Saturday, November 18, 2017

‘दैनिक जागरण’ के सभी संस्करणों में ‘संगिनी’ के अंतर्गत् मेरे जीवन के कुछ खास अनुभव

About Dr (Miss) Sharad Singh in Dainik Jagaran, Sangini, All Editions, 18.11.2017
आज ‘दैनिक जागरण’ के सभी संस्करणों में ‘संगिनी’ के अंतर्गत् मेरे जीवन के कुछ खास अनुभव प्रकाशित हुए हैं। मैं धन्यवाद देती हूं ‘दैनिक जागरण’ को जिसने पाठकों के साथ मेरे जीवन के अनुभवों को साझा किया। मेरे साथ ही गायिका, अभिनेत्री एवं चित्रकार सुचित्रा कृष्णमूर्ति, लेखिका एवं प्राध्यापक अर्चना ओझा, फैशन डिज़ाइनर अपराजिता आरोड़ा तथा शेफ शिप्रा खन्ना ने भी अपने जीवन के अनुभवों को सामने रखा है। बहुत महत्वपूर्ण है यह फीचर। इसे अवश्य पढ़ें! आप इसे इस लिंक पर भी पढ़ सकते हैं-
About Dr (Miss) Sharad Singh in Dainik Jagaran, Sangini, All Editions, 18.11.2017

Wednesday, November 15, 2017

लापता हुए बच्चों का स्मरण - डॉ. शरद सिंह - चर्चा प्लस


Dr (Miss) Sharad Singh

एक और बाल दिवस गुज़र गया......

चर्चा प्लस  (सागर दिनकर, 15.11.2017 )


लापता हुए बच्चों का स्मरण
- डॉ. शरद सिंह
एक और बाल दिवस गुज़र गया। उत्सवधर्मिता से मनाया हमने इस बार के बालदिवस को भी। बच्चों के हित-अहित पर ढेर सारी चर्चाएं कीं, भाषण दिए और चिंताएं व्यक्त कीं। किन्तु गिनती के लोग होंगे जिन्होंने लापता हुए बच्चों का स्मरण किया होगा और सोचा होगा कि क्या कारण है जो वे आज तक नहीं मिल सके। ग़ैरजरूरी मुद्दों पर तो बहुत शोर मचाया जाता है लेकिन लापता हुए बच्चों के बारे में एक सन्नाटा पसरा रहता है। बच्चे हमारा भविष्य हैं और यदि बच्चे ही सुरक्षित न रहें तो हमारा भविष्य कैसे सुरक्षित रहेगा? जबकि लापता होने वाले बच्चों के आंकड़े सिर्फ़ चौंकाने वाले नहीं अपितु डराने वाले भी हैं। 
Charcha Plus Column in Sagar Dinkar by Dr Miss Sharad Singh
हमें बचपन में यही कह कर डराया जाता था कि घर से बाहर दूर मत जाओ नही ंतो बाबा पकड़ ले जाएगा, कहना मानो नहीं तो बाबा पकड़ ले जाएगा, जल्दी सो जाओ नही ंतो बाबा पकड़ ले जाएगा। हमारी मांएं जानती थीं कि ‘‘बच्चा उठाने वाले बाबा’’ मोहल्लों में घूमते रहते हैं। वे बच्चों को बहला-फुसला कर अगवा कर लेते हैं। वे अपने बच्चों को भी ऐसे कथित बाबाओं से सजग रहने को कहती थीं।  बच्चे अगवा करने वाले कथित बाबाओं की ने अब मानो अपने रूप बदल लिए हैं और वे हमारी लापरवाही, मजबूरी और लाचारी का फायदा उठाने के लिए नाना रूपों में आते हैं और हमारे समाज, परिवार के बच्चे को उठा ले जाते हैं और हम ठंडे भाव से अख़बार के पन्ने पर एक गुमशुदा की तस्वीर को उचटती नज़र से देख कर पन्ने पलट देते हैं। यही कारण है कि बच्चों की गुमशुदगी की संख्या में दिनोंदिन बढ़ोत्तरी होती जा रही है। बच्चों के प्रति हमारी चिन्ता सिर्फ अपने बच्चों तक केन्द्रित हो कर रह गई है। यह भूल कर कि लापता होने वाले बच्चों में कभी हमारे परिवार का कोई बच्चा भी हुआ तो? नही ंहम यह कल्पना नहीं कर पाते हैं क्योंकि हमने अपने परिवार के दायरे को ही बहुत छोटा कर लिया है। हमारे परिवार में हमारे पड़ोसी, हमारे मुहल्ले, हमारे शहर या हमारे समाज का बच्चा शामिल नहीं रहता है। अतः हमें उसकी चिन्ता भी क्यों होने लगी? 
मध्यप्रदेश राज्य सीआईडी के किशोर सहायता ब्यूरो से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार हाल ही के वर्षों में बच्चों के लापता होने के जो आंकड़ें सामने आए हैं वे दिल दहला देने वाले हैं।  2010 के बाद से राज्य में अब तक कुल 50 हजार से ज़्यादा बच्चे गायब हो चुके हैं। यानी मध्यप्रदेश हर दिन औसतन 22 बच्चे लापता हुए हैं। एक जनहित याचिका के उत्तर में यह खुलासा सामने आया। 2010-2014 के बीच गायब होने वाले कुल 45 हजार 391 बच्चों में से 11 हजार 847 बच्चों की खोज अब तक नहीं की जा सकी है, जिनमें से अधिकांश लड़कियां थीं। सन् 2014 में ग्वालियर, बालाघाट और अनूपुर ज़िलों में 90 फीसदी से ज़्यादा गुमशुदा लड़कियों को खोजा ही नहीं जा सका। ध्यान देने वाली बात ये है कि लड़कों की अपेक्षा लड़कियों के लापता होने की संख्या अपेक्षाकृत अधिक है जो विशेषरूप से 12 से 18 आयु वर्ग की हैं। निजी सर्वेक्षकों के अनुसार लापता होने वाली अधिकांश लड़कियों को ज़बरन घरेलू कामों और देह व्यापार में धकेल दिया जाता है।  एक और आंकड़ा चौंका देने वाला है कि मध्यप्रदेश राज्य का इन्दौर जिला बच्चों के लिए सबसे ज़्यादा असुरक्षित माना गया है जहां 2010 के बाद 4 हजार से अधिक बच्चे लापता हो चुके हैं। इनमें 60 प्रतिशत संख्या लड़कियों की है यानी देश में लापता होने वाले 3.85 लाख बच्चों में से 61 प्रतिशत लड़कियां हैं। पिछले कुछ सालों में एक कारण ये भी सामने आया है कि भारत की हिंदी पट्टी की लड़कियों को गायब कर उन्हें खाड़ी देशों में विवाह के लिए बेच दिया जाता है। चूंकि भारतीय स्त्री के सौन्दर्य को लेकर विश्व स्तर पर चर्चा रहती है, लिहाजा ऐसी कुछ रिपोर्ट्स सामने आई हैं कि इन लड़कियों के लिए खाड़ी देशों के अमीर लोग खासे दाम चुकाते हैं। बदलते वक्त में अरबों रुपए के टर्नओवर वाली ऑनलाइन पोर्न इंडस्ट्री में भी गायब लड़कियों-लड़कों का उपयोग किया जाता है। इतने भयावह मामलों के बीच भिक्षावृत्ति तो वह अपराध है जो ऊपरी तौर पर दिखाई देता है, मगर ये सारे अपराध भी बच्चों से करवाए जाते हैं।
बच्चों के लापता होने के पीछे सबसे बड़ा हाथ होता है मानव तस्करों का जो अपहरण के द्वारा, बहला-फुसला कर अथवा आर्थिक विपन्ना का लाभ उठा कर बच्चों को ले जाते हैं और फिर उन बच्चों का कभी पता नहीं चल पाता है। इन बच्चों के साथ गम्भीर और जघन्य अपराध किए जाते हैं जैसे- बलात्कार, वेश्यावृत्ति, चाइल्ड पोर्नोग्राफी, बंधुआ मजदूरी, भीख मांगना, देह या अंग व्यापार आदि। इसके अलावा, बच्चों को गैर-कानूनी तौर पर गोद लेने के लिए भी बच्चों की चोरी के मामले सामने आए हैं। आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चे मानव तस्करों के आसान निशाना होते हैं। वे ऐसे परिवारों के बच्चों को अच्छी नौकरी देने के बहाने आसानी से अपने साथ ले जाते हैं। ये तस्कर या तो एक मुश्त पैसे दे कर बच्चे को अपने साथ ले जाते हैं अथवा किश्तों में पैसे देने का आश्वासन दे कर बाद में स्वयं भी संपर्क तोड़ लेते हैं। पीड़ित परिवार अपने बच्चे की तलाश में भटकता रह जाता है।
विगत वर्ष एक सम्मेलन के दौरान केंद्रीय गृहमंत्री ने मानव तस्करी को बड़ी चुनौती बताते हुए स्वीकार किया था कि यौन पर्यटन और बाल पोर्नोग्राफी समेत अन्य मुद््दे बच्चों के लिए बड़ी चुनौती के तौर पर उभरे हैं। बच्चों के खिलाफ हिंसा समाप्त करने के लिए दक्षिण एशियाई पहल की चतुर्थ मंत्रीस्तरीय बैठक को संबोधित करते हुए गृहमंत्री ने कहा कि बच्चों की सुरक्षा सबकी जिम्मेदारी है। इसलिए जितने भी संभव पक्ष हैं- जैसे माता-पिता, शिक्षक, बच्चे और समुदाय आदि उन सबको मिल कर काम करना चाहिए। मानव तस्करी हम सब के लिए एक अन्य बड़ी चुनौती है।
बाल मामलों के विशेषज्ञ सोहा मोइत्रा के अनुसार बच्चे के लापता होने के बाद पहले कुछ घण्टे बहुत महत्वपूर्ण होते हैं, क्योंकि इनमें से अधिकतर बच्चों को राज्य की सीमाएं पार करके जल्द से जल्द तस्करों के द्वारा पड़ोसी राज्यों में भेज दिया जाता है। इसके बाद अधिकार क्षेत्र के मुद्दों के चलते बच्चों को खोजने में और देरी होती है। अप्रभावी ट्रैकिंग प्रणाली और अपर्याप्त जानकारी के चलते इन बच्चों के वापस घर लौटने की सम्भावनाएं न्यूनतम हो जाती हैं। दूसरी ओर सरकारी विभागों, बाल अधिकार एवं संरक्षण आयोग जैसी संस्थाओं और पुलिस के बीच तालमेल बच्चों के खिलाफ अपराध को सीमित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। दुर्भाग्य से हमारी प्रणाली में इसी तरह के तालमेल का अभाव है, जो हमारे बच्चों के कल्याण के लिए घातक साबित हो रहा है। यह सुनिश्चित करना ज़रूरी है कि नीतियों, योजनाओं और बजट आवंटन की दृष्टि से हमारे बच्चों को प्राथमिकता दी जाए, ताकि बच्चों की सुरक्षा को समाज के सभी हितधारकों के लिए प्राथमिक एजेण्डा बनाया जा सके। 
सन् 2012 में नोबल पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी ने अपनी संस्था ‘‘बचपन बचाओ आंदोलन’’ की ओर से लापता बच्चों के बारे में उच्चतम न्यायालय में एक रिट याचिका दायर की थी। इसके जवाब में उच्चतम न्यायालय ने केन्द्र एवं राज्य सरकारों को खोए बच्चों के बारे में समय-समय पर सूचना देने का निर्देश दिया। इसी कड़ी में महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने भी एक वेबसाइट बनाई गई। इस वेबसाइट पर हर राज्य में लापता बच्चों की जानकारी रखी जाती है। फिर भी गुमशुदा बच्चों तक पहुंच नहीं बन पाती हैं। ‘‘बचपन बचाओ आंदोलन’’ की बात मानें, तो लापता बच्चों की दी गई संख्या से 10 गुना ज्यादा बच्चे लापता हैं। दरअसल, मानव तस्करी के जाल में फंस चुके बच्चों की गिनती न तो लापता बच्चों में होती है और न ही उनका कोई आधिकारिक दस्तावेज होता है।
राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के अनुसार मानव तस्करी के पीछे अनेक कारण होते हैं। बलात् विवाह, बाल श्रम, घरेलू नौकर और लैंगिक शोषण इसके पीछे मुख्य कारण हैं। मार्च 2016 में लोकसभा में दिए गए एक प्रश्न के उत्तर के अनुसार 2014-15 में बड़ी संख्या में अवयस्क लड़कियों को मुक्त कराया गया। लेकिन गुम रह जाने वालों के आंकड़े इनसे कहीं बहुत अधिक हैं। हाईकोर्ट ने मध्य प्रदेश के गुम बच्चों की तलाश के लिए सिर्फ पुलिस के भरोसे बैठने के बजाय राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण के सचिव के नेतृत्व में कमेटी बनाने तथा इसमें समाज के सभी वर्ग को शामिल करने का निर्देश दिया है।
गायब हुए नाबालिग बच्चों की तलाश के लिए प्रस्तुत जनहित याचिका में के तारतम्य में अदालत ने अपने निर्देश में कहा कि गायब बच्चों की तलाश के लिए सिर्फ पुलिस के भरोसे नहीं रहा जा सकता है। इसके लिए राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण के सचिव के नेतृत्व में कमेटी बनाने, कमेटी में वकील, समाज के अन्य वर्ग को शामिल कर तलाश करने का निर्देश दिया। इसके अलावा ऐसे बच्चे जिन्हें लेने के लिए उनके अभिभावक नहीं आ रहे हैं उनके पुनर्वास की व्यवस्था करने का कहा। सच है, बच्चे सिर्फ़ पुलिस, कानून या शासन के ही नही ंहम सब के दायित्व हैं और उन्हें सुरक्षित रखना भी हर व्यक्ति की जिम्मेदारी है, चाहे वह बच्चा किसी भी धर्म, किसी भी जाति अथवा किसी भी तबके का हो। हमें खुद के भीतर ललक जगानी होगी अपने लापता भविष्य को ढूंढने की और याद करते रहना होगा अपने खोए हुए बच्चों को।
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Wednesday, November 8, 2017

