Wednesday, September 12, 2018

हिन्दी की उपेक्षा पर स्व. अटल जी की पीड़ा - डॉ. शरद सिंह .. चर्चा प्लस

Dr (Miss) Sharad Singh
चर्चा प्लस ... 
 हिन्दी की उपेक्षा पर स्व. अटल जी की पीड़ा
- डॉ. शरद सिंह
 
जब हमारी बात सुनी नहीं जाती है, मानने योग्य हो कर भी मानी नहीं जाती है तो क्षोभ होता है अपनी स्थिति पर। कुछ इसी तरह की पीड़ा से गुज़रे थे पूर्व प्रधानमंत्री स्व. अटल बिहारी वाजपेयी। हिन्दी के गहन समर्थक स्व. अटल जी देश में हिन्दी की उपेक्षा को देख कर तड़प उठे थे और वे कह उठे थे कि-‘अच्छा होता यदि मैं किसी अहिन्दी प्रांत में पैदा हुआ होता...’।
हिन्दी की उपेक्षा पर स्व. अटल जी की पीड़ा - डॉ. शरद सिंह .. चर्चा प्लस ... Column of Dr (Miss) Sharad Singh in Sagar Dinkar News Paper
अटल बिहारी भली-भांति जानते थे कि कब, कहां, क्या कहना है? अटल बिहारी अपने भाषण के श्रोताओं से अपने उद्गारों द्वारा सीधा सम्बन्ध स्थापित करने में माहिर रहे। चाहे साहित्यिक मंच हो, चाहे राजनीतिक मंच हो अथवा संसद हो, अटल बिहारी के ओजस्वी भाषणों को सभी ध्यानपूर्वक सुनते रहे हैं, यहां तक कि उनके राजनीतिक विरोधी भी उनके भाषणों की प्रशंसा करते रहे हैं। चाहे कितना भी आक्रामक विषय क्यों न हो, वे अपने भाषणों में शालीनता बनाए रखते और शब्दों की गरिमा बनाए रखते। ‘‘राष्ट्रवादी व्यक्तित्व अटल बिहारी वाजपेयी’’ को लिखने के दौरान मुझे स्व. अटल बिहारी वाजपेयी के विचारों को गहराई से जानने का अवसर मिला। मेरी यह किताब सन् 2015 में सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली से प्रकाशित हुई। अपनी इसी किताब में सहेजा गया उनके भाषा के प्रमुख अंश मैं यहां प्रस्तुत कर रही हूं जो 22 फरवरी 1965 को राज्यसभा में राजभाषा नीति पर परिचर्चा के दौरान उन्हांने दिया था, इसमें हिन्दी की उपेक्षा के प्रति उनकी पीड़ा को स्पष्ट रूप से अनुभव किया जा सकता है- µ
‘‘सभापति जी! मेरा दुर्भाग्य है, मेरी मातृभाषा हिन्दी है। अच्छा होता यदि मैं किसी अहिन्दी प्रांत में पैदा हुआ होता क्योंकि तब अगर हिन्दी के पक्ष में कुछ कहता तो मेरी बात का ज्यादा वजन होता। हिन्दी को अपनाने का फैसला केवल हिन्दी वालों ने ही नहीं किया। हिन्दी की आवाज पहले अहिन्दी प्रांतों से उठी। स्वामी दयानंद जी, महात्मा गांधी या बंगाल के नेता हिन्दीभाषी नहीं थे। हिन्दी हमारी आजादी के आंदोलन का एक कार्यक्रम बनी और चौदह सूत्रीय कार्यक्रम के अंतर्गत उसका समावेश किया गया। हमारे संविधान का जो पहला मसविदा बना, उसमें अंग्रेजी के लिए पांच साल देना तय किया गया था, लेकिन श्री गोपालास्वामी अयंगार, श्री अल्लादि कृष्णास्वामी और श्री टी.टी. कृष्णमाचारी के आग्रह पर वह पांच साल की अवधि बढ़ाकर पन्द्रह साल की गयी। हिन्दी अंकों को अंतर्राष्ट्रीय अंकों का रूप नहीं दिया गया। राष्ट्रभाषा की जगह हिन्दी को राजभाषा कहा गया। उस समय अहिन्दी प्रान्तों से हिन्दी का विरोध नहीं हुआ था। संविधान में जो बातें थीं, उनका विरोध या तो राजर्षि पुरुषोत्तमदास टंडन ने किया, जो अंग्रेजी नहीं चाहते थे या स्वर्गीय मौलाना आजाद ने किया, जो हिन्दी की जगह हिन्दुस्तानी चाहते थे, मगर दक्षिण में हिन्दी के विरोध में आवाज नहीं उठी थी, लेकिन पंद्रह साल में हमने क्या किया? यदि पन्द्रह साल में जैसा कि सभा ने निर्णय किया था और जैसा कि संविधान में लिखा गया था, हिन्दी पढ़ाने की व्यवस्था होती तो फिर आज जो परिस्थिति पैदा हो गई है, वह न होती, लेकिन केन्द्र तो मद्रास में हिन्दी नहीं ला सकता था। मद्रास की सरकार ने हिन्दी को अनिवार्य नहीं किया। अनिवार्यता हटा ली गयी। परीक्षाओं में पास होना भी अनिवार्य नहीं रहा और वहां हिन्दी की पढ़ाई एक मजाक बनकर रह गयी। जनता का राज जनता की भाषा में ही चलना चाहिए, मगर उत्तर प्रदेश में, बिहार में, राजस्थान में भी अंग्रेजी चल रही है क्योंकि सब नईदिल्ली की तरफ देखते हैं, दिल्ली से प्रेरणा लेते हैं। अगर नईदिल्ली और प्रांतों में हिन्दी नहीं चला सकती तो हिन्दी प्रांतों में उसे अंग्रेजी चलाने का अधिकार नहीं होगा।
