Thursday, December 1, 2016

हिन्दी साहित्य, स्त्री और आत्मकथा - डॉ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
" #हिन्दी_साहित्य, #स्त्री और #आत्मकथा " - मेरे कॉलम #चर्चा_प्लस में "दैनिक सागर दिनकर" में ( 30.11. 2016) .....
My Column #Charcha_Plus in "Sagar Dinkar" news paper


 

हिन्दी साहित्य, स्त्री और आत्मकथा
 
- डॉ. शरद सिंह


हिन्दी में लेखिकाओं द्वारा आत्मकथा लिखने की परम्परा पुरानी नहीं है। यदि यह विधा लेखिकाओं की कलम से अधिकतर दूर रही तो इसका सबसे बड़ा कारण है सामाजिक दबाव। किसी भी स्त्री के लिए अपने जीवन का सच उजागर करना कोई आसान काम नहीं है। जब स्त्री आत्मकथा लिखती है तो उसे धमाके के रूप में देखा जाता है, विशेष रूप से लेखन के क्षेत्र से जुड़ी स्त्रियों की आत्मकथा। लेखिकाओं की आत्मकथा उंगलियों पर गिनी जा सकती है। पर अब स्त्री और उसकी आत्मकथा के अस्तित्व को एक साथ स्वीकार करने का वातावरण जन्म ले चुका है, एक बौद्धिक सकारात्मक बोध की तरह।

लेखिकाओं की आत्मकथा लेखकों की आत्मकथा की अपेक्षा अधिक चौंकाती है। इन्हें पढ़ने वाले स्तब्ध रह जाते हैं कि ‘क्या ऐसा भी हुआ है?’ चाहे अमृता प्रीतम की ‘रसीदी टिकट’ हो, कमला दास की ‘मेरी कहानी’, तस्लीमा नसरीन की ‘अमार मेयीबेला’, ‘उताल हवा’, ‘क’,‘सेई सोब अंधोकार’, ‘अमी भालो नेई-तुमी भालो थेको प्रियो देश’, प्रभा खेतान की ‘अन्या से अनन्या’, कृष्णा अग्निहोत्री की दो खण्डों की आत्मकथा ‘लगता नहीं है दिल मेरा’ तथा ‘और......और औरत’। इनके अलावा मैत्रेयी पुष्पा की आत्मकथात्मक पुस्तकें ‘कस्तूरी कुण्डल बसै’ झूलानट’ तथा ‘गुड़िया भीतर गुड़िया’ ने भी सभी को चौंकाया।
‘स्त्री’ और ‘मुक्ति’- ये दोनों शब्द सदियों से परस्पर एक-दूसरे का पूरक बनने के लिए छटपटाते रहे हैं किन्तु ऐसे अनेक कारण हैं जिन्होंने इस पूरकता की राह में सदैव रोड़े अटकाए। स्त्री के संदर्भ में मुक्ति का विषय कठिन भी है और सरल भी। सैद्धांतिक रूप में यह सदैव सरल जान पड़ा है किन्तु प्रायोगिक रूप में अत्यंत कठिन। किसी हद तक प्रतिबन्धित। हिन्दी लेखन के आरम्भिक समय में पुरुष वर्चस्व साफ़-साफ़ दिखाई पड़ता है। एक कारण यह भी था कि हिन्दी कहानियों में स्त्री का वही स्वरूप उभर कर आया जो पुरुष-प्रधान समाज में पुरुषों द्वारा सोचा, समझा और रचा जाता है। इसीलिए उस दौर की कहानियों के स्त्रीपात्र अतिवादी आदर्श की चादर ओढ़ कर खड़े दिखाई देते हैं।
आज प्रतिमान बदलते जा रहे हैं। यह माना जाता है कि स्त्रियों का प्रथम बंधन देह से प्रारम्भ होता है। इसीलिए कहानियों में भी देहमुक्ति का विषय बनना स्वाभविक है। कई बार हिन्दी कथासंसार में लेखिकाओं के संदर्भ में देहमुक्ति को उनके लेखन की ‘बोल्डनेस’ ठहरा दिया जाता है जिससे विषय की गंभीरता की सरासर अवहेलना हो जाती है। प्रश्न यह उठता है कि स्त्री की देहमुक्ति का क्या आशय है? क्या हिन्दी में लेखिकाओं द्वारा जो दैहिक संदर्भ प्रस्तुत किए जा रहे हैं वे अनुपयोगी हैं? क्या वे अपरिष्कृत हैं? क्या इस प्रकार के संदर्भों से बच कर उन विषयों पर विस्तृत दृष्टि डाली जा सकती है जिनके जन्म में देह आधारभूत तत्व है? या फिर ऐसे विषयों को अछूता छोड़ दिया जाना चाहिए क्योंकि ऐसे विषयों पर लेखन से कुछ परम्परागत मानक टूटते हैं? ये बहुत सारे प्रश्न हैं जो महिला कथालेखन की चर्चा आते ही सिर उठाने लगते हैं। और जब प्रश्न हो आत्मकथा का तो प्रश्नों का अंबार लग जाता है।
साहित्य में अनेक विधाएं हैं जिनके द्वारा साहित्यकारों ने अपने जीवन के गोपन पक्षों को सार्वजनिक किया है। पाठकों को उन कक्षों में प्रवेश की अनुमति दी है जिनमें रह कर उन्होंने नितान्त अपने दुख, सुख और प्रेम को जिया है। प्रेमपत्रों का प्रकाशन इसी तारतम्य की एक कड़ी है। डायरी को प्रकाशित करा कर भी अपने निजी को सार्वजनिक किया गया है। आत्मकथा इसी प्रकार की एक विधा है जिसमें व्यक्ति, चाहे वह स्त्री हो या पुरुष, अपने जीवन की, अपने अनुभवों की पर्तें खोलता है। इसकी शैली ‘जो जैसा है,वैसे ही’ की रहती है। इसीलिए लेखिकाओं द्वारा अपनी आत्मकथा का प्रकाशन कराए जाने पर अच्छा खासा बवाल मच जाता है। अनेक प्रश्न उठ खड़े होते हैं कि क्या उन्हें ऐसा लिखना चाहिए था? क्या उन्हें फलां के साथ अपने अंतःसंबंधों को उजागर करना चाहिए था? क्या यह एक लेखिका के लिए सामाजिक दृष्टि से उचित है? क्यों कि अतंतः वह एक स्त्री है। स्त्री से उसके जीवन में यही अपेक्षा की जाती है कि वह देह और आत्मा को अलग-अलग दो खांचों में रख कर जिए। फिर भी कुछ लेखिकाओं ने सामाजिक दबाव की चिन्ता किए बिना अपने जीवन के उन पक्षों को आत्मकथा के रूप में सबके सामने लाने का साहस किया।
मैत्रेयी पुष्पा ‘गुड़िया भीतर गुड़िया’ में लिखती हैं कि ‘‘जिन्दगी जो थी तन मन से घिरी हुई। मेरे लिए उसको दो भागों में बांट कर देखना कठिन था। जब शरीर और मन को काट कर देखने की बात होती, मैं बहुत उदास और खिन्न हो जाती।’
प्रभा खेतान ने ‘अन्या से अनन्या’ में डॉ. सर्राफ के साथ अपने संबंधों का बेहिचक विवरण दिया। पढ़ने वालों ने इसे प्रभा खेतान का साहस और दुस्साहस माना। कृष्णा अग्निहोत्री की आत्मकथा (दो खण्डों में) ‘लगता नहीं है दिल मेरा’ तथा ‘और......और औरत’ ने उस सुगबुगाहट की याद ताजा करा दी जो तसलीमा नसरीन की आत्मकथा ‘क’ के प्रकाशित होने पर साहित्य जगत में हुई थी। तसलीमा ने कई दिग्गज साहित्यकारों के साथ अपने अंतःसंबंधों का खुलासा किया था। जिस पर उन साहित्यकारों को ‘पीड़ा’ पंहुची थी। उनकी इस ‘पीड़ा’ के संबंध में तसलीमा ने अपने एक साक्षात्कार में उन्मुक्त भाव से कहा था कि जिन्होंने मेरा भावनात्मक दोहन किया उन्हें मेरी आत्मकथा में अपना नाम आने पर आपत्ति नहीं होनी चाहिए।
साहित्य में एक ओर ‘स्त्री साहित्य’ को अलग करके देखा ताजा है और उसमें स्त्री के जीवन को अक्षरशः पाने की आशा रखी जाती है वहीं दूसरी ओर यदि आत्मकथा के रूप में कोई स्त्री अपने जीवन के प्रत्येक पन्ने को अक्षरशः उतार देती है तो उस पर कई प्रकार की प्रतिक्रियाएं होती हैं। कुछ लोग चौंकते हैं , कुछ स्तब्ध रह जाते हैं, कुछ सच की स्वीकारेक्ति पर प्रसन्न होते हैं तो कुछ इस बात से नाराज हो उठते हैं कि आत्मकथा लेखिका ने उन से जुड़े संर्दभां को प्रकाश में क्यों लाया। अपेक्षाओं का यह दुहरा-तिहरा मापदण्ड साहित्यजगत में खलबली मचाता है। वैसे जब भी कोई स़्त्री चाहे वह किसी भी विधा से जुड़ी हो स्वयं को सार्वजनिक रूप से यथास्थिति सामने रखती है तो पुरुषप्रधान सोच सकते में आ जाती है जबकि कई सि़्त्रयां भी पुरुषवादी सोच के पक्ष में जा खड़ी होती हैं। वे भी ऐसी आत्मकथाओं पर किंचित असहज हो उठती हैं। सम्भवतः इसका कारण यह है कि वे जिए गए जीवन के यथास्थिति प्रकाशन को स्वीकार करने से इसलिए हिचकती हैं कि वे स्वयं को एक स़्त्री से पहले मां, बहन, बेटी के रूप में पाती हैं और अपने इन्हीं संबंधियों के रोष से भयभीत हो उठती हैं। यह स्वाभाविक है। क्योंकि स्त्री चाहे किसी भी क्षेत्र में अपनी पहचान बना चुकी हो, उसे उसकी पहचान से परे पहले एक स्त्री के रूप में ही देखा जाता है। सदियों की बेड़ियां आसानी से नहीं टूटती हैं। चित्रकार अमृता शेरगिल ने जब अपना आत्मचित्र (सेल्फ पोट्रट) बनाया तो लोग चौंके। पुरुष स्त्री देह को अनावृत करे तो कोई बात नहीं लेकिन यदि स्त्री स्वयं अपनी देह को अनावृत करे तो कलाजगत भी चौंकता है। यहां भी वही अपेक्षा के दोहरे-तिहरे मापदण्ड की बात आती है।
कमलादास ने अपने यौवनारम्भ की घटनाओं को बेझिझक लिख डाला। अपनी भावनात्मक और दैहिक इच्छा को भी छिपाया नहीं। लोग चौंके। इससे पूर्व अमृता प्रीतम ने इमरोज़ और साहिर लुधियावनी से अपने संबंधों को सबके सामने रख दिया। उनके इस साहस ने उन सभी लोगों के मुंह पर ताला लगा दिया जो इन बिन्दुओं पर चटखारे ले कर ‘गॉसिप’ करते थे। मैत्रेयी पुष्पा ने अपनी आत्मकथात्मक पुस्तकों के माध्यम से अपने जीवन के उन पक्षों को सामने रखा जिसके बारे में आम पाठक सोच नहीं सकता था कि वे किस संघर्ष से गुज़र कर इस ऊंचाई तक पहुंची हैं। इन सबसे से परे, कृष्णा अग्निहोत्री की आत्मकथा है। यद्यपि उनके दुख-सुख तसलीमा से अलग हैं फिर भी वे अनुभव कहीं न कहीं एक जैसे हैं जो भावनात्क शोषण के हैं। इसमें स्वनामधन्य संपादकों द्वारा भावनात्मक- शोषण किए जाने का उल्लेख है। सुखद यह लगा कि इस पर उस ढंग से प्रतिक्रिया नहीं हुई जैसी कि तसलीमा नसरीन के ‘क’ पर हुई थी। जबकि शायद यह भारतीय साहित्यकारों, संपादकों के सोच में आए खुलेपन का प्रमाण है। धीरे-धीरे यह तथ्य स्वीकार किया जाने लगा है कि लेखिका एक स्त्री होने के साथ-साथ पुरुषों की भांति एक मनुष्य भी है जिसका अपना एक जीवन है, अपने दुख-सुख हैं और जिन्हें गोपन रखने अथवा उजागर करने का उसे पूरा-पूरा अधिकार है। उसके भीतर वे सभी संवेग होते हैं जो एक आम स्त्री में होते हैं, अन्तर मात्र यही होता है कि आम स्त्री उन संवेगों को व्यक्त करने का साहस नहीं संजो पाती है जबकि आत्मकथा लिखने वाली स्त्री साहस के साथ सब कुछ सामने रख देती है-जो जैसा है, वैसा ही। जैसा कि अपनी आत्मकथा के संबंध में कृष्णा अग्निहोत्री का कहना है कि, ‘‘मेरा बयान नंगा रहे...एकदम प्राकृतिक...साफ़! अहसासों की पर्तें कुछ इस तरह उघड़ती जाएं कि उनकी बारीक रेखाएं भी पढ़त से बाहर न रहें।’’
स्त्री और उसकी आत्मकथा के अस्तित्व को एक साथ स्वीकार करने का वातावरण बहुत पहले जन्म ले चुका है और उसमें हिन्दी की लेखिकाओं की आत्मकथाओं की कड़ियों का जुड़ते जाना स्त्री से उसके समूचे अस्तित्व के साथ स्वीकार किए जाने जैसा है। एक बौद्धिक सकारात्मक बोध की तरह।
-------------------

