Tuesday, July 10, 2018

बच्चियों की सुरक्षा के लिए लेने होंगे कठोर निर्णय - डॉ. शरद सिंह .. चर्चा प्लस

Dr (Miss) Sharad Singh
चर्चा प्लस
बच्चियों की सुरक्षा के लिए लेने होंगे कठोर निर्णय
- डॉ. शरद सिंह
भोपाल, फिर मंदसौर और अब सतना .... बच्चियों की उम्र चार से छः वर्ष और बलात्कार जैसा जघन्य अपराध, वह भी बर्बरता की सारी सीमाएं तोड़ते हुए। चार से छः वर्ष की जिस उम्र में नन्हीं बच्चियां सही ढंग से गुड्डे-गुड़ियों से भी नहीं खेल पाती हैं, उस उम्र में उन्हें जिस दरिंदगी का शिकार बनाया जा रहा है, यह किसी भी प्रकार से क्षम्य नहीं है। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने कहा है कि वे पूरा प्रयास करेंगे कि ऐसे बलात्कारियों को फांसी की सजा दी जाए। यही मांग कर रही है आम जनता भी। कठोर दंड ही अंकुश लगा सकता है इस जघन्य अपराध पर। 
Charcha Plus -Bachchiyo Ki Suraksha Ke Liye Lene Honge Kathor Nirnay - Charcha Plus Column by Dr Sharad Singh
मंदसौर की घटना के घाव अभी ताज़ा ही थे कि सतना में एक और वारदात हो गई। मानो बलात्कारियों ने मानवता को तो कही दफ्न कर दिया है और उनके मन में कानून का भय रह नहीं गया है। अपराध अन्वेषण ब्यूरो की ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार बलात्कार के मामले में मध्यप्रदेश पहले स्थान पर है। प्रदेश में बलात्कारियों के हौसले इतने बुलन्द है कि प्रदेश की राजधानी भोपाल में कुछ अरसा पहले एक नन्हीं बच्ची को बलात्कारी अपनी दरिंदगी का शिकार बना कर एक मंत्री के आवास के पास फेंक गया।
पिछले कुछ समय में इस तरह के अपराध तेजी से बढ़े हैं। हाल ही में मध्य प्रदेश के मंदसौर जिले में सात साल की बच्ची के साथ हुई सामूहिक दुष्कर्म की वारदात के बाद सतना जिले में चार साल की मासूम के साथ एक दरिंदे ने हैवानियत की। आरोपी को गिरफ्तार कर लिया गया है। पुलिस के अनुसार, उचेहरा थाने के नजदीक परसमनिया पठार इलाके में चार साल की एक बच्ची सोमवार को गंभीर हालत में पाई गई। बच्ची अपने आंगन में सो रही थी, तभी आरोपी महेंद्र सिंह (23) मासूम को अपने साथ ले गया और दुष्कर्म के बाद जब उसे लगा कि बच्ची की जान चली गई है, तो उसे निर्जन स्थान पर फेंककर भाग गया। बेटी के लापता होने पर परिजन और गांव वाले उसे तलाशने निकले तो वह गंभीर हालत में मिली। उसे अस्पताल ले जाया गया। गांव वालों ने आरोपी की खोजा और उसकी पिटाई करने के बाद उसे पुलिस के हवाले कर दिया। बताया जाता है कि उक्त आरोपी युवक संविदा शिक्षक के पद पर कार्य कर चुका है जो कि और अधिक चिंतनीय बात है। यदि शिक्षाजगत में ऐसे अपराधी मानसिकता वाले व्यक्ति काम करेंगे तो नाबालिगों पर हमेशा अपराध का साया मंडराता रहेगा।
कठुआ की घटना से द्रवित मेनका गांधी पॉक्सो यानी यौन उत्पीड़न से बच्चों के संरक्षण के क़ानून में अब बलात्कार के लिए फांसी की सज़ा जोड़ने की अपील की थी। इससे पहले बीजेपी शासित तीन राज्यों- राजस्थान, मध्य प्रदेश और हरियाणा में नाबालिग से बलात्कार पर क़ानून बना चुकी है। इस संदर्भ में कुछ लोगों ने प्रश्न उठाए थे कि बलात्कार के लिए फांसी की सज़ा होगी तो मुजरिम डरेंगे यह सच है लेकिन फांसी कैसे होगी? क्या किसी सुनवाई के बिना किसी को फांसी की सज़ा सुनाई जा सकती है? किसी को फांसी देने से पहले यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि आरोपी सचमुच बलात्कारी है या नहीं? जैसे उन्नाव के मामले में उत्तर प्रदेश के डीजीपी ने कहा था कि