मैं एक सुझाव देना चाहता हूं कि अगर हमारे गैर हिन्दी वाले हिन्दी को जोड़ भाषा, लिंक लैंग्वेज मानने के लिए तैयार नहीं हैं तो ईमानदारी से केवल मद्रास में, नईदिल्ली में कहना काफी नहीं है। अतुल्य बाबू संसद में कहेंगे कि हमने हिन्दी मान ली है, बंगाल में कहेंगे हिन्दी नहीं लदेगी। श्री कामराज रायपुर में कहेंगे हिन्दी चलनी चाहिए और वहां सिण्डीकेट के सदस्यों के साथ बैठकर हिन्दी के खिलाफ होने वाले आंदोलन में आहुति डालेंगे, यह दुरंगी बात, यह दोमुंही बात बंद होनी चाहिए। आप ईमानदारी से कहिए कि हम हिन्दी नहीं मानेंगे।
आप तय कर लीजिए कि आप कौन-सी भाषा मानते हैं। जिसकी भाषा हिन्दी नहीं है मैं उन्हें दावत देता हूं कि वे अपनी सभा कर लें और उसमें निश्चय कर लें कि हिन्दी जोड़ भाषा नहीं होगी, हिन्दी राजभाषा नहीं होगी और हम जो भाषा तय करते हैं, वह रहेगी और अगर वे सब मिलकर एक भाषा तय कर लेंगे तो हम हिन्दी वाले पंद्रह साल में उसको सीख कर दिखाएंगे। उसे हिन्दी वालों पर लाद दो, मगर अंग्रेजी को हटाओ। मगर वह खुद कोई भाषा तय नहीं करेंगे। हिन्दी नहीं चलने देंगे और हमारे ऊपर अंग्रेजी लादे रखना चाहते हैं।
एक सुझाव मैं और देना चाहता हूं। कहा जाता है कि झगड़ा नौकरियों का है, बच्चों का भविष्य क्या बनेगा? मेरा निवेदन है कि यूनियन पब्लिक सर्विस कमीशन के लिए अंग्रेजी चल रही है। यह सिफारिश पहले भी की गई थी कि अंग्रेजी के साथ हिन्दी और एक अन्य भारतीय भाषा का ज्ञान हर एक उम्मीदवार के लिए आवश्यक कर दिया जाए। अंग्रेजी में परीक्षा हो लेकिन उसके साथ हिन्दी का ज्ञान हो और हिन्दी के साथ एक भारतीय भाषा का ज्ञान अनिवार्य कर दिया जाए। अभी हिन्दी राज्यों में तीन भाषायी फार्मूला नहीं चल रहा। चलना चाहिए लेकिन जब तक नौकरी के लिए उसकी जरूरत नहीं होगी, कोई दक्षिण की भाषा नहीं पढ़ेगा। यूनियन पब्लिक सर्विस कमीशन के इम्तिहान में जो भी विद्यार्थी बैठे, उन्हें अपनी मातृभाषा के अलावा एक भारतीय भाषा अनिवार्य रूप से जाननी चाहिए। हिन्दी के अलावा एक और भाषा क्या हो, यह अहिन्दी वाले तय कर लें। अगर वे उर्दू तय करेंगे तो हम मान लेंगे। अगर वे पंजाबी के पक्ष में मत देंगे तो हम मान लेंगे मगर वे एक भाषा तय कर दें और हिन्दी प्रांतों के जो भी लड़के आएंगे, उन्हें उस भाषा का पढ़ना अनिवार्य कर दिया जाए। अगर उन्हें नौकरी लेनी है तो वे उस भाषा को पढ़ेंगे किन्तु नौकरियों के कारण देश के सांस्कृतिक विकास को रोका नहीं जा सकता। कितने लोग केन्द्रीय नौकरियों में आते हैं? चाहिए तो जनसंख्या के हिसाब से नौकरियों का कोटा तय कर दीजिए, चाहिए तो हिन्दी वालों को दस साल के लिए केन्द्रीय सेवाओं से वंचित कर दीजिए।
हम हिन्दी वालों को समझाएंगे जाकर, मगर चित भी मेरी, पट भी मेरी, यह नहीं चलेगा। नौकरियों के लिए ऐसा वातावरण पैदा करना कि देश की एकता खतरे में पड़ जाए, यह अच्छा नहीं है। इसलिए इस सवाल को जरा ऊंचे धरातल पर देखना होगा। अंग्रेजी पढ़ने में कितनी शक्ति, कितना समय, कितना धन खर्च होता है? हमारे श्री गोविन्द रेड्डी कह रहे थे कि अंग्रेजी का स्तर गिर रहा है, क्यों कि हवा बदल गई है, वातावरण बदल गया है। लड़के प्राथमिक शिक्षा, माध्यमिक शिक्षा अपनी भाषा में शुरू करते हैं और फिर उनके ऊपर अंग्रेजी लादी जाती है। यह केवल हिन्दी प्रांतों में नहीं है, अहिन्दी प्रांतों में भी है। मद्रास में तमिल को, बंगाल में बंगला को जो स्थान मिलना चाहिए, वह नहीं मिला। इसलिए नहीं कि राजभाषा हिन्दी हो गई, लेकिन इसलिए कि अंग्रेजी वहां पर अभी तक छाई हुई है। कुल दो फीसदी लोग अंग्रेजी जानते हैं। क्या वे चिरन्तन काल तक अठानवे फीसदी अंग्रेजी न जानने वालों पर राज करते रहेंगे? दो फीसदी लोग ऊंचे वर्ण के हैं, ऊंचे वर्ग के हैं और अठानवे फीसदी का शोषण करना चाहते हैं।
राष्ट्र की सच्ची एकता तब पैदा होगी जब भारतीय भाषाएं अपना स्थान ग्रहण करेंगी और अगर भारतीय भाषाएं हर जगह अपना स्थान ग्रहण कर लें तो फिर ‘लिंक लेंग्वेज’ के बनने में दो राय नहीं होंगी। अभी मद्रास में तमिल नहीं आई, बंगाल में बंगला नहीं आई। इसलिए वहां के लोगों को हिन्दी के खिलाफ भड़काया जा सकता है। एक बार वहां के आम आदमी समझ जाएं कि दो फीसदी अंग्रेजी जानने वाले हमें गुलाम रखने के लिए हिन्दी के विरोध का नारा लगा रहे हैं तो फिर अंग्रेजी नहीं रहेगी।’’
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( सागर दिनकर, 12.09.2018)


