Wednesday, April 2, 2025

चर्चा प्लस | पौराणिक एवं समसामयिक महत्व है नवरात्रि का | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर

चर्चा प्लस (सागर दिनकर में प्रकाशित)
    पौराणिक एवं समसामयिक महत्व है नवरात्रि का
       - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह  
         नवरात्रि देवी स्तुति के रूप में स्त्री शक्ति के जागरण का त्योहार है। नवरात्रि के दौरान इस बात का स्मरण किया जाता है कि जिस प्रकार देवी दुर्गा ने असुरों का वध किया और जगत के पालन के लिए विविध रूपों में प्रकट हुईं, ठीक उसी प्रकार स्त्री को भी अपनी शक्ति एवं दायित्वों को पहचानना, परखा और अमल में लाना चाहिए। यदि स्त्री स्वयं को शक्ति स्वरूपा मान कर आत्मबल से काम ले तो वह कभी अबला हो ही नहीं सकती है। यही संदेश निहित है इस पूरे नौदिवसीय त्योहार में। इसीलिए कहा गया है- ‘‘या देवी सर्वभूतेषु शक्ति-रूपेण संस्थिता, नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः!’’    
       जब व्यक्ति दुख से ग्रस्त होता है तो उसे आत्मबल की आवश्यकता होती है और जब प्रत्यक्ष आत्मबल नहीं मिल पाता है तो अप्रत्यक्ष अर्थात दैवीय शक्ति के प्रति उसकी आस्था उसे आत्मबल प्रदान करती है। व्यक्ति यही सोचता है कि उसकी सहायता कोई करे या न करे, पर ईश्वर उसकी मदद करेगा। यही विचार उसे आत्मबल से भर देता है। इसके बाद निराशा से उबरा हुआ व्यक्ति अपने लिए सुगमता से सही मार्ग ढूंढ लेता है। स्त्रियां स्वयं को अबला, असहाय, अशक्त मान कर स्वयं को तुच्छ प्राणी न समझती रहें, इसीलिए नवरात्रि का त्योहार उन्हें विशेष आत्मबल प्रदान करता है। एक स्त्री भी शक्ति स्वरूपा हो सकती है यदि वह असुरों का डट कर मुकाबला करे और उनका दमन करने की ठान ले। वर्तमान समाज में असुर आचरण करने वाले वे सभी हैं जो स्त्रियों का मा सम्मान नहीं करते हैं तथा उन्हें मात्र उपभोग की वस्तु समझते हैं। किन्तु इसके लिए आवश्यकता है देवी दुर्गा के स्वरूपों को समझने की। 

चैत्र नवरात्रि हिन्दुओं के प्रमुख त्योहारों में से एक है। ये नौ दिन देवी दुर्गा के नौ अलग-अलग रूपों की आराधना के लिए समर्पित हैं। यह चैत्र मास में मनाया जाता है। वैसे दो नवरात्रियों का सर्वाधिक महत्व है- शारदीय नवरात्रि तथा चैत्र नवरात्रि। अन्यथा, वर्ष में अन्य नवरात्रियों भी मनाई जाती हैं। तिथियों के अनुरूप वर्ष में पांच नवरात्रि होती हैं- शरदीय नवरात्रि, चैत्र नवरात्रि, आषाढ़ नवरात्रि, पौष नवरात्रि और माघ नवरात्रि। इनमें से प्रत्येक नवरात्रि का अपना विशिष्ट महत्त्व है।
नवरात्रि में देवी दुर्गा के अलग अलग रूपों की पूजा की जाती है। लेकिन इन नवरात्रि के पीछे की एक पौराणिक कथा भी है। दरअसल पौराणिक कथाओं के अनुसार प्राचीनकाल में महिषासुर नाम का एक दानव हुआ करता था। उसने कठोर तपस्या से ब्रम्हा जी को प्रसन्न कर लिया। ब्रम्हा ने प्रसन्न होकर उससे वरदान मांगने को कहा। तब महिषासुर ने भगवान ब्रम्हा से अमर होने का वरदान मांगा। ब्रम्हा ने कहा कि अमर होने का वरदान नहीं दिया जा सकता। तब उसने ब्रम्हा से यह वरदान मांगा कि कोई पुरुष या देव अथवा दानव  उसे न मार सके। ब्रम्हा ने उसे वरदान दे दिया कि तीनों लोकों में कोई पुरुष, देव अथवा दानव उसे नहीं मार सकता है। यह वरदान पाने के बाद महिषासुर निद्र्वन्द्व हो गया। उसके अत्याचार बहुत ज्यादा बढ़ने लगे। उसे यह विश्वास हो चला था कि ब्रम्हा के वरदान के बाद अब वह अमर हो चला है। अब उसे कोई नहीं मार सकता है। उसने देवताओं को पराजित कर तीनों लोकों पर अपनी सत्ता स्थापित करने की योजना बनाई और देवलोक पर आक्रमण कर दिया। इस बात से घबराकर सभी देवता ब्रम्हा, विष्णु और महेश की शरण में गए। किन्तु त्रिदेव भी ब्रह्मा द्वारा दिए गए वरदान के समक्ष वे विवश थे। तब त्रिदेवों ने देवी दुर्गा से प्रार्थना की कि वे अपनी शक्ति का प्रयोग करें और महिषासुर का वध कर के ऋषियों एवं देवताओं की रक्षा करें। तब देवी दुर्गा आदिशक्ति के रूप में प्रकट हुई। नौ दिनों तक महिषासुर दानव और देवी दुर्गा के बीच में घमासान युद्ध चला। दसवें दिन मां दुर्गा ने दुष्ट दानव महिषासुर का अंत कर दिया। इसी उपलक्ष्य में हर वर्ष नवरात्रि का त्यौहार मनाया जाता है। 

