Friday, April 4, 2025

डॉ (सुश्री) शरद सिंह श्रीराम सेवा समिति सागर की रेलवे स्टेशन पर जल सेवा उद्घाटन समारोह में बतौर अतिथि

आज 04 अप्रैल 2025 को श्री राम सेवा समिति सागर द्वारा प्लेटफार्म नंबर 01 पर जल सेवा कार्य का शुभारंभ किया गया। संस्था विगत 27 वर्ष से निरंतर रेल यात्रियों को ग्रीष्म काल में निशुल्क ठंडा पेयजल उपलब्ध करा रही है। इस वर्ष भी यह शुभ कार्य आज आरंभ हो गया। 
    🚩इस बार प्रसन्नता का विषय यह भी रहा कि मेरे प्रिय अनुज श्री राम सेवा समिति के वर्तमान अध्यक्ष डॉ विनोद तिवारी जी को नगर पालिक निगम की ओर से सागर का स्वच्छता ब्रांड एंबेसडर नियुक्त किया गया है। अतः मैंने इस अवसर पर उन्हें माता की चुनरी ओढ़ा कर उनके सेवा भाव के प्रति अपना सम्मान प्रकट किया। 
   🚩उद्घाटन के इस समारोह की अध्यक्षता की गांधीवादी चिंतक दादा रघु ठाकुर जी ने। अध्यक्षता की पूर्व सांसद दादा लक्ष्मी नारायण यादव जी ने। सहयोगी अतिथि के रूप में मैं डॉ (सुश्री) शरद सिंह, श्री सरस्वती पुस्तकालय एवं वाचनालय के सचिव दादा शुकदेव तिवारी जी, पूर्व विधायक तथा दैनिक आचरण के प्रधान संपादक भाई सुनील जैन जी, पूर्व चिकित्सा अधिकारी एवं गीतकार डॉ श्याम मनोहर सीरोठिया जी, प्रख्यात लोकगीत गायक दादा हरगोविंद विश्व जी एवं बीड़ी उद्योगपति भाई सुरेश चंद्र जैन जी मंचासीन रहे।
   🚩उद्घाटन की औपचारिकता के उपरांत रेलवे प्लेटफार्म पर उपस्थित यात्रियों को ठंडा जल पिलाकर मैंने भी सेवा कार्य किया। आगे भी जब संभव होगा वह स्टेशन पहुंचकर इस पुण्य कार्य में अवश्य अपना सहयोग दूंगी। 
      🚩इस पुण्य कार्य में अपनी माताजी डॉ विद्यावती 'मालविका' जी एवं दीदी डॉ वर्षा सिंह जी की स्मृति में शीतल जल के लिए 11 घड़ों का अत्यल्प सेवा सहयोग मेरी ओर से प्रतिवर्ष रहता है। वस्तुतः यह सेवा सहयोग वर्षा दीदी ने आरंभ किया था।
    इस अवसर पर शिवसेना प्रमुख भाई पप्पू तिवारी, डॉ गजाधर सागर, आरके तिवारी जी सहित बड़ी संख्या में बुद्धिजीवियों एवं नागरिकों की उपस्थिति रही।
     🚩 दादा रघु ठाकुर जी के कुशल निर्देशन में भाई डॉ विनोद तिवारी जी जिस तरह लगन और सेवा भाव से निरंतर कार्य कर रहे हैं वह प्रशंसनीय है🙏
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शून्यकाल | स्त्री शक्ति का स्मरण कराती है नवरात्रि | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नयादौर


दैनिक 'नयादौर' में मेरा कॉलम -
शून्यकाल
स्त्री शक्ति का स्मरण कराती है नवरात्रि

- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

     ‘देवी’ का अर्थ है निर्भयता और शक्ति। नवरात्रि वह काल खण्ड है जिसमें देवी के प्रतीक को स्थापित कर के शक्ति की उपासना का अनुष्ठान किया जाता है और देवी के रूप में शक्तिसम्पन्न निर्भय स्त्री की कल्पना को साकार किया जाता है। नवरात्रि में देवी भगवती के नौ रूपों में नौ शक्तियों की पूजा की जाती हैं। यह नौ शक्तियां स्त्रीशक्तियां ही तो हैं। निर्भय स्त्री ही देवी है, जो असुरों का संहार करने, जो देवताओं और सम्पूर्ण जगत् का कल्याण करने की क्षमता रखती है। जो जगत् की जननी है, मां है, वही शक्ति है। इसीलिए इस पर्व के धार्मिक महत्व के साथ ही हमें इसके व्यावहारिक महत्व को भी समझना होगा। वस्तुतः नवरात्रि पर्व स्त्रियों का सम्मान का पर्व है।


सम्मान किया जाता है। उसे समाज में बराबरी का दर्जा दिया जाता था। पौराणि ग्रंथों में ऋषितुल्य विदुषी स्त्रियों का उल्लेख मिलता है। किन्तु हमारे अतीत में वह काला समय आया जो भारतीय इतिहास में मध्यकाल के नाम से जाना जाता है। विदेशी हमलावरों ने भारतीय पुरुषों को भ्रमित कर के स्त्री सम्मान के मायने ही बदलवा दिए। उन्होंने यह मस्तिष्क में बिठा दिया कि यदि स्त्री को परपुरुष स्पर्श भी कर ले तो उसे आत्मदाह कर लेना चाहिए। इससे भी आगे बढ़ कर एक पाठ और पढ़ाया कि परपुरुष की कुदृष्टि मात्र से बचने के लिए स्त्रियों को तलवार नहीं उठानी चाहिए बल्कि जौहर कर लेना चाहिए। दुर्भाग्य यह कि मातृशक्ति को देवी के रूप् में पूजने वाला पुरुष समाज इस तरह के पाठों को आत्मसात करता चला गया और स्वयं स्त्री समाज आत्महत्या में अपने सम्मान का प्रतिबिम्ब देखने लगी। लेकिन कहा जाता है न कि बुराई के पैर भले ही मजबूत दिखाई दें लेकिन होते कमजोर ही हैं और जल्दी थक जाते हैं। इन बुराइयों के पैर कई दशक बाद थके लेकिन अंततः थक कर चूर-चूर हो गए। जौहर और सती प्रथा बंद हुई। लेकिन इन काले दशकों ने स्त्रियों को शिक्षा, निर्णय लेने के अधिकार, कोख पर अधिकार और यहां तक कि खुली हवा से भी वंचित कर दिया। विचित्रता यह कि जब स्त्रियां दलित बनाई जा रही थीं, उस दौरान भी देवियां पूज्य रहीं। काल्पनिक शक्ति के सामने समाज ने सिर झुकाया किन्तु प्रत्यक्ष शक्ति को लम्बे समय तक अनदेखा किया। इतना अधिक अनदेखा किया कि आज भी समाज स्त्रीशक्ति को पूरी तरह से नहीं देख पा रहा है। शायद इसीलिए नवरात्रि के रूप में देवी के नौ रूपों वाली नौ शक्तियां प्रति वर्ष दो बार समाज के सामने आती हैं ताकि समाज स्त्रीशक्ति को पहचाने और उसे अपना सहभागी बनाए। नवरात्रि तो यह नारी शक्ति के आदर और सम्मान का उत्सव है। यह उत्सव नारी को अपने स्वाभिमान व अपनी शक्ति का स्मरण दिलाता है, साथ ही सकल समाज को नारी शक्ति का सम्मान करन के लिए प्रेरित करता है।

