Wednesday, October 4, 2017

कला राजनीतिक सीमाओं में न बंधे - डॉ. शरद सिंह ... चर्चा प्लस

Dr (Miss) Sharad Singh

मेरा कॉलम चर्चा प्लस, सागर दिनकर में, इस बार उन विदेशी कलाकारों के बारे में जो बॉलीवुड से जुड़े हुए हैं। 04.10.2017...

 

चर्चा प्लस
कला राजनीतिक सीमाओं में न बंधे
- डॉ. शरद सिंह 


कला सीमाओं में नहीं बंधना चाहती है। यही कारण है कि कलाकार भी देश की सीमाओं को लांघ कर दूसरे देशों में अपनी कला का प्रदर्शन करने को आतुर रहते हैं। बॉलीवुड इसका अपवाद नहीं है। बॉलीवुड के कालाकार पाकिस्तानी फिल्मों में अभिनय करने गए तो पाकिस्तान से कई कलाकारों ने बॉलीवुड का रुख किया। इस समय तो अनेक देशों के कलाकार बॉलीवुड में अपनी कला का प्रदर्शन कर रहे हैं। वैसे भी वे नुकसानदायक नहीं हैं बल्कि भारतीय फिल्म इंडस्ट्री का प्रचार ही करते हैं फिर उनके आने से परहेज क्यां किया जाए? बेहतर है कि राजनीति में बांधने की बजाए कला को कला ही रहने दिया जाए। 
Charcha Plus Column by Dr Miss Sharad Singh in Sagar Dinkar Daily News Paper
‘मुझे जीवन भर इस बात का दुख रहा कि मुझे मेरी कला से नहीं बल्कि मेरी नस्ल से पहचाना गया। मैं विदेशी नहीं, भारतीय हूं। भारत मेरी जन्मभूमि है।’ यह कहा था टॉम आल्टर ने अपने एक साक्षात्कार में। इंग्लिश और स्कॉटिश पूर्वजों के अमेरिकी ईसाई मिशनरियों के पुत्र भारतीय नागरिक एवं भारतीय अभिनेता पद्मश्री स्व. टॉम आल्टर के पिता मसूरी में बस गए थे। उनके दादा दादी नवंबर 1916 में ओहियो से भारत आए थे। इलाहाबाद, जबलपुर और सहारनपुर में रहने के बाद, वे अंततः सन् 1954 में उत्तर प्रदेश में मसूरी में बस गए।
सच है, कलाकारों को उनकी नस्ल से नहीं बल्कि उनकी कला से पहचाना जाना चाहिए। उन्हें राजनीतिक सीमाओं में नहीं बांधा जाना चाहिए। फिर भी कभी-कभी राजनीति कला को बुरी तरह प्रभावित कर बैठती है। कश्मीर घाटी में उड़ी हमले के बाद महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना ने पाकिस्तानी कलाकारों को भारत से चले जाने का अल्टीमेटम दिया था और घोषणा की थी कि वो ऐसी फ़िल्मों को रिलीज़ नहीं होने देंगे जिनमें पाकिस्तानी कलाकारों ने काम किया हो। इस धमकी के कारण पाकिस्तानी कलाकारों की फिल्मों, उनके टीवी सीरियल्स का भारत में प्रदर्शन बंद करना पड़ा था। पाकिस्तान की राजनीतिक एवं सैन्य कुचेष्टाओं को ध्यान में रखते हुए यह विरोध स्वाभाविक था जिसका नुकसान उठाना पड़ा उन पाकिस्तानी कलाकारों को जो बॉलीवुड में निरंतर काम करना चाहते हैं। यह सर्वविदित है कि पाकिस्तान में भारतीय फिल्में बड़े चाव से देखी जाती हैं। ऐसे में भारतीय फिलमों में पाकिस्तानी कलाकारों को शामिल किया जाना पाकिस्तानी दर्शकों के लिए और भी आनन्ददायक होता है। यूं भी आमनागरिक किसी भी देश का हो, वह लड़ाई-झगड़े से दूर रहना चाहता है किन्तु राजनीतिज्ञ उन्हें भेड़ों के समान हांकते रहते हैं और कई बार वैमनस्य या आतंक के कुए की ओर बढ़ा देते हैं। जबकि भारतीय फिल्म इंडस्ट्री और भारतीय कलाकारों को आज सारी दुनिया प्रशंसा की दृष्टि से देखती है। नसीरुद्दीन शाह, ओमपुरी, नंदिता दास, जैसे कलाफिल्मों के कलाकारों से ले कर प्रियंका चोपड़ा, ऐश्वर्या राय, अनिल कपूर, सोनू सूद जैसे कामर्शियल फिल्मों के कलाकार भी हॉलीवुड में लोकप्रिय हो चुके हैं। जिस तरह हॉलीवुड दुनिया भर की नस्ल, जाति और धर्म के कलाकारों के लिए अपने दरवाज़े खुले रखता है, उसी प्रकार बॉलीवुड को भी स्वतंत्रता मिलनी ही चाहिए। कहते हैं न कि कला बंधनों से जितनी आजाद रहती है उतनी ही निखरती है।
श्रीदेवी अभिनीत फिल्म ‘मॉम’ जिसने में भी देखी होगी, वह उस फिल्म को भुला नहीं सका होगा। इस फिल्म की कहानी एक ऐसी मां के इर्द-गिर्द घूमती है जो अपनी बेटी के साथ गैंगरेप करने वालों को दण्ड देने के लिए कानून अपने हाथ में ले लेती है। इस फिल्म में पाकिस्तानी कलाकार अदनान सिद्दकी और सजल खान ने पिता-पुत्री की भूमिका निभाई थी। फिल्म देखते हुए किसी भी दर्शक को एक पल को भी यह नहीं लगा कि वे दोनों पाकिस्तानी कलाकार हैं। इससे पहले फिल्म ‘इंग्लिश मीडियम’ में इरफान खान की पत्नी की भूमिका में पाकिस्तानी अभिनेत्री सबा कमर अपने अभिनय के जलवे बिखेर चुकी है। सबा कमर ने जिस तरह ठेठ दिल्ली की मध्यमवर्गीय स्त्री जो अपने बेटी का दाखिला इंग्लिश मीडियम स्कूल में कराना चाहती है, की भूमिका निभाई उससे लगा ही नहीं कि उसका दिल्ली से कोई नाता है ही नहीं। क्योंकि कलाकार स्वयं को पात्र में ढाल लेता है। उस समय वह किसी देश का नागरिक नहीं बल्कि उस पात्र का जीवन होता है जिसे उसे जीवन्त करना है। पाकिस्तानी कलाकारों के भारत में प्रवेश पर हंगामें के बाद भी कई फिल्में प्रदर्शित हुईं जिनमें पाकिस्तानी कलाकारों की उपस्थिति की अलग से चर्चा नहीं हुई। रणवीर कपूर अभिनीत ‘तमाशा’ में उसके पिता की भूमिका पाकिस्तानी कलाकार जावेद शेख ने निभाई थी। इससे पहले विपाशा बसु की हॉरर फिल्म ‘क्रिएचर’ में हीरो की भूमिका में थे पाकिस्तान के गायक एवं अभिनेता इमरान अब्बास। सन् 2014 में सोनम कपूर अभिनीत फिल्म ‘खूबसूरत’ में नायक थे पाकिस्तान के मशहूर अभिनेता फवाद खान।
