Wednesday, August 17, 2016

चर्चा प्लस ... स्वतंत्रता, स्वास्थ्य, सुरक्षा और स्त्री .... डाॅ. शरद सिंह

Dr Sharad Singh
मेरा कॉलम  "चर्चा प्लस" "दैनिक सागर दिनकर" में (17. 08. 2016) .....
 
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  स्वतंत्रता, स्वास्थ्य, सुरक्षा और स्त्री
- डॉ शरद सिंह
समाज की भांति हिन्दी व्याकरण भी पुरुष प्रधान है। अंग्रेजी में व्यक्तिवाचक संज्ञा के लिए प्रथम, द्वितीय, तृतीय के साथ ‘पर्सन’ अर्थात् ‘व्यक्ति’ जुड़ा होता है। यह ‘पर्सन’ (व्यक्ति) पुरुष भी हो सकता है और स्त्री भी किन्तु, हिन्दी भाषा के व्याकरण में मानो स्त्री न तो कोई व्यक्ति है और न व्यक्तिवाचक संज्ञा। प्रथम है तो पुरुष, द्वितीय है तो पुरुष और तृतीय है तो पुरुष, फिर स्त्री के लिए जगह कहां हैं? क्या स्त्री का अस्तित्व मात्र लिंग तक सीमित हैं? मैं न तो व्याकारण की आधिकारिक ज्ञाता हूं और न आधिकारित व्याख्याकार, लेकिन एक स्त्री होने के नाते यह बात मुझे सदैव चुभती है।
स्वतंत्रता मात्र एक शब्द नहीं, असीमित संभावनाओं एवं असीमित सकारात्मकता के द्वार की चाबी है। इस चाबी से देष के बहुमुखी विकास का द्वार तो खुला ही, स्त्री के अधिकारों का द्वार भी खुला। सन् 1947 से सन् 2016 तक के लम्बे सफर में स्त्री ने प्रगति के अनेक सोपान चढ़े हैं। फिर भी बहुत कुछ बुनियादी स्तर पर छूटा हुआ है। विषेष रूप से मध्यमवर्गीय और ग्रामीण अंचलों में तस्वीर अभी श्वेत-ष्याम दिखाई देती है। इन तबकों में बेटे की ललक स्त्री को आज भी बाध्य करता है कि वह बेटी पैदा करने के बारे में सोचे भी नहीं। विवाह के समय बहू के साथ ढेर सारा दहेज मिले। स्त्री परिवार की सदस्य तो रहे किन्तु मुखिया बनने का स्वप्न न देखे। अर्थात् स्त्री परिवार की अनुमति के बिना न तो कमाने की सोचे और न खर्च करने के बारे में विचार करे, परिवार से संबंधित महत्वपूर्ण निर्णय भी लेने के बारे में न सोचे। आज भी यह कटुसत्य स्त्रीप्रगति की तस्वीर को मुंहचिढ़ाता रहता है। स्त्री के विरुद्ध होने वाले अपराधों के आंकड़े भी घटने का नाम नहीं ले रहे हैं। जिस तरह महाभारत काल में भरे दरबार में दुश्शासन ने द्रौपदी का चीर हरण करने का दुस्साहस किया था, वैसा दुस्साहस आजकल बलात्कार के रूप में समाचारों की सुर्खियां बनता रहता है। उस जमाने में कृष्ण ने द्रौपदी की रक्षा की थी लेकिन इस जमाने में दुश्शासन तो बहुतेरे हैं लेकिन कृष्ण जैसे साहस का अभाव है।

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 स्वास्थ्य की बुनियाद
स्त्री बुनियाद है परिवार की। वह बच्चों को जन्म देती है और उनकी परवरिष करती है। लेकिन इसी स्त्री की षिक्षा और स्वास्थ्य के बारे में आंकड़े अधिक बोलते हैं, सच्चाई कम। राजनीतिक हलकों अथवा सरकारों को स्त्री-स्वास्थ्य जच्चा-बच्चा के टीकाकरण तक ही सीमित दिखाई देता रहा है। पहली बार मध्यप्रदेष सरकार ने एक महत्वपूर्ण घोषणा की कि छात्राओं को सैनेटरी पेड्स मुफ़्त उपलब्ध कराए जाएंगे। स्त्री-जीवन के जिस सबसे महत्वपूर्ण पक्ष की ओर कभी ध्यान नहीं दिया गया उस ओर ध्यान दिया जाना इस बात का द्योतक कहा जा सकता है कि स्त्री के स्वास्थ्य के प्रति एक राज्य-सरकार का ध्यान आकृष्ट तो हुआ। बाकी राज्य सरकारों को भी बिना किसी राजनीतिक पूर्वाग्रह के इस कदम को अपनाना चाहिए। क्योंकि जो परिवार गरीबीरेखा ने नीचे जी रहे हैं अथवा जिनमें स्त्री-स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता नहीं है, उन परिवारों की बेटियों को मासिकधर्म के समय स्वच्छ साधन उपलब्ध हो सके। मासिकधर्म वह प्रक्रिया है जो स्त्री के जननी बनने में अहम भूमिका निभाती है।
नई दिल्ली लोधी रोड स्थित सभागार में 15 फरवरी, 2012 को केन्द्रीय पेयजल एवं स्वच्छता मंत्रालय द्वारा ग्रामीण स्वच्छता प्रवर्द्धन हेतु राष्ट्रीय परामर्श का आयोजन किया गया था। इस कार्यक्रम का मुख्य मुद्दा शौचालय था। चर्चा में हिस्सा लेने वाले प्रमुख गैर-सरकारी संगठनों ने बहुत विस्तार से इस मुद्दे पर बातचीत की कि भारत की निरन्तर बढ़ती मलिन बस्तियों और ताल-तलैयों में बैक्टीरिया के बढ़ने से अनेक बीमारियां पैदा होती हैं और देशभर में ग्रामीण इलाके के लोग उससे प्रभावित होते हैं।
02 अक्टूबर 2014 को मोदी सरकार ने ‘स्वच्छ भारत अभियान’ के अंतर्गत ख्ुाले में शौच से मुक्ति की ओर कदम बढ़ाने का खुला आह्वान किया। स्त्री-जीवन की सुऱक्षात्मक प्रगति के पक्ष में ‘‘सोच से शौचालय तक’’ का यह कदम स्वागत योग्य रहा है। किन्तु इसके लिए जनजागरूकता सबसे अधिक जरूरी है। यह तो आमजनता को ही समझना पड़ेगा न कि एक स्वस्थ औरत ही स्वस्थ पीढ़ी को जन्म दे सकती है और एक स्वस्थ औरत ही बहुमुखी प्रगति कर सकती है। 

