Wednesday, November 25, 2020

चर्चा प्लस | डाॅ. हरी सिंह गौर : उनके जैसा दूजा नहीं और | डाॅ शरद सिंह

चर्चा प्लस
डाॅ. हरी सिंह गौर : उनके जैसा दूजा नहीं और
 - डाॅ शरद सिंह
 डॉ. हरी सिंह गौर एक प्रसिद्ध शिक्षाविद्, वकील, राजनेता, लेखक और समाज सुधारक थे। वे दिल्ली विश्वविद्यालय के पहले वाइस चांसलर, नागपुर नगरपालिका के मेयर और भारत की संविधान सभा के सम्मानित सदस्य थे। यह सारा परिचय उस समय छोटा पड़ जाता है जब उनका यह परिचय सामने आता है कि उन्होंने अपनी व्यक्तिगत संपत्ति दान दे कर एक विश्वविद्यालय की स्थापना की। अपना सब कुछ दे कर बुंदेलखंड के हर दृष्टि से पिछड़े इलाके में उच्चशिक्षा की गौरवशाली नींव रखी और दुनिया को दिखा दिया कि परहित और जनहित किसे कहते हैं   हरीसिंह गौर का जन्म 26 नवंबर 1870 को सागर में एक गरीब परिवार में हुआ था। उनके तीन भाई थे- ओंकार सिंह, गणपत सिंह और आधार सिंह। दो बहनें थीं- लीलावती और मोहनबाई। हरी सिंह ने अपनी प्राथमिक शिक्षा सागर से ही पूरी की और चूंकि वह पढ़ाई में बहुत अच्छे थे। प्राइमरी के बाद उन्होनें दो वर्ष में ही आठवीं की परीक्षा पास कर ली जिसके कारण उन्हें सरकार से 2रुपये की छात्रवृति मिलने लगी, जिसके बल पर ये जबलपुर के शासकीय हाई स्कूल गये। लेकिन मैट्रिक में ये फेल हो गये जिसका कारण था एक अनावश्यक मुकदमा। इस कारण इन्हें वापिस सागर आना पड़ा दो साल तक काम के लिये भटकते रहे फिर जबलपुर अपने भाई के पास गये जिन्होने इन्हें फिर से पढ़ने के लिये प्रेरित किया। डॉ. गौर फिर मैट्रिक की परीक्षा में बैठे। अपने विद्यालय का नाम रोशन करते हुए उन्होंने पूरे प्रान्त में प्रथम स्थान पाया। इस उपलब्धि पर उन्हें 50 रुपये नगद एक चांदी की घड़ी एवं बीस रूपये की छात्रवृति मिली। आगे की पढ़ाई के लिए उन्हें नागपुर जाना पड़ा। वहां हिलसप कॉलेज में दाखिला लिया। पूरे कॉलेज में अंग्रेजी एव इतिहास में ऑनर्स करने वाले वे एकमात्र छात्र थे। नागपुर के हिसलोप कॉलेज में वह इंटर की परीक्षा में अव्वल आए और पढ़ाई जारी रखने के लिए उन्हें वजीफा मिल गया। 

हरी सिंह गौर की अध्ययन की प्यास अभी बुझी नहीं थी। वे लंदन जा कर उच्चशिक्षा ग्रहण करना चाहते थे। उन्होंने अपने इच्छा अपने भाइयों के सामने व्यक्त की। उनके भाइयों ने उन्हें लंदन जाने की अनुमति भी दी और सहयोग भी दिया। इसके बाद हरी सिंह गौर कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय चले गए। वहां उन्होंने सन् 1891 में दर्शनशास्त्र और अर्थशास्त्र में उपाधि प्राप्त की। इसके बाद कानून की शिक्षा ग्रहण की और कानून की उपाधि ले कर ही भारत लौटे। अपने देश लौट कर वे रायपुर में वकालत करने लगे। उन्होंने करीब चालीस साल तक वकालत की। शीघ्र ही वे एक योग्य वकील के रूप में विख्यात हो गए। उन्होंने प्रिवी कौंसिल के लिए कई महत्वपूर्ण मुकद्दमें लड़े। वह हाई कोर्ट बार कौंसिल के सदस्य थे और बाद में उन्हें हाई कोर्ट बार एसोसिएशन का अध्यक्ष भी चुना गया। उन्होंने महिलाओं को वकालत करने के लिए क़ानूनी लड़ाई भी लड़ी थी। सिविल मैरिज बिल 1923 तैयार में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस दौरान उन्होंने एक किताब ‘‘पीनल लॉ ऑफ इंडिय’’ लिखी ।

डाॅ. हरी सिंह गौर 1920 से लेकर 1935 तक वह केंद्रीय विधान सभा के सदस्य रहे। सन् 1922 में जब दिल्ली विश्वविद्यालय की स्थापना हुई तब डाॅ. हरि सिंह को उसका वाइस चांसलर नियुक्त किया गया। वे 1928 से 1936 तक नागपुर विश्वविद्यालय के भी वाइस चांसलर रहे। जब डॉ. आंबेडकर की अगुवाई में नया संविधान बनाने के लिए संविधान सभा का गठन हुआ तब हरि सिंह को इसका सदस्य बनाया गया और उन्होंने भारत के संविधान के निर्माण में अहम भूमिका निभाई।

अपनी सारी उपलब्धियों को वे अपूर्ण मानते थे। उनका कहना था कि ‘‘यदि हम कोई ऐसा क़दम नहीं उठाते हैं जो दूसरों का जीवन बदल सके, संवार सके, तो हमारा हर कदम व्यर्थ है।’’ उनकी यही सोच नींव थी उनके उस प्रयास की जो आगे चल कर सागर विश्वविद्यालय के रूप में सामने आई। सागर ही क्या समूचे बुंदेलखंड में उन दिनों उच्चशिक्षा का कोई केन्द्र नहीं था। डाॅ. हरी सिंह गौर यह भली-भांति जानते थे कि आर्थि दृष्टि से पिछड़ा हुआ बुंदेलखंड योग्य युवाओं से तो परिपूर्ण है लेकिन वे युवा असमर्थ हैं बाहर जा कर उच्चशिक्षा प्राप्त करने में। अतः उन्होंने सोचा कि क्यों न उच्चशिक्षा का केन्द्र ही उन युवाओं के पास ला दिया जाए। डाॅ. हरी सिंह गौर ने ब्रिटिश सरकार से आग्रह किया कि सागर में उच्चशिक्षा का केन्द्र स्थापित किया जाए। लम्बी काग़ज़ी कार्यवाही और धन के संकट का हवाला देते हुए टालमटोल करती ब्रिटिश सरकार के आगे अपनी संपत्ति सामने रखते हुए डाॅ. हरी सिंह गौर ने कहा कि अब कोई अड़चन नहीं आनी चाहिए। उन्होंने विश्विद्यालय के लिए बीस लाख रुपये दे दिए। उन्होंने अपनी वसीयत में अपनी संपत्ति का दो तिहाई हिस्सा (लगभग दो करोड़ रुपये) विश्विद्यालय के नाम कर दिया था। उन्होंने इस नए विश्वविद्यालय को कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय की भांति ‘‘सागर विश्वविद्यालय’’ नाम दिया। वे हर विभाग के लिए दुनिया भर से चुन-चुन कर शिक्षाविद् विद्वान सागर विश्वविद्यालय में लाए। अफ़सोस कि वे अपने द्वारा स्थापित सागर विश्वविद्यालय को फलता-फूलता अधिक दिनों तक नहीं देख सके। सन् 1949 की 25 दिसम्बर को उनका निधन हो गया। महान दानी डाॅ. हरी सिंह गौर को श्रद्धांजलि स्वरूप सन् 1983 में सागर विश्वविद्यालय का नाम बदलकर ‘‘डॉ. हरि सिंह गौर विश्वविद्यालय’’ कर दिया गया ताकि दुनिया भर में उनकी यह देन उनके नाम से जानी जाए। 
डाॅ. हरी सिंह गौर समय के पाबंद और मितव्ययी थे। डाॅ. हरि सिंह गौर धन के अपव्यय के प्रबल विरोधी थे। उनके जीवन की अनेक ऐसी घटनाएं हैं जिनसे उनकी मितव्ययिता का पता चलता है। डाॅ. हरि सिंह गौर जब सागर के कुलपति निवास में रहते थे, उस समय की एक घटना है कि एक दिन जब उनका निज सहायक उनसे मिलने आया तो देखा की डाॅ. हरि सिंह गौर फर्श पर घुटनों के बल झुक कर कुछ ढूंढ रहे हैं। कुछ देर देखते रहने के बाद जब निज सहायक ने न रहा गया तो उसने पूछ ही लिया कि आप क्या ढूंढ रहे हैं? डाॅ. हरि सिंह गौर ने उत्तर दिया कि मैं अठन्नी ढूंढ रहा हूं जो यहीं कहीं गिर गई है। ‘‘एक अठन्नी के पीछे आप इतने परेशान हो रहे हैं, आप तो कुलपति हैं।’’ निज सहायक कह बैठा। इस पर डाॅ. हरि सिंह गौर ने उससे कहा,‘‘बात मेरे कुलपति होने और उसके अठन्नी होने की नहीं है, बात लापरवाही और पैसे की कीमत की है। रकम चाहे छोटी हो या बड़ी, मूल्यवान होती है।’’ यह सुन कर निज सहायक ािक अपनी गलती का अहसास हो गया और वह भी अठन्नी ढूंढने लगा। जल्दी ही वह अठन्नी मिल गई और निज सहायक को मितव्ययिता का सबक भी।

एक और रोचक घटना है कि एक बार डाॅ. हरि सिंह गौर जापान सरकार के आमंत्रण पर लेक्चर देने जापान गए। उनकी बेटी भी उनके साथ गई। डाॅ. हरि सिंह गौर अपनी बेटी को निश्चित अंतराल पर जेब खर्च दिया करते थे। जापान में बेटी को एक छाता पसंद आ गया। बेटी के पास जेबखर्च के पैसा खऋत्म हो गया था और अगला जेबखर्च मिलने में अभी दो दिन शेष थे। वे जानती थीं कि उनके पिता समय से पहले जेबखर्च नहीं देंगे। अतः उन्होंने अपने पिता से वह छाता खरीदने के लिए पैसे मांगे। इस पर डाॅ. हरि सिंह गौर कहा कि यदि तुम्हारे पास पैसे नहीं है तो छाता मत खरीदो। तब बेटी से अनुरोध किया कि उधार के रूप में ही दे दीजिए। अगले जेबखर्च से काट लीजिएगा। तब डाॅ. हरि सिंह गौर ने बेटी को समझाया कि यदि पैसे नहीं हैं तो मत खरीदो, और उधार में धन ले कर यानी कर्ज ले कर तो कभी मत खरीदो। इस तरह उन्होंने पैसे देने से साफ़ मना कर दिया। लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं है कि अपनी बेटी को मितव्ययिता और कर्ज से बचने की शिक्षा देते हुए वे पिता के अपने कर्तव्य को भूल गए हों। दूसरे ही दिन उनकी बेटी को जापान में ही एक पार्सल मिला। जब उन्होंने पार्सल खोलकर देखा तो उसमें से जापानी छाता निकला एवं उस पर लिखा था ‘‘तुम्हारे पिता का स्नेह’’। वर्तमान आर्थिक संकट के दौर में उनकी यह सीख बहुत महत्व रखती है।

