Friday, February 11, 2011

वेश्यावृत्ति को वैधानिक दर्जे पर कुछ प्रश्न

- डॉ. शरद सिंह


"भारतीय दंडविधान" 1860 से "वेश्यावृत्ति उन्मूलन विधेयक" 1956 तक सभी कानून सामान्यतया वेश्यालयों के कार्यव्यापार को संयत एवं नियंत्रित रखने तक ही प्रभावी रहे हैं। जिस्मफरोशी को कानूनी जामा पहनाए जाने की जोरदार वकालत करते हुए कांग्रेस सांसद प्रिया दत्त ने मंगलवार को कहा कि यौनकर्मी भी समाज का एक हिस्सा हैं और उनके अधिकारों की कतई अनदेखी नहीं की जा सकती।

प्रिया दत्त ने कहा कि जिस्मफरोशी को वैधानिक दर्जा दिया जाना चाहिए, ताकि यौनकर्मियों की आजीविका पर कोई असर नहीं पड़े। मैं इस बात की वकालत करती हूँ। उन्होंने कहा कि जिस्मफरोशी को दुनिया का सबसे पुराना पेशा कहा जाता है। यौनकर्मियों की समाज में एक पहचान है। हम उनके हकों की अनदेखी नहीं कर सकते। उन्हें समाज, पुलिस और कई बार मीडिया के शोषण का भी सामना करना पड़ता है। उत्तर-मध्य मुंबई की 44 वर्षीय कांग्रेस सांसद ने कमाठीपुरा का नाम लिए बगैर कहा कि देश की आर्थिक राजधानी के कुछ रेड लाइट क्षेत्रों में विकास के नाम पर बहुत सारे यौनकर्मियों को बेघर किया जा रहा है।
प्रिया दत्त की इस मांग पर कुछ प्रश्न उठते हैः-
         1-क्या किसी भी सामाजिक बुराई को वैधानिक दर्जा दिया जाना चाहिए ?
         2-क्या वेश्यावृत्ति उन्मूलन के प्रयासों को तिलांजलि दे दी जानी चाहिए ?

3-जो वेश्याएं इस दलदल से निकलना चाहती हैं, उनके मुक्त होने के मनोबल का क्या होगा ?

 4-जहां भी जिस्मफरोशी को वैधानिक दर्जा दिया गया वहां वेश्याओं का शोषण दूर हो गया ?

 5- क्या वेश्यावृत्ति के कारण फैलने वाले एड्स जैसे जानलेवा रोग वेश्यावृत्ति को संरक्षण दे कर रोके जा सकते हैं ?



6- क्या इस प्रकार का संकेतक हम अपने शहर, गांव या कस्बे में देखना चाहेंगे?



 
7- अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुसार विष्व में लगभग 60 लाख बाल श्रमिक बंधक एवं बेगार प्रथा से जुड़े हुए है, लगभग 20 लाख वेश्यावृत्ति तथा पोर्नोग्राफी में हैं, 10 लाख से अधिक बालश्रमिक नशीले पदार्थों की तस्करी में हैं। सन् 2004-2005 में उत्तरप्रदेश, छत्तीसगढ़, कर्नाटक आदि भारत में सेंटर फॉर एजुकेशन एण्ड कम्युनिकेशन द्वारा कराए गए अध्ययनों में यह तथ्य सामने आए कि आदिवासी क्षेत्रों तथा दलित परिवारों में से विशेष रूप से आर्थिकरूप से कमजोर परिवारों के बच्चों को बंधक श्रमिक एवं बेगार श्रमिक के लिए चुना जाता है। नगरीय क्षेत्रों में भी आर्थिक रूप से विपन्न घरों के बच्चे बालश्रमिक बनने को विवश रहते हैं।
     वेश्यावृत्ति में झोंक दिए जाने वाले इन बच्चों पर इस तरह के कानून का क्या प्रभाव पड़ेगा ?     