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मानव एकता के पैरोकर डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन - डॉ. शरद सिंह .. चर्चा प्लस - 5 सितम्बर शिक्षक दिवस पर विशेष

Dr (Miss) Sharad Singh
चर्चा प्लस : 5 सितम्बर शिक्षक दिवस पर विशेष : मानव एकता के पैरोकर डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन - डॉ. शरद सिंह

देश के द्वितीय राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्मदिन देश शिक्षक दिवस के रूप में मनाता है। शिक्षा के व्यावसायीकरण के दौर में आज भी प्रासंगिक हैं उनके विचार। यह कहना अधिक उपयुक्त होगा कि डॉ. राधाकृष्णन के विचारों में वह क्षमता मौजूद है जो अनेक वर्तमान समस्याओं का हल सुझा सकती है। आवश्कता है तो ‘शिक्षक दिवस’ को एक दिवसीय आयोजन के रूप में मनाने के बजाए डॉ. राधाकृष्णन के विचारों को समझने की और 365 दिन के लिए जीवन में उतारने की।
मानव एकता के पैरोकर डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन - डॉ. शरद सिंह .. चर्चा प्लस - 5 सितम्बर शिक्षक दिवस पर विशेष .. Column of Dr (Miss) Sharad Singh in Sagar Dinkar News Paper
‘‘मानव को एक होना चाहिए।’’ यह कथन था महान शिक्षाविद् डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्ण का। वे कहते थे कि ‘‘ जब हम शिक्षा के प्रबंधन की बात करते हैं तो हमें विश्व को एक ही इकाई मानकर शिक्षा का प्रबन्धन करना चाहिए। वह शिक्षा दोषपूर्ण है जो जाति, धर्म, समुदाय अथवा लिंगभेद का पाठ पढ़ाती हो। वह शिक्षक अपराधी है जो विद्यार्थियों की कोरी स्लेट के समान मस्तिष्क में भेद-भाव की इबारत लिखते हैं। शिक्षा और शिक्षक को हमेशा तर्क की कसौटी अपने पास रखते हुए बिना किसी भेद-भाव के एकता मानव एकता की शिक्षा देना चाहिए।
आज हम हर चार कदम पर एक अंग्रेजी माध्यम स्कूल, हर दो कदम पर एक कोचिंग सेंटर देखते हैं फिर भी हमें शैक्षिक उन्नति का वह स्वरूप दिखाई नहीं देता है जो वास्तव में दिखाई देना चाहिए। ऐसा लगता है कि शिक्षातंत्र कहीं भटक गया है। विद्यार्थी शिक्षित तो हो रहे हैं किन्तु एक ओर बेरोजगारी बढ़ रही है तो दूसरी ओर असंवेदनशीलता बढ़ रही है। माता-पिता और अपने शिक्षकों के प्रति विद्यार्थियों में वह सम्मान की भावना दिखाई नहीं देती है जो कुछ दशक पहले तक देखी जा सकती थी। इसका सबसे सीधा उत्तर है कि शिक्षा में व्यावसायिकता बढ़ गई है। व्यापमं घोटाला जैसी घटनाएं शिक्षा के वर्तमान प्रबंधन पर प्रश्नचिन्ह लगाती रहती हैं। ऐसे में यह कहना कठिन है कि शिक्षाजगत में सबकुछ ठीक है। शिक्षा क्षेत्र के दोषों को दूर करने के लिए डॉ राधाकृष्णन ने सुझाव दिया था कि जब भी शिक्षा के प्रबंधन पर चिन्तन किया जाए, शिक्षा को और अधिक उपयोगी बनाने पर मनन किया जाए तो सबसे पहले शैक्षिक प्रबंधन में यूनीफिकेशन पर बल देना चाहिए। कश्मीर से कन्याकुमारी तक शिक्षा का स्वरूप एक जैसा होगा तभी पारस्परिक संवाद बढ़ेगा और लोग एक-दूसरे की समस्याओं को समझ सकेंगे।
डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन मानते थे कि यह सम्पूर्ण विश्व एक विश्वविद्यालय की तरह है जिसमें सभी को नित सीखते और सिखाते रहना पड़ता है। वे शिक्षा को सबसे बड़ी मानवीय शक्ति के रूप में देखते थे। उनका मानना था कि शिक्षा के द्वारा ही मानव मस्तिष्क का सदुपयोग किया जा सकता है, शिक्षा ही वह क्षमता है जो मनुष्य को अन्य प्राणियों से श्रेष्टतम साबित करती है। ब्रिटेन के एडिनबरा विश्वविद्यालय में दिये अपने भाषण में डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने कहा था- “मानव इतिहास का संपूर्ण लक्ष्य मानव जाति की मुक्ति होना चाहिए और यह तभी सम्भव है जब देशों की नीतियों का आधार पूरे विश्व में शान्ति की स्थापना का प्रयत्न हो।''
दक्षिण मद्रास में लगभग 60 किलोमीटर की दूरी पर स्थित तिरुतनी नामक छोटे से कस्बे में 5 सितंबर सन् 1888 को सर्वपल्ली वीरास्वामी के घर जन्मे डॉ. राधाकृष्णन का विवाह तत्कालीन रीतिरिवाज़ के अनुसार बहुत छोटी आयु में ही कर दिया गया था। उनके पिता वीरास्वामी जमींदार की कोर्ट में एक अधीनस्थ राजस्व अधिकारी थे। डॉ राधाकृष्णन को अपनी बाल्यावस्था से ही पढ़ाई में अगाध रूचि थी। उनकी प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षा तिरूतनी हाईस्कूल बोर्ड व तिरुपति के हर्मेसबर्ग इवंजेलिकल लूथरन मिशन स्कूल में हुई। उन्होंने मैट्रिक उत्तीर्ण करने के बाद येल्लोर के बोरी कालेज में प्रवेश लिया और यहां पर उन्हें छात्रवृत्ति भी मिली। सन् 1904 में विशेष योग्यता के साथ प्रथमकला परीक्षा उत्तीर्ण की तथा तत्कालीन मद्रास के क्रिश्चियन कालेज में 1905 में बी.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण करने केलिए उन्हें छात्रवृत्ति दी गयी। उच्च अध्ययन के लिए उन्होनें दर्शन शास्त्र को अपना विषय बनाया। इस विषय के अध्ययन से उन्हें समूचे विश्व में ख्याति मिली। एम.ए. की उपाधि प्राप्त करने के बाद 1909 में एक कालेज में अध्यापक नियुक्त हुए और प्रगति के पथ पर निरंतर बढ़ते चले गए। उन्होंने मैसूर तथा कलकत्ता विश्वविद्यालय में दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर के रूप में कार्य किया।
डॉ. राधाकृष्णन ने भारतीय धर्मदर्शन एवं शिक्षा के अंतर्सम्बंधों की नए ढंग से व्याख्या की। ’द एथिक्स ऑफ वेदांत’ नामक अपने शोधग्रंथ में उन्होंने लेख किया कि -‘‘ जो गांवों में रहते हैं, गरीब हैं और अपने धार्मिक रीतरिवाजों, संस्कारों एवं परम्पराओं में बंधे हुए हैं वे जीवन को अपेक्षाकृत अधिक अच्छे से समझते हैं। क्यों कि उन्हें जीवन के व्यावहार से ज्ञान की प्राप्ति होती है। वे प्रकृति और क्रियाशीलता के अधिक निकट होते हैं। यही तो शिक्षा है वेदांत की। वेद, पुराण, दर्शन आदि सभी ग्रंथ यही कहते हैं कि देखो, समझो और सीखो। ’द एथिक्स ऑफ वेदांत’ शोधग्रंथ में जहां उन्होंने दार्शनिक चीजों को सरल ढंग से समझने की का रास्ता सुझाया वहीं इसमें उन्होंने हिंदू धर्म की कमजोरियों का भी उल्लेख किया। उनका कहना था, “हिदू वेदांत वर्तमान शताब्दी के लिए उपयुक्त दर्शन उपलब्ध कराने की क्षमता रखता है। जिससे जीवन सार्थक व सुखमय बन सकता है। सन् 1910 में सैदायेट प्रशिक्षण कालेज में विद्यार्थियों को 12 व्याख्यान दिए। उन्होंने मनोविज्ञान के अनिवार्य तत्व पर पुस्तक लिखी जो कि 1912 में प्रकाशित हुई। वह विश्व को दिखाना चाहते थे कि मानवता के समक्ष सार्वभौम एकता प्राप्त करने का सर्वोत्तम साधन भारतीय धर्म दर्शन है।“
जहां तक दर्शन का प्रश्न है तो डॉ. राधाकृष्णन का दर्शन प्रत्ययवादी कहा जा सकता है। वे शंकर के अद्वैतवाद से अत्यंत प्रभावित थे। उन्होंने शंकर के अद्वैतवेदान्त की व्याख्या की जिसे ‘नववेदान्त’ के यप् में स्वीकार किया गया। डॉ. राधाकृष्णन ने पश्चिमी विचारकों की चुनौती को स्वीकार करते हुए सिद्ध किया कि हिन्दू धर्म शुद्ध अध्यात्मवाद होते हुए भी जीवन और जगत की सत्यता का सच्चा उद्घोष करता है। अनेक पश्चिमी विद्वानों ने डॉ राधाकृष्णन के दर्शन की व्याख्या की है। ब्रिटिश फिलॉसफर प्रोफ़ेसर सी.ई.एम. जोड ने उनके दर्शन पर ’‘काउंटर अटैक फ्रॉम दि ईस्ट : द फिलॉसफी ऑफ राधाकृष्णन’’ नामक ग्रंथ लिखा। जर्मनी में जन्मे और सन् 1952 में नोबल प्राईज़ के विजेता रहे अलबर्ट स्वाइत्ज़र ने डॉ. राधाकृष्णन के दर्शन में नव हिन्दू धर्म का प्रवर्तन देखा और उसको जीवन तथा जगत की सत्ता का प्रतिपादन करने वाला दर्शन माना। विदेशी विचारकों का डॉ. राधाकृष्णन के दर्शन और चिनतन के प्रति रुझान इसलिए भी था क्यों कि डॉ. राधाकृष्णन ने धर्मदर्शन को रुढ़िवादी दृष्टिकोण से बाहर निकाल कर विश्लेक्षणात्मक पद्धति से व्याख्यायित किया। उन्होंने अपनी धर्म मीमांसा में धर्ममीमांसा की आलोचना करने वाले सन्तों, सूफ़ियों और रहस्यवादियों को भी महत्त्वपूर्ण स्थान दिया। धर्म की महत्ता को स्थापित करते हुए डॉ. राधाकृष्णन ने विज्ञान की प्रगति को भी आवश्क माना। उनका कहना था कि ‘‘धर्म, चिन्तन और जीवन-ये तीनों विज्ञान के जल से सिंचित हो कर और अधिक पल्लवित हो सकते हैं।’’ यद्यपि वे मानते थे कि धर्म और विज्ञान दोनों का ही वर्तमान स्वरूप दोषपूर्ण है और इन दोनों का परिष्कार होना जरूरी है।
‘शिक्षक दिवस’ मनाते हुए इसे एक महज औपचारिक प्रक्रिया जैसे अपनाने के बजाए यदि डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के विचारों एवं दर्शन को अपनाया जाए तो आपसी कटुता, आतंकवाद, मॉबलिंचिंग, हर तरह के भेदभाव की समस्या से निजात पाया जा सकता है। डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के विचार आज भी प्रासंगिक हैं।
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(सागर दिनकर, दैनिक, 05.09.2018 )

