Wednesday, December 6, 2017

My Birthday Celebration By Dainik Bhaskar Sagar Raahgiri


On the celebrating my birthday along with talented children in the joint ceremony of Dainik Bhaskar Sagar Edition, Sagar Raahgiri Social Group and Shubha Environment  Samajotthan Samiti Sagar, I planted a tree, gave a message of environmental protection and cut cake. In the celebration memento and honor gave to me by Dainik Bhaskar Sagar Rahgiri Raahgiri and Kadam Sanstha Jabalpur. On this occasion, I and My Elder Sister Dr. Varsha Singh awarded the talented children on behalf of Dainik Bhaskar Sagar Raahgiri.
To give such a Love and respect, I am very grateful to Dainik Bhaskar Sagar Raahgiri, Shubha Environment Samajotthan Samiti, Sagar and Kadam Sansthan Jabalpur.
Photos of the same occasion  -




















डॉ. अम्बेडकर के जीवन को प्रभावित करने वाली स्त्रियां - डॉ. शरद सिंह... चर्चा प्लस

Dr (Miss) Sharad Singh
चर्चा प्लस (दैनिक सागर दिनकर, 06.12.2017)

डॉ. अम्बेडकर के महापरिनिर्वाण दिवस (6दिसम्बर) पर विशेष :

 
डॉ. अम्बेडकर के जीवन को प्रभावित करने वाली स्त्रियां
- डॉ. शरद सिंह
डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने 'हिन्दू कोड बिल’ के जरिए स्त्रियों को समान अधिकार और संरक्षण दिए जाने की पैरवी की। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि स्त्रियों को संपत्ति, विवाह-विच्छेद, उत्तराधिकार, गोद लेने का अधिकार दिया जाए। स्त्री का विवाह की उसकी मर्जी के बिना न किया जाए। स्त्रियों को पढ़ने का भरपूर अवसर दिया जाए। ऐसे स्त्री-अधिकारों के पक्षधर डॉ. अम्बेडकर के जीवन को भी कुछ स्त्रियों ने प्रभावित किया था। डॉ. अम्बेडकर के महापरिनिर्वाण दिवस के अवसर पर यहां प्रस्तुत हैं मेरी पुस्तक ‘‘डॉ. अम्बेडकर का स्त्रीविमर्श’’ का एक अंश।

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 डॉ. भीराव अम्बेडकर ने अपने जीवन में स्त्रियों के हित की रक्षा करने के लिए अनेक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक कदम उठाए। उनके इन कदमों के पीछे वे स्त्रियां मौजूद थीं जिन्होंने जाने-अनजाने डॉ. अम्बेडकर के जीवन को प्रभावित किया। उनमें जीवनदायिनी मां भीमाबाई, बुआ मीराबाई, सौतेली मां जिजाबाई, प्रथम पत्नी रमाबाई प्रमुख थीं।
जीवनदायिनी मां भीमाबाई - डॉ. अम्बेडकर की मां भीमाबाई वाक्चातुर्य की धनी, सुन्दर, सुशील और धर्मपरायण थीं। वे अत्यन्त स्वाभिमानी थीं। रामजी सकपाल अपने अल्प वेतन से पैसे बचाकर भीमाबाई के पास भेजते थे जो पूरे परिवार के लिये पर्याप्त नहीं था। परिवार के खर्चों को पूरा करने के लिये भीमाबाई ने सान्ताक्रूज में सड़क पर बजरी (कंकड़-पत्थर) बिछाने की मजदूरी का काम करना शुरू कर दिया। कुछ समय बाद भाग्य ने करवट ली और रामजी सकपाल की योग्यता को पहिचान कर उन्हें पूणे के पन्तोजी विद्यालय में पढ़ने का अवसर दिया गया परीक्षा पास करने के उपरान्त उन्हें फौजी छावनी के विद्यालय में अध्यापक का पदभार सौंपा गया। शीघ्र ही उन्हें प्रधान अध्यापक बना दिया गया। वे लगभग चौदह वर्ष तक प्रधान अध्यापक रहे। जिससे उनकी आर्थिक स्थिति सुदृढ़ होती गयी। इस बीच भीमाबाई ने तेरह संतानों को जन्म दिया जिनमें सात संताने ही जीवित रहीं, शेष का बचपन में ही निधन हो गया था।
भीमाबाई बहुत अधिक व्रत-उपवास करती थीं। साथ ही उनकी बीमारी का सही निदान न होने के कारण स्वास्थ्य लगातार गिरने लगा। रामजी सकपाल का स्थानांतरण अलग-अलग छावनियों में होता रहता था। महू (मध्यप्रदेश में इन्दौर के निकट) में रहते समय रामजी सकपाल और भीमाबाई ने कामना की कि उनका एक ऐसा पुत्र उत्पन्न हो जो दीन दुखियों की सेवा करे। भीमाबाई की यह प्रार्थना शीघ्र ही फलीभूत हुई और उन्होंने 14 अप्रैल 1891 को एक पुत्र को जन्म दिया जिसका नाम भीमराव रखा गया। भीमराव को अपनी मां का स्नेह अधिक समय तक नहीं मिल पाया। अस्वस्थता के कारण भीमाबाई का निधन हो गया।
भीमराव अपनी मां को ‘बय’ कह कर पुकारते थे। उन्हें अपनी मां से अगाध स्नेह था। मां की मृत्यु के उपरान्त भी वे अपनी ‘बय’ को कभी भुला नहीं सके। स्वाभिमान, दृढ़ इच्छाशक्ति और किसी भी संकट का साहस के साथ सामना करने का गुण भीमराव को अपनी मां भीमाबाई से मानो अनुवांशिक रूप में मिला था। यह गुण भी उन्हें अपनी मां से ही मिला था कि कोई भी काम छोटा नहीं होता है। ये सारे गुण भीमराव को जीवन में सतत आगे बढ़ाते रहे।