सुरक्षा का प्रश्न
एक और बुनियादी समस्या जिसके बारे में लगभग दस वर्ष से भी पहले मैंने एक कहानी लिखी थी ‘मरद’। कहानी का सार यही था कि सुंदरा नाम की एक नवयुवती विवाह के उपरान्त अपने ससुराल आती है, जहां उसे खुले में शौच के लिए जाना पड़ता है। जब तक उसकी सास या उसकी सहेलियां उसके साथ जाती हैं तब तक वह सरपंच की कुदुष्टि से बची रहती है। लेकिन एक दिन अकेले जाने पर सुंदरा सरपंच की हवस की षिकार हो जाती है। वह पुलिस के पास जाना चाहती है लेकिन उसकी सास उसे चुप रहने को मना लेती है, उसका पति भी उसे चुप रहने को कहता है। कुछ वर्ष बाद जब कुदृष्टि के काले साए सुंदरा की अवयस्क बेटी चमेली पर मंडराने लगते हैं तो वह चुप न बैठ कर रौद्र रूप धारण कर लेती है और अपने दम पर शौचालय बनवाने की घोषणा करती हुई ललकार कर अपने पति से कहती है -‘‘‘‘तू बैठ के सोच! आ के देखे तो साला सरपंच, गाड़ दूंगी उसे खुड्डी में...अब मैं वो सुंदरा नहीं कि तेरे कहे से चुप बैठूं, अब मैं मंा हूं चमेली की! समझे!’’
यह सभी जानते हैं कि सारे के सारे अपराध पुलिस के रोजनामचे तक नहीं पहुंच पाते हैं, कुछ पहुचते हैं तो दर्ज़ नहीं हो पाते हैं और कुछ दर्ज़ होते भी हैं तो वे या तो वापस ले लिए जाते हैं अथवा प्रताड़ित को लांछन की असीम वेदना सहते हुए दम तोड़ देना पड़ता है। एक ओर देश की आजादी का उत्सव और दूसरी ओर यह अप्रिय लगने वाला दुखद प्रसंग। लेकिन सच तो सच ही रहेगा कि जिस घड़ी कल्पना चावला अंतरिक्ष में उड़ान भर रही थी, ठीक उसी समय देष के किसी दूर-दराज़ ग्रामीण क्षेत्र में शौच के लिए जाती स्त्री बलात्कार की षिकार हो रही थी। कल्पना चावला के रूप में स्त्री की वैष्विक प्रगति को सबने देखा किन्तु उस बलत्कृत स्त्री की तो रिपोर्ट भी दर्ज़ नहीं हो पाई। भारतीय स्त्री के जीवन का यह स्याह पक्ष एक धब्बा है देश की तमाम प्रगति पर। यदि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद महिलाओं की एक पीढ़ी का बहुमुखी विकास हो चुका होता तो आज देश में महिलाओं की दशा का परिदृश्य कुछ और ही होता। उस स्थिति में न तो दहेज हत्याएं होतीं, न मादा-भ्रूण हत्या और न महिलाओं के विरुद्ध अपराध का ग्राफ इतना ऊपर जा पाता। उस स्थिति में झारखण्ड या बस्तर में स्त्रियों को न तो ‘डायन’ घोषित किया जाता और न तमाम राज्यों में बलात्कार की घटनाओं में बढ़ोत्तरी हो पाती। महिलाओं को कानूनी सहायता लेने का साहस तो रहता। लिहाजा प्रश्न उठता है कि महिला एवं बालविकास मंत्रालय कार्य कर रहा है, राष्ट्रीय महिला आयोग दायित्व निभा रहा है तथा स्वयंसेवी संस्थाएं समर्पित भाव से काम कर रही हैं तो फिर विगत 53 वर्ष में देश की समस्त महिलाओं का विकास क्यों नहीं हो पाया? कहीं कोई कमी तो है जो स्त्रियों के समुचित विकास के मार्ग में बाधा बन रही है। जाहिर है कि यह कमी स्त्री के प्रति सुरक्षा में कमी की है। 

