Wednesday, July 3, 2019

चर्चा प्लस … गौरवशाली परम्परा है बुंदेलखंड में रथयात्रा की - डॉ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
चर्चा प्लस …..

गौरवशाली परम्परा है बुंदेलखंड में रथयात्रा की
- डॉ. शरद सिंह 

बुंदेलखंड संस्कृति का धनी है क्योंकि इसने सम्पूर्ण भारत की सांस्कृतिक एवं धार्मिक परम्पराओं को आत्मसात किया है। यहां जिस उत्साह से दुर्गापूजा मनाई जाती है उसी उत्साह से भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा निकाली जाती है। रथयात्रा एक ऐसा पर्व है जिसे समूचा बुंदेलखंड ठीक उसी प्रकार से मानता है जैसाकि ओडीशा के पुरी में में मनाया जाता है। वैसी ही अर्द्धनिर्मित मूर्तियां, वैसे ही रथ और ठीक वैसे ही रथ को अपने हाथों से खींचने का उत्साह। अनेकता में एकता का सुंदर उदाहरण देखा जा सकता है भगवान जगन्नाथ की बुंदेली रथयात्रा में।
Charcha Plus Column by Dr Sharad Singh ... चर्चा प्लस … गौरवशाली परम्परा है बुंदेलखंड में रथयात्रा की - डॉ. शरद सिंह
बुंदेलखंड में विभिन्न प्रदेशों के व्यक्ति सदियों से आते और बसते रहे हैं। विशेषता यह कि यहां कभी प्रादेशिकता के आधार पर कभी किसी से किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं किया गया वरन् उनकी परम्पराओं को इस प्रकार अपना लिया गया जैसे वे परम्पराएं किसी अन्य प्रदेश की नहीं बल्कि बुंदेलखंड की ही हों। इसी तारतम्य में एक गौरवशाली परम्परा है रथयात्रा निकालने की। बुंदेलखंड में परम्परागत रूप से रथयात्रा पर्व मनाया जाता है, ठीक उसी दिन जब ओडीशा के पुरी में जगन्नाथ मंदिर में स्थित भगवान जगन्नाथ, उनकी बहन सुभद्रा और बड़े भाई बलदाऊ को विशाल रथों में आसीन कर रथयात्रा निकाली जाती है। यह आयोजन प्रत्येक वर्ष आषाढ़ शुल्क की द्वितिया को सम्पन्न होता है। भगवान जगन्नाथ, उनकी बहन सुभद्रा और बड़े भाई बलदाऊ की ये मूर्तियां अर्द्धनिर्मित हैं। जन्नाथपुरी की अर्द्धनिर्मित प्रतिमाओं के संबंध में कहा जाता है कि राजा इन्द्रद्युम्न को भगवान जगन्नाथ ने स्वप्न में दर्शन दिए और समुद्र में तैरते वृ़क्ष की शाखा से भाई बलराम एवं बहन सुभद्रा सहित उनकी मूर्ति बनाए जाने का आदेश दिया। भोर होने पर राजा ने समुद्र तट पर पहुंच कर वह शाखा प्राप्त कर ली और कारीगरों को मूर्तियां गढ़ने का आदेश दिया। वह शाखा इतनी अद्भुत थी कि उस पर कोई भी कारीगर छैनी तक नहीं चला सका। अंततः स्वयं विश्वकर्मा एक वृद्ध कारीगर के रूप में राजा के पास पहुंचे और शर्त रखी कि मूर्ति निर्माण के दौरान न तो कोई उन्हें व्यवधान पहुंचाएगा और न ही मंदिर के पट खोलेगा। यदि ऐसा किसी ने किया तो वे मूर्तिनिर्माण कार्य उसी क्षण रोक कर वहां से चले जाएंगे। राजा ने शर्त स्वीकार कर ली। मंदिर से आरी, छैनी, हथौड़ी चलने की आवाजें