Wednesday, November 23, 2016

मेरा गोल्ड मेडल ... My Gold Medal .. Dr (Miss) Sharad Singh

प्रिय मित्रो, आज आपसे शेयर कर रही हूं अपना वह गोल्ड मेडल जो मुझे डॉ हरीसिंह गौर यूनीवर्सिटी, सागर की ओर से एम.ए. में यूनीवर्सिटी, में टॉप करने पर दिया गया था। मेरा एम.ए. का विषय था - प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व। . डॉ शरद सिंह
It's My Gold Medal which was given me by The University when I was achieved First Position as University Toper in M.A. at Dr Harisingh Gour University Sagar. My subject in M.A. was 'Ancient Indian History, Culture and Archeology. – Dr Sharad Singh  


It's My Gold Medal which was given me by The University when I was achieved First Position as University Toper in M.A. at Dr Harisingh Gour University Sagar. My subject in M.A. was 'Ancient Indian History, Culture and Archeology. – Dr Sharad Singh
 
It's My Gold Medal which was given me by The University when I was achieved First Position as University Toper in M.A. at Dr Harisingh Gour University Sagar. My subject in M.A. was 'Ancient Indian History, Culture and Archeology. – Dr Sharad Singh
It's My Gold Medal which was given me by The University when I was achieved First Position as University Toper in M.A. at Dr Harisingh Gour University Sagar. My subject in M.A. was 'Ancient Indian History, Culture and Archeology. – Dr Sharad Singh

डॉ. हरीसिंह गौर : जिन्होंने स्वप्न देखा और उसे पूरा किया

Dr (Miss) Sharad Singh
मेरा कॉलम #चर्चा_प्लस "दैनिक सागर दिनकर" में (23. 11. 2016) .....

My Column #Charcha_Plus in "Sagar Dinkar" news paper

 
 
 
डॉ. हरीसिंह गौर : जिन्होंने स्वप्न देखा और उसे पूरा किया
- डॉ. शरद सिंह

Charcha Plus Column of Dr Sharad Singh in "Sagar Dinkar" Daily News Paper
यूं तो हर व्यक्ति कोई न कोई स्वप्न देखता है और चाहता है कि उसका सपना पूरा हो। लेकिन सिर्फ़ चाहने से सपने पूरे नहीं होते। अपना सपना पूरा करने के लिए हरसंभव प्रयास करना भी जरूरी होता है। बुंदेली सपूत डॉ. हरीसिंह गौर ने भी एक स्वप्न देखा और उसे पूरा करने के लिए अपना तन, मन, धन सब न्योछावर कर दिया। यूं भी उनका स्वप्न एक ऐसा लोकव्यापी स्वप्न था जो सबकी आंखों में बसा हुआ था। बस, उसे साकार करना डॉ. हरीसिंह गौर जैसे दृढ़ इच्छाशक्ति वाले व्यक्ति के वश में ही था।

डॉ. हरीसिंह गौर ख्यति प्राप्त विधिवेत्ता, न्यायविद्, समाज सुधारक, शिक्षाशास्त्री, साहित्यकार, महान दानी, देशभक्त थे। उन्होंने एक स्वप्न देखा था। वह स्वप्न था बुंदेलखण्ड को शिक्षा का केन्द्र बनाना। वे ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय की भांति एक विश्वविद्यालय की स्थापना बुंदेलखण्ड में करना खहते थे। जिस समय वे बुंदेलखण्ड में उच्चशिक्षा केन्द्र का सपना देखा करते थे, उन दिनों बुंदेलखण्ड विकट दौर से गुज़र रहा था। गौरवपूर्ण इतिहास के धनी बुंदेलखण्ड के पास आत्मसम्मान और गौरव से भरे ऐतिहासिक पन्ने तो थे किन्तु धन का अभाव था। अंग्रेज सरकार ने बुंदेलखण्ड को अपने लाभ के लिए छावनियों के उपयुक्त तो समझा लेकिन यह कभी नहीं चाहा कि यहां औद्योगिक विकास हो जबकि यहां आकूत प्रकृतिक संपदा मौजूद थी। ठग और पिण्डारियों के आतंक को कुचलने वाले अंग्रेज कभी इस बात को महसूस नहीं कर सके कि वह अशिक्षा और आर्थिक विपन्नता ही थी जिसने ठग और पिण्डारियों को जन्म दिया। अंग्रेजों ने कभी यह नहीं सोचा कि बुंदेलखण्ड में उच्चशिक्षा का कोई केन्द्र भी स्थापित किया जा सकता है जिसमें पढ़-लिख कर बुंदेली युवा आमदनी के नए रास्ते पा सकता है।
अनेक युवा नहीं जानते थे कि स्कूल की चार कक्षाएं पढ़ लेने के बाद आगे क्या कर सकते हैं? किसी कार्यालय में चपरासी बनना अथवा कि स्कूल में शिक्षक बनना सबकी चाहत नहीं हो सकती थी। अपने जीवन को सफल बनाते हुए दूसरों से आगे कौन नहीं बढ़ना चाहता है? हर व्यक्ति एक सफल व्यक्ति का जीवन जीना चाहता है। डॉ. हरीसिंह गौर ने इस चाहत को समझा और उन्होंने मन ही मन ठान लिया कि चाहे कुछ भी हो जाए वे बुंदेलखण्ड में एक ऐसा विश्वविद्यालय स्थापित करेंगे जहां दुनिया भर से विद्वान आ कर शिक्षा देंगे और बुंदेलखण्ड के युवाओं को विश्व के शैक्षिकमंच तक ले जाएंगे। उनका यह सपना विस्तृत आकार लिए हुए था। उसमें बुंदेली युवाओं के साथ ही देश के विभिन्न क्षेत्रों से आने वाले युवाओं और विदेशी युवाओं तक के लिए जगह थी। बल्कि वे विश्व के विभन्न क्षेत्रों के युवाओं में परस्पर संवाद और मेलजोल को ज्ञान के प्रवाह का एक अच्छा माध्यम मानते थे।