बुआ मीराबाई - मीराबाई डॉ. अम्बेडकर की बुआ थीं। वे उत्साही होने के साथ परिवार-प्रबंधन में निपुण थीं। दुर्भाग्यवश उनका वैवाहिक जीवन सुखद नहीं था। पति से अनबन के कारण उन्हें मायके में अपने छोटे भाई रामजी सकपाल के साथ रहना पड़ रहा था। भीमराव की मां भीमाबाई का निधन होने के बाद मीराबाई ने भीमराव को मां की कमी नहीं होने दी। भीमराव के प्रति उनका अगाध स्नेह था। मीराबाई अत्यंत मितव्ययी थीं। किन्तु बालक भीमराव को यही लगता था कि बुआ के पास पर्याप्त पैसा है। इसीलिए जब भीमराव के मन में विचार आया कि कुली का काम कर के वे परिवार को इच्छित सहयोग नहीं कर सकते हैं और उन्हें मुंबई जा कर मिल में काम करना चाहिए, तो उन्हें मुंबई जाने के लिए धन की आवश्यकता का अनुभव हुआ। उन्हें लगा कि बुआ जिस बटुवे को हमेशा अपनी कमर में खोंसे रहती हैं, उसमें अवश्य इतना पैसा निकल आएगा कि वे उस पैसे से मुंबई पहुंच जाएंगे। वे बुआ से पैसे मांग कर अपने मुंबई जाने का इरादा प्रकट नहीं करना चाहते थे। अतः उन्होंने बुआ के बटुए से चुपचाप पैसे निकालने का निश्चय किया। रात को भीमराव और उनके बड़े भाई बुआ की दाईं-बाईं ओर सोते थे तथा यह क्रम बदलता रहता था। जिस रात भीमराव बटुवे की ओर सोए, उन्होंने चुपके से बटुवा खोल कर देखा। बटुवे में झांकते ही वे सन्न रह गए। बटुवे में मात्र दो पैसे थे। भीमराव का यह भ्रम टूट गया कि बुआ के पास पर्याप्त पैसे हैं। वे सोच में पड़ गए कि इतने कम पैसों में बुआ इतने सारे सदस्यों का लालन-पालन कैसे कर रही हैं? उन्हें अपने किए पर पश्चाताप हुआ और उन्होंने मुंबई जाने का निश्चय छोड़ कर पढ़ाई में मन लगाने का निश्चय किया। उन्हें लगा कि पढ़-लिख कर ही वे परिवार का सहारा बन सकते हैं। इस घटना के बाद भीमराव के व्यक्तित्व का कायाकल्प हो गया। पढ़ाई के प्रति उदासीन रहने वाला बालक पढ़ाई के प्रति समर्पित हो गया। जो शिक्षक पहले भीमराव के ठीक से न पढ़ने की शिकायत उनके पिता से करते रहते थे, वे अब भीमराव की बुद्धिमानी को देखते हुए उन्हें आगे पढ़ाने का आग्रह करने लगे। यह परिवर्तन बुआ मीराबाई के मितव्ययी स्वभाव और ममत्व के कारण हुआ।
सौतेली मां जिजाबाई - भीमाबाई की मृत्यु के बाद डॉ. अम्बेडकर के पिता रामजी सकपाल ने दूसरा विवाह जिजाबाई से किया। जिजाबाई विधवा थीं। जिजाबाई भी रामजी सकपाल के प्रति पूर्ण समर्पिता रहीं। किन्तु बालक भीमराव को उस समय अपनी सौतेली मां पर बहुत क्रोध आता था जब वे उनकी ‘बय’ अर्थात् मां भीमाबाई के कपड़े और जेवर पहन लेती थीं। एक बार त्यौहार के अवसर पर जिजाबाई ने भीमाबाई के कपड़े-जेवर पहन लिए। यह देख कर उन्हें अपनी सौतेली मां पर बहुत क्रोध आया। वे अपनी सौतेली मां जिजाबाई से झगड़ा करने लगे। उसी समय रामजी सकपाल घर आ गए। उन्होंने झगड़े का कारण पूछा तो बालक भीम ने कारण बता दिया। यह सुन कर पिता ने भीमराव को ही डांट दिया। इस पर भीमराव को लगा कि उन्हें स्वयं पैसे कमाने होंगे। इसीलिए उन्होंने ढोर चराए, खेत पर काम किया और तो और कुली का भी काम किया। यद्यपि इसके बाद उनके ज्ञानचक्षु खुल गए और वे समझ गए कि यदि वे परिवार की सहायता करना चाहते हैं तो उन्हें अध्ययन में मन लगाना होगा।
आयु के बढ़ने के साथ-साथ भीमराव अपनी सौतेली मां जिजाबाई के मनोविज्ञान को समझते गए और वे उनके चिड़चिड़े स्वभाव को अनदेखा कर उन्हें सदा मान-सम्मान देते रहे। यहां तक कि जिजाबाई की मृत्यु के शोक में डूबे होने के कारण उन्होंने नवम्बर 1997 में दलित वर्ग द्वारा आयोजित सम्मेलन में भाग नहीं लिया।
पत्नी रमाबाई - डॉ. अम्बेडकर जब मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण की तभी उनके विवाह के लिए योग्य लड़की की खोज शुरू कर दी गई। उनके लिए रामीबाई को पसन्द किया गया। उस समय रामीबाई नौ साल की थीं और भीमराव सोलह साल के थे। विवाह के बाद रामीबाई का नाम बदल कर रमाबाई रखा गया। रमाबाई बचपन से ही शांत स्वभाव की थीं। वे मितव्ययी और सहनशील भी थीं। मैट्रिक उत्तीर्ण छात्र भीमराव को संविधान निर्माता बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर के स्वरूप तक पहुंचने में रमाबाई के समर्पित सहयोग को अनदेखा नहीं किया जा सकता है। डॉ. अम्बेडकर उच्चअध्ययन के लिए अमेरिका गए उन दिनों रमाबाई गर्भवती थीं। शीघ्र ही उन्होंने एक पुत्र को जन्म दिया जिसका नाम गंगाधर रखा गया। दुर्भाग्यवश गंगाधर बचपन में ही परलोक सिधार गया। उनके दूसरे पुत्र यशवंत का स्वास्थ्य प्रायः खराब रहता था जिसकी चिकित्सा के लिए वे जूझती रहती थीं किन्तु अपने पति डॉ. अम्बेडकर के अध्ययनकार्य को बाधित नहीं होने देती थीं। लंदन में अध्ययन के समय डॉ. अम्बेडकर को अपने मित्र से उधार मांग कर काम चलाना पड़ा। उस समय भी रमाबाई ने धन की कमी का उलाहना अपने पति को कभी नहीं दिया। उनका प्रयास यही रहता था कि पारिवारिक विषमताओं का प्रभाव डॉ. अम्बेडकर के जीवन पर न पड़ने पाए और वे निश्चिन्त भाव से अपने महान उद्देश्यों की पूर्ति में संलग्न रहें। रमाबाई के इस समर्पित भाव का डॉ. अम्बेडकर के जीवन पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा और वे भारतीय समाज की प्रत्येक स्त्री की जीवनदशा एवं संघर्षों के बारे में गहराई से समझ सके।