बॉलीवुड में विदेशी कलाकारों का प्रवेश वर्षों से होता आया है। राज कपूर की सुप्रसिद्ध फिल्म ‘मेरा नाम जोकर’ में सरकस की कलाकार के रूप में एडवर्ड जेराडा ने महत्वपूर्ण रोल किया था। यह फिल्म सुपर-डुपर हिट रही। इसमें राज कपूर का अभिनय काफी सराहा गया। फिल्म में असली सरकस दिखाया गया था, जिसके लिये सोवियत स्टेट सरकस से कलाकारों को बुलाया गया था। इसी सरकस में काम करने वाली एडवर्ड जेराडा ने एक ऐसी महिला का अभिनय किया जिसे राजकपूर अपना दिल दे बैठते हैं।
सन् 1979 में इंडो-रशियन सहयोग से बनी ‘अरेबीयन नाइट्स’ की मशहूर कथा पर आधारित फिल्म ‘अलीबाबा और चालीस चोर‘ में जाकिर मुख्वामेद्ज़नोव, सोफिको चिआउरेली, याकूब अख्मेदोव, रोलन बाईकोव आदि कई प्रसिद्ध रशियन कलाकारों ने अभिनय किया था। इस फिलम का डायरेक्शन भी उमेश मेहरा और रूसी फिल्म निदेशक लतीफ़ फैजियेव ने संयुक्त रूप से किया था। सन् 1984 में लतीफ़ फैजियेव ने एक और भारतीय फिल्म का निर्देशन किया जिसका नाम था ‘सोहनी महिवाल’। सनी देओल और पूनम ढिल्लो की प्रमुख भूमिका वाली इस फिल्म में जाकिर मुख्वामेद्ज़नोव, महेर मर्कतच्यान तथा कोमुरोवा ने महत्वपूर्ण रोल अदा किया था।
फिल्म ‘निकाह’ की पाकिस्तानी अभिनेत्री सलमा आगा भारतीय दर्शकों के दिलों पर भी छा गई थी। सलमा आगा के पूर्वपति पार्श्वगायक अदनान सामी को तो भारत इतना पसंद आया कि उन्होंने भारत की नागरिकता ही ग्रहण कर ली। फिल्म ‘हिना’ में हिना की भूमिका निभाई थी पाकिस्ता्नी अभिनेत्री ज़ेबा बख्तियार ने। यह फिल्म भारत ही नहीं बल्कि पाकिस्तान के सिनेमाघरों में खूब चली थी। इसमें हिना के साथ थे ऋषि कपूर। यह फिल्म् भारत-पाक बॉर्डर पर बसे गांवों में आये दिन होने वाले विवादों पर बनी बनाई गई थी। सन् 2007 में सलमान खान की फिल्म ‘मैरीगोल्ड’ में अली लार्टर ने बेहतरीन अदाकारी की। अली कार्टर अमेरिकी अभिनेत्री है जिसने हॉलीवुड की कई फिल्मों में काम किया है।
फिल्म ‘लगान’ में ब्रिटिश अभिनेत्री रशेल शैली की प्रभावी भूमिका थी। आमिर खान इस फिल्म् को ऑस्कर के लिये नॉमिनेट किया गया था। यह फिल्म देश भक्ति पर बनी है, जिसमें अंग्रेजों के शासन से मुक्ति पाने के लिये गांव वाले उनसे क्रिकेट मैच खेलते हैं। क्रिकेट का खेल सिखाने के लिये अंग्रेजों के साथ रहने वाली एलीज़ाबेथ रस्सेल यानी रशेल शैली आती हैं। उसी बीच वो भुवन यानी आमिर पर फिदा हो जाती हैं। रशेल शैली इंग्लैंड की मॉडल हैं। कई फिल्मों में काम कर चुकी हैं।
आमिर खान की ही ‘रंग दे बसंती’ में ब्रिटिश अभिनेत्री एलिस ने विदेशी महिला सू की भूमिका निभाई, जो डॉक्यूमेंट्री फिल्म बनाने भारत आती है। यह डॉक्यूमेंट्री भी ब्रिटिश नियमों पर आधारित होती है। ‘किसना’ फिल्म में कैथरीन की भूमिका निभाने वाली एंटोनिया बरनथ इंग्लैंड की अभिनेत्री हैं और कई हॉलीवुड फिल्में कर चुकी हैं। इन्होंन ने कैंब्रिज विश्वविद्यालय से पढ़ाई की है। यह फिल्म 2005 में आयी। फिल्म ‘काइट्स’ में बारबरा मोरी ने रितिक रौशन के साथ काम किया तो फिल्म ‘लव आजकल’ में ब्राजील की अभिनेत्री गिसेली मॉन्टे्रियो ने सैफ अली खान और दीपिका पादुकोण के साथ अभिनय किया। सैफ अली खान की फिल्म ‘एजेंट विनोद’ में स्विडशि मॉडल मरियम जकारिया ने फराह की भूमिका निभाई।
ब्रिटेन की कैटरीना कैफ, श्रीलंका की जैक्लीन फर्नांडीज की लोकप्रियता भारतीय दर्शकों के सिर चढ़ कर बोलती रही है। सलमान खान की ‘बॉडीगार्ड’ में ब्रिटिश मॉडल हज़ेल कीच ने भी यादगार रोल निभाया। स्वीडन की मॉडल एली अवराम ने जो पहले बिग बॉस में आयीं और फिर फिल्म ‘मिक्की वायरस’ में अपना कमाल दिखाया। पोर्न फिल्मों में काम करने वाली अभिनेत्री सन्नी लियोन को जिस तरह भारतीय फिल्म एवं विज्ञापन जगत में प्रमुखता से स्थान दिया वह भी अपने आप में एक मिसाल है।
यूं भी भारतीय सिने जगत में विदेशी कलाकार छोटे-बड़े रोल्स में आते रहते हैं।
कला सीमाओं में नहीं बंधना चाहती है। यही कारण है कि कलाकार भी देश की सीमाओं को लांघ कर दूसरे देशों में अपनी कला का प्रदर्शन करने को आतुर रहते हैं। बॉलीवुड इसका अपवाद नहीं है। बॉलीवुड के कालाकार पाकिस्तानी फिल्मों में अभिनय करने गए तो पाकिस्तान से कई कलाकारों ने बॉलीवुड का रुख किया। इस समय तो अनेक देशों के कलाकार बॉलीवुड में अपनी कला का प्रदर्शन कर रहे हैं। वैसे भी वे नुकसानदायक नहीं हैं बल्कि भारतीय फिल्म इंडस्ट्री का प्रचार ही करते हैं फिर उनके आने से परहेज क्यां किया जाए? बेहतर है कि राजनीति में बांधने की बजाए कला को कला ही रहने दिया जाए। इस संदर्भ में जाने-माने फ़िल्म समीक्षक मयंक शेखर की यह टिप्पणी मायने रखती है कि “जिस दिन हम कला, संस्कृति और राजनीति में फ़र्क करना बंद कर देंगे उस दिन बदले की भावना और नफ़रत के सिवा कुछ नहीं रह जाएगा।“
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Wednesday, September 27, 2017