मरती संवेदनाओं पर ठहाके लगाती अव्यवस्थाएं - डॉ शरद सिंह - चर्चा प्लस

Dr (Miss) Sharad Singh
मेरा कॉलम ' चर्चा प्लस ' आज 'सागर दिनकर' में
(08.11.2017) ...
मरती संवेदनाओं पर ठहाके लगाती अव्यवस्थाएं
 - डॉ. शरद सिंह     
                                                                 
मां पुलिस में पिता पुलिस में फिर भी बेटी की अस्मत तार-तार होने पर रिपोर्ट लिखने के लिए पूरे परिवार को पुलिस के ही चक्कर काटने पड़ें। पीड़िता को एक महिला पुलिसकर्मी के माखौल का निशाना बनना पड़े। दूसरी ओर समाज पंचायत द्वारा पति से अलग रहने की अनुमति प्राप्त पत्नी को सरे बाज़ार पीटते हुए उसका जुलूस निकाला जाए और लोग सिर्फ़ मोबाईल से वीडियो बनाते रहें। लोगों का इस तरह असंवेदनशील होना न केवल धिक्कार योग्य है बल्कि ये घटनाएं बताती है कि संवेदनाएं किस तरह मरती जा रही हैं। क्या ऐसे वातावरण में कोई भी सभ्य संस्कृति लम्बे समय तक ज़िन्दा रह सकेगी? 
Charcha Plus Column of Dr (Miss) Sharad Singh in Daily Sagar Dinkar