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Tuesday, September 11, 2018

आचार्य विनोबा भावे देवनागरी को विश्वलिपि के रूप में देखना चाहते थे - डॉ. ‪शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
भूदान आंदोलन के जनक ‘भारत रत्न’ आचार्य विनोबा भावे यानी विनायक नरहरी भावे आज ही के दिन अर्थात् 11 सितम्बर 1895 को जन्मे थे। वे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, सामाजिक कार्यकर्ता तथा प्रसिद्ध गांधीवादी नेता थे। सन् 1051 में आचार्य विनोबा भावे ने भूदान आन्दोलन आरम्भ किया था। इस आंदोलन का उद्देश्य था स्वैच्छिक भूमि सुधार। विनोबा चाहते थे कि भूमि का पुनर्वितरण सिर्फ सरकारी कानूनों के द्वारा न हो, बल्कि एक आंदोलन के द्वारा जनता में जागरूकता लाते हुए पुनर्वितरण हो। 20वीं सदी के पचासवें दशक में भूदान आंदोलन को सफल बनाने के लिए विनोबा ने गांधीवादी विचारों पर चलते हुए रचनात्मक कार्यों और ट्रस्टीशिप जैसे विचारों को प्रयोग में लाया। उन्होंने सर्वोदय समाज की स्थापना की। यह रचनात्मक कार्यकर्ताओं का अखिल भारतीय संघ था। इसका उद्देश्य अहिंसात्मक तरीके से देश में सामाजिक परिवर्तन लाना था। इसके साथ ही आचार्य भावे देश के ही नहीं अपितु विश्व की सभी भाषाओं की पारस्परिक दूरी को समाप्त करना चाहते थे और इसका आरम्भ वे भारतीय भाषाओं का पहले देवनागरी लिपि से परस्पर जोड़ना चाहते थे। उनका मानना था कि सम्पर्क लिपि एक होने से विभिन्न भाषाओं को सीखना आसान हो सकता है।
Bharat Ratna Acharya Vinoba Bhave
सभी भारतीय भाषाओं के लिए देवनागरी का प्रयोग हो, इससे राष्ट्रीय एकता और अन्तर्राष्ट्रीय सद्भाव लाने में सहायता मिलेगी। सन् 1972 में उन्होंने कहा था कि-
''इन दिनों यही मेरा एक लक्ष्य है। मैं नागरी लिपि पर जोर दे रहा हूं। मेरा अधिक ध्यान नागरी लिपि को लेकर चल रहा है। नागरी लिपि हिन्दुस्तान की सब भाषाओं के लिए चले तो हम सब लोग बिल्कुल नजदीक आ जायेंगे। खासतौर से दक्षिण की भाषाओं को नागरी लिपि का लाभ होगा। वहां की चार भाषाएं अत्यन्त नजदीक हैं। उनमें संस्कृत शब्दों के अलावा उनके अपने जो प्रान्तीय शब्द हैं, तेलुगु, कन्नड़ और मलयालम के उनमें बहुत से शब्द समान हैं। वे शब्द नागरी लिपि में अगर आ जाते हैं तो दक्षिण की चारों भाषाओं के लोग चारों भाषाएं 15 दिन में सीख सकते हैं। 

Devanagiri Script
 ....विभिन्न लिपियोंं को सीखने में हर एक की अपनी-अपनी परिस्थिति आड़े आती हैं। मैंने हिम्मत की, हिन्दुस्तान की हर एक लिपि का अध्ययन किया। परिणाम में विचार आया कि दूसरी लिपियां चलें उसका मैं विरोध नहीं करता। मैं तो चाहता हूं वे भी चलें और नागरी भी चले। मैं बैंगलोर की जेल में था वहां डेढ़ दो साल रहा। वहां मैंने दक्षिण भारत की चार भाषाएं सीखना एकदम शुरू किया। जेल में विभिन्न भाषाओं के लोग थे। तो किसी ने मुझसे पूछा विनोबा जी, आप चार भाषाएं एकदम से क्यों सीख रहे हैं। मैंने कहा, पांच नहीं हैं इसलिए अगर पांच होतीं तो पांच ही सीखता। चार ही हैं इसलिए चार ही सीख रहा हूं। मैंने देखा कि उन भाषाओं में अत्यंत समानता है। केवल लिपि के कारण ही वे परस्पर टूटी हैं एक नहीं बन पा रही हैं।’’