मां दुर्गा की उपासना करते समय जिस स्त्रीशक्ति का बोध होता है वह उपासना के बाद स्मरण क्यों नहीं रहता? न स्त्रियों को और न पुरुषों को। समाचारपत्रों में आए दिन स्त्री के विरुद्ध किए गए जघन्य अपराधों के समाचारों भरे रहते हैं। समाज में आती जा रही चारित्रिक गिरावट को देख कर अत्यंत दुख भी होता है लेकिन सिर्फ़ शोक प्रकट करने या रोने से समस्या का समाधान नहीं निकलता है। देवी दुर्गा का दैवीय चरित्र हमें यही सिखाता है कि अपराधियों को दण्डित करने के लिए स्वयं के साहस को हथियार बनाना पड़ता है। जिस महिषासुर को देवता भी नहीं मार पा रहे थे उसे देवी दुर्गा ने मार कर देवताओं को भी प्रताड़ना से बचाया। नवरात्रि के दौरान लगभग हर हिन्दू स्त्री अपनी क्षमता के अनुसार दुर्गा के स्मरण में व्रत, उपवास पूजा-पाठ करती है। अनेक महिला निर्जलाव्रत भी रखती हैं। पुरुष भी पीछे नहीं रहते हैं। वे भी पूरे समर्पणभाव से मां दुर्गा की स्तुति करते हैं। नौ दिन तक चप्पल-जूते न पहनना, दाढ़ी नहीं बनाना आदि जैसे सकल्पों का निर्वाह करते हैं। लेकिन वहीं जब किसी स्त्री को प्रताड़ित किए जाने का मामला समाने आता है तो अधिकांश स्त्री-पुरुष तटस्थ भाव अपना लेते हैं। उस समय गोया यह भूल जाते हैं कि आदि शक्ति दुर्गा के चरित्र से शिक्षा ले कर अपनी शक्ति को भी तो पहचानना जरूरी है। मां दुर्गा का चरित्र उन्हें दृढ़ और सबल होने का संदेश देता है।
यह भी सच है कि आज स्त्रियों को बहुत अधिक संघर्ष करना पड़ रहा है। दरअसल, स्त्रियों के प्रति संवेदनाओं में विस्तार होना चाहिए। जिस तरह हम नवरात्रि में मातृशक्ति के अनेक स्वरूपों का पूजन करते हैं, उनका स्मरण करते हैं, उसी प्रकार नारी के गुणों का सम्मान किया जाना जरूरी है। घर में मौजूद स्त्रियां अर्थात् माता, पत्नी, बेटी, बहन में नौ दुर्गा के गुण होते हैं जिन्हें स्वीकार कर के सामाजिक बुराइयों को दूर किया जा सकता है। इस पर्व के धार्मिक महत्व के साथ ही हमें इसके व्यावहारिक महत्व को भी समझना होगा। वस्तुतः नवरात्रि पर्व स्त्रियों का सम्मान का पर्व है।
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Thursday, April 3, 2025