   इस त्यौहार की समाप्ति नौवें दिन होती है, ऐसा माना जाता है कि इस दिन भगवान राम का जन्म हुआ था। अतः श्रीरामनवमी भी मनाई जाती है। चैत्र नवरात्रि के साथ ही हिन्दू नववर्ष का आरम्भ भी माना जाता है। चैत्र नवरात्रि ग्राष्मकाल के आगमन का प्रतीक है। ऋतु परिवर्तन के साथ ही फसल के चक्र में भी परिवर्तन होता है। यह बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। माता के भक्त सभी नौ दिनों ओर व्रत आदि रखते हैं। ये नौ दिन घरों में व्रत पूजा को ध्यान में रखते हुए कुछ विशेष प्रकार के पकवान बनाए जाते हैं। नवरात्रि में साबूदाना खिचड़ी, कूटू के आटे की पूरी और सिंघाड़े की पूरी आदि बनाई जाती हैं।
प्रत्येक दिन देवी के अलग-अलग रूप की पूजा की जाती है। पहला दिन शैलपुत्री को समर्पित है, दूसरा दिन ब्रह्मचारिणी को, तीसरा दिन चंद्रघंटा को, चैथा दिन कुष्मांडा को, पांचवां दिन स्कंदमाता को, छठा दिन कात्यायनी को, सातवां दिन कालरात्रि को, आठवां दिन महागौरी को और नौवां दिन सिद्धिदात्री को।

1. शैलपुत्री - देवी दुर्गा का पहला रूप शैलपुत्री या शैलजा के नाम से जाना जाता है। शैल का अर्थ है पर्वत और यह रूप पर्वत की पुत्री या देवी पार्वती को संदर्भित करता है जो राजा हिमवत अर्थात हिमालय पर्वत की पुत्री थीं। देवी पार्वती को देवी सती का पुनर्जन्म माना जाता है और उन्हें दो हाथों और माथे पर अर्धचंद्र के साथ एक स्त्री रूप में दर्शाया जाता है। वे अपने दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल का फूल धारण करती हैं। उन्हें अपने वाहन या नंदी बैल की सवारी के साथ दर्शाया जाता है।
2. ब्रह्मचारिणी - ब्रह्मचारिणी या देवी दुर्गा के महिला तपस्वी रूप की पूजा नवरात्रि के दूसरे दिन की जाती है। उन्हें एक ब्रह्मचारिणी देवी के रूप में दर्शाया जाता है जो अपने दाहिने हाथ में सूखे रुद्राक्ष की माला और बाएं हाथ में कमंडल धारण करती हैं।
3. चंद्रघंटा - तीसरे दिन पूजा जाने वाली दुर्गा का तीसरा रूप चंद्रघंटा है। उनके माथे पर घंटी के आकार का एक अर्धचंद्र है जिसके कारण उनका नाम चंद्रघंटा भी पड़ा। देवी को उनकी तीसरी आंख खुली हुई अवस्था में दिखाई जाती हैं और वे सदा असुरों से युद्ध के लिए तैयार रहती हैं। उन्हें रणचंडी के नाम से भी जाना जाता है। देवी के इस योद्धा रूप में उनके 10 हाथ होते हैं जिनमें से दो में त्रिशूल, गदा, धनुष और बाण, खड्ग, कमल, घंटा और कमंडल हैं, उनका एक हाथ हमेशा आशीर्वाद मुद्रा या अभयमुद्रा में रहता है जो भय को दूर करता है। 
4. कुष्मांडा - नवरात्रि के चैथे दिन पूजी जाने वाली देवी दुर्गा का चैथा रूप कुष्मांडा है। कुष्मांडा नाम को कु, ऊष्मा और अंड में विभाजित किया जा सकता है, जहां ‘‘कु’’ का अर्थ है थोड़ा, ऊष्मा का अर्थ है गर्मी या ऊर्जा और अंड का अर्थ है ब्रह्मांड। देवी दुर्गा के इस रूप को अष्टभुजा देवी के नाम से भी जाना जाता है और उन्हें आदि शक्ति के नाम से भी जाना जाता है जिन्हें ब्रह्मांड के निर्माण का श्रेय दिया जाता है। वे अपने वाहन के रूप में सिंह पर सवार दिखाई देती हैं।
5. स्कंदमाता - स्कंदमाता देवी दुर्गा का पांचवां रूप है और नवरात्रि के पांचवें दिन इनकी पूजा की जाती है, देवी के इस रूप को कार्तिकेय को गोद में लिए हुए एक मातृ देवी के रूप में दर्शाया गया है। उल्लेखनीय है कि कार्तिकेय को स्कंद के नाम से भी जाना जाता है। देवी के इस रूप को चार भुजाओं, तीन आँखों और शेर पर सवार एक महिला देवता के रूप में दर्शाया जाता है। देवी की चार भुजाओं में से दो में कमल है जबकि अन्य दो में से एक में कार्तिकेय और दूसरे हाथ में आशीर्वाद मुद्रा या अभयमुद्रा है। 
6. कात्यायनी - कात्यायनी देवी दुर्गा का छठा रूप है और नवरात्रि के छठे दिन उनकी पूजा की जाती है। उन्हें देवी महादेवी या दुर्गा के योद्धा रूप के रूप में दर्शाया जाता है। दुर्गा के अन्य दो उग्र रूप भद्रकाली और चंडिका हैं। देवी दुर्गा के इस रूप को अठारह भुजाओं और देवताओं द्वारा उपहार में दिए गए विभिन्न हथियारों के साथ शेर पर सवार एक महिला देवी के रूप में दर्शाया जाता है। उन्हें ऋषि कात्यायन के नाम पर कात्यायनी के रूप में जाना जाता है, जिन्होंने देवी दुर्गा की तपस्या की और उन्हें वरदान के रूप में अपनी बेटी के रूप में जन्म लेने के लिए कहा। अर्थात ऋषि कात्यायन की पुत्री कात्यायिनी।
7. कालरात्रि - कालरात्रि सातवां रूप हैं। नवरात्रि के सातवें दिन कालरात्रि की पूजा की जाती है। यह देवी दुर्गा के सबसे रौद्र रूपों में से एक हैं। वे अंधकार और अज्ञान का नाश करने वाली हैं और उन्हें गधे पर सवार दिखाया जाता है, उनकी चार भुजाएं हैं, जिनमें से दो आशीर्वाद और सुरक्षा की मुद्रा में हैं जबकि अन्य दो में तलवार और वज्र रहता है। उन्हें काली के नाम से भी जाना जाता है।
8. महागौरी - महागौरी देवी दुर्गा का आठवां रूप हैं और नवरात्रि के आठवें दिन इस रूप की पूजा की जाती है। देवी के इस रूप को चार भुजाओं वाली देवी के रूप में दर्शाया जाता है, जिनके एक हाथ में त्रिशूल और दूसरे हाथ में डमरू रहता है। अन्य दो भुजाएँ आशीर्वाद और भय को दूर करने के लिए होते हैं जिन्हें क्रमशः वरद और अभय मुद्रा के रूप में भी जाना जाता है। वे एक बैल या सफेद हाथी पर सवार होती हैं।
9. सिद्धिदात्रि - देवी दुर्गा का नौवां और अंतिम रूप सिद्धिदात्रि है और नवरात्रि के नौवें और अंतिम दिन उनकी पूजा की जाती है। उन्हें सभी सिद्धियों की प्रदाता माना जाता है। देवी के इस रूप को कमल पर सवार एक महिला देवी के रूप में दर्शाया गया है, जो अपने चार हाथों में कमल, शंख, गदा और चक्र धारण किए हुए हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार, वे महाशक्ति या सर्वोच्च देवी का अवतार हैं, जिन्होंने ब्रह्मांड का निर्माण किया और शिव ने देवी सिद्धिदात्रि की पूजा करके सभी सिद्धियाँ प्राप्त कीं थीं।