सागर विश्वविद्यालय की स्थापना

डॉ. हरीसिंह गौर केन्द्रीय विश्वविद्यालय की स्थापना ‘सागर विश्वविद्यालय’ के नाम से डॉ. हरीसिंह गौर ने की थी। परतंत्र देश में अपनी इच्छानुसार कोई शिक्षाकेन्द्र स्थापित करना आसान नहीं था। डॉ. हरीसिंह गौर ने तत्कालीन ब्रिटिश सरकार के सामने अपनी इच्छा प्रकट की। ब्रिटिश सरकार को विश्वविद्यालय स्थापित किए जाने की अनुमति देने के लिए मनाना टेढ़ीखीर था। अंग्रेज तो यही सोचते थे कि अधिक पढ़ा-लिखा भारतीय उनके लिए कभी भी सिरदर्द बन सकता है। किन्तु एक सकारात्मक स्थिति यह थी कि उस समय तक ब्रिटिश सरकार को इतना तो समझ में आने लगा था कि अब भारत से उनका दाना-पानी उठने वाला है। एक तो द्वितीय विश्वयुद्ध के वे दुष्परिणाम जिन्हें झेलना ब्रिटेन की नियति बन चुका था और दूसरे भारत में ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध बढ़ते हुए आंदोलन। अंततः डॉ. हरीसिंह गौर अपने स्वप्न को साकार करने की दिशा में एक क़दम आगे बढ़े और उन्हें हग्रटिश सरकार से अनुमति मिल गई। लेकिन शर्त यह थी कि सरकार उस उच्चशिक्षा केन्द्र की स्थापना का पूरा खर्च नहीं उठाएगी। डॉ. हरीसिंह गौर चाहते तो देश के उन पूंजीपतियों से धन हासिल कर सकते थे जो उनकी विद्वता के कायल थे। लेकिन उन्होंने किसी से धन मांगने के बदले स्वयं एक उदाहरण प्रस्तुत करना उचित समझा और अपनी गाढ़ी कमाई से 20 लाख रुपये की धनराशि से 18 जुलाई 1946 को अपनी जन्मभूमि सागर में सागर विश्वविद्यालय की स्थापना की। आगे चल कर वसीयत द्वारा अपनी पैतृक संपत्ति से 2 करोड़ रुपये दान भी दिया।
डॉ. हरीसिंह गौर ने ‘सागर विश्वविद्यालय’ के स्थापना करके ही अपने दायित्वों की समाप्त नहीं समझ लिया। उन्होंने अपने जीवन के अंतिम समय तक इसके विकास के लिए संकल्पित रहे। उनका स्वप्न था कि सागर विश्वविद्यालय, कैम्ब्रिज तथा ऑक्सफोर्ड जैसी मान्यता हासिल करे। उन्होंने ढाई वर्ष तक इसे सहेजने में अपना पूरा श्रम अर्पित किया। अपनी स्थापना के समय यह भारत का 18वां विश्वविद्यालय था। सन 1983 में इसका नाम डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय कर दिया गया। 27 मार्च 2008 से इसे केन्द्रीय विश्वविद्यालय की श्रेणी प्रदान की गई है। विंध्याचल पर्वत शृंखला के एक हिस्से पथरिया हिल्स पर स्थित सागर विश्वविद्यालय का परिसर देश के सबसे सुंदर परिसरों में से एक है। यह करीब 803.3 हेक्टेयर क्षेत्र में फैला है। विश्वविद्यालय परिसर में प्रशासनिक कार्यालय, विश्वविद्यालय शिक्षण विभागों के संकुल, ब्वायज़ हॉस्टल, गर्ल्स हॉस्टल, स्पोर्ट्स कांप्लैक्स तथा कर्मचारियों एवं अधिकारियों के आवास हैं। डॉ. सर हरीसिंह गौर एक ऐसा विश्वस्तरीय अनूठा विश्वविद्यालय है, जिसकी स्थापना एक शिक्षाविद् के द्वारा दान द्वारा की गई थी।

अनुकरणीय जीवनयात्रा

डॉ. सर हरीसिंह गौर का जन्म महाकवि पद्माकर की नगरी सागर में 26 नवम्बर 1870 को एक निर्धन परिवार में हुआ था। डॉ. गौड़ बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि के थे। प्राइमरी के बाद इन्होनें दो वर्ष मेँ ही आठवीं की परीक्षा पास कर ली जिसके कारण इन्हेँ सरकार से 2 रुपये की छात्रवृति मिली जिसके बल पर ये जबलपुर के शासकीय हाई स्कूल गये। लेकिन मैट्रिक में ये फेल हो गये जिसका कारण था एक अनावश्यक मुकदमा। इस कारण इन्हें वापिस सागर आना पड़ा दो साल तक काम के लिये भटकते रहे फिर जबलपुर अपने भाई के पास गये जिन्होने इन्हें फिर से पढ़ने के लिये प्रेरित किया।
डॉ. गौर फिर मैट्रिक की परीक्षा में बैठे और इस बार ना केवल स्कूल मेँ बल्कि पूरे प्रान्त में प्रथम आये। इन्हें 50 रुपये नगद एक चांदी की घड़ी एवं बीस रूपये की छात्रवृति मिली। मिडिल से आगे की पढ़ाई के लिए जबलपुर गए फिर महाविद्यालयीन शिक्षा के लिए नागपुर के हिसलप कॉलेज में दाखिला ले लिया, जहां से उन्होंने इंटरमीडिएट की परीक्षा भी प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। पूरे कॉलेज में अंग्रेजी एव इतिहास मेँ ऑनर्स करने वाले ये एकमात्र छात्र थे। उन्होंने छात्रवृत्ति के सहारे अपनी पढ़ाई का क्रम जारी रखा। सन् 1889 में उच्च शिक्षा लेने इंग्लैंड गए। सन् 1892 में दर्शनशास्त्र व अर्थशास्त्र में ऑनर्स की उपाधि प्राप्त की। फिर 1896 में एम.ए., सन 1902 में एल. एल. एम. और अन्ततः सन 1908 में एल. एल. डी. किया। कैम्ब्रिज में पढाई से जो समय बचता था उसमें वे ट्रिनिटी कालेज में डी लिट्, तथा एल एल डी की पढ़ाई करते थे। उन्होने अंतर-विश्वविद्यालयीन शिक्षा समिति में कैंब्रिज विश्वविद्यालय का प्रतिनिधित्व किया, जो उस समय किसी भारतीय के लिये गौरव की बात थी। डॉ. सर हरीसिंह गौर ने छात्र जीवन में ही दो काव्य संग्रह ‘‘दी स्टेपिंग वेस्टवर्ड एण्ड अदर पोएम्स’’ और ‘‘रेमंड टाइम’’ की रचना की, जिससे सुप्रसिद्ध रायल सोसायटी ऑफ लिटरेचर द्वारा उन्हें स्वर्ण पदक प्रदान किया गया।
सन् 1912 में वे बैरिस्टर होकर स्वदेश आ गये। सेंट्रल प्रॉविंस कमीशन में अतिरिक्त सहायक आयुक्त के रूप में उनकी नियुक्ति हो गई। उन्होंने तीन माह में ही पद छोड़कर अखिल भारतीय स्तर पर वकालत प्रारंभ कर दी व मध्य प्रदेश, भंडारा, रायपुर, लाहौर, कलकत्ता, रंगून तथा चार वर्ष तक इंग्लैंड की प्रिवी काउंसिल मे वकालत की, उन्हें एलएलडी एवं डी. लिट् की सर्वोच्च उपाधि से भी विभूषित किया गया। 1902 में उनकी ‘‘द लॉ ऑफ ट्रांसफर इन ब्रिटिश इंडिया’’ पुस्तक प्रकाशित हुई। वर्ष 1909 में ‘‘दी पेनल ला ऑफ ब्रिटिश इंडिया (वाल्यूम २)’’ प्रकाशित हुई। प्रसिद्ध विधिवेत्ता सर फेडरिक पैलाक ने भी उनके इस ग्रंथ की प्रशंसा की थी। इसके अतिरिक्त डॉ. गौर ने बौद्ध धर्म पर ‘‘दी स्पिरिट ऑफ बुद्धिज्म’’ नामक पुस्तक लिखी। उस समय तक डॉ. हरीसिंह गौर की प्रसिद्धि चतुर्दिक फैल चुकी थी। उन्हें ‘सर’ की उपाधि से भी सम्मानित किया गया था।
डॉ. हरीसिंह गौर ने 20 वर्ष तक वकालत की तथा प्रिवी काउंसिल के अधिवक्ता के रूप में शोहरत अर्जित की। वे कांग्रेस पार्टी के सदस्य रहे, लेकिन सन 1920 में महात्मा गांधी से मतभेद के कारण कांग्रेस छोड़ दी। वे 1935 तक विधान परिषद् के सदस्य रहे। वे भारतीय संसदीय समिति के भी सदस्य रहे, भारतीय संविधान परिषद् के सदस्य रूप में संविधान निर्माण में अपने दायित्वों का निर्वहन किया। 25 दिसम्बर 1949 को डॉ. हरीसिंह गौर का निधन हुआ।
डॉ. गौर के जन्म के समय किसी ने भी नहीं सोचा होगा कि गरीबी में जन्मा बालक एक दिन पूरी दुनिया में अपनी पहचान बनाएगा और अनेक निर्धन छात्रों के लिए उच्चशिक्षा के द्वार खोल देगा। डॉ. गौर के जीवन के अनेक ऐसे पक्ष हैं युवाओं को सफलता से जीने का रास्ता दिखा कसते हैं। स्मरणीय हैं ये पंक्तियां जो राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने डॉ. हरीसिंह गौर की प्रशंसा में लिखी थीं -
‘‘सरस्वती-लक्ष्मी दोनों ने दिया तुम्हें सादर जय-पत्र,
साक्षी है हरीसिंह ! तुम्हारा ज्ञानदान का अक्षय सत्र! “
-------------------

Wednesday, November 16, 2016

सब्र, सियासत और कालाधन

Dr Sharad Singh
मेरा कॉलम #चर्चा_प्लस "दैनिक सागर दिनकर" में (16. 11. 2016) .....