सविता देवी - पत्नी रमाबाई की मृत्यु के उपरान्त डॉ. अम्बेडकर ने सामाज में जातिगत एकता का आदर्श स्थापित करते हुए ब्राह्मण परिवार की विधवा स्त्री सविता देवी से विवाह किया। सविता देवी सुशिक्षित थीं। पुत्र यशवंत राव के विवाह में डॉ. अम्बेडकर के सम्मिलित न हो पाने पर सविता देवी ने मां के रूप में विवाह में सहयोग दिया। वे डॉ. अम्बेडकर के अंतिम समय तक उनके साथ रहीं तथा उनके कार्यों में उन्हें सहयोग देती रहीं। विवाह से पहले उनकी पत्नी का नाम शारदा कबीर था। डॉ. अम्बेडकर के साथ ही उन्होंने ने भी बौद्ध धर्म ग्रहण कर लिया था।
डॉ. अम्बेडकर के जीवन से जुड़ी इन सभी स्त्रियों ने प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप से उन पर अपना स्थाई प्रभाव डाला। इन स्त्रियों के जीवन और समाज में उनके स्थान तथा उनके कर्त्तव्यबोध के प्रति डॉ. अम्बेडकर सदा चिन्तनशील रहे तथा इससे उन्हें समाज में स्त्री की दशा को समझने का पर्याप्त अवसर मिला।
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उल्लेखनीय : बाबा साहब पर मेरी पुस्तक " डॉ अंबेडकर का स्त्रीविमर्श " सन् 2012 में प्रकाशित हुई थी।
पुस्तक के प्रकाशक- भारत बुक सेन्टर, 17, अशोक मार्ग, लखनऊ (उत्तर प्रदेश)- 226001

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रेप और गैंगरेप के विरुद्ध ऐतिहासिक क़दम - डॉ. शरद सिंह... चर्चा प्लस

Dr (Miss) Sharad Singh
चर्चा प्लस (दैनिक सागर दिनकर, 29.11.2017)
रेप और गैंगरेप के विरुद्ध ऐतिहासिक क़दम
- डॉ.शरद सिंह

