Friday, February 23, 2018

अंतर्राष्ट्रीय मातृ भाषा दिवस (21 फरवरी 2018) को डॉ. (सुश्री) शरद सिंह मुख्य अतिथि

Inter National Mother Language Day 2018 - Dr (Miss) Sharad Singh as Chief Guest
अंतर्राष्ट्रीय मातृ भाषा दिवस (21 फरवरी 2018) को स्थानीय साहित्य एवं कलाधर्मी संस्था श्यामलम कला द्वारा जे.जे. इंस्टीट्यूट के सभागार में एक बहुभाषी विचारगोष्ठी का आयोजन किया गया जिसमें मैने मुख्य अतिथि के रूप में अपने विचार साझा किए। 
तस्वीरें उसी अवसर की...
International Mother Language Day (21 February 2018) celebrated as a multilingual discussion by Shyamalam Kala which is a local literary organization at auditorium of J.J. Institute. I shared my views as the chief guest. Photos of the same occasion ....
Inter National Mother Language Day 2018 - Dr (Miss) Sharad Singh as Chief Guest

Inter National Mother Language Day 2018 - Dr (Miss) Sharad Singh as Chief Guest

Inter National Mother Language Day 2018 - Dr (Miss) Sharad Singh as Chief Guest
 Inter National Mother Language Day 2018 - Dr (Miss) Sharad Singh as Chief Guest 5 - News - Naidunia, Sagar Edition, 23.02.2018
News - Dainik Bhaskar, Sagar Edition, 23.02.2018 - Inter National Mother Language Day 2018 - Dr (Miss) Sharad Singh as Chief Guest
Inter National Mother Language Day 2018 - Dr (Miss) Sharad Singh as Chief Guest

Inter National Mother Language Day 2018 - Dr (Miss) Sharad Singh as Chief Guest
Inter National Mother Language Day 2018 - Dr (Miss) Sharad Singh as Chief Guest

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Inter National Mother Language Day 2018 - Dr (Miss) Sharad Singh as Chief Guest
 
News - Aacharan, Sagar Edition, 23.02.2018 Inter National Mother Language Day 2018 - Dr (Miss) Sharad Singh as Chief Guest

खरीदी हुई भाषा व्यापार दे सकती है, संस्कार नहीं ... डॉ. शरद सिंह... चर्चा प्लस

Dr (Miss) Sharad Singh
चर्चा प्लस 

21 फरवरी : अन्तर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस पर विशेष

 
खरीदी हुई भाषा व्यापार दे सकती है, संस्कार नहीं
- डॉ. शरद सिंह

आज यदि हमारे संस्कार गड़बड़ा रहे हैं तो उसका सबसे बड़ा कारण यही है कि अपनी देशज़ भाषाओं की जड़ों में अंग्रेजी का मट्ठा डाल कर उसे सुखाने पर उतारू हैं। सच्चाई तो यह है कि नई पीढ़ी की माएं भी अपने बच्चों को उस भाषा में लोरी सुनाने का प्रयास करती हैं जो उन्हें अपनी मां से नहीं बल्कि अंग्रेजी स्कूलों से खरीद कर मिली है। जबकि याद रखा जाता चाहिए कि खरीदी हुई भाषा व्यापार दे सकती है, संस्कार नहीं। संस्कार तो मातृभाषा ही देती है।
21 फरवरी- अन्तर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस पर विशेष -  खरीदी हुई भाषा व्यापार दे सकती है, संस्कार नहीं - ...Lekh for Column - Charcha Plus by Dr Sharad Singh in Sagar Dinkar Dainik


