Wednesday, June 9, 2021

चर्चा प्लस | महात्मा गांधी की दृष्टि में कला और सौंदर्य | डाॅ शरद सिंह

चर्चा प्लस
   महात्मा गांधी की दृष्टि में कला और सौंदर्य
       - डाॅ शरद सिंह
जब महात्मा गांधी के विचारों की चर्चा हो रही हो तो कला और सौंदर्य पर उनके चैंकाने वाले विचार सामने आते हैं। जहां तक विचारों का संदर्भ है तो महात्मा गांधी एक ऐसे व्यक्तित्व थे जो अपने विचारों में स्पष्टता रखने के हिमायती थे। जीवन का चाहे कोई भी विषय हो, उन्होंने बेझिझक उसकी व्याख्या की। इसीलिए माना जाता है कि यदि महात्मा गांधी के विचारों को समझना है तो उनके समग्र विचारों को जानना जरूरी है जैसे कला और सौंदर्य के संबंध में भी उनके विचार स्पष्ट थे।
 सादा जीवन जीने वाले महात्मा गांधी को कला और सौंदर्य की अद्भुत समझ थी। महात्मा गांधी ने अपनी पुस्तक ‘एक्सपेरिमेंट्उ विथ ट्रू’ में कला के बारे में लिखा है- ‘‘मैं जानता हूं कि बहुत-से व्यक्ति अपने को कलाकार कहते हैं और उन्हें इस रूप में मान्यता भी प्राप्त है लेकिन उनकी कृतियों में आत्मा के उदग्र आवेग और आकुलता का लेश भी नहीं होता जबकि प्रत्येक सच्ची कला आत्मा के आंतरिक स्वरूप की सिद्धि में सहायक होनी चाहिए। जहां तक मेरा ताल्लुक है, मुझे अपनी आत्मसिद्धि में बाह्य रूपों की सहायता की कतई जरूरत नहीं है। इसलिए मैं कोई कलाकृतियां प्रस्तुत नहीं कर सकता।’’
महात्मा गांधी कला में प्राकृतिक तत्वों को असीमित मानते थे। उनके अनुसार मानवीय कला प्राकृतिक कला के सामने कुछ भी नहीं है। वे कला की व्याख्या करते हुए कहते हैं कि -‘‘‘हो सकता है कि मेरे कमरे की दीवारें नंगी हों, मुझे तो शायद सिर पर छत की भी जरूरत नहीं है क्योंकि तब मैं असीम विस्तार वाले तारों भरे आकाश को निहार सकता हूं। जब मैं चमकते तारों से भरे आकाश को निहारता हूं तो मेरे सामने ऐसा अद्भुत परिदृश्य होता है जिसकी बराबरी मनुष्य की कला कभी नहीं कर सकती।’’
कला के महत्व के साथ ही महात्मा गांधी  ने कला के उद्देश्य को भी स्पष्ट किया। वे मानते थे कि कला का कोई न कोई उद्देश्य होता है और यह उद्देश्य ही कला की गुणवत्ता को सिद्ध करता है। उन्होंने लिखा है कि ‘‘इसका तात्पर्य यह नहीं है कि मैं सामान्यतः मानी गई कला-वस्तुओं के मूल्य को स्वीकार करने से इन्कार करता हूं बल्कि सिर्फ यह है कि मैं व्यक्तिगत रूप से यह अनुभव करता हूं कि यह प्राकृतिक सौन्दर्य के शाश्वत प्रतीकों की तुलना में कितनी अपूर्ण है। इन कला-वस्तुओं का मूल्य वहीं तक है जहां तक कि वे आत्मा को सिद्धि की दिशा में अग्रसर होने में सहायक होती हैं। ’’
महात्मा गांधी कला में सत्य को ढूंढते थे। यदि कला में सत्यता है तो वह सभी के लिए उपयोगी हो सकती है। उनके अनुसार ‘‘सत्य का शोध पहली चीज है, सौन्दर्य और शुभत्व उसमें अपने आप जुड़ जाएंगे। मैं समझता हूं कि ईसा मसीह सर्वोत्कृष्ट कलाकार थे, चूंकि  उन्होंने सत्य के दर्शन किए थे और उसे अभिव्यक्त किया था। ऐसे ही मोहम्मद साहब भी थे जिनकी ‘कुरान’ सम्पूर्ण अरबी साहित्य की सबसे श्रेष्ठ कृति है, कम-से-कम विद्वानों का मत यही है। कारण यह है कि दोनों ने पहले सत्य को पाने का प्रयास किया था, इसलिए उनकी वाणी में अभिव्यक्ति का सौन्दर्य सहज ही आ गया, हालांकि उन्होंने कोई कला-रचना नहीं की थी। मुझे इसी सत्य और सौन्दर्य की चाह है, मैं इसी के लिए जीऊंगा और इसी के लिए मरूंगा।’’