आती रहीं। राजा इन्द्रद्युम्न की रानी गुंडिचा अपने को रोक नहीं पाई। वह दरवाजे के पास गई तो उसे कोई आवाज सुनाई नहीं दी। वह घबरा गई। उसे लगा वृद्ध कारीगर मर गया है। राजा को भी यही भ्रम हो गया। राजा ने कमरे का दरवाजा खोलने का आदेश दिया। जैसे ही कमरा खोला गया तो वृद्ध वहां नहीं था जबकि तीन अर्द्धनिर्मित मूर्तियां वहां मिलीं। तब से आज तक मूर्तियों के अर्द्धनिर्मित स्वरूप की ही पूजा की जाती है।
पुरी के जगन्नाथ मंदिर के दस दिवसीय महोत्सव की तैयारी का श्रीगणेश अक्षय तृतीया को श्रीकृष्ण, बलराम और सुभद्रा के रथों के निर्माण से हो जाता है। कुछ धार्मिक अनुष्ठान भी किए जाते हैं। रथयात्रा में जगन्नाथ को दशावतारों के रूप में पूजा जाता है। रथ का रूप श्रद्धा के रस से परिपूर्ण होता है। वह चलते समय शब्द करता है। उसमें धूप और अगरबत्ती की सुगंध होती है। इसे भक्तजनों का पवित्र स्पर्श प्राप्त होता है। रथ का निर्माण बुद्धि, चित्त और श्रम से होता है, ऐसे रथ रूपी शरीर में आत्मा रूपी भगवान जगन्नाथ विराजमान होते हैं। इस प्रकार रथयात्रा शरीर और आत्मा के मेल की ओर संकेत करती है और आत्मदृष्टि बनाए रखने की प्रेरणा देती है। रथयात्रा के समय रथ का संचालन आत्मा युक्त शरीर करता है जो जीवन यात्रा का प्रतीक है। यद्यपि शरीर में आत्मा होती है तो भी वह स्वयं संचालित नहीं होती, बल्कि उसे माया संचालित करती है। इसी प्रकार भगवान जगन्नाथ के विराजमान होने पर भी रथ स्वयं नहीं चलता बल्कि उसे खींचने के लिए लोक-शक्ति की आवश्यकता होती है।
जगन्नाथ, बलराम और सुभद्रा के लिए अलग- अलग रथों का निर्माण लकड़ियों से होता है जिनमें किसी भी कील अथवा धातु का प्रयोग नहीं किया जाता है। आषाढ़ की शुक्ल द्वितीय को तीनों रथों को ’सिंहद्वार’ पर लाया जाता है। स्नान व वस्त्र पहनाने के बाद प्रतिमाओं को अपने-अपने रथ में रखा जाता है। इसे ’पहोन्द्रि महोत्सव’ कहते हैं। जब रथ तैयार हो जाते हैं, तब पुरी के राजा एक पालकी में आकर इनकी प्रार्थना करते हैं तथा प्रतीकात्मक रूप से रथ मण्डप को झाडू से साफ़ करते हैं। इसे ’छर पहनरा’ कहते हैं। अब सर्वाधिक प्रतीक्षित व शुभ घड़ी आती है। ढोल, नगाड़ों, तुरही तथा शंखध्वनि के बीच भक्तगण इन रथों को खींचते हैं। प्रतिमाएं अलग-अलग रथों पर सवार होकर अपनी मौसी अर्थात् गुंडिचा देवी के मंदिर की ओर प्रस्थान करती हैं। जगन्नाथ मंदिर से गुंडिचा मंदिर तक का रास्ता ’बड़ दाण्ड’ कहलाता है। इस रथयात्रा में हर वर्ग, उम्र, जाति, सम्प्रदाय के असंख्य लोग शामिल होते हैं। अब तो विदेशी पर्यटक भी बड़ी संख्या में इस अनूठे समागम का आनंद लेने पहुंचने लगे हैं। प्रभु जगन्नाथ का सोलह विशाल पहियों वाला रथ लगभग साढ़े छह सौ क्विंटल का होता है। इसे खींचने वाली मोटी रस्सियां शंखचूड़ कहलाती हैं। शास्त्रों में रथ को देह का प्रतीक माना गया है। देह या शरीर को आत्मा रूपी सारथी अर्थात् रथ का चालक अपनी बुद्धि और दूरदर्शिता से गति देता है। आज के इलेक्ट्रॉनिक एवं तकनीकी युग में भी विशालकाय तीनों रथों को हाथों से ही खींचा जाता है।