12 साल या उससे कम उम्र की बच्ची के साथ बलात्कार तथा किसी महिला के साथ गैंगरेप के अपराधी को फांसी की सज़ा दिए जाने के ऐतिहासिक फैसले ने मध्यप्रदेश को महिलाओं की सुरक्षा के प्रति सजग राज्य का पहला दर्जा दिला दिया है। यद्यपि इस प्रकार का कठोर दण्ड जहां एक ओर ऐसे जघन्य अपराध पर अंकुश लगाने का कार्य करेगा वहीं दूसरी ओर कानून और न्याय व्यवस्था से हर स्तर पर और अधिक सजगता, तत्परता और निष्पक्षता की मांग करेगा। तमाम साक्ष्यों के साथ यह सुनिश्चित करना अत्यंत आवश्यक होगा कि अभियुक्त वास्तविक अपराधी है या नहीं। इसके लिए उन सभी लोगों को भी भावुकता का त्याग करना होगा जो अपराध की गंभीरता एवं अमानवीयता को देख कर अभियुक्त का मुद्दमा न लड़ने की घोषणा कर बैठते हैं। अपराधी माने जा रहे व्यक्ति का अपराध जब तक सिद्ध न हो जाए उसे कानून के प्रतिनिधियों के माध्यम से अपना पक्ष सामने रखने का अधिकार होता है। यह अधिकार उसे इसीलिए दिया जाता है कि कहीं कोई निरपराध सजा का भागी न बन जाए। फांसी जैसी सजा के मामले में यह दायित्व और अधिक गंभीर हो जाता है। फिर भी इसमें कोई संदेह नहीं कि यह बच्चियों एवं महिलाओं के प्रति किए जाने वाले अपराधों के विरुद्ध एक कठोर और मजबूत कदम सिद्ध होगा। वैसे, रेप एवं गैंगरेप के मामलों में जुवेनाईल धाराओं में भी अभी संशोधन की आवश्यकता है।
 
