Thursday, June 13, 2019

हीरों का जनक बुंदेलखंड बढ़ रहा है भुखमरी की ओर - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह - 'नवभारत' में प्रकाशित

Dr (Miss) Sharad Singh
'नवभारत' में आज प्रकाशित मेरा लेख...
हार्दिक धन्यवाद 'नवभारत' 🙏



        हीरों का जनक बुंदेलखंड बढ़ रहा है भुखमरी की ओर
    - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
                     
छत्ता तेरे राज में धक्-घक् धरती होय।
जित-जित घोड़ा पग धरे, उत-उत हीरा होय।।
- यह आशीर्वाद दिया था बुंदेला महाराज छत्रसाल को प्रणामी धर्म के प्रवर्त्तक महामति प्राणनाथ ने। आशीर्वाद फलीभूत हुआ और जिसका प्रमाण है कि आज भी पन्ना स्थित हीरों की खदान ने हीरों का खनन किया जाता है। जिस धरती में हीरे पाए जाते हों उसे तो धन सम्पन्न, सुविधासम्पन्न होना चाहिए किन्तु दुर्भाग्य से ऐसा नहीं है। यशस्वी बुंदेलखंड आज भुखमरी की ओर बढ़ रहा है। जहां भुखमरी होगी वहां अपराध और अत्याचार भी होंगे ही। बुंदेलखंड में भुखमरी का सबसे बड़ा कारण है प्राकृतिक संपदा का असंतुलित दोहन। जिन्हें जरूरत है उन्हें पानी नहीं मिलता और जिन्हें विलासिता के लिए चाहिए उनके फॉर्म हाऊस के पूल पानी से लबालब भरे रहते हैं। सामुदायिक व्यवस्थाएं तो जब पूरे देश ने बिसार दी हैं तो बुंदेलखंड की क्या बिसात? व्यक्तिगत लॉन सिंचित होते रहते हैं जिनमें अधिक से अधिक चार-छः लोग आनन्द ले पाते हैं जबकि सार्वजनिक पार्क अपनी दुदर्शा पर आंसू बहाते रहते हैं, जहां पचासों व्यक्ति हर शाम प्रकृति का आनन्द ले सकते हैं। लेकिन स्थिति इससे भी अधिक गंभीर हो चली है। यदि किसान की खेती ही सूख जाए और पीने को पानी ही न मिले तो किसी पार्क में आनन्द नहीं आ सकता है।
Article of Dr (Miss) Sharad Singh published in  Navbharat
        जंगल कटते जा रहे हैं। बेतहाशा खनन हो रहा है, इस पर अंकुश नहीं है। कभी सूखे से तो कभी ओलावृष्टि से चारा नष्ट हो गया। बुंदेले सरकार और उनकी मशीनरी के ही हाशिये पर ही नहीं रहे बल्कि प्रकृति ने भी उन्हें कमजोर किया। पहले बारिश न होने से सूखा झेला तो दो वर्ष से किसानों ने अतिवृष्टि और ओलावृष्टि की समस्या का भी सामना किया। अब तो मानों किसानों ने समस्याओं का सामना करने को नियति मान लिया है।  बुंदेलखंड में किसान सालभर में एक ही फसल बो पाता है। ऐसी स्थिति में इस योजना का बहुत लाभ किसानों को नहीं मिल पाता है। बुंदेलखंड कभी जल संरक्षण और संवर्धन की गाथा कहने वाला इलाका हुआ करता था, मगर अब यही इलाका पानी की समस्या के कारण हर वर्ष अखबारों की सुर्खियों में रहता है।

राजनीतिक स्थितियां सरकारों के साथ बदलती गईं लेकिन मगर बुंदेलखंड के हालात नहीं बदले। जल संकट, सूखा, बेरोजगारी और पलायन का आज भी स्थायी समाधान नहीं खोजा जा सका है। राजनेताओं ने खूब सब्ज-बाग दिखाए, मगर जमीनी हकीकत वही बंजर जमीन जैसी है। सन् 2018 में खजुराहो में ‘राष्ट्रीय जल सम्मेलन’ का आयोजन किया गया था। इस सम्मेलन में देशभर के 200 से अधिक सामाजिक कार्यकर्ता, विशेषज्ञ और जल संरक्षण के जानकारों नें भाग लिया था। इस दो दिन के सम्मेलन में बुंदेलखंड की जल समस्या पर खास चर्चा हुई। जल-समस्या के निदान पर भी चर्चा हुई किन्तु समस्या जस के तस रही। बुंदेलखंड में मध्यप्रदेश के सात और उत्तर प्रदेश के सात, कुल मिलाकर 14 जिले हैं। इन सभी जिलों की स्थिति लगभग एक जैसी है। कभी यहां नौ हजार से ज्यादा जल संरचनाएं हुआ करती थीं, मगर अब अस्तित्व में एक हजार से कम ही बची हैं। भवन निर्माण के विस्तार के लिए प्राचीनतम तालाब और कुए तक सुखा दिए गए। कुछ कुंओं और बावड़ियों का उद्धार समाजसेवकों ने किया किन्तु इतना पर्याप्त नहीं है। दरअसल, पुराने जलस्रोतों को बचाने और नए स्रोतों की खोज करने की मुहिम छेड़े जाने की जरूरत है। 

जलवायु परिवर्तन ने बुंदेलखंड में भी विगत 15 वर्षों में जो मौसम में गंभीर परिवर्तन किए हैं। इन परिवर्तनों ने क्षेत्र के लोगों की कठिनाइयों और जोखिम को बढ़ा दिया है। यहां विगत वर्षों में मानसून का देर से आना, जल्दी वापस हो जाना दोनों बीच लंबा सूखा अंतराल, जल संग्रह क्षेत्रों में पानी का न हो पाना, कुआं का सूख जाना इत्यादि ने यहां कि कृषि को पूरी तरफ नष्ट कर दिया। यहां तक कि कुछ वर्षों में तो किसान फसल की बुवाई तक नहीं कर पाए। विगत 3 दशकों में तो यहां की स्थिति काफी दयनीय हो गई है। प्राकृतिक आपदाओं ने इस पूरे क्षेत्र की तस्वीर ही बदल दी है, जिसकी वजह से यहां की सामाजिक व आर्थिक स्थिति काफी हद तक बिगड़ चुकी है। यह क्षेत्र सूखा प्रभावित हैं, जिसका सीधा असर यहां की कृषि पर पड़ा है। एक बार पुनः इस वर्ष बुंदेलखंड भयंकर रूप से सूखा की मार झेल रहा है। विगत पांच वर्षों का औसत देखा जाए तो इसमें 40-50 प्रतिशत की कमी आई है अर्थात औसत 450-550 मि.मी. वर्षा ही प्राप्त हुई है। यह चिंताजनक है।

हर वर्ष ग्रीष्मकाल में पेयजल के लिए सिरफुटौव्वल की सीमा तक झगड़े होना आम बात है। जान जोखिम में डाल कर महिलाएं और बच्चे गहरे कुओं की तलछठ से पानी निकालने को विवश रहते हैं। जहां तक विवशता का मसला है तो विगत वर्षों विवशता का वह रूप सामने आया जिसने सभी को स्तब्ध कर दिया। एक ओर किसानों ने घास की रोटियां खा कर अपना पेट भरा तो दूसरी ओर पलायन करने को मजबूर परिवारों की बेटियां मानव-तस्करी की शिकार हो गईं। गरीबी से जूझती बुंदेली युवतियां महानगरों के लोगों के झांसे में आ जाती हैं और अपना भविष्य सोचे बिना उनके साथ हो लेती हैं। युवतियों को लगता है कि वे रोजी-रोटी कमा कर अपने परिवार का सहारा बन सकेंगी किन्तु ऐसा हो नहीं पाता है। प्रायः गरीब परिवारों की युवतियां देहशोषण की भेट चढ़ जाती हैं।

इस वर्ष भी मानसून बुंदेलखंड को तरसा रहा है। वर्षाजल की बाट जोहते किसानों को बुवाई आरम्भ करने की प्रतीक्षा है। जबकि जलप्रबंधन की लचर दशा इस बात की ओर संकेत कर रही है कि इस बार भी वर्षाजल का समुचित भंडारण नहीं हो सकेगा। तालाब और नदियों की सफाई या गहरीकरण की दिशा में कोई ठोस कदम उठाए ही नहीं गए हैं। अपने गौरवशाली अतीत को सीने से लगाए और हाथ में कटोरा लिए खड़े बुंदेलखंड की कल्पना ही मन को डरा देने वाली हैं। अभी भी असंभव प्रतीत होती व्यवस्थाएं संभव हैं यदि राजनीतिक नेतृत्व अपने वादों को ईमानदारी से पूरा कर दे, अन्यथा बुंदेलखंड को भुखमरी का दंश झेलना ही पड़ेगा। 
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('नवभारत', 13.06.2019)

Wednesday, June 12, 2019

चर्चा प्लस ... और कितनी बेबी, कितनी गुड़िया, कितनी निर्भया? - डॉ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
चर्चा प्लस ... 
और कितनी बेबी, कितनी गुड़िया, कितनी निर्भया?
 