विनोबा जी राष्ट्र संत थे। वे सभी के अभ्युदय की कामना करते थे। सर्वोदय आंदोलन का उद्देश्य भी यही था। वे किसी राजनीतिक दल में नहीं थे। वे तो भारतीय समाज को एकसूत्र देखने के लिए प्रयत्नशील रहते थे। उन्होंने स्वयं को
आजीवन सर्वाभ्युदय में लगाए रखा। वे सबका  हित चाहते थे। लिपि-संबंधी उनके विचार भी सर्वहित से ही प्रेरित थे। बीसियों भाषाओं के ज्ञाता विनोबा भावे देवनागरी को विश्वलिपि के रूप में देखना चाहते थे। भारत के लिये वे देवनागरी को सम्पर्क लिपि के रूप में विकसित करने के पक्षधर थे। वे कहते थे कि मैं नहीं कहता कि नागरी ही चले, बल्कि मैं चाहता हूं कि नागरी भी चले। उनके ही विचारों से प्रेरणा लेकर नागरी लिपि संगम की स्थापना की गयी है जो भारत के अन्दर और भारत के बाहर देवनागरी को उपयोग और प्रसार करने के लिये कार्य करती है। 
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Monday, September 10, 2018

लियो टॉल्सटाय की जन्मतिथि 9 सितम्बर पर मेरा एक पत्र अन्ना करेनिना के नाम...

Dr (Miss) Sharad Singh
प्रिय अन्ना करेनिना,
तुम्हारे अस्तित्व ने कब जन्म लिया यह तो मात्र लियो टॉल्सटाय ही बता सकते थे। उन्होंने तुम्हारी कल्पना की, तुम्हें अपने समय से आगे की स्त्री के रूप में आकार दिया और संवारा। कल ही तो थी वह तारीख जो तुम्हारे सर्जक लियो टॉल्सटाय की जन्मतिथि थी यानी 9 सितम्बर 1828। यह पत्र मैं तुम्हें कल भी लिख सकती थी लेकिन कल दिन भर मैंने बिता दिया तुम्हारे बारे में सोचते हुए। तुम हमेशा मेरे दिल के बहुत करीब रही हो। अपनी कॉलेजियट उम्र के साथ तुम्हें पढ़ कर मैंने सुना और समझा था स़्त्री आंकांक्षा का वह स्वर जो मुझे मेरे आस-पास कहीं दिखाई नहीं दिया था। 
From Anna Karenina movie

तुम्हें मिला एक स्वछन्द चरित्र। इतना स्वच्छंद भी नहीं कि तुम एक ‘बिगड़ी हुई औरत’ कहलाओ। मगर टॉल्सटाय ने पाया कि तुम्हें तो तत्कालीन सामाजिक ठेकेदार ‘बिगडी हुई औरत’ ही मान रहे हैं। क्योंकि टॉल्सटाय ने तुम्हें अपनी ज़िन्दगी अपने ढंग से जीने की आजादी दी। तुम कॉर्सेट मेें भर कर उभारे गए शरीर के भीतर सांसों की घुटन के साथ जीना नहीं चाहती थी। तुम्हें अच्छा लगता था खुली हवा में घोड़े पर सवारी करते हुए प्रकृति की सुंदरता को अपनी आंखों में समा लेना। वहीं आंखें जिन्हें तुम्हारा पति कभी पढ़ नहीं सका। जानती हो अन्ना, आज भी न जाने कितनी औरतें जीना चाहती है तुम्हारी तरह अपनी ज़िन्दगी अपने ढंग से। क्यों कि उनकी आंखों को भी कोई नहीं पढ़ता है। सदियां बीत गईं। तुम्हारी जन्मभूमि ने भी सामाजिक और राजनीतिक चोला बदला, एक नहीं दो बार। उन्होंने सन् 1875 से 1877 में तुम्हारे जीवन को विस्तार दिया। वह समय अलग था आज से लेकिन पूरा तरह से नहीं। आज भी औरतें सिसक रही हैं घर की चौखटों के भीतर, यहां भारतीय उपमहाद्वीप में। आज जितनी भी औरतें व्यवसाय या नौकरी के द्वारा पैसे कमा रही हैं, उनमें से गिनती की ही हैं जिन्हें अपने परिवार में निर्णय लेने का अधिकार पुरुषों के बराबर मिला है। तुम्हारी जैसी आर्थिक सम्पन्नता प्राप्त स्त्रियों की दशा भी जो दिखती है, वह नहीं है। वे तुम्हारी तरह खुले आकाश में उड़ना चाहती हैं लेकिन नहीं उड़ पाती हैं। 
Title page of first edition of Anna Karenina

अन्ना, शायद मैं भावुक हो गई हूं तुम्हारे बारे में सोच-सोच कर। एक टीस है मन में जो आज मैं तुमसे साझा करना चाहती हूं। मुझे तुम्हारा अंत कभी पसंद नहीं आया। नारी दृढ़ता की प्रतिमूर्ति अन्ना रेल के पहिए से कट कर अपनी जान दे दे, भला यह कैसा अंत? यह तो अन्याय है तुम्हारे चरित्र के साथ, तुम्हारे व्यक्तित्व के साथ। तुम्हें तो जीवित रखा जाना चाहिए था तुमहारी स्वाभाविक मृत्यु तक। भले ही तुम्हारा शरीर शिथिल पढ़ चुका होता, भले ही तुम्हारे बातों में सफेदी छा चुकी होती, भले ही तुम्हारी चंचलता आयुगत गंभीरता में दब चुकी होती फिर भी तुम्हें जीवित रहते देखना मुझे सुखद लगता। जब मैंने तुम्हारे बारे में पहली बार पढ़ा था तो तुम्हारे अंत ने मेरी आंखों में आंसू ला दिया था लेकिन आज जब दुनिया के अनेक रंग देख चुकी हूं तो मुझे तुम्हारे अंत कें बारे में साचे कर क्रोध आता है। अगर आज लियो टॉल्सटाय होते तो शायद मैं उनसे झगड़ा करती कि अन्ना का अंत इस तरह मत करिए। भले ही मैं उन्हें अपना प्रेरक-लेखक मानती फिर भी उनसे लड़ती। एक जुझारू औरत का अंत भला आत्महत्या के रूप में? चुभता है मुझे आज भी।
आज मैं चाहती हूं कि मैं जब भी तुम्हारे बारे में पढूं, या सोचूं तो तुम्हारे अंत को बदला हुआ देखूं। मेरी अन्ना करेनिना रेल के पहिए के नीचे कट कर अपना अंत नहीं कर सकती, वह तो डटी रहेगी अंतिम सांस तक।
तो अन्ना, जान लो कि तुम मेरी आशाओं में हमेशा जीवित रहोगी एक अडिग स्त्री की तरह।
तुम्हें हमेशा याद करती हूं आन्ना!
तुम्हारी - 
शरद सिंह
 

