Saturday, January 31, 2026

टॉपिक एक्सपर्ट | रहिमन छिड़ियां राखिए, बिन छिड़ियां सब सून | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | पत्रिका | बुंदेली कॉलम

टाॅपिक एक्सपर्ट
रहिमन छिड़ियां राखिए, बिन छिड़ियां सब सूनन
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
जिनगी में छिड़ियां भौतई जरूरी आए। जो छिड़ियां ने होंए तो तरक्की नईं करी जा सकत। कओ जात आए के मेनत की छिड़ियां से आदमी कऊं के कऊं पौंच सकत आए। मनो जे किताबी बातन से ज्यादा प्रैक्टिकल वारी बातन पे आ जाओ चाइए। काए से हमाओ आज लौं तक को एक्सपियरेंस जो रओ के चाए कित्तौ छिड़ियां चढ़ जाओ, चाए कित्तई तरक्की कर लेओ, मनो जो घरे एक ठइयां छिड़ियां ने होए तो आप अपने छत को पंखा ठीक नईं करा सकत औ ने ट्यूब लाईट बदरवा सकत। जो हमाई कई झूठी लगे तो तनक बा टेम याद कर लइयो जबें आपने पंखा या एसी सुधरवाबे खों, नें तो छत पे लगो बलब बदरवावे खों कोनऊं मिस्त्री भैया खों बुलाओ होए औ ऊने आतई संगे सबसे पैले जेई ने पूछो होए के छिड़ियां कां धरी? मनो हर घर में छिड़ियां भओ चाइए। औ अपनी मजबूरी के अपन मों खोल के नईं कै सकत के भैया छिड़ियां संगे लाने रई। आपखों पता हती के ऊपरे चढ़ने पड़हे। बाकी होत का आए के अपन पड़ोसियन के इते भगत फिरत आएं छिड़ियां की भिखमंगी करबे के लाने। बरयाबर के एकाद के इते मिलत आए। सो पैले ऊकी बड़ियाई सुनो, फेर छिड़ियां उठवा के अपने घरे ल्याओ तो मिस्त्री भैया की कई सुनो के “ज्यों लौं छिड़ियां आई उत्ते टेम में तो पूरो काम हो गओ होतो, हमें अबे मुतकी जांगा जाने।”
     अब जे ने बोल पाऊंत आएं के भैया जू मिस्त्री आप आओ के हम? छिड़ियां आपखों रखो चाइए के हमें? सो, हर दइयां ऊ टेम पे जेई सोचत आएं के एक छिड़ियां ले लई जाए। फेर लगत आए के कोन रोज लगत आए? कां राखबी? वईं जब मिस्त्री भैया आके ठेन करत आएं तो रहीम जू से माफी संगे जोई लगत आए के - ‘रहिमन छिड़ियां राखिए, बिन छिड़ियां सब सून।’
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Thank you Patrika 🙏
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Thursday, January 29, 2026

बतकाव बिन्ना की | भैया हरों, ऊपर वारे से डरो तनक | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बतकाव बिन्ना की | भैया हरों, ऊपर वारे से डरो तनक | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम
बतकाव बिन्ना की  
 भैया हरों, ऊपर वारे से डरो तनक
  - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

आज मोरो मूड भौतई खराब चल रओ। सो आज कोनऊं के संगे बतकाव करे को जी नई चा रओ। अब आप आरें पूछहो के काय भैयाजी के संगे बी बतकाव नई करने? 
हऔ उनके संगे बी नई करने। बाकी आप ओरें चाओ तो आप ओरन के संगे डायरेक्ट बतकाव कर लई जाए। काए से के जोन के कारन मेरो जी दुखा रओ ऊपे कोनऊं से कोऊं डिबेट नई करने मोए। ई टाॅपिक को पक्ष तो हो सकत आए मनो विपक्ष हरगिज नइयां। जो ईपे उल्टो बोले, मैं तो ऊको इंसान को दुस्मन कऊं। मनो, भैयाजी औ भौजी बी कभऊं ईके बारे मे उल्टो ने बोलहें, मोए पतो आए। 
‘‘का बर्राया रईं बिन्ना? कल संकारे से तुमने अपनी सकल ने दिखाई। हमें लगो के तुम कछू पढ़बे, लिखबे में लगी हुइयो। फेर पूरो दिन कढ़ गओ, तुमाओ पतो ने परो। संझा लौं ने आईं। आज बी संकारे से तुमाई बाट देखत देखत हम ओरे थक गए, सो तुमाई भौजी ने कई के जा के देखो के बिन्ना काय ने आईं? काय का हो गओ? बे ने आईं, ने फोन करो। ने सोसल मिडिया पे कोनऊं पोस्ट डारी। हमें फिकर सी होन लगी। सब ठीक तो आए ना?’’ भैयाजी मोरे घर में घुसत साथ गोलियन से सवाल दागन लगे।
‘‘कछू नईं, सब ठीक आए।’’ मैंने कई। मैं समझ गई के अब आप ओरन से सूदी बात ने हो सकहे, काय से के भैयाजी बतकाव करे बिगैर ने जाहें।
‘‘का सोचन लगीं? का हो गओ?’’ भैयाजी बोले। फेर बोले, ‘‘देखों बिन्ना, कभऊं खुद को अकेली ने समझियो। हम ओरें आएं ने तुमाए लाने। औ सई कई जाए तो हम ओरन को बी जी तुमई से लगो रैत आए। तुमसे दो बतकाव कर लेओ तो जी सो हल्को हो जात आए।’’ 
‘‘आप ओरन की कोनऊं बात नोंई।’’ मैंने कई।
‘‘सो का बात हो गई?’’ भैयाजी ने फेर के पूछी।
‘‘भैयाजी, जा सोच के जी दुखात आए के आजकाल लोग कित्ते पथरा घांईं भए जा रए।’’ मैंने कई।
‘‘सो तो आए, पर भओ का?’’ भैयाजी ने पूछी।
‘‘आपने सोई पढ़ो हुइए। बाकी ऊकी वीडियो क्लिप सोई एक ने मोए फार्वड करी। बा देख के ऐसो लगो के जे अपनो देस को सीन आए के कोनऊं औ देस को? इत्ते निठुर तो कभऊं नईं रए अपने इते।’’ मैंने कई।
‘‘कोन की बात कर रईं?’’ भैयाजी ने पूछी।
‘‘बा ऊ गरीब गुरबा की। जोन अपने ई सागर में ई अपनी बेमार लुगाई खों हाथ ठेला पे ले के अस्पतालें जाने के लाने सड़कन पे भगत रओ औ संगे मदद के लाने गुहार बी लगात रओ। कइयों ने ऊकी ई दसा की रीलें बनाईं मनो ऊकी मदद करबे की ने सोची। जेई-जेई में ऊकी लुगाई रस्ता में ई चल बसी। ऊ गरीब खाों तो कछु समझ ने पर रई हती के बा का करे? बा तो जा ठीक रओ के ऐ पार्षद जू खों खबर लगी औ बे तुरतईं ऊके लिंगे पौंचे औ उन्ने ऊ आदमी खों सम्हारो। संगे ऊकी लुगाई को किरया-करम बी कराओ। ने तो जोन के पास लुगाई खों आटो से अस्पतालें ले जाबे को पइसा ने हते, बा अपनी लुगाई को किरया-करम कां से करतो?’’ मैंने भैयाजी खों बताई।
‘‘अरे, जे हमें खबर ने लगी? हमाए इते बी तो एक अखबार आऊत आए मनो ऊमें जे खबर ने हती।’’ भैयाजी अचरज करत भए बोले।
‘‘नईं कछू अखबार वालन ने तो जा खबर छापी रई औ एक के तो संपादक जू ने स्पेसल संपादकीय सोई लिखी रई। उन्ने तो नेता हरों खों धिक्कारो बी रओ के फीता काटबे औ फोटू खिचाबे से फुरसत होय तो उने पता परे के उनके शहर में का हो रओ औ का दसा आए। पर आप सई कए रए, कछू ने ई खबर को ढापो बी नईं, काय से खबर छापबे के लाने ऊ गरीब से पइसा थोड़े मिलने हते।’’ मैंने कई।
‘‘हऔ, चाए नेता होएं चाए बड़े अधिकारी होंए, सबकी एकई दसा आए। नेता हरों खों अपनी जयकारे लगवाबे से फुरसत नइयां औ अधिकारियां खों नेताओं के आंगू-पीछूं दुम हिलाबे से फूरसत नइयां। काय से उने पतो आए के नेता खुस रैहें तो उने मलाई खाबे वारी सीट मिलहे ने तो कऊं लूप लाइन में बिसुरत परो रैने परहे। बाकी जे जो घटी घटना तुम बता रईं, जे कोनऊं आज को भर घटो नईं कहो जा सकत। काए से के तुमने सायद ने देखी हुइए, मनो हमने एक फिलम देखी हती ऊमें जां तेक दिलीप कुमार रओ जो अपनी लुगाई खों अस्पतालें ले जाबे को फड़फड़ात रैत आए, पर कोनऊं ऊकी मदद नई करत। ऊपे से सड़क पे लगो जाम बी नईं खुलत। सो ऐसी बुरई दसा पैले बी होत रई, बाकी बा पैले बड़े शहरन में होत्ती औ अब सागर जैसे छोटे शहरन में होन लगी।’’ भैयाजी बोले।
‘‘जा तो सई कई आपने भैयाजी, बाकी अपनी पब्लिक बी कोनऊं कम नोईं। जीको पेट भरो कहानों ऊको कोनऊं की फिकर नोईं। दूसरो चाए जिए के मरे। ऊको जे नई लगत के जोन ऊ गरीब पे गुजरी, कभऊं कोनऊं टाईप से उनपे सोई गुजर सकत आए। उने तो रील बनाबे से फुरसत नोईं। मोए तो ऐसी रील बनाबे वारों से नफरत सी होन लगी। कोनऊं की लाचारी खों देख के ऊकी मदद करबे के जांगा अपनो लाईक, कमेंट बटोरबे के लाने मरे जा रए। का कई जाए ऐसे लोगन खों।’’ मैंने कई। मोरो जी कर रओ तो के उन ओरन खों दुनिया भरे की गारियां दे डारी जाए।
‘‘जा तो सई आए बिन्ना। कभऊं-कभऊं हम देखत आएं ने के एक मरो सो मोड़ा खों पचासेक लोग मार रए, कूट रए औ ऊको बचाबे के बदले बा पूरे सीन की रीलें बना के सोसल मिडिया पे डारी जा रई। कछू कांड तो जेई के लाने होत रैत आएं।’’ भैयाजी बोले।
‘‘हऔ भैयाजी! बड़े बुरए दिन आ गए। पैले तो सबरे एक-दूसरे की मदद के लाने ठाड़े रैत्ते, अब तो उने मोबाईल से फुर्सत नोंईं। बे बोई की सबरी बातन खों सच मान के चलत रैत आएं।’’ मैंने कई।
‘‘अरे, अब हम तुमें का बताएं। पर की साल हमाएं संगे भौत बड़ो वारो मजाक सो हो गओै रऔ।’’ भैयाजी बोले।
‘‘का हो गओ रओ?’’ मैंने पूछी।
‘‘का भओ के पर की साल जब हमें मलेरिया भओ रओ सो हम बिस्तरा पे डरे-डरे अपनी पुरानी फोटुअन खों अपने सोसल मिडिया पे डारत रैत्ते। हमाए एक दोस्त ऊपे कमेंट करत रैत्ते। जब हम ठीक हो गए औ एक दिन बजरिया गए तो उते हमाए बेई दोस्त हमें मिले। हमने ऊसे कई के काय, हम इत्ते बिमार रए औ तुम हमें देखबे, मिलबे लौं नईं आए? सो ऊने कई के तुम कां बिमार रए? तुम तो इते उते फिर रए हते और अपनी फोटू खींच-खींच के उार रए हते। हमें काय बना रए? ऊकी बात सुन के हमें भौतई गुस्सा आई। हमने ऊसे कई के तुमाई नास पिटे, हम इत्ते बिमार रए, तब तो तुमसे बनो नईं के हमें आ के देख लेते। औ रई बा फोटुअन की सो हम तो बा पुरानी फोटुएं टाईम पास के लाने पोस्ट करत रए। सोसल मीडिया पे देख के जो तुम चलहो तो फेर तो हो गई दुनियादारी। ऊंसे बायरे निकर के सांची की दुनिया सोई देख लओ करो। मनो ऊपे डरी फोटू देख के ऊने मान लओ के हमाए संगे सब ठीक आए। मनो जो हम बिमार परें सो हमें बीमारी की हालत की फोटू डार के मुनादी कराओ चाहिए के हम बीमार आएं। तब उने लगहे के ईके लाने ‘गेटवैल सून’ को एक ठइयां कमेंट डार देओ। सो, जे तो दसा होत जा रईै।’’ भैयाजी ने कई।
‘‘जेई तो मैं सोच रई भैयाजी के लोग कित्ती स्वारथपना में जी रए। दूसरन की फिकर कोनऊं खों नइयां। बा तो कओ के सौ में दस जने ऊ पार्षद घाईं अबे बी आएं, ने तो जाने का हुइए ई समाज को। माए तो जेई जी करत आए के ऐसे लोगन से कओं के भैया हरों, ऊपर वारे से डराओ तनक!’’ मैंने कई।
‘‘हऔ!’’ भैयाजी ने हामी में मुंडी हलाई।          
मनो बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की। जे जरूर सोच के सोचियों के जे दसा हमें कां लौं ले जाहे? 
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बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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Wednesday, January 28, 2026

