Saturday, November 29, 2025

शून्यकाल | डॉ. हरीसिंह गौर : जिन्होंने स्वप्न देखा और उसे पूरा किया | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नयादौर

शून्यकाल | डॉ. हरीसिंह गौर : जिन्होंने स्वप्न देखा और उसे पूरा किया | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नयादौर
शून्यकाल : डॉ. हरीसिंह गौर : जिन्होंने स्वप्न देखा और उसे पूरा किया
- डाॅ (सुश्री) शरद सिंह 
                                                                                   यूं तो हर व्यक्ति कोई न कोई स्वप्न देखता है और चाहता है कि उसका सपना पूरा हो। लेकिन सिर्फ़ चाहने से सपने पूरे नहीं होते। अपना सपना पूरा करने के लिए हरसंभव प्रयास करना भी जरूरी होता है। बुंदेली सपूत डॉ. हरीसिंह गौर ने भी एक स्वप्न देखा और उसे पूरा करने के लिए अपना तन, मन, धन सब न्योछावर कर दिया। यूं भी उनका स्वप्न एक ऐसा लोकव्यापी स्वप्न था जो सबकी आंखों में बसा हुआ था। बस, उसे साकार करना डॉ. हरीसिंह गौर जैसे दृढ़ इच्छाशक्ति वाले व्यक्ति के वश में ही था।

      डॉ. हरीसिंह गौर ख्यति प्राप्त विधिवेत्ता, न्यायविद्, समाज सुधारक, शिक्षाशास्त्री, साहित्यकार, महान दानी, देशभक्त थे। उन्होंने एक स्वप्न देखा था। वह स्वप्न था बुंदेलखण्ड को शिक्षा का केन्द्र बनाना। वे ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय की भांति एक विश्वविद्यालय की स्थापना बुंदेलखण्ड में करना चाहते थे। जिस समय वे बुंदेलखण्ड में उच्चशिक्षा केन्द्र का सपना देखा करते थे, उन दिनों बुंदेलखण्ड विकट दौर से गुज़र रहा था। गौरवपूर्ण इतिहास के धनी बुंदेलखण्ड के पास आत्मसम्मान और गौरव से भरे ऐतिहासिक पन्ने तो थे किन्तु धन का अभाव था। अंग्रेज सरकार ने बुंदेलखण्ड को अपने लाभ के लिए छावनियों के उपयुक्त तो समझा लेकिन यह कभी नहीं चाहा कि यहां औद्योगिक विकास हो जबकि यहां आकूत प्रकृतिक संपदा मौजूद थी। ठग और पिण्डारियों के आतंक को कुचलने वाले अंग्रेज कभी इस बात को महसूस नहीं कर सके कि वह अशिक्षा और आर्थिक विपन्नता ही थी जिसने ठग और पिण्डारियों को जन्म दिया। अंग्रेजों ने कभी यह नहीं सोचा कि बुंदेलखण्ड में उच्चशिक्षा का कोई केन्द्र भी स्थापित किया जा सकता है जिसमें पढ़-लिख कर बुंदेली युवा आमदनी के नए रास्ते पा सकता है।

अनेक युवा नहीं जानते थे कि स्कूल की चार कक्षाएं पढ़ लेने के बाद आगे क्या कर सकते हैं? किसी कार्यालय में चपरासी बनना अथवा किसी प्रायमरी स्कूल में शिक्षक बनना सबकी चाहत नहीं हो सकती थी। अपने जीवन को सफल बनाते हुए दूसरों से आगे कौन नहीं बढ़ना चाहता है? हर व्यक्ति एक सफल व्यक्ति का जीवन जीना चाहता है। डॉ. हरीसिंह गौर ने इस चाहत को समझा और उन्होंने मन ही मन ठान लिया कि चाहे कुछ भी हो जाए वे बुंदेलखण्ड में एक ऐसा विश्वविद्यालय स्थापित करेंगे जहां दुनिया भर से विद्वान आ कर शिक्षा देंगे और बुंदेलखण्ड के युवाओं को विश्व के शैक्षिकमंच तक ले जाएंगे। उनका यह सपना विस्तृत आकार लिए हुए था। उसमें बुंदेली युवाओं के साथ ही देश के विभिन्न क्षेत्रों से आने वाले युवाओं और विदेशी युवाओं तक के लिए जगह थी। बल्कि वे विश्व के विभन्न क्षेत्रों के युवाओं में परस्पर संवाद और मेलजोल को ज्ञान के प्रवाह का एक अच्छा माध्यम मानते थे।

    डॉ. हरीसिंह गौर केन्द्रीय विश्वविद्यालय की स्थापना ‘सागर विश्वविद्यालय’ के नाम से डॉ. हरीसिंह गौर ने की थी। परतंत्र देश में अपनी इच्छानुसार कोई शिक्षाकेन्द्र स्थापित करना आसान नहीं था। डॉ. हरीसिंह गौर ने तत्कालीन ब्रिटिश सरकार के सामने अपनी इच्छा प्रकट की। ब्रिटिश सरकार को विश्वविद्यालय स्थापित किए जाने की अनुमति देने के लिए मनाना टेढ़ीखीर था। अंग्रेज तो यही सोचते थे कि अधिक पढ़ा-लिखा भारतीय उनके लिए कभी भी सिरदर्द बन सकता है। किन्तु एक सकारात्मक स्थिति यह थी कि उस समय तक ब्रिटिश सरकार को इतना तो समझ में आने लगा था कि अब भारत से उनका दाना-पानी उठने वाला है। एक तो द्वितीय विश्वयुद्ध के वे दुष्परिणाम जिन्हें झेलना ब्रिटेन की नियति बन चुका था और दूसरे भारत में ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध बढ़ते हुए आंदोलन। अंततः डॉ. हरीसिंह गौर अपने स्वप्न को साकार करने की दिशा में एक क़दम आगे बढ़े और उन्हें ब्रिटिश सरकार से अनुमति मिल गई। लेकिन शर्त यह थी कि सरकार उस उच्चशिक्षा केन्द्र की स्थापना का पूरा खर्च नहीं उठाएगी। डॉ. हरीसिंह गौर चाहते तो देश के उन पूंजीपतियों से धन हासिल कर सकते थे जो उनकी विद्वता के कायल थे। लेकिन उन्होंने किसी से धन मांगने के बदले स्वयं एक उदाहरण प्रस्तुत करना उचित समझा और अपनी गाढ़ी कमाई से 20 लाख रुपये की धनराशि से 18 जुलाई 1946 को अपनी जन्मभूमि सागर में सागर विश्वविद्यालय की स्थापना की। आगे चल कर वसीयत द्वारा अपनी पैतृक संपत्ति से 2 करोड़ रुपये दान भी दिया।
डॉ. हरीसिंह गौर ने ‘सागर विश्वविद्यालय’ के स्थापना करके ही अपने दायित्वों की समाप्त नहीं समझ लिया। उन्होंने अपने जीवन के अंतिम समय तक इसके विकास के लिए संकल्पित रहे। उनका स्वप्न था कि सागर विश्वविद्यालय, कैम्ब्रिज तथा ऑक्सफोर्ड जैसी मान्यता हासिल करे। उन्होंने ढाई वर्ष तक इसे सहेजने में अपना पूरा श्रम अर्पित किया। अपनी स्थापना के समय यह भारत का 18वां विश्वविद्यालय था। सन 1983 में इसका नाम डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय कर दिया गया। 27 मार्च 2008 से इसे केन्द्रीय विश्वविद्यालय की श्रेणी प्रदान की गई है। विंध्याचल पर्वत शृंखला के एक हिस्से पथरिया हिल्स पर स्थित सागर विश्वविद्यालय का परिसर देश के सबसे सुंदर परिसरों में से एक है। यह करीब 803.3 हेक्टेयर क्षेत्र में फैला है। विश्वविद्यालय परिसर में प्रशासनिक कार्यालय, विश्वविद्यालय शिक्षण विभागों के संकुल, ब्वायज़ हॉस्टल, गर्ल्स हॉस्टल, स्पोर्ट्स कांप्लैक्स तथा कर्मचारियों एवं अधिकारियों के आवास हैं। डॉ. सर हरीसिंह गौर एक ऐसा विश्वस्तरीय अनूठा विश्वविद्यालय है, जिसकी स्थापना एक शिक्षाविद् के द्वारा दान द्वारा का।

         डॉ. सर हरीसिंह गौर का जन्म महाकवि पद्माकर की नगरी सागर में 26 नवम्बर 1870 को एक निर्धन परिवार में हुआ था। डॉ. गौड़ बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि के थे। प्राइमरी के बाद इन्होनें दो वर्ष मेँ ही आठवीं की परीक्षा पास कर ली जिसके कारण इन्हेँ सरकार से 2 रुपये की छात्रवृति मिली जिसके बल पर ये जबलपुर के शासकीय हाई स्कूल गये। लेकिन मैट्रिक में ये फेल हो गये जिसका कारण था एक अनावश्यक मुकदमा। इस कारण इन्हें वापिस सागर आना पड़ा दो साल तक काम के लिये भटकते रहे फिर जबलपुर अपने भाई के पास गये जिन्होने इन्हें फिर से पढ़ने के लिये प्रेरित किया।
डॉ. गौर फिर मैट्रिक की परीक्षा में बैठे और इस बार ना केवल स्कूल मेँ बल्कि पूरे प्रान्त में प्रथम आये। इन्हें 50 रुपये नगद एक चांदी की घड़ी एवं बीस रूपये की छात्रवृति मिली। मिडिल से आगे की पढ़ाई के लिए जबलपुर गए फिर महाविद्यालयीन शिक्षा के लिए नागपुर के हिसलप कॉलेज में दाखिला ले लिया, जहां से उन्होंने इंटरमीडिएट की परीक्षा भी प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। पूरे कॉलेज में अंग्रेजी एव इतिहास मेँ ऑनर्स करने वाले ये एकमात्र छात्र थे। उन्होंने छात्रवृत्ति के सहारे अपनी पढ़ाई का क्रम जारी रखा। सन् 1889 में उच्च शिक्षा लेने इंग्लैंड गए। सन् 1892 में दर्शनशास्त्र व अर्थशास्त्र में ऑनर्स की उपाधि प्राप्त की। फिर 1896 में एम.ए., सन 1902 में एल. एल. एम. और अन्ततः सन 1908 में एल. एल. डी. किया। कैम्ब्रिज में पढाई से जो समय बचता था उसमें वे ट्रिनिटी कालेज में डी लिट्, तथा एल एल डी की पढ़ाई करते थे। उन्होंने अंतर- विश्वविद्यालयीन शिक्षा समिति में कैंब्रिज विश्वविद्यालय का प्रतिनिधित्व किया, जो उस समय किसी भारतीय के लिये गौरव की बात थी। 

डॉ. सर हरीसिंह गौर ने छात्र जीवन में ही दो काव्य संग्रह ‘‘दी स्टेपिंग वेस्टवर्ड एण्ड अदर पोएम्स’’ और ‘‘रेमंड टाइम’’ की रचना की, जिससे सुप्रसिद्ध रायल सोसायटी ऑफ लिटरेचर द्वारा उन्हें स्वर्ण पदक प्रदान किया गया।

सन् 1912 में वे बैरिस्टर होकर स्वदेश आ गये। सेंट्रल प्रॉविंस कमीशन में अतिरिक्त सहायक आयुक्त के रूप में उनकी नियुक्ति हो गई। उन्होंने तीन माह में ही पद छोड़कर अखिल भारतीय स्तर पर वकालत प्रारंभ कर दी व मध्य प्रदेश, भंडारा, रायपुर, लाहौर, कलकत्ता, रंगून तथा चार वर्ष तक इंग्लैंड की प्रिवी काउंसिल मे वकालत की, उन्हें एलएलडी एवं डी. लिट् की सर्वोच्च उपाधि से भी विभूषित किया गया। 1902 में उनकी ‘‘द लॉ ऑफ ट्रांसफर इन ब्रिटिश इंडिया’’ पुस्तक प्रकाशित हुई। वर्ष 1909 में ‘‘दी पेनल ला ऑफ ब्रिटिश इंडिया (वाल्यूम २)’’ प्रकाशित हुई। प्रसिद्ध विधिवेत्ता सर फेडरिक पैलाक ने भी उनके इस ग्रंथ की प्रशंसा की थी। इसके अतिरिक्त डॉ. गौर ने बौद्ध धर्म पर ‘‘दी स्पिरिट ऑफ बुद्धिज्म’’ नामक पुस्तक लिखी। उस समय तक डॉ. हरीसिंह गौर की प्रसिद्धि चतुर्दिक फैल चुकी थी। उन्हें ‘सर’ की उपाधि से भी सम्मानित किया गया था।
डॉ. हरीसिंह गौर ने 20 वर्ष तक वकालत की तथा प्रिवी काउंसिल के अधिवक्ता के रूप में शोहरत अर्जित की। वे कांग्रेस पार्टी के सदस्य रहे, लेकिन सन 1920 में महात्मा गांधी से मतभेद के कारण कांग्रेस छोड़ दी। वे 1935 तक विधान परिषद् के सदस्य रहे। वे भारतीय संसदीय समिति के भी सदस्य रहे, भारतीय संविधान परिषद् के सदस्य रूप में संविधान निर्माण में अपने दायित्वों का निर्वहन किया। 25 दिसम्बर 1949 को डॉ. हरीसिंह गौर का निधन हुआ।

डॉ. गौर के जन्म के समय किसी ने भी नहीं सोचा होगा कि गरीबी में जन्मा बालक एक दिन पूरी दुनिया में अपनी पहचान बनाएगा और अनेक निर्धन छात्रों के लिए उच्चशिक्षा के द्वार खोल देगा। डॉ. गौर के जीवन के अनेक ऐसे पक्ष हैं युवाओं को सफलता से जीने का रास्ता दिखा कसते हैं। स्मरणीय हैं ये पंक्तियां जो राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने डॉ. हरीसिंह गौर की प्रशंसा में लिखी थीं -
‘‘सरस्वती-लक्ष्मी दोनों ने दिया तुम्हें सादर जय-पत्र,
साक्षी है हरीसिंह ! तुम्हारा ज्ञानदान का अक्षय सत्र! “
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Wednesday, November 26, 2025

चर्चा प्लस | अपनी समसामयिक महत्ता एवं प्रासंगिकता है भागवत कथा आयोजनों की | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर

चर्चा प्लस | अपनी समसामयिक महत्ता एवं प्रासंगिकता है भागवत कथा आयोजनों की | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर 
चर्चा प्लस
अपनी समसामयिक महत्ता एवं प्रासंगिकता है भागवत कथा आयोजनों की

- डाॅ (सुश्री) शरद सिंह
                                                                       इन दिनों भागवत कथा का आयोजन लगभग हर गांव, शहर, कस्बे में होता रहता है। भागवत कथा सुनाने के लिए कथा वाचकों को आमंत्रित किया जाता है। सामर्थ्य के अनुसार प्रसिद्धिवान कथावाचक बुलाए जाने का चलन है। जिस स्थान पर कथा होती है, वहां से कई-कई किलोमीटर दूर से श्रवणकर्ता भागवत कथा सुनने आते हैं। वे श्री कृष्ण की कथाएं सुनते हैं। कथावाचक द्वारा गाए जाने वाले भक्तिमय गानों पर झूमते-थिरकते हैं। हमारी सांस्कृतिक परंपराओं के अनुरूप होता है उत्सवी वातावरण। किन्तु धर्म का मर्म कितने लोग समझ पाते हैं यह कहना कठिन है।   