Friday, August 31, 2018

‘इंडिया’ क्यों? सिर्फ़ ‘भारत’ क्यों नहीं ? - डॉ. शरद सिंह ... चर्चा प्लस

Dr (Miss) Sharad Singh
चर्चा प्लस ...
‘इंडिया’ क्यों? सिर्फ़ ‘भारत’ क्यों नहीं ?
- डॉ. शरद सिंह

विदेशों में हम भारतीयों से जब हमारी नागरिकता पूछी जाती है तो हम गर्व से कहते हैं-‘आई एम इंडियन’। इसी बात को जब हिन्दी में कहने की बारी आती है तो ‘मैं इंडियन हूं’ कहने में गर्व का अनुभव करते हैं। गोया ‘भारतीय’ कहना कोई लज्जाजनक बात हो। इसका सबसे बड़ा कारण है हमारे देश के तीन नामों का होना। दुनिया का कोई भी देश ऐसा नहीं है जिसके तीन नाम एक साथ क्रियाशील हों। अब समय आ गया है कि इस विचित्र स्थिति से उबरते हुए देश का आधिकारिक रूप से एक नाम और वह भी मूल प्राचीन नाम ‘भारत’ मान्य कर दिया जाए।
‘इंडिया’ क्यों? सिर्फ़ ‘भारत’ क्यों नहीं ? - डॉ. शरद सिंह ... चर्चा प्लस .. Column of Dr (Miss) Sharad Singh in Sagar Dinkar News Paper
विश्व का सबसे बड़ा गणतंत्र का दर्ज़ा रखने वाला देश - भारत, हिन्दुस्तान या इंडिया। एक देश जिसके तीन नाम। आधिकारिक तौर पर दो नाम हैं-इंडिया और भारत। बार-बार इस बात की मांग उठती रही है कि देश का एक नाम रहे-‘भारत’। अभी कुछ अरसा पहले विश्वविख्यात जैन संत आचार्य विद्यासागर ने ‘इंडिया’ शब्द की व्याख्या करते हुए देश का नाम ‘भारत’ रखे जाने पर तार्किक पक्ष रखे हैं और ‘भारत बोलो’ मुहिम का आह्वान किया है।

भारत या इंडिया, क्या नाम है इस देश का? हिन्दुस्तान सिर्फ़ बोलचाल में है अथवा पुराने अभिलेखों में किन्तु ‘इंडिया’ और ‘भारत’ आज भी समान रूप से प्रयोग में लाया जा रहा है। सन् 2012 में लखनऊ की सामाजिक कार्यकर्ता उर्वशी शर्मा ने केंद्र सरकार से यह प्रश्न किया था। सूचना के अधिकार के अंतर्गत उर्वशी शर्मा ने पूछा था कि सरकारी तौर पर भारत का नाम क्या है? उन्होंने अपने प्रश्न पूछे जाने का कारण बताते हुए उल्लेख किया िा कि “इस बारे में हमारे बीच काफी असमंजस है। बच्चे पूछते हैं कि जापान का एक नाम है, चीन का एक नाम है लेकिन अपने देश के दो नाम क्यूं हैं।“ इसीलिए वे यह जानना चाहती हैं कि वे बच्चों को सही-सही उत्तर दे सकें और आने वाली पीढ़ी के बीच इस बारे में कोई संदेह न रहे। उर्वशी ने कहा कि “हमें सुबूत चाहिए कि किसने और कब इस देश का नाम भारत या इंडिया रखा? कब ये फैसला लिया गया?“

उर्वशी का तर्क था कि यह एक भ्रम की स्थिति है जो सरकारी स्तर पर भी देश के दो नामों का प्रयोग किया जाता है। इसी आधार पर उन्होंने कहा कि ‘‘मैं केवल ये जानना चाहती हूं कि भारत का सरकारी नाम भारत है या इंडिया क्योंकि सरकारी तौर पर भी दोनों नाम इस्तेमाल किए जाते हैं।“ उल्लेखनीय है कि भारतीय संविधान की प्रस्तावना में लिखा है- ’इंडिया दैट इज़ भारत’। अर्थात् देश के दो नाम हैं। सरकारी कामकाज में ’गवर्नमेंट ऑफ़ इंडिया’ और ’भारत सरकार’ दोनों का प्रयोग किया जाता है। अंग्रेजी में भारत और इंडिया दोनों का इस्तेमाल किया जाता है जबकि हिंदी में भी इंडिया कहा जाता है. उर्वशी ने कहा था कि वे इस मुद्दे को गंभीरता से लेती हैं क्योंकि ये देश की पहचान का सवाल है।

उर्वशी को प्रधानमंत्री कार्यालय से जवाब मिला जिसमें कहा गया कि उनके आवेदन को गृह मंत्रालय के पास भेजा गया हैं। किन्तु गृह मंत्रालय में इस सवाल का जवाब किसी के पास नहीं था। इसलिए इसे संस्कृति विभाग और फिर वहां से राष्ट्रीय अभिलेखागार भेजा गया, जहां जानकारी की ढूंढ-खोज शुरू हुई। राष्ट्रीय अभिलेखागार 300 वर्षों के सरकारी दस्तावेज़ों का खज़ाना है। आज भी उर्वशी को अपने प्रश्न के उत्तर की प्रतीक्षा है।

देश के नामों को ले कर उच्चतम न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर करके मांग की जा चुकी है कि ‘इंडिया’ का नाम बदल कर भारत किया जाना चाहिए। याचिका में कहा गया था कि महाराजा परीक्षित, कुरु वंश के अंतिम दुर्जेय सम्राट की मृत्यु तक, पूरी दुनिया भारतवर्ष के रूप में जाना जाता था। इसके अलावा दुनिया के एक महान सम्राट का शासन था । भारत ऋग्वेद में उल्लेख किया है। इस पर उच्चतम न्यायालय ने केंद्र और राज्यों से जवाब मांगा। यह याचिका को महाराष्ट्र के सामाजिक कार्यकर्ता निरंजन भटवाल ने दायर की थी। मुख्य न्यायाधीश एच एल दत्तू और न्यायाधीश अरूण मिश्रा की पीठ ने सभी राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों को इस जनहित याचिका पर नोटिस भी जारी किया। इस याचिका में केंद्र को किसी सरकारी उद्देश्य के लिए और आधिकारिक पत्रों में इंडिया नाम का उपयोग करने से रोकने की मांग की गई थी। याचिकाकर्ता निरंजन भटवाल ने आग्रह किया कि न केवल सरकारी अपितु गैर सरकारी संगठनों और कॉरपोरेट्स को भी सभी आधिकारिक और अनाधिकारिक उद्देश्यों के लिए देश का नाम ‘भारत’ का उपयोग करने का निर्देश दिया जाना चाहिए। दुर्भाग्यवश लगभग छह माह बाद भी याचिकाकर्ता को कोई सकारात्मक जवाब नहीं मिला।