वास्तविक अधिकारों की जरूरत
राजनीतिक क्षेत्र में स्त्रियों की संख्या के आंकड़ों पर अकसर विवाद होता रहता है। फलां राजनीतिक दल महिलाओं को उतना स्थान नहीं देता, जितना कि हम देते हैं, जैसे दावे हास्यास्पद ढंग से जब तक उछलते रहते हैं। कम से कम हिन्दी पट्टी में तो यह आम दृष्य है कि महिला सरपंच के सारे संवैधानिक निर्णय उसका पति अर्थात् ‘सरपंच पति’ लेता है। उत्तर प्रदेष में ‘प्रधानपति’ का पद इसी हेतु है कि ‘प्रधान’ के पति महोदय प्रधान को निर्णय लेने में मदद कर सके। अब यदि पुरुष-बैसाखियों के सहारे स्त्री की प्रगति खड़ी है तो यह काहे की प्रगति? स्वनिर्णय लेने के अधिकार से बढ़ कर और कोई अधिकार नहीं होता है। यह अधिकार अभी भी स्त्री से कोसों दूर है।
अंत में मैं उस तथ्य को एक बार फिर दोहराना चाहूंगी जिसे मैंने अपने उपन्यास ‘पिछले पन्ने की औरतें’ की भूमिका में सामने रखा था कि समाज की भांति हिन्दी व्याकरण भी पुरुष प्रधान है। अंग्रेजी में व्यक्तिवाचक संज्ञा के लिए प्रथम, द्वितीय, तृतीय के साथ ‘पर्सन’ अर्थात् ‘व्यक्ति’ जुड़ा होता है। यह ‘पर्सन’ (व्यक्ति) पुरुष भी हो सकता है और स्त्री भी किन्तु, हिन्दी भाषा के व्याकरण में मानो स्त्री न तो कोई व्यक्ति है और न व्यक्तिवाचक संज्ञा। प्रथम है तो पुरुष, द्वितीय है तो पुरुष और तृतीय है तो पुरुष, फिर स्त्री के लिए जगह कहां हैं? क्या स्त्री का अस्तित्व मात्र लिंग तक सीमित हैं? मैं न तो व्याकारण की आधिकारिक ज्ञाता हूं और न आधिकारित व्याख्याकार, लेकिन एक स्त्री होने के नाते यह बात मुझे सदैव चुभती है।’
अभी स्त्रियों को अपना भविष्य संवारने के लिए बहुत संघर्ष करना है। उन्हें अभी पूरी तरह सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक, राजनीतिक एवं मातृत्व का अधिकार प्राप्त करना है जिस दिन उसे अपने सारे अधिकार मिल जाएंगे जो कि देश की नागरिक एवं मनुष्य होने के नाते उसे मिलने चाहिए, उस दिन एक स्वस्थ समाज की कल्पना भी साकार हो सकेगी। जिसमें स्त्री और पुरुष सच्चे अर्थों में बराबरी का दर्जा रखेंगे।
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Wednesday, August 10, 2016

चर्चा प्लस ... गाय पर राजनीति .... डाॅ. शरद सिंह

Dr Sharad Singh
मेरा कॉलम  "चर्चा प्लस" "दैनिक सागर दिनकर" में (10. 08. 2016) .....
 
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गाय पर राजनीति
- डॉ शरद सिंह

प्रधानमंत्री मोदी के कथन और विपक्षी दलों के आरोपों के बीच पशुपालकों के दायित्वों पर भी ध्यान दिया जाना आवश्यक है। गाय कोई आवारा पशु तो है नहीं, फिर पचासों गायें सड़कों और सब्जीमंडियों में घूमती, मार खाती दिखाई पड़ती हैं। इन गायों को आवारा पशुओं के समान कौन छोड़ देता है? इसका पता लगाया जाना भी जरूरी है। एक ओर गाय को माता का दर्जा देना और दूसरी ओर उसे डंडे, गालियां खाने और भूख से जूझने के लिए आवारा पशु के समान छोड़ देना किसी अपराध से कम नहीं है। सबसे पहले तो ऐसे गायपालकों को चिन्हित कर दंण्डित किया जाना चाहिए।

‘‘काऊ इज़ ए फोर फुटेड एनिमल। शी हेज़ टू हार्न एंड वन लांग टेल ...।’’ लगभग हर व्यक्ति ने जिसने कभी न कभी, किसी न किसी कक्षा में अंग्रेजी पढ़ी हो, ‘काऊ’ पर निबंध जरूर लिखा होगा। अंग्रेजी भाषा में निबंध लिखने के अभ्यास का यह सबसे लोकप्रिय निबंध माना जाता है। इसकी लोकप्रियता का मूल कारण है गाय का बच्चों का चिरपरिचित होना। भारतीय बच्चे गाय को बखूबी जानते, पहचानते हैं। उन्हें पता है कि गाय दूध देती हैं वह दूध उन्हें पीने को मिलता है और उस दूध से चाय भी बनती है। वे यह भी जानते हैं कि गाय को ‘‘माता’’ कहा जाता है। बच्चों को तो आज भी गाय माता ही लगती है लेकिन शायद बड़े भूलते जा रहा कि गाय से उनका क्या रिश्ता है।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने शनिवार को अपने ‘टाउनहॉल’ कार्यक्रम में बोलते हुए अधिकांश गौरक्षकों को गोरखधंधे में लिप्त बताया। उन्होंने कहा, ‘‘कुछ लोग गौरक्षक के नाम पर दुकान खोलकर बैठ गए हैं। मुझे इस पर बहुत गुस्सा आता है। कुछ लोग पूरी रात असमाजिक कार्यों में लिप्त रहते हैं और दिन में गौरक्षक का चोला पहन लेते हैं. मैं राज्य सरकार से कहता हूं कि वे ऐसे लोगों का डोजियर बनाएं। ऐसे गौरक्षक में से 80 फीसदी लोग गोरखधंधे में लिप्त हैं।’’ उन्होंने गौरक्षकों से अपील की है कि वे गाय को प्लास्टिक खाने से बचाएं, ये बड़ी सेवा होगी।
प्रधानमंत्री मोदी के इस कथन से पहले ही गाय पर राजनीति गरमाने लगी थी। जुलाई 2016 में राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के अध्यक्ष लालू प्रसाद ने गुजरात में हो रही ‘सामाजिक क्रांति’ का समर्थन करते हुए कहा था कि गौ रक्षा के नाम पर सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने वालों का आर्थिक और सामाजिक बहिष्कार किया जाना चाहिए। बिना किसी राजनीतिक दल का नाम लिए लालू ने ट्वीट किया, ‘‘गुजरात में हो रही सामाजिक क्रांति को समर्थन। ऐसे लोगों का आर्थिक व सामाजिक बहिष्कार किया जाए, जो गौमाता के नाम पर सामाजिक सौहार्द बिगाड़ते हैं।’’ उन्होंने लिखा, ‘‘जो व्यक्ति, पार्टी और सरकार इंसान की महत्ता एवं कीमत नहीं जानते, वह जानवरों की क्या जानेंगे? इंसान मरे या जानवर, वो अपना घिनौना खेल ही खेलेंगे।’’
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आरजेडी अध्यक्ष ने बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान बीजेपी द्वारा विभिन्न अखबारों में ‘बीफ’ खाने के संबंध में दिए गए बयानों से संबंधित प्रकाशित कराए गए विज्ञापन को पोस्ट करते हुए लिखा, श्बिहार में उन्होंने गाय के नाम पर विज्ञापन निकाला। विज्ञापन में लालू, आरजेडी नेता रघुवंश प्रसाद सिंह तथा कांग्रेस नेता सिद्धारमैया के ‘बीफ’ को लेकर दिए गए बयानों को जिक्र किया गया था और गाय को गले लगाते एक युवती की तस्वीर थी। विज्ञापन में कहा गया था, ‘‘वोट बैंक की राजनीति बंद कीजिए और जवाब दीजिए, क्या आप अपने साथियों के इन बयानों से सहमत हैं। जवाब नहीं तो वोट नहीं। बदलिए सरकार-बदलिए बिहार।’’
विभिन्न राज्यों के चुनावों और आगामी आमचुनाव को ध्यान में रखते हुए प्रत्येक राजनीतिक दल गाय पर अपनी-अपनी कमर कस चुका है। इनमें से अधिकांश को गायों की दुर्दशा से अधि इस मुद्दे को अधिक से अधिक भुनाने की कोशिश होने लगी है।