उनके पास आरोपी के खि़लाफ़ कोई सबूत नहीं है. तो बिना किसी सबूत के किसी को कैसे फांसी दे सकते हैं ? लेकिन यह भी विचारणीय है कि ऐसे मामलों में पुलिस के दायित्व को कम कर के नहीं आंका जा सकता हैं गवाह और सबूत पुलिस जुटाती है। यह उसका काम है। यदि कोई प्रबल राजनीतिक दबाव न हो तो वह अपने कर्त्तव्य को भली-भांति निभाती है। बेहतर यह है कि बलात्कारियों के बचने के रास्तें ढूंढने के बजाए पुलिस का मनोबल बढ़ाया जाए जिससे वह तपरता से सबूत जुटा सके। जब सबूत होंगे तो बलात्कारी को फांसी के फंदे से कोई नहीं बचा सकेगा।
आए दिन बढ़ती जा रही बलात्कार की घटनाओं को देखते हुए कड़े-से कड़ा दंड जरूरी हो चला हैं एक ऐसा दंड जिससे अपराधी अपराध करने से पहले सौ बार सोचे। भोपाल, फिर मंदसौर और अब सतना....बच्चियों की उम्र चार से छः वर्ष और बलात्कार जैसा जघन्य अपराध, वह भी बर्बरता की सारी सीमाएं तोड़ते हुए। चार से छः वर्ष की जिस उम्र में नन्हीं बच्चियां सही ढंग से गुड्डे-गुड़ियों से भी नहीं खेल पाती हैं, उस उम्र में उन्हें जिस दरिंदगी का शिकार बनाया जा रहा है, यह किसी भी प्रकार से क्षम्य नहीं है। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने कहा है कि वे पूरा प्रयास करेंगे कि ऐसे बलात्कारियों को फांसी की सजा दी जाए। यही मांग कर रही है आम जनता भी। कठोर दंड ही अंकुश लगा सकता है इस जघन्य अपराध पर।
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(दैनिक सागर दिनकर, 04.07.2018 )
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और वे निकल पड़ीं सड़कों पर आधी रात को - डॉ. शरद सिंह ...चर्चा प्लस

Dr (Miss) Sharad Singh
चर्चा प्लस  
... और वे निकल पड़ीं सड़कों पर आधी रात को
           - डॉ. शरद सिंह
सऊदी अरब में महिलाओं को ड्राइविंग का अधिकार देने का ऐतिहासिक फैसला रविवार को लागू कर दिया गया। वे आधी रात को सड़कों पर निकल पड़ीं अपनी खुशी को प्रकट करनेके लिए। स्पष्ट है कि उस देश में महिलाएं अधिकार पाती जा रही हैं जहां सदियों से औरतों के अधिकारों के बारे में ठीक से सोचा भी नहीं गया। लैंगिक रूढ़ियों को तोड़ने वाली साउदी अरब की महिलाओं ने गोया दुनिया भर के देशों को समझा दिया है कि यदि देश का अर्थतंत्र सुदृढ़ करना है तो महिलाओं की क्षमता पर विश्वास करना सीखना होगा और उन्हें सड़ी-गली रूढ़ियां से आजाद करना होगा। 
Charcha Plus -Aur Ve Nikal Padi Sadakon Pr Adhi Raat Ko - Charcha Plus Column by Dr Sharad Singh
                
सऊदी अरब में महिलाओं को ड्राइविंग का अधिकार देने का ऐतिहासिक फैसला 24 जून 2018 को लागू कर दिया गया। स्मरण रहे कि यह ऐतिहासिक फैसला कोई सरकारी रियायत या सामाजिक उपकार नहीं है। इसके लिए साउदी महिलाओं ने अट्ठाईस वर्ष लम्बा संघर्ष किया। इसकी शुरुआत तब हुई थी जब सऊदी की 40 महिलाओं ने नवंबर 1990 में रियाद में एक साथ गाड़ी चलाई। यह प्रतिबंध के खिलाफ पहली बार सार्वजनिक तौर पर विरोध था। इन महिलाओं को एक दिन के लिए जेल हुई और साथ ही पासपोर्ट भी जब्त कर लिया गया था।