My Column #Charcha_Plus in "Sagar Dinkar" news paper

 
सब्र, सियासत और कालाधन 
- डॉ. शरद सिंह 
दुनिया की नज़र भारत पर उस घड़ी से टिकी हुई है जिस घड़ी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पुराने पांच सौ और हज़ार के नोट बंद किए जाने की घोषणा की। कोई और देश होता तो शायद आमजनता सड़कों पर निकल आती और आपदा गहरा जाती। लेकिन भारत की जनता ने बड़े से बड़े संकट में धैर्य का परिचय दिया है और एक बार फिर अपनी इसी खूबी को दुनिया के सामने रख दिया है। सब्र, सियासत और काले धन के त्रिकोण के बीच खड़ी आमजनता प्रतिदिन एक मिसाल बनती जा रही है।   

यह पहली बार नहीं है जब देश में बड़े नोटों को वापस लिया गया हो और फिर बाज़ार में नए सिरे से हजार, पांच हजार और दस हजार के रुपए लाए गए हों। सन् 1946 में भी हज़ार रुपए और 10 हज़ार रुपए के नोट वापस लिए गए थे। सन् 1954 में हज़ार, पांच हज़ार और दस हज़ार रुपए के नोट वापस लाए गए। उसके बाद जनवरी 1978 में इन्हें फिर बंद कर दिया गया। 16 जनवरी 1978 को एक अध्यादेश जारी कर हज़ार, पांच हज़ार और 10 हज़ार के नोट वापस लेने का फ़ैसला लिया गया था। लेकिन उन दिनों आमआदमी की घर की बचत में अथवा रोजमर्रा की जरूरतों में बड़े नोट आज की तरह शामिल नहीं थे। इसलिए आमजनता पर इसका प्रतिकूल असर नहीं पड़ा था। आज मंहगाई के चलते पांच सौ रुपए दैनिक उपभोग के खर्च में शामिल हो चुका है। सब्ज़ी-भाजी अथवा दैनिक किराना में पांच सौ का नोट आसानी से तुड़वाया जा सकता है। ऐसी स्थिति में अचानक हज़ार और पांच सौ के नोट बंद कर दिए जाने से आमजनता का परेशान होना स्वाभाविक है। फिर जितनी शीघ्रता में और कम समय देते हुए नोट-बंदी का यह क़दम उठाया गया उससे देश-दुनिया सभी को हत्प्रभ होना ही था।
निःसंदेह नोट-बंदी का यह ऐतिहासिक कदम कालेधन पर सीधी चोट है लेकिन आमजनता कालेधन और इस नोटबंदी के बीच जिस तरह पिस गई है, वह भी इतिहास के पन्नों में दर्ज़ हो कर रहेगा। इतिहास के पन्नों में दर्ज़ तो आमजनता का वह धैर्य भी होगा जिसका प्रदर्शन उसने इस आर्थिक विपत्ति के समय किया है।

Charcha Plus Column of Dr Sharad Singh in "Sagar Dinkar" Daily News Paper

कालेधन के विरुद्ध कानून

राजग सरकार ने विदेशों में जमा कालेधन को देश में लाने और देश के भीतर कालाधन पैदा न हो इस मकसद की भरपाई के लिए कारगर कानूनी उपाय किए पिछले साल दो कानून बनाकर किए थे। इसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ‘मन की बात‘ कार्यक्रम में कालेधन के कुबेरों को चेतावनी दी थी कि 30 सितंबर तक यदि कालाधन घोषित नहीं किया गया तो कठोर कार्यवाही की जाएगी। इस चेतावनी का भी कोई विशेष असर नहीं हुआ। मोदी सरकार ने इस नाते एक तो ‘कालाधन अघोषित विदेशी आय एवं जायदाद और आस्ति विधेयक-2015‘ को संसद के दोनों सदनों से पारित कराया था। दूसरे देश के भीतर कालाधन उत्सर्जित न हो,इस हेतु ‘बेनामी लेनदेन; निषेध विधेयक को मंत्रीमण्डल ने मंजूरी दी थी। इस विधेयक में विदेश में काला धन छिपाने वालों को दस साल तक की सजा और नब्बे फीसद का जुर्माना लगाने का प्रावधान है। इसके पहले वर्ष 1997 में तत्कालीन संयुक्त मोर्चा सरकार ने काले धन का खुलासा करने के लिए इस तरह की योजना चलाई थी। उसके बाद से अब तक कई बार इस बारे में विचार किया गया, लेकिन राजनीतिक वजहों से लागू नहीं किया गया। वहीं नए कानून के तहत कर चोरी के मामलों को भी धनशोधन (मनी लांड्रिंग) निरोधक कानून, 2002 के तहत अपराध माना जा सकेगा। यानी कर चोरी के मामलों में मनी लांड्रिंग निरोधक कानून के तहत कार्रवाई की जा सकेगी। उल्लेखनीय है कि भारत ने वैश्विक स्तर पर समयबद्ध रूप में कर संबंधी सूचनाओं के स्वतः आदान-प्रदान की वकालत की है, जिस पर जी-20 देशों ने भी सहमति जताई है। विभिन्न देश एक साझा रिपोर्टिंग स्टैंडर्ड 2017-18 द्वारा कर संबंधी सूचनाओं का आपस में आदान-प्रदान करेंगे। यद्यपि विदेशी बैंकों में भारत का कितना काला धन जमा है, इस बात के अभी तक कोई आधिकारिक आंकड़े सरकार के पास मौजूद नहीं हैं, लेकिन अनुमान के मुताबिक यह 466 अरब डॉलर से लेकर 1400 अरब डॉलर हो सकता है।
ये दोनों विधेयक इसलिए एक दूसरे के पूरक माने जा रहे थे, क्योंकि एक तो आय से अधिक काली कमाई देश में पैदा करने के स्रोत उपलब्ध हैं, दूसरे इस कमाई को सुरक्षित रखने की सुविधा विदेशी बैंकों में हासिल है। दोनों कानून एक साथ अस्तित्व में आने से यह आशा बंधी थी कि कालेधन पर लगाम लग जाएगी। किन्तु ऐसा लगता है कि सरकार अब समझ चुकी थी कि कालेधन के विरुद्ध लाए गए कानून र्प्याप्त कारगर साबित नहीं हो रहे हैं। इसीलिए ऐसा निर्णयक क़दम उठाना पड़ा।

परेशानियों का सिलसिला

इसमें कोई संदेह नहीं कि बड़े नोटों को बंद करने के पीछे उद्देश्य अच्छा है लेकिन आमजनता की परेशानी का हिसाब कौन देगा? आमजन अपनी पॉकेट-बचत में पांच सौ या हज़ार के नोट रख कर निश्चिन्तता का अनुभव करता रहा है। पांच सौ से छोटे नोट रोजमर्रा के खर्च में आते-जाते रहे हैं। ऐसी स्थिति में जब आमजन को अपने पास रखे पांच सौ और हज़ार के नोट बैंकों में जमा कराने पड़े और बदले में उसे नए नोट अथवा छोटे नोट मिलना कठिन हो गया तो संकट बढ़ना ही था। दिहाड़ी मज़दूरों पर सबसे अधिक गाज गिरी। दैनिक भुगतान वाले काम जिनमें छोटे नोटों का उपयोग अधिक होता है, लगभग थम-सा गया। क्योंकि बैंकों से रुपया निकलवाना टेढ़ी खीर जो बन गया। सुबह से शाम तक और शाम से रात तक एटीएम तथा बैंकों के दरवाज़ों पर लम्बी-लम्बी कतारों में लग कर भी असफलता हाथ लगने हताश हैं। जिनके लिए हताशा चरमसीमा पर पहुंच गई उनमें से कुछ तो दिल के दौरे के शिकार हो गए।
500 और 1000 रुपये का नोट बंद करने के फैसले ने देश में ही नहीं, बल्कि पूरे विश्र्व की अर्थव्यवस्था को हिलाकर रख दिया है। कई देशों की अर्थव्यवस्था भारत के अंदर चलने वाले कारोबार पर निर्भर है। बड़े नोट की बंदी से कम से कम तीन माह के लिए पूरे देश का कारोबार बंद हो गया है। इसने दुबई तक हड़कंप मचा कर रख दिया है। चूंकि दुबई में 70 फीसद भारतीय हैं, जो नौकरी और कारोबार से जुड़े हैं और वहां पर प्रॉपर्टी तक खरीद रहे हैं। ऐसे में प्रधानमंत्री के इस फैसले के बाद दुबई में प्रॉपर्टी के दाम धड़ाम होने की आशंका प्रबल हो गई है। फ्यूचर च्वॉइस ग्रुप के सीएमडी पीयूष कुमार द्विवेदी ने बताया, “वैसे तो कारोबार की हालत देश में अभी बहुत खराब है। तीन माह तक सुधरने के आसार नहीं दिख रहे है लेकिन विश्र्व भर के उद्यमियों की आंख भारत पर टिकी है। वह यह देख रहे है कि आगे क्या होने वाला है। यदि भारत की बैंक में मुद्रा भंडारण होता है तो स्वाभाविक ही डॉलर की कीमत में गिरावट दर्ज होगी। विश्व में बड़ा उलट फेर होगा।“
भारत में 500 और 1000 रुपये के नोट वापस लेने की वजह से नेपाल में भी अफ़रा-तफ़री का माहौल है। नेपाल के सीमावर्ती इलाकों में ’नोट बंदी’ का असर साफ़ देखा जा सकता है। भारत और नेपाल की सीमा खुली है और नेपाल के कई इलाकों में भारतीय रुपये का धड़ल्ले से इस्तेमाल होता है, इस वजह से भारत के फ़ैसले का असर नेपाल के इलाक़ों में भी देखने को मिल रहा है। इस फ़ैसले का असर नेपाल राष्ट्र बैंक के उस आदेश के बाद और भी बढ़ गया है, जिसमें कहा गया है कि वित्तीय संस्थानों, मनी एक्सचेंज काउंटर और अन्य एजेंसियों में इन नोटों को तत्काल रोक दिया जाए। नेपाल राष्ट्र बैंक ने भारतीय रिज़र्व बैंक को इस मामले में पत्र लिखकर मैत्रीपूर्ण समाधान निकालने की मांग की है। भारत की तरफ से अचानक लिए गए इस फैसले से नेपाल के कारोबारी बुरी तरह से प्रभावित हुए हैं।

सियासत के रंग

नोटबंदी के बड़े कदम पर सियासत न हो, ऐसा हो ही नहीं सकता। लोकतंत्र में यह स्वाभाविक भी है। उत्तर प्रदेश में होने वाले आगामी चुनाव ने भी माहौल गर्मा रखा है। यद्यपि नोटबंदी की घोषणा के तत्काल बाद सोशल मीडिया पर कोई बड़ा बयान सामने नहीं आया लेकिन दो दिन का समय बीतने पर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने चुप्पी तोड़ी। फिर मुलायम सिंह, मायावती और उद्धव ठाकरे ने नोटबंदी से होनेवाली परेशानियों की ओर ध्यान खींचते हुए बयान दिए। इस बीच राहुल गांधी ने जनता के कष्टों में उनके साथ होने के सांकेतिक कदम के तौर पर कतार में लग कर चार हज़ार रूपए बदलवाए। इसके बाद प्रधानमंत्री की लगभग 97 वर्षीया माताजी ने भी साढ़े चार हज़ार रुपए बदलवाने के लिए बैंक तक का सफर किया। चाहे दल कोई भी हो, नोटबंदी के इस कदम का समर्थन सभी ने किया है लेकिन इससे आम जनता को जो कष्ट उठाना पड़ रहा है, उसने विरोधियों को भी भरपूर अवसर प्रदान कर दिया है। अब तो यहां तक कहा जाने लगा है कि यदि 2017 के चुनाव से पहले इसका कोई सकारात्मक नतीजा देखने को नहीं मिला तो खेल बदल भी सकता है। वैसे भारतीय सदैव आशावादी रहे हैं अतः आमजन को यही उम्मीद रखनी चाहिए कि उनके कष्ट झेलने के परिणामस्वरूप भारतीय अर्थव्यवस्था मजबूत हो सकेगी।
              --------------------------    

सब्र, सियासत और कालाधन

मेरा कॉलम #चर्चा_प्लस "दैनिक सागर दिनकर" में (16. 11. 2016) .....

