Wednesday, March 29, 2017

चर्चा प्लस ... स्त्रीशक्ति का प्रतीक है दुर्गा - डॉ. शरद सिंह

#नवरात्रि पर विशेष लेख:
"#स्त्रीशक्ति का प्रतीक है #दुर्गा " मेरे कॉलम #चर्चा_प्लस में "दैनिक सागर दिनकर" में ( 29.03. 2017) ..My Column #Charcha_Plus in "Sagar Dinkar" news paper
 

चर्चा प्लस
नवरात्रि आरम्भ पर विशेष :
स्त्रीशक्ति का प्रतीक है दुर्गा

- डॉ. शरद सिंह
नवरात्रि...नौ दिन देवी दुर्गा के नौ रूपों की स्तुति... दुर्गा जो स्त्रीशक्ति का प्रतीक हैं, असुरों का विनाश करने की क्षमता रखती हैं... किन्तु इस बात पर विश्वास करना ही र्प्याप्त है क्या? सिर्फ़ सोचने या मानने से नहीं बल्कि करने से कोई भी कार्य पूरा होता है। इसलिए यदि आज स्त्री प्रताड़ित है, अपराधों का शिकार हो रही है तो उसे अपनी शक्ति को पहचानते हुए स्वयं दुर्गा की शक्ति में ढलना होगा। डट कर समाना करना होगा स्त्रीजाति के विरुद्ध की समस्त बुराइयों का और स्त्री का सम्मान करना सीखना होगा समस्त पुरुषों को, तभी नवरात्रि का अनुष्ठान सार्थक होगा।
या देवि सर्वभूतेषु शक्ति रूपेण संस्थिता,
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।
मां दुर्गा की उपासना करते समय जिस स्त्रीशक्ति का बोध होता है वह उपासना के बाद स्मरण क्यों नहीं रहता? न स्त्रियों को और न पुरुषों को। समाचारपत्रों में आए दिन स्त्री के विरुद्ध किए गए जघन्य अपराधों के समाचारों भरे रहते हैं। कभी तेजाब कांड तो कभी दहेज हत्या तो कभी बलात्कार और बलात्कार के बाद नृशंसतापूर्वक हत्या। ये घटनाएं हरेक पाठक के दिल-दिमाग़ को झकझोरती हैं। बहुत बुरा लगता है ऐसे समाचारों को पढ़ कर। समाज में आती जा रही चारित्रिक गिरावट को देख कर अत्यंत दुख भी होता है लेकिन सिर्फ़ शोक प्रकट करने या रोने से समस्या का समाधान नहीं निकलता है। देवी दुर्गा का दैवीय चरित्र हमें यही सिखाता है कि अपराधियों को दण्डित करने के लिए स्वयं के साहस को हथियार बनाना पड़ता है। जिस महिषासुर को देवता भी नहीं मार पा रहे थे उसे देवी दुर्गा ने मार कर देवताओं को भी प्रताड़ना से बचाया। नवरात्रि के दौरान लगभग हर हिन्दू स्त्री अपनी क्षमता के अनुसार दुर्गा के स्मरण में व्रत, उपवास पूजा-पाठ करती है। अनेक महिला निर्जलाव्रत भी रखती हैं। पुरुष भी पीछे नहीं रहते हैं। वे भी पूरे समर्पणभाव से मां दुर्गा की स्तुति करते हैं। नौ दिन तक चप्पल-जूते न पहनना, दाढ़ी नहीं बनाना आदि जैसे सकल्पों का निर्वाह करते हैं। लेकिन वहीं जब किसी स्त्री को प्रताड़ित किए जाने का मामला समाने आता है तो अधिकांश स्त्री-पुरुष तटस्थ भाव अपना लेते हैं। उस समय गोया यह भूल जाते हैं कि आदि शक्ति दुर्गा के चरित्र से शिक्षा ले कर अपनी शक्ति को भी तो पहचानना जरूरी है।