डाॅ. हरि सिंह गौर ने जिस मितव्ययिता और शैक्षिक योग्यता की जो दूसरों से अपेक्षा की उसे पहले स्वयं अमल में लाया। उनके नाम पर कौंसिल ऑफ साइंस एंड टैक्नॉलॉजी, भोपाल ने ‘डॉ. हरि सिंह गौर स्टेट अवार्ड’ शुरु किया। भारत सरकार ने 26 नवंबर 1976 में उनके नाम पर एक डाक टिकट भी जारी किया था। शिक्षा क्षेत्र में एक महानदानी के रूप में वे हमेशा याद रखे जाएंगे। वे अद्वितीय थे, अद्वितीय हैं और अद्वितीय रहेंगे।   
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(दैनिक सागर दिनकर में 25.11.2020 को प्रकाशित)
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Wednesday, November 18, 2020

चर्चा प्लस | चिन्ताजनक है प्रेम का हिंसा की ओर बढ़ना | डाॅ शरद सिंह

चर्चा प्लस
चिन्ताजनक है प्रेम का हिंसा की ओर बढ़ना
 - डाॅ शरद सिंह
  महाराष्ट्र के बीड जिले में दिवाली के दिन दिल दहला देने वाली घटना घटी जिसमें एक 22 वर्षीय युवती को उसके बॉयफ्रेंड ने एसिड और पेट्रोल से जलाने के बाद सड़क किनारे फेंक दिया। इस ख़बर ने सोचने को मज़बूर कर दिया है कि क्या प्रेम इतना हिंसात्मक रूप भी ले सकता है? विगत कुछ दशकों से एकतरफा प्रेम अथवा प्रेमिका से छुटकारे के लिए हिंसात्मक कदम उठाए जाने के समाचार अकसर पढ़ने को मिलने लगे हैं। प्रेम का इस तरह हिंसा की ओर बढ़ना चिंतनीय है।   
जिसने भी चन्द्रधर शर्मा गुलेरी की ‘उसने कहा था’ पढ़ी है, उसे वह यह संवाद कभी नहीं भूल सकता कि कहानी का नायक लहना सिंह एक लड़की से पूछता है-‘तेरी कुड़माई हो गई?’ और वह लड़की ‘धत्’ कह कर शरमा जाती है। लड़की ने एक दिन ‘तेरी कुड़माई हो गई’ का उत्तर दे दिया कि ‘हंा, हो गई....!’ लहना विचलित हो गया। उस लड़की का विवाह जिससे हुआ, वह आगे चल कर सेना में सूबेदार बना और वह लड़की कहलाई सूबेदारनी। एक भरा-पूरा परिवार, वीर, साहसी पति, वैसा ही वीर, साहसी बेटा। आर्थिक सम्पन्नता। सामाजिक दृष्टि से सुखद पारिवारिक जीवन। वहीं एकतरफा प्रेम में डूबा लहना सिंह उस लड़की को कभी भुला नहीं सका। युद्ध में जाते समय जब लहना सूबेदार के घर उन्हें लेने गया तो सूबेदारनी ने ही उसे पहचाना और अनुरोध किया कि युद्ध में उसके पति यानी सूबेदार की रक्षा करना। लहना सिंह ने अपना वचन निभाया। लहना चाहता तो सूबेदार को मर जाने देता ओर सूबेदारनी से अपना बदला ले लेता। या फिर बहुत पहले ‘कुड़मई’ की ख़बर पाते ही आक्रामक हो उठता। लेकिन लहना ने कोई गलत कदम नहीं उठाया क्योंकि वह उस लड़की से सच्चा प्रेम कर बैठा था। प्रेम समर्पण मांगता है हिंसा या प्रतिकार नहीं।   

आज के माहौल में लहना सिंह का समर्पित प्रेम मानो कहीं खो गया है। हाल ही में महाराष्ट्र के बीड जिले में दिवाली के दिन की दिल दहला देने वाली घटना ने यह सोचने को मजबूर कर दिया कि क्या प्रेम मर कर हिंसा का रूप ले लेता है या फिर वह वस्तुतः प्रेम होता ही नहीं है? महाराष्ट्र के बीड जिले में एक 22 वर्षीय युवती को उसके बॉयफ्रेंड ने एसिड और पेट्रोल से जलाने के बाद सड़क किनारे फेंक दिया, जहां वह 12 घंटे से अधिक समय तक मौत से जूझती, तड़पती वह पड़ी रही। किसी ने उसे देखा और पुलिस को ख़बर की जिसके बाद उसे अस्पताल पहुंचाया गया। मौत से 16 घंटे तक जूझने के बाद उस युवती ने दम तोड़ दिया। यह सिर्फ़ एक घटना नहीं है। विगत कुछ दशको से ऐसी घटनाएं अकसर पढ़ने-सुनने को मिलती रहती हैं। देश के हर प्रांत, हर जिले से एक न एक ऐसी घटना प्रकाश में आती रहती है। जून 2016 को रेवाड़ी में एक युवक ने एक तरफा प्यार के चलते युवती को चाकू मार घायल कर दिया था। मार्च 2017 मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में एक युवक ने एकतरफा प्रेम के चलते एक युवती की चाकू मार कर हत्या करने की कोशिश की। युवती को फौरन अस्पताल ले जाया गया। नवंबर 2018 गाजियाबाद के सिहानी गेट थाना क्षेत्र के मालीवाडा में प्रशांत नाम के 28 वर्षीय युवक ने एक 26 वर्षीय युवती पर चाकू से हमला कर दिया। आरोपी प्रेमी ने लड़की के घर पर ही लड़की का गला चाकू से बुरी तरह रेत दिया। ग्रेटर नोएडा के एक मॉल में शुक्रवार को एकतरफा प्रेम प्रसंग के मामले में एक व्यक्ति ने 18 वर्षीय युवती की चाकू घोंपकर हत्या कर दी और इसके बाद अपने आप को भी मारने की कोशिश की। नवंबर 2019 अलीगढ़ के इगलास कोतवाली क्षेत्र के गांव जारौठ में एकतरफा प्रेम में पागल प्रेमी ने युवती की घर में घुसकर बेरहमी से हत्या कर दी। 19 वर्षीय युवती की 15 दिसंबर को शादी होने वाली थी। शादी की खबर से युवक आहत था। उसने सोमवार दोपहर युवती के घर में घुसकर उसकी गर्दन, छाती और पेट में चाकू से प्रहार किए और भाग गया। जून 2020 कोतवाली थाना क्षेत्र में एक सिरफिरे आशिक ने एकतरफा प्रेम में पड़ोस में रहने वाली लड़की पर चाकू से हमला कर दिया। ओरछा गेट निवासी विनोद पड़ोस में रहने वाली एक लड़की से एकतरफा प्यार करता था। साथ ही वह लड़की पर आये दिन शादी करने का दबाव बनाता था। जब ऐसा नहीं हो सका तो विनोद ने बुधवार की दोपहर लड़की पर चाकू से हमला कर दिया। जून 2020 दिल्ली से सटे गाजियाबाद के तुलसी निकेतन में एकतरफा प्यार में पागल एक सनकी प्रेमी ने एक युवती की चाकू से गोदकर निर्ममता से हत्या कर दी। आरोपी युवक उस युवती की कहीं और शादी तय होने से नाराज था। 

ये तो मामले हैं एकतरफा प्रेम के हिंसात्मक परिणाम के। अब लिवइन में अपनी पार्टनर से पीछा छुड़ाने के लिए हिंसात्मक तरीके अपनाएं जाने लगे हैं। जबकि लिवइन का आधार ही है प्रेम, समर्पण और विश्वास। लेकिन इस प्रकार की हिंसात्मक घटनाओं को देखते हुए लगने लगा है मानो प्रेम से ये तीनों आधार तत्व लुप्त होते जा रहे हैं। ‘प्रेम’ एक जादुई शब्द है। कोई कहता है कि प्रेम एक अनभूति है तो कोई इसे भावनाओं का विषय मानता है। कहा तो यह भी जाता है कि प्रेम सोच-समझ कर नहीं किया जाता है। यदि सोच-समझ को प्रेम के साथ जोड़ दिया जाए तो लाभ-हानि का गणित भी साथ-साथ चलने लगता है। बहरहाल सच्चाई तो यही है कि प्रेम बदले में प्रेम ही चाहता है और इस प्रेम में कोई छोटा या बड़ा हो ही नहीं सकता है। जहां छोटे या बड़े की बात आती है, वहीं प्रेम का धागा चटकने लगता है। ‘रहिमन धागा प्रेम का मत तोड़ो चटकाय। टूटे से फिर न जुड़े, जुड़े गांठ पड़ जाए।’ प्रेम सरलता, सहजता और स्निग्धता चाहता है, अहम की गंाठ नहीं। इसीलिए जब प्रेम किसी सामाजिक संबंध में ढल जाता है तो प्रेम करने वाले दो व्यक्तियों का पद स्वतः तय हो जाता है। स्त्री और पुरुष के बीच का वह प्रेम जिसमें देह भी शामिल हो पति-पत्नी का सामाजिक रूप लेता है। हजारी प्रसाद द्विवेद्वी लिखते हैं कि ‘प्रेम से जीवन को अलौकिक सौंदर्य प्राप्त होता है। प्रेम से जीवन पवित्रा और सार्थक हो जाता है। प्रेम जीवन की संपूर्णता है।’ आचार्य रामचंद्र शुक्ल मानते थे कि प्रेेम एक  संजीवनी शक्ति है। संसार के हर दुर्लभ कार्य को करने के लिए यह प्यार संबल प्रदान करता है। आत्मविश्वास बढ़ाता है। यह असीम होता है। इसका केंद्र तो होता है लेकिन परिधि नहीं होती।’ कथा सम्राट प्रेमचंद ने लिखा है कि ‘मोहब्बत रूह की खुराक है। यह वह अमृतबूंद है, जो मरे हुए भावों को ज़िन्दा करती है। यह ज़िन्दगी की सबसे पाक, सबसे ऊंची, सबसे मुबारक़ बरक़त है।’ 

बेशक़ प्रेम की परिभाषा। प्रेम का अर्थ, एक साथ महसूस की जाने वाली उन सभी भावनाओं से जुड़ा है, जो मजबूत लगाव, सम्मान, घ्बहुत कठिन है घनिष्ठता, आकर्षण और मोह से सम्बन्धित हैं। प्रेम होने पर परवाह करने और सुरक्षा प्रदान करने की गहरी भावना व्यक्ति के मन में सदैव बनी रहती है। प्रेम वह अहसास है जो लम्बे समय तक साथ देता है और एक लहर की तरह आकर चला नहीं जाता। तभी तो कबीर ने कहा है कि -
पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुआ, हुआ न पंडित कोय। 
ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय।।

