नर था। उसी के प्रयासों से खिलजी ने दक्षिण भारत में अपने साम्राज्य का विस्तार किया। गुजरात में सुलतान मुजफ्फर के शासनकाल में एक किन्नर मुमित-उल-मुल्क कोतवाल था। जहांगीर के शासनकाल में कई किन्नर महत्वपूर्ण पदों पर थे। एक किन्नर ख्वाजासरा हिलाल प्रमुख प्रशासनिक पद पर था। इफ्तिखार खान भी एक किन्नर था जिसे जहांगीर ने उसे एक जागीर का फौजदार बना दिया।
जिस समाज में स्त्री और पुरुष रहते हैं उसी समाज में एक वर्ग और है, जो पारिवारिक अनुष्ठानों में आशीष देने का कार्य करता है। माना जाता है कि इस वर्ग का आशीर्वाद आनुवंशिक समृद्धि लाती है। पर समाज का कोई भी व्यक्ति उनके जैसे जीवन की स्वप्न में भी आकांक्षा नहीं करता। यह वर्ग है ‘थर्ड जेंडर’, जिसे ‘हिजड़ा’, ‘किन्नर’, ‘ख्वाजासरा’ आदि नामों से पुकारा जाता है। मुख्यधारा के समाज में बहिष्कृत, व्यंग्य, घृणा, तिरस्कार आदि सहने को अभिशप्त इस श्रेणी के इंसानों की यौन स्थिति के आधार पर कई और नामों से पुकारा जाता है जैसे ‘किन्नर’, ‘उभयलिंगी’, ‘शिखंडी’ वगैरह।
समय-समय पर कहानियों, नाटकों एवं उपन्यासों में ‘थर्ड जे़ंडर’ पात्र आते रहे हैं लेकिन उनका उल्लेख मुख्य पात्र के रूप में नहीं हुआ। किन्तु समकालीन कथाकारों ने ‘थर्ड जे़ंडर’ के जीवन की ओर गंभीरता से ध्यान दिया। यूं भी विगत दो दशकों में ‘थर्ड जे़ंडर’ ने भी अपने सामाजिक अधिकारों की लड़ाई लड़ने की पहल की। जिसके परिणाम स्वरूप राजनीति, शिक्षा और फैशन जगत् में ‘थर्ड जे़ंडर’ को महत्वपूर्ण दायित्व सौंपे गए। शबनम मौसी, कमला जान, आशा देवी, कमला किन्नर, मधु किन्नर और ट्रांसजेंडर एक्टिविस्ट लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी वे नाम हैं जिन्होंने चुनाव में बहुमत से विजय प्राप्त कर के विधायक और महापौर तक के पद सम्हाले।

थर्ड जेंडर विमर्श की घोषणा

23-24 जुलाई 2016 को हिन्दी भवन, भोपाल में आयोजित दो दिवसीय 23वीं पावस व्याख्यानमाला में ‘‘समकालीन उपन्यासों में थर्ड जेंडर की सामाजिक उपस्थिति’’ विषय पर अपना व्याख्यान देते हुए मैंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि ‘‘इस मंच से थर्ड जेंडर विमर्श को आरम्भ किए जाने की मैं घोषणा करती हूं।’’ वहां उपस्थित बुद्धिजीवियों ने मेरी इस घोषणा का स्वागत किया। मैंने कहा कि थर्ड जेंडर को सामाजिक समानता के अधिकार दिलाने में साहित्य महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है और आवश्यकता है ऐसे साहित्य पर एक स्वतंत्र विमर्श की। सभी ने मेरी बात का समर्थन किया। मैंने अनुभव किया कि सभी उत्सुक हैं इस नए विमर्श के आगाज़ के लिए। मैंने अपनी बात के तर्क में थर्ड जेंडर से जुड़ी जमीनी सच्चाइयों के साथ ही हिन्दी के उन पांच महत्वपूर्ण उपन्यासों पर विस्तार से चर्चा की जो थर्ड जेंडर पर आधारित हैं। ये पांच उपन्यास हैं - नीरजा माधव का ‘यमदीप’ (2002), प्रदीप सौरभ का ‘तीसरी ताली’ (2011), महेन्द्र भीष्म का ‘किन्नर कथा’ (2011), निर्मला भुराड़िया का ‘गुलाम मंडी’ (2014) और चित्रा मुद्गल का ‘पोस्ट बाॅक्स नं. 203 नाला सोपारा’ (2016)। इस विषय पर मेरी एक पुस्तक भी आने वाली है।

