Friday, September 22, 2017

मोदी और मुस्लिम महिलाओं का ‘संवाद’ क्या रचेगा नया इतिहास ? - डाॅ. शरद सिंह ... चर्चा प्लस

Dr (Miss) Sharad Singh
चर्चा प्लस 
मोदी और मुस्लिम महिलाओं का ‘संवाद’
क्या रचेगा नया इतिहास ? 

- डाॅ. शरद सिंह

(मेरा कॉलम 'सागर दिनकर' में 20.09.2017)

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी 22 सितम्बर को अपने संसदीय क्षेत्र बनारस पहुंचने वाले हैं। अपने इस दो दिवसीय दौरे में वे डीरेका ऑडिटोरियम में मुस्लिम महिलाओं के साथ ‘संवाद’ कार्यक्रम के अंतर्गत बातचीत करेंगे। इसमें काफी संख्या में वे मुस्लिम महिलाएं शामिल होने की संभावना हैं जो लंबे समय से तीन तलाक के खिलाफ आवाज बुलंद करती रही हैं। इस बात को नकारा नहीं जा सकता है कि तीन तलाक मामले के बाद मुस्लिम महिलाओं के बीच प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता बढ़ी है। इसीलिए आशा की जा रही है कि यह संवाद कार्यक्रम मुस्लिम महिलाओं के लिए तरक्की के कई नए रास्ते खोलेगा।
Charcha Plus Column of Dr Sharad Singh in "Sagar Dinkar" Daily News Paper