सितंबर 2007 में महिला ऐक्टिविस्ट्स ने तत्कालीन किंग अब्दुल्लाह को ड्राइविंग से बैन हटाने के लिए 1000 हस्ताक्षरों के साथ एक याचिका दी। इसके बाद मार्च 2008 में वजेहा-अल हुवैदर नाम की एक ऐक्टिविस्ट ने यू-ट्यूब पर गाड़ी चलाते हुए एक विडियो पोस्ट किया। जून 2011 को फेसबुक पर ‘वूमेन टू ड्राईव’ नाम का कैंपेन लॉन्च किया गया। इससे भड़क कर सरकार की ओर से कठोर कदम उठाए गए और महिलाओं की ड्राइविंग से जुड़े 70 केस दर्ज किए गए। कुछ को गिरफ्तार भी किया गया। इस भी महिलाएं न डरीं और न रुकीं। अक्टूबर 2013 को दर्जनों महिलाओं ने ड्राइविंग करते हुए अपनी फोटो और विडियोज ऑनलाइन शेयर किए। संघर्ष जारी रहा। नवंबर 2014 में ऐक्टिविस्ट लूजा इन हथलाउल और मायसा अल अमूदी को 73 दिनों तक हिरासत में रखा गया। यूएई से सऊदी अरब तक ड्राइव करने की कोशिश के बाद इन पर आतंकवाद से जुड़े अपराध दर्ज किए गए। महिलाओं द्वारा अपना सांर्ष जारी रखने और लगातार मांग किए जाते रहने पर किंग सलमान ने मामले को अपने संज्ञान में लिया और सितंबर 2017 को महिलाओं के ड्राइविंग को मंजूरी का आदेश दिया। फिर भी इसे लागू होने में लगभग नौ माह लग गए। अंततः 24 जून 2018 को महिलाओं को ड्राइविंग सीट मिल ही गई।
साउदी महिलाओं ने इस फैसले को सही ठहराने वाला एक धमाकेदार उदाहरण भी दुनिया के सामने रख दिया। सऊदी अरब में महिलाओं के ड्राइविंग करने पर लगा प्रतिबंध हटने के बाद साउदी महिला असील अल हमद फॉर्मूला वन कार चलाने वाली पहली महिला बन गईं। उन्होंने यह उपलब्धि फ्रांस में हासिल की। असील ने फ्रेंच ग्रां प्री से पहले ‘ले कास्टेलेट सर्किट’ पर यह कार चलाई। एफ वन टीम रैनो ने उन्हें यह अवसर दिया। असील रैनो टीम की ’पैशन परेड’ का हिस्सा हैं। सऊदी अरब की मोटर स्पोर्ट्स की पहली महिला सदस्य असील वही कार चलाती दिखीं जिससे 2012 में अबू धाबी में किमी राइकोनेन ने जीत दर्ज की थी।
सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान का यह फैसला देश के सबसे बड़े सामाजिक सुधारों में से एक है। यह उनके तेल पर अर्थव्यवस्था की निर्भरता खत्म करने की योजना का भी मुख्य हिस्सा है। दाऊद बताते हैं कि अगर हर साल देश में महिलाओं के रोजगार से जुड़ने का आंकड़ा एक प्रतिशत भी रहता है तो यह श्रमिक बाज़ार में हर साल 70,000 और महिलाओं को जोड़ेगा। महिलाओं की भागीदारी आर्थिक विकास दर में 0.9 प्रतिशत का योगदान देगी। अकेले इस फैसले से तेल पर आधारित अर्थव्यवस्था वाले देश सऊदी को अरबों डॉलर की कमाई होगी। बताया जा रहा है कि साल 2030 तक अकेले इतनी कमाई होने की उम्मीद है जितनी सरकारी कंपनी अरमाको के 5 प्रतिशत शेयर को बेचने से होने वाली है। विगत वर्ष सितंबर में किंग सलमान ने अपने बेटे मोहम्मद बिन सलमान द्वारा सुधारों को लागू किए जाने के बाद महिलाओं के ड्राइविंग पर लगे बैन को हटाने का आदेश दिया था।
सरकार के इस फैसले के बाद रविवार को महिलाएं व्यस्त सड़क पर वाहन चलाती नजर आईं। रियाद में गाड़ियों के काफिले के साथ भी महिलाएं देखी गईं। इस फैसले के साथ ही दुनिया में अब ऐसा कोई देश नहीं बचा है, जहां महिलाओं की ड्राइविंग पर रोक हो। दुनिया भर की महिलाओं ने सऊदी अरब के इस फैसले का खुल कर स्वागत किया। सऊदी अरब के इस फैसले को वहां के आर्थिक जगत में महिलाओं की भागीदारी में वृद्धि के रूप में देखा जा रहा है। दुबई में रहने वाले और ब्लूमबर्ग में मध्य पूर्व के चीफ अर्थशास्त्री के रूप में काम करने वाले जियाद दाऊद ने इस पर बताया, ’ड्राइविंग से बैन हटाने पर नौकरी करने वाली महिलाओं की संख्या में वृद्धि के आसार हैं, इससे पेशेवरों की संख्या बढ़ेंगी और यह कुल आय में वृद्धि करेगा।’ ब्लूमबर्ग इकनॉमिक्स के मुताबिक, इस फैसले से 2030 तक सऊदी 90 अरब डॉलर से ज्यादा कमा सकता है। साउदी अरब के ऊर्जा मंत्री खालिद अल-फालिह ने भी माना है कि बैन हटाने का मतलब है कि महिलाएं और अधिक सशक्त होंगी। नौकरी के क्षेत्र में उनकी भागीदारी और बढ़ेगी, ऐसे में मुझे लगता है कि यह फैसला देश में महिलाओं के रोजगार को बढ़ाने में योगदान देगा।