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आज देश में बार-बार यह प्रश्न उठता है कि बलात्कार की घटनाओं पर कैसे अंकुश लगाया जाए? महिलाओं को यौन अपराध से कैसे सुरक्षित किया जाए? बलात्कारी को मृत्युदण्ड दिए जाने का प्रश्न भी एक ज्वलंत प्रश्न रहा है। इस प्रश्न पर सबसे बड़ी अड़चन यह आती रही है कहीं किसी निरपराधी को बलात्कारी का ठप्पा लगा कर सूली पर न चढ़ा दिया जाए। बहरहाल, मध्यप्रदेश विधानसभा का शीतकालीन सत्र शुरू होने से एक दिन पहले कैबिनेट ने 12 साल या उससे कम उम्र की लड़कियों से बलात्कार या किसी भी उम्र की महिला से गैंगरेप के दोषी को फांसी की सज़ा देने को मंजूरी दे दी। कैबिनेट में अपने फैसले के लिये 376 ए ए और 376 डी ए के रूप में संशोधन किया गया। यह भी कहा गया है कि लोक अभियोजन की सुनवाई का अवसर दिए बिना जमानत नहीं होगी. शादी का प्रलोभन देकर शारीरिक शोषण करने के आरोपी को सजा के लिए 493 क में संशोधन करके संज्ञेय अपराध बनाने का प्रस्ताव किया गया। महिलाओं के खिलाफ आदतन अपराधी को धारा 110 के तहत गैर जमानती अपराध और जुर्माने की सज़ा देने के साथ महिलाओं का पीछा करने का अपराध दूसरी बार साबित होने पर न्यूनतम एक लाख रुपये का जुर्माना लगाया जाएगा। कैबिनेट की बैठक के बाद वित्त मंत्री जयंत मलैया ने कहा, “मंत्रिमंडल ने 12 साल या उससे कम उम्र की बच्ची के साथ बलात्कार के दोषी को मृत्युदंड की मंजूरी दे दी है, गैंगरेप के दोषियों को भी मृत्युदंड का प्रस्ताव पारित कर दिया गया है।’’
यद्यपि पिछले कैबिनेट की बैठक में मलैया और ग्रामीण विकास मंत्री गोपाल भार्गव ने आशंका जताई थी कि बलात्कारियों के लिए मौत की सजा पीड़ितों के लिए एक बड़ा खतरा होगा क्योंकि अपराधी उन्हें मारने की कोशिश करेंगे। इसलिए कैबिनेट की मुहर लगाने से पहले इस मामले में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने अधिक विचार-विमर्श और कानूनी सलाह के लिये कुछ और समय लिया। मुख्यमंत्री चौहान ने भोपाल में 19 साल की युवती के साथ सामूहिक बलात्कार की घटना के बाद कहा था कि बलात्कार के दोषियों को फांसी की सज़ा देनी चाहिये और वो कानून बनाकर विधेयक को मंजूरी के लिए भारत सरकार को भेजेंगे।
महिलाओं के खिलाफ आदतन अपराधी को धारा 110 के तहत गैर जमानती अपराध और जुर्माने की सजा का प्रावधान किया गया है। महिलाओं का पीछा करने, छेड़छाड़, निर्वस्त्र करने, हमला करने और बलात्कार का आरोप साबित होने पर न्यूनतम जुर्माना एक लाख रुपए लगाया जाएगा। हाल ही में राजधानी भोपाल में हुई गैंग रेप की घटना के बाद मध्य प्रदेश सरकार पर कानून व्यवस्था को लेकर सवाल खड़े हुए थे। यही नहीं, पीड़िता ने भी कहा था कि आरोपियों को चौराहे पर फांसी दी जाए।
सरकार ने बलात्कार मामले में सख्त फैसला लेते हुए आरोपियों के जमानत की राशि बढ़ाकर एक लाख रुपये कर दी है। इस तरह मध्य प्रदेश देश का पहला राज्य बन गया है, जहां बलात्कार के मामले में इस तरह के कानून के प्रस्ताव को मंजूरी दी गई है। साथ ही शादी का प्रलोभन देकर शारीरिक शोषण करने के आरोपी को सजा के लिए 493 क में संशोधन करके संज्ञेय अपराध बनाने के प्रस्ताव को मंजूरी दी गई है।
निश्चित रूप से यह एक ऐतिहासिक और साहसिक फैसला है। आशा की जा सकती है कि इससे महिलाओं के विरुद्ध यौन अपराध करने वालों में भय व्याप्त होगा तथा बलात्कार तथा अन्य प्रकार के यौनअपराधों में भी कमी आएगी। किन्तु इस फैसले का एक पक्ष और है जो अपनेआप में संवेदनशील है। यह पक्ष है कि कहीं किसी निर्दोष को दण्ड का भागी न बनना पड़े। इस बिन्दु पर दो बातों पर ध्यान दिया जाना अतिआवश्यक होगा- पहली बात तो यह कि पुलिस की पड़ताल और मेडिकल जांच में किसी तरह की कोताही न बरती जाए और वहीं पीड़िता स्वयं को अथवा उसके परिजन उसे मेडिकल जांच के लिए जल्दी से जल्दी प्रस्तुत कर दें। बलाकात्कार के संदर्भ में मनोवैज्ञानिक डॉ. वाणी नायर का कहना है कि -‘‘पीड़िता के लिए यह एक सदमे का विषय होता है। यह सामान्य चोट लगने जैसी स्थिति नहीं होती है कि घर जा कर तुरन्त सबको बता सकें। पीड़िता सदमें के उबरने के बाद ही घटना का विस्तृत विवरण दे पाती है।’’
