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Wednesday, April 2, 2025
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Tuesday, April 1, 2025
पुस्तक समीक्षा | ‘‘रंग बारिश’’: छायावादी नाव पर सवार यथार्थवादी ग़ज़लें | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण
आज 01.04.2025 को 'आचरण' में प्रकाशित - पुस्तक समीक्षा
पुस्तक समीक्षा
‘‘रंग बारिश’’: छायावादी नाव पर सवार यथार्थवादी ग़ज़लें
- समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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गजल संग्रह - रंग बारिश
कवि - विनय मिश्र
प्रकाशक - लिटिल बर्ड पब्लिकेशंस, 4637/20, शॉप नं.-एफ-5, प्रथम तल, हरि सदन, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली-110002
मूल्य - 395/-
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ग़ज़ल विधा ने जिस प्रकार हिन्दी साहित्य में अपनी जगह बनाई वह इस विधा के प्रति कवियों की रुचि को दर्शाता है। एक ग़ज़ल में तीन से ले कर अनेक शेर हो सकते हैं किन्तु खूबी यह कि हर शेर अपने-आप में स्वतंत्र अस्तित्व रखता है, फिर भी काफिया और रदीफ़ को सहेजता हुआ। ग़ज़ल कहना इतना आसान भी नहीं है जितना की लोग प्रायः मान लेते हैं। कहन की अर्थवत्ता और शिल्प विधान का पालन ही ग़ज़ल को वास्तविक स्वरूप देता है। यदि वज़न ज़रा भी लड़खड़ाया तो पूरी की पूरी ग़ज़ल धराशायी हो जाती है। वहीं कुछ लोग ग़ज़ल को अच्छी तरह साध लेते हैं और अपनी ग़ज़लों के माध्यम से अपनी पहचान बना लेते हैं। विगत दिनों हिन्दी काव्य विधा के चर्चित साहित्यकार विनय मिश्र का ग़ज़ल संग्रह ‘‘रंग बारिश’’ प्रकाशित हुआ है। इसमें उनकी कुल 110 ग़ज़लें हैं। यद्यपि पुस्तक में विनय मिश्र का परिचय प्रकाशित नहीं हैं किन्तु जो उनके लेखन से परिचित हैं वे जानते हैं कि काव्य जगत में उनका एक विशेष स्थान है।
नयी दिल्ली की वरिष्ठ लेखिका व लोकधर्मी आलोचक कुसुमलता सिंह की फ्लैप पर दी गई अपनी टिप्पणी में उन्होंने कहा है कि ‘‘अब इसमें खुद के साथ बैठने का जो ‘जरा-सा’ काम है वही मिश्र जी की भाषा की कारीगरी है। ‘रंग बारिश’ में संग्रहीत गजलों में आज के समय संदर्भ की समग्रता में व्यंजना है। पूर्व और पश्चिमी काव्य-चिंतन का अनुशीलन करते हुए मुझे लगता है कि इन गजलों ने सौंदर्यबोध के नए मानक स्थापित किए हैं। टी. एस. इलियट कहते हैं कि कविता का अस्तित्व मात्र वही नहीं है जो ‘कवि’ ने सोचा था अथवा जो पाठक सोचता है और न उसके ‘प्रयोजन’ की यही सीमा बाँधी जा सकती है। वस्तुतः कविता का हमसे भिन्न, अपना अस्तित्व हमसे पहले था और बाद में भी रहेगा।’’
वस्तुतः ग़ज़ल जब दिल और दिमाग के ताने-बाने से बुनी जाती है तो वह सटीक एवं सार्थक होती है तथा पढ़ने या सुनने वाले पर अपनी गहरी छाप छोड़ती है। समय तेजी से टेक्नालाॅजी के हवाले होता जा रहा है। आर्टीफीशियल इंटेलीजेंस का चलन तो सोचने-समझने की क्षमता भी छीन लेने को आमादा है। संवादों की संक्षिप्तता इमोजीज़ में ढल कर इस तरह कोडीफाई हो गई है अब संवादों का विस्तार नई पीढ़ी को निरर्थक लगता है। किन्तु वहीं दूसरी ओर जिसने लंबी-लंबी चिट्ठियों का स्वाद चखा है, वही उसके स्वाद को समझ सकता है। विनय मिश्र ने बदलती जीवन शैली पर पैनी दृष्टि रखते हुए ग़ज़ल की मूल प्रवृत्ति रूमानियत को भी बड़ी खूबी के साथ समेटा है। एक ग़ज़ल के ये शेर देखिए-
तेरे मेरे सबके मन की चिट्ठियां।
याद आती है वो लंबी चिट्ठियां।
चैट मैसेज काॅल का है वक़्त पर
अपने एहसासों की धरती चिट्ठयां।
इसी ग़ज़ल का एक और खूबसूरत शेर है जो नास्टैल्जिक होता हुआ स्मृतियों के रंग को और गाढ़ा कर देता है-
टांगनी थीं जब भी यादों की कमीज़
हो गई थीं एक खूंटी चिट्ठियां।
विनय मिश्र अपने विचारों में स्पष्ट हैं। वे जीवन को अपनी दृष्टि से देखते हैं और मौलिकता को प्रधान तत्व मानते हैं। वे मौलिक होने में विश्वास रखते हैं, किसी की प्रतिकृति होने में नहीं। वे कटाक्ष करते हुए लिखते हैं-
दूसरों को देखने की मुझको आदत ही नहीं ।
जो नहीं हूँ वो मुझे होने की चाहत ही नहीं।
यह समय रोबोट का है यह समय ए.आइ. का
इस समय को आदमी की अब जरूरत ही नहीं।
