Thursday, November 21, 2019

चर्चा प्लस .. महामना के बेदाग़ बीएचयू में न लगें भेदभाव के धब्बे - डाॅ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
चर्चा प्लस ..

महामना के बेदाग़ बीएचयू में न लगें भेदभाव के धब्बे

 
- डाॅ. शरद सिंह


महामना मदन मोहन मालवीय ने जब काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना का स्वप्न देखा और उस स्वप्न को पूरा करने का निश्चय किया तो उन्होंने जाति, धर्म, वैचारिक मतभेद सब को भूल कर आर्थिक सहायता जुटाने निकल पड़े। यहां तक कि हैदराबाद के निजाम से भी उन्होंने धनराशि निकलवा ली। यह अपने पवित्र लक्ष्य की ओर उनकी दृढ़ता थी जिसके सामने उनके लिए सब कुछ गौण था। आज उसी विश्वविद्यालय परिसर में जो घटनाएं घटती हैं वे सोचने पर मजबूर कर देती हैं। ऐसे समय याद आती है महामना की महानता।

Charcha Plus - चर्चा प्लस ... महामना के बेदाग़ बीएचयू में न लगें भेदभाव के धब्बे - डाॅ. शरद सिंह  -  Charcha Plus Column by Dr Sharad Singh
      14 नवम्बर, 2019 बीएचयू के राजीव गांधी दक्षिण परिसर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का झण्डा हटाए जाने के विवाद में देहात कोतवाली में धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के आरोप में डिप्टी चीफ प्रॉक्टर के खिलाफ मामला दर्ज किया गया। बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी के संस्कृत विभाग में नियुक्ति पहले मुस्लिम प्रोफेसर फिरोज खान को लेकर परिसर में धरना-प्रदर्शन हुआ। बीएचयू में संस्कृत विभाग में मुस्लिम प्रोफेसर की नियुक्ति पर प्रोफेसर फिरोज खान ने पूछा, मैं मुस्लिम हूं तो क्या संस्कृत सिखा नहीं सकता? फिरोज ने कहा, संस्कृत से मेरा खानदानी नाता है, दादा गाते थे हिंदुओं के भजन।
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना का मार्ग सरल नहीं था। इसके मार्ग में सबसे बड़ी बाधा थी आर्थिक व्यवस्था। मदन मोहन मालवीय बाधाओं से घबराने वाले व्यक्ति नहीं थे। वे जो ठान लेते थे, उसे पूरा करके रहते थे। विश्वविद्यालय के लिए वित्तीय व्यवस्था के सम्बन्ध में उन्होंने अपने साथियों को आश्वस्त किया कि वे किसी न किसी तरह से चंदे का जुगाड़ कर लेंगे। उन्होंने घोषणा की कि वे विश्वविद्यालय के लिए जहां भी दान मांगने जाएंगे, किसी भी मूल्य पर खाली हाथ नहीं लौटेंगे। यह एक बहुत बड़ी आश्वस्ति थी और उतनी ही बड़ी चुनौती भी थी।
अपने प्रण को पूरा करते हुए, पेशावर से लेकर कन्याकुमारी तक महामना मदन मोहन मालवीय ने चंदा एकत्र किया था, जो उस समय लगभग एक करोड़ 64 लाख रुपये हुआ था। काशी नरेश ने जमीन दी थी तो दरभंगा नरेश ने 25 लाख रुपये से सहायता की। महामना ने हैदराबाद के निजाम से निवेदन किया कि वे भी विश्वविद्यालय के लिए कुछ आर्थिक सहायता करें, किन्तु निजाम ने कहा कि इस विश्वविद्यालय के नाम से पहले ‘हिन्दू’ शब्द हटाओ फिर दान दूंगा। महामना ने मना कर दिया। तो निजाम ने भी दान देने से मना कर दिया। महामना ने निजाम को बताया कि वे जहां जाते हैं, वहां से दान लिए बिना नहीं लौटते हैं अतः जब तक वे दान नहीं देंगे, तब तक वे हैदराबाद में ही रहेंगे।

‘‘कुछ न कुछ तो आपको देना ही पड़ेगा।’’ पं. मालवीय ने निजाम से कहा।
‘‘ठीक है। आप जिद कर रहे हैं तो लीजिए, ये मेरी पुरानी जूतियां हैं, हिन्दू विश्वविद्यालय के लिए।’’ निजाम ने अपनी पुरानी जूतियों का एक जोड़ा महामना को देते हुए कहा।
यदि महामना के स्थान पर कोई और होता तो वह निजाम के इस दान पर बौखला उठता किन्तु महामना शांत रहे और उन्होंने जूतियों का जोड़ा सहर्ष स्वीकार कर लिया। महामना जूतियों का जोड़ा लेकर अपने विश्राम-स्थल पर पहुंचे। इसके बाद उसी दिन तीसरे पहर से उन्होंने हैदराबाद में मुनादी करा दी, ‘‘निजाम साहब ने हिन्दू विश्वविद्यालय के लिए अपनी जूतियां दान में दी हैं। उन जूतियों की नीलामी दूसरे दिन चार मीनार के पास की जाएगी। जो भी व्यक्ति जूती खरीदना चाहे, वह अधिक से अधिक बोली लगाकर निजाम साहब की जूतियों का मालिक बन सकता है।’’
मुनादी की सूचना निजाम तक पहुंची। यह बात उनके लिए अपमानजनक थी कि कोई व्यक्ति उनकी जूतियां उन्हीं के राज्य में धन के लिए नीलाम करे। उन्होंने तत्काल महामना मालवीय को बुलवाया। महामना जूतियां अपने ठहरने के स्थान पर छोड़कर निजाम के पास पहुंचे। निजाम ने महामना को उलाहना दिया कि वे उन्हीं के राज्य में उनकी जूती की नीलामी करके उनका अपमान करने जा रहे हैं। अच्छा होगा कि वे उसी समय हैदराबाद छोड़ कर चले जाएं।
इस पर महामना मालवीय ने शांत स्वर में कहा, ‘‘आपने जो जूतियां दी हैं, उनसे किसी भी प्रकार का निर्माण कार्य नहीं हो सकता है। जूतियों को नीलाम करके उससे मिलने वाली रकम ही निर्माण में सहायक हो सकती है। चूंकि आपकी जूतियों की सबसे अधिक बोली आपके राज्य में ही लग सकती है, अतः मैं जूतियों को यहीं नीलाम करने को विवश हूं।’’
‘‘मैं आपको ऐसा नहीं करने दूंगा। मैं आपको जेल में डाल दूंगा।’’ निजाम ने धमकी दी।
‘‘जैसी आपकी इच्छा। मैं तो वैसे भी दान की रकम लिए बिना वापस नहीं जा सकता हूं।’’ महामना ने उत्तर दिया।
इससे निजाम का क्रोध बढ़ गया और उसने महामना को बंदी बना कर जेल में डाल देने का आदेश दे दिया। महामना को बंदी बनाया जाता कि इसके पहले निजाम के प्रधानमंत्राी ने निजाम को समझाया, ‘‘आप अपना आदेश वापस ले लीजिए। यदि यहां हैदराबाद में महामना को बंदी बनाया गया तो इंडियन नेशनल कांग्रेस से लेकर अंग्रेज सरकार तथा समूचा उत्तर भारत नाराज़ हो जाएगा। यदि वायसराय नाराज़ हो गए तो हैदराबाद की सत्ता खतरे में पड़ जाएगी।’’
प्रधानमंत्री के समझाने पर निजाम को अपनी भूल का अनुभव हुआ। निजाम ने बंदी बनाने का आदेश तो रद्द कर दिया किन्तु महामना से क्षमा भी नहीं मांगना चाहता था। तब महामना मालवीय ने प्रधानमंत्राी से मिलकर निजाम को रास्ता सुझाया क्योंकि महामना का उद्देश्य विश्वविद्यालय के लिए दान की राशि पाना था, निजाम का अपमान करना नहीं। महामना ने सुझाव दिया कि विश्वविद्यालय में छात्रावास तो बन चुके हैं किन्तु अध्यापकों के रहने के लिए घर बनने अभी शेष हैं। यदि निजाम अध्यापकों के लिए घर बनाने के लिए दान की राशि प्रदान कर दे तो उस काॅलोनी का नाम निजाम के नाम पर ‘निजाम हैदराबाद काॅलोनी’ रखा जाएगा। इससे निजाम का यश बढ़ेगा और विश्वविद्यालय को भी सहायता मिल जाएगी, साथ ही जूतियों की नीलामी भी नहीं करनी पड़ेगी।
महामना की इस चतुराई के समक्ष निजाम ने घुटने टेक दिए। उसने अध्यापकों के निवास के लिए रकम दान में दे दी। इस प्रकार हिन्दू विश्वविद्यालय के परिसर में ‘निजाम हैदराबाद काॅलोनी’ का निर्माण हुआ। शिक्षा केन्द्र की स्थापना का पवित्र लक्ष्य की ओर उनकी दृढ़ता थी जिसके सामने उनके लिए सब कुछ गौण था। आज उसी विश्वविद्यालय परिसर में जो घटनाएं घटती हैं वे सोचने पर मजबूर कर देती हैं। ऐसे समय याद आती है महामना की महानता।
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(दैनिक ‘सागर दिनकर’, 20.11. 2019)
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