इला सरस्वती मही तिस्त्रो देवीर्मयोभुवः। - ऋग्वेद (1-13-9) में दिए गए इस श्लोक का भावार्थ है कि कि मातृभूमि, मातृसंस्कृति व मातृभाषा तीन देवियां हैं, इनकी उपासना करनी चाहिए, ये सुखदात्री है।
अन्तर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस प्रतिवर्ष 21 फरवरी को मनाया जाता है। 17 नवंबर 1999 को यूनेस्को ने इसे स्वीकृति दी। यूनेस्को द्वारा स्वीकृत इस दिवस का उद्देश्य भाषाई, सांस्कृतिक विविधा को बढ़ावा देना। मातृभाषा सामाजिक, पारिवारिक एवं जातीय संस्कारों की संवाहक होती है। बच्चा मां की गोद से ही भाषा का प्रथम ज्ञान प्राप्त करता है। लोरी और कहानियों के माध्यम से वह भाषा संस्कार यानी साहित्य से जुड़ता है। यही तथ्य इस बात को भी साबित करता है कि प्रत्येक वह साहित्य जो लेखक ने अपनी मातृभाषा में लिखा हो, अधिक प्रभावी होता है। जो साहित्य मातृभाषा में लिखा जाता है वही ज़मीन से जुड़ा हुआ होता है और पाठक के हृदय को सरलता से छूता है। यहां मातृभाषा अपनी विस्तृत परिभाषा के साथ प्रस्तुत होती है। एक ऐसे समुद्र की तरह जिसमें विभिन्न बोलियां समाहित होती हैं। बोली और भाषा में अंतर को ध्यान रखना जरूरी है। एक मातृभाषा में विभिन्न बोलियां होती हैं। बुंदेलखण्डी बोली है, न कि भाषा। यदि हमें इसे भाषा का दर्ज़ा दिलाना है तो इस बात को ध्यान में रखना होगा कि हम बोली को भाषा का दर्ज़ा दिलाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। तभी हम सही दिशा में प्रयास कर सकेंगे। मान लेने और होने में बहुत अन्तर होता है। भोपाल में आयोजित दसवें विश्व हिन्दी सम्मेलन में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था कि ‘‘भारत में भाषाओं का अनमोल खजाना है, यदि इन्हें हिन्दी से जोड़ा जाए तो हमारी मातृभाषा और अधिक मजबूत होगी।’’

