Sunday, September 25, 2016

चर्चा प्लस ... राष्ट्रवादी चिंतक पं. दीनदयाल उपाध्याय .... डाॅ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
मेरा कॉलम  "चर्चा प्लस"‬ "दैनिक सागर दिनकर" में (21. 09. 2016) .....
 
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राष्ट्रवादी चिंतक पं. दीनदयाल उपाध्याय
- डॉ. शरद सिंह
 
दीनदयाल उपाध्याय में देश सेवा की ललक थी उतनी ही अध्ययन के प्रति अभिरुचि थी। वे एक चिन्तक, लेखक, सम्पादक, संगठनकर्ता एवं राजनीतिज्ञ ही नहीं अपितु एक अच्छे पाठक भी थे। उनके कंधे में टंगे रहने वाले थैले में दो या तीन किताबें अवश्य रहती थीं। दीनदयाल उपाध्याय की बहुमुखी प्रतिभा का सभी सम्मान करते थे, चाहे वे संघ के अनुयायी हों या किसी और दल के। यहां मैं अपनी पुस्तक ‘‘राष्ट्रवादी व्यक्तित्व : दीनदयाल उपाध्याय’’ के कुछ अंश साझा कर रही हूं। 

25 सितंबर 1916 को राजस्थान के धनकिया नामक ग्राम में जन्में पं. दीनदयाल उपाध्याय को परिवार का स्नेह अधिक समय तक न मिल सका। जब माता-पिता उनसे बिछड़े तब उनकी आयु मात्र आठ वर्ष ही थी। दुर्भाग्य ऐसा था कि कुछ ही समय बाद दीनदयाल जी के भाई शिवदयाल की भी निमोनिया से पीड़ित होने के कारण मृत्यु हो गई। माता-पिता के अभाव में उनका पालन-पोषण उनके मामा ने किया। जो राजस्थान के गंगापुर रेलवे स्टेशन पर मालगार्ड के रूप में कार्यरत थे। उनके मामा ने उनसे शादी का कई बार आग्रह किया लेकिन वे शादी के प्रस्तावों को नकार देते थे। शायद राष्ट्र की सेवा का व्रत लेकर ही वे जन्मे थे, जिस कारण सभी सांसारिक बंधनों से दूर वे केवल भारत माता के बंधन में ही रहे। उन्होंने भारतीय संस्कृति एवं राष्ट्र के लिए अथक कार्य किया। 
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पं. दीनदयाल उपाध्याय एक सच्चे कर्मयोगी थे। वे अत्यंत सादगी से रहना पसंद करते थे। उनका मानना था कि व्यक्ति को इच्छाओं के वशीभूत नहीं रहना चाहिए, बल्कि इच्छाओं को अपने वश में रखना चाहिए। वे यह भी मानते थे कि विचारों की उच्चता ही व्यक्ति को उत्कृष्ट बनाती है। दीनदयाल उपाध्याय सभी को अपना मानते थे। उनके मन में जाति, धर्म, भाषा, अमीर, गरीब आदि का कोई भेद नहीं था। उनके इस स्वभाव के संबंध में मुम्बई की एक महिला कार्यकर्ता ने अपने उद्गार प्रकट किए थे कि ‘‘हमारे यहां अनेक नेता आते रहते हैं। कोई नेता आ रहा हो तो उनकी अच्छी देख-भाल करने की चिन्ता तो मन में होती ही है। किन्तु दीनदयाल उपाध्याय आने वाले हों तो ऐसी कोई चिन्ता मुझे नहीं होती थी । लगता था मानों अपना ही कोई भाई या सगा-संबंधी आ रहा है।’’


अहम् से परे

पंडित दीनदयाल उपाध्याय सहज व्यक्ति थे। वे अहंकार से कोसों दूर रहते थे। सन् 1960 की एक घटना है, कानपुर में संघ-शिक्षा वर्ग का शिविर था। दीनदयाल उपाध्याय भी शिविर में शामिल थे। दोपहर के भोजन के पश्चात् सभी शिविरार्थी अपना-अपना लोटा ले कर नल पर हाथ धोने के लिए पंक्तिबद्ध खड़े थे। उस पंक्ति में एक चंचल प्रकृति का कार्यकर्ता भी था। उसने जैसे ही देखा कि एक धोती-कुर्ताधारी शांत स्वभाव का कार्यकर्ता पानी भरने के लिए अपना लोटा नल के नीचे रख रहा है, वैसे ही वह चंचल कार्यकर्ता लपक कर आया और उसने लोटा उठा कर परे फेंक दिया। धोती-कुर्ताधारी कार्यकर्ता उसके इस कृत्य पर शान्त रहा। उसने अपना लोटा उठाया और पंक्ति में सबसे पीछे जा कर खड़ा हो गया क्यों कि उसकी पारी व्यर्थ जा चुकी थी। वह चंचल कार्यकर्ता अपनी इस शरारत पर अत्यन्त प्रसन्न था। कुछ देर बाद कक्षाएं पुनः आरम्भ हुईं। बौद्धिक वर्ग की कक्षा में उस धोती-कुर्ताधारी युवक का परिचय कराते हुए कहा गया कि ये पंडित दीनदयाल उपाध्याय हैं और ये आपकी बौद्धिक वर्ग की कक्षा लेंगे।
वहां लोटा फेंकने वाला कार्यकर्ता भी विद्यार्थी के रूप में उपस्थित था। जैसे ही उसे इस बात का पता चला कि उसने जिसका लोटा फेंका था वह और कोई नहीं पंडित दीनदयाल उपाध्याय थे। उसे तो मानां काटो तो खून नहीं। वह भाग कर शिविर संचालक के पास पहुंचा क्योंकि दीनदयाल उपाध्याय का सामना करने का साहस उसमें नहीं था। शिविर संचालक ने उसे समझाया कि यदि दीनदयाल उपाध्याय को अपने वरिष्ठ होने का अहंकार होता तो वे उसी समय डांटते या अन्य किसी तरह से दंडित करते किन्तु उन्होंने ऐसा कुछ भी नहीं किया। अतः वह भयभीत न हो। इस प्रकार शिविर संचालक द्वारा समझाए जाने के बाद वह चंचल कार्यकर्ता साहस करके दीनदयाल उपाध्याय के पास गया और उनके पैर पकड़ लिए। दीनदयाल उपाध्याय ने उसे गले से लगाते हुए कहा - ‘‘मैं तुम्हारे भीतर उपस्थित ऊर्जा को प्रणाम करता हूं। तुम इसका सही मार्ग पर उपयोग करोगे ऐसा मुझे विश्वास है।’’ 


व्यक्तिगत आलोचना के विरोधी

राजनीति के क्षेत्र में एक-दूसरे पर व्यक्तिगत छींटाकशीं करना हमेशा सामान्य बात रही है, विशेषरूप से चुनाव के दौरान तो इसका और भी वीभत्स रूप सामने आने लगता है। जौनपुर लोकसभा क्षेत्र से जब दीनदयाल उपाध्याय को चुनाव के लिए खड़ा किया गया तो उनके साथी यादवराज देशमुख ने अपने पत्रकारिता के अनुभवों के आधार पर उन्हें सलाह दी कि -‘‘पंडित जी, चुनाव सभाओं में आपके भाषण कुछ अधिक आक्रामक होने चाहिए। प्रतिपक्ष पर तीखा प्रहार किए बिना चुनाव अभियान में रंग नहीं चढ़ पाएगा। मतदाताओं पर रचनात्मक एवं शिक्षात्मक भाषणों का प्रभाव नहीं पड़ता है।’’
एक अन्य कार्यकर्त्ता ने भी देशमुख का समर्थन करते हुए कहा कि -‘‘हां, पंडित जी, आपको अपने भाषणों में विरोधी नेता की जम कर टांग खि्ांचाई करना चाहिए।’’
‘‘ टांग खि्ांचाई से आपका आशय?’’ दीनदयाल उपाध्याय ने पूछा।
‘‘आशय यही कि आप उसके व्यक्तिगत जीवन का बखिया उधेड़ दीजिए।’’ उस कार्यकर्त्ता ने स्पष्ट किया।
‘‘देखिए, यदि आप लोगों को ऐसा लगता है कि मेरा प्रभाव नहीं पड़ेगा तो मैं चुनाव से हट जाता हूं। लेकिन केवल मत बटोरने के लिए अपने भाषणों में किसी पर व्यक्तिगत लांछन नहीं लगा सकूंगा। चाहे अपने हों या विरोधी, किसी की भी व्यक्तिगत आलोचना को मैं अनैतिक कार्य मानता हूं और मैं इसका विरोधी हूं।’’ दीनदयाल उपाध्याय दो-टूक ढंग से आगाह कर दिया कि उनसे घटिया राजनीति की आशा कोई न रखे।
पं. दीनदयाल उपाध्याय ने सदैव स्वच्छ राजनीति का पक्ष लिया। वे स्पष्टवादी थे और राजनीति में भी वे सभी से स्पष्टता की अपेक्षा रखते थे। 


सदा प्रासंगिक रहेंगे विचार 

पं. दीनदयाल उपाध्याय राष्ट्र को सर्वोपरि मानते थे। उनका कहना था कि राष्ट्र विभिन्न समाजों, समूहों एवं कुशलताओं से बनी एक ऐसी इकाई है जो मानव सभ्यता को सच्चे अर्थ में परिभाषित करती है। वे नागरिकों के लिए राष्ट्रीयता को सबसे बड़ी पूंजी मानते थे।
पं. दीनदयाल प्रकृति की महत्ता को सम्मान देते थे। वे प्राकृतिक सम्पदा के दुरुपयोग के विरोधी थे। उनके अनुसार प्रकृति का दोहन उसी सीमा तक किया जाना चाहिए जिस सीमा तक प्रकृति को क्षति न पहुंचे। पं. दीनदयाल जी ने मनुष्य एवं राष्ट्र के समुचित विकास के लिए सांस्कृतिक स्वतंत्रता को अति आवश्यक माना। इस संबंध में उन्होंने अपने एक लेख में लिखा था कि ‘‘15 अगस्त 1947 को हमने एक लड़ाई जीती है। अपने विकास के मार्ग के रोड़ों को दूर करने के लिए हमें स्वतंत्रता की आवश्यकता थी। अब हमारी आत्मानुभूति का मार्ग प्रशस्त हो गया है। अब मानव की प्रगति के लिए हमें इसकी सहायता करनी है। पं. दीनदयाल देश के विकास के लिए भूमि के उचित वितरण एवं समुचित देखभाल को मुख्य आधार मानते थे। वे कृषि की सुव्यवस्था के लिए कृषियोग्य भूमि का उचित बन्दोबस्त किया जाना आवश्यक समझते थे। पं. दीनदयाल भविष्य के भारत की अपनी संकल्पना में आर्थिक, सामाजिक, बौद्धिक, सांस्कृतिक एवं धार्मिक दृष्टि से सुदृढ़ भारत को देखा था। उन्होंने कहा था कि ‘‘परतंत्रता के कारण दुनिया के अन्य राष्ट्रों की तुलना में हम बराबरी में खड़े नहीं हो सके। परन्तु अब हम स्वाधीन हो गए हैं। अब हमें इस कमी को पूरा करना चाहिए।’’
पं. दीनदयाल उपाध्याय ने राष्ट्र एवं मनुष्यता को आधार में रख कर जीवन के प्रत्येक पक्षों पर चिन्तन किया तथा अपने मौलिक विचार सब के सामने रखे। चाहे प्रकृति के उचित दोहन का विषय हो या सांस्कृतिक स्वतंत्रता की आवश्यकता पर का, धर्म संबंधी विचार हों या फिर भूमि के उचित वितरण चिन्ता दीनदयाल जी के विचार प्रत्येक देश, काल एवं परिस्थितियों में प्रासंगिक रहेंगे तथा दिशाबोध कराते रहेंगे। इसीलिए उनके विचारों को राजनीतिक मतभेदों से परे रख कर देखा जाता है। तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गांधी ने पं. दीनदयाल उपाध्याय की मृत्यु पर शोक प्रकट करते हुए कहा था कि ‘‘मुझे श्री उपाध्याय जी की मृत्यु की खबर सुन कर गहरा आघात पहुंचा है। श्री उपाध्याय देश के राजनीतिक जीवन में एक प्रमुख भूमिका अदा कर रहे थे। उनकी ऐसी दुखद परिस्थितियों में असामयिक और अप्रत्याशित मुत्यु से उनका कार्य अधूरा रह गया है। जनसंघ व कांग्रेस के बीच मतभेद चाहे जो हों मगर श्री उपाध्याय सर्वाधिक सम्मान प्राप्त नेता थे और उन्होंने अपना जीवन देश की एकता और संस्कृति को समर्पित कर दिया था।’’

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Wednesday, September 14, 2016

चर्चा प्लस ... बुंदेलखंड को विवाद नहीं, विकास चाहिए .... डाॅ. शरद सिंह

Dr Sharad Singh
मेरा कॉलम  "चर्चा प्लस"‬ "दैनिक सागर दिनकर" में (14. 09. 2016) .....
 