  इस प्रकार देवी के नौ रूपों में मौजूद नौ शक्तियों के स्मरण कात्योहार नवरात्रि। देवी दुर्गा की प्रतिमा में चार अथवा आठ या फिर इससे भी अधिक हाथ बनाए जाते हैं। इन सभी हाथों में विविध आयुध होते हैं। यह मां दुर्गा का शक्तिपुंज स्वरूप होता है। इसकी यदि आज के आधुनिक प्रसंग के रूप में व्याख्या की जाए तो दुर्गा के इस श्ीक्ति पुंज रूप का अरशय है कि बुराई के विरुद्ध विभिन्न स्त्रियों एकजुट हो कर शंखनाद करें और बुराई के शमन का प्रयास करें तो वे अपनी शक्तियों से किसी भी अपराधी को पराजित कर सकती हैं। उदाहरण के लिए, एक स्त्री सड़क पर जा रही है। कोई उद्दण्ड व्यक्ति उसका दुपट्टा या साड़ी का पल्लू खींचता है तो उस स्त्री को डरना नहीं चाहिए बल्कि उसे जोर से चिल्लाना चाहिए। उसकी पुकार को सुन कर अन्य स्त्रियों को उसकी मदद के लिए आगे बढ़ना चाहिए और फिर सब मिल कर उस मनचले को सबक सिखा दें तो फिर कोई दूसरा व्यक्ति ऐसा दुस्साहस नहीं कर सकेगा। लेकिन एक दृश्य यदाकदा ही दिखता है कि जब महिलाएं अपनी शक्ति को पहचान कर, एक जुट हो कर अपने विरुद्ध उठाए गए हर कदम का विरोध करती हों। नवरात्रि में देवी दुर्गा के नौरूपों का स्मरण करने मात्र से संकट दूर होने की आकांक्षा रखने की बजाए उन नौ रूपों से सीख ले कर अपना आत्मबल बढ़ाना ही इस त्योहार की सार्थकता है।  इस त्योहार को यदि आडंबर की दृष्टि से न देख कर इन शक्तियों को सहज भाव से आत्मसात करने की दृष्टि से देखा जाए तो अनुभव होगा कि ये शक्तियों मनुष्य के भीतर आत्मबल के रूप में उपस्थित रहती हैं। इसी सत्य का स्मरण कराता है यह त्योहार।  
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Tuesday, April 1, 2025

पुस्तक समीक्षा | ‘‘रंग बारिश’’: छायावादी नाव पर सवार यथार्थवादी ग़ज़लें | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण


आज 01.04.2025 को 'आचरण' में प्रकाशित - पुस्तक समीक्षा


पुस्तक समीक्षा
‘‘रंग बारिश’’: छायावादी नाव पर सवार यथार्थवादी ग़ज़लें
- समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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गजल संग्रह - रंग बारिश
कवि       - विनय मिश्र
प्रकाशक - लिटिल बर्ड पब्लिकेशंस, 4637/20, शॉप नं.-एफ-5, प्रथम तल, हरि सदन, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली-110002
मूल्य - 395/-
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ग़ज़ल विधा ने जिस प्रकार हिन्दी साहित्य में अपनी जगह बनाई वह इस विधा के प्रति कवियों की रुचि को दर्शाता है। एक ग़ज़ल में तीन से ले कर अनेक शेर हो सकते हैं किन्तु खूबी यह कि हर शेर अपने-आप में स्वतंत्र अस्तित्व रखता है, फिर भी काफिया और रदीफ़ को सहेजता हुआ। ग़ज़ल कहना इतना आसान भी नहीं है जितना की लोग प्रायः मान लेते हैं। कहन की अर्थवत्ता और शिल्प विधान का पालन ही ग़ज़ल को वास्तविक स्वरूप देता है। यदि वज़न ज़रा भी लड़खड़ाया तो पूरी की पूरी ग़ज़ल धराशायी हो जाती है। वहीं कुछ लोग ग़ज़ल को अच्छी तरह साध लेते हैं और अपनी ग़ज़लों के माध्यम से अपनी पहचान बना लेते हैं। विगत दिनों हिन्दी काव्य विधा के चर्चित साहित्यकार विनय मिश्र का ग़ज़ल संग्रह ‘‘रंग बारिश’’ प्रकाशित हुआ है। इसमें उनकी कुल 110 ग़ज़लें हैं। यद्यपि पुस्तक में विनय मिश्र का परिचय प्रकाशित नहीं हैं किन्तु जो उनके लेखन से परिचित हैं वे जानते हैं कि काव्य जगत में उनका एक विशेष स्थान है। 
       नयी दिल्ली की वरिष्ठ लेखिका व लोकधर्मी आलोचक कुसुमलता सिंह की फ्लैप पर दी गई अपनी टिप्पणी में उन्होंने कहा है कि ‘‘अब इसमें खुद के साथ बैठने का जो ‘जरा-सा’ काम है वही मिश्र जी की भाषा की कारीगरी है। ‘रंग बारिश’ में संग्रहीत गजलों में आज के समय संदर्भ की समग्रता में व्यंजना है। पूर्व और पश्चिमी काव्य-चिंतन का अनुशीलन करते हुए मुझे लगता है कि इन गजलों ने सौंदर्यबोध के नए मानक स्थापित किए हैं। टी. एस. इलियट कहते हैं कि कविता का अस्तित्व मात्र वही नहीं है जो ‘कवि’ ने सोचा था अथवा जो पाठक सोचता है और न उसके ‘प्रयोजन’ की यही सीमा बाँधी जा सकती है। वस्तुतः कविता का हमसे भिन्न, अपना अस्तित्व हमसे पहले था और बाद में भी रहेगा।’’
    वस्तुतः ग़ज़ल जब दिल और दिमाग के ताने-बाने से बुनी जाती है तो वह सटीक एवं सार्थक होती है तथा पढ़ने या सुनने वाले पर अपनी गहरी छाप छोड़ती है। समय तेजी से टेक्नालाॅजी के हवाले होता जा रहा है। आर्टीफीशियल इंटेलीजेंस का चलन तो सोचने-समझने की क्षमता भी छीन लेने को आमादा है। संवादों की संक्षिप्तता इमोजीज़ में ढल कर इस तरह कोडीफाई हो गई है अब संवादों का विस्तार नई पीढ़ी को निरर्थक लगता है। किन्तु वहीं दूसरी ओर जिसने लंबी-लंबी चिट्ठियों का स्वाद चखा है, वही उसके स्वाद को समझ सकता है।  विनय मिश्र ने बदलती जीवन शैली पर पैनी दृष्टि रखते हुए ग़ज़ल की मूल प्रवृत्ति रूमानियत को भी बड़ी खूबी के साथ समेटा है। एक ग़ज़ल के ये शेर देखिए-
तेरे मेरे सबके मन की चिट्ठियां।
याद आती है वो लंबी चिट्ठियां।
चैट मैसेज काॅल का है वक़्त पर
अपने एहसासों की धरती चिट्ठयां।
इसी ग़ज़ल का एक और खूबसूरत शेर है जो नास्टैल्जिक होता हुआ स्मृतियों के रंग को और गाढ़ा कर देता है-
टांगनी थीं जब भी यादों की कमीज़
हो  गई  थीं  एक  खूंटी चिट्ठियां।
विनय मिश्र अपने विचारों में स्पष्ट हैं। वे जीवन को अपनी दृष्टि से देखते हैं और मौलिकता को प्रधान तत्व मानते हैं। वे मौलिक होने में विश्वास रखते हैं, किसी की प्रतिकृति होने में नहीं। वे कटाक्ष करते हुए लिखते हैं-
दूसरों को देखने की मुझको आदत ही नहीं ।
जो नहीं हूँ वो मुझे होने की चाहत ही नहीं।
यह समय रोबोट का है यह समय ए.आइ. का
इस समय को आदमी की अब जरूरत ही नहीं।
ग़ज़लकार ने अपनी बात कहने के लिए प्राकृतिक बिम्बों का भी सहारा लिया है जिससे उनके भाव और अधिक कोमल और प्रभावी हो गए हैं। जैसे ये शेर हैं-
किसी कागज पे कोई ख़्वाब लिखना।
न  पूछो  ये  अधूरापन  है कितना।
हवा  लहरों  के  पन्ने   खोलती है
नदी  को  हो  गया  आसान पढ़ना।
इस उपरोक्त शेर में नदी को पढ़ना ज़िन्दगी को पढ़ने के समान है। विनय मिश्र की ग़ज़लों में छायावादी तत्व प्रभावी हो उठते हैं जब वे प्रकृति का मानवीयकरण कर के अपनी बात कहते हैं। छायावाद की यही तो विशेषता रही कि उसमें प्रकृति का मानवीकृत करते हुए जीवन के प्रत्येक पक्ष एवं भावनाओं को अभिव्यक्ति दी गई। इस खूबी को विनय मिश्र ने भी अपनाया है। बानगी देखिए - 
अपने सिर को झुका रही है अब।
रात  चेहरा  छुपा   रही है अब।
आज के दिन को अलविदा कहकर
आखिरी  धूप  जा  रही  है अब।
मंहगाई, अपनों से दूरियां, पीढ़ियों के बीच मतभेद, बुजुर्गों की अवहेलना, युवाओं के प्रति अविश्वास, बेरोजगारी आदि समस्याएं वर्तमान की मुखर समस्याएं हैं। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो ये लगभग हर घर की समस्याएं हैं। अतः जब सब के दुख एक से हों तो किसी के भी दुख की चर्चा अपने दुख की चर्चा लगती है। ग़ज़लकार ने लिखा है कि ‘‘घर घर जिसकी चर्चा है/वो दुख कितना अपना है।’’
किसी भी काव्य विधा की महत्ता तब और अधिक बढ़ जाती है जब उसमें नूतन बिम्ब प्रयोग किए जाते हैं। ऐसा करने से काव्य में कहन का सपाटपन दूर होत है और पाठक से तादात्म्य गहरा जाता है। विनय मिश्र ने अपने कुछ शेरो में नवीन टटके प्रयोग किए हैं जो बहुत रोचक और प्रभावी बन पड़े हैं। जैसे घुटनों तक आने के मुहावरे का प्रयोग-
आँखों के  सपने तक हूँ
मंजिल के मिलने तक हूँ
जिसको कहना मुश्किल है
मैं उसको  कहने तक हूँ
तेरी  ये  खुशफहमी है
मैं  तेरे  घुटने  तक हूँ
कवि ने राजनीति के चरित्र को भी अपनी ग़ज़ल में उकेरा है। राजनीति में किसी भी बात का सिरा समझना कठिन होता है। सारे दांव-पेंच इतने गोलमोल होते हैं कि आमजन तो उन्हें समझ ही नहीं पाता है। जैसे रथ के घूमते हुए पहिए की तीलियां घूमती हुई एक समान गति की प्रतीत होती हैं। उन्हें एकटक देखने वाला व्यक्ति उन घूमती हुई तीलियों के स्पेस को माप नहीं सकता लेकिन उसकी दृष्टि चकरा जरूर जाएगी। कुछ ऐसा ही कहा गया है इस शेर में-