मातृभाषा में सीखना सरल होता है क्योंकि बच्चा उस भाषा से ही संवाद की ध्वनियों को पहचानना सीखता है। वह उसकी अपनी भाषा होती है। अपनी इस मौलिक मातृ भाषा के साथ ही वह पलता और बढ़ता है। अतः अपनी मातृभाषा को व्यवहार में लाना उसका पहला अधिकार होता है। परंतु हमारे देश में राजनीतिक, आर्थिक और तकनीकी कारणों से भाषा और मातृभाषा का सवाल उलझता ही चला गया। आज की कटु हकीकत यही है कि भाषाई साम्राज्यवाद के कारण अंग्रेजी प्रभु भाषा के रूप में स्थापित है और आज के प्रतिस्पर्धा और वैश्वीकरण के जमाने में हमने अंग्रेजी को मुक्तिद्वार मान लिया है। हम भूल जाते हैं कि भाषा सीखने का बना-बनाया आधार मातृभाषा होती है और उसके माध्यम से विचारों और कलेवर आदि को सीखना, समझना आसान होता है। ऐसा न कर हम शिशुओं का समय विषय को छोड़ कर अंग्रेजी सीखने में लगा देते हैं और उसके माध्यम से विषय को सीखना केवल अनुवाद की मानसिकता को ही बल देता है. साथ ही हर भाषा किसी न किसी संस्कृति और मूल्य व्यवस्था की वाहिका होती है। हम अंग्रेजी को अपना कर अपने आचरण और मूल्य व्यवस्था को भी बदलते हैं और इसी क्रम में अपनी सांस्कृतिक धरोहर को भी विस्मृत करते जा रहे हैं।
मातृभाषा बहुत पुराना शब्द नहीं है, मगर इसकी व्याख्या करते हुए लोग अक्सर इसे बहुत प्राचीन मान लेते हैं। हिन्दी का मातृभाषा शब्द दरअसल अंग्रेजी के मदरटंग मुहावरे का शाब्दिक अनुवाद है। जन्म लेने के बाद मानव जो प्रथम भाषा सीखता है उसे उसकी मातृभाषा कहते हैं। मातृभाषा, किसी भी व्यक्ति की सामाजिक एवं भाषाई पहचान होती है। बच्चे का शैशव जहां बीतता है, उस माहौल में ही जननी भाव है। जिस परिवेश में वह गढ़ा जा रहा है, जिस भाषा के माध्यम से वह अन्य भाषाएं सीख रहा है, जहां विकसित-पल्लवित हो रहा है, वही महत्वपूर्ण है। उल्लेखनीय है कि मातृभाषा दिवस की संकल्पना बांग्लादेश के भाषा आंदोलन से उत्पन्न हुई। यूनेस्को द्वारा अन्तर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस की घोषणा से बांग्लादेश के भाषा आन्दोलन दिवस को अन्तर्राष्ट्रीय स्वीकृति मिली, जो बांग्लादेश में सन् 1952 से मनाया जाता रहा है। संयुक्त राष्ट्र आम सभा ने सन् 2008 को अन्तर्राष्ट्रीय भाषा वर्ष घोषित किया था।
मातृभाषा में सीखना सरल होता है क्योंकि बच्चा उस भाषा के साथ सांस लेता है और जीता है. वह उसकी अपनी भाषा होती है और उस भाषा को व्यवहार में लाना उसका मानव अधिकार है. परंतु भारत में राजनीतिक, आर्थिक और तकनीकी कारणों से भाषा और मातृभाषा का सवाल उलझता ही चला गया. आज की कटु सच्चाई यही है कि अंग्रेजों की गुलामी से हमने स्वयं को स्वतंत्र कर लिया लेकिन अंग्रेजी की गुलामी हम शान से कर रहे हैं। हम अपने परिवार के बच्चे पर दबाव डालते हैं कि वह अंग्रेजी में ‘पोएम’ सुनाए और जब वह सुना देता है तो हम गर्व से छलछला उठते हैं। दिक्कत यही है कि हम स्वयं अपनी मातृभाषा को हेय समझने लगते हैं। जबकि अब तक अनेक अध्ययनों से प्रमाणित हो चुका है कि जो बच्चे मातृभाषा में स्कूली शिक्षा ग्रहण करते हैं, वे अधिक सीखते हैं। बुनियादी शिक्षा मातृभाषा में हो और अंग्रेजी वैश्विक संपर्क-भाषा के रूप में ही रहे।