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बुंदेलखंड को विवाद नहीं, विकास चाहिए
- डॉ. शरद सिंह
 एक बार फिर राजनीति के बैरोमीटर का पारा चढ़ने लगा है। आगामी वर्ष उत्तर प्रदेश में होने वाले चुनावों ने माहौल अभी से गर्मा दिया है। कोई पुराने चेहरों को सामने लाने की योजना बना रहा है तो कोई नए चेहरे मैदान में उतार रहा है। भजपा, सपा, और बासपा के अतिरिक्त कांग्रेस भी उत्तर प्रदेश में जोर आजमाइश के लिए बांहें चढ़ा चुकी है। इस बार राहुल गांधी का बुंदेलखंड दौरा क्या रंग लाएगा, यह तो आने वाला समय ही बताएगा। लेकिन बुंदेलखंड पर राजनीतिक दांव लगाने वालों को यह भली-भांति समझना होगा कि यह क्षेत्र विवाद नहीं विकास चाहता है।

उत्तर प्रदेश में आगामी वर्ष होने वाला चुनाव ने राजनीतिक परिसर में हलचल मचा रखी है। कोई ‘चाय पर चर्चा’ के जरिए मतदाताओं का ध्यानाकर्षण कर रहा है तो कोई ‘खाट पर चर्चा’ कर रहा है। दो बहुएं जिनकी आयु में दादी और पोती जितना अन्तर है, राजनीतिक मैदान में कमर कस कर खड़ी हो गई हैं। इनमें एक बहू है दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित तो दूसरी बहू है उत्तर प्रदेश के वर्तमान मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की पत्नी डिंपल यादव। शीला दीक्षित उन्नाव की बहू हैं तो डिंपल यादव सैफई की। ये दोनों बहुएं बुंदेलखण्ड का भी रुख करेंगी, लेकिन फिलहाल राहुल गांधी अपने पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अंतर्गत 15 सितम्बर 2016 से बुंदेलखंड में ‘‘रोड शो’’ करेंगे।
पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार राहुल गांधी 15 सितंबर को चित्रकूट पहुंचेंगे। वे चित्रकूट में भगवान के दर्शन के बाद रोड शो आरम्भ करेंगे। वहां रोड शो करते हुए लोगों को अपनी पार्टी की घोषणाओं के बारे में अवगत कराएंगे। इसके बाद 16 सितंबर को बुंदेलखंड के बांदा और महोबा में रोड शो कर जनता के बीच जाएंगे। राहुल गांधी 17 सितंबर को ऐतिहासिक नगरी झांसी पहुंचेंगे। झांसी में भी वह रोड शो के माध्यम से अपनी पार्टी की घोषणाओं के बारे में बताएंगे और कांग्रेस को जिताने की अपील करेंगे। 17 सितंबर को ही वह जालौन, राठ और हमीरपुर में भी रोड शो करेंगे।
यह राहुल गांधी का बुंदेलखंड का पहला दौरा नहीं है, इससे पूर्व भी वे बुंदेलखंड के दौरे कर चुके हैं। अपने पिछले दौरे में राहुल गांधी ने ‘पृथक बुंदेलखण्ड’ की बात उठाई थी। यह मांग कोई नई नहीं थी। इस बार वे मोदी सरकार की कमियां गिनाने के मूड में हैं। बीच-बीच में उत्तर प्रदेश सरकार पर भी चुटकी लेते रहेंगे। उनके भाषणों पर वाद-विवाद भी होंगे और दूसरे नेता भी अपनी पार्टी के ऐजेंडे ले कर जनता के बीच उतरेंगे। लेकिन इन सभी को बुंदेलखंड की आवश्यकताओं को ध्यान रखना होगा। 
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विकास की बाट जोहता बुंदेलखंड
 
बुंदेलखण्ड के विकास के लिए उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश दोनों राज्यों में वर्षों से पैकेज आवंटित किए जा रहे हैं जिनके द्वारा विकास कार्य होते रहते हैं किन्तु विकास के सरकारी आंकड़ों से परे भी कई ऐसे कड़वे सच हैं जिनकी ओर देख कर भी अनदेखा रह जाता है। जहां तक कृषि का प्रश्न है तो औसत से कम बरसात के कारण प्रत्येक दो-तीन वर्ष बाद बुंदेलखंड सूखे की चपेट में आ जाता है। कभी खरीफ तो कभी रबी अथवा कभी दोनों फसलें बरबाद हो जाती हैं। जिससे घबरा कर कर्ज में डूबे किसान आत्महत्या जैसा पलायनवादी कदम उठाने लगते हैं। इन सबके बीच स्त्रियों की दर और दशा पर ध्यान कम ही दिया जाता है। उत्तर प्रदेश और मध्यप्रदेश में फैला बुंदेलखंड आज भी जल, जमीन और सम्मानजनक जीवन के लिए संघर्षरत है। दुनिया भले ही इक्कीसवीं सदी में कदम रखते हुए विकास की नई सीढ़ियां चढ़ रहा है लेकिन बुंदेलखंड आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए जूझ रहा है।

बुंदेलखंड की समस्याएं

आर्थिक पिछड़ेपन का दृष्टि से बुंदेलखंड आज भी सबसे निचली सीढ़ी पर खड़ा हुआ है। विगत वर्षों में बुन्देलखण्ड में किसानों द्वारा आत्महत्या और महिलाओं के साथ किए गए बलात्कार की घटनाएं यहां की दुरावस्था की कथा कहती हैं। भूख और गरीबी से घबराए युवा अपराधी बनते जा रहे हैं। यह भयावह तस्वीर ही बुंदेलखंड की सच्ची तस्वीर है। यह सच है कि यहां की सांस्कृतिक परम्परा बहुत समृद्ध है किन्तु यह आर्थिक समृद्धि का आधार तो नहीं बन सकती है। आर्थिक समृद्धि के लिए तो जागरूक राजनैतिक स्थानीय नेतृत्व, शिक्षा का प्रसार, जल संरक्षण, कृषि की उन्नत तकनीक की जानकारी का प्रचार-प्रसार, स्वास्थ्य सुविधाओं की सघन व्यवस्था और बड़े उद्योगों की स्थापना जरूरी है। वन एवं खनिज संपदा प्रचुर मात्रा में है किन्तु इसका औद्योगिक विकास के लिए उपयोग नहीं हो पा रहा है। कारण की अच्छी चौड़ी सड़कों की कमी है जिन पर उद्योगों में काम आने वाले ट्राले सुगमता से दौड़ सकें। रेल सुविधाओं के मामले में भी यह क्षेत्र पिछड़ा हुआ है। सड़क और रेल मार्ग की कमी औघेगिक विकास में सबसे बड़ी बाधा बनती है। स्वास्थ्य और शिक्षा की दृष्टि से बुंदेलखंड की दशा औसत दर्जे की है।
लगभग साल भर पहले बुंदेलखंड के अंतर्गत आने वाले मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश के कांग्रेसी राहुल गांधी के साथ प्रधानमंत्री से मिले थे और राहत राशि के लिये विशेष पैकेज और प्राधिकरण की मांग रखी थी। एक पैकेज की घोषणा भी हुई लेकिन यह स्थायी हल साबित नहीं हुआ। यूं भी, इस क्षेत्र के उद्धार के लिये किसी तात्कालिक पैकेज की नहीं बल्कि वहां के संसाधनों के बेहतर प्रबंधन की आवश्यकता है। साथ ही इस बात को समझना होगा कि मात्र आश्वासनों और परस्पर एक-दूसरे को कोसने वाली राजनीति से इस क्षेत्र का भला होने वाला नहीं है।

पृथक राज्य कोई हल नहीं

पृथक बुंदेलखण्ड राज्य की मांग करने वालों का यह मानना है कि यदि बुंदेलखण्ड स्वतंत्र राज्य का दर्जा पा जाए तो विकास की गति तेज हो सकती है। यह आंदोलन राख में दबी चिंनगारी के समान यदाकदा सुलगने लगता है। बुंदेलखंड राज्य की लड़ाई तेज करने के इरादे से 17 सितंबर 1989 को शंकर लाल मेहरोत्रा के नेतृत्व में बुंदेलखंड मुक्ति मोर्चा का गठन किया गया था। आंदोलन सर्व प्रथम चर्चा में तब आया जब मोर्चा के आह्वान पर कार्यकर्ताओं ने पूरे बुंदेलखंड में टीवी प्रसारण बंद करने का आंदोलन किया। यह आंदोलन काफी सफल हुआ था। इस आंदोलन में पूरे बुंदेलखंड में मोर्चा कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारियां हुईं। आंदोलन ने गति पकड़ी और मोर्चा कार्यकर्ताओं ने वर्ष 1994 में मध्यप्रदेश विधानसभा में पृथक राज्य मांग के समर्थन में पर्चे फेंके। कार्यकर्ताओं का उत्साह बढ़ा और वर्ष 1995 में उन्होंने शंकर लाल मेहरोत्रा के नेतृत्व में संसद भवन में पर्चे फेंक कर नारेबाजी की। तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव के निर्देश पर स्व. मेहरोत्रा व हरिमोहन विश्वकर्मा सहित नौ लोगों को रात भर संसद भवन में कैद करके रखा गया। विपक्ष के नेता अटल विहारी वाजपेई ने मोर्चा कार्यकर्ताओं को मुक्त कराया। वर्ष 1995 में संसद का घेराव करने के बाद हजारों लोगों ने जंतर मंतर पर क्रमिक अनशन शुरू किया, जिसे उमा भारती के आश्वासन के बाद समाप्त किया गया। वर्ष 1998 में वह दौर आया जब बुंदेलखंडी पृथक राज्य आंदोलन के लिए सड़कों पर उतर आए। आंदोलन उग्र हो चुका था। बुंदेलखंड के सभी जिलों में धरना-प्रदर्शन, चक्का जाम, रेल रोको आंदोलन आदि चल रहे थे। इसी बीच कुछ उपद्रवी तत्वों ने बरुआसागर के निकट 30 जून 1998 को बस में आग लगा दी थी, जिसमें जन हानि हुई थी। इस घटना ने बुंदेलखंड राज्य आंदोलन को ग्रहण लगा दिया था। मोर्चा प्रमुख शंकर लाल मेहरोत्रा सहित नौ लोगों को रासुका के तहत गिरफ्तार किया गया। जेल में रहने के कारण उनका स्वास्थ्य काफी गिर गया और बीमारी के कारण वर्ष 2001 में उनका निधन हो गया। पृथक्करण की मांग ले कर राजा बुंदेला भी सामने आए।
आज भी जब तब पृथक बुंदेलखण्ड की मांग उठती रहती है। चुनावों के समय इस मांग को समर्थन दिया जाने लगता है और चुनाव ख़त्म होते ही जोश ठंडा पड़ जाता है। वैसे, बुंदेलखंड की आर्थिक दशा को देख कर तो यही कहा जा सकता है कि एक कमजोर राज्य के नवनिर्माण से बेहतर है कि प्रशासनिक दृष्टि से जिलों और संभागों को यथास्थिति रखते हुए विकास पर ध्यान केन्द्रित किया जाए।