कितना रहस्यमय है ये रथ राजनीति का
पहिये-सी घूमती हुई जिसकी कला चले
कवि ने जीवन की विसंगतियों, विषमताओं एवं विडंबनाओं को केामलता से रेखांकित करते हुए भी प्रेम के तत्व को प्रमुखता दी है। ऐसा करते हुए कवि ने प्रेम के सौंदर्य को जिन शब्दों में व्याख्यायित किया है वह किसी के भी मन को छू लेने में सक्षम है। एक ग़ज़ल के चंद शेर देखिए-
हर सुबह एक ताजगी होकर।
रात  आती है रौशनी होकर।
आज  तेरे  किनारे  बैठा हूँ
और तू बह रही नदी होकर।
हर  कोई  वक्त पूछता है यूँ
रह गया जैसे मैं घड़ी होकर।
विनय मिश्र का ग़ज़ल संग्रह ‘‘रंग बारिश’’ सधे हुए शिल्प की वे ग़ज़लें हैं जो छायावादी नाव पर सवार हो कर यथार्थ के अनुभवों को सहेजे हुए हैं। इन ग़ज़लों में प्रेमाभिव्यक्ति की स्निग्धता है और विसंगतियों पर कटाक्ष भी। इन ग़ज़लों में रोबोट होते जीवन में प्रेम को जी लेने की ललक है। ये ग़ज़लें सभी को अपने मन की बात सी प्रतीत होंगी। इसीलिए ‘‘रंग बारिश’’ हर आयुवर्ग के पाठकों को पसंद आएगा। 
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Saturday, March 29, 2025

टॉपिक एक्सपर्ट | पत्रिका | लेओ फेर के पिट गई पुलिस | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

पत्रिका | टॉपिक एक्सपर्ट | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली में
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लेओ फेर के पिट गई पुलिस
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह    
       हऔ, सांची आए जे खबर के फेर के पिट गई पुलिस औ बा बी ई दफा अपने सागर जिला में। का भओ के कछु पुलिसवारे महुआखेड़ा पौंचे आरोपी खों पकड़बे के लाने। उते उनको डंडा, पथरा औ कुल्हड़िया से वेलकम करो गओ। बचत-बचत बी कछु पुलिस वारन खों चोटें-मोटें घल गईं। बताओ गओ के पुलिसवारे कछू ने कर सके, काए से के उन ओरन के पास बंदूकें ना हतीं, खाली डंडा रओ। सो अब दो बातें सोचबे की आएं के जो उन पुलिस वारन के पास डंडा की जांगा बंदूकें होतीं तो बे का कर लेते? बिगैर ऊपर की परमीसन के बे गोली तो चला ने सकत्ते। भौतई होती तो एकाध चिरैया उड़ाऊ फायर मने हवाई फायर कर लेते। बाकी ऊके बाद सबरे उनई खों गरियाउते के उन्ने काय खों गोली चलाई? मने ने करे में सल्ल औ ने ना कर पाबे में सल्ल।  
बाकी दूसरी सोचबे वारी बात जे आए के कभऊं रीवा में, कभऊं सतना में, कभऊं इन्दौर में, तो कभऊं मंदसौर में औ अब सागर में सोई पुलिस पिट गई। जो ऐसो काय हो रओ? पुलिसवारन ने कोन के खेत पटा लए, के उनकी दसा ठुकेली-पिटेली सी भई जा रई? बाकी बे का कोऊ के खेत पटाहें, बे तो ऊंसईं नेता-मंत्री हरों के दौरा की ड्यूटी करत-करत दूबरे होत रैत आएं। सो, निकर के जेई बात आऊत आए के बदमास हरों औ ऊनके संगवारन में पुलिस को डर कम होत जा रओ। तभई तो बे मारबे दौड़त आएं। सो, ई पे गंभीरता से विचार करे की ज़रूरत आए। ने तो ऐसे तो पुलिसवारन को मनोबल टूटहे औ फेर पब्लिक को का हुइए? पब्लिक खों रैने परहे टोटल रामभरोसे। सो, समै रैत भए सासन-प्रसासन ई तरफी बी तनक ध्यान दे लैवे।
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Friday, March 28, 2025