घटनाओं की कड़ियां

मार्च 2016 में गुजरात के राजकोट में गौ रक्षक समिति नाम के एक संगठन ने गाय को ‘राष्ट्रमाता’ घोषित करने और गोमांस पर पूरे देश में प्रतिबंध लगाने की मांग करते कलेक्टर के सामने प्रदर्शन किया। इस दौरान आठ गौ संरक्षण कार्यकर्ताओं ने कथित रूप से कीटनाशक खाकर आत्महत्या करने का प्रयास किया, जिसमें एक व्यक्ति की जान चली गई, जबकि तीन की हालत नाजुक बनी हुई है। पुलिस का कहना है कि गऊ रक्षक समिति के आठ सदस्य हाथों में कीटनाशक की बोतल लिए कलेक्टर के ऑफिस पहुंचे थे। पुलिस के मुताबिक, इससे पहले कि पुलिस उन्हें रोक पाती, उन्होंने कीटनाशक पी लिया। इस घटना के बाद गऊ रक्षक समिति के सदस्य बड़ी संख्या में सड़कों पर उतर आए। राजकोट से पूर्व कांग्रेस सांसद कुनवारजी बावलिया एवं गौसेवा आयोग के अध्यक्ष वल्लभाई कठीरिया घटना के बाद अस्पताल पहुंचे तो प्रदर्शनकारियों ने उन्हें अस्पताल परिसर में जाने से रोक दिया। घटना के विरोध में गौ रक्षक समिति ने गुजरात बंद का आह्वान किया।
जुलाई 2016 में दलित युवकों के कपड़े उतार कर बेरहमी से पिटाई के चलते सात दलितों ने गुजरात में आत्महत्या करने की कोशिश की। विरोध प्रदर्शन के बीच बसों में आग लगा दी गई। अहमदाबाद से करीब 360 किलोमीटर दूर उना में गो हत्या के आरोप में दलित युवकों कथित तौर पर गो-रक्षकों ने अर्धनग्न कर बुरी तरह मारा पीटा। विभिन्न जगहों पर हुई रैली में कथित तौर पर सात लोगों ने जहर खाकर जान देने की कोशिश की। इस मसले को यूपी की पूर्व मुख्यमंत्री और बीएसपी सुप्रीमो मायावती ने कल संसद में जोरशोर से उठाया। इसके बाद संसद में काफी हंगामा हुआ और राज्यसभा स्थगित कर दी गई। राजकोट में स्टेट ट्रांसपोर्ट की दो बसें जला दी गईं और एक जामनगर में जला दी गई।
चमड़े के कारखानों में काम करने वाले चार लोगों एक एसयूवी से बांधकर लाठियों से मारा गया। उनके कपड़े भी उतारे हुए थे। इन्हें मारे वाले खुद को गौ रक्षक बता रहे थे। बाद में खुद उन्होंने ही इस वीडियो को ऑनलाइन डाल दिया जो खूब वायरल हुआ। पीड़ित दलितों ने हमलावरों को बताया भी था कि वे केवल मरी हुआ गायों पर से चमड़ा निकाल रहे थे लेकिन उनकी एक नहीं सुनी गई। पीटे गए दलित बुरी तरह जख्मी हुए और उन्हें हफ्ते भर हॉस्पिटल में भर्ती रखना पड़ा। तत्कालीन मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल ने दलित समुदाय के सदस्यों की कथित पिटाई की घटना की सीआईडी जांच का सोमवार को आदेश दिया। साथ ही, उन्होंने मामले की त्वरित सुनवाई के लिए एक विशेष अदालत गठित किए जाने की भी घोषणा की। पीड़ितों के इलाज के लिए सरकार द्वारा प्रति व्यक्ति एक लाख रुपए सेंक्शन भी कर दिए गए।