Charcha Plus Column of Dr Sharad Singh in "Sagar Dinkar" Daily News Paper

किसी भी प्रकार की प्रताड़ना या हिंसा का स्त्रीसमाज पर शारीरिक, मानसिक तथा भावनात्मक दुष्प्रभाव पड़ता है। इसके कारण महिलाओं के काम तथा निर्णय लेने की क्षमता पर प्रभाव पड़ता है। परिवार में आपसी रिश्तों और आसपड़ौस के साथ रिश्तों व बच्चों पर भी इस हिंसा का सीधा दुष्प्रकभाव देखा जा सकता है। इससे स्त्रियों की सार्वजनिक भागीदारी में बाधा पड़ती है और वे स्वयं को अबला समझने लगती हैं। जबकि इसके विपरीत मां दुर्गा का चरित्र उन्हें दृढ़ और सबल होने का संदेश देता है।
हिन्दुओं के शाक्त साम्प्रदाय में भगवती दुर्गा को ही दुनिया की पराशक्ति और सर्वोच्च देवता माना जाता है। उल्लेखनीय है कि शाक्त साम्प्रदाय ईश्वर को देवी के रूप में मानता है। वेदों में तो दुर्गा का व्यापाक उल्लेख है। उपनिषद में देवी दुर्गा को “उमा हैमवती“ अर्थात् हिमालय की पुत्री कहा गया है। वहीं पुराणों में दुर्गा को आदिशक्ति माना गया है। वैसे दुर्गा शिव की अर्द्धांगिनी पार्वती का एक रूप हैं, जिसकी उत्पत्ति राक्षसों का नाश करने के लिये देवताओं की प्रार्थना पर पार्वती ने धारण किया था देवी दुर्गा के और भी कई रूपों की कल्पना की गई है। दुर्गा सप्तशती में दुर्गा के कई रूप भी बताए गए है, जैसे- ब्राह्मणी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, नरसिंही, ऐन्द्री, शिवदूती, भीमादेवी, भ्रामरी, शाकम्भरी, आदिशक्ति, रक्तदन्तिका।
दुर्गा सप्तशती में कुल 13 अध्याय हैं, जिसमें 700 श्लोकों में देवी-चरित्र का वर्णन है। मुख्य रूप से ये तीन चरित्र हैं, प्रथम चरित्र (प्रथम अध्याय), मध्यम चरित्र (2-4 अध्याय) और उत्तम चरित्र (5-13 अध्याय)। प्रथम चरित्र की देवी महाकाली, मध्यम चरित्र की देवी महालक्ष्मी और उत्तम चरित्र की देवी महासरस्वती मानी गई है। यहां दृष्टव्य है कि महाकाली की स्तुथति मात्र एक अध्याय में, महालक्ष्मी की स्तुति तीन अध्यायों में और महासरस्वती की स्तुति नौ अध्यायों में वर्णित है, जो सरस्वती की वरिष्ठता, काली (शक्ति) और लक्ष्मी (धन) से अधिक सिद्ध करती है। मां दुर्गा के तीनों चरित्रों से संबंधित तीन रोचक कहानियां भी हैं जो
प्रथम चरित्र - बहुत पहले सुरथ नाम के राजा राज्य करते थे। शत्रुओं और दुष्ट मंत्रियों के कारण उनका राज्य, कोष सब कुछ हाथ से निकल गया। वह निराश होकर वन से चले गए, जहां समाधि नामक एक वैश्य से उनकी भेंट हुई। उनकी भेंट मेधा नामक ऋषि के आश्रम में हुई। इन दोनों व्यक्तियों ने ऋषि से पूछा कि यद्यपि हम दोनों के साथ अपने लोगों (पुत्र, मंत्रियों आदि) ने दुर्व्यवहार किया है फिर भी उनकी ओर हमारा मन लगा रहता है। मुनिवर, क्या कारण है कि ज्ञानी व्यक्तियों को भी मोह होता है। ऋषि ने कहा कि यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है, भगवान विष्णु की योगनिद्रा ज्ञानी पुरुषों के चित्त को भी बलपूर्वक खींचकर मोहयुक्त कर देती है, वहीं भगवती भक्तों को वर देती है और ’परमा’ अर्थात ब्रह्म ज्ञानस्वरूपा मुनि ने कहा, ’नित्यैव सा जगन्मूर्तिस्तया सर्वमिद ततम्’ अर्थात वह देवी नित्या है और उसी में सारा विश्व व्याप्त है। प्रलय के पश्चात भगवान विष्णु योगनिद्रा में निमग्न थे तब उनके कानों के मैल से मधु और कैटभ नाम के दो असुर उत्पन्न हुए। उन्होंने ब्रह्माजी को आहार बनाना चाहा। ब्रह्माजी उनसे बचने के लिए योगनिद्रा की स्तुति करने लगे। तब देवी योगनिद्रा उन दोनों असुरों का संहार किया।
मध्यम चरित्र - इस चरित्र में मेधा नामक ऋषि ने राजा सुरथ और समाधि वैश्य के प्रति मोहजनित कामोपासना द्वारा अर्जित फलोपभोग के निराकरण के लिए निष्काम उपासना का उपदेश दिया है। प्राचीनकाल में महिषासुर सभी देवताओं को हराकर स्वयं इन्द्र बन गया और सभी देवताओं को स्वर्ग से बाहर निकाल दिया। वे सभी देवता- ब्रह्मा, विष्णु और शंकर के पास सहायतार्थ गए। उनकी करुण कहानी सुनकर विष्णु और शंकर के मुख से तेज प्रकट हुआ। इसी प्रकार का तेज अन्य देवताओं के शरीर से भी निकला। यह सब एक होकर देवी रूप में परिणित हुआ। इस देवी ने महिषासुर और उनकी सेना का नाश किया। देवताओं ने अपना अभीष्ट प्राप्त कर, देवी से वर मांगा। ’जब-जब हम लोगों पर विपत्तियां आएं, तब-तब आप हमें आपदाओं से विमुक्त करें और जो मनुष्य आपके इस चरित्र को प्रेमपूर्वक पढ़ें या सुनें वे संपूर्ण सुख और ऐश्वर्यों से संपन्न हों।’ महिषासुर को मार कर देवी ‘महिषासुरमर्दिनी’ कहलाईं।
उत्तम चरित्र - उत्तम चरित्र में परानिष्ठा ज्ञान के बाधक आत्म-मोहन, अहंकार आदि के निराकरण का वर्णन है। पूर्व काल में शुंभ और निशुंभ नामक दो असुर हुए। उन्होंने इन्द्र आदि देवताओं पर आधिपत्य कर लिया। बार-बार होते इस अत्याचार के निराकरण के लिए देवता दुर्गा देवी की प्रार्थना हिमालय पर्वत पर जाकर करने लगे। देवी प्रकट हुई और उन्होंने देवताओं से उनकी प्रार्थना करने का कारण पूछा। कारण जानकर देवी ने परम सुंदरी ’अंबिका’ रूप धारण किया। इस सुंदरी को शुंभ-निशुंभ के सेवकों चंड और मुंड ने देखा। इन सेवकों से शुंभ-निशुंभ को सुंदरी के बारे में जानकारी मिली और उन्होंने सुग्रीव नामक असुर को अंबिका को लाने के लिए भेजा। देवी ने सुग्रीव से कहा, ’जो व्यक्ति युद्ध में मुझ पर विजय प्राप्त करेगा, उसी से मैं विवाह करूंगी।’ दूत के द्वारा अपने स्वामी की शक्ति का बार-बार वर्णन करने पर देवी उस असुर के साथ नहीं गई। तब शुंभ-निशुंभ ने सुंदरी को बलपूर्वक खींचकर लाने के लिए धूम्रलोचन नामक असुर को आदेश दिया। धूम्रलोचन देवी के हुंकार मात्र से भस्म हो गया। फिर चंड-मुंड दोनों एक बड़ी सेना लेकर आए तो देवी ने असुर की सेना का विनाश किया और चंड-मुंड का शीश काट दिया, जिसके कारण देवी का नाम ’चामुंडा’ पड़ा। असुर सेना का विनाश करने के बाद देवी ने शुंभ-निशुंभ को संदेश भेजा कि वे देवताओं को उनके छीने अधिकार दे दें और पाताल में जाकर रहें, परंतु शुंभ-निशुंभ मारे गए। रक्तबीज की विशेषता थी कि उसके शरीर से रक्त की जितनी बूंदें पृथ्वी पर गिरती थीं, उतने ही रक्तबीज फिर से उत्पन्न हो जाते थे। देवी ने अपने मुख का विस्तार करके रक्तबीज के शरीर का रक्त को अपने मुख में ले लिया और असुर का सिर काट डाला। इसके पश्चात शुंभ और निशुंभ भी मारे गए और तब देवताओं ने स्तुति की-
सर्वाबाधा प्रशमनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्वरी।
एवमेव त्वया कार्यमस्मद्वैरी विनाशम्।।