- डॉ. शरद सिंह

आश्चर्य होता है कि किसी नन्हीं बच्ची के साथ कोई इतनी नृशंसता कैसे कर सकता है? अलीगढ़ के आंसू अभी सूखे नहीं थे कि भोपाल में एक ऐसी बच्ची हवस और मौत का शिकार बन गई जो पढ़ाई में अव्वल थी और एक लम्बा सुखद भविष्य उसके सामने था। लेकिन वहशी दरिंदे को उसकी योग्यता नहीं मात्र शरीर दिखा। हद तो यह है कि आज ढाई साल की बच्चियां भी सुरक्षित नहीं रह गई हैं। आए दिन ऐसे घृणित अपराध घटित हो रहे हैं मानो कानून का कोई भय उन अपराधियों को है ही नहीं। वस्तुतः यौनअपराधों से जुड़े कानूनों की एक बार फिर समीक्षा किए जाने की जरूरत है। 
चर्चा प्लस ... और कितनी बेबी, कितनी गुड़िया, कितनी निर्भया? - डॉ. शरद सिंह   Charcha Plus Column by Dr Sharad Singh
     भारत में पिछले साल जम्मू के एक रेप केस ने सबको हिलाकर रख दिया था। कठुआ ज़िले में ख़ानाबदोश समुदाय की एक बच्ची की बलात्कार के बाद हत्या कर दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर इस मामले की सुनवाई पंजाब में हुई जहां अदालत ने जम्मू-कश्मीर के कठुआ में पिछले साल जनवरी महीने में आठ साल की एक बच्ची के साथ गैंग रेप, प्रताड़ना और हत्या मामले में छह दोषियों में से तीन को अदालत ने उम्र क़ैद की सज़ा दी है। इस सनसनीखेज गैंग रेप के बाद देश भर में ग़ुस्सा देखा गया था। पूर्व सरकारी अधिकारी सांजी राम को इस मामले का मास्टरमाइंड माना जा रहा था। पठानकोट की फास्ट ट्रैक अदालत ने राम को भी उम्र क़ैद की सज़ा सुनाई है। सबूतों के अभाव में सांजी राम के बेटे को अदालत ने रिहा कर दिया है। इसके साथ ही दो पुलिस वालों को भी पांच-पांच साल की क़ैद की सज़ा सुनाई है। सांजी राम के अलावा परवेश कुमार, दो स्पेशल पुलिस ऑफिसर दीपक कुमार और सुरेंदर वर्मा, हेड कॉन्स्टेबल तिलक राज और सब-इंस्पेक्टर आनंद दत्ता को इस मामले में दोषी ठहराया गया है। पुलिसकर्मियों को सबूतों को मिटाने में दोषी ठहराया गया है। यह जान कर आश्चर्य होता है कि सांजी राम राजस्व विभाग के रिटायर्ड अधिकारी रहा है और दीपक खजुरिया स्पेशल पुलिस ऑफिसर। ऐसे जिम्मेदार पदों पर आसीन व्यक्तियों ने इतना घृणित कार्य किया कि मानवता और सांस्कृतिक मूल्यों का भी दिल दहल गया। कोर्ट के फ़ैसले के बाद पीड़िता की मां ने मुख्य अभियुक्त सांझी राम को फांसी देने की मांग की थी। सजा के संबंध में पीड़िता की मां का कहना है कि “मुझे राहत मिली है, लेकिन न्याय तब मिलेगा जब सांझी राम और विशेष पुलिस अधिकारी दीपक खजुरिया को फांसी दी जाएगी।“
पीड़िता पक्ष के वकील मुबीन फ़ारूकी ने कहा, “आज सच की जीत हुई है आज पूरे देश की जीत हुई है। पूरे देश ने यह लड़ाई मिल कर लड़ी थी। दीपक खजुरिया, प्रवेश कुमार और सांझी राम को 376डी, 302, 201, 363, 120बी, 343 और 376बी के तहत दोषी ठहराया गया है। वहीं तिलक राज, आनंद दत्ता और सुरिन्दर वर्मा को आईपीसी की धारा 201 के तहत दोषी ठहराया गया है। यह संवनैधानिक भावना की जीत है।’’
   लेकिन मां का हृदय अपनी बेटी की क्षत-विक्षत स्थिति को याद कर आज भी चीत्कार कर उठता है। वे कहती हैं कि “मेरी बेटी का चेहरा आज भी मुझे परेशान करता है और यह दर्द जीवनभर रहेगा। जब मैं उसकी उम्र के दूसरे बच्चों को खेलते देखती हूं तो मैं अंदर से टूट जाती हूं।“