प्रधानमंत्री के बयान और गौ रक्षक

नरेंद्र मोदी के गौरक्षकों को लेकर दिए बयान के बाद पंजाब में करीब 20 गौ रक्षकों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है। पीएम मोदी ने इन गौ रक्षकों के खिलाफ राज्य सरकारों से कार्रवाई करने की अपील की थी। इन पर 382, 384, 342, 341, 323, 148, 149 के तहत केस दर्ज किया गया। जयपुर में बनी हिंगोनिया गौशाला में पिछले दिनों 500 से ज्यादा गायें मर चुकी हैं। जो जिंदा हैं, वो भी बहुत खराब हालत में थीं। उन्हें ना तो समय पर चारा मिल रहा था। ना ही उनकी कोई देखभाल हो रही थी। गाय के नाम पर हो रही राजनीति के बाद राजस्थान सरकार सक्रिय हुई। राजस्थान के राज्य मंत्री गौशाला पहुंचे और गायों के लिए चारे पानी का इंतजाम कराया।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बयान से ब्रज के गौ रक्षक परेशान हो उठे। गौ रक्षकों का कहना है कि जैसा प्रधानमंत्री ने कहा है कि गौ रक्षक गायों को पालीथिन खाने से बचाएं, यह ठीक है, लेकिन इसके विपरीत जब कंटेनर गायों से लदा पकड़ा जाता है। इसमें दम घुटने से काफी गायें मृत मिलती हैं। मान मंदिर की माताजी गौशाला के सचिव सुनील के अनुसार, ‘‘पिछले दिनों गायों से भरे कंटेनर को पकड़ कर 32 गायों की जान बचाई थी। कॉल करने पर बरसाना पुलिस गांव हाथिया आने से एक बार इन्कार दिया था। बाद में आई थी। तीन गाय दम घुटने से मर चुकी थीं। मेवात के आसपास का 50 किमी का क्षेत्र भी गायों की तस्करी के लिए भी बदनाम है। गौ रक्षक हर महीने 500-700 गायों का जीवन बचा रहे हैं। ऐसे में पुलिस ने किसी गौ रक्षक का डोजियर बनाना शुरू कर दिया तो गौ रक्षा की मुहिम कमजोर पड़ सकती है।’’

सड़कों पर भटकती गऊ माताएं

प्रधानमंत्री मोदी के कथन और विपक्षी दलों के आरोपों के बीच पशुपालकों के दायित्वों पर भी ध्यान दिया जाना आवश्यक है। गाय कोई आवारा पशु तो है नहीं, फिर पचासों गायें सड़कों और सब्जीमंडियों में घूमती, मार खाती दिखाई पड़ती हैं। इन गायों को आवारा पशुओं के समान कौन छोड़ देता है? इसका पता लगाया जाना भी जरूरी है। एक ओर गाय को माता का दर्जा देना और दूसरी ओर उसे डंडे, गालियां खाने और भूख से जूझने के लिए आवारा पशु के समान छोड़ देना किसी अपराध से कम नहीं है। सबसे पहले तो ऐसे गायपालकों को चिन्हित कर दंण्डित किया जाना चाहिए। गायों को प्लास्टिक खाने से रोकना है तो उन्हें उनकी वास्तविक गौशाला दिलानी होगी। गायों की दुर्दशा पर सिर्फ़ आंसू बहाने अथवा किसी दल या जाति विशेष के सिर पर ठीकरा फोड़ने से कुछ नहीं होगा, यदि गायों के प्रति सचमुच हमदर्दी है तो उन मूक पशुओं की पीड़ा को समझना होगा उन्हें सड़कों भटकने से रोकने के उपाय करने होंगे।
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Wednesday, August 3, 2016

चर्चा प्लस ... इरोम के संघर्ष का दूसरा अध्याय ..... डाॅ. शरद सिंह


मेरा कॉलम  "चर्चा प्लस" "दैनिक सागर दिनकर" में (03. 08. 2016) .....
 
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जब कोई औरत कुछ कर गुज़रने की ठान लेती है तो उसके इरादे किसी चट्टान की भांति अडिग और मजबूत सिद्ध होते हैं। इरोम जैसी सोलह साल लम्बी भूख हड़ताल का कोई दूसरा उदाहरण नहीं मिलता। वे अपना जीवन दांव पर लगा कर निरन्तर संघर्ष करती रही हैं। और अब वे राजनीति में सक्रिय हो कर अफस्पा कानून का विरोध करने जा रही हैं। इरोम के संघर्ष और उनके जीवन के दूसरे अध्याय का भी स्वागत किया जाना चाहिए।

अपना 16 साल पुराना अनशन अगले माह समाप्त करने की घोषणा कर लोगों को चैंका देने वाली मणिपुर की ‘लौह महिला’ इरोम चानू शर्मिला ने कहा कि अपने आंदोलन के प्रति आम लोगों की बेरूखी ने उन्हें यह फैसला करने के लिए बाध्य कर दिया। इरोम ने मीडिया से कहा कि वह सशस्त्र बल विशेष शक्ति अधिनियम (आफ्सपा) हटाने की उनकी अपील पर सरकार की तरफ से कोई ध्यान नहीं देने और आम नागरिकों की बेरूखी से मायूस हुई हैं जिन्होंने उनके संघर्ष को ज्यादा समर्थन नहीं दिया। उन्होंने राज्य में इनर लाइन परमिट सिस्टम के क्रियान्वयन के लिए चले आंदोलन में स्कूली छात्रों के इस्तेमाल की आलोचना की। इरोम सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून (आफ्सपा) को हटाने की मांग को लेकर 16 साल से अनशन कर रहीं मणिपुर की ‘आयरन लेडी’ इरोम चानू शर्मिला ने घोषणा की कि वह नौ अगस्त 2016 को अपना अनशन समाप्त कर देंगी और निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में राज्य विधानसभा का चुनाव लड़ेंगी।
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कौन हैं इरोम चानू शर्मिला