हमें गर्व रहा है अपनी संस्कृति पर। हमने दुनिया के सामने अपनी सभ्यता और सच्चरित्रता के अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत किए हैं। लेकिन आज यदि दुनिया हम पर हंस रही हो तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए। क्यों कि हम उस सीमा पर जा पहुंचे हैं जहां व्यक्ति अपनी ही दृष्टि में गिरने लगता है फिर भी स्वयं को सम्हालना नहीं चाहता है ओर ढीठ की तरह अपनी महानता का ढिंढोरा पीटता रहता है। भारतीय संस्कृति स्त्रियों की प्रतिष्ठा एवं सम्मान की संस्कृति रही है। लेकिन अब ऐसा लगता है कि स्त्री की प्रतिष्ठा, सम्मान और अस्मत तीनों की असुरक्षित हैं और ऐसा प्रतीत होना स्वाभाविक है। देश हो या प्रदेश कहीं भी अकेली स्त्री स्वयं को सुरक्षित अनुभव नहीं कर पाती है। वह स्त्री चाहे जींस-टॉप पहनने वाली शहरी हो या माथे पर घूंघट डाल कर सोलह हाथ की साड़ी पहनने वाली निपट देहाती हो। वह चाहे दो-चार साल की बच्ची हो या नब्बे साल की वृद्धा। जब किसी भी जगह की और किसी भी आयु की स्त्री सुरक्षित न हो तो उस व्यवस्था को सामाजिक अराजकता के अतिरिक्त और भला क्या कहा जा सकता है? और इस सामाजिक अराजकता के बढ़ने में कानून व्यवस्था की शिथिलता भी कम जिम्मेदार नहीं है।
31 अक्टूबर 2017, स्थान मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल के हबीबगंज स्टेशन के निकट, एक छात्रा जो अपना भविष्य संवारने के लिए कोचिंग में शिक्षा ग्रहण कर के घर वापस लौट रही थी और एक ही झटके में उसका भविष्य ही नहीं वर्तमान भी गहरी खाई में धकेल दिया गया जिसके बारे में उसने जो लिखित बयान पुलिस को दिया वह उसी के शब्दों में इस प्रकार था-‘’मैं कक्षा 12 वीं पास कर चुकी हूं, अभी भोपाल में यूपीएससी की कोचिंग कर रही हूं। 31 अक्टूबर को अपनी कोचिंग से शाम सात बजे एमपी नगर से रेल लाइन होते हुए हबीबगंज स्टेशन जा रही थी, तभी आउटर सिंग्नल से चालीस-पचास मीटर हबीबगंज स्टेशन की तरफ आई तो एक लड़का जो पटरियों के पास ही खड़ा था, मैं पटरियों की बीच से चलते हुए आगे बढ़ने लगी तो वह पटरियों के बीच में मेरे सामने खड़ा हो गया, मेरा हाथ पकड़ लिया। मैंने अपना हाथ छुड़ाने के लिए उसे एक लात मारी तो वह मेरे साथ पटरियों के बीच में ही जबरदस्ती करने लगा। वह लड़का छोटे कद का था और उसकी छोटी दाढ़ी थी तभी उसने अमर घंटू आवाज देकर अपने एक दोस्त को बुलाया। उसके बाद उन्होंने मुझे पटरी के बगल में नाले की तरफ खींच लिया तो नाले में जहां कचरा पड़ा था वहां पर मुझे उन दोनों लड़कों ने नाले के नीचे गिरा दिया। वो मुझे घसीट कर पुलिया के अंदर ले गए फिर मैंने उन्हें पत्थर उठा कर मारा तो एक लड़का जो थोड़ा लंबा सा था उसने मुझे पीठ पर पत्थर से बुरी तरह से मारा उसके बाद उन लोगों ने मेरे दोनों हाथ बांधे और दोनों ने बारी-बारी से बुरा काम किया। वो पुलिया की दूसरी तरफ लेकर गए जहां उनके साथ वाले दो व्यक्ति थे। उन लोगों ने भी मेरे साथ गंदा काम किया। उन्होंने मेरा मोबाइल फोन और मेरे कानों की सोने की बाली और मेरी घड़ी भी ले ली। फिर वे मुझे छोड़कर चले गए। उसके बाद मैं पास में आरपीएफ थाना हबीबगंज गई और वहां से अपने पिताजी को फोन किया।’’
लड़की बहादुर थी। वह इस जघन्य हादसे से टूटी नहीं और साहस कर के सीधे पुलिस थाने पहुंची। उसके मन में यह विश्वास था कि वह स्वयं भी पुलिस परिवार की बेटी है, कम से कम उसे तो पुलिस का सहारा मिलेगा। मगर उसका यह विचार एक भ्रम साबित हुआ। जिसे रिपोर्ट लिखना चाहिए था उस महिला पुलिस कर्मी ने पीड़िता की पीड़ा का मज़ाक उड़ाया। उस पर दुखद तथ्य यह कि वह कोई छोटे पद की कर्मचारी नहीं अपितु 2009 बैच की आईपीएस है। गैंगरेप की घटना की रिपोर्ट न लिखने पर जब मीडिया ने इस महिला अधिकारी से प्रश्न किए तो उन्होंने ठहाका लगाते हुए कहा कि इस बारे में पूछे गए सवालों से मेरा सिरदर्द करने लगा है।
मुख्यमंत्री को स्वयं हस्तक्षेप करना पड़ा। चंद तबादले किए गए। इसके बाद आ गया एक अजीब सा आदेश कि कोचिंग सेंटर्स रात्रि आठ बजे के बाद बंद कर दिए जाएं। कोंचिंग सेंटर संचालकों ने विरोध करते हुए तर्क दिया कि यदि बस स्टेंड आते-जाते समय कोई घटना घट जाए तो क्या बस स्टेंड बंद कर दिए जाएंगे? इसके बाद शाम तक आदेश तनिक संशोधित हो कर इस रूप में सामने आया कि यदि कोचिंग सेंटर में रात्रि आठ बजे के बाद भी क्लासेस लगती हैं तो सेंटर्स की जिम्मेदारी होती छात्राओं को घर पहुंचाने की। यानी कानून व्यवस्था अभी भी आश्वस्त नहीं कर पा रही है कि ‘‘बेटियों तुम निर्भय हो कर घर से निकलो, हमारे रहते तुम्हें कोई छू भी नहीं सकता है।’’
भोपाल की इस घटना के बाद एक और घटना वीडियो के रूप में सामने आई। यह बलात्कार की घटना नहीं थी लेकिन स्त्री के सार्वजनिक अपमान की ऐसी घटना थी जिसमें सामाजिक असंवेदनशीलता अपनी सारी सीमाओं को लांघती हुई दिखाई दी। घटना झाबुआ के खेड़ी गांव की है। जो वीडियो वायरल हुआ उसमें एक युवक अपनी पत्नी के कंधे पर चढ़ कर उसे सरेआम पीटता जा रहा है। पत्नी के चेहरे पर घाघट डला हुआ है जिससे वह ठीक से देख भी नहीं पा रही है। बेरहमी से पड़ती मार और पति के बोझ से वह रो रही है, चींख रही है। भीड़ उसकी दशा देख-देख कर मजे ले रही है और कुछ लोग अपने-अपने मोबाईल से उस मार-पीट की वीडियो बना रहे हैं। मीडिया के सामने आई जानकारी के अनुसार खेड़ी गांव की 32 वर्षीया पत्नी के साथ उसका पति मारपीट करता था। मारपीट से तंग आ कर पत्नी पति और बच्चों को छोड़ कर चली गई। पति को संदेह था कि उसकी पत्नी का किसी से अनैतिक संबंध है। कहा जाता है कि समाज-पंचायत ने पति के पक्ष को समझौता रकम दिलाने के बाद पत्नी को उसके परिजनों को सौंप दिया था। लेकिन फिर उसके ससुराल पक्ष के लोग उसे समझा-बुझा कर अपने गांव ले आए और गांव में पहुंचते ही पंचायत भवन के पास पत्नी के कंधों पर पति को बैठा दिया। इसके बाद लगभग 500 मीटर दूर घर तक मारपीट करते हुए ले गए। उस दौरान पूरा गांव-समाज इस तमाशे का मजा लेता रहा। यह भूल कर कि इस तरह के चलन से कभी उनके घर की बेटियों को भी गुज़रना पड़ सकता है।
दो भिन्न घटनाएं, एक ही प्रदेश में, लगभग एक ही समय। यूं तो दोनों घटनाओं में कोई समानता नहीं है। एक छात्रा और एक विवाहिता। एक की पीड़ा को उसके गांव-समाज ने तमाशे की तरह देखा जबकि छात्रा के समर्थन में समाज भर्त्सना की बल्कि कैंडलमार्च भी निकाला। मगर हुईं तो दोनों प्रताड़ना की शिकार। एक शहर की, एक गांव की लेकिन दोनों ने दुर्दम्य असंवेदनशीलता को झेला और दोनों का भविष्य अंधकारमय है यदि आगे भी उन्हें समाज का सहारा नहीं मिला तो। एक का अपराध यह था कि वह पढ़ाई करके अपना भविष्य संवारने में जुटी हुई थी और दूसरी का गुनाह यह था कि उसने अपने पति के मार-पीट से त्रस्त हो कर पलायन का रास्ता अपनाया और अपने ढंग से जीने का एक प्रयास किया। उसके पति और ससुरालवालों की क्रूर मानसिकता का साक्ष्य तो वह वीडियो ही है जो वायरल हो कर जन-जन तक पहुंच चुका है। वहीं भोपाल की उस छात्रा के प्रति पुलिस का कर्त्तव्यहीन रवैया सभी बेटियों को डरा देने वाला है। जब पुलिसवालों की बेटी को ही पुलिस से तत्काल सहयोग न मिले तो सामान्य बेटियों को सहयोग कैसे मिलेगा? प्रश्न यह भी है कि यदि ऐसे संवेदनशील मामले में मुख्यमंत्री के हस्तक्षेप किए बिना मामले की गंभीरता न समझी जाए तो क्या प्रत्येक पीड़िता को थाने के बजाए मुख्यमंत्री के दरवाज़े पर जा कर गुहार लगानी चाहिए?
ज़रा सोचिए, मां पुलिस में पिता पुलिस में फिर भी बेटी की अस्मत तार-तार होने पर रिपोर्ट लिखने के लिए पूरे परिवार को पुलिस के ही चक्कर काटने पड़ें। पीड़िता को एक महिला पुलिसकर्मी के माखौल का निशाना बनना पड़े। दूसरी ओर समाज पंचायत द्वारा पति से अलग रहने की अनुमति प्राप्त पत्नी को सरे बाज़ार पीटते हुए उसका जुलूस निकाला जाए और लोग सिर्फ़ मोबाईल से वीडियो बनाते रहें। लोगों का इस तरह असंवेदनशील होना न केवल धिक्कार योग्य है बल्कि ये घटनाएं बताती है कि संवेदनाएं किस तरह मरती जा रही हैं। वस्तुतः यह तो मरती संवेदनाओं पर अव्यवस्थाओं के ठहाके लगाने जैसा दृश्य है।
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Wednesday, November 1, 2017

मध्य प्रदेश के स्थापना दिवस पर विशेष : स्थापना का उत्सव पर्व - डॉ. शरद सिंह

Dr Miss Sharad Singh

मेरा कॉलम - चर्चा प्लस, सागर दिनकर 01.11.2017





मध्य प्रदेश के स्थापना दिवस पर विशेष :
स्थापना का उत्सव पर्व
- डॉ. शरद सिंह                                                                       
1 नवम्बर 1956, मध्य प्रदेश का स्थापना दिवस। यह प्रदेश जो देश का हृदय कहलाता है, अब तक विकास के कई पड़ाव तय कर चुका है और निरंतर प्रगति के पथ पर अग्रसर है। उद्योग, शिक्षा और कृषि की नवीन प्रविधियों के मृद्दे पर जो कभी सबसे उपेक्षित, सबसे पिछड़ा हुआ था, आज उन्नति का नया इतिहास रच रहा है। उन्नत से उन्नत क्षेत्र में कमियां होती हैं किन्तु उन्हें संभावनाओं के पाले में रखते हुए प्रदेश के स्थापना पर्व का उत्सव मनाया ही जाना चाहिए। यह उत्सव और इससे उत्पन्न होने वाली प्रसन्नता एवं गर्व को अनुभव करना प्रत्येक प्रदेशवासी का अधिकार है। इसीलिए तो मध्य प्रदेश का प्रत्येक नागरिक हर साल 1 नवंबर को यही कहता है-‘नमामि मध्यप्रदेश’। 
Column of Dr Miss Sharad Singh - Charcha Plus in Sagar Dinkar News Paper, Sagar, Madhya Pradesh, Indi