चाहे अलीगढ़ की घटना हो या भोपाल की अथवा सागर की, ऐसी सभी वारदातों में एक बात की समानता होती है और वह है नाबालिग मासूम बच्चियों के साथ दरिंदगी। हाल ही में घटित अलीगढ़ की घटना ने तो एक बार फिर देश को स्तब्ध कर दिया। आश्चर्य होता है कि किसी नन्हीं बच्ची के साथ कोई इतनी नृशंसता कैसे कर सकता है? अलीगढ़ के आंसू अभी सूखे नहीं थे कि भोपाल में एक ऐसी बच्ची हवस और मौत का शिकार बन गई जो पढ़ाई में अव्वल थी और एक लम्बा सुखद भविष्य उसके सामने था। लेकिन वहशी दरिंदे को उसकी योग्यता नहीं मात्र शरीर दिखा। हद तो यह है कि आज ढाई साल की बच्चियां भी सुरक्षित नहीं रह गई हैं। आए दिन ऐसे घृणित अपराध घटित हो रहे हैं मानो कानून का कोई भय उन अपराधियों को है ही नहीं। वस्तुतः यौनअपराधों से जुड़े कानूनों की एक बार फिर समीक्षा किए जाने की जरूरत है। नाबालिग बच्चियों के साथ नृशंसतापूर्ण अपराध पर रोक न लग पाना इस बात का स्पष्ट संकेत है कि कहीं न कहीं व्यवस्था में कमी जरूर है-सामाजिक व्यवस्था में भी और कानून व्यवस्था में भी। बच्चियों के साथ निरंतर हो रहे हादसों पर राजनीति का खेल खेलने के बजाए जरूरी है जन जागरूकता और कानून में कुछ जरूरी बदलाव पर ध्यान दिया जाना।
प्रायः पुलिस 24 घंटे से पहले गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखने से परहेज करती है क्योंकि कई बार गुमशुदा इंसान अपनी मर्जी से क्रोध में आ कर घर से निकल पड़ता है और क्रोध शांत होने पर स्वयं घर लौट आता है। यह धारणा आज के आपराधिक माहौल में मंहगी साबित हो रही है। जहां तक धारणा की बात है तो इस धारणा को भी बदलना होगा कि यदि कोई लड़की घर से गायब है तो प्रथमदृटष्या यह मान लिया जाए कि वह किसी के साथ भाग गई होगी। आज लड़कियों के घर से भागने के मामले नगण्य हो चले हैं जबकि उनके साथ यौनहिंसा के अपराध रिकार्ड तोड़ रहे हैं। ऐसी स्थिति में तत्काल रिपोर्ट लिख कर खोज आरम्भ कर देने से कई बच्चियों की जान बच सकती है।
हमारे जीवन की हमारे समाज का पारिवारिक ढांचा और सामाजिक सोच बुनियादी रूप से आत्मीयता भरी है। यहां अपरिचितों से दूरी बनाने के बजाए उनसे परिचय बढ़ा कर अपनापन स्थापित करने की परम्परा रही है। ऐसे वातावरण में छोटी बच्चियां दिन भर पड़ोसियों के आंगन और घर में खेलती रहती हैं। उनके माता-पिता भी यह सोच कर निश्चिन्त रहते हैं कि बच्ची अपने चाचा, मामा जैसे पड़ोसी के घर में ही तो खेल रही है। ऐसे पड़ोसी जब बच्ची को टॉफी-चॉकलेट देते हैं और बच्चियां अपने माता-पिता की ओर देखती हैं कि वो ‘अंकल जी’ से टॉफी-चॉकलेट ले या न ले तो उसके माता-पिता भी उसे प्रोत्साहित करते हैं कि ‘ले लो बेटी, अंकल टॉफी दे रहे हैं, ले लो!’
माता-पिता को विश्वास रहता है कि बच्ची के ‘अंकल जी’ बच्ची के प्रति वात्सल्यभाव रखते हैं और उसे किसी भी प्रकार की क्षति नहीं पहुंचाएंगे। लेकिन दिल्ली गुड़िया-कांड के अपराधियों ने न केवल माता-पिता के विश्वास को तोड़ा बल्कि एक ऐसे अविश्वास को जन्म दे डाला जिसके कारण अब माता-पिता अपनी बच्चियों को पड़ोसियों से दूर रखने का प्रयास करेंगे। यदि दूर नहीं भी रख सकेंगे तो मन ही मन दुश्चिन्ताओं से घिरे रहेंगे।
राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के गांधीनगर इलाके में 15 अप्रैल 2013 को पांच साल की मासूम ‘गुड़िया’ का अपहरण के बाद किए गए दुराचार से पूरा देश स्तब्ध रह गया था। दिसम्बर 2012 में ‘दामिनी’ के साथ हुई घटना को लोग भूल भी नहीं पाए थे कि यह घटना सामने आ गई थी। दामिनी रेप कांड के बाद कुछ लोगों ने यह भी दोषारोपण किया कि लड़कियां पाश्चात्य वेशभूषा धारण करती हैं और अकेली या अपने मित्रों के साथ घूमती हैं इसलिए उनके प्रति बलात्कारी आकर्षित होते हैं। लेकिन चार-पांच साल की छोटी बच्चियों के बारे में भी क्या यही कहा जाएगा कि ये भी बलात्कारियों को आकर्षित करती हैं? ऐसी गैरजिम्मेदाराना सोच अनजाने में ही बलात्कारियों की पक्षधर बन जाती है।

दामिनी बलात्कार कांड के बाद भी यही लगा था कि बलात्कार के अपराध पर लगाम लगेगी। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में एक मासूम बच्ची के साथ हुई बलात्कार व दरिंदगी की घटना को लेकर महिला संगठनों में एक बार फिर उबाल आया। इन संगठनों ने आरोपियों के अपराध स्वीकार करते ही उन्हें फांसी के तख्ते पर चढ़ा देने की मांग की। राष्ट्रीय और प्रादेशिक महिला जन संगठनों ने ‘दामिनी’ के साथ हुए सामूहिक बलात्कार की घटना के बाद एनसीआर में अप्रैल 2013 तक कुल 393 बलात्कार की घटनाएं घटने पर भी गहरा रोष व्यक्त किया। उन्होंने कहा था कि ‘दिल्ली जैसे इलाके में बलात्कार की घटनाओं से अंदाजा लगाया जा सकता है कि महिलाएं इस देश में सुरक्षित नहीं हैं, लिहाजा खुद उन्हें तीर-तलवार लेकर अपनी हिफाजत करनी पड़ेगी।’ कुछ महिला संगठनों की मांग थी कि ‘जिस अपराध के लिए जो सजा का प्रावधान कानून में निहित किया गया हो, उसकी सजा देने का अधिकार पीड़ित या उसके परिजनों को ही दिया जाए।’ निःसंदेह कठोर सजा जरूरी है। ऐसी सजा जो अन्य अपराधियों को अपराध में प्रवृत होने से रोक सके। उनके दिलों में भय जगा सके। किन्तु क्या इतना ही पर्याप्त होगा? भारतीय दण्ड संहिता में सजाओं के अनेक प्रावधान हैं। फिर भी अपराधी बेखौफ़ अपराध करते रहते हैं।
एक ओर दिल्ली की पांच वर्षीया नन्हीं गुड़िया दो वहशियों की शिकार बनी और दूसरी ओर मध्यप्रदेश के सिवनी जिले की नन्हीं बच्ची बलात्कारियों की शिकार बनी। शिकार हुई पांच वर्षीय मासूम ने 14 दिनों से जिंदगी और मौत से जंग लड़ने के बाद नागपुर के निजी अस्पताल में दम तोड़ दिया। दोनों स्थानों पर अलग-अलग दल की सरकारें। इसलिए राजनीतिक बयानबाज़ी का बाज़ार गर्म होना था और हुआ भी। दूसरी ओर एक और शर्मनाक प़क्ष सामने आया कि दिल्ली गुड़िया-रेप कांड में बच्ची के माता-पिता को अपना मुंह बंद रखने की एवज में दो हजार रुपए देने वाले आरोपी एक कांस्टेबल था। अर्थात् जिसे रक्षा के लिए तैनात किया गया वही भक्षकों का ‘सगावाला’ बन बैठा। जब कांस्टेबल पकड़ा गया तो उसने कथित तौर पर स्वीकार किया कि अपने सीनियर इंस्पेक्टर के कहने पर ही उसन दो हजार रुपए की पेशकश बच्ची के परिजनों को की थी। ऐसी दशा में दोषी किसे ठहराया जाए? भ्रष्ट और लचर कानून व्यवस्था को? राजनीतिज्ञों को? समाज के पुरुषवादी दृष्टिकोण को? या फिर तीनों को?
उन सभी बच्चियों को याद करते हुए जो आज जीवित होतीं अगर समाज में दरिंदे न होते....उन बच्चियों का मेरी ये पंक्तियां श्रद्धांजलि स्वरूप ....
आपराधिक हो चला वातावरण
हो चला संदिग्ध सबका आचरण
जब सुरक्षित ही नहीं हैं बच्चियां
उठ गया इंसानियत का आवरण
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(दैनिक ‘सागर दिनकर’, 12.06.2019)
 

बुंदेलखंड की लोकगाथाओं में है अद्भुत ‘महाभारत’-प्रसंग - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह - नवभारत में प्रकाशित

 
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Dr (Miss) Sharad Singh
नवभारत' में  प्रकाशित मेरा लेख ...
धन्यवाद नवभारत !!!
 
बुंदेलखंड की लोकगाथाओं में है अद्भुत ‘महाभारत’-प्रसंग
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
 