लैंगिक रूढ़ियों को तोड़ने वाली साउदी अरब की महिलाओं ने गोया दुनिया भर के देशों को समझा दिया है कि यदि देश का अर्थतंत्र सुदृढ़ करना है तो महिलाओं की क्षमता पर विश्वास करना सीखना होगा और उन्हें सड़ीगली रूढ़ियां से आजाद करना होगा।
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(दैनिक सागर दिनकर, 28.06.2018 )          ---------------------------
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योग ने बनाई है सेहत भी पहचान भी - डॉ. शरद सिंह ... चर्चा प्लस

Dr (Miss) Sharad Singh
चर्चा प्लसः
योग ने बनाई है सेहत भी पहचान भी
   - डॉ. शरद सिंह                          
अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस भले ही 21 जून को मनाया जाना है लेकिन उसका उत्साह महीने भर से छाया हुआ है। आज सभी एकमत से स्वीकार करते हैं कि योग ने जहां हमें सेहत दी है वहीं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर एक अलग पहचान भी दी है। वस्तुतः योग स्वस्थ जीवन जीने की शैली है और अब जरूरत है इसे उस निचले तबके तक पहुंचाने की जहां कुपोषण का साम्राज्य है और सेहत के प्रति जागरूकता का तो नामोनिशान भी नहीं है। अब प्राथमिकता भी यही होनी चाहिए कम पढ़ा-लिखा और जीवन के हर कदम पर रोजी-रोटी के लिए जूझने वाला तबका भी दो पल के लिए अपनी सेहत के बारे में सोचे और योग को अपनाए। तभी सही मायने में स्वस्थ भारत की परिकल्पना साकार हो सकेगी। भूख, गरीबी और दिहाड़ी के बीच की यह डगर कठिन है किन्तु असंभव कुछ भी नहीं है अगर हम ठान लें।    
Charcha Plus -Yoga Ne Banai Sehat Bhi Pahachan Bhi - Charcha Plus Column by Dr Sharad Singh
   
“योग भारत की प्राचीन परंपरा का एक अमूल्य उपहार है यह दिमाग और शरीर की एकता का प्रतीक है; मनुष्य और प्रकृति के बीच सामंजस्य है; विचार, संयम और पूर्ति प्रदान करने वाला है तथा स्वास्थ्य और भलाई के लिए एक समग्र दृष्टिकोण को भी प्रदान करने वाला है। यह व्यायाम के बारे में नहीं है, लेकिन अपने भीतर एकता की भावना, दुनिया और प्रकृति की खोज के विषय में है। हमारी बदलती जीवन-शैली में यह चेतना बनकर, हमें जलवायु परिवर्तन से निपटने में मदद कर सकता है। तो आएं एक अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस को गोद लेने की दिशा में काम करते हैं।“ ये शब्द थे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के संयुक्त राष्ट्र महासभा में योग की पैरवी करते हुए। इसके बाद 11 दिसम्बर 2014 को संयुक्त राष्ट्र में 177 सदस्यों द्वारा 21 जून को “ अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस“ को मनाने के प्रस्ताव को मंजूरी मिली। प्रधानमंत्री मोदी के इस प्रस्ताव को 90 दिन के अंदर पूर्ण बहुमत से पारित किया गया, जो संयुक्त राष्ट्र संघ में किसी दिवस प्रस्ताव के लिए सबसे कम समय है। परिणामतः 21 जून को “ अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस“ घोषित किया गया। इस एक घोषणा से सारी दुनिया योग से जुड़ गई। इसमें कोई संदेह नहीं है कि योग सिर्फ कसरत नहीं है बल्कि यह स्वस्थ जीवन जीने की एक शैली है और प्रधानमंत्री मोदी ने इस जीवनशैली को ग्लोबल बनाने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार संसार के सबसे पहले योगी हैं भगवान शिव। वैदिक