अभी हाल ही में मेरे शहर में भागवत कथा का बहुत बड़ा आयोजन हुआ। जिसमें सुप्रसिद्ध कथावाचक ने सात दिन तक कथा सुनाई। अपार जनसमूह उमड़ा रहा। इसी प्रकार के पिछले वर्ष के आयोजन में मैं भी कथा सुनने तथा उत्सवी वातावरण को महसूस करने कथा-स्थल पर गई थी। इस बार कतिपय कारणोंवश जाना नहीं हो सका। मेरे एक परिचित को जब यह ज्ञात हुआ कि मैं नहीं जा पाई तो उन्होंने भारी शोक प्रकट किया। उन्होंने इस प्रकार मुझे जताने का प्रसास किया कि मैंने जीवन का एक बहुत सुनहरा अवसर गवां दिया है। अफसोस मुझे भी था किन्तु जीवन के अन्य जरूरी काम भी छोड़े नहीं जा सकते हैं। फिर वह आयोजन स्थल मेरे घर से बहुत दूर था, शहर के दूसरे छोर पर। मैंने जब उन सज्जन से ढेर सारे उलाहने सुन लिए तब उकता कर मैंने उनसे पूछा कि क्या प्रहलाद चरित्र भी सुनाया गया था? यदि सुनाया गया था तो किस दिन? उनका उत्तर था, ‘‘अब ये तो याद नहीं है। बाकी, कथावाचक बड़े सुंदर ढंग से कथा कह रहे थे।’’
‘‘हर कथावाचक सुंदर ढंग से कथा कहते हैं, फिर ये तो बहुत प्रसिद्ध कथावाचक थे। मैं तो यह जानना चाहती हूं कि आपने क्या सुना और क्या गुना?’’ मैंने सीधे-सीधे पूछा।
‘‘अब हम सुनबे खों गए रहे, रटबे खों थोड़ी?’’ वे सज्जन खिसिया कर बुंदेली में बोले।
मैंने इसके आगे उनसे कुछ नहीं कहा। मुझे लगा कि चलो कथा न सही उत्सव का सुख तो इन्होंने पा ही लिया है, यही बहुत है। फिर मुझ लगा कि जो भी जन भागवत कथा सुनने जाते हैं क्या वे भागवत कथा का सही अर्थ समझ पाते हैं? या भक्ति के वातावरण में मात्र डुबकी लगा कर चले आते हैं? आखिर क्या है भागवत कथा?
वस्तुतः भागवत कथा, श्रीमद्भागवत पुराण पर आधारित 7 दिवसीय एक धार्मिक आयोजन है, जिसमें एक कथावाचक भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं और शिक्षाओं को सुनाते हैं। इसका मुख्य विषय भक्ति योग है, जिसमें भगवान कृष्ण को सर्वोपरि देव माना गया है। कथा के माध्यम से ज्ञान, भक्ति और वैराग्य का संदेश दिया जाता है। यह भक्ति, ज्ञान और वैराग्य का मार्ग दर्शाती है, जिसके श्रवण से आध्यात्मिक विकास और मन की शांति प्राप्त होती है। इस आयोजन का उद्देश्य भक्तों को भगवान कृष्ण के जीवन से जोड़ना और उन्हें जीवन के कष्टों से मुक्ति दिलाना है। यह आध्यात्मिक उत्थान और मन की शांति लाती है। इसे धार्मिक दृष्टि से कलियुग में पापों से मुक्ति और मोक्ष प्राप्ति का एक सरल साधन माना जाता है। यह भगवान के प्रति भक्ति को गहरा करती है और जीवन के उद्देश्य की समझ बढ़ाती है।
श्रवण मात्र से ही पुण्य फल की प्राप्ति होती है। इससे भी बढ़ कर यह जीवन जीने की एक अद्भुत शैली सिखाती है। बशर्ते कोई इसके वास्तविक मर्म को समझ ले।
पुराण का अर्थ है - जो प्राचीन होते हुए भी सदा नवीन है अर्थात “पुरा अपि नवं इति प्रमाणं”। पुराण में 5 लक्षण होते हैं परन्तु श्रीमद्भागवत पुराण नहीं, अपितुय महापुराण है, जो सर्गादि 10 लक्षणों से युक्त है। इसमें गायत्री का महाभाष्य, जिसमें वृत्रासुर के वध की कथा है ।
यत्राधिक्षुत्र गायत्रीं वर्ण्यते धर्म विस्तर।
वृत्रासुर वधोपेतं तदवै भागवतं विदुः।।
इसमें जीवन जीने की एक अद्धभुत शैली है। यह महापुराण विशिष्ट है। श्रीमद्भागवत महापुराण  को भगवान श्रीकृष्ण का शब्दमय विग्रह, आध्यात्मिक रस की अलौकिक सरिता, असंतोष जीवन को शान्ति प्रदान करने वाला दिव्य संदेश तथा नर को नारायण बनाने वाली दिव्य चेतना से युक्त माना गया है । इसमें 12 स्कन्ध एवं 335 अध्याय हैं। इसे श्रीमद्भागवतं या केवल भागवतं भी कहा जाता है। ज्ञान, भक्ति और वैराग्य का यह महान ग्रन्थ है। श्रीमद्भागवत महापुराण में भगवान नारायण के अवतारों का ही वर्णन है। 
नैमिषारण्य में शौनकादि ऋषियों की प्रार्थना पर लोमहर्षण के पुत्र उग्रश्रवा सूत जी ने श्रीमद्भागवत महापुराण के माध्यम से श्रीकृष्ण के चैबीस अवतारों की कथा कही है। श्रीमद्भागवत महापुराण में श्रीकृष्ण के ईश्वरीय और अलौकिक रूप का ही वर्णन किया गया है। यह माना जाता है कि इसके पठन एवं श्रवण से भोग और मोक्ष तो सुलभ हो ही जाते हैं, मन शुद्ध होता है और चेतना जाग्रत होती है। 
एक कथा के अनुसार एक बार भगवान् श्रीकृष्ण के सखा उद्धवजी ने श्री कृष्ण से एक प्रश्न किया कि ‘‘हे श्रीकृष्ण! जब आप सदेह अपने धाम चले जायेंगे, तब आपके भक्त इस धरती पर कैसे रहेंगे? वे किसकी उपासना करेंगे?’’ इस पर श्री कृष्ण ने उत्तर दिया कि ‘‘निर्गुण की उपासना करेंगे।’’ तब उद्धव ने पूछा,‘‘ भगवान! निर्गुण की उपासना में बहुत कष्ट है, अतः हे भगवन ! इस विषय में भली प्रकार से आप विचार करें।’’
मान्यता है कि उद्धव की बात का स्मरण करते हुए भगवान् श्रीकृष्ण ने अपने दिव्य देह के तेज को श्रीमद्भागवत महापुराण के ग्रन्थ में प्रवेश कर प्रतिष्ठित दिया और ‘‘पद्मपुराणान्तर्गत श्रीमद्भागवत माहात्म्य’’ के अनुसार उसी दिन से श्रीमद्भागवत महापुराण भगवान श्री कृष्ण का ही शरीर माना जाता है-
स्वकीयं यद्भवेत्तेजसतच्च भागवतेदधात् ।
तिरोधाय प्रविष्टोऽयं श्रीमद्भागवतार्णवम।।
सात दिन चलने वाली भागवत कथा में प्रत्येक दिन के लिए विषय निर्धारित रहते हैं।-
प्रथम दिन - श्रीगणेश पूजन, श्रीमद्भागवत माहात्म्य, मंगलाचरण, भीष्म-पाण्डवादि चरित्र, परीक्षित जन्म एवं श्री शुकदेव प्राकट्य की कथाएं।
दूसरे दिन - ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति, भगवान् विराट का प्राकट्य, विदुर-मैत्रेय संवाद, कपिलोपाख्यान
तीसरे दिन -सती चरित्र, ध्रुव चरित्र, जड़भरत व प्रह्लाद चरित्र की कथाएं।
चौथे दिन  - गजेंद्र मोक्ष, समुद्र मंथन, वामन अवतार, श्रीराम चरित्र एवं श्रीकृष्ण प्राकट्योत्सव
पांचवें दिन - श्रीकृष्ण बाल लीलायें, श्रीगोवर्धन पूजा एवं छप्पनभोग का आनन्द।
छठें दिन  - महारासलीला, श्रीकृष्ण मथुरा गमन, गोपी-उद्धव संवाद एवं रुक्मिणी मंगल।
सातवें दिन - सुदामा चरित्र, श्रीशुकदेव विदाई, व्यास पूजन, कथा विश्राम एवं हवन पूर्णाहुति। 
  - इस प्रकार सात दिनों के लिए कथाओं तथा अनुष्ठानों का निर्धारण किया जाता है। कथावाचक कथाओं की निरंतरा से उत्पन्न होने वाली बोरियत को दूर रखने के लिए भक्ति गीतों का सहारा लेते हैं जिससे रोचकता बनी रहती है तथा श्रवणकर्ताओं में उत्साह बना रहता है।
भागवत कथा की अपनी समसामयिक प्रासंगिकता है जिसे स्वीकार करना अनेक प्रगतिवादी व्यक्तियों के लिए कठिन होगा किन्तु यदि मनोवैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए तो साहित्य चाहे धार्मिक हो अथवा सामाजिक, पुरातन हो अथवा अधुनातन, दोनों की अपनी-अपनी मूल्यवत्ता होती है। जिसे सुन कर, पढ़ कर मन शांति, आनन्द एवं सदमार्ग को चुने जाते हैं जो श्रवणीय ही होती हैं। आज जब समाज से नैतिकता घटती जा रही है, ऐसे कठिन समय में यदि एक कथावाचक भागवत कथा के द्वारा  नैतिक और व्यावहारिक मार्गदर्शन देता है तो, भागवत कथा की उपादेयता को नकारा नहीं जा सकता है। कथावाचक समकालीन मुद्दों को सामने रखकर प्राचीन शिक्षाओं को प्रासंगिक बनाते हैं, जिससे श्रोता अपने जीवन में समानताएं खोज सकते हैं। भागवत की शिक्षाएं इच्छाओं पर नियंत्रण रखना सिखाती हैं तथा स्वार्थरहित होकर करने कर्तव्य करने के लिए प्रेरित करती हैं। भागवत कथा मानसिक शांति प्रदान करती है। कथा परिसर का उत्सवी वातावरण नैराश्य भरे जीवन में उत्साह का संचार करता है। जीवन के प्रति राग उत्पन्न करता है तथा अतिशयता की स्थिति में बुरे कर्मों के प्रति वैराग्य भी उत्पन्न करता है। ऐसे आयोजन आज के युग में भौतिकवाद और आध्यात्मिक विवाद के दौर में उचित विचार-विमर्श की क्षमता जगाते हैं। भागवत कथाएं कभी भी धार्मिक कट्टरता को स्थान नहीं देती हैं वरन उनका आयोजन समरसता का वातावरण गढ़ता है, बशर्ते कट्टरता अथवा अतिप्रगतिवाद के चश्में को परे रख कर इन आयोजनों की ओर देखा जाए। इन्हें सुनने वाले भी यदि मन लगा कर कथाओं का मर्म आत्मसात करें तो जीवन सरस और सार्थक प्रतीत होगा।      
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(दैनिक, सागर दिनकर में 26.11.2025 को प्रकाशित)  
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Tuesday, November 25, 2025

पुस्तक समीक्षा | हिन्दी काव्य परंपरा से समृद्ध सजलें | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

पुस्तक समीक्षा | हिन्दी काव्य परंपरा से समृद्ध सजलें | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण


पुस्तक समीक्षा
हिन्दी काव्य परंपरा से समृद्ध सजलें
- समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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काव्य संग्रह  - रश्मियों का अपहरण
कवि            - ज.ल. राठौर ‘प्रभाकर’
प्रकाशक     - शिवराज प्रकाशन, म.न. 1/1898, गीता गली, मानसरोवर पार्क, शाहदरा, दिल्ली-110032
मूल्य       - 395/-
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हिन्दी काव्य ने अपनी परम्पराओं को सहेजते हुए सदा नूतनता को स्वीकार किया है। यही कारण है कि हिन्दी काव्य आज भी निरन्तर समृद्ध होता जा रहा हैं। हिन्दी में गजल के प्रभाव से उर्दू शब्दों का समावेश अधिक हो गया था किन्तु सजल ने हिन्दी काव्य को हिन्दी भाषा के वास्तविक स्वरूप से पुनः जोड़ने का महत्वपूर्ण कार्य किया है। जहां तक हिन्दी के संस्कृतनिष्ठ भाषाई सौंदर्य का प्रश्न है तो व्यक्तिगत रूप से मेरा यह  मानना रहा है कि यदि हिन्दी के भाषाई सौंदर्य से साक्षात्कार करना है तो जयशंकर प्रसाद के काव्य को पढ़ना चाहिए। यह इसलिए कि प्रसाद ने संस्कृतनिष्ठ परिष्कृत हिन्दी को अपनी अभिव्यक्ति का आधार बनाया। दैनिक संवाद में भले ही अंग्रेजी और उर्दू के शब्द सहज रूप से आ जाते हैं किन्तु जब बात साहित्य की हो तो भाषाई शुद्धता का आग्रह अनुचित नहीं है। हर भाषा का अपना एक सौंदर्य होता है और यह सौंदर्य तभी पूर्णरूप से प्रकट होता है जब उसमें मौलकिता हो, शुद्धता हो। हिन्दी की नई काव्य विधा सजल ने इस आग्रह को दृढ़ता से स्थापना दी है। यद्यपि अब सजल विधा नूतनता के प्रथम सोपान पर नहीं है, वरन यह कई सोपान चढ़ती हुई अपनी पहचान स्थापित कर चुकी है। इसका श्रेय है डाॅ. अनिल गहलौत जी को।
रोचक तथ्य यह है कि सजल विधा अधुनातन तकनीक के गवाक्ष से हो कर साहित्य के प्रांगण में पहुंची है। इस संबंध में डाॅ. अनिल गहलौत ने अपनी पुस्तक ‘‘सजल और सजल का सृजन विज्ञान’’ में लिखा है कि -‘‘हमारे मोबाइल के वाट्स एप ग्रुप ‘‘गजल है जिंदगी’’ के साथियों से हमने सन 2016 में हिंदी को बचाने की अपनी इस चिंता को साझा किया। हमने कहा कि क्यों न गजल के समकक्ष हम हिंदी की एक अपनी विधा लाएँ जिसकी भाषा और व्याकरण के तथा शिल्प के अपने मानक हों। हमारे ग्रुप में अनेक हिंदी के विद्वान कवि, गजलकार, प्रोफेसर, समीक्षक और समाजसेवी जुड़े हुए थे। एक माह के सघन विचार-मंथन के उपरांत सहमति बनी। सजल विधा के नाम पर तथा सजल के अंग-उपांगों के हिंदी नामों पर सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया। सजल की भाषा, व्याकरण और शिल्प के मानक भी सुनिश्चित किए गए। सजल की लय का आधार हिंदी छंदों की लय को मान्य किया गया। उसके उपरांत 5 सितंबर 2016 को उस ग्रुप पर सजल विधा के हिंदी साहित्य में पदार्पण की घोषणा की गई और ग्रुप का नाम बदलकर ‘‘सजल सर्जना’’ कर दिया गया। इस विमर्श में हमारे सहयोग और समर्थन में, श्रम और समय देकर सजल विधा को रूपायित करने में, प्रारंभ में जिनकी प्रमुख भूमिका रही उनके नाम हैं- वाराणसी के डॉ.चन्द्रभाल ‘‘सुकुमार’’, डॉ.रामसनेहीलाल शर्मा ‘‘यायावर’’, श्री विजय राठौर, श्रीमती रेखा लोढ़ा ‘‘स्मित’’, श्री विजय बागरी ‘‘विजय’’, डॉ० मोरमुकुट शर्मा, श्री संतोष कुमार सिंह, डॉ.बी.के.सिंह, डॉ० रामप्रकाश ‘‘पथिक’’, डॉ० राकेश सक्सेना, श्री रामवीर सिंह, श्री ईश्वरी प्रसाद यादव, श्री महेश कुमार शर्मा, श्रीमती कृष्णा राजपूत, एड. हरवेन्द्र सिंह गौर तथा डॉ.एल.एस.आचार्य आदि। (पृष्ठ 42-43)
ज.ल.राठौर ‘‘प्रभाकर’’ के सजलों पर चर्चा करने से पूर्व सजल के उद्भव पर दृष्टिपात कर लेना मुझे इसलिए उचित लगा कि यदि इस संग्रह के जो पाठक सजल विधा से भली-भांति परिचित न हों, उन्हें भी इस नूतन विधा के उद्भव की एक झलक प्राप्त हो जाए। इस विधा को अस्तित्व में आए दस वर्ष पूर्ण होने जा रहे हैं। यह सुखद है। किसी भी विधा का विकास तभी संभव होता है जब उसके प्रति साहित्य जगत में विश्वास हो और उसका स्वागत किया जा रहा हो। सजल विधा से गहराई से जुड़े सागर, मध्यप्रदेश निवासी ज.ल.राठौर ‘‘प्रभाकर’’ जी में सजल को ले कर मैंने सदैव असीम उत्साह देखा है। वे सजल विधा के प्रति आश्वस्त हैं, आस्थावान हैं तथा सतत सृजनशील रहते हैं। ‘‘प्रभाकर’’ जी के इस सजल संग्रह में उनके द्वारा संग्रहीत सजलों को पढ़ते समय उनके वैचारिक एवं भावनात्मक विस्तार से भली-भांति परिचय हुआ जा सकता है। ‘प्रभाकर’’ जी अपने सजलों में शांति, अहिंसा, प्रकृति, पर्यावरण, मनुष्यता आदि विविध बिन्दुओं पर चिंन्तन करते दिखाई देते हैं। वर्तमान में सबसे अधिक पीड़ादायक हैं आतंकी गतिविधियां जो सम्पूर्ण मानवता पर प्रहार कर के प्रत्येक मानस को विचलित कर देती हैं। इस संदर्भ में ‘प्रभाकर’’ जी के एक सजल की कुछ पंक्तियां देखिए-
आँधी करने लगी आक्रमण ।
दीप-शिखा संकट में हर क्षण।
बाढ़ विकट उन्मादी आई ।
डूबा शांति-क्षेत्र का कण-कण।
‘‘प्रभाकर’’ जी स्थिति की विषमताओं का अवलोकन कर के ठहर नहीं जाते हैं वरन वे उन कारणों पर भी चिंतन करते हैं जो समस्त अव्यवस्था के मूल में है। वे लिखते हैं-
तिमिरण इतना पसरा क्यों है।
सूरज अभी न सँवरा क्यों है ।
तुम करते विघटन की बातें 
मन में इतना कचरा क्यों है ।
कवि को पता है कि अव्यवस्थाओं का कारण छल, छद्म और भ्रष्टाचार है। इसीलिए कवि के हृदय में क्रोध भी उमड़ता है और वह अपनी लेखनी के द्वारा सब कुछ जला कर भस्म कर देना चाहता है, जिससे एक ऐसे संसार की रचना हो सके जिसमें सुख और शांति का वातावरण हो। इसीलिए कवि ‘‘प्रभाकर’’ उपचार की बात भी लिखते हैं -
आग लिखता हूँ सदा, अंगार लिखता हूँ।
ओज से परितप्त कर, ललकार लिखता हूँ।
अंधकारों का नहीं, साम्राज्य बढ़ पाए।
रश्मियों की मैं सतत, बौछार लिखता हूँ।
कवि इस बात से व्यथित भी हो उठता है कि अपात्र सुपात्र बने घूम रहे हैं तथा अयोग्य व्यक्ति छद्म के सहारे योग्यता के सिंहासन पर प्रतिष्ठित हैं। भाषाई संदर्भ में वे पाते हैं कि स्वयं हिन्दी भाषी हिन्दी की अवहेलना कर रहे हैं। यह सब कवि के लिए दुखद है, असहनीय है -
कैसा हुआ जगत का हाल !
चलता काग हंस की चाल !!
सूखा कहीं, कहीं है बाढ़ ।
मौसम ने बदले सुर-ताल ।।
ज.ल. राठौर ‘‘प्रभाकर’’ जी ने अतीत के संदर्भों के आधार पर वर्तमान का आकलन भी किया है। जैसे वे अपने एक सजल में कुन्ती पुत्र कर्ण का उल्लेख करते हुए लिखते हैं-
जन्म से वह कर्ण कौन्तेय था।
नियति ने बना दिया. राधेय।।
समय को समझ सका है कौन ?
समय है अटल, सचल, अविजेय ।।
राष्ट्रहित-चिंतन से हम दूर ।
निजी हित-पोषण पहला ध्येय ।।
जब निज हित पोषण की भावना प्रबल हो जाती है तो प्रकृति तक का हनन होने लगता है। वनों का अवैध निर्बाध काटा जाना, पर्वतों को खण्डित किया जाना, बढ़ते प्रदूषण को अनदेखा किया जाना कवि के हृदय को सालता है। कवि ‘‘प्रभाकर’’ की ये पंक्तियां दृष्टव्य हैं-
धरती पर बढ़ रही घुटन है।
सहमा-सहमा आज गगन है।।
सिसक रही हैं सबकी साँसें ।
बहका-बहका रुग्ण पवन है।।
देखा जाए तो कवि ज.ल. राठौर ‘‘प्रभाकर’’ अपने सजलों के माध्यम से जहां मार्ग के कंटकों के प्रति ध्यान आकर्षित करते हैं तो वहीं वे कंटकों के उन्मूलन तथा पीड़ा का  निदान और उपचार भी सुझाते हैं। यह कवि के भीतर उपस्थित सकारात्मकता की द्योतक है। यूं भी प्रत्येक सृजनकार को आशावादी होना ही चाहिए। निराशा का उच्छेदन आशा से ही किया जा सकता है। इस दृष्टि से कवि ‘‘प्रभाकर के सजल हिन्दी काव्य की वैचारिकी को परंपरागत रूप से समृद्ध करते हैं। ज.ल. राठौर ‘‘प्रभाकर’’ के सजल शिल्प की दृष्टि से डाॅ. अनिल गहलौत द्वारा स्थापित किए गए सजल के सृजन-विज्ञान के मानक पर भी खरे उतरते हैं। ‘‘प्रभाकर’’ जी के सजलों का भाषाई सौंदर्य काव्यात्म तत्वों का रसास्वादन कराता है तथा विन्यास सजल विधा में उनकी पकड़ को दर्शाता है। यह सजल संग्रह पाठकों को काव्य की एक नई विधा का सुरुचिपूर्ण आस्वाद कराएगा।        
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Saturday, November 22, 2025