हमें यह विचार करना ही होगा कि पूजा-अर्चना द्वारा हम देवी के इन चरित्रों का आह्वान करते हैं तो फिर देवी के इन चरित्रों से प्रेरणा ले कर उन लोगों पर शिकंजा क्यों नहीं कस पाते हैं जो असुरों जैसे कर्म करते हैं? क्या हम इन प्रेरक कथाओं के मर्म को समझ नहीं पाते हैं अथवा समझना ही नहीं चाहते हैं? बहरहाल, एक और रोचक कथा है- राजा सुरथ और समाधि वैश्य दोनों ने देवी की आराधना की। देवी की कृपा से सुरथ को उनका खोया राज्य और वैश्य का मनोरथ पूर्ण हुआ। उसी प्रकार जो व्यक्ति भगवती की आराधना करते हैं उनका मनोरथ पूर्ण होता है। ऐसी मान्यता है कि दुर्गा सप्तशती के केवल 100 बार पाठ करने से सर्वार्थ सिद्धि प्राप्त होती है। इस मान्यता को व्यवहारिकता में ढालते हुए यदि स्त्रियों के हित में अपनी शक्ति को पहचान कर अपराधों का प्रतिकार किया जाए तो यह मां दुर्गा की सच्ची स्तुति होगी।
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Wednesday, March 22, 2017

विश्व जल दिवस ... जल है तो कल है - डॉ. शरद सिंह

Dr Sharad Singh
22 मार्च : #विश्व_जल_दिवस पर विशेष लेख
"#जल_है_तो_कल_है" मेरे कॉलम #चर्चा_प्लस में "दैनिक सागर दिनकर" में ( 22.03. 2017) ..My Column #Charcha_Plus in "Sagar Dinkar" news paper
चर्चा प्लस
 



22 मार्च : #विश्व_जल_दिवस पर विशेष
जल है तो कल है
- डॉ. शरद सिंह 


विश्व के लोगों द्वारा हर वर्ष 22 मार्च को विश्व जल दिवस मनाया जाता है। वर्ष 1993 में संयुक्त राष्ट्र की सामान्य सभा के द्वारा इस दिन को एक वार्षिक कार्यक्रम के रुप में मनाने का निर्णय किया गया। जल का महत्व, आवश्यकता और संरक्षण के बारे में जागरुकता बढ़ाने के लिये इसे पहली बार वर्ष 1992 में ब्राजील के रियो डी जेनेरियो में “पर्यावरण और विकास पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन” की अनुसूची 21 में आधिकारिक रुप से जोड़ा गया था और वर्ष 1993 से इस उत्सव को मनाना शुरु किया। वर्ष 2017 के लिए थीम है “अपशिष्ट जल प्रबंधन“ ।

गर्मी का मौसम आते ही पानी की किल्लत सिर चढ़कर बोलने लगती है। जल ही तो जीवन हैं। यदि जल नही ंतो जीवन कहां? स्वतंत्र भारत में अनेक बांधों के निर्माण के बाद भी लापरवाही, अव्यवस्था और सजगता के अभाव के कारण जल-संकट निरन्तर बढ़ता गया है। जिन ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल के स्रोत कम होते हैं तथा जल स्तर गिर जाता है, उन क्षेत्रों की औरतों को कई किलोमीटर पैदल चल कर अपने परिवार के लिए पीने का पानी जुटाना पड़ता है। छोटी बालिकाओं से लेकर प्रौढ़ाओं तक को पानी ढोते देखा जा सकता है। स्कूली आयु की अनेक बालिकाएं अपनी साइकिल के कैरियर तथा हैंडल पर प्लास्टिक के ‘कुप्पे’ (पानी भरने के लिए काम में लाए जाने वाले डिब्बे) की कई खेप जलास्रोत से अपने घर तक ढोती, पहुंचाती हैं। भारत में हर साल 1 लाख से भी ज्यादा लोगों की जलप्रसारित बीमारियों की वजह से मौत होती है। ताजा आंकड़ों के मुताबिक भारत के कुल रोगियों में 77 फीसदी हैजा, पीलिया, दस्त, मियादी बुखार (टाइफाइड) जैसी जलप्रसारित बीमारियों से पीड़ित होते हैं। जल प्रदूषण इतना बढ़ गया है कि इससे देश के 70 फीसदी घरों पर असर होता है। योग्य शौचालयों और आरोग्य व्यवस्था का अभाव जल प्रदूषण की बड़ी वजह है। साफ न किया गया गंदा पानी जल स्रोत्रों में जाकर मिलता है, जिससे बीमारियां फैलती हैं। जलप्रसारित बीमारियों में सबसे गंभीर रोग दस्त है, जिससे सबसे ज्यादा बच्चों की मौत होती है। वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन के आंकड़ों के मुताबिक हर साल भारत में दस्त की वजह से 98,000 बच्चे जान गंवाते हैं। अगर इस स्थिति में सुधार लाना है तो शहरी विकास में अपशिष्ट जल प्रशोधन को प्राथमिकता देना जरूरी है।
Charcha Plus Column of Dr Sharad Singh in "Sagar Dinkar" Daily News Paper