आधी आबादी की सुरक्षा का प्रश्न - डॉ. शरद सिंह ... चर्चा प्लस

Dr (Miss) Sharad Singh
आधी आबादी की सुरक्षा का प्रश्न
  - डॉ. शरद सिंह
(मेरा कॉलम चर्चा प्लस दैनिक सागर दिनकर में, 27.09.2017)                                                                    
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की छात्राओं ने विरोध किया छेड़छाड़ का तो बदले में उन्हे मिला पुलिस का लाठीचार्ज। ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ अथवा ‘सेल्फी विथ डॉटर’ के नारों के बीच यह घटना सोचने को मजबूर करती है कि देश की आधी आबादी यानी महिलाएं और बेटियां वास्तव में कितनी सुरक्षित हैं? यदि घर से निकलते हुए बेटियां डरें या फिर महिलाएं पराए शहर में काम से जाती हुई सिर छुपाने की जगह न पा सकें तो व्यर्थ है राष्ट्रवाद और आधी आबादी की सुरक्षा का दम भरना। आखिर कब तक हम प्रगति के झूठे आंकड़ों से स्वयं को भरमाते रहेंगे?
Charcha Plus Column by Dr Miss Sharad Singh in Sagar Dinkar Daily News Paper

24 सितम्बर 2017 को एक अग्रणी समाचारपत्र के सागर नगर संस्करण द्वारा ‘प्रजा मंडल’ की बैठक आयोजित की गई। जिसमें मैंने इस समस्या को उठाया कि संभागीय मुख्यालय में अपने काम के सिलसिले में बाहर से आने वाली महिलाओं के लिए प्रशासन द्वारा महिला गेस्टहाऊस या हॉस्टल बनाया जाए ताकि ग्रामीण अथवा छोटे शहरों से आने वाली अकेली महिलाएं निर्भय हो कर ठहर सकें। वर्तमान माहौल में कोई भी अकेली महिला के लिए किसी होटल में ठहरने में स्वयं को सुरक्षित महसूस नहीं करती है। अतः अकेली महिलाओं के लिए गेस्टहाऊस बनाया जाना जरूरी है। मैं जब किसी दूसरे शहर किसी आयोजन के सिलसिले में जाती हूं तो मेरे मन में यही विचार आता है कि मेरे अथवा मेरी सहभागी महिलाओं के लिए तो आयोजकों द्वारा उत्तमकोटि की सुरक्षित व्यवस्था की जाती है लेकिन यदि कोई अकेली महिला निजी काम से भोपाल, इन्दौर या किसी अन्य शहर जाए तो वह कहां ठहरेगी? उसे रात बिताने के लिए कहां सुरक्षित जगह मिलेगी? नौकरीपेशा ही नहीं गैरनौकरी पेशा घरेलू महिलाओं को भी कई बार किसी क्लेम अथवा बच्चों की पढ़ाई के संबंध में दूसरे शहर जाने की आवश्यकता पड़ती है। उस समय उनके सामने समस्या होती है रात को ठहरने की। पहली बात तो यह कि हर तबके की महिला अच्छे और सुरक्षित होटल का व्यय नहीं उठा सकती है। और दूसरी बात कि सामान्य होटल में अकेली ठहरते हुए कोई भी महिला स्वयं को सुरक्षित अनुभव नहीं कर पाती है। इस स्थिति का दूसरा पक्ष देखें तो यदि वह महिला किसी परिचित का सहारा लेती है अथवा दूसरे शहर में पहुंच कर किसी परिचित के घर ठहरती है तो उसकी सुरक्षा का उस परिचित की नीयत पर निर्भर रहती है। यदि परिचित शरीफ है तो सब ठीक है अन्यथा समस्या और भी विकट रूप ले लेती है। यह विचार बहुत अरसे से मेरे मन में उमड़-घुमड़ रहा था। अतः जब ‘प्रजा मंडल’ की बैठक हुई जिसमें शहर के प्रत्येक वर्ग के बुद्धिजीवी शामिल हैं, तो मैंने अपने मन की बात सबके सामने रखते हुए महिलाओं के लिए कम से कम संभागीय मुख्यालय में एक गेस्टहाऊस अथवा हॉस्टल बनाने की मांग सामने रखी। यह गेस्टहाऊस किसी डोरमेट्री की तरह भी हो सकता है यानी एक बड़ा हॉल जिसमें बीस-पच्चीस बिस्तरों और आलमारियों की व्यवस्था हो। जहां टॉयलेट अटैच हो। जहां की सारी व्यवस्थाएं महिला कर्मचारियों के हाथों हों तथा जिसकी सुरक्षा का दायित्व भी महिला पुलिस के पास हो। ऐसे गेस्टहाऊस में न्यूनतम शुल्क में महिलाओं को ठहरने के लिए आसरा दिया जाए।
मैं नहीं जानती हूं कि मेरी यह तमन्ना कभी पूरी होगी भी या नहीं। या पूरी होगी तो किसी सीमा तक होगी? लेकिन वो कहते हैं कि यदि मनुष्य चांद पर पहुंचने की इच्छा नहीं करता तो वह कभी चांद पर नहीं पहुंच पाता। मुझे भी अपनी इच्छा चांद पर पहुंचे की इच्छा जैसी ही लग रही है-आसान हो कर भी कठिन। यह संदेह मेरे मन में इस लिए उपज रहा है क्यों कि इस बैठक के ठीक दो दिन पहले पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश के बनारस शहर में जो घटना क्रम शुरू हुआ उसने मेरे मुझे सोचने पर विवश कर दिया कि इस इक्कीसवीं सदी में पहुंचने के बाद भी क्या हम इतना ही पाठ पढ़ पाए कि छेड़छाड़ का विरोध करने वाली छात्राओं पर लाठियां बरसाई जाएं। उस पर भी दुखद यह कि यह घटना उस पवित्र भूमि पर घटी जो विश्वनाथ की नगरी कहलाती है। दुखद इसलिए भी कि वे छात्राएं उस पवित्र विश्वविद्यालय की थीं जिसे स्थापित करने के लिए पं. मदन मोहन मालवीय ने अपना जीवन समर्पित कर दिया। पं. मदन मोहन मालवीय बेटियों की शिक्षा, सुरक्षा और सम्मान के अटूट पक्षधर थे और उन्हीं के विश्वविद्यालय की छात्राओं को जो कष्ट झेलना पड़ रहा है उसे देख कर उनकी आत्म भी रो पड़ी होगी।