चर्चा प्लस | अपराध की पहली सीढ़ी घर से ही शुरू होती है | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर

चर्चा प्लस  
अपराध की पहली सीढ़ी घर से ही शुरू होती है 
- डाॅ (सुश्री) शरद सिंह                                                                                      
     समाज में अपराध कब नहीं थे? हमेशा थे। किन्तु अब दिनों-दिन अपराध की जघन्यता बढ़ती जा रही है। कोई इंटरनेट को दोष देता है तो कोई पहनावे को, तो कोई वर्तमान वातावरण और संगत को। क्या अतीत में पहनावों में परिवर्तन नहीं हुए? या फिर आपसी संपर्क नहीं रहा? अतीत तो युद्धों के भयावह वातावरण से ग्रस्त था। बलशाली अतीत में भी अपराध करते थे क्योंकि उन्हें लगता था कि वे अपराध कर के बच जाएंगे। बलशाली आज भी अपराध करते हैं और लंबे समय तक बचे भी रहते हैं। लेकिन जो चिंताजनक अंतर आया है वह ये कि अब मध्यम और निम्न मध्यमवर्ग में भी अपराधी मानसिकता जड़ें जमाती जा रही है। सच्चाई यही है कि अपराधी मानसिकता घर से ही शुरू होती है।    
एक भीली लोककथा है- एक युवक था जोे राजा के महल में चोरी करने घुसा और पहरेदारों द्वारा बंदी बना लिया गया। न्यायाधीश ने इसे जघन्य अपराध माना। उसने कहा कि जो युवक राजा के महल में चोरी कर सकता है, वह कोई भी बड़ा अपराध कर सकता है, इसलिए इसे सार्वजनिक स्थल पर मृत्युदंड दिया जाए। इससे अन्य अपराधियों को भी सबक मिलेगा। नगर के चैक पर उस युवक को फांसी की सजा दी जानी थी। तयशुदा दिन उसे चैक पर लाया गया। उस युवक की मां का रो-रो कर बुरा हाल था। वह युवक अपनी मां की इकलौती संतान था। युवक के मरने के बाद मां अकेली रह जाने वाली थी। मां ने न्यायाधीश के पैर पकड़े लेकिन न्यायाधीश टस से मस न हुआ। तब वह रोती हुई अपने बेटे को अंतिम बार देखने उसके निकट पहुंची। मां ने दहाड़ें मारते हुए कहा,‘‘बेटा मैं तुम्हें बचा नहीं पा रही हूं। मुझे माफ कर दो।’’
मां की बात सुन कर युवक ने कहा,‘‘हां मां, तुम मुझे बचा नहीं पा रही हो। यदि तुमने मुझे उस दिन एक झापड़ लगा कर रोक दिया होता जिस दिन मैंने पहली चोरी की थी, तो आज मुझे इस तरह मरना नहीं पड़ता।’’ 
बेटे की बात सुन कर मां अवाक रह गई। वह अपने बेटे की ओर ताकने लगी।
‘‘मां, मैं सच कह रहा हूं। जब मैं मिठाई की दूकान से एक लड्डू चुरा कर लाया था तब तुमने मुझे डांटने के बजाए मेरी पीठ ठोंक कर शाबाशी दी थी। इसके बाद मेरा साहस बढ़ता गया और तुम्हारी शाबाशियां भी बढ़ती गईं। मैं चोरियां करता रहा और तुम मुझे बचाती रहीं। इसी का परिणाम हुआ कि मेरा साहस इतना बढ़ गया कि मैं राजमहल में चोरी करने पहुंच गया। जो आज तुम मुझे बचा नहीं पा रही हो तो अब इसमें रोना कैसा, क्योंकि बचाने वाला समय तो वर्षों पहले निकल गया है।’’
मां को बेटे की बात सुन कर अपनी गलती का अहसास हुआ। लेकिन अब उस गलती को सुधारा नहीं जा सकता था। अब उसे अपने बेटे के बिना जीना था और वह भी एक गहरे पछतावे के साथ। 
यह तो है एक सीधी-सादी आदिवासी लोककथा लेकिन इसमें जो संदेश मौजूद है वह आज के उन माता-पिता को भी सबक देता है जो अपने बच्चों की ढिठाई को अनदेखा करते रहते हैं। कल और आज में अंतर बहुत तगड़ा है। कल यानी विगत में बच्चे अपने माता-पिता और अभिभावक का कहना मानते थे। उन्हें पलट कर जवाब नहीं देते थे। बेज़ा ज़िद नहीं करते थे। अपनी बात मनवाने के लिए घर के सामानों की तोड़-फोड़ नहीं करते थे। मगर अब ये सारे विघ्वंसक लक्षण 70 से 80 प्रतिशत बच्चों में देखे जा सकते हैं। गोद में पल रहा शिशु नहीं जानता कि मोबाईल क्या है? किन्तु एक रोशनी चाली चमकती हुई वस्तु के प्रति उसका सहज आकर्षण उसे मोबाइल पाने के लिए उकसाता है। माता-पिता यह देख कर निहाल हो जाते हैं कि उनका अबोध शिशु अभी से मोबाइल मांग रहा है। वे उसे मोबाइल पकड़ा देते हैं। वहीं शिशु जब थोड़ा बड़ा होता है तो उसे लगता है कि वह जिद कर के अपनी मनचाही वस्तु पा सकता है। वह उसमें सफल भी हो जाता है। उसके भीतर एक ज़िद और ढिठाई पनपने लगती है। 
कुछ समय पहले मेरे घर मेरे एक परिचित अपने बेटे की दो संतानों यानी अपने पोेते-पोती को ले कर आए। दोनों बच्चे बहुत छोटे थे। पोता तीन साल का रहा होगा तो पोती पांच साल की। वे लोग आ कर ड्राइंगरूम में बैठे। मैंने मुस्कुरा कर पड़े प्यार से दोनों बच्चों से उनके नाम पूछे। मेरा इतना पूछना ही मुझ पर भारी पड़ गया। मुझे खुद से बात करता पा कर वे दोनों बच्चे दूसरे ही पल बेख़ौफ़ हो गए और मेरे घर के ड्राइंगरूम की और नास्ते की जो दुर्दशा उन्होंने की, वह शब्दातीत है। उनके जाने के बाद उनके लिए एक ही विशेषण मेरे दिमाग में आया, वह था ‘‘सुनामी’’। मैंने सोचा कि उन दोनों नासमझ बच्चों के इस तरह उद्दंड होने के पीछे क्या कारण हो सकता है? तो सबसे पहले मुझे उनके माता-पिता ही दोषी नज़र आए। इसी के साथ मुझे अपना बचपन भी याद आया। मेरी मां ने मुझे और मेरी दीदी को हमेशा समझाया कि दूसरे के घर जा कर शांत बैठना चाहिए। बिना पूछे दूसरे के सामानों को हाथ नहीं लगाना चाहिए। जब तक मैं इशारा न करूं तब तक नास्ते की प्लेट की ओर हाथ भी नहीं बढ़ाना। ये सारे सबक हम दोनों बहनों ने गांठ बांध रखे थे। जब दूसरे लोग हमारे व्यवहार को देख कर मां से कहते कि ‘‘आप की बच्चियां कितनी सुशील हैं, शांत हैं।’’ तो मां ही नहीं, हम लोग भी खुशी से भर जाते। इस तरह हमें लगभग अबोध अवस्था से ही प्रशंसा पाने वाले व्यवहार करने की आदत डाली गई। 
पर आज स्थितियां बिलकुल उलट हैं। मेरी एक युवा परिचित अपने बेटे की तारीफ करते हुए कहा करती है कि ‘‘इसके हाथ से तो कोई चीज सही-सलामत बचती ही नहीं है। नया से नया खिलौना चार दिन में तोड़-ताड़ कर एक कोने में फेंक देता है। मेरा जिद्दी बच्चा!’’ उसका यह लाड़ भरा स्वर अनजाने में उसके बेटे को और जिद्दी बनाता जा रहा है। वह जान गया है कि वह तोड़-फोड़ कर के नई चीजें हासिल कर सकता है। 