बतकाव बिन्ना की | ऊंची पहरिया पे माई को डेरा | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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बतकाव बिन्ना की
ऊंची पहरिया पे माई को डेरा
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
         ‘‘काय बिन्ना कल कां हतीं, दिखानीं नईं?’’ भौजी ने मोसे पूछी।
‘‘काल ज्वाला माई के दरसन के लाने गई रई।’’ मैंने भौजी खों बताई।
‘‘हम ने जा पाए अब लौं! बड़ी प्रसिद्धी आए उनकी तो।’’ भौजी ने कई।
‘‘बड़ी नोनी जांगा आए, भौजी। जा अपने सागर की सुरखी विधान सभा क्षेत्र में पड़त आए। जलंधर गांव में।’’ मैंने भौजी खों बताई।
‘‘बोई जलंधर, जां के बे अपने गांधीवादी दादा रघु ठाकुर आएं?’’ भौजी ने पूछी।
‘‘हऔ, बोई वारो।’’ मैंने कई।
‘‘बाकी भौजी, उते जांगा भौतई सुंदर आए। उते ऊंची पहरिया पे माई को डेरा आए। लोग बताउत आएं के पैले उते तनक सी मढ़िया रई। मनो हमने देखी के अब उते खूब बड़ो सो मंदिर बन गओ आए। पक्की छिड़ियां और छिड़ियां पे टीनशेड की छायरी। ने का मोसे उत्ते ऊपरे चढ़त बन पातो? मनो जे जरूर आए भौजी के उते पौंच के न जाने कां से ताकत आ जात आए। मैं सोई बड़ी मजे-मजे छिड़ियां चढ़ गई।’’ मैंने भौजी खों बताई।
‘‘जे तो होत आए। हम सोई पर की साल मैहर गए रए, शारदा माई के दरसन खों। हम ओरन ने सोची रई के उते ऊपर लौं गाड़ी से पौंचबी, मनो उते नैचे पौंचत साथ हमाए संगे गईं एक बाई कैन लगीं के हम तो छिड़ियां चढ़ के जाबी। पैले तो हम ओरन ने उनको समझाबे खों प्रयास करो, जब बे ने मानीं सो हम ओरें सोई उनके संगे छिड़ियां चढ़े। पैले हमें सोई लगो के हम ने चढ़ पाबी, बाकी फेर कैसे चढ़ गए पतो ई ने परो। ऐसी जांगा पे ऐसई होत आए।’’ भौजी बोलीं।
‘‘भौजी, उते एक बात हमें औ मजे की लगी के उते सुद्ध बुंदेली सुनबे खों मिल रई हती। हम ओरन ने रस्ता में एक बालक से पूछी के माई के मंदर के लाने जे रस्ता मुड़ने परहे के सीधी रस्ता जाएं? तो बा तुरतईं बोलो के ‘सूदे जाओ’। ऊके मों से ‘सूदे’ सुन के मोय भौतई अच्छो लगो। जेई से मैंने उते मंदर में औ मेला में बुंदेली में मुतकी बतकाव करी। रामधई भौजी, अपनी बुंदेली भौतई मीठी आए। औ अपने इते के लोग इत्ते प्रेम से बोलत आएं के का कओ जाए।’’ मैंने भौजी से कई।
जे तो आए, अपनी बुंदेली बो का कहाउत आय के ‘साॅफ्ट टोन’ वारी आए। ऐसो नईं के कोऊ बोले तो लगे के मूंड़ पे लट्ठ घुमा के दे रओ होय। सुने, बोले में बड़ी मुलायम सी लगत आए। औ तुमें तो खुदई पतो के अपनी बुंदेली में कित्तो सारो साहित्य लिखो जा चुको।’’ भौजी बोलीं।
‘‘औ बताऊं! उते मंदर में मोए एक बिन्ना मिली। मैंने ऊंसे पूंछी के कां की आओ? सो बा बोली के इतई जलंधर के। फेर मैंने पूछी के पढ़त आओ? स्कूलें जात आओ? सो बा बोली के हऔ, जात आएं। सो मैंने फेर के पूछी के इते मंदर में कोन के संगे आईं? सो ऊने बताई के अपने पापा के संगे आई, जोन बे उते मेला में दुकान लगा रए। फेर मैंने ऊसे पूछीं के तुम सोई दुकान पे बैठहो? सो बा कैन लगी के हऔ। काल हमने दो सौ रुपइया की चूड़ी-बिंदी बेची रई। औ जा बात ऊने बड़ी शान से बताई। ऊकी बात सुन के मोय भौतई अच्छो लगो। मोड़ियन खों ऐसई लड़कोरें से पढ़ाओ, सिखाओ चाइए। ईसे जो कभऊं कोनऊं बुरौ समै परे तो बे अपनो जी-खा सकें।’’ मैंने भौजी खों बताई।
‘‘सई कई बिन्ना!’’ भौजी बोलीं।
‘‘हऔ भौजी! सई बताऊं तो कभऊं-कभऊं जी करत आए के कोनऊं गांव में जा के रहो जाए। उते की सुद्ध हवा की शहरन से कोनऊं मुकाबला नोईं।’’ मैंने भौजी खों अपने जी की बताई। 
‘‘सांची कई बिन्ना! बाकी आज संकारे से बा खबर पढ़ के भौतई बुरौ लगो।’’ भौजी तनक दुखी होत भई बोलीं।
‘‘कोन सी खबर?’’ मैंने पूछी।
‘‘बा जो उते गुजरात में पटाखा फैक्टरी में भए बिस्फोट में दस जने मर गए, ऊमें नौ तो अपने एमपी के हते। उनमें बाल-बच्चा सोई मरे। देख तो बिन्ना, जे पापी पेट की खातिर का-का नई भुगतने परत आए। बे ओरें गए हते उते दो रोटी कमाबे के लाने और ऐसे मारे गए। जोन उनके मालिक हते उन्ने उन ओरन के बारे में तनकऊं ने सोची के बे उन ओरन की जान से खेल रए।’’ भौजी दुखी होत भई बोलीं।
‘‘हऔ भौजी, मैंने सोई पढ़ी बा खबर। सई में जी दुखात आए। एक मानुस अपने पइसा कमाबे के लाने मुतके मानुस की जान से खेलत रैत आए। औ जोन खों जे सब पे नजर रखनी चाइए, बे पइसा की पल्ली से मों ढंाप के सोए रैत आएं। ने तो आप ई बताओ के ऐसे गलत काम कैसे चलत रैत आए?’’ मैंने कई।
‘‘सई कै रईं बिन्ना! तुमाए भैयाजी बता रए हते के आजकाल तो जैई होत आए के इते के मजूर राजस्थान, गुजरात औ हरियाणा भेज दए जात आएं औ उते के मजूर इते बुला लए जात आएं। ईमें होत का आए के उनके कुनबा के बाकी लोग से अपने गांव में रैत आएं सो उनपे दबाव बनो रैत आए। फेर बे परदेस जात आएं अपने ठेकेदार मालक के सहारे, सो उते बी उने उनई को कहो मानने परत आए, ने तो उते उने कोन को संग मिलहे। मने उनकी मजबूरी को पूरो फायदा उठाओ जात आए।’’ भौजी ने बताई।
‘‘हऔ भौजी! जेई बात आए। बड़ी उमर वारे सो मजूरी के लाने इते से उते ले जाए जात आएं, संगे बच्चा हरों खों सोई ले जाओ जात आए। फेर उनसे उते कऊं दरी बुनबे के कारखाना में काम कराओ जात आए तो कऊं बोतलन में लेबल लगवाओ जात आए। उते उन ओरन से अठारा-अठारा घंटे काम लओ जात आए। जे सब तो ऊ टेम पे खुलो जबे बा अपने विदिशा वारे जोन खों नोबल प्राईज मिली रई, कैलास सत्यार्थी जू ने ऐसे मुतके बच्चन खों बचाओ रओ। मनो आज बी जे सब चल रओ।’’ मैंने भौजी खों बताई।
‘‘सई में भौतई अत्तें होत रैत आएं।’’ भौजी दुखी होत भई बोलीं।
‘‘अरे का कओ जाए भौजी। कोरोना के पैले हम ओरें भुनसारे घूमबे खों जाओ करत्ते। ऊ टेम पे रस्ता में एक हथकरघा वारो कारखाना परत्तो। भुनसारे चार-पांच बजे से उते करघा चलाबे की खटर-खट्ट, खटर-खट्ट सुनाई परन लगत्ती। फेर दिन भरे में जबे उते से निकरो सो ऊंसई खटर-खटर सुनी जा सकत्ती। उने खाबे औ आराम करबे खों कबे मिलत्तो पतो नइयां। एक जने ने बताई रई के ऊ सेंटर में राजस्थान के करीगर हते। फेर तो बा कोरोना के टेम पे कारखाना बंद हो गओ। बा कारीगरन को का भओ, उने पइसा दओ गओ के ऊंसई भगा दओ गओ, पता नई परी। बड़ी दुरदसा रैत आए इन ओरन की।’’ मैंने भौजी से कई।
‘‘जेई तो मोय लगत आए बिन्ना के देवी मैया इन ओरन की मदद काय नईं करतीं? सगरे पापी फलत-फूलत रैत आएं औ गरीब-गुरबा जिनगी भर खटत रैत आएं।’’ भौजी दुखी होत भई बोलीं।
‘‘माई बी का करें भौजी, जे कलजुग आए। ई टेम पे रक्तबीजी राच्छस मुतके आएं। एक खों दण्ड दओ नईं के चार ठाड़े हो जात आएं। बाकी देर-सबेर उनकों सजा तो मिलत आए।’’ मैंने भौजी खों समझाओ।
‘‘चलो, हम चाय बना रए। अपन ओरे चाय पीबी। काय से के जी भारी हो रओ।’’ कैत भईं भौजी उठ खड़ी भईं।     
बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की। तब लौं माई को ध्यान करियो औ मनो सोचियो जरूर ई बारे में के का जे ठीक आए के ताकतवारो गरीबन की जान के बारे में सोचत लौं नईयां? 
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Wednesday, April 2, 2025