लेकिन वर्तमान परिदृश्य चिंता में डालने वाला है। प्रेम हिंसा की ओर बढ़ता दिखाई देने लगा है। इसके कारणों पर गौर करें तो तो मूल करण यही दिखाई देते हैं कि एक तो मानवीय मूल्यों में तेजी से कमी आती जा रही है और दूसरे, युवाओं में प्रेम संबंधों को ले कर असुरक्षा की भावना बढ़ रही है। ये दोनों कारण ‘‘प्रेम करने का भ्रम पालने वालों’’ को हिंसाात्मक बना देता है। असली प्रेम करने वाले कभी, किसी भी दशा में अपने प्रिय का अहित नहीं कर सकते हैं। इस हिंसात्मक आचरण के लिए कहीं न कहीं घरेलूहिंसा भी जिम्मेदार है। जो बच्चे अपने घर में स्त्रियों के प्रति हिंसात्मक रवैया देखते हैं, वही बच्चे बड़े हो कर स्त्रियों के प्रति हिंसात्मक कदम उठाने से नहीं हिचकते हैं। समाज से जुड़ा यह एक ऐसा विषय है जिसकी अनदेखी नहीं किया जाना चाहिए। भारतीय संस्कृति प्रेम की पक्षधर है हिंसा की नहीं।               
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(दैनिक सागर दिनकर में 18.11.2020 को प्रकाशित)
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Wednesday, November 11, 2020

चर्चा प्लस | सतर्कता से दीपावली मनाना है, कोरोना को हराना है | डाॅ शरद सिंह

चर्चा प्लस
सतर्कता से दीपावली मनाना है, कोरोना को हराना है
   - डाॅ शरद सिंह
  दीपावली वह त्यौहार है जिसका नाम लेते ही दीपकों की जगमग करती कतारों की तस्वीर आंखों के आगे घूम जाती है। लाई, बताशे, पटाखे, फुलझड़ी आदि इसे और अधिक रोचक बना देते हैं। लेकिन इस बार की दीपावली वैसी नहीं होगी जैसी हम हमेशा मनाते आए हैं। कारण कि कोरोना आपदा से अभी छुटकारा नहीं मिला है। इस बार की दीपावली सतर्क दीपावली के रूप में मनाने में ही सुरक्षा और खुशियां दोनों निहित है। साथ ही इसे हम परमार्थ रूप दे कर सार्थक दीपावली यानी एक स्पेशल दीपावली में बदल सकते हैं। 

दीपावली का उत्साह कोरोना के भय पर भारी पड़ रहा है। बाज़ार में दूकानें सज गई हैं और भीड़ उमड़ने लगी है। फिर भी हर व्यक्ति दुविधा की स्थिति से गुज़र रहा है। इतने बड़े त्यौहार को वह फीका भी नहीं जाने देना चाहता है और वहीं उसके भीतर कोरोना संक्रमण कर भय भी समाया हुआ है। कोरोना के भय के प्रति देश में हर स्तर पर प्रशासन भी सतर्क है। इसी लिए दीपावली पर एनजीटी यानी नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने सतर्कता नोटिस जारी करते हुए देश के 23 राज्यों में पटाखों की बिक्री और उपयोग पर अस्थायी प्रतिबंध लगाने पर अपना आदेश सुनाया है। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल यानी राष्ट्रीय हरित अधिकरण की स्थापना 18 अक्तूबर 2010 को एनजीटी अधिनियम, 2010 के तहत पर्यावरण संरक्षण, वन संरक्षण, प्राकृतिक संसाधनों सहित पर्यावरण से संबंधित किसी भी कानूनी अधिकार के प्रवर्तन, दुष्प्रभावित व्यक्ति अथवा संपत्ति के लिये क्षतिपूर्ति प्रदान करने एवं इससे जुड़े हुए मामलों के प्रभावशाली और त्वरित निपटारे के लिये की गई थी। दूसरे शब्दों में इसे पर्यावरण अदालत कहा जा सकता है, जिसे हाई कोर्ट के समान शक्तियां प्राप्त हैं। एनजीटी ने 30 नवंबर की रात तक दिल्ली एनसीआर सहित देश के उन शहरों और कस्बों में पटाखों पर पूरी तरह बैन लगा दिया है जहां पिछले साल नवंबर में हवा की गुणवत्ता खराब रही। आतिशबाजी पर भी पाबंदी लगाई गई है। वहीं मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने पटाखों पर पाबंदी तो नहीं लगाई है लेकिन चाईनीज़ पटाखे बेचने और चलाने पर रोक लगाई है।

दीपावली मानने को ले कर एनजीटी ने गाईडलाईन भी जारी की है जिसके अनुसार जिन शहरों में वायु प्रदूषण इंडेक्स 200 से ज्यादा है, वहां पर पटाखों की बिक्री और पटाखे जलाने पर रोक लगाई गई है। जिन शहरों में वायु प्रदूषण खतरे के बिन्दु से नीचे होगा, वहां पर पटाखे बेचे जा सकेंगे और उन्हें जलाने के लिए दो घंटे का समय निर्धारित रहेगा। यह पटाखे त्यौहारों यथा - दीपावली, छठ, न्यू ईयर और क्रिसमस जैसे त्यौहारों पर जलाए जा सकेंगे। पश्चिम बंगाल, ओडिशा, राजस्थान और हरयाणा समेत एनजीटी ने 23 राज्यों में पटाखों की बिक्री और उपयोग पर अस्थायी प्रतिबंध लगाने पर अपना आदेश सुनाया है। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने कहा, ‘वैसे शहर या कस्बे जहां वायु गणवत्ता ‘मध्यम’ या उसके नीचे दर्ज की गई, वहां सिर्फ हरित पटाखों की बिक्री हो सकती है और दीपावली, छठ, नया साल, क्रिसमस की पूर्व संध्या जैसे अन्य मौकों पर पटाखों के इस्तेमाल और उन्हें फोड़ने की समय सीमा को दो घंटे तक ही सीमित रखी जा सकती है, जैसा कि संबंधित राज्य इसको तय कर सकते हैं।’ इसके साथ ही नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने कहा कि ‘वहीं अन्य स्थानों पर प्रतिबंधरोक अधिकारियों के लिए वैकल्पिक है और अगर अधिकारियों के आदेश में इस संबंध में कड़े कदम हैं, तो वे लागू होंगे।’ यह गाईडलाईन इसलिए जारी की गई है क्योंकि वायु प्रदूषण से कोविड-19 के मामले बढ़ सकते हैं।  इसके अलावा जिन शहरों में वायु प्रदूषण प्रतिशत अपेक्षाकृत कम है, वहां सिर्फ ग्रीन पटाखे ही छोड़े जा सकते हैं, वह भी मात्र दो घंटे की निर्धारित अवधि में। यह याद रखना जरूरी है कि इस बार तो कोरोना आपदा का दौर है। कोरोना हवा में ही तेजी से फैलता है। अगर पर्यावरण प्रदूषित होगा तो कोरोना भी उतनी तेजी से ही फैलेगा। इसलिए प्रदेश सरकार के द्वारा दी गई छूट रूपी विश्वास का सम्मान करते हुए मध्यप्रदेश में भी पटाखे कम से कम चलाए जाएं तो इससे हवा को प्रदूषित होने से बचाए रख सकेंगे और कोरोना संक्रमण को फैलाने के अपराध के मानवीय अपराध के भागीदार भी नहीं बनेंगे। इस बार अध्योध्या में अभूतपूर्व दीपोत्सव मानाया जाना है। उस दीपोत्सव की संकल्पना का अनुसरण करते हुए हम भी दीपोत्सव मना सकते हैं। दीपक पटाखों की तरह वायु को नुकसान नहीं पहुंचाते हैं, वहीं जगमग रोशनी की सुंदरता से सराबोर कर देते हैं। प्रकाश का त्यौहार है दीपावली तो सही मायने में प्रकाश पर ही आधारित दीपावली हम मनाएं, व्यर्थ ही पटाखें के बारूद से धन और वायु का अपव्यय क्यों करें? कुछ पल की खुशी के लिए ध्वनि और वायु प्रदूषण बढ़ा कर कोरोना को न्योता देने से बेहतर है कि हम पटाखों में व्यय होने वाले पैसों से उन लोगों की मदद करें जो कोरोना आपदा के चलते बेरोजगार हो गए हैं अथवा महानगरों से अपने घर-गांव लौट कर आर्थिक तंगी से जूझ रहे हैं।

कोरोना के मामलों की गिनती में भले ही आधिकारिक रूप से कमी दिखाई दे रही हो लेकिन इससे चिन्तामुक्त नहीं हुआ जा सकता हैं। चिकित्सकों एवं विशेषज्ञों का भी मानना है कि बढ़ती सर्दी में कोरोना संक्रमण का दूसरा दौर आ सकता है। इस घातक वायरस का अभी भी कोई टीका विकसित नहीं हुआ है। इसलिए इस दीवाली हमें अपने और अपने परिवार को सुरक्षित रखने के लिए पहले की तरह सतर्क रहना होगा। लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं है कि दीपावली के जोश को कम होने दें। थोड़ी-सी समझदारी और सतर्कता के साथ खुशियों भरी सुरक्षित दीपावली मनाई जा सकती है। सतर्कता सिर्फ़ इतनी रखनी है कि बड़े और भीड़-भाड़ वाले दीपावली के समारोहों में जाने से बचें। कोरोनावायरस के फैलने का जोखिम सबसे ज्यादा उन स्थानों पर है जहां छोटे स्थान में अधिक लोग इकट्ठा होते हैं। विस्तार वाली जगह में जहां सोशल डिस्टेंसिंग संभव है वहां भी कई बार डिस्टेंसिंग बनाए रखना कठिन हो जाता है। आप हर व्यक्ति से सतर्कता भरी बुद्धिमानी की उम्मींद नहीं कर सकते हैं। कई लोग जान की परवाह किए बिना ढिठाई की हद तक बेपरवाह हो जाते हैं और बिना मास्क के लपक कर मिलने के लिए निकट चले आते हैं। ऐसे समय आप सभ्यता एवं संकोचवश ‘‘दूर रहिए-दूर रहिए’’ भी नहीं कह पाते हैं और मन ही मन डरते रहते हैं। इसलिए बेहतर है कि ऐसी कठिनाई वाली स्थिति में ही क्यों फंसा जाए। 

जब बात भीड़ से बचने की हो तो त्यौहारी खरीददारी के लिए बाज़ार जाने से भी परहेज करना जरूरी है। त्यौहार के समय बाज़ार में भीड़ जुटना स्वाभाविक है। ऐसे में कोरोना से खुद का बचाव करना बेहद कठिन है। सभी जानते हैं कि भीड़ में संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है। इस कोरोनाकाल में बिना किसी अतिरिक्त खर्च के स्थानीय दूकानदार ‘‘एट डोर सर्विस’’ देने लगे हैं। तो इस घर बैठी सेवा का लाभ उठाते हुए त्यौहारी खरीददारी की जा सकती है। इसलिए कोरोना के डर से मन मारने के बजाए कोरोना काल में ऑनलाइन शॉपिंग सबसे बेहतर विकल्प है।
जहां तक आर्थिक संकट से जूझ रहे लोगों की मदद का प्रश्न है तो कोरोना काल में रोजी रोटी के संकट से जूझ रहे कुम्हारों के लिए स्थानीय प्रशासन ने ‘‘बाज़ार बैठकी’’ से उन्हें मुक्त रख कर उनकी बहुत बड़ी सहायता की है। कोरोना और आर्थिक संकट दोनों से जूझते हुए भी कुम्हारों ने अपनी उम्मींद का दिया जलाए रखा है और वे उत्साहपूर्वक दिए बना रहे हैं। दीपावली के अवसर पर मिट्टी से बने हुए दीपकों के साथ ही लक्ष्मी, गणेश, कुबेर, अन्न का कूडा, ग्वालिन आदि की भी जरूरत पड़ती है। कुम्हार भी कोरोना आपदा की गंभीरता को समझते हैं। उन्हें मजबूरी में बाज़ार की भीड़ के बीच अपनी दूकानें लगानी पड़ रही हैं, फिर भी वे घर-घर घूमते हुए भी दीपक तथा मिट्टी की अन्य वस्तुएं बेचते घूम रहे हैं। यदि घर के दरवाज़े आए कुम्हारों से हम बिना अधिक मोलभाव किए दीपक आदि खरीदेंगे तो इससे हम भीड़ भरे बाज़ार में जाने से भी बचेंगे और उन कुम्हारों से सामग्री खरीद कर उनकी आर्थिक मदद भी कर सकेंगे। आखिर जो वस्तुएं वे हमारे घर के दरवाज़े पर ला रहे हैं वही वस्तुएं तो बाज़ार में मौजूद है।  