बुन्देलखण्ड में वे लोक गाथाएं सदियों से कहीं-सुनी जा रही हैं जिनमें ‘महाभारत’ महाकाव्य की कथाएं मौजूद हैं। बुन्देलखण्ड में जगनिक के बाद विष्णुदास ने लगभग 14 वीं सदी में ‘महाभारत कथा’ और ‘रामायण कथा’ लिखी थी। अन्य बुंदेली गाथाओं में भी ‘महाभारत प्रसंग मिलते हैं। 
बुंदेलखंड की लोकगाथाओं में है अद्भुत ‘महाभारत’-प्रसंग - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह - नवभारत में प्रकाशित  Navbharat - Bundelkhand Ki Lokgathaon Me Adbhut Hai Mahabharat Prasang  - Dr Sharad Singh
बुन्देली की प्रसि़द्ध महाभारतकथा संदर्भित लोकगाथाएं हैं- बैरायठा, कृष्ण-सुदामा, द्रौपदी चीरहरण तथा मेघासुर दानव आदि। इनके अतिरिक्त राजा जगदेव की लोकगाथा में भी पाण्डवों की चर्चा का समावेश है। महाभारत कालीन चरित्रों से जुड़ी गाथाओं का इस प्रकार बुन्देलखण्ड में रूचिपूर्वक गाया जाना इस बात का द्योतक है कि बुन्देली जन प्रकृति से जितने वीर होते हें तथा मानवीय संबंधों के आकलन को लेकर उतने ही संवेदनशील होते हैं। उन्हें व्यक्ति के अच्छे अथवा बुरे होने की परख होती है तथा साहसी, वीर, उदार, दानी और सच्चा व्यक्ति अपना आदर्श प्रतीत होता है। इसीलिए जन-जन में गाए जाने वाली बैरायठा लोकगाथा में ‘महाभारत’ महाकाव्य की लगभग सम्पूर्ण कथा को जन-परिवेश में पस्तुत किया गया है। जैसे, धृतराष्ट्र और गांधारी के विवाह के प्रसंग को इन शब्दों में प्रस्तुत किया गया है-
जब आ गई है चिठिया महाराज रे कै,
जब गंधार में हो रये हैं ब्याव रे कै
जब गांधारी को हुइये नौने ब्याव रे कै,
जब खबरें तो मिल गईं महराज रे कै
इसी गाथा में कौरवों द्वारा आयोजित कपट भरी द्यूतक्रीड़ा दृश्यात्मक वर्णन मिलता है-
जब सकुनी ने डारे दाव रे कै,
जब पर गये अठारा दाव रे कै
फिर हारे धरम और राज रे कै
जब बोले जरजोधन महराज रे कै
इस विवरण में जिन तथ्यों को विशेष रूप से रेखांकित किया गया है वे ध्यान देने योग्य हैं कि जब व्यक्ति अनुचित कर्म करने लगता है तो ‘धरम’ और ‘राज’ दोनों गंवा बैठता है। उस समय तो और अनर्थ होने लगता है जब दुश्शासन द्रौपदी को बलपूर्वक राजसभा ले जाता है-
जब जबरन तो लैजा रव महराज रे कै
जब जूटो तो पकरो ओने आज रे कै
जब रानी खों लै गव अपने साथ रे कै
जब आ गई सभा के नोने बीच रे कै
जब सबरो से करी है गुहार रे कै
जब कोऊ खों ने आई लाज रे कै
इसी प्रकार जब ‘पांच पती’ अर्थात् सगे-संबंधी भी रक्षा नहीं कर पाते हैं उस समय ‘हरि’ अर्थात् ईश्वर सहायता करता है-
जब भरी कचेरो महराज रे कै
जब कोनऊ ने करे सहाय रे कै
जब पांच पती मौजूद रे कै
जब हर से लगा दई ओने टेर रे कै
जब कैसे तो रये हो नोने सोय रे कै
यह मानव मन की वह अवस्था है जो राजनीतिक अस्थिरता एवं असुरक्षा के दौर में प्रभावी हो उठती है। यही भाव ‘चीरहरण’ लोकगाथा में मिलते हैं। दुश्शसन द्वारा चीरहरण किए जाने पर द्रौपदी पतियों द्वारा निर्धारित नियति को चुपचाप स्वीकार करने के बदले सहायता के लिए कृष्ण को पुकारती है-
हे श्याम मेरी सुध लइयो, रे प्रभु मोरी लाज बचइयो रे
शकुनी दुर्योधन ने मिल के, कपट के पांसे डारे
जुआ खेल के पति हमारे, राजपाट सब हारे
मोरी बिगड़ी आज बनइयो, रे प्रभु मोरी लाज बचइयो रे
‘राजा जगदेव’ लोकगाथा में भी पाण्डवों का उल्लेख प्रश्नों के रूप में है। किसने पृथ्वी को रचा? किसने संसार को रचा? किसने पाण्डवों को बनाया? पाण्डवों को किस उद्देश्य से बनाया गया? इन प्रश्नों का उत्तर भी इन्हीं के साथ दिया गया है कि देवी ने पाण्डवों को बनाया। पृथ्वी से अन्याय और अधर्म का विनाश करने के लिए पाण्डवों की रचना की गई।
कौना रची पिरथवी रे दुनियां संसार, कौना रचे पंडवां उनई के दरबार
बिरमा रची पिरथवी रे दुनियां संसार, माई रचें पंडवां रे अपने दरबार
रैबे खों रची पिरथवी रे दुनियां संसार, रन खों रचे पंडवा रे अपने दरबार ।।
अन्याय, दासता के विरुद्ध युद्धघोष करने वाले बुन्देलों के लिए महाभारतकालीन प्रसंगों का विशेष महत्व होना स्वाभाविक है। यदि मुग़लों अथवा अंग्रेजों के विरु़द्ध बुन्देलों के संघर्ष का इतिहास पढ़ा जाए तो यही तथ्य सामने आता है कि बहुसंख्यक शत्रुओं से अल्पसंख्यक बुन्देलों ने सदैव डट कर संघर्ष किया। ठीक उसी तरह जिस प्रकार पाण्डवों ने कौरवों का सामना किया था। अतः इसमें तनिक भी संदेह नहीं है कि ऐसे संघर्षपूर्ण अवसरों पर ये लोग गाथाएं आमजन में साहस का संचार करती रही होंगी। आज भी सुदूर ग्रामीण अंचलों में ये लोक गाथाएं गाई जाती हैं। यद्यपि आधुनिकता के आज के दौर में इन लोक गाथाओं के मूल स्वरूप के लुप्त होने का भय बढ़ चला है। आज बहुत कम लोग जानते हैं कि बुंदेली में भी अद्भुत ‘महाभारत’ प्रसंग मौजूद है।
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नवभारत, 08.06.2019

world environment day 2019 : पहले वृक्ष काट दिए और अब कर रहे पर्यावरण की चिंता, ऐसे में कैसे मिलेगी शुद्ध हवा - डॉ. शरद सिंह

विश्व पर्यावरण दिवस पर Patrika.com ने मेरे लेख को प्रकाशित कर जो डिज़िटल प्लेटफार्म दिया है उसके लिए मै Patrika.com की हृदय से आभारी हूं।
https://www.patrika.com/sagar-news/world-environment-day-2019-how-to-reduce-air-pollution-4669006/?fbclid=IwAR2wXgjIThaFA_Z30YsysggfHm8Yotwl8WQzbRJdgINeKqGi3eExE5626M8 


डॉ. शरद सिंह. सागर. विश्व पर्यावरण दिवस हर वर्ष पांच जून को मनाया जाता है। इस वर्ष भी मनाया जा रहा है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) द्वारा थीम तय की गई है- वायु प्रदूषण। इसी थीम के आधार पर वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जा रहा है। इसके साथ ही मंत्रालय इस अवसर पर कई कार्यक्रम आयोजित कर रहा है। कितना कंट्रास्ट और विरोधाभासी है न यह सब? एक ओर देश का आधे से अधिक हिस्सा पेयजल की किल्लत से जूझ रहा है वहीं दूसरी ओर उत्सवी वातावरण में पर्यावरण पर चिंतन किया जा रहा है। गोया हम अपने उत्सवधर्मिता के दायरे से बाहर आए बिना कुछ सोच ही नहीं सकते हैं। वहीं चीन अपने संसाधनों को हरसंभव बचाते हुए हमसे तेजी से आगे निकलता जा रहा है। इसीलिए वर्ष 2019 के लिए विगत 15 मार्च 2018 को को संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण परियोजना कार्यालय की कार्यवाहक कार्यकारी प्रमुख जॉइसी म्सुया के साथ केन्या की राजधानी नैरोबी में संयुक्त रुप से चीन को मेजबान घोषित किया गया।
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अत: इस वर्ष चीन पर्यावरण दिवस के आयोजन का मेजबान देश बनाया गया है। इस अवसर पर म्सुया ने कहा था कि 'वायु प्रदूषण के मुकाबले में चीन ने बड़ी नेतृत्वकारी शक्ति दिखाई। इसी क्षेत्र में चीन विश्व में और बड़े कदम उठाने में मददगार सिद्ध होगा। चीन वैश्विक अभियान का नेतृत्व करेगा, ताकि लाखों प्राणियों के प्राण बचाए जा सके।
world environment day 2019 how to reduce air pollution