My Column #Charcha_Plus in "Sagar Dinkar" news paper

 
सब्र, सियासत और कालाधन 
- डॉ. शरद सिंह 
दुनिया की नज़र भारत पर उस घड़ी से टिकी हुई है जिस घड़ी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पुराने पांच सौ और हज़ार के नोट बंद किए जाने की घोषणा की। कोई और देश होता तो शायद आमजनता सड़कों पर निकल आती और आपदा गहरा जाती। लेकिन भारत की जनता ने बड़े से बड़े संकट में धैर्य का परिचय दिया है और एक बार फिर अपनी इसी खूबी को दुनिया के सामने रख दिया है। सब्र, सियासत और काले धन के त्रिकोण के बीच खड़ी आमजनता प्रतिदिन एक मिसाल बनती जा रही है।   

यह पहली बार नहीं है जब देश में बड़े नोटों को वापस लिया गया हो और फिर बाज़ार में नए सिरे से हजार, पांच हजार और दस हजार के रुपए लाए गए हों। सन् 1946 में भी हज़ार रुपए और 10 हज़ार रुपए के नोट वापस लिए गए थे। सन् 1954 में हज़ार, पांच हज़ार और दस हज़ार रुपए के नोट वापस लाए गए। उसके बाद जनवरी 1978 में इन्हें फिर बंद कर दिया गया। 16 जनवरी 1978 को एक अध्यादेश जारी कर हज़ार, पांच हज़ार और 10 हज़ार के नोट वापस लेने का फ़ैसला लिया गया था। लेकिन उन दिनों आमआदमी की घर की बचत में अथवा रोजमर्रा की जरूरतों में बड़े नोट आज की तरह शामिल नहीं थे। इसलिए आमजनता पर इसका प्रतिकूल असर नहीं पड़ा था। आज मंहगाई के चलते पांच सौ रुपए दैनिक उपभोग के खर्च में शामिल हो चुका है। सब्ज़ी-भाजी अथवा दैनिक किराना में पांच सौ का नोट आसानी से तुड़वाया जा सकता है। ऐसी स्थिति में अचानक हज़ार और पांच सौ के नोट बंद कर दिए जाने से आमजनता का परेशान होना स्वाभाविक है। फिर जितनी शीघ्रता में और कम समय देते हुए नोट-बंदी का यह क़दम उठाया गया उससे देश-दुनिया सभी को हत्प्रभ होना ही था।
निःसंदेह नोट-बंदी का यह ऐतिहासिक कदम कालेधन पर सीधी चोट है लेकिन आमजनता कालेधन और इस नोटबंदी के बीच जिस तरह पिस गई है, वह भी इतिहास के पन्नों में दर्ज़ हो कर रहेगा। इतिहास के पन्नों में दर्ज़ तो आमजनता का वह धैर्य भी होगा जिसका प्रदर्शन उसने इस आर्थिक विपत्ति के समय किया है।

Charcha Plus Column of Dr Sharad Singh in "Sagar Dinkar" Daily News Paper

कालेधन के विरुद्ध कानून

राजग सरकार ने विदेशों में जमा कालेधन को देश में लाने और देश के भीतर कालाधन पैदा न हो इस मकसद की भरपाई के लिए कारगर कानूनी उपाय किए पिछले साल दो कानून बनाकर किए थे। इसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ‘मन की बात‘ कार्यक्रम में कालेधन के कुबेरों को चेतावनी दी थी कि 30 सितंबर तक यदि कालाधन घोषित नहीं किया गया तो कठोर कार्यवाही की जाएगी। इस चेतावनी का भी कोई विशेष असर नहीं हुआ। मोदी सरकार ने इस नाते एक तो ‘कालाधन अघोषित विदेशी आय एवं जायदाद और आस्ति विधेयक-2015‘ को संसद के दोनों सदनों से पारित कराया था। दूसरे देश के भीतर कालाधन उत्सर्जित न हो,इस हेतु ‘बेनामी लेनदेन; निषेध विधेयक को मंत्रीमण्डल ने मंजूरी दी थी। इस विधेयक में विदेश में काला धन छिपाने वालों को दस साल तक की सजा और नब्बे फीसद का जुर्माना लगाने का प्रावधान है। इसके पहले वर्ष 1997 में तत्कालीन संयुक्त मोर्चा सरकार ने काले धन का खुलासा करने के लिए इस तरह की योजना चलाई थी। उसके बाद से अब तक कई बार इस बारे में विचार किया गया, लेकिन राजनीतिक वजहों से लागू नहीं किया गया। वहीं नए कानून के तहत कर चोरी के मामलों को भी धनशोधन (मनी लांड्रिंग) निरोधक कानून, 2002 के तहत अपराध माना जा सकेगा। यानी कर चोरी के मामलों में मनी लांड्रिंग निरोधक कानून के तहत कार्रवाई की जा सकेगी। उल्लेखनीय है कि भारत ने वैश्विक स्तर पर समयबद्ध रूप में कर संबंधी सूचनाओं के स्वतः आदान-प्रदान की वकालत की है, जिस पर जी-20 देशों ने भी सहमति जताई है। विभिन्न देश एक साझा रिपोर्टिंग स्टैंडर्ड 2017-18 द्वारा कर संबंधी सूचनाओं का आपस में आदान-प्रदान करेंगे। यद्यपि विदेशी बैंकों में भारत का कितना काला धन जमा है, इस बात के अभी तक कोई आधिकारिक आंकड़े सरकार के पास मौजूद नहीं हैं, लेकिन अनुमान के मुताबिक यह 466 अरब डॉलर से लेकर 1400 अरब डॉलर हो सकता है।
ये दोनों विधेयक इसलिए एक दूसरे के पूरक माने जा रहे थे, क्योंकि एक तो आय से अधिक काली कमाई देश में पैदा करने के स्रोत उपलब्ध हैं, दूसरे इस कमाई को सुरक्षित रखने की सुविधा विदेशी बैंकों में हासिल है। दोनों कानून एक साथ अस्तित्व में आने से यह आशा बंधी थी कि कालेधन पर लगाम लग जाएगी। किन्तु ऐसा लगता है कि सरकार अब समझ चुकी थी कि कालेधन के विरुद्ध लाए गए कानून र्प्याप्त कारगर साबित नहीं हो रहे हैं। इसीलिए ऐसा निर्णयक क़दम उठाना पड़ा।

परेशानियों का सिलसिला

इसमें कोई संदेह नहीं कि बड़े नोटों को बंद करने के पीछे उद्देश्य अच्छा है लेकिन आमजनता की परेशानी का हिसाब कौन देगा? आमजन अपनी पॉकेट-बचत में पांच सौ या हज़ार के नोट रख कर निश्चिन्तता का अनुभव करता रहा है। पांच सौ से छोटे नोट रोजमर्रा के खर्च में आते-जाते रहे हैं। ऐसी स्थिति में जब आमजन को अपने पास रखे पांच सौ और हज़ार के नोट बैंकों में जमा कराने पड़े और बदले में उसे नए नोट अथवा छोटे नोट मिलना कठिन हो गया तो संकट बढ़ना ही था। दिहाड़ी मज़दूरों पर सबसे अधिक गाज गिरी। दैनिक भुगतान वाले काम जिनमें छोटे नोटों का उपयोग अधिक होता है, लगभग थम-सा गया। क्योंकि बैंकों से रुपया निकलवाना टेढ़ी खीर जो बन गया। सुबह से शाम तक और शाम से रात तक एटीएम तथा बैंकों के दरवाज़ों पर लम्बी-लम्बी कतारों में लग कर भी असफलता हाथ लगने हताश हैं। जिनके लिए हताशा चरमसीमा पर पहुंच गई उनमें से कुछ तो दिल के दौरे के शिकार हो गए।
500 और 1000 रुपये का नोट बंद करने के फैसले ने देश में ही नहीं, बल्कि पूरे विश्र्व की अर्थव्यवस्था को हिलाकर रख दिया है। कई देशों की अर्थव्यवस्था भारत के अंदर चलने वाले कारोबार पर निर्भर है। बड़े नोट की बंदी से कम से कम तीन माह के लिए पूरे देश का कारोबार बंद हो गया है। इसने दुबई तक हड़कंप मचा कर रख दिया है। चूंकि दुबई में 70 फीसद भारतीय हैं, जो नौकरी और कारोबार से जुड़े हैं और वहां पर प्रॉपर्टी तक खरीद रहे हैं। ऐसे में प्रधानमंत्री के इस फैसले के बाद दुबई में प्रॉपर्टी के दाम धड़ाम होने की आशंका प्रबल हो गई है। फ्यूचर च्वॉइस ग्रुप के सीएमडी पीयूष कुमार द्विवेदी ने बताया, “वैसे तो कारोबार की हालत देश में अभी बहुत खराब है। तीन माह तक सुधरने के आसार नहीं दिख रहे है लेकिन विश्र्व भर के उद्यमियों की आंख भारत पर टिकी है। वह यह देख रहे है कि आगे क्या होने वाला है। यदि भारत की बैंक में मुद्रा भंडारण होता है तो स्वाभाविक ही डॉलर की कीमत में गिरावट दर्ज होगी। विश्व में बड़ा उलट फेर होगा।“
भारत में 500 और 1000 रुपये के नोट वापस लेने की वजह से नेपाल में भी अफ़रा-तफ़री का माहौल है। नेपाल के सीमावर्ती इलाकों में ’नोट बंदी’ का असर साफ़ देखा जा सकता है। भारत और नेपाल की सीमा खुली है और नेपाल के कई इलाकों में भारतीय रुपये का धड़ल्ले से इस्तेमाल होता है, इस वजह से भारत के फ़ैसले का असर नेपाल के इलाक़ों में भी देखने को मिल रहा है। इस फ़ैसले का असर नेपाल राष्ट्र बैंक के उस आदेश के बाद और भी बढ़ गया है, जिसमें कहा गया है कि वित्तीय संस्थानों, मनी एक्सचेंज काउंटर और अन्य एजेंसियों में इन नोटों को तत्काल रोक दिया जाए। नेपाल राष्ट्र बैंक ने भारतीय रिज़र्व बैंक को इस मामले में पत्र लिखकर मैत्रीपूर्ण समाधान निकालने की मांग की है। भारत की तरफ से अचानक लिए गए इस फैसले से नेपाल के कारोबारी बुरी तरह से प्रभावित हुए हैं।