बुंदेलखंड के पन्ना नगर में भगवान जगन्नाथ स्वामी रथ यात्रा नगर में स्थित प्राचीन एवं ऐतिहासिक जगदीश स्वामी मंदिर जिसे बड़ा दिवाला मंदिर भी कहते हैं, से आरम्भ होती है। रथ यात्रा के शुभारम्भ में भगवान जगन्नाथ स्वामी जी, देवी सुभद्रा और भगवान बलराम को पूजा अर्चना कर अलग-अलग रथ में विराजमान किया जाता है। यह पूजा पुजारी और राजपरिवार के सदस्य द्वारा की जाती है। इस भव्य रथयात्रा में हजारों की संख्या में श्रद्धालु राजपरिवार के सदस्यों सहित बड़ी संख्या में नागरिकगण शामिल होते हैं। जगदीश स्वामी मंदिर से आरम्भ हो कर रथ यात्रा पन्ना जिले में ही स्थित जनकपुर मंदिर पहुंचती है। जहां मंदिर में भगवान का तिलक एवं आरती करके स्वागत किया जाता है और मंदिर में प्रवेश कराया जाता है। भगवान के मंदिर में प्रवेश के बाद जनकपुर में ही भण्डारा का आयोजन किया जाता है। पन्ना में भव्य रथों के साथ निकली शोभायात्रा में शामिल होने आस-पास के जिलों से भी श्रद्धालु पहुंचे। पन्ना में प्राचीन काल से मनाई जा रही जगन्नाथ स्वामी की रथयात्रा बुंदेलखंड का सबसे भव्य रथयात्रा समारोह है। पन्ना नगर में ऐतिहासिक रथयात्रा महोत्सव का आयोजन जगन्नाथपुरी की तर्ज पर होता है।
पन्ना की भांति ही छतरपुर में भी रथयात्रा का भव्य आयोजन किया जाता है। नगर के तमराई मुहल्ला में प्राचीन भगवान जगन्नाथ स्वामी का मंदिर है। इसी मंदिर से श्रीजगन्नाथ की रथयात्रा आरम्भ होती है। यहां सबसे पहले आकर्षक तरीके से सजाए गए रथ में भगवान जगन्नाथ के साथ बहन सुभद्रा और बलदाऊ की प्रतिमाएं स्थापित की जाती हैं। इसके बाद पूजन, आरती और प्रसाद लगाया गया और शंखनाद के साथ रथयात्रा होती है। बैंडबाजे के साथ रथयात्रा तमराई मुहल्ला से गोवर्धन टाकीज के पास से कोतवाली रोड होते हुए महल परिसर में पहुंचती है।
सागर नगर में रथयात्रा की एक अलग ही रौनक रहती है। यहां छोटे-बड़े अनके मंदिरों से रथयात्राएं निकाली जाती हैं। रथयात्रा के अवसर पर विशेषरूप से नगर कें बड़ा बाजार, चमेली चौक स्थित मंदिरों एवं गोपालगंज स्थित वृंदावन बाग से भगवान जगन्नाथ की अलग-अलग रथयात्राएं निकाली जाती हैं। बड़ा बाजार स्थित श्रीरामबाग मंदिर की रथयात्रा आरम्भ होती है जो मोतीनगर, विजय टॉकीज आदि मुख्य मार्गों से होती हुए मंदिर पर समाप्त होती है। मंदिर में भगवान जगन्नाथ स्वामी विराजमान हैं। मंदिर का नाम भी पहले श्री जगन्नाथ रामबाग मंदिर था। इस अवसर पर शुद्ध घी से बने मालपुओं का भोग लगाया जाता है। बड़ा बाजार स्थित श्रीदेव