ऋषि-मुनियों ने शिव द्वारा प्रदत्त योग को अपनी जीवनशैली बनाया और उसका विशद विवरण ताड़पत्रों पर लिखा। योगाभ्यास के प्रामाणिक सूत्र लगभग 3000 हजार ईसापूर्व सिन्धुघाटी सभ्यता के अवशेषों में मिलते हैं। लगभग 200 ईसापूर्व योग पर एक ग्रंथ लिखा गया था जिसका नाम था ‘‘योगसूत्र’’। हिन्दू, जैन, बौद्ध इन सभी धर्मों में योग के महत्व को प्रतिपादित किया गया है। भारत की यह प्राचीनतम परम्परा समूचे विश्व को हमेशा आकर्षित करती रही है। आज हॉलीवुड के नामचीन सितारे भी अपनी फिटनेस बनाए रखने के लिए योग करते हैं, फिर वो चाहे किम कर्देशियन हो या जेनीफर लोपेज। बस, हम आम भारतीय ही अपनी रोजी-रोटी के चक्कर में इस जीवनशैली से दूर होते चले गए। मानो हमारी भागमभाग वाली दिनचर्या ने हमें अपनी सेहत के बारे में सोचने से ही रोक दिया। आमतौर पर औसत भारतीयों को अपनी सेहत की सलामती की याद तभी आती है जब उसे डॉक्टरों के चक्कर काटने पड़ते हैं। ऐसे में ढेर सारी दवाओं और ढेरों परहेज के साथ वही जीवनचर्या अपनानी पड़ती है जिसे योग में बताया गया है।
मुझे याद है कि 12 मई 2016 को उज्जैन सिंहस्थ के दौरान ‘अंतर्राष्ट्रीय विचार महाकुंभ’ में योग पर चर्चा के दौरान मैंने तत्कालीन पर्यावरण मंत्री अनिल माधव दवे से प्रश्न किया था कि गंदी बस्तियों और  झुग्गी-झोपड़ी में रहने वालों को सेहत के प्रति जागरूक करने के लिए क्या कोई ऐसा मॉडल बनाया जा सकता है जो उन्हें योग से जोड़ सके? इस पर उन्होंने उत्तर दिया था कि ‘‘हां, इस पर ध्यान दिया जाना चाहिए।’’ और फिर स्व. दवे ने योग पर चर्चा करने धर्मशाला से आए बौद्ध भिक्षु से इस बारे में राय मांगी थी। सिंहस्थ विचार महाकुंभ के बाद मेरी दोबारा अनिल माधव दवे जी से भेंट नहीं हो सकी और मुझे पता नहीं चल सका कि इस संबंध में शासन की कोई राय बनी या नहीं। किन्तु प्रधानमंत्री मोदी ने जिस तरह योग को संयुक्तराष्ट्र संघ से अंतर्राष्ट्रीय दिवस घोषित कराया और इससे उन सेलीब्रटीज़ को जोड़ा जो निचले तबके के दिलों पर भी राज करते हैं, इससे आशा बंधी है कि एक दिन वह तबका भी अपनी सेहत के लिए योग का सस्ता नहीं बल्कि निःशुल्क, सुंंदर और टिकाऊ रास्ता अपना लेगा। अब प्राथमिकता भी यही होनी चाहिए कम पढ़ा-लिखा और जीवन के हर कदम पर रोजी-रोटी के लिए जूझने वाला तबका भी दो पल के लिए अपनी सेहत के बारे में सोचे और योग को अपनाए। तभी सही मायने में स्वस्थ भारत की परिकल्पना साकार हो सकेगी। आखिर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर देखें तो योग ने बनाई है हम भारतियों की सेहत भी और भारत की पहचान भी।        
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(दैनिक सागर दिनकर, 20.06.2018 )
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Friday, June 15, 2018

‘नई दुनिया’ (In All Editions) के ‘अधबीच’ कॉलम में

‘नई दुनिया’ (In All Editions) के ‘अधबीच’ कॉलम में आज (15.06.2018) मेरा यह लेख प्रकाशित हुआ है...आप भी पढ़िए ! इस लिंक पर भी आप इसे पढ़ सकते हैं- https://naiduniaepaper.jagran.com/Article_detail.aspx… 
हार्दिक धन्यवाद एवं आभार ‘नई दुनिया’




चर्चा प्लस : बारिश में भीगता अनाज और खून के आंसू - डॉ. शरद सिंह ‘दबंग मीडिया’ में

मुझे प्रसन्नता है कि ‘दबंग मीडिया’ ने मेरे लेख को प्रमुखता से प्रकाशित किया है।
आभारी हूं 'दबंग मीडिया' की और भाई हेमेन्द्र सिंह चंदेल बगौता की जिन्होंने मेरे इस समसामयिक लेख को और अधिक पाठकों तक पहुंचाया है.... 