समझना होगा जरूरतों को

पिछले कुछ सालों से किसानों के मुद्दों को जिस तरह उत्तर प्रदेश कांग्रेस उठा रही है उससे ये स्पष्ट हो गया है कि किसान कार्ड उसके लिए अहम होने जा रहा है। बुंदेलखंड के किसानों के आधार पर राहुल गांधी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की तैयारी का शंखनाद कर चुके हैं। शेष राजनीतिक दल भी पीछे नहीं रहेंगे। किन्तु पूर्व के अनुभवों के आधार पर इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है कि विकास के बुनियादी मुद्दे आरोप-प्रत्यारोप और वाद-विवाद में दब कर रह जाएंगे। स्थानीय नेतृत्व को समर्थन देना और उसे मजबूत बनाना भी महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है। वैसे, एक बार फिर राजनीति के बैरोमीटर का पारा चढ़ने लगा है। आगामी वर्ष उत्तर प्रदेश में होने वाले चुनावों ने माहौल अभी से गर्मा दिया है। कोई पुराने चेहरों को सामने लाने की योजना बना रहा है तो कोई नए चेहरे मैदान में उतार रहा है। भजपा, सपा, और बासपा के अतिरिक्त कांग्रेस भी उत्तर प्रदेश में जोर आजमाइश के लिए बांहें चढ़ा चुकी है। इस बार राहुल गांधी का बुंदेलखंड दौरा क्या रंग लाएगा, यह तो आने वाला समय ही बताएगा। लेकिन बुंदेलखंड पर राजनीतिक दांव लगाने वालों को यह भली-भांति समझना होगा कि यह क्षेत्र विवाद नहीं विकास चाहता है।

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Thursday, September 8, 2016

चर्चा प्लस ... विघ्नहर्ता के देश में महिला -जीवन में विध्न .... डाॅ. शरद सिंह

Dr Sharad Singh
मेरा कॉलम  "चर्चा प्लस"‬ "दैनिक सागर दिनकर" में (07. 09. 2016) .....
 
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विघ्नहर्ता के देश में महिला -जीवन में विध्न
- डॉ. शरद सिंह
 
श्रीगणेश विध्नहर्ता हैं, यही मानते हुए सदा उनसे प्रार्थना की जाती है कि उनकी कृपा से प्रत्येक कार्य निर्विघ्न संम्पन्न हों। भारत की धर्मपरायण आमजनता में महिलाएं ही सबसे अधिक धर्मध्वजा संवाहक मानी जाती हैं। भारतीय स्त्रियां आमतौर पर धर्मपरायण ही होती हैं, चाहे वे कितनी भी पढ़-लिख जाएं अथवा वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपना लें। वे आस्था और वैज्ञानिक ज्ञान को समानान्तर रखते हुए आराम से दोनों को साधे रखती हैं। किन्तु दुख की बात यह है कि विध्नहर्ता श्री गणेश से विध्नविनाश की रोज प्रार्थना करने वाली स्त्रियों के जीवन में दिन प्रतिदिन विध्न बढ़ते ही जा रहे हैं। बलात्कार, अपहरण, अपमान आदि रोजमर्रा की बात हो चली है। महिला-जीवन प्रगति कर रहा है किन्तु सुरक्षा पर प्रश्नचिन्ह के साथ।

महिला-जीवन प्रगति कर रहा है किन्तु सुरक्षा पर प्रश्नचिन्ह के साथ। लेकिन क्या सारे अपराधियों को विध्नहर्ता के खाते में डाल कर हाथ पर हाथ धरे बैठा रहा जाना चाहिए? भारतीय समाज में महिलाओं में स्वतंत्रता और आधुनिकता का विस्तार के साथ ही उनके प्रति संकीर्णता का भाव बढ़ गया। महिलाओं के विरू‘ होने वाले अपराधों को देख कर कई बार ऐसो लगने लगता है जैसे 21वीं सदी में भी आधुनिक समाज की दृष्टि अभी भी महिलाएं मात्र स्त्री हैं और उन्हें सड़ी-गली परम्पराओं से बागे नहीं आना चाहिए। स्त्री आज भी निरीह, भोग्या और उत्पीड़न की आसान शिकार मानी जाती है। इसी मानसिकता का घातक परिणाम है कि महिलाओं के प्रति छेड़छाड़, बलात्कार, यातनाएं, अनैतिक व्यापार, दहेज मृत्यु तथा यौन उत्पीड़न जैसे अपराधों की संख्या में निरंतर वृद्धि हो रही है जबकि देश में महिलाओं को अपराधों के विरुद्ध कानूनी संरक्षण दिए जाने का प्रावधान है।
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कानून तो अनेक हैं

देश में महिलाओं को अपराधों और अपराधियों से बचाने के लिए यू ंतो ढ़ेर सारे कानून बनाए गए हैं, लेकिन अपराध के आंकड़े शर्म से सिर झुका लेने को विवश करते हैं। महिलाओं की सुरक्षा के लिए जो प्रमुख कानून हैं उनमें अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम 1956, दहेज प्रतिषेध अधिनियम 1961, कुटुम्ब न्यायालय अधिनियम 1984, महिलाओं का अशिष्ट-रुण्ण प्रतिषेध अधिनियिम 1986, गर्भाधारण पूर्व लिंग-चयन प्रतिषेध अधिनियम 1994, सती निषेध अधिनियम 1987, राष्ट्रीय महिला आयोग अधिनियम 1990, घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम 2005, बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम 2006, कार्यस्थल पर महिलाओं का लैंगिक उत्पीड़न (निवारण, प्रतिषेध, प्रतितोष) अधिनियम 2013 प्रमुख हैं। इसके अतिरिक्त 16 दिसंबर, 2012 को देश की राजधानी दिल्ली में हुए ‘निर्भया कांड’ के परिप्रेक्ष्य में दंड विधि (संशोधन) 2013 पारित किया गया और यह कानून 3 अप्रैल, 2013 को देश में लागू हो गया. इस कानून में प्रावधान किया गया है कि तेजाबी हमला करने वालों को 10 वर्ष की सजा और बलात्कार के मामले में अगर पीड़ित महिला की मृत्यु हो जाती है तो बलात्कारी को न्यूनतम 20 वर्ष की सजा होगी। इसके साथ ही महिलाओं के विरुद्ध अपराध की एफआईआर दर्ज नहीं करने वाले पुलिसकर्मियों को दंडित का भी प्रावधान है। इस कानून के मुताबिक महिलाओं का पीछा करने और घूर-घूर कर देखने को भी गैर जमानती अपराध घोषित किया है। लेकिन त्रासदी है कि इन कानूनों के होते हुए भी महिलाओं पर अत्याचार थमने का नाम नहीं ले रहा है. देश में घरेलू हिंसा, बलात्कार, कन्या भ्रूण हत्या, दहेज-मृत्यु, अपहरण और अगवा, लैंगिक दुव्र्यवहार और ऑनर किलिंग की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं।

शर्मनाक आंकड़े

राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की एक रिपोर्ट के अनुसार महिलाओं को सुरक्षा उपलब्ध कराने के बावजूद भी 2014 में प्रतिदिन 100 महिलाओं का बलात्कार हुआ और 364 महिलाएं यौनशोषण का शिकार हुई। रिपोर्ट के मुताबिक 2014 में केंद्रशासित और राज्यों को मिलाकर कुल 36735 मामले दर्ज हुए। यह दुखद है कि दर में कमी आने के बजाए हर वर्ष बलात्कार के मामले में वृद्धि हुई है। सरकारी ऐजेंसी के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2004 में बलात्कार के कुल 18233 मामले दर्ज हुए जबकि वर्ष 2009 में यह संख्या बढ़कर 21397 हो गई। इसी तरह वर्ष 2012 में 24923 मामले दर्ज किए गए और 2014 में यह संख्या 36735 हो गई। तुलना करने पर साफ पता चलता है कि वर्ष 2004 की तुलना में वर्ष 2014 स्त्रीविरुद्ध अपराध के आंकड़े दुगुने हो गए। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो की एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार महिलाओं के लिए मध्यप्रदेश सबसे अधिक असुरक्षित राज्य के रुप में उभरा है। पिछले वर्ष यहां सबसे अधिक 5076 बलात्कार के मामले दर्ज किए गए। इसी तरह राजस्थान में 3759, उत्तरप्रदेश में 3467, महाराष्ट्र में 3438 और दिल्ली में 2096 बलात्कार के मामले दर्ज किए गए। महिलाओं की सुरक्षा के मामले में मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, राजस्थान और दिल्ली की दशा बिहार से भी बदतर है। आंकड़ों से उजागर हुआ है कि 2014 में बिहार में बलात्कार के कुल 1127 मामले दर्ज हुए। संपूर्ण साक्षरता वाले राज्य केरल में भी महिलाएं सुरक्षित नहीं हैं। केरल में एक वर्ष में बलात्कार के कुल 1347 मामले दर्ज किए गए।
वस्तुतः देश के अधिकांश राज्य महिलाओं की सुरक्षा के प्रश्न पर कटघरे में खड़े दिखाई देते हैं। उल्लेखनीय है कि महिलाएं सिर्फ सड़कों व सार्वजनिक स्थानों पर ही नहीं बल्कि अपने घर-परिवार के बीच भी असुरक्षित हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के अनुसार रिश्तेदारों द्वारा बलात्कार किए जाने की घटनाओं में अप्रत्याशित रुप से वृद्धि हुई है। दुष्कर्म की घटनाओं में तकरीबन 95 फीसदी मामलों में दुष्कर्मी पीड़िता के जान-परिचय का व्यक्ति होता है। यूनिसेफ की रिपोर्ट ‘हिडेन इन प्लेन साइट’ से उजागर हुआ है कि भारत में 15 साल से 19 साल की उम्र वाली 34 फीसद विवाहित महिलाएं ऐसी हैं, जिन्होंने अपने पति या साथी के हाथों शारीरिक या यौन हिंसा झेली हैं। संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष तथा वाशिंगटन स्थित संस्था ‘इंटरनेशनल सेंटर पर रिसर्च ऑन वुमेन’ की रिपोर्ट के अनुसार भारत में 10 में से 6 पुरुषों ने कभी न कभी अपनी पत्नी अथवा प्रेमिका के साथ हिंसक व्यवहार करते हैं। रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि 52 प्रतिशत महिलाओं ने स्वीकार किया कि उन्हें अपने पति अथवा प्रेमी से किसी न किसी तरह हिंसा का सामना करना पड़ा है।