ये छोटी-छोटी लेकिन महत्वपूर्ण सतर्कता दीपावली की खुशियों पर कोरोना का ग्रहण लगने से बचाए रखेगी। फिर यह भी संभव है कि इस तरह की संकट वाली यह इकलौती दीपावली हो। दुनिया भर में चल रहे अनुसंधानों को देखते हुए हम आशा कर सकते हैं कि अगली दीपावली के पहले तक हर व्यक्ति के पास वैक्सीन पहुंच जाएगा और अगली दीपावली हम कोरोना आपदा से मुक्त हो कर मनाएंगे। तो इस बार की दीपावली में कुछ अलग हट कर, कुछ सुरक्षित, कुछ सतर्क, कुछ दूरियों के साथ दीपावली का आनंद लें और कोरोना के भय पर विजय पाएं। आखिर पटाखों के बिना भी दीपावली हो सकती है दमदार।
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(दैनिक सागर दिनकर में 11.11.2020 को प्रकाशित)
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Wednesday, November 4, 2020

चर्चा प्लस | ‘चार्ली हेब्दो’ जनित अशांति और संयम का अस्त्र | डाॅ शरद सिंह

चर्चा प्लस
‘चार्ली हेब्दो’ जनित अशांति और संयम का अस्त्र
 - डाॅ शरद सिंह
 किसी की भावनाओं को भड़काना सबसे आसान होता है यदि पता चल जाए कि वह किसके प्रति सबसे अधिक संवेदनशील है। ‘‘चार्ली हेब्दो’’ ने सटायर के नाम पर हमेशा भावनाओं को ही चोट पहुंचाया है और भड़काया है। इस बार उसके भड़कावे की आंच हमारे देश की सड़कों तक आ पहुंची। ऐसे समय में सामूहिक गुस्से का फ़ायदा उठाने वाले भी सक्रिय हो उठते हैं और आम जनजीवन की शांति भंग कर देते हैं। तब संयम ही वह अस्त्र होता है जो प्रत्येक आतंकी और कट्टरपंथी गतिविधियों को सौ प्रतिशत पराजित करता है। 
हाल ही में फ्रांस की व्यंग्य पत्रिका ‘‘चार्ली हेब्दो’’ ने एक बार फिर पूरे विश्व की शांति भंग कर दी है। ‘‘चार्ली हेब्दो’’ ने उस कार्टून को फिर से प्रकाशित कर दिया जिस पर एक बार पहले भी नृशंस गोलीकांड हो चुका है। इस बार कार्टून प्रकाशित होने के बाद राजधानी पेरिस में एक युवक ने एक स्कूली शिक्षक की सिर काटकर नृशंस हत्या कर दी थी। युवक ने ऐसा इसलिए किया था क्योंकि शिक्षक ने अपने विद्यार्थियों को पैगंबर मोहम्मद का एक कार्टून दिखाया था। इस युवक को भी तुरंत ही मौत के घाट उतार दिया गया। युवक की पहचान एक चेचेन्या निवासी के तौर पर की गई और इस संबंध में कई गिरफ्तारियां भी की गईं। इस घटना के बाद एक बार फिर बहस छिड़ गई है वैश्विक आतंकवाद पर। 

पेरिस की घटना के बाद दुनिया के हर देश में विचारधारा के दो धड़े दिखाई देने लगे हैं। एक धड़ा वह जो शिक्षक के मारे जाने की निंदा कर रहा है तथा इसे आतंकवादी गतिविधि मान रहा है और दूसरा धड़ा वह जो शिक्षक के मारे जाने का समर्थन करता है। इस बहस की आंच से भारत भी अछूता नहीं है। मानवतावाद का हिमायती भारत और भारतीय कभी भी हिंसा का समर्थन नहीं करते हैं किन्तु कुछ लोगों की भावनाओं को इतनी अधिक ठेस पहुंची कि उन्होंने सड़कों पर निकल कर फ्रांस के राष्ट्रपति का विरोध किया ओर शिक्षक की हत्या किए जाने का समर्थन किया। ऐसे संवेदनशील समय में कुछ बुद्धिजीवियों ने भी संयम का साथ छोड़ कर ऐसे बयान दे दिए जो भारतीय परिप्रेक्ष्य में उचित नहीं कहे जा सकते हैं। असल दोषी ‘‘चार्ली हेब्दो’’ है। किसी की धार्मिक भावनाओं के साथ अनावश्यक छेड़-छाड़ करना कतई उचित नहीं कहा जा सकता है जैसे कि शिक्षक की हत्या भी मानवता का हनन ही कहा जाएगा। बेशक धार्मिक कट्टरता से किसी का भला नहीं होता लेकिन धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने से भी किसी का भला नहीं होता है। ऐसी घटनाओं का सबसे अधिक लाभ उठाते हैं आतंकी संगठन। आम जनता समझ भी नहीं पाती है कि उन्हें किस तरह उकसाया जा रहा है। जब तक उन्हें समझ में आता है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।

आतंकवादी गतिविधियों के दो उदाहरण ऐसे हैं जिन्हें सभी आसानी से समझ सकते हैं। 9/11 की घटना जिसमें न्यूयॉर्क में वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हमला किया गया था जिसमें अनेक निरपराध लोग मारे गए थे। साल 2001 में 11 सितंबर को अमेरिका में हुए आतंकी हमले ने पूरी दुनिया को हिला कर रख दिया था। इस हमले में अमेरिका का वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पूरी तरह से ध्वस्त हो गया था। दो विमानों को वर्ल्ड ट्रेड सेंटर के टॉवर्स में टकरा दिया, जबकि तीसरे विमान से पेंटागन पर हमला किया गया। इन हमलों में 2,996 लोगों की मौत हो गई थी और 6,000 से ज्यादा लोग घायल हुए थे। अमेरिका ने इस हमले का बदला लिया और पाक के एबटाबाद में 2 मई 2011 को अमेरिकी कमांडो ने एक ऑपरेशन में अलकायदा चीफ ओसामा बिन लादेन को मौत के घाट उतार दिया। इस हमले के बाद अमेरिका ने सुरक्षा नीति में व्यापक बदलाव किए गए। दूसरी घटना भारत में मुंबई पर आतंकी हमले की। मुंबई में 26 नवंबर 2008 को हुए आतंकी हमले ने पूरे देश को हिलाकर रख देने वाले इस हमले को आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा के 10 आतंकियों ने अंजाम दिया था। उन्होंने देश की आर्थिक राजधानी में कई स्थानों को निशाना बनाया था। इस हमले में 166 बेगुनाह लोग मारे गए थे। छत्रपति शिवाजी टर्मिनस स्टेशन के अलावा आतंकियों ने ताज होटल, होटल ओबेरॉय, लियोपोल्ड कैफे, कामा अस्पताल और दक्षिण मुंबई के कई स्थानों पर हमले शुरू कर दिया था। एक साथ इतनी जगहों पर हमले ने सबको चौंका दिया था। 

भारत को अब तक अनेक बार आतंकी गतिविधियों का शिकार होना पड़ा है। 1991 पंजाब हत्याकांड, 1993 मुंबई बम धमाके, 1993 चेन्नई में आरएसएस कार्यालय में बमबारी, 2000 चर्च बमबारी, 2000 लाल किला आतंकवादी हमला, 2001 भारतीय संसद हमला, 2002 मुंबई बस बमबारी, 2002 अक्षरधाम मंदिर पर हमला, 2003 मुंबई बम बमबारी, 2004 असम में धमाजी स्कूल बमबारी, 2005 दिल्ली बम विस्फोट, 2005 भारतीय विज्ञान संस्थान शूटिंग, 2006 वाराणसी बमबारी, 2006 मुंबई ट्रेन बमबारी, 2006 मालेगांव बमबारी, 2007 समझौता एक्सप्रेस बमबारी, 2007 हैदराबाद बमबारी, 2007 अजमेर दरगाह बमबारी, 2008 जयपुर बमबारी, 2008 बैंगलोर सीरियल विस्फोट, 2008 अहमदाबाद बमबारी, 2008 दिल्ली बम विस्फोट, 2008 मुंबई हमले, 2010 पुणे बमबारी, 2010 वाराणसी बमबारी, 2011 मुंबई बमबारी, 2011 दिल्ली बमबारी, 2012 पुणे बमबारी, 2013 हैदराबाद विस्फोट, 2013 श्रीनगर हमला, 2013 बोध गया बमबारी, 2013 पटना बम विस्फोट, 2014 छत्तीसगढ़ हमला, 2014 झारखंड विस्फोट, 2014 चेन्नई ट्रेन बमबारी, 2014 असम हिंसा, 2014 चर्च स्ट्रीट बम विस्फोट, बैंगलोर, 2015 जम्मू हमला, 2015 गुरदासपुर हमला, 2015 पठानकोट हमला, 2016 उरी हमला, 2016 बारामुल्ला हमला, 2017 भोपाल उज्जैन पैसेंजर ट्रेन बमबारी, 2017 अमरनाथ यात्रा हमला, 2018 सुक्का हमला आदि अनेक आतंकवादी घटनाएं हैं जिन्होंने भारत की शांति को समय-समय पर चोट पहुंचाई। लेकिन आतंकवाद के विरुद्ध भारत का दृष्टिकोण हमेशा एकदम स्पष्ट रहा है। सन् 2019 की 11 सितम्बर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि ‘‘आज आतंकवाद एक वैश्विक समस्या है जिसने विचारधारा का रूप ले लिया है। उन्होंने साथ ही कहा कि आतंक की जड़ें हमारे पड़ोस में पनप रही हैं लेकिन हम इसका मजबूती से सामना कर रहे हैं और आगे भी करते रहेंगे। आतंकवादियों को पनाह और प्रशिक्षण देने वालों के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए भारत पूर्ण रूप से सक्षम है और हमने इसे करके दिखाया भी है।’’ यही तो है भारतीय दृष्टिकोण और दृढ़ता जिसने हर अशांति से देश को उबारा है।