बच्चे तो घर की फुलवारी के वे खूबसूरत फूल होते हैं जिन्हें अच्छाई के खाद-पानी से पालना-पोसना जरूरी है। आज अवयस्क अपराध की दर आश्चर्यजनक रूप से बढ़ रही है। क्या यह भयावह नहीं है कि अवयस्क चार स्कूली बच्चे अपने से छोटी क्लास में पढने वाली एक नन्हीं बच्ची के साथ अनैतिक कार्य करते हैं और फिर उसे मार कर नहर में फेंक देते हैं। यह रोंगटे खड़े कर देने वाली घटना कोई आम घटना नहीं है लेकिन इससे मिलती-जुलती घटनाएं अब प्रकाश में आने लगी हैं जब नाबालिग युवकों ने नाबालिग बच्चे या बच्ची के साथ अनैतिक कार्य किया। मामले की तह में जाने पर हर बार यही कारण सामने आया कि वे अवयस्क अपराधी इंटरनेट पर आपत्तिजनक दृश्य देख कर अपराध के लिए प्रेरित हुए। अब सोचने की बात है कि वे नाबालिग अपराधी मोबाइल या इंटरनेट साथ ले कर तो पैदा नहीं हुए होंगे। माता-पिता ने ही वह सुविधा उन्हें उपलब्ध कराई होगी। यह कह कर माता-पिता अपनी जिम्मेदारी से नहीं मुकर सकते हैं कि वे नहीं जानते थे कि उनके बच्चे इंटरनेट पर क्या देख रहे हैं? यदि माता-पिता बच्चों को मोबाइल सौंप रहे हैं तो यह उनकी ड्यूटी है कि वे इस बात का ध्यान रखें कि बच्चे किन साईट्स पर सर्फिंग कर रहे हैं। बच्चों को अच्छी और बुरी साईट्स के बारे में खुल कर समझाएं। बच्चों के दोस्त बन कर उनकी माॅनीटरिंग करें। क्योंकि जो बुराई बचपन में बच्चों के दिमाग में घर कर लेती है, उनके बड़े होने के साथ वह भीतर ही भीतर बढ़ती जाती है। पहली चोरी या पहली गलत हरकत पर ही उन्हें टोंकना और डांटना ज़रूरी है, अन्यथा सिर से पानी गुज़रने के बाद कुछ नहीं किया जा सकता है। 
अपराध मनोविज्ञानी अपराध के मुख्य कारण मानते हैं- भावनात्मक अस्थिरता, हीनता की भावना तथा पारिवारिक वातावरण। चाहे कुण्ठा हो, हीन भावना हो अथवा उग्रता हो, अधिकतर मनोविज्ञानी यही मानते हैं कि यह प्रवृतियां हर मनुष्य के भीतर पाई जाती हैं। जिस मनुष्य में ये प्रवृतियां जितनी अधिक प्रभावी रहती हैं, वह उतने बड़े अपराध करता है। 
सन् 1991 में एन्थोनी हाॅपकिंस अभिनीत हाॅलीवुड की एक फिल्म आई थी जिसका नाम था ‘‘द साइलेंस आफॅ द लैंब्स’’। यह फिल्म लेखक थाॅमस हैरिस के उपन्यास ‘‘द साइलेंस आफॅ द लैंब्स’’ पर आधारित थी। इस फिल्म को पूरी दुनिया में बड़ी सराहना मिली तथा इसे प्रमुख पांच श्रेणियों के लिए अकादमी अवार्ड दिया गया।  अपराधकथा पर आधारित फिल्मों में इसे सबसे प्रभावशाली फिल्म मना गया। एन्थोनी हाॅपकिंस ने इस फिल्म में एक पूर्व मनोचिकित्सक एवं नरभक्षी अपराधी डाॅ. हैनिबल लैक्टर की भूमिका निभाई थी। एफबीआई का एक प्रशिक्षु अधिकारी एक अन्य सीरियल किलर को पकड़ने के लिए डाॅ. हैनिबल लैक्टर से लगातार बातचीत करता है ताकि वह सीरियल किलर की मानसिकता को भांप कर उसके अगले कदम का पता लगा सके तथा उसे अगला अपराध करने से रोक सके। यह माना जाता है कि थाॅमस हैरिस का उपन्यास ‘‘द साइलेंस आफॅ द लैंब्स’’ अमरीकी इतिहास के दो सबसे कुख्यात सीरियल किलर से प्रभावित था जिनमें से एक था थियोडोर टेड बंडी। दूसरा था डाॅ. अल्फ्रेडो बल्ली ट्रविनो। इस फिल्म में यही बताया गया था कि जब अपराधी मानसिकता जटिल हो जाती है तो उसे सामान्य सोच वाला व्यक्ति समझ नहीं पाता है। यह मानसिक जटिलता विशेष परिस्थितियों में पनपती है और विशेष माहौल में ही बढ़ती है। इसलिए बेहतर है कि बचपन से ही बच्चों को एक ऐसा स्वस्थ माहौल दिया जाए जिसमें वे दूसरे को दुख, कष्ट अथवा हानि पहुंचाने के बारे में कभी न सोचें। यह परिवार और समाज के ऊपर है कि वह अपराधयुक्त वातावरण चाहता है अथवा अपराध मुक्त वातावरण। अच्छे बच्चे भी इसी समाज में रहते हैं और बुरे बच्चे भी। अच्छे बच्चे बड़े हो कर अच्छे नागरिक बनते हैं और बुरे बच्चे बड़े हो कर बड़े अपराधी बन जाते हैं।
अवयस्क अपराधियों के लिए जुवेनाईल कोर्ट होता है तथा उन्हें सजा भुगतने के लिए बाल सुधारगृह भेजा जाता है। लेकिन यदि परिवार में ही बच्चों पर ध्यान दिया जाए तो उनके बाल अपराधी बनने की नौबत ही न आए। आजकल यह नौबत इसलिए भी आने लगी है क्योंकि माता-पिता दोनों कामकाजी होते हैं। परिवार विकेन्द्रित होता है। आया अथवा केयरटेकर के जिम्मे बच्चों की परवरिश होती है। एक आया को उतने अधिकार नहीं रहते हैं जितने एक मां, दादा या नानी को होते हैं। या फिर एक पिता, दादा या नाना को अधिकार होते हैं। संयुक्त परिवार में बच्चों को एक अनुशासित माहौल अपने-आप मिल जाता है जबकि एकल परिवार में बच्चों को अनुशासित रखने माता-पिता का दायित्व बढ़ जाता है। कुछ परेंट्स तो इस दायित्व को साध लेते हैं किन्तु अधिकांश लापरवाह होते चले जाते हैं। उन्हें पता ही नहीं चल पाता है कि उनकी संतान अपराध की ओर कब मुड़ गई। 
आज जब अपराध चारो ओर से बच्चों को अपने शिकंजे में कसने को तैयार बैठा है ऐसे में माता-पिता, अभिभावकों एवं शिक्षकों को भी चौकन्ना रहना जरूरी है। उनका चौकन्नापन बच्चे को अपराध से दूर रख सकता है। मनोविज्ञानी कहते हैं कि बच्चों की छोटी-छोटी गलतियों पर भी ध्यान दें। यदि वे बार-बार उस गलती को दोहरा रहे हैं तो उन्हें अनदेखा कर के प्रोत्साहित न करें, बल्कि उन्हें सही रास्ता दिखाएं। भले ही इसके लिए उन्हें कड़ाई से डांटना ही क्यों न पड़े। आज की एक डांट उन्हें कल के बड़े अपराध से बचा सकती है।                
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(दैनिक, सागर दिनकर में 28.01.2026 को प्रकाशित)  
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Sunday, January 25, 2026