चर्चा प्लस : बारिश में भीगता अनाज और खून के आंसू - डॉ. शरद सिंह  In Daban Media

चर्चा प्लस : बारिश में भीगता अनाज और खून के आंसू - डॉ. शरद सिंह

चर्चा प्लस :
बारिश में भीगता अनाज और खून के आंसू
- डॉ. शरद सिंह
खून-पसीना एक कर के जिस अनाज को किसान उगाता है वह अगर उसकी आंखों के सामने बारिश में भीग कर खराब हो जाए तो इससे बढ़ कर दुर्भाग्य उसके लिए और कुछ नहीं हो सकता है। शासन हर कदम पर किसानों की मदद करना चाहती है वहीं प्रशासनिक लापरवाही और कमियां न केवल योजनाओं को अपितु किसानों की मेहनत को भी हर साल बड़े पैमाने पर पानी में सड़ा देती है। कि
सान तो खून के आंसू रोता ही है, साथ में आम जनता भी विवश हो जाती है मंहगा अनाज खरीदने को। सवाल यह है कि चूक एक बार हो तो वह चूक कही जा सकती है लेकिन प्रति वर्ष वही विडम्बना दोहराई जाए तो उसे अपराध नही ंतो और क्या कहेंगे? इस अव्यवस्था के चलते देश में हर साल लगभग 2.10 करोड़ टन गेहूं बर्बाद होता है।
चर्चा प्लस : बारिश में भीगता अनाज और खून के आंसू - डॉ. शरद सिंह .. Article for Column - Charcha Plus by Dr Sharad Singh in Sagar Dinkar Dainik
 देश में गेहूं बर्बाद होने से कई सवाल राज्यों से लेकर केन्द्र की सरकारों पर हमेशा से खड़े होते रहे हैं। इस विषय में सुप्रीम कोर्ट ने भी केंद्र से कहा था कि देश के गोदामों में गेहूं सड़ा देने से अच्छा है उसे उसे गरीबों में बांट दिया जाए। गेहूं की बर्बादी को लेकर सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी कई मायनों में बहुत महत्वपूर्ण थी। एक रिपोर्ट के मुताबिक देश में भुखमरी का सामना करने वाले सबसे ज्यादा प्रभावित लोग हैं। देश में करीब 19 करोड़ लोगों को उनकी आवश्यकता के अनुसार भोजन नहीं मिल पा रहा है। वहीं देश में हर साल 2.10 करोड़ टन गेहूं बर्बाद होता है। इस बर्बादी को लेकर न तो भारतीय खाद्य निगम गंभीर है और न ही गेहूं खरीदने वाली राज्य की एजेंसियां।
अनाज की सुरक्षा और भंडारण के दौरान हुए नुकसान के कुछ ताज़ा उदाहरण देखें कि 08 जून 2018, मध्य प्रदेश के दमोह और हटा में अधिकारियों की लापरवाही से लाखों रुपये के चने बारिश में भीग गए। कृषिमंडी में चने की ये बोरियां खुले में रखी गई थीं। चने को बारिश से बचाने के लिए अधिकारियों ने कोई उचित व्यवस्था नहीं की थी। न तो बोरियों को शेल्टर में रखवाईं गईं और न ही चने को बचाने के लिए कोई इंतजाम किया। मंडी के जिम्मेदार अधिकारियों की लापरवाही के चलते किसानों के लाखों रुपये के काबुली चने पानी में बह गए। कृषि उपज मंडी में काबुली चने की ये बोरियां खुले में रखी थीं। इसके पूर्व 15 मई 2018 को सुसनेर में भी इसी तरह लापरवाही के चलते 5 हजार क्विंटल अनाज बारिश की भेंट चढ़ गया था।
मध्यप्रदेश के सतना जिले में 82 जगहों पर सरकार ने समर्थन मूल्य पर गेहूं खरीद केन्द्र खोले। अब तक आईं तेज तूफानी हवाओं और बारिश ने इन केन्द्रों में करोड़ों का नुकसान कर दिया। उचित व्यवस्था न होने की वजह से बड़ी मात्रा में गेहूं गीला हो गया। मई माह तक जिले में 1,00,469 मीट्रिक टन गेहूं की खरीदी हो चुकी थी। मगर खरीद केन्द्रों से सिर्फ परिवहन और भंडारण 83,323 टन ही हुआ था। शेष का 20,746 मीट्रिक टन गेंहू बारिश से भीग गया। अनाज साथ ही हरपालपुर रेलवे स्टेशन पर खुले मे 3270 टन यूरिया टीकमगढ़ और छतरपुर मे विपणन संघ के माध्यम से किसानों को बांटा जाना था लेकिन अधिकारियों की लापरवाही से 500 टन यूरिया गीला हो गया।