कुछ क़दम उठाने ही होंगे

श्रीगणेश विध्नहर्ता हैं, यही मानते हुए सदा उनसे प्रार्थना की जाती है कि उनकी कृपा से प्रत्येक कार्य निर्विघ्न संम्पन्न हों। भारत की धर्मपरायण आमजनता में महिलाएं ही सबसे अधिक धर्मध्वजा संवाहक मानी जाती हैं। भारतीय स्त्रियां आमतौर पर धर्मपरायण ही होती हैं, चाहे वे कितनी भी पढ़-लिख जाएं अथवा वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपना लें। वे आस्था और वैज्ञानिक ज्ञान को समानान्तर रखते हुए आराम से दोनों को साधे रखती हैं। किन्तु दुख की बात यह है कि विध्नहर्ता श्री गणेश से विध्नविनाश की रोज प्रार्थना करने वाली स्त्रियों के जीवन में दिन प्रतिदिन विध्न बढ़ते ही जा रहे हैं। बलात्कार, अपहरण, अपमान आदि रोजमर्रा की बात हो चली है। महिला-जीवन प्रगति कर रहा है किन्तु सुरक्षा पर प्रश्नचिन्ह के साथ।
स्त्रियों को बढ़ते अपराधों से बचाने के लिए कुछ क़दम उठाने ही होंगे। जैसे पहला कदम है कि स्त्री के प्रति उन पुरुषों की सोच को बदलना होगा जो स्त्री को मात्र देह अथवा उपभोग की वस्तु के रूप में देखते हैं। ऐसे पुरुषों की सोच को बदलने के लिए कानूनी ही नहीं अपितु सामाजिक स्तर पर भी कठोरता बरतनी होगी। किसी भी आयुवर्ग के बलात्कारी का सामाजिक बहिष्कार भी जरूरी है जिससे ऐसे अपराधियों पर भय व्याप्त हो सके। दूसरा कदम है शौचालय का। ग्रामीण अंचलों एवं झुग्गी-बस्तियों में टी.वी. और मोटरसायकिलें तो मिल जाती है किन्तु शौचालय नहीं मिलता है। इस बुनियादी आवश्यकता के प्रति किसी का ध्यान ही नहीं जाता है। जबकि शौचालय के अभाव में स्त्रियों को समय-असमय घर से बाहर अकेले निकलने को विवश होना पड़ता है। फिर भी न तो वे स्त्रियां घर में शौचालय की मांग करती हैं और न घर के पुरुष इस ओर ध्यान देते हैं। इस प्रकार जागरूकता की कमी समस्या को जस का तस बनाए हुए है। कम से कम वर्ष 21 वीं सदी के इस दूसरे दशक में तो यह मुद्दा समाप्त हो ही जाना चाहिए। तीसरा कदम है स्त्री शिक्षा का। यदि आंकड़ों पर ही शिक्षा को मापें तब भी स्त्री-शिक्षा का आंकड़ा शत-प्रतिशत पर नहीं पहुंच सका है। स्त्रियों में आत्मबल शिक्षा द्वारा ही जागृत किया जा सकता है। चैथा कदम है राजनीति में स्त्रियों के वास्तविक स्थान का। देखने में आता है कि सारे निर्णय पति अथवा परिवार के पुरुष लेते हैं और सरपंच अथवा पार्षद स्त्रियां ‘रबर स्टैम्प’ की भांति उनके निर्णय पर खामोशी से मुहर लगाती रहती हैं। राजनीति में स्त्रियों के बढ़ते वर्चस्व की तस्वीर वाले कोलाज़ का यह टुकड़ा निहायत भद्दा और झुठ का पुलन्दा है। इस टुकड़े की कड़ाई से जांच किए जाने की जरूरत है वरना हमारे स्त्री-प्रगति के किस्से थोथे चने की तरह बजते रहेंगे और स्त्रियां उसी तरह दोयम दर्जे पर ही खड़ी रहेंगी। पांचवा कदम है स्त्री द्वारा आत्मावलोकन का। जी हां, स्त्रियों को अपने भीतर झांकना चाहिए। चाहे वह मां हो, सास हो, बेटी हो, बहू हो या किसी भी रूप में हो, उसे खुद को परखना होगा कि वह अन्य स्त्रियों के प्रति कितनी सहज और उत्तरदायित्वपूर्ण है? स्त्रियों की बहुत सारी समस्याएं तो मात्र इसी बात समाप्त हो सकती है कि यदि एक स्त्री पर संकट आए तो दूसरी स्त्रियां उसके पक्ष में जा खड़ीं हों और उसकी मदद करें।
यदि इस तरह कुछ महत्वपूर्ण कदम गंभीरता से उठाए जाएं तो विध्नहर्ता भी आगे बढ़ कर सहायता करेंगे। वो कहते हैं न कि ‘‘हिम्मते मर्दा तो मददे खुदा!’’
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Wednesday, August 31, 2016

चर्चा प्लस ... ब्रिक्स के खजुराहो सम्मेलन से आशाएं .... डाॅ. शरद सिंह

Dr Sharad Singh
मेरा कॉलम  "चर्चा प्लस"‬ "दैनिक सागर दिनकर" में (31. 08. 2016) .....
 
My Column Charcha Plus‬ in "Dainik Sagar Dinkar" .....
  
ब्रिक्स के खजुराहो सम्मेलन से आशाएं
- डॉ. शरद सिंह
1 सितम्बर 2016 को खजुराहो में होने जा रहे दो दिवसीय ब्रिक्स सम्मेलन की मेजबानी करने का सुअवसर मिला है मध्यप्रदेश को। खजुराहो में होने वाले इस आठवें ब्रिक्स सम्मेलन की अध्यक्षता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी करेंगे। इसमें ब्रिक्स शिखर समूह के सभी देश भारत, चीन, रूस, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका शामिल हो रहे हैं। यह समूह विश्व अर्थव्यवस्था की संवृद्धि में विविधता लाने की दिशा में प्रयासरत है। इसलिए ब्रिक्स के इस खजुराहो सम्मेलन से आर्थिक दिशा में अच्छे परिणाम की आशा की जा सकती है। उम्मीद तो यह भी है कि भारत के हित में यह सम्मेलन सार्थक सिद्ध होगा।

21 वीं सदी में किसी भी देश के लिए पर्यटन व्यवसाय एक मजबूत आर्थिक स्रोत के रूप में उभरा है। आतंकवादी गतिविधियां भले ही इस व्यवसाय के मार्ग में रोड़ा बन कर खड़ी हो जाती हैं फिर भी यह व्यवसाय उद्योगजगत और पर्यटन प्रेमियों दोनों को समान रूप से लुभता रहता है। पर्यटन के क्षेत्र में और अधिक संभावनाओं की तलाश खजुराहो में होने जा रहे ब्रिक्स सम्मेलन की बुनियादी चर्चा का विषय रहेगा। सम्मेलन में पांच देशों के पर्यटन मंत्रियों के साथ कुल 25 सदस्य होंगे। इसमें धरोहरों के संरक्षण, संवर्धन और सुरक्षा पर मंथन होगा। चंदेल राजाओं द्वारा बसाए गए ऐतिहासिक महत्व के कलातीर्थ खजुराहो में पयर्टन पर अंतराष्ट्रीय स्तर का मंथन होना अपने-आप में महत्वपूर्ण रहेगा। सम्मेलन में भारत समेत ब्राजील, रूस, चीन और दक्षिण अफ्रीका के पर्यटन मंत्री शामिल होने जा रहे हैं।
विगत 22 मार्च को भारत में ब्रिक्स सम्मेलन श्रृंखला के लिए ब्रिक्स लोगो और ब्रिक्स वेबसाइट का विदेश मंत्री द्वारा औपचारिक शुभारंभ किया गया था। ब्रिक्स के लोगो को संदीप गांधी ने डिजाइन किया है। इस लोगो में भारत के राष्ट्रीय फूल का प्रतीक और ब्रिक्स देशों के रंग हैं। 

क्या है ब्रिक्स

ब्रिक्स पांच प्रमुख उभरती अर्थव्यवस्थाओं वाले देशों का समूह है जहां विश्वभर की लगभग 43 प्रतिशत आबादी रहती है। इसके सदस्य राष्ट्र ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका हैं। इन्ही देशों के अंग्रेजी में नाम के प्रथमाक्षरों से मिलकर इस समूह का यह नामकरण हुआ है। इन देशों में विश्व का सकल घरेलू उत्पाद लगभग 37 प्रतिशत है और विश्व व्यापार में इसकी लगभग 17 प्रतिशत हिस्सेदारी है। 21 वीं शताब्दी के पहले दशक में जहां परम्परागत देश दशक के अन्त तक वैश्विक वित्तीय संकट से ग्रस्त हो गए, वहीं विश्व के कतिपय विकासशील देशों ने इस दशक में उल्लेखनीय आर्थिक प्रगति दर्ज की। वर्ष 2009 में ऐसे ही चार देशों-ब्राजील, रूस, भारत व चीन ने एक नए आर्थिक संगठन ‘ब्रिक’ की स्थापना की। ब्रिक की स्थापना इन चार देशों के प्रथम शिखर सम्मेलन का परिणाम थी। इनका प्रथम शिखर सम्मेलन 16 जून 2009 को रूस के शहर येकेतरिनबर्ग में सम्पन्न हुआ था। इस सम्मेलन में इन चारों देशों ने अमरीका व उसके यूरोपीय सहयोगियों के प्रभुत्व वाली वर्तमान वैश्विक व्यवस्था के स्थान पर बहुध्रुवीय वैश्विक व्यवस्था के पक्ष में आवाज उठाई। इनका मानना था कि बहुध्रुवीय वैश्विक व्यवस्था विकासशील देशों की आर्थिक व्यवस्था को मजबूती प्रदान कर सकती है।
 
Charcha Plus Column of Dr Sharad Singh in "Sagar Dinkar" Daily News Paper
ब्रिक्स सम्मेलनों का क्रम