टॉपिक एक्सपर्ट | ब्याओ में ने करियो अन्न की बरबादी | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | पत्रिका | बुंदेली कॉलम

टॉपिक एक्सपर्ट | ब्याओ में ने करियो अन्न की बरबादी | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | पत्रिका | बुंदेली कॉलम
टाॅपिक एक्सपर्ट 
ब्याओ में ने करियो अन्न की बरबादी 
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
     ब्याओ को सीजन सुरू होतई साथ न्योते सोई आन लगत आएं। कछू जने जेई लाने परखे रैत आएं के कबे न्योतो आए औ बे ब्यौहार निभाबे के लाने पौंचे। फेर अकेले ब्यौहार निभाबे की बात नोंई रैत। न्योते में जीमबे मने ‘स्वरुचि भोज’ की ब्यबस्था सोई रैत आए। पैले तो का होत्तो के पंगत लगत्ती। बराती, घराती, मैंमान हरें सबई पंगत में जीमत्ते। परसबे वारे पूंछ-पूंछ के बड़े प्रेम से सबरे ब्यंजन परसत जात्ते। ने कम, ने ज्यादा। मनो कोनऊं खों अफरत लौं खाने होय सो बा तब लौं खा सकत्तो जब लौं अफर ने जाए। बाकी एक नियम रैत्तो के पत्तल पे जूठो ने बचो चाइए। ऊको अन्न को अनादर मानो जात्तो। सो, ईसे जूठो अन्न न बचत्तो औ ने फिंकत्तो। 
        अब आजकाल का आए के बिदेसन की नकल में चल गओ आए बुफे। कायदों ऊको बी जेई आए के जित्तो जो खाने हो उत्तई अपनी प्लेट पे लेओ। मनो होत का आए के स्टालन पे मची रैत आए गदर सी। सो, सबई जने सोचत आएं के जित्ती बने प्लेट भर लेओ औ कऊं पसर के जीमों जाए। अब कोऊ ब्यंजन अच्छो लगत आए कोऊ नईं लगत। कोऊ पूरो खा लेत, तो कोऊ की प्लेट में मुतको बचो रै जात आए। बा जूठो कोऊ के काम को नईं रैत। जो बनाबे वारे या फेर परसत वारे बासन में साजो खाना बचे तो बा कोऊ गरीब-गुरबा, ने तो कोनऊं संस्था में भेजबे के काम आ जात आए। सो, अब कोनऊं ब्याओ के न्योतो में जाओ सो, खयाल राखियो के खाना की बरबादी ने होने पाए। जी भर के खाइयो, मनो प्लेट में उत्तई लेत जाइयो जित्ते में फिंके ना। काए से के अन्न से बढ़ के कछू नईंयां।
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Thank you Patrika 🙏
Thank you Dear Reshu Jain 🙏
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Friday, November 21, 2025

चर्चा प्लस | धैर्य और पठन की कमी हानिकारक है हिन्दी साहित्य के लिए | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर


चर्चा प्लस | धैर्य और पठन की कमी हानिकारक है हिन्दी साहित्य के लिए | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर 


चर्चा प्लस
धैर्य और पठन की कमी हानिकारक है हिन्दी साहित्य के लिए
- डाॅ (सुश्री) शरद सिंह
                
  आज एक पूरी पीढ़ी अंग्रेजी माध्यम से पढ़ कर तैयार हो चुकी है और उसके बाद की दूसरी पीढ़ी अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में पढ़ रही है। आज के युवा माता-पिता और उनके बच्चे हिन्दी से कट चुके हैं। उनके लिए हिन्दी घर के नौकरों और बाजार-हाट में खरीददारी की भाषा है। उनके लिए नौकरी और सामाजिक सम्मान की भाषा अंग्रेजी है। उन्हें जिस भाषा से लगाव ही नहीं है, वे उसके साहित्य के प्रति लगाव कहां से पैदा करेंगे? वे हिन्दी का साहित्य क्यों खरीदेंगे? और क्यों पढ़ेंगे? यह एक कटु सच्चाई है। यदि हम शुतुरमुर्ग की भांति रेत में अपने सिर को घुसा कर सोच लें कि कोई संकट नहीं है तो यह हमारी सबसे बड़ी भूल होगी। हां, हिन्दी को पुनःप्रतिष्ठा उसके साहित्य से ही मिल सकती है।


हिन्दी आज दुनिया में बोली जाने वाली तीसरी सबसे बड़ी भाषा है। आंकड़ों के अनुसार दुनिया भर में लगभग 64.6 करोड़ लोग हिन्दी बोलते हैं। इस हिसाब से तो हिन्दी साहित्य को ललहलहाती फसल की भांति दिखाई देना चाहिए लेकिन उस पर तुषार का असर दिखाई देता है। हिन्दी का साहित्य अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष रहा है। क्या यह चौंकाने वाली बात नहीं है? क्या हम हिन्दी वाले किसी भ्रम में जी रहे हैं अथवा स्थिति हम हिन्दी साहित्य वालों द्वारा ही स्थिति बिगाड़ी गई है?  भाषा और साहित्य परस्पर एक-दूसरे पर निर्भर होते हैं। भाषा का प्रसार साहित्य के प्रसार का आधार बनता है। एक समय था जब हिन्दी में लोकप्रियता एक मानक की भांति थी। अंग्रेजी माध्यम से पढ़ने वाले और अंग्रेजी के प्राध्यापक भी हिन्दी में साहित्य सृजन कर के स्वयं को धन्य समझते थे। अनेक ऐसे चर्चित साहित्यकार हुए जो जीवकोपार्जन के लिए अंग्रेजी में अध्यापनकार्य करते थे किन्तु उन्होंने स्थापना पाई हिन्दी साहित्य रच कर। किन्तु आज स्थिति विचित्र है। आज हिन्दी का साहित्यकार एक व्याकुल प्राणी की भांति अपनी स्थापना के लिए छटपटाता रहता है। जिस साहित्य को पूर्व आलोचकों ने ‘‘लुगदी’’ साहित्य कह कर हाशिए पर खड़े कर रखा था आज उसी साहित्य की नैया पर सवार हो कर प्रसिद्धि की गंगा पार करने का प्रयास किया जाता है। यद्यपि यह अलग बहस का मुद्दा है कि किसी भी साहित्य को मात्र इसलिए ठुकरा दिया जाना कहां तक उचित था कि वह रीसाइकिल्ड मोटे कागाज पर छापा जाता था। वह कागज अपेक्षाकृत खुददुरा होता था। उसका रंग भी पीला-भूरा सा होता था लेकिन उसमें छपने वाली किताबें लोकप्रियता में सबसे आगे थीं। भले ही उसे साहित्य की श्रेणी में न रखा गया हो लेकिन वे किताबे खूब पढ़ी गईं।  
अगर बात हिन्दी की करें तो हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र संघ की सातवीं आधिकारिक भाषा बनाने हेतु प्रयास सतत जारी हैं। वर्ष 2018 में सुषमा स्वराज ने यह पक्ष सामने रखा था कि हिन्दी को आधिकारिक भाषा बनाने हेतु कुल सदस्यों में से दो तिहाई सदस्य देशों के समर्थन की आवश्यकता होगी।’’ इस महत्त्वपूर्ण कार्य हेतु आवश्यक है कि कुछ ठोस पहल की जानी चाहिए थीं किन्तु अभी तक ऐसा कुछ हो नहीं सका है। अभी संयुक्त राष्ट्र की छह आधिकारिक भाषाएं हैं- अरबी, चीनी, अंग्रेजी, फ्रेंच, रूसी और स्पेनिश। संयुक्त राष्ट्र संघ में हिन्दी के लिए कुछ प्रयास किए गए हैं जैसे- हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए विदेश मंत्रालय में हिन्दी एवं संस्कृत प्रभाग बनाया गया है। संयुक्त राष्ट्र संघ हिन्दी में नियमित रूप से एक साप्ताहिक कार्यक्रम प्रस्तुत करता है। संयुक्त राष्ट्र संघ ने हिन्दी में न्यूज वेबसाइट चलाई है। हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र संघ की आधिकारिक भाषा बनाने के लिए जो तर्क दिए जाते हैं वे हैं- कि हिन्दी की लिपि सरल और वैज्ञानिक है, इसकी लिपि रोमन, रूसी, और चीनी जैसी लिपियों का अच्छा विकल्प बन सकती है, हिन्दी के कारण दुनिया की कई भाषाओं को मदद मिलेगी आदि-आदि। अब एक लक्ष्य और निर्धारित किया गया है वह है ‘‘पंच प्रण’’ का। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ‘‘पंच प्रण’’ की घोषणा करते हुए कहा है कि अब हमें वर्ष 2047 तक एक वैश्विक महाशक्ति के रूप में खुद को स्थापित करने के लिए ‘पंच प्रण’ का संकल्प लेना है। इसमें हिन्दी को हमारे पारंपरिक ज्ञान, ऐतिहासिक मूल्यों और आधुनिक प्रगति के बीच, एक महान सेतु की भांति देखा गया है। लेकिन आज एक पूरी पीढ़ी अंग्रेजी माध्यम से पढ़ कर तैयार हो चुकी है और उसके बाद की दूसरी पीढ़ी अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में पढ़ रही है। आज के युवा माता-पिता और उनके बच्चे हिन्दी से कट चुके हैं। उनके लिए हिन्दी घर के नौकरों और बाजार-हाट में खरीददारी की भाषा है। उनके लिए नौकरी और सामाजिक सम्मान की भाषा अंग्रेजी है। उन्हें जिस भाषा से लगाव ही नहीं है, वे उसके साहित्य के प्रति लगाव कहां से पैदा करेंगे? वे हिन्दी का साहित्य क्यों खरीदेंगे? और क्यों पढ़ेंगे? यह एक कटु सच्चाई है। यदि हम शुतुरमुर्ग की भांति रेत में अपने सिर को घुसा कर सोच लें कि कोई संकट नहीं है तो यह हमारी सबसे बड़ी भूल होगी।
वर्ष 2024 के उत्तरार्द्ध में एक चर्चित साहित्य उत्सव में बतौर कवयित्री एक ऐसी अभिनेत्री को बुलाए जाने पर बवाल मचा जिसकी साहित्यिक प्रतिभा का तो किसी को पता नहीं था किन्तु उसके विचित्र कपड़ों के माध्यम से देह प्रदर्शन की ख्याति अवश्य है। उस अभिनेत्री ने कौन-सी राह पकड़ी है, यह उसका निजी मामला है। उस पर किसी को आपत्ति न थी और न है। अचम्भा तो इस बात का हुआ कि क्या साहित्य को ख्याति पाने के लिए किसी ऐसे सहारे की आवश्यकता है?
हिन्दी के साहित्य को वैश्वि पटल पर पहुंचाने के लिए क्या उसके अनुवाद का सहारा लेना जरूरी है? यह प्रश्न उठा था जब लेखिका गीतांजलि श्री को उनके हिन्दी उपन्यास ‘रेत समाधि’ के अंग्रेजी अनुवाद ‘टम्ब ऑफ सेण्ड’ के लिए अंतर्राष्ट्रीय बुकर पुरस्कार दिया गया है। उत्तर भी उन्हीं दिनों मिल गया था कि बुकर पुरस्कार में हिन्दी भाषा की कोई श्रेणी नहीं है। दुनिया की तीसरे नंबर की सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा को एक विदेशी पुरस्कार दाता अपनी भाषाई श्रेणी में नहीं रखता है किन्तु उसका पुरस्कार पाने के लिए उसकी मान्य भाषा को हम स्वीकार कर लेते हैं। यह एक गजब का विरोधाभास है। निःसंदेह अनुवाद में कोई बुराई नहीं है। अनुवाद तो दो संस्कृतियों और दो भाषाओं के बीच सेतु का कार्य करता है किन्तु पीड़ा तब होती है जब हम अपनी ही भाषा हिन्दी को ले कर हीन भावना के शिकार हो जाते हैं।
खैर, बात हिन्दी साहित्य की है। कभी-कभी ऐसा लगता है मानो हिन्दी साहित्य जयशंकर प्रसाद, प्रेमचंद, महावीर प्रसाद द्विवेदी, हजारी प्रसाद द्विवेदी अथवा आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी के समय की गरिमा को खो चुका है। यदि इन मनीषियों का उदाहरण न भी लिया जाए तो वह साहित्यिक विमर्श जो चेतना को झकझोरे रखता था और जिसे जगाए रखने का श्रेय राजेन्द्र यादव और नामवर सिंह को दिया जाता था, वह विमर्श भी मानों कहीं सो गया है। अब ऐसा लगता है कि विचार-विमर्श के लिए किसी के पास समय नहीं है। हिन्दी के सारे साहित्यकार बड़ी शीघ्रता में हैं। यह शीघ्रता है रातों-रात प्रसिद्धि पाने की। सोशल मीडिया ने साहित्य को एक अच्छा पटल दिया किन्तु उस पटल पर इतने खरपतवार की भांति साहित्यकार उग आए कि पूरा पटल भ्रम में डाल देता है कि असली रचना किसी है? एक बुद्धिजीवी महिलाओं के व्हाट्सएप्प ग्रुप में एक फार्वडेड पोस्ट मिली जिसमें एक कविता को यह कह कर प्रस्तुत किया गया था कि यह मुंशी प्रेमचंद की सबसे मार्मिक कविता है। मुझसे नहीं रहा गया और मैंने उस पर टिप्पणी कर दी कि प्रेमचंद कथाकार थे, उन्होंने कविताएं नहीं लिखीं। और यह कविता तो उनकी कदापि नहीं है। उस अग्रेषित पोस्ट को ग्रुप में साझा करने वाली विदुषी महिला ने बड़े उपेक्षा भाव से उत्तर दिया कि ‘‘यह कविता प्रेमचंद की हो या न हो लेकिन कविता अच्छी है और मार्मिक है।’’ अर्थात् उस गलत पोस्ट को उन्होंने व्यक्तिगत लेते हुए उसकी अप्रत्यक्ष पैरवी कर डाली। उसके बाद मैंने उस ग्रुप से स्वयं को अलग कर लिया। क्योंकि किसी सोते हुए को जगाना आसान है किन्तु जागे हुए को भला आप कैसे जगाएंगे?
वर्तमान में हिन्दी के नवोदित साहित्यकारों में आमतौर पर जो लक्षण देखने को मिल रहे हैं उनमें सबसे प्रमुख है दूसरों के लिखे साहित्य को पढ़ने की आदत की कमी और लेखकीय साधना या अभ्यास की कमी। मुझे याद है कि सागर के वरिष्ठ साहित्यकार शिवकुमार श्रीवास्तव प्रायः यह बात कहा करते थे कि जब कोई कविता या कहानी लिखो तो उसे लिख कर एक सप्ताह के लिए किसी दराज़ में छोड़ दो। फिर एक सप्ताह बाद उसे पढ़ कर देखो। उसमें मौजूद कमियां स्वयं दिखाई दे जाएंगी।’’ यह बात थी साहित्य में धैर्य रखे जाने की।
एक बार एक पुस्तक की भूमिका लिखने के लिए मुझे पांडुलिपि दी गई। मैंने उसे पढ़ा। मुझे लगा कि यदि उसमें रखी गई कविताओं में तनिक सुधार कर दिया जाए तो वे बहुत बेहतर हो जाएंगी। मैंने उस साहित्यकार को फोन पर यह बात बताई। उसका उत्तर था,‘‘अब इसको तो आप ऐसे ही रहने दीजिए, सुधार का काम अगले में देखा जाएगा। इसको जल्दी से जल्दी छपवाना है। प्रकाशक से सब तय हो गया है।’’ उनके इस उत्तर से मेरे लिए धर्मसंकट खड़ा हो गया। यदि मैं भूमिका लिखने से मना करती हूं तो उस साहित्यकार से मेरे संबंध बिगड़ेंगे और यदि भूमिका लिखती हूं तो साहित्य से मेरे संबंध खराब होंगे। बहुत सोच-विचार के बाद मैंने बीच का रास्ता निकाला और तनिक समीक्षात्मक होते हुए भूमिका लिख दी। वह साहित्यकार प्रसन्न कि मैंने सुधार किए बिना भूमिका लिख दी और मुझे तसल्ली थी कि मैंने समीक्षात्मक ढंग से उसकी खामियों की ओर भी संकेत कर दिया था। यद्यपि ईमानदारी से कहा जाए तो यह उचित नहीं था। भूमिका को भूमिका की भांति ही होना चाहिए किन्तु उस साहित्यकार के हठ ने मुझे यह कदम उठाने को विवश किया। कहने का आशय ये है कि इस समय का नवोदित साहित्यकार अपनी आलोचना अथवा अपने सृजन की कमियों को सुनना ही नहीं चाहता है औ आशा करता है कि हर कोई उसकी रचना को पढ़े। हिन्दी साहित्य को पुनःप्रतिष्ठा उसके साहित्य से ही मिल सकती है बशर्ते ऐसा लिखा जाए जो उसे उसका पाठक बनने को विवश कर दे।        
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(दैनिक, सागर दिनकर में 21.11.2025 को प्रकाशित) 
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चर्चा प्लस | धैर्य और पठन की कमी हानिकारक है हिन्दी साहित्य के लिए | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर

चर्चा प्लस | धैर्य और पठन की कमी हानिकारक है हिन्दी साहित्य के लिए | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर 

चर्चा प्लस
धैर्य और पठन की कमी हानिकारक है हिन्दी साहित्य के लिए
- डाॅ (सुश्री) शरद सिंह
             
  आज एक पूरी पीढ़ी अंग्रेजी माध्यम से पढ़ कर तैयार हो चुकी है और उसके बाद की दूसरी पीढ़ी अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में पढ़ रही है। आज के युवा माता-पिता और उनके बच्चे हिन्दी से कट चुके हैं। उनके लिए हिन्दी घर के नौकरों और बाजार-हाट में खरीददारी की भाषा है। उनके लिए नौकरी और सामाजिक सम्मान की भाषा अंग्रेजी है। उन्हें जिस भाषा से लगाव ही नहीं है, वे उसके साहित्य के प्रति लगाव कहां से पैदा करेंगे? वे हिन्दी का साहित्य क्यों खरीदेंगे? और क्यों पढ़ेंगे? यह एक कटु सच्चाई है। यदि हम शुतुरमुर्ग की भांति रेत में अपने सिर को घुसा कर सोच लें कि कोई संकट नहीं है तो यह हमारी सबसे बड़ी भूल होगी। हां, हिन्दी को पुनःप्रतिष्ठा उसके साहित्य से ही मिल सकती है।


हिन्दी आज दुनिया में बोली जाने वाली तीसरी सबसे बड़ी भाषा है। आंकड़ों के अनुसार दुनिया भर में लगभग 64.6 करोड़ लोग हिन्दी बोलते हैं। इस हिसाब से तो हिन्दी साहित्य को ललहलहाती फसल की भांति दिखाई देना चाहिए लेकिन उस पर तुषार का असर दिखाई देता है। हिन्दी का साहित्य अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष रहा है। क्या यह चौंकाने वाली बात नहीं है? क्या हम हिन्दी वाले किसी भ्रम में जी रहे हैं अथवा स्थिति हम हिन्दी साहित्य वालों द्वारा ही स्थिति बिगाड़ी गई है?  भाषा और साहित्य परस्पर एक-दूसरे पर निर्भर होते हैं। भाषा का प्रसार साहित्य के प्रसार का आधार बनता है। एक समय था जब हिन्दी में लोकप्रियता एक मानक की भांति थी। अंग्रेजी माध्यम से पढ़ने वाले और अंग्रेजी के प्राध्यापक भी हिन्दी में साहित्य सृजन कर के स्वयं को धन्य समझते थे। अनेक ऐसे चर्चित साहित्यकार हुए जो जीवकोपार्जन के लिए अंग्रेजी में अध्यापनकार्य करते थे किन्तु उन्होंने स्थापना पाई हिन्दी साहित्य रच कर। किन्तु आज स्थिति विचित्र है। आज हिन्दी का साहित्यकार एक व्याकुल प्राणी की भांति अपनी स्थापना के लिए छटपटाता रहता है। जिस साहित्य को पूर्व आलोचकों ने ‘‘लुगदी’’ साहित्य कह कर हाशिए पर खड़े कर रखा था आज उसी साहित्य की नैया पर सवार हो कर प्रसिद्धि की गंगा पार करने का प्रयास किया जाता है। यद्यपि यह अलग बहस का मुद्दा है कि किसी भी साहित्य को मात्र इसलिए ठुकरा दिया जाना कहां तक उचित था कि वह रीसाइकिल्ड मोटे कागाज पर छापा जाता था। वह कागज अपेक्षाकृत खुददुरा होता था। उसका रंग भी पीला-भूरा सा होता था लेकिन उसमें छपने वाली किताबें लोकप्रियता में सबसे आगे थीं। भले ही उसे साहित्य की श्रेणी में न रखा गया हो लेकिन वे किताबे खूब पढ़ी गईं।  
अगर बात हिन्दी की करें तो हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र संघ की सातवीं आधिकारिक भाषा बनाने हेतु प्रयास सतत जारी हैं। वर्ष 2018 में सुषमा स्वराज ने यह पक्ष सामने रखा था कि हिन्दी को आधिकारिक भाषा बनाने हेतु कुल सदस्यों में से दो तिहाई सदस्य देशों के समर्थन की आवश्यकता होगी।’’ इस महत्त्वपूर्ण कार्य हेतु आवश्यक है कि कुछ ठोस पहल की जानी चाहिए थीं किन्तु अभी तक ऐसा कुछ हो नहीं सका है। अभी संयुक्त राष्ट्र की छह आधिकारिक भाषाएं हैं- अरबी, चीनी, अंग्रेजी, फ्रेंच, रूसी और स्पेनिश। संयुक्त राष्ट्र संघ में हिन्दी के लिए कुछ प्रयास किए गए हैं जैसे- हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए विदेश मंत्रालय में हिन्दी एवं संस्कृत प्रभाग बनाया गया है। संयुक्त राष्ट्र संघ हिन्दी में नियमित रूप से एक साप्ताहिक कार्यक्रम प्रस्तुत करता है। संयुक्त राष्ट्र संघ ने हिन्दी में न्यूज वेबसाइट चलाई है। हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र संघ की आधिकारिक भाषा बनाने के लिए जो तर्क दिए जाते हैं वे हैं- कि हिन्दी की लिपि सरल और वैज्ञानिक है, इसकी लिपि रोमन, रूसी, और चीनी जैसी लिपियों का अच्छा विकल्प बन सकती है, हिन्दी के कारण दुनिया की कई भाषाओं को मदद मिलेगी आदि-आदि। अब एक लक्ष्य और निर्धारित किया गया है वह है ‘‘पंच प्रण’’ का। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ‘‘पंच प्रण’’ की घोषणा करते हुए कहा है कि अब हमें वर्ष 2047 तक एक वैश्विक महाशक्ति के रूप में खुद को स्थापित करने के लिए ‘पंच प्रण’ का संकल्प लेना है। इसमें हिन्दी को हमारे पारंपरिक ज्ञान, ऐतिहासिक मूल्यों और आधुनिक प्रगति के बीच, एक महान सेतु की भांति देखा गया है। लेकिन आज एक पूरी पीढ़ी अंग्रेजी माध्यम से पढ़ कर तैयार हो चुकी है और उसके बाद की दूसरी पीढ़ी अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में पढ़ रही है। आज के युवा माता-पिता और उनके बच्चे हिन्दी से कट चुके हैं। उनके लिए हिन्दी घर के नौकरों और बाजार-हाट में खरीददारी की भाषा है। उनके लिए नौकरी और सामाजिक सम्मान की भाषा अंग्रेजी है। उन्हें जिस भाषा से लगाव ही नहीं है, वे उसके साहित्य के प्रति लगाव कहां से पैदा करेंगे? वे हिन्दी का साहित्य क्यों खरीदेंगे? और क्यों पढ़ेंगे? यह एक कटु सच्चाई है। यदि हम शुतुरमुर्ग की भांति रेत में अपने सिर को घुसा कर सोच लें कि कोई संकट नहीं है तो यह हमारी सबसे बड़ी भूल होगी।
वर्ष 2024 के उत्तरार्द्ध में एक चर्चित साहित्य उत्सव में बतौर कवयित्री एक ऐसी अभिनेत्री को बुलाए जाने पर बवाल मचा जिसकी साहित्यिक प्रतिभा का तो किसी को पता नहीं था किन्तु उसके विचित्र कपड़ों के माध्यम से देह प्रदर्शन की ख्याति अवश्य है। उस अभिनेत्री ने कौन-सी राह पकड़ी है, यह उसका निजी मामला है। उस पर किसी को आपत्ति न थी और न है। अचम्भा तो इस बात का हुआ कि क्या साहित्य को ख्याति पाने के लिए किसी ऐसे सहारे की आवश्यकता है?
हिन्दी के साहित्य को वैश्वि पटल पर पहुंचाने के लिए क्या उसके अनुवाद का सहारा लेना जरूरी है? यह प्रश्न उठा था जब लेखिका गीतांजलि श्री को उनके हिन्दी उपन्यास ‘रेत समाधि’ के अंग्रेजी अनुवाद ‘टम्ब ऑफ सेण्ड’ के लिए अंतर्राष्ट्रीय बुकर पुरस्कार दिया गया है। उत्तर भी उन्हीं दिनों मिल गया था कि बुकर पुरस्कार में हिन्दी भाषा की कोई श्रेणी नहीं है। दुनिया की तीसरे नंबर की सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा को एक विदेशी पुरस्कार दाता अपनी भाषाई श्रेणी में नहीं रखता है किन्तु उसका पुरस्कार पाने के लिए उसकी मान्य भाषा को हम स्वीकार कर लेते हैं। यह एक गजब का विरोधाभास है। निःसंदेह अनुवाद में कोई बुराई नहीं है। अनुवाद तो दो संस्कृतियों और दो भाषाओं के बीच सेतु का कार्य करता है किन्तु पीड़ा तब होती है जब हम अपनी ही भाषा हिन्दी को ले कर हीन भावना के शिकार हो जाते हैं।
खैर, बात हिन्दी साहित्य की है। कभी-कभी ऐसा लगता है मानो हिन्दी साहित्य जयशंकर प्रसाद, प्रेमचंद, महावीर प्रसाद द्विवेदी, हजारी प्रसाद द्विवेदी अथवा आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी के समय की गरिमा को खो चुका है। यदि इन मनीषियों का उदाहरण न भी लिया जाए तो वह साहित्यिक विमर्श जो चेतना को झकझोरे रखता था और जिसे जगाए रखने का श्रेय राजेन्द्र यादव और नामवर सिंह को दिया जाता था, वह विमर्श भी मानों कहीं सो गया है। अब ऐसा लगता है कि विचार-विमर्श के लिए किसी के पास समय नहीं है। हिन्दी के सारे साहित्यकार बड़ी शीघ्रता में हैं। यह शीघ्रता है रातों-रात प्रसिद्धि पाने की। सोशल मीडिया ने साहित्य को एक अच्छा पटल दिया किन्तु उस पटल पर इतने खरपतवार की भांति साहित्यकार उग आए कि पूरा पटल भ्रम में डाल देता है कि असली रचना किसी है? एक बुद्धिजीवी महिलाओं के व्हाट्सएप्प ग्रुप में एक फार्वडेड पोस्ट मिली जिसमें एक कविता को यह कह कर प्रस्तुत किया गया था कि यह मुंशी प्रेमचंद की सबसे मार्मिक कविता है। मुझसे नहीं रहा गया और मैंने उस पर टिप्पणी कर दी कि प्रेमचंद कथाकार थे, उन्होंने कविताएं नहीं लिखीं। और यह कविता तो उनकी कदापि नहीं है। उस अग्रेषित पोस्ट को ग्रुप में साझा करने वाली विदुषी महिला ने बड़े उपेक्षा भाव से उत्तर दिया कि ‘‘यह कविता प्रेमचंद की हो या न हो लेकिन कविता अच्छी है और मार्मिक है।’’ अर्थात् उस गलत पोस्ट को उन्होंने व्यक्तिगत लेते हुए उसकी अप्रत्यक्ष पैरवी कर डाली। उसके बाद मैंने उस ग्रुप से स्वयं को अलग कर लिया। क्योंकि किसी सोते हुए को जगाना आसान है किन्तु जागे हुए को भला आप कैसे जगाएंगे?
वर्तमान में हिन्दी के नवोदित साहित्यकारों में आमतौर पर जो लक्षण देखने को मिल रहे हैं उनमें सबसे प्रमुख है दूसरों के लिखे साहित्य को पढ़ने की आदत की कमी और लेखकीय साधना या अभ्यास की कमी। मुझे याद है कि सागर के वरिष्ठ साहित्यकार शिवकुमार श्रीवास्तव प्रायः यह बात कहा करते थे कि जब कोई कविता या कहानी लिखो तो उसे लिख कर एक सप्ताह के लिए किसी दराज़ में छोड़ दो। फिर एक सप्ताह बाद उसे पढ़ कर देखो। उसमें मौजूद कमियां स्वयं दिखाई दे जाएंगी।’’ यह बात थी साहित्य में धैर्य रखे जाने की।
एक बार एक पुस्तक की भूमिका लिखने के लिए मुझे पांडुलिपि दी गई। मैंने उसे पढ़ा। मुझे लगा कि यदि उसमें रखी गई कविताओं में तनिक सुधार कर दिया जाए तो वे बहुत बेहतर हो जाएंगी। मैंने उस साहित्यकार को फोन पर यह बात बताई। उसका उत्तर था,‘‘अब इसको तो आप ऐसे ही रहने दीजिए, सुधार का काम अगले में देखा जाएगा। इसको जल्दी से जल्दी छपवाना है। प्रकाशक से सब तय हो गया है।’’ उनके इस उत्तर से मेरे लिए धर्मसंकट खड़ा हो गया। यदि मैं भूमिका लिखने से मना करती हूं तो उस साहित्यकार से मेरे संबंध बिगड़ेंगे और यदि भूमिका लिखती हूं तो साहित्य से मेरे संबंध खराब होंगे। बहुत सोच-विचार के बाद मैंने बीच का रास्ता निकाला और तनिक समीक्षात्मक होते हुए भूमिका लिख दी। वह साहित्यकार प्रसन्न कि मैंने सुधार किए बिना भूमिका लिख दी और मुझे तसल्ली थी कि मैंने समीक्षात्मक ढंग से उसकी खामियों की ओर भी संकेत कर दिया था। यद्यपि ईमानदारी से कहा जाए तो यह उचित नहीं था। भूमिका को भूमिका की भांति ही होना चाहिए किन्तु उस साहित्यकार के हठ ने मुझे यह कदम उठाने को विवश किया। कहने का आशय ये है कि इस समय का नवोदित साहित्यकार अपनी आलोचना अथवा अपने सृजन की कमियों को सुनना ही नहीं चाहता है औ आशा करता है कि हर कोई उसकी रचना को पढ़े। हिन्दी साहित्य को पुनःप्रतिष्ठा उसके साहित्य से ही मिल सकती है बशर्ते ऐसा लिखा जाए जो उसे उसका पाठक बनने को विवश कर दे।        
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(दैनिक, सागर दिनकर में 21.11.2025 को प्रकाशित) 
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शून्यकाल | मानवमूल्यों की पोषक है हमारी भारतीय संस्कृति | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नयादौर

शून्यकाल | मानवमूल्यों की पोषक है हमारी भारतीय संस्कृति | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नयादौर
शून्यकाल
मानवमूल्यों की पोषक है हमारी भारतीय संस्कृति
- डाॅ (सुश्री) शरद सिंह 
                                                                                   संस्कृति व्यक्ति, समाज, राष्ट्र और विश्व के सतत् विकास का महत्त्व पूर्ण आधार है। मानव मूल्य संस्कृति से ही उत्पन्न होते हैं और संस्कृति की रक्षा करते हैं। सत्य, शिव और सुन्दर के शाश्वत मूल्यों से परिपूर्ण भारतीय संस्कृति में पाषाण जैसी जड़ वस्तु भी देवत्व प्राप्त कर सर्वशक्तिमान हो सकती है और नदियां एवं पर्वत माता, पिता, बहन, आदि पारिवारिक संबंधी बन जाते हैं। ऐसी भारतीय संस्कृति की नाभि में मानवमूल्य ठीक उसी तरह अवस्थित है जैसे भगवान विष्णु की नाभि में कमल पुष्प और उस कमल पुष्प पर जिस तरह ब्रह्मा विद्यमान हैं, उसी तरह मानवमूल्य पर ‘सर्वे भवन्ति सुखिनः’ की लोक कल्याणकारी भावना विराजमान है। वस्तुतः मूल भारतीय संस्कृति में धर्म, जाति, विचार आदि के भेद को ‘भेद’ या अलगाव नहीं वरन् विविधता माना गया है। भारतीय संस्कृति ‘‘अप्प देवो भव’’ की संस्कृति है।