हर दृष्टि से सक्षम है थर्ड जेंडर

देश की पहली ट्रांसजेंडर प्राचार्य बन कर मानबी बंदोपाध्याय ने सिद्ध कर दिया कि किन्नर अथवा ‘थर्ड जे़ंडर’ किसी भी विद्वत स्त्री-पुरुष की भांति शिक्षा जगत के उच्च पद तक पहुंच सकते हैं। इसके साथ ही यह भी स्वतः सिद्ध हो गया कि ‘थर्ड जे़ंडर’ के प्रति समाज का दृष्किोण सकारात्मक होने लगा है। समाज अब उन्हें सिर्फ़ बधाई गाने वाले समूह के सदस्य के रूप में, फूहड़ मेकअप कर के अश्लील नृत्य करने वाला न मानते हुए यह स्वीकार करने लगा है कि ‘थर्ड जे़ंडर’ भी समाज के विभिन्न क्षेत्रों में काम कर सकते हैं और अपनी योग्यता साबित कर सकते हैं। प्राचार्य बनने के पूर्व मानबी विवेकानंद महाविद्यालय में बांग्ला की एसोसिएट प्रोफेसर रह चुकी थी। जितना सच यह है कि उसने साहस से काम लेते हुए अपना संघर्ष जारी रखा, उतना ही सच यह भी है कि उसे क़दम-क़दम पर बाधाओं और उपेक्षा का सामना करना पड़ा।
किन्नर लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी ने अपनी आत्मकथा ‘मी हिजड़ा मी लक्ष्मी’ में अपने जीवन के संघर्षों का विस्तृत विवरण दिया है। किन्नर लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी के संघर्ष के परिणामस्वरूप ही अप्रैल 2015 में उच्चतम न्यायालय ने किन्नरों को तीसरे लिंग अर्थात् ‘थर्ड जेंडर’ की मान्यता प्रदान की। उज्जैनी सिंहस्थ 2016 में किन्नर लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी को महामंडलेश्वर की पदवी प्रदान की गई थी।
Charcha Plus Column of Dr Sharad Singh in "Sagar Dinkar" Daily News Paper
बुनियादी जरूरतों की बात

