Thursday, April 19, 2018

नोट और वोट के बीच फंसी आमजनता - डॉ. शरद सिंह

मुझे प्रसन्नता है कि ‘दबंग मीडिया’ ने मेरे लेख को प्रमुखता से प्रकाशित किया है।
आभारी हूं 'दबंग मीडिया' की और भाई हेमेन्द्र सिंह चंदेल बगौता की जिन्होंने मेरे इस समसामयिक लेख को और अधिक पाठकों तक पहुंचाया है....
 
नोट और वोट के बीच फंसी आमजनता- डॉ शरद सिंह in Dabang Media

नोट और वोट के बीच फंसी आमजनता ... डॉ. शरद सिंह ... चर्चा प्लस

Dr (Miss) Sharad Singh
चर्चा प्लस
नोट और वोट के बीच फंसी आमजनता
- डॉ. शरद सिंह
नोटबंदी का जख़्म अभी पूरी तरह से भरा नहीं था कि अब 2000 के नोटों का संकट आमजनता को सांसत में डाल रहा है। एक ओर आसन्न चुनाव का शुरू हो चुका घमासान और दूसरी ओर खाली पड़े एटीएम मुंह चिढ़ा रहे हैं। यानी नोट और वोट के बीच फंसे लोग जाएं तो कहां जाएं ? कभी-कभी ऐसा लगता है जैसे आमजनता के धैर्य की परीक्षा का अंतहीन सिलसिला जारी है। 
 