लगभग 13 राज्यों की 70 हजार मुस्लिम महिला सदस्यों वाले राष्ट्रीय गठबंधन भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन ने मुस्लिम पर्सनल लॉ में सुधार किए जाने की जरूरत जताते हुए नवम्बर, 2015 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी समेत कई नेताओं को पत्र लिखा था तथा बराबरी के हक और लैंगिक न्याय की मांग की थी। इसके बाद 24 अक्तूबर 2016 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्रिपल तलाक़ के मुद्दे पर पहली बार अपनी राय सामने रखते हुए उत्तर प्रदेश में ’महापरिवर्तन रैली’ के दौरान बुंदेलखंड में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था कि - ‘‘हमें अपनी बेटियों, मांओं और बहनों को बचाना ज़रूरी है, इसमें धर्म आड़े नहीं आना चाहिए। मांओं और बहनों का सम्मान करना चाहिए। अब ये ट्रिपल तलाक़ का मुद्दा आ गया है. जैसे कोई हिंदू, कन्या भ्रूण हत्या जैसे अपराध में लिप्त होता है तो उसे जेल जाना पड़ता है उसी तरह से मेरी मुसलमान बहनों का क्या अपराध कि कोई फ़ोन पर तलाक़ कह देता है और उनकी ज़िंदगी तबाह हो जाती है। केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष रखा है कि महिलाओं पर किसी तरह की ज़्यादती नहीं होनी चाहिए और धर्म के आधार पर किसी महिला के साथ भेदभाव नहीं होना चाहिए। लोकतंत्र में बातचीत होनी चाहिए। सरकार ने अपनी स्थिति साफ़ कर दी है। वो लोग जो ट्रिपल तलाक़ के मुद्दे से ध्यान भटकाना चाहते हैं, ऐसे लोग जनता को भड़का रहे हैं। हमारे देश में मुस्लिम महिलाओं की ज़िंदगी ट्रिपल तलाक़ से बर्बाद होने की इजाज़त नहीं दी जा सकती। कुछ पार्टियां वोट बैंक की ख़ातिर 21 वीं सदी में महिलाओं के प्रति अन्याय करने पर उतारू हैं। ये किस तरह का इंसाफ़ है। राजनीति और चुनाव की अपनी जगह है लेकिन मुस्लिम महिलाओं को संविधान के मुताबिक़ अधिकार देना सरकार की और देश के लोगों की ज़िम्मेदारी है। तलाक़ के मुद्दे पर बहस में मुस्लिम समुदाय के उऩ पढ़े लिखे लोगों को हिस्सा लेना चाहिए जो क़ुरान की अच्छी जानकारी रखते हों। मुस्लिम समुदाय में भी प्रगतिशील सोच रखने वाले पढ़े लिखे लोग हैं। शिक्षित मुस्लिम महिलाएं भी इस मुद्दे पर अपने विचार रख सकती हैं।’’
तमाम मतभेदों के बावजूद भी विरोधी भी इस बात को स्वीकार करते हैं कि शायद आज भी नरेन्द्र मोदी की जगह किसी और के नेतृत्व की सरकार होती तो इस प्रकार का फैसला नहीं आ पाता क्योंकि जिस दृढ़ता के साथ केन्द्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के सामने सरकार का पक्ष रखा, उससे सुप्रीम कोर्ट को फैसला सुनाने में और भी आसानी हो गई। केन्द्र की मोदी सरकार ने सुप्रीम अदालत में अपना पक्ष दृढ़ता पूर्वक रखते हुए कहा था कि सभी पर्सनल कानून संविधान के दायरे में हों। ’’शादी, तलाक, संपत्ति और उत्तराधिकारी के अधिकार को भी एक नजर से देखा जाना चाहिए। तीन तलाक इस्लाम का अभिन्न अंग नहीं है।’’
तीन तलाक के प्रकरण में हुआ फैसला इस लिए भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के पक्ष को मजबूती देता है क्यों कि लोग अभी शाहबानो प्रकरण को भूले नहीं हैं। राजीव गांधी सरकार ने कट्टरपंथियों के दबाव में आकर मुस्लिम महिलाओं को गुजारा भत्ता देने संबंधी सुप्रीम कोर्ट के आदेश को कानून बनाकर पलट दिया था। मध्य प्रदेश के जिला इंदौर की शाहबानो को उनके पति मोहम्मद अहमद खान ने सन् 1978 में तलाक दे दिया था। तलाक के समय शाहबानो के पांच बच्चे थे। इनके भरण−पोषण के लिए उन्होंने निचली कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। अदालत ने शाहबानो के पक्ष में फैसला सुनाया, बाद में यह मामला हाईकोर्ट होता हुआ सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा। सभी जगह शाहबानो के ही पक्ष में फैसले सुनाए गए। उस समय मुस्लिम समाज का कट्टरपंथी पुरुष समुदाय शाहबानो की अपील का विरोध किया। विरोध के दबाव में आकर तत्कालीन राजीव गांधी सरकार ने 1986 में मुस्लिम महिला अधिनियम पारित कर दिया, जिसमें शाहबानो मामले में उच्चतम न्यायालय के निर्णय को उलट दिया गया। इस कानून में कहा गया था, ’हर वह आवेदन जो किसी तालाकशुदा महिला के द्वारा अपराध दंड संहिता 1973 की धारा 125 के अंतर्गत किसी न्यायालय में इस कानून के लागू होते समय विचाराधीन है, अब इस कानून के अंतर्गत निपटाया जायेगा, चाहे उपर्युक्त कानून में जो भी लिखा हो।’ उस समय राजीव गांधी सरकार को पूर्ण बहुमत प्राप्त था, इसीलिये उच्चतम न्यायालय के धर्म−निरपेक्ष निर्णय को उलटने वाला मुस्लिम महिला (तालाक अधिकार सरंक्षण) कानून 1986 आसानी से पास हो गया। इसके आधार पर शाहबानो के पक्ष में सुनाया गया फैसला संसद ने पलट दिया।