भारत का इतिहास सदियों से काफी गौरवशाली रहा है। भारत का नाम प्राचीन वर्षों में ‘भारतवर्ष’ था। इसके पूर्व भारत नाम जम्बूदीप था। देश का नाम भारत होने के संबंध में एक सर्वमान्यकथा प्रचलित है कि कुरूवंशीय राजा दुष्यंत और शकुंतला के प्रतापी पुत्र भरत के नाम पर ही देश का नाम भारतवर्ष पड़ा। यद्यपि कई आधुनिक विद्वान इस कथा को प्रमाण के अभाव में खारिज़ करते हैं किन्तु पुराणों में ‘भारतवर्ष’ नाम का उल्लेख नकारा नहीं जा सकता है। ‘वायु पुराण’ में इस बात की पुष्टि होती है कि देश का नाम भारतवर्ष क्यों पड़ा। इस संदर्भ में ‘वायु पुराण’ का यह श्लोक ध्यान देने योग्य है जिसमें कहा गया है कि हिमालय पर्वत से दक्षिण का वर्ष अर्थात क्षेत्र भारतवर्ष है-

हिमालयं दक्षिणं वर्षं भरताय न्यवेदयत्।

तस्मात्तद्भारतं वर्ष तस्य नाम्ना बिदुर्बुधाः।

इंडिया नाम तो अंग्रेजों की गुलामी के साथ आयाजबकि पुराणों में भारत के प्राचीन नाम जम्बूद्वीप का भी उल्लेख मिलता है। जम्बूदीप का अर्थ है समग्र द्वीप। भारत के प्राचीन धर्म ग्रंथों में हर जगह जम्बूदीप का उल्लेख आता है। उस समय भू-भाग एक विस्तृत द्वीप था जिसे आगे चल कर भारतीय उपमहाद्वीप कहा गया। ‘वायु पुराण’ में ही दी गई एक अन्य कथा के अनुसार त्रेता युग में देश का नाम भारतवर्ष पड़ा। ‘वायु पुराण’ के अनुसार त्रेता युग के प्रारंभ में स्वंयभू मनु के पौत्र और प्रियव्रत के पुत्र ने भरत खंड को बसाया था। लेकिन राजा प्रियव्रत के कोई भी पुत्र नहीं था इसलिए उन्होंने अपनी पुत्री के पुत्र अग्नींध्र को गोद ले लिया था जिसका पुत्र नाभि था। नाभि की एक पत्नी मेरू देवी से जो पुत्र पैदा हुआ उसका नाम ऋषभ था और ऋषभ के पुत्र का नाम भरत था और भरत के नाम पर ही देश का नाम भारतवर्ष पड़ा था। उस वक्त राजा प्रियव्रत ने अपनी कन्या के दस पुत्रों में से सात पुत्रों को पूरी धरती के सातों महाद्वीपों का अलग-अलग राजा नियुक्त किया था। इस तरह राजा प्रियव्रत ने जम्बू द्वीप का शासक अग्नींध्र को बनाया था। इसके बाद राजा भरत ने जो अपना राज्य अपने पुत्र को दिया वही भारतवर्ष कहलाया। ‘वायु पुराण’ में यह कथा इस प्रकार है-

व्याख्या सप्तद्वीपपरिक्रान्तं जम्बूदीपं निबोधत। अग्नीध्रं ज्येष्ठदायादं कन्यापुत्रं महाबलम।। प्रियव्रतोअभ्यषिञ्चतं जम्बूद्वीपेश्वरं नृपम्।। तस्य पुत्रा बभूवुर्हि प्रजापतिसमौजसः। ज्येष्ठो नाभिरिति ख्यातस्तस्य किम्पुरूषोअनुजः।। नाभेर्हि सर्गं वक्ष्यामि हिमाह्व तन्निबोधत। (वायु 31-37, 38)

विचारणी है कि जब कम्बोडिया अपना नाम बदल कर मोलिक नाम कम्पूचिया कर सकता है, सिलोन अपने मौलिक नाम श्रीलंका को अपना सकता है तो इंडिया सिर्फ़ भारत क्यों नहीं हो सकता है। एक देश, एक नाम, एक पहचान - यह जरूरी है देश के वैश्विक गौरव के लिए।
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( सागर दिनकर, 31.08.2018)