आज भी मुख्यधारा के समाज में किसी व्यक्ति के साहस या उसकी वीरता पौरुष अथवा मर्दानगी पर सवाल लगाना होता है तो उसे ‘हिजड़ा’ कहकर दुत्कारा जाता है। यानि मुख्य यौनधारा के बहुसंख्यक पुल्लिंगी और स्त्रीलिंगी लोगों के लिए ‘हिजड़ा’ शब्द एक भद्दी गाली की तरह है। गर्भावस्था की गड़बड़ी के कारण पैदा होनेवाले एक खास तरह की लैंगिक स्थिति वाले लाखों हिजड़ों के बारे में मुख्यधारा की लैंगिक स्थिति वाले स्त्रियों और पुरुषों की यह नकारात्मक धारणा लैंगिक वर्चस्व का एक नमूना है। ‘थर्ड जेंडर’ की इस मानसिक पीड़ा को साहित्य के द्वारा ही सामने रखा जा सकता था और रखा भी गया है। विशेष रूप से औपन्यासिक विस्तार के माघ्यम से इस तथ्य को समझाया जा सकता था कि अपने जीवन से, अपनी योनि से, अपने लिंग से नफ़रत करते हुए जीवन बिताना आसान नहीं होता है और अपने इस उद्देश्य में समकालीन उपन्यास सफल हैं।
आर्थिक असमर्थता बेरोजगारी, शिक्षा का अभाव, तकनीकी अकुशलता और सबसे बड़ी समस्या परंपरागत पेशे का अज्ञान इन्हें वैश्यावृति को पेशा बनाने पर मजबूर करता है। लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी अपने साक्षात्कार में इस समुदाय की आर्थिक सामाजिक स्थिति के संदर्भ में कहती हैं कि ‘‘हिजड़ों के पास बुद्धि नहीं होती? उनके पास प्रतिभा नहीं होती ? बल नहीं होता? वह राजनीति में नहीं जा सकते? फौज में नहीं जा सकते? इन बातों को किन तर्कों के आधार पर तय किया? आप ने कलाकारों, प्रतिभावानों को मजबूर कर दिया पचास-पचास रुपए में देह बेचने को, ताली बजाने को।’’
हाल ही में ब्रिटेन में आवासीय स्कूलों के लिए आदेश जारी किए गए कि उन्हें ‘ही’ अथवा ‘शी’ के बजाए ‘जी’ सम्बोधन दिया जाए। यह स्वयं थर्ड जेंडर बच्चों की मांग थी। कई ऐसी बुनियादी बातें हैं जो थर्ड जेंडर को परेशान करती हैं जैसे- स्कूल, कालेजों एवं सार्वजनिक स्थानों में पृथक सुलभ शौचालय का न होना, शिक्षा का समान अवसर न मिलना, उनके विरुद्ध अपमानजनक स्थितियों तथा अपराधों को रोकने के लिए अलग पुलिस थाना न होना, नौकरी का समान अवसर न मिलना आदि। इनसे भी बड़ी बुनियादी समस्या है समाज का इनके प्रति दृष्टिकोण। यदि समाज स्वीकार कर ले कि थर्ड जेंडर भी सभी स्त्री-पुरुषों की भांति हैं, वे कोई अजूबा नहीं हैं तो उनकी प्राकृतिक कमी भी उन्हें विकास की मुख्यधारा से जोड़ने से नहीं रोक सकेगी। इसे एक आशाजनक कदम कहा जा सकता है कि हिन्दी साहित्य में अभी थर्ड जेंडर विमर्श अपनी आंखे खोल रहा फिर भी यह मानना पड़ेगा कि ‘यमदीप’, ‘तीसरी ताली’, ‘किन्नर कथा’, ‘गुलाम मंडी’; और ‘पोस्ट बाॅक्स नं. 203 नाला सोपारा’ उपन्यास किन्नर जीवन के परिदृश्यों को बखूबी सामने रखते हैं। ये प्रतिनिधि उपन्यास बताते हैं कि ‘थर्ड जेंडर’ किस तरह समाज का अभिन्न अंग है और उन्हें समाज में वही स्थान मिलना चाहिए जो किसी स्त्री अथवा पुरुष को मिलता है। समकालीन उपन्यासों में ‘थर्ड जे़ंडर’ के कथानकों को मिलना उनकी सामाजिक दृष्टि की सम्पन्नता एवं जागरूकता को रेखांकित करता है।

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2 comments:

  1. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 28 . 07. 2016 को चर्चा मंच पर
    चर्चा - 2417
    में दिया जाएगा
    धन्यवाद

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  2. मेरा मानना है कि मानबी बंदोपाध्याय से किन्नरों को प्रेरणा लेनी होगी और समाज में अपने बलबूते आगे आना होगा, तभी वे सम्मानजनक ढंग से जी पाएंगे, अपनी मेहनत के बलबूते काम करके ही वे ऐसा कर सकते हैं, नाच गाकर ऐसा संभव नहीं हो सकेगा. क्योंकि हमारा समाज अभी भी उन्नत कहाँ हो पाया है ........

    बहुत अच्छी प्रस्तुति

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