1 नवम्बर 1956 को मध्यप्रदेश के रूप में स्थापित यह सुरम्य भू-भाग देश का हृदय-प्रदेश है। प्रति वर्ष 1 नवम्बर को मध्यप्रदेश के सभी निवासी उत्सव मानते हैं अपने प्रदेश के स्थापना दिवस के रूप में इस वर्ष भी यह उत्सव पर्व है और तीन दिवसीय है। मनुष्य होने के नाते हम उत्सव जीवी हैं। हम अपनी प्रसन्नता और उत्साह को उत्सव के रूप में ही तो व्यक्त करते हैं, इसे हम अपने मनुष्यत्व का प्राकृतिक गुण भी कह सकते हैं। प्रत्येक पर्व समाज के उत्कृष्ट रूप को प्रतिबिम्बित करता है क्यों कि ऐसे अवसरों पर समाज का प्रत्येक व्यक्ति परस्पर एक-दूसरे से खुशियां बांटता है और अपनत्व की नई सीढ़ियां चढ़ता है। 1947 में भारत की आजादी के बाद, 26 जनवरी, 1950 के दिन भारतीय गणराज्य के गठन के साथ सैकड़ों रियासतों का संघ में विलय किया गया था। राज्यों के पुनर्गठन के साथ सीमाओं को तर्कसंगत बनाया गया। 1950 में पूर्व ब्रिटिश केंद्रीय प्रांत और बरार, मकाराई के राजसी राज्य और छत्तीसगढ़ मिलाकर मध्यप्रदेश का निर्माण हुआ तथा नागपुर को राजधानी बनाया गया। सेंट्रल इंडिया एजेंसी द्वारा मध्य भारत, विंध्य प्रदेश और भोपाल जैसे नए राज्यों का गठन किया गया। राज्यों के पुनर्गठन के परिणाम स्वरूप 1956 में, मध्य भारत, विंध्य प्रदेश और भोपाल राज्यों को मध्यप्रदेश में विलीन कर दिया गया, तत्कालीन सी.पी. और बरार के कुछ जिलों को महाराष्ट्र में स्थानांतरित कर दिया गया तथा राजस्थान, गुजरात और उत्तर प्रदेश में मामूली समायोजन किए गए। फिर भोपाल राज्य की नई राजधानी बन गया।  नवंबर 2000 में, राज्य का दक्षिण-पूर्वी हिस्सा विभाजित कर छत्तीसगढ़ का नया राज्य बना। इस प्रकार, वर्तमान मध्यप्रदेश राज्य अस्तित्व में आया।
मध्य प्रदेश का समृद्ध इतिहास मौर्य राजवंश के काल तक रहा है। लेकिन उससे भी पहले पाषाण काल के लोगों द्वारा प्रागैतिहासिक काल में भीमबेटका, आबचंद की गुफाओं और रायसेन के शैलाश्रयों को चित्रित कर के अपने जीवन के अनुभवों को संजोया। गुप्तकाल में राजधानी के रूप में उज्जैन ने अपने समय में गौरव शिखर को छुआ और उसकी ख्याति पूरी दुनिया में फैली। चंदेलवंश ने खजुराहो में जो मंदिर शिल्प की विरासत छोड़ी वह आज भी बेजोड़ है। प्रदेश के ऊंचे शैल-शिखर विन्ध्य, सतपुड़ा, मैकल की पर्वतीय श्रृंखलाओं की हरियाली और उनमें कहे-सुने जाते पौराणिक आख्यान इसे समृद्ध बनाते हैं। नर्मदा, सोन, सिन्ध, चम्बल, बेतवा, केन, धसान, तवा, ताप्ती, शिप्रा, काली सिंध आदि नदियों के उद्गम और मिलन स्थल अनेकानेक कथाएं कहते हैं।
मध्य प्रदेश अपने आप में अनूठा है। यहां की संस्कृति में विविधता है जो सतरंगी आभा का सृजन करती है। अन्य भाषायी प्रदेशों की भांति मध्य प्रदेश की कोई एक भाषित संस्कृति नहीं है, यहां बहुभाषिक संस्कृतियां सदियों से साझातौर पर फल-फूल रही हैं। वस्तुतः मध्य प्रदेश विभिन्न लोक और जनजातीय संस्कृतियों का ऐसा गुलदस्ता है जिसमें विभिन्न रंगों और सुगधों के फूल महकते रहते हैं। यहां कोई एक लोक संस्कृति नहीं है अपितु अनेकता में एकता का सजीव उदाहरण प्रस्तुत करती एकाधिक लोक संस्कृतियां हैं। यहां पांच लोक संस्कृतियां एक साथ मौजूद हैं जो निमाड़, मालवा, बुन्देलखण्ड, बघेलखण्ड और ग्वालियर और धार-झाबुआ, मंडला-बालाघाट, छिन्दवाड़ा, होशंगाबाद्, खण्डवा-बुरहानपुर, बैतूल, रीवा-सीधी आदि क्षेत्रों में अपनी परम्पराओं को सहेजे हुए हैं। लोक गायन की शैलियों में फाग, भर्तहरि, संजा गीत, भोपा, कालबेलिया, भांड, वसदेवा, विदेसिया, कलगी तुर्रा, निर्गुनिया, आल्हा और पंडवानी गायन आदि हैं। मध्य प्रदेश का शास्त्रीय और लोक संगीत के क्षेत्र में विशेष अवदान है। विख्यात हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत घरानों में मध्य प्रदेश के मैहर घराने, ग्वालियर घराने और सेनिया घराने शामिल हैं। वर्तमान मध्य प्रदेश के ग्वालियर के निकट जन्म हुआ था तानसेन और बैजू बावरा का। आधुनिक में प्रसिद्ध ध्रुपद कलाकार अमीनुद्दीन डागर इंदौर में, गुंदेचा ब्रदर्स और उदय भवालकर उज्जैन में जन्मे थे। पार्श्व गायक किशोर कुमार का खंडवा में जन्म हुआ था तो स्वर साम्राज्ञी लता मंगेशकर का जन्मस्थान इंदौर हैं।
प्रदेश के लोक नृत्य में बधाई, राई, सैरा, जवारा, बरेदी, सैला, मौनी, ढिमरियाई, कनारा, भगोरिया, दशेरा, ददरिया, दुलदुल घोड़ी, लहगी घोड़ी, फेफरिया मांडल्या, डंडा, एडीए-खड़ा, दादेल, मटकी, बिरहा, अहिराई, परधौनी, विल्मा, दादर और कलस ने देश-विदेश में ख्याति अर्जित की है। जहां तक शास्त्रीय नृत्यों का प्रश्न है तो कथक नृत्य ने मध्यप्रदेश में गरिमापूर्ण पहचान बनाई है। खजुराहो-उत्सव में प्रदर्शित शास्त्रीय नृत्य दुनिया भर के नृत्यकारों के आकर्षण का केन्द्र होते हैं।
मध्यप्रदेश देश का एकमात्र हीरा उत्पादक राज्य है। यहाँ 6000 मिलियन टन लाईम स्टोन रिजर्व है। देश का 8 प्रतिशत कोयला है। कोल बेड मीथेन 144 बिलियन क्यूबिक मीटर उपलब्ध है। देश के 18 एग्रो क्लाईमेटिक जोन में से 11 एग्रो क्लाइमेटिक जोन मध्यप्रदेश में हैं। देश में मध्यप्रदेश का सोयाबीन, दालें, चना एवं लहसुन उत्पादन में प्रथम स्थान है। गेंहू, मिर्च, रामतिल एवं धनिया उत्पादन में प्रदेश प्रथम पांच में है। केला, संतरा, आम एवं नीबू उत्पादन में प्रदेश अग्रणी है। विपरीत स्थितियों में भी यहां का किसान हार नहीं मानता है। मध्य प्रदेश अपने टेक्सटाईल उत्पादों के लिए मशहूर है। महेश्वरी और चंदेरी साड़ियों की समृद्ध परंपरा आज भी मौजूद है। भोपाल का ज़रदोजी का काम भी बहुत मशहूर है।
मध्यप्रदेश में राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त पर्यटन केन्द्र हैं। ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक की दृष्टि से खजुराहो, सांची, माण्डू, ग्वालियर, ओरछा एवं भीमबैठका आदि। प्राकृतिक सौन्दर्य की दृष्टि से पचमढ़ी, भेड़ाघाट और अमरकंटक आदि। धार्मिक दृष्टि से उज्जैन, अमरकण्टक, ओंकरेश्वर, महेश्वर, चित्रकूट, मैहर, बुरहानपुर आदि। इनके अतिरिक्त अनेक ऐसे स्थान हैं जो स्थानीय पर्यटन के रूप में विकसित हैं।
लाड़ली लक्ष्मी, रुक जाना नहीं, मेधावी लड़कियों को लैपटॉप और स्मार्टफोन, मुख्यमंत्री तीर्थ दर्शन योजना मध्यप्रदेश, मध्यप्रदेश विधवा पुनर्विवाह योजना, प्रतिभा किरण योजना, मध्यप्रदेश लोकसेवा गारंटी अधिनियम जैसी योजनाएं प्रदेश के प्रत्येक व्यक्ति के विकास के लिए क्रियान्वित हैं। रुक जाना नहीं, लाड़ली लक्ष्मी, मेधावी लड़कियों को लैपटॉप और स्मार्टफोन, मुख्यमंत्री तीर्थ दर्शन योजना मध्यप्रदेश, मध्यप्रदेश विधवा पुनर्विवाह योजना, प्रतिभा किरण योजना, मध्यप्रदेश लोकसेवा गारंटी अधिनियम जैसी योजनाएं प्रदेश के प्रत्येक व्यक्ति के विकास के लिए क्रियान्वित हैं। प्रदेश सरकार की योजनाएं उद्योगों के विकास को ध्यान में रख कर बनाई जाती रही हैं। 
राज्य शासन द्वारा प्रदेश के तेज गति से औद्योगिक विकास तथा यहां पूरे विश्व से निवेश सुलभ करवाने के लिये प्रति दो वर्ष में किया जाने वाला वैश्विक निवेशक सम्मेलनों से उत्तरोत्तर आर्थिक सफलता की उम्मींद की जा सकती है। इंदौर के ब्रिलियंट कन्वेंशन सेंटर में 21 से 23 अक्टूबर 2016 तक आयोजित पांचवां वैश्विक निवेशक सम्मेलन अत्यधिक सफल रहा था। इसमें उद्योगपतियों एवं निवेशकों द्वारा प्रदेश में 2,630 निवेश के इरादे (इन्टेन्शन टू इन्वेस्ट) व्यक्त किये गये थे, जिनकी कुल कीमत 5 लाख 62 हजार 847 करोड़ थी। निवेशकों द्वारा जो घोषणाएं की गई थीं, वे थीं- प्रदेश की मंडला इकाई में न्यूक्लियर पावर कॉर्पोरेशन 25 हजार करोड़ का निवेश करेगा, बिड़ला समूह विभिन्न क्षेत्रों में 20 हजार करोड़ का निवेश करेगा, इंडियन ऑइल 4760 करोड़ के निवेश करेगा, एस्सार समूह गैस शोधन क्षेत्र में प्रदेश में 4500 करोड़ के नये निवेश करेगा, सिन्टेक्स समूह प्रदेश में 2000 करोड़ के निवेश करेगा, पी एण्ड जी इंडिया 1100 करोड़ के निवेश करेगा, ल्यूपिन इंडिया 700 करोड़ का निवेश करेगा, जर्मनी का हैटिक समूह 400 करोड़ का निवेश करेगा।
विगत अक्टूबर 2017 में प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने अपने अमेरिका के प्रवास को अनिवासी भारतीयों के प्रदेश में निवेश पर केन्द्रित रखा। भारतीय समुदाय से चर्चा करते हुए उन्होंने राज्य में निवेश की अपार संभावनाओं की ओर भी ध्यान आकर्षित किया। यह बात और है कि वे अति उत्साह में प्रदेश की सड़कों को वाशिंगटन की सड़कों से कई गुना अच्छी कह बैठे। लेकिन निवेश कराने के प्रति उनकी लगन और इच्छा को कम कर के नहीं आंका जा सकता है। इस बात को समझना होगा कि सरकारें नागरिकों के दम पर होती हैं नागरिक सरकारों के दम पर नहीं। हमें सरकार को कोसना भर नहीं बल्कि सरकार को अपनी समस्याएं बताना, जताना और मनवाना आना चाहिए। साथ ही, सरकारी योजनाओं का भरपूर लाभ उठाना भी आना चाहिए।
स्थापना के उत्सव पर्व को मनाते हुए प्रदेश का प्रत्येक नागरिक इस आशा पर तो विचार कर ही सकता है कि भविष्य में उसका यह मध्य प्रदेश स्वच्छता में अग्रणी होगा, उर्जा उत्पादन की मिसालें कायम कर सकेगा, स्त्री एवं बालिका सुरक्षा के क्षेत्र में प्रतिमान गढ़ेगा। सांस्कृतिक और आर्थिक दृष्टि से सम्पन्नता के नए शिखरों को छुएगा क्यों की यहां ईको, पुरातात्विक, कला और चिकित्सकीय पर्यटन की असीम संभावनाएं हैं। बस, आवश्यकता है तो राजनीतिक और नागरिक के रूप में अपनी उन आदतों को सुधारने की जिनके कारण प्रदेश पूर्ण सफलता का स्वाद नहीं चख पाता है। इस उत्सव पर्व में अपनी बुरी आदतों को सुधारने का संकल्प तो लिया ही जा सकता है।

Happy Madhya Pradesh Foundation Day !