22 अगस्त 2017 को जब सुप्रीम कोर्ट ने ‘तीन तलाक’ की प्रथा को असंवैधानिक करार दिया तब शाहबानो के बेटे जमील अहमद ने उन दुख भरे दिनों को याद करते हुए कहा था कि ‘‘38 साल पहले जब कोर्ट ने अम्मी (शाहबानो) को भरण−पोषण के 79 रुपए अब्बा से दिलवाए थे, तो लगा था जैसे दुनिया भर की दौलत मिल गई, जो खुशी उस समय मिली थी, वही आज फिर महसूस हो रही है। जब फैसले को लेकर विवाद बढ़ने लगा तो अम्मी इतनी आहत हुईं कि उन्होंने भरण पोषण की राशि ही त्याग दी। अब ऐसा नहीं हो पायेगा। सुप्रीम कोर्ट ने तीन तलाक को असंवैधानिक ठहरा कर मुस्लिम महिलाओं के हक में फैसला सुनाया है। जो मशाल 38 साल पहले अम्मी ने जलाई थी, उसकी रोशनी आज पूरे देश और समाज को रोशन कर रही है।’’
बिना किसी राजनीतिक पक्षपात के समाज हित में यह बात स्वीकार की जा सकती है कि उस समय मोदी की सरकार होती तो शायद मुस्लिम महिलाओं को 40 वर्षों तक यूं भटकना नहीं पड़ता। यह भी कहा गया कि प्रधानमंत्री ने कांग्रेस के मुस्लिम वोट के किले में सेंध लगा दी है। लेकिन यदि महिलाओं के मानवीयहित को ध्यान में रखा जाए तो इस प्रकार की राजनीति में बुरा क्या है जब इससे किसी बड़े पक्ष को बुनियादी अधिकार मिल रहा हों।
इस तारतम्य में 22 सितम्बर 2017 को बनारस में होने वाले संवाद कार्यक्रम को देखा जा रहा है। अपने इस दो दिवसीय दौरे में वे डीरेका ऑडिटोरियम में मुस्लिम महिलाओं के साथ ‘संवाद’ कार्यक्रम में भाग लेंगे। इसमें काफी संख्या में वे मुस्लिम महिलाएं शामिल होने की संभावना हैं जो लंबे समय से तीन तलाके के खिलाफ आवाज बुलंद करती रही हैं। यद्यपि वहीं दूसरी ओर देश की प्रमुख समाचार ऐजेंसियों के अनुसार मुस्लिम बाहुल शक्करतालाब इलाके में कट्टरपंथियों के सक्रिय होने से महिलाओं को धमकाने का दौर शुरू हो गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ’संवाद’ कार्यक्रम को लेकर मुस्लिम महिलाओं को धमकाए जाने का मामला सामने आया। कार्यक्रम में शामिल होने की इच्छुक महिलाओं को कट्टरपंथी घर-घर जाकर मारने-पीटने के साथ सामाजिक बहिष्कार की धमकी दे रहे हैं। यह जानकारी स्वयं मुस्लिम महिला फाउंडेशन की महिला कचहरी में सामने रखी गई। प्रशासन को भी इस बारे में जानकारी दी जा चुकी है।
वरुणापार इलाके में रविवार को मुस्लिम महिला फाउंडेशन की ओर से आयोजित महिला कचहरी में शामिल हुई शबाना ने बताया कि कट्टरपंथियों के इशारे पर युवकों की टोली घरों में बार-बार जाकर महिलाओं को पीएम कार्यक्रम में न जाने की बात कह धमका रही है। गुड़िया, रेशमा, शहनाज और आफरीन के अलावा एक दर्जन अन्य महिलाओं ने भी धमकाए जाने की जानकारी दी। महिलाओं ने बताया कि धमकी देने वाले कह रहे हैं कि मोदी कार्यक्रम के दिन घर से बाहर कदम रखते ही हाथ-पैर तोड़ दिया जाएगा। इस पर मुस्लिम महिला फाउंडेशन की नेशनल सदर नाजनीन अंसारी ने महिला कचहरी में कहा कि धमकी देने वाले कायर हैं। मुस्लिम महिलाएं जागरुक हो चुकी हैं। प्रधानमंत्री मोदी से मिलकर वे अपनी परेशानी जरूर बताएंगी। इस मसले पर सर्वसम्मति से तय किया गया ज्यादा से ज्यादा महिलाएं हर कीमत पर प्रधानमंत्री से मिलने जाएंगी। धमकी देने वालों के खिलाफ लिखित रिपोर्ट एसएसपी को दी जाएगी। मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के राष्ट्रीय सेवा प्रमुख डा. राजीव श्रीवास्तव का कहना है कि धमकी देकर मुस्लिम महिलाओं में डर पैदा करने का प्रयास किया जा रहा है।
प्रधानमंत्री के ‘‘संवाद कार्यक्रम’’ के प्रति उत्साही मुस्लिम महिलाओं का साहस देखते हुए इस बात को नकारा नहीं जा सकता है कि तीन तलाक मामले के बाद मुस्लिम महिलाओं के बीच प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता बढ़ी है। एक ओर भारतीय मुस्लिम महिलाओं का संघर्ष दूसरी ओर सरकार की महिलाओं के हित में सकारात्मक सोच और तीसरी भारतीय न्यायायिक व्यवस्था का मानवीय दृष्टिकोण - इन तीनों ने शक्तियों ने मिल कर भारतीय मुस्लिम महिलाओं के पक्ष में ‘तीन तलाक’ से मुक्ति का जो द्वार खोला है वह उन महिलाओं के सुखद और सुरक्षित भविष्य की ओर एक बड़ा और मज़बूत क़दम है। इसीलिए आशा की जा रही है कि यह संवाद कार्यक्रम मुस्लिम महिलाओं के लिए प्रगति के नए द्वार खोलेगा और रचेगा नया इतिहास।
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Saturday, September 16, 2017