जहां तक पुलिस छानबीन का प्रश्न है तो भोपाल में हुए बलात्कार कांड में पीड़िता के स्वयं थाने पहुंचने पर भी तत्परता से रिपोर्ट न लिखा जाना एक ऐसा उदाहरण है जो पुलिस की कार्यवाही पर उंगली उठाती है। यद्यपि इस मामले में दोषी पुलिसकर्मियों को विभागीय दण्ड दिया जा चुका है लेकिन प्रश्न उठता है कि इस प्रकार की ढीली-ढाली व्यवस्था में सही अपराधी के विरुद्ध दमदार साक्ष्य कैसे जुटाए जा सकेंगे। इस भोपाल बलात्कार कांड में पुलिस ने एक गलत आदमी को बलात्कार के संदेह में पकड़ ही लिया था और बाद में उसे छोड़ना पड़ा।
बलात्कार एक ऐसा जघन्य किन्तु संवेदनशील अपराध है जो पीड़िता के जीवन को तो प्रताड़ित करता ही है, साथ ही पूरे परिवार को प्रभावित करता है। न केवल पीड़िता और सके परिवार के पक्ष को अपितु उस हर व्यक्ति को चोट पहुंचाता है जिसे इस अपराध के संदेह में पकड़ा गया हो। भले ही वह व्यक्ति के बाद निर्दोष निकल आए किन्तु संदेह का दाग उसके दामन पर उम्र भर के लिए लग जाता है। फिर जब सज़ा का स्वरूप फांसी का हो तो आवेश, भावुकता अथवा लापरवाही कां छोड़ कर पुलिस की कार्यवाही में र्प्याप्त सजगता और तत्परता की दरकार होगी।
पिछले कुछ समय से भावुकतापूर्ण निर्णयों का चलन दिखाई देने लगा है। यह सच है कि गैंगरेप जैसे जधन्य अपराध की पीड़िता के प्रति सहानुभूति होना स्वाभाविक है। ऐसी घटनाएं प्रत्येक व्यक्ति को भावुकता से भर देती हैं और वह अपराधी को कड़ी से कड़ी सजा दिलाना चाहता है। हरियाणा के स्कूल में एक बच्चे की हत्या के बाद वकीलों द्वारा भावुकता में आ कर अभियुक्त के पक्ष से मुकद्दमा नहीं लड़ने की घोषणा कर दी थी। जबकि सीबीआई की जांच से बाद इस बात के संकेत मिले कि दोषी माना जा रहा कंडक्टर वास्तव में दोषी नहीं था और उसने पुलिस की प्रताड़ना से घबरा कर अपराध स्वीकार कर लिया था जो कि उसने किया ही नहीं था। हाल ही में दूसरी बार भोपाल बलात्कार कांड में भी वकीलों ने अभियुक्तों की ओर से मुकद्दमा नहीं लड़ने की घोषणा कर दी थी। तमाम साक्ष्यों के साथ यह सुनिश्चित करना अत्यंत आवश्यक होगा कि अभियुक्त वास्तविक अपराधी है या नहीं। इसके लिए उन सभी लोगों को भी भावुकता का त्याग करना होगा जो अपराध की गंभीरता एवं अमानवीयता को देख कर अभियुक्त का मुद्दमा न लड़ने की घोषणा कर बैठते हैं। अपराधी माने जा रहे व्यक्ति का अपराध जब तक सिद्ध न हो जाए उसे कानून के प्रतिनिधियों के माध्यम से अपना पक्ष सामने रखने का अधिकार होता है। यह अधिकार उसे इसीलिए दिया जाता है कि कहीं कोई निरपराध सजा का भागी न बन जाए।
वैसे, रेप एवं गैंगरेप के मामलों में जुवेनाईल धाराओं में भी अभी संशोधन की आवश्यकता है। यदि कोई नाबालिग बलात्कार जैसा बालिग अपराध करता है तो उसे बालिगों की श्रेणी में माना जाना चाहिए। दिल्ली के निर्भया कांड के बाद यह मांग तेजी से उठी थी। तब सन् 2015 में जुवेनाइल बिल राज्य सभा में भी पास कर के राष्ट्रपति की मंज़ूरी के लिए भेजा गया। इस बिल के में प्रावधान रखा गया कि अगर जुर्म ’जघन्य’ हो, यानी आईपीसी में उसकी सज़ा सात साल से अधिक हो तो, 16 से 18 साल की उम्र के नाबालिग को वयस्क माना जाएगा। इस कानून के जरिए नाबालिग़ को अदालत में पेश करने के एक महीने के अंदर ’जुवेनाइल जस्टीस बोर्ड’ ये जांच करेगा कि उसे ’बच्चा’ माना जाए या ’वयस्क’ और वयस्क माने जाने पर किशोर को मुकदमे के दौरान भी सामान्य जेल में रखा जाएगा। हालांकि अगर नाबालिग को वयस्क मान भी लिया जाए तो मुक़दमा ’बाल अदालत’ में चले और आईपीसी के तहत सज़ा हो उम्र क़ैद या मौत की सजा नहीं दी जा सकती। एनसीआरबी रिपोर्ट के अनुसार 2014 में किशोरों द्वारा किए गए अपराधों की संख्या में 132 फीसदी का इजाफा देखने के मिला है, जिसमें बलात्कार की घटनाओं में यह वृद्धि 60 फीसदी से अधिक है। इस रिपोर्ट के अनुसार दर्ज किए गए मामलों में 66 फीसदी से अधिक बच्चों की उम्र 16-18 साल के बीच है। नाबालिगों में इस तरह के अपराधों की बढ़ती दर को देखते हुए कानूनन कठोर कदम उठाया जाना जरूरी है।
यह बात तय है कि यदि हमें रेप, गैंगरेप, सोशल मीडिया पर यौनअपराध की वीडियो अपलोडिंग आदि अपराधों से मुक्ति चाहिए तो कठोर कदमों का स्वागत करना ही होगा।
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Wednesday, November 29, 2017