पूरे विश्व के लोगों द्वारा हर वर्ष 22 मार्च को विश्व जल दिवस मनाया जाता है। वर्ष 1993 में संयुक्त राष्ट्र की सामान्य सभा के द्वारा इस दिन को एक वार्षिक कार्यक्रम के रुप में मनाने का निर्णय किया गया। लोगों के बीच जल का महत्व, आवश्यकता और संरक्षण के बारे में जागरुकता बढ़ाने के लिये हर वर्ष 22 मार्च को विश्व जल दिवस के रुप में मनाने के लिये इस अभियान की घोषणा की गयी थी। इसे पहली बार वर्ष 1992 में ब्राजील के रियो डी जेनेरियो में “पर्यावरण और विकास पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन” की अनुसूची 21 में आधिकारिक रुप से जोड़ा गया था और पूरे दिन के लिये अपने नल के गलत उपयोग को रोकने के द्वारा जल संरक्षण में उनकी सहायता प्राप्त करने के साथ ही प्रोत्साहित करने के लिये वर्ष 1993 से इस उत्सव को मनाना शुरु किया। यह अभियान यूएन अनुशंसा को लागू करने के साथ ही वैश्विक जल संरक्षण के वास्तविक क्रियाकलापों को प्रोत्साहन देने के लिये सदस्य राष्ट्र सहित संयुक्त राष्ट्र द्वारा मनाया जाता हैं। इस अभियान को प्रति वर्ष यूएन एजेंसी की एक इकाई के द्वारा विशेष तौर से बढ़ावा दिया जाता है जिसमें लोगों को जल मुद्दों के बारे में सुनने व समझाने के लिये प्रोत्साहित करने के साथ ही विश्व जल दिवस के लिये अंतरराष्ट्रीय गतिविधियों का समायोजन शामिल है। वर्ष 2017 के विश्व जल दिवस उत्सव के लिए विषय “अपशिष्ट जल“ रखा गया है।
क्या कभी किसी ने सोचा था कि एक दिन देश ऐसी भी स्थिति आएगी कि पानी के लिए धारा 144 लगाई जाएगी अथवा पेयजल के स्रोतों पर बंदूक ले कर चौबीसों घंटे का पहरा बिठाया जाएगा? किसी ने नहीं सोचा। लेकिन वर्ष 2016 की गर्मियों में ऐसा ही हुआ। पिछले दशकों में पानी की किल्लत पर गंभीरता से नहीं सोचे जाने का ही यह परिणाम है कि शहर, गांव, कस्बे सभी पानी की कमी से जूझते दिखाई पड़े। देश के कई हिस्सों में पानी की समस्या अत्यंत भयावह रही। विगत वर्ष महाराष्ट्र में कृषि के लिए पानी तो दूर, पीने के पानी के लाले पड़ गए थे। जलस्रोत सूख गए थे। जो थे भी उन पर जनसंख्या का अत्यधिक दबाव था। सबसे शोचनीय स्थिति लातूर की थी। पीने के पानी के लिए हिंसा और मार-पीट की इतनी अधिक घटनाएं सामने आईं। कलेक्टर ने लातूर में 20 पानी की टंकियों के पास प्रशासन को धारा 144 लगानी पड़ी।
मध्यप्रदेश में भी पानी का भीषण संकट मुंह बाए खड़ा रहा। मध्यप्रदेश में 32 हजार हैंडपम्प बंद हो गए थे। 12 हजार से अधिक नल-जल योजनाएं सीधे तौर पर बंद हो गई थीं। प्रदेश की करीब 200 तहसीलों सूखाग्रस्त और 82 नगरीय निकायों में भी गम्भीर पेयजल संकट का सामना करते रहे। मध्यप्रदेश के टीकमगढ़ में और भी अजीब स्थिति रही। वहां की नगर पालिका के चेयरमैन के अनुसार किसान पानी न चुरा पाएं, इसलिए नगरपालिका की ओर से लाइसेंसी हथियार शुदा 10 गार्ड तैनात किए। वहीं दूसरी ओर सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों में सूखे पर केंद्र से जवाब-तलब किया। स्वराज अभियान की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि 9 राज्य सूखे की चपेट में हैं और केंद्र कुछ नहीं कर रहा। साथ ही कोर्ट ने मनरेगा फंड में देरी पर फटकार लगाई थी। मनरेगा पर सुप्रीम कोर्ट ने की केंद्र की खिंचाई करते हुए कहा था कि मनरेगा के तहत 150 दिन की जगह सिर्फ 25 दिन रोजगार मिल रहा है। केंद्र की वजह से राज्यों को फंड में देरी हो रही है। आदालत का कहना था कि राहत में 6 से 7 महीने की देरी बर्दाश्त नहीं की जा सकती।
हमें धरती पर स्वच्छ जल के महत्व को समझना होगा और अपनी पूरी कोशिश करनी होगी कि हम पानी की बर्बादी करने के बजाए उसे बचाएं। हमें अपने स्वच्छ जल को औद्योगिक कचरे, सीवेज़, खतरनाक रसायनों और दूसरे गंदगियों से गंदा होने और प्रदूषित होने से बचाना ही होगा। यह सच है कि पानी की कमी और जल प्रदूषण का मुख्य कारण हमेशा बढ़ती जनसंख्या और तेजी से बढ़ता औद्योगिकीकरण और शहरीकरण है। स्वच्छ जल की कमी के कारण, निकट भविष्य में लोग अपनी मूल जरुरतों को भी पूरा नहीं कर पाएंगे। हाल ही में हुए अध्ययनों के अनुसार, ऐसा पाया गया कि लगभग 25 प्रतिशत शहरी जनसंख्या को साफ पानी मिल ही नहीं पाता है।
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मुताबिक भारत की कुल 445 नदियों में से आधी नदियों का पानी पीने के योग्य नहीं है। अपशिष्ट जल को साफ करके ये सुनिश्चित किया जा सकता है कि गंदे पानी से जल स्रोत्र प्रदूषित नहीं होंगे। जल संसाधनों का प्रबंधन किसी भी देश के विकास का एक अहम संकेतक होता है। अगर इस मापदंड पर भारत खरा उतरना है तो देश को ताजा पानी पर निर्भरता घटानी होगी और अपशिष्ट जल के प्रशोधन को बढ़ावा देना होगा। भविष्य में जल की कमी की समस्या को सुलझाने के लिये जल संरक्षण ही जल बचाना है। भारत और दुनिया के दूसरे देशों में जल की भारी कमी है जिसकी वजह से आम लोगों को पीने और खाना बनाने के साथ ही रोजमर्रा के कार्यों को पूरा करने के लिये जरूरी पानी के लिये लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। जबकि दूसरी ओर, पर्याप्त जल के क्षेत्रों में अपने दैनिक जरुरतों से ज्यादा पानी लोग बर्बाद कर रहें हैं। हम सभी को जल के महत्व और भविष्य में जल की कमी से संबंधित समस्याओं को समझना ही होगा।
2011 की जनगणना के मुताबिक सिर्फ 32.7 फीसदी शहरी निवासी नाली व्यवस्था से जुड़े हैं और शहरी इलाकों में रहने वाले 12.6 फीसदी लोग खुले में शौच करते हैं। ये आंकड़े दर्शाते हैं कि सभी नागरिकों के लिए योग्य शौचायल व्यवस्था करना देश के लिए अब भी बड़ी चुनौती बनी हुई है। शहरों में अवैध इमारतें और झुग्गियों के निर्माण से ये दिक्कत और भी बढ़ गई है। इन इमारतों और झुग्गियों से निकला गंदा पानी के उन जल स्रोत्रों में जाकर मिल जाता है जहां से नगरपालिकाएं पानी की आपूर्ति करती हैं। इसलिए जरूरी है कि अपशिष्ट जल को साफ किया जाए, ताकि प्रदूषण पर काबू पाया जा सके। पानी की किल्लत दूर करने और जलप्रसारित बीमारियों पर काबू पाने के लिए अपशिष्ट जल को सही तरीके से साफ करने की जरूरत है। अपशिष्ट जल के प्रशोधन के बाद उसे शहरों में सिंचाई, हीटिंग एंड वेंटलेशन, धुलाई और शौचालयों में इस्तेमाल किया जा सकता है। कई बड़े शहरों में कैंपस, रिहायशी प्रोजेक्ट ने अपने परिसर में ही साफ किए गए पानी का पुनर्प्रयोग करना शुरू भी कर दिया है। लेकिन छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों में पेयजल की कमी आज भी मुंहबाए खड़ी है।
चिंता की बात यह है कि जब हम स्वच्छ पानी के संरक्षण और संवर्द्धन के प्रति जागरूक नहीं हो पाए हैं तो अपशिष्ट जल का दोहन कैसे कर सकेंगे? हमें इस सच्चाई को हमेशा याद रखना होगा कि जल है तो कल है।
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Thursday, March 16, 2017