चर्चा प्लस | पौराणिक एवं समसामयिक महत्व है नवरात्रि का | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर

चर्चा प्लस (सागर दिनकर में प्रकाशित)
    पौराणिक एवं समसामयिक महत्व है नवरात्रि का
       - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह  
         नवरात्रि देवी स्तुति के रूप में स्त्री शक्ति के जागरण का त्योहार है। नवरात्रि के दौरान इस बात का स्मरण किया जाता है कि जिस प्रकार देवी दुर्गा ने असुरों का वध किया और जगत के पालन के लिए विविध रूपों में प्रकट हुईं, ठीक उसी प्रकार स्त्री को भी अपनी शक्ति एवं दायित्वों को पहचानना, परखा और अमल में लाना चाहिए। यदि स्त्री स्वयं को शक्ति स्वरूपा मान कर आत्मबल से काम ले तो वह कभी अबला हो ही नहीं सकती है। यही संदेश निहित है इस पूरे नौदिवसीय त्योहार में। इसीलिए कहा गया है- ‘‘या देवी सर्वभूतेषु शक्ति-रूपेण संस्थिता, नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः!’’    
       जब व्यक्ति दुख से ग्रस्त होता है तो उसे आत्मबल की आवश्यकता होती है और जब प्रत्यक्ष आत्मबल नहीं मिल पाता है तो अप्रत्यक्ष अर्थात दैवीय शक्ति के प्रति उसकी आस्था उसे आत्मबल प्रदान करती है। व्यक्ति यही सोचता है कि उसकी सहायता कोई करे या न करे, पर ईश्वर उसकी मदद करेगा। यही विचार उसे आत्मबल से भर देता है। इसके बाद निराशा से उबरा हुआ व्यक्ति अपने लिए सुगमता से सही मार्ग ढूंढ लेता है। स्त्रियां स्वयं को अबला, असहाय, अशक्त मान कर स्वयं को तुच्छ प्राणी न समझती रहें, इसीलिए नवरात्रि का त्योहार उन्हें विशेष आत्मबल प्रदान करता है। एक स्त्री भी शक्ति स्वरूपा हो सकती है यदि वह असुरों का डट कर मुकाबला करे और उनका दमन करने की ठान ले। वर्तमान समाज में असुर आचरण करने वाले वे सभी हैं जो स्त्रियों का मा सम्मान नहीं करते हैं तथा उन्हें मात्र उपभोग की वस्तु समझते हैं। किन्तु इसके लिए आवश्यकता है देवी दुर्गा के स्वरूपों को समझने की। 

चैत्र नवरात्रि हिन्दुओं के प्रमुख त्योहारों में से एक है। ये नौ दिन देवी दुर्गा के नौ अलग-अलग रूपों की आराधना के लिए समर्पित हैं। यह चैत्र मास में मनाया जाता है। वैसे दो नवरात्रियों का सर्वाधिक महत्व है- शारदीय नवरात्रि तथा चैत्र नवरात्रि। अन्यथा, वर्ष में अन्य नवरात्रियों भी मनाई जाती हैं। तिथियों के अनुरूप वर्ष में पांच नवरात्रि होती हैं- शरदीय नवरात्रि, चैत्र नवरात्रि, आषाढ़ नवरात्रि, पौष नवरात्रि और माघ नवरात्रि। इनमें से प्रत्येक नवरात्रि का अपना विशिष्ट महत्त्व है।
नवरात्रि में देवी दुर्गा के अलग अलग रूपों की पूजा की जाती है। लेकिन इन नवरात्रि के पीछे की एक पौराणिक कथा भी है। दरअसल पौराणिक कथाओं के अनुसार प्राचीनकाल में महिषासुर नाम का एक दानव हुआ करता था। उसने कठोर तपस्या से ब्रम्हा जी को प्रसन्न कर लिया। ब्रम्हा ने प्रसन्न होकर उससे वरदान मांगने को कहा। तब महिषासुर ने भगवान ब्रम्हा से अमर होने का वरदान मांगा। ब्रम्हा ने कहा कि अमर होने का वरदान नहीं दिया जा सकता। तब उसने ब्रम्हा से यह वरदान मांगा कि कोई पुरुष या देव अथवा दानव  उसे न मार सके। ब्रम्हा ने उसे वरदान दे दिया कि तीनों लोकों में कोई पुरुष, देव अथवा दानव उसे नहीं मार सकता है। यह वरदान पाने के बाद महिषासुर निद्र्वन्द्व हो गया। उसके अत्याचार बहुत ज्यादा बढ़ने लगे। उसे यह विश्वास हो चला था कि ब्रम्हा के वरदान के बाद अब वह अमर हो चला है। अब उसे कोई नहीं मार सकता है। उसने देवताओं को पराजित कर तीनों लोकों पर अपनी सत्ता स्थापित करने की योजना बनाई और देवलोक पर आक्रमण कर दिया। इस बात से घबराकर सभी देवता ब्रम्हा, विष्णु और महेश की शरण में गए। किन्तु त्रिदेव भी ब्रह्मा द्वारा दिए गए वरदान के समक्ष वे विवश थे। तब त्रिदेवों ने देवी दुर्गा से प्रार्थना की कि वे अपनी शक्ति का प्रयोग करें और महिषासुर का वध कर के ऋषियों एवं देवताओं की रक्षा करें। तब देवी दुर्गा आदिशक्ति के रूप में प्रकट हुई। नौ दिनों तक महिषासुर दानव और देवी दुर्गा के बीच में घमासान युद्ध चला। दसवें दिन मां दुर्गा ने दुष्ट दानव महिषासुर का अंत कर दिया। इसी उपलक्ष्य में हर वर्ष नवरात्रि का त्यौहार मनाया जाता है। 