Thank You Google to make my Birthday very special by Doodle !!!

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Really Hearty Thanks !!!
GOOGLE Birthday Wishes to Me
 

Wednesday, November 22, 2017

इतिहास, सिनेमा और (कु)संवाद के साए में ‘पद्मावती’ - डॉ. शरद सिंह... चर्चा प्लस

Dr (Miss) Sharad Singh

चर्चा प्लस  (दैनिक सागर दिनकर, 22.11.2017)



इतिहास, सिनेमा और (कु)संवाद के साए में ‘पद्मावती’
  - डॉ. शरद सिंह
यूं आजकल चलन-सा हो गया है विवाद खड़ा कर के फिल्म को चर्चित बनाने का लेकिन संजय लीला भंसाली ने भी फिल्म बनाते समय यह नहीं सोचा होगा कि उनकी फिल्म को ले कर वाद-संवाद इस तरह अपना स्तर गवां बैठेंगे। जिस धैर्य और संयम के परिचय की अपेक्षा विरोध कर रहे राजपूतों से की जा रही है, वही अपेक्षा संजय लीला भंसाली से भी है। जावेद अख़्तर जैसे व्यक्ति से ऐसे वक्तव्य की आशा नहीं थी जो उन्होंने इस विवाद के तारतम्य में दिया है। समय रहते संयम नहीं बरता गया तो विवाद के बीच में कूद पड़ने वाले कुसंवादी वातावरण को और बिगाड़ सकते हैं।
रानी पद्मिनी अथवा रानी पद्मावती की कथा हम सभी ने सुनी है, पढ़ी है। हम उस संस्कृति के नागरिक हैं जहां पशु, पक्षी, वनस्पति और यहां तक कि पाषाण में भी देवता के होने का विश्वास रखते हैं। वहीं हम मिलजुल कर रहने में विश्वास रखते हैं। लेकिन विगत कुछ सप्ताह से फिल्म ‘पद्मावती’ को ले कर जिस तरह का विवाद खड़ा हो गया है वह हमारी सांस्कृतिक मान्यताओं एवं भावनाओं को आहत करने वाला है। मसला सिर्फ़ यह नहीं है कि इससे राजपूतों की भावना को ठेस पहुंची, मसला यह भी है कि इससे भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों को ठेस पहुंची है। यह सच है कि कुछ राजपूतों को अतिआवेश में आ कर अभिनेत्री दीपिका पादुकोण के विरुद्ध अपशब्द नहीं कहने चाहिए थे किन्तु वहीं दूसरी ओर संजय लीला भंसाली को भी राजपूतों की भावनाओं का सम्मान करते हुए विरोध कर रहे राजपूतों के प्रतिनिधियों को फिल्म की स्क्रीनिंग दिखा देनी चाहिए थी, इससे मामला उस सीमा तक नहीं बिगड़ता जितना कि बिगड़ता चला गया। संजय लीला भंसाली ने जिस हठ का परिचय दिया वह भी चकित कर देने वाला है। उन्होंने अपनी फिल्म को विवाद के बहुत बाद सेंसर बोर्ड के पास भेजा।
Column Charcha Plus, Dainik Sagar Dinkar, Dr (Miss) Sharad Singh