‘‘बुंदेलखण्ड की कवयित्रियां’’ ग्रंथ में डॉ शरद सिंह का परिचय एवं ग़ज़लें

Bundel Khand Ki Kavyitriyan
अपनी एक ग़ज़ल यहां दे रही हूं जो प्रकाशित हुई है ‘‘बुंदेलखण्ड की कवयित्रियां’’ ग्रंथ में। इस ग्रंथ में मेरी और मेरी दीदी डॉ वर्षा सिंह का परिचय एवं ग़ज़लें भी शामिल हैं। बुंदेली साहित्य परम्परा के संदर्भ में महत्वपूर्ण ग्रंथ है यह।

इसका संपादन किया है वरिष्ठ साहित्यकार हरिविष्णु अवस्थी जी ने और प्रकाशित किया है श्री वीरेन्द्र केशव साहित्य परिषद् टीकमगढ़ की ओर से सरस्वती साहित्य संस्थान, इलाहाबाद ने।
हरिविष्णु अवस्थी जी का आभार एवं उन्हें हार्दिक बधाई!

Bundel Khand Ki Kavyitriyan - Sharad Singh

Wednesday, March 15, 2017

हिन्दी साहित्य में उपेक्षित ही रहा रिकार्डतोड़ क्राइम पल्प फिक्शन - शरद सिंह

‘हंस’ ने मार्च 2017 के अंक को ‘ रहस्य-अपराध-वार्ता ’ विशेषांक के रूप में प्रकाशित किया है। इस विशेषांक के अतिथि संपादक हैं गौतम सान्याल जो गंभीर समीक्षक एवं वरिष्ठ लेखक हैं। 

इस अंक में मेरा भी एक लेख है- ‘‘ हिन्दी साहित्य में उपेक्षित ही रहा रिकार्डतोड़ क्राइम पल्प फिक्शन ’’। मेरा दावा है कि यह लेख आपकी बहुत-सी यादों को ताज़ा कर देगा।
इस पठनीय अंक को जरूर पढ़िए!

Hans, March 2017- Dr (Miss) Sharad Singh article

Hans, March 2017- Dr (Miss) Sharad Singh article

Hans, March 2017- Dr (Miss) Sharad Singh article

Hans, March 2017- Dr (Miss) Sharad Singh article

Wednesday, March 8, 2017


About Dr (Miss) Sharad Singh in Patrika, Sagar Edition, 08.03.2017  ... International Women's Day 2017
On the International Women's Day Patrika, Sagar edition published my Literary Achievement .... (08.03.2017)
Hearty Thanks Patrika !!!

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर विशेष : स्त्री-सशक्तीकरण ही है चतुर्दिक विकास की चाबी- डॉ. शरद सिंह

Dr Sharad Singh
मेरे कॉलम चर्चा प्लस में "दैनिक सागर दिनकर" में ( 08.03. 2017) .....My Column #Charcha_Plus in "Sagar Dinkar" news paper