मध्यप्रदेश ही नहीं बल्कि उत्तर प्रदेश में भी भंडारण को ले कर बड़ी गड़बड़ियां सामने आती रही है। इस वर्ष को ही लें तो उत्तर प्रदेश के गेहूं का भंडारण के बारे में समाचार ऐजेंसियों ने विगत चार मई को ही आगाह करा दिया था कि करोड़ों रुपये का गेहूं क्रय केंद्रों पर खुले में पड़ा है। बारिश होने के साथ ही यह गेहूं भीग जाएगा। मई माह तक 35069.25 मीट्रिंक टन गेहूं की खरीद हो चुकी थी। लेकिन भंडारण के लिए र्प्याप्त स्थान नहीं होने से संकट के बादल मंडराने लगे। बदायूं के उझानी में 4500 एमटी भंडारण किया गया। इसके बाद वहां से भी भंडारण के लिए इंकार कर दिया गया। एटा में भी अब तक 17000 एमटी से अधिक का गेहूं भंडारित हो चुका तो एटा ने भी भंडारण करने से हाथ खड़े कर लिए। इससे क्रय केंद्रों पर खुले में रखे 4479.55 एमटी गेहूं के भंडारण की समस्या हो गई। गेहूं की खरीद 30 जून तक होनी है। जिससे क्रय केंद्रों पर और भी गेहूं आएगा। जबकि अभी भी लगभग करीब 8 करोड़ रुपये का गेहूं क्रय केंद्रों पर खुले में पड़ा है। कन्नौज में अब तक सैंकड़ों बोरी गेहूं पानी में भीगकर पहले ही खराब हो चुका है।
उल्लेखनीय है कि विकासशील देशों के ग्लोबल हंगर इंडेक्स में भारत की रैंकिंग 97वें स्थान पर थी, लेकिन एक साल में यह तीन पायदान और गिर कर 100 वें स्थान पर पहुंच गई। भारत जैसे देश में जहां रोजाना लगभग 5013 बच्चे कुपोषण और भुखमरी का शिकार हो जाते हैं, वहां अनाज की इस तरह बर्बादी किया जाना अत्यंत दुर्भाग्य की बात है।
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(दैनिक सागर दिनकर, 13.06.2018 )
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Friday, June 8, 2018

चर्चा प्लस : अनदेखा किया तो देर हो जाएगी .. डॉ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
चर्चा प्लस : अनदेखा किया तो देर हो जाएगी
- डॉ. शरद सिंह
मौसम की अपनी विशेषता होती है, लेकिन अब इसका ढंग बदल रहा है। गर्मियां लंबी होती जा रही हैं, और सर्दियां छोटी। पूरी दुनिया में ऐसा हो रहा है। यही है जलवायु परिवर्तन जिसके प्रभाव इन रूपों में दिखने लगे हैं - पीने के पानी की कमी, खाद्यान्न उत्पादन में कमी, बाढ़, तूफ़ान, सूखा और गर्म हवाओं में वृद्धि। हम हरे-भरे जंगल को काट कर क्रांक्रीट के जंगल खड़े करते जा रहे हैं। ग्लोबल वार्मिंग यानी पृथ्वी के तापमान में वृद्धि और इसके कारण मौसम में होने वाले परिवर्तन के कारण पृथ्वी पर विगत 100 सालों के औसत तापमान पर 10 फारेनहाईट आंका गया है और जिसके के परिणामस्वरूप बारिश के तरीकों में बदलाव, हिमखण्डों और ग्लेशियरों के पिघलने, समुद्र के जलस्तर में वृद्धि और वनस्पति तथा जन्तु जगत पर प्रभावों के रूप के सामने आ रहे हैं। इनके परिणामों के प्रति समय रहते हमें सचेत होना होगा।

चर्चा प्लस : अनदेखा किया तो देर हो जाएगी ..  डॉ. शरद सिंह .. Article for Column - Charcha Plus by Dr Sharad Singh in Sagar Dinkar Dainik