दुनिया भर में बढ़ते प्रदूषण और उसको रोकने के उपायों पर ध्यान देने और उन उपायों को लागू करने के मकसद से विश्व पर्यावरण दिवस हर साल मनाया जाता है। एक बार फिर हम आज चिंतन कर रहे हैं बढ़ते हुए वायु प्रदूषण पर। यह चिंतन ठीक इसी प्रकार है कि पहले हमने चिकित्सकों को काम से हटा दिया और फिर मरीज की चिंता करने जुटे हैं। जी हां, वायु प्रदूषण पर सबसे अधिक नियंत्रण करने वाले प्राकृतिक तत्व हैं वृक्ष। लेकिन हमने अपने कांक्रीट का साम्राज्य बढ़ाने के लिए वृक्षों को कटने दिया और आज उम्मीद कर रहे हैं कि हमें शुद्ध वायु मिले। गंदगी से बजबजाते खुले नालों और कूड़े के ढेरों को देखते हुए भी हम आशा करते हैं कि हमें शुद्ध वायु मिले। यह स्वयं को छलने से बढ़कर और यदि कुछ है तो वह अपराध है जो हम अपने आने वाली पीढ़ी के प्रति कर रहे हैं।
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भारत में वाहन संबंधी वायु प्रदूषण के कारण अकेले वर्ष 2015 में साढ़े तीन लाख दमा का शिकार बने थे। दुनिया की प्रतिष्ठित चिकित्सा पत्रिका 'द लांसेट प्लैनटेरी हेल्थ जर्नल में प्रकाशित हुए एक अध्ययन में यह बात सामने आई थी। अध्ययन में 194 देशों और दुनिया भर के 125 प्रमुख शहरों को शामिल किया गया था। रिपोर्ट के अनुसार प्रति वर्ष बच्चों में दमा के दस में से एक से ज्यादा मामले वाहन संबंधी प्रदूषण के होते हैं। इन मामलों में से 92 प्रतिशत मामले ऐसे क्षेत्रों के रहते हैं, जहां यातायात प्रदूषण का स्तर विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के दिशानिर्देश स्तर से नीचे है। उसी दौरान अमेरिका स्थित जॉर्ज वाशिंगटन विश्वविद्यालय के विशेषज्ञ सुसान अनेनबर्ग ने इस रिपोर्ट पर बात करते हुए मीडिया से कहा था कि हमारे निष्कर्षों से पता लगा है कि नाइट्रोजन डाइऑक्साइड से होने वाला प्रदूषण बचपन में दमा की बीमारी के लिए ज्यादा जिम्मेदार है। यह विकसित और विकासशील दोनों तरह के देशों के लिए चिंता का विषय है। ऐसे में नाइट्रोजन डाइऑक्साइड की सांद्रता से जुड़े विश्व स्वास्थ्य संगठन के दिशा-निर्देश पर पुनर्विचार करने की जरूरत है तथा यातायात उत्सर्जन को कम करने के लिए भी एक लक्ष्य निर्धारित किया जाना चाहिए।
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क्या इस रिपोर्ट के प्रकाशित होने के बाद हमारे देश में वायु प्रदूषण के आधार पर वाहनों के रख-रखाव अथवा प्रदूषण नियंत्रण के प्रति कोई जागरूकता सामने आई? बस, एक ठोस कदम यह उठाया गया कि 15 वर्ष से पुराने वाहनों को सड़क पर निषिद्ध कर दिया गया। जबकि वाहनों की संख्या में सौगुनी वृद्धि हुई। भारत में बहुप्रचतिल वाहनों में मुख्यत: पेट्रोल एवं डीजल का ईंधन रूप में उपयोग होता है। इन वाहनों से निकलनेवाले धुंए में कार्बन-डाई-ऑक्साइड, कार्बन-मोनो-आक्साइड जैसी विषैली गैसे होती हैं, जो मानव एवं जीव जन्तुओं के स्वास्थ्य के लिए घातक होती हैं। वायु में निरन्तर घुलते भारी जहर के कारण लोगों को श्वासजनित बीमारियां हो जाती हैं। इनमें से अनेक लाइलाज होती हैं। वाहनों के धुएं से आंखों में जलन होना तो आम बात है।
वाहनों का धुआं इनकी साइलेन्सर की नली के छोर से निकलता है, जिसका मुंह वाहनों के पीछे की ओर रहता है। पीछे की ओर हवा में जहरीले पदार्थ घुलते जाते हैं। और फिर इस नली का मुंह नीचे ओर झुका होने के कारण धुएं का तेज झोंका पहले सड़क पर टकराता है और अपने साथ सड़क की गन्दी धूल को भी लेकर हवा में उड़ाकर जहरीले तत्वों को कई गुना बढ़ा देता है। लोगों की नाक में यह धुआं एवं गन्दी धूल घुसकर घातक प्रभाव डालती है। सबसे घातक स्थिति होती है, जब चौराहों पर लाल बत्ती होने के कारण प्रतीक्षारत वाहन खड़े रहते हैं तो उनका इंजन स्टार्ट रहता है तथा उनसे निकलता धुआं इतना अधिक गहरा होता जाता है कि आंखों में जलन होने के साथ साथ खांसी भी आने लगती है। चौराहों पर यातायात पुलिस कर्मियों की स्थिति आत्मघातियों जैसी बनी रहती है।
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हम अपने शहरों और बस्तियों में कारों की बाढ़ ले आए लेकिन हमने आज भी कारपूल करना नहीं सीखा। जबकि कारपूल वह पद्धति है जिसमें एक ही दफ्तर अथवा एक ही दिशा में जाने वाले कर्मचारी एक ही कार का साझा उपयोग करते हैं। प्रतिदिन किसी एक की कार का उपयोग होता है जिससे ईंधन की खपत कम होती है और सड़कों पर गाडिय़ों की संख्या में भी कमी आती है। इस पद्धति में किसी एक व्यक्ति पर बोझ भी नहीं पड़ता है। किंतु दिखावा पसंद हम कारों की बढ़त के खतरों को अनदेखा कर के अपने ऐश्वर्य का प्रदर्शन करने में अधिक विश्वास रखते हैं।
आज जब लगभग हर पच्चीसवें घर की एक न एक संतान अपनी रोजगार देने वाली कंपनियों के सौजन्य से विदेशों के स्वच्छ वातावरण में कुछ दिन बिताकर आती है और उनके माता-पिता भी टूर पैकेज में विदेश यात्राएं कर लेते हैं। वहां से लौट कर वे विदेशों में स्वच्छता के किस्से तो बड़ी धूमधाम से सुनते हैं किंतु उनमें से बिरले ही एकाध ऐसा संवेदनशील निकलता है जो विदेशों में स्वच्छता से प्रभावित हो कर अपने शहर, गांव या कस्बे को साफ-सुथरा रखने की पहल करता हो। हमारे देश में हर घर में आंगन का कंसेप्ट हुआ करता था जिसमें एक न एक छायादार बड़ा वृक्ष लगाया जाता था किन्तु अब इस तरह मकानों को अतिक्रमण करते हुए फैला दिया जाता है कि घर का मुख्यद्वार ही सड़क पर खुलता है। इस तरह हमाने अपने जीवनरक्षक वृक्ष को अपने घर से काट कर फेंक दिया है।
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नदियां जो गांवों और शहरों की गंदगी को बारिश के पानी के साथ बहा कर दूर ले जाता करती थीं, उन्हें भी हमारी लापरवाहियों ने सुखा दिया है। गंगा में औद्योगिक कारखानों का ज़हर घुलता रहता है और शेष में सीवेज की गंदगी घुलती रहती है। गंदे पानी से उठने वाली बदबू वायु को शुद्ध कैसे बनाए रख सकती हैं? झील एवं तालाबों की सतह पर जब गंदगी की पत्र्तें फैल जाती हैं तो जलजीव भी दम घुटने से मरने लगते हैं। मरे हुए जलजीवों की दुर्गंध भी वायु प्रदूषण का एक बड़ा कारण बनती है।
कवि कालिदास के साथ जुड़ा एक किस्सा है कि वे जिस डाल पर बैठे थे उसे ही काट रहे थे, इस बात से बेखबर कि डाल कटने पर वे गिर जाएंगे। हम भी कुछ ऐसा ही तो कर रहे हैं। जो पर्यावरण हमें जीवन देता है हम उसी को तेजी के साथ नष्ट करते जा रहे हैं। वायु प्रदूषण, जलसंकट और जंगलों का विनाश- ये तीनों स्थितियां हमारी खुद की पैदा की गई हैं जो समूची दुनिया को भयावह परिणाम की ओर ले जा रही है। यदि हम अब भी नहीं चेते तो हमारे जीवन की डाल कट जाएगी और नीचे गिरने पर हमें धरती का टुकड़ा भी नहीं मिलेगा।
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Wednesday, June 5, 2019