भारत में आठवां ब्रिक्स सम्मेलन होने वाला है। ब्रिक्स का प्रथम शिखर सम्मेलन 16 जून 2009 को रूस के शहर येकेतरिनबर्ग में हुआ था। इसके परिणामों में उत्साहित हो कर दूसरा ब्रिक सम्मेलन 15 अप्रैल, 2010 को ब्राजील के शहर ब्राजीलिया में आयोजित किया गया था। इस सम्मेलन में भी ब्रिक देशों ने बहुध्रुवीय समतापूर्ण व प्रजातांत्रिक विश्व व्यवस्था की मांग उठाई थी। उल्लेखनीय है कि ये चारों देश जी-20 समूह के भी सदस्य हैं । अतः इन्होंने यह मांग की कि जी-8 के स्थान पर जी- 20 को विश्व अर्थव्यवस्था के प्रबन्धन में महत्वपूर्ण भूमिका प्राप्त होनी चाहिए। ब्रिक्स अन्तर्राष्ट्रीय वित्तीय सुधार का पक्षधर है। दूसरे शिखर सम्मेलन में इन देशों ने यह भी निर्णय लिया था कि दक्षिण अफ्रीका को ब्रिक की सदस्यता प्रदान की जाए । चूंकि ‘ब्रिक’ का नामकरण इसके सदस्य देशों के नाम के पहले अक्षर से हुआ है । अतः दक्षिण अफ्रीका के शामिल होने के बाद इसका नाम ‘ब्रिक्स’ (ब्राजील, रूस, इंडिया, चाइना और साउथ आफ्रिका) हो गया।
ब्रिक्स का तीसरा शिखर सम्मेलन चीन के शहर सान्या में 14 अप्रैल 2011 को हुआ। दक्षिण अफ्रीका ने पहली बार इस सम्मेलन में भाग लिया। इस सम्मेलन में पांचों देशों ने पहली बार एक कार्यवाही योजना को स्वीकृति प्रदान की। इस कार्यवाही योजना में जहां एक ओर इन देशों में चल रहे सहयोगात्मक कार्यक्रमों की समीक्षा की गई, वहीं सहयोग की नई गतिविधियों पर प्रकाश डाला गया। इस कार्यवाही योजना में सुरक्षा सम्बन्धी मामलों, खाद्य सुरक्षा, तकनीकी शोध, बैंकिंग संस्थाओं में सहयोग तथा व्यावसायिक संगठनों में सहयोग को प्राथमिकता दी गई। कार्यवाही योजना में चार नए क्षेत्रों को भविष्य में सहयोग हेतु चिन्हित किया गया। ये क्षेत्र थे - सदस्य देशों के नगर निगमों के मंच का आयोजन, व्यापार तथा सम्बन्धित क्षेत्रें में शोध को बढ़ावा, स्वास्थ्य मंत्रियों के सम्मेलन का आयोजन तथा इस क्षेत्र में सहयोग, इन देशों की बिबलियोग्राफी को समुन्नत बनाना। ब्रिक्स का चैथा सम्मेलन सन् 2012 में भारत की राजधानी नई दिल्ली में हुआ। पांचवां सम्मेलन सन् 2013 में दक्षिण अफ्रीका के डरबन में, छठां सम्मेलन सन् 2014 ब्राजील के फोर्टलीजा शहर में तथा सातवां सम्मेलन रूस के ऊफा शहर में आयोजित किया गया था। दक्षिण अफ्रीका के डरबन में मार्च, 2013 में ब्रिक्स शिखर सम्मेसलन के दौरान जारी किए गए घोषणापत्र के अनुरूप, आर्थिक मुद्दों के अतिरिक्त, मादक द्रव्य के मुद्दे को प्रमुखता से उठाते हुए सदस्य देशों के बीच सहयोग के विभिन्न नए क्षेत्रों की खोज करने का फैसला किया गया। फैसला किया गया कि ब्रिक्सस मादक द्रव्य् रोधी कार्य समूह बैठक के तत्वागधान में पांच सदस्य देशों की मादकद्रव्य रोधी एजेंसियों के प्रमुखों की नियमित अंतराल पर बैठक आयोजित की जाए। इस घोषणापत्र की भावना के अनुरूप, ब्रिक्स देशों की मादक द्रव्य रोधी कार्यसमूह की प्रथम बैठक नवंबर, 2015 में रूस के मास्को में आयोजित की गई थी। इससे पूर्व सन् 2014 में ब्राजील में हुए ब्रिक्स सम्मेलन में भारत की पहल पर सौ अरब डॉलर से ब्रिक्स विकास बैंक की स्थापना का फैसला लिया गया था। अब भारत में होने वाले आठवें सम्मेलन में आर्थिक उन्नति से लेकर अंतरराष्ट्रीय आंतकवाद और पर्यावरण, पर्यटन सहित अन्य मुद्दों पर चर्चा होगी। आठवें सम्मेलन की मेजबानी का जिम्मा भारत को मिला है। खजुराहो में होने जा रहा सम्मेलन पहले गोवा में होना था, लेकिन विदेश मंत्रालय को भारतीय परंपरा व संस्कृति की झलक दिखाने की दृष्टि से खजुराहो का चयन किया गया और गोवा के स्थान पर खजुराहो को यह मौका दिया गया। खजुराहो उम्मेलन के दौरान मध्यप्रदेश सहित दूसरे राज्य भारतीय कला व संस्कृति की प्रस्तुति भी सदस्य देशों के प्रतिनिधियों के मन को लुभाएगी। इसके बाद नई दिल्ली के सिरीफोर्ट ऑडिटोरियम में 2 सितंबर, 2016 से 6 सितंबर, 2016 तक ब्रिक्स फिल्म महोत्सव आयोजित किया जाएगा। फिल्मों के साथ ही मंच कला का भी प्रदर्शन होगा। लेकिन फिलहाल खजुराहो सम्मेलन पर सबकी दृष्टि रहेगी।

सार्थक संभावनाएं

ब्रिक्स देश विश्व की सर्वाधिक तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाएं हैं। ब्रिक्स संगठन सदस्य देशों के बीच अर्थव्यवस्थाओं के परस्पर सहयोग पर बल देता है। दरअसल, ब्रिक्स के सदस्य देशों की अनेक अर्थों में समान स्थितियां हैं। वे विकास की समान अवस्था में हैं। वे आर्थिक रूप् से अभी विकासशील हैं और अपनी आर्थिक मजबूती के लिए संघर्षशील हैं। उनके सामने अर्थव्यवस्था के विकास के साथ-साथ जनता के कल्याण की भी जिम्मेदारी है। पांचों सदस्य अपनी अर्थव्यवस्था के पुनर्गठन, स्वस्थ एवं टिकाऊ संवृद्धि और समावेशी, न्यायसंगत एवं स्वच्छ विकास के संदर्भ में समान चुनौतियों और समस्याओं का सामना कर रहे हैं। ब्रिक्स ने पांचों देशों को विकास सम्बन्धी अनुभवों को साझा करने का महत्वपूर्ण मंच प्रदान किया है। इन देशों के लिए ब्रिक्स वी प्लेटफार्म है जिस पर एक साथ खड़े हो कर ये अपने विकास के अनुभव साझा कर सकते हैं तथा परस्पर एक-दूसरे के अनुभवों से सीख कर आगे की योजनाएं बना सकते हैं। मात्र संभावनाओं की तलाश नहीं वरन् ब्रिक्स देशों को वैश्विक आर्थिक शासन और संबद्ध संस्थानों में सुधार की भी चिंता है। वे अपने खुद के हितों के साथ-साथ समूचे अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के हित साधने के सम्मलित उपाय ढूंढ रहे हैं। ब्रिक्स देश एक साथ मिलकर संयुक्त राष्ट्र जी-20 जैसे मंचों पर काम कर रहे हैं और खाद्य, ऊर्जा सुरक्षा, जलवायु परिवर्तन, सहस्त्राब्दि विकास लक्ष्य, अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों के सुधार, नागरिकों की बुनियादी जरूरतों की पूर्ति जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर एकजुट हैं। वस्तुतः ब्रिक्स विकसित और विकासशील देशों के बीच संवाद स्थापित करने में सेतु की भूमिका भी निभा रहा है ।
1 सितम्बर 2016 को खजुराहो में होने जा रहे दो दिवसीय ब्रिक्स सम्मेलन की मेजबानी करने का सुअवसर मिला है मध्यप्रदेश को। खजुराहो में होने वाले इस आठवें ब्रिक्स सम्मेलन की अध्यक्षता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी करेंगे। इसमें ब्रिक्स शिखर समूह के सभी देश भारत, चीन, रूस, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका शामिल हो रहे हैं। यह समूह विश्व अर्थव्यवस्था की संवृद्धि में विविधता लाने की दिशा में प्रयासरत है। इसलिए ब्रिक्स के इस खजुराहो सम्मेलन से पर्यटन को लेकर आर्थिक दिशा में अच्छे अनुबंधों एवं योजनाओं की आशा की जा सकती है। इस सम्मेलन में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पर्यटन उद्योग को बढ़ावा मिलने की भी संभावना है। उम्मीद तो यह भी है कि भारत के हित में यह सम्मेलन सार्थक सिद्ध होगा।
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चर्चा प्लस ... लेना होगा रियो ओलम्पिक से सबक .... डाॅ. शरद सिंह

Dr Sharad Singh
मेरा कॉलम  "चर्चा प्लस"‬ "दैनिक सागर दिनकर" में (24. 08. 2016) .....


 


My Column Charcha Plus‬ in "Dainik Sagar Dinkar" .....
लेना होगा  रियो ओलम्पिक से सबक
- डॉ. शरद सिंह
        सवा सौ करोड़ की जनसंख्या की ओर से 119 खिलाड़ी रियो ओलम्पिक में शामिल हुए। इन 119 खिलाड़ियों में से मात्र दो खिलाड़ियों ने पदक जीते। वह भी कांस्य और रजत। पदकों के अकाल के बीच छाई घनी अंधियारी में दो महिला खिलाड़ियों ने भारत की लाज बचाई और भारत की खाली झोली में दो पदक डाले। पी. वी. सिंधु ने रजत पदक और साक्षी मलिक ने कांस्य पदक जीता। लेकिन खुश होने के लिए दो पदक प्र्याप्त नहीं हैं। हमें पदकों का यह अकाल क्यों झेलना पड़ा इसकी समीक्षा भी जरूरी है। लेना होगा रियो ओलम्पिक से सबक तभी टोक्यो में कुछ हासिल कर पाएंगे।
  चार साल की तैयारी के दौरान देशवासियों को बड़ी आशा थी कि इस बार देश को पदक तालिका में सम्मानजनक स्थान मिलेगा। भारत ने 2012 में पिछले लंदन ओलंपिक में दो रजत और चार कांस्य सहित छह पदक जीते थे जबकि 2008 के बीजिंग ओलंपिक में भारत ने एक स्वर्ण और दो कांस्य सहित तीन पदक जीते। इस बार भारत के लिये भारतीय ओलंपिक संघ (आईओए) ने दस से 15 पदक का दावा किया था लेकिन परिणाम रहा दो पदकों में सिमटा हुआ। वह तो गनीमत है कि सिंधू और साक्षी ने 24 घंटे के अंतराल में दो पदक जीतकर देश के सम्मान को सहारा दिया। अन्यथा 12 दिनों का खेल हो जाने पर भी भारत का खाता न खुल पाने पर यही लगने लगा था कि पदक तालिका में देश को जगह मिल ही नहीं पाएगी। जनसंख्या के हिसाब से विश्व के दूसरे नंबर का देश होने पर भी पदक तालिका में शून्य रहना भारत के लिए सबसे शर्मनाक बात होती। लेकिन दो बैसाखियों के सहारे पदक तालिका में पहुंच ही गए। पहले हरियाणा की साक्षी ने ऐतिहासिक कांस्य पदक जीता और फिर हैदराबाद की सिंधू ने ऐतिहासिक रजत पदक जीत लिया। सवा सौ करोड़ की जनसंख्या की ओर से 119 खिलाड़ी रियो ओलम्पिक में शामिल हुए। इन 119 खिलाड़ियों में से मात्र दो खिलाड़ियों ने पदक जीते। वह भी कांस्य और रजत। पदकों के अकाल के बीच छाई घनी अंधियारी में दो महिला खिलाड़ियों ने भारत की लाज बचाई। लेकिन खुश होने के लिए दो पदक प्र्याप्त नहीं हैं। हमें पदकों का यह अकाल क्यों झेलना पड़ा इसकी समीक्षा भी जरूरी है।
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जीते नहीं पर उल्लेखनीय रहे 


साक्षी और सिंधु ने न केवल अच्छा प्रदर्शन किया बल्कि पदक भी जीत कर दिखाया लेकिन कुछ खिलाड़ी ऐसे भी रहे जो पदक तो नहीं जीत सके लेकिन उनके प्रदर्शन को इस उम्मी में अच्छा माना जा सकता है कि ये चार साल बाद टोक्यों ओलम्पिक में पदकों की कमी को दूर कर दिखाएंगे। महिला जिमनास्ट दीपा करमाकर का वॉल्ट फाइनल में चैथा स्थान हासिल करना, निशानेबाज अभिनव बिंद्रा का दस मीटर एयर राइफल स्पर्धा में चैथे स्थान पर रहना, एथलीट ललिता बाबर का 3000 मीटर स्टीपलचेका में दसवें नंबर पर रहना, सानिया मिर्जा और रोहन बोपन्ना का कांस्य पदक मुकाबले में हारना, किदांबी श्रीकांत का बैडमिंटन के पुरुष क्वार्टरफाइनल में हारना, पुरुष तीरंदाज अतानु दास का क्वार्टरफाइनल तक पहुंचना, मुक्केबाज विकास कृष्णन यादव का भी क्वार्टरफाइनल में पहुंचना, 18 वर्षीय महिला गोल्फर अदिति अशोक का 41वां स्थान हासिल करना और युवा निशानेबाज जीतू राय का 10 मीटर एयर पिस्टल में आठवें स्थान पर रहना इस निराशाजनक अभियान के बीच कुछ उल्लेखनीय प्रदर्शन रहे। 