17 comments:

  1. सांसद प्रिया दत्त की बात से कतई सहमत नहीं हुआ जा सकता |
    किसी सामाजिक बुराई को समाप्त करने की जगह उसे कानूनी
    मान्यता दे देना , भारतीय समाज के लिए आत्मघाती ही साबित
    होगा |
    हाँ , ये बात जरूर है कि इस धंधे से जुड़े लोगों के जीवनयापन के
    लिए कोई दूसरी सम्मानजनक व्यवस्था सरकारें करें | इन्हें इस
    धंधे की भयानकता से अवगत कराकर जागरूक किया जाये |

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  2. Surendra ji ne bikul sahi kaha hai ..ek sarthak post k liye abhar vyakt kerta hu

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  3. आपकी उम्दा प्रस्तुति कल शनिवार (12.02.2011) को "चर्चा मंच" पर प्रस्तुत की गयी है।आप आये और आकर अपने विचारों से हमे अवगत कराये......"ॐ साई राम" at http://charchamanch.uchcharan.com/
    चर्चाकार:Er. सत्यम शिवम (शनिवासरीय चर्चा)

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  4. अँधेरे में बिकती हैं बदनसीब जवानियाँ
    उजाले में बिकते हैं इज्जतदार लोग .
    दुर्भाग्यवश इज्जतदार लोगों का बिकना कोई नहीं देखता ..... जो मजबूरी के चलते जिस्म बेचते हैं उनकी मजबूरियां दूर होनी चाहिए ताकि वे मुख्य धारा में लौट सकें . आपका लेख अच्छा प्रयास है .

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  5. जिस्मफरोशी को मान्यता देने में कोई बुराई नहीं है. कोई अब उतारू हो ही जाये कि ये धंधा करनाहै तो करे. जी भर कर कर ले. लोग देह को सीढ़ी बना कर कहाँ से कहाँ पहुँच रहे है(या पहुँच रही हैं) तो फिर बेचारी वे मजबूर औरते क्या गलत कर रही है, जो केवल जिस्म को कमाई का साधन बनाना चाहती है. बैठे-ठाले जब तगड़ी कमाई हो सकती है, तो यह कुटीर उद्योग जैसा धंधा (भले ही लोग गन्दा समझे,) बुरा नहीं है. जो इस धंधे को बुरा मानते है, वे अपनी जगह बने रहे, मगर जो पैसे वाले स्त्री-देह को देख कर कुत्ते की तरह जीभ लपलपातेरहते हैं, उनका दोहन खूब होना ही चाहिये.. बहुत हराम की कमाई है सेठों और लम्पटों के पास. जिस्मफरोशी को मान्यता मिल जायेगी तो ये दौलत भी बहार आयेगी. ये और बात है, की तब निकल पड़ेगी पुलिस वालों की, गुंडों की, नेताओं की. क्या-क्या होगा, यह अलग से कभी लिखा जायेगा. फिलहाल जिस्मफरोशी को मान्यता देने की बात है. वह दे दी जाये. चोरी-छिपे कुकर्म करने से अच्छा है, लाइसेंस ही दे दो न. सब सुखी रहे. समलैंगिकों को मान्यता देने की बात हो रही है...लिव्इनरिलेशनशिप को मान्यता मिल रही है. इसलिए प्रियादत्त गलत नहीं कह रही , वह देख रही है इस समय को.

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  6. इस काम के वैधानिक करने या ना करने दोनों पक्षों के पक्ष और उलटे में तर्क हैं....
    वैधानिक होने में बुरी नहीं है अगर सही तरह से कानून बनाया जाए.
    अगर शराब बिक सकती है ये कह के कि समझदार लोग नहीं पीयेंगे. तो फिर इसमें क्या प्रॉब्लम है....जिनको वहाँ जाना है वो जायेंगे ही लीगल हो या न हो. लीगल होने से पुलिस की आमदनी बंद हो जायेगी थोड़ी.
    अगर ना हो और उन्मूलन हो जाए तो सब से अच्छा.....
    वैधानिक न होने की जरूरत पड़े तो अच्छा.....लेकिन देह व्यापार से जुड़े स्त्री-पुरुष के लिए कदम उठाना जरूरी है...

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  7. क़ानून बनते हैं पर पालन नहीं होता ..गिरीश पंकज जी की बात में दम है ...लेकिन फिर भी क्या ऐसी स्त्रियों को उनका पूरा हक मिल पाएगा ?