यूनेस्को द्वारा और अनेक देशों में हुए शोध से यह प्रमाणित है कि छात्रों की शैक्षिक उपलब्धि, दूसरी भाषा की उपलब्धि, चिंतन की क्षमता, जानकारी को पचा कर समझ पाने की क्षमता, सृजनशक्ति और कल्पनाशीलता, इनसे उपजने वाला अपनी सामर्थ्य का बोध मातृभाषा के माध्यम से ही उपजता है। कुल मिलाकर मातृभाषा के माध्यम से सीखने का बौद्धिक विकास पर बहुआयामी सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। ऐसे में मातृभाषा को आरंभिक शिक्षा का माध्यम न बनाना एक गंभीर सामाजिक और सांस्कृतिक चुनौती है जिसकी उपेक्षा नहीं की जा सकती। भारतीयों को अंग्रेजी भाषा भी सीखनी चाहिए, यह सोच महत्वपूर्ण थी। इसी मुकाम पर यह बात भी सामने आई कि विशिष्ट ज्ञान के लिए तो अंग्रेजी माध्यम बने मगर आम हिन्दुस्तानी को आधुनिक शिक्षा उनकी अपनी ज़बान में मिले। उसी युग में ‘मदर टंग’ जैसे शब्द का अनुवाद मातृभाषा के रूप में सामने आया।
गांधी जी के विचार शिक्षा के माध्यम के संदर्भ में स्पष्ट थे, वे बुनियादी शिक्षा मातृभाषा में दिए जाने के पक्ष में थे। वे अंग्रेजी भाषा को लादने को विद्यार्थी समाज के प्रति “कपटपूर्ण नीति“ समझते थे। उनका मानना था कि भारत में 90 प्रतिशत व्यक्ति चौदह वर्ष की आयु तक ही पढ़ते हैं, अतः मातृभाषा में ही अधिक से अधिक ज्ञान होना चाहिए। उन्होंने 1909 ई. में “स्वराज्य“ में अपने विचार प्रकट किए हैं। उनके अनुसार हजारों व्यक्तियों को अंग्रेजी सिखलाना उन्हें गुलाम बनाना है। गांधी जी विदेशी माध्यम के कटु विरोधी थे। उनका मानना था कि विदेशी माध्यम बच्चों पर अनावश्यक दबाव डालने, रटने और नकल करने की प्रवृत्ति को प्रोत्साहित करता है तथा उनमें मौलिकता का अभाव पैदा करता है। यह देश के बच्चों को अपने ही घर में विदेशी बना देता है। उनका कथन था कि-‘‘यदि मुझे कुछ समय के लिए निरकुंश बना दिया जाए तो मैं विदेशी माध्यम को तुरन्त बन्द कर दूंगा।’’
गांधी जी के अनुसार विदेशी माध्यम का रोग बिना किसी देरी के तुरन्त रोक देना चाहिए। उनका मत था कि मातृभाषा का स्थान कोई दूसरी भाषा नहीं ले सकती। उनके अनुसार, “गाय का दूध भी मां का दूध नहीं हो सकता।“ महामना मदनमोहन मालवीय के निमंत्रण पर गांधीजी बनारस पहुंचे। काशी नागरी प्रचारिणी सभा के बाईसवें वार्षिकोत्सव में भी शामिल हुए। कार्यक्रम में वायसराय भी शामिल हुए थे। दरभंगा के राजा सर रामेश्वर सिंह की अध्यक्षता में संपन्न समारोह में मालवीयजी के विशेष आग्रह पर गांधीजी ने भाषण दिया। गांधीजी ने कहा कि इस पवित्र नगर में, महान विद्यापीठ के प्रांगण में, अपने देशवासियों से एक विदेशी भाषा में बोलना शर्म की बात है। आशा प्रगट की कि बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में विद्यार्थियों को उनकी मातृभाषा के माध्यम से शिक्षा देने का प्रबंध किया जाएगा। गांधीजी ने वहां मौजूद लोगों से सवाल किया कि ‘‘क्या कोई स्वप्न में भी यह सोच सकता है कि अंगरेजी भविष्य में किसी भी दिन भारत की राष्ट्रभाषा हो सकती है?’’ श्रोताओं ने ‘‘नहीं, नहीं’ कह कर जवाब दिया।’’
आज यदि हमारे संस्कार गड़बड़ा रहे हैं तो उसका सबसे बड़ा कारण यही है कि अपनी देशज़ भाषाओं की जड़ों में अंग्रेजी का मट्ठा डाल कर उसे सुखाने पर उतारू हैं। सच्चाई तो यह है कि नई पीढ़ी की माएं भी अपने बच्चों को उस भाषा में लोरी सुनाने का प्रयास करती हैं जो उन्हें अपनी मां से नहीं बल्कि अंग्रेजी स्कूलों से खरीद कर मिली है। जबकि याद रखा जाता चाहिए कि खरीदी हुई भाषा व्यापार दे सकती है, संस्कार नहीं। संस्कार तो मातृभाषा ही देती है।
इसी संदर्भ में मेरी ये काव्य पंक्तियां देखें -
मातृभाषा से हमें गौरव मिले, सम्मान भी
है यही निजता हमारी, है यही अभिमान भी
हो सहज अभिव्यक्ति इसमें
और मुखरित हो मनुज
ये हमें देती महत्ता, साथ में पहचान भी।