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Wednesday, October 25, 2017

स्वप्नजीवी सरकारी योजनाएं - डॉ. शरद सिंह ... चर्चा प्लस

Dr (Miss) Sharad Singh

मेरा कॉलम चर्चा प्लस दैनिक सागर दिनकर में (25.10.2017)

 
स्वप्नजीवी सरकारी योजनाएं
 
- डॉ. शरद सिंह 

इसमें कोई संदेह नहीं कि सरकार बहुत अच्छी योजनाएं बनाती है लेकिन सभी अच्छी योजनाओं का क्रियान्वयन क्या सचमुच अच्छी तरह हो सकता है? यह जरूर संदेह का विषय है। जहां औरतों, लड़कियों यहां तक कि नाबालिग बालकों के साथ भी अनैतिक कार्यों का ग्राफ चौंकाने वाला हो उस वातावरण में बाईक-टैक्सी कितनी सुरक्षित हो सकती है? या फिर यह कि बच्चे एप्प पर शिकायत करेंगे कि उन्हें दिया गया मध्यान्ह भोजन अच्छा था कि नहीं, जबकि भयवश तो अच्छे-अच्छे दमदार लोग भी ग़लतबयानी कर जाते हैं। यह समझ से परे है कि ज़मीनी सच्चाई और सरकारी योजनाओं में इतनी दूरी क्यों रहती है? क्या हर सपना सच्चाई की धूप में खरा उतर सकता है? करोड़ों खर्च होने के बाद यदि सपने की कटु सच्चाई सामने आए भी तो क्या लाभ? 
Charcha Plus Column by Dr Miss Sharad Singh in Sagar Dinkar Daily News Paper

यदि आज के समय में कोई पूछे कि स्वप्नजीविता क्या है तो इसका सटीक उत्तर होगा-‘‘बहुसंख्यक सरकारी योजनाएं’’। अभी हाल ही में दो-तीन सरकरी योजनाओं की घोषणा की गई है ये भी स्वप्नजीविता की बेहतरीन उदाहरण कही जा सकती हैं। स्वप्नजीविता यानी सपनों में जीना। सच्चाई के खुरदुरेपन से दूर मखमली सपनों में सब कुछ आनन्द में डूबा, सही और विकसित दिखाई देता है। व्यवहारिकता का इससे वस्ता सिर्फ़ इतना ही रहता है कि इनकेेेेेेे क्रियान्वयन में करोड़ों रुपए खर्च हो जाते हैं और हाथ अगर कुछ आता है तो असफलता और जांच आयोग। हाल ही में जो दो योजनाएं मध्यप्रदेश में घोषित की गई हैं वे निश्चितरूप से उम्दा हैं। यदि ये योजनाएं सामान्य परिस्थितियों में लागू होतीं तो इनका परिणाम विकास में चार चांद लगा देता लेकिन सरकार को इन योजनाओं के बारे में सुझाव देने वाले विद्वान भूल गए कि परिस्थितियां इनके ठीक विपरीत हैं।
दोनों में से पहली योजना को ही लें, यह है बाईक-टैक्सी योजना। बदलती जीवनशैली और शहरों में ट्रैफिक समस्या या बढ़ते वाहनों की भीड़ के मद्देनजर अब सरकार मोटरसाइकिल का भी कॉमर्शियल लाइसेंस जारी करेगी। ताकि मोटरसाइकिल का इस्तेमाल टैक्सी की तरह बाइक टैक्सी (बैक्सी) के रूप में हो सके। इससे जहां एक तरफ लोगों को रोजगार मिल सकेगा, वहीं दूसरी तरफ लोग कम पैसे में और कम समय में अधिक ट्रैफिक की स्थिति में भी अपने गंतव्य स्थल तक पहुंच सकेंगे। यद्यपि बैक्सी नया कॉन्सेप्ट नहीं है। भारत में भी यह राजस्थान, गोवा, गुजरात, नोएडा, गुरुग्राम और गाजियाबाद में शुरू हो चुका है लेकिन अभी लोगों के बीच ज्यादा लोकप्रिय नहीं हो सका है। बैक्सी का एप लोड करने के बाद दो विकल्प मिलेंगे, जिसमें पिकअप और ड्रॉप लिखना होगा। ड्रॉप और पिकअप लिखने के बाद संभावित किराया भी पता लगाया जा सकेगा। सभी बाइक चालकों के पास स्मार्ट फोन होगा। चालक एप की मदद से आपकी स्थान (लोकेशन) खोज लेगा और आपके घर पहुंच जाएगा। इस तरह घर बैठे आप बाइक टैक्सी को बुला सकेंगे। मध्यप्रदेश में सरकार ने किराए पर बाईक देने की योजना को सामने रखा है। इसमें कोई संदेह नहीं कि इस प्रकार की सवारी सुविधा सस्ते दर में उपलब्ध हो सकेगी और तंग गलियों में भी पहुंचा सकेगी।
क्या इस प्रकार की बाईक-सेवा सुरक्षित होगी जबकि महिलाओं और बालक-बालिकाओं के प्रति अपराध के आंकड़ें असुरक्षा की एक अलग ही कहानी कह रहे हों। एक राष्ट्रीय जांच सर्वे के अनुसार भारत में हर एक घंटे में 22 बलात्कार के मामले दर्ज होते हैं। ये वे आंकड़े हैं जो पुलिसथानों में दर्ज कराए जाते हैं। अनेक मामले तो पुलिसथानों तक पहुंच ही नहीं पाते हैं। अकसर लोकलाज को आधार बनाकर पीड़िता के परिजनों द्वारा मामला दबा दिया जाता है। कुछ वर्ष पूर्व दिल्ली जैसे महानगर में उबेर कंपनी के टैक्सी चालक द्वारा अपनी महिला सवारी से बलात्कार करने की घटना सुर्खियों में छाई रही। महिलाओं के प्रति अपराध की संभावना भीड़ भरे वातावरण में अपेक्षाकृत कम रहती है। इसीलिए स्वयं महिलाएं भी सिटी बस, टेम्पो, टैक्सी या ऑटोरिक्शा को प्राथमिकता देती हैं जिनमें अन्य सवारियां भी रहती हैं। क्या सागर, जबलपुर, कटनी, झाबुआ जैसे छोटे शहरों की महिलाएं बाईक टैक्सी में जाना पसंद करेंगी? यदि वे बाईक टैक्सी को अपनाएंगी भी तो क्या यह उनके लिए सुरक्षित होगा? फिर महिलाएं बाईक टैक्सी में जाएं या न जाएं किन्तु युवाओं और बच्चों को तो वह आकर्षिक करेगी ही। उल्लेखनीय है कि एक ओर बच्चों के साथ यौन शोषण के बढ़ते मामलों के बीच एनसीईआरटी चाहता है कि छात्र गुड टच और बैड टच के बीच का अंतर पहचानें और उन्हें किताबों में यह पढ़ाया जाए कि यौन शोषण का सामना करने पर उन्हें क्या करना चाहिए। स्कूली पाठ्यक्रमों और पुस्तकों पर केंद्र और राज्य सरकार को सुझाव देने वाले राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद ने कहा है कि अगले सत्र से उसकी सभी किताबों में ऐसे मामलों से निपटने के लिए क्या करना चाहिए, इसकी एक सूची होगी। इसमें पोक्सो कानून और राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) के बारे में जानकारी देने के साथ ही कुछ हेल्पलाइन नंबर भी होंगे। एनसीईआरटी के अनुसार शिक्षकों को गुड और बैड टच के बीच अंतर बताने के लिए छात्रों को शिक्षित करने की कोशिश करनी चाहिए। इसीलिए तय किया गया है कि अगले शिक्षण सत्र से एनसीईआरटी की सभी किताबों के पीछे वाले कवर के अंदर की तरफ आसान भाषा में कुछ दिशा निर्देश होंगे। इसमें छूने के अच्छे और बुरे तरीके के बारे में कुछ चित्र भी होंगे। कुछ हेल्पलाइन नंबर भी होंगे, जहां छात्र या अभिभावक ऐसे मामलों की रिपोर्ट कर सकते हैं या कोई मदद या काउंसिलिंग मांग सकते हैं। गुरुग्राम (हरियाणा) में एक निजी स्कूल में सात वर्षीय लड़के की हत्या और दिल्ली में एक स्कूल के चपरासी द्वारा पांच साल की बच्ची का बलात्कार किए जाने की घटनाओं के मद्देनजर छात्रों की सुरक्षा को लेकर बढ़ रही चिंताओं के बीच यह कदम उठाया गया। सीबीएसई ने पिछले सप्ताह स्कूलों से अपने शिक्षण और गैर शिक्षण कर्मचारियों का पुलिस वेरिफिकेशन कराने के साथ-साथ साइकोमेट्रिक जांच कराने के लिए भी कहा। केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावडेकर ने स्कूली बसों के लिए महिला चालकों की भर्ती करने का भी सुझाव दिया। वहीं दूसरी ओर राज्य सरकारों द्वारा बाईक-टैक्सी योजना सामने रखी जा रही है।
प्रदेश में कानून व्यवस्था की दशा यह है कि स्वयं पुलिसवाले असुरक्षित दिखाई देते हैं। मध्यप्रदेश के छतरपुर जिला मुख्यालय में कोतवाली थाना क्षेत्र में आरक्षक की गोली मारकर हत्या कर दी गई। मामला ठंडा नहीं हुआ कि एक और नया मामला सामने आ गया। छतरपुर के ही सिविल लाइन थाना में पदस्थ आरक्षक दुवेश सोनकर अपने परिजनों को ट्रेन में बैठाने के लिए पन्ना रोड स्थित महाराजा छत्रसाल रेलवे स्टेशन छतरपुर पहुंचे। जहां पर करीब 5-6 गुंडे आए और आरक्षक की कालर पकड़कर गाली-गलौज करने लगे। साथ धक्कामुक्की की और स्टेशन पर मौजूद लोग तमाशाबीन बने रहे। इस दौरान गुंडों ने आरक्षक को जान से मारने की धमकी देते हुए कहा कि चंद्रपुरा आओ, तो काट कर फेंक देंगे। पीड़ित आरक्षक ने इस बात की सूचना तत्काल ही सिविल लाइन पुलिस को दी, लेकिन जब तक पुलिस पहुंची, तब तक गुंडे वहां से भाग चुके थे। इतना ही नहीं कोतवाली थाना क्षेत्र में हुई घटना का हवाला देकर गुंडों ने आरक्षक दुवेश को धमकाया। जब पुलिस आरक्षक ही सुरक्षित न हो तो आम जनता किसके भरोसे बाईक टैक्सी जैसी नई योजनाओं का स्वागत करें?
स्वप्नजीवी दूसरी योजना है कि अब बच्चे खुद खाने की गुणवत्ता जांचेंगे। महिला एवं बाल विकास विभाग के तहत संचालित आंगनवाड़ियों में मिड डे मील की गुणवत्ता स्वयं विभाग तय नहीं कर पा रहा हो तो बच्चे कैसे बताएंगे कि उसमें कार्बोहाइड्रेट कम है या प्रोटीन की मात्रा मानक स्तर से कम है? वैसे महिला एवं बाल विकास विभाग ने इसके लिए मोबाइल एप्प एमपीडब्ल्यूडी सीडी बनाया है। उस पर बताया जा सकेगा कि भोजन में प्रोटीन या कार्बोहाइड्रेट उचित मात्रा में नहीं है। अब ज़मीनी सच्चाई पर नज़र डाली जाए। गुणवत्ताहीन भोजन की शिकायत करने के लिए मोबाईल एप्प की व्यवस्था रहेगी। शून्य से छह साल तक के अधिकांश कुपोषित बच्चे ग्रामीण इलाकों से हैं। एक तो ग्रामीण क्षेत्रों में एंडरायड मोबाईल कम लोगों के पास होते हैं, दूसरे जिनके पास होते भी हैैैैैैै वे सस्ते फोन रखते हैं जिनमें ढेर सारे एप्प लोड नहीं किए जा सकते हैं, तीसरे जब अच्छे-अच्छे दमदार लोग सच्चाई बयान नहीं कर पाते हैं तो छोटे-बच्चों को तो बड़ी आसानी से अपने पक्ष में किया जा सकता है। इन तीनों से भी बड़ी सच्चाई कि कोई छः साल का ग्रामीण बच्चा मोबाईल एप्प से शिकायत कैसे दर्ज़ करा सकेगा? इस योजना एक अर्थ यह भी है कि मिड डे मील की गुणवत्ता पर निगरानी रखने वाले संदेह के दायरे देखे जा रहे हैं या उन पर लगाम लगाना सरकार को कठिन लग रहा है।
हर सरकार अच्छे काम करना चाहती है। वह जनता पर अपने प्रशासनिक कौशल और अपनी योजनाओं की छाप छोड़ना चाहती है लेकिन वह अपनी इस आकांक्षा में तभी कामयाब हो सकती है जब उसकी योजनाएं ज़मीनी स्तर पर खरी उतरती हों। यह समझ से परे है कि ज़मीनी सच्चाई और सरकारी योजनाओं में इतनी दूरी क्यों रहती है? क्या हर सपना सच्चाई की धूप में खरा उतर सकता है? करोड़ों खर्च होने के बाद यदि सपने की कटु सच्चाई सामने आए भी तो क्या लाभ? कई राज्यों में ऐसे मुख्यमंत्री हैं जो ज़मीन से जुड़े हुए हैं कम से कम उनसे तो यह अपेक्षा की ही जा सकती है वे अपने अमले को व्यावहारिक योजनाएं बनाने की सलाह दें। यह उनकी जनहितप्रिय छवि के लिए भी आवश्यक है।
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Saturday, October 21, 2017