अटल बिहारी मंदिर से निकलने वाली शोभायात्रा की शुरुआत वर्षों पहले महंत दयालदास महाराज ने की थी। श्रीद्वारकाधीश मंदिर में भगवान बाल स्वरूप में विराजमान हैं, इसलिए उन्हें बाहर नहीं निकाला जाता है। भगवान को मंदिर में ही रथ पर बैठाकर भ्रमण कराया जाता है। इसी प्रकार राधावल्लभ मंदिर, बांके बिहारी मंदिर, जगन बल्देव मंदिर चकराघाट में भी मंदिर के अंदर ही भगवान को रथ में घुमाया जाता है। बड़ा बाजार स्थित साहू समाज मंदिर से भी रथयात्रा निकाली जाती है। इसी प्रकार गेंडाजी मंदिर बड़ा बाजार, कुंजीलाल जगन्नाथ स्वामी मंदिर लक्ष्मीपुरा, बांके बिहारी मंदिर चमेली चौक से भी रथ यात्रा निकलती है।
सागर की गढाकोटा तहसील में परंपरागत तरीके से निकाली जाने वाली जगदीश स्वामी की रथ यात्रा जगदीश मंदिर पटेरिया से हर्षोल्लास के साथ निकाली जाती है जो बाजार वार्ड स्थित मालगुजार परिवार के जनकपुरी मंदिर तक पहुंचती है। इस दौरान ढोल, मंजीरा, झांझर आदि के साथ लोग भजनों के स्वर गूंजने लगते हैं। रहली में पहली यात्रा महावीर चौक स्थित जगदीश स्वामी मंदिर से निकाली जाती है और दूसरी रथ यात्रा बजरिया स्थित देवलिया मंदिर से निकलती है। वहीं रहली में गहोई वैश्य समाज द्वारा रथयात्रा का आयोजन किया जाता है जिसमें सभी वर्गों एवं धर्मों के लोग शामिल होते हैं। राहतगढ़ और सिहोरा में भी रथयात्राएं सोल्लास निकाली जाती हैं।
झांसी में रथयात्रा उत्सव समिति द्वारा यात्रा का भव्य आयोजन किया जाता है जिसमें हजारों श्रद्धालु सम्मिलित होते हैं। ललितपुर में लगभग 25-26 साल पहले छोटे से तांगे पर भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा निकाली गई थी। किन्तु अब हजारों लोग इसमें शामिल होते हैं। जैसा कि जगन्नाथपुरी में सोने की झाड़ू से जगन्नाथ रथयात्रा के रास्ते को साफ किया जाता है। उसी तरह ललितपुर में चांदी की झाडू से मार्ग को साफ किया जाता है।
रथयात्रा एक ऐसा पर्व है जिसे समूचा बुंदेलखंड ठीक उसी प्रकार से मानता है जैसाकि ओडीशा के पुरी में में मनाया जाता है। वैसी ही अर्द्धनिर्मित मूर्तियां, वैसे ही रथ और ठीक वैसे ही रथ को अपने हाथों से खींचने का उत्साह। रथयात्रा का यही मर्म है कि सामूहिक रूप से किए गए श्रम से बड़े से बड़े कार्य भी सुगमतापूर्वक सम्पादित किए जा सकते हैं। साथ ही इस रथयात्रा में यह संदेश भी निहित होता है कि अनेक प्रकार की मशीनी ताकतों पर आश्रित रहने के बजाए मानव को अपनी स्वयं की शक्ति पर विश्वास रखना चाहिए। बुंदेलखंड ने रथयात्रा की गौरवशाली परम्परा सदियों से चली आ रही है और यह भविष्य में भी इसी प्रकार सतत जारी रहेगी।
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(दैनिक ‘सागर दिनकर’, 03.07.2019)
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