महात्मा गांधी मानते थे कि कला को जनोपयोगी होना चाहिए। उनके अनुसार कला सिर्फ कला के लिए नहीं वरन आमजन के लिए होनी चाहिए। उन्होंने साफ शब्दों में लिखा है कि ‘‘मैं उस कला और साहित्य का पक्षधर हूं जो जनता से जुड़ा हो। वही कला कला है जो सुखकर हो। सच्ची कला केवल आकार पर नहीं बल्कि उसकी पृष्ठभूमि में जो है, उस पर भी ध्यान केन्द्रित करती है। एक कला वह है जो मारती है और एक कला वह है जो जीवन देती है। सच्ची कला अपने रचनाकार की सुख-शांति, संतोष और शुचिता का प्रमाण होनी चाहिए। मैं संगीत और अन्य सभी कलाओं का प्रेमी हूं लेकिन मैं उनको उतना महत्त्व नहीं देता जितना कि आम तौर पर दिया जाता है। मिसाल के तौर पर मैं उन कार्यकलापों के महत्त्व को स्वीकार नहीं कर सकता जिन्हें समझने के लिए तकनीकी ज्ञान की जरूरत होती है। जीवन सब कलाओं से बढ़कर है। मैं तो यहां तक कहूंगा कि जिसने जीवन में प्रायः पूर्णता को प्राप्त कर लिया है, वह सबसे बड़ा कलाकार है, कारण कि उदात्त जीवन के निश्चित आधार और संरचना के बिना कला है भी क्या?’’
सत्य महात्मा गांधी का प्रिय विषय था। वे निरंतर सत्य की खोज में लगे रहते थे। वे कहते थे कि -‘‘मैं सत्य में अथवा सत्य के द्वारा सौन्दर्य को खोजता और पाता हूं। सत्य के सभी रूप-केवल सच्चे विचार ही नहीं बल्कि सच्ची तस्वीरें या गीत भी अत्यंत सुंदर होते हैं। लोग प्रायः सत्य में सौन्दर्य के दर्शन नहीं कर पाते, आम आदमी उससे दूर भागता है और उसमें सौन्दर्य के दर्शन की क्षमता ही खो बैठता है। जब लोग सत्य में सौन्दर्य के दर्शन करने लगेंगे, तब सच्ची कला का उदय होगा।’’
वे कला, सौंदर्य और सत्य को परस्पर पूरक मानते थे। महात्मा गांधी के अनुसार -‘‘‘सच्चे कलाकार की दृष्टि में वही मुख सुंदर है जो अपने बाह्य रूप से भिन्न, आत्मा के भीतर प्रतिष्ठित सत्य से आलोकित है। सत्य से भिन्न कोई सौन्दर्य नहीं है। इसके विपरीत, सत्य अपने आपको ऐसे रूपों में प्रकट कर सकता है जो बाहर से तनिक भी सुंदर न हों। कहा जाता है कि सुकरात अपने जमाने का सबसे सत्यनिष्ठ व्यक्ति था लेकिन कहते हैं कि उसकी मुखाकृति ग्रीस में सबसे कुरूप थी। मेरी दृष्टि में सुकरात सुंदर था क्योंकि उसने आजीवन सत्य के लिए संघर्ष किया और आपको याद होगा कि सुकरात की बाह्याकृति के कारण फिडिएस को उसके अन्दर के सत्य की सुंदरता को सराहने में कोई बाधा नहीं आई, हालांकि कलाकार के नाते वह बाह्याकृतियों में भी सौन्दर्य के दर्शन का अभ्यस्त था।’’
महात्मा गांधी ने वास्तविक सुंदर कृति की बड़े सरल शब्दों में व्याख्या की है। वे इस बारे में भी प्रकाश डालते हैं कि सुंदर कृति कब जन्म लेती है-‘‘सत्य और असत्य प्रायः साथ-साथ मौजूद रहते हैं, उसी तरह अच्छाई और बुराई का भी साथ है। कलाकार में भी अनेक बार वस्तुओं की सच्ची और झूठी धारणाओं का सह-अस्तित्व रहता है। सच्ची सुंदर कृति तब जन्म लेती है जब कलाकार सच्ची धारणा से प्रेरित होता है। यदि इसके उदाहरण जीवन में विरल हैं तो कला के क्षेत्र में भी विरल ही हैं।’’ वे आगे कहते हैं कि ‘तुम सब्जियों के रंग में सुंदरता क्यों नहीं देख पाते? और निरभ्र आकाश भी तो सुंदर है, लेकिन नहीं, तुम तो इंद्रधनुष के रंगों से आकर्षित होते हो, जो केवल एक दृष्टिभ्रम है। हमें यह मानने की शिक्षा दी गई है कि जो सुंदर है, उसका उपयोगी होना आवश्यक नहीं है और जो उपयोगी है, वह सुंदर नहीं हो सकता। मैं यह दिखाना चाहता हूं कि जो उपयोगी है, वह सुंदर भी हो सकता है।’’
इसमें कोई संदेह नहीं है कि महात्मा गांधी ने न केवल राजनीतिक मसलों का हल निकाला बल्कि कला और सौंदर्य का भी गहराई आकलन किया और इन दोनों तत्वों को जनोपयोगी तथा मानसिक विकास के लिए आवश्यक माना।
               ----------------------
#शरदसिंह  #DrSharadSingh #miss_sharad #चर्चाप्लस #दैनिक #सागर_दिनकर #महात्मागांधी #गांधी #कला #सौंदर्य

2 comments:

  1. कला और सौंदर्य के बारे में महात्मा गांधी के विचार वास्तव में क्रांतिकारी हैं, वे अनगढ़ वस्तुओं में भी सौंदर्य देख लेते हैं यदि वह वस्तु उपयोगी हो और सत्य के मार्ग पर ले जाती हो, सार्थक लेखन!

    ReplyDelete
  2. हार्दिक आभार अनिता जी 🙏

    ReplyDelete