जिनसे बहुत उम्मीदें थीं

यूं तो जितने भी खिलाड़ी ओलम्पिक में भेजे जाते हैं उनसे बड़ी उम्मीदें रहती हैं। क्योंकि वे अच्छे खिलाड़ी ही होते हैं जिनका ओलम्पिक के लिए देश के भीतर चयन किया जाता है फिर चार साल का विशेष अभ्यास और उसके बाद क्वालीफाईंग प्रदर्शन के बाद ही कोई खिलाड़ी ओलम्पिक के मैदान पर उतर पाता है। फिर भी कई दिग्गजों के सुपर फ्लॉप प्रदर्शन के बीच भारत का रियो ओलंपिक में अभियान रिकॉर्ड 119 सदस्यीय दल उतारने के बावजूद मात्र दो पदकों के साथ समाप्त हो गया। टेनिस में सानिया मिर्जा और बैडमिंटन में सायना नेहवाल से बहुत आशाएं थीं। ओलम्पिक से बाहर इनका प्रदर्शन सदैव अच्छा रहा है। भारत को 31वें ओलम्पिक खेलों में पुरुष खिलाड़ियों ने सर्वाधिक निराश किया। बीजिंग ओलम्पिक 2008 में स्वर्ण पदक जीतने बाले निशानेबाज अभिनव बिंद्रा कांस्य पदक के बिल्कुल नजदीक पहुंचकर लड़खड़ा गए। उनसे भी एक बार फिर इतिहास दोहराए जाने की आशा थी। भारोत्तोलकों और धावकों ने भी खासा निराश किया। कुश्तीमें भारत के पदक की उम्मीद योगेश्वर दत्त क्वालिफिकेशन राउंड में ही हार गए। योगेश्वर वल्र्ड नंबर 6 गांजोरिग के खिलाफ कोई दांव नहीं लगा पाए। एक बार अटैक की कोशिश भी की, लेकिन खुद ही पटकनी खा गए। मैराथन में टी गोपी 39वें, खेता राम 52वें और नितेंद्र सिंह 93वें स्थान पर रह गए। योगी की हार के साथ ही 31वें ओलिंपिक में भारत का अभियान खत्म हो गया। भारत ने रियो में सिर्फ दो मेडल जीते। पीवी सिंधु ने सिल्वर और साक्षी ने ब्रॉन्ज जीता। यह पिछले तीन ओलिंपिक यानी आठ साल में भारत का सबसे कमजोर प्रदर्शन है। भारत ने बीजिंग में तीन और लंदन में छह मेडल जीते थे। अमेरिका 45 गोल्ड समेत 120 पदक के साथ मेडल टैली में टॉप पर रहा। यह दूसरा अवसर है जब हमारी सिर्फ महिला खिलाड़ी मेडल जीत सकीं। इससे पहले 2000 में सिडनी ओलिंपिक में एकमात्र मेडल कर्णम मल्लेश्वरी ने दिलाया था। पिछले 12 साल में यह पहला मौका है जब हमारा कोई भी पुरुष खिलाड़ी मेडल नहीं जीत पाया। अब तक का अपना सबसे बड़ा ओलम्पिक दल भेजने के बावजूद भारत पिछले प्रदर्शन से भी फिसड्डी रहा।
विनेश चोटिल होकर बाहर, तीरंदाजी में अतानु,दीपिका, बोंबायला प्री क्वार्टर में हारे। महिला टीम क्वार्टर फाइनल शूटआॅफ में हारी, एथलेटिक्समें पुरुष एथलीट पहले राउंड से आगे नहीं बढ़ पाए। ललिता फाइनल खेलने वाली एकमात्र एथलीट रहीं। बॉक्सिंग में विकासक्वार्टर, मनोज प्री क्वार्टर और शिवा थापा पहला मैच ही हारे। हॉकी में पुरुषटीम क्वार्टर में हारी। महिला टीम आखिरी स्थान पर रही। गोल्फ में एसएसपीचैरसिया 50वें, अनिर्बाण 57वें और अदिति 41वें स्थान पर रहीं। जिम्नास्टि में दीपावॉल्ट में 0.15 अंक से ब्रॉन्ज चूकीं। जूडो में अवतारपहले राउंड में रिफ्यूजी खिलाड़ी से हारे। रोइंग में दत्तू क्वार्टर में हारे। शूटिंग में सिर्फअभिनव बिंद्रा और जीतू राय ही फाइनल में पहुंचे।स्वीमिंग में साजन और शिवानी हीट से आगे नहीं बढ़े। टेनिस में मिक्स्डडबल्स में ब्रॉन्ज मेडल मैच में हारी सानिया-बोपन्ना की जोड़ी। वेटलिफ्टिंग में एससतीश और चानू फाइनल में ही प्रवेश नहीं कर पाए। 


सुविधाओं की कमी का रोना

5 से 21 अगस्त 2016 तक चलने वाले रियो ओलम्पिक में खराब प्रदर्शन के बाद कई खिलाड़ियों ने सुविधाओं की कमी का रोना रोया। यदि सुविधाओं में सचमुच बहुत कमी थी तो साक्षी और सिंधू को वह कमी क्यों नहीं रोक पाई? या फिर हमारे खिलाड़ी भी अधिक सुविधाभोगी और पैसों के पीछे भागने वाले बनते जा रहे हैं। सुविधा में कमी का रोना रोने वाले खिलाड़ी और उनके समर्थक अकसर क्रिकेट का उदाहरण देते हैं और तर्क देते हैं कि क्रिकेटरों की भांति उन पर भी पैसों की बरसात क्यों नहीं होती है? उस समय वे भूल जाते हैं कि 20-20 खेलने वाले खिलाड़ी ‘निजी मालिकों’ की ‘सम्पत्ति’ बन कर खेलते हैं जो पैसों की दृष्टि से बेहतर होता है लेकिन सम्मान की दृष्टि से देश का प्रतिनिधि बन कर खेलना कहीं अधिक सम्मानजनक होता है। ओलम्पिक जैसे वैश्विक खेलों में देश का प्रतिनिधित्व करने से मिलने वाले सम्मान को पैसों में नहीं तौला जा सकता है। जहां तक सुविधाओं का सवाल है तो बहुत से आफ्रिकी देश जिनके खिलाड़ियों ने ओलम्पिक में भाग लिया, बुनियादी सुविधाओं के अभाव से गुज़र रहे हैं। वहां के खिलाड़ियों को न तो भरपेट पौष्टिक भोजन मिलता है और ने बेहतरीन जूते। फिर भी वे सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करते हैं। टर्की जैसा देश अपनी आंतरिक अस्थिरता और तख़्तापलट से बाल-बाल बचा। फिर भी वहां के खिलाड़ियों ने बेहतर प्रदर्शन किया।
भारतीय खिलाड़ियों को और कितनी और कैसी सुविधाएं चाहिए इस पर उनसे खुल कर राय मंगाई जानी जरूरी है। लेकिन क्या सुविधाओं के बदले वे यह आश्वासन दे सकेंगे कि वे देश के लिए पदक ला कर ही रहेंगे? जब मुकाबला विश्वस्तर का हो तो सुविधाओं से कहीं अधिक लगन और आत्मबल की आवश्यकता होती है। इस बात को सिंधु और साक्षी ने साबित भी कर दिया है। 


टोक्यो ओलम्पिक के लिए मंथन जरूरी

जो हुआ सो हुआ। रियो ओलम्पिक के परिणाम बदले नहीं जा सकते हैं। ओलम्पिक के इतिहास में भारत दो पदकों के साथ अंकित हो गया है और रियो ओलम्पिक का नाम आते ही ये दो पदक ही आंसू पोंछने का रूमाल बनेंगे। लेकिन कहा गया है न कि ‘‘बीती बात बिसारिए, आगे की सुध लेय’’, तो अब आगे टोक्यो ओलम्पिक के लिए हमें उन स्थितियों की समीक्षा करनी ही होगी जिनके कारण हम रियो में पदक पाने से वंचित रह गए। खिलाड़ियों के चयन से ले कर उनकी सुविधाओं तक ध्यान देते हुए खिलाड़ियों को भी इस बात के लिए तैयार करना होगा कि वे अपने प्रदर्शन को व्यक्तिगत प्रदर्शन नहीं बल्कि देश का प्रदर्शन मान कर अपना सर्वश्रेष्ठ देने के लिए तत्पर रहें। यदि वे ऐसा नहीं कर सकते हैं तो ईमानदारी से पीछे हट जाएं और दूसरे खिलाड़ियों को मौका दें, जो उनसे बेहतर खेल सकते हों। अब टोक्यो ओलम्पिक में कुछ कर दिखाना है तो रियो में मिली असफलताओं का मंथन करना ही होगा।
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Wednesday, August 17, 2016

चर्चा प्लस ... स्वतंत्रता, स्वास्थ्य, सुरक्षा और स्त्री .... डाॅ. शरद सिंह

Dr Sharad Singh
मेरा कॉलम  "चर्चा प्लस" "दैनिक सागर दिनकर" में (17. 08. 2016) .....
 
My Column Charcha Plus‬ in "Dainik Sagar Dinkar" .....
  स्वतंत्रता, स्वास्थ्य, सुरक्षा और स्त्री
- डॉ शरद सिंह
समाज की भांति हिन्दी व्याकरण भी पुरुष प्रधान है। अंग्रेजी में व्यक्तिवाचक संज्ञा के लिए प्रथम, द्वितीय, तृतीय के साथ ‘पर्सन’ अर्थात् ‘व्यक्ति’ जुड़ा होता है। यह ‘पर्सन’ (व्यक्ति) पुरुष भी हो सकता है और स्त्री भी किन्तु, हिन्दी भाषा के व्याकरण में मानो स्त्री न तो कोई व्यक्ति है और न व्यक्तिवाचक संज्ञा। प्रथम है तो पुरुष, द्वितीय है तो पुरुष और तृतीय है तो पुरुष, फिर स्त्री के लिए जगह कहां हैं? क्या स्त्री का अस्तित्व मात्र लिंग तक सीमित हैं? मैं न तो व्याकारण की आधिकारिक ज्ञाता हूं और न आधिकारित व्याख्याकार, लेकिन एक स्त्री होने के नाते यह बात मुझे सदैव चुभती है।
स्वतंत्रता मात्र एक शब्द नहीं, असीमित संभावनाओं एवं असीमित सकारात्मकता के द्वार की चाबी है। इस चाबी से देष के बहुमुखी विकास का द्वार तो खुला ही, स्त्री के अधिकारों का द्वार भी खुला। सन् 1947 से सन् 2016 तक के लम्बे सफर में स्त्री ने प्रगति के अनेक सोपान चढ़े हैं। फिर भी बहुत कुछ बुनियादी स्तर पर छूटा हुआ है। विषेष रूप से मध्यमवर्गीय और ग्रामीण अंचलों में तस्वीर अभी श्वेत-ष्याम दिखाई देती है। इन तबकों में बेटे की ललक स्त्री को आज भी बाध्य करता है कि वह बेटी पैदा करने के बारे में सोचे भी नहीं। विवाह के समय बहू के साथ ढेर सारा दहेज मिले। स्त्री परिवार की सदस्य तो रहे किन्तु मुखिया बनने का स्वप्न न देखे। अर्थात् स्त्री परिवार की अनुमति के बिना न तो कमाने की सोचे और न खर्च करने के बारे में विचार करे, परिवार से संबंधित महत्वपूर्ण निर्णय भी लेने के बारे में न सोचे। आज भी यह कटुसत्य स्त्रीप्रगति की तस्वीर को मुंहचिढ़ाता रहता है। स्त्री के विरुद्ध होने वाले अपराधों के आंकड़े भी घटने का नाम नहीं ले रहे हैं। जिस तरह महाभारत काल में भरे दरबार में दुश्शासन ने द्रौपदी का चीर हरण करने का दुस्साहस किया था, वैसा दुस्साहस आजकल बलात्कार के रूप में समाचारों की सुर्खियां बनता रहता है। उस जमाने में कृष्ण ने द्रौपदी की रक्षा की थी लेकिन इस जमाने में दुश्शासन तो बहुतेरे हैं लेकिन कृष्ण जैसे साहस का अभाव है।