ऐसे समय में जब विश्व कोरोना आपदा जैसे विकट संकट से जूझ रहा है, ऐसी घटनाओं के प्रति संयम बरतना जरूरी है जो भावनाओं को ठेस पहंचाने और भड़काने के लिए ही की गई हों। विकसित देशों की अपेक्षा हमारा देश अधिक संकटों से घिरा हुआ है। कोरोना आपदा ने लाखों लोगों की नौकरियां छीन ली हैं। उद्योग-धंघे एक बार फिर अपना पांव जमाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। कोरोना आपदा के कारण हमारी जीवनचर्या पूरी तरह से बदल चुकी है। अब सेहत की सुरक्षा हमारा पहला मुद्दा है। इन परिस्थितियों में ‘‘चार्ली हेब्दो’’ जैसी पत्रिका को नकारना ही उचित कदम होगा। सटायर का अर्थ किसी की निजता को चोट पहुंचाना नहीं होता है।  अतः जिस प्रतिक्रिया की वे उम्मीद करते हैं, वह प्रतिक्रिया उन्हें नहीं मिलेगी तो वे स्वयं पराजित हो जाएंगे। प्रत्येक विपरीत परिस्थितियों में संयम का अस्त्र सबसे अधिक कारगर होता है।      
                  
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(दैनिक सागर दिनकर में 04.11.2020 को प्रकाशित)
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Wednesday, October 28, 2020

चर्चा प्लस | 28 अक्टूबर-पुण्यतिथि | कठिन है समझना राजेन्द्र यादव होने का अर्थ | डाॅ शरद सिंह

चर्चा प्लस
28 अक्टूबर-पुण्यतिथि 
कठिन है समझना राजेन्द्र यादव होने का अर्थ
   - डाॅ शरद सिंह
         हिंदी साहित्य की मशहूर पत्रिका ‘‘हंस’’ के संपादक, हिंदी में नई कहानी आंदोलन के प्रवर्तकों में एक, कहानीकार, उपन्यासकार राजेंद्र यादव ने हिन्दी साहित्य में दलित विमर्श, स्त्री विमर्श को मजबूती से खड़ा करने में अपना जो योगदान दिया वह अद्वितीय है। बेशक वे हमेशा विवादों से घिरे रहे लेकिन विवादों से घबराने के बजाए उन्होंने विवादों से प्रेम किया। राजेन्द्र यादव के जाने के बाद हिन्दी साहित्य जगत में जो शून्य उत्पन्न हुआ है उसे अभी तक कोई भर नहीं सका है। गोया ज्वलंत विचारों की एक चिंनगारी थी जो बुझ गई लेकिन उसकी तपिश भविष्य के गर्त में कहीं दबी हुई है। 
हिन्दी साहित्य के ‘मील का पत्थर’ कहे जाने वाले राजेन्द्र यादव जी से मेरी पहली मुलाक़ात सन् 1998 में सागर में ही हुई थी जब वे एक साहित्यिक समारोह में सागर आए थे। स्थानीय रवीन्द्र भवन में समारोह के उद्घाटन के दिन उनसे मेरी प्रथम भेंट हुई। इससे पूर्व मात्र पत्राचार था। उन्होंने मेरा परिचय पाते ही कहा-‘‘ ऐसी भी क्या नाराज़गी, हंस के लिए और कहानी भेजो!’’ उस समय भी उन्हें सागर नगर और विश्वविद्यालय के साहित्य प्रेमियों ने घेर रखा था। मगर वे किसी घेराव के परवाह करने वाले व्यक्ति थे ही नहीं। मैंने उनसे कहा कि आप जानते हैं मेरी नाराज़गी का कारण। राजेन्द्र जी बोले -‘‘ ठीक है आइन्दा ध्यान रखा जाएगा।’’ इतना कह कर वे हंसने लगे। हमारे बीच हुई वार्ता का सिर-पैर वहां उपस्थित लोगों के समझ से परे था। दरअसल हुआ यूं था कि मेरी एक कहानी ‘‘हंस’’ में प्रकाशित हुई और उस कहानी के साथ कुछ ज़्यादा ही बोल्ड रेखाचित्र प्रकाशित कर दिए गए। जो देखने में तो अटपटे थे ही और जिनसे कहानी की गंभीरता को भी चोट पहुंच रही थी। मैंने फोन कर के अपनी आपत्ति से उन्हें अवगत कराया था और साथ ही जोश में आ कर यह भी कह दिया था कि आइन्दा मैं ‘‘हंस’’ के लिए अपनी कोई कहानी नहीं भेजूंगी। बस, इसी बात पर वे मुझे टोंक रहे थे। सिर्फ़ मुझे ही नहीं, मेरी दीदी डाॅ. वर्षा सिंह से भी कहा था,‘‘आप तो अपनी ग़ज़लें भेज दिया करिए और इसे भी समझाइए।

दोबारा लखनऊ में ‘‘कथाक्रम’’ के आयोजन में राजेन्द्र यादव जी से भेंट हुई। उस समय तक वे मेरी कुछ और कहानियां ‘‘हंस’’ में प्रकाशित कर चुके थे और मेरा प्रथम उपन्यास ‘‘पिछले पन्ने की औरतें’’ प्रकाशित हो चुका था। मुझे भी वहां बोलना था। मैंने अपनी बात रखते हुए कहा कि "साहित्य जगत में उठाने-गिराने का खेल चल रहा है, उससे साहित्य को ही क्षति पहुंच रही है।’’ और भी बहुत कुछ बोला था मैंने, लेकिन इस बात को राजेन्द्र यादव जी ने पकड़ लिया। दोपहर के भोजन के दौरान उन्होंने मुझसे कहा-‘‘बहुत ज़्यादा खरा-खरा बोल दिया तुमने। अब कई लोग तुमसे नाराज़ हो जाएंगे।’’ फिर हंस कर बोले-’’यह खरापन ही तुम्हें सबसे अलग बनाता है, इसे ऐसे ही ज़िन्दा रखना।’’ उनका यह कथन मेरे लिए चौंकाने वाला था। ‘‘उठाने-गिराने’’ का आरोप राजेन्द्र जी पर भी लगता रहा था इसलिए मुझे लगा था कि उन्हें भी मेरी बात बुरी लगी होगी लेकिन इसके विपरीत उन्होंने मेरा उत्साहवर्द्धन किया। उस समय मुझे लगा था कि जो दावा करते हैं कि वे राजेन्द्र यादव को समझते हैं, दरअसल उन्हें कोई नहीं समझ सकता है। वस्तुतः यह अबूझपन ही राजेन्द्र यादव को एक ऐसा संपादक बनाता था जो हिन्दी साहित्य को अपनी मनचाही दिशा देता जा रहा था। राजेन्द्र यादव जी ने स्वीकार किया था कि उन्हें मेरा पहला उपन्यास बहुत पसंद आया। ‘‘लीक से हट कर है’’ यही कहा था उन्होंने। 
समय-समय पर अन्य समारोहों में राजेन्द्र यादव जी से संक्षिप्त भेंट होती रही। किन्तु सन् 2013 में जब मैं एक आयोजन के सिलसिले में दिल्ली गई तो पता चला कि राजेन्द्र यादव जी अस्वस्थ चल रहे हैं। दिल्ली के ही एक मित्र के साथ मैं उनके निवास पर पहुंची। मैं पहली बार उनके घर गई थी। तब मुझे पता नहीं था कि यह मेरी उनसे अंतिम भेंट है। वे बीमार थे लेकिन उनका उत्साह देख कर कोई नहीं कह सकता था कि वे बीमार हैं। मुझे देख कर वे बहुत खुश हुए। काफी साहित्यिक चर्चाएं हुईं। उनसे विदा लेते हुए मैंने कहा था कि-‘‘आप जल्दी स्वस्थ हों। अगली बार दिल्ली आऊंगी तो फिर भेंट होगी।’’

मगर 28 अक्टूबर 2013 को रात्रि में टीवी समाचारों से ज्ञात हुआ कि राजेन्द्र यादव अब नहीं रहे। विश्वास करना कठिन था, मगर विश्वास करना पड़ा। मानो एक युग समाप्त हो गया था। 

28 अगस्त 1929 को आगरा में जन्मे राजेंद्र यादव ने आगरा विश्वविद्यालय से 1951 में हिन्दी विषय से एमए की डिग्री हासिल की थी। वे काफी दिनों तक कोलकाता में रहे। बाद में दिल्ली आ गए और और राजधानी के बौद्धिक जगत का एक अहम हिस्सा बन गए। उनका विवाह सुपरिचित हिन्दी लेखिका मन्नू भण्डारी के साथ हुआ था। संयुक्त मोर्चा सरकार में वह प्रसार भारती के सदस्य भी बनाए गए थे। वे हिन्दी के सुपरिचित लेखक, कहानीकार, उपन्यासकार व आलोचक थे। ‘‘नयी कहानी’’ के नाम से हिन्दी साहित्य में उन्होंने एक नयी विधा का सूत्रपात किया। उपन्यासकार मुंशी प्रेमचन्द द्वारा सन् 1930 में स्थापित साहित्यिक पत्रिका ‘‘हंस’’ का पुनर्प्रकाशन प्रेमचन्द की जयन्ती के दिन 31 जुलाई 1986 को उन्होंने प्रारम्भ किया। इसके प्रकाशन का दायित्व पूरे 27 वर्ष यानी जीवनपर्यन्त निभाया। हिन्दी अकादमी, दिल्ली द्वारा राजेन्द्र यादव को उनके समग्र लेखन के लिये वर्ष 2003-04 का सर्वोच्च सम्मान (शलाका सम्मान) प्रदान किया गया था।

राजेन्द्र यादव जी की यह विशेषता थी कि उनसे वैचारिक मतभेद होते हुए भी उनके कार्यों को अनदेखा नहीं किया जा सकता था। राजेन्द्र यादव के निधन के बाद जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में प्रोफेसर रहे मैनेजर पांडेय ने अपने एक साक्षात्कार में कहा था-‘‘राजेंद्र यादव पिछली आधी सदी से हिंदी साहित्य में सक्रिय रहे। उन्होंने तीन-चार क्षेत्रों में बहुत महत्वपूर्ण काम किया है। नई कहानी के लेखकों में महत्वपूर्ण थे राजेंद्र यादव। उन्होंने कुछ अच्छे उपन्यास भी लिखे जिस पर ‘‘सारा आकाश’’ जैसी फिल्म भी बनी। जीवन के उत्तरार्ध में उन्होंने ‘‘हंस’’ पत्रिका निकाली, जो हिंदी की लोकप्रिय और विचारोत्तेजक पत्रिका मानी जाती है। इसके जरिए उन्होंने दो काम किए, पहला यह कि उन्होंने स्त्री दृष्टि और लेखन को बढ़ावा दिया। स्त्री दृष्टि पर उनकी राय विवादास्पद लेकिन विचारणीय रही। उन्होंने दूसरा काम यह किया कि हंस के जरिए उन्होंने दलित चिंतन और दलित साहित्य को बढ़ावा दिया। दलित साहित्य को हिंदी साहित्य में स्थापित करने में राजेंद्र यादव ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। हिंदी में दलित साहित्य को आगे बढ़ाने में राजेंद्र यादव का बहुत बड़ा योगदान है। मेरी जानकारी में हिंदी में दलित साहित्य पर पहली गोष्ठी उन्होंने 1990 के दशक में कराई थी। उसके माध्यम से लोग यह जान सके कि हिंदी में दलित साहित्य की धारा विकसित हो रही है। उन्होंने दलित लेखकों की रचनाओं को हंस में प्रमुखता से छापा। दलित साहित्य पर हंस के कई विशेषांक निकाले। इसके जरिए दलित साहित्य को समझने और आगे बढ़ाने का काम राजेंद्र यादव ने किया। इसकी बदौलत दलित साहित्य हिंदी में स्थापित धारा बन पाया। युवा लेखकों को आगे बढ़ाने में भी राजेंद्र यादव का बड़ा योगदान है।  