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(दैनिक सागर दिनकर, 21.02.2018 )
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Thursday, February 15, 2018

शिवरात्रि पर्व पर विशेष : खजुराहो के शिव का शिल्पसौंदर्य ... डॉ. शरद सिंह... चर्चा प्लस

Dr (Miss) Sharad Singh
चर्चा प्लस - 
शिवरात्रि पर्व पर विशेष :
खजुराहो के शिव का शिल्पसौंदर्य
- डॉ. शरद सिंह 


शिव समस्त संसार का कल्याण करने वाले देवता माने गए हैं। समुद्र-मंथन से निकला हुआ गरल यानी विष स्वर्ग में निवास करने वाले देवताओं को भी भस्म कर सकता था यदि शिव उसे अपने गले में धारण नहीं करते। आदि ग्रंथों एवं पुराणों में शिव के विविध रूपों का वर्णन मिलता है। यहां मैं अपनी पुस्तक ‘खजुराहो की मूर्तिकला के सौंदर्यात्मक तत्व’ का वह अंश दे रही हूं जिसमें खजुराहो की शिव प्रतिमाओं की पूर्ण विविधता का विवरण है।

Shivratri Pr Vishesh - Khajuraho Ke Shiv Ka Shilp Saundarya - Charcha Plus Column of Dr Sharad Singh in Sagar Dinkar Dainik