इरोम चानू शर्मिला का जन्म 14 मार्च 1972 को इम्फाल के पास एक गांव में हुआ । इरोम शर्मिला 5 भाई और 3 बहनों में सबसे छोटी हैं। एक साधारण परिवार की इरोम की माता घरेलू महिला और पिता सरकारी पशु चिकित्सा विभाग में नौकरी रहे हैं। सितंबर 2000 में इरोम ह्यूमन राइट्स अलर्ट नामक संस्था से जुड़ी और उसके साथ ही आर्म्ड़ फोर्सेज स्पेशल पावर्स एक्ट के प्रभावों की छानबीन करने के लिए गठित पीपुल्स इंक्वायरी कमीशन के साथ भी इरोम ने काम किया। इरोम शर्मीला ने मात्र 28 वर्ष की आयु में अपनी भूख हड़ताल आरम्भ की थी। उस समय कुछ लोगों को लगा था कि यह एक युवा स्त्री द्वारा भावुकता में उठाया गया कदम है और शीघ्र ही वह अपना हठ छोड़ कर सामान्य ज़िन्दगी में लौट जाएगी। वह भूल जाएगी कि मणिपुर में सेना के कुछ लोगों द्वारा स्त्रियों को किस प्रकार अपमानित किया गया। किन्तु 28 वर्षीया इरोम शर्मीला ने न तो अपना संघर्ष छोड़ा और न आम ज़िन्दगी का रास्ता चुना। वे न्याय की मांग को लेकर संघर्ष के रास्ते पर जो एक बार चलीं तो उन्होंने कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा। यह स्त्री का वह जुझारूपन है जो उसकी कोमलता के भीतर मौजूद ऊर्जस्विता से परिचित कराता है।

इरोम ने क्यों चुना यह रास्ता

शर्मीला ने यह रास्ता क्यों चुना इसे जानने के लिए सन् 2000 के पन्ने पलटने होंगे। सन् 2000 के 02 नवम्बर को मणिपुर की राजधानी इम्फाल के समीप मलोम में शान्ति रैली के आयोजन के सिलसिले में इरोम शर्मीला एक बैठक कर रही थीं। उसी समय मलोम बस स्टैण्ड पर सैनिक बलों द्वारा अंधाधुंध गोलियां चलाई गईं। जिसमें करीब दस लोग मारे गए। इन मारे गए लोगों में 62 वर्षीया लेसंगबम इबेतोमी तथा बहादुरी के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित सिनम चन्द्रमणि भी शामिल थीं। एक ऐसी महिला जिसे बहादुरी के लिए सम्मानित किया गया और एक ऐसी स्त्री जो ‘सीनियर सिटिजन’ की आयु सीमा में आ चुकी थी, इन दोनों महिलाओं पर गोलियां बरसाने वालों को तनिक भी हिचक नहीं हुई? इस नृशंसता ने शर्मीला के अंतर्मन को हिला दिया। इससे पहले भी अनेक ऐसी घटनाएं हो चुकी थीं जिसमें सुरक्षाबल के सैनिकों द्वारा निरपराध और निहत्थे नागरिकों पर गोलियां चलाई गई थीं। शर्मीला ने इस घटना की तह में पहुंच कर मनन किया और पाया कि यह सेना को मिले ‘अफस्पा’ रूपी विशेषाधिकार का दुष्परिणाम है। इस कानून के अंतर्गत सेना को वह विशेषाधिकार प्राप्त है जिसके तहत वह सन्देह के आधार पर बिना वारण्ट कहीं भी घुसकर तलाशी ले सकती है, किसी को गिरफ्तार कर सकती है तथा लोगों के समूह पर गोली चला सकती है। 
इस घटना के बाद इरोम ने निश्चय किया कि वे इस दमनचक्र का विरोध कर के रहेंगी चाहे कोई उनका साथ दे अथवा न दे। इरोम शर्मीला ने भूख हड़ताल में बैठने की घोषणा की और मणिपुर में लागू कानून सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम (अफस्पा) को हटाए जाने की मंाग रखी। इस एक सूत्रीय मांग को लेकर उन्होंने अपनी भूख हड़ताल आरम्भ कर दी। शर्मीला ने 03 नवम्बर 2000 की रात में आखिर बार अन्न ग्रहण किया और 04 नवम्बर 2000 की सुबह से उन्होंने भूख हड़ताल शुरू कर दी। इस भूख हड़ताल के तीसरे दिन सरकार के आदेश पर इरोम शर्मीला को गिरफ्तार कर लिया गया। उन पर आत्महत्या करने का आरोप लगाते हुए धारा 309 के तहत कार्रवाई की गई और न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया। उल्लेखनीय है कि धारा 309 के तहत इरोम शर्मीला को एक साल से ज्यादा समय तक न्यायिक हिरासत में नहीं रखा जा सकता था इसलिए एक साल पूरा होते ही कथिततौर पर उन्हें रिहा कर दिया गया। जवाहरलाल नेहरू अस्पताल का वह वार्ड जहां उन्हें रखा गया है, उसे जेल का रूप दे दिया गया। वहीं उनकी नाक से जबरन तरल पदार्थ दिया जाता रहा।

क्या है ‘अफस्पा’ कानून

अफस्पा कानून एक तरह से आपातकालीन स्थिति लागू करने जैसा ही है। इस कानून के मुख्य बिन्दु हैं - 1-केन्द्र और राज्य सरकार किसी क्षेत्र को गड़बड़ी वाला क्षेत्र घोषित करती है यानी डिस्टब्र्ड एरिया घोषित होने के बाद अफस्पा लगाया जा सकता है। 2-सेना को बिना वारंट तलाशी, गिरफ्तारी तथा जरूरत पड़ने पर शक्ति का इस्तेमाल करने की इजाजत है। इतना ही नहीं, सेना संदिग्ध व्यक्ति को गोली से उड़ा भी सकती है। 3-सेना गिरफ्तार व्यक्ति को जल्दी से जल्दी स्थानीय पुलिस को सौंपने को बाध्य है। लेकिन जल्द से जल्द की कोई व्याख्या नहीं की गई है और न ही कोई समय सीमा तय है। इसकी आड़ में सेना असीमित समय तक किसी भी व्यक्ति को अपने कब्जे में रख सकती है। 4-इस कानून के दायरे में काम करने वाले सैनिकों के खिलाफ कोई कानूनी कार्रवाई नहीं की जा सकती है। मानवाधिकार उल्लंघन या कानून की आड़ में ज्यादती किए जाने का आरोपी सैनिक पर, केन्द्र की अनुमति से ही मुकदमा चलाया जा सकता है या सजा दी जा सकती है।
इस प्रकार यह कानूनी सुरक्षा के नाम संविधान द्वारा प्रदत्त नागरिक मौलिक अधिकारों का पूर्णतः हनन है । इसके चलते कई बार मानव अधिकार कमीशन के दबाव में इस कानून को लेकर मंथन हुआ जिसके तहत प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने 2004 में इस कानून में सुधार की संभावना तलाशने के लिए जस्टिस बी.पी.जीवन रेड्डी कमेटी गठित की लेकिन नतीजा कुछ निकला कर नहीं आया और आज भी यह कानून यथावत है । 
‘अफस्पा’ शासन के 53 वर्षों में 2004 का वर्ष मणिपुर की महिलाओं द्वारा किए गए एक और संघर्ष के लिए चर्चित रहा। असम राइफल्स के जवानों द्वारा थंगजम मनोरमा के साथ किये बलात्कार और हत्या के विरोध में मणिपुर की महिलाओं ने कांगला फोर्ट के सामने नग्न होकर प्रदर्शन किया। उन्होंने जो बैनर ले रखा था, उसमें लिखा था ‘भारतीय सेना आओ, हमारा बलात्कार करो’। इस प्रदर्शन पर बहुत हंगामा हुआ। मीडिया ने इसे भरपूर समर्थन दिया तथा दुनिया के सभी देशों का ध्यान मणिपुर की स्थिति की ओर आकर्षित हुआ।