शून्यकाल | रांगेय राघव की संवेदनाओं को समझने का प्रवेश द्वार है रिपोर्ताज़ “तूफानों के बीच” | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नयादौर

दैनिक 'नयादौर' में मेरा कॉलम - शून्यकाल
रांगेय राघव की संवेदनाओं को समझने का प्रवेश द्वार है रिपोर्ताज़ “तूफानों के बीच”
 - डाॅ (सुश्री) शरद सिंह                                                                                        
        यह रिपोर्ताज बंगाल के काल की भीषणता को बखूबी सामने रखता है। रांगेय राघव का रिपोर्ताज़ “ तूफानों के बीच” उनके कथेत्तर साहित्य कि वह निधि है जो हिंदी साहित्य के कथेत्तर साहित्य को समृद्ध करती है। यदि रांगेय राघव की संवेदनाओं को भली-भांति समझना है तो इस रिपोर्ताज को पढ़ना जरूरी है। इससे होकर गुजरने के बाद उनके उपन्यास तथा अन्य कथा साहित्य की संवेदनात्मकता और अधिक निकट महसूस होती है। यदि शिल्प की दृष्टि से देखा जाए तो इसे रिपोर्ताज़ लिखने वालों के लिए एक “गाइड बुक” भी कहा जा सकता है। यह रिपोर्ताज बताता है की कठोर से कठोर और भयानक यथार्थ को किस प्रकार साहित्यिकता के साथ सामने रखा जा सकता है जिससे पढ़ने वाला उसे घटना की दृश्यात्मकता को आत्मसात कर सके साथ ही, उसकी कटु सच्चाई से भी अवगत हो सके। 
रांगेय राघव की मातृभाषा तमिल थी।  उनका नाम मूल नाम था तिरुमल्लै नंबाकम वीर राघव आचार्य। किंतु उन्होंने “रांगेय राघव” के नाम से अपना समस्त साहित्य लिखा। उनके पूर्वज आंध्र प्रदेश मे तिरुपति के निवासी थे लेकिन उनका जन्म 17 जनवरी 1923 को आगरा में हुआ था। कई बार यह स्थिति देखने को मिलती है कि हिंदी भाषी लोग हिंदी भाषी क्षेत्र में जन्म लेकर जीवन यापन करते हुए भी हिंदी को पूरी तरह से आत्मसात नहीं कर पाते हैं किंतु रांगेय राघव का जन्म ही शायद दो भाषाओं के बीच एक सौहार्दय-सेतु के रूप में हुआ था इसीलिए उन्होंने तमिल भाषी परिवार में जन्म लेकर भी अपने पूरे जीवन भर हिंदी की ही सेवा की। हिंदी भाषा पर उनकी अच्छी पकड़ थी। हिंदी साहित्य को समृद्ध करने में उनके अवदान अद्वितीय है।  यद्यपि उनका जीवनकाल अधिक नहीं रहा। 12 सितंबर 1962 को कैंसर से उनका निधन हो गया। लेकिन अपने 39 वर्ष के छोटे से जीवन काल में उन्होंने लगभग 100 किताबें लिखीं। जिनमें फिक्शन उपन्यास, जीवनीपरक उपन्यास, कहानी, जीवनी, रिपोर्ताज़ आदि शामिल है। उस पर विशेष बात यह है कि उनकी किसी भी कृति को अपरिपक्व को नहीं कहा जा सकता है। उनकी सभी कृतियां पूर्णतया परिपक्व तथा ठहर कर, विचारपूर्वक और पूरी गंभीरता से लिखी गई हैं। अपनी हर विधा के प्रति उन्होंने पूरा-पूरा न्याय किया है। जब रांगेय राघव के उपन्यासों को कोई व्यक्ति पढ़े तो उसे यही लगता है कि वे एक श्रेष्ठ उपन्यासकार थे, जब उनकी कहानियों को कोई पढ़ता है तो उसे लगता है कि वे एक उत्कृष्ट कहानीकार थे। वहीं, जब उनके रिपोर्ताज़ को पढ़ा जाए तो ऐसा लगता है कि वह उच्चकोटि के पत्रकार और यथार्थवादी साहित्यकार थे। अब यदि उनके सीमित जीवन काल 39 वर्ष की अवधि से किशोरावस्था में पहुंचने तक की 14 वर्ष की आयु घटा दी जाए तो बचते हैं कल 25 वर्ष। इस 25 वर्ष को उनके लेखन कला की अवधि माना जा सकता है। यद्यपि कानून वाली होने की आयु 18 वर्ष मानी जाती है किंतु साहित्य के सृजन के लिए किशोरावस्था से भी गणना की जा सकती है। मात्र 25 वर्ष में 100 पुस्तके वह भी विविध विधाओं में यानी मल्टीडाइमेंशनल क्रिएटिविटी का इतना अनुपम उदाहरण हिंदी में प्रायः देखने को नहीं मिलता है। यदि यह कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी कि रांगेय राघव का जन्म ही साहित्य सृजन के लिए हुआ था विशेष रूप से हिंदी साहित्य को समृद्ध करने के लिए। यदि उन्हें धूम्रपान की लत यानी चैन स्मोकिंग की आदत नहीं होती तो शायद वे और अधिक समय इस दुनिया में रहते और साहित्य की ओर अधिक सेवा करते। किंतु 100 पुस्तकों के बाद शायद उनका दायित्व समाप्त हो गया था और इस दुनिया में उनकी अवधि समाप्त हो गई थी, यही सोच कर संतोष करना पड़ता है।