सन् 2014 में स्त्रीविमर्श पर मेरी पुस्तक प्रकाशित हुई थी-‘‘औरत तीन तस्वीरें’’। उसमें मेरा एक लेख है-‘‘स्त्रीविमर्श के माईलस्टोन पुरुष’’। इस लेख में मैंने स्त्रीविमर्श के प्रति राजेन्द्र यादव के योगदान की चर्चा की है। लेख का अंश इस प्रकार है-‘‘स्त्री-विमर्श के संदर्भ में एक सुखद तथ्य यह भी है कि हिन्दी साहित्य में स्त्री-विमर्श को एक वैचारिक आन्दोलन के रूप में एक पुरुष ने स्थापित किया और उसमें स्त्रियों की सहभागिता को हरसंभव तरीके से बढ़ाया। यह नाम है राजेन्द्र यादव का। यह सच है कि स्त्रीविमर्श के अपने वैचारिक आन्दोलन के कारण उन्हें समय-समय पर अनेक कटाक्ष सहने पड़े हैं तथा लेखिकाओं के लेखन को ‘बिगाड़ने’ का आरोप भी उन पर लगाया जाता रहा है किन्तु सभी तरह के कटाक्षों और आरोपों से परे राजेन्द्र यादव ने साहित्यिक पत्रिका ‘हंस’ के पटल पर लेखिकाओं को अपने विचारों को खुल कर सामने रखने का भरपूर अवसर दिया। राजेन्द्र यादव अपने सामाजिक सरोकार रखने वाले साहित्यक विचारों और उद्देश्य को ले कर सदा स्पष्ट रहे। उन्होंने कभी गोलमोल या बनावटी बातों का सहारा नहीं लिया। यूं भी अपनी स्पष्टवादिता के लिए वे विख्यात रहे हैं।  
राजेन्द्र यादव ने स्त्री स्वातंत्र्य की पैरवी की तो उसे अपने जीवन में भी जिया। एक बार जयंती रंगनाथन को साक्षात्कार देते हुए उन्होंने स्त्री विमर्श पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि ‘मैंने हमेशा स्पष्ट कहा है कि स्त्री विमर्श पर बात करनी है तो मां, बेटी और बहन इन तीन संबंधों पर बात नहीं करूंगा। घर के अंदर भी स्त्री को जितनी आजादी चाहिए, बहन-बेटी को जो फ्रीडम चाहिए, एजुकेशन चाहिए,  मैंने दी है। बेटी को ज़िन्दगी में एक बार थप्पड़ मारा, आज तक उसका अफसोस है। बाद में ज़िन्दगी के सारे निर्णय उसने खुद ही लिए, यह फ्रीडम तो देनी ही पड़ेगी।’ वे स्त्री-लेखन और पुरुष लेखन के बुनियादी अन्तर को हमेशा रेखांकित करते रहे हैं। उनके अनुसार ‘जो पुरुष मानसिकता से लिखा गया है और जो स्त्री की मानसिकता से लिखा गया है, बेसिक अंतर है। दो अलग एप्रोच हैं। उस चीज को तो हमें मानना होगा।’ 

निःसंदेह, यह एक ऐसा तथ्य है जिसको नकारा नहीं जा सकता है कि हिन्दी साहित्य में लेखिकाओं को यदि किसी ने सही अर्थ में मुखरता प्रदान की तो वह हैं राजेन्द्र यादव। यह हिन्दी साहित्य जगत में सतत् परिवर्तन की प्रक्रिया थी जो  कभी न कभी, कहीं से तो शुरू होनी ही थी। इस यात्रा का प्रस्थान बिन्दु बना राजेन्द्र यादव का वह साहस जो उन्हें यश-अपयश के बीच अडिग बनाए रखा।
दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर अपूर्वानंद भी मानते हैं कि तमाम विवादों के बावजूद राजेन्द्र यादव के योगदान को नकारा नहीं जा सकता है। उन्होंने अपने एक साक्षात्कार में कहा था-‘‘हंस साहित्यिक पत्रिका का पुनर्प्रकाशन उनका सबसे बड़ा योगदान माना जाएगा। इसे उन्होंने एक ऐसे मंच का रूप दिया, जिस पर कई नए कहानीकार आए, जिन्हें कोई जानता तक नहीं था। राजेंद्र यादव ने उन्हें जगह दी। विवादों को जानबूझकर जन्म देते हुए और विवाद झेलते हुए भी उन्होंने नए लोगों को मौका दिया। इसके लिए उन्होंने इस बात की चिंता नहीं की कि इसका परिणाम क्या होगा। हंस में उन्होंने साहित्य के इर्द-गिर्द सामाजिक विषयों पर बहस शुरू की। दलितों के सवाल पर, स्त्रियों के सवाल पर और यौन वृत्तियों के सवाल पर। यह भी उनका बड़ा योगदान है। राजेंद्र यादव उस त्रयी के सदस्य थे, जिनमें कमलेश्वर और मोहन राकेश का नाम आता है। इस त्रयी ने हिंदी कहानी को एक नई दिशा दी और उसके तेवर को बदलकर रख दिया।’’ 

दरअसल राजेन्द्र यादव ने उन सभी को मुखर होने का भरपूर अवसर दिया जो शायद कभी मुखर नहीं हो पाते यदि राजेन्द्र यादव न होते। लेकिन स्वयं राजेन्द्र यादव स्वयं विवाद और विमर्श के रूप में ही मुखर होते रहे। आज के साहित्यिक परिवेश में जिसे राजेन्द्र यादव के युग के बाद का समय कहा जा सकता है, राजेन्द्र यादव होने का अर्थ समझ पाना बहुत कठिन है। 
                   
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(दैनिक सागर दिनकर में 28.10.2020 को प्रकाशित)
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Wednesday, October 21, 2020

चर्चा प्लस | राजनीति की अभद्र भाषा के निशाने पर महिलाएं | डाॅ शरद सिंह

चर्चा प्लस
राजनीति की अभद्र भाषा के निशाने पर महिलाएं
   - डाॅ शरद सिंह
      जब दो उजड्ड लोग आपस में लड़ते हैं तो वे जल्दी ही गाली-गलौज पर उतर आते हैं। ऐसे समय मां-बहन की गाली आम बात है। वे गाली के अर्थ को नहीं जानते क्योंकि वे उजड्ड हैं। लेकिन इन दिनों मध्यप्रदेश के उपचुनावी माहौल में जनप्रतिनिधियों द्वारा जिस प्रकार की भाषा का प्रयोग किया जा रहा है वह सोचने पर मज़बूर करता है कि इन जनप्रतिनिधियों को किस खांचे में रखा जाए- सभ्रांत या उजड्ड? किसी महिला के सम्मान को निशाना बनाने के बाद कोई तर्क मायने नहीं रखता है कि वह किस निहितार्थ कहा गया। समाज में हर महिला को सम्मान पाने का अधिकार है, चाहे वह किसी भी कार्य से जुड़ी हो। 
मां ने सुबह अख़बार उठाया और पहले पेज की एकाध ख़बर पढ़ कर अख़बार बंद कर के टेबल पर एक ओर सरका दिया। वे मानो अख़बार की ओर देखना भी नहीं चाह रही थीं। मैं और मेरी दीदी डाॅ. वर्षा सिंह भी वहीं दूसरी मेज पर दूसरा अख़बार ले कर बैठे थे। दीदी का ही ध्यान पहले गया मां की ओर। अख़बार लगभग बिना पढ़े ही एक ओर सरका देना हमें अज़ीब लगा। मेरी मां डाॅ विद्यावती ‘मालविका’ जो स्वयं एक वरिष्ठ साहित्यकार हैं, बड़े चाव से अख़बार पढ़ती हैं। वे टीवी बहुत कम देखती हैं लेकिन सुबह अख़बार ज़रूर पढ़ती हैं। कोरोनाकाल की शुरुआत में यानी लाॅकडाउन 1.0 के दौरान उन्हीें के कहने पर हमें अख़बार लेना बंद करना पड़ा था लेकिन फिर उन्हीं ने कहा कि अख़बार पढ़े बिना पता ही नहीं चलता है कि दुनिया में क्या हो रहा है। यह बात मैं इसलिए बता रही हूं कि मेरी मां अख़बारों या यूं कहिए कि समाचारों में कितनी अधिक रुचि रखती हैं। उनकी आयु 90 से ऊपर हो चली है लेकिन अपनी क्षमता के अनुरुप पठन-पाठन करती रहती हैं। उन्हें देख कर मैंने हमेशा महसूस किया है कि जीवन का इतना लम्बा अनुभव व्यक्ति में धीरे-धीरे वैचारिक तटस्थता ला देता है। मेरी मां न तो कांग्रेस के पक्ष में रहती हैं और न भाजपा के पक्ष में। जो अच्छे काम करता है उसकी तारीफ़ करती हैं और महिलाओं को हर क्षेत्र में आगे बढ़ा देख कर खुश होती हैं।

हमने मां से पूछा कि वे अख़बार क्यों नहीं पढ़ रही हैं? तबीयत तो ठीक है न? इस पर उन्होंने यह उत्तर दिया-‘‘कितनी अभद्र हो गई है हमारे यहां की राजनीति। महिलाओं का सम्मान करना ही भूल गए हैं।’’ तब हमें मामला समझ में आया। उस समय तक हम लोग भी पूर्वमुख्यमंत्री कमलनाथ की टिप्पणी पढ़ चुके थे। एक ऐसी महिला जिसने गांधीयुग देखा हो उनका ऐसी टिप्पणी पढ़ कर आहत होना स्वाभाविक था। अख़बार कमलनाथ की टिप्पणी से गरमाए हुए माहौल से भरा हुआ था।

माहौल तो गर्म होना ही था। पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कमल नाथ ने वह कह दिया जो उन्हें नहीं कहना चाहिए था। भाजपा से उम्मीदवार इमरती देवी के लिए ‘आईटम’ शब्द का प्रयोग कर के कमलनाथ ने सुर्खियां भले ही बटोर ली हों लेकिन चुनाव के संवेदनशील वातावरण में अपनी ही पार्टी पर अप्रत्यक्ष चोट कर बैठे। इसके विरोध में मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने दो घंटे का मौन रखा और कांग्रेस की महिलाओं के प्रति असम्मान की भावना पर विरोध जताया। बात यहीं तक थमी नहीं रही। कमलनाथ ने ‘आईटम’ शब्द को सही ठहराने के लिए जो तर्क दिए वह गैर राजनीतिक व्यक्तियों के गले भी नहीं उतरे। किसी महिला को ‘आईटम’ कहा जाना अभद्रता की श्रेणी में ही आएगा। भले ही वह महिला राजनीति से जुड़ी हो।

मंा इमरती देवी को सिर्फ़ समाचारों से ही जानती हैं। व्यक्तिगततौर उन्हें इमरती देवी से कोेई लेना-देना नहीं है लेकिन वे पहले भी इसी प्रकार व्यथित हो चुकी हैं जब जनप्रतिनिधयों ने राजनीति में मौजूद महिलाओं के लिए अभद्र भाषा का प्रयोग किया। वे तब भी दुखी हुई थीं जब एक महिला राजनेता को ‘‘दारूवाली बाई’’ कहा गया था। वे हेमा मालिनी और जयाप्रदा के लिए भी दुखी हुई थीं जब उन्हें ‘‘नचनिया’’ कहा गया था और वे तब भी दुखी होती हैं जब सोनिया गांधी को अपशब्द कहे जाते हैं। कमलनाथ की टिप्पणी के बाद वे फिर क्षुब्ध हो उठीं जब उन्होंने बिसाहूलाल सिंह की टिप्पणी पढ ली। शिवराज सिंह चौहान सरकार के मंत्री बिसाहूलाल सिंह ने अपने प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस उम्मीदवार की पत्नी को ‘रखैल’ कह दिया। मंा की यही प्रतिक्रिया थी कि ‘‘अब और कितना गिरेंगे ये लोग?’’