   इस त्यौहार की समाप्ति नौवें दिन होती है, ऐसा माना जाता है कि इस दिन भगवान राम का जन्म हुआ था। अतः श्रीरामनवमी भी मनाई जाती है। चैत्र नवरात्रि के साथ ही हिन्दू नववर्ष का आरम्भ भी माना जाता है। चैत्र नवरात्रि ग्राष्मकाल के आगमन का प्रतीक है। ऋतु परिवर्तन के साथ ही फसल के चक्र में भी परिवर्तन होता है। यह बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। माता के भक्त सभी नौ दिनों ओर व्रत आदि रखते हैं। ये नौ दिन घरों में व्रत पूजा को ध्यान में रखते हुए कुछ विशेष प्रकार के पकवान बनाए जाते हैं। नवरात्रि में साबूदाना खिचड़ी, कूटू के आटे की पूरी और सिंघाड़े की पूरी आदि बनाई जाती हैं।
प्रत्येक दिन देवी के अलग-अलग रूप की पूजा की जाती है। पहला दिन शैलपुत्री को समर्पित है, दूसरा दिन ब्रह्मचारिणी को, तीसरा दिन चंद्रघंटा को, चैथा दिन कुष्मांडा को, पांचवां दिन स्कंदमाता को, छठा दिन कात्यायनी को, सातवां दिन कालरात्रि को, आठवां दिन महागौरी को और नौवां दिन सिद्धिदात्री को।

1. शैलपुत्री - देवी दुर्गा का पहला रूप शैलपुत्री या शैलजा के नाम से जाना जाता है। शैल का अर्थ है पर्वत और यह रूप पर्वत की पुत्री या देवी पार्वती को संदर्भित करता है जो राजा हिमवत अर्थात हिमालय पर्वत की पुत्री थीं। देवी पार्वती को देवी सती का पुनर्जन्म माना जाता है और उन्हें दो हाथों और माथे पर अर्धचंद्र के साथ एक स्त्री रूप में दर्शाया जाता है। वे अपने दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल का फूल धारण करती हैं। उन्हें अपने वाहन या नंदी बैल की सवारी के साथ दर्शाया जाता है।
2. ब्रह्मचारिणी - ब्रह्मचारिणी या देवी दुर्गा के महिला तपस्वी रूप की पूजा नवरात्रि के दूसरे दिन की जाती है। उन्हें एक ब्रह्मचारिणी देवी के रूप में दर्शाया जाता है जो अपने दाहिने हाथ में सूखे रुद्राक्ष की माला और बाएं हाथ में कमंडल धारण करती हैं।
3. चंद्रघंटा - तीसरे दिन पूजा जाने वाली दुर्गा का तीसरा रूप चंद्रघंटा है। उनके माथे पर घंटी के आकार का एक अर्धचंद्र है जिसके कारण उनका नाम चंद्रघंटा भी पड़ा। देवी को उनकी तीसरी आंख खुली हुई अवस्था में दिखाई जाती हैं और वे सदा असुरों से युद्ध के लिए तैयार रहती हैं। उन्हें रणचंडी के नाम से भी जाना जाता है। देवी के इस योद्धा रूप में उनके 10 हाथ होते हैं जिनमें से दो में त्रिशूल, गदा, धनुष और बाण, खड्ग, कमल, घंटा और कमंडल हैं, उनका एक हाथ हमेशा आशीर्वाद मुद्रा या अभयमुद्रा में रहता है जो भय को दूर करता है। 
4. कुष्मांडा - नवरात्रि के चैथे दिन पूजी जाने वाली देवी दुर्गा का चैथा रूप कुष्मांडा है। कुष्मांडा नाम को कु, ऊष्मा और अंड में विभाजित किया जा सकता है, जहां ‘‘कु’’ का अर्थ है थोड़ा, ऊष्मा का अर्थ है गर्मी या ऊर्जा और अंड का अर्थ है ब्रह्मांड। देवी दुर्गा के इस रूप को अष्टभुजा देवी के नाम से भी जाना जाता है और उन्हें आदि शक्ति के नाम से भी जाना जाता है जिन्हें ब्रह्मांड के निर्माण का श्रेय दिया जाता है। वे अपने वाहन के रूप में सिंह पर सवार दिखाई देती हैं।
5. स्कंदमाता - स्कंदमाता देवी दुर्गा का पांचवां रूप है और नवरात्रि के पांचवें दिन इनकी पूजा की जाती है, देवी के इस रूप को कार्तिकेय को गोद में लिए हुए एक मातृ देवी के रूप में दर्शाया गया है। उल्लेखनीय है कि कार्तिकेय को स्कंद के नाम से भी जाना जाता है। देवी के इस रूप को चार भुजाओं, तीन आँखों और शेर पर सवार एक महिला देवता के रूप में दर्शाया जाता है। देवी की चार भुजाओं में से दो में कमल है जबकि अन्य दो में से एक में कार्तिकेय और दूसरे हाथ में आशीर्वाद मुद्रा या अभयमुद्रा है। 
6. कात्यायनी - कात्यायनी देवी दुर्गा का छठा रूप है और नवरात्रि के छठे दिन उनकी पूजा की जाती है। उन्हें देवी महादेवी या दुर्गा के योद्धा रूप के रूप में दर्शाया जाता है। दुर्गा के अन्य दो उग्र रूप भद्रकाली और चंडिका हैं। देवी दुर्गा के इस रूप को अठारह भुजाओं और देवताओं द्वारा उपहार में दिए गए विभिन्न हथियारों के साथ शेर पर सवार एक महिला देवी के रूप में दर्शाया जाता है। उन्हें ऋषि कात्यायन के नाम पर कात्यायनी के रूप में जाना जाता है, जिन्होंने देवी दुर्गा की तपस्या की और उन्हें वरदान के रूप में अपनी बेटी के रूप में जन्म लेने के लिए कहा। अर्थात ऋषि कात्यायन की पुत्री कात्यायिनी।
7. कालरात्रि - कालरात्रि सातवां रूप हैं। नवरात्रि के सातवें दिन कालरात्रि की पूजा की जाती है। यह देवी दुर्गा के सबसे रौद्र रूपों में से एक हैं। वे अंधकार और अज्ञान का नाश करने वाली हैं और उन्हें गधे पर सवार दिखाया जाता है, उनकी चार भुजाएं हैं, जिनमें से दो आशीर्वाद और सुरक्षा की मुद्रा में हैं जबकि अन्य दो में तलवार और वज्र रहता है। उन्हें काली के नाम से भी जाना जाता है।
8. महागौरी - महागौरी देवी दुर्गा का आठवां रूप हैं और नवरात्रि के आठवें दिन इस रूप की पूजा की जाती है। देवी के इस रूप को चार भुजाओं वाली देवी के रूप में दर्शाया जाता है, जिनके एक हाथ में त्रिशूल और दूसरे हाथ में डमरू रहता है। अन्य दो भुजाएँ आशीर्वाद और भय को दूर करने के लिए होते हैं जिन्हें क्रमशः वरद और अभय मुद्रा के रूप में भी जाना जाता है। वे एक बैल या सफेद हाथी पर सवार होती हैं।
9. सिद्धिदात्रि - देवी दुर्गा का नौवां और अंतिम रूप सिद्धिदात्रि है और नवरात्रि के नौवें और अंतिम दिन उनकी पूजा की जाती है। उन्हें सभी सिद्धियों की प्रदाता माना जाता है। देवी के इस रूप को कमल पर सवार एक महिला देवी के रूप में दर्शाया गया है, जो अपने चार हाथों में कमल, शंख, गदा और चक्र धारण किए हुए हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार, वे महाशक्ति या सर्वोच्च देवी का अवतार हैं, जिन्होंने ब्रह्मांड का निर्माण किया और शिव ने देवी सिद्धिदात्रि की पूजा करके सभी सिद्धियाँ प्राप्त कीं थीं।