रिपोर्ताज विधा अपने आप में एक विशिष्ट विधा है । वैसे रिपोर्ताज़ शब्द हिंदी का नहीं है यह फ्रांसीसी शब्द है जो हिंदी में आत्मसात कर लिया गया है।  जिसका अर्थ है "रिपोर्ट" या "विवरण”। 
रिपोर्ताज में, पत्रकार या लेखक किसी घटना को अपनी भाषा और शैली में, कलात्मक ढंग से प्रस्तुत करता है, ताकि पाठक को घटना का निकटता से अनुभव हो सके।

हिंदी में रिपोर्ताज लेखन की शुरुआत 1940 के आस-पास हुई। हिंदी में रिपोर्ताज विधा का जनक शिवदान सिंह चौहान को माना जाता है जिन्होंने “लक्ष्मीपुरा”, “मौत के खिलाफ जिंदगी की लड़ाई” जैसे रिपोर्ताज लिखे। रिपोर्ताज़ लेखन की अपनी कुछ शर्ते हैं। जिनमें से प्रमुख हैं - 1.किसी विशेष घटना को अपनी मानसिक छवि में बदलते हुए उसे लेखकीय रूप में प्रस्तुत करना। 2.रिपोर्ट में कल्पना का इस्तेमाल आटे में नमक बराबर किया जाता है। जिस घटना अपने पूर्ण प्रभाव के साथ प्रस्तुत हो सके किंतु उसकी वास्तविकता पर प्रभाव न पड़े। 3.रिपोर्ताज घटना प्रधान होने के कारण ही कथा तत्व से भी युक्त होना चाहिए। 4.रिपोर्टर्स लेखक को पत्रकार और साहित्यकार दोनों की संतुलित भूमिका निभानी चाहिए अर्थात साहित्यिक शब्दों में यथार्थ को प्रस्तुत करना रिपोर्ताज का मूल होना चाहिए। 5. यदि बात रिपोर्ताज के कला पक्ष की जाए, तो उसमें वास्तविक पात्र, कथात्मकता, चरित्र, संवाद और विवरण शैली की प्रमुखता होती है। 6.रिपोर्ताज़ कथेत्तर साहित्य की विधा की श्रेणी में आता है। इसमें घटना की कथा तो होती है किंतु इसका प्रस्तुतिकरण काल्पनिक कथा के समान न होकर यथार्थ रिपोर्ट की भांति होता है किंतु साहित्यिक शैली में।

     रांगेय राघव का रिपोर्ताज़ “तूफानों के बीच” इन सारे बिंदुओं पर खरा उतरता है। “तूफानों के बीच” सन 1943 में पड़े बंगाल के काल पर आधारित है। इस अकाल के संबंध में हमेशा यह बात सामने आई कि वह अकाल की स्थिति प्राकृतिक के बजाय सरकारी असहयोग एवं अव्यवस्था के कारण उत्पन्न हुई। उसे समय लंदन में विंटर चर्चिल प्रधानमंत्री थे। जिन्होंने बंगाल में पड़े अकाल के प्रति संवेदनशीलता दिखाई। जिसके कारण बंगाल में हजारों लोगों की मौत हुई और एक विभीषिका के रूप में वह समय इतिहास में दर्ज़ है।
      रांगेय राघव ने बंगाल के काल के सच को पूरी गंभीरता और सच्चाई के साथ अपने रिपोर्ताज में प्रस्तुत किया है।
      रिपोर्ताज़ की जो यह विधा है उसका यथार्थ बोध सबसे महत्वपूर्ण तत्व है। जब मैंने अपना पहला उपन्यास पिछले पन्ने की औरतें लिखा तो उसमें यथार्थ का चित्रण करते हुए मात्र उन पात्रों के नाम मैंने परिवर्तित किया जिनके सम्मान की रक्षा करना भी मेरा दायित्व था। किंतु उस समुदाय, जिसकी महिलाओं के जीवन पर मेरा यह उपन्यास आधारित है, उनके सच और पीड़ा भरे यथार्थ को सामने रखना भी मेरा लेखकीय बोध था। इसीलिए मैंने अपने उसे उपन्यास को रिपोर्ताज़िक उपन्यास कहा और वरिष्ठ आलोचकों ने इसे हिंदी उपन्यास विधा का एक “टर्निंग पॉइंट” माना।
      संभावित इसीलिए  “तूफानों के बीच” को पढ़ते समय मैं उसकी विधागत तत्वों से स्वयं को घनिष्ठता से जोड़ पाई। 
     एक कारण और भी था इस रिपोर्ताज के प्रति मेरे आकर्षण का कि मैं एक इतिहास की विद्यार्थी रही हूं, आज भी हूं। और, मैंने एक जीवनीकार के रूप में जब श्यामा प्रसाद मुखर्जी की जीवनी लिखी तो बंगाल के अकाल के दौरान उनके द्वारा किए गए सहायता कार्य एवं प्रयासों के बारे में पढ़ते समय मुझे बंगाल के उस काल की भयावहता का भी अनुभव हुआ। इसके बाद मैं बीबीसी द्वारा लिए गए हुए साक्षात्कार पढ़े और देखें जो उन्होंने काल से बच गए लोगों को जो साक्षात्कार तक चरम वृद्धावस्था में पहुंच चुके थे उनके अनुभव को आत्मसात करने का कंपा देने वाली अनुभूति हुई। उस दौरान मुझे रांगेय राघव का रिपोर्ताज़ “तूफानों के बीच” याद आने लगा, जिसमें लगभग वही दृश्य अक्षरशः से मौजूद हैं।