Friday, August 24, 2018

इंटरनेट गेमर्स के निशाने पर बच्चे और युवा - डॉ. शरद सिंह ... चर्चा प्लस

 
चर्चा प्लस : इंटरनेट गेमर्स के निशाने पर बच्चे और युवा - डॉ. शरद सिंह
Dr (Miss) Sharad Singh
चर्चा प्लस :
इंटरनेट गेमर्स के निशाने पर बच्चे और युवा
- डॉ. शरद सिंह
कुछ अरसा पहले ‘ब्लू व्हेल’ नाम के इन्टरनेट गेम ने दुनिया भर में कई युवाओं की जान ले ली थी। दुनिया भर में अनेक देशों ने इस गेम को न केवल प्रतिबंधित किया था बल्कि इसे न खेले जाने के लिए मुहिम भी चलाई। ब्लू व्हेल के बाद आया ‘किकी चैलेंज’। किकी चैलेंज से भी अधिक घातक सिद्ध हुआ ‘मैरी पौपिंस चैलेंज’। इसी क्रम में अब आ गया है एक घातक व्हाटएप्प गेम -‘मोमो’। ऐसा लगता है मानो कुछ साईको किस्म के गेमर्स युवा जगत को आत्मघाती उन्माद की दुनिया में ले जाना चाहते हैं। यह वह संकट है जिसके प्रति युवाओं का सचेत रहना जरूरी है। 
इंटरनेट गेमर्स के निशाने पर बच्चे और युवा - डॉ. शरद सिंह ... चर्चा प्लसColumn of Dr (Miss) Sharad Singh in Sagar Dinkar News Paper
जिसने भी यह खबर सुनी वह चौंक गया। चौंकना स्वाभाविक था। आखिर 14 साल की उम्र भला कोई ऐसी उम्र होती है जिसमें फांसी लगा कर आत्महत्या करने का विचार आए और उसे अमल भी कर लिया जाए। शायद इंटरनेट की दुनिया में पहुंच कर बच्चे यह भी सीख रहे हैं कि आत्मघाती कदम कैसे उठाए जाते हैं। घटना मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल की है। मोबाइल पर गेम खेल रही 14 साल की बेटी को डांट लगाना मां को भारी पड़ गया। कक्षा 9वीं में पढ़ने वाली बच्ची ने कमरा बंद करके खुद को फांसी लगा ली। घर में सबकुछ ठीकठाक चल रहा था और 14 साल की बच्ची अपनी मां के फोन पर गेम खेल रही थी। बच्ची की मां ने उसे फोन छोड़कर पढ़ाई करने को कहा तो वह अपने कमरे में चले गई। मां ने उसे आवाज लगाई तो उसने कोई जवाब नहीं दिया। इसके बाद उन्होंने उसके कमरे की खिड़की खोलकर देखा तो वह स्तब्ध रह गईं। बच्ची फंदे पर लटकी हुई थी। जब उसे अस्पताल ले जाया गया तो डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया। यदि इस प्रश्न का उत्तर ढूंढा जाए कि यह आत्मघाती कदम उस नन्हीं बच्ची को कैसे सूझा होगा? तो उंगली इंटरनेट की ओर उठती है।
मोबाईल और इंटरनेट बच्चों और युवाओं सहज ही आकर्षित कर लेते हैं। मुझे आद है अपनी सागर से भोपाल की वह छोटी-सी यात्रा। राज्यरानी एक्सप्रेस की उस इकलौती चेयरकार में एक युवा मां अपने दो साल के बच्चे के साथ सफर कर रही थी। लगभग छब्बीस-सत्ताईस हज़ार कीमत का मोबाईल फोन उसने अपने बेटे के हाथ में दे रखा था। फोन की कीमत शायद इससे भी अधिक रही हो। उसका बेटा मोबाई के बटन दबाता जिससे की-पैड टोन बजती और वह खुश हो कर हाथ हिलाने लगता। इस फेर में कई बार उसके हाथ से फोन छूट कर गिरा। ऐसा लगता था जैसे आर्थिक रूप् से समृद्ध उस युवा मां को न तो अपने कीमती मोबाईल फोन की चिन्ता थी और न अपने बेटे पर पड़ने वाले फोन के दुष्प्रभाव की। उस नन्हें बच्चे पर फोन के रेडिएशन पर असर की परवाह थी। उसे तो मजा आ रहा था अपनी समृद्धि का प्रदर्शन करने में। मुझे विचार आया कि वह बच्चा ज़रा बड़ा होगा तब भी उसके हाथों में मोबाईल होगा। तब वह उन चीजों से रूबरू होगा जो उसे उस उम्र में देखनी भी नहीं चाहिए और उसे टोकने वाला कोई नहीं होगा। ऐसे ही बच्चे युवावस्था में पहुंचते-पहुंचते हानिकारक साईट्स और गेमर्स के हत्थे चढ़ जाते हैं।
कुछ समय पहले इन्टरनेट पर एक गेम आया था- ब्लू व्हेल। इस ब्लू व्हेल गेम की वजह से भारत समेत कई देशों में किशोरों और बच्चों द्वारा आत्महत्या करने के मामले सामने आए थे। लगभग 130 से ज्यादा जान गई थीं ब्लू व्हेल गेम के कारण। इस गेम के तहत खुद को हर रोज किसी न किसी तरह से नुकसान पहुंचाना होता था 50वें दिन खुद की जान लेने के साथ यह गेम खत्म होती थी अब व्हाट्सअप मंच पर उपलब्ध ‘मोमो’ से भी वैसा ही खतरा पैदा होने की आशंका जताई जा रही है। ब्लू व्हेल गेम के बाद अब इस नए व्हाट्सएप गेम ‘मोमो’ ने कई देशों की चिंता बढ़ा दी है। यह खतरनाक गेम खासतौर से किशोरों और बच्चों को अपना निशाना बनाने की कोशिश में है। विशेषज्ञों ने दुनियाभर के माता-पिता को चेताया है कि यह व्हाट्सएप गेम ब्लू व्हेल गेम की तरह घातक साबित हो सकती है। इस गेम के जरिए यूजर को हिंसक तस्वीरें भेजी जाती हैं। अगर यूजर इसे खेलने से मना करता है, तो उसे धमकाने की भी कोशिश की जाती है। इस गेम के लिए जो डरावनी तस्वीर इस्तेमाल की जा रही है, उसे जापानी कलाकार मिदोरी हायाशी ने बनाया था। हालांकि मिदोरी का इस गेम से कोई लेना-देना नहीं है। अर्जेंटीना के ब्यूनस आयर्स में एक 12 साल की लड़की की संदिग्ध मौत के पीछे इसी गेम को माना जा रहा है। पुलिस का भी यह मानना है कि मोमो गेम की चुनौती के तहत बच्ची ने संभवतः आत्महत्या का वीडियो सोशल मीडिया पर अपलोड करने की भी कोशिश की थी। अर्जेंटीना में प्रशासन ने इस संबंध में लोगों को जागरूक करने की मुहिम भी शुरू कर दी है।
इससे पहले सोशल मीडिया पर ‘‘आइस बकेट’’ चैलेंज चला था जिसमें बर्फ से भरी बाल्टी को अपने सिर पर उड़ेलना था और ऐसा करते हुए अपना वीडियो अपलोड करना था। इसके बाद सोशल मीडिया पर ट्रेंड कर करने लगा किकी चैलेंज। कनेडियन हिप हॉप सुपरस्टार ड्रेक के लेटेस्ट ऐल्बम स्कॉर्पियन के हिट सॉन्ग ‘इन माय फीलिंग’ पर शुरू हुआ ‘किकी चैलेंज’ दुनियाभर में वायरल हो गया। इसमें सिलेब्रिटीज के भी शामिल हो जाने से अधिक से अधिक लोगो को इसने आकर्षित किया। आम लोग भी इस चैलेंज को पूरा करने में जुट गए। सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि स्पेन, अमेरीका, मलेशिया और यूएई में लोग इस चैलेंज वीकार करने लगे और दूसरों के लिए मुसीबत खड़ी करने लगे। यहां तक कि पुलिस को एडवाइजरी तक जारी करनी पड़ी जिसमें लोगों से अपील की गई कि वे कीकी चैलेंज को स्वीकार न करें यह खतरनाक हो सकता है। अमेरिकी पुलिस ने इसे सबसे खतरनाक डांस मूव बताया। वहीं फ्लोरिडा की पुलिस ने यह डांस मूव करते हुए पकड़े जाने पर 1000 डॉलर का जुर्माना लगाने का एलान किया। भारत में यूपी और दिल्ली समेत कई राज्यों में पुलिस ने चेतावनी जारी की। इस चैलेंज में कैनेडियन रैपर ड्रेक के गाने ‘इन माय फीलिंग’ पर लोग चलती गाड़ी से उतरकर डांस स्टेप करते थे। इस दौरान गाड़ी की रफ्तार बहुत धीमी होती थी। चैलेंज की खास बात है कि डांस के बाद वापस चलती गाड़ी में ही बैठना होता है।
इसी तरह का घातक चैलेंज है मैरी पौपिंस चैलेंज। इसमें किसी ऊंचाई पर चढ़ कर एक खुले छाते के सहारे नीचे कूद पड़ना होता है। इस चैलेंज में भी कई लोगों ने अपनी जान गंवाई। चैलेंज वाले इन गेम्स के क्रम में अब आ धमका है ‘मोमो’ गेम। इसका प्लेटफार्म व्हाट्सएप्प होने से इसके अधिक से अधिक वायरल होने की संभावना है। भले ही भारत में एक बार में व्हाट्सएप्प मैसेज को पांच से अधिक फॉवर्ड करने पर रोक लगा दी गई है लेकिन खतरों से भरे इस गेम का खतरा सिर्फ सजगता से ही टाला जा सकता है। माता-पिता, अभिभावकों, मित्रों और शिक्षकों को अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करते हुए बच्चों और युवाओं की मोबाईल और इंटरनेट गतिविधियों पर ध्यान रखना होगा, तभी सुरक्षित रहेंगे बच्चे और युवा।
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(Sagar Dinkar, Daily, 22.08.2018)
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