‘शिवपुराण’ के अनुसार जब देवताओं और असुरों ने समुद्र-मंथन किया तो उसमें हलाहल विष निकला। यह इतना घातक था कि देवताओं को भी भस्म कर सकता था। देवता हलाहल विष की विषाक्तता से भयभीत हो उठे तक शिव ने आगे बढ़ कर उस विष का पान कर लिया। लेकिन वे भी उसे यदि अपने गले से नीचे पेट में उतरने देते तो वह विष शिव को भी क्षति पहुंचा सकता था अतः विष को शिव ने अपने गले में ही रोक लिया जिससे शिव का गला नीला पड़ गया और वे नीलकंठ कहलाए। विष को गले में धारण करने के बावजूद उसका प्रभाव इतना तेज था कि उनके शरीर में जलन होने लगी और उन्हें गरती का अनुभव होने लगा तब वे हिमालय की ओर आकाशमार्ग से चल पड़े। बीच में विंध्य पर्वत के ऊपर से गुज़रते हुए उन्हें शीतलता का अनुभव हुआ और वे कुछ समय के लिए वहीं रुक गए। वह विश्रामस्थल कालंजर था। उस समय कालंजर में निवास कर रही देवी उमा से शिव ने विवाह किया और दोनों साथ-साथ कुछ समय वहां रहे। इसके बाद देवी उमा कामाख्या चली गईं और शिव हिमालय के लिए निकल पड़े। इस पौराणिक कथानक के आधार पर कालंजर में उमा-महेश्वर की अनेक प्रतिमाओं से ले कर विवाहमंडप तक मिलता है। शिल्पकारों ने जिस सुंदरता से कालंजर में नीलंकठ एवं उमा-महेश्वर के विवाह की कथा को पत्थरों में तराशा है ठीक उसी प्रकार खजुराहो में शिव के विवध रूपों की अनेक प्रतिमाएं हैं जो पौराणिक कथाओं पर आधारित हैं। सन् 2000 में डॉक्टरेट की उपाधि के लिए खजुराहो की मूर्तिकला पर शोध करते समय और उसके बाद ‘खजुराहो की मूर्तिकला के सौंदर्यात्मक तत्व’ पुस्तक लिखते समय मुझे खजुराहो के मंदिरों में मौजूद शिव प्रतिमाओं की सम्पूर्ण विविधता को देखने और जानने का अवसर मिला। मेरी यह पुस्तक सन् 2006 में विश्वविद्यालय प्रकाशन, चौक, वाराणसी, उ.प्र. से प्रकाशित हुई। खजुराहो के मंदिर 950 से 1050 ई. के मध्य निर्मित हुए जिनमें मातंगेश्वर मंदिर प्राचीनतम हैं। विश्वनाथ मंदिर, लक्ष्मण और कंदरिया महादेव मंदिर के बीच की कड़ी है। इस मंदिर के मंडप दीवार पर लगे शिलालेख से पता चलता है, कि धंग द्वारा 1002 ई. में शंभु मरकतेश्वर के मंदिरों का निर्माण कराया गया था जिसमें मरकत तथा पाषाण निर्मित दो लिंगों की स्थापना का उल्लेख है। वर्तमान में पाषाण लिंग ही शेष है। इसी मंदिर के ठीक सामने नंदी मंदिर स्थित है। यह विश्वनाथ मंदिर का समकालीन है।
त्रिदेव में तीसरे देवता महेश अर्थात शिव हैं। जिनकी विविधता पूर्ण अनेक प्रतिमाएं खजुराहो के मंदिरों में मिलती है। ये एक ऐसे देव है जिनकी आराधना वैदिक काल से पूर्व सैन्धव युग में की जाती थी। वैदिक काल में शिव कारूद्र रूप अधिक प्रसिद्ध रहा। सांख्यायन तथा कौशितकि उपनिषदों में शिव, रूद्र, महादेव, महेश्वर, ईशान आदि नाम आते हैं। महाभारत में शिव के सहस्त्र नामों का उल्लेख हुआ है। उनके लिये शंकर, ईशान, शर्व, नीलकंठ, त्रयम्बक, धूर्जटि, नंदीश्वर, शिखिन, व्योमकेश, महादेव आदि नाम आये हैं। इन सभी रूपों में आयुध प्रतीकों की भिन्नता पायी जाती है, कभी शिव के हाथ में डमरू, खड्ग, खेटक, पारा तथा त्रिशूल रहता है तो कभी खप्पर, रूद्राक्षमाला, तलवार, धनुष, खट्वांग तथा ढाल आदि आयुध प्रतीक रहते हैं। खजुराहो में निर्मित शिव मूर्तियों में चतुर्भुजी, अष्टभुजी, बारहभुजी, सोलहभुजी रूप मिलते है। जिनमें विविध आयुध प्रदर्शित है।
चतुर्भुजी नटराज - दूला देव मंदिर में चतुर्भुज नटराज की मूर्ति है जिसमें उनकी प्रथम तीन भुजाओं में क्रमशः त्रिशूल, डमरू, खप्पर (कपाल) है जबकि चौथी भुजा भग्नावस्था में है। कुछ प्रतिमाओं में एक भुजा में अग्नि लिये हुये भी प्रदर्शित किया जाता है।
अष्टभुजी नटराज - खजुराहो संग्रहालय में स्थित अष्टभुजी प्रतिमा में उनकी आठों-भुजाओं में क्रमशः त्रिशूल, खड्ग, डमरू, खेटक, खट्वांग तथा खप्पर हैं। एक अन्य प्रतिमा में त्रिशूल, पाश, डमरू, अभय, कपाल अग्नि तथा घंटा प्रदर्शित है।
बारह भुजी नटराज - दूलादेव मंदिर में बारहभुजी नटराज की एक सुन्दर प्रतिमा है जिसमें बायां पैर नृत्य मुद्रा में उठा हुआ है। भुजाओं में त्रिशूल, पाश, डमरू, खेटक, खट्वांग, खड्ग, खप्पर, दृष्टिगत् है।
कल्याण सुन्दर शिव - शिव का कल्याण सुन्दर रूप शिव पार्वती के विवाह के अवसर का है। खजुराहो संग्रहालय, वामन मंदिर तथा भरत चित्रगुप्त मंदिर में स्थित कल्याण सुन्दर शिव को त्रिशूल के आयुध प्रतीक से युक्त दिखाया गया है।