शून्यकाल | हमारा भी दायित्व है अपने गणतंत्र के अनुरूप बनना | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नयादौर

शून्यकाल
हमारा भी दायित्व है अपने गणतंत्र के अनुरूप बनना
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
       .हम भारत के लोग...’ हमने अपनी आकांक्षाओं, आशाओं एवं विश्वास के साथ संविधान की संरचना को स्वीकार किया और सच्चे गणतंत्र की राह में आगे बढ़ने की शपथ ली। हमने तो हमेशा अपने गणतंत्र से अनेकानेक आशाएं रखीं लेकिन क्या कभी सोचा कि हमने उन आशाओं का क्या किया जो हमारे गणतंत्र को हमसे रही होंगी? क्या हम गणतंत्र की आशाओं पर खरे उतरे हैं या फिर हमने अपने गणतंत्र को अपना निजीतंत्र बनाते जा रहे हैं। अपनी वैश्विक छवि के साथ-साथ सबसे नीचे की पंक्ति के नागरिकों के जीवन-स्तर को ध्यान में रखते हुए इस संदर्भ में कभी-कभी हमे आत्मावलोकन भी करना चाहिए।
    
    एक लम्बी परतंत्रता के बाद स्वतंत्रता किसी भी कीमत पर मिले स्वीकार्य थी। कीमत भी हमने चुकाई। भारतीय भू-भाग का बंटवारा हुआ। अमानवीयता का तांडव देखना पड़ा। उसके बाद ग़रीबी, बदहाली, शरणार्थियों का सैलाब, बेरोज़गारी और सांप्रदायिक तनाव ने स्वतंत्रता की खुशी को कई-कई बार हताहत किया। फिर भी स्वतंत्रता विजयी रही और हमने अपना संविधान गढ़ा तथा उसे स्वयं पर लागू किया। इसके  पहले संविधान सभा के सामने चुनौती थी कि नए गणतंत्र का निर्माण ऐसे हो कि देश में फैली भाषाई, धार्मिक, जातीय, सांस्कृतिक विविधता को आत्मसात किया जा सके और लोगों को सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक दृष्टि से न्याय सुनिश्चित किया जा सके। एक ऐसा गणतंत्र जिसमें नागरिकों को बराबरी का दजर्र मिले। जिसमें शासन की शक्ति किसी एक राजा अथवा अधिनायक के पास न हो कर जनता और उसके चुने प्रतिनिधियों के हाथ में हो।

      गणतंत्र के साथ सुनहरी आशाएं जागीं। देश तरक्की करेगा तो हम भी तरक्की करेंगे। या फिर इसके उलट कि हम तरक्की करेंगे तो देश भी तरक्की करेगा। लेकिन इस ‘हम भारत के लोग’ में से ‘हम’ पर ‘मैं’ का प्रभाव बढ़ता गया और ‘मैं’ ने ‘हम’ को निर्बल बना दिया। कभी-कभी उन्मादी भी। हमने अपनी परम्पराओं को सहेजा संवारा और उनसे सबक लिया। समयानुसार सड़ी-गली परम्पराओं को काट कर फेंका भी लेकिन उन्माद की अवस्था में पहुंचते ही हम सत्य, अहिंसा और परमार्थ के समीकरण को भुला कर हिंसक व्यवहार करने लगते हैं। जीव मात्र के प्रति उदार विचार की परम्परा के पोषक हम यदि जलीकट्टू का समर्थन करने लगते हैं तो वहीं हमारा ‘अहिंसा परमोधर्म’ का आह्वान टूटने लगता है। हमने अपने संविधान में अहिंसा को र्प्याप्त जगह दी है। परमोधर्म को भी उच्च स्थान दिया है फिर हिंसा को अपनी गौरवमयी परम्परा कहते हुए संविधान की धाराओं को कैसे सुरक्षित रख सकते हैं?