 नोट और वोट के बीच फंसी आमजनता ... डॉ. शरद सिंह ... चर्चा प्लसArticle for Column - Charcha Plus by Dr Sharad Singh in Sagar Dinkar Dainik
वह भी विवाहों के मुहूर्त्त के पूर्व का समय था और लोगों को नोटबंदी का सामना करना पड़ा था। भारत के 500 और 1000 रुपये के नोटों के विमुद्रीकरण, जिसे मीडिया में छोटे रूप में नोटबंदी कहा गया, की घोषणा 8 नवम्बर 2016 को रात आठ बजे भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा अचानक राष्ट्र को किये गए संबोधन के द्वारा की गयी। यह संबोधन टीवी के द्वारा किया गया। इस घोषणा में 8 नवम्बर की आधी रात से देश में 500 और 1000 रुपये के नोटों को खत्म करने का ऐलान किया गया। इसका उद्देश्य केवल काले धन पर नियंत्रण ही नहीं बल्कि जाली नोटों से छुटकारा पाना भी था। इससे पहले भी इसी तरह के उपायों को भारत की स्वतंत्रता के बाद लागू किया गया था ताकि जालसाजी और काले धन पर अंकुश लगाया जा सके। लेकिन यह अदला-बदली की प्रक्रिया थी जिसमें जनता को पर्याप्त समय दिया गया था नोट बदलने के लिए। बल्कि देखा जाए तो इन पूर्व के तमाम विमुद्रीकरण ने सिर्फ़ जमाखोरों को सबक सिखाया था और आमजनता को तो इसका प्रभाव भी महसूस नहीं हुआ था। लेकिन 8 नवम्बर 2016 को बंद किए गए 500 और 1000 रुपए के नोटों ने दिहाड़ी मजदूरों तक की कमर तोड़ दी।
अब अप्रैल 2018 के मध्य में उत्पन्न 2000 रुपयों के नोटों की कमी और एमटीएम में रुपयों की र्प्याप्त उपलब्धता नहीं होने से एक बार फिर अमजनता सशंकित हो उठी है। विवाहों का सबसे बड़ा मुहूर्त्त सिर पर है और लोगों को नोटों की कमी से जूझना पड़ रहा है। हर जगह स्वाईप या डिज़िटल तरीका काम नहीं कर पाता है। छोटे व्यापारियों, मजदूरों और रोजमर्रा की छोटी खरीददारी के लिए फुटकर नोटों से ले कर 2000 तक के नोट की जरूरत पड़ती ही है। बहरहाल, 2000 के नोटों के संकट पर मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के हाल ही में दिए गए बयान से पहले मीनाक्षी लेखी के उस वक्तव्य का उल्लेख करना जरूरी लग रहा है जो उन्होंने नोटबंदी का विरोध करते हुए दिया था- ‘’आम औरत और आदमी, जो लोग अनपढ़ हैं और बैंकिंग सुविधाओं तक जिनकी पहुंच नहीं है ऐसे लोग इस तरह के उपायों से सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे। मुख्य रूप से कुछ समय के अंतराल में स्वयं जनता 2000 के नोट को चलन से बाहर कर देगी, क्योंकि जहां कम मूल्य की वस्तु खरीदनी हो तब दुकानदार आपसे 2000 के नोट नहीं लेगा। परिणाम स्वरूप 2000 के नोट की या तो जमाखोरी होगी अथवा काले धन का ही सृजन करेंगें। सरकार को इस विषय पर प्रारंभिक समय से सचेत रहने की आवश्यकता है।’’
लगता है जैसे मीनाक्षी लेखी का अनुमान सच साबित हो रहा है। इसकी पुष्टि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के वक्तव्य से भी होती है। मध्य प्रदेश के शाजापुर में 16 अप्रैल 2018 को किसानों को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा था, “नोटबंदी से पहले 15 लाख करोड़ रुपए की नकदी चलन में थी। इस प्रक्रिया (नोटबंदी) के बाद यह बढ़कर 16 लाख 50 हजार करोड़ रुपए हो गई, लेकिन बाजार से 2000 का नोट गायब हो रहा है। लेकिन दो-दो हजार के नोट कहां जा रहे हैं, कौन दबाकर रख रहा है, कौन नकदी की कमी पैदा कर रहा है। यह षड्यंत्र है। ऐसा इसलिए किया जा रहा है, ताकि दिक्कतें पैदा हों। सरकार इससे सख्ती से निपटेगी।“ उन्होंने यह भी कहा कि उन्होंने यह मुद्दा केंद्र सरकार के सामने भी उठाया है। उन्होंने इसके पीछे साजिश होने का आरोप लगाया है।
यद्यपि एसबीआई के चेयरमैन का कहना है कि नोटबंदी जैसे हालात नहीं है। उस वक्त पैसा सिस्टम से निकाला गया था, इसलिए परेशानी हुई थी। अभी ऐसी स्थिति नहीं है। एसबीआई के पास पर्याप्त कैश है। यह बात जरूर है कि 2000 के नोट का सर्कुलेशन कम हुआ है। एक वजह यह है कि फसलें आई हैं, किसानों को तेजी से पेमेंट बढ़ा है। जल्दी ही सबकुछ सामान्य हो जाएगा। वैसे पिछले कुछ हफ्ते से गुजरात, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में कैश में कमी बनी हुई थी। 