  इस प्रकार देवी के नौ रूपों में मौजूद नौ शक्तियों के स्मरण कात्योहार नवरात्रि। देवी दुर्गा की प्रतिमा में चार अथवा आठ या फिर इससे भी अधिक हाथ बनाए जाते हैं। इन सभी हाथों में विविध आयुध होते हैं। यह मां दुर्गा का शक्तिपुंज स्वरूप होता है। इसकी यदि आज के आधुनिक प्रसंग के रूप में व्याख्या की जाए तो दुर्गा के इस श्ीक्ति पुंज रूप का अरशय है कि बुराई के विरुद्ध विभिन्न स्त्रियों एकजुट हो कर शंखनाद करें और बुराई के शमन का प्रयास करें तो वे अपनी शक्तियों से किसी भी अपराधी को पराजित कर सकती हैं। उदाहरण के लिए, एक स्त्री सड़क पर जा रही है। कोई उद्दण्ड व्यक्ति उसका दुपट्टा या साड़ी का पल्लू खींचता है तो उस स्त्री को डरना नहीं चाहिए बल्कि उसे जोर से चिल्लाना चाहिए। उसकी पुकार को सुन कर अन्य स्त्रियों को उसकी मदद के लिए आगे बढ़ना चाहिए और फिर सब मिल कर उस मनचले को सबक सिखा दें तो फिर कोई दूसरा व्यक्ति ऐसा दुस्साहस नहीं कर सकेगा। लेकिन एक दृश्य यदाकदा ही दिखता है कि जब महिलाएं अपनी शक्ति को पहचान कर, एक जुट हो कर अपने विरुद्ध उठाए गए हर कदम का विरोध करती हों। नवरात्रि में देवी दुर्गा के नौरूपों का स्मरण करने मात्र से संकट दूर होने की आकांक्षा रखने की बजाए उन नौ रूपों से सीख ले कर अपना आत्मबल बढ़ाना ही इस त्योहार की सार्थकता है।  इस त्योहार को यदि आडंबर की दृष्टि से न देख कर इन शक्तियों को सहज भाव से आत्मसात करने की दृष्टि से देखा जाए तो अनुभव होगा कि ये शक्तियों मनुष्य के भीतर आत्मबल के रूप में उपस्थित रहती हैं। इसी सत्य का स्मरण कराता है यह त्योहार।  
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Tuesday, April 1, 2025

पुस्तक समीक्षा | ‘‘रंग बारिश’’: छायावादी नाव पर सवार यथार्थवादी ग़ज़लें | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण


आज 01.04.2025 को 'आचरण' में प्रकाशित - पुस्तक समीक्षा


पुस्तक समीक्षा
‘‘रंग बारिश’’: छायावादी नाव पर सवार यथार्थवादी ग़ज़लें
- समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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गजल संग्रह - रंग बारिश
कवि       - विनय मिश्र
प्रकाशक - लिटिल बर्ड पब्लिकेशंस, 4637/20, शॉप नं.-एफ-5, प्रथम तल, हरि सदन, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली-110002
मूल्य - 395/-
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ग़ज़ल विधा ने जिस प्रकार हिन्दी साहित्य में अपनी जगह बनाई वह इस विधा के प्रति कवियों की रुचि को दर्शाता है। एक ग़ज़ल में तीन से ले कर अनेक शेर हो सकते हैं किन्तु खूबी यह कि हर शेर अपने-आप में स्वतंत्र अस्तित्व रखता है, फिर भी काफिया और रदीफ़ को सहेजता हुआ। ग़ज़ल कहना इतना आसान भी नहीं है जितना की लोग प्रायः मान लेते हैं। कहन की अर्थवत्ता और शिल्प विधान का पालन ही ग़ज़ल को वास्तविक स्वरूप देता है। यदि वज़न ज़रा भी लड़खड़ाया तो पूरी की पूरी ग़ज़ल धराशायी हो जाती है। वहीं कुछ लोग ग़ज़ल को अच्छी तरह साध लेते हैं और अपनी ग़ज़लों के माध्यम से अपनी पहचान बना लेते हैं। विगत दिनों हिन्दी काव्य विधा के चर्चित साहित्यकार विनय मिश्र का ग़ज़ल संग्रह ‘‘रंग बारिश’’ प्रकाशित हुआ है। इसमें उनकी कुल 110 ग़ज़लें हैं। यद्यपि पुस्तक में विनय मिश्र का परिचय प्रकाशित नहीं हैं किन्तु जो उनके लेखन से परिचित हैं वे जानते हैं कि काव्य जगत में उनका एक विशेष स्थान है। 
       नयी दिल्ली की वरिष्ठ लेखिका व लोकधर्मी आलोचक कुसुमलता सिंह की फ्लैप पर दी गई अपनी टिप्पणी में उन्होंने कहा है कि ‘‘अब इसमें खुद के साथ बैठने का जो ‘जरा-सा’ काम है वही मिश्र जी की भाषा की कारीगरी है। ‘रंग बारिश’ में संग्रहीत गजलों में आज के समय संदर्भ की समग्रता में व्यंजना है। पूर्व और पश्चिमी काव्य-चिंतन का अनुशीलन करते हुए मुझे लगता है कि इन गजलों ने सौंदर्यबोध के नए मानक स्थापित किए हैं। टी. एस. इलियट कहते हैं कि कविता का अस्तित्व मात्र वही नहीं है जो ‘कवि’ ने सोचा था अथवा जो पाठक सोचता है और न उसके ‘प्रयोजन’ की यही सीमा बाँधी जा सकती है। वस्तुतः कविता का हमसे भिन्न, अपना अस्तित्व हमसे पहले था और बाद में भी रहेगा।’’
    वस्तुतः ग़ज़ल जब दिल और दिमाग के ताने-बाने से बुनी जाती है तो वह सटीक एवं सार्थक होती है तथा पढ़ने या सुनने वाले पर अपनी गहरी छाप छोड़ती है। समय तेजी से टेक्नालाॅजी के हवाले होता जा रहा है। आर्टीफीशियल इंटेलीजेंस का चलन तो सोचने-समझने की क्षमता भी छीन लेने को आमादा है। संवादों की संक्षिप्तता इमोजीज़ में ढल कर इस तरह कोडीफाई हो गई है अब संवादों का विस्तार नई पीढ़ी को निरर्थक लगता है। किन्तु वहीं दूसरी ओर जिसने लंबी-लंबी चिट्ठियों का स्वाद चखा है, वही उसके स्वाद को समझ सकता है।  विनय मिश्र ने बदलती जीवन शैली पर पैनी दृष्टि रखते हुए ग़ज़ल की मूल प्रवृत्ति रूमानियत को भी बड़ी खूबी के साथ समेटा है। एक ग़ज़ल के ये शेर देखिए-
तेरे मेरे सबके मन की चिट्ठियां।
याद आती है वो लंबी चिट्ठियां।
चैट मैसेज काॅल का है वक़्त पर
अपने एहसासों की धरती चिट्ठयां।
इसी ग़ज़ल का एक और खूबसूरत शेर है जो नास्टैल्जिक होता हुआ स्मृतियों के रंग को और गाढ़ा कर देता है-
टांगनी थीं जब भी यादों की कमीज़
हो  गई  थीं  एक  खूंटी चिट्ठियां।
विनय मिश्र अपने विचारों में स्पष्ट हैं। वे जीवन को अपनी दृष्टि से देखते हैं और मौलिकता को प्रधान तत्व मानते हैं। वे मौलिक होने में विश्वास रखते हैं, किसी की प्रतिकृति होने में नहीं। वे कटाक्ष करते हुए लिखते हैं-
दूसरों को देखने की मुझको आदत ही नहीं ।
जो नहीं हूँ वो मुझे होने की चाहत ही नहीं।
यह समय रोबोट का है यह समय ए.आइ. का
इस समय को आदमी की अब जरूरत ही नहीं।
ग़ज़लकार ने अपनी बात कहने के लिए प्राकृतिक बिम्बों का भी सहारा लिया है जिससे उनके भाव और अधिक कोमल और प्रभावी हो गए हैं। जैसे ये शेर हैं-
किसी कागज पे कोई ख़्वाब लिखना।
न  पूछो  ये  अधूरापन  है कितना।
हवा  लहरों  के  पन्ने   खोलती है
नदी  को  हो  गया  आसान पढ़ना।
इस उपरोक्त शेर में नदी को पढ़ना ज़िन्दगी को पढ़ने के समान है। विनय मिश्र की ग़ज़लों में छायावादी तत्व प्रभावी हो उठते हैं जब वे प्रकृति का मानवीयकरण कर के अपनी बात कहते हैं। छायावाद की यही तो विशेषता रही कि उसमें प्रकृति का मानवीकृत करते हुए जीवन के प्रत्येक पक्ष एवं भावनाओं को अभिव्यक्ति दी गई। इस खूबी को विनय मिश्र ने भी अपनाया है। बानगी देखिए - 
अपने सिर को झुका रही है अब।
रात  चेहरा  छुपा   रही है अब।
आज के दिन को अलविदा कहकर
आखिरी  धूप  जा  रही  है अब।
मंहगाई, अपनों से दूरियां, पीढ़ियों के बीच मतभेद, बुजुर्गों की अवहेलना, युवाओं के प्रति अविश्वास, बेरोजगारी आदि समस्याएं वर्तमान की मुखर समस्याएं हैं। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो ये लगभग हर घर की समस्याएं हैं। अतः जब सब के दुख एक से हों तो किसी के भी दुख की चर्चा अपने दुख की चर्चा लगती है। ग़ज़लकार ने लिखा है कि ‘‘घर घर जिसकी चर्चा है/वो दुख कितना अपना है।’’
किसी भी काव्य विधा की महत्ता तब और अधिक बढ़ जाती है जब उसमें नूतन बिम्ब प्रयोग किए जाते हैं। ऐसा करने से काव्य में कहन का सपाटपन दूर होत है और पाठक से तादात्म्य गहरा जाता है। विनय मिश्र ने अपने कुछ शेरो में नवीन टटके प्रयोग किए हैं जो बहुत रोचक और प्रभावी बन पड़े हैं। जैसे घुटनों तक आने के मुहावरे का प्रयोग-
आँखों के  सपने तक हूँ
मंजिल के मिलने तक हूँ
जिसको कहना मुश्किल है
मैं उसको  कहने तक हूँ
तेरी  ये  खुशफहमी है
मैं  तेरे  घुटने  तक हूँ
कवि ने राजनीति के चरित्र को भी अपनी ग़ज़ल में उकेरा है। राजनीति में किसी भी बात का सिरा समझना कठिन होता है। सारे दांव-पेंच इतने गोलमोल होते हैं कि आमजन तो उन्हें समझ ही नहीं पाता है। जैसे रथ के घूमते हुए पहिए की तीलियां घूमती हुई एक समान गति की प्रतीत होती हैं। उन्हें एकटक देखने वाला व्यक्ति उन घूमती हुई तीलियों के स्पेस को माप नहीं सकता लेकिन उसकी दृष्टि चकरा जरूर जाएगी। कुछ ऐसा ही कहा गया है इस शेर में-