सियासत के रंग

नोटबंदी के बड़े कदम पर सियासत न हो, ऐसा हो ही नहीं सकता। लोकतंत्र में यह स्वाभाविक भी है। उत्तर प्रदेश में होने वाले आगामी चुनाव ने भी माहौल गर्मा रखा है। यद्यपि नोटबंदी की घोषणा के तत्काल बाद सोशल मीडिया पर कोई बड़ा बयान सामने नहीं आया लेकिन दो दिन का समय बीतने पर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने चुप्पी तोड़ी। फिर मुलायम सिंह, मायावती और उद्धव ठाकरे ने नोटबंदी से होनेवाली परेशानियों की ओर ध्यान खींचते हुए बयान दिए। इस बीच राहुल गांधी ने जनता के कष्टों में उनके साथ होने के सांकेतिक कदम के तौर पर कतार में लग कर चार हज़ार रूपए बदलवाए। इसके बाद प्रधानमंत्री की लगभग 97 वर्षीया माताजी ने भी साढ़े चार हज़ार रुपए बदलवाने के लिए बैंक तक का सफर किया। चाहे दल कोई भी हो, नोटबंदी के इस कदम का समर्थन सभी ने किया है लेकिन इससे आम जनता को जो कष्ट उठाना पड़ रहा है, उसने विरोधियों को भी भरपूर अवसर प्रदान कर दिया है। अब तो यहां तक कहा जाने लगा है कि यदि 2017 के चुनाव से पहले इसका कोई सकारात्मक नतीजा देखने को नहीं मिला तो खेल बदल भी सकता है। वैसे भारतीय सदैव आशावादी रहे हैं अतः आमजन को यही उम्मीद रखनी चाहिए कि उनके कष्ट झेलने के परिणामस्वरूप भारतीय अर्थव्यवस्था मजबूत हो सकेगी।
              --------------------------    

Wednesday, November 9, 2016

वायु प्रदूषण की दिल्ली अब दूर नहीं है

Dr Sharad Singh
" वायु प्रदूषण की दिल्ली अब दूर नहीं है " - मेरा कॉलम #चर्चा_प्लस "दैनिक सागर दिनकर" में (09. 11. 2016) .....

My Column #Charcha_Plus in "Sagar Dinkar" news paper

 

वायु प्रदूषण की दिल्ली अब दूर नहीं है
- डॉ. शरद सिंह 


दिल्ली में पिछले 17 वर्षों की सबसे खतरनाक धुंध को देखते हुए पूरे देश में चिन्ता के बादल छा गए। राष्ट्रीय राजधानी में वायु प्रदूषण से निपटने के लिए समय रहते रक्षात्मक कदम न उठाने के लिए राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने दिल्ली सरकार को फटकार लगाई। एनजीटी ने पानी के छिड़काव के लिए हेलीकॉप्टरों के इस्तेमाल तक के लिए कहा। जो दशा आज हम दिल्ली और उसके आस-पास के क्षेत्रों में देख रहे हैं, वह देश के किसी भी हिस्से में कल दिखाई देने लगे तो आश्चर्य नहीं होगा। यह भयावह स्थिति किसी एक दिन में नहीं बनी। दिवाली के पटाखों या खेत के धुंए ने तो बस आखिरी बूंद का काम किया है।

यूं तो प्राकृतिक एवं मानवीय कारणों से वायु के दूषित होने की प्रक्रिया वायु प्रदूषण कहलाती है। लेकिन वर्तमान दशा बताती है कि मानवीय कारणों ने वायु को प्रदूषित करने में प्रकृति को बहुत पीछे छोड़ दिया है। भारत जैसे विकासशील देश में प्राकृतिक संसाधनों को अनुचित दोहन और कृत्रिम तत्वों के अधिकतम प्रयोग ने पर्यावरण को अनुमान से कहीं अधिक नुकसान पहुंचाया है। यदि दिल्ली का ही उदाहरण लें तो जिस समय दिल्ली के मुख्यमंत्री ने गाड़ियों के लिए ऑड-इवेन फार्मूला पहली बार लागू किया था, उस समय उसे भी यह अनुमान नहीं था कि चंद माह बाद दिल्ली में वायु प्रदूषण का स्तर मापने की क्षमता से भी कहीं अधिक पाया जाएगा। शाम होते-होते धुंधलका छा जाना कई वर्षोंं दिल्ली के लिए आम बात रही है। सभी ने इसे लगभग अनदेखा किया। भले ही वायु प्रदूषण के कारण दिल्ली में श्वास रोगियों की संख्या में तेजी से बढ़ोत्तरी हुई। वाशिंगटन विश्वविद्यालय द्वारा 1999 से 2000 के बीच किए एक अध्ययन के अनुसार सूक्ष्म वातावरण, वायु प्रदूषण में रहने वाले मरीजों को फेफडों के संक्रमण का जोखिम अधिक रहता है। वायु में घुल जाने वाले विशिष्ट प्रदूषक एरुगिनोसा या बी-सिपेसिया घातक रोगों के कारण बनते हैं। एक अध्ययन के दौरान पाया गया कि एक हजार में से लगभग 117 मौतें सिर्फ़ वायु प्रदूषण के कारण हुईं। अध्ययन बताते हैं कि शहरी क्षेत्रों में मरीज बलगम की अधिकता, फेफड़ों की क्षमता कम होना और गंभीर खांसी से अधिक पीड़ित रहते हैं।
वर्तमान में विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लू.एच.ओ.) के अनुसार ‘वायु प्रदूषण एक एैसी स्थिति है जिसके अन्तर्गत बाह्य वातावरण में मनुष्य तथा उसके पर्यावरण को हानि पहुचाने वाले तत्व सघन रूप से एकत्रित हो जाते हैं।‘ दूसरे शब्दों में वायु के सामान्य संगठन में मात्रात्मक या गुणातात्मक परिवर्तन, जो जीवन या जीवनोपयोगी अजैविक संघटकों पर दुष्प्रभाव डालता है, वायु प्रदूषण कहलाता है।
हम यह सोच कर तसल्ली नहीं रख सकते हैं कि जो संकट महानगरों में दिखाई दे रहा है वह छोटे शहरां अथवा औद्योगिक दृष्टि से पिछड़े इलाकों में नहीं गहरा सकता है। संकट के कारण अलग हो सकते हैं लेकिन संकट की भयावहता दिल्ली जैसी ही रहेगी।

Charcha Plus Column of Dr Sharad Singh in "Sagar Dinkar" Daily News Paper
सबक नहीं लिया

विश्व में औद्योगिक विकास के बाद कई ऐसी घटनाएं घटीं जिनसे सबक लेते हुए वायु प्रदूषण के नियंत्रण पर गंभीरता सेध्यान दिया जाना चाहिए था। किन्तु अफसोस कि ऐसा नहीं हुआ। अमेरिका में वायु प्रदूषण की सबसे भीषण घटना डोनोरा, पेनसिल्वेनिया में 1948 के अक्टूबर के अन्तिम दिनों में हुई जिसमे 20 लोग मरे गए और 7,000 लोग घायल हो गए थे। इंग्लैंड को अपना सबसे बुरा नुकसान जब हुआ तब 4 दिसम्बर 1952 को लन्दन में भारी धूम कोहरा की घटना हुई। छह दिन में 4000 से अधिक लोग मारे गए और बाद के महीनों के भीतर 8000 और लोगों की मृत्यु हो गई। सन् 1979 में पूर्व सोवियत संघ में स्वर्डर्लोव्स्क के पास एक जैविक युद्ध कारखाने से अन्थ्रेक्स के रिसाव से सैकड़ों लोगों की मृत्यु हो गयी थी। भारत में सबसे भयंकर नागरिक प्रदूषण आपदा 1984 में भोपाल आपदा थी। संयुक्त राज्य अमरीका की यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री कारखाने से रिसने वाली गैस से 2000 से अधिक लोग मारे गए और 150,000 से 600,000 दूसरे लोग घायल हो गए जिनमे से 6,000 लोग बाद में मारे गए। जबकि ये तथ्य किसी से भी छिपे नहीं रहे कि वायु प्रदूषण से होने वाले स्वस्थ्य प्रभाव जैविक रसायन और शारीरिक परिवर्तन से लेकर श्वास में परेशानी, घरघराहट, खांसी और विद्यमान श्वास तथा हृदय की परेशानी हो सकती है। इन प्रभावों का परिणाम दवाओं के उपयोग में वृद्धि होती है, चिकित्सक के पास या आपातकालीन कक्ष में ज्यादा जाना, ज्यादा अस्पताल में भरती होना और असामयिक मृत्यु के रूप में आता है। वायु की ख़राब गुणवत्ता के प्रभाव दूरगामी है परन्तु यह सैद्धांतिक रूप से शरीर की श्वास प्रणाली और हृदय के संचालन को प्रभावित करता है। वायु प्रदुषण की व्यक्तिगत प्रतिक्रिया उस प्रदूषक पर, उसकी मात्रा पर, व्यक्ति के स्वास्थ्य की स्थिति और अनुवांशिकी पर निर्भर करती है जिससे वह व्यक्ति संपर्क में रहता है।