घटनाक्रम इस प्रकार रहा कि 21 सितम्बर को विश्वविद्यालय परिसर में एक छात्रा के साथ दो बाइक सवारों ने छेड़खानी की थी जिसके बाद से ही छात्राओं में इस घटना को लेकर आक्रोश जाग उठा। आरोपियों की गिरफ्तारी की मांग के लिए छात्राएं 22 सितम्बर को सुबह 6 बजे से ही बीएचयू के मेन गेट पर तीव्र विरोध प्रदर्शन कर रहीं थी। प्रदर्शनकारी छात्राओं का आरोप था कि कुछ लड़के उनके हॉस्टल की बाहर खड़े रहते हैं और गंदे गंदे इशारे करते हैं। छेड़छाड़ का विरोध करने पर धमकी दी जाती है।
23 सितम्बर रात करीब 12 बजे छात्राओं ने इस मामले पर कुलपति की चुप्पी और उनकी छात्राओं से नहीं मिलने की जिद के विरोध में उनके आवास पर घेराव किया। जहां पर छात्राओं पर प्रॉक्टोरियल बोर्ड के इशारे पर लाठीचार्ज किया गया। कुलपति आवास पर लाठीचार्ज के बाद सुरक्षाबलों ने बीएचयू के मेनगेट पर पहुंचकर वहां भी छात्राओं के ऊपर लाठीचार्ज किया और मेनगेट को छात्राओं से खाली करा लिया गया। इस घटना में घायल 1 छात्रा और 3 छात्रों को बीएचयू के ट्रामा सेंटर में भर्ती कराया गया। वाराणसी से लेकर दिल्ली तक बीएचयू में लड़कियों पर लाठीचार्ज को लेकर विरोध प्रदर्शन किया गया। बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी में आधी रात को छात्र-छात्राओं पर हुए लाठीचार्ज में पहली कार्रवाई हुई। बीएचयू के पास इलाके लंका के एसओ को लाइन हाजिर किया गया।
बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय यानी बीएचयू के कुलपति प्रोफ़ेसर गिरीश चंद्र त्रिपाठी का कहना है कि दिल्ली और इलाहाबाद के कुछ अराजक तत्व यहां आकर माहौल ख़राब कर रहे हैं। छात्राओं को यह शिकायत थी कि वीसी उनसे आकर क्यों नहीं मिल रहे हैं? इस बारे में प्रोफ़ेसर त्रिपाठी ने कहा कि, “मुझे मिलने में कोई दिक़्क़त नहीं है। मैं पहले भी कई छात्राओं से मिला और उन छात्राओं को अपने किए पर पछतावा भी था। शनिवार रात भी मैं उनसे मिलने ही जा रहा था, लेकिन तभी कुछ अराजक तत्वों ने माहौल को ख़राब करने की कोशिश की।“
उन्होंने जेएनयू और बीएचयू कीतुलना करते हुए यह कहा कि, “जेएनयू अपनी अकादमिक ख़ूबी के लिए कम जाना जाता है, लेकिन एक ऐसे समुदाय के कार्यों की वजह से ज़्यादा जाना जाता है जो राष्ट्र को सिर्फ़ एक भूभाग समझते हैं। लेकिन बीएचयू छात्रों के भीतर राष्ट्रवादी भावना को पोषित करने का काम करता रहा है और उसकी ये परंपरा हम किसी क़ीमत पर खंडित नहीं होने देंगे।“
राष्ट्रवाद और अकादमिक मूल्य बेटियों की सुरक्षा में निहित होती है उनके प्रति लापरवाह अथवा बर्बर रवैये में नहीं। जिस सिंहद्वार पर छात्राओं पर लाठियां बरसाई गईं उसी सिंहद्वार की यह घटना याद रखने योग्य है-‘‘ सन् 1931 में मालवीय जी ‘गोलमेज सम्मेलन’ में सम्मिलित होकर इंग्लैंड से वाराणसी आए थे। उनके स्वागत में विश्वविद्यालय के सिंहद्वार पर समस्त छात्रा-छात्राएं तथा अध्यापक उपस्थित थे। महामना स्टेशन से आकर प्रधान द्वार के पास अपनी कार से उतर गए और छात्रों के साथ पैदल ही चलने लगे। विश्वविद्यालय के महिला महाविद्यालय की छात्राओं ने उनकी आरती उतारने का आयोजन किया था। इस अवसर पर बड़ी भीड़ थी। कुछ मनचले छात्रों ने ‘ऑफीशियल फोटोग्राफरों’ के साथ-साथ छात्राओं की फोटो उतारनी चाही परन्तु इसी बीच महामना की पैनी दृष्टि उन पर पड़ गई। उन्होंने अपनी तर्जनी उंगली से ऐसा करने के लिए निषेध किया। उनकी तर्जनी देखते ही छात्र सकपका गए और अपना कैमरा छिपा कर हट गए।’’ (मेरी पुस्तक ‘‘राष्ट्रवादी व्यक्तित्व : महामना मदनमोहन मालवीय’’ से)
एक बार रात के एक बजे मालवीय जी बनारस स्टेशन पर उतरे थे तो उन्होंने देखा कि दो बदमाश एक स्त्री को परेशान कर रहे हैं। मालवीय जी के साथ कुछ छात्र भी थे। मालवीय जी ने उस महिला को जानकारी दिए बिना उस स्त्री के लिए तांगा करवाया और उसे घर भिजवा दिया। बाद में वे स्वयं भी छात्रों के साथ इस बात का पता लगाने पहुंचे कि वह स्त्री सुरक्षित घर पहुंच गई या नहीं। जबकि वह स्त्री उनके लिए नितान्त अपरिचित थी।
आधी आबादी की सुरक्षा के लिए आज फिर महामना जैसे विचारों की आवश्यकता है, राष्ट्रवाद पर बयानबाजी की नहीं। राष्ट्रवाद कोई नारा नहीं अपितु सभी के सम्मान की रक्षा करते हुए जीवन जीने की कला है। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की छात्राओं ने विरोध किया छेड़छाड़ का तो बदले में उन्हे मिला पुलिस का लाठीचार्ज। ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ अथवा ‘सेल्फी विथ डॉटर’ के नारों के बीच यह घटना सोचने को मजबूर करती है कि देश की आधी आबादी यानी महिलाएं और बेटियां वास्तव में कितनी सुरक्षित हैं? यदि घर से निकलते हुए बेटियां डरें या फिर महिलाएं पराए शहर में काम से जाती हुई सिर छुपाने की जगह न पा सकें तो व्यर्थ है राष्ट्रवाद और आधी आबादी की सुरक्षा का दम भरना। आखिर कब तक हम प्रगति के झूठे आंकड़ों से स्वयं को भरमाते रहेंगे?
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Monday, September 25, 2017