चर्चा प्लस ... विश्व पर्यावरण दिवस पर विशेष : तय करना होगा कि हमें शुद्ध वायु चाहिए या अशुद्ध - डॉ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
चर्चा प्लस ... विश्व पर्यावरण दिवस पर विशेष :
तय करना होगा कि हमें शुद्ध वायु चाहिए या अशुद्ध
- डॉ. शरद सिंह
हमारे शहरों में तापमान 50 डिग्री सेल्सियस को छूने चला है। राजस्थान के श्री गंगानगर में यह 50डिग्री को पार भी कर चुका है। कभी सोचा है कि ऐसा क्यों? हमने पेड़ काटे, जलस्रोतों को सुखाया जिससे हवा भी शुष्क हो गई। एक बार फिर हम आज चिंतन कर रहे हैं बढ़ते हुए वायु प्रदूषण पर। यह चिंतन ठीक इसी प्रकार है कि पहले हमने चिकित्सकों को काम से हटा दिया और फिर मरीज की चिंता करने जुटे हैं। जी हां, वायु प्रदूषण पर सबसे अधिक नियंत्रण करने वाले प्राकृतिक तत्व हैं वृक्ष। लेकिन हमने अपने कांक्रीट का साम्राज्य बढ़ाने के लिए वृक्षों को कटने दिया और आज उम्मींद कर रहे हैं कि हमें शुद्ध वायु मिले। यह स्वयं को छलने से बढ़ कर और यदि कुछ है तो वह अपराध है जो हम अपने आने वाली पीढ़ी के प्रति कर रहे हैं।
Charcha Plus -  विश्व पर्यावरण दिवस पर विशेष -  तय करना होगा कि हमें शुद्ध वायु चाहिए या अशुद्ध   -  Charcha Plus Column by Dr Sharad Singh
     विश्व पर्यावरण दिवस हर वर्ष 5 जून को मनाया जाता है। इस वर्ष भी मनाया जा रहा है। संयुक्तराष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) द्वारा थीम तय की गई है-‘वायु प्रदूषण’। इसी थीम के आधार पर वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जा रहा है। इसके साथ ही मंत्रालय इस अवसर पर कई कार्यक्रम आयोजित कर रहा है। जिसके तहत 5 जून, 2019 को दिल्ली के विज्ञान भवन में एक बड़ा आयोजन तय किया गया है। इस आयोजन में पर्यावरण पर फिल्म प्रतिस्पर्धा, पुस्तकों के विमोचन के साथ ही वायु प्रदूषण, अपशिष्ट प्रबंधन एवं ‘वन : द ग्रीन लंग्स ऑफ सिटीज’ पर तीन विषयगत सत्र आयोजित रखे गए हैं। विश्व पर्यावरण दिवस दिल्ली ही नहीं वरन् देश भर में राज्यों की राजधानियों और अन्य शहरों में भी मनाया जाना है। इस आयोजन के लिए थीम सांग की लंचिंग काफी पहले की जा चुकी है।
कितना कंट्रास्ट और विरोधाभासी है न यह सब? एक ओर देश का आधे से अधिक हिस्सा पेयजल की किल्लत से जूझ रहा है वहीं दूसरी ओर उत्सवी वातावरण में पर्यावरण पर चिंतन किया जा रहा है। गोया हम अपने उत्सवधर्मिता के दायरे से बाहर आए बिना कुछ सोच ही नहीं सकते हैं। वहीं चीन अपने संसाधनों को हरसंभव बचाते हुए हमसे तेजी से आगे निकलता जा रहा है। इसीलिए वर्ष 2019 के लिए विगत 15 मार्च 2018 को को संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण परियोजना कार्यालय की कार्यवाहक कार्यकारी प्रमुख जॉइसी म्सुया के साथ केन्या की राजधानी नैरोबी में संयुक्त रुप से चीन को मेजबान घोषित किया गया। अतः इस वर्ष चीन ‘विश्व पर्यावरण दिवस’ के आयोजन का मेजबान देश बनाया गया है। इस अवसर पर बोलते हुए म्सुया ने कहा था कि ‘वायु प्रदूषण के मुकाबले में चीन ने बड़ी नेतृत्वकारी शक्ति दिखाई। इसी क्षेत्र में चीन विश्व में और बड़े कदम उठाने में मददगार सिद्ध होगा। चीन वैश्विक अभियान का नेतृत्व करेगा, ताकि लाखों प्राणियों के प्राण बचाए जा सके।’
संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा स्थापित संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम हर साल 5 जून को “विश्व पर्यावरण दिवस” का आयोजन करता है। विश्व पर्यावरण दिवस दुनिया भर में बढ़ते प्रदूषण और उसको रोकने के उपायों पर ध्यान देने और उन उपायों को लागू करने के मकसद से हर साल मनाया जाता है। वर्तमान में वातावरण में लगातार बढ़ते प्रदूषण और उसके मानव जीवन सहित दूसरे जीव जन्तुओं में पड़ते प्रभाव को कम करने के उपायों को बेहतर बनाने के लिए है विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाता है। प्रति वर्ष की भांति इस वर्ष भी विश्व पर्यावरण दिवस बुधवार 5 जून 2019 को मनाया जा रहा है। हर साल की तरह इस साल भी संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा विश्व पर्यावरण दिवस का आयोजन होगा। वैसे तो समय-समय में संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा पर्यावरण पर सम्मेलन आयोजित होते रहते हैं किंतु 5 जून को विश्व के सभी सदस्य देश इस सम्मेलन में भाग लेते हैं और पर्यावरण को बेहतर और हराभरा बनाने के उपायों में विचार विमर्श करते हैं। यह विश्व के 100 से ज्यादा देशों द्वारा मनाया जाता है। इस दिन हर जगह पर्यावरण के सन्दर्भ में जागरुकता कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है।
एक बार फिर हम आज चिंतन कर रहे हैं बढ़ते हुए वायु प्रदूषण पर। यह चिंतन ठीक इसी प्रकार है कि पहले हमने चिकित्सकों को काम से हटा दिया और फिर मरीज की चिंता करने जुटे हैं। जी हां, वायु प्रदूषण पर सबसे अधिक नियंत्रण करने वाले प्राकृतिक तत्व हैं वृक्ष। लेकिन हमने अपने कांक्रीट का साम्राज्य बढ़ाने के लिए वृक्षों को कटने दिया और आज उम्मींद कर रहे हैं कि हमें शुद्ध वायु मिले। गंदगी से बजबजाते खुले नालों और कूड़े के ढेरों को देखते हुए भी हम आशा करते हैं कि हमें शुद्ध वायु मिले। यह स्वयं को छलने से बढ़ कर और यदि कुछ है तो वह अपराध है जो हम अपने आने वाली पीढ़ी के प्रति कर रहे हैं।