पर्यावरणीय खतरों से भारत अछूता नहीं है। हिमालय के ग्लेशियर पिघलने से खतरा बढ़ता जा रहा है। कुल 155 वर्ग किलोमीटर पर फैला ये ग्लेशियर पिछले पचास साल में करीब पंद्रह फीसदी सिकुड़ चुका है। कश्मीर में ग्लेशियरों से ढंकी जमीन में 21 प्रतिशत की कमी आई है। हिमालय के ग्लेशियर के पिघलने से भारत में आ सकती है बाढ़। हिमालय के ग्लेशियर के पिघलने से समंदर का बढ़ रहा है जल स्तर. हिमालय के ग्लेशियर के पिघलने का एक बड़ा खतरा खेती पर भी पड़ेगा। ग्लेशियर के कम होने से उत्पन्न चटियल जमीन सूरज की 80 फीसदी रोशनी को सोख लेती है जिससे तापमान बढ़ता है जबकि ग्लेशियर 80 फीसदी रोशनी को वापस परावर्तित कर देता है। परिणामतः पर्वतीय क्षेत्रों में बर्फबारी भी कम हो रही है जिससे वहां फसल चक्र बर्बाद होने का खतरा मंडरा रहा है। स्पष्ट है कि खतरा सिर्फ भारत को ही नहीं है बल्कि आसपास के दूसरे देशों को भी है। हिमालय के ग्लेशियर के पिघलने का एक बड़ा खतरा बाढ़ का भी है। ग्लेशियर से पिघला हुआ पानी एक जगह किसी झील में लगातार जमा हो सकता है जो किसी भी वक्त टूटकर अपने राह में पड़ने वाली हर चीज को तबाह कर सकता है। दुनिया का सबसे बड़ा डेल्टा सुंदरबन का अस्तित्व भी खतरे में है क्योंकि हिमालय और दुनियाभर के ग्लेशियर पिघलने की वजह से समंदर का जलस्तर भी अब बढ़ने लगा है। इसका असर सुंदरबन पर दिखने भी लगा है। हर साल 1 मिलीमीटर से लेकर 2 मिलीमीटर तक समंदर का जलस्तर बढ़ता जा रहा है। ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने से खासकर जम्मू कश्मीर का औसत तापमान लगातार बढ़ता ही जा रहा है। इंडियन स्पेस रिसर्च आर्गेनाइजेशन के स्पेस एप्लीकेशन सेंटर अहमदाबाद के सर्वे में से चौंकाने वाले तथ्य सामने आए कि कश्मीर में ग्लेशियरों से ढंकी जमीन में 21 प्रतिशत की कमी आई है। कभी अकेले जनस्कार में पांच सौ ग्लेशियर हुआ करते थे और पिछले पचास सालों में 200 ग्लेशियर खत्म हो चुके हैं। कारगिल और लद्दाख के करीब तीन सौ ग्लेशियर सोलह फीसदी पिघल चुके हैं। इससे तापमान बढ़ रहा है। पैदावार पर असर पड़ रहा है और कार्बन डाईऑक्साइड की मात्रा बढ़ रही है।
सबसे ज्यादा चिंता उत्तराखंड के ग्लेशियर्स का पिघलना है। 120 सालों में पिंडरी ग्लेशियर 2840 मीटर तक घट चुका है। यानी सालाना 23.5 मीटर के दर से ये ग्लेशियर पिघल रहा है। गंगोत्री ग्लेशिय़र जो देश की सबसे बड़ी नदी गंगा का जलस्रोत है, डेढ़ सौ सालों में 1147 मीटर नीचे आ चुका है। सन् 1971 से 2005 के बीच गंगोत्री क्षेत्र का ग्लेशियर 565 मीटर तक पिघल चुका है, यानी हर साल गंगोत्री में 15 मीटर तक की कमी आ रही है। ठीक ऐसे ही मिलाम ग्लेशियर 85 सालों में 990 मीटर पिघल चुका है। 50 सालों में पोंटिंग ग्लेशियर 262 मीटर नीचे आ चुका है। हिमाचल के त्रिलोकनाथ ग्लेशियर में सिर्फ 25 सालों में 400 मीटर की कमी आई है जबकि बड़ा सिंगरी ग्लेशियर सिर्फ 17 सालों में 650 मीटर तक पिघल चुका है। कुछ वर्ष पहले तक कई वैज्ञानिक जलवायु परिवर्तन को ग्लेशियर्स के पिघलने की वजह मानने से इंकार करते रहे हैं लेकिन हाल के सालों में वैज्ञानिकों के बीच ये आम राय बन चुकी है कि पिघलते ग्लेशियर्श बढ़ते तापमान का ही असर है और जल्द से जल्द इसे रोकना हम सब के लिए बेहद जरूरी है।
जो पर्यावरण हमें जीवन देता है हम उसी को तेजी के साथ नष्ट करते जा रहे हैं। ग्लोबल वार्मिंग, ग्लेशियर्स मेल्टिंग और वेदर चेंजिंग - ये तीनों हमारी खुद की पैदा की गई मुसीबतें हैं जो समूची दुनिया को भयावह परिणाम की ओर ले जा रही है। यदि हम अब भी नहीं चेते तो हमारे जीवन की डाल कट जाएगी और नीचे गिरने पर हमें धरती का टुकड़ा भी नहीं मिलेगा। दरअसल, हमें अपने रहन-सहन के ढंग को अधिक से अधिक ‘इको फ्रेंडली’ बनाना होगा तभी हम अपनी भावी पीढ़ी को विरासत में यह पृथ्वी दे सकेंगे।
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( दैनिक सागर दिनकर, 06.06.2018 )
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