नई दुनिया, प्रजा मंडल में डॉ शरद सिंह द्वारा महिला मुद्दा उठाया गया


Women issue raised by Dr. Sharad Singh in the Praja Mandal

24.09.2017 को नई दुनिया के सागर संस्करण द्वारा ‘प्रजा मंडल’ की बैठक आयोजित की गई। जिसमें मैंने इस समस्या को उठाया कि संभागीय मुख्यालय में अपने काम के सिलसिले में बाहर से आने वाली महिलाओं के लिए प्रशासन द्वारा महिला गेस्टहाऊस या हॉस्टल बनाया जाए ताकि ग्रामीण अथवा छोटे शहरों से आने वाली अकेली महिलाएं निर्भय हो कर ठहर सकें। वर्तमान माहौल में कोई भी अकेली महिला के लिए किसी होटल में ठहरने में स्वयं को सुरक्षित महसूस नहीं करती है। अतः अकेली महिलाओं के लिए गेस्टहाऊस बनाया जाना जरूरी है।
मेरी इस मांग को  ‘नई दुनिया’ के सागर संस्करण में प्रमुखता से स्थान दिया जिसके लिए मैं ‘नई दुनिया’ परिवार एवं प्रजा मंडल के साथियों की अत्यंत आभारी हूं। 