      संस्कृति, राष्ट्र और समाज ये तीन ईकाइयां हैं, जो मानव संस्कृति को आकार देती हैं। सुसंस्कृति से सुराष्ट्र आकार लेता है और अपसंस्कृति से अपराष्ट्र। शब्द अनसुना सा लग सकता है-‘‘अपराष्ट्र’‘। किन्तु यदि राष्ट्रों की राजनीतिक स्तर पर अपराधों में लिप्तता राजनीतिक कुसंस्कारों को जन्म देती है और यही कुसंस्कार राष्ट्र में अतंकवाद की गतिविधियों को प्रश्रय देते हैं। विश्व में कई देश ऐसे हैं जो राजनीतिक दृष्टि से अपराष्ट्र की श्रेणी में गिने जा सकते हैं। वहीं भारत की संस्कृति का स्वरूप इस प्रकार का है जिसमें अपसंस्कारों की कोई जगह नहीं है। भारतीय संस्कृति ‘‘अप्प देवो भव’’ की संस्कृति है। यदि प्रत्येक मनुष्य में देवत्व के गुण जाग्रत हो जाएं तो सांस्कृतिक विकार जागने अथवा किसी विषम पल में जाग भी जाए तो उसके स्थाई रूप से बने रहने का प्रश्न ही नहीं है। संस्कृत में प्रणीत हमारा संपूर्ण वाङ्मय वेदों, उपनिषदों, रामायण, महाभारत, भागवत, भगवद्गीता आदि के रूप में विद्यमान है, जिसमें हमारे जीवन को सार्थक बनाने के सभी उपक्रमों का विस्तृत विवरण विद्यमान है। इन प्राचीन ग्रंथों में स्पष्ट रूप से व्याख्या की गई है कि संस्कृति एक शाब्दिक ईकाई नहीं वरन् जीवन की समग्रता की द्योतक है। संस्कृति मात्र चेतन तत्वों के लिए ही नहीं अपितु जड़तत्वों के लिए भी प्रतिबद्धता का आग्रह करती है। अब प्रश्न उठता है कि क्या जड़ तत्वों के लिए भी कोई सांस्कृतिक आह्वान होता है जबकि जड़ तो जड़ है, निचेष्ट, निर्जीव। फिर निर्जीव के लिए संसकृति का कैसा स्वरूप, कैसा रूप? ठीक इसी बिन्दु पर भारतीय संस्कृति की महत्ता स्वयंसिद्ध होने लगती है।
      भारतीय संस्कृति समस्त जड़ ओर समस्त चेतन जगत से तादात्म्य स्थापित करने का तीव्र आग्रह करती है। यही आग्रह आज हम पर्यावरण संतुलन के आग्रह के रूप में देखते हैं, सुनते हैं और उसके लिए चिन्तन-मनन करते हैं। जब पा्रणियों का शरीर पंचतत्वों से बना हुआ है और ये पंचतत्व वही हैं जिनसे संसार के जड़ तत्वों की भी पृथक-पृथक रचना हुई है, तो जड़ और चेतन के पारस्परिक संबंध अलग कहां हैं? ये दोनों तो घनिष्ठता से परस्पर जुड़े हुए हैं। 
        संस्कृति की ध्वजा को फहराते रहने का दायित्व मानव का है क्योंकि वही धरती पर उपस्थित शेष प्राणियों में सबसे अधिक विचारवान और निर्मितिपूर्ण है। निर्माणकौशल के सतत् विकास ने मानव को अन्य प्राणियों से श्रेष्ठतर बना दिया है। मनुष्य के निर्माणकौशल ने ही उसे सामाजिक प्राणी बनाया और मिलजुल कर रहने के लाभ को जानना सिखाया। मानव के निर्माणकौशल के विकास ने आज उसे इलेक्ट्राॅनिकयुग तक पहुंचा दिया है और यह विकासयात्रा अभी जारी है। किन्तु इसी विकास ने मानवजीवन में ‘‘मूल्य’’ शब्द के स्वरूप को अर्थतंत्र का अनुगामी बना दिया है। यूं तो ‘‘मूल्य’’ एक मानक है श्रेष्ठता के आकलन का। जिसके लिए अधिक श्रम, अधिक मुद्रा खर्च करनी पड़े, जिसके लिए मानव मन में अधिक ललक हो किन्तु उपलब्धता सीमित हो, वह मूल्यवान है। इसके विपरीत जो सुगमता से, कम मुद्राओं में मिल जाए, जिसकी उपलब्धता भी प्रचुर हो और जिसके प्रति मानव मन में अधिक ललक न हो वह सस्ता कहलाता है। यही परिभाषा बनाई है अर्थशास्त्रियों ने। किन्तु जब बात संसकृति की हो अर्थात् जीवनशैली की हो तो ‘‘मूल्य’’ शब्द का अर्थ असीमित और अपरिमित हो जाता है। संस्कृति बाज़ार की वस्तु नहीं है, उसे खरीदा या बेचा नहीं जा सकता है। संस्कृति तो आचरण है जिसे अपनाया अथवा छोड़ा जा सकता है। जो संस्कृति को अपनाता है वह संस्कारवान होता है और जो संस्कृति का त्याग कर देता है, त्याग से यहां आशय सांस्कृति मूल्यों के त्याग से है। तो, जो संस्कृति को त्याग देता है वह असंस्कारी हो जाता है। 
                 भारतीय संस्कृति विश्व की प्राचीनतम संस्कृतियों में से एक है। मध्य प्रदेश के भीमबेटका में पाये गये शैलचित्र, नर्मदा घाटी में की गई खुदाई तथा कुछ अन्य नृवंशीय एवं पुरातत्त्वीय प्रमाणों से यह सिद्ध हो चुका है कि भारत भूमि आदि मानव की प्राचीनतम कर्मभूमि रही है। भारतीय संस्कृति की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता यह है कि हज़ारों वर्षों के बाद भी यह संस्कृति आज भी अपने मूल स्वरूप में जीवित है, जबकि मिस्र, असीरिया, यूनान और रोम की संस्कृतियों अपने मूल स्वरूप को लगभग विस्मृत कर चुकी हैं। भारत में नदियों, वट, पीपल जैसे वृक्षों, सूर्य तथा अन्य प्राकृतिक देवी- देवताओं की पूजा अर्चना का क्रम शताब्दियों से चला आ रहा है। देवताओं की मान्यता, हवन और पूजा-पाठ की पद्धतियों की निरन्तरता भी आज तक अप्रभावित रही हैं। वेदों और वैदिक धर्म में करोड़ों भारतीयों की आस्था और विश्वास आज भी उतना ही है, जितना हज़ारों वर्ष पूर्व था। गीता और उपनिषदों के सन्देश हज़ारों साल से हमारी प्रेरणा और कर्म का आधार रहे हैं। समयानुसार परिवर्तनों के बाद भी भारतीय संस्कृति के आधारभूत तत्त्वों, जीवन मूल्यों और वचन पद्धति में निरन्तरता रही है।
भारतीय संस्कृति वह मार्ग सुझाती है कि वे सांस्कृतिक मूल्य कहां से सीख सकते हैं जो मनावजीवन को मूल्यवान बना दे -
परोपकाराय फलन्ति वृक्षः
परोपकाराय वहन्ति नद्यः
परोपकाराय दुहन्ति गावः
परोपकारार्थमिदम् शरीरम्।

अर्थात् - वृक्ष परोपकार के लिए फलते हैं, नदियां परोपकार के लिए बहती हैं, गाय परोकार के लिए दूध देती हैं अतः अपने शरीर अर्थात् अपने जीवन को भी परोपकार में लगा देना चाहिए।

भारतीय संस्कृति की यह सबसे बड़ी विशेषता है कि वह चौ्रासी लाख योनियों में मनुष्य योनि को सबसे श्रेष्ठ मानती है किन्तु साथ ही अन्य योनियों की महत्ता को भी स्वीकार करती है। जिसका आशय है कि प्रकृति के प्रत्येक तत्व से कुछ न कुछ सीखा जा सकता है। और यह तभी संभव है जब प्रकृति के प्रति मनुष्य की आत्मीयता ठीक उसी प्रकार हो जैसे अपने माता-पिता, भाई, बहन, गुरु और सखा आदि प्रियजन से होती है। यह आत्मीयता भारतीय संस्कृति में जिस तरह रची-बसी है कि उसकी झलक गुरुगंभीर श्लोकों के साथ ही लोकव्यवहार में देखा जा सकता है। लोक जीवन में आज भी जल और पर्यावरण के प्रति सकारात्मक चेतना पाई जाती है। एक किसान धूल या आटे को हवा में उड़ा कर हवा की दिशा का पता लगा लेता है। वह यह भी जान लेता है कि यदि चिड़िया धूल में नहा रही है तो इसका मतलब है कि जल्दी ही पानी बरसेगा। लोकगीत, लोक कथाएं एवं लोक संस्कार प्रकृतिक के सभी तत्वों के महत्व की सुन्दर व्याख्या करते हैं। लोक जीवन की धारणा में पहाड़ मित्र है तो नदी सहेली है, धरती मां है तो अन्न देवता है। प्रकृति के वे सारे तत्व जिनसे मिल कर यह पृथ्वी और पृथ्वी पर पाए जाने वाले सभी जड़-चेतन मनुष्य के घनिष्ठ हैं, पूज्य हैं ताकि मनुष्य का उनसे तादात्म्य बना रहे और मनुष्य इन सभी तत्वों की रक्षा के लिए सजग रहे। भारतीय संस्कृति लोक व्यवहार की संस्कृति है जो हमने प्रकृति से सीखी है, इस बात को हमेशा हमें याद रखना चाहिए।  
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Thursday, November 20, 2025

बतकाव बिन्ना की | इत्तो ने भगाओ के ऊपरई पौंच जाओ | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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बतकाव बिन्ना की          
इत्तो ने भगाओ के ऊपरई पौंच जाओ                             
- डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह

“काय भौजी का हो गओ? आपको मूड ठीक सो नईं दिखा रओ।” मैंने भौजी से पूछी।
“मूड कां से ठीक हुइए मरत-मरत बचे।’’ भौजी ने कई। जेई के संगे लगो के उनके सरीर में मनो फुरूरी सी दौर गई।
“काए का हो गओ? कऊं रपट परीं का?” मैंने भौजी से पूंछी।
“रपटें हमाएं दुस्मन!’’ भौजी भुनभुनात भई बोलीं।
‘‘हो का गओ?’’ मैंने फेर के पूछी।
‘‘अरे का बताएं, एक ठठरी के बंधे से पाला पर गओ। नास मिटे ऊकी।’’ भौजी बोलीं। बे बड़े गुस्से में दिखानीं।
‘‘को आ मिल गओ?’’ मैंने पूछा।
‘‘अरे का बताएं हम बजारे से लौट रए हते सो पांछू से एक मोड़ा सर्र दइयां निकरो औ बाजू से कढ़ गओ। इत्ते नजीक से कढ़ां के हमाए जे दांए बाजू से टकरात भओ गओ।’’ भौजी अपनो बाजू दिखात भईं बोलीं।
‘‘अरे का ज्यादा लग गई?’’ मैंने पूछी। ऊपरे से तो कछू नई दिखा रओ हतो, मनो मुंदी चोट रई हुइए।
‘‘ज्यादा तो नई लगी मनो झटका खा के जी सो घबड़ा गओ।’’ भौजी बोलीं।
‘‘सई कई, झटका सो लगत आए।’’ मैंने कई।
‘‘औ का हमने सोई चिल्ला के ऊको बोलों के इत्तो ने भगो के ऊपरई पौंच जाओ। बाकी बो कां सुनबे वालो हतो? बा तो ये जा, बो जा। एक पल में इते तो दूसरई पल में उते। को जाने काए की जल्दी रैत आए इन ओरन खों। अरे, तनक देरी में पौंच जाहो सो कोन ऊं पहाड़ ने टूट परहे।’’ भौजी बोलीं।
‘‘सई में भौजी! जेई बात तो मोए समझ नईं परत के ऐसई कोन सी जल्दी रैत आए? मोड़ा हरों को तो एक बाईक भर मिल जाए, बस, फेर बे तो आसमान में उड़न लगत आएं। अभई कछू दिनां पैले मोरे संगे सोई ऐसई भओ रओ। मैं सिविल लेन से लौट रई हती। अपनी स्कूटी पे हती। इत्ते में मोरे पांछू से एक मोड़ा अपनी बाईक को हार्न टिटियांत सो कढ़ गओ। ऊकी स्पीड कओ 120 की रई होय। काय से के ऊकी बाईक सोई स्पोर्ट बाईक हती। बा मोरे बाजू से कढ़ो औ रामधईं ऐसो लगो के कोनऊं झोंका सो चलो होए। न जाने कोन खों दिखाओ चा ऊत आएं अपनी हिरोगिरी? ऐसई में तो बे खुद क ऊं जा के भिड़त आएं औ दूसरों की जान के लाने सोई मुसीबत बनत आएं।’’ मैंने कई।
‘‘औ का! उने कोई रोकट-टोंकत बी नइयां। जबके अबे चार दिनां पैले तुमाए भैयाजी सौदा लाबे के लाने गए हते औ उन्ने जो अपनी बाईक ठाढ़ी करी सो जेई गलती भई के ऊको पछिलो चका रोड पे रओ। बस, उत्तई में बे पुलिस वारे आए औ उन्ने गाड़ी में तारो डार दओ।’’ भौजी बतान लगीं।
‘‘फेर?’’ मैंने पूछी।
‘‘फेर का? तुमाए भैयाजी ने फाईन भरो औ अपनी गाड़ी से तारो खुलवाओ। मनो जे जो गाड़ी भगाउत फिरत आएं उनके लाने कछू नियम-कायदो नइयां का?’’ भौजी बोलीं।
‘‘सई में भौजी। अबे एक भौतई बड़ी दुर्घटना भई। का रओ के चार-पांच मोड़ा ग्वालियर से जनमदिन की पार्टी मनाबे खों झांसी पौंचे। देर तक उन्ने पार्टी करी औ फेर बे झांसी से ग्वालियर के लाने लौट परे। अब आजकाल के मोड़ा घर से इत्ती दूर जा के पार्टी करहें सो कछू पी-पुवा लओ हुइए। बाकी अखबार में सार्ह वारे में कछू ने रओ। मनो ापई सोचों के उनकी गार पूरी फुल स्पीड पे रेती की टिराली के नैंचे घुस गई। ऊके झटसे टिराली पलट गई औ पूरी रेत उनईं ओरन के ऊपरे गिरी। बे ओरें उतई दब के मर गए। अब कैबे खों तो उनके घरवारे कैत रए के जा सब ऊ टिराली वारे को दोष रओ, के बा अवैध रेत ढोउत फिर रओ हतो। अब आपई सोचो के जो बा अवैध रेत ढो गी रओ हतो तो बे ओरें से पांछू से घुसे, बा बी 120 की रफ्तार से। अब बोलो के कोन खों दोस दओ जाए?’’ मैंने भौजी से पूछी।
‘‘दोस तो घुसबेई वारो को कहाओ। बाकी नुकसान तो उनके घरवारों को भओ। जो कोनऊं खों ज्वान-जहान मोड़ा चलो जाए तो ईसे बढ़ के उनके लाने औ का दुख हो सकत आए? जे ऐसे मोड़ा हरें हैं बे अपने बाप-मताई के बारे में बी नईं सोचत आएं। उनके बाप-मताई की उनसे कित्ती उमींदें रैत आएं। कां तो बे सोचत आएं के मोउ़ा बड़ो हो हमाओ सहारा बनहे औ जो मोड़ा बड़ो भओ औ हात में कोनऊं बी गाड़ी आई, सो फेर ऊको रेस करबे से कोऊं ने रोक सकत। फेर चाए सूनी रोड होए, चाए भरी-भराई। ने उने अपनी फिकर, ने दूसरों की फिकर।’’ भौजी बोलीं।
‘‘आप बड़े होबे वारों की कै रईं? आजकाल सो लोहरे-लोहरे लड़का-बच्चा गाड़ियां दौड़ात रैत आएं। अभई दो दिनां पैले की बात आए के मैं राधा तिगड्डा के इते हती। उते बड़ो खतरनाक टिरेफिक रैत आए। मैंने ब्रेक लगाई, काए से सामने से एक चार पहिया चली आ रई हती। इत्ते में एक स्कूटी मोरी स्कूटी औ बा चार पहिया के बी से कढ़ गई। ऊपे चार मोड़िया सवार हतीं। चारों लोहरी हतीं। अबे तो उनको लाईसेंस बी ने बनो हुइए। बा चार पहिया वारो जो तुरतईं ब्रेक ने मारतो तो ऊको टकराबो तै हतो। गलती ऊकी ने होबे पर बी ऊकई कैलाती औ कओ जातो के ऊने मोड़ियन पे गाड़ी चढ़ा दई। जा कोनऊं न देखतो के बे मोड़ियां कम उम्मर की हतीं औ एकऊं ने हेलमेट लौं ने पैहनो तो। को जाने उनके बाप-मताई उने कैसे गाड़ी चलाबे देत आएं?’’ मैंने भौजी से कई।
‘‘जेई तो बात आए बिन्ना के ने तो बाप-मताई को फिकर आए औ ने खुद मोड़ा-मोड़ियन खों औ ने पुलिस वारन खों। अब तो रोडन पे औ चैराहा पे कैमरे सोई लगे। सबई गाड़ियन की खच्च दीनां फोटू खिंच जात आए। बोई फोटू से गाड़ी के नंबर जांच के उनके बाप-मताई की खबर लई जानी चाइए के बे अपने लोहरे बच्चा हरों खों गाड़ी कैसे चलाउन देत आएं?’’ भौजी बोलीं।
‘‘सांची कै रई आप। ऐसोई होन चाइए। जब तक लौं कानून ने कसो जैहे तब तक लौं जे मोड़ा-मोड़ी ऐसई गाडी भगात रैहें।’’ मैंने कई।
‘‘औ का हो रओ? तुम ओरे का बतकाव कर रईं?’’ भैयाजी घर में घुसत भए बोले। बे कऊं कोनऊं से मिलबे के लाने गए रए।
‘‘कछू नईं हम ओरें जे गाड़ियां दौड़ाबे वारे मोड़ा-मोड़ियन की कै रए हते।’’ मैंने कई।
‘‘सुनो! आज एक मोड़ा ने हमाए बाजू में धक्का मार दओ। बा हमाए बाजू से ऐसो फर्राटे से कढ़ो के हमाए बाजू में धक्का लग गओ।’’ भौजीे ने अपनो बाजू दिखात भई भैयाजी खों बताई।
‘‘को आ हतो? तुमने उतई ऊको थपड़िया नईं दओ? सकल सुदर जाती।’’ भैयाजी बोले।
‘‘थपड़ियाबे की तो तब हो पाती जब बो ठैरतो। बा तो पलक झपकत में फुर्र हो गओ, ने तो हम ऊकी खपड़िया तोड़ देते।’’ भौजी भुनभुनात भई बोलीं।
‘‘जेई तो सल्ल आए।’’ भैयाजी बोले।
‘‘चलो छोड़ो, आप बताओ आपके भनेज मिले के नईं?’’ भौजी भैयाजी से पूछन लगीं।
बाकी बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़िया हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की। मनो सोचियो जरूर के रोडन पे चलबो सेफ कैसे हो सकत आए?
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Tuesday, November 18, 2025