उनके इस प्रश्न का उत्तर हम दोनों बहनों के पास नहीं था। हम अनुत्तरित रह गए। वर्तमान राजनीतिक माहौल पर उनकी क्षुब्धता देख कर हमें एकबारगी लगा कि हम एक बार फिर अख़बार मंगाना बंद कर दें। फिर दूसरे ही पल विचार आया कि यह कटुसत्य उनसे छिपाने से क्या होगा? अख़बार में बहुत-सी, सकारात्मक बातें होती हैं, उनसे मां को वंचित करना ठीक नहीं है।   

वैसे मां का दुखी होना स्वाभाविक है। हर महिला ऐसी बातें पढ़-सुन कर दुखी होती है। राजनीति में भाषा की ऐसी गिरावट शायद पहले कभी नहीं देखी गयी। ऊपर से नीचे तक सड़कछाप भाषा ने अपनी बड़ी जगह बना ली है। चाहे मंच हो या टेलीविज़न पर डिबेट का कार्यक्रम हो, चुभती हुई निर्लज्ज भाषा का प्रयोग आम हो गया है। भारतीय राजनीति में आज किसी भी पार्टी के लिए यह नहीं कहा जा सकता है इस पार्टी ने भाषा की गरिमा को बनाए रखा है। समय-समय पर और चुनाव के समय देश की सभी पार्टियों ने भाषा की गिरावट के नए-नए कीर्तिमान रचे हैं। राजनीति में मौजूद महिलाएं सबसे पहले इसका शिकार बनती हैं। उन पर अभद्र बोल बोलने वाले प्रतिद्वंद्वी उस समय यह भूल जाते हैं कि वह महिला उस समाज का अभिन्न हिस्सा है जिसमें वह स्वयं रहता है। सवाल यह भी है कि क्या भारतीय राजनीति इतनी दूषित हो गई है कि वोट की खातिर नैतिक मूल्यों को भी ताक पर रख दिया जाए? देश की राजनीति अगर इतनी गंदी हो गई तो लोकतंत्र की बात करने वाले सफेदपोश नेताओं को व्यक्तिगत छींटाकशी करने की स्वतंत्रता किस ने दे दी? इसके लिए उत्तरदायी कौन है, आम जनता या फिर वे शीर्ष नेता जिन पर दायित्व है अपने दल के नेताओं को दल के सिद्धांतों पर चलाने का।

मध्य प्रदेश में विधानसभा उपचुनाव के लिए चल रहे प्रचार अभियान के दौरान बयानों का स्तर गिरता ही जा रहा है। पहले पूर्वमुख्यमंत्री कमलनाथ ने एक महिलानेत्री को ‘‘आईटम’’ कहा और अपने इस शब्द को शालीन ठहराने के लिए तर्क दे डाले। फिर मंत्री बिसाहूलाल सिंह ने अपने प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस उम्मीदवार की पत्नी को ‘रखैल’ कहा जिसका वीडियो सोशल मीडिया में जारी हो गया। वीडियो में बिसाहूलाल सिंह अपने प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस उम्मीदवार विश्वनाथ सिंह के नामांकन में दिए गए ब्यौरे पर टिप्पणी करते हुए कह रहे थे कि ‘‘विश्वनाथ ने अपनी पहली पत्नी का नहीं, बल्कि रखैल का ब्यौरा दिया है।’’ 

कमलनाथ द्वारा फैलाए गए रायते को समेटने में जुटी कांग्रेस को एक धमाकेदार मुद्दा हाथ लग गया। कांग्रेस प्रवक्ता सैयद जाफर ने ट्वीट कर इस पर आपत्ति जताई है। उन्होंने कहा कि ‘‘इसे कहते हैं महिला का अपमान। भाजपा के मंत्री बिसाहूलाल सिंह ने कांग्रेस प्रत्याशी की पत्नी को कहा रखैल, क्या महिलाओं के लिए ऐसे ही शब्दों का इस्तेमाल करती है भाजपा? मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान तत्काल इस पर संज्ञान लेते हुए मंत्री को पद से हटाएं और प्रदेश की महिलाओं से माफी मांगें।’’ उल्लेखनीय है कि बिसाहूलाल सिंह उन नेताओं में शामिल हैं, जिन्होंने कांग्रेस छोड़कर भाजपा का दामन थामा था और कमलनाथ की सरकार गिराई थी। बिसाहूलाल अनूपपुर से विधानसभा उपचुनाव लड़ रहे हैं। 

सच तो यह है कि न तो ‘‘आईटम’’ शब्द उचित है और न ‘‘रखैल’’। ये दोनों ही शब्द महिला के सम्मान को चोट पहुंचाने वाले हैं। क्या महिला कोई वस्तु है जिसे आईटम कहा जाए? याद आता है कि इसी तरह कांग्रेस के एक और वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह ने अपनी ही पार्टी की शालीन और प्रबुद्ध महिला सांसद को  ‘‘टंचमाल’’ कह दिया था। दिग्विजय सिंह ने मंदसौर में एक जनसभा को संबोधित करते वक्त अपनी ही पार्टी की एक महिला सांसद को ‘‘100 टंच माल’’ कह दिया था। बयान पर बवाल हुआ तो, दिग्विजय ने मानहानि का केस करने की चेतावनी देते हुए कहा कि उनकी बात का गलत मतलब निकाला गया। दिग्विजय सिंह ने यह बयान जुलाई 2013 में मंदसौर में दिया था। मंदसौर में एक जनसभा को संबोधित करते वक्त वह इलाके की सांसद मीनाक्षी नटराजन पर ‘‘100 प्रतिशत टंच माल’’ की टिप्पणी कर डाली थी। सभा में दिग्विजय सिंह ने कहा था कि ‘‘मैं अंत में आपसे इतना ही कहूंगा मीनाक्षी नटराजन आपकी लोकसभा की सदस्य हैं। गांधीवादी हैं, सरल हैं, ईमानदार हैं। सबके पास जाती हैं, गांव-गांव जाती हैं। मैं अभी कल से इनके इलाके में देख रहा हूं। मुझे भी 40-42 साल का अनुभव है। मैं भी पुराना जौहरी हूं। राजनीतिज्ञों को थोड़ी सी बात में पता चल जाता है कि कौन फर्जी है और कौन सही है। यह 100 प्रतिशत टंच माल हैं और गरीबों की लड़ाई लड़ती हैं। मंदसौर जैसे जिले की गुटबाजी में नहीं पड़तीं, सबको साथ लेकर चलती हैं। दिल्ली में भी इन्होंने अपनी छाप छोड़ी है। लोकसभा के अंदर भी और पार्टी में भी। सोनिया और राहुल इनको बहुत मानते हैं। साथियो ये आपकी संसद सदस्य हैं, इनको पूरा सपोर्ट करिए, समर्थन करिए।’’

क्या महिलाएं ‘‘माल’’ हैं? क्या महिलाएं ‘‘आईटम’’ हैं? क्या विवाहित महिलाएं ‘‘रखैल’’ हैं? जिम्मेदार और प्रतिष्ठित राजनेताओं द्वारा जब इस तरह की महिला विरोधी टिप्पणी की जाती है तो आश्चर्य होता है राजनीतिक चरित्र की गिरावट पर। स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस नेता शशि थरूर की पत्नी सुनंदा पुष्कर के लिए ‘‘50 करोड़ की गर्लफ्रेंड’’ शब्द का इस्तेमाल किया था। बीजेपी के नेताओं ने सोनिया गांधी के लिए ‘‘जर्सी गाय’’ जैसे घोर आपत्तिजनक बयान तक दिए हैं। कांग्रेस, बीजेपी के अलावा भी तमाम पार्टियों के नेताओं ने समय-समय पर महिलाओं के खिलाफ विवादित बयान दिए हैं। गोया राजनीति को विकास के मूलमुद्दों से भटकाए रखने के लिए महिलाओं के सम्मान पर भी चोट पहुंचानी पड़े तो वह भी सही माना जाए। यही तो चाहते हैं हमारे आज के जनप्रतिनिधि। लिहाज़ा अब समय है इस पर विचार करने का कि हम मतदाता एवं आमनागरिक क्या चाहते हैं? शायद मतदाताओं के सामने दुविधा का पहाड़ खड़ा है। जब सभी पक्ष अभद्रता पर उतारू हों तो आमनागरिक नहीं बल्कि चुनाव आयोग और सुप्रीमकोर्ट की तत्काल लगाम कस सकती है। वरना राजनीति में भाषाई गिरावट का यह सिलसिला यूं ही चलता रहेगा। 

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(दैनिक सागर दिनकर में 21.10.2020 को प्रकाशित)
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Wednesday, October 14, 2020

चर्चा प्लस - जब ‘बाॅबी’ पर भारी पड़े ‘बाबूजी’ - डाॅ शरद सिंह


चर्चा प्लस
जब ‘बाॅबी’ पर भारी पड़े  ‘बाबूजी’
- डाॅ शरद सिंह

           इन दिनों सागर का सुरखी विधान सभा क्षेत्र सुर्खियों में है। उपचुनाव की तारीख घोषित हो चुकी है इसलिए सरगर्मियां भी बढ़ गई हैं। सुरखी चुनाव सीट अपने आरम्भ से ही ऐतिहासिक राजनीतिक क्षेत्र रहा है। इसका नाम लेते ही अनेक रोचक किस्से इतिहास के पन्नों से निकल कर बाहर आने लगते हैं। दिलचस्प तथ्य यह भी है कि इस क्षेत्र का का संबंध राजकपूर की मशहूर फिल्म ‘बाॅबी’ और सुप्रसिद्ध राजनेता बाबू जगजीवन राम से भी रहा है। 