बुंदेलखंड पर भी संकट

हम विश्व के किसी भी हिस्से में ‘शुद्ध वायु’ नहीं प्राप्त कर सकते। भारत में भी 1970 के दशक से ही प्रदूषण के व्यापक प्रभावों के बारे में विशेष अध्ययन किये गये हैं। वर्तमान में सभी महानगरों एवं औद्योगिक केन्द्रों में प्रदूषण मापन के यन्त्र लगाना प्रशासन ने अनिवार्य कर दिया है। देश की कई संस्थायें इस काम में लगी हुई है। इनमें से नागपुर की (राष्ट्रीय पारिस्थितिकी एवं परिवेश शोध संस्थान), प्रमुख विश्वविद्यालयों के पर्यावरण विभाग, भारतीय टेक्नालाजी संस्थान, भाभा आणविक शोध केन्द्र, बम्बई, पर्यावरण नियोजन एवं समन्वयय की राष्ट्रीय समिति, भारत सरकार का केन्द्रीय स्वास्थ्य एवं श्रम मंत्रालय आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। इन सभी कार्यों का परिवेश एवं नियोजन एवं समन्वय की राष्ट्रीय समिति से समन्वित कर उनके आधार पर विभिन्न प्रकार के नियम व कानून बनाने की एवं विशेष प्रदूषण नियंत्रण व तकनीक व उपकरण काम में लाने या आयात करने की सलाह दी जाती है। लेकिन योजनाओं एवं सरकारी प्रयासों के साथ ही जरूरत है जन जागरूकता की। सरल शब्दों में कहा जाए तो अपनी और अपनी आने वाली पीढ़ी की सांसों को शुद्ध वायु देने के लिए प्रत्येक व्यक्ति को स्वयं जागरूक रहना होगा। जागरूक रहने से आशय है स्वच्छता बनाए रखना और अधि से अधिक पेड़ लगाना। बुंदेलखंड में इन दोनों में गिरावट आई है। नागरिकों में जागरूकता की कमी है और जंगल की अवैध कटाई स्थिति को घातक दशा की ओर धकेल रही है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण पिछले साल पड़ा सूखा है। किसानों को आशानुरूप फसल न मिलने पर आत्महत्या के लिए विवश होना पड़ा। इसके पीछे कर्ज न चुका पाने का कारण तो था ही लेकिन इससे बड़ा कारण था सूखे की मार। जो र्प्यावरण के परिवर्तन के परिणामस्वरूप सामने आया।
बुंदेलखण्ड औद्योगिक दृष्टि से पिछड़ा हुआ है। यहां बड़े कारखानों की कमी है। लेकिन इससे यह सोचना गलत होगा कि यहां वायु प्रदूषण के बढ़ते स्तर का खतरा नहीं है। बुंदेलखंड जैसे क्षेत्रों में जंगलों और नदियों का होना खतरे के आगमन को धीमा तो कर सकता है लेकिन उससे मुक्त नहीं रख सकता है। यहां के शहरों और गांवों में वायु प्रदूषण के सबसे बड़े कारक हैं खुली बजबजाती नालियां, हर दस कदम पर रखा कूचे-कचरे का ढेर और गंदगी का अंबार। इन सबसे निकलती ज़हरीली गैसें स्लोप्वाइजन का काम करती हुई सांसों को प्रभावित कर रही हैं। केन जैसी सहायक नदियों का जल स्तर तेजी से होता जा रहा है। भू-जल के सतर में भी विगत वर्षों में चिन्ताजनक गिरावट आई है। दरअसल चाहे वायु हो या जल, प्रत्येक प्राकृतिक तत्व संतुलन पर निर्भर रहते हैं। यदि र्प्यावरण सृतुलन बिगड़ेगा तो उपयोगी एवं जीवनदायी प्राकृतिक तत्वों की भी कमी होने लगेगी। बुंदेलखंड जैसे क्षेत्र इसलिए भी महत्व रखते हैं कि यदि समय रहते इन क्षेत्रों में पर्यावरण के संतुलन को पुनर्स्थापित कर लिया गया तो शहरी क्षेत्रों को भी ये शुद्ध वायु मुहैया करा सकेंगे। 


संकट की गंभीरता

दुनिया भर के अत्यधिक वायु प्रदूषण वाले शहरों में ऐसी संभावना है कि उनमें रहने वाले बच्चों में कम जन्म दर के अतिरिक्त अस्थमा, निमोनिया और दूसरी श्वास सम्बन्धी परेशानियां विकसित हो सकती हैं। युवाओं के स्वास्थ्य के प्रति सुरक्षा उपायों को सुनिश्चित करने के लिए नई दिल्ली जैसे शहरों में बसें अब संपीडित प्राकृतिक गैस का उपयोग प्रारंभ किया गया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा किए गए अनुसंधान बताते हैं कि कम आर्थिक संसाधन वाले देशों में जहां सूक्ष्म तत्वों की मात्रा बहुत ज्यादा है, बहुत ज्यादा गरीबी है और जनसंख्या की उच्च दर है। इन देशों के उदाहरण में शामिल हैं मिस्र, सूडान, मंगोलिया और इंडोनेशिया.स्वच्छ वायु अधिनियम 1970 में पारित किया गया था, लेकिन 2002 में कम से कम 146 मिलियन अमेरिकी ऐसे क्षेत्रों में रहते थे जो 1997 के राष्ट्रीय परिवेश वायु गुणवत्ता मानकों में से एक “प्रदूषक मानदंड“ को भी पूरा नहीं करते थे। उन प्रदूषकों में शामिल हैं, ओज़ोन, सूक्ष्म तत्व, सल्फर डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन डाइऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड और सीसा क्योंकि बच्चे ज्यादातर समय घर से बाहर व्यतीत करते हैं इसलिए वे वायु प्रदूषण के खतरों के प्रति अधिक संवेदनशील है। यह याद रखना जरूरी है कि विश्व में हर सातवां बच्चा वायु प्रदूषण से प्रभावित है।
इस बात को समझना ही होगा कि यदि अब भी स्थितियों की गंभीरता को सिर्फ़ राजनीति के चौसर या बयानबाजी पर उछालना नहीं छोड़ा तो चाहे बुंदेलखंड हो या टिहरी-गढ़वाल हो, वायु प्रदूषण के मामले में अब दिल्ली दूर नहीं है। वह दिन जल्दी ही आ जाएगा जब हर शहर, हर गांव धुंधलके से ढंक जाएगा और लगभग प्रत्येक नागरिक श्वास के गंभीर रोगों से जूझता नज़र आएगा।
----------------------

Wednesday, November 2, 2016

चर्चा प्लस ... आगे बढ़ रहा है मध्यप्रदेश .... डाॅ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
मेरा कॉलम 'चर्चा प्लस' "दैनिक सागर दिनकर" में (02. 11. 2016) .....
My Column 'Charcha Plus' in "Sagar Dinkar" news paper

आगे बढ़ रहा है मध्यप्रदेश
- डॉ. शरद सिंह 

यह सच है कि कठिनाइयों का पहाड़ सामने है। यह भी सच है कि विकास की गति अपेक्षाकृत धीमी है लेकिन यह उल्लेखनीय है कि विकास के पहिए निरंतर गतिमान हैं। इसमें कोई संदेह नहीं है कि ‘बीमारू प्रदेश’ कहा जाने वाला मध्यप्रदेश तेजी से विकास कर रहा है। दरअसल, विकास वह लम्बी प्रक्रिया है जिसका परिणाम तत्काल दिखाई नहीं देता है और जिसमें त्वरित जैसा कुछ नहीं होता है। यह एक या दो दिन में होने वाली घटना नहीं वरन् कुछ वर्षों में दिखाई पड़ने वाला परिवर्तन है और मध्यप्रदेश इसी परिवर्तन के दौर से गुज़र रहा है, आगे बढ़ रहा है।

मध्यप्रदेश ऐतिहासिक दृष्टि से एक समृद्ध राज्य है। प्रथम बार मध्यप्रदेश ने 1 नवम्बर 1956 में आकार लिया था। दूसरी बार 1 नवम्बर 2000 को छत्तीसगढ़ राज्य के निर्माण के साथ ही इसका आकार बदल गया। किन्तु इसकी प्राचीनता और पुरातात्विक वैभव इसकी गरिमा का एक अलग ही इतिहास लिख चुके हैं। मध्यप्रदेश समूचे देश में पुराचित्रकला, प्राचीन गुफाओं और प्राचीन अवशेषों के के संदर्भ में सबसे समृद्व राज्य है। और यह सम्पदा राज्य के सीहोर, भोपाल, रायसेन, होशंगाबाद और सागर जिलों में मौजूद है। मध्यप्रदेश में सांची को विश्वप्रसिध्द स्तूप हैं। इन स्तूपों का निर्माण ईसा से 300 वर्ष पूर्व से लेकर ईसा के बाद 12वीं शताब्दी के बीच किया गया था। 16वीं एवं 17वीं शताब्दी में बुन्देला राजाओं ने ओरछा में मध्यकालीन वास्तुकला के अभूतपूर्व निर्माण करवाये। चंदेल कला के अनुपम उदाहरण खजुराहो के मंदिर प्रदेश की स्थापत्य एवं मूर्तिकला की सम्पन्नता की निशानी हैं।
 
Charcha Plus Column of Dr Sharad Singh in "Sagar Dinkar" Daily News Paper
इतिहास के आइने में 