    9 दिसम्बर 1946 को हुई संविधान सभा की पहली बैठक में विभिन्न जातियों, धर्मों, आर्थिक, राजनीतिक विचारों के लोग शामिल थे और सामाजिक आधार को फैलाने की कोशिश की गई थी ताकि भारत अपने आप में जिस तरह से अद्वितीय विविधता को समेटे है उसी के अनुरूप नए गणतंत्र का निर्माण हो सके। भारतीय संविधान में नैतिकता और राजनीतिक परिपक्वता को आधार बनाया गया। लेकिन समूचे देश में महिलाओं साथ बढ़ते दुर्व्यवहार को देखते हुए यह लगने लगता है कि हमारे तंत्र से अब नैतिकता का लोप होने लगा है। गोया भारतीय स्त्री बर्बरयुग के किसी नए संस्करण को जी रही हो। भारत इस समय मानव तस्करी का वैश्विक मार्ग बन चुका है। यह बर्बरता भी हमारे संवैधानिक उसूलों का सिर झुकाने को र्प्याप्त है।
गणतांत्रिक भारत में देश की विविधता और जटिलता को एक राजनीतिक व्यवस्था के रूप में अपनाया गया और ऐसा करते समय विभिन्न क्षेत्रों में बहुलतावाद का सम्मान किया गया। राजनीतिक क्षेत्र में लोकतंत्र, सांस्कृतिक क्षेत्र में संघीय ढांचे और धार्मिक मामलों में धर्मनिरपेक्षता के सहारे एक नए गणतंत्र के मायनों को स्पष्ट किया गया। गणतंत्र के गठन के बाद से ही नीति निर्धारकों की प्राथमिकता देश के संघीय ढांचे को बनाए रखना थी।

यह सच है कि कोई भी तंत्र हो उसकी अपनी व्यक्तिगत समस्याएं होती हैं। लेकिन गणतंत्र की परिकल्पना मैं संवैधानिक समस्याओं के लिए कई रास्ते खुले रखे गए। संशोधनों के द्वारा संवैधानिक ढांचे में लचीलापन भी बनाए रखा गया। फिर भी प्रत्येक नए चुनाव में चाहे वह लोकसभा का हो या विधान सभा का या फिर किसी पंचायत अथवा निगम का, गरिमा के सीमाएं चटकती मिली हैं। गणतंत्रता के क्या है मायने आज हमारे देश में। इतने लम्बे अरसे में कितने नियमों का ईमानदारी से हमने निर्वाह किया है और कितने ऐसे संवैधानिक नियम है जिनको हमने संविधान के पन्नों पर लिख कर भुला दिया है। हमारा देश भारतवर्ष एक जनतांत्रिक देश है। जहां जनता के द्वारा चुने गये प्रतिनिधियों द्वारा ही देश की शासन व्यवस्था चलायी जाती है। गणतंत्र दिवस हमारे देश के इतिहास का वो दिन है, जिस दिन संविधान पूर्णरुपेण लागू किया गया था। देश की समस्त गतिविधियां इन संवैधानिक नियमों के आधार पर ही सुचारु ढंग से संचालित होती है। संविधान हमे जीने के तौर तरीके सीखाता है। एक सभ्य और कर्मठ राष्ट्र के सपने को साकार करता है हमारा संविधान। देश की गणतंत्रत को बनाये रखने हेतु प्रशासन के साथ साथ जनता का भी महत्वपूर्ण योगदान होता है। संविधान के नियम सबों के लिए बराबर होते है। वो किसी भी प्रकार के जातिभेद या वर्चस्व की भावना से ऊपर होता है। फिर भी भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और विभिन्न प्रकार के संकट आज भी मुंहबाए खड़े हैं। अगर हम सिर्फ अपनी उन्नति के बारे में सोचते है तो ये हमारी संकीर्ण मानसिकता का परिचायक है। हमे अपने देश और समाज के विषय में भी सोचने की जरूरत है। हमें ऐसे कार्यों की ओर स्वयं को अग्रसर करना है, जिनमें स्वयं के साथ सम्पूर्ण राष्ट्र की प्रगति भी सम्मिलित हो। जैसे हमारा संविधान हमें अपने अधिकारों और कर्तव्यों की समझ देता है। वैसे ही हमें भी देश के प्रति अपनी भावना परिलक्षित करनी चाहिए। युवावर्ग जो कि किसी भी राष्ट्र की प्रगति और उसके भविष्य का एकमात्र कार्यवाहक होता है।युवाओं की सहनशीलता, कर्तव्यपरायणता और कर्मठता ही राष्ट्र की अखण्डता रुपी महल के लिए ईंट का कार्य करते है। एक एक ईंट मिलकर ही एक विशाल महल का निर्माण करता है। आज जबकि हम इक्कीसवी सदी में कदम रख चुके है। तकनीक के साथ साथ लोगों की मानसिकता भी अब बदल चुकी है। ऐसे समय में गणतंत्र दिवस को सिर्फ एक राष्ट्रीय दिवस अथवा एक दिन का उत्सव मान कर, टीवी के छोटे पर्दे पर झांकियां देख कर, नेताओं के भाषण सुन कर भुला देना और दूसरे दिन से यह भी याद न रखना कि हमारा कोई संविधान भी है, हमारा कोई गणतंत्र भी है जिसके प्रति हम उत्तरदायी हैं, यह हमारी नासमझी ही नहीं अपराध भी है।

हमारे गणतंत्र का दूसरा महत्वपूर्ण अंग तंत्र है। लेकिन आजकल ऐसा लगता है जैसे तंत्र अनियंत्रित होता जा रहा है। उसे अपनी मनमानी करने से रोकने का दायित्व जिनका है कहीं कहीं तो वे खुद ही भ्रष्टाचार की मिसाल निकल आते हैं। तंत्र के इस कथन की भी अनदेखी नहीं की जा सकती कि आज के दौर में सत्ता दल का राजनैतिक हस्तक्षेप प्रशासनिक अमले पर इतना अधिक रहता हैं कि वे चाहकर भी निष्पक्ष और निर्भीक होकर काम नहीं कर सकते हैं। कोई भी जनप्रतिनिधि जब एक बार अपने राजनैतिक हित साधने के लिये तंत्र का उपयोग कर लेता हैं तो फिर गणतंत्र के मूल्यों में गिरावट आने लगती है। आर्थिक मुद्रास्फीति से कहीं अधिक घातक होती है नैतिकता की स्फीति।किसी भी समस्या को हल करने के लिये गण को तंत्र का साथ देने और तंत्र को त्वरित निराकरण के प्रयास करने आवश्यक होते हैं। आज महंगाई सबसे बड़ी समस्या हैं। हालांकि विश्व स्तरीय आर्थिक मंदी, अंर्तराष्ट्रीय बाजार की उथल पुथल, नोटबंदी के बाद की आर्थिक स्थिति ने देश को भी हिला कर रख दिया है। लेकिन इतना कह देने मात्र से सरकार के कर्तव्यो की इतिश्री नहीं हो जाती है। और ना ही केन्द्र और राज्य सरकार एक दूसरे पर दोषारोपण़ करके बच सकतीं है। गण चुस्त और दुरुस्त रहें तथा तंत्र पूरी मुस्तैदी से देश के विकास और आम आदमी की खुशहाली के लिये संकल्पित हो, तभी देश एक बार फिर अपने स्वर्णिम मुकाम पर पहुंच सकेगा।
आज हम चारों ओर देख रहे हैं की बहुत सारे सरकारी कर्मचारी उन लोगों से घूस ले रहे हैं रिश्वत ले रहे हैं। क्या यही हम हमारे देश के प्रति कर्तव्य निभा रहे हैं । इसमें जिम्मेदार सिर्फ वह सरकारी आदमी नहीं है जिम्मेदार आम आदमी भी है रिश्वत लेने वाला और देने वाला भी जिम्मेदार है और रिश्वत देने वाला भी उतना ही जिम्मेदार है क्योंकि लोग अपना कर्तव्य भूल जाते हैं डॉक्टर, इंजीनियर या किसी भी विभाग के सरकारी कर्मचारी इस दूषित व्यवहार को अपनाते हैं और पूरे देश को इसका खामियाजा भुगतना पड़ता है। विकास के पहिए ऐसे आचरण से ही बाधित हो जाते हैं। प्रश्न यह है कि सुरक्षा मामलों में भी भ्रष्टाचार के दाग़ जब उभर कर सामने आने लगे हैं तो यह मान ही लेना चाहिए कि हम अपने संवैधानिक उसूलों से भटक गए हैं। यदि स्वतंत्रता के दशकों बाद भी हम खुले में शौचमुक्त देश बनाने के लिए संघर्ष करते दिखाई दे रहे हैं तो विश्व के सक्षम राष्ट्रों से किस आधार पर अपनी तुलना कर सकते हैं? बहरहाल अब समय आ गया है कि हमें खुद को धोखा देने से रोकना होगा और सही मायने में खुद के लिए तय करना होगा कि हम अपने गणतंत्र के अनुरूप एक सही तथा अच्छे नागरिक कैसे साबित हो सकते हैं।
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Saturday, January 24, 2026

टॉपिक एक्सपर्ट | गरब करो संविधान सभा के मेंबर रए अपने गौर बब्बा | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | पत्रिका | बुंदेली कॉलम