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 स्वास्थ्य की बुनियाद
स्त्री बुनियाद है परिवार की। वह बच्चों को जन्म देती है और उनकी परवरिष करती है। लेकिन इसी स्त्री की षिक्षा और स्वास्थ्य के बारे में आंकड़े अधिक बोलते हैं, सच्चाई कम। राजनीतिक हलकों अथवा सरकारों को स्त्री-स्वास्थ्य जच्चा-बच्चा के टीकाकरण तक ही सीमित दिखाई देता रहा है। पहली बार मध्यप्रदेष सरकार ने एक महत्वपूर्ण घोषणा की कि छात्राओं को सैनेटरी पेड्स मुफ़्त उपलब्ध कराए जाएंगे। स्त्री-जीवन के जिस सबसे महत्वपूर्ण पक्ष की ओर कभी ध्यान नहीं दिया गया उस ओर ध्यान दिया जाना इस बात का द्योतक कहा जा सकता है कि स्त्री के स्वास्थ्य के प्रति एक राज्य-सरकार का ध्यान आकृष्ट तो हुआ। बाकी राज्य सरकारों को भी बिना किसी राजनीतिक पूर्वाग्रह के इस कदम को अपनाना चाहिए। क्योंकि जो परिवार गरीबीरेखा ने नीचे जी रहे हैं अथवा जिनमें स्त्री-स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता नहीं है, उन परिवारों की बेटियों को मासिकधर्म के समय स्वच्छ साधन उपलब्ध हो सके। मासिकधर्म वह प्रक्रिया है जो स्त्री के जननी बनने में अहम भूमिका निभाती है।
नई दिल्ली लोधी रोड स्थित सभागार में 15 फरवरी, 2012 को केन्द्रीय पेयजल एवं स्वच्छता मंत्रालय द्वारा ग्रामीण स्वच्छता प्रवर्द्धन हेतु राष्ट्रीय परामर्श का आयोजन किया गया था। इस कार्यक्रम का मुख्य मुद्दा शौचालय था। चर्चा में हिस्सा लेने वाले प्रमुख गैर-सरकारी संगठनों ने बहुत विस्तार से इस मुद्दे पर बातचीत की कि भारत की निरन्तर बढ़ती मलिन बस्तियों और ताल-तलैयों में बैक्टीरिया के बढ़ने से अनेक बीमारियां पैदा होती हैं और देशभर में ग्रामीण इलाके के लोग उससे प्रभावित होते हैं।
02 अक्टूबर 2014 को मोदी सरकार ने ‘स्वच्छ भारत अभियान’ के अंतर्गत ख्ुाले में शौच से मुक्ति की ओर कदम बढ़ाने का खुला आह्वान किया। स्त्री-जीवन की सुऱक्षात्मक प्रगति के पक्ष में ‘‘सोच से शौचालय तक’’ का यह कदम स्वागत योग्य रहा है। किन्तु इसके लिए जनजागरूकता सबसे अधिक जरूरी है। यह तो आमजनता को ही समझना पड़ेगा न कि एक स्वस्थ औरत ही स्वस्थ पीढ़ी को जन्म दे सकती है और एक स्वस्थ औरत ही बहुमुखी प्रगति कर सकती है। 

सुरक्षा का प्रश्न
एक और बुनियादी समस्या जिसके बारे में लगभग दस वर्ष से भी पहले मैंने एक कहानी लिखी थी ‘मरद’। कहानी का सार यही था कि सुंदरा नाम की एक नवयुवती विवाह के उपरान्त अपने ससुराल आती है, जहां उसे खुले में शौच के लिए जाना पड़ता है। जब तक उसकी सास या उसकी सहेलियां उसके साथ जाती हैं तब तक वह सरपंच की कुदुष्टि से बची रहती है। लेकिन एक दिन अकेले जाने पर सुंदरा सरपंच की हवस की षिकार हो जाती है। वह पुलिस के पास जाना चाहती है लेकिन उसकी सास उसे चुप रहने को मना लेती है, उसका पति भी उसे चुप रहने को कहता है। कुछ वर्ष बाद जब कुदृष्टि के काले साए सुंदरा की अवयस्क बेटी चमेली पर मंडराने लगते हैं तो वह चुप न बैठ कर रौद्र रूप धारण कर लेती है और अपने दम पर शौचालय बनवाने की घोषणा करती हुई ललकार कर अपने पति से कहती है -‘‘‘‘तू बैठ के सोच! आ के देखे तो साला सरपंच, गाड़ दूंगी उसे खुड्डी में...अब मैं वो सुंदरा नहीं कि तेरे कहे से चुप बैठूं, अब मैं मंा हूं चमेली की! समझे!’’
यह सभी जानते हैं कि सारे के सारे अपराध पुलिस के रोजनामचे तक नहीं पहुंच पाते हैं, कुछ पहुचते हैं तो दर्ज़ नहीं हो पाते हैं और कुछ दर्ज़ होते भी हैं तो वे या तो वापस ले लिए जाते हैं अथवा प्रताड़ित को लांछन की असीम वेदना सहते हुए दम तोड़ देना पड़ता है। एक ओर देश की आजादी का उत्सव और दूसरी ओर यह अप्रिय लगने वाला दुखद प्रसंग। लेकिन सच तो सच ही रहेगा कि जिस घड़ी कल्पना चावला अंतरिक्ष में उड़ान भर रही थी, ठीक उसी समय देष के किसी दूर-दराज़ ग्रामीण क्षेत्र में शौच के लिए जाती स्त्री बलात्कार की षिकार हो रही थी। कल्पना चावला के रूप में स्त्री की वैष्विक प्रगति को सबने देखा किन्तु उस बलत्कृत स्त्री की तो रिपोर्ट भी दर्ज़ नहीं हो पाई। भारतीय स्त्री के जीवन का यह स्याह पक्ष एक धब्बा है देश की तमाम प्रगति पर। यदि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद महिलाओं की एक पीढ़ी का बहुमुखी विकास हो चुका होता तो आज देश में महिलाओं की दशा का परिदृश्य कुछ और ही होता। उस स्थिति में न तो दहेज हत्याएं होतीं, न मादा-भ्रूण हत्या और न महिलाओं के विरुद्ध अपराध का ग्राफ इतना ऊपर जा पाता। उस स्थिति में झारखण्ड या बस्तर में स्त्रियों को न तो ‘डायन’ घोषित किया जाता और न तमाम राज्यों में बलात्कार की घटनाओं में बढ़ोत्तरी हो पाती। महिलाओं को कानूनी सहायता लेने का साहस तो रहता। लिहाजा प्रश्न उठता है कि महिला एवं बालविकास मंत्रालय कार्य कर रहा है, राष्ट्रीय महिला आयोग दायित्व निभा रहा है तथा स्वयंसेवी संस्थाएं समर्पित भाव से काम कर रही हैं तो फिर विगत 53 वर्ष में देश की समस्त महिलाओं का विकास क्यों नहीं हो पाया? कहीं कोई कमी तो है जो स्त्रियों के समुचित विकास के मार्ग में बाधा बन रही है। जाहिर है कि यह कमी स्त्री के प्रति सुरक्षा में कमी की है। 

वास्तविक अधिकारों की जरूरत
राजनीतिक क्षेत्र में स्त्रियों की संख्या के आंकड़ों पर अकसर विवाद होता रहता है। फलां राजनीतिक दल महिलाओं को उतना स्थान नहीं देता, जितना कि हम देते हैं, जैसे दावे हास्यास्पद ढंग से जब तक उछलते रहते हैं। कम से कम हिन्दी पट्टी में तो यह आम दृष्य है कि महिला सरपंच के सारे संवैधानिक निर्णय उसका पति अर्थात् ‘सरपंच पति’ लेता है। उत्तर प्रदेष में ‘प्रधानपति’ का पद इसी हेतु है कि ‘प्रधान’ के पति महोदय प्रधान को निर्णय लेने में मदद कर सके। अब यदि पुरुष-बैसाखियों के सहारे स्त्री की प्रगति खड़ी है तो यह काहे की प्रगति? स्वनिर्णय लेने के अधिकार से बढ़ कर और कोई अधिकार नहीं होता है। यह अधिकार अभी भी स्त्री से कोसों दूर है।
अंत में मैं उस तथ्य को एक बार फिर दोहराना चाहूंगी जिसे मैंने अपने उपन्यास ‘पिछले पन्ने की औरतें’ की भूमिका में सामने रखा था कि समाज की भांति हिन्दी व्याकरण भी पुरुष प्रधान है। अंग्रेजी में व्यक्तिवाचक संज्ञा के लिए प्रथम, द्वितीय, तृतीय के साथ ‘पर्सन’ अर्थात् ‘व्यक्ति’ जुड़ा होता है। यह ‘पर्सन’ (व्यक्ति) पुरुष भी हो सकता है और स्त्री भी किन्तु, हिन्दी भाषा के व्याकरण में मानो स्त्री न तो कोई व्यक्ति है और न व्यक्तिवाचक संज्ञा। प्रथम है तो पुरुष, द्वितीय है तो पुरुष और तृतीय है तो पुरुष, फिर स्त्री के लिए जगह कहां हैं? क्या स्त्री का अस्तित्व मात्र लिंग तक सीमित हैं? मैं न तो व्याकारण की आधिकारिक ज्ञाता हूं और न आधिकारित व्याख्याकार, लेकिन एक स्त्री होने के नाते यह बात मुझे सदैव चुभती है।’
अभी स्त्रियों को अपना भविष्य संवारने के लिए बहुत संघर्ष करना है। उन्हें अभी पूरी तरह सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक, राजनीतिक एवं मातृत्व का अधिकार प्राप्त करना है जिस दिन उसे अपने सारे अधिकार मिल जाएंगे जो कि देश की नागरिक एवं मनुष्य होने के नाते उसे मिलने चाहिए, उस दिन एक स्वस्थ समाज की कल्पना भी साकार हो सकेगी। जिसमें स्त्री और पुरुष सच्चे अर्थों में बराबरी का दर्जा रखेंगे।
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Wednesday, August 10, 2016

चर्चा प्लस ... गाय पर राजनीति .... डाॅ. शरद सिंह

Dr Sharad Singh
मेरा कॉलम  "चर्चा प्लस" "दैनिक सागर दिनकर" में (10. 08. 2016) .....
 