ग़ज़लकार ने अपनी बात कहने के लिए प्राकृतिक बिम्बों का भी सहारा लिया है जिससे उनके भाव और अधिक कोमल और प्रभावी हो गए हैं। जैसे ये शेर हैं-
किसी कागज पे कोई ख़्वाब लिखना।
न पूछो ये अधूरापन है कितना।
हवा लहरों के पन्ने खोलती है
नदी को हो गया आसान पढ़ना।
इस उपरोक्त शेर में नदी को पढ़ना ज़िन्दगी को पढ़ने के समान है। विनय मिश्र की ग़ज़लों में छायावादी तत्व प्रभावी हो उठते हैं जब वे प्रकृति का मानवीयकरण कर के अपनी बात कहते हैं। छायावाद की यही तो विशेषता रही कि उसमें प्रकृति का मानवीकृत करते हुए जीवन के प्रत्येक पक्ष एवं भावनाओं को अभिव्यक्ति दी गई। इस खूबी को विनय मिश्र ने भी अपनाया है। बानगी देखिए -
अपने सिर को झुका रही है अब।
रात चेहरा छुपा रही है अब।
आज के दिन को अलविदा कहकर
आखिरी धूप जा रही है अब।
मंहगाई, अपनों से दूरियां, पीढ़ियों के बीच मतभेद, बुजुर्गों की अवहेलना, युवाओं के प्रति अविश्वास, बेरोजगारी आदि समस्याएं वर्तमान की मुखर समस्याएं हैं। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो ये लगभग हर घर की समस्याएं हैं। अतः जब सब के दुख एक से हों तो किसी के भी दुख की चर्चा अपने दुख की चर्चा लगती है। ग़ज़लकार ने लिखा है कि ‘‘घर घर जिसकी चर्चा है/वो दुख कितना अपना है।’’
किसी भी काव्य विधा की महत्ता तब और अधिक बढ़ जाती है जब उसमें नूतन बिम्ब प्रयोग किए जाते हैं। ऐसा करने से काव्य में कहन का सपाटपन दूर होत है और पाठक से तादात्म्य गहरा जाता है। विनय मिश्र ने अपने कुछ शेरो में नवीन टटके प्रयोग किए हैं जो बहुत रोचक और प्रभावी बन पड़े हैं। जैसे घुटनों तक आने के मुहावरे का प्रयोग-
आँखों के सपने तक हूँ
मंजिल के मिलने तक हूँ
जिसको कहना मुश्किल है
मैं उसको कहने तक हूँ
तेरी ये खुशफहमी है
मैं तेरे घुटने तक हूँ
कवि ने राजनीति के चरित्र को भी अपनी ग़ज़ल में उकेरा है। राजनीति में किसी भी बात का सिरा समझना कठिन होता है। सारे दांव-पेंच इतने गोलमोल होते हैं कि आमजन तो उन्हें समझ ही नहीं पाता है। जैसे रथ के घूमते हुए पहिए की तीलियां घूमती हुई एक समान गति की प्रतीत होती हैं। उन्हें एकटक देखने वाला व्यक्ति उन घूमती हुई तीलियों के स्पेस को माप नहीं सकता लेकिन उसकी दृष्टि चकरा जरूर जाएगी। कुछ ऐसा ही कहा गया है इस शेर में-
कितना रहस्यमय है ये रथ राजनीति का
पहिये-सी घूमती हुई जिसकी कला चले
कवि ने जीवन की विसंगतियों, विषमताओं एवं विडंबनाओं को केामलता से रेखांकित करते हुए भी प्रेम के तत्व को प्रमुखता दी है। ऐसा करते हुए कवि ने प्रेम के सौंदर्य को जिन शब्दों में व्याख्यायित किया है वह किसी के भी मन को छू लेने में सक्षम है। एक ग़ज़ल के चंद शेर देखिए-
हर सुबह एक ताजगी होकर।
रात आती है रौशनी होकर।
आज तेरे किनारे बैठा हूँ
और तू बह रही नदी होकर।
हर कोई वक्त पूछता है यूँ
रह गया जैसे मैं घड़ी होकर।
विनय मिश्र का ग़ज़ल संग्रह ‘‘रंग बारिश’’ सधे हुए शिल्प की वे ग़ज़लें हैं जो छायावादी नाव पर सवार हो कर यथार्थ के अनुभवों को सहेजे हुए हैं। इन ग़ज़लों में प्रेमाभिव्यक्ति की स्निग्धता है और विसंगतियों पर कटाक्ष भी। इन ग़ज़लों में रोबोट होते जीवन में प्रेम को जी लेने की ललक है। ये ग़ज़लें सभी को अपने मन की बात सी प्रतीत होंगी। इसीलिए ‘‘रंग बारिश’’ हर आयुवर्ग के पाठकों को पसंद आएगा।
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डॉ (सुश्री) शरद सिंह की नाटकों की दो पुस्तकें
डॉ (सुश्री) शरद सिंह का व्याख्यान रांगेय राघव के रिपोर्ताज "तूफानों के बीच" पर डॉ हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय की राष्ट्रीय संगोष्ठी में
25 मार्च 2025 को हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय की हिंदी विभाग द्वारा आयोजित "इतिहास कथाश्रित हिन्दी कथा लेखन और रांगेय राघव का अवदान" विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के प्रथम सत्र में मैंने रांगेय राघव के रिपोर्ताज़ “तूफानों के बीच” पर अपना व्याख्यान दिया जिसे आप यूट्यूब के इस लिंक पर सुन सकते हैं-
https://youtu.be/SOPiSgJY2l4?si=pWQor3FKlaDNsrkj
मेरे व्याख्यान को यूट्यूब पर उपलब्ध कराने के लिए भाई माधव चंद्र चंदेल जी का हार्दिक आभार🙏
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