टॉपिक एक्सपर्ट | गरब करो संविधान सभा के मेंबर रए अपने गौर बब्बा | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | पत्रिका | बुंदेली कॉलम
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गरब करो संविधान सभा के मेंबर रए अपने गौर बब्बा
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
         26 जनवरी आत-आत हमें गणतंत्र दिवस मनाबे को जी करन लगत है। अब हर कोऊ अपने घरे अपनो तिरंगा लगा सकत आए। कित्तो अच्छो लगत आए न जे सोंस के, के अपन आजाद आएं, अपनो एक संविधान आए। अपनो गणतंत्र दुनिया को सबसे बड़ो गणतंत्र आए। आजादी के पैले 9 दिसम्बर 1946 को संविधान सभा की पैली बैठक भई रई। मनो 26 जनवरी 1950 को अपनो जो संविधान लागू भओ। जेई से अपन 26 जनवरी खों गणतंत्र दिवस मनाऊंत आएं। 
     औ अपन सागर वारों के लाने गरब करबे की बात जे आए के डॉ हरीसिंह गौर जू मने अपने ‘गौर बब्बा’ संविधान सभा के 84 मेंबरन में खास मेंबर रए। बे सेंट्रल प्रोविंस एंड बेरार से संविधान सभा के मेंबर चुने गए रए।  बे ड्राफ्टिंग कमेटी में भले नईं रए मनो बे ड्राफ्टिंग के लाने रखे जाबे वारे प्रस्तावन पे बहस करबे वारी कमेटी में रए औ उन्ने मुतके जरूरी मुद्दन पे बहस करी, जीसे अच्छो संविधान बन सको। ‘हम भारत के लोग’ से सुरू होबे वारे अपने संविधान में  प्रस्तावना के संगे 470 से ज्यादा अनुच्छेद आएं औ 25 भाग के संगे 12 अनुसूचियां आएं। सो, पैली बात तो जे के हमें अपने गणतंत्र पे गरब करो चाइए, काए से के ईमें अपने गौर बब्बा को बी योगदान रओ। दूसरो ई लाने के अपनो गणतंत्र दुनिया को सबसे बड़ो गणतंत्र आए। ऐसो गणतंत्र जीमें सबई जात, धरम औ करम के इंसा एक बरोबर माने गए आएं। सो, बकरियां घांईं “मैं-मैं” करबे की जांगा हमें सोई अपने सागर की भलाई औ विकास के लाने सोचबो चाइए के ‘हम सागर के लोग’ औ मिलजुल के काम करो चाइए।  सो, सबई मिल के संगे बोलियो- “अपने गणतंत्र की जै!” “गौर बब्बा की जै!”
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Thursday, January 22, 2026

चर्चा प्लस | बाज़ारवाद को कोसते और कर्तव्यों की ब्रांडिंग करते हम | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर


चर्चा प्लस 

बाज़ारवाद को कोसते और कर्तव्यों की ब्रांडिंग करते हम

- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

      यदि राज्य एक ब्रांड है, बेटी बचाओ एक ब्रांड है, स्वच्छता मिशन एक ब्रांड है, शौचालय का उपयोग एक ब्रांड है, निर्मलजल एक ब्रांड है और अतुल्य भारत अभियान एक ब्रांड है तो हम अपने युवाओं से राष्ट्रप्रेम की आशा रखें अथवा बाज़ारवाद की? हमने अपने सुरक्षा बलों को भी ब्रांड बना दिया और उनके लिए ब्रांड एम्बेसडर भी अनुबंधित कर लिए गए। जैसे- सीआरपीएफ की ब्रांड एम्बेसडर है पी. वी. सिन्धु तो बीएसएफ के ब्रांड एम्बेसडर है विराट कोहली रहे हैं। यदि राष्ट्र और मानवता के प्रति भावनाएं एवं कत्र्तव्य भी ब्रांड बन कर प्रचारित होने का समय हमने ओढ़ लिया है जो भारतीय विचार संस्कृति के मानक पर यह ब्रांडिंग कहां सही बैठती है, यह विचारणीय है। फिर बाज़ारवाद को क्यों कोसना?   .

     हम आज ब्रांडिग के समय में जी रहे हैं। हमारे शौच की व्यवस्था से ले कर राज्य, कत्र्तव्य और संवेदनाओं की भी ब्रांंिडग होने लगी है। ब्रांड क्या है? ब्रांड उत्पाद वस्तु की बाजार में एक विशेष पहचान होती है जो उत्पाद की क्वालिटी को सुनिश्चित करती है, उसके प्रति उपभोक्ताओं में विश्वास पैदा करती है। क्यों कि उत्पाद की बिक्री की दशा ही उत्पादक कंपनी के नफे-नुकसान की निर्णायक बनती है। कंपनियां अपने ब्रांड को बेचने के लिए और अपने ब्रांड के प्रति ध्यान आकर्षित करने के लिए ‘ब्रांड एम्बेसडर’ अनुबंधित करती हैं। यह एक पूर्णरुपेण बाज़ारवादी आर्थिक प्रक्रिया है। कमाल की बात यह है कि ब्रांडिग हमारे जीवन में गहराई तक जड़ें जमाता जा रहा है। इसी लिए नागरिक कत्र्तव्यों, संवेदनाओं एवं दायित्वों की भी ब्रांडिंग की जाने लगी है, गोया ये सब भी उत्पाद वस्तु हों।


आजकल राज्यों के भी ब्रांड एम्बेसडर होते हैं। जबकि राज्य एक ऐसा भू भाग होता है जहां भाषा एवं संस्कृति के आधार पर नागरिकों का समूह निवास करता है। - यह एक अत्यंत सीधी-सादी  परिभाषा है। यूं तो राजनीतिशास्त्रियों ने एवं समाजवेत्ताओं ने राज्य की अपने-अपने ढंग से अलग-अलग परिभाषाएं दी है। ये परिभाषाएं विभिन्न सिद्धांतों पर आधारित हैं। राज्य उस संगठित इकाई को कहते हैं जो एक शासन के अधीन हो। राज्य संप्रभुतासम्पन्न हो सकते हैं। जैसे भारत के प्रदेशों को ’राज्य’ कहते हैं। इस सिद्धांत के अनुसार राज्य की उत्पत्ति का एकमात्र कारण शक्ति है। इसके अलावा युद्ध को राज्य की उत्पत्ति का कारण यह सिद्धांत मानता है जैसा कि वाल्टेयर ने कहा है प्रथम राजा एक भाग्यशाली योद्धा था। इस सिद्धांत के अनुसार शक्ति राज्य की उत्पत्ति का एकमात्र आधार है शक्ति का आशय भौतिक और सैनिक शक्ति से है। प्रभुत्व की लालसा और आक्रमकता मानव स्वभाव का अनिवार्य घटक है। प्रत्येक राज्य में अल्पसंख्यक शक्तिशाली शासन करते हैं और बहुसंख्यक शक्तिहीन अनुकरण करते हैं। वर्तमान राज्यों का अस्तित्व शक्ति पर ही केंद्रित है। 

राज्य को परिभाषित करते सामाजिक समझौता सिद्धांत को मानने वालों में थाॅमस हाब्स, जॉन लॉक, जीन जैक, रूसो आदि का प्रमुख योगदान रहा। इन विचारकों के अनुसार आदिम अवस्था को छोड़कर नागरिकों ने विभिन्न समझौते किए और समझौतों के परिणाम स्वरुप राज्य की उत्पत्ति हुई। वहीं विकासवादी सिद्धांत मनोवैज्ञानिक, ऐतिहासिक और समाजशास्त्रीय प्रमाणों पर आधारित है। इसके अनुसार राज्य न    कृत्रिम संस्था है, न ही देवीय संस्था है। यह सामाजिक जीवन का धीरे-धीरे किया गया विकास है इसके अनुसार राज्य के विकास में कई तत्व जैसे कि रक्त संबंध धर्म शक्ति राजनीतिक चेतना आर्थिक आधार का योगदान है पर आज सबके हित साधन के रूप में विकसित हुआ। ऐसा राज्य क्या कोई उत्पाद वस्तु हो सकता है? जिसके विकास के लिए ब्रांडिंग की जाए?