सिनेमा मनोरंजन का वह सशक्त माध्यम है जिसके द्वारा यदि फिल्मकार चाहे तो सामाजिक, धार्मिक, ऐतिहासिक और राजनीतिक मूल्यों का शानदार ताना-बाना बुन सकता है। यहां शानदार होने का अर्थ करोड़ों के बजट से भव्य सेट लगाने से नहीं है, यहां शानदार होने का अर्थ है आम जनता के साथ सीधा संवाद स्थापित करना। अनेक ऐसी फिल्में बन चुकी हैं जिन्होंने जनमानस पर गहरा प्रभाव डाला है। ऐसा नहीं है कि उनमें विरोधात्मक बातें नहीं थीं लेकिन उस विरोध में भी सार्थकता थी। जैसे ‘जाने भी दो यारो’ ने जैसा राजनीतिक कटाक्ष किया वह अद्वितीय था। इतिहास की बात करें तो मेहताब की ‘झांसी की रानी’ (1953) अथवा हेमामालिनी अभिनीत ‘मीरा’ (1979) को सभी ने खुले दिल से स्वीकार किया। फिल्म ‘लेकिन’ और ‘रूदाली’ में उन दूषित व्यवस्थाओं को सामने रखा गया जिनके कारण राजस्थानी समाज में स्त्रियों को कष्ट सहने पड़ते थे। इन दोनों फिल्मों का किसी ने भी विरोध नहीं किया। क्योंकि भले ही यह समाज का काला पक्ष था लेकिन सच था। लेकिन ‘पद्मावती’ को विरोध का सामना करना पड़ रहा है। राजस्थानी राजपूत समाज का कहना है कि रानी पद्मावती को जिस प्रकार सबके सामने घूमर नृत्य करते हुए दिखाया गया है, वह उचित नहीं है साथ ही अपमानजनक है। यदि मध्यकालीन राजपूत समाज की परम्पराओं पर ध्यान दिया जाए तो यह सच है कि उस समय स्त्रियों में पर्दाप्रथा का कठोरता से पालन किया जाता था। इस प्रकार के नियम राजपरिवार की स्त्रियों पर भी लागू होते थे। ऐसे वातावरण में किसी रानी के द्वारा अपनी ससुराल में नृत्य किया जाना भला कैसे संभव हो सकता है? जबकि पीढ़ियों बाद राजस्थान की ही कृष्ण भक्त राजपूत रानी मीराबाई ने जब कृष्ण की भक्ति में झूमते हुए भजन गाए उस समय उन्हें ‘कुलनाशी’ कहा गया। मीरा ने स्वयं लिखा है- ‘‘लोग कहे मीरा बाबरी, सासु कहे कुलनासी री। विष रो प्यालो राणा भेज्या, पीवां मीरा हांसी री।।’’
विवाद को हवा देने वाले कुछ प्रतिष्ठित व्यक्तियों द्वारा यहां तक कहा जा रहा है कि रानी पद्मावती थी ही नहीं। इसे सिद्ध करने के लिए वे मलिक मोहम्मद जायसी के ‘पद्मावत’ का उदाहरण देते हैं और कहते हैं कि जायसी ने अपने काव्य में काल्पनिक पात्र को पिरोया है। किन्तु इस पद्मावती के द्वारा जौहर किए जाने के संदर्भ अन्य कई ग्रंथों में मिलते हैं। जौहर के बारे में अमीर खुसरों ने अपने ग्रन्थ “तारीख-ए-अलाई’ में लिखा है कि जब अलाउद्दीन ने 1301 ई. में रणथम्भौर पर आक्रमण किया व दुर्ग को बचाने का विकल्प न रहा तो दुर्ग का राजा अपने वीर योद्धाओं के साथ किले का द्वार खोलकर शत्रुदल पर टूट पड़ा। इसके पूर्व ही वहां की वीरांगनाएं सामूहिक रुप से अग्नि में कूदकर स्वाहा हो गईं।
उल्लेखनीय है कि कर्नल जेम्स टॉड द्वारा राजस्थान का विशद इतिहास लिखा गया है जो दो खण्डों में प्रकाशित है। कर्नल टॉड ने ‘राजस्थान का इतिहास’ में लिखा है कि सन 1275 ई. में चित्तौड़ के सिंहासन पर लक्ष्मण सिंह बैठा, राजा की अवस्था उस समय छोटी थी, इसलिए उसका संरक्षक राजा के चाचा भीमसिंह को बनाया गया। राजा भीमसिंह का विवाह उस समय की अद्वितीय सुंदरी रानी पद्मिनी के साथ हुआ था, रानी की सुंदरता का जब अलाउद्दीन खिलजी को पता चला तो उसने रानी को प्राप्त करने के लिए चित्तौड़ पर आक्रमण कर दिया। अलाउद्दीन ने राजा के पास एक संदेश भेजा कि यदि रानी पद्मिनी को उसे दर्पण में भी दिखा देगा तो भी वह इतने से ही प्रसन्न और संतुष्ट होकर दिल्ली लौट जाएगा। राजा ने प्रजाहित में अलाउद्दीन की यह शर्त स्वीकार कर ली। रानी की एक झलक दर्पण में से अलाउद्दीन को दिखा दिया गया। रानी को दर्पण में देखने के पश्चात उसे प्राप्त करने की इच्छा से अलाउद्दीन व्याकुल हो उठा। राणा को शिविर में कैद करके अलाउद्दीन ने किले के भीतर सूचना भिजवाई कि यदि राणा को जीवित देखना चाहते हो तो पद्मिनी को मुझको सौंप दो। यह असंभव शर्त थी। स्थिति की गंभीरता देखते हुए रानी ने अपने दो सेनापतियों गोरा और बादल के साथ योजना बनाई कि शर्त मानने का दिखावा किया जाएगा और रानी तथा उसकी सहेलियों की पालकियों में सशस्त्र राजपूत सैनिक शत्रुओं के पास जाएंगे। अवसर मिलते ही सैनिक राजा को अपनी पालकी में बैठाकर वहां से चल देंगे और पालकियों के भीतर छिपे सैनिक और कहारों के रूप में चल रहे योद्धा मिलकर शत्रुओं के प्रतिरोध का सामना करेंगे। भेद खुलते ही भीषण युद्ध हुआ और जब यह स्पष्ट हो गया कि किला अब शत्रुओं के हाथों में जा सकता है तो रानी पद्मिनी ने अनेक महिलाओं सहित जौहर कर लिया। कर्नल टॉड ने लिखा है कि -‘‘शिविर और सिंह द्वार पर जो कुछ हुआ, उसे देखकर अलाउद्दीन का साहस टूट गया। पद्मिनी को पाने के स्थान पर उसने जो कुछ पाया, उससे वह युद्ध को रोककर अपनी सेना के साथ दिल्ली की ओर रवाना हो गया।’’ आज भी चित्तौड़ के किले में वह कुण्ड मौजूद है जिसमें रानी पद्मावती ने जौहर किया था। राजपूत आज भी उन्हें सती माता के रूप में याद करते हैं।
जब किसी व्यक्ति से गहन संवेदनाएं जुड़ी हों तो उसके जीवन पर फिल्म बनाते समय सावधानियां जरूरी हो जाती हैं। फिर चित्तौड़ राजघराने के वंशज आज भी मौजूद हैं जिनसे विचार-विमर्श करना तथा पहली फिल्म स्क्रीनिंग में उन्हें शामिल करना आवश्यक था। यदि ऐसा किया गया होता तो विवाद बनने के पहले ही समस्या सुलझ गई होती।
दुख तो इस बात की है कि जावेद अख़्तर जैसे वरिष्ठ साहित्यकार रानी पद्मावती के अस्तित्व पर ऐसे अजीबोगरीब वक्तव्य दे रहे हैं। लखनऊ में एक न्यूज चैनल से बातचीत में जावेद ने कहा कि राजपूत-रजवाड़े अंग्रेजों से तो कभी लड़े नहीं और अब सड़कों पर उतर रहे हैं। ये जो राणा लोग हैं, महाराजे हैं, राजे हैं राजस्थान के, 200 साल तक अंग्रेज के दरबार में खड़े रहे पगड़ियां बांधकर, तब उनकी राजपूती कहां थी। ये तो राजा ही इसीलिए हैं, क्योंकि इन्होंने अंग्रेजों की गुलामी स्वीकार की थी।’’
इतना ही नहीं फिल्म के विरोध को लेकर जावेद अख़्तर बोले कि ’देश में सेंसर बोर्ड को ही बंद कर देना चाहिए’। उनका यह भी कहना है कि ’फिल्मों को इतिहास मत समझिए और इतिहास को भी फिल्म से मत समझिए।’ इस तरह के संवाद यदि किसी और के होते तो यह मानना पड़ता कि सस्ती लोकप्रियता के लिए आग में घी डालने का काम किया जा रहा है लेकिन जावेद अख़्तर तो स्वयं ही एक प्रसिद्ध व्यक्ति हैं अतः उन्हें तो कम से कम संयम से काम लेना चाहिए। उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि भारतीय इतिहास में महाकाव्यों का भी बहुत महत्व है और वे भी अतिशयोक्तियों को अलग करते हुए साक्ष्य के रूप में स्वीकार किए जाते हैं। 
यूं भी हिन्दी सिनेमा जिस दौर से गुज़र रहा है वह भी कम चिन्तनीय नहीं है। हिन्दी सिनेमा में हॉलीवुड फिल्मों की नकल के साथ ही दक्षिण भारतीय फिल्मों की नकल और रीमेक का चलन बढ़ गया है। ऐसे में मौलिक फिल्म बनाने वाले फिल्मकारों को हठ की नीति अपनाने के बजाए सावधानी रखते हुए फिल्में बनानी चाहिए। आखिर वे इतनी मेहनत आमजनता के लिए ही तो करते हैं फिर जन भावनाओं की अवहेलना क्यूं? विवाद की आंच को महसूस करते हुए कई राज्य सरकारों ने अपने राज्य में ‘पद्मावती’ के प्रदर्शन पर समस्या का समाधान होने तक के लिए रोक लगा दी है जिनमें राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश और पंजाब प्रमुख हैं। यही उचित क़दम है और इसी तरह के संयमित क़दम उठाते हुए बुद्धिजीवियों को भी भड़कावे वाले संवाद करने से परहेज करना चाहिए। यह शांतिव्यवस्था एवं पारस्परिक सौहार्द्य के लिए जरूरी है।  
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