अंधेरे के विरुद्ध शंखनाद का समय - डॉ. शरद सिंह ... चर्चा प्लस

Dr (Miss) Sharad Singh

अंधेरे के विरुद्ध शंखनाद का समय
- डॉ. शरद सिंह 

 
(मेरा कॉलम 'चर्चा प्लस' दैनिक 'सागर दिनकर' में, 18.10.2017)


गुलामी से आजाद हुए वर्षों व्यतीत हो गए लेकिन ग़रीबी, बेरोज़गारी, मंहगाई, भ्रष्टाचार, धर्मांधता, पाखंड जैसी समस्याएं आज भी जस के तस हैं। हर दशहरे पर हम आसुरी शक्तियों के प्रतीक रावण को जलाते हैं और हर दीपावली को दीपक से घरों को जगमगा कर सुख-समृद्धि, धन-धान्य का आह्वान करते हैं। हम कामना करते हैं कि समृद्धि की देवी लक्ष्मी आए और हमारे कष्टों को दूर कर दे। उस समय हम भूल जाते हैं कि मंहगाई देवी लक्ष्मी नहीं बढ़ाती है, आर्थिक अव्यवस्था और भ्रष्टाचार के कारण मंहगाई बढ़ती है और अपनी इन कमियों के विरुद्ध हम स्वयं डट कर खड़े नहीं होते हैं। इस बार दीपावली पर हम तमाम भ्रष्टाचार एवं अव्यवस्था के अंधेरे के विरुद्ध शंखनाद करने का निश्चय करें तभी सच्चे अर्थ में दीपक जगमगा सकेंगे। 