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गाय पर राजनीति
- डॉ शरद सिंह

प्रधानमंत्री मोदी के कथन और विपक्षी दलों के आरोपों के बीच पशुपालकों के दायित्वों पर भी ध्यान दिया जाना आवश्यक है। गाय कोई आवारा पशु तो है नहीं, फिर पचासों गायें सड़कों और सब्जीमंडियों में घूमती, मार खाती दिखाई पड़ती हैं। इन गायों को आवारा पशुओं के समान कौन छोड़ देता है? इसका पता लगाया जाना भी जरूरी है। एक ओर गाय को माता का दर्जा देना और दूसरी ओर उसे डंडे, गालियां खाने और भूख से जूझने के लिए आवारा पशु के समान छोड़ देना किसी अपराध से कम नहीं है। सबसे पहले तो ऐसे गायपालकों को चिन्हित कर दंण्डित किया जाना चाहिए।

‘‘काऊ इज़ ए फोर फुटेड एनिमल। शी हेज़ टू हार्न एंड वन लांग टेल ...।’’ लगभग हर व्यक्ति ने जिसने कभी न कभी, किसी न किसी कक्षा में अंग्रेजी पढ़ी हो, ‘काऊ’ पर निबंध जरूर लिखा होगा। अंग्रेजी भाषा में निबंध लिखने के अभ्यास का यह सबसे लोकप्रिय निबंध माना जाता है। इसकी लोकप्रियता का मूल कारण है गाय का बच्चों का चिरपरिचित होना। भारतीय बच्चे गाय को बखूबी जानते, पहचानते हैं। उन्हें पता है कि गाय दूध देती हैं वह दूध उन्हें पीने को मिलता है और उस दूध से चाय भी बनती है। वे यह भी जानते हैं कि गाय को ‘‘माता’’ कहा जाता है। बच्चों को तो आज भी गाय माता ही लगती है लेकिन शायद बड़े भूलते जा रहा कि गाय से उनका क्या रिश्ता है।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने शनिवार को अपने ‘टाउनहॉल’ कार्यक्रम में बोलते हुए अधिकांश गौरक्षकों को गोरखधंधे में लिप्त बताया। उन्होंने कहा, ‘‘कुछ लोग गौरक्षक के नाम पर दुकान खोलकर बैठ गए हैं। मुझे इस पर बहुत गुस्सा आता है। कुछ लोग पूरी रात असमाजिक कार्यों में लिप्त रहते हैं और दिन में गौरक्षक का चोला पहन लेते हैं. मैं राज्य सरकार से कहता हूं कि वे ऐसे लोगों का डोजियर बनाएं। ऐसे गौरक्षक में से 80 फीसदी लोग गोरखधंधे में लिप्त हैं।’’ उन्होंने गौरक्षकों से अपील की है कि वे गाय को प्लास्टिक खाने से बचाएं, ये बड़ी सेवा होगी।
प्रधानमंत्री मोदी के इस कथन से पहले ही गाय पर राजनीति गरमाने लगी थी। जुलाई 2016 में राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के अध्यक्ष लालू प्रसाद ने गुजरात में हो रही ‘सामाजिक क्रांति’ का समर्थन करते हुए कहा था कि गौ रक्षा के नाम पर सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने वालों का आर्थिक और सामाजिक बहिष्कार किया जाना चाहिए। बिना किसी राजनीतिक दल का नाम लिए लालू ने ट्वीट किया, ‘‘गुजरात में हो रही सामाजिक क्रांति को समर्थन। ऐसे लोगों का आर्थिक व सामाजिक बहिष्कार किया जाए, जो गौमाता के नाम पर सामाजिक सौहार्द बिगाड़ते हैं।’’ उन्होंने लिखा, ‘‘जो व्यक्ति, पार्टी और सरकार इंसान की महत्ता एवं कीमत नहीं जानते, वह जानवरों की क्या जानेंगे? इंसान मरे या जानवर, वो अपना घिनौना खेल ही खेलेंगे।’’
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आरजेडी अध्यक्ष ने बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान बीजेपी द्वारा विभिन्न अखबारों में ‘बीफ’ खाने के संबंध में दिए गए बयानों से संबंधित प्रकाशित कराए गए विज्ञापन को पोस्ट करते हुए लिखा, श्बिहार में उन्होंने गाय के नाम पर विज्ञापन निकाला। विज्ञापन में लालू, आरजेडी नेता रघुवंश प्रसाद सिंह तथा कांग्रेस नेता सिद्धारमैया के ‘बीफ’ को लेकर दिए गए बयानों को जिक्र किया गया था और गाय को गले लगाते एक युवती की तस्वीर थी। विज्ञापन में कहा गया था, ‘‘वोट बैंक की राजनीति बंद कीजिए और जवाब दीजिए, क्या आप अपने साथियों के इन बयानों से सहमत हैं। जवाब नहीं तो वोट नहीं। बदलिए सरकार-बदलिए बिहार।’’
विभिन्न राज्यों के चुनावों और आगामी आमचुनाव को ध्यान में रखते हुए प्रत्येक राजनीतिक दल गाय पर अपनी-अपनी कमर कस चुका है। इनमें से अधिकांश को गायों की दुर्दशा से अधि इस मुद्दे को अधिक से अधिक भुनाने की कोशिश होने लगी है।

घटनाओं की कड़ियां

मार्च 2016 में गुजरात के राजकोट में गौ रक्षक समिति नाम के एक संगठन ने गाय को ‘राष्ट्रमाता’ घोषित करने और गोमांस पर पूरे देश में प्रतिबंध लगाने की मांग करते कलेक्टर के सामने प्रदर्शन किया। इस दौरान आठ गौ संरक्षण कार्यकर्ताओं ने कथित रूप से कीटनाशक खाकर आत्महत्या करने का प्रयास किया, जिसमें एक व्यक्ति की जान चली गई, जबकि तीन की हालत नाजुक बनी हुई है। पुलिस का कहना है कि गऊ रक्षक समिति के आठ सदस्य हाथों में कीटनाशक की बोतल लिए कलेक्टर के ऑफिस पहुंचे थे। पुलिस के मुताबिक, इससे पहले कि पुलिस उन्हें रोक पाती, उन्होंने कीटनाशक पी लिया। इस घटना के बाद गऊ रक्षक समिति के सदस्य बड़ी संख्या में सड़कों पर उतर आए। राजकोट से पूर्व कांग्रेस सांसद कुनवारजी बावलिया एवं गौसेवा आयोग के अध्यक्ष वल्लभाई कठीरिया घटना के बाद अस्पताल पहुंचे तो प्रदर्शनकारियों ने उन्हें अस्पताल परिसर में जाने से रोक दिया। घटना के विरोध में गौ रक्षक समिति ने गुजरात बंद का आह्वान किया।
जुलाई 2016 में दलित युवकों के कपड़े उतार कर बेरहमी से पिटाई के चलते सात दलितों ने गुजरात में आत्महत्या करने की कोशिश की। विरोध प्रदर्शन के बीच बसों में आग लगा दी गई। अहमदाबाद से करीब 360 किलोमीटर दूर उना में गो हत्या के आरोप में दलित युवकों कथित तौर पर गो-रक्षकों ने अर्धनग्न कर बुरी तरह मारा पीटा। विभिन्न जगहों पर हुई रैली में कथित तौर पर सात लोगों ने जहर खाकर जान देने की कोशिश की। इस मसले को यूपी की पूर्व मुख्यमंत्री और बीएसपी सुप्रीमो मायावती ने कल संसद में जोरशोर से उठाया। इसके बाद संसद में काफी हंगामा हुआ और राज्यसभा स्थगित कर दी गई। राजकोट में स्टेट ट्रांसपोर्ट की दो बसें जला दी गईं और एक जामनगर में जला दी गई।
चमड़े के कारखानों में काम करने वाले चार लोगों एक एसयूवी से बांधकर लाठियों से मारा गया। उनके कपड़े भी उतारे हुए थे। इन्हें मारे वाले खुद को गौ रक्षक बता रहे थे। बाद में खुद उन्होंने ही इस वीडियो को ऑनलाइन डाल दिया जो खूब वायरल हुआ। पीड़ित दलितों ने हमलावरों को बताया भी था कि वे केवल मरी हुआ गायों पर से चमड़ा निकाल रहे थे लेकिन उनकी एक नहीं सुनी गई। पीटे गए दलित बुरी तरह जख्मी हुए और उन्हें हफ्ते भर हॉस्पिटल में भर्ती रखना पड़ा। तत्कालीन मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल ने दलित समुदाय के सदस्यों की कथित पिटाई की घटना की सीआईडी जांच का सोमवार को आदेश दिया। साथ ही, उन्होंने मामले की त्वरित सुनवाई के लिए एक विशेष अदालत गठित किए जाने की भी घोषणा की। पीड़ितों के इलाज के लिए सरकार द्वारा प्रति व्यक्ति एक लाख रुपए सेंक्शन भी कर दिए गए।

प्रधानमंत्री के बयान और गौ रक्षक

नरेंद्र मोदी के गौरक्षकों को लेकर दिए बयान के बाद पंजाब में करीब 20 गौ रक्षकों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है। पीएम मोदी ने इन गौ रक्षकों के खिलाफ राज्य सरकारों से कार्रवाई करने की अपील की थी। इन पर 382, 384, 342, 341, 323, 148, 149 के तहत केस दर्ज किया गया। जयपुर में बनी हिंगोनिया गौशाला में पिछले दिनों 500 से ज्यादा गायें मर चुकी हैं। जो जिंदा हैं, वो भी बहुत खराब हालत में थीं। उन्हें ना तो समय पर चारा मिल रहा था। ना ही उनकी कोई देखभाल हो रही थी। गाय के नाम पर हो रही राजनीति के बाद राजस्थान सरकार सक्रिय हुई। राजस्थान के राज्य मंत्री गौशाला पहुंचे और गायों के लिए चारे पानी का इंतजाम कराया।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बयान से ब्रज के गौ रक्षक परेशान हो उठे। गौ रक्षकों का कहना है कि जैसा प्रधानमंत्री ने कहा है कि गौ रक्षक गायों को पालीथिन खाने से बचाएं, यह ठीक है, लेकिन इसके विपरीत जब कंटेनर गायों से लदा पकड़ा जाता है। इसमें दम घुटने से काफी गायें मृत मिलती हैं। मान मंदिर की माताजी गौशाला के सचिव सुनील के अनुसार, ‘‘पिछले दिनों गायों से भरे कंटेनर को पकड़ कर 32 गायों की जान बचाई थी। कॉल करने पर बरसाना पुलिस गांव हाथिया आने से एक बार इन्कार दिया था। बाद में आई थी। तीन गाय दम घुटने से मर चुकी थीं। मेवात के आसपास का 50 किमी का क्षेत्र भी गायों की तस्करी के लिए भी बदनाम है। गौ रक्षक हर महीने 500-700 गायों का जीवन बचा रहे हैं। ऐसे में पुलिस ने किसी गौ रक्षक का डोजियर बनाना शुरू कर दिया तो गौ रक्षा की मुहिम कमजोर पड़ सकती है।’’

सड़कों पर भटकती गऊ माताएं

प्रधानमंत्री मोदी के कथन और विपक्षी दलों के आरोपों के बीच पशुपालकों के दायित्वों पर भी ध्यान दिया जाना आवश्यक है। गाय कोई आवारा पशु तो है नहीं, फिर पचासों गायें सड़कों और सब्जीमंडियों में घूमती, मार खाती दिखाई पड़ती हैं। इन गायों को आवारा पशुओं के समान कौन छोड़ देता है? इसका पता लगाया जाना भी जरूरी है। एक ओर गाय को माता का दर्जा देना और दूसरी ओर उसे डंडे, गालियां खाने और भूख से जूझने के लिए आवारा पशु के समान छोड़ देना किसी अपराध से कम नहीं है। सबसे पहले तो ऐसे गायपालकों को चिन्हित कर दंण्डित किया जाना चाहिए। गायों को प्लास्टिक खाने से रोकना है तो उन्हें उनकी वास्तविक गौशाला दिलानी होगी। गायों की दुर्दशा पर सिर्फ़ आंसू बहाने अथवा किसी दल या जाति विशेष के सिर पर ठीकरा फोड़ने से कुछ नहीं होगा, यदि गायों के प्रति सचमुच हमदर्दी है तो उन मूक पशुओं की पीड़ा को समझना होगा उन्हें सड़कों भटकने से रोकने के उपाय करने होंगे।
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