निर्माता-निर्देशक राजकपूर की सुपरहिट फिल्म ‘‘बाॅबी’’ आज भी देखने वालों को रोमांचित कर देती है। सन् 1973 में रिलीज़ हुई इस फिल्म में अभिनेता ऋषि कपूर और अभिनेत्री डिंपल कपाड़िया ने युवा प्रेमी जोड़े का रोल निभाया था। इस फिल्म का सबसे सुपरहिट गाने ‘‘झूठ बोले कौव्वा काटे, काले कव्वे से डरियो’’ के गीतकार थे  विट्ठल भाई पटेल। वे गीतकार थे, समाजसेवी थे और एक राजनीतिज्ञ भी थे। विट्ठल भाई पटेल सुरखी विधान सभा से दो बार विधायक बने। पहली बार सन् 1980 में और दूसरी बार सन् 1985 में। वैसे सुरखी विधान सभा सीट अपने आरम्भ काल से ही महत्वपूर्ण रही है। सन् 1951 में प्रतिष्ठित स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पंडित ज्वालाप्रसाद ज्योतिषी कांग्रेस से चुनाव जीते थे। इसी सीट से मध्यप्रदेश सरकार के वर्तमान नगरीय प्रशासन मंत्री भूपेन्द्र सिंह 1993 और 1998 में विधायक का चुनाव जीत चुके हैं। इन दिनों जिन दो महारथियों के बीच चुनाव होने जा रहा है उनमें से एक गोविंद सिंह राजपूत माधवराव सिंधिया के निकटतम हैं तथा कांग्रेस छोड़ कर भाजपा की सदस्यता ग्रहण कर चुके हैं। साथ ही वे फिलहाल परिवहन राज्य मंत्री भी हैं। उनकी प्रतिद्वंदी पारुल साहू पहले भाजपा में थीं किन्तु वहां वैचारिक मतभेद होने के कारण कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण कर चुकी हैं और कांग्रेस उम्म्ीदवार के रूप में चुनाव लड़ रही हैं। ये दोनों उम्मीदवार पहले भी एक-दूसरे को चुनौती दे चुके हैं जिसमें पारुल साहू ने गोविंद सिंह राजपूत को पराजित कर के विधायक पद हासिल किया था। बहरहाल, आज मैं ‘चर्चा प्लस’ में वर्तमान चुनावी परिदृश्य की नहीं बल्कि बाबू जगजीवन राम के समय के चुनावी परिदृश्य की चर्चा कर रही हूं। बड़ी ही रोचक घटना है। 

उस समय विट्ठल भाई पटेल सुरखी से विधायक तो नहीं बने थे किन्तु राजनीति में सक्रिय थे और स्व. राजकपूर से भी उनके अच्छे संबंध थे। इसलिए जब राजकपूर ने ‘‘बाॅबी’’ फिलम का निर्माण शुरू किया तो विट्ठल भाई पटेल से उन्होंने गीतों की मांग की। विट्ठल भाई पटेल  ने उन्हें गीत लिख कर दिए ओर जैसाकि सभी जानते हैं कि इस फिल्म का विट्ठल भाई पटेल द्वारा लिखा गया गीत ‘‘झूठ बोले कौव्वा काटे’’ सुपरहिट तो हुआ ही, साथ ही किसी मुहावरे की तरह लोगों की ज़बान पर चढ़ गया। यहां मैं जिस घटना की चर्चा करने जा रही हूं वह फिल्म ’’बाॅबी’’ के रिलीज़ के समय की है। उन दिनों हर शहर में या हर टाॅकीज़ में एक साथ फिल्म रिलीजऋ नहीं होती थी, जैसे कि आजकल सैटेलाईट के कारण हो पाती है। ‘‘बाॅबी’’ जहां-जहां रिलीज़ हुई, वहां-वहां उसने रिकार्ड तोड़ दर्शकों की भीड़ हासिल की। कहां जाता है कि उन दिनों ‘‘बाॅबी’’ को देखने वाले ऐसे दर्शक भी थे जिन्होंने लगातार दस-दस दिन तक उस फिल्म को टाॅकीज़ में देखा। विट्ठल भाई पटेल का लिखा गाना ‘‘झूठ बोले कौव्वा काटे’’ बच्चे-बच्चे की जुबान पर था। पांच साल गुज़रने पर भी ‘‘बाॅबी’’ की लोकप्रियता सिरचढ़ कर बोल रही थी। बात जनवरी 1977 की है।  18 जनवरी 1977 को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने लोकसभा चुनाव करवाने की घोषणा कर दी। राजनीति के जानकारों के अनुसार आपातकाल समाप्त करने की यह घोषणा आपातकाल लागू होने की घोषणा की तरह चैंकाने वाली थी। जनवरी 1977 में चुनावों की घोषणा करते हुए इंदिरा गांधी का कहना था, ‘‘करीब 18 महीने पहले हमारा प्यारा देश बर्बादी के कगार पर पहुंच गया था। राष्ट्र में स्थितियां सामान्य नहीं थी। चूंकि अब हालात स्वस्थ हो चुके हैं, इसलिए अब चुनाव करवाए जा सकते हैं।’’

देश में आपातकाल लागू हुए 19 महीने बीत चुके थे। उस समय तक इंदिरा गांधी और बाबूजगजीवन राम के बीच वैचारिक मतभेद आरम्भ हो चुका था। आपातकाल के समर्थन में लोकसभा में प्रस्ताव लाने वाले बाबू जगजीवन राम ने बाद में कांग्रेस से इस्तीफा देकर जनता पार्टी के साथ 1977 का चुनाव लड़ने का मन बना लिया था। क्यों कि आपातकाल के दौरान संविधान में इस हद तक संशोधन कर दिए गए कि उसे ‘कंस्टीट्यूशन ऑफ इंडिया’ की जगह ‘कंस्टीट्यूशन ऑफ इंदिरा’ कहा जाने लगा था। उसमें ऐसे भी प्रावधान जोड़ दिए गए थे कि सरकार अपने पांच साल के कार्यकाल को कितना भी बढ़ा सकती थी। विपक्ष के सभी बड़े नेता जेलों में कैद थे और कोई नहीं जानता था कि देश इस आपातकाल से कब मुक्त होगा। किन्तु 18 जनवरी 1977 को आपातकाल के समापन की घोषणा कर दी गई। लेकिन तब तक देर हो चुकी थी। कांग्रेस के कद्दावर जमीनी नेता बाबू जगजीवन राम ने कांग्रेस से इस्तीफा देकर जगजीवन राम ने अपनी नई पार्टी ‘कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी’ बनाई। उन्होंने यह भी घोषणा की कि उनकी पार्टी जनता पार्टी के साथ मिलकर ही चुनाव लड़ेगी ताकि बंटे हुए विपक्ष का लाभ कांग्रेस को न मिल सके। माना जाता है कि 1977 में उनके कांग्रेस से अलग होने के कारण जनता पार्टी को दोगुनी मजबूती मिल गई थी।

5 अप्रैल, 1908 को बिहार के भोजपुर में जन्मे जगजीवन राम स्वतंत्रता संग्राम में भी सक्रिय रहे थे। 1946 में जब जवाहरलाल नेहरु की अध्यक्षता में अंतरिम सरकार का गठन हुआ था, तो जगजीवन राम उसमें सबसे कम उम्र के कैबिनेट मंत्री बने थे। उनके नाम सबसे ज्यादा समय तक कैबिनेट मंत्री रहने का रिकॉर्ड भी दर्ज है। वे 30 साल से ज्यादा समय केंद्रीय कैबिनेट में मंत्री रहे। उनके कांग्रेस से अलग होने पर कांग्रेस को नुकसान तो पहुंचना ही था। वे बहुत अच्छे वक्ता थे। उन्हें सुनने के लिए भीड़ उमड़ पड़ती थी। उन दिनों लोकनायक जयप्रकाश नारायण कांग्रेस के खिलाफ रैलियों पर रैलियां कर रहे थे। पटना, कलकत्ता, बॉम्बे, मद्रास, चंडीगढ़, हैदराबाद, इंदौर, पूना और रतलाम में जनसभाएं करते हुए मार्च की शुरुआत में वे दिल्ली पहुंच गए। मार्च 1977 के ही तीसरे हफ्ते में चुनाव होने थे। बाबू जगजीवन राम ने घोषणा की कि छह मार्च को दिल्ली में एक विशाल जनसभा का आयोजन किया जाएगा। कांग्रेस इस घोषणा से सतर्क हो गई। उसे पता था कि बाबू जगजीवन राम में वह क्षमता है कि वे अपने भाषण से हजारों लोगों की भीड़ जोड़ कसते हें और उन्हें प्रभावित कर सकते हैं।

कांग्रेस ने बाबू जगजीवन राम के इस प्रभाव को तोड़ने के लिए एक दिलचस्प चाल चली। जिस समय दिल्ली में बाबू जगजीवन राम की सभा होनी थी ठीक उसी समय दूरदर्शन पर फिल्म ‘बॉबी’ का  प्रदर्शन करा दिया। उन दिनों छोटे शहरों में तो दूरदर्शन का नामोनिशान नहीं था लेकिन बड़े शहरों और महानगरों में दूरदर्शन तेजी से आमजनता के जीवन से जुड़ता जा रहा था। वह दौर था जब दूरदर्शन पर हर तरह के कार्यक्रम लोग बड़े चाव से देखते थे। ऐसे समय ‘‘बाॅबी’’ जैसी सुपरहिट फिल्म घर बैठे देखने को मिल रही हो तो उसे भला कौन छोड़ना चाहता। ‘‘बाॅबी’’ के इसी आकर्षण को सियासी हथियार के रूप में प्रयोग में लाया गया। इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने अपनी पुस्तक ‘इंडिया आफ्टर गांधी’ में इस घटना का उल्लेख किया है। कांग्रेस तय मान कर बैठी थी कि ‘‘बाॅबी’’ का आकर्षण बाबूजी अर्थात् बाबू जगजीवनराम की सभा पर भारी पड़ेगा और उन्हें श्रोता नहीं मिलेंगे। लेकिन कांग्रेस का अनुमान गलत साबित हुआ। लगभग दस लाख लोगों की भीड़ सभा में जुड़ गई और सभी ने रुचिपूर्वक बाबू जगजीवन राम और जयप्रकाश नारायण का भाषण सुना। दूसरे दिन सुबह दिल्ली के अंग्रेजी अखबारों में हैडलाइन  थी-‘‘बाबूजी बीट्स बाॅबी’’ अर्थात् बाबूजी ने बाॅबी को हरा दिया।

आज भी राजनीतिक गलियारों में जब ‘‘बाॅबी’’ और ‘‘बाबूजी’’ की चर्चा होती है तो इस घटना का जिक्र जरूर होता है। फिल्म गीतकार और राजनीतिज्ञ स्व. विट्ठल भाई पटेल की फिल्मी पहचान बन गई ‘‘बाॅबी’’ उनके दो बार सुरखी क्षेत्र से विधायक बनने के बाद भी अमिट बनी रही। राजनीति और फिल्मी दुनिया के बीच ‘‘बाॅबी’’, ‘‘बाबूजी’’ और विट्ठल भाई पटेल का त्रिकोण कभी भुलाया नहीं जा सकता है, यह इतिहास के पन्ने पर एक दिलचस्प राजनीतिक दांव-पेंच के रूप में दर्ज़ हो चुका है। अब देखना है कि सुरखी में क्या कुछ दिलचस्प होगा।

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(दैनिक सागर दिनकर में 14.10.2020 को प्रकाशित)
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