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  8. बहुत सटीक प्रश्न उठाएं हैं आपने.
    मैं इस मामले में आपकी बातों का समर्थन करता हूँ,मगर मगर मगर.......................
    किसी का एक शेर जो काफी हद तक वैश्यावृत्ति के पक्ष की बात करता है और आज के आदमी की खिलाफत करता है वो भी मुझे बहुत प्यारा लगता है. आप भी वो शेर देखें:-

    उसने तो जिस्म को ही बेचा है, एक फाकें को टालने के लिए.
    लोग ईमान बेच देते हैं,अपना मतलब निकलने के लिए.

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  9. satik vishleshan. bahut- bahut dhanywad.

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  10. paisa sab kuchh dabaata hai, aise mahilayen apna pet bharne ke liye yah sab karti hain, majboori bas , fir bhi badnaam
    iske vipreet kai oonche gharon ki mahilaye ya ladkiyan bhi ye karti hain kyon ? paise ke liye ya ayaashi ke liye ! jo pakda gaya so chor,
    kam se kam ye mahilayen kulkar to karti hain , ab sarkaar ko inke baare main sochna chahiye,


    ek vicharniy evam sahi mudda uthaya

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  11. सांसद प्रिया दत्त की बात से कतई सहमत नहीं हुं,ओर जो भी इसे कानूनी मान्यता देने के हक मे हे वो एक बार इन वेश्याओ से तो पुछे कि यह किस नर्क मे रह रही हे,इन्हे जबर्दस्ती से धकेला जाता हे इस दलदल मे, हां जो अपनी मर्जी से बिकना चाहे उस के लिये लाईसेंस या कानूनी मान्यता हो, उस मे किसी दलाल का काम ना हो, क्योकि जो जान बुझ कर दल दल मे जाना चाहे जाये... वेसे हमारे सांसद कोई अच्छा रास्ता क्यो नही सोचते? अगर यह सांसद इन लोगो की भलाई के लिये ही काम करना चाहते हे तो अपने बेटॊ की शादी इन से कर दे, यह कम से कम इज्जत से तो रह पायेगी

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  12. बहुत ही महत्‍वपूर्ण बातें कही आपने। इनपर भी विचार होना चाहिए।

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    ब्‍लॉगवाणी: ब्‍लॉग समीक्षा का एक विनम्र प्रयास।

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  13. आपने जो प्रश्न उठाये वे सटीक एवं सही हैं.

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  14. महत्‍वपूर्ण बातें कही आपने।
    क़ानून बनते हैं पर पालन नहीं होता

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  15. Dr.sharad ji ,
    namskar ,
    aapki soch ,suyogyata ,bhavnaon ka samman karte huye ,bas itana kahana chahta hun "dard-a-majalum
    ruswa nahin hote,chhanv na mili viswas ki ".bahut-bahut aadar hai aapke mukhar lekhan ke prati.koyi to virangana hai ,jo uthh kadi hai,samman dene .

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  16. यह बुराई सामंती पुरुषों ने शुरू की थी और सामंतवाद समाप्त होने के बाद भी पुरुषों ने इसे जारी रखने में योगदान दिया। इस बुराई को समाप्त करने की मुहिम भी पुरुषों ने ही शुरू की थी। महिलाओं को उनका विधिसंगत अधिकार दिलाने के बजाय महिला होकर उन्हें ग़र्त में झोंकने की प्रिया दत्त की दलील से कतई सहमत नहीं हुआ जा सकता। हम महिला दिवस मनाते हैं। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस भी मनाते हैं। ऐसे किसी भी मंच पर ऐसी बात नहीं उठाई जाती है कि जिस्मफ़रोशी की वृत्ति को वैधानिक दर्ज़ा दे दिया जाए। नारी को देवी का दर्ज़ा देने वाले देश की सांसद और सांसद तथा फ़िल्मों में नैतिकता को प्रचारित करने वाले सुनील दत्त की पुत्री प्रिया दत्त को ऐसा कौन सा अधिकार मिल गया है कि वे समस्त महिलाओं को मात्र एक वस्तु समझने का सुझाव दे रही हैं। उनसे सहमत होना तो दूर, उनकी निंदा की जानी चाहिए। डॉ. शरद सिंह ने अच्छी चर्चा छेड़ी है। इसके पक्ष में जनमत बनना चाहिए।

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