नीलकंठ - खजुराहो के विभिन्न मंदिरों में नीलकंठ शिव की मूर्तियां हैं। कंदरिया मंदिर में नीलकंठ की भुजाओं में पदम, त्रिशूल, खट्वांग, तथा विषपात्र है। भरत चित्रगुप्त मंदिर में नीलकंठ को विषपात्र, त्रिशूल खट्वांग कमंडलु, डमरू तथा कमल सहित दिखाया गया है। एक अन्य प्रतिमा में नीलकंठ को खप्पर, डमरू, कमल तथा खट्वांग धारी दिखाया गया है। लक्ष्मण मंदिर तथा कंदरिया मंदिर में उन्हें विषपात्र, डमरू, खट्वांग तथा कमंडलु युक्त प्रदर्शित किया है। पार्श्वनाथ मंदिर में आलिंगनबद्ध नीलकंठ की भुजाओं में खट्वांग एवं कमल नाल दिखाया गया है।
अघोर शिव - जगदंबा मंदिर में अघोर शिव की प्रतिमा है। जिसमें उन्हें शूल, डमरू, पाश, दंड, धारण किये हुये बताया गया है। पार्श्वनाथ मंदिर में खट्वांग, पुस्तक तथा नीलकंठ पक्षी धारी अघोर शिव है। पार्श्वनाथ मंदिर में शिव के हाथ में घंटिका है। कंदरिया महादेव मंदिर में अष्टभुजी अघोर प्रतिमा है। जिसमें खप्पर, त्रिशूल, शक्ति डमरू, घंटिका, सर्प, खट्वांग तथा कमंडलु दिखाया गया है। विश्वनाथ मंदिर में अघोर शिव त्रिशूल डमरू घंटिका गदा और कमंडलुधारी हैं। दूलादेव मंदिर में शिव अघोर की वरद् मुद्रा, सर्प, त्रिशूल, डमरू, खट्वांग और कमंडलु धारी हैं।
गज संहार शिव - खजुराहो में गज संहार शिव की विभिन्न प्रतिमायें हैं। कंदरिया महादेव मंदिर में सोलह भुजी गज संहार शिव है। जबकि कुछ अन्य प्रतिमायें बारहमुखी हैं। शिव के इस रूप में उन्हें त्रिशूल वज्र डमरू तथा हाथी का चमड़ा लिये हुये प्रदर्शित किया गया है।
भैरव - खजुराहो में दो प्रकार की भैरव प्रतिमायें है। प्रथम श्वान वाहन सहित तथा दूसरी नग्न प्रतिमा है। एक अन्य प्रकार भी भैरव प्रतिमा का है जिसमें उन्हें भैरवी के साथ आलिंगन मुद्रा में दिखाया गया है। इस प्रतिमा में भैरव चक्र (छल्ला), कमल तथा घंटिका धारी हैं। कंदरिया महादेव, वामन तथा चतुर्भुज मंदिर में नग्न भैरव को पेय पात्र, डमरू, घंटी, नरमुण्ड, सहित दिखाया गया है। विश्वनाथ मंदिर, जगदम्बा मंदिर, भरत चित्रगुप्त मंदिर तथा लक्ष्मण मंदिर में भैरव पेय, डमरू, घंटी, नरमुण्ड, तथा खड्ग लिये हुये हैं। विश्वनाथ मंदिर में भैरव की एक ऐसी प्रतिमा भी है जिसमें उन्हें कमल, सर्प, खट्वांग तथा नरमुण्ड लिये हुये दिखाया गया है। इसी प्रकार लक्ष्मण मंदिर में खड्ग, घंटिका तथा सर्प सहित वामन मंदिर में खड्ग, करबाल तथा खट्वांग सहित हैं। कंदरिया मंदिर की प्रदक्षिणा में खड्ग, जगदम्बा मंदिर में पाश तथा खड्ग तथा विश्वनाथ मंदिर में खेटक, खड्ग तथा सर्प सहित भैरव हैं। श्वान वाहन युक्त भैरव प्रतिमा में गदा, डमरू, घंटिका, खप्पर, कमल तथा सर्प आयुध प्रतीक हैं। आदिनाथ मंदिर में गदा, सर्प के साथ फल प्रदर्शित हैं जबकि विश्वनाथ मंदिर की प्रदक्षिणा में गदा, खड्ग सर्प तथा नरमुण्ड और दूलादेव मंदिर में स्थित प्रतिमा में खड्ग, ढाल तथा नरमुण्ड है। जगदम्बा मंदिर में भैरव की एक ऐसी प्रतिमा भी है जिसमें उनके एक हाथ में पक्षी तथा शेष दो हाथों में घंटिका तथा खट्वांग है।
त्रिपुरान्तक - खजुराहो में आलिंगन मुद्रा की त्रिपुरान्तक प्रतिमा है। जिसमें उन्हें, घट, धनुष, बाण तथा नरमुण्ड धारण किये हुये बताया गया है।
यदि मुद्राओं के आधार पर देखा जाए तो खजुराहो में मौजूद शिव की चतुर्भज प्रतिमाओं को ही तीन श्रेणियों में बांटा जा सकता है - प्रथम श्रेणी में शिव की वे चतुर्भुजी प्रतिमायें है जिनमें शिव वरद मुद्रा में त्रिशूल, घट तथा सर्प धारण किये है। द्वितीय श्रेणी में वे शैव मूर्तियां हैं जिसमें पहली भुजा वरद अथवा अभय मुद्रा में है। तथा दूसरी भुजा में त्रिशूल है। अन्य भुजाओं में पाश, कमल अथवा पुस्तक है। तृतीय श्रेणी में शिव की वे प्रतिमायें है जिनमें शिव के दूसरी अथवा तीसरी भुजा में सर्प प्रदर्शित है जबकि पहली भुजा वरद, अभय अथवा आलिंगन मुद्रा में है। वरद मुद्रा में दूसरे हाथ में पुस्तक अथवा कमल तीसरे में सर्प और चौथे में घट प्रदर्शित है। अभय मुद्रा में दूसरे हाथ में पाश तीसरे में सर्प तथा चौथा कटि पर है।
भारतीय शिल्पकला यूं भी अत्यंत समृद्ध है और जब उसमें कथानक का समावेश हो जाता है तो ऐसा लगता है जैसे प्रतिमाएं जीवंत हो कर उन कथाओं को स्टेज पर मंचित कर रही हों। यूं भी भारत में प्रतिमा निर्माण की परम्परा बहुत प्राचीन है। खजुराहो का मूर्तिशिल्प शिव प्रतिमाओं के बिना पूर्ण हो ही नहीं सकता था। शिव जो संहारक हैं तो कल्याणकर्त्ता भी हैं। भोले हैं लेकिन दुखहर्त्ता हैं। संभवतः खजुराहो का शैव-शिल्प भी यही कहना चाहता है कि -‘शिव सबका कल्याण करें!’
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(दैनिक सागर दिनकर, 14.02.2018 )
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Tuesday, February 13, 2018