कहानी वह कला है जो ज़िन्दगी से ज़िन्दगी को मिलाती है - मुख्य अतिथि डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh in Pathak Manch Samiksha Goshthi Held at Aacharya Nand Dulare Bajpai Sabhagaar, Dr. Hari Singh Gour Central University, Sagar 15.09.2017

विश्वविद्यालय पाठक मंच की गोष्ठी में ‘‘ढाई बीघा ज़मीन’’ कहानी संग्रह पर समीक्षा गोष्ठी

Dr (Miss) Sharad Singh in Pathak Manch Samiksha Goshthi Held at Aacharya Nand Dulare Bajpai Sabhagaar, Dr. Hari Singh Gour Central University, Sagar 15.09.2017

Dr (Miss) Sharad Singh in Pathak Manch Samiksha Goshthi Held at Aacharya Nand Dulare Bajpai Sabhagaar, Dr. Hari Singh Gour Central University, Sagar 15.09.2017

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Dr (Miss) Sharad Singh in Pathak Manch Samiksha Goshthi Held at Aacharya Nand Dulare Bajpai Sabhagaar, Dr. Hari Singh Gour Central University, Sagar 15.09.2017

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विश्वविद्यालय पाठक मंच की गोष्ठी में ‘‘ढाई बीघा ज़मीन’’ कहानी संग्रह पर परिचर्चा




Dr (Miss) Sharad Singh in Pathak Manch Samiksha Goshthi Held at Aacharya Nand Dulare Bajpai Sabhagaar, Dr. Hari Singh Gour Central University, Sagar 15.09.2017

कहानी वह कला है जो ज़िन्दगी से ज़िन्दगी को मिलाती है - मुख्य अतिथि डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
 
कहानी वह कला है जो ज़िन्दगी से ज़िन्दगी को मिलाती है। कहानी के संक्षिप्त स्वरूप पर बड़े दायित्व रहते हैं। उसे सीमित शब्दों, सीमित पात्रों और सीमित कथोपकथन के द्वारा कथानक की सम्पूर्णता को पिरोना रहता है। यह बात डॉ हरीसिंह गौर केन्द्रीय विश्वविद्यालय, सागर की पाठक मंच की मासिक पुस्तक परिचर्चा गोष्ठी के दौरान मुख्य अतिथि प्रसिद्ध कथाकार सुश्री शरद सिंह ने कही। ख्यातिलब्ध लेखिका मृदुला सिंन्हा के कहानी संग्रह ‘‘ढाई बीघा ज़मीन’’ पर बोलते हुए डॉ. शरद सिंह ने कहा कि समाज से सरोकार रखने वाली कहानियों पर पूरी दक्षता से कलम चलाने वाली लेखिका मृदुला सिन्हा का कहानी संग्रह ‘‘ढाई बीघा ज़मीन’’ वर्तमान समाज की ज्वलंत समस्याओं को पूरी गंभीरता से रेंखांकित करता है। यह एक महत्वपूर्ण कहानी संग्रह है।