अचानक लिया निर्णय नहीं है यह

सन् 2014 में अपने एक साक्षात्कार में इरोम ने कहा था कि ‘‘मैं अब शादी करना चाहती हूं। एक बार मेरा मकसद हासिल हो जाए, तो मैं डेसमंड के साथ पति-पत्नी के रिश्ते में रहना चाहती हूं। मैं वोट भी डालना चाहती हूं।’’ उल्लेखनीय है कि भारत में हिरासत में रखे गए लोगों को वोट डालने का अधिकार नहीं है। यद्यपि ऐसे उदाहरण भी हैं जब जे़ल में सज़्ा काट रहे लोगों ने चुनाव लड़े और चुनाव जीता भी है।
अब अपने अनशन के सोलहवें वर्ष में इरोम ने अदालत में कहा कि ‘‘किसी भी राजनीतिक दल ने मेरे लोगों की आफ्सपा हटाने की मांग को नहीं उठाया। इसीलिए मैंने ये विरोध खत्म करने और 2017 के असेंबली चुनावों की तैयारी करने का फैसला किया है। मैं 9 अगस्त 2016 को अदालत में अपनी अगली पेशी के समय भूख हड़ताल खत्म कर दूंगी।’’ इरोम के इस निर्णय से उनके कुछ समर्थकों को निराशा हुई। लेकिन प्रत्येक मनुष्य को अपने जीवन के लिए अपने ढंग से निर्णय लेने का अधिकार होता है, इरोम को भी है। अतः उनके इस निर्णय का सभी को स्वागत करना चाहिए। वे अपने उद्देश्य से नहीं हट रही हैं, वे सिर्फ रास्ता बदल रही हैं। यूं भी जब सोलह साल में देश की जनता उनके समर्थन में सरकार को राजी नहीं कर सकी तो उसे इरोम के इस निर्णय का समर्थन करना ही चाहिए। अब वे राजनीति में सक्रिय हो कर अफस्पा कानून का विरोध करने जा रही हैं। इरोम के संघर्ष और उनके जीवन के दूसरे अध्याय का भी स्वागत किया जाना चाहिए।

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Memories of Pavas Vyakhyanmala 2016, 23-24 July, Bhopal (MP) India

In the occasion I had lecture on the topic of "Social presence of Third Gender in Hindi Novels" - Dr Sharad Singh
Dr ( Miss) Sharad Singh at  Pavas Vyakhyanmala 2016, 23-24 July, Bhopal (MP) India

Dr ( Miss) Sharad Singh at  Pavas Vyakhyanmala 2016, 23-24 July, Bhopal (MP) India with Neerja Madhav and Suryabala

Dr ( Miss) Sharad Singh at  Pavas Vyakhyanmala 2016, 23-24 July, Bhopal (MP) India

Dr ( Miss) Sharad Singh at  Pavas Vyakhyanmala 2016, 23-24 July, Bhopal (MP) India with Dinesh Prabhat

Dr ( Miss) Sharad Singh at  Pavas Vyakhyanmala 2016, 23-24 July, Bhopal (MP) India

Dr ( Miss) Sharad Singh at  Pavas Vyakhyanmala 2016, 23-24 July, Bhopal (MP) India

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Dr ( Miss) Sharad Singh at  Pavas Vyakhyanmala 2016, 23-24 July, Bhopal (MP) India

Dr ( Miss) Sharad Singh at  Pavas Vyakhyanmala 2016, 23-24 July, Bhopal (MP) India

Dr ( Miss) Sharad Singh at  Pavas Vyakhyanmala 2016, 23-24 July, Bhopal (MP) India

Dr ( Miss) Sharad Singh at  Pavas Vyakhyanmala 2016, 23-24 July, Bhopal (MP) India

Dr ( Miss) Sharad Singh at  Pavas Vyakhyanmala 2016, 23-24 July, Bhopal (MP) India

Dr ( Miss) Sharad Singh at  Pavas Vyakhyanmala 2016, 23-24 July, Bhopal (MP) India with Suryabala

Dr ( Miss) Sharad Singh at  Pavas Vyakhyanmala 2016, 23-24 July, Bhopal (MP) India

Dr ( Miss) Sharad Singh at  Pavas Vyakhyanmala 2016, 23-24 July, Bhopal (MP) India with Rajkumar Tiwari Sumitra and Acharya Bhagavat Dubey

Dr ( Miss) Sharad Singh at  Pavas Vyakhyanmala 2016, 23-24 July, Bhopal (MP) India with Pro. Pushpesh Pant

Dr ( Miss) Sharad Singh at  Pavas Vyakhyanmala 2016, 23-24 July, Bhopal (MP) India with Neerja Madhav and Kumud Sharma

Dr ( Miss) Sharad Singh at  Pavas Vyakhyanmala 2016, 23-24 July, Bhopal (MP) India

Sunday, July 31, 2016

मेरी पुस्तक " राष्ट्रवादी व्यक्तित्व : सरदार वल्लभ भाई पटेल


मेरी पुस्तक " #राष्ट्रवादी #व्यक्तित्व : #सरदार_वल्लभ_भाई_पटेल" की #समीक्षा आज (31.07.2016) " #जनसत्ता" में .... please read ...
Thank you #Jansatta !