#अंतर्राष्ट्रीय_महिला_दिवस पर विशेष : " स्त्री-सशक्तीकरण ही है चतुर्दिक विकास की चाबी " - मेरे कॉलम #चर्चा_प्लस में "दैनिक सागर दिनकर" में ( 08.03. 2017) .....My Column #Charcha_Plus in "Sagar Dinkar" news paper
चर्चा प्लस
अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर विशेष :
स्त्री-सशक्तीकरण ही है चतुर्दिक विकास की चाबी
- डॉ. शरद सिंह
संयुक्तराष्ट्र संघ की 2015-2016 की वार्षिक रिपोर्ट में कहा गया है कि हमने जो लक्ष्य निर्धारित किए थे, उनमें हमारी उल्लेखनीय उपलब्धियां रहीं लेकिन अनेक लक्ष्य ऐसे हैं जो अभी पूरे नहीं हो पाए हैं और उन लक्ष्यों को पूरा करना हमारा प्राथमिक दायित्व रहेगा। संयुक्तराष्ट्र संघ ने दुनिया भर की स्त्रियों के लिए जो लक्ष्य निर्धारित किए हैं उनमें समाज, राजनीति और अर्थजगत में स्त्रियों का नेतृत्व और भागीदारी बढ़ाने तथा स्त्रियों एवं बालिकाओं के प्रति हिंसा समाप्त करने को प्रमुखता दी है। इसे ‘ऐजेंडा-2030’ का नाम दिया गया है। इसके तहत भारत में भी कई योजनाएं चल रही हैं।
संयुक्त राष्ट्रसंघ के महासचिव बान की मून का मानना है कि ‘‘दुनिया अपने विकास लक्ष्यों को तब तक 100 प्रतिशत हासिल नहीं कर सकती है जब तक कि इसके 50 प्रतिशत लोगों अर्थात् महिलाओं के साथ सभी क्षेत्रों में पूर्ण और समान प्रतिभागियों के रूप में व्यवहार नहीं किया जाता है।’’
सन् 2016 ‘‘यूनाईटेड नेशन्स वूमेन’’ का छठां वर्ष था। संयुक्तराष्ट्र संघ की 2015-2016 की वार्षिक रिपोर्ट में कहा गया है कि ‘‘हमने जो लक्ष्य निर्धारित किए थे, उनमें हमारी उल्लेखनीय उपलब्धियां रहीं लेकिन अनेक लक्ष्य ऐसे हैं जो अभी पूरे नहीं हो पाए हैं और उन लक्ष्यों को पूरा करना हमारा प्राथमिक दायित्व रहेगा।’’ संयुक्तराष्ट्र संघ की इस इकाई ने दुनिया भर की स्त्रियों के लिए जो लक्ष्य निर्धारित किए हैं उनमें समाज, राजनीति और अर्थजगत में स्त्रियों का नेतृत्व और भागीदारी बढ़ाने तथा स्त्रियों एवं बालिकाओं के प्रति हिंसा समाप्त करने को प्रमुखता दी है। इसे ‘ऐजेंडा-2030’ का नाम दिया गया है। भारत में भी स्त्री के हित में कई योजनाएं चल रही हैं तथा इन योजनाओं के औचित्य और परिणामों का आकलन करने के लिए देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों में स्त्री अध्ययन केन्द्र भी स्थापित किए गए हैं।
Charcha Plus Column of Dr Sharad Singh in "Sagar Dinkar" Daily News Paper
 विकास के लिए वित्तीय प्रबंधन पर विगत जुलाई में अपनाए गए अदिस अबाबा एजेंडे और विगत सितम्बर में 2030 के सतत विकास के एजेंडे के निष्कर्ष में यह बात दृढ़ता से दिखाई देती है। अदीस अबाबा एजेंडे का पहले अनुच्छेद में ही घोषणा की गई है-‘‘हम लैंगिक समानता और महिला सशक्तिकरण प्राप्त कर के रहेंगे।’’ 2030 के एजेंडे में इस बात को माना गया है कि लैंगिक असमानता सभी असमानताओं की जननी है जिसमें देशों के बीच और देशों के अंदर मौजूद असमानताएं शामिल हैं।
महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी के अनुसार भारत सरकार लैंगिक समानता का लक्ष्य हासिल करने एवं महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा देने के साथ उनके खिलाफ सभी तरह के भेदभाव को खत्म करने के लिए प्रतिबद्ध है। ‘कमिशन ऑन स्टेटस ऑफ वीमेन’ (सीएसडब्ल्यू) के 60वें सत्र के गोलमेज सत्र के दौरान मेनका ने कहा कि भारत ‘सहस्त्राब्दि विकास लक्ष्य’ हासिल करने को प्रतिबद्ध है और उसने पारदर्शी एवं जवाबदेह तंत्रों के जरिए महिलाओं एवं पुरूषों को बराबरी का मौका देते हुए उनके लिए समान अवसर सुनिश्चित करने के मकसद से आगे बढ़ने का लक्ष्य निर्धारित किया है।