Charcha Plus Column by Dr Miss Sharad Singh in Sagar Dinkar Daily News Paper

यह प्रतिदिन का कार्य है कि शाम को अंधेरा घिरते ही हम अपने-अपने घरों में बल्ब, ट्यूबलाईट, दिया-बाती, चिमनी आदि किसी न किसी साधन से उजाला कर ही लेते हैं। अंधेरा होते ही ऊंची अट्टालिकाओं से ले झुग्गी झोपड़ी तक मनुष्य प्रकाश की व्यवस्था कर लेता है। फिर अपने जीवन के उस अंधकार को मिटाने के प्रश्न पर हम असहाय और निर्बल बन कर क्यों खड़े हो जाते हैं। माना कि भ्रष्टाचार और अव्यवस्था की जड़ें हमारे जीवन में बहुत गहरे तक समा चुकी हैं और भ्रष्टाचार का अंधेरा हमारे जीवन के सुख-चैन के प्रकाश को निगलता जा रहा है। लेकिन ये भ्रष्टाचारी हैं कौन? ये कोई एलियन यानी किसी दूसरे ग्रह से आए हुए प्राणी तो नहीं हैं, ये तो हमारे बीच के, हमारे अपने लोग ही हैं, फिर हम इन्हें अंधेरा फैलाने से रोक क्यों नहीं पाते हैं? कहीं हम कायर तो नहीं होते जा रहे हैं? मुझे याद है अपने बचपन में देखा हुआ महिलाओं द्वारा किया गया वह विरोध जिसने जिला प्रशासन को झुकने के लिए विवश कर दिया था। वह कोई बड़ा आंदोलन नहीं था। महिलाओं के समूह द्वारा किया गया एक छोड़ा-सा विरोध प्रदर्शन था। घटना सागर संभाग के पन्ना जिला मुख्यालय की है। यू ंतो पन्ना में तालाबों की कोई कमी नहीं है लेकिन अव्यवस्था के कारण मोहल्ला रानीगंज में पेयजल का संकट खड़ा हो गया। मोहल्लेवालों ने जिला प्रशासन से शिकायत की। जब इससे भी काम नहीं बना तो एक दिन मोहल्ले की समस्त महिलाएं खाली घड़े ले कर कलेक्ट्रेट कार्यालय के रास्ते पर बैठ गईं। महिलाओं के उस हुजूम में हाथ-हाथ भर का घूंघट (जो उस समय चलन में था) चेहरे पर डाले बहुएं भी शामिल थीं। जब तक जिला प्रशासन के जिम्मेदार अधिकारियों ने पेयजल समस्या को सुलझाने का वादा नहीं किया तब तक वे रास्ते पर डटी रहीं। प्रदर्शनकारियों द्वारा न तो कोई तोड़-फोड़ की गई और न कोई उद्दण्डता की गई। यह घरेलू महिलाओं द्वारा किया गया एक ईमानदार विरोध था जिसने प्रशासन को जागने को मजबूर कर दिया। विरोध का यह तेवर अब दिखाई ही नहीं देता है। ऐसा लगता है कि गोया सारा विरोध सोशल मीडिया तक सिमट कर रह गया है। जो विरोध सड़कों पर दिखाई देता है उसमें प्रायोजित तत्वों की इतनी मिलावट रहती है कि जिसके परिणामस्वरूप लाठीचार्ज, आगजनी के दृश्य निर्मित हो जाते हैं और निरपराधों के रक्त की नदियां बहती दिखाई देती हैं। ऐसा नहीं है कि भ्रष्टाचार के विरोध के रास्ते हें पता नहीं हैं लेकिन हजारों में से कोई एक होता है जो भ्रष्टाचारी को पकड़वाने के लिए आर्थिक अपराध शाखा की मदद लेता है। जब कोई किसी भ्रष्टाचारी को रंगेहाथों पकड़वाता है तो हम उस समाचार को पढ़ कर खुश होते हैं, उस पर दिनभर जुगाली करते हैं, उस समाचार को गर्मजोशा से व्हाट्सअप करते हैं लेकिन उसके बाद किसी अन्य भ्रष्टाचारी को पालने-पोसने वालों की पंक्ति में जा कर खड़े हो जाते हैं।
चर्चा करने में बात बहुत घिसी-पिटी और पुरानी सी लगती है कि समाज में दहेज लिया और दिया जाता है। दहेज के विरुद्ध कानून भी बने हुए हैं लेकिन प्रति वर्ष देश में करोड़ों शादियां दहेज का लेन-देन करते हुए होती हैं। अधिक हुआ तो दोनों पक्ष झूठ बोल देते हैं कि हमने तो कुछ लिया-दिया ही नहीं। रही-सही कसर सरकार पूरी कर देती है सामूहिक विवाहोत्सवों में गहने, कपड़े और गृहस्थी का सामान दे कर। मुफ़्तखोरी की बुनियाद पर नए जीवन की शुरूआत होने से मेहनत की रोटी अच्छी कैसे लगेगी? इस तरह की योजनाएं सामाजिक संस्थाओं के सुपुर्द ही रहे तो सही जरूरतमंद को इसका लाभ मिलेगा वरना हर साल कई शादीशुदा जोड़े फिर से फेरे लेते नज़र आते रहेंगे।
मुफ़्तखोरी की बात जब चली ही है तो इसे अनदेखा नहीं किया जा सकता है कि राजनीतिक लाभ के लिए या वोट बटोरने के लिए अथवा सस्ती लोकप्रियता के लिए आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों को मुफ़्त बिजली, मुफ़्त रसोई गैस कनेक्शन जैसे लाभ दिए जाते हैं। जिसका बोझ प्रत्यक्ष रूप से सरकार उठाती दिखाई देती है जबकि असली बोझ पड़ता है हर नागरिक पर। तरह-तरह के टैक्स के रूप में प्रत्येक नागरिक उस बोझ को ढोता है। यह बोझ किसी को भी बुरा न लगे यदि सही व्यक्तियों को लाभ मिल पा रहा हो और इससे उनमें मेहनत करने की भावना जागती हो। ज़मीनी सच्चाई इससे भिन्न है और यह सच्चाई किसी से छिपी भी नहीं है फिर भी इस तरह की योजनाएं चलती रहती हैं। जरा सोचिए कि एक बार किसी व्यक्ति को कुकिंग गैस का चूल्हा और सिलेंडर मुफ़्त में दे भी दिया जाए तो वह एक सिलेंडर जीवन भर तो चलेगा नहीं। अगली बार वह सिलेंडर कैसे भरवाएगा? क्या बेहतर नहीं है कि उसे ऐसा रोजगार दिया जाए जिससे वह स्वयं गैस-चूल्हा, सिलेंडर आदि खरीदने की क्षमता पा सके। राजनीति में तो सभी एक-दूसरे पर तोहमत लगाते रहते हैं। एक कहता है कि तुम्हारे शासन में ग़रीबी बढ़ी तो दूसरा कहता है मेरे नहीं, तुम्हारे शासन में ग़रीबी बढ़ी। ग़रीबी हटाने का वादा हर शासन करता है लेकिन आजादी की लगभग तीन चौथाई सदी बाद भी ग़रीबी समाप्त नहीं हुई है। वरन् आर्थिक अस्थिरता बढ़ती ही जा रही है। करों और निजी क्षेत्रों की भूल-भुलैया में प्रत्येक नागरिक भ्रमित-सा घूम रहा है। लेकिन लगता है जैसे वह इस भ्रम से उबरना ही नहीं चाहता है।
कला कभी कलंक नहीं होती है। इस बात को ध्यान में रखते हुए ‘‘ताजमहल हमारी संस्कृति पर कलंक है’’ जैसे मानसिक प्रदूषण का भी विरोध करना होगा। यदि हमारी सोच इतनी संकुचित हो जाएगी तो फिर हम में और तालिबानों में क्या अन्तर रह जाएगा जिन्होंने बाम्बियान (अफ़गानिस्तान) में महात्मा बुद्ध की अनुपम प्रतिमा को ध्वस्त कर दिया था। हमारी संस्कृति में ऐसी संकुचित सोच के लिए कोई जगह नहीं है और न कोई जगह होनी चाहिए। वाद-विवाद स्वस्थ मुद्दों पर हों तो सुपरिणाम देते हैं अन्यथा गाली-गलौच की सूरत में बदलते चले जाते हैं। भारतीय संस्कृति शास्त्रार्थ की संस्कृति रही है, गाली-गलौच की नहीं।
एक बात और कि जब कोई तथाकथित बाबा पकड़ा जाता है तो हम चौंक जाते हैं और थू-थू करने लगते हैं लेकिन हम उस व्यक्ति की सच्चाई का आकलन करने के बारे में कभी सोचते ही नहीं है जिसे हम स्वयं ‘बाबा’ या ‘मां’ के रूप् में पूज रहे होते हैं। भले ही वह ‘बाबा’ सोने के सिंहासन पर विराजते हो या ‘मां’ फिल्मी गानों की धुन पर नाचती हो। अचम्भा तो तब होता है जब अच्छा-खासा पढ़ा-लिखा तबका ऐसे बाबाओं और मांओं की धुन पर बेखबर नाचता-झूमता नज़र आता है। जंगल बचाने और हरियाली लाने की बातें तो खूब होती हैं लेकिन सच तो यह है कि हम अपने मोहल्ले में एक पार्क भी बना नहीं पाते हैं। जो पार्क बने हुए हैं उनको बचाने की भी सुध हमें नहीं रहती है। यहां तक कि जब हम घर बनवाते हैं तो उसमें एक ऐसा छोटा-सा स्थान भी नहीं रखते हैं जिसमें कोई पेड़ लगा सकें। आमतौर पर हमारा हरियाली प्रेम गमलों में सिमट कर रह जाता है। वर्तमान आचार-व्यवहार को देख कर यही लगता है गोया हमें अपनी अगली पीढ़ी की भी चिंता नहीं है। ध्वनि प्रदूषण, वायु प्रदूषण, जंगलों का अभाव, पानी की किल्लत, नौकरियों की अस्थिरता आदि की विरासत हमारी आने वाली पीढ़ी को कब तक सहेज पाएगी? सच तो ये है कि हमें अपने भीतर के अंधेरे को समझना होगा और उसके विरुद्ध खड़े होना होगा। अपनी कमजोरियों के अंधेरों को मिटाना होगा और आने वाली पीढ़ियों की जरूरतों से सरोकार रखना होगा।
गुलामी से आजाद हुए वर्षों व्यतीत हो गए लेकिन ग़रीबी, बेरोज़गारी, मंहगाई, भ्रष्टाचार, धर्मांधता, पाखंड जैसी समस्याएं आज भी जस के तस हैं। हर दशहरे पर हम आसुरी शक्तियों के प्रतीक रावण को जलाते हैं और दीपावली को दीपक से घरों को जगमगा कर सुख-समृद्धि, धन-धान्य का आह्वान करते हैं। हम कामना करते हैं कि समृद्धि की देवी लक्ष्मी आए और हमारे कष्टों को दूर कर दे। उस समय हम भूल जाते हैं कि मंहगाई देवी लक्ष्मी नहीं बढ़ाती है, आर्थिक अव्यवस्था और भ्रष्टाचार के कारण मंहगाई बढ़ती है और अपनी इन कमियों के विरुद्ध हम स्वयं डट कर खड़े नहीं होते हैं। हमें ‘अप्प दीपो भव’ के आचरण को अपनाना होगा ताकि अपनी कमियों, अपनी भीरुता, अपनी असंवेदनशीलता के अंधकार को मिटा सकें। इस बार दीपावली पर हम तमाम भ्रष्टाचार एवं अव्यवस्था के अंधेरे के विरुद्ध शंखनाद करने का निश्चय करें तभी सच्चे अर्थ में दीपक जगमगा सकेंगे।
एक दीपक तो जलाओ
दूर हो मन का अंधेरा
क्लेश मिट जाएं, रहे बस
रोशनी का ही बसेरा

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स्वच्छता की दीपावली साल भर मनाएं हम - डॉ. शरद सिंह ... चर्चा प्लस

Dr (Miss) Sharad Singh
चर्चा प्लस
 

स्वच्छता की दीपावली साल भर मनाएं हम
- डॉ. शरद सिंह
 

( सागर दिनकर में मेरा कॉलम चर्चा प्लस, 11.10.2017)
जब हम दीपावली के समय लक्ष्मी-आगमन की कल्पना कर के यह स्वीकार करते हैं कि देवी लक्ष्मी साफ-सुथरे घरों में ही प्रवेश करती हैं तो फिर दीपावली की रात छोड़ कर शेष 364 रातों में देवी लक्ष्मी का अनादर क्यों करते हैं? यदि हमेशा स्वच्छता बनी रहे तो हमेशा लक्ष्मी आएंगी न! इसीलिए दीपावली के घरेलू स्वच्छता अभियान के साथ हमें अपने मन के कोने-कोने को भी टटोलना होगा कि हम भारतीय दुनिया की सबसे श्रेष्ठ संस्कृति वाले हो कर भी आज शौच और गली-मोहल्ले की स्वच्छता के अभियान के क्यों मोहताज़ हैं? 