उल्लेखनीय है कि प्रजा मंडल की पहली बैठक में मैंने नगर के सार्वजनिक स्थलों में महिलाओं के लिए सुविधाघर बनाए जाने की मांग रखी थी जिसे ‘नई दुनिया’ एवं प्रजा मंडल के साथियों ने प्रमुखता दी थी और महापौर सागर के सौजन्य से शहर के आठ स्थानों पर सुविधाघर बनाए गए तथा जीर्णोद्धार किया गया।
Dr Sharad Singh in the meeting of Naidunia, Sagar Edition, Praja Mandal , 25.09.2017
Dr Sharad Singh in the meeting of Naidunia, Sagar Edition, Praja Mandal , 25.09.2017
Dr Sharad Singh in the meeting of Naidunia, Sagar Edition, Praja Mandal , 25.09.2017
Dr Sharad Singh in the meeting of Naidunia, Sagar Edition, Praja Mandal , 25.09.2017
Dr Sharad Singh

Dr Sharad Singh

Dr Sharad Singh

Dr Sharad Singh

Friday, September 22, 2017

मोदी और मुस्लिम महिलाओं का ‘संवाद’ क्या रचेगा नया इतिहास ? - डाॅ. शरद सिंह ... चर्चा प्लस

Dr (Miss) Sharad Singh
चर्चा प्लस 
मोदी और मुस्लिम महिलाओं का ‘संवाद’
क्या रचेगा नया इतिहास ? 

- डाॅ. शरद सिंह

(मेरा कॉलम 'सागर दिनकर' में 20.09.2017)

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी 22 सितम्बर को अपने संसदीय क्षेत्र बनारस पहुंचने वाले हैं। अपने इस दो दिवसीय दौरे में वे डीरेका ऑडिटोरियम में मुस्लिम महिलाओं के साथ ‘संवाद’ कार्यक्रम के अंतर्गत बातचीत करेंगे। इसमें काफी संख्या में वे मुस्लिम महिलाएं शामिल होने की संभावना हैं जो लंबे समय से तीन तलाक के खिलाफ आवाज बुलंद करती रही हैं। इस बात को नकारा नहीं जा सकता है कि तीन तलाक मामले के बाद मुस्लिम महिलाओं के बीच प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता बढ़ी है। इसीलिए आशा की जा रही है कि यह संवाद कार्यक्रम मुस्लिम महिलाओं के लिए तरक्की के कई नए रास्ते खोलेगा।
Charcha Plus Column of Dr Sharad Singh in "Sagar Dinkar" Daily News Paper