कितना रहस्यमय है ये रथ राजनीति का
पहिये-सी घूमती हुई जिसकी कला चले
कवि ने जीवन की विसंगतियों, विषमताओं एवं विडंबनाओं को केामलता से रेखांकित करते हुए भी प्रेम के तत्व को प्रमुखता दी है। ऐसा करते हुए कवि ने प्रेम के सौंदर्य को जिन शब्दों में व्याख्यायित किया है वह किसी के भी मन को छू लेने में सक्षम है। एक ग़ज़ल के चंद शेर देखिए-
हर सुबह एक ताजगी होकर।
रात  आती है रौशनी होकर।
आज  तेरे  किनारे  बैठा हूँ
और तू बह रही नदी होकर।
हर  कोई  वक्त पूछता है यूँ
रह गया जैसे मैं घड़ी होकर।
विनय मिश्र का ग़ज़ल संग्रह ‘‘रंग बारिश’’ सधे हुए शिल्प की वे ग़ज़लें हैं जो छायावादी नाव पर सवार हो कर यथार्थ के अनुभवों को सहेजे हुए हैं। इन ग़ज़लों में प्रेमाभिव्यक्ति की स्निग्धता है और विसंगतियों पर कटाक्ष भी। इन ग़ज़लों में रोबोट होते जीवन में प्रेम को जी लेने की ललक है। ये ग़ज़लें सभी को अपने मन की बात सी प्रतीत होंगी। इसीलिए ‘‘रंग बारिश’’ हर आयुवर्ग के पाठकों को पसंद आएगा। 
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Saturday, March 29, 2025

टॉपिक एक्सपर्ट | पत्रिका | लेओ फेर के पिट गई पुलिस | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

पत्रिका | टॉपिक एक्सपर्ट | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली में
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टाॅपिक एक्सपर्ट
लेओ फेर के पिट गई पुलिस
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह    
       हऔ, सांची आए जे खबर के फेर के पिट गई पुलिस औ बा बी ई दफा अपने सागर जिला में। का भओ के कछु पुलिसवारे महुआखेड़ा पौंचे आरोपी खों पकड़बे के लाने। उते उनको डंडा, पथरा औ कुल्हड़िया से वेलकम करो गओ। बचत-बचत बी कछु पुलिस वारन खों चोटें-मोटें घल गईं। बताओ गओ के पुलिसवारे कछू ने कर सके, काए से के उन ओरन के पास बंदूकें ना हतीं, खाली डंडा रओ। सो अब दो बातें सोचबे की आएं के जो उन पुलिस वारन के पास डंडा की जांगा बंदूकें होतीं तो बे का कर लेते? बिगैर ऊपर की परमीसन के बे गोली तो चला ने सकत्ते। भौतई होती तो एकाध चिरैया उड़ाऊ फायर मने हवाई फायर कर लेते। बाकी ऊके बाद सबरे उनई खों गरियाउते के उन्ने काय खों गोली चलाई? मने ने करे में सल्ल औ ने ना कर पाबे में सल्ल।  
बाकी दूसरी सोचबे वारी बात जे आए के कभऊं रीवा में, कभऊं सतना में, कभऊं इन्दौर में, तो कभऊं मंदसौर में औ अब सागर में सोई पुलिस पिट गई। जो ऐसो काय हो रओ? पुलिसवारन ने कोन के खेत पटा लए, के उनकी दसा ठुकेली-पिटेली सी भई जा रई? बाकी बे का कोऊ के खेत पटाहें, बे तो ऊंसईं नेता-मंत्री हरों के दौरा की ड्यूटी करत-करत दूबरे होत रैत आएं। सो, निकर के जेई बात आऊत आए के बदमास हरों औ ऊनके संगवारन में पुलिस को डर कम होत जा रओ। तभई तो बे मारबे दौड़त आएं। सो, ई पे गंभीरता से विचार करे की ज़रूरत आए। ने तो ऐसे तो पुलिसवारन को मनोबल टूटहे औ फेर पब्लिक को का हुइए? पब्लिक खों रैने परहे टोटल रामभरोसे। सो, समै रैत भए सासन-प्रसासन ई तरफी बी तनक ध्यान दे लैवे।
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Thank you Patrika 🙏
Thank you Dear Reshu Jain 🙏
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