16 अप्रैल 2018 को पूर्वी महाराष्ट्र, बिहार और मध्य प्रदेश से नकदी की कमी की शिकायतें मिलीं। उत्तर प्रदेश, बिहार, तेलंगाना, झारखंड और महाराष्ट्र में नकदी का संकट पैदा हो गया। उधर गुजरात में भी बैंकों में नकदी की किल्लत शुरू हो चुकी है। लगभग 10 दिन पहले यह परेशानी उत्तर गुजरात से शुरू हुई, लेकिन अब पूरे राज्य में इसका असर है। यहां तक कि बैंकों ने नकदी निकालने की सीमा तय कर दी है। ज्यादातर एटीएम में पैसा नहीं है। शादी और किसानों को फसल के भुगतान का वक्त होने की वजह से लोगों को कठिनाई का सामना करना पड़ रहा है। दिल्ली, एनसीआर, भोपाल, पटना, लखनऊ, हैदराबाद और अहमदाबाद समेत देश के कई इलाकों के एटीएम में पैसा नहीं होने की शिकायतें मिलीं। इस बीच, केंद्र सरकार ने स्वीकार किया कि कुछ जगह कैश की कमी है। इसके बाद वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा, “देश में नकदी के हालात की समीक्षा की जा चुकी है। कुल मिलाकर पर्याप्त नकदी चलन में है। बैंकों में पर्याप्त कैश है। कुछ जगहों पर कमी इसलिए हुई, क्योंकि कुछ जगहों पर मांग अचानक बढ़ी। इस पर जल्द ही नियंत्रण पाया जाएगा।“
न्यूज़ ऐजेंसियों के अनुसार रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया ने 2000 रुपए के नोटों की छपाई तीन महीने के लिए बंद कर रखी है। जिससे 500 और 200 से छोटे नोटों को ही प्रचलन में लाया जाए और सभी बैंक अपने ग्राहकों को यही नोट उपलब्ध कराए। सिक्योरिटी प्रिंटिंग एंड मिंटिंग कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड कंपंनी ने भी इस चीज की पुष्टि करते हुए बताया कि आरबीआई ने 2000 नोट को छापने की कोई भी डिमांड नहीं की इसलिए नए 500, 200 और इससे छोटे नोटों को ही छापा जा रहा है। इसका उद्देश्य यह हैं की देशभर में छोटे नोटों का प्रचलन ज्यादा से ज्यादा हो और कालेधन पर लगाम भी लग सके। इस संबंध में यह चर्चा भी जोरो रही है कि रिजर्व बैंक एक बार फिर 2000 रुपये की करेंसी के संचार को धीरे-धीरे कम कर देगी। दूसरी चर्चा यह रही कि 2000 की करेंसी की सुविधा के चलते देश में कालेधन का संचय आसान हो गया है और इसी के चलते बाजार में 2000 की करेंसी का ज्यादा संचार नहीं है।
कारण जो भी हो लेकिन फिलहाल आमजनमा को नोटों की कमी के संकट से एकबार फिर जूझना पड़ रहा है। एक ओर आसन्न चुनावों के लोक-लुभावने वादे हैं तो दूसरी ओर नोटों की कमी का कठोर यथार्थ। ऐसे में आमजनता का अपने भविष्य को ले कर चिंतित होना स्वाभाविक है कि कहीं एक बार फिर किसी प्रकार की बंदी का सामना तो नहीं करना पड़ेगा? यह समय सिर्फ़ विवाह महूर्तों का नहीं है, इस समय किसान अपनी उपज को मंडियों में पहुंचा रहे हैं और उनके खातों में धन पहुंच रहा है लेकिन यदि समय रहते यह धन उनके हाथों में रुपयों के रूप में नहीं आ पाया तो उनके लिए भी संकट खड़ा हो सकता है। स्थानीय छोटे-मोटे कर्जे या मजदूरों को चुकता करने के लिए किसानों को भी नकद राशि की दरकार होती है। एटीएम और बैंक काउंटरों पर नकद की कमी होने की स्थिति में धन होते हुए भी धन की कमी से उनहें जूझना पड़ेगा। यही स्थिति लगभग हर तबके के लोगों की रहेगी।
नोटबंदी का जख़्म अभी पूरी तरह से भरा नहीं है कि अब 2000 के नोटों का संकट आमजनता को उलझन में डाल रहा है। एक ओर आसन्न चुनाव का शुरू हो चुका घमासान और दूसरी ओर खाली पड़े एटीएम यानी नोट और वोट के बीच फंसे लोग जाएं तो कहां जाएं? कभी-कभी ऐसा लगता है जैसे आमजनता के धैर्य की परीक्षा का अंतहीन सिलसिला जारी है। लिहाजा इस परीक्षा का अंत अब सरकार को ही पूरी तत्परता से करना होगा क्योंकि यह उसी के अधिकार क्षेत्र का मामला है। आमजनता सीधे आरबीआई से संवाद नहीं कर सकती है लेकिन सरकार आरबीआई को निर्देश दे सकती है। जहां तक जमाखोरी और कालाबाजारी का प्रश्न है तो इसके लिए भी सरकारी स्तर पर ही कोई ठोस कदम उठाने होंगे, वह भी ऐसे कदम जो जमाखोरों ओर कालाबाजारी करने वालों पर तो अंकुश लगाए किन्तु आमजनता को परेशानी न उठानी पड़े। आखिर कब तक बड़े-बड़े घोटालेबाज अरबों रुपयों का घोटाला कर के देश से बाहर भागते रहेंगे और आमजनता बलि का बकरा बनती रहेगी? इस प्रश्न को ध्यान में रख कर कोई तो ऐसी योजना बनानी ही होगी जिससे बार-बार आमजनता को मुद्रा की कमी और उससे उत्पन्न घबराहट न झेलनी पड़े। यह एक ऐसा मुद्दा है जो चुनावों की दिशा का निर्धारण करने की ताकत रखता है।
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Note Aur Vote Ke Beech Fansi Aamjanta - Charcha Plus by Dr Sharad Singh
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(दैनिक सागर दिनकर, 18.04.2018 )
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Friday, April 13, 2018