लगभग 13 राज्यों की 70 हजार मुस्लिम महिला सदस्यों वाले राष्ट्रीय गठबंधन भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन ने मुस्लिम पर्सनल लॉ में सुधार किए जाने की जरूरत जताते हुए नवम्बर, 2015 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी समेत कई नेताओं को पत्र लिखा था तथा बराबरी के हक और लैंगिक न्याय की मांग की थी। इसके बाद 24 अक्तूबर 2016 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्रिपल तलाक़ के मुद्दे पर पहली बार अपनी राय सामने रखते हुए उत्तर प्रदेश में ’महापरिवर्तन रैली’ के दौरान बुंदेलखंड में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था कि - ‘‘हमें अपनी बेटियों, मांओं और बहनों को बचाना ज़रूरी है, इसमें धर्म आड़े नहीं आना चाहिए। मांओं और बहनों का सम्मान करना चाहिए। अब ये ट्रिपल तलाक़ का मुद्दा आ गया है. जैसे कोई हिंदू, कन्या भ्रूण हत्या जैसे अपराध में लिप्त होता है तो उसे जेल जाना पड़ता है उसी तरह से मेरी मुसलमान बहनों का क्या अपराध कि कोई फ़ोन पर तलाक़ कह देता है और उनकी ज़िंदगी तबाह हो जाती है। केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष रखा है कि महिलाओं पर किसी तरह की ज़्यादती नहीं होनी चाहिए और धर्म के आधार पर किसी महिला के साथ भेदभाव नहीं होना चाहिए। लोकतंत्र में बातचीत होनी चाहिए। सरकार ने अपनी स्थिति साफ़ कर दी है। वो लोग जो ट्रिपल तलाक़ के मुद्दे से ध्यान भटकाना चाहते हैं, ऐसे लोग जनता को भड़का रहे हैं। हमारे देश में मुस्लिम महिलाओं की ज़िंदगी ट्रिपल तलाक़ से बर्बाद होने की इजाज़त नहीं दी जा सकती। कुछ पार्टियां वोट बैंक की ख़ातिर 21 वीं सदी में महिलाओं के प्रति अन्याय करने पर उतारू हैं। ये किस तरह का इंसाफ़ है। राजनीति और चुनाव की अपनी जगह है लेकिन मुस्लिम महिलाओं को संविधान के मुताबिक़ अधिकार देना सरकार की और देश के लोगों की ज़िम्मेदारी है। तलाक़ के मुद्दे पर बहस में मुस्लिम समुदाय के उऩ पढ़े लिखे लोगों को हिस्सा लेना चाहिए जो क़ुरान की अच्छी जानकारी रखते हों। मुस्लिम समुदाय में भी प्रगतिशील सोच रखने वाले पढ़े लिखे लोग हैं। शिक्षित मुस्लिम महिलाएं भी इस मुद्दे पर अपने विचार रख सकती हैं।’’
तमाम मतभेदों के बावजूद भी विरोधी भी इस बात को स्वीकार करते हैं कि शायद आज भी नरेन्द्र मोदी की जगह किसी और के नेतृत्व की सरकार होती तो इस प्रकार का फैसला नहीं आ पाता क्योंकि जिस दृढ़ता के साथ केन्द्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के सामने सरकार का पक्ष रखा, उससे सुप्रीम कोर्ट को फैसला सुनाने में और भी आसानी हो गई। केन्द्र की मोदी सरकार ने सुप्रीम अदालत में अपना पक्ष दृढ़ता पूर्वक रखते हुए कहा था कि सभी पर्सनल कानून संविधान के दायरे में हों। ’’शादी, तलाक, संपत्ति और उत्तराधिकारी के अधिकार को भी एक नजर से देखा जाना चाहिए। तीन तलाक इस्लाम का अभिन्न अंग नहीं है।’’
तीन तलाक के प्रकरण में हुआ फैसला इस लिए भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के पक्ष को मजबूती देता है क्यों कि लोग अभी शाहबानो प्रकरण को भूले नहीं हैं। राजीव गांधी सरकार ने कट्टरपंथियों के दबाव में आकर मुस्लिम महिलाओं को गुजारा भत्ता देने संबंधी सुप्रीम कोर्ट के आदेश को कानून बनाकर पलट दिया था। मध्य प्रदेश के जिला इंदौर की शाहबानो को उनके पति मोहम्मद अहमद खान ने सन् 1978 में तलाक दे दिया था। तलाक के समय शाहबानो के पांच बच्चे थे। इनके भरण−पोषण के लिए उन्होंने निचली कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। अदालत ने शाहबानो के पक्ष में फैसला सुनाया, बाद में यह मामला हाईकोर्ट होता हुआ सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा। सभी जगह शाहबानो के ही पक्ष में फैसले सुनाए गए। उस समय मुस्लिम समाज का कट्टरपंथी पुरुष समुदाय शाहबानो की अपील का विरोध किया। विरोध के दबाव में आकर तत्कालीन राजीव गांधी सरकार ने 1986 में मुस्लिम महिला अधिनियम पारित कर दिया, जिसमें शाहबानो मामले में उच्चतम न्यायालय के निर्णय को उलट दिया गया। इस कानून में कहा गया था, ’हर वह आवेदन जो किसी तालाकशुदा महिला के द्वारा अपराध दंड संहिता 1973 की धारा 125 के अंतर्गत किसी न्यायालय में इस कानून के लागू होते समय विचाराधीन है, अब इस कानून के अंतर्गत निपटाया जायेगा, चाहे उपर्युक्त कानून में जो भी लिखा हो।’ उस समय राजीव गांधी सरकार को पूर्ण बहुमत प्राप्त था, इसीलिये उच्चतम न्यायालय के धर्म−निरपेक्ष निर्णय को उलटने वाला मुस्लिम महिला (तालाक अधिकार सरंक्षण) कानून 1986 आसानी से पास हो गया। इसके आधार पर शाहबानो के पक्ष में सुनाया गया फैसला संसद ने पलट दिया।
22 अगस्त 2017 को जब सुप्रीम कोर्ट ने ‘तीन तलाक’ की प्रथा को असंवैधानिक करार दिया तब शाहबानो के बेटे जमील अहमद ने उन दुख भरे दिनों को याद करते हुए कहा था कि ‘‘38 साल पहले जब कोर्ट ने अम्मी (शाहबानो) को भरण−पोषण के 79 रुपए अब्बा से दिलवाए थे, तो लगा था जैसे दुनिया भर की दौलत मिल गई, जो खुशी उस समय मिली थी, वही आज फिर महसूस हो रही है। जब फैसले को लेकर विवाद बढ़ने लगा तो अम्मी इतनी आहत हुईं कि उन्होंने भरण पोषण की राशि ही त्याग दी। अब ऐसा नहीं हो पायेगा। सुप्रीम कोर्ट ने तीन तलाक को असंवैधानिक ठहरा कर मुस्लिम महिलाओं के हक में फैसला सुनाया है। जो मशाल 38 साल पहले अम्मी ने जलाई थी, उसकी रोशनी आज पूरे देश और समाज को रोशन कर रही है।’’
बिना किसी राजनीतिक पक्षपात के समाज हित में यह बात स्वीकार की जा सकती है कि उस समय मोदी की सरकार होती तो शायद मुस्लिम महिलाओं को 40 वर्षों तक यूं भटकना नहीं पड़ता। यह भी कहा गया कि प्रधानमंत्री ने कांग्रेस के मुस्लिम वोट के किले में सेंध लगा दी है। लेकिन यदि महिलाओं के मानवीयहित को ध्यान में रखा जाए तो इस प्रकार की राजनीति में बुरा क्या है जब इससे किसी बड़े पक्ष को बुनियादी अधिकार मिल रहा हों।
इस तारतम्य में 22 सितम्बर 2017 को बनारस में होने वाले संवाद कार्यक्रम को देखा जा रहा है। अपने इस दो दिवसीय दौरे में वे डीरेका ऑडिटोरियम में मुस्लिम महिलाओं के साथ ‘संवाद’ कार्यक्रम में भाग लेंगे। इसमें काफी संख्या में वे मुस्लिम महिलाएं शामिल होने की संभावना हैं जो लंबे समय से तीन तलाके के खिलाफ आवाज बुलंद करती रही हैं। यद्यपि वहीं दूसरी ओर देश की प्रमुख समाचार ऐजेंसियों के अनुसार मुस्लिम बाहुल शक्करतालाब इलाके में कट्टरपंथियों के सक्रिय होने से महिलाओं को धमकाने का दौर शुरू हो गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ’संवाद’ कार्यक्रम को लेकर मुस्लिम महिलाओं को धमकाए जाने का मामला सामने आया। कार्यक्रम में शामिल होने की इच्छुक महिलाओं को कट्टरपंथी घर-घर जाकर मारने-पीटने के साथ सामाजिक बहिष्कार की धमकी दे रहे हैं। यह जानकारी स्वयं मुस्लिम महिला फाउंडेशन की महिला कचहरी में सामने रखी गई। प्रशासन को भी इस बारे में जानकारी दी जा चुकी है।
वरुणापार इलाके में रविवार को मुस्लिम महिला फाउंडेशन की ओर से आयोजित महिला कचहरी में शामिल हुई शबाना ने बताया कि कट्टरपंथियों के इशारे पर युवकों की टोली घरों में बार-बार जाकर महिलाओं को पीएम कार्यक्रम में न जाने की बात कह धमका रही है। गुड़िया, रेशमा, शहनाज और आफरीन के अलावा एक दर्जन अन्य महिलाओं ने भी धमकाए जाने की जानकारी दी। महिलाओं ने बताया कि धमकी देने वाले कह रहे हैं कि मोदी कार्यक्रम के दिन घर से बाहर कदम रखते ही हाथ-पैर तोड़ दिया जाएगा। इस पर मुस्लिम महिला फाउंडेशन की नेशनल सदर नाजनीन अंसारी ने महिला कचहरी में कहा कि धमकी देने वाले कायर हैं। मुस्लिम महिलाएं जागरुक हो चुकी हैं। प्रधानमंत्री मोदी से मिलकर वे अपनी परेशानी जरूर बताएंगी। इस मसले पर सर्वसम्मति से तय किया गया ज्यादा से ज्यादा महिलाएं हर कीमत पर प्रधानमंत्री से मिलने जाएंगी। धमकी देने वालों के खिलाफ लिखित रिपोर्ट एसएसपी को दी जाएगी। मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के राष्ट्रीय सेवा प्रमुख डा. राजीव श्रीवास्तव का कहना है कि धमकी देकर मुस्लिम महिलाओं में डर पैदा करने का प्रयास किया जा रहा है।
प्रधानमंत्री के ‘‘संवाद कार्यक्रम’’ के प्रति उत्साही मुस्लिम महिलाओं का साहस देखते हुए इस बात को नकारा नहीं जा सकता है कि तीन तलाक मामले के बाद मुस्लिम महिलाओं के बीच प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता बढ़ी है। एक ओर भारतीय मुस्लिम महिलाओं का संघर्ष दूसरी ओर सरकार की महिलाओं के हित में सकारात्मक सोच और तीसरी भारतीय न्यायायिक व्यवस्था का मानवीय दृष्टिकोण - इन तीनों ने शक्तियों ने मिल कर भारतीय मुस्लिम महिलाओं के पक्ष में ‘तीन तलाक’ से मुक्ति का जो द्वार खोला है वह उन महिलाओं के सुखद और सुरक्षित भविष्य की ओर एक बड़ा और मज़बूत क़दम है। इसीलिए आशा की जा रही है कि यह संवाद कार्यक्रम मुस्लिम महिलाओं के लिए प्रगति के नए द्वार खोलेगा और रचेगा नया इतिहास।
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Saturday, September 16, 2017