 
Charcha Plus Column by Dr Miss Sharad Singh in Sagar Dinkar Daily News Paper

दीपावली एक ऐसा त्यौहार है जो स्वच्छता के लिए प्रेरित करता है। बचपन में जब दीपावली पर निबंध लिखना पड़ता था तब उसमें हम अपने अनुभव से प्रेरित हो कर लिखते थे कि दीपावली पर घरों में साफ-सफाई होती है। खिड़की, दरवाजों और दीवारों पर रंग-रोगन किया जाता है। यह लिखते हुए हम सभी को अपने घरों में होने वाली सफाई, लिपाई और रंगा-पुताई याद आने लगती थी। उन दिनों घरों के सामने गोबर से लीप कर चूने या छुई से ढिग (आउटलाईन) धरी जाती थी। ऐसे आंगन आज शहरों में यकाकदा लेकिन गांवों में अभी भी देखने को मिल जाते हैं। गोबर से लिपे आंगन का एक साफ, गुनगुना अहसास। गोबर से लिपी मिट्टी वाले फर्श सीमेंट या टाईल्स के फर्श जितने ठंडे नहीं हुआ करते हैं। यद्यपि ऐसे गोबर लिपे फर्श में समाई रहती है स्त्रियों की कमरतोड़ मेहनत और घर को साफ-सुथरा रखने का जज़्बा।
आज हमने अपने रहन-सहन में बहुत प्रगति कर ली है। आज गांवों में भी पक्के मकान और सीमेंट के फर्श बनने लगे हैं। लेकिन ऐसा लगता है कि साफ़-सफ़ाई से रहने की भावना हम कहीं पीछे छोड़ आए हैं। पहले सीमित साधन अथवा साधनहीनता में भी जो कचरा-कूड़ा गांवों और शहरों के बाहर फेंका जाता था, उसे आज परस्पर एक-दूसरे के घर के सामने या फिर हमारे घरों के बीच खाली पड़े किसी प्लॉट पर फेंक कर सफाई का कर्त्तव्य पूरा कर लेते हैं। कहने को 21 वीं सदी में पहुंच गए हैं हम, रहन-सहन का स्तर और स्टाईल भी बदल लिया है लेकिन क्या यह शर्मनाक नहीं है कि आज भी हमें अपने लोगों को समझाना पड़ रहा है कि उन्हें शौच के लिए कहां जाना चाहिए? क्या यह लज्जित कर देने वाला संदर्भ नहीं है कि हमें ‘‘भारत स्वच्छता अभियान’’ चला कर स्वच्छता का महत्व और उसकी जरूरत समझाना पड़ रहा है? जो स्वच्छता के लिए उत्साह दीपावली के समय हमारे मन में जागता है वह साल के 365 दिन बना क्यों नहीं रह पाता है? इसीलिए दीपावली के घरेलू स्वच्छता अभियान के साथ हमें अपने मन के कोने-कोने को भी टटोलना होगा कि हम भारतीय दुनिया की सबसे श्रेष्ठ संस्कृति वाले हो कर भी आज शौच और गली-मोहल्ले की स्वच्छता के अभियान के क्यों मोहताज़ हैं? ये अभियान ऐसे नहीं हैं जिन पर दुनिया की दृष्टि न पड़ रही हो, हमें सोचना होगा कि हम दुनिया के सामने अपनी कैसी छवि रख रहे हैं? यह हमारी भीरुता ही है कि जो आज भी गांवों और शहरों के भी अनेक हिस्सों में शौचालय नहीं हैं।
आधिकारिक रूप से 1 अप्रैल 1999 से शुरू, भारत सरकार ने व्यापक ग्रामीण स्वच्छता कार्यक्रम का पुनर्गठन किया और पूर्ण स्वच्छता अभियान शुरू किया जिसको बाद में 01 अप्रैल 2012 को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा निर्मल भारत अभियान नाम दिया गया। स्वच्छ भारत अभियान के रूप में 24 सितंबर 2014 को केंद्रीय मंत्रिमंडल की मंजूरी से निर्मल भारत अभियान का पुनर्गठन किया गया था। इसके बाद स्वच्छ भारत अभियान की विस्तृत रूपरेखा तैयार की गई। स्वच्छ भारत अभियान 2 अक्टूबर 2014 को शुरू किया गया और 2019 तक खुले में शौच को समाप्त करना इसका उद्देश्य तय किया गया। यह एक राष्ट्रीय अभियान है।
सार्वजनिक क्षेत्र की अनेक इकाइयां भी इस अभियान में अपना योगदान दे रही हैं। लेकिन ज़मीनी स्तर पर सच्चाई का एक अन्य पहलू भी है। सरकार की ओर से घर में शौचालय बनाने के लिए धनराशि दी जा रही है, शौचालय बनवाने के बाद उसकी तस्वीर सरकार के पास भेजे जाने का भी प्रावधान रखा गया है ताकि शौचालय बनवाने की झूठी रिपोर्ट तैयार न की जा सके। इस तरह सरकार के पास अपनी योजना के क्रियान्वयन का सबूत तो इकट्ठा हो जाता है किन्तु यह भी देखने में आया है कि शौचालय के मालिक सरकार के पीठ करते ही उस शौचालय के कमरे को दूसरे काम में लाने लगते हैं। शौचालय के कमरे से कमोड उखाड़ कर रसोईघर बना लेने तक की तस्वीरें सामने आई हैं। अब यदि हमारे प्रधान मंत्री यह कहते हैं कि मंदिर निर्माण से अधिक शौचालय निर्माण की आवश्यकता है तो हम शब्दों तक सीमित रहते हुए भड़क जाते हैं। उस हम बिना चिन्तन किए विपक्ष की कुर्सी पर जा बैठते हैं। जबकि यहां सवाल राजनीति का नहीं है बल्कि अपनी सोच बदलने का है। जब हम दीपावली के समय लक्ष्मी-आगमन की कल्पना कर के यह स्वीकार करते हैं कि देवी लक्ष्मी साफ-सुथरे घरों में ही प्रवेश करती है तो फिर दीपावली की रात छोड़ कर शेष 364 रातों में देवी लक्ष्मी का अनादर क्यों करते हैं? यदि हमेशा स्वच्छता बनी रहे तो हमेशा लक्ष्मी आएगी न।
बॉलीवुड भी स्वच्छता अभियान में गंभीरता से जुड़ गया है और फिल्म निदेशक नारायण सिंह की अक्षय कुमार और भूमि पेडनेकर द्वारा अभिनीत फिल्म ‘‘टॉयलेट एक प्रेमकथा’’ इसका एक दमदार सबूत है। इस फिल्म ने लोगों के दिलों को भी छुआ। लेकिन फिल्म देखने के बाद कितने लोगों ने उसके कथानक की गंभीरता को समझा या आत्मसात किया, यह कहना कठिन है। सच्चाई यह भी है कि एक करोड़ में औसतन एक हज़ार लोग आज भी खुले में शौच के लिए जाते हैं और इस एक हज़ार की जनसंख्या में एक भी लड़की ऐसी नहीं होती है जो ससुराल में शौचालय है या नहीं, यह जानना चाहे। या फिर ससुराल में शौचालय न होने पर विवाह से मना कर दे। ससुराल और विवाह की बात तो छोड़िए, इन घरों की बेटियां अपने माता-पिता से भी घर में शौचालय बनवाने का हठ नहीं करती हैं। यह स्वच्छता, स्वास्थ्य और सुरक्षा के प्रति चेतनाहीनता नहीं तो और क्या है? यह ठीक है कि कई परिवारों की स्थिति यह नहीं होती है कि वे शौचालय बनवाने के लिए जमीन या निस्तार के लिए र्प्याप्त पानी जुटा पाएं लेकिन ऐसे परिवार क्या सार्वजनिक शौचालय इस्तेमाल नहीं कर सकते हैं? खुले में जाने से तो यह कहीं अधिक सुरक्षित है, विशेषरूप से महिलाओं और बच्चियों के लिए।
वैसे खुले मैंने स्वयं इस विडम्बना को झेला है। हुआ यूं था कि सन् 1998 में मंडला जिले के विक्रमपुर में मैं और मेरी दीदी वर्षा सिंह अपने मामा कमल सिंह जी के पास छुट्टी मनाने पहुंचे। मामा जी वहां हायरसेकेंड्री स्कूल में प्राचार्य थे। उन्होंने हमें आगाह किया था कि उनके घर और स्कूल में शौचालय नहीं है, आओगी तो ‘लोटा परेड’ करना पड़ेगा। हमने इस बात को गंभीरता से नहीं लिया और विक्रमपुर पहुंचे। दूसरे दिन से ही हमें भी ‘लोटा परेड’ करनी पड़ी। शर्म तो बहुत आई मगर मजबूरी थी। उस आदिवासी बाहुल्य और वनसंपदा के धनी क्षेत्र के जंगल में घूमते हुए हमने गूलर के पके हुए फल खा लिए। बहुत स्वादिष्ट थे। लेकिन उसका खामियाज़ा दूसरे दिन भुगतना पड़ा जब ठीक उस समय लोटा परेड की आवश्यकता महसूस हुई जब घर के सामने स्थित स्कूल के सुबह के सत्र की छुट्टी का समय हुआ। इधर हम घर से लोटा ले कर निकले और उधर से स्कूल से दर्जनों लड़के-लड़कियां निकले। उनके लिए हमारा यूं लोटा लिए निकलना सहज बात थी लेकिन हमारे लिए कुछ भी सहज नहीं था। वह दिन ज़िन्दगी में कभी भुला नहीं सकती हूं। यद्यपि उस घटना ने मुझे ग्रामीण महिलाओं की समस्याओं को समझने का एक और आयाम दिया। खुले में शौच जाना किस तरह किसी स्त्री के लिए अभिशाप बन सकता है, इस पर मैंने एक कहानी भी लिखी थी जिसका नाम था ‘मरद’। इस कहानी को अनेक प्रशंसक मिले। लेकिन दुख है कि कहानी लिखे जाने के डेढ़ दशक बाद भी समस्या जस की तस है।
एक बात और सोचने की है कि आज विदेश में रह रहे बच्चों और रिश्तेदारों से मिलने या फिर टूर-पैकेज पर पर्यटन के लिए विदेश जाने का तारतम्य बढ़ गया है। लेकिन विदेश घूम कर लौटने वाले, वहां की स्वच्छता से प्रभावित होने वाले भी भारत लौटते ही गोया स्वच्छता के सारे सबक भूल जाते हैं। उनके सारे अनुभव सोशल मीडिया की वॉल तक सीमित हो कर रह जाते हैं। अधिक से अधिक घर के भीतर की सजावट बदल लेते हैं लेकिन घर के बाहर खुली बजबजाती नालियों और कचरे के ढेरों की ओर ध्यान नहीं देते हैं।
जब प्रश्न घरेलू, ग्रामीण, नगरीय और देश की स्वच्छता का हो तो हमें राजनीति के चश्में को उतार कर स्वास्थ्य, सुरक्षा और सभ्यता के नजरिए से सोचना चाहिए। मंदिर अथवा किसी भी देवस्थल को हम साफ़ रखते हैं क्यों कि हम मानते हैं कि वहां देवता का वास होता है। फिर जिस देश में अनेक देवता वास कर रहों उसे हम साफ-सुथरा क्यों नहीं रख पा रहे हैं? तो चलिए, स्वच्छता की दीपावली साल भर मनाएं हम।
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