डॉ हरीसिंह गौर केन्द्रीय विश्वविद्यालय, सागर के आचार्य नंनददुलारे वाजपेयी सभागार में हुई गोष्ठी की अध्यक्षता विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के अध्यक्ष प्रो. आनन्दप्रकाश त्रिपाठी ने की। प्रसिद्ध कथाकार डॉ, (सुश्री) शरद सिंह मुख्य अतिथि तथा डॉ महेश तिवारी विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। समीक्षक के रूप में हिन्दी विभाग के सहायक प्राध्यापक डॉ हिमांशु कुमार तथा शोध छात्र सपन राज ने समीक्षा आलेख का वाचन किया। इस अवसर पर कार्यक्रम के अध्यक्ष प्रो. त्रिपाठी ने ‘‘ढाई बीधा ज़मीन’’ को समकालीन संवेदनाओं एवं संदर्भों का जीवन्त दस्तावेज बताया। पाठक मंच के संचालक डॉ शशिकुमार सिंह ने लेखिका मृदुला सिन्हा का परिचय प्रस्तुत किया।डॉ महेश तिवारी ने भी संग्रह पर अपने विचार रखे। कार्यक्रम का संचालन रवीन्द्र पंथ ने किया तथा आभार प्रकट किया डॉ ऋषभ भारद्वाज ने। इस आयोजन में डॉ वर्षा सिंह, डॉ उदय जैन, डॉ आशुतोष मिश्र, प्रो. के एस पित्रे, डॉ वंदना राजोरिया आदि साहित्य मर्मज्ञों की उपस्थित उल्लेखनीय रही।
(‘नव दुनिया’ समाचारपत्र में दिनांक 16.09.2017 प्रकाशित समाचार से)
Dr (Miss) Sharad Singh in Pathak Manch Samiksha Goshthi Held at Aacharya Nand Dulare Bajpai Sabhagaar, Dr. Hari Singh Gour Central University, Sagar 15.09.2017

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Wednesday, September 6, 2017

ब्लू व्हेल गेम करता है माइण्ड ट्रेप : दृढ़ रहिए-सुरक्षित रहिए ... डॉ शरद सिंह ... चर्चा प्लस

Dr (Miss) Sharad Singh

मेरा कॉलम चर्चा प्लस (06.09.2017 दैनिक सागर दिनक में )
 

ब्लू व्हेल गेम करता है माइण्ड ट्रेप : दृढ़ रहिए-सुरक्षित रहिए 
- डॉ. शरद सिंह 

देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में में 14 वर्षीय एक लड़के ने ऑनलाइन गेम ब्लू व्हेल चैलेंज के अंतिम चरण को पूरा करने के लिए सातवीं मंजिल से कूदकर खुदकुशी कर ली थी। मध्य प्रदेश के इंदौर शहर का एक छात्र ’ब्लू व्हेल गेम’ का शिकार होते-होते बचा। सातवीं कक्षा का यह छात्र गेम की आखिरी स्टेज को पूरा करने के लिए स्कूल की तीसरी मंजिल से छलांग लगा रहा था, तभी उसे टीचर ने सुरक्षित बचा लिया। ’ब्लू व्हेल गेम’ के 50वें चरण को पूरा करने के लिए तीसरी मंजिल से नीचे कूद रहा था। ऐसा करने पर उसे दो करोड़ रुपए मिलने का दावा किया गया था। दमोह और हरदा जैसे छोटे शहर भी इसकी चपेट से नहीं बचे। वीडियो गेम अपने-आप में एक ऐसा जुनून पैदा करता है जिससे छुटकारा पाना कठिन होता है। ’ब्लू व्हेल गेम’ इस जुनून की एक आत्मघाती कड़ी है। बेशक यह माइण्ड ट्रेप गेम है लेकिन इससे बड़ी आसानी से बचा जा सकता है। इससे बचने का रास्ता है- दृढ़ मानसिक स्थिति और दृढ़ इच्छाशक्ति। 
Charcha Plus Column of Dr Sharad Singh in "Sagar Dinkar" Daily News Paper