प्रागैतिहासिक काल पत्थर युग से शुरू होता है, जिसके गवाह भीमबेटका, आदमगढ, जावरा, रायसेन, पचमढ़ी जैसे स्थान है। हालांकि राजवंशीय इतिहास, महान बौद्ध सम्राट अशोक के समय के साथ शुरू होता है, जिसका मौर्य साम्राज्य मालवा और अवंती में शक्तिशाली था। कहा जाता है कि राजा अशोक की पत्नी विदिशा से थी, जो आज के भोपाल की उत्तर में स्थित एक शहर था। सम्राट अशोक की मृत्यु के बाद मौर्य साम्राज्य का पतन हुआ और ई. पू. तीन से पहली सदी के दौरान मध्य भारत की सत्ता के लिए शुंग, कुशान, सातवाहन और स्थानीय राजवंशों के बीच संघर्ष हुआ। ई. पू. पहली शताब्दी में उज्जैन प्रमुख वाणिज्यिक केंद्र था। गुप्ता साम्राज्य के दौरान चौथी से छठी शताब्दी में यह क्षेत्र उत्तरी भारत का हिस्सा बन गया, जो श्रेष्ठ युग के रूप में जाना जाता है। हूणों के हमले के बाद गुप्त साम्राज्य का पतन हुआ और उसका छोटे राज्यों में विघटन हो गया। हालांकि, मालवा के राजा यशोधर्मन ने ई. सन 528 में हूणों को पराजित करते हुए उनका विस्तार समाप्त कर दिया। मध्ययुगीन राजपूत काल में 950 से 1060 ई.सन के दौरान बुंदेलखंड में चंदेलों का प्रभुत्व रहा। चंदेलों ने न केवल सुव्यवस्थित शासन दिया बल्कि कलाजगत को अत्यंत कलात्मक मंदिर प्रदान किए। भोपाल शहर को नाम देनेवाले परमार राजा भोज ने इंदौर और धार पर राज किया। गोंडवना और महाकौशल में गोंड राजसत्ता का उदय हुआ। 13 वीं सदी में, दिल्ली सल्तनत ने उत्तरी मध्यप्रदेश को हासील किया था, जो 14 वीं सदी में ग्वालियर की तोमर और मालवा की मुस्लिम सल्तनत जैसे क्षेत्रीय राज्यों के उभरने के बाद ढह गई।
1156-1605 अवधि के दौरान, वर्तमान मध्यप्रदेश का संपूर्ण क्षेत्र मुगल साम्राज्य के अंतर्गत आया, जबकि गोंडवाना और महाकौशल, मुगल वर्चस्व वाले गोंड नियंत्रण के अंतर्गत बने रहे। सन् 1707 में औरंगजेब की मृत्यु के बाद मुगल नियंत्रण कमजोर हो गया, जिसके परिणाम स्वरूप मराठों ने विस्तार करना शुरू किया और 1720-1760 के बीच उन्होने मध्यप्रदेश के सबसे अधिक हिस्से पर नियंत्रण स्थापित कर लिया। इंदौर में बसे अधिकतर मालवा पर होलकर ने शासन किया, ग्वालियर पर सिंधिया ने तथा नागपुर द्वारा नियंत्रित महाकौशल, गोंडवाना और महाराष्ट्र में विदर्भ पर भोसले ने शासन किया। इसी समय मुस्लिम राजवंश के अफगान जनरल दोस्त मोहम्मद खान के वंशज भोपाल के शासक थे। कुछ ही समय में ब्रिटिश कंपनी ने बंगाल, बंबई और मद्रास जैसे अपने गढ़ों से अधिराज्य का विस्तार किया। मध्यप्रदेश के इंदौर, भोपाल, नागपुर, रीवा जैसे बड़े राज्यों सहित अधिकांश छोटे राज्य ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन आ गए। 1853 में ब्रिटिशो ने नागपुर के राज्य पर कब्जा कर लिया, जिसमे दक्षिण-पूर्वी मध्यप्रदेश, पूर्वी महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ शामिल था। उत्तरी मध्यप्रदेश के राजसी राज्य सेंट्रल इंडिया एजेंसी द्वारा संचालित किए जाते थे।
1947 में भारत की आजादी के बाद, 26 जनवरी, 1950 के दिन भारतीय गणराज्य के गठन के साथ सैकड़ों रियासतों का संघ में विलय किया गया था। 1950 में पूर्व ब्रिटिश केंद्रीय प्रांत और बरार, मकाराई के राजसी राज्य और छत्तीसगढ़ मिलाकर मध्यप्रदेश का निर्माण हुआ तथा नागपुर को राजधानी बनाया गया। सेंट्रल इंडिया एजेंसी द्वारा मध्य भारत, विंध्य प्रदेश और भोपाल जैसे नए राज्यों का गठन किया गया। राज्यों के पुनर्गठन के परिणाम स्वरूप 1956 में, मध्य भारत, विंध्य प्रदेश और भोपाल राज्यों को मध्यप्रदेश में विलीन कर दिया गया, तत्कालीन सी.पी. और बरार के कुछ जिलों को महाराष्ट्र में स्थानांतरित कर दिया गया तथा राजस्थान, गुजरात और उत्तर प्रदेश में मामूली समायोजन किए गए। फिर भोपाल राज्य की नई राजधानी बन गया। शुरू में राज्य के 43 जिले थे। इसके बाद, वर्ष 1972 में दो बड़े जिलों का बंटवारा किया गया, सीहोर से भोपाल और दुर्ग से राजनांदगांव अलग किया गया। तब जिलों की कुल संख्या 45 हो गई। वर्ष 1998 में, बड़े जिलों से 16 अधिक जिले बनाए गए और जिलों की संख्या 61 बन गई। इसके बाद 1 नवम्बर 1956 को मध्यप्रांत की रियासतों - राज्यों को मिलाकर मध्यप्रदेश का निर्माण किया गया।
मध्यप्रदेश के भू-भाग ने प्रगैतिहासिक एवं ऐतिहासिक दोनों दृष्टि से अपने महत्व को संजोया है। भीमबैठका, आबचंद तथा उदय गिरि की गुफाएं प्रगैतिहासिक महत्व के साक्ष्य रखती हैं जबकि खजुराहो, कुंडलपुर, ताजुल मसाज़िद, मांडू का किला, सागर विश्वविद्यालय जैसे स्थल पुरातन से नूतन की समृद्धि को दर्शाते हैं।

विकास की गति

यह सच है कि कठिनाइयों का पहाड़ सामने है। यह भी सच है कि विकास की गति अपेक्षाकृत धीमी है लेकिन यह उल्लेखनीय है कि विकास के पहिए निरंतर गतिमान हैं। इसमें कोई संदेह नहीं है कि ‘बीमारू प्रदेश’ कहा जाने वाला मध्यप्रदेश आगे बढ़ रहा है, विकास कर रहा है। दरअसल, विकास वह लम्बी प्रक्रिया है जिसका परिणाम तत्काल दिखाई नहीं देता है और जिसमें त्वरित जैसा कुछ नहीं होता है। यह एक या दो दिन में होने वाली घटना नहीं वरन् कुछ वर्षों में दिखाई पड़ने वाला परिवर्तन है और मध्यप्रदेश इसी परिवर्तन के दौर से गुज़र रहा है। ‘बीमारू राज्य’ की छवि से बाहर आने के लिए निरंतर प्रयास किए जा रहे हैं। विकास को हर छोर तक पहुंचाने के लिए पंचायती राज व्यवस्था आरम्भ की गई। राज्य में जल संकट के समाधान के लिये ‘जलाभिषेक’ जैसे जलग्रहण कार्यक्रम शुरू किए गए। वन सम्पदा के सम्बन्ध में संयुक्त वन प्रबंधन, ऊर्जा की जरूरतों को पूरा करने के लिये नर्मदा नदी पर बड़े-बड़े बांध और एशियाई विकास बैंक की शर्तों पर बाजारीकरण, कृषि के क्षेत्र में नकद फसलों का विस्तार भी किया गया। बेशक इस तरह के कदम उठाते समय जोखिम भी उठाया गया लेकिन दृढ़ इच्छाशक्ति ने हमेशा साथ दिया।

कठिनाइयां बनाम हौसले

शून्य से छह वर्ष की आयु के बच्चों में कुपोषण का स्तर आज भी चिंताजनक बना हुआ है। सर्वेक्षणों के अनुसार मध्यप्रदेश में 55 प्रतिशत बच्चे कुपोषण के शिकारं हैं। स्मरण रहे कि सन् 1975 से पोषण के अधिकार की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिये एकीकृत बाल विकास परियोजना शुरू हुई थी जिसका दायित्व था कि प्रदेश में एक भी बच्चा कुपोषित न रहे। किन्तु दुर्भाग्यवश, योजना लागू किए जाने के कई दशक के बाद भी बहुत से बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। प्रदेश में बढ़ता हुआ अपराध दर भी चिन्ताजनक है। विशेष रूप से महिलाओं के विरुद्ध किए जाने वाले अपराध। दहेज, बलात्कार, चैन स्नैचिंग, छेड़खानी आदि की घटनाएं प्रदेश की छवि को भी धूमिल करती हैं। छवि खराब करने वाली बात तो यह भी है कि राज्य में लगभग 49 लाख परिवार गरीबी की रेखा के नीचे रहकर जीवन बिता रहे हैं। प्रदेश में साक्षरता का प्रतिशत सरकारी आंकड़ों से कम है। पेयजल और सड़क जैसी बुनियादी आवश्यकताओं की अभी भी कमी है। प्रशासनिक व्यवस्थाओं में भी सुराख अभी बाकी हैं। फिर भी यह कहना ही होगा कि कई क्षेत्रों में स्थितियां पहले से बेहतर हुई हैं। प्रदेश में खेल-कूद को पर्याप्त बढ़ावा दिया जाता है। बच्चों की शिक्षा तथा गर्भवतियों की स्वास्थ्य-सुरक्षा पर र्प्याप्त ध्यान दिया गया है। स्वच्छता अभियान को भी तत्परता से लागू किया गया है। रहा पुलिस व्यवस्था और सुरक्षा का सवाल तो हाल ही में भोपाल सेंट्रल जेल से फरार हुए आतंकियों को लगभग डेढ़ घंटे में मारगिराने की घटना ने आश्वस्त किया है कि तमाम भूल-चूक के बावजूद पुलिस व्यवस्था में तत्परता शेष है।
उज्जैन में कुंभ के आयोजन की सफलता, खजुराहो में ब्रिक्स की बैठक और विदेशी उद्योगपतियों द्वारा प्रदेश में निवेश की इच्छा जताना मध्यप्रदेश के विकास के लिए शुभसंकेत कहे जा सकते हैं। दरअसल, विकास की गति को तेज करने या बनाए रखने में नागरिकों की भूमिका भी मायने रखती है। उदाहरण के लिए स्वच्छता अभियान तभी सफल हो सकता है जब प्रत्येक नागरिक कचरा सही स्थान पर ही डाले। अतः यदि मध्यप्रदेश आगे बढ़ रहा है तो यह मानना होगा कि शासन, प्रशासन और नागरिकों में धीरे-धीरे तालमेल स्थापित होता जा रहा है।
---------------------