पुस्तक समीक्षा | ये मात्र कहानियां नहीं वरन जीवन की डायरी के पन्ने हैं | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

पुस्तक समीक्षा | ये मात्र कहानियां नहीं वरन जीवन की डायरी के पन्ने हैं | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण
पुस्तक समीक्षा 
ये मात्र कहानियां नहीं वरन जीवन की डायरी के पन्ने हैं
- समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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पुस्तक      - नानी की डायरी 
लेखिक      - उर्मिला शिरीष
प्रकाशक     - सस्ता साहित्य मण्डल प्रकाशन, एन-77,पहली मंज़िल, कनाॅट सर्कस, नई दिल्ली-110001
मूल्य       - 550/-
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आधुनिक हिन्दी कथा जगत के परिदृश्य में उर्मिला शिरीष एक प्रतिष्ठित एवं वरिष्ठ नाम है। उनकी कहानियां मन और जीवन के एक-एक शब्द करीने से सामने रखती हैं जिससे उन कहानियों का पाठक कथानक में स्वयं को ढूंढ निकालता है। यही अच्छी कहानियों की खूबी होती है कि जब पाठक को कहानी अपने जीवनानुभव की कहानी प्रतीत हो। ‘‘नानी की डायरी’’ उर्मिला शिरीष का अद्यतन कहानी संग्रह है जिसे नई दिल्ली के सस्ता साहित्य मण्डल ने प्रकाशित किया है। इस कहानी संग्रह में कुल 13 कहानियां हैं। ‘‘नानी की डायरी’’ संग्रह की सबसे अंतिम कहानी है लेकिन इस कहानी की समसामायिकता एवं सामाजिक सरोकार इस पर सबसे पहले चर्चा करने का आग्रह करते हैं।
‘‘नानी की डायरी’’ एक ऐसी स्त्री की डायरी है जिसका बचपन गांव में व्यतीत हुआ। विवाह के उपरांत ग्रामीण परिवेश में ही चार अक्षर लिखना-पढ़ना सीखा ताकि परदेस में रहने वाले अपने पति की चिट्ठियां पढ़ सके और उसे पत्र लिख सके। उदारमना ससुर ने ही उसे इसके लिए प्रेरित किया था। समय के साथ परिस्थितियां बदलीं। नानी ने डायरी लिखनी आरम्भ की। रोज नहीं, कभी-कभी। उस डायरी में उसने निजी जीवन के अलावा किसान आंदोलन के प्रति अपने दृष्टिकोण को भी लिखा। उस पीड़ा को भी लिखा जो घर के बंटवारे के रूप में उपजी, साथ ही उस अवसाद को भी जो गांव की ज़मीन को बेचने के लिए आए बेटे, पोते आदि के कारण घेरने लगा था। वस्तुतः किसी भी व्यक्ति का जीवन जितना शांत जल की भांति दिखाई देता है, वस्तुतः सतह के नीचे उतनी ही तीव्र हलचल मची रहती है। भीतर ही भीतर भावनाओं की लहरें थपेड़े मारती रहती हैं। ‘‘नानी की डायरी’’ स्त्रीविमर्श के प्रश्न उठाती हुई वृद्ध विमर्श तक जा पहुंचती है तथा पाठक के मन से सीधा संवाद करती है। डायरी शिल्प में लिखी गई अत्यंत प्रभावी कहानी है यह। 
अब बात संग्रह की पहली कहानी की जिसका नाम है ‘‘सत्तर साल का बूढ़ा पेड़’’। विकास के चक्र से यदि सबसे अधिक गरदनें किसी की कटीं हैं तो वे हैं वृक्ष। चाहे शहरों और गांवों का विकास हो या सड़कों की लेन की संख्या बढ़ाई जाए, सबसे पहले पुराने से पुराने वृक्षों पर ही आरियां चलती हैं। ऐसा ही एक सत्तर साल पुराना पेड़ जिसे कहानी की नायिका के पूर्वज ने लगाया था अपनी जन्मभूमि पर अकेला पड़ गया। उसे लगाने वाला परलोक सिधार गया तथा उसके बच्चों ने रोजी-रोटी के सिलसिले में शहरों की ओर रुख किया। उसी परिवार की एक स्त्री को अपनी पुरानी भूमि एवं पुराने पेड़ से लगाव हुआ और वह उसे तथा उस वनभूमि को बचाने चल पड़ी। गांव के लोगों के लिए यह पागलपन भरा कदम था। कुछ-कुछ मायावी भी। जिसे बात को समझना कठिन हो वह मायावी ही लगती है। उस पुराने वृक्ष के प्रति उस स्त्री का लगाव गांव के लोगों के लिए अबूझ था और वहां बस जाने की उसकी हठ मायावी। यह कहानी पर्यावरण संरक्षण की पैरवी करती हुई प्रकृति और मनुष्य के पारस्परिक संबंधों की प्रगाढ़ता का संदेश देती है। उर्मिला जी के कथा लेखन की यह विशेषता है कि वे कहीं भी उपदेशात्मक नहीं होती हैं, वरन इस ढंग से अपनी बात कहती हैं कि पढ़ने वाला स्वयं उससे तादात्म्य बिठा ले।
कहानी ‘‘विलोम’’  एक स्त्री के स्वाभिमान एवं अपनी अस्मिता के प्रति उसकी सजगता को सामने रखती है तो वहीं ‘‘तिकड़म’’ कहानी उस कटु सत्य से साक्षात्कार कराती है जिससे कभी न कभी सभी को किसी न किसी रूप में जूझना ही पड़ता है। पिता की मृत्यु वह आपात स्थिति होती है जो सिर से सुरक्षा का साया तो छीनती ही है, अचानक अनेक मुसीबतों के सामने धकेल देती है। 
‘‘‘‘गुनाह-ए-इश्क़’’ वह मसला है जो बालिग लड़के-लड़कियों को भी प्रेम में पड़ कर विवाह करने की अनुमति नहीं देता है। ऐसे मामलों में सबसे पहले परिजन द्वारा यही घोषण की जाती है कि आज से मेरा बेटा/बेटी मेरे लिए मर गया/गई है। कई बार तो यह भी देखने में आता है कि घर से भाग कर प्रेमविवाह करने वाली बेटी को मृत घोषित कर के धूम-धाम से उसका श्राद्ध भी कर दिया गया। ऐसी ही एक विडबना भरे संघर्ष का विवरण है ‘‘गुनह-ए-इश्क़’’ में। 
‘‘सुयोग्य पुत्रों के नाम’’ और ‘‘जन्मभूमि’’ कहानियां संवेदनाओं को झंकृत कर देने वाली कहानियां हैं। पुश्तैनी मकान, गांव और गांव के परिवेश का मोह हर व्यक्ति को होता है। दरअसल यह सब मात्र भौतिक वस्तुएं नहीं होतीं वरन जीवन की जड़ें होती हैं, भावनाओं की थाती होती हैं और इनमें होती है सरोकारों की एक दीर्घ उपस्थिति। ये दोनों कहानियां पढ़ कर महसूस की जा सकती हैं। 
‘‘बहस के बाहर’’, ‘‘न्याय देवता’’, ‘‘परिंदों का लौटना’’, ‘‘बाबू की पूूजा’’ ब्रेक-अप’’ और ‘‘लालटेन मार्च’’ जीवन के रंगमंच के विविध किरदारों, उनकी चेष्टाओ, आकांक्षाओं, आशाओं, टूटन, बिखराव एवं उम्मींद की वे तस्वीर प्रस्तुत करती हैं जिनमें परंपरा, संस्कार एवं आधुनिकता के बीच के टकराव साफ देखे जा सकते हैं। अतीत एवं वर्तमान जीवन के सारोकारों के अंतर को साफ पढ़ा जा सकता है। ये कहानियां यह भी याद दिलाती हैं कि संबंध विश्वास पर टिके होते हैं। प्रेम में फिजिकल रिलेशन हो या न हों किन्तु यह सबसे पहले मान लिया जाता है कि फिजिकल रिलेशन तो होंगे ही। ‘‘ब्रेक अप’’ कहानी का एक अंश देखिए-
‘‘उसके भी फिजिकल रिलेशन रहे हैं।’’
‘‘वह तो पापा के सामने कसम खाकर कह रही थी कि उसका किसी के साथ कोई प्रेम संबंध नहीं रहा। न कोई फ्रेंड है। मैं वर्जिन हूँ। जब पापा ने उसको बताया कि तुम्हारी दोस्त तुम्हारे बारे में तरह-तरह की बातें कहती है तो वह रो-रोकर कसमें खाने लगी थी।’’
‘‘तब उसने पापा से झूठ बोला था। पापा उसको बेटी की तरह मानते हैं। उसके पापा के साथ पापा की दोस्ती रही है, इसलिए झूठ बोल गई...। पापा ने उसे बचपन से देखा था...।’’
प्रेम संबंधों में सच-झूठ की तह तक उतरे बिना ही हर कोई दरोगागिरी करने लगता है। यह कहानी संबंधों की कोमलता और संकटों को बयान करती है। वैसे विवरण की बीरीकियों को उर्मिला शिरीष इस ढंग से अपनी कहानियों में पिरोती हैं कि कथानक में सौ प्रतिशत दृश्यात्मकता उतर आती है। जैसे उदाहरण के लिए कहानी ‘‘न्याय देवता’’ के इस अंश को लें- ‘‘नंदू भइया का जन्म गांव में हुआ था आजादी के दस साल बाद यानी उन्नीस सी सत्तावन में। आजाद भारत में जन्मे नंदू भइया रंग-रूप, कद-काठी में आम भारतीयों की तरह थे। गेहुँआ रंग, काली आँखें, घुँघराले बाल, पर दुबले-पतले। नंदू भइया ने गाँव में बिताए बचपन को जी भरकर जिया था। कुश्ती लड़ना, तालाब में तैरना। कुएँ से पानी भरना, कसरत करना, बैलगाड़ी चलाना, लकड़ियाँ काटना और इन सबके बीच में पढ़ाई करना। पढ़ाई के पीछे नंदू भइया की प्रेरणा या कहना चाहिए आकर्षण था गाँव में आने वाले अफसरों की गाड़ियों। गाँव के मुखिया या पंचायत अध्यक्ष द्वारा उन अफसरों की जाने वाली आवभगत। उनका रुतबा। नंदू भइया के दिल-दिमाग में ये बात घर कर गई थी कि ये तमाम चीजें रुतबा, मान-सम्मान, अपनी पढ़ाई, अपनी बुद्धि और अपनी मेहनत से पाई जा सकती हैं। इसके लिए न तो पूँजी की जरूरत है न किसी और की सहायता की। बस नंदू भइया के सपनों ने उड़ान भरना शुरू कर दी। वे नियमित रूप से स्कूल जाते। स्कूल क्या एक हॉल भर था जिसमें बच्चे अपने घर से लाई गई चटाई पर बैठते। एक टूटा-फूटा बोर्ड टॅगा रहता था। जिसका इस्तेमाल पढ़ाई-लिखाई के लिए शायद ही कभी होता हो। हाँ, उसके कोनों पर मास्टर जी का गमछा, छोटा-सा थैला और चावियों का गुच्छा जरूर टॅगा होता था। स्लेट-बत्ती, कॉपी और पेंसिल से ही सारी पढ़ाई-लिखाई होती थी। खड़ीपाई, पहाड़े और वर्णमाला मास्टर जी मौखिक रटवाते थे। उनके हाथ में थमी छड़ी को देखकर आधे बच्चे तो डर के मारे हकलाने लगते थे, बिना मास्टर जी के कुछ कहे अपना हाथ आगे बढ़ा देते जिस पर छड़ी की मार गहरे निशान छोड़ देती थी। किताबें शहर से आ जाती थीं। स्कूल का भवन बहुकर्मी भवन था। इसी में पढ़ाई के लिए एक हॉल बना था। जैसे ही गाँव में किसी बड़े परिवार में शादी होती।’’ 
इतना विवरण पढ़ने के बाद कोई भी बता सकता है कि नंदू भैया कौन है? हा घर, हर परिवार में एक नंदू भैया अवश्य होते हैं, बस, देखने की बात यह होती है कि परिजन अथवा लोकजन उनकी खूबियों को पहचान पाते अथवा उन्हें जान पाते हैं या नहीं। 

उर्मिला शिरीष की कथा शैली तो प्रभावी है ही, उनकी भाषा भी सरल, सुबोध एवं आमजन की होती है। साहित्य के नाम पर अनावश्यक अलंकारिकता का बोझ वे अपनी कहानियों पर नहीं डालती हैं जिससे उनकी कहानियां पाठक के करीब बैठ कर उनसे बतियाती हैं। ‘‘नानी की डायरी’’ कहानी संग्रह की भी सभी कहानियां मात्र कहानियां नहीं वरन जीवन के डायरी के पन्ने हैं जिन्हें पढ़ कर जीवन के विविध पक्षों को पढ़ा जा सकता है। इन कहानियों की रोचकता इन्हें बार-बार पढ़े जाने के लिए उकसाती है। इस संग्रह की प्रकाशकीय खूबी यह भी है कि इसे डायरी के आकार में ही प्रकाशित किया गया है जिससे यह देखते ही कौतूहल जगाती है। निःसंदेह यह एक उम्दा कहानी संग्रह है।      
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Saturday, November 15, 2025

टॉपिक एक्सपर्ट | जे मिलावट वारे सो भगवान खों तक नईं छोड़ रए आए | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | पत्रिका | बुंदेली कॉलम


टॉपिक एक्सपर्ट | जे मिलावट वारे सो भगवान खों तक नईं छोड़ रए आए | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | पत्रिका | बुंदेली कॉलम
टाॅपिक एक्सपर्ट
जे मिलावट वारे सो भगवान खों तक नईं छोड़ रए आए 
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
जब से बा खबर पता परी तभई से जी में खटका सो लगो रैत आए के कऊं कोनऊं मिलावटी किराना ने पकरा देवें। काए से के आजकाल मिलावट करे वारे भगवान से नईं डरा रए औ उने बी चूना  लगाए दे रए। आप ओरन ने सोई बा खबर पढ़ी हुइए के तिरुमला तिरुपति देवस्थानम में जोन प्रसाद बनत्तो ऊके लाने जोन कंपनी मंदिर खों  घी सप्लाई करत्ती ऊने जानवरन की चर्बी वारो घी सप्लाई करी। वा बी एकाद दार नोईं, पूरी पांच-छै साल लौं। मने 2019 से 2024 लौं। जोन की कुल्ल कीमत ₹250 करोड़ रई। अखीर, 68 लाख किलो घी कछू चीज होत आए। औ बा पापी हरों ने कंपनी को नांव 'वैष्णवी डेयरी' रखो रओ। मने देवी जू को धरो औ पांछू से मिलावट को चूना लगा रए हते, वा बी नॉनवेज वारो। जांच में पाओ गओ के बा घी में  मछली को तेल, बीफ टैलो औ लार्ड मिलाओ जा रओ हतो। रामधई, ठठरी के बंधों को तनकऊ लाज ने आई। जा ने सोचो उन ओरन ने के मंदिर में चढ़ाओ गओ परसाद भक्तन में बंटत आए। अब उमें कई भक्त तो ऐसे रए हुइएं के जो प्याज-लैसुन लौं ने खात हुइएं, उनखों चर्बी वारो घी ख्वा दओ। सो, जा खबर पढ़े के बाद से मन में संका सी बैठ गई कहानी।
      जे खबर ई लाने बी याद राखने के मिलावट खाली त्योहारन के टेम पे भर नईं होत आए, मिलावट करबे वारे कभऊं बी, कऊं पे बी मिलावट कर सकत आएं। सो, अपन खों सोईं तनक चौकन्ने रैने। जो लगे के सामान में मिलावट करी गई आए, सो बा ने खरीदो। संगे शिकायत सोई करो। अपनी सेहत को खयाल अपन खों खुद राखो चाइए। सई कई न!
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Thank you Patrika 🙏
Thank you Dear Reshu Jain 🙏
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Friday, November 14, 2025

शून्यकाल | बाल दिवस विशेष : कैसा भविष्य दे रहे हैं हम बच्चों को? | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नयादौर