Pray for Justice - Dr (Miss) Sharad Singh

Pray for Justice - Dr (Miss) Sharad Singh
Let's #Pray For #Asifa ....
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Let's #Pray For #Justice ....
And
Let's #Pray For #Stop The #Crime_Against_Women ....
- #DrSharadSingh

बुंदेलखंड से गुज़रते राजनीतिक गलियारे - डॉ. शरद सिंह ...‘दबंग मीडिया’ में

मुझे प्रसन्नता है कि ‘दबंग मीडिया’ ने मेरे लेख को प्रमुखता से प्रकाशित किया है।
आभारी हूं 'दबंग मीडिया' की और भाई हेमेन्द्र सिंह चंदेल बगौता की जिन्होंने मेरे इस समसामयिक लेख को और अधिक पाठकों तक पहुंचाया है....
 

बुंदेलखंड से गुज़रते राजनीतिक गलियारे

 - Article of Dr Sharad Singh in Dabang Media

ग़लत है अराजकता का रास्ता - डॉ. शरद सिंह ...‘दबंग मीडिया’ में

मुझे प्रसन्नता है कि ‘दबंग मीडिया’ ने मेरे लेख को प्रमुखता से प्रकाशित किया है।
आभारी हूं 'दबंग मीडिया' की और भाई हेमेन्द्र सिंह चंदेल बगौता की जिन्होंने मेरे इस समसामयिक लेख को और अधिक पाठकों तक पहुंचाया है....

ग़लत है अराजकता का रास्ता - Article of Dr Sharad Singh in Dabang Media

उपन्यास ‘कस्बाई सिमोन’ पर पीएच. डी. (हिन्दी) उपाधि के लिए शोध ग्रंथ

Kasbai Simon - Novel of Dr (Miss) Sharad Singh
उच्च शिक्षा और शोध संस्थान दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा, मद्रास की पीएच. डी. (हिन्दी) उपाधि के लिए शोधार्थी माली गीताबेन द्वारा मेरे उपन्यास ‘कस्बाई सिमोन’ पर लिखा गया शोध ग्रंथ आज मुझे प्राप्त हुआ जिसके लिए उन्हें डॉक्टरेट की उपाधि प्रदान की गई है। मैं डॉ. माली गीताबेन के उज्ज्वल भविष्य की कामना करती हूं 🙂
Ph. D. Research Book on Kasbai Simon - Novel of Dr (Miss) Sharad Singh
📚एक दिलचस्प बात बताऊं कि यूं तो कई यूनीवर्सिटीज़ में मेरे उपन्यासों पर शोधकार्य हुए हैं और हो रहे हैं मगर अकसर उनके बारे में मुझे तब पता चलता है जब वे मुझसे शोध के दौरान चर्चा करते हैं या फिर उपाधि अवार्ड हो जाने के बाद यूजीसी की साईट से पता चलता है। कभी-कभी कोई उदारमना शोधार्थी अपनी रिसर्च बुक की कॉपी मुझे भी भेज भी देते हैं।

बुंदेलखंड से गुज़रते राजनीतिक गलियारे - डॉ. शरद सिंह ... चर्चा प्लस

Dr (Miss) Sharad Singh
चर्चा प्लस
बुंदेलखंड से गुज़रते राजनीतिक गलियारे
- डॉ. शरद सिंह