Thursday, July 28, 2016

23वीं पावस व्याख्यानमाला , 23-24 जुलाई 2016 को हिन्दी भवन, भोपाल (मध्यप्रदेश)

Dr ( Miss) Sharad Singh at  Pavas Vyakhyanmala 2016, 23-24 July, Bhopal (MP) India
मध्यप्रदेश राष्ट्रभाषा प्रचार समिति भोपाल द्वारा 23-24 जुलाई 2016 को हिन्दी भवन, भोपाल (मध्यप्रदेश) में आयोजित दो दिवसीय 23वीं पावस व्याख्यानमाला में ‘‘समकालीन हिन्दी उपन्यासों में सामाजिक दृष्टि’’ विषय पर मैंने ं(डाॅ. शरद सिंह) अपने वक्तव्य में कहा कि ‘‘मैं इस मंच से थर्ड जेंडर विमर्श को आरम्भ किए जाने की घोषणा करती हूं।’’ वहां उपस्थित सभी बुद्धिजीवियों ने मेरी इस घोषणा का स्वागत एवं समर्थन किया।
 ‘‘समकालीन उपन्यासों में थर्ड जेंडर की सामाजिक उपस्थिति’’ विषय पर अपना व्याख्यान देते हुए मैंने थर्ड जेंडर पर आधारित हिन्दी के पांच प्रतिनिधि उपन्यासों की चर्चा की। मैंने कहा कि थर्ड जेंडर को सामाजिक समानता के अधिकार दिलाने में साहित्य महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। आवश्यकता है ऐसे साहित्य पर एक स्वतंत्र विमर्श की।

इस पावस व्याख्यानमाला में देश भर से आए साहित्यकारों में प्रो. पुष्पेश पंत, सूर्यबाला, डाॅ. सदानंद गुप्त, डाॅ. डी एन प्रसाद, डाॅ शंकर शरण, नीरजा माधव, प्रो. रमेश दवे, प्रो. रमेशचंद्र शाह, कैलाशचन्द्र पंत, नरेन्द्र दीपक, डाॅ. संतोष चौबे, आचार्य भगवत दुबे, राजकुमार सुमित्र आदि की उपस्थिति महत्वपूर्ण रही।
Dr ( Miss) Sharad Singh at  Pavas Vyakhyanmala 2016, 23-24 July, Bhopal (MP) India

Dr ( Miss) Sharad Singh at  Pavas Vyakhyanmala 2016, 23-24 July, Bhopal (MP) India

Dr ( Miss) Sharad Singh at  Pavas Vyakhyanmala 2016, 23-24 July, Bhopal (MP) India

Dr ( Miss) Sharad Singh at  Pavas Vyakhyanmala 2016, 23-24 July, Bhopal (MP) India

Dr ( Miss) Sharad Singh at  Pavas Vyakhyanmala 2016, 23-24 July, Bhopal (MP) India







सागर के अखबारों में मेरा व्याख्यान ....

Dr (Miss) Sharad Singh in Pavas Vyakhyanmala, Bhopal - 2016, 23-24 July
मध्यप्रदेश राष्ट्रभाषा प्रचार समिति भोपाल द्वारा 23-24 जुलाई 2016 को हिन्दी भवन, भोपाल (मध्यप्रदेश) में आयोजित दो दिवसीय 23वीं पावस व्याख्यानमाला में ‘‘समकालीन हिन्दी उपन्यासों में सामाजिक दृष्टि’’ विषय पर मैंने (डाॅ. शरद सिंह) अपने वक्तव्य में कहा कि ‘‘मैं इस मंच से थर्ड जेंडर विमर्श को आरम्भ किए जाने की घोषणा करती हूं।’’ वहां उपस्थित सभी बुद्धिजीवियों ने मेरी इस घोषणा का स्वागत एवं समर्थन किया।
 ‘‘समकालीन उपन्यासों में थर्ड जेंडर की सामाजिक उपस्थिति’’ विषय पर अपना व्याख्यान देते हुए मैंने थर्ड जेंडर पर आधारित हिन्दी के पांच प्रतिनिधि उपन्यासों की चर्चा की। मैंने कहा कि थर्ड जेंडर को सामाजिक समानता के अधिकार दिलाने में साहित्य महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। आवश्यकता है ऐसे साहित्य पर एक स्वतंत्र विमर्श की।

इस पावस व्याख्यानमाला में देश भर से आए साहित्यकारों में प्रो. पुष्पेश पंत, सूर्यबाला, डाॅ. सदानंद गुप्त, डाॅ. डी एन प्रसाद, डाॅ शंकर शरण, नीरजा माधव, प्रो. रमेश दवे, प्रो. रमेशचंद्र शाह, कैलाशचन्द्र पंत, नरेन्द्र दीपक, डाॅ. संतोष चैबे, आचार्य भगवत दुबे, राजकुमार सुमित्र आदि की उपस्थिति महत्वपूर्ण रही।

Patrika, Sagar Edition, 28.07.2016

Sagar Dinkar, Sagar Edition, 27.07.2016

Deshbandhu, Sagar Edition, 26.07.2016

Nav Dunia, Sagar Edition, 26.07.2016

Dainik Bhaskar, Sagar Edition,  28.07.2016