देश के विभिन्न हिस्सों में खतरनाक रूप लेते वीडियो गेम ’ब्लू व्हेल चैलेंज’ के खतरे मध्य प्रदेश में भी नज़र आने लगे हैं। इसकी गंभीरता को भांपते हुए अगस्त के पहले पखवाड़े में ही राज्य के तकनीकी शिक्षा (स्वतंत्र प्रभार), स्कूल शिक्षा एवं श्रम राज्यमंत्री दीपक जोशी ने मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर को पत्र लिखकर इस गेम को प्रतिबंधित करने की मांग की थी। मंत्री जोशी ने जावड़ेकर को सोमवार को लिखे पत्र में कहा था कि इस गेम के जाल में फंसकर बच्चे आत्महत्या जैसे गंभीर कदम उठा रहे हैं। यह स्थिति चिंताजनक है। यद्यपि, खत मिलने के पहले ही सरकार ने ब्लू व्हेल चैलेंज को प्रतिबंधित कर दिया। राज्यमंत्री दीपक जोशी ने प्रमुख सचिव स्कूल शिक्षा एवं प्रमुख सचिव तकनीकी शिक्षा को भी इस गेम से होने वाले नुकसान के प्रति शैक्षणिक संस्थाओं के बच्चों को जागरूक करने के संबंध में जरूरी कार्रवाई के निर्देश दिए हैं।
भारत सरकार ने गूगल इंडिया, माइक्रोसॉफ्ट इंडिया और प्रमुख सोशल मीडिया साइटों से इस गेम के लिंक हटाने के लिए कहा। सारकार की ओर से इलेक्ट्रॉनिक और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने फेसबुक, इंस्टाग्राम और व्हाट्सऐप से कहा था कि ब्लू व्हेल चैलेंज से जुड़े लिंक फौरन हटाए जाएं। मंत्रालय के वरिष्ठ निदेशक अरविंद कुमार ने 11 अगस्त 2017 को निर्देश जारी किया था। इस गेम पर प्रतिबंध की आशंका को देखते हुए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर पहले ही कई प्रॉक्सी यूआरएल या आईपीएड्रेस बना लिए गये थे। इसके मद्देनजर ही सरकार ने अपने निर्देश में सर्च इंजन और सोशल मीडिया वेबसाइट से ब्लूव्हेल चेलैंज गेम से मिलते जुलते नाम वाले या यूआरएल वाले गेम के लिंक भी हटाने को कहा था।
विगत दिनों ब्लू व्हेल गेम एक नई मुसीबत बनकर सामने आया है। तमाम प्रयासों के बाद भी यह ना सिर्फ सरकार के लिए बल्कि शिक्षण संस्थानों के लिए भी एक चुनौती बना हुआ है। इसके लिए आईटी मंत्रालय से लेकर सीबीएसई बोर्ड ने सर्कुलर जारी किया है, जिसमें कहा गया है कि इसे रोकने के हरसंभव प्रयास किए जाए। इस गेम को खेलते हुए अभी तक दुनिया भर में 200 से ज्यादा लोग अपनी जान दे चुके हैं। भारत कई युवा और स्कूली बच्चे इसके प्रभाव में आ कर आत्मघात कर चुके हैं।