बुंदेलखंड देश का एक संघर्षशील और पिछड़ा इलाका है। इसके पिछड़ेपन का एक सबसे बड़ा कारण यह है कि इसने कभी झुक कर समझौते नहीं किए। कभी अपना स्वाभिमान नहीं गंवाया जिसका गवाह इतिहास भी है। आज उसी बुंदेलखंड में नए-नए राजनीतिक गलियारे गढ़े जा रहे हैं। सवाल यह है कि उन गलियारों से गुज़रने वालों को बुंदेलखंड से लगाव है या सत्ता से? इसका आकलन तो बुंदेलखंड के वासियों को ही करना पड़ेगा, वह भी समय रहते। 
बुंदेलखंड से गुज़रते राजनीतिक गलियारे - डॉ. शरद सिंह ... चर्चा प्लस Article for Column - Charcha Plus by Dr Sharad Singh in Sagar Dinkar Dainik

पहले विधानसभा चुनाव और उसके बाद लोकसभा चुनाव। दो समर सामने हैं और योद्धा इस समर को जीतने के लिए अपनी-अपनी योजनाएं बनाने में जुट गए हैं। मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश इन दो राज्यों में बंटा बुंदेलखंड राजनीतिज्ञों के लिए एक ऐसा इलाका है जहां समस्याएं ही समस्याएं हैं और जहां आश्वासन की पोटली आसानी से खोली जा सकती है। पिछले आमसभा चुनाव के दौरान भी अनेक ऐसे राष्ट्रीयस्तर के नेता बुंदेलखंड में पधारे जिन्हें बुंदेलखंड कहां है यह जानने के लिए गूगलसर्च करना पड़ा होगा। बुंदेलखंड में आ कर उन्होंने गरीबों के घर रोटियां खाईं, चाय पी और मुंह पोंछ कर चलते बनें। फिर चुनाव के दिन करीब आए तो फिर बुंदेलखंड याद आया। इस बार और नए राजनीतिक खिलाड़ी बुंदेलखंड के राजनीतिक गलियारे में बिगुल बजाते हुए गुज़र रहे हैं और आमचुनावों तक गुज़रते रहेंगे। बुंदेलखंड के राजनीतिक मंच पर दृश्य वही रहेगा- ढेर सारे मुद्दे और उससे भी अधिक आश्वासन। इस प्रसंग में बार-बार एक छोटी-सी कहानी याद आता है कि एक गांव में एक तालाब था जिसमें साफ़-स्वच्छ पानी था। हर मौसम में तालाब लबालब भरा रहता। एक बार एक शिकारी उस गांव से गुज़रा उसने देखा कि गांव खुशहाल है उन्हें किसी की मदद की कभी कोई जरूरत नहीं पड़ती है। शिकारी के मन में खोट आ गया। उसने यह प्रचारित की कि वह मगरमच्छ पकड़ने में माहिर है। और एक रात चुपके से एक मगरमच्छ का बच्चा तालाब में छोड़ कर वहां से चला गया। कुछ दिन बाद जब मगरमच्छ बड़ा हुआ और लोगों के लिए खतरा बन गया तो गांववालों को उस शिकारी की याद आई। चतुर शिकारी एक आदमी के पास अपना पता भी छोड़ गया था। गांव वालों उस शिकारी को बुलाया और उससे मगरमच्छ पकड़ने की फ़रियाद की। शिकारी ने वादा किया कि वह मगरमच्छ पकड़ेगा। लेकिन उसने मगरमच्छ पकड़ने में इतने अधिक दिन लगाए कि तब तक उस मगरमच्छ की संतानें भी हो गईं। इसके बाद शिकारी ने उस मगरमच्छ को पकड़ा, गांववालों से अपना ईनाम लिया और वहां से चलता बना। कुछ समय बाद गांव वालों को पता चला कि तालाब में तो अभी भी मगरमच्छ है। उन्होंने फिर शिकारी को बुलाया। फिर वहीं किस्सा दोहराया गया। एक बार शिकारी के सहायक ने ही उससे पूछ लिया कि शिकारी साहब आप हर बार मगरमच्छ का एक न एक बच्चा तालाब में क्यों जीवित छोड़ देते हैं? इस पर शिकारी ने मुस्कुरा कर उत्तर दिया कि अगर मैं एक बार में सारे मगरमच्छ मार दूंगा और तालाब को समस्या-मुक्त कर दूंगा तो गांव वाले मुझे फिर क्यों बुलाएंगे? और यदि वे मुझे नहीं बुलाएंगे तो मुझे पैसे ऐंठने को कहां से मिलेंगे। अपने शिकारी साहब का उत्तर सुन कर उनका सहायक गद्गद हो गया। वहीं, गांव वाले आज भी शिकारी के मोहताज़ बने हुए हैं।