Madhya Pradesh Sahitya Academy Samman to Dr (Miss) Sharad Singh

Madhya Pradesh Sahitya Academy Samman to Dr (Miss) Sharad Singh

Dr (Miss) Sharad Singh and Dr Varsha Singh in an informal evening ...

एक अनौपचारिक शाम ... प्रो. आनंद प्रकाश त्रिपाठी, विभागाध्यक्ष हिन्दी विभाग, डॉ हरीसिंह गौर केन्द्रीय विश्वविद्यालय सागर के निवास पर भाभी डॉ बिन्दु त्रिपाठी, भाई आनंद प्रकाश त्रिपाठी, दीदी डॉ वर्षा सिंह, मैं शरद सिंह और शोधार्थी आशीष सिंह ... साहित्य, राजनीति और घर-परिवार पर हमने ढेर सारी चर्चाएं की और एक दिलचस्प शाम साथ-साथ व्यतीत की।
(Date : 10.02.2018)
Dr (Miss) Sharad Singh and  Dr Varsha Singh in an  informal evening

Dr (Miss) Sharad Singh and  Dr Varsha Singh in an  informal evening

Dr (Miss) Sharad Singh and  Dr Varsha Singh in an  informal evening

Dr (Miss) Sharad Singh and  Dr Varsha Singh in an  informal evening

Dr (Miss) Sharad Singh and  Dr Varsha Singh in an  informal evening

Dr (Miss) Sharad Singh and  Dr Varsha Singh in an  informal evening

Dr (Miss) Sharad Singh and  Dr Varsha Singh in an  informal evening

Dr (Miss) Sharad Singh and  Dr Varsha Singh in an  informal evening

Dr (Miss) Sharad Singh and  Dr Varsha Singh in an  informal evening

Dr (Miss) Sharad Singh and  Dr Varsha Singh in an  informal evening

Dr Sharad Singh Honored in Jhansi (UP) 07.02.2018

Dr Sharad Singh honored in Jhansi
 बुंदेलखण्ड विश्वविद्यालय झांसी के गांधी सभागार में आयोजित इस समारोह में मुझे (डॉ शरद सिंह को) विशिष्ट अतिथि के रूप में शॉल, श्रीफल एवं स्मृतिचिन्ह देकर सम्मानित किया गया। अवसर था बुंदेलखण्ड विश्वविद्यालय झांसी एवं अखिल भारतीय साहित्य परिषद् महानगर झांसी (उत्तर प्रदेश) के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित ‘‘डॉ माधुरी शुक्ला स्मृति कथा साहित्य समारोह एवं संगोष्ठी’’ का। समारोह के मुख्यअतिथि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक इन्द्रेश जी थे तथा अध्यक्षता प्रो. सुरेन्द्र दुबे कुलपति बुंदेलखण्ड विश्वविद्यालय झांसी ने की।
समारोह में विशिष्ट अतिथि के रूप में ''भारतीय संस्कृति में नारी की भूमिका'' विषय पर बोलते हुए मैंने कहा कि हर युग में स्त्रियों ने भारतीय संस्कृति की रक्षा की है जिसका उदाहरण सीता, अनुसुइया, उभय भारती, लक्ष्मीबाई जैसी स्त्रियां हैं तथा वर्तमान ग्लोबल और इंटरनेट के युग में अपराध में लिप्त होते जा रहे युवाओं को महिलाएं सही राह दिखा सकती हैं।इस अवसर पर प्रो. श्रीराम परिहार वरिष्ठ साहित्यकार, रामतीर्थ सिंघल महापौर झांसी नगरनिगम, प्रवीण गुगनानी प्रदेश महामंत्री अखिल भारतीय साहित्य परिषद् म.प्र. भोपाल तथा डॉ मुन्ना तिवारी विभागाध्यक्ष, हिन्दी विभाग बुंदेलखण्ड विश्वविद्यालय झांसी की उपस्थिति उल्लेखनीय रही। समारोह के आयोजक एवं संयोजक थे वरिष्ठ साहित्यकार एवं पूर्व शिक्षामंत्री उत्तर प्रदेश शासन डॉ रवीन्द्र शुक्ला।

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