गेम को बनानेवाला और एडमिन :
सन् 2016 में इस गेम के डेवलपर फिलिप वुडकिन को आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया था। उस वक्त 15 बच्चों ने आत्महत्या की थी। वुडकिन साइकोलॉजी का स्टूडेंट रहा है। वुडकिन ने पुलिस को बताया था कि उसका मकसद समाज की सफाई करना है। वुडकिन के मुताबिक जो अपने जीवन का मूल्य नहीं समझते वो समाज के लिए कचरा हैं और उनकी सफाई करना जरूरी है।
अच्छी ख़बर यह है कि इसी माह ब्लू व्हेल गेम की एडमिन लड़की गिरफ्तार कर ली गई है। वह रूस की रहनेवाली 17 वर्षीय लड़की है। यह गेम रूस में भी कई बच्चों की जान ले चुका है। संबंधित समाचारों के अनुसार लड़की पर आरोप है कि जानलेवा ब्लू व्हेल चैलेंज गेम के पीछे उसी का हाथ है। लड़की शिकार को धमकी दिया करती थी कि अगर उसने ब्लू व्हेल टास्क पूरा नहीं किया तो वह उसे और उसके परिवार का खून कर देगी। ब्लू व्हेल चैलेंज उन्हीं लोगों को अपना शिकार बनाता है, जो तनाव जूझ रहे हैं और आत्महत्या करने के बारे में सोचते हैं। रूसी पुलिस द्वारा गिरफ्तारी का फुटेज जारी किया गया है। आरोपी लड़की मनोविज्ञान की छात्रा है और उसने अपना अपराध स्वीकार कर लिया है। अदालत में हुई पेशी के बाद उसे तीन साल के लिए जेल भेज दिया गया है। 


क्या है ब्लू व्हेल गेम?
यह एक सेल्फ डिस्ट्रक्टिव चैलेंज गेम है। जो इंटरनेट के माध्यम से दुनिया के अनेक देशों में खेला जा रहा है। प्राप्त जानकारी के अनुसार खेल कथित तौर पर एक श्रृंखला मे होते हैं जिसमें खिलाड़ियों को कहने के लिये 50-दिन की अवधि में कई कार्य आवंटित किया जाता है, जिसकी अंतिम चुनौती में खिलाड़ी को आत्महत्या करने को बोला जाता है। शब्द “ब्लू व्हेल“ बीच्ड व्हेल्स की घटना से आता है, जोकि आत्महत्या से जुड़ा हुआ था।
ब्लू व्हेल से बच्चों के मरने का सिलसिला जारी है। इन मौतों का कारण है वो चैलेंज, जो ये गेम खेलने वाले बच्चों को दिए जाते हैं। इन चैलेन्जेस के बारे में जानना जरूरी है जिससे बच्चों की संदिग्ध गतिविधियों को आसानी से पहचाना जा सके। इसी बात को ध्यान में रखते हुए गेम के चैलेन्जेस की जानकारी एन.सी.पी.सी.आर. अर्थात् नेशनल कमीशन फॉर प्रोटेकशन ऑफ चाइल्ड राईट्स ने अपनी वेबसाइट पर दी है-
1. हाथ पर रेजर की मदद से अंग्रेजी का अक्षर और नंबर ’एफ 57’ कुरेदना और उसकी फोटो क्यूरेटर को भेजना।
2. सुबह 4ः 30 बजे उठना और वो डरावने, विकृत वीडियोज देखना जिन्हें क्यूरेटर ने आपको भेजा है।
3. बाजू को अपनी नसों के पास से होते हुए रेजर से काटना। ये कट ज्यादा गहरे नहीं होने चाहिए। केवल 3 कट हों और उनकी फोटो क्यूरेटर को भेजना।
4. एक पेपर शीट पर व्हेल बनाना और उसकी फोटो क्यूरेटर को भेजना।
5. अगर आप ’व्हेल बनने को तैयार’ हैं तो पैरों पर रेजर से ’यस’ का निशान बनाना। अगर आप तैयार नहीं हैं, तो आपको खुद को सजा देनी है और कई कट खुद को मारने होंगे।
6. हाथ पर ‘एफ 40’ का निशान बनान और उसे क्यूरेटर को भेजना।
7. सुबह 4:20 बजे उठना है और जो छत सबसे ऊंची हो वहां पहुंचना है।
8. रेजर से हाथ में व्हेल की आकृति बनाना और उसकी फोटो क्यूरेटर को भेजना।
9. पूरा दिन डरावने वीडियोज देखना।
10. जो संगीत क्यूरेटर आपको भेजे उन्हें ध्यानपूर्वक सुनना।
11. अपने होंठो को काटना।
12. अपने साथ कुछ भी ऐसा करना जिससे आपको दर्द का अनुभव हो।
13. सबसे ऊंची छत पर पहुंचो और वहां किनारे पर कुछ देर खड़े रहो।
14. किसी पुल पर जाओ और वहां किनारे पर खड़े रहो।
15. छत पर जाकर किनारे पर बैठो और अपने पैरों को हिलाओ।
16. सुबह 4:20 पर उठो और रेलवे लाइन पर जाओ।
17. पूरे दिन किसी से भी बात मत करो।
18. हर रोज अपने शरीर पर एक कट मारो।
19. ऊंची बिल्डिंग से कूद जाओ और अपनी जिंदगी को खत्म करो।
20. किसी क्रेन पर चढ़िए या इसकी कोशिश करिए।
खेलने वाले के दिमाग़ में यह बिठा दिया जाता है कि यदि एक बार गेम खेलना शुरू कर दिया, तो वो इसे बीच में नहीं छोड़ सकता। यदि गेम को बीच में छोड़ दिया तो एडमिन आपका फोन हैक कर लेगा और फोन की सारी डिटेल हैक एडमिन के पास चली जाएगी। अगर कोई बीच में गेम छोड़ना चाहे, तो एडमिन की तरफ से धमकी मिलती रहती है कि उसे या फिर उसके माता-पिता को जान से मार दिया जाएगा।