कहानी वह कला है जो ज़िन्दगी से ज़िन्दगी को मिलाती है - मुख्य अतिथि डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh in Pathak Manch Samiksha Goshthi Held at Aacharya Nand Dulare Bajpai Sabhagaar, Dr. Hari Singh Gour Central University, Sagar 15.09.2017

विश्वविद्यालय पाठक मंच की गोष्ठी में ‘‘ढाई बीघा ज़मीन’’ कहानी संग्रह पर समीक्षा गोष्ठी

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विश्वविद्यालय पाठक मंच की गोष्ठी में ‘‘ढाई बीघा ज़मीन’’ कहानी संग्रह पर परिचर्चा




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कहानी वह कला है जो ज़िन्दगी से ज़िन्दगी को मिलाती है - मुख्य अतिथि डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
 
कहानी वह कला है जो ज़िन्दगी से ज़िन्दगी को मिलाती है। कहानी के संक्षिप्त स्वरूप पर बड़े दायित्व रहते हैं। उसे सीमित शब्दों, सीमित पात्रों और सीमित कथोपकथन के द्वारा कथानक की सम्पूर्णता को पिरोना रहता है। यह बात डॉ हरीसिंह गौर केन्द्रीय विश्वविद्यालय, सागर की पाठक मंच की मासिक पुस्तक परिचर्चा गोष्ठी के दौरान मुख्य अतिथि प्रसिद्ध कथाकार सुश्री शरद सिंह ने कही। ख्यातिलब्ध लेखिका मृदुला सिंन्हा के कहानी संग्रह ‘‘ढाई बीघा ज़मीन’’ पर बोलते हुए डॉ. शरद सिंह ने कहा कि समाज से सरोकार रखने वाली कहानियों पर पूरी दक्षता से कलम चलाने वाली लेखिका मृदुला सिन्हा का कहानी संग्रह ‘‘ढाई बीघा ज़मीन’’ वर्तमान समाज की ज्वलंत समस्याओं को पूरी गंभीरता से रेंखांकित करता है। यह एक महत्वपूर्ण कहानी संग्रह है।

डॉ हरीसिंह गौर केन्द्रीय विश्वविद्यालय, सागर के आचार्य नंनददुलारे वाजपेयी सभागार में हुई गोष्ठी की अध्यक्षता विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के अध्यक्ष प्रो. आनन्दप्रकाश त्रिपाठी ने की। प्रसिद्ध कथाकार डॉ, (सुश्री) शरद सिंह मुख्य अतिथि तथा डॉ महेश तिवारी विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। समीक्षक के रूप में हिन्दी विभाग के सहायक प्राध्यापक डॉ हिमांशु कुमार तथा शोध छात्र सपन राज ने समीक्षा आलेख का वाचन किया। इस अवसर पर कार्यक्रम के अध्यक्ष प्रो. त्रिपाठी ने ‘‘ढाई बीधा ज़मीन’’ को समकालीन संवेदनाओं एवं संदर्भों का जीवन्त दस्तावेज बताया। पाठक मंच के संचालक डॉ शशिकुमार सिंह ने लेखिका मृदुला सिन्हा का परिचय प्रस्तुत किया।डॉ महेश तिवारी ने भी संग्रह पर अपने विचार रखे। कार्यक्रम का संचालन रवीन्द्र पंथ ने किया तथा आभार प्रकट किया डॉ ऋषभ भारद्वाज ने। इस आयोजन में डॉ वर्षा सिंह, डॉ उदय जैन, डॉ आशुतोष मिश्र, प्रो. के एस पित्रे, डॉ वंदना राजोरिया आदि साहित्य मर्मज्ञों की उपस्थित उल्लेखनीय रही।
(‘नव दुनिया’ समाचारपत्र में दिनांक 16.09.2017 प्रकाशित समाचार से)
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