चुनावों के समय उठाए जाने वाले मुद्दों के अलावा भी बुंदेलखंड में कई मुद्दे ऐसे हैं जिनका इस कथा से गहरा संबंध है। बुंदेलखंड की कल-कल करती नदियां अब सूख चली हैं, वनपरिक्षेत्र का धनी बुंदेलखंड अंधाधुंध अवैध कटाई को दशकों से झेल रहा है। रसूख वाले बांधों से पानी चुराते हैं और रेतमाफिया नदियों से रेत चुरा रहे हैं। परिणामतः बुंदेलखंड में भी जलवायु परिवर्तन का कालासाया मंडराने लगा है। मौसम का असंतुलन सूखे का समीकरण रचने लगा है। जब पर्याप्त बारिश नहीं होगी तो किसान कैसे फसल उगाएंगे? पर्याप्त फसल नहीं होगी तो किसान कर्ज के बोझ तले दबता जाएगा और कर्ज न चुका पाने की स्थिति में वहीं हो रहा है जो आए दिन अखबारों की सुर्खियों में पढ़ने को मिल रहा है। बुंदेलखंड 2004 से ही सूखे की चपेट में रहा। जब बहुत शोर मचा तो पहली बार इलाके को 2007 में सूखाग्रस्त घोषित किया गया। 2014 में ओलावृष्टि की मार ने किसानों को तोड़ दिया। सूखा और ओलावृष्टि से यहां के किसान अब तक नहीं उबर पाए हैं। खेती घाटे का सौदा बन गई है और किसान तंगहाली में पहुंच चुके हैं। यहां के किसान लगातार कर्ज में डूबते जा रहे हैं। लगभग 80 प्रतिशत किसान साहूकारों और बैंको के कर्जे में डूबे हैं। ओलावृष्टि के दौरान तो सैकड़ों किसानों ने आत्महत्याएं तक कर लीं। इन आत्महत्याओं की वजह से ही बुंदेलखंड देश भर में चर्चा में रहा। अब भी औसतन हर माह एक न एक किसान मौत को गले लगा रहा है। दुनिया भले ही इक्कीसवीं सदी में कदम रखते हुए विकास की नई सीढ़ियां चढ़ रहा है लेकिन बुंदेलखंड आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए जूझ रहा है।
बुंदेलखंड वह इलाका है, जिसमें मध्यप्रदेश के छह जिले छतरपुर, टीकमगढ़, पन्ना, दमोह, सागर व दतिया उत्तर प्रदेश के सात जिलों झांसी, ललितपुर, जालौन, हमीरपुर, बांदा, महोबा, कर्वी (चित्रकूट) आते हैं। कुल मिलाकर 13 जिलों से बुंदेलखंड बनता है। नदियों, तालाबों, कुओं वाले इस क्षेत्र में जल का सही व्यवस्थापन नहीं होने के कारण लोग बूंद-बूद पानी के लिए तरसते रहते हैं। पिछले साल 2016 में बुंदेलखंड में पीने के पानी की ऐसी समस्या हुई कि केंद्र ने वाटर ट्रेन भी भेज दी, जिसपर खूब राजनीति हुई। कई गांव ऐसे हैं जहां 10 किलोमीटर से भी ज्यादा दूर से पीने का पानी लाना पड़ता है। पानी की समस्या दूर करने के लिए प्रदेश सरकारों ने तालाब खुदवाए। सरकारी अधिकारियों ने बताया कि यहां अब पानी की कोई कमी नहीं है, जिसके बाद उत्तरप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने पानी से लबालब भरे तालाबों की फोटो ट्वीट कर दी। उसके बाद देश की एक प्रतिष्ठित समाचार एजेंसी ने इन तालाबों की सच्चाई का पता लगाया तो सच्चाई कुछ और ही निकली। कई तालाब सूखे पड़े थे। पानी जैसी बुनियादी चीज पर भ्रष्टाचार करने वालों की आत्मा भी क्या उनहें नहीं झकझोरती है? या फिर वे अपनी आत्मा को पहले ही बेच चुके हैं? राजनीतिक विश्लेषक सुरेंद्र किशोर का कहना है कि ‘’समय-समय पर बुंदेलखंड के लिए काफी पैसा दिया गया लेकिन बदहाली बताती है कि पैसे का सदुपयोग नहीं हुआ। केंद्र ने पैसा देकर अपनी जिम्मेदारी खत्म कर ली। यह नहीं देखा कि पैसा सही इस्तेमाल हुआ या नहीं। प्रदेश सरकारों ने जो घोषणाएं कीं और पैसा दिया उसे अधिकारियों ने जनता तक पहुंचने नहीं दिया। बस अपनी जेब भरते रहे।’’