      “तूफानों के बीच”  जिसका 1946 ई., 'हंस' पत्रिका में बंगाल के अकाल से संबंधित इस रिपोर्ताज़  का पुस्तकाकार संकलन किया गया। यह चार भागों में लिखा गया है - बांध मांगे दाओ, एक रात, मरेंगे साथ जियेंगे साथ, अदम्य जीवन।
        
        सन 1942 से 44 के बीच जब बंगाल में भीषण अकाल पड़ा उसे समय रांगेय राघव आगरा में निवास कर रहे थे और उनकी आयु मात्र 19 वर्ष थी उसे समय आगरा के प्रगतिशील लेखक संघ के द्वारा एक प्रतिनिधि दल बंगाल भेजा गया ताकि वहां की स्थिति का सही पता चल सके इस दल में एक रिपोर्टर के रूप में रांगेय राघव भी शामिल थे। जब बंगाल पहुंचकर रांगेय राघव ने वहां की भीषण स्थिति को दिखा तो उनका युवा मन कांप उठा। उन्होंने “तूफानों के बीच” की भूमिका में लिखा है-
   “बंगाल का अकाल मानवता के इतिहास का बहुत बड़ा कलंक है। शायद क्लियोपैट्रा भी धन के वैभव और साम्राज्य की लिप्सा में अपने गुलामों को इतना भीषण दुख नहीं दे सकी जितना आज एक साम्राज्य और अपने ही देश के पूँजीवाद ने बंगाल के करोड़ों आदमी, औरतों और बच्चों को भूखा मारकर दिया है।"
    उसे समय बंगाल में स्थित यह थी की अपना पेट भरने के लिए लोगों को अपने बच्चों को बेचना पड़ रहा था इससे बड़ा दुर्भाग्य और कुछ नहीं हो सकता था। दुख और भाग के लिए लोग आपस में लड़ पड़ते थे। गांव के गांव भुखमरी से मौत के शिकार हो गए थे। देश की विभिन्न समाजसेवी संस्थाएं एवं समाजसेवी आगे बढ़कर वहां के लोगों की मदद कर रहे थे किंतु ब्रिटिश सरकार गोया उनकी मौत का तमाशा देख रही थी। दूसरे राजनीतिक उद्देश्यों पर डटे हुए महात्मा गांधी ने उसे काल की स्थिति पर अधिक ध्यान नहीं दिया जिसके लिए उन पर हमेशा प्रश्न चिन्ह लगाया जाता है। क्योंकि वे ऐसे सशक्त व्यक्ति थे जिनके पहल करने पर ब्रिटिश सरकार को मामले को गंभीरता से लेने के लिए मजबूर होना पड़ता है। वही श्यामा प्रसाद मुखर्जी जैसे राष्ट्रवादी व्यक्तित्व आगे बढ़कर बंगाल के लोगों की सहायता कर रहे थे।
     यह रिपोर्ताज बंगाल के काल की भीषणता को बखूबी सामने रखता है। रांगेय राघव का रिपोर्ताज़ “ तूफानों के बीच” उनके कथेत्तर साहित्य कि वह निधि है जो हिंदी साहित्य के कथेत्तर साहित्य को समृद्ध करती है। यदि रांगेय राघव की संवेदनाओं को भली-भांति समझना है तो इस रिपोर्ताज को पढ़ना जरूरी है। इससे होकर गुजरने के बाद उनके उपन्यास तथा अन्य कथा साहित्य की संवेदनात्मकता और अधिक निकट महसूस होती है। यदि शिल्प की दृष्टि से देखा जाए तो इसे रिपोर्ताज़ लिखने वालों के लिए एक “गाइड बुक” भी कहा जा सकता है। यह रिपोर्ताज बताता है की कठोर से कठोर और भयानक यथार्थ को किस प्रकार साहित्यिकता के साथ सामने रखा जा सकता है जिससे पढ़ने वाला उसे घटना की दृश्यात्मकता को आत्मसात कर सके साथ ही, उसकी कटु सच्चाई से भी अवगत हो सके। 
    रांगेय राघव ने जिस प्रकार अपने सृजन से हिंदी साहित्य को समृद्ध किया है वह तो अद्वितीय है ही, साथ ही, उन्होंने यथार्थ लेखन को जिस तरह अपने रिपोर्ताज “तूफानों के बीच” द्वारा रेखांकित किया है वह भी अद्वितीय है।
*(डॉ हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय की हिंदी विभाग द्वारा आयोजित "इतिहास कथाश्रित हिन्दी कथा लेखन और रांगेय राघव का अवदान" विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के प्रथम सत्र में कथेत्तर साहित्य पर मेरे द्वारा दिए गए व्याख्यान का अंश)*
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Thursday, March 27, 2025

डॉ (सुश्री) शरद सिंह की नाटकों की दो पुस्तकें

विश्व रंगमंच दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं 🎭
 नाटकों की मेरी दो पुस्तकें... 🎭🎭🎭
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डॉ (सुश्री) शरद सिंह का व्याख्यान रांगेय राघव के रिपोर्ताज "तूफानों के बीच" पर डॉ हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय की राष्ट्रीय संगोष्ठी में


25 मार्च 2025 को हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय की हिंदी विभाग द्वारा आयोजित "इतिहास कथाश्रित हिन्दी कथा लेखन और रांगेय राघव का अवदान" विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के प्रथम सत्र में मैंने रांगेय राघव के रिपोर्ताज़ “तूफानों के बीच” पर अपना व्याख्यान दिया जिसे आप यूट्यूब के इस लिंक पर सुन सकते हैं-

https://youtu.be/SOPiSgJY2l4?si=pWQor3FKlaDNsrkj

मेरे व्याख्यान को यूट्यूब पर उपलब्ध कराने के लिए भाई माधव चंद्र चंदेल जी का हार्दिक आभार🙏


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