शून्यकाल | बाल दिवस विशेष : कैसा भविष्य दे रहे हैं हम बच्चों को?  | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नयादौर
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शून्यकाल
बाल दिवस विशेष : कैसा भविष्य दे रहे हैं हम बच्चों को ?             
- डाॅ (सुश्री) शरद सिंह                                                                                    
           हर साल बालदिवस का उत्सव मनाना आसान है लेकिन अपने गिरेबान में झांकना कठिन हैं जहां हम स्वयं को कटघरे में खड़ा पाते हैं। यदि हम अपने बच्चों को अच्छा स्वास्थ्य नहीं दे सकते, अच्छी शिक्षा नहीं दे सकते, अच्छे संस्कार नहीं दे सकते, समुचित सुरक्षा नहीं दे सकते हैं, तो क्या हम दावा कर सकते हैं कि हम अपने बच्चों को अच्छा भविष्य दे रहे हैं? गरीबी, बेरोजगारी, मंहगाई, भ्रष्टाचार, प्रदूषण और अपराध के दलदल का उपहार देते हुए बच्चों को कैसे कहें ‘हैप्पी बालदिवस’? हमारे ये उपहार बच्चों को न तो अच्छा वर्तमान दे सकते हैं और न अच्छा भविष्य।*


पीठ पर लदा भारी-भरकम स्कूल बैग, कोचिंग क्लासेस के लिए भागमभाग कुल मिला कर बेइंतहा तनाव में जीते बच्चे। यदि बच्चा खेलना चाहता है तो उससे उस खेल को खेलने के लिए बाध्य किया जाता है जिसमें आगे चल कर वह कैरियर बना सके और लाखों कमा सके। यदि बच्चे को नाचने या गाने में रुचि है तो उसकी इस रुचि में भी टेलेण्ट-हण्ट वाले टी.वी. शोज़ में सहभागिता की चमक-दमक दिखाई देने लगती है। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो बच्चे की रुचि में कमाई का जरिया देखने की आदत बनती जा रही है। जब यह तस्वीर है वर्तमान की तो भविष्य कैसा होगा? जबकि हम अपने बच्चों के भविष्य के लिए न तो स्वच्छ वातावरण छोड़े रहे हैं और न प्र्याप्त प्राकृतिक संसाधन। जैसे एक जुआरी पिता जुआ खेलने के लिए कर्ज लेता चला जाता है और इस बात का कतई ध्यान नहीं रखता है कि उसके बच्चे उस कर्ज को कैसे चुकाएंगे, कुछ ऐसी ही दशा की ओर बढ़ रहे हैं हम और हमारे बच्चे।
दिल्ली जैसे महानगरों में प्रदूषण का स्तर इतना अधिक है कि अस्थमा जैसी सांस की बीमारियों से ग्रस्त बच्चों की संख्या दिन प्रति दिन बढ़ती जा रही है। नाक पर नक़ाब लगा कर सांस लेने को मज़बूर बच्चे और बाज़ारवाद के शिकार होते उनके माता-पिता सब कुछ देख कर भी मानो कुछ नहीं देख पा रहे हैं। जो नक़ाब आॅपरेशन थियेटर में पहने जाते थे, वे नक़ाब अब घर से निकलते ही लगाने की नौबत है। गोया समूचा शहर ही आॅपरेशन थियेटर में बदल गया हो। बस, अंतर यही है कि आॅपरेशन थियेटर के अन्दर का वातावरण स्वच्छ रहता है और उस स्वच्छता को बनाए रखने के लिए दस्ताने और नक़ाब पहने जाते हैं लेकिन शहर में गंदगी से बचने के लिए नक़ाब पहनने की जरूरत पड़ने लगी है। 
जो गंदगी भरा वातावरण हम अपने बच्चों को दे रहे हैं उसी का परिणाम है कि आज पालने में झूलने वाले नन्हें बच्चे जीका वायरस से जूझ रहे हैं। यह वायरस देश के लगभग हर राज्य में फैलता जा रहा है। मध्यप्रदेश में यहां तक कि सागर जैसे कम विकसित शहर में भी इसके मरीज़ मिलने लगे हैं। ज़ीका वायरस दिन में एडीज मच्छरों के काटने से फैलता है। इस बीमारी में बुखार के साथ जोड़ों में दर्द और सिरदर्द जैसे लक्षण दिखाई देते हैं। इसका कोई टीका नहीं है, न ही कोई ख़ास उपचार है। ये मच्छरों से ही फैलता है। ये वायरस दिन में ज्यादा सक्रिय रहता है। पाया गया है कि विशेष रूप से गर्भावस्था में महिलाएं इससे ज्यादा संक्रमित होती हैं।  इससे प्रभावित बच्चे का जन्म आकार में छोटे और अविकसित दिमाग के साथ होता है। ये गर्भावस्था के दौरान वायरस के संक्रमण से होता है। इसमें शिशु दोष के साथ पैदा हो सकता है। नवजात का सिर छोटा हो सकता है। उसके ब्रेन डैमेज की ज्यादा आशंका होती है। साथ ही जन्मजात तौर पर अंधापन, बहरापन, दौरे और अन्य तरह के दोष दे सकता है। इसका सिंड्रोम शरीर के तंत्रिका तंत्र पर हमला करता है और इसके चलते लोग लकवा का शिकार हो जाते हैं। ये न्यूरोलॉजिकल जटिलताएं भी दे सकता है। जीका वायरस कोई नया नहीं है। इसकी पहचान पहली बार सन् 1947 में हुई थी। जिसके बाद ये कई बार अफ्रीका व साउथ ईस्ट एशिया के देशों के कुछ हिस्सों में फैला था। अभी तक कैरेबियाई ,उत्तर व दक्षिणी अमेरिका के 21 देशों में ये वायरस फैल चुका है। भारत में इसके फैलने का सबसे बड़ा कारण है ऐसी गंदगी जहां मच्छर पलते रहते हैं। किसी भी स्वच्छता मिशन का सरकारी स्वरूप आने वाली पीढ़ी को स्वच्छ वातावरण नहीं दे सकता है। इसके लिए प्रत्येक नागरिक को स्वच्छता को जीवनचर्या बनाना होगा। भले ही वह नागरिक करोड़ों के भवनों में रह रहा हो या झोपड़पट्टी में रहता हो। खुद के लिए नही ंतो अपने बच्चों के लिए यह जरूरी है। आज जीका वायरस है तो कल कुछ और इससे भी भयावह वायरस आ जाएगा, यदि आज हम नहीं सम्हले तो।
आपराधिक स्तर पर भी बच्चे अपराध से घिरे हुए दिखाई देते हैं। जब अवयस्क युवा बलात्कार जैसा घिनौना अपराध करने लगें या फिर तीन-चार साल की नन्हीं बच्चियों को हवस का शिकार बनाया जाने लगे तो इसे अच्छी सामाजिक दशा तो हरगिज नहीं कहा जा सकता है। अपराध और अपराधियों से आज बच्चे सुरक्षित नहीं हैं। विकास के दावों के बीच यह एक कड़वा सच है कि हमने अपराधों में कहीं अधिक विकास कर लिया है। हमारे बच्चे न तो घर-परिवार में सुरक्षित हैं, न मोहल्ले में और न स्कूलों में। कोई दुश्मनी भी नहीं, मात्र व्यक्तिगत आनन्द के लिए बच्चों को शिकार बनाया जा रहा है। 
देश के विकास की दिशा में यूं तो लक्ष्य रखा गया है बच्चों के प्रति दुराचार, उनका शोषण, तस्करी, हिंसा और उत्पीड़न समाप्त करना। किन्तु सच तो यह है कि हमारी व्यवस्थाएं नहीं बचा पा रही हैं अपने बच्चों को। महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के अध्ययन ‘चाइल्ड एब्यूज़ इन इंडिया’ के अनुसार भारत में 53.22 प्रतिशत बच्चों के साथ एक या एक से ज़्यादा तरह का यौन दुव्र्यवहार और उत्पीड़न हुआ होता है। इन आंकड़ों को देख कर चिंता होने लगती है कि जब हम बच्चों को उनका सुरक्षित वर्तमान नहीं दे पा रहे हैं तो एक सुरक्षित भविष्य कहां से देंगे?  
दिनों-दिन बढ़ते हुए बाल-अपराध हमारे सामाजिक जीवन के लिए एक चुनौती हैं। छोटे-छोटे बच्चों में अपराधी प्रवृत्तियां एक गंभीर समस्या बन गई है। बाल जीवन में बढ़ती जा रही हिंसा, क्रूरता, गुण्डागर्दी, नशेबाजी, आवारापन मानव-समाज के लिए एक गंभीर समस्या है। बाल अपराध इस तरह बढ़ रहे हैं कि उनका अनुमान कर सकना मुश्किल है। यूं तो बाल अपराधों के लिए सर्वेक्षण होता रहता है किन्तु कहीं की भी पूरे आंकड़े सामने नहीं आ पाते हैं। माता-पिता अपने बच्चों के अपराधों पर पर्दा डालते रहते हैं। अपने बच्चों के आपराधिक कारनामों को छिपाने के लिए माता-पिता जितनी ऊर्जा और धन खर्च करते हैं, यदि उससे आधी ऊर्जा और धन भी बच्चों की गतिविधियों पर ध्यान देने में लगाएं तो बच्चों के अच्छे संस्कार खोने नहीं पाएंगे। बच्चों का दिमाग़ तो कोरी स्लेट के समान होता है, उसमें यदि आपराधिक प्रवृत्तियां लिख दी जाएं तो वहीं जीवन भर लिखी रहेंगी। 
आज बच्चे अगर अपने माता-पिता या मेहमानों को पलट कर जवाब देते हैं या बेअदबी से पेश आते हैं तो इसमें दोष बच्चों का नहीं, उन माता-पिता का है जिन्होंने हंस कर बढ़ावा दिया और अपराधी बनने की पहली सीढ़ी यानी ढिठाई पर चढ़ा दिया। आज 80 प्रतिशत बच्चे स्कूली शिक्षा पूरी करते ही कैरियर वाली पढ़ाई के चक्कर में अपने घर से दूर पराये शहरों में चले जाते हैं। इसके बाद उनकी हमेशा के लिए अपनी घर वापसी बहुत कम हो पाती है। जो लौटते भी हैं वे फ्रस्टेशन से ग्रस्त रहते हैं। यह फ्रस्टेशन भी उन्हें उसी वातावरण से मिलता है जो हमने आर्थिक दबाव के रूप में रच दिया है। कमाऊ युवाओं के उदाहरणों से घिरे बेरोजगार युवा पारिवारिक दबाव में आ कर गलत कदम उठाने लगते हैं। या तो वे आत्मघाती हो उठते हैं या फिर अपराधी बन जाते हैं। 
    हर साल बालदिवस का उत्सव मनाना आसान है लेकिन अपने गिरेबान में झांकना कठिन है,ं जहां हम स्वयं को कटघरे में खड़ा पाते हैं। यदि हम अपने बच्चों को अच्छा स्वास्थ्य नहीं दे सकते, अच्छी शिक्षा नहीं दे सकते, अच्छे संस्कार नहीं दे सकते, समुचित सुरक्षा नहीं दे सकते हैं, तो क्या हम दावा कर सकते हैं कि हम अपने बच्चों को अच्छा भविष्य दे रहे हैं? गरीबी, बेरोजगारी, मंहगाई, भ्रष्टाचार, प्रदूषण और अपराध के दलदल का उपहार देते हुए बच्चों को कैसे कहें ‘हैप्पी बालदिवस’? 
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Thursday, November 13, 2025

बतकाव बिन्ना की | रामधई ! इंसानीयत मरत जा रई | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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बतकाव बिन्ना की    
       
रामधई ! इंसानीयत मरत जा रई                              
- डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह

‘‘काए बिन्ना का सोच रईं?’’ भैयाजी ने मोसे पूछी।
‘‘का कओ जाए भैयाजी, आजकाल न जाने का होत जा रओ लोगन खों।’’ मैंने भैयाजी से कई।
‘‘का होत जा रओ? काय की फिकर कर रईं?’’ भैयाजी ने फेर के पूछी।
‘‘फिकर? हऔ फिकर तो होत आए। लोगन में इंसानीयत मरत जा रई। एक जने खों कछू हो जाए मनो दूसरे खों ऊसे कछू लेबो-देबो नईयां।’’ मैंने कई।
‘‘का हो गओ ऐसां?’’ भैयाजी ने पूछी।
‘‘अब का कई जा ? भओ का के कछू दिनां पैले की बात आए के हमाई सहेली के मोहल्ला में एक के घरे भड़याई भई। मकान मालिक हरें कई मईना से घरे न हते। अपने मोड़ा के लिंगे बायरे गए हते। भड़यन खों जे ने सूझो के जोन कई मईना खों बायरे जा रओ, बा अपने घरे माल-मत्ता छोड़ के तो ने जाहे। औ ने तो फेर सरकारी सूचनातंत्र घांई उनको सूचनातंत्र बी फिसड्डी रओ हुइए। सो बे ऊ सूने घर में जा पिड़े। खास जे रई के उन्ने बायरे के तारे ने तोड़े औ फटका से बुलक के भीतरे पौंच गए। फेर भीतरे को ताला खोलो और सबरे कमरा में दोंदरा दओ औ फेर छूंछे हात चलत बने। काय से के उते ऐसो कछू ने हतो के बे चुरा पाते। मनो सबेरे पड़ोसियन खों पता परी सो उन्ने पुलिस बुलाई। पुलिसवारन ने सीसीटीवी कैमरा की पूछी तो जोन घर में भड़या पिड़े रए उनईं के सामने वारे घर में सीसीटीवी लगी रई। पुलिस ने फुटेज मांगी सो बे धनी-धोरी बोले के हमाऔ तो कैमरा खराब आए। सो सीसीटीवी में कछू रिकार्ड ने हो सको। बाकी बाद में पता परी के उन्ने झूठी बोल दई रई, काय से बे पुलिस के चक्कर में पड़ो ने चाउत्ते।’’ मैंने बताई।
‘‘जो का बात भई? फेर सीसीटीवी लगाई काय खों रई?’’ भैयाजी बोले।
‘‘अब आपई सोचो के जो बे फुटेज दे देते तो पुलिस उने तो जेल में पेंड़ ने देती? बाकी उनके फुटेज देबे से बा उन भड़यन की चिन्हारी हो जाती। ई घटना के बाद से कछू जने मजाक में जा कहन लगे के उनको सीसीटीवी तो जे लाने को आए के बे देख सकें कोन के घरे को आ रओ औ कोन, कोन से बतकाव कर रओ। बाकी मोए जा लगो के जा तो एक फेलियर भड़यागिरी हती सो उन्ने फुटेज के लाने गुल्ली मार दई, जो कऊं कोनऊं बड़ी वारदात हो जाए सो बे बोल दैंहे के हमाए तो आंख-कान लौं बंद हते। 
मोए ऊ टेम की सुरता आए जबे मैं लोहरी हती औ पन्ना में हिरणबाग कालोनी में रैत्ती। उते छै मकान हते, सरकारी। छैओ में बाल-बच्चा सैंत लेडी टीचर रैत्तीं। ऊ टेम पे ने तो मोबाईल हतो औ न घरे फोन होत्तो। सो सबने तै कर रखी हती के जो एक के घरे कछू होय तो बा जोर7जोर से चिल्लाहे, बरतन-भाड़क पटकहे जोन से बाकी खों पता पर जाए के कछू गड़़बड़ आए। औ फेर सबरीं बा आवाजें सुन के एक संगे अपने-अपने घरे की बायरे तक की लाईटें जला के डंडा ले के निकल परहें। एक दफा ऐसो भओ बी। ऊके बाद फेर कभऊं ऐसी नौबत ने आई। बाकी अब तो जे हाल आए के एक के घरे कछू हो जाए बाकियन खों कोऊ लेबो-देबो नइयां।’’ मैंले भैयाजी से कई।
‘‘सई कै रईं बिन्ना! भारी निठुरापन भओ जा रओ।’’ भैयाजी सोई अफसोस करत भए बोले।
‘‘सो निठुरापने की कां लौं कई जाए। अब तो जा दसा आए के एक मोड़ा ने अपनी प्रेमिका को गलो रेत दओ, बा बी सबके सामने। कोनऊं ने ऊको ने रोको। आपने सोई जा खबर पढ़ी हुइए। चायते तो सबरे मिल के ऊको पकर लेते, ने तो एक लट्ठ घुमा के देते तो बा मोड़ी बच जाती औ बा मोड़ा बी तभईं पकर लओ जातो। पर नईं, उते तो लोग बा मोड़ी की गला रैते की रीलें बनाऊंत रए। अब का कओ जाए ऐसे लोगन खों। जो बा मोड़ी की जांगा उनकी अपनी मताई, भैन होती तो का बे तब्बी ऊको कटत भए की रीलें बनाऊंत रैते? औ बा मोड़ा की तो का कई जाए। बा निठुरा कैत रओ के ऊको अपनी प्रेमिका को गला रेते में कोनऊं दुख नई भओ। काए से के बा प्रेमिका धोका दे रई हती। अरे, मालिक! तो बा मोड़ी से ब्रेकअप कर लेते, ऊको जान से मार के का मिलो? जनम भर की जेल मिली।’’ मैंने भैयाजी से कई। 
‘‘हऔ, ऐसई बा इन्दौर वारी घटना ने भई रई?’’ भैयाजी बोले।
‘‘कोन-सी घटना?’’ मैंने पूछी। 
‘‘अरे बाई वारी जीमें मोड़ी ने घरवारों के कए में ब्याओ तो कर लओ, औ बाद में हनीमून पे जा के अपने प्रेमी हरों से मिल के अपने दूला खों काम तमाम करा दओ। मने बा अपने घरवारों खों मना करबे को साहस ने जुटा पाई, औ अपने दूला को मरबावे को साहस जुटा लाई। मने ई टाईप के लोग इंसान आएं के नईं, हमें सोई ईमें शक होत आए।’’ भैयाजी बोले। फेर भैयाजी कैन लगे के ‘‘ईके पैले भी ऐसी वारदातें खींब हो चुकीं। दिल्ली मेंई एक मोड़ा ने एक मोड़ी खों भरे बजार में चाकू से गोद दओ रओ। बा मोड़ी बचबे के लाने भगत फिरी हती मनो कोनऊं ने की मदद ने करी। दो-चार ज्वान-जहान हरें ऊकी रीलें बनाऊंत रए। जा सब कछू देख-देख के लगत आए के दुनिया से इंसानीयत उठत जा रई। जा रीलन ने बी भौत बिगाड़ करी आए।’’
‘‘बात तो सई कै रए आप भैयाजी मनो कछू जने अच्छी रीलें बी बनाऊंत आएं जो अच्छो मनोरंजन करत आए, ने तो अच्छो संदेसा देत आए। ऐसई एक रील मैंने देखी हती जीमें एक ज्वान मोड़ा सड़के से गुजर रओ हतो के ऊको एक मोड़ी की चिंचियाबे और सहायता के पुकार भई आवाज सुनाई परत आए। पर बा सुन के अनसुनी कर देत आए के को जाने कोआ? कोन ऊ पचड़े में परे? औ तभई ऊको दो लफंगा दिखात आएं जोन अपने कपड़ा ठीक करत भए अंदियारे से बायरे आऊतें आएं। मने उने देख के कोनऊं बी समझ सकत्तो के बे अंदियारे में बा मोड़ी के संगे का कांड कर के निकर रए। बाकी बा ज्वान मोड़ा फेर बी ने तो पुलिस खों फोन करत आए औ ने मोड़ी की सहायत के लाने कछू सोचत आए। औ बा अपने घरे चलो जात आए। घरे पौंचत सात ऊकी मताई फिकर करत भई ऊको बताऊत आए के मोड़ा की छोटी भैन कछू सौदा लाने खों घरे से निकरी हती औ अब लौं लौटी नइयां, जबके ऊको गए भए कुल्ल देर हो गई आए। ब मोड़ा पूछत आए के बहना कोन तरफी गई आए? सो मताई बताऊत आए। मताई की बात सुन के ऊ मोड़ा खों मनो गश सो आ जात आए। काए से मताई बहना के जाबे के बारे में जोन तरफी की बता रई हती, ओई तरफी से बा एक मोड़ी की चींखे सुन के आ रओ हतो। रील की किसां इतई खतम हो जात आए। रील बनाबे वारों जेई बताओ चात्तो के जोन मोड़ी गुंडों में फंसी होए बा देखबे वारन में से कोनऊं की भैन बी हो सकत आए। सो सबई मोड़ियन की हिफाजत के बारे में सोचो चाइए। मोड़ियां सबकी एक सी होत आएं औ परेसानी सबकी एक सी होत आए।’’ मैंने कई।
जा सब बतकाव करत-करत हम दोई को मन दुखी सो हो गओ।   
बाकी बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़िया हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की। मनो सोचियो जरूर के माहौल ऐसो काए बिगरत जा रओ?
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Wednesday, November 12, 2025