भारत में वाहन संबंधी वायु प्रदूषण के कारण अकेले वर्ष 2015 में साढ़े तीन लाख बच्चे दमा का शिकार बने थे। दुनिया की प्रतिष्ठित चिकित्सा पत्रिका ‘द लांसेट प्लैनटेरी हेल्थ जर्नल’ में प्रकाशित हुए एक अध्ययन में यह बात सामने आयी थी। इस अध्ययन में 194 देशों और दुनिया भर के 125 प्रमुख शहरों को शामिल किया गया था। रिपोर्ट के अनुसार प्रति वर्ष बच्चों में दमा के दस में से एक से ज्यादा मामले वाहन संबंधी प्रदूषण के होते हैं। इन मामलों में से 92 प्रतिशत मामले ऐसे क्षेत्रों के रहते हैं, जहां यातायात प्रदूषण का स्तर विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के दिशानिर्देश स्तर से नीचे है। उसी दौरान अमेरिका स्थित जॉर्ज वाशिंगटन विश्वविद्यालय के विशेषज्ञ सुसान अनेनबर्ग ने इस रिपोर्ट पर बात करते हुए मीडिया से कहा था कि ‘हमारे निष्कर्षों से पता लगा है कि नाइट्रोजन डाइऑक्साइड से होने वाला प्रदूषण बचपन में दमा की बीमारी के लिए ज्यादा जिम्मेदार है। यह विकसित और विकासशील दोनों तरह के देशों के लिए चिंता का विषय है। ऐसे में नाइट्रोजन डाइऑक्साइड की सांद्रता से जुड़े विश्व स्वास्थ्य संगठन के दिशा-निर्देश पर पुनर्विचार करने की जरूरत है तथा यातायात उत्सर्जन को कम करने के लिए भी एक लक्ष्य निर्धारित किया जाना चाहिए।’
क्या इस रिपोर्ट के प्रकाशित होने के बाद हमारे देश में वायु प्रदूषण के आधार पर वाहनों के रख-रखाव अथवा प्रदूषण नियंत्रण के प्रति कोई जागरूकता सामने आई? बस, एक ठोस कदम यह उठाया गया कि 15 वर्ष से पुराने वाहनों को सड़क पर निषिद्ध कर दिया गया। जबकि वाहनों की संख्या में सौगुनी वृद्धि हुई। भारत में बहुप्रचतिल वाहनों में मुख्यतः पेट्रोल एवं डीजल का ईंधन रूप में उपयोग होता है। इन वाहनों से निकलनेवाले धुंए में कार्बन-डाई-ऑक्साइड, कार्बन-मोनो-आक्साइड जैसी विषैली गैसे होती हैं, जो मानव एवं जीव जन्तुओं के स्वास्थ्य के लिए घातक होती हैं। वायु में निरन्तर घुलते भारी जहर के कारण लोगों को श्वासजनित बीमारियां हो जाती हैं। इनमें से अनेक लाईलाज होती हैं। वाहनों के धुंए से आंखों में जलन होना तो आम बात है। वाहनों का धुंआ इनकी साईलेन्सर की नली के छोर से निकलता है, जिसका मुंह वाहनों के पीछे की ओर रहता है। पीछे की ओर हवा में जहरीले पदार्थ घुलते जाते हैं। और फिर इस नली का मुंह नीचे ओर झुका होने के कारण धुंए का तेज झोंका पहले सड़क पर टकराता है और अपने साथ सड़क की गन्दी धूल को भी लेकर हवा में उड़ाकर जहरीले तत्वों को कई गुना बढ़ा देता है। लोगों की नाक में यह धुंआ एवं गन्दी धूल घुसकर घातक प्रभाव डालती है। सबसे घातक स्थिति होती है, जब चौराहों पर लाल बत्ती होने के कारण प्रतीक्षारत वाहन खड़े रहते हैं तो उनका इंजन स्टार्ट रहता है तथा उनसे निकलता धुंआ इतना अधिक गहरा होता जाता है कि आंखों में जलन होने के साथ साथ खांसी भी आने लगती है। चौराहों पर यातायात पुलिस कर्मियों की स्थिति आत्मघातियों जैसी बनी रहती है।
हम अपने शहरों और बस्तियों में कारों की बाढ़ ले आए लेकिन हमने आज भी ‘कारपूल’ करना नहीं सीखा। जबकि ‘कारपूल’ वह पद्धति है जिसमें एक ही दफ्तर अथवा एक ही दिशा में जाने वाले कर्मचारी एक ही कार का साझा उपयोग करते हैं। प्रतिदिन किसी एक की कार का उपयोग होता है जिससे ईंधन की खपत कम होती है और सड़कों पर गाड़ियों की संख्या में भी कमी आती है। इस पद्धति में किसी एक व्यक्ति पर बोझ भी नहीं पड़ता है। किंतु दिखावा पसंद हम कारों की बढ़त के खतरों को अनदेखा कर के अपने ऐश्वर्य का प्रदर्शन करने में अधिक विश्वास रखते हैं।
आज जब लगभग हर पच्चीसवें घर की एक न एक संतान अपनी रोजगार देने वाली कंपनियों के सौजन्य से विदेशों के स्वच्छ वातावरण में कुछ दिन बिता कर आती है और उनके माता-पिता भी टूर पैकेज में विदेश यात्राएं कर लेते हैं। वहां से लौट कर वे विदेशों में स्वच्छता के किस्से तो बड़ी धूम-धाम से सुनते हैं किंतु उनमें से बिरले ही एकाध ऐसा संवेदनशील निकलता है जो विदेशों में स्वच्छता से प्रभावित हो कर अपने शहर, गांव या कस्बे को साफ-सुथरा रखने की पहल करता हो। हमारे देश में हर घर में आंगन का कंसेप्ट हुआ करता था जिसमें एक न एक छायादार बड़ा वृक्ष लगाया जाता था किन्तु अब इस तरह मकानों को अतिक्रमण करते हुए फैला दिया जाता है कि घर का मुख्यद्वार ही सड़क पर खुलता है। इस तरह हमाने अपने जीवनरक्षक वृक्ष को अपने घर से काट कर फेंक दिया है।
नदियां जो गांवों और शहरों की गंदगी को बारिश के पानी के साथ बहा कर दूर ले जाता करती थीं, उन्हें भी हमारी लापरवाहियों ने सुखा दिया है। गंगा में औद्योगिक कारखानों का ज़हर घुलता रहता है और शेष में सीवेज की गंदगी घुलती रहती है। गंदे पानी से उठने वाली बदबू वायु को शुद्ध कैसे बनाए रख सकती हैं? झील एवं तालाबों की सतह पर जब गंदगी की पर्त्तें फैल जाती हैं तो जलजीव भी दम घुटने से मरने लगते हैं। मरे हुए जलजीवों की दुर्गंध भी वायु प्रदूषण का एक बड़ा कारण बनती है।
कवि कालिदास के साथ जुड़ा एक किस्सा है कि वे जिस डाल पर बैठे थे उसे ही काट रहे थे, इस बात से बेखबर कि डाल कटने पर वे गिर जाएंगे। हम भी कुछ ऐसा ही तो कर रहे हैं। जो पर्यावरण हमें जीवन देता है हम उसी को तेजी के साथ नष्ट करते जा रहे हैं। वायु प्रदूषण, जलसंकट और जंगलों का विनाश - ये तीनों स्थितियां हमारी खुद की पैदा की गई हैं जो समूची दुनिया को भयावह परिणाम की ओर ले जा रही है। यदि हम अब भी नहीं चेते तो हमारे जीवन की डाल कट जाएगी और नीचे गिरने पर हमें धरती का टुकड़ा भी नहीं मिलेगा।
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(दैनिक ‘सागर दिनकर’, 05.06.2019)