जब किसान तंगहाल होता है तो शेष व्यवसाय भी लड़खड़ाने लगते हैं। बुंदेलखंड की भुखमरी भी सुर्खियों में रही है। ‘नवभारत टाईम्स’ में छपे इस समाचार ने पूरे देश को स्तब्ध कर दिया था कि बुंदेलखंड में लोग घास की रोटियां बनाकर खा रहे हैं’। एनबीटी ने इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाया। सरकार ने इसे नकारा लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने संज्ञान लेकर अपनी टीम मौके पर जांच के लिए भेजी। उस टीम को लोगों ने घास की रोटियां दिखाईं और बताया कि इनको ही खाकर वे जिंदा रहते हैं। बुंदेलखंड में खेती खत्म होने, उद्योग न होने और बेरोजगारी-भुखमरी के कारण गांव के लोग पलायन करने को विवश हैं। विभिन्न समाचार ऐजेंसियों के आंकड़ों के अनुसार पिछले 10 साल मे लगभग 50 लाख लोग पलायन कर चुके हैं। किसानों ने खेती छोड़ दी है और दूसरे प्रांतों में मजदूरी कर रहे हैं। यहां की बदहाली और लगातार पड़ रहे सूखे ने बुंदेलखंड के युवाओं को अपनी जड़ों से उखड़ने को विवश कर दिया है। युवा अपना गांव, अपना घर-परिवार छोड़ कर बाहर नौकरी करने जाने को मजबूर हैं। युवाओं के पास बाहर मजदूरी करके खाने-कमाने और परिवार को खिलाने के अलावा दूसरा चारा नहीं है।
प्रदेश सरकारें बढ़-चढ़ कर घोषणाएं करती रहती हैं- कभी सेवानिवृत्ति की आयु बढ़ाने की तो कभी वेतन और भत्ता बढ़ाने की। सवाल उठता है कि क्या प्रदेश सरकारों के खजानों में इतना दम है कि वे लम्बे समय तक इस प्रकार की व्यवस्थाओं को बनाए रख सकेंगी या फिर खुद सरकारी खजाने कर्ज में डूबते चले जाएंगे? दूसरी ओर विचारणीय यह भी है कि मौजूदा सरकारों पर उंगली उठानेवाले अन्य राजनीतिक दल बुंदेलखंड के लिए सचमुच कुछ करेंगे या फिर हमेशा की तरह मुंगेरीलाल के हंसीन सपने दिखाते रहेंगे? याद रहे कि सितम्बर 2016 में राहुल गांधी ने बुंदेलखंड में रोड-शो किया था, सन् 2017 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने महोबा का भ्रमण किया था और अप्रैल 2018 में हार्दिक पटेल ने बुंदेलखंड के राजनीतिक गलियारे में क़दम रखा। अर्थात् यह तो मानना होगा कि बुंदेलखंड ने राजनीतिक नक्शे में अपनी जगह बना ली है लेकिन अभी उसे सीखना है अपने अधिकारों तात्कालिक नहीं वरन हमेशा के लिए हासिल करना। आज उसी बुंदेलखंड में नए-नए राजनीतिक गलियारे गढ़े जा रहे हैं। सवाल यह है कि उन गलियारों से गुज़रने वालों को बुंदेलखंड से लगाव है या सत्ता से? इसका आकलन तो बुंदेलखंड के वासियों को ही करना पड़ेगा, वह भी समय रहते।
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(दैनिक सागर दिनकर, 11.04.2018 )
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