चर्चा प्लस | कहां है रीजनल इंडस्ट्रियल कॉन्क्लेव का फालोअप? | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर


चर्चा प्लस | कहां है रीजनल इंडस्ट्रियल कॉन्क्लेव का फालोअप? | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर 


चर्चा प्लस
कहां है रीजनल इंडस्ट्रियल कॉन्क्लेव का फालोअप?
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
    सितम्बर 2024 में सागर में रीजनल इंडस्ट्रियल कॉन्क्लेव हुआ था जिसमें निवेशकों ने कई महत्वपूर्ण घोषणाएं की थीं। तब से अब तक किसी निवेशक ने अपने वादे के अनुसार रुचि ली या नहीं, आमजनता को इसकी कोई जानकारी नहीं है। जबकि यह प्रशासन की जिम्मेदारी है कि वह रीजनलझं इंडस्ट्रियल कॉन्क्लेव के फालोअप से आमजन को अवगत कराता रहे। इससे लोगों में भविष्य के प्रति उम्मींद बंधती है। जो पलायन करने के बारे में विचार कर रहे होंगे वे भी यहीं रुक कर अपना भाग्य आजमाना पसंद करेंगे। अभी तो मात्र यही समझ में आता है कि सागर उत्साही सांसद केन्द्र सरकार की योजनाओं को लागू कराने के लिए कृतसंकल्प हैं। लेकिन इस बीच निवेशकों का आगाज़ कैसा है, यह भी तो पता लगते रहना चाहिए। 

बुंदेलखंड आरम्भ उत्तर प्रदेश तथा मध्य प्रदेश में फैला हुआ है। बुंदेलखंड के इन दोनों हिस्सों की आर्थिक दशा बेहतर नहीं कही जा सकती है। लेकिन उत्तर प्रदेश का बुंदेलखंड बाजी मारता हुआ दिखाई दे रहा है। बात माॅल्स, काॅरीडोर या बाजार एवं काॅलोनीज़ के विस्तार की नहीं है, बात है बुनियादी विकास की। उत्तर प्रदेश में योगी सरकार ने बुंदेलखंड इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट अथॉरिटी के अंत बुंदेलखंड के विकास का बीडा उठाया है।  बुंदेलखंड औद्योगिक विकास प्राधिकरण का क्षेत्र उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में स्थित है, जिसमें मुख्य रूप से झांसी जिले के 33 गांव शामिल हैं। इस क्षेत्र को 65,000 एकड़ से अधिक में एक बड़े औद्योगिक शहर के रूप में विकसित किया जा रहा है। बुंदेलखंड इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट अथॉरिटी मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में स्थित है, जिसका मुख्यालय झांसी में है। इस परियोजना के तहत 33 गाँवों की 65,000 एकड़ से अधिक भूमि को औद्योगिक और व्यावसायिक विकास के लिए चिन्हित किया गया है। विकास का उद्देश्य है कि इस क्षेत्र को एक अत्याधुनिक, विश्व स्तरीय औद्योगिक और आर्थिक केंद्र के रूप में विकसित किया जाना है, जिसमें आधुनिक बुनियादी ढांचा और रहने की सुविधाएं शामिल होंगी। यानी बुंदेलखंड इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट अथॉरिटी बुंदेलखंड इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट अथॉरिटी एक नया शहर बसा रही है। इसमें उद्योग, घर और हरियाली सब होगा। यह शहर दस लाख लोगों को बसाएगा। यहाँ रोजगार के भरपूर अवसर मिलेंगे और पलायन रुकेगा।

बुंदेलखंड इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट अथॉरिटी शहर का 35 प्रतिशत हिस्सा पूर्वी क्षेत्र में उद्योगों के लिए होगा, जबकि 15-20 प्रतिशत हिस्सा पश्चिमी क्षेत्र में आवासीय उद्देश्यों के लिए रखा गया है। इसमें होटल, स्कूल और रिसॉर्ट जैसी सुविधाएं शामिल होंगी। यह शहर लगभग दस लाख लोगों को बसाने में सक्षम होगा। इन दोनों हिस्सों को 200 मीटर चैड़ी सड़क अलग करेगी, जो चार एक्सप्रेसवे की चैड़ाई के बराबर होगी। कुल जमीन का तीस प्रतिशत हिस्सा हरियाली के लिए आरक्षित किया गया है। इसमें पार्क, छोटे जंगल, जल निकाय और ट्रेकिंग के रास्ते शामिल होंगे। इस नई टाउनशिप में चैड़ी सड़कें, सीवेज सिस्टम, गैस पाइपलाइन, एसटीपी (सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट), सीइटीपी (कंबाइंड एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट) और सोलर लाइटिंग सिस्टम जैसी सभी आधुनिक सुविधाएं होंगी। साथ ही, एक एकीकृत कमांड कंट्रोल सिस्टम भी होगा।  बीडा उद्योगपतियों के लिए इसलिए भी उपयुक्त है क्योंकि यह पूर्व-पश्चिम और उत्तर-दक्षिण गलियारों के जंक्शन पर स्थित है। यहाँं सड़क और रेल मार्ग से अच्छी कनेक्टिविटी है। जल्द ही यहाँ एक हवाई अड्डा भी बनने की उम्मीद है। जमीन सस्ती है और किसी भी कानूनी पचड़े से मुक्त है। यहाँ काम करने के लिए पर्याप्त लोग भी उपलब्ध हैं। उनके अनुसार, कंटेनर कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया और भारत अर्थ मूवर्स सहित लगभग बीस उद्योगों ने यहाँ आने की सहमति दे दी है। उन्होंने यह भी बताया कि वे एक मल्टी-मोडल लॉजिस्टिक्स पार्क, यानी एक तरह का ड्राई पोर्ट स्थापित करने पर भी विचार कर रहे हैं।

     अब तक, बुंदेलखंड इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट अथॉरिटी ने 10,000 किसानों से 20,000 एकड़ जमीन का अधिग्रहण कर लिया है और उन्हें 2,700 करोड़ रुपये का मुआवजा दिया है। मास्टर प्लान, जमीन आवंटन के नियम और भवन निर्माण के नियम गवर्निंग बॉडी द्वारा मंजूर किए जा चुके हैं। भविष्य का लक्ष्य 1,000 एकड़ जमीन पर अत्याधुनिक बुनियादी ढांचे के साथ एक एक्टिवेशन एरिया बनाना है। इसके लिए एक विस्तृत परियोजना रिपोर्ट तैयार की जा रही है, जिसे दिसंबर 2026 तक पूरा करने का लक्ष्य है।

दूसरी ओर बीडा बुंदेलखंड इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट अथॉरिटी एक आत्मनिर्भर एकीकृत औद्योगिक टाउनशिप बनने जा रही है, जिसमें सभी आधुनिक सुविधाएं और भरपूर हरियाली होगी। बुनियादी ढांचे की गुणवत्ता के मामले में यह नोएडा और ग्रेटर नोएडा से बेहतर होगी। यह स्थानीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देगी और बड़े पैमाने पर पलायन को रोकेगी। स्थानीय लोगों को आगे बढ़ने का एक बड़ा अवसर मिलेगा।
यह सारे प्रयास एवं योजनाएं पढ़ने, सुनने में ही बहुत अच्छी एवं आशाएं जगाने वाली लग रही हैं। वहीं मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड के लिए बुंदेलखंड विकास प्राधिकरण नामक एक अथॉरिटी है, जो इस क्षेत्र के विकास की जिम्मेदारी संभालती है। इस प्राधिकरण के अधिकार क्षेत्र में मध्य प्रदेश के सागर संभाग के सागर, दमोह, छतरपुर, टीकमगढ़, पन्ना और ग्वालियर-चंबल संभाग के दतिया जिले को शामिल किया गया है, जिसमें निवाड़ी जिला भी शामिल है। इसकी वर्तमान स्थिति एवं परिदृश्य खबरों से ओझल है। बीडीए का कर रहा है इसका ठीक-ठीक पता आमजन को नहीं है। खैर, अब बात करते हैं उस  रीजनल इंडस्ट्रियल कॉन्क्लेव की जो सितम्बर 2024 में बड़े धूमधाम से सागर में सम्पन्न हुआ था। देश-विदेश से निवेशक सागर आए थे। सागर रीजनल इंडस्ट्रियल कॉन्क्लेव में खूब प्रस्ताव आए थे। कहा गया था कि बुंदेलखंड रीजन में उद्योगों का जाल बिछेगा। इसके साथ ही सागर में एयरपोर्ट बनेगा। बुंदेलखंड में अलग-अलग सेक्टर में निवेश को लेकर 6600 करोड़ रुपए के प्रस्ताव आए। पूरे मध्य प्रदेश में 19,000 करोड़ रुपए के प्रस्ताव आए। बुंदेलखंड के संभागीय मुख्यालय सागर में आयोजित रीजनल इंडस्ट्रियल कॉन्क्लेव में देश भर के उद्योगपतियों ने निवेश की इच्छा जताई। दोपहर तक सागर, दमाोह, छतरपुर और निवाड़ी सहित अन्य क्षेत्र में करीब 6600 करोड़ रुपए के निवेश की घोषणा की गई थी। पूरे प्रदेश में करीब 19 हजार करोड़ से अधिक के निवेश के प्रस्ताव कॉन्क्लेव के माध्यम से आए।

कुछ योजनाओं की घोषणाएं की गई थी उनमें से कुछ के काम शुरू हो भी चुके हैं किन्तु आमजन उससे लगभग अनभिज्ञ है। एक महत्पूर्ण घोषणा थी कि ढाना में बनेगा एयरपोर्ट बनेगा। जी हां, सागर के ढाना में स्थित एयर स्ट्रिप को अब एयरपोर्ट बनाया जा सकेगा। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कॉन्क्लेव में बताया कि हमें ढाना एयरपोर्ट सहित प्रदेश में 1800 करोड़ की लागत से एयरपोर्ट बनाने का प्रस्ताव मिला। इसके अलावा बंसल ग्रुप सागर में देश का सबसे बड़ा और प्रदेश का पहला डेटा सेंटर बनाएगा। इसमें करीब 1700 करोड़ का निवेश आएगा। एआई के दौर में यह सागर सहित प्रदेश के लिए बड़ी उपलब्धि होगी। प्राप्त जानकारी के अनुसार ढाना एयरपोर्ट का काम प्रगति पर है किन्तु इस प्रगति की गति के बारे में प्रशासन कह ओर से अपडेट नहीं दिया जा रहा है। 
दूसरी महत्वपूर्ण घोषणा थी सागर में चांदी क्लस्टर बनाए जाने की। सीएम डाॅ मोहन यादव ने मंच से जानकारी देते हुए बताया था कि सागर में चांदी क्लस्टर बनाया जाएगा। इसके अलावा यहां स्टील, सीमेंट, हॉस्पिटल, होटल, फर्नीचर क्लस्टर, एयरपोर्ट सहित अन्य सेक्टरों में निवेश की घोषणा की गई थी। इनमें एक ग्रुप ने निवाड़ी में 3200 करोड़ का इंटीग्रेटेड स्टील प्लांट स्थापित करने की घोषणा की थी। आयरन और माइनिंग में भी निवेश किया जाएगा। इससे 10 हजार लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार मिलेगा। इसी प्रकार मेडिकल इंडस्ट्री और अन्य उपक्रमों में भी गीतांजलि ग्रुप निवेश करने की घोषण की थी।

इसी प्रकार बंसल ग्रुप बुंदेलखंड सहित पूरे एमपी में 4 सुपर स्पेशियालिटी हॉस्पिटल, 5 स्टार होटल और 100 मेगावाट का सोलर प्लांट लगाए जाने की घोषण की गई थी। इसमें करीब 1350 करोड़ रुपए के निवेश तय किया गया था। वहीं, मध्य भारत एग्रो सागर के बंडा इलाके में 500 करोड़ का नया इंवेस्टमेंट करने की घोषणा की थी। कार्यक्रम में सीएम ने बुंदेलखंड सहित प्रदेश के लिए 96 औद्योगिक इकाईयों के लिए 240 एकड़ भूमि आवंटित करने के आदेश पत्र प्रदान किए थे। इससे 1565 करोड़ रुपए का निवेश होगा तो 6000 रोजगार सृजित होने का अनुमान था। सागर में फर्नीचर क्लस्टर के लिए 10 इकाईयों को आदेश पत्र भी दिए गए थे।

बुंदेलखंड में डॉ. मोहन यादव द्वारा कराए गए पहले रीजनल इंडस्ट्रीज कॉन्क्लेव में जिन सेक्टरों में निवेश की घोषणा की गई थी, उसमें चांदी उद्योग के लिए क्लस्टर, एयरपोर्ट, स्टील प्लांट, सीमेंट प्लांट, सुपर स्पेशियालिटी हॉस्पिटल, 5 स्टार होटल, फर्नीचर क्लस्टर, तेंदूपत्ता, रॉक फास्फेट प्लांट सहित खनिज क्षेत्र में निवेश की बात कही गई थी। विशेश यह भी था कि रीजनल इंडस्ट्रियल कॉन्क्लेव केवल सागर या बुंदेलखंड तक सीमित नहीं था। बल्कि इसमें देश भर के कारोबारियों के अतिरिक्त विदेशों से भी निवेशक  आए थे जिनमें थाईलैंड के महावाणिज्य दूत व मंगोलिया राजदूत तथा यूरोप से कुछ व्यवसायी आए थे।

यदि यह सब कुछ रीजनल इंडस्ट्रियल कॉन्क्लेव की घोषणाओं के अनुरुप होता है तो मध्यप्रदेश के बुंदेलखंड के विकास का चेहरा भी बदल जाएगा। इस क्षेत्र से रोजगार के लिए होने वाले पलायन रुकेंगे। चौतरफा विकास होगा। यहां तक कि आरम्भिक स्तर पर ‘‘सेटअप’’ के लिए रोजगार के अवसर मिलने लगेंगे। किन्तु लगभग सवा साल बाद निवेश की क्या स्थिति है अथवा घोषणाओं के अनुरुप काम शुरू हुआ है या नहीं इसका फालोअप आमजन के पास नहीं है जबकि ऐसी योजनाएं आमजन को केन्द्र में रख कर ही बनाई जाती हैं तथा इनका विकास किया जाता है। जिस प्रकार से उत्तरप्रदेश के बुंदेलखंड में बीडा समाचारों के माध्यम से अपनी उपस्थिति याद दिलाता रहता है उसी तरह बीडीए और रीजनल इंडस्ट्रियल कॉन्क्लेव का भी फालोअप जारी होते रहना चाहिए ताकि आमजन अपने भावी विकास को ले कर आश्वस्त हो सके।   

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