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ईद मुबारक़ ...डॉ शरद सिंह

Eid Mubarak - Dr (Miss) Sharad Singh

Monday, June 3, 2019

बुंदेलखंड के पारंपरिक व्यंजन घर से बेघर पर ‘फूडजोन’ में आबाद - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh, Author
नवभारत में प्रकाशित मेरा लेख "बुंदेलखंड के पारंपरिक व्यंजन घर से बेघर पर ‘फूडजोन’ में आबाद" प्रकाशित हुआ है, इसे आप भी पढ़ें.... हार्दिक धन्यवाद नवभारत !!!


     पिछले दिनों पहले भोपाल उसके बाद झांसी के एक मॉल के ‘फूडजोन’ में यह देख कर सुखद आश्चर्य हुआ कि वहां पारंपरिक बुंदेली व्यंजनों का भी एक ‘कॉर्नर’ है। संयोगवश उन्हीं दिनों ‘लिविंग फूड चैनल’ के प्रसिद्ध टीवी शो ‘नॉदर्न फ्लेवर’ में बुंदेली शादियों में बनाए जाने वाले पारंपरिक व्यजनों पर एक कार्यक्रम देखा जिसमें ‘सिंदोरा-सिंदोरी’ जैसे व्यंजन बनाने की विधि बताई गई थी। इन सबको देख कर मुझे वो दिन याद आ गए जब बचपन में मैं बिरचुन यानी सूखे बेर का चूरा खाती हुई इंद्रजाल कॉमिक्स पढ़ा करती थी और मेरी मां खाना बनाने वाली ‘बऊ’ के साथ मिलकर छुट्टी के दिन खुरमा-पपड़ियां बनाया करती थीं। महीनों तक रखे जा सकने वाले खुरमा-पपड़िया को हम बच्चों से बचा कर रखने के लिए ढेर सारे जतन करने पड़ते थे मां को। उन दिनों लपटा और लप्सी भी हमारी जबान पर चढ़ा हुआ था। चीले की फरमाईश तो आए दिन होती थी। पारंपरिक व्यंजनों का यह शौक मुझे अपनी मां से विरासत में मिला। लेकिन अब इस व्यस्त ज़िन्दगी में ऐसे बहुत कम अवसर आते हैं जब घर में कोई विशेष पारंपरिक व्यंजन बन पाता हो। रिश्तेदारों एवं परिचितों के बच्चे तो पिज्जा, बर्गर, नूडल्स और चाउमिन पर फ़िदा रहते हैं। रहा शादी-विवाह के समारोहों का सवाल तो वहां भी बुंदेली छोड़ कर विभिन्न प्रांतों के व्यंजनों के स्टॉल लगे होते हैं, गोया बुंदेली व्यंजन रोज घरों पर बन रहे हों। यही कारण है कि बुंदेलखण्ड के पारंपरिक व्यंजन घर से बेघर होते जा रहे हैं।
बुंदेलखंड के पारंपरिक व्यंजन घर से बेघर पर ‘फूडजोन’ में आबाद - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह  Navbharat - Bundelkhand Ke Paramparik Vyanjan Ghar Se Beghar Pr FooZone Me Aabad - Dr Sharad Singh,

ऐसा नहीं है कि बुंदेलखंड के पारंपरिक व्यंजनों का कोई मौसमी नियम ही न हो। किस मौसम में क्या खाया जाना चाहिए, इसका निर्देश में मिलता है। जैसे -
चैते गुड, वैसाखे तेल, जेठे पंथ, अषाढ़े बेल
साउन साग, भादौं दही, क्वांर करेला, कातिक मही;
अगहन जीरा, पूसै धना, माघै मिसरी, फागुन चना
जो यह बारह देई बचाय, ता घर वैद कभऊं नइं जाए।।
अर्थात चैत्र मास में गुड़ का सेवन करना अहितकर है, क्योंकि नया गुड़ कफकारी होता है। वैशाख में गर्मी की प्रखरता रहती है, तेल की प्रकृति गर्म होती है इसलिए हानिकारक है। ज्येष्ठ मास में गर्मी की भीषणता रहती है अतः हल्का, सुपाच्य भोजन लेना चाहिए। आषाढ मास में बेल का सेवन नहीं करना चाहिए। और भाद्रपद में दही पित्त को कुपित करता है। आश्विन में करेला पककर पित्तकारक हो जाता है, अतएव हानिकर सिद्ध होता है। कार्तिक मास, जो कि वर्षा और शीत ऋतु का संधिस्थल है, उसमें पित्त का कोप और कफ का संचय होता है और मही यानी मट्ठे से शरीर में कफ बढता है, इसलिए त्याज्य है. अगहन में सर्दी अधिक होती है, जीरा की तासीर भी शीतकारक है, इसलिए इससे बचना चाहिए। पौष मास में धनिया, माघ में मिसरी और फाल्गुन में चना खाना उचित नहीं होता है। इनको ध्यान में रखकर जो मनुष्य खान-पान में सावधानी रखते हैं, वे सदैव निरोग रहते हैं, उनको कभी डाक्टर-वैद्य की आवश्यकता नहीं पडती।
रहा पारंपरिक व्यंजनों का प्रश्न तो, पूड़ी के लड्डुओं का स्वाद वह कभी नहीं भूल सकता है जिसने उन्हें अपने जीवन में एक भी बार खाया हो। ये त्यौहारों बनाए जाते हैं। (चूंकि ‘थे’ लिखने में अंतस कचोटता है अतः मैं ‘है’ ही लिखूंगी) बेसन की बड़ी एवं मोटी पूड़ियां तेल में सेंककर हाथों से बारीक मीड़ी जाती है। फिर उन्हें चलनी से छानकर थोड़े से घी में भूना जाता है। उसके बाद शक्कर या गुड़ डाल कर हाथों से बांधा जाता है। स्वाद बढ़ाने के लिए कालीमिर्च अथवा इलायची भी डाल दी जाती है। इसी तरह है हिंगोरा। बिना मठे की बेसन की कढ़ी जिसमें हींग का तड़का लगाया जाता है। आंवरिया भी इसी श्रेणी का एक व्यंजन है। आंवरिया अर्थात् आंवले की कढ़ी। इसमें सूखे आंवलों की कलियों को तेल में भूनकर सिल पर पीस लिया जाता है। फिर बेसन को पानी में घोलकर किसी बर्तन में चूल्हे पर चढ़ा देते हैं और कढ़ी पक जाने पर, चूल्हे से उतारने के पहले इसमें आंवलों का चूर्ण और नमक डाल देते हैं। इच्छानुसार इसमें लाल मिर्च, जीरा, प्याज एवं लहसुन आदि भी पीस कर डाला जाता है।
फरा भी एक पारंपरिक बुंदेली व्यंजन है। इसमें गेहूं के आटे को मांड़ कर छोटी-छोटी पूड़िया बेल ली जाती हैं फिर इन्हें खौलते हुए पानी में सेंका जाता है। बफौरी, मीड़ा, निघौना, रस खीर, बेसन के आलू, फरा, अद्रेनी, थोपा, पूड़ी के लडडू, महेरी या महेई, करार, मांडे, एरसे या आंसे, लपटा, हिंगोरा, आंवरिया, ठोमर, ठड़ूला, डुबरी, कचूमर, कुम्हड़े की खीर, गुना, खाकड़ा, लप्सी, रसाजें, खींच, बिरचून, लुचई, गकरिआ, पपड़िया, टिक्कड़, बरी, बिजौरा, कचरिया, खुरमा-खुरमी, बतियां आदि अनेक ऐसे व्यंजन हैं जो बुंदेली रसोई के अभिन्न अंग हुआ करते थे किंतु अब ये इतालवी या चाइनीज़ फूड तले दबते जा रहे हैं। जबकि इनमें से अनेक ऐसे व्यंजन हैं जो ‘फास्ट फूड’ की श्रेणी में रखे जा सकते हैं।
यूं तो हमारे देश में व्यंजनों की संख्या का निर्धारण आमतौर पर छप्पन प्रकार के व्यंजनों के रूप में किया जाता है, किंतु बुंदेलखंड में सौ से भी अधिक प्रकार के व्यंजन बनाए जाते रहे हैं। दुख तो तब होता है जब इन व्यंजनों में से कुछ को ‘स्ट्रीट फूड’ की श्रेणी में गिना जाता है। जो बुंदेली रसोईघर के राजा-रानी हुआ करते थे वे आज ‘स्ट्रीट फूड’ के रूप में बिकते हैं। यही है बाज़ारवाद का चमत्कार जिसने पारंपरिक व्यंजनों को घरों से बेघर कर के मॉल के आलीशान फूडजोन में पहुंचा दिया है जहां इनमें से कुछ व्यंजनों का अस्तित्व तो बचा हुआ है लेकिन दस रुपए के सामान को सौ रूपए में खरीद कर यह झूठा गुमान भी पालने का शगल आ गया है कि हम अपने पारंपरिक व्यंजनों को लुप्त होने से बचा रहे हैं। यद्यपि बुंदेलखंड में आयोजित किए जाने वाले बुंदेली उत्सव इव पारंपरिक व्यंजनों को पुनः चलन में लाने में अपनी महती भूमिका निभा रहे हैं तथा साहित्यकार पारंपरिक बुंदेली व्यंजनों को पुस्तकाकार सहेज भी रहे हैं किंतु ये तभी चलन में लौट सकते हैं जब ये एक बार फिर हर घर की रसोई का हिस्सा बन जाएं।
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( नवभारत, 03.06.2019 )
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