गेम से बचने के तरीके :
यह साफ़तौर पर माइण्ड ट्रेप गेम है। इस गेम के ट्रेप से बड़ी आसानी से बचा और बचाया जा सकता है। इसके लिए सबसे पहले जरूरी है दृढ़ मानसिक स्थिति और दृढ़ इच्छाशक्ति। दरअसल, इस गेम में आत्मघात वही कर रहे हैं जो कमजोर इच्छाशक्ति के हैं, भावुक हैं अथवा जुनूनी हैं। दृढ़इच्छाशक्ति बनाए रखने पर इस गेम के प्रभाव से आसानी से दूर रहा जा सकता है अथवा इससे बाहर निकला जा सकता है। दमोह और हरदा जैसे छोटे शहर भी इसकी चपेट से नहीं बचे। वीडियो गेम अपने-आप में एक ऐसा जुनून पैदा करता है जिससे छुटकारा पाना कठिन होता है। ’ब्लू व्हेल गेम’ इस जुनून की एक आत्मघाती कड़ी है। बेशक यह माइण्ड ट्रेप गेम है लेकिन इससे बचा जा सकता है बड़ी आसानी से। इससे बचने का रास्ता है इसके लिए सबसे पहले जरूरी है दृढ़ मानसिक स्थिति और दृढ़ इच्छाशक्ति।
मनोवैज्ञानिकों के मुताबिक इस गेम के एडिक्ट ज्यादातर लोग डिप्रेशन के शिकार होते हैं। ऐसे में यदि आपके घर का कोई मेंबर डिप्रेशन का शिकार है तो उसे सोशल मीडिया से दूर रखा जाए। इंटरनेट और सोशल मीडिया के इस दौर में बच्चों में वर्चुअल वर्ल्ड का एडिक्शन होता है। ऐसे में घरवाले बच्चों पर नजर रखें और उनकी इंटरनेट हैबिट पर खास ध्यान दें। इसके अलावा बच्चों को घर में इस तरह का माहौल दें कि वह मां-बाप से कोई बात छिपाए नहीं। वे बच्चों को इस बात का विश्वास दिलाएं कि यदि वे गेम में शामिल हो भी गए हैं तो किसी भी समय उसे छोड़ सकते हैं। गेम का एडमिन उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता है। एडमिन की धमकियों के विरुद्ध वे सामान्य पुलिस अथवा साईबर सेल की मदद ले सकते हैं। उन्हें डांटने के बजाए उनका आत्मविश्वास जगाएं।
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