महिला-नीत विकास के महत्व पर जोर देते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी कहा है कि महिलाओं को प्रौद्योगिकी सम्पन्न और जनप्रतिनिधि के तौर पर और प्रभावी बनना चाहिए क्योंकि केवल व्यवस्था में बदलाव से काम नहीं चलेगा। वहीं, लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने चौथे वैश्विक संसदीय स्पीकर सम्मेलन की आयोजन समिति की बैठक में कहा, ‘‘लैंगिक समानता को मुख्यधारा में लाना विकास के आदर्श के केंद्र में है। लैंगिक समानता और महिला सशक्तिकरण को विकास प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभानी है, खासकर ऐसे तरीकों से , जिनका गुणात्मक प्रभाव हो।’’
जहां तक स्त्री विमर्श का प्रश्न है तो स्त्री विमर्श, स्त्री मुक्ति, नारीवादी आंदोलन आदि - इन सभी के मूल में एक ही चिन्तन दृष्टिगत होता है, स्त्री के अस्तित्व को उसके मौलिक रूप में स्थापित करना। स्त्री विमर्श को लेकर कभी-कभी यह भ्रम उत्पन्न हो जाता है कि इसमें पुरुष को पीछे छोड़ कर उससे आगे निकल जाने का प्रयास है किन्तु ‘विमर्श’ तो चिन्तन का ही एक रूप है जिसके अंतर्गत किसी भी विषय की गहन पड़ताल कर के उसकी अच्छाई और बुराई दोनों पक्ष उजागर किए जाते हैं जिससे विचारों को सही रूप ग्रहण करने में सुविधा हो सके। स्त्री विमर्श के अंतर्गत भी यही सब हो रहा है। समाज में स्त्री के स्थान पर चिन्तन, स्त्री के अधिकारों पर चिन्तन, स्त्री की आर्थिक अवस्थाओं पर चिन्तन तथा स्त्री की मानसिक एवं शारीरिक अवस्थाओं पर चिन्तन - इन तमाम चिन्तनों के द्वारा पुरुष के समकक्ष स्त्री को उसकी सम्पूर्ण गरिमा के साथ स्थायित्व प्रदान करने का विचार ही स्त्री विमर्श है।
महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा व भारतीय स्त्री अध्ययन संघ के संयुक्तच तत्वावधान में स्त्री अध्ययन के 13 वें राष्ट्रीय सम्मे्लन के अंतर्गत पांच दिवसीय सम्मेलन में ‘‘हाशिएकरण का प्रतिरोध, वर्चस्व को चुनौती : जेंडर राजनीति की पुनर्दृष्टि’’ पर गंभीर विमर्श करने के लिए गांधीजी की कर्मभूमि वर्धा में देशभर के 650 स्त्री अध्ययन अध्येताओं का सम्मेलन हुआ था। इससे पहले 11वां अधिवेशन गोवा में और 12 वां लखनऊ में आयोजित किया गया था। इस पांच दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन में अधिवेशन पूर्व कार्यशाला में देशभर के 60 से अधिक विश्वमविद्यालयों के लगभग 250 विद्यार्थियों ने भाग लिया था। स्त्री अध्ययन के विद्यार्थियों ने पहले सत्र के दौरान ‘‘स्त्री अध्ययन : शिक्षा शास्त्र और पाठ्यक्रम’’ पर विमर्श करते हुए कहा था कि-‘‘स्त्री अध्ययन महिला मुक्ति आंदोलन के परिणामस्वरूप निकला हुआ एक विषय है, जबकि स्त्री अध्ययन को लेकर केंद्रों, विभागों और स्नातकोत्तर व उच्च शिक्षा के स्तर पर बहुत सारे संघर्ष हुए हैं और किए जाने हैं।’’ विद्यार्थियों ने स्त्री अध्ययन के मुख्य अनुशासन के अभ्यासों और उससे पड़ने वाले प्रभावों के अनुभवों को साझा किया। शोधार्थियों ने विशेषकर इस विषय को पढ़ते समय परिवार द्वारा मिलनेवाली चुनौतियों को भी बताया कि किस तरह जब वह अपने विषय के तत्वों पर परिवार और समाज में बात करते हैं तो लोग उनका विरोध करते हैं। कुछ विद्यार्थियों ने यह अनुभव किया है कि यह मात्र समानता का सवाल नहीं है परंतु यह मानव की तरह व्यवहार किए जाने का सवाल है। विद्यार्थियों ने स्वीकार किया कि स्वयं शिक्षा व्यवस्था में जेंडर स्टडीज को एक पूर्ण विषय के तौर पर मान्यता नहीं मिल पायी है। यह मुद्दा भी उठाया गया कि स्त्री अध्ययन के अधिकांश केन्द्रों व विभागों के विभिन्न पद पर या तो दूसरे विषय के शिक्षकों को लाया जाता है या फिर वह पदरिक्त छोड दिया जाता है।
अटल बिहारी वाजपेयी हिंदी विश्वविद्यालय, भोपाल ने भी महिलाओें के उत्थान एवं जागरूकता की दृष्टि से जाबाला महिला अध्ययन केन्द्र की स्थापना हेतु कुछ महत्वपूर्ण उद्देश्य निर्धारित किए हैं, जैसे - परिवार व्यवस्था में महिला की भूमिका का अध्ययन करना, व्यापक सामाजिक जीवन में महिला की स्थिति एवं भूमिका का आकलन करना, भारतीय संस्कृति के संदर्भ में स्त्रीपुरुष सहअस्तित्व की संकल्पना को पुनर्स्थापित करना, समतामूलक समाज की पुनर्स्थापना के मध्य स्त्री की एक मानव के रूप में पहचान करना, स्त्री अपराध-मुक्त समाज की संकल्पना पर शोध करना, स्त्री सशक्तीकरण के मार्ग में आने वाले अवरोधों की पहचान कर उनके समाधानमूलक उपायों पर विचार करना, स्त्री क्रियाशीलता के प्रस्थान बिंदुओं की पहचान के साथ, राष्ट्र निर्माण में स्त्री की भूमिका को सुनिश्चित करना, महिला संबंधी भारतीय दृष्टिकोण या अवधारणा का अध्ययन तथा वैश्विक दृष्टिकोण की समीक्षा करना, वर्तमान समय में युवा महिलाओं के समक्ष आने वाली विभिन्न चुनौतियों (पारिवारिक, व्यावसायिक, सामाजिक) एवं समाधानों का अध्ययन करना तथा लिंगीय (जेण्डर) संवेदनशीलता पर अध्ययन एवं शोध आयोजित करना।
स्त्री अध्ययन के महत्व को देखते हुए यूजीसी ने स्त्री अध्ययन के लिए 7 क्षेत्रों को सूचीबद्ध किया है- 1. विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में महिलाओं पर शोध का विकास 2. मुख्यधारा के विकास में महिलाओं को शामिल किए जाने को बढ़ावा देना 3. भारतीय महिलाओं की विभिन्न आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए समावेशी समाज का विकास 4. महिला शिक्षकों की शैक्षिक नेतृत्व के लिए अनुकूल वातावरण एवं महिलाओं और आर्थिक विकास 5. साक्ष्य आधारित अनुसंधान 6. वैश्विक परिप्रेक्ष्य स्त्रियों के लिए नए ज्ञान का निर्माण तथा 7. वर्तमान और भविष्य की चुनौतियों का सामना करने के लिए भारतीय परिप्रेक्ष्य में महिलाओं पर नए ज्ञान का विकास करना।
अकसर यह देखने में आता है कि विश्वविद्यालयीन शोधकर्ता ज़मीनीतौर पर परिश्रम करने के बजाए सरकारी और गैरसरकारी अांकड़ों को आधार बना लेते हैं। जबकि कई बार ज़मीनी सच्चाई आंकड़ों से परे होती है। स्त्री-अध्ययन एक महत्वपूर्ण विषय है। यह विषय समाज की आधी आबादी की दशा और दिशा को तय करता है। आंकड़ों को खंगालने में कोई बुराई नहीं है किन्तु यह भी देखा जाना चाहिए कि किसी एक मुद्दे पर किसी एनजिओ और सरकारी आंकड़ों में अन्तर तो नहीं है? यदि अंतर है तो क्यों है? और यदि अंतर नहीं है तो क्यों नहीं है? इन दोनों पक्षों का स्वयं सत्यापन करना बेहद जरूरी होता है। स्त्री-अध्ययन के समय यदि ज़मीनी सच्चाई को ध्यान में रख कर शोध कार्य किया जाए तो एक ऐसी यथार्थपरक तस्वीर सामने आएगी जो भारतीय स्त्रियों के अधिकारों एवं सुखद भविष्य को सुनिश्चित कर सकती है। यूं भी स्त्री सशक्तीकरण ऐसा पहलू है, जिसकी उपेक्षा कर कोई देश तरक्की नहीं कर सकता, लेकिन यह केवल कागजों में नहीं हकीकत में होना चाहिए। शुरुआत घर से हो, लेकिन इच्छाशक्ति राजनीतिक स्तर पर हो। तभी स्त्री सशक्तीकरण की दिशा में सार्थक प्रयास किए जा सकते हैं क्योंकि स्त्री सशक्तिकरण ही है चतुर्दिक विकास की चाबी।
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Dr (Miss) Sharad Singh at AHI Dr Hari Singh Gour Central University, Sagar

From Left : Dr RP Singh, Pro. Nagesh Dubey, Dr Arun Pratap Singh, Dr (Miss) Sharad Singh, Dr Sneh Rani, Dr KK Tripathi, Dr Sharma, Dr Pradeep Shukla 
07.03.2017 को हरिसिंह गौर पुरातत्व संग्रहालय में आयोजित ‘‘जैन धर्म का भारतीय संस्कृति को अवदान’’ विषय पर प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग, डॉ हरिसिंह गौर केन्द्रीय विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित व्याख्यान के दौरान दो विद्वानों से सुखद मुलाक़ात हुई। ये थे बलिया के डॉ. अरूण प्रताप सिंह तथा सागर की डॉ. स्नेहरानी। दोनों ही जैन धर्म एवं संस्कृति के अच्छे जानकार हैं। प्रो. नागेश दुबे एवं डॉ. आर पी सिंह को धन्यवाद इस महत्वपूर्ण बौद्धिक आयोजन के लिए।