शौचालय, और स्वच्छता की ब्राडिंग किया जाना और इसके लिए ब्रांड एम्बेसडर्स को अनुबंधित किया जाना बाजारवाद का ही एक नया रूप है। बाज़ारवाद वह मत या विचारधारा जिसमें जीवन से संबंधित हर वस्तु का मूल्यांकन केवल व्यक्तिगत लाभ या मुनाफ़े की दृष्टि से ही किया किया जाता है; मुनाफ़ा केंद्रित तंत्र को स्थापित करने वाली विचारधारा; हर वस्तु या विचार को उत्पाद समझकर बिकाऊ बना देने की विचारधारा। बाजारवाद में व्यक्ति उपभोक्ता बनकर रह जाता है, पैसे के लिए पागल बन बैठता है, बाजारवाद समाज को भी नियंत्रण में कर लेता है, सामाजिक मूल्य टूट जाते हैं। बाजारवाद एक सांस्कृतिक पैकेज होता है। जो उपभोक्ता टॉयलेट पेपर इस्तेमाल करता है, वह एयर कंडीशनर में ही सोना पसन्द करता है, एसी कोच में यात्रा करता है और बोतलबंद पानी साथ लेकर चलता है। इस संस्कृति के चलते लौह उत्खनन से लेकर बिजली, कांच और ट्रांसपोर्ट की जरूरत पड़ती है। यूरोप और अमेरिका में लाखों लोग केवल टॉयलेट पेपर के उद्योग में रोजगार पाते हैं। यह सच है कि बाजारवाद परंपरागत सामाजिक मूल्यों को भी तोड़ता है।


जीवनस्तर में परिवर्तन एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। प्रत्येक व्यक्ति भौतिक सुखों के पीछे भागता है। उसकी इसी प्रवृत्ति को बाज़ार अपना हथियार बनाता है। यदि बाजार का स्वच्छता से नुकसान हो रहा है तो वह स्वच्छता को क्यों बढ़ने देगा? पीने का पानी गंदा मिलेगा तो इंसान वाटर प्यूरी फायर लेगा, हवा प्रदूषित मिलेगी तो वह एयर प्यूरी फायर लेगा। इस तरह प्यूरी फायर्स का बाज़ार फलेगा-फूलेगा। इस बाजार में बेशक नौकरियां भी मिलेंगी लेकिन बदले में प्रदूषित वातावरण बना रहेगा और सेहत पर निरंतर चोट करता रहेगा तो इसका खामियाजा भी तो हमें ही भुगतना होगा। 


स्वच्छता बनाए रखना एक नागरिक कत्र्तव्य है और एक इंसानी पहचान है। यदि इसके लिए भी ब्रांडिंग की जरूरत पड़े तो वह कत्र्तव्य या पहचान कहां रह जाता है? वह तो एक उत्पाद वस्तु है और जिसके पास धन है वह उसे प्राप्त कर सकता है, जिसके पास धन की कमी है वह स्वच्छता मिशन के बड़े-बड़े होर्डिंग्स के नीचे भी सोने-बैठने की जगह हासिल नहीं कर पाता है। 


भ्रूण हत्या एवं बेटी बचाओ का सीधा संबंध हमारी मानवीयता एवं संवेदनशीलता से है। यह भावना हमारे भीतर स्वतः जागनी चाहिए अथवा सरकार जो इन अभियानों की दिशा में प्रोत्साहनकारी कार्य करती है उन्हें संचालित होते रहना चाहिए। जब बात आती है इन विषयों के ब्रांड एम्बेसडर्स की तो फिर प्रश्न उइता है कि क्या बेटियां उपभोक्ता उत्पाद वस्तु हैं या फिर भ्रूण की सुरक्षा के प्रति हमारी संवेदनाएं महज विज्ञापन हैं। आज जो देश में आए दिन आपराधिक घटनाएं बढ़ रही हैं तथा संवेदना का स्तर निरंतर गिरता जा रहा है, उसका सबसे बड़ा कारण यही है कि जाने-अनजाने हमारी तमाम कोमल संवेदनाएं बाजार के हाथों गिरवी होती जा रही हैं।


बात उत्पादन की बिक्री की हो तो उचित है किन्तु बाजार से हो कर गुजरने वाले कत्र्तव्यों में दिखावा अधिक होगा और सच्चाई कम। ब्रांड एम्बेसडर अनुबंधित करने के पीछे यही धारणा काम करती है कि जितना बड़ा अभिनेता या लोकप्रिय ब्रांड एम्बेसडर होगा उतना ही कम्पनी को आय कमाने में मदद मिलती है क्योंकि लोग वो सामान खरीदते है। अमूमन जितना बड़ा ब्रांड होता है उतना ही महंगा या उतना ही लोकप्रिय व्यक्ति ब्रांड एम्बेसडर बनाया जाता है क्योंकि बड़ा ब्रांड अधिक पैसे दे सकता है जबकि छोटा ब्रांड कम और ऐसा इसलिए क्योंकि कोई भी व्यक्ति जो ब्रांड का प्रतिनिधित्व करता है, उसकी फीस करोड़ों में होती है। एक तो अगर जनता उस व्यक्ति को अगर रोल मॉडल मानती है तो ऐसे में लोगो के दिलों में जगह बनाना आसान हो जाता है। 


सड़क सुरक्षा अभियान के ब्रांड एम्बेसडर है अक्षय कुमार, फिट इंडिया अभियान के ब्रांड एम्बेसडर कौन रहे हैं सोनू सूद, पूर्वोत्तर क्षेत्र विकास के ब्रांड एम्बेसडर मैरीकॉम, असम राज्य के ब्रांड एम्बेसडर रही हैं हिमा दास, अरुणाचल प्रदेश राज्य के ब्रांड एम्बेसडर जॉन अब्राहम, हरियाणा (योग और आयुर्वेद) के ब्रांड एम्बेसडर रहे बाबा रामदेव, तेलंगाना राज्य के ब्रांड एम्बेसडर सानिया मिर्जा और महेश बाबू। इसी प्रकार सिक्किम राज्य के ब्रांड एम्बेसडर ए. आर. रहमान, गुड्स एण्ड सर्विस टैक्स (जीएसटी) के ब्रांड एम्बेसडर  अमिताभ बच्चन, हरियाणा के स्वास्थ्य कार्यक्रम के ब्रांड एम्बेसडर गौरी शोरान, स्वच्छ आदत, स्वच्छ भारत के ब्रांड एम्बेसडर काजोल, स्वच्छ आंध्र मिशन के ब्रांड एम्बेसडर पी. वी. सिंधु, स्वच्छ भारत मिशन की ब्रांड एम्बेसडर शिल्पा शेट्टी, स्वच्छ भारत मिशन उत्तर प्रदेश एवं उत्तराखंड के ब्रांड एम्बेसडर अक्षय कुमार, भारतीय वन्यजीव ट्रस्ट (वाइल्ड लाइफ ट्रस्ट) की ब्रांड एम्बेसडर दीया मिर्जा, असम राज्य पर्यटन की ब्रांड एम्बेसडर प्रियंका चोपड़ा, स्किल इंडिया अभियान की भी ब्रांड एम्बेसडर है प्रियंका चोपड़ा, ‘माँ’ अभियान की ब्रांड एम्बेसडर माधुरी दीक्षित, हेपेटाइटिस-बी उन्मूलन के ब्रांड एम्बेसडर अमिताभ बच्चन, अतुल्य भारत अभियान के ब्रांड एम्बेसडर है प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, भारत के पशुपालन बोर्ड के ब्रांड एम्बेसडर है अभिनेता रजनीकांत, किसान चैनल के ब्रांड एम्बेसडर है अमिताभ बच्चन, स्वच्छ साथी कार्यक्रम की ब्रांड एम्बेसडर  दीया मिर्जा, निर्मल भारत अभियान की ब्रांड एम्बेसडर विद्या बालन, डिजिटल भारत की ब्रांड एम्बेसडर कृति तिवारी, उत्तर प्रदेश के समाजवादी किसान बीमा योजना के ब्रांड एम्बेसडर रहे अभिनेता नवाजुद्दीन सिद्दकी।

ब्रांडिग का क्रम यही थम जाता तो भी गनीमत था। गोया हमने अपने सुरक्षा बलों को भी ब्रांड बना दिया और उनके लिए ब्रांड एम्बेसडर भी अनुबंधित कर लिए गए। जैसे- सीआरपीएफ की ब्रांड एम्बेसडर पी. वी. सिन्धु और बीएसएफ के ब्रांड एम्बेसडर विराट कोहली। यदि हमने सुरक्षा बलों के लिए सिर्फ एम्बेसडर यानी राजदूत रखा होता तो बात थी लेकिन हमने तो ‘‘ब्रांड’’ एम्बेसडर रखा।

यदि राज्य एक ब्रांड है, बेटी बचाओ एक ब्रांड है, स्वच्छता मिशन एक ब्रांड है, शौचालय का उपयोग एक ब्रांड है, निर्मलजल एक ब्रांड है और अतुल्य भारत अभियान एक ब्रांड है तो हम अपने युवाओं से राष्ट्रप्रेम की आशा रखें अथवा बाज़ारवाद की? यदि राष्ट्र और मानवता के प्रति भावनाएं एवं कत्र्तव्य भी ब्रांड बन कर प्रचारित होने का समय हमने ओढ़ लिया है जो भारतीय विचार संस्कृति के मानक पर यह ब्रांडिंग कहां सही बैठती है, यह विचारणीय है और फिर क्यों कोसते हैं बाज़ारवाद को जिसका बुनियादी आधार ही ब्रांडिंग होता है। हमें सोचना चाहिए अपने इस दोहरेपन के बारे में। 

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(दैनिक, सागर दिनकर में 22.01.2026 को प्रकाशित)  

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बतकाव बिन्ना की | एक ने कई औ सैंकड़न ने दोहराई | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बतकाव बिन्ना की | एक ने कई औ सैंकड़न ने दोहराई | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम
बतकाव बिन्ना की  
   एक ने कई औ सैंकड़न ने दोहराई
  - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

‘‘बिन्ना कछू पूछें?’’ भैयाजी ने तनक गंभीर होत भए कई। 
मोए धड़का सो लगो के जे ऐसो काए कै रए? मोसे कछू मिस्टेक हो गई का, जो भैयाजी ऐसी पूछ रए? का भओ हुइए?
‘‘हऔ भैयाजी पूछो!’’ मैंने डरात-डरात कई।
‘‘जो बताओ के मुतके जने बुरई बात पकर के काए बैठ जात आएं?’’ भैयाजी ने पूछी।
जा सुन के मोरो मूंड़़ चकरा गओ। काए से के मोए लग रओ हतो के भैयाजी कछू मोरे बारे में पूछबे वारे आएं। पर बे तो मुतके जने की बात कर रए। बाकी जे मुतके जने की बतकाव कऊं मोरे बारे में तो नोंईं? का हो सकत आए? औ फिकर भई।
‘‘भैयाजी मोए समझ ने पर रई के आप पूछो का चा रए? काए मोसे कछू गलती हो गई का?’’ मैंने भैयाजी से कई।
‘‘अरे नईं! हम तुमाई नईं कै रए। हम तो दीन-दुनिया की कए रै।’’ भैयाजी ने कई। जा सुन के मोए तनक सहूरी भई। भैयाजी लगाई-बुझाई वारों पे कान देबे वारे नोंई, पर कनकुतरों की का, कछू बी कोनऊ के बारे में कान भरत रैत आएं।
‘‘सो बताओ आप काए के बारे में कै रए?’’ मैंने पूछी।
‘‘हम जा कै रए के लोग बड़े-बड़े लोगन की कथा सुनबे जात आएं। पर उनकी नोनी बात पे कोनऊं बतकाव नईं करी जात आए। है के नईं?’’ भैयाजी ने पूछी।
‘‘हऔ जा तो आए। बात तो करत आएं बाकी ज्यादा नईं।’’ मैंने कई।
‘‘ज्यादा नईं? हम तो कै रए के ऊके सामने तो उत्तो बी नईं जित्तो जो बे कछू गलत बोल जाएं तो बे ट्रोल कर दए जात आएं। बे बी इंसान आएं, गलती उनसे बी हो सकत आए।’’ भैयाजी बोले।
‘‘हऔ! जा तो आए। पर पब्लिक उनको भगवान घांई मानन लगत आए। मोए लगत के जेई से उने बुरौ लगत आए।’’ मैंने कई।
‘‘पब्लिक खों तो कम, ट्रोलर हरों को ज्यादा मजो आत आत आए। और बाकी अकल के अंधरा हरें उनको दोहरान लगत आएं। जे ई पे मोए गुस्सा आत आए।’’ भैयाजी बोले।
‘‘लेकन आप इत्तो काए सोच रए? जा तो दुनिया आए। इते सबई तरां के लोग रैत आएं।’’ मैंने भैयाजी से कई।
‘‘बा तो ठीक आए, बाकी हमें जा सोच के पीरा होत आए के लोग गलत बातन पे कित्तो ज्यादा जुट जात आएं। मनो उने गलत बात ई अच्छी लगत होए।’’ भैयाजी बोले।
बात तो उनकी सई हती। कोऊ चाए सई कए, चाए गलत मनो ट्रोलर हरों को तो ट्रोल करबे में मजो आउत आए, चाए ऊको रिजल्ट कैसो बी रए। सई कई जाए तो जा बी एक तरां की पगलेटपना आए। अच्छी अंग्रेजी में कई जाए तो साइको पना। बे को आ कोऊं खों जज करबे वारे? मनो बे अपने को ऐसई मानत आएं। सो भैयाजी जो कै रए, बे गलत नोईं कै रए। को जाने का होत जा रओ के लोग बुरौ देख के ऊकी जुगाली करबे में ज्यादा जुटे रैत आएं, अच्दी बातन के जांगा।
‘‘भैयाजी, जे टेम ई ऐसो चल रओ। को तो एक जमाना में रामलीला होत्ती, फेर आरकेस्ट््रा चलो, औ अब बा बी घटिया सो होन लगो। मने पैले बच्चा हरें बी रामलीला में राम औ लछमन खों देखत्ते तो उनई के जैसे बनो चात्ते। अब बे ‘लाॅलीपाॅप-लाॅलीपाॅप’ देखत आएं तो ऊंसई कूल्हा मटकात फिरत आएं। का कओ जाए।’’ मैंने कई।
‘‘सई में, आजकाल जे कै-सुने के संत हरें कछू के कछू बकत रैत आएं औ दूसरे उनकी बेई बातें दोहरात आएं। उने बा सब याद नई रैत जो उन्ने अच्छी-अच्छी बातें करी हतीं। औ आजकाल तो मनो फैशन सो चल रओ के लुगाइन के बारे में अंटशंट बको औ नांव कमा लेओ। काए से उनके लाने बदनामी में बी नामी होत आए।’’ भैयाजी बोले। 
‘‘सई कै रए आप भैयाजी! जेई पे से मोए बा किसां याद आ गई के एक देस में एक राजा हतो। ऊको एक दिनां लगो के महल से बायरे ज के पतो करो जाए के ऊकी परजा ऊको कित्तो जानत आए। सो ऊने भेस बदरो औ अपने मंत्री को संग ले के संझा खों निकर परो। फिरत-फिरत रात को दूसरो पहर हो गओ मनो ऊको कोनऊ ऐसो ने मिलो जीको अपने राजा के बारे में ज्यादा पतो होय। जा जान के राजा बड़ो दुखी भओ। ऊने मंत्री से पूछी के का करो जाए? सो मंत्राी बोलो के महराज ऐसो करो जाए के आपकी बड़ी-बड़ी फोटुएं बनबा के हरेक गली-चौराए पे लगवा दई जाए। ईसे सबई आपखों रोज-रोज देखहें औ चीनने लगहें। राजा को मंत्री को जो आइडिया भौतई नोनो लगो। ऊने दूसरई दिन अपनी मुतकी फोटुएं बनवाई और अपने राज के सबरे चैराए पे टंगवा दईं। पैले दिनां तो सबने देखी औ ऊके बारे में बतकाव करी, मनो दूसरे दिनां बे अपने-अपने काम में लग गए। फेर को आ पूछ रओ तो राजा की फोटुअन को? राजा फेर एक दिनां ऊंसई भेस बदर के निकरो। ऊने देखो के कोनऊं ऊके बारे में बतकाव नईं कर रओ। सो ऊको बड़ो दुख भओ। ऊने फेर के मंत्री से कई के कछू करो के जीसें परजा हमाई बात करे। ईपे मंत्री बोलो के जो हो तो सकत आए, बाकी आप खों ईके लाने राजी होने हुइए। राजा बोलो के हमें कोनऊं परेसानी नईं, तुम तो जो समझ परे सो करो। ईपे मंत्री ने का करो के दूसरे दिन ऊने राजा की दूसरी फोटुएं बनवाईं औ ऊके संगे धमकी वारी कछू बुरई बातें लिखवा दईं। ऊके बाद तो पूरी परजा में हल्ला मच गओ। ऊके दस दिनां बाद राजा फेर के पता करबे निकरो। बा जां बी गओ परजा ऊकोई गरियात मिली। राजा को जा सब देख के अचरज भओ। तब मंत्री ने राजा को समझाओ के लोग बुरई बातन पे ज्यादा बतकाव करत आएं औ ज्यादा याद रखत आएं जेई लाने ऊको राजा जू खों खलनायक बना के सामने करो। राजा ने जा देखों-सुनो तो बा दंग रै गओ। ऊको अपनी परजा से जा उमींद ने हती। ऊको पतो ने हतो के बुराई की लम्बी दुम होत आए जो जो कुल्ल दिनां तक हलत रैत आए।’’ मैंने भैयाजी खों किसां सुनाई।
‘‘बिलकुल सई किसां आए। पैले ऐसो रओ के ने रओ बाकी आजकाल तो जेई चल रओ।’’ भैयाजी बोले। हम दोई फिकर करत बैठे रए।  
मनो बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की। जे जरूर सोच के देखियों के हमें हमें अच्छी